1
00:00:01,960 --> 00:00:06,480
[संगीत] दूसरा दशक पहला समास

2
00:00:06,480 --> 00:00:09,520
मूर्ख लक्षण

3
00:00:09,520 --> 00:00:13,520
हे एकदंत त्रिनयन गजानन आपको नमस्कार

4
00:00:13,520 --> 00:00:17,600
है। आप भक्तों को कृपा की दृष्टि से देखें। हे वेद माता

5
00:00:17,600 --> 00:00:21,920
और ब्रह्मसुता शारदा आपको भी नमस्कार करता हूं।

6
00:00:21,920 --> 00:00:27,040
आप कृपा कर मेरे हृदय में स्फूर्ति रूप में निवास कीजिए।

7
00:00:27,040 --> 00:00:31,040
अब सद्गुरु चरणों की वंदना तथा रघुनाथ का स्मरण करके मूर्ख

8
00:00:31,040 --> 00:00:35,040
के लक्षण इसलिए बतलाता हूं जिसमें लोग उनका

9
00:00:35,040 --> 00:00:39,280
त्याग करें। इसको निषेध मुख भी कहते हैं। निषेध

10
00:00:39,280 --> 00:00:43,440
मुख से शिक्षा ग्रहण करना। मूर्ख दो प्रकार के

11
00:00:43,440 --> 00:00:48,160
होते हैं। एक साधारण और दूसरा पढ़ा लिखा।

12
00:00:48,160 --> 00:00:52,560
दोनों के लक्षण विचित्र हैं। श्रोताओं को वे लक्षण भलीभांति

13
00:00:52,560 --> 00:00:56,720
समझ लेने चाहिए। पढ़े लिखे मूर्खों के लक्षण

14
00:00:56,720 --> 00:01:02,080
अगले समास में बदलाए गए हैं। विचक्षण श्रोता

15
00:01:02,080 --> 00:01:06,080
सावधान होकर सुने। लक्षण तो अपार हैं पर उनमें से

16
00:01:06,080 --> 00:01:10,400
कुछ लक्षण तत्पर होकर सुनिए। पहले उनके लक्षण सुनिए

17
00:01:10,400 --> 00:01:14,640
जो प्रपंची हैं जिन्हें आत्मज्ञान नहीं है जो केवल अज्ञानी

18
00:01:14,640 --> 00:01:17,120
है। एक मूर्ख वह होता है जो उन्हीं से विरोध करता

19
00:01:17,120 --> 00:01:21,360
है जिनके उदर से जन्म लेता है और पत्नी को ही मित्र मानता

20
00:01:21,360 --> 00:01:25,680
हो। एक मूर्ख वह होता है जो अपने सारे गोत्र को छोड़कर केवल

21
00:01:25,680 --> 00:01:29,760
स्त्री के अधीन होकर रहता हो और उसे मन की गुप्त बात बतलाता

22
00:01:29,760 --> 00:01:33,760
हो। एक मूर्ख वह है जो पराई स्त्री से प्रेम करता हो या

23
00:01:33,760 --> 00:01:37,760
ससुर के घर में रहता हो। या बिना कुल देखे किसी कन्या

24
00:01:37,760 --> 00:01:41,760
से विवाह करता हो। एक मूर्ख वह है जो

25
00:01:41,760 --> 00:01:45,760
समर्थ के सामने अभिमान करता हो।

26
00:01:45,760 --> 00:01:49,840
अपने आप को उसके बराबर समझता हो। और

27
00:01:49,840 --> 00:01:54,240
बिना शक्ति रहते हुए अधिकार जतलाता

28
00:01:54,240 --> 00:01:58,240
हो। एक मूर्ख वह है जो आप ही प्रशंसा करता हो।

29
00:01:58,240 --> 00:02:02,800
स्वदेश में रहकर विपत्ति भोगता हो या अपने बड़ों की कीर्ति बखानता

30
00:02:02,800 --> 00:02:07,040
हो। एक मूर्ख वह है जो अकारण हंसता हो।

31
00:02:07,040 --> 00:02:11,280
अच्छी बात बतलाने पर ना समझता हो। और बहुतों का बैरी

32
00:02:11,280 --> 00:02:15,280
हो। एक मूर्ख वह है जो अपने आदमियों से दूर

33
00:02:15,280 --> 00:02:19,440
रहता हो और पराए आदमियों से मित्रता करता हो या रात के समय

34
00:02:19,440 --> 00:02:23,680
दूसरों की निंदा करता हो। एक मूर्ख वह है

35
00:02:23,680 --> 00:02:28,000
जो बहुतों के जागते रहने पर भी उनके बीच में सोता हो

36
00:02:28,000 --> 00:02:32,240
और दूसरे के घर जाकर बहुत खाता हो। एक मूर्ख वह है

37
00:02:32,240 --> 00:02:36,480
जो अपने मान या अपमान की बातें स्वयं सबसे कहता फिरता हो

38
00:02:36,480 --> 00:02:40,560
अथवा जिसके जिसके मन में सात प्रकार के व्यसन

39
00:02:40,560 --> 00:02:44,960
ड्यूट वैश्या गमन, चोरी, चुगली,

40
00:02:44,960 --> 00:02:49,440
परस्त्री गमन, लघु पक्षी क्रीडा और किन्नरी

41
00:02:49,440 --> 00:02:53,920
गायन। भगवत कृपा से मेरी जानकारी

42
00:02:53,920 --> 00:02:57,920
में तो यह सारे लक्षण ये जो अभी-अभी बोले हैं वो मुझे लगता

43
00:02:57,920 --> 00:03:02,640
है कि नहीं होंगे। हम सभी जो यहां पे उपस्थित हैं। रहते

44
00:03:02,640 --> 00:03:07,120
हो। एक मूर्ख वह है जो स्वयं प्रयत्न करना छोड़ दे और निश्चित निश्चिंत

45
00:03:07,120 --> 00:03:11,520
होकर दूसरों के भरोसे बैठा रहे अथवा अल्हा

46
00:03:11,520 --> 00:03:15,600
दीपन में ही संतुष्ट रहे। एक मूर्ख वह है जो

47
00:03:15,600 --> 00:03:19,680
घर में तो बहुत सी बातें सोचता हो पर सभा में जा बोलने में

48
00:03:19,680 --> 00:03:24,160
लजाता हो। एक मूर्ख वह है जो अपने से श्रेष्ठ

49
00:03:24,160 --> 00:03:28,880
लोगों के साथ मित्रता या बराबरी का संबंध स्थापित करता हो

50
00:03:28,880 --> 00:03:33,360
अथवा दिया हुआ उपदेश ना सुनता हो।

51
00:03:33,360 --> 00:03:37,360
एक मूर्ख वह है यहां पर किसी की याद आ रही है। मुझे अपने से

52
00:03:37,360 --> 00:03:41,360
श्रेष्ठ लोगों के साथ मित्रता या बराबरी का संबंध और दिया

53
00:03:41,360 --> 00:03:46,400
हुआ उपदेश ना सुनता हो।

54
00:03:46,400 --> 00:03:50,480
जो एक मूर्ख वह है जो उपदेश देता हो।

55
00:03:50,480 --> 00:03:54,800
जो ऐसे लोगों को उपदेश देता हो जो उसकी बात ही ना सुनते हो।

56
00:03:54,800 --> 00:03:58,800
जो बड़ों के सामने अपना ज्ञान छांटता हो या श्रेष्ठ लोगों को धोखे

57
00:03:58,800 --> 00:04:02,960
में डालता हो। एक मूर्ख वह है जो

58
00:04:02,960 --> 00:04:07,440
विषय वासना में निर्लज्ज हो गया हो अथवा मर्यादा का उल्लंघन

59
00:04:07,440 --> 00:04:11,600
करके सब काम करता हो। एक मूर्ख वह है जो रोगी होने

60
00:04:11,600 --> 00:04:16,080
पर भी औषधि का सेवन ना करता हो। कभी पथ्य का संयम

61
00:04:16,080 --> 00:04:20,160
ना करता हो और सहज में मिलने वाले अच्छे पदार्थ को ग्रहण

62
00:04:20,160 --> 00:04:26,160
ना करता हो। एक मूर्ख वह है जो

63
00:04:27,280 --> 00:04:31,440
बिना किसी संगी साथी के अकेला विदेश जाता हो। ये बिना

64
00:04:31,440 --> 00:04:35,680
समझे मूझे समझे बूझे अनजान आदमी

65
00:04:35,680 --> 00:04:39,680
के साथ हो लेता हो या बड़ी हुई नदी में कूद पड़ता हो।

66
00:04:39,680 --> 00:04:43,920
एक मूर्ख वह है जो ऐसी जगह बहुत

67
00:04:43,920 --> 00:04:48,160
अधिक आता जाता हो जहां उसका बहुत मान हो गया हो

68
00:04:48,160 --> 00:04:52,320
या जो अपने मान अपमान का ध्यान ना रखता हो। एक मूर्ख

69
00:04:52,320 --> 00:04:56,400
वह है जो अपने धनवान सेवक के आश्रम में

70
00:04:56,400 --> 00:05:00,560
जाकर रहता हो और सदा दुखी रहता हो। एक

71
00:05:00,560 --> 00:05:04,720
मूर्ख वह है जो कारण आदि का विचार ना करके बिना

72
00:05:04,720 --> 00:05:08,880
अपराध के ही दंड देता हो या जरा सी बात में कंजूसी

73
00:05:08,880 --> 00:05:12,880
करता हो। एक मूर्ख वह है जो देवताओं और पितरों को

74
00:05:12,880 --> 00:05:17,040
ना मानता हो। शक्ति ना होते हुए भी बहुत बढ़चढ़कर बातें

75
00:05:17,040 --> 00:05:21,040
करता हो और बहुत बकवाद करता हो। एक मूर्ख

76
00:05:21,040 --> 00:05:25,440
वह है जो घर के लोगों को तो खाने दौड़ता हो

77
00:05:25,440 --> 00:05:29,520
परंतु बाहर बिल्कुल सीधा सादा और

78
00:05:29,520 --> 00:05:33,920
बेचारा बना रहता हो। ऐसे तो कई होंगे यहां पर

79
00:05:33,920 --> 00:05:37,600
घर में एकदम

80
00:05:37,600 --> 00:05:41,760
बिल्कुल किंग ऑफ द रिंग और बाहर सबके

81
00:05:41,760 --> 00:05:46,240
लिए मृदभाष। हां? ऐसे ज्यादातर

82
00:05:46,240 --> 00:05:51,920
लोग करते हैं। एक मूर्ख वह है

83
00:05:51,920 --> 00:05:55,920
जो नीच जाति के लोगों की संगत करता हो। पराई

84
00:05:55,920 --> 00:06:00,080
स्त्री के साथ एकांत में बातें करता हो

85
00:06:00,080 --> 00:06:04,080
या रास्ता चलते-चलते खाता हो। एक

86
00:06:04,080 --> 00:06:09,520
मूर्ख वह है जो परोपकार ना करता हो।

87
00:06:09,520 --> 00:06:13,680
दूसरे के उपकार का बदला अपकार से देता हो और जो काम करता

88
00:06:13,680 --> 00:06:17,840
हो पर बातें बहुत बगारता हो। काम करता हो पर बातें बहुत

89
00:06:17,840 --> 00:06:22,080
बगारता हो। यहां पर एक बात क्लियर करता चलूं। नीच जाति के

90
00:06:22,080 --> 00:06:26,320
लोगों की संगत करता हो। तो यह नीच जाति के

91
00:06:26,320 --> 00:06:30,800
लोगों की संगत विपरीतार्थक गुण दोष वाली।

92
00:06:30,800 --> 00:06:35,680
जो कुल परंपरा है उसकी संगत करने से संगत का अर्थ?

93
00:06:35,680 --> 00:06:39,680
कि रहन सहन आचार विचार का जहां पर लेनदेन हो रहा

94
00:06:39,680 --> 00:06:45,200
है तो वहां पर बहुत ज्यादा संभावना होती है कि वह जो विपरीतार्थक

95
00:06:45,200 --> 00:06:49,600
गुण दोष हैं वो आपके कुल परंपरा को विकृत

96
00:06:49,600 --> 00:06:52,800
कर करेंगे। आपके यहां के गुण दोष उसको और उसके

97
00:06:52,800 --> 00:06:56,800
यहां के गुण दोष आपको तो जो शुद्ध परंपरा है उसमें विकृति

98
00:06:56,800 --> 00:07:00,880
आ सकती है। तो जो संगत है वो

99
00:07:00,880 --> 00:07:04,880
अपने समान जो अपनी कुल परंपरा है जो अपने

100
00:07:04,880 --> 00:07:09,760
गुण दोष वाले लोग हैं उन्हीं के साथ में संगत रखने से

101
00:07:09,760 --> 00:07:14,720
कम से कम विकृति उत्पन्न होती है। ठीक है?

102
00:07:14,720 --> 00:07:19,680
तो यहां पर वह वाला है द्वेष मूलक नहीं है। व्यवस्था मूलक बात है।

103
00:07:19,680 --> 00:07:23,760
जैसे कि ऑपरेशन थिएटर का कई बार मैंने

104
00:07:23,760 --> 00:07:28,000
उदाहरण दिया है कि ऑपरेशन थिएटर के अनुकूल डॉक्टर और

105
00:07:28,000 --> 00:07:31,600
डॉक्टर के जो

106
00:07:31,600 --> 00:07:36,320
परिकर होते हैं उनको माना जाता है तो उनको प्रवेश का

107
00:07:36,320 --> 00:07:40,400
प्रवेश की आज्ञा होती है। परंतु वहीं पर जिनके बारे में

108
00:07:40,400 --> 00:07:44,720
हमें बोध नहीं है भले ही अंदर जो मर्जी मरीज है जिसकी

109
00:07:44,720 --> 00:07:49,760
वहां चिकित्सा हो रही है जिसका ऑपरेशन हो रहा है उसके घर वाले भी

110
00:07:49,760 --> 00:07:53,840
माना जाता है कि वह वहां के वातावरण के प्रतिकूल है।

111
00:07:53,840 --> 00:07:58,160
इस कारण से उनका प्रवेश निषेध होता है और विशेष स्थितियों

112
00:07:58,160 --> 00:08:02,560
में ही उनको अंदर जाने की अनुमति प्राप्त हो पाती है।

113
00:08:02,560 --> 00:08:08,560
तो इसी प्रकार से एक मूर्ख वह

114
00:08:08,560 --> 00:08:11,840
जो

115
00:08:11,840 --> 00:08:16,080
क्रोधी पेटु या आलसी हो, मलन और कुटिल हो या मान आदि

116
00:08:16,080 --> 00:08:20,160
कुछ भी ना होने पर झूठा अभिमान करता हो। एक मूर्ख वह

117
00:08:20,160 --> 00:08:24,720
है जो क्षद्र झूठा, कपटी, बकवादी, कुकर्मी और उद्वत,

118
00:08:24,720 --> 00:08:28,720
उद्धत हो। या बहुत अधिक सोता हो। एक मूर्ख वह

119
00:08:28,720 --> 00:08:33,120
है जो ऊंचे स्थान पर चढ़कर कपड़े पहनता हो। बाहर चौरास्ते

120
00:08:33,120 --> 00:08:37,600
पर जाकर बैठता हो और सदा नंगा ही दिखाई पड़ता हो।

121
00:08:37,600 --> 00:08:41,920
एक मूर्ख वह है जो वैदति वैदति

122
00:08:41,920 --> 00:08:46,000
और व्यतिपात आदि बुरे मुहूर्तों में यात्रा करता हो और

123
00:08:46,000 --> 00:08:50,160
अपशगुणों से अपना घात करता हो। एक

124
00:08:50,160 --> 00:08:54,240
मूर्ख वह है जो क्रोध अपमान या कुबुद्धि के कारण स्वयं

125
00:08:54,240 --> 00:08:58,320
अपनी हत्या करता हो और जिसके दृढ़ बुद्धि ना हो। एक

126
00:08:58,320 --> 00:09:02,480
मूर्ख वह है जो अपने प्रिय लोगों को दुखी करता हो। सुखी करने

127
00:09:02,480 --> 00:09:06,720
वाला शब्द भी मुंह से ना निकालता हो और नीचों की बढ़ाई या वंदना

128
00:09:06,720 --> 00:09:10,880
करता हो। एक मूर्ख वह है जो अपनी रक्षा का तो बहुत

129
00:09:10,880 --> 00:09:14,960
यत्न करता हो पर अपने शरणागतों की ओर कुछ भी ध्यान ना देता हो

130
00:09:14,960 --> 00:09:19,120
अथवा लक्ष्मी का बहुत अधिक भरोसा करता हो। एक मूर्ख वह

131
00:09:19,120 --> 00:09:23,200
है जो स्त्री और पुत्र को ही सब कुछ मान बैठा हो और ईश्वर को भूल गया

132
00:09:23,200 --> 00:09:27,040
हो। एक मूर्ख वह है जो यह नहीं जानता है कि जैसा

133
00:09:27,040 --> 00:09:31,680
करता है वैसा ही जो जैसा करता है वैसा ही भरता है।

134
00:09:31,680 --> 00:09:35,200
एक मूर्ख वह है

135
00:09:35,200 --> 00:09:39,440
जो यह समझता हो कि स्त्रियों को पुरुषों से अटगुनी काम वासना

136
00:09:39,440 --> 00:09:43,600
होती है इसलिए जिसके अनेक विवाह किए हो। जिसने अनेक विवाह

137
00:09:43,600 --> 00:09:48,240
किए हो। यहां पर अभी एक बात आई है कि एक

138
00:09:48,240 --> 00:09:52,320
जो जैसा करता है वैसा ही भरता है जो यह ना जाने यहां पर

139
00:09:52,320 --> 00:09:56,640
आप देखो समाज में कई ऐसी लोकोक्तियां

140
00:09:56,640 --> 00:10:02,400
मुहावरे और अ

141
00:10:02,400 --> 00:10:06,560
सिद्धांत लोकाचार में प्रासंगिक है प्रसिद्ध

142
00:10:06,560 --> 00:10:10,880
है जो हमें यदा कदा यहां वहां एन केन प्रकारन

143
00:10:10,880 --> 00:10:14,880
सुनाई देते ही रहते हैं और जितने भी ऐसे

144
00:10:14,880 --> 00:10:19,520
सिद्धांत है जिनका खंडन नहीं किया जा सकता है। उन सारे सिद्धांतों

145
00:10:19,520 --> 00:10:23,600
का जो मूल रूप है वह आपको कहीं ना कहीं हमारे सनातन

146
00:10:23,600 --> 00:10:28,000
धर्म ग्रंथों में मिल जाएगा। इसमें से ऐसा ही एक सिद्धांत

147
00:10:28,000 --> 00:10:32,400
है जो समाज में प्रचलित है। जैसी करनी वैसी भरनी।

148
00:10:32,400 --> 00:10:36,400
टिट फॉर टैट। तो टिथ फॉर टैट जो है

149
00:10:36,400 --> 00:10:40,560
हमारे सनातन शास्त्रों में कहां वर्णित है? कहां से

150
00:10:40,560 --> 00:10:42,800
निकल के आ रहा है?

151
00:10:42,800 --> 00:10:47,600
महाभारत में सीधा सीधा बताया गया है कि

152
00:10:47,600 --> 00:10:51,920
जो व्यवहार अपने साथ स्वीकार ना हो वही

153
00:10:51,920 --> 00:10:56,320
व्यवहार दूसरे के साथ ना करना

154
00:10:56,320 --> 00:10:59,440
धर्म है।

155
00:10:59,440 --> 00:11:03,760
है ना? क्योंकि जो आप समाज को दे रहे हो

156
00:11:03,760 --> 00:11:07,760
वही आपको वापस प्राप्त होना है। तो इसलिए आप अगर ये चाहते हो कि मुझे

157
00:11:07,760 --> 00:11:11,920
दर्द ना मिले तो दर्द दो भी मत। तो यह

158
00:11:11,920 --> 00:11:16,000
उसका मूल प्राप्त हुआ ना जैसी करनी वैसी भरनी का टिट

159
00:11:16,000 --> 00:11:20,800
फॉर टेट का तो इस तरीके से आप देखिए जो समाज के लिए उपयोगी

160
00:11:20,800 --> 00:11:24,800
सिद्धांत हैं जो नियम है वो

161
00:11:24,800 --> 00:11:28,960
सारे हमें हमारे सनातन शास्त्रों से प्राप्त हो जाते हैं। हमें कहीं

162
00:11:28,960 --> 00:11:33,200
भी जाने की आवश्यकता नहीं होती। जैसे मैंने अपनी कुछ

163
00:11:33,200 --> 00:11:37,200
रील्स में भी बताया है ऐसे सिद्धांतों के बारे में जो छुपे तौर

164
00:11:37,200 --> 00:11:41,200
पर हमारे यहां पर पहले से ही वर्णित जैसे खाली

165
00:11:41,200 --> 00:11:45,440
दिमाग शैतान का घर ऐसा

166
00:11:45,440 --> 00:11:49,440
प्रचलित है ना यह लोग उत्तम मुहावरा खाली दिमाग शैतान का घर ये भगवत गीता

167
00:11:49,440 --> 00:11:53,440
में आप देख लीजिए इसका मूल आपको मिल जाएगा भगवत गीता में

168
00:11:53,440 --> 00:11:58,560
लिखा हुआ है कि मनुष्य

169
00:11:58,560 --> 00:12:04,320
एक क्षण भी बिना कोई कर्म किए नहीं रह सकता

170
00:12:04,320 --> 00:12:08,400
तो ऐसे में यदि तुम शास्त्र सम्मत कर्मों को करने में

171
00:12:08,400 --> 00:12:12,960
बुद्धि नहीं लगाओगे तो क्योंकि तुम कुछ ना कुछ करोगे तो तुम्हारे द्वारा

172
00:12:12,960 --> 00:12:17,040
अशास्त्रीय चीजें होंगी यानी कि धर्म विरुद्ध चीजें तो

173
00:12:17,040 --> 00:12:21,040
क्या हो गया जब तुमने कुछ नहीं कर किया तो तुमसे क्या हुआ अधर्म हुआ

174
00:12:21,040 --> 00:12:27,040
तो खाली दिमाग शैतान का घर हो

175
00:12:27,120 --> 00:12:31,600
तो इसलिए आपको अपनी बुद्धि को शास्त्र सम्मत सिद्धांतों

176
00:12:31,600 --> 00:12:35,600
के पालन में लगाते रहना चाहिए क्योंकि यदि आप नहीं

177
00:12:35,600 --> 00:12:39,680
लगाएंगे तो आप कहीं ना कहीं तो लगाएंगे वही है खाली दिमाग शैतान

178
00:12:39,680 --> 00:12:45,680
देगा तो जब आप खाली होंगे तो आपसे शैतानी हो जाएगी

179
00:12:45,760 --> 00:12:50,640
तो ये मूल मिल गया तो इस तरह से संसार भर में परंपरा

180
00:12:50,640 --> 00:12:54,640
सारी दुनिया परंपरा पूछती है सर्टिफिकेट क्या है कहां से पढ़ाई की है

181
00:12:54,640 --> 00:12:58,640
तुम्हारी क्या क्वालिफिकेशन है यहां क्या पूछा जा रहा है मूल में क्या है

182
00:12:58,640 --> 00:13:02,880
परंपरा वो परंपरा ना कुरान में है ना बाइबल

183
00:13:02,880 --> 00:13:07,200
में है वो परंपरा हमारे यहां मुंडकोपनिषद निरुक्त

184
00:13:07,200 --> 00:13:11,680
में है शिव पुराण में है, महाभारत में है,

185
00:13:11,680 --> 00:13:13,920
परंपरा भरी पड़ी,

186
00:13:13,920 --> 00:13:18,080
गीता में है, एवं परंपरा प्राप्तिम।

187
00:13:18,080 --> 00:13:20,240
तो

188
00:13:20,240 --> 00:13:24,480
संसार में जितनी भी उपयोगी चीजें हैं वो

189
00:13:24,480 --> 00:13:28,560
का मूल हमारे सनातन धर्म शास्त्रों में प्राप्त है। हमें। इसीलिए यह कहा जाता है

190
00:13:28,560 --> 00:13:32,720
कि जहां गुरुदेव एक बात कहते हैं कि दुनिया में जहां भी कहीं जरा

191
00:13:32,720 --> 00:13:36,720
सी भी चमक है तो उसके कारण है वेद। अब कुछ लोग कहते

192
00:13:36,720 --> 00:13:41,760
हैं कि भाई जैसे हम पूछते हैं कि भाई अगर तुम

193
00:13:41,760 --> 00:13:45,760
आस्तिक नहीं हो तो फिर तुम्हारे यहां पर यह जो मर्यादा है इसका

194
00:13:45,760 --> 00:13:49,920
आधार क्या है? नास्तिक लोग यह प्रश्न करते हैं कि भाई जिनके

195
00:13:49,920 --> 00:13:54,640
यहां पर वेद नहीं पढ़े जा रहे हैं तो उनके यहां पर माता को माता नहीं माना जाता है क्या?

196
00:13:54,640 --> 00:13:59,120
तो भाई जो सीधे तौर पर थॉमस अलवा एडिसन को नहीं जानता

197
00:13:59,120 --> 00:14:03,360
है उससे उसके बारे में कभी उसने सुना तक नहीं है तो

198
00:14:03,360 --> 00:14:07,440
क्या उसके घर में रोशनी बिना थॉमस अलवा एडिसन के दिए हुए

199
00:14:07,440 --> 00:14:11,520
बल्ब के हो जा रही है

200
00:14:11,520 --> 00:14:15,920
उसके घर में जो बल्ब जल रहा है वो उसकी जानकारी

201
00:14:15,920 --> 00:14:19,920
में नहीं है कि वो बल्ब मुझे मेरे पास थॉमस अलवा एडिसन

202
00:14:19,920 --> 00:14:24,000
से ही आया है। इसी प्रकार से जो व्यक्ति जितने

203
00:14:24,000 --> 00:14:28,320
अंश में भी मानवता का प्रतिपादन कर रहा है, मानवता का अनुकरण

204
00:14:28,320 --> 00:14:32,640
अनुसरण कर रहा है, वो व्यक्ति उतने अंश में

205
00:14:32,640 --> 00:14:36,720
उसकी जानकारी के बाहर वेदों का ही पालन कर रहा है। वैदिक धर्म का ही

206
00:14:36,720 --> 00:14:41,600
पालन अनुसरण कर रहा है। ठीक है?

207
00:14:41,600 --> 00:14:45,760
ये मानना पड़ेगा। दुनिया में कहीं भी कोई भी जरा सी भी चमक है उसका आधार

208
00:14:45,760 --> 00:14:50,560
क्या है? वेद। वेद के बाहर कुछ है ही नहीं। तो

209
00:14:50,560 --> 00:14:55,040
जो कुछ भी बना है वेदों से मिलती जुलती चीजों के रूप में बना है बस

210
00:14:55,040 --> 00:14:59,360
क्योंकि उसमें अपना चीजें भी घुसेनी थी तो वेदों

211
00:14:59,360 --> 00:15:03,680
की चीज को कॉपी कर करके जरूरी चीजें लेते हुए अपने मन मुताबिक उसमें

212
00:15:03,680 --> 00:15:08,240
चीजें भरभर के नईनई थ्योरीज खड़ी कर दी गई। कारण

213
00:15:08,240 --> 00:15:12,400
कि जो मानवीय मानवोचित मर्यादा थी उसका उल्लंघन करना

214
00:15:12,400 --> 00:15:17,040
था। किसी को ज्यादा विवाह करने थे। किसी को

215
00:15:17,040 --> 00:15:21,200
अपने अनियंत्रित रूप से कुछ खाना पीना था। यह सारे कारण

216
00:15:21,200 --> 00:15:25,200
है दुनिया में। किसी को धर्म के नाम पर जो है धंधा

217
00:15:25,200 --> 00:15:27,280
चलाना था।

218
00:15:27,280 --> 00:15:31,520
बैठ के खाना पीना था। इस कारण से वो जो वैदिक

219
00:15:31,520 --> 00:15:35,920
मर्यादा है उसका उल्लंघन करने के लिए वेदों की ही जो चीजें हैं उनको

220
00:15:35,920 --> 00:15:40,320
थोड़ा बहुत लेके उसमें फिर अपना ठप्पा लगा के अपना मैसेंजर

221
00:15:40,320 --> 00:15:45,040
बना के अपना प्रॉफिट बना करके और हो गया। चालू हो गया नया।

222
00:15:45,040 --> 00:15:50,160
मगर जब ऐसा करते हैं जब वेद की सीमा के बाहर जाते हैं

223
00:15:50,160 --> 00:15:54,240
तो वहां पर वह तीन चीजें वो सनातन सिद्धांत तो प्राप्त हो नहीं

224
00:15:54,240 --> 00:15:58,240
पाते और जब नहीं हो पाते हैं तो कोई एक

225
00:15:58,240 --> 00:16:02,640
चला आता है पूछने के लिए सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत

226
00:16:02,640 --> 00:16:06,720
धर्म वहीं पे फेल हो जाता है। जो परंपरा का जो

227
00:16:06,720 --> 00:16:11,200
शब्द है जो हमारा तीसरा सिद्धांत है ना शाश्वत धर्म

228
00:16:11,200 --> 00:16:15,200
यानी वैदिक धर्म जब हम किसी से परंपरा पूछते

229
00:16:15,200 --> 00:16:19,440
हैं तो उसमें वही सवाल है कि आपका धर्म जो है वो शाश्वत

230
00:16:19,440 --> 00:16:23,440
है जो नियम सिद्धांत आप अभी दे रहे हैं ये पहले भी थे

231
00:16:23,440 --> 00:16:27,680
ये कैसे सिद्ध होता है अगर परंपरा सिद्ध कर पाए वेदों से अपनी तो सिद्ध

232
00:16:27,680 --> 00:16:31,760
होगा नहीं सिद्ध कर पाए तो सिद्ध ही नहीं होगा आपका स्वकल्पित

233
00:16:31,760 --> 00:16:34,480
सिद्ध होगा

234
00:16:34,480 --> 00:16:40,480
यह बात ठीक है।

235
00:16:43,280 --> 00:16:47,360
एक मूर्ख वह है जो दुर्जनों के कहने पर मर्यादा का उल्लंघन करता हो

236
00:16:47,360 --> 00:16:51,920
और जो किसी होती हुई बात को देखकर भी उस पर ध्यान ना देता हो।

237
00:16:51,920 --> 00:16:56,320
एक मूर्ख वह है जो माता-पिता, ब्राह्मण, स्वामी, देवता, गुरु आदि का द्रोही

238
00:16:56,320 --> 00:17:01,440
हो। गुरु का द्रोही कौन है? मूर्ख।

239
00:17:01,440 --> 00:17:07,280
एक मूर्ख वह है जो दूसरों को दुखी देखकर सुखी होता हो।

240
00:17:07,280 --> 00:17:11,280
दूसरों को सुखी देखकर दुखी होता हो या गई हुई वस्तु के लिए

241
00:17:11,280 --> 00:17:15,280
शोक करता हो। एक मूर्ख वह है जो बिना बोलाए

242
00:17:15,280 --> 00:17:19,280
बोलता हो। बिना पूछे साक्षी देता हो। निंदनीय

243
00:17:19,280 --> 00:17:23,280
वस्तु ग्रहण करता हो। एक मूर्ख वह है जो दूसरों का अपमान

244
00:17:23,280 --> 00:17:27,440
करने वाली बातें करता हो। ठीक रास्ता बे रास्ते चलता हो

245
00:17:27,440 --> 00:17:31,680
अथवा कुकर्मी लोगों के साथ में मित्रता करता हो। एक मूर्ख

246
00:17:31,680 --> 00:17:36,080
वह है जो कभी सत्य या मर्यादा का विचार ना रखता हो। सदा परिहास

247
00:17:36,080 --> 00:17:40,160
करता हो और दूसरों के परिहास करने पर लड़ने को तैयार

248
00:17:40,160 --> 00:17:44,320
होता हो। एक मूर्ख वह है जो व्यर्थ की होड़ लगाता हो। व्यर्थ

249
00:17:44,320 --> 00:17:48,320
बकवास करता हो अथवा जो सदा मुंह बंद किए बैठा हो

250
00:17:48,320 --> 00:17:52,400
और कभी कुछ बोलता ही ना हो। एक मूर्ख वह है जो ना तो वस्त्र ही

251
00:17:52,400 --> 00:17:56,560
अच्छे पहने और ना ही शास्त्रों का ही ज्ञान हो। पर फिर भी जो सभा में सबसे ऊंचे

252
00:17:56,560 --> 00:17:58,880
स्थान पर जाकर बैठता हो।

253
00:17:58,880 --> 00:18:03,040
या अपने गोत्र वालों पर का विश्वास करता हो। एक

254
00:18:03,040 --> 00:18:07,520
मूर्ख वह है जो चोरों से अपनी जान पहचान बतलाता हो।

255
00:18:07,520 --> 00:18:12,000
देखी हुई वस्तु दोबारा देखने को मांगता हो और क्रोध में

256
00:18:12,000 --> 00:18:16,240
स्वयं अपना ही अनहित कर बैठता हो। एक मूर्ख वह है

257
00:18:16,240 --> 00:18:20,320
जो बराबर ही इन लोगों से साथ ही इन लोगों के साथ

258
00:18:20,320 --> 00:18:24,320
बातचीत करता हो या बाएं हाथ से भोजन करता हो। बाएं हाथ से

259
00:18:24,320 --> 00:18:28,080
भोजन तो नहीं करता ना कोई?

260
00:18:28,080 --> 00:18:34,080
हां।

261
00:18:34,560 --> 00:18:37,200
तो

262
00:18:37,200 --> 00:18:42,080
एक मूर्ख वह है जो बड़े लोगों के साथ मत्सर रखता हो। अलभ्य

263
00:18:42,080 --> 00:18:46,400
वस्तु प्राप्त करना चाहता हो या स्वयं अपने घर की चीजें चुराता

264
00:18:46,400 --> 00:18:50,480
हो। एक मूर्ख वह है जो जगदीश्वर

265
00:18:50,480 --> 00:18:54,640
को छोड़कर मनुष्यों का भरोसा रखता हो या जो अपना जीवन सार्थक

266
00:18:54,640 --> 00:18:58,800
ना करके व्यर्थ ही गवाता हो। एक मूर्ख वह है जो

267
00:18:58,800 --> 00:19:02,960
सांसारिक दुखी से दुखों से दुखी होकर ईश्वर को गालियां

268
00:19:02,960 --> 00:19:06,960
देता हो। या अपने मित्र की हीनता

269
00:19:06,960 --> 00:19:10,960
लोगों को बतलाता हो। एक मूर्ख वह है जो थोड़े से अन्याय के

270
00:19:10,960 --> 00:19:14,960
लिए क्षमा ना कर सकता हो। सदा तेजी दिखलाता हो या विश्वासघात

271
00:19:14,960 --> 00:19:19,040
करता हो। एक मूर्ख वह है जो क्षण क्षण पर रंग बदलता हो।

272
00:19:19,040 --> 00:19:23,360
एक मूर्ख वह है जो पुराने नौकरों को निकालकर उनकी जगह नए नौकर

273
00:19:23,360 --> 00:19:28,080
रखता हो या जिसकी सभा बिना अध्यक्ष की हो।

274
00:19:28,080 --> 00:19:32,640
जिसकी सभा बिना अध्यक्ष की हो। यह

275
00:19:32,640 --> 00:19:37,280
बात बहुत गौर करने लायक है। हम

276
00:19:37,280 --> 00:19:42,080
लोग मूर्ख क्यों हैं? हिंदू मूर्ख क्यों हैं?

277
00:19:42,080 --> 00:19:46,560
हिंदू मूर्ख इसीलिए क्योंकि उसकी जो सभा है

278
00:19:46,560 --> 00:19:50,080
वह बिना अध्यक्ष की बिना कप्तान

279
00:19:50,080 --> 00:19:55,360
की है। हमारी समस्याएं हमारी समस्या

280
00:19:55,360 --> 00:19:59,440
ये क्रिश्चियन मुस्लिम तंत्र नहीं है।

281
00:19:59,440 --> 00:20:05,440
हमारी समस्या है बहु नेतृत्ववाद।

282
00:20:05,600 --> 00:20:10,640
जो योग्य नहीं है उसको खड़ा करोगे तो किसी की आस्था होगी नहीं।

283
00:20:10,640 --> 00:20:14,640
किसी की निष्ठा होगी नहीं तो हमें नेतृत्व नहीं मिल

284
00:20:14,640 --> 00:20:18,720
पाएगा। जो योग्य है उसको तुम खड़ा नहीं करोगे तो हमें नेतृत्व नहीं

285
00:20:18,720 --> 00:20:22,960
मिल पाएगा। जब तक बहु

286
00:20:22,960 --> 00:20:28,080
नेतृत्ववाद है तब तक सनातन का उद्धार नहीं हो सकता।

287
00:20:28,080 --> 00:20:32,640
और भागवतानंद आर्य समाज

288
00:20:32,640 --> 00:20:36,640
या अमुक अमुक जो परंपरा पर टोट करने वाले जितने भी

289
00:20:36,640 --> 00:20:40,720
तंत्र हैं व्यक्ति हैं वो प्रत्यक्ष अथवा गुप्त रूप

290
00:20:40,720 --> 00:20:46,720
से यह बहु नेतृत्ववाद के पोषक हैं।

291
00:20:48,720 --> 00:20:53,200
हम एक तरफ लोकतंत्र का विरोध करते हैं। राजतंत्र

292
00:20:53,200 --> 00:20:57,200
चाहते हैं। यानी बहु नेतृत्ववाद को खत्म करना

293
00:20:57,200 --> 00:21:01,280
चाहते हैं। दूसरी ओर जिसका आचरण होगा वही ब्राह्मण

294
00:21:01,280 --> 00:21:06,080
हो जाएगा। यह क्या है? बहु नेतृत्ववाद

295
00:21:06,080 --> 00:21:10,640
पीछे से सर्टिफिकेट की आवश्यकता नहीं है।

296
00:21:10,640 --> 00:21:14,720
कुल परंपरा का सीधे व्यक्ति क्लेम कर देगा कि मैं हूं

297
00:21:14,720 --> 00:21:18,720
ब्राह्मण। लो। तुम कौन होते हो मना करने वाले?

298
00:21:18,720 --> 00:21:22,800
कि मैं ब्राह्मण नहीं हूं। तुम कौन होते हो मना करने वाले? मैं आचार्य नहीं हूं। मैं कर्म

299
00:21:22,800 --> 00:21:26,000
से आचार्य हूं। कर्मणा आचार्य।

300
00:21:26,000 --> 00:21:31,280
करणा ब्राह्मण करुणा आचार्य

301
00:21:31,280 --> 00:21:35,440
तो बहु नेतृत्ववाद की वजह से हम एकजुट नहीं हो सकते

302
00:21:35,440 --> 00:21:39,520
क्यों रामचरितमानस जलाई जा रही होगी एक कहेगा

303
00:21:39,520 --> 00:21:43,600
वो बेकार की पुस्तक है एक कहेगा अच्छी पुस्तक है जो अच्छी मानेंगे वो

304
00:21:43,600 --> 00:21:47,600
बचाने जाएंगे जो बेकार समझेंगे नहीं जाएंगे अच्छा बेकार वाले से प्रश्न क्यों

305
00:21:47,600 --> 00:21:51,840
किया जाए भाई तुमने कैसे कह दिया वो कह देगा मुझे भगवती ने सपना दिया

306
00:21:51,840 --> 00:21:56,480
है मैं खुद खुद से आचार्य बनाऊं।

307
00:21:56,480 --> 00:22:00,000
अब बताओ

308
00:22:00,000 --> 00:22:04,240
परंपरा प्राप्त आचार्य ही जब दूसरे आचार्य को खड़ा

309
00:22:04,240 --> 00:22:08,320
करेगा तो उसकी वही मान्यताएं होंगी जो हमारी पूर्वजों की मान्यताएं

310
00:22:08,320 --> 00:22:12,800
हैं। वरना कोई भी व्यक्ति आकर के क्लेम कर देगा। अच्छा भागवतानंद

311
00:22:12,800 --> 00:22:16,800
चलो वर्णाश्रमी है। मूर्ति पूजक है। उसको स्वीकार करने में दिक्कत

312
00:22:16,800 --> 00:22:22,800
क्या? उसको स्वीकार करने के नाम पे हम इन सबका पोषण कर देंगे ना।

313
00:22:23,200 --> 00:22:27,200
आर्य समाज जैसी चीजों का पोषण कर देंगे ना। परंपरा विरोधियों का पोषण

314
00:22:27,200 --> 00:22:32,240
कर देंगे ना। वह भी तो बिना परंपरा के आया है।

315
00:22:32,240 --> 00:22:37,600
उसकी भी तो कोई परंपरा नहीं है। ब्रह्मा कुमारी भी कहेगा फिर।

316
00:22:37,600 --> 00:22:41,680
इसलिए जिस सिस्टम से जो चल रहा है वही शूद्र में यदि

317
00:22:41,680 --> 00:22:45,920
गुण दिखाई भी दे रहे हैं कि ब्राह्मणों जैसा विद्वान है सब कुछ है। मगर

318
00:22:45,920 --> 00:22:50,000
क्योंकि वो सिस्टम बिगड़ जाएगा। इसलिए शूद्र को अनुमति नहीं दी जाएगी

319
00:22:50,000 --> 00:22:54,320
कि वह जो है ब्राह्मणों के कार्य करें। लेफ्ट में

320
00:22:54,320 --> 00:22:58,480
चलना अगर नियम है राइट साइड में गाड़ी चलाने वाला दिखाई देगा कि बहुत

321
00:22:58,480 --> 00:23:02,640
अच्छी गाड़ी चला रहा है एक्सीडेंट नहीं कर रहा है। उसको ले लो

322
00:23:02,640 --> 00:23:06,800
अपने से मिला लो। मगर फिर भी हम क्यों नहीं मिलाएंगे? क्योंकि अगर उसको हमने अनुमति

323
00:23:06,800 --> 00:23:11,200
दे दी राइट साइड में रॉन्ग साइड में गाड़ी चलाने की तो विप्लव

324
00:23:11,200 --> 00:23:15,280
हो जाएगा। सब अपने मन से रॉन्ग साइड में गाड़ी चलाने

325
00:23:15,280 --> 00:23:21,280
लगेंगे। इसलिए नियम तो यही है कि लेफ्ट में ही गाड़ी चलानी है

326
00:23:21,440 --> 00:23:26,160
तो इसलिए उसका पोषण नहीं किया जा सकता है।

327
00:23:26,160 --> 00:23:30,960
गुरु परंपरा से जो है वही आचार्य बनेगा।

328
00:23:30,960 --> 00:23:35,040
इसका जिसकी सभा बिना अध्यक्ष की हो यह बहुत इंपॉर्टेंट

329
00:23:35,040 --> 00:23:39,520
पॉइंट है। आप लोगों को याद रखना है कि हमारी समस्या बहु नेतृत्ववाद

330
00:23:39,520 --> 00:23:44,240
है और हम लोग बहु नेतृत्ववाद से ही लड़ रहे हैं।

331
00:23:44,240 --> 00:23:48,480
पूरा आहान ही इसी बारे में है। हमारी लड़ाई बहु नेतृत्ववाद

332
00:23:48,480 --> 00:23:52,640
से है। धर्म को लेकर कम से कम हमारे बीच में बहु

333
00:23:52,640 --> 00:23:56,720
नेतृत्ववाद नहीं होना चाहिए। परम जो कल्याण वाली बात

334
00:23:56,720 --> 00:24:01,200
है परमार्थ वाली बात है उस वो तो

335
00:24:01,200 --> 00:24:05,440
व्यवहारिक धरातल पर उसका कोई कार्य है ही नहीं तो बहु

336
00:24:05,440 --> 00:24:09,600
नेतृत्ववाद से हमारी लड़ाई अजीत भारती ने एक वीडियो बनाया

337
00:24:09,600 --> 00:24:14,080
था काफी दिन पहले कि हमारे सनातन में सर्वोच्च की कोई अवधारणा

338
00:24:14,080 --> 00:24:18,160
है ही नहीं क्या हुआ इसका मतलब वो

339
00:24:18,160 --> 00:24:22,720
यह कह रहा है कि हमारे सनातन में कोई कप्तान बने

340
00:24:22,720 --> 00:24:26,800
ऐसा है ही नहीं कोई कप्तान होना ही नहीं चाहिए। कप्तान के बिना क्या

341
00:24:26,800 --> 00:24:30,480
है वो? मूर्खों की सभा।

342
00:24:30,480 --> 00:24:34,560
कप्तान के बिना जो झुंड है वो

343
00:24:34,560 --> 00:24:36,960
मूर्खों की सभा है।

344
00:24:36,960 --> 00:24:41,040
अच्छा जो व्यक्ति ये कह रहा है कि सर्वोच्च है ही नहीं। तो उसने क्या

345
00:24:41,040 --> 00:24:45,120
किया? इनडायरेक्ट वे में सबकी सर्वोच्चता को जो जो

346
00:24:45,120 --> 00:24:49,680
लोग अपने आप को सर्वोच्च क्लेम कर रहे हैं। उनकी सर्वोच्चता को खंडित करके

347
00:24:49,680 --> 00:24:53,840
खुद को सर्वोच्च बना दिया कि नहीं। उसने कहा नहीं कि मैं सर्वोच्च हूं।

348
00:24:53,840 --> 00:24:57,920
मगर जितने लोग अपने आप को सर्वोच्च कह रहे हैं उनको निषेध कर दिया उसने

349
00:24:57,920 --> 00:25:01,920
तो उनसे ऊपर हो गया ना। भाई वह लोग गलत बात बता रहे

350
00:25:01,920 --> 00:25:06,000
थे। यह सही बात बता रहा है। इस रूप में वो सर्वोच्च हो गया।

351
00:25:06,000 --> 00:25:10,560
उसने कहा नहीं क्लेम नहीं किया, दावा नहीं किया।

352
00:25:10,560 --> 00:25:14,880
तो कप्तान ना होना, अध्यक्ष ना होना

353
00:25:14,880 --> 00:25:19,040
मूर्खता के लक्षण है। जो लोकतंत्र से हमको प्राप्त नहीं हो सकता

354
00:25:19,040 --> 00:25:23,440
है। करुणा आचार्य हमें नहीं चाहिए। कर्मणा ब्राह्मण हमें नहीं चाहिए।

355
00:25:23,440 --> 00:25:27,520
हमें जन्म से फिर कर्म से ब्राह्मण चाहिए। हमें परंपरा से

356
00:25:27,520 --> 00:25:33,520
फिर आचरण से आचार्य चाहिए। ठीक है।

357
00:25:33,760 --> 00:25:38,880
जिसकी प्रामाणिकता भी हो।

358
00:25:38,880 --> 00:25:44,880
अच्छा।

359
00:25:52,000 --> 00:25:56,160
एक मूर्ख वह है जो अन्याय से द्रव्य एकत्र करता हो

360
00:25:56,160 --> 00:26:00,400
या धर्म नीति तथा न्याय का विचार छोड़कर अपने साथियों

361
00:26:00,400 --> 00:26:04,640
से अलग रहता हो। एक मूर्ख वह है जो घर की सुंदर स्त्री को छोड़कर सदा दूसरी

362
00:26:04,640 --> 00:26:08,960
स्त्रियों के फेर में पड़ा रहता हो। बहुतों की झूठन

363
00:26:08,960 --> 00:26:13,120
झूठन अंगीकार करता हो। एक मूर्ख वह है जो अपना धन

364
00:26:13,120 --> 00:26:17,200
दूसरों के पास रखता हो। दूसरों का धन स्वयं लेना चाहता हो

365
00:26:17,200 --> 00:26:21,200
या छोटे लोगों के साथ लेनदेन रखता हो। एक

366
00:26:21,200 --> 00:26:25,280
मूर्ख वह है जो अतिथि को कष्ट देता हो। बुरे ग्राम या स्थानों में

367
00:26:25,280 --> 00:26:29,280
रहता हो और सदा चिंतित रहता हो। एक मूर्ख वह

368
00:26:29,280 --> 00:26:33,520
है जो उस स्थान पर जाकर बैठता हो जहां दो आदमी बातें

369
00:26:33,520 --> 00:26:37,520
करते हो या दोनों हाथों से सिर खुजलाता हो। एक मूर्ख

370
00:26:37,520 --> 00:26:41,520
वह है जो पानी में कुल्ला करता हो। पैर से पैर खुजलाता हो

371
00:26:41,520 --> 00:26:45,680
या हीन कुल की सेवा करता हो। एक मूर्ख वह है जो

372
00:26:45,680 --> 00:26:50,000
स्त्रियों और बच्चों को मुंह लगाता हो। पागलों के पास बैठता हो।

373
00:26:50,000 --> 00:26:54,160
अपनी मर्यादा का विचार छोड़कर कुत्ता पालता हो। एक मूर्ख

374
00:26:54,160 --> 00:26:58,560
वह है जो पराई स्त्री से लड़ाई झगड़ा करता हो। मूर्ख पशुओं को अचानक या छिपकर

375
00:26:58,560 --> 00:27:02,960
मारता हो और मूर्खों के साथ रहता हो। एक मूर्ख वह है

376
00:27:02,960 --> 00:27:07,120
जो चुपचाप खड़ा हुआ लड़ाई झगड़ा देखता हो और

377
00:27:07,120 --> 00:27:11,280
सच को छोड़कर झूठ का आदर करता हो। एक मूर्ख वह

378
00:27:11,280 --> 00:27:15,760
है जो धन पाकर अपनी पुरानी दशा भूल जाता हो और देवताओं

379
00:27:15,760 --> 00:27:21,760
तथा ब्राह्मणों पर अधिकार जमाना चाहता हो।

380
00:27:21,840 --> 00:27:25,920
एक मूर्ख वह है जो अपना काम पढ़ने

381
00:27:25,920 --> 00:27:29,920
पर तो बहुत अधिक नम्र

382
00:27:29,920 --> 00:27:34,080
बना बन जाता हो पर दूसरों का कोई काम ना करता हो। एक मूर्ख वह

383
00:27:34,080 --> 00:27:38,240
है जो पढ़ने में अक्षर छोड़ अक्षर छोड़ देता हो या

384
00:27:38,240 --> 00:27:42,480
अपनी ओर से मिला देता हो। एक और पढ़ते समय पुस्तक

385
00:27:42,480 --> 00:27:46,880
पर दृष्टि ना रखता हो। यहां तो मेरे से भी ये वाली मूर्खताएं

386
00:27:46,880 --> 00:27:50,400
हो गई पढ़ते-पढ़ते।

387
00:27:50,400 --> 00:27:54,640
एक मूर्ख वह जो ना तो स्वयं पुस्तक पढ़ता हो ना दूसरे को पढ़ने देता

388
00:27:54,640 --> 00:27:58,720
हो और उसे केवल बस्ते में बांधकर रख छोड़ता हो। बस यही सब

389
00:27:58,720 --> 00:28:02,960
मूर्खों के लक्षण है जिन्हें सुनकर मनुष्य चतुर हो सकता

390
00:28:02,960 --> 00:28:07,360
है। इसको कहते हैं निषेध मुख से सुनना।

391
00:28:07,360 --> 00:28:09,200
तो ये निषेध मुख हमने सुन लिया

392
00:28:09,200 --> 00:28:13,360
तो इसका ज्यादा असर पड़ता है। एक बार विधि का पालन हो

393
00:28:13,360 --> 00:28:17,440
ना हो पर निषेध आज्ञा का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। है

394
00:28:17,440 --> 00:28:23,440
ना? तो विधि निषेध में ज्यादा पावरफुल कौन हुआ? निषेध।

395
00:28:26,480 --> 00:28:31,680
मूर्खों के लक्षण तो अपार हैं।

396
00:28:31,680 --> 00:28:35,760
समझदार आदमी सदा इस तरह की बातें मन लगाकर सुन सुना करते हैं। मूर्खों के

397
00:28:35,760 --> 00:28:39,760
लक्षण तो अपार हैं। पर यहां थोड़े से लक्षण अपनी समझ के अनुसार लोगों

398
00:28:39,760 --> 00:28:44,080
के परित्याग के लिए दे दिए गए हैं। श्रोताग मुझे क्षमा करें। उत्तम लक्षण

399
00:28:44,080 --> 00:28:48,320
ग्रहण करने के लिए चाहिए। ग्रहण करने चाहिए और मूर्खों के लक्षण

400
00:28:48,320 --> 00:28:54,080
छोड़ देने चाहिए। अगले समास में उत्तम लक्षण बतलाए गए हैं।

401
00:28:54,080 --> 00:29:00,080
बढ़िया चैप्टर था ना जानने लायक है ना

402
00:29:18,040 --> 00:29:22,040
[संगीत]
