1
00:00:04,000 --> 00:00:08,400
आप यह मानते हैं कि शंकराचार्य की फिलोसफी मायावाद है।

2
00:00:08,400 --> 00:00:14,400
हां बिल्कुल बिल्कुल तो इसका कारण बताइए।

3
00:00:14,720 --> 00:00:18,880
इसमें शास्त्र में लिखा है। कौन से शास्त्र में? पद्म

4
00:00:18,880 --> 00:00:23,360
पुराण में मायावाद शास्त्र प्रमते और

5
00:00:23,360 --> 00:00:27,360
शास्त्र में भी लिखा है और आप ही के आप ही के जो सन्यासी हुए जैसे

6
00:00:27,360 --> 00:00:31,440
कि वाचस्पति मिश्र हुए तो उन्होंने भी ये ऐसा नहीं है कि

7
00:00:31,440 --> 00:00:35,760
बस इस वाले बोल रहे हैं या कोई एक एक पर्टिकुलर

8
00:00:35,760 --> 00:00:40,240
संप्रदाय बोल रहा है। ठीक है? आप जितने भी संप्रदाय ले लो जितना भी इंफॉर्मेशन

9
00:00:40,240 --> 00:00:44,400
अवेलेबल है Google पे हर जगह पे मायावाद केवल और केवल

10
00:00:44,400 --> 00:00:48,640
अद्वैतियों को ही कहा गया है। आपकी फिलॉसफी बुद्धिज्म से काफी मिलती जुलती है।

11
00:00:48,640 --> 00:00:52,960
तो मेरा क्वेश्चन पहला है क्या शास्त्र में लिखा है शंकराचार्य की फिलॉसफी

12
00:00:52,960 --> 00:00:57,120
मायावाद है। आपने बोला दूसरा पॉइंट बहुत से लोग बोलते हैं। बहुत

13
00:00:57,120 --> 00:01:01,120
से लोग ऐसा नहीं बोला। ऐसा नहीं बोला। जितने भी संप्रदाय ले लो

14
00:01:01,120 --> 00:01:05,680
जितना भी इंफॉर्मेशन अवेलेबल है Google पे हर जगह पे मायावाद

15
00:01:05,680 --> 00:01:10,240
केवल और केवल अद्वैतियों को ही कहा गया है और किसी को ऐसा नहीं बोला

16
00:01:10,240 --> 00:01:14,480
ऐसा नहीं बोला कि जितने भी संप्रदाय ले लो जितना भी इंफॉर्मेशन अवेलेबल है Google

17
00:01:14,480 --> 00:01:18,560
पे हर जगह पे मायावाद केवल और केवल अद्वैतियों को ही कहा गया है और

18
00:01:18,560 --> 00:01:19,840
किसी को

19
00:01:19,840 --> 00:01:24,400
ऐसा नहीं बोला ऐसा नहीं बोला जितने भी संप्रदाय ले लो जितना भी इंफॉर्मेशन

20
00:01:24,400 --> 00:01:28,560
अवेलेबल है Google पे हर जगह पे मायावाद केवल और केवल

21
00:01:28,560 --> 00:01:32,640
अद्वैतियों को ही कहा गया और पहली बात आपने कही क्या शास्त्र में लिखा

22
00:01:32,640 --> 00:01:37,360
है तो मैंने उस पर मेरा प्रश्न है क्या शास्त्र में लिखा है कि शंकराचार्य का जो अद्वैतवाद

23
00:01:37,360 --> 00:01:41,360
है वही मायावाद है। ठीक है? दूसरा पॉइंट

24
00:01:41,360 --> 00:01:45,440
यह है कि कई लोगों के बोल देने से वो प्रमाण नहीं बनता है।

25
00:01:45,440 --> 00:01:49,520
महाभारत में भीष्म जी ने ये बात कही है युधिष्ठिर जी से कि कई

26
00:01:49,520 --> 00:01:53,600
लोगों के कह देने से पूर्व में किसी के कर देने से वह प्रमाण नहीं माना जाता

27
00:01:53,600 --> 00:01:57,840
है। शास्त्रों द्वारा उसे स्वीकार किए जाने पर प्रमाण माना जाता है। तर्क

28
00:01:57,840 --> 00:02:01,920
भी ले लीजिए। दुनिया में बहुत से लोग हैं जो कहते हैं सनातन धर्म

29
00:02:01,920 --> 00:02:06,160
बुरा है। ईसाई है, बाइबल वाले

30
00:02:06,160 --> 00:02:11,840
हैं। तो उसके आधार पे हम ये नहीं कह सकते कि नहीं सनातन धर्म बुरा है।

31
00:02:11,840 --> 00:02:16,000
तीसरा पॉइंट था आपकी कि बुद्ध से मैच खाती थी। अगर कहीं-कहीं

32
00:02:16,000 --> 00:02:20,000
पे हमारा हमारा कोई चीजें मिल रही है तो ऐसे तो मैं आपके अंदर की

33
00:02:20,000 --> 00:02:24,080
कई चीजें मिला दिखा दूंगा जो कुत्तों से भी मिलेगी, जानवरों से भी मिलेगी। जैसे

34
00:02:24,080 --> 00:02:28,400
कि जो एक स्वान है वह दांतों

35
00:02:28,400 --> 00:02:32,640
से चबाकर खाना खाता है। आप भी दांतों से चबाकर खाना खाते हैं। तो

36
00:02:32,640 --> 00:02:35,040
इस कारण से क्या आपको स्वान माना जाए?

37
00:02:35,040 --> 00:02:39,040
की बात जो है पद्म पुराण में कही गई है प्रचंड बौद्ध। वही है

38
00:02:39,040 --> 00:02:43,040
क्योंकि शंकराचार्य को आप शिव का अवतार मानते हैं और शिव जीना के दिया है। बस इस और मुझे आप दिखा

39
00:02:43,040 --> 00:02:47,200
दीजिए कौन सा ऐसा शिव शिव का ऐसा कौन सा अवतार है जिसने अवैदिक मायावा दिया है। मुझे प्रमाण

40
00:02:47,200 --> 00:02:51,200
दीजिए फिर। भगवान शंकर के लिए कहा गया है एक करोड़ से ज्यादा अवतार

41
00:02:51,200 --> 00:02:55,200
हैं उनके। तो अब मैं आपसे अगर यह पूछूं कि आप मुझे वो बाकी के एक

42
00:02:55,200 --> 00:02:59,200
करोड़ अवतार है जो उनके प्रमाण दे दीजिए और अगर नहीं

43
00:02:59,200 --> 00:03:03,200
है तो मैं अगर नहीं है अगर नहीं है तो मैं ये कह दूं कि वो सब आप

44
00:03:03,200 --> 00:03:07,280
ही हो इस में ही है वो सारे एक करोड़ अवतार तो ये क्या

45
00:03:07,280 --> 00:03:11,280
ठीक है अगर वहां पर अगर

46
00:03:11,280 --> 00:03:15,360
वहां पर मुझे बोलने दीजिए मेरा तर्क ये है मेरा तर्क ये है मेरा

47
00:03:15,360 --> 00:03:19,360
तर्क ये है कि अगर वहां पर शंकर के भगवान शंकर के

48
00:03:19,360 --> 00:03:23,440
अवतार की बात हो रही है और उनका कोई अन्य प्रमाण नहीं मिल

49
00:03:23,440 --> 00:03:27,520
रहा है। इसलिए कि जो उपलब्ध दिखाई दे रहे हैं अवतार उसमें से किसी

50
00:03:27,520 --> 00:03:31,600
को एक को पकड़ के वैदिक बना दो। यह कहां का सनातन सिद्धांत है? जो

51
00:03:31,600 --> 00:03:35,600
अंतिम रूप से है वो निर्गुण है वो बौद्ध जैसा है। यह कहां लिखा

52
00:03:35,600 --> 00:03:37,760
है?

53
00:03:37,760 --> 00:03:41,840
वहां पर वेदों के आधार पे बताया गया बौद्ध लिखा है या वेदों

54
00:03:41,840 --> 00:03:45,840
के अगेंस्ट है। तो यार सीधी सी बात

55
00:03:45,840 --> 00:03:50,000
है। कोई भी व्यक्ति अपने आप को अवैदिक नहीं बोलेगा। जो वेदों का सहारा लेकर जब

56
00:03:50,000 --> 00:03:50,500
वो

57
00:03:50,240 --> 00:03:54,400
बुद्ध जो बुद्धिज्म के सिमिलर कोई कांसेप्ट दे रहा है वेदों का सहारा

58
00:03:54,400 --> 00:03:58,400
लेकर तो फिर वो वो लोग क्यों बोलेंगे कि भाई मैं

59
00:03:58,400 --> 00:04:02,640
अवैदिक वाला मायावादी हूं। अरे आपने कहा कोई भी खुद को अवैदिक क्यों कहेगा?

60
00:04:02,640 --> 00:04:06,640
तो अगर कोई भी खुद को अवैदिक नहीं कहेगा तो कोई भी खुद को मायावादी

61
00:04:06,640 --> 00:04:10,880
क्यों कहेगा। हां मैं आपको बताता हूं। हमारे सन्यासी

62
00:04:10,880 --> 00:04:15,040
स्वयं को वैदिक भी तो कहते हैं। वहां पर

63
00:04:15,040 --> 00:04:19,280
जो शास्त्र में आप बात कर रहे हैं कि अवैदिक मायावाद

64
00:04:19,280 --> 00:04:23,440
तो हमारे सन्यासियों ने स्वयं को अवैदिक मायावादी कहा

65
00:04:23,440 --> 00:04:27,680
है क्या? हमारे सन्यासी स्वयं को वैदिक भी तो कहते

66
00:04:27,680 --> 00:04:31,680
हैं। वैष्णव भी तो कहते हैं। धार्मिक भी तो

67
00:04:31,680 --> 00:04:35,920
कहते हैं। सच्चिदानंद स्वरूप का बोध कराने वाला भी तो कहते

68
00:04:35,920 --> 00:04:39,920
हैं। ये बात आपने क्यों नहीं मानी? इसका मतलब यह

69
00:04:39,920 --> 00:04:43,920
है कि जब कोई खुद को वैदिक कह रहा है तो उसकी बात पर आपको

70
00:04:43,920 --> 00:04:47,920
विश्वास नहीं है। मगर जब कोई खुद को मायावादी कह रहा है तो क्योंकि वहां

71
00:04:47,920 --> 00:04:52,000
से आपका मंतव्य सिद्ध हो रहा है। वो पद पुराण से आप उसको जोड़ पा रहे हैं। इसलिए वो

72
00:04:52,000 --> 00:04:56,560
बात आपके लिए प्रमाणिक हो जाएगी। हम

73
00:04:56,560 --> 00:05:00,560
इसका अर्थ क्या हुआ? जिस जिस व्यक्ति के बोले हुए एक वचन

74
00:05:00,560 --> 00:05:05,280
पर हमको भरोसा नहीं है, उसके ही दूसरे वचन पर हमको भरोसा है।

75
00:05:05,280 --> 00:05:09,280
अब आगे जो बात आती है वो यह है कि शंकराचार्य को आने की

76
00:05:09,280 --> 00:05:13,280
आवश्यकता ही क्या थी? अगर उन्हें एज इट इज बौद्धों का ही वो

77
00:05:13,280 --> 00:05:17,680
देना था। तो मैं एक बात आपसे पूछ रहा हूं कि जब बौद्धों

78
00:05:17,680 --> 00:05:22,240
का अतिक्रमण हुआ था इस दुनिया में तो आप गुरु शिष्य परंपरा मधवाचार्य

79
00:05:22,240 --> 00:05:26,240
की फॉलो करते हैं। वह जो ज्ञान है भगवान कृष्ण से आया है वह

80
00:05:26,240 --> 00:05:31,120
ज्ञान उस समय धरती पर था कि नहीं था? बिल्कुल था।

81
00:05:31,120 --> 00:05:35,840
तो शंकराचार्य को क्यों आना पड़ रहा है हिंदुओं को बचाने के लिए?

82
00:05:35,840 --> 00:05:41,600
अच्छा बुद्धों का खंडन किसने किया था?

83
00:05:41,600 --> 00:05:46,000
बुद्धों से बुद्धों से इसलिए लड़े, बुद्धों से इसलिए लड़े क्योंकि उनकी उनकी फिलॉसफी

84
00:05:46,000 --> 00:05:51,040
उनको फैलानी थी। बौद्धों का खंडन इसलिए किया। ठीक है?

85
00:05:51,040 --> 00:05:55,280
आपने कोई भी सनातन सिद्धांत नहीं दिया कि मायावाद

86
00:05:55,280 --> 00:05:59,520
को मायावाद जिस मायावाद की बात पद्म पुराण में की जा रही है

87
00:05:59,520 --> 00:06:03,680
वो मायावाद जो है वो वही मायावाद है जो शंकराचार्य

88
00:06:03,680 --> 00:06:07,840
जी का मायावाद है। ये देखिए आपके

89
00:06:07,840 --> 00:06:12,560
द्वारा आपके अनुसार प्रामाणिक परंपरा

90
00:06:12,560 --> 00:06:16,720
हां रामानुजाचार्य परंपरा पहले इन्होंने श्लोक

91
00:06:16,720 --> 00:06:21,120
दिखाया वो पद्म पुराण का देख लीजिए श्लोक दिखाया है देख लीजिए हेलो

92
00:06:21,120 --> 00:06:25,600
हेलो प्रतिवादी को मानो आक्षेप करने के लिए

93
00:06:25,600 --> 00:06:30,000
किसी पुराण का कोई मूल श्लोक मिलता ही नहीं है इसलिए

94
00:06:30,000 --> 00:06:34,240
वह प्रक्षिप्त श्लोकों के आधार पर आक्षेप की इमारत

95
00:06:34,240 --> 00:06:38,240
खड़ी करता करना चाहता है। अब ये यहां आपको कह रहे हैं फिलहाल सबसे पहला

96
00:06:38,240 --> 00:06:42,240
क्वेश्चन कि ये जो आचार्य जिनका बुक इतना मोटा सा बुक

97
00:06:42,240 --> 00:06:46,480
आप दिखा रहे हैं। ठीक है? सबसे पहले तो वो कौन से ईयर के थे?

98
00:06:46,480 --> 00:06:50,640
क्वेश्चन नंबर वन। ठीक है? और किस आधार पे? दूसरा क्वेश्चन कि उन्होंने

99
00:06:50,640 --> 00:06:55,600
किस आधार पे उसको प्रक्षिप्त कहा है?

100
00:06:55,600 --> 00:06:56,800
ये आचार 19वीं

101
00:06:56,800 --> 00:07:00,960
सदी के ही है। क्या कब के हैं? 19वीं

102
00:07:00,960 --> 00:07:05,120
सदी के ही है। अरे तो 19वीं सदी के तो उसको फिर प्रमाण कैसे मान लेंगे

103
00:07:05,120 --> 00:07:09,120
हम लोग? मतलब नहीं मानते ना कि ये ये जो है

104
00:07:09,120 --> 00:07:13,520
प्रामाणिक आचार्य हैं। इसकी परिभाषा क्या है? प्रामाणिक

105
00:07:13,520 --> 00:07:17,680
आचार्य की परिभाषा क्या है? जो ऑथेंटिक प्रॉपर

106
00:07:17,680 --> 00:07:21,680
गुरु परंपरा से हो तो ये परंपरा है

107
00:07:21,680 --> 00:07:26,960
और यह सिद्ध हो रहा है तो आप ये इसलिए नहीं मानेंगे क्योंकि ये 19वीं सदी के हैं।

108
00:07:26,960 --> 00:07:31,040
19वीं सदी की बात ही नहीं है। अरे तो 19वीं सदी के तो उसको भी प्रमाण कैसे मान

109
00:07:31,040 --> 00:07:35,040
लेंगे हम लोग। 19वीं सदी की बात ही नहीं है। अरे तो 19वीं सदी के तो

110
00:07:35,040 --> 00:07:39,200
उसको भी प्रमाण कैसे मान लेंगे हम लोग? 19वीं सदी की बात ही नहीं है। अरे तो 19वीं

111
00:07:39,200 --> 00:07:43,600
सदी के तो कि उसको भी प्रमाण कैसे मान लेंगे हम लोग यहां पे। मतलब कि अगर कोई आचार्य 19वीं

112
00:07:43,600 --> 00:07:48,000
सदी में अगर ऑथेंटिक गुरु परंपरा से होगा तो वो प्रामाणिक नहीं माना जाएगा। प्रामाणिक

113
00:07:48,000 --> 00:07:52,160
की परिभाषा ये है। नहीं नहीं नहीं [हंसी] ये

114
00:07:52,160 --> 00:07:56,320
बात तो मैंने बोली नहीं है। ये बात मैंने बोली नहीं है। ये आपने एकदम गलत पूरा ऐसा मतलब

115
00:07:56,320 --> 00:08:00,320
घुमा दिया यहां पे। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। मैं ये नहीं कह रहा कि वो आचार्य है। वो

116
00:08:00,320 --> 00:08:04,320
प्रमाणिक परंपरा के नहीं है। मैंने ये नहीं कहा। प्रामाणिक आचार्य का अर्थ क्या

117
00:08:04,320 --> 00:08:08,560
बताया आपने? देखो सुनो अभी तक मैंने उस चीज को कंप्लीटली रिजेक्ट

118
00:08:08,560 --> 00:08:11,920
भी नहीं किया। मैंने अरे तो 19 अधिग्रहों की उसको भी फिर प्रमाण कैसे मान लेंगे

119
00:08:11,920 --> 00:08:16,160
हम लोग देखो सुनो अभी तक मैंने उस चीज को कंप्लीटली रिजेक्ट भी नहीं किया मैंने

120
00:08:16,160 --> 00:08:20,240
अरे तो 1920 अधिगो की उसको भी फिर प्रमाण कैसे मान लेंगे हम लोग देखो

121
00:08:20,240 --> 00:08:24,240
सुनो अभी तक मैंने उस चीज को कंप्लीटली रिजेक्ट भी नहीं किया मैंने अरे तो

122
00:08:24,240 --> 00:08:28,240
1920 अधि अधिकतों की उसको भी प्रमाण कैसे मान लेंगे हम लोग देखो सुनो अभी

123
00:08:28,240 --> 00:08:33,200
तक मैंने उस चीज को कंप्लीटली रिजेक्ट भी नहीं किया मैंने पूछा किस आधार पर कहा

124
00:08:33,200 --> 00:08:37,280
पे आप इस पे अध्ययन करिएगा कि वो उन्होंने क्या कहा किस आधार पर कहा

125
00:08:37,280 --> 00:08:41,440
गलत कहा सही कहा अरे आप दे रहे हो मैं क्यों अध्ययन करूं जा के आप प्रमाण दो ना

126
00:08:41,440 --> 00:08:46,480
अरे आप कह रहे हो मैं कंप्लीटली रिजेक्ट नहीं कर रहा हूं तो आप अभी बीच मजधार में हो ना

127
00:08:46,480 --> 00:08:50,560
अरे तो इससे तो क्वेश्चन पूछ रहा है आपको कि उसका उत्तर दो मुझको अच्छे से बोला तो

128
00:08:50,560 --> 00:08:54,560
पढ़ के बताया आपको पूरा पढ़ के क्या बताया था पढ़

129
00:08:54,560 --> 00:08:58,720
के सुनाना नहीं होता एक्सप्लेनेशन देना होता है उन्होंने अपने गुरु से जिस पद्म पुराण

130
00:08:58,720 --> 00:09:02,800
का अध्ययन किया उसमें वो श्लोक नहीं था दूसरी बात उन्होंने

131
00:09:02,800 --> 00:09:07,200
इसका आधार ये भी बताया कि भैया ये जो माया

132
00:09:07,200 --> 00:09:11,200
है इस माया के बारे में वेदों में भी बात की गई है। तो अगर

133
00:09:11,200 --> 00:09:15,200
इस माया वेदों में दी गई माया के आधार पर पद पुराण में दी गई माया के

134
00:09:15,200 --> 00:09:19,680
आधार पे अगर कोई आचार्य अपने आप को मायावादी बोलेगा और मायावाद

135
00:09:19,680 --> 00:09:23,840
शब्द का खंडन किया जाएगा पद्म पुराण में तो वो गलत है। उन्होंने

136
00:09:23,840 --> 00:09:27,120
दोनों चीजें बताई प्रक्षिप्त भी बताया। अच्छा कोई

137
00:09:27,120 --> 00:09:32,160
कोई श्लोक प्रक्षिप्त है कि नहीं? इसका निर्णय किस आधार पे होगा? ये बताइए।

138
00:09:32,160 --> 00:09:36,410
अरे मैं आपको वही तो पूछो। क्वेश्चन मेरा है आपसे कि किस आधार पे होगा?

139
00:09:36,410 --> 00:09:40,480
[हंसी] दिया ना कि हमारे गुरु ने हमको नहीं पढ़ाया और अब वो

140
00:09:40,480 --> 00:09:44,480
आ रहा है सामने तो प्रक्षिप्त है। ये कहा आपने

141
00:09:44,480 --> 00:09:48,640
यह कहा कि जो जो भी आचार्य जिनका 19 सेंचुरी

142
00:09:48,640 --> 00:09:52,880
का आपने रेफरेंस दिया है उन्होंने इस आधार पर उसको प्रक्षिप्त बोला है

143
00:09:52,880 --> 00:09:56,880
क्योंकि उन्होंने वो चीज नहीं पढ़ी। बराबर ये इतना ही है बस।

144
00:09:56,880 --> 00:10:00,880
उन्होंने उन्होंने जिस पद्म पुराण का अध्ययन किया अपनी गुरु

145
00:10:00,880 --> 00:10:05,600
परंपरा से उस पद्म पुराण में वो श्लोक नहीं है।

146
00:10:05,600 --> 00:10:09,760
उस पद्म पुराण में नहीं है ना तो हो सकता है कि लास्ट [हंसी] होना है

147
00:10:09,760 --> 00:10:13,840
कि उनको जो पद्म पुराण दिया गया था वो अधूरा था पूरा नहीं था। और

148
00:10:13,840 --> 00:10:17,920
पूरे के नाम पे उन्हें दे दिया गया। परंपरा से आने वाला ज्ञान भी

149
00:10:17,920 --> 00:10:23,280
भंग हुआ। वैष्णवाचार्यों की परंपरा रामानुजाचार्य सिंपल

150
00:10:23,280 --> 00:10:29,280
आपके पास आपके पास रामानुजाचार्य का विधान सूत्र भाष्य

151
00:10:38,640 --> 00:10:42,640
आपके पास नहीं है लेकिन क्योंकि मेरे पास एक प्रमाण है कि श्रीमद रामानुजाचार्य

152
00:10:42,640 --> 00:10:46,960
ने श्री भाष्य में ये कहा है इस चीज को कहा है कि मायावादम

153
00:10:46,960 --> 00:10:50,960
अस शास्त्रम प्रचनम बद्धम उच्चते ये उन्होंने उसमें कोट

154
00:10:50,960 --> 00:10:55,120
किया रामानुजाचार्य जी ने इस श्लोक को उधत किया है तो

155
00:10:55,120 --> 00:10:59,280
हम यह मान जान लेंगे कि यह जो आचार्य हैं जिसके आधार पर हम

156
00:10:59,280 --> 00:11:03,440
यह मानते थे कि वैष्णवाचार्य ने उस श्लोक को प्रक्षिप्त

157
00:11:03,440 --> 00:11:07,520
माना है। हम इन आचार्य को गुरु विरोधी मानते हुए प्रामाणिक नहीं

158
00:11:07,520 --> 00:11:11,520
मानेंगे। अगर हम अपनी तसल्ली कर लेंगे और इस पर हम वीर भी बना

159
00:11:11,520 --> 00:11:15,920
देंगे। देखिए प्रक्षम बौद्ध रामानुजाचार्य

160
00:11:15,920 --> 00:11:20,480
के श्री भाषा के दूसरे अध्याय के दूसरे पाद के

161
00:11:20,480 --> 00:11:24,080
27 सूत्र में

162
00:11:24,080 --> 00:11:28,080
प्रचन्नम बोध बात यहां पर ये आ रही

163
00:11:28,080 --> 00:11:32,640
है कि वो श्लोक प्रक्षिप्त है कि नहीं श्लोक प्रक्षिप्त

164
00:11:32,640 --> 00:11:36,640
है कि नहीं श्लोक का उपयोग जी ने किया है कि

165
00:11:36,640 --> 00:11:40,720
नहीं आचार्य श्री एक बहुत हमारे पूज्य

166
00:11:40,720 --> 00:11:45,360
आचार्य हुए पंडित माधवाचार्य शास्त्री जी और उन्होंने

167
00:11:45,360 --> 00:11:49,520
बहुत कालजई ग्रंथ लिखे क्यों क्यों

168
00:11:49,520 --> 00:11:53,520
और पुराण दर्शन एक समय प्रभाव बहुत ज्यादा हो गया था आर्य

169
00:11:53,520 --> 00:11:54,160
समाज

170
00:11:54,160 --> 00:11:58,240
जो है पुराणों पर कटाक्ष कर रहा था तो यथोचित

171
00:11:58,240 --> 00:12:02,400
उत्तर उन्होंने समग्र रूप से उन्होंने दिया और उसमें उन्होंने एक जो ये मायावादम

172
00:12:02,400 --> 00:12:06,560
अच्छ शास्त्रम वाला जो श्लोक है पद्म पुराण का उसका भी खंडन किया

173
00:12:06,560 --> 00:12:11,280
उन्होंने उसमें उन्होंने कहा कि शंकराचार्य जी का जो

174
00:12:11,280 --> 00:12:15,440
सिद्धांत है वो भी श्रुति सम्मत है और यह जो श्लोक है प्रक्षिप्त

175
00:12:15,440 --> 00:12:19,680
है। उन्होंने श्रुति के आधार पर उसको खंडित किया। इन्होंने यह माना शंकराचार्य

176
00:12:19,680 --> 00:12:23,680
का मायावाद भी वैदिक है। हम जब इस तथ्य को ये

177
00:12:23,680 --> 00:12:27,680
जो संस्था है विकृत रूप से प्रस्तुत कर रही है। परंपराओं

178
00:12:27,680 --> 00:12:31,680
के विरुद्ध कार्य कर रही है। हमने हम जब इस तथ्य को रखते हैं तो इनके लोग कहते हैं कि

179
00:12:31,680 --> 00:12:35,840
पंडित माधवाचार्य शास्त्री जी प्रामाणिक आचार्य ही नहीं थे रामानुज

180
00:12:35,840 --> 00:12:39,840
परंपरा के। कब के हैं? 19वीं सदी के

181
00:12:39,840 --> 00:12:43,840
ही है। अरे तो 19वीं सदी के तो उसको फिर प्रमाण कैसे मान लेंगे हम

182
00:12:43,840 --> 00:12:48,240
लोग? तो उनकी प्रमाणिकता माधवाचार्य जी रामानुज

183
00:12:48,240 --> 00:12:52,960
परंपरा के थे और विद्वान पुरुष थे। शास्त्र निष्ठावान

184
00:12:52,960 --> 00:12:57,200
थे और माधवाचार्य जी के विषय में ऐसा कहना कि वो पारंपरिक

185
00:12:57,200 --> 00:13:01,200
नहीं थे। यह तो एक उनका अपलाप
