1
00:00:06,240 --> 00:00:10,480
तो सभी को जय श्री राम। जैसा कि आप जानते

2
00:00:10,480 --> 00:00:14,480
हैं अ जो विभिन्न आध्यात्म

3
00:00:14,480 --> 00:00:18,560
को लेकर के विचारधाराएं हैं उनको लेकर के हम उनका

4
00:00:18,560 --> 00:00:22,560
जो पक्ष है उनका जो उनकी जो विचारधारा

5
00:00:22,560 --> 00:00:26,640
है उसको आपके समक्ष प्रस्तुत करते हैं। तो

6
00:00:26,640 --> 00:00:30,640
इसी क्रम में आज हम आए हैं ब्रह्मा

7
00:00:30,640 --> 00:00:34,640
कुमारीज सरोजनी नगर लखनऊ में यह सेंटर स्थित है और

8
00:00:34,640 --> 00:00:39,280
हमारे साथ यहां पर जो यहां की शिक्षिका हैं दीदी हैं

9
00:00:39,280 --> 00:00:43,360
जो यहां मार्ग निर्देशन का कार्य करती हैं तो वो हमारे

10
00:00:43,360 --> 00:00:47,520
साथ हैं। तो सबसे पहले दीदी आपको जय श्री राम।

11
00:00:47,520 --> 00:00:51,600
तो दीदी थोड़ा सा अपना एक संक्षिप्त परिचय थोड़ा सा आप हमारे दर्शकों

12
00:00:51,600 --> 00:00:55,680
को दे दीजिए। मेरा नाम बी के सुनीता

13
00:00:55,680 --> 00:01:00,320
है। मां कुमारी सुनीता बहन। मुझे यह आध्यात्मिक

14
00:01:00,320 --> 00:01:04,400
ज्ञान 95 में मिला। आज लगभग 30

15
00:01:04,400 --> 00:01:08,480
वर्ष पूरे पूरे हो गए हैं सब। अच्छा

16
00:01:08,480 --> 00:01:12,960
और अभी तक इसी ही मार्ग पे मैं चल रही हूं।

17
00:01:12,960 --> 00:01:16,960
और सदा मेरा मन का उद्देश्य है और सदा ही चलती

18
00:01:16,960 --> 00:01:20,960
रहूंगी इस ईश्वरी मार्ग पे समाज की सेवा में सभी

19
00:01:20,960 --> 00:01:21,520
की सेवा

20
00:01:21,520 --> 00:01:25,520
में ताकि सभी के अंदर जो परमात्मा ने

21
00:01:25,520 --> 00:01:29,680
हमें उजाले का मार्ग दिखाया है प्रशस्त किया है आगे

22
00:01:29,680 --> 00:01:33,680
बढ़ाया है वो सभी को मिल सके मैं सभी के अंदर वो दिया

23
00:01:33,680 --> 00:01:37,760
जला सकूं जिसे तीसरा नेत्र कहते हैं सभी को लाभ हो

24
00:01:37,760 --> 00:01:41,840
सके इसलिए मेरा यह संपूर्ण जीवन है यह मेरा संक्षिप्त

25
00:01:41,840 --> 00:01:46,560
छोड़ा का परिचय है। बहुत सुंदर। बहुत सुंदर। थोड़ा सा एक बेसिक

26
00:01:46,560 --> 00:01:50,800
जो ब्रह्माकुमारीज की जो एक जो स्पिरिचुअल

27
00:01:50,800 --> 00:01:56,560
बेसिक छोटा सा तो वो थोड़ा सा आप हमें बताएंगी कि क्या है?

28
00:01:56,560 --> 00:02:01,040
देखिए यहां आध्यात्म मतलब ही अध्यन

29
00:02:01,040 --> 00:02:05,200
आत्मा। जिस धर्म में जिस ज्ञान

30
00:02:05,200 --> 00:02:09,280
में जिस अध्यात्म में आत्मा का पाठ पढ़ाया जाता उसके बारे

31
00:02:09,280 --> 00:02:13,440
में बताया जाता है जैसे कि हमारी गीता में भी जी बहुत

32
00:02:13,440 --> 00:02:17,520
समय से द्वापर युग से जब से गीता आई उसमें भी आत्मा के

33
00:02:17,520 --> 00:02:21,520
ही बारे में बताया गया है और आज ब्रह्मा कुमारी संस्था

34
00:02:21,520 --> 00:02:25,520
भी आत्मा परमात्मा सृष्टि चक्र स्वयं

35
00:02:25,520 --> 00:02:29,760
का ज्ञान और कर्मों की गहन गति के ऊपर विषय ध्यान खिंचाया

36
00:02:29,760 --> 00:02:34,000
जाता है जिसमें हम हम लोग यही हमारा उद्देश्य रहता है, एक लक्ष्य भी रहता

37
00:02:34,000 --> 00:02:36,880
है कि हर आत्मा जो मनुष्य

38
00:02:36,880 --> 00:02:40,960
है वह श्रेष्ठ ज्ञान को प्राप्त करें और प्राप्त करके कहते

39
00:02:40,960 --> 00:02:45,120
हैं हमारे भारत में नर ऐसी करनी करे जो नारायण बने

40
00:02:45,120 --> 00:02:49,280
और नारी ऐसी करनी करे जो लक्ष्मी बने।

41
00:02:49,280 --> 00:02:53,440
मनुष्य से देवता बनाने की पढ़ाई है। लेकिन पढ़ना हर एक को

42
00:02:53,440 --> 00:02:57,600
पड़ता है। अब वो कितने प्रतिशत वो पढ़ाई करता? कितने प्रतिशत इसका

43
00:02:57,600 --> 00:03:01,680
अध्ययन करता है? कितनी इसकी अध्यात्म के धरातल में जाता है यह उस

44
00:03:01,680 --> 00:03:05,840
पर निर्भर करता है। बाकी हम लोगों का एक यही लक्ष्य रहता है कि हर

45
00:03:05,840 --> 00:03:10,480
आत्मा आगे बढ़े और इसकी गहराइयों में जाए

46
00:03:10,480 --> 00:03:14,800
और उस जब हमें आत्मा का परिचय हो जाता आत्मा का ज्ञान

47
00:03:14,800 --> 00:03:19,040
यथार्थ हो जाता है। ज्ञान तो सभी को था। हमारे शास्त्रों में

48
00:03:19,040 --> 00:03:23,520
पुराणों में सभी हमारे बड़े बड़े-बड़े विद्वानों ने दिया

49
00:03:23,520 --> 00:03:27,600
लेकिन अमल करना एक अलग बात होती है। इसको बहुत तरीके अंदर

50
00:03:27,600 --> 00:03:31,760
से जाना उसकी डीपली में जाना गहराई में जाना ये एक अलग बात

51
00:03:31,760 --> 00:03:35,760
है। तो ब्रह्माकुमारी संस्था में परमात्मा ने आकर के

52
00:03:35,760 --> 00:03:39,760
प्रजापिता ब्रह्मा के तन में आकर के दादा लेखकराज

53
00:03:39,760 --> 00:03:43,840
के तन में आकर के यह बहुत ही डीपली ज्ञान और ये कहने

54
00:03:43,840 --> 00:03:48,000
ही तक नहीं रखा बल्कि व्यवहारिक जीवन में उतारने के लिए हमेशा

55
00:03:48,000 --> 00:03:51,920
प्रेरित किया और प्रेरित आज भी हम ब्रह्मा आज दादा लेखराज में

56
00:03:51,920 --> 00:03:56,240
नहीं है। फिर भी हम ब्रह्मा हमारी बहने यही कहते जब तक आत्मा

57
00:03:56,240 --> 00:04:00,240
का ज्ञान नहीं होगा तब तक परमात्मा का ज्ञान नहीं हो सकता

58
00:04:00,240 --> 00:04:04,320
और कहते भी हैं कि आत्मा के ज्ञान बिन परमात्मा मिलता

59
00:04:04,320 --> 00:04:09,200
नहीं और पत्ता पत्ता सींचने से फूल कभी खिलता नहीं

60
00:04:09,200 --> 00:04:13,200
तो मेरा जड़ में पानी डालना पड़ेगा जी जड़ परमात्मा है और जब

61
00:04:13,200 --> 00:04:17,440
तक उस तक नहीं जाए और उसके पहले स्वयं का ज्ञान कहते हैं कि

62
00:04:17,440 --> 00:04:21,680
आप सुनार की दुकान पे जाए तो मुझे ऐसा नहीं लगता

63
00:04:21,680 --> 00:04:26,160
है कि मिट्टी का तेल रखा होगा या वो अनाज बेचेगा। हम

64
00:04:26,160 --> 00:04:30,240
ठीक है? तो जब आप सुनार की दुकान पे जाते तो हमेशा यही

65
00:04:30,240 --> 00:04:34,320
रहता कि सुनार की दुकान में सोना, चांदी, हीरे, मड़े कुछ भी मिल सकता है।

66
00:04:34,320 --> 00:04:38,400
और आप परचून की दुकान पे जाएंगे तो संभवत मुझे लगता है

67
00:04:38,400 --> 00:04:42,720
कि अन्य चीजें बहुत कम ही उपलब्ध होंगी। जैसे हीरा जवाहरात रखता

68
00:04:42,720 --> 00:04:46,720
हो। ऐसा अभी तक तो नहीं मुझे दिखा है। तो परमात्मा

69
00:04:46,720 --> 00:04:50,720
जड़ है और हम कई बार कई जगह तलाशते हैं क्योंकि हमारी

70
00:04:50,720 --> 00:04:55,040
प्यास होती परमात्मा कैसा है? उसका रूप क्या है?

71
00:04:55,040 --> 00:04:59,120
नाम क्या है? गुण क्या है? धाम क्या है? और कर्तव्य क्या है?

72
00:04:59,120 --> 00:05:03,200
तलाशते रहते। आज भी दुनिया तलाशती रहती है। पूरी तरीके से उसे

73
00:05:03,200 --> 00:05:06,960
वो चीज प्राप्त नहीं हो पाई। कहते हैं ना कि रामपुर में

74
00:05:06,960 --> 00:05:11,200
एक हाथी आया। सबने देखा उसमें सात अंधे थे। तो

75
00:05:11,200 --> 00:05:15,680
जब किसी ने उसमें से एक सज्जे ने पूछा एक आंख जिसकी थी

76
00:05:15,680 --> 00:05:19,760
भाई कैसा हाथी था बताओ आप लोग? तो उसने कहा हाथी तो

77
00:05:19,760 --> 00:05:23,840
सांप जैसा था। हाथी तो रस्सी जैसा था और हाथी

78
00:05:23,840 --> 00:05:28,160
तो ढोलक जैसा था। हाथी तो सूप जैसा था। हाथी

79
00:05:28,160 --> 00:05:32,640
तो खंभे जैसा था। सब ने एक-एक उसके भाग्य को छुआ

80
00:05:32,640 --> 00:05:36,640
और भाग को छूने बाद उसको वर्णन किया कि हाथी ऐसा था। लेकिन

81
00:05:36,640 --> 00:05:40,640
जिसने देखा जिसने सूर को जिसने सूर को छुआ उसे सांप नजर आया।

82
00:05:40,640 --> 00:05:44,800
जिसने पूछ को छुआ उसे रस्सी नजर आई और जिसने उसके पांव

83
00:05:44,800 --> 00:05:49,200
को छुआ उसको खंभा नजर आया। पिलर्स नजर आया। जिसने

84
00:05:49,200 --> 00:05:53,520
कान को छुआ उसे सूप नजर आई। जिसने उसके पेट को छुआ उसको

85
00:05:53,520 --> 00:05:57,520
ढोलक नजर आई। ऐसे ही हमारे सनातन

86
00:05:57,520 --> 00:06:01,680
एक है। सब कुछ है। लेकिन उसकी जब तक गहराई तक नहीं गए तो

87
00:06:01,680 --> 00:06:06,160
यही लगता है कि भगवान ऐसा होगा। क्यों? तो दीदी इसमें

88
00:06:06,160 --> 00:06:10,320
इसमें यह था कि यह तो हो गया कि ठीक है हमें गहराई में जाना है।

89
00:06:10,320 --> 00:06:10,880
जी तो

90
00:06:10,880 --> 00:06:15,600
अभी हम ब्रह्मा कुमारीज में क्या कर रहे हैं और हमें

91
00:06:15,600 --> 00:06:19,600
मतलब जैसे हमें पता चल गया कि आत्मा का ज्ञान ये है। ज्ञान

92
00:06:19,600 --> 00:06:23,680
पता चल गया कि हम आत्मा है। आत्मस्वरूप है। फिर हम

93
00:06:23,680 --> 00:06:27,840
ब्रह्माकुमारी में क्या प्रैक्टिसिंग करते हैं? और उस प्रैक्टिसिंग से हमें मिलना क्या है?

94
00:06:27,840 --> 00:06:32,160
फाइनल गोल क्या है हमारा? फाइनल जो लक्ष्य है मैंने पहले ही बताया। मनुष्य

95
00:06:32,160 --> 00:06:36,480
से देवता बनाने की पढ़ाई परमात्मा पढ़ाने के लिए आया है। ये जैसे

96
00:06:36,480 --> 00:06:40,640
हमारा दुनिया के भी मतलब हम देवता बनते हैं।

97
00:06:40,640 --> 00:06:44,720
देवता बना पढ़ाई पढ़ा रहा। अब अगर आप पढ़ेंगे तो ही

98
00:06:44,720 --> 00:06:48,800
बनेंगे। नहीं पढ़ेंगे। जितना पढ़ेंगे देवताओं की भी कैटेगरी

99
00:06:48,800 --> 00:06:53,200
होती है। शनि का अपना काम। इंद्र का अपना काम है। विष्णु

100
00:06:53,200 --> 00:06:57,200
का अपना उसकी कैटेगरी ऊंची है। विष्णु जी की कैटेगरी ऊंची है। ब्रह्मा जी की

101
00:06:57,200 --> 00:07:01,280
ऊंची है। शंकर जी की ऊंची है। और उससे भी थोड़ा कैटेगरी

102
00:07:01,280 --> 00:07:05,360
स्तर कम होता है। जो जैसा यहां अध्ययन करता पढ़ाई करता

103
00:07:05,360 --> 00:07:09,760
है आत्मा के बारे में परमात्मा के बारे में। वो उसी तरह की कैटेगरी वाले देवत्व

104
00:07:09,760 --> 00:07:13,920
में पहुंचता है। उसी तरीके से उसकी पूजा भी भक्ति में होती है। अच्छा उसके बाद देवता

105
00:07:13,920 --> 00:07:17,920
बनने के बाद भी कोई गोल आ गया। भैया जैसे हम डीएम बन जाए तो

106
00:07:17,920 --> 00:07:22,160
फिर मुझे नहीं लगता कि डीएम पद पाने के बाद कोई दूसरा कोई और

107
00:07:22,160 --> 00:07:26,000
मतलब फाइनल गोल यही है कि देवत्व को प्राप्त करना है। मैंने कहा ना

108
00:07:26,000 --> 00:07:30,160
इस पढ़ाई से मनुष्य देव पद को प्राप्त करता अगर पढ़ता

109
00:07:30,160 --> 00:07:34,240
है सही तरीके से तो जो भगवान के नियम के अनुसार चलता है

110
00:07:34,240 --> 00:07:38,640
तो अन्यथा नहीं फिर वो कोई भी हो

111
00:07:38,640 --> 00:07:43,120
तो जो मोक्ष का कांसेप्ट है वो अधूरा नहीं लगता आपको

112
00:07:43,120 --> 00:07:47,120
मुझे नहीं लगता है इसलिए क्योंकि जैसे आपने कहा ना डीएम

113
00:07:47,120 --> 00:07:51,280
डीएम वाली बात जैसे आपने कही वो एक अलग बात है लक्ष्य की आपसे कही थी

114
00:07:51,280 --> 00:07:55,600
लक्ष्य और लक्ष्य में फर्क है जी जी मोक्ष क्या मोक्ष जैसे

115
00:07:55,600 --> 00:07:59,760
आवागमन से हमारा छुटकारा होना। तो देवता जब बन जाएंगे

116
00:07:59,760 --> 00:08:03,840
तो उसके बाद आवागमन नहीं होना है। हां होना है। वही तो मिलता है। मोक्ष कभी किसी

117
00:08:03,840 --> 00:08:08,080
प्राणी को नहीं मिलता। क्यों? कई बताएं मोक्ष ऐसा क्यों कहा गया है? जैसे

118
00:08:08,080 --> 00:08:12,160
कई बार होता है ना कि आप मोक्ष कभी किसी प्राणी को नहीं मिलता है।

119
00:08:12,160 --> 00:08:16,720
हम मैं बताती हूं कैसे केवल बेहतर होता है बस। हां हां मैं बताती हूं। जीवन

120
00:08:16,720 --> 00:08:20,800
एक तरीके से छुटकारा कभी नहीं से मान लीजिए हमारी आपकी कोई लड़ाई हुई

121
00:08:20,800 --> 00:08:24,800
तो हम परेशान होके क्या बोलते आपसे मोक्ष छुटकारा मिल जाए

122
00:08:24,800 --> 00:08:28,800
भगवान मुझे इस धरती पे नहीं भेजना प्रभु क्यों क्यों परेशान हो

123
00:08:28,800 --> 00:08:33,360
के ऐसे शब्द अगर किसी का बहुत प्रेम है अच्छा अच्छा व्यवहार

124
00:08:33,360 --> 00:08:38,000
है तो शायद उसके मुंह से कभी निकले कि ना प्रभु धरती पे भेजना

125
00:08:38,000 --> 00:08:41,440
आदमी को चाहे नफरत व जिससे जिसका

126
00:08:41,440 --> 00:08:45,680
अच्छा अथवा बुरा हिसाब है उसे चुने के

127
00:08:45,680 --> 00:08:49,760
लिए इस धरती पे आना ही पड़ता है। वो मोक्ष का

128
00:08:49,760 --> 00:08:53,920
सवाल नहीं उठता। अगर आपने किया है तो भी उसे आप चुने

129
00:08:53,920 --> 00:08:57,920
करने के लिए आए। उसकी प्रालब्ध आपको भोगने के लिए आना ही पड़ा है। नहीं

130
00:08:57,920 --> 00:09:02,320
ऐसा इसमें एक क्वेश्चन बनता है। हां जी। कि

131
00:09:02,320 --> 00:09:06,480
अ जैसे आपने कहा कि उसको किसी व्यवहार

132
00:09:06,480 --> 00:09:10,480
के साथ चुकता करना है तो उसको आना पड़ता है। वो एक अलग बात है कि जब

133
00:09:10,480 --> 00:09:14,480
तक हमारे को कोई दुख देने वाला मौजूद है अगर दुख देने वाला ही नहीं होगा

134
00:09:14,480 --> 00:09:18,720
तो हमें क्यों ऐसा लगेगा कि हम यहां से जाएं। मगर अगर अगर

135
00:09:18,720 --> 00:09:22,720
हम किसी से हमारी बैरभाव है भी नहीं।

136
00:09:22,720 --> 00:09:26,720
फिर भी हमारी अपनी बॉडी की कई ऐसी चीजें हैं जिनके कारण हम लोग

137
00:09:26,720 --> 00:09:30,720
कई बार ऐसा फील कर जाते हैं कि भाई हमें जो है यहां से बेहतर कहीं पर

138
00:09:30,720 --> 00:09:34,880
पहुंचना चाहिए। जैसे कि जैसे कि भूख लगना समय पर

139
00:09:34,880 --> 00:09:38,880
भोजन नहीं मिल रहा है। मान लीजिए नदी है। नदी नहीं मिल रही है

140
00:09:38,880 --> 00:09:43,120
हमें। पानी नहीं मिल रहा है पीने के लिए या फिर वो जो बूढ़ापन

141
00:09:43,120 --> 00:09:47,280
आता है, वृद्धावस्था आती है। चल नहीं पा रहे हैं। उठा ले भगवान उठा ले। ये कहते हैं।

142
00:09:47,280 --> 00:09:51,440
वहां पे हमारा कोई दुश्मन नहीं है। हम स्वतः अपनी स्थिति में वो स्थित हो रहे हैं।

143
00:09:51,440 --> 00:09:55,600
तो हम चाहते हैं कि हम ये जो त्रिविध

144
00:09:55,600 --> 00:09:56,640
ताप है दैहिक

145
00:09:56,640 --> 00:10:00,880
दैविक भौतिक इन तापों से हमारी मुक्ति हो जी परंतु जैसे

146
00:10:00,880 --> 00:10:04,880
आपने कहा कि हम देवता ही बन रहे हैं और देवता के बाद आगे कुछ नहीं देवता

147
00:10:04,880 --> 00:10:09,120
बन के रह जाएंगे फिर से ये चक्र चलेगा तो यानी कि देव मैं बता

148
00:10:09,120 --> 00:10:13,200
किस स्टार्ट कर रहे हैं देखिए क्या होता है जैसे हम कभी-कभी

149
00:10:13,200 --> 00:10:17,280
क्या घर में कई बार बहुत परेशान हो जाते हैं तो कहते बस हो गया अब इससे

150
00:10:17,280 --> 00:10:21,440
बात नहीं करनी मतलब नहीं फिर जब उसे सिर्फ सुख मिलता या किसी

151
00:10:21,440 --> 00:10:25,600
से थोड़ा समय में रिस्पेक्ट भी कोई कह दे देता फिर हम भूल जाते रहने

152
00:10:25,600 --> 00:10:29,600
दो कोई बात नहीं है अभी अच्छा है हमें जीना है इसके साथ जब

153
00:10:29,600 --> 00:10:34,320
स्वयं से बहुत ज्यादा त्रस्त हो जाते तब भी व्यक्ति कहता है कि मोक्ष दे परमात्मा

154
00:10:34,320 --> 00:10:38,320
लेकिन उस समय तक एक ही जीवन तक ऐसा होता है लेकिन उससे बेहतर

155
00:10:38,320 --> 00:10:42,400
एक हमको जब जीवन मिलता है तब हम ये भूल जाते हैं अगर हमें याद

156
00:10:42,400 --> 00:10:46,400
रहे तो हम बार-बार वही रिपीट करें यह एक और भी प्रकृति

157
00:10:46,400 --> 00:10:50,560
किसी हमें प्रदत्त एक चीज है भूल जाने की एक चीज

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00:10:50,560 --> 00:10:54,880
में तंग तंग होके हम भविष्य का निर्माण कर पाना, सोच पाना ये बहुत मुश्किल

159
00:10:54,880 --> 00:10:58,960
क्योंकि कुछ चीजें अनचाही हमारे जीवन में होंगी और कुछ चीजें

160
00:10:58,960 --> 00:11:03,280
मनचाही। प्रभु कुछ और चाहता है और हम आप कुछ और।

161
00:11:03,280 --> 00:11:07,360
हम चाहते मोक्ष मिल जाए लेकिन हमारे कर्मों का जो हिसाब है वो

162
00:11:07,360 --> 00:11:11,600
हमें वापस आना ही पड़ता। चुप करने के लिए धरती

163
00:11:11,600 --> 00:11:12,100
पे

164
00:11:11,760 --> 00:11:15,760
आना पड़ता। दूसरे जन्म में हम भूल गए। बात खत्म हो गई जा के।

165
00:11:15,760 --> 00:11:20,080
फिर एक नया अच्छा जन्म मिला। तो यानी कि एक तरीके से हम

166
00:11:20,080 --> 00:11:24,080
ऐसा नहीं लग रहा कि हम स्पिरिचुअल लाइफ जी के हमें बेवकूफ बेवकूफ बनाया जा

167
00:11:24,080 --> 00:11:28,320
रहा है कि हम भूल गए अपनी चीजों को। नहीं नहीं बिल्कुल नहीं। क्योंकि आप किसी

168
00:11:28,320 --> 00:11:32,560
के जीवन से किसी के शब्दों में चेहरे पे ना जाकर के उसके

169
00:11:32,560 --> 00:11:36,560
व्यवहारिक जीवन को नहीं नहीं जैसे आपने कहा ना कि वो दूसरे जन्म में आप

170
00:11:36,560 --> 00:11:40,960
ये भूल जाएंगे कि आप मोक्ष ले आए हैं। अच्छा बात बताइए। तो आपका मोक्ष जी

171
00:11:40,960 --> 00:11:45,120
जैसे मान लीजिए आपकी किसी से दुश्मनी है। ठीक? और आपको अगला

172
00:11:45,120 --> 00:11:49,120
जन्म याद हो जाए कि फलाने भेजे एक करोड़ नहीं दुश्मनी नहीं फॉर

173
00:11:49,120 --> 00:11:53,280
एग्जांपल और आपको याद आ जाए उस जन्म में भी तो आप क्या करोगे

174
00:11:53,280 --> 00:11:57,440
आप उस जीवन को जी नहीं पाओगे जो आपको मिला है जिस घर में

175
00:11:57,440 --> 00:12:01,520
आपको वो जीवन याद रहेगा कि उसने मुझे कष्ट दिया था। अब

176
00:12:01,520 --> 00:12:06,240
मुझे उससे बदला लेना मैं वो नहीं कह रहा हूं। इसलिए भूलना जरूरी होता है। मैं वो नहीं कह रहा हूं भूलना।

177
00:12:06,240 --> 00:12:10,240
मैं यह कह रहा हूं जैसे कि अपने शरीर की अवस्था ऐसी होती

178
00:12:10,240 --> 00:12:14,320
है जिसमें हमको जरूरतें पड़ती हैं और वो जब जरूरत जैसे हम

179
00:12:14,320 --> 00:12:18,400
कहते हैं कि हम जब हम किसी को स्पिरिचुअल मार्ग पे लाते हैं तो

180
00:12:18,400 --> 00:12:22,480
हम ये हमारा एक क्लेम होता है होना चाहिए जितनी भी आध्यात्मिक संस्थाएं

181
00:12:22,480 --> 00:12:27,040
हैं कि भाई हम आपको जो आपको दुख हो रहे हैं उससे हम मुक्ति दिलाएंगे

182
00:12:27,040 --> 00:12:31,120
हम जो आपको अभी दुख हो रहे हैं तो उसमें अभी ये आता है कि जैसे

183
00:12:31,120 --> 00:12:35,120
भाई आप ऐसा कौन सा सुख देने वाले हैं जो कि हमें यहां नहीं मिल

184
00:12:35,120 --> 00:12:39,280
रहा है मूवी देखने में नहीं मिल रहा है या मिठाई खाने में नहीं मिल रहा है। भोजन

185
00:12:39,280 --> 00:12:43,440
खाने करने में नहीं मिल रहा है। तो हम ऐसा सुख आपको देने वाले हैं जो शाश्वत

186
00:12:43,440 --> 00:12:47,680
हो जिसमें ब्रेक ना आए। जी जिसमें कि बीच में बाधा ना उत्पन्न

187
00:12:47,680 --> 00:12:51,680
हो वो लगातार आप जो है स्थित प्रज्ञ हो जाए। आत्म स्थित हो जाए।

188
00:12:51,680 --> 00:12:55,840
आत्मस्वरूप हो जाए। तो ये हम कहेंगे

189
00:12:55,840 --> 00:12:59,920
अच्छा अगर हम ये कहें कि ये जो सुख तुम्हें मिल रहा है इससे बेहतर सुख होगा मगर

190
00:12:59,920 --> 00:13:04,080
ब्रेक तो उसमें भी आएगी। जी है ना? अनंत सुख नहीं होगा। वहां शाश्वतता

191
00:13:04,080 --> 00:13:08,320
नहीं होगी। तो फिर वो कहेगा भाई ठीक है फिर मैं अपना जो प्रैक्टिकल

192
00:13:08,320 --> 00:13:12,400
कर रहा हूं उसमें ही ठीक हूं खुश हूं फिर हम जब उसको वो दे नहीं रहे दूसरी बात यह है कि

193
00:13:12,400 --> 00:13:16,400
जैसे हमने कहा कि दूसरा दूसरा जन्म मिलता है वहां

194
00:13:16,400 --> 00:13:20,640
पर भी मोक्ष मिलता है मतलब मोक्ष नहीं मतलब वो देवत्व की प्राप्ति होती है

195
00:13:20,640 --> 00:13:24,640
तो कहने का मतलब है इन शॉर्ट कि ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार

196
00:13:24,640 --> 00:13:28,880
मोक्ष नहीं है जी देवत्व की प्राप्ति है और देवत्व

197
00:13:28,880 --> 00:13:33,120
की प्राप्ति होने के बाद आप यह भूलते हुए कि आप यह जीवन पहले काट

198
00:13:33,120 --> 00:13:37,120
चुके हैं दोबारा दोबारा वही जीवन आपको जीना है। देवत्व की प्राप्ति के बाद

199
00:13:37,120 --> 00:13:41,200
नहीं जीवन बेहतर जीना है। जीवन जीना नहीं देवत्व से पतित होना

200
00:13:41,200 --> 00:13:42,480
है ना दोबारा। नहीं

201
00:13:42,480 --> 00:13:46,640
पतित साइकिल चलेगी ना बहुत समय बाद जब हमें विस्मृति

202
00:13:46,640 --> 00:13:50,720
हो जाती है। जब अजंता एलोरा वगैरह में गुफाओं में ऐसी चीजें आती तो

203
00:13:50,720 --> 00:13:54,880
विकृति आती मन के अंदर होती है। तब हमारा तो लास्ट तक बहुत अच्छा

204
00:13:54,880 --> 00:13:59,280
जन्म होता। द्वापर के अंत तक हमारा बहुत देवत्व बना रहता।

205
00:13:59,280 --> 00:14:03,360
मतलब एक मतलब एक बड़े टाइम की अब कोई नहीं 16 कला फिर आठ कला

206
00:14:03,360 --> 00:14:07,680
कम हो जाते हैं ना जैसे आप बचपन जैसे जेल में पेरोल मिलता है ना

207
00:14:07,680 --> 00:14:12,000
आप 8 दिन के लिए घुमाओ जाके ऐसा तो मैं नहीं कहूंगी पेल

208
00:14:12,000 --> 00:14:16,080
जैसी शब्द तो नहीं कहूंगी लेकिन हां लास्ट में मुझे

209
00:14:16,080 --> 00:14:20,320
लगता आप शायद सुना होगा अपने बड़ों से अभी तक

210
00:14:20,320 --> 00:14:24,400
100 साल के अंदर जितनी गिरावट हुई नैतिक पतन हुआ है चारित्रिक पतन

211
00:14:24,400 --> 00:14:28,480
हुआ हमारी सोच नीचे आई है उतनी तो पहले भी नहीं थी

212
00:14:28,480 --> 00:14:32,560
नहीं नहीं थी तो कहां गिरा था मनुष्य कुल मिला के अब एक चीज़ समझ ले कि

213
00:14:32,560 --> 00:14:36,640
यह जो आवागमन है इससे हमारा छुटकारा नहीं है। अगर एक जैसे

214
00:14:36,640 --> 00:14:41,280
मान लीजिए किसी चीज का नहीं नहीं वो ठीक है मैं आपकी बात मान गया भाई बी के जो ब्रह्माकुमारी

215
00:14:41,280 --> 00:14:45,600
है उसकी विचारधारा यह है कि जो ये आवागमन है इससे मुक्ति

216
00:14:45,600 --> 00:14:49,600
नहीं है हां इससे बेटर में आप जाओगे मुक्ति नहीं जीवन मुक्ति मिलेगी

217
00:14:49,600 --> 00:14:53,600
एक अच्छा जीवन मिलेगा जैसे अभी आपने कहा था ना बीच में अपने से

218
00:14:53,600 --> 00:14:57,600
इंसान परेशान हो जाता है तो मोक्ष तो वहां अपना जीवन बहुत ही

219
00:14:57,600 --> 00:15:01,760
बेहतर जीवन होगा जिसको जीने के लिए मन करेगा कि मैं इस जीवन को

220
00:15:01,760 --> 00:15:05,760
जीू जिस बेहतर जीवन देखिए कोई रोग नहीं

221
00:15:05,760 --> 00:15:09,840
होगा मैं वही मैं आपको कह रहा हूं। पहली बात तो ये है कि वो बेहतर जीवन

222
00:15:09,840 --> 00:15:13,920
भी शाश्वत नहीं होगा। नहीं उसमें भी एक ना एक दिन हम गिरावट आनी है। अपना

223
00:15:13,920 --> 00:15:18,240
जीवन छ साल के थे। अभी आप जो भी हो गए हो हां तो सबका मतलब वो मुक्ति

224
00:15:18,240 --> 00:15:22,240
नहीं होनी है। जो यहीं जैसा रहना है आगे बस ये लंबे समय के लिए अच्छा

225
00:15:22,240 --> 00:15:26,960
जीवन मिल जाएगा। मुक्ति नहीं मिलेगी। अब [नाक से की जाने वाली आवाज़] उसमें एक चीज यह भी है कि

226
00:15:26,960 --> 00:15:31,040
जब तक हम किसी देश काल परिस्थिति पर निर्भर हैं

227
00:15:31,040 --> 00:15:35,680
तब तक हम अपने आप को पूर्ण रूप से सुखी नहीं मान पाते।

228
00:15:35,680 --> 00:15:39,680
जैसे कि अगर मैं पानी पर निर्भर हूं। मुझे प्यास लग रही है तो मैं कभी-कभी

229
00:15:39,680 --> 00:15:43,920
सोचता हूं मुझे उठा के ना लाना पड़े। ये भी सोचता हूं। और

230
00:15:43,920 --> 00:15:48,080
भोजन के लिए मुझे पकाना ना पड़े, कुक ना करना पड़े। जी और मुझे

231
00:15:48,080 --> 00:15:52,240
बढ़िया स्वादिष्ट भोजन भी मिल जाए। या फिर इसके अलावा और भी आप समझ रही होंगी

232
00:15:52,240 --> 00:15:56,320
कि काफी काम वासना इत्यादि ये सब इच्छाएं भी होती हैं। तो ये

233
00:15:56,320 --> 00:16:00,480
सारी चीजें जो होती हैं जब तक हम अपने से किसी द्वैत

234
00:16:00,480 --> 00:16:04,480
भाव पे निर्भर रहते हैं। द्वैत मतलब किसी देश काल परिस्थिति पे हमारी

235
00:16:04,480 --> 00:16:08,480
सुख की निर्भरता जब तक होगी तब तक हम पूर्ण रूप से सुखी नहीं हो

236
00:16:08,480 --> 00:16:12,640
सकते। जैसे किसी क्रिया की ही जरूरत हो गई। क्रिया मतलब कि किसी के मतलब

237
00:16:12,640 --> 00:16:16,640
रमण करना ये सब इस इसमें ही हमारी जरूरत हो गई। या फिर हमारी भोजन

238
00:16:16,640 --> 00:16:20,640
पे आवश्यक भोजन पे हम निर्भर हो गए। ये भी हम किसी सामग्री पर निर्भर

239
00:16:20,640 --> 00:16:24,640
है कि वो वहां रख के मुझे उठा के लानी है। तो मेरे अंदर ये है कि मैं क्यों जाऊं कोई

240
00:16:24,640 --> 00:16:28,720
मुझे अपने आप दे दे। तो जब तक हम किसी देश काल परिस्थिति पर निर्भर

241
00:16:28,720 --> 00:16:32,960
हैं तब तक हम पूर्ण रूप से सुखी नहीं तो हम ये मान सकते हैं कि जो बीके

242
00:16:32,960 --> 00:16:37,040
को फॉलो कर रहे हैं यहां पर उसको देवत्व की प्राप्ति होनी है। यहां से बहुत

243
00:16:37,040 --> 00:16:41,120
बेटर जीवन मिलना है और बहुत सालों तक वो चलना है। बहुत समय तक वो चलना

244
00:16:41,120 --> 00:16:45,200
है। आप ये भूल ही जाओगे कि आपने कभी दुख देखा भी था। मगर एक

245
00:16:45,200 --> 00:16:49,360
दिन यह दुख वापस भी आएगा। ये भैया जैसे सतयुग

246
00:16:49,360 --> 00:16:53,360
कलयुग आता है ना ये तो शाश्वत सत्य है ना प्रमाणिक है

247
00:16:53,360 --> 00:16:57,600
सभी में है तो ऐसे हर चीज हमारी आपकी बाल्यावस्था

248
00:16:57,600 --> 00:17:02,000
और फिर किशोरी युवा और फिर क्या होता है वृद्धि

249
00:17:02,000 --> 00:17:06,320
मतलब पूर्ण रूप से मुक्ति नहीं है कोई चीज नहीं है क्योंकि जो चीज बनी है

250
00:17:06,320 --> 00:17:10,560
जो इसमें सर्किल में है सोमवार मंगल बुध बृहस्पत

251
00:17:10,560 --> 00:17:14,560
आता है ना ऐसे [गला साफ़ करने की आवाज़] चार ऋतुओं का है 12 महीनों का है सभी

252
00:17:14,560 --> 00:17:18,560
का एक तो है हमें हमें एक लंबे समय की मुक्ति दे रहे हैं व्यक्ति

253
00:17:18,560 --> 00:17:22,640
को यहां से लंबे समय की लंबे समय की परंतु

254
00:17:22,640 --> 00:17:25,840
यह नहीं है कि मुक्ति है ही मुक्त ही हो गए। अच्छा

255
00:17:25,840 --> 00:17:30,160
एक चीज इसमें ये आती है कि जैसे अ

256
00:17:30,160 --> 00:17:34,800
जो ईश्वर का अस्तित्व है जी वो किस मतलब जैसे

257
00:17:34,800 --> 00:17:39,040
क्या ब्रह्मा कुमारी ये मानता है कि जैसे आपने कहा ना कि जिन लोगों से हमें दुख मिल रहा है

258
00:17:39,040 --> 00:17:43,040
जी है ना तो उसका कारण भी ईश्वरी है। मतलब

259
00:17:43,040 --> 00:17:47,600
हमें जो दुख देने वाले लोग हैं मैं नहीं मानती। जी जी ये

260
00:17:47,600 --> 00:17:51,680
नहीं पढ़ी तो मैं कैसे हम उसको दोष

261
00:17:51,680 --> 00:17:55,920
नहीं दे सकते उसने ज्ञान समझा गीता के माध्यम से रामायण के माध्यम से किस

262
00:17:55,920 --> 00:18:00,160
माध्यम किस धर्म आत्मा को नहीं भेजा उसने धारा धाम पे सभी को बेच के

263
00:18:00,160 --> 00:18:04,160
हम बच्चों के सुधार के लिए उसने हर प्रयास किया लास्ट में आता

264
00:18:04,160 --> 00:18:08,160
है जब कहते हैं कि धर्म की ग्लानी होती है परमात्मा तब आता है वो

265
00:18:08,160 --> 00:18:12,320
दुख कभी नहीं देख सकता क्या पिता कोई अपने क्या आप भी अगर आप शादीशुदा

266
00:18:12,320 --> 00:18:16,480
है आपके बच्चे हो गए क्या आप चाहेंगे हमारे बच्चे को दुख कोई पिता नहीं चाहता

267
00:18:16,480 --> 00:18:20,480
ना ही वो नहीं इसमें इसमें कांसेप्ट ये होता है कई कांसेप्ट है तो

268
00:18:20,480 --> 00:18:24,560
उसमें से एक कांसेप्ट मैं बताता हूं एक कांसेप्ट ये है कि जैसे कि बच्चा जो है

269
00:18:24,560 --> 00:18:28,800
वो किसी बलून के लिए रो रहा है जी

270
00:18:28,800 --> 00:18:32,880
लाल कलर के मुझे चाहिए जी पिता जानता है कि बैलून के लिए

271
00:18:32,880 --> 00:18:36,960
बेकार में रो रहा है इसके पास तो उससे बहुत अच्छी बॉल है तो पिता

272
00:18:36,960 --> 00:18:41,040
मुस्कुराता है उसको बैलून नहीं दिलाता है बच्चे के हिसाब से वो जो बैलून

273
00:18:41,040 --> 00:18:45,120
ना मिलना है वो बुरे बुरी चीज है और पिता के हिसाब से वो व्यर्थ है

274
00:18:45,120 --> 00:18:49,200
जी जी तो नैनम छिंदती शस्त्राण नैन धरती पावका न

275
00:18:49,200 --> 00:18:53,280
चैनम क्लेदंत न शषति मारुता तो जब हम भय खा

276
00:18:53,280 --> 00:18:57,600
रहे हैं हमें लग रहा है कि भैया हम मरने वाले हैं इसलिए हम भय खा रहे हैं मगर हमारे पिता

277
00:18:57,600 --> 00:19:02,160
जो परमेश्वर हैं उनको पता है इसको कुछ नहीं होने वाला तो

278
00:19:02,160 --> 00:19:06,320
वहां पर पिता की स्थिति क्या होगी कि भाई मुझे पता है इसको कुछ नहीं होने वाला तो

279
00:19:06,320 --> 00:19:10,960
वहां पे वो उन कर्मों का जो मेरे साथ घटित होने वाली घटना है उनको

280
00:19:10,960 --> 00:19:15,040
करने वाला होते हुए भी वो अकर्ता है जैसे भगवान ने कहा भगवत गीता है कि समस्त

281
00:19:15,040 --> 00:19:19,120
कर्मों को करते हुए भी तुम मुझे अकर्ता जानते क्यों जब उसकी याद में हो

282
00:19:19,120 --> 00:19:23,440
तो अकर्ता हो जाओगे क्योंकि जैसे आप बच्चे को बेटा

283
00:19:23,440 --> 00:19:27,440
तुम यह नहीं करना फिर अगर तुम किसी से झगड़ा नहीं अगर कोई और करे

284
00:19:27,440 --> 00:19:31,440
तो मुझे बताना नहीं ये तो खैर विषय अलग हो रहा है बात बता रही

285
00:19:31,440 --> 00:19:35,760
थी कि जब वो समर्थ सर्वशक्तिमान है और उसने कह दिया है

286
00:19:35,760 --> 00:19:39,760
तो फिर हम कोई भी कर्म कर रहे हैं उसके अनुसार अपने अनुसार

287
00:19:39,760 --> 00:19:43,760
कर्म करना माना विकर्म को जन्म देना उसके अनुसार करना

288
00:19:43,760 --> 00:19:48,000
मतलब शास्त्र सम्मत तेरे लिए कर्तव्य और कर्तव्य के विषय में शास्त्र प्रमाण है।

289
00:19:48,000 --> 00:19:52,560
ठीक है? अच्छा तो अब यह बात आती है कि ईश्वर जो है वो जो

290
00:19:52,560 --> 00:19:56,320
नेगेटिविटी है, तामसिक कार्य हैं, बुराई उनसे दूर है।

291
00:19:56,320 --> 00:20:00,400
उनसे अलग है ईश्वर। उसके उसकी सत्ता में वह चीज नहीं हो रही है। वह

292
00:20:00,400 --> 00:20:04,560
प्राकृतिक हो रहा है। तो ईश्वर का अस्तित्व

293
00:20:04,560 --> 00:20:08,560
किसी के समक्ष हम कैसे प्रूव करते हैं कि ईश्वर है। जैसे हमने कहा कि

294
00:20:08,560 --> 00:20:12,720
हम ब्रह्माकुमारी आ रहे हैं और हम स्पिरिचुअलिटी को फॉलो कर रहे हैं और हमें मुक्ति

295
00:20:12,720 --> 00:20:16,880
नहीं मगर एक बहुत बेटर जीवन मिल रहा है बहुत लंबे समय तक के लिए देवत्व

296
00:20:16,880 --> 00:20:20,880
वाला 16 कला वाला। उसके बाद वो घटेंगी कलाएं। फिर हम आठ कला में फिर आएंगे।

297
00:20:20,880 --> 00:20:25,200
आठ कला से हम लोग तो और गिरे हुए होंगे। मेरे ख्याल से वो भी कम होंगी। तो

298
00:20:25,200 --> 00:20:29,200
हम जब ये कहते हैं कि कोई है जो हमें ऐसा प्रोवाइड कराएगा अगर हम इस उसके रास्ते

299
00:20:29,200 --> 00:20:33,360
पर चलेंगे तो वो है ये हम कैसे माने? जैसे सूर्य

300
00:20:33,360 --> 00:20:37,520
को आप मानते हो हां देखते हो हां और ग्रहण लग जाए ना दिखे

301
00:20:37,520 --> 00:20:42,000
तो ना दिखे तो अनुमान प्रमाण से मानते हैं मानते हैं लेकिन अस्तित्व

302
00:20:42,000 --> 00:20:46,160
में तो है ना नहीं अस्तित्व भले ही ग्रहण लग गया लेकिन है

303
00:20:46,160 --> 00:20:50,800
वो नहीं तो अनुमान प्रमाण है ना वहां पे अनुमान वही अनुमान प्रमाण क्या है

304
00:20:50,800 --> 00:20:54,880
क्योंकि जिस समय हमें यह ज्ञान होता है मैं आत्मा हूं

305
00:20:54,880 --> 00:20:59,440
तो जब गहराई से ज्ञान होने के बाद फिर परमात्मा को

306
00:20:59,440 --> 00:21:03,520
याद करना उससे जुड़ना उस प्रमाण जाहिर

307
00:21:03,520 --> 00:21:07,520
कर देगा आपके जीवन में परिवर्तन। परमात्मा का यह अस्तित्व है। वह

308
00:21:07,520 --> 00:21:11,440
है वह पढ़ा रहा है। अगर आया आप उससे जुड़े हुए तो आप में पूरा

309
00:21:11,440 --> 00:21:15,520
परिवर्तन हो जाएगा। जिस प्रकार अर्जुन को जब गीता का ज्ञान दे उसके

310
00:21:15,520 --> 00:21:19,760
पहले अर्जुन एक सामान्य व्यक्ति एक योद्धा थे। ठीक है? क्षत्रिय

311
00:21:19,760 --> 00:21:24,000
योद्धा थे। लेकिन जब उसका सानिध्य आया। उसकी छत्रछाया

312
00:21:24,000 --> 00:21:28,640
में उसके प्रकाश की किरणें बनी। उसको ज्ञान मिला तो उसमें परिवर्तन आया।

313
00:21:28,640 --> 00:21:32,880
हम ठीक ऐसे जब मनुष्य में परिवर्तन आता है बहुत आत्मिक

314
00:21:32,880 --> 00:21:37,120
स्तर पर आता आ जाता है तो यह उसका सबसे बड़ा परिवर्तन

315
00:21:37,120 --> 00:21:41,120
ये प्रमाण है कि परमात्मा का अस्तित्व क्योंकि जो कुछ वो दे रहा

316
00:21:41,120 --> 00:21:45,200
है वो ग्रहण करके अपने आप को प्रमाणित करता है दुनिया के

317
00:21:45,200 --> 00:21:49,200
सामने शुद्ध करता है जाकर के वो आप सही कह रही हो अर्जुन के जीवन में परिवर्तन

318
00:21:49,200 --> 00:21:53,280
तो तब आया जब उसने परमात्मा पर विश्वास कर लिया साक्षात्कार कराया तब

319
00:21:53,280 --> 00:21:57,360
परमात्मा पे उस विश्वास कर लिया तब परिवर्तन आया अभी क्या है परमात्मा

320
00:21:57,360 --> 00:22:01,440
के मार्ग पर चलने के लिए हम क्या उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं?

321
00:22:01,440 --> 00:22:05,440
अनुमान प्रमाण। जैसे जो सूर्य है ग्रहण लग जाता है। उसके बाद भी

322
00:22:05,440 --> 00:22:09,520
अनुमान प्रमाण है। क्योंकि यहां पर पेड़ पौधे जो है आगे

323
00:22:09,520 --> 00:22:13,920
बढ़ रहे हैं। हमें भी एनर्जी मिल रही है। इसका मतलब कोई है जो हमें एनर्जी दे रहा है। सूर्य

324
00:22:13,920 --> 00:22:18,000
से हमें एनर्जी मिलती है। तो अनुमान प्रमाण से और भी कई सारे प्रमाण

325
00:22:18,000 --> 00:22:22,080
हैं। उससे हमें पता चलता है। तो हम यहां पर वो अर्जुन की बात तो ये है कि

326
00:22:22,080 --> 00:22:26,640
उसने विश्वास किया उस पथ पे चला। विश्वास बाद में किया जब उसने साक्षात्कार

327
00:22:26,640 --> 00:22:30,640
किया जब देखा अर्जुन ने उसके दिव्य विराट रूप को तब

328
00:22:30,640 --> 00:22:34,800
विश्वास किया है ऐसे नहीं शब्दों से कभी अर्जुन ने विश्वास नहीं किया

329
00:22:34,800 --> 00:22:39,040
इतने समय तो ज्ञान देते रहे श्री कृष्ण जी जब दिखाया बोला नहीं संभल

330
00:22:39,040 --> 00:22:43,040
रहा अभी भी नहीं संभल रहा मोह नहीं खत्म हो रहा तब विराट रूप को तुमने

331
00:22:43,040 --> 00:22:47,360
दिखाया तब बोला बस प्रभु मैं समझ गया तो परिवर्तन

332
00:22:47,360 --> 00:22:51,440
ही परमात्मा का एक सबसे बड़ा प्रमाण है कि वो है

333
00:22:51,440 --> 00:22:55,520
नहीं नहीं कोई जो स्पिरिचुअल पे चल के बदल गया वो तो बाद का प्रमाण है।

334
00:22:55,520 --> 00:22:59,680
हम पहले क्या प्रमाण दे रहे हैं? जिससे वो उसके मार्ग पे चले वो प्रमाण

335
00:22:59,680 --> 00:23:03,760
क्या है? मतलब अनुमान प्रमाण हमारा है। एक अनुमान प्रमाण

336
00:23:03,760 --> 00:23:07,840
ये दिया जाता है कि दुनिया में सभी चीजें जो है किसी ना किसी चीज

337
00:23:07,840 --> 00:23:11,840
पर निर्भर है। इसलिए जो जो प्रकृति काम कर रही है तो

338
00:23:11,840 --> 00:23:15,840
इस ये स्वयं से नहीं कर सकती क्योंकि जड़ है प्रकृति। तो क्योंकि यह

339
00:23:15,840 --> 00:23:20,080
किसी ना किसी पर निर्भर है। इसलिए यह मानना पड़ेगा कि कोई ऐसा

340
00:23:20,080 --> 00:23:24,160
स्त्रोत है जिसके ऊपर यह निर्भर है और जो स्वयं पर निर्भर है वो किसी

341
00:23:24,160 --> 00:23:28,240
पर निर्भर नहीं है। यह मानना पड़ेगा हमें कि कहीं से इसकी शुरुआत हो रही है।

342
00:23:28,240 --> 00:23:32,880
कह रहा है जब परमात्मा ने उसके पहले भी उसका प्रमाण नहीं नहीं मतलब

343
00:23:32,880 --> 00:23:36,880
कैसे सिद्ध कह रहे हैं कि परमात्मा नहीं ना होने के बाद भी वो चला रहा

344
00:23:36,880 --> 00:23:41,680
है। नहीं नहीं नहीं मैं ये नहीं कह रहा। मैं तो यह कह रहा हूं जैसे हमने कहा कि

345
00:23:41,680 --> 00:23:45,840
ब्रह्मा कुमारी से हमें यह वाला कांसेप्ट मिलता है देवत्व

346
00:23:45,840 --> 00:23:50,080
वाला। ठीक है? और ब्रह्मा कुमारी ये भी नहीं मानती कि ईश्वर

347
00:23:50,080 --> 00:23:54,400
पर ही ईश्वर इनका भी अधिष्ठान है। किनका? जो तामसिक

348
00:23:54,400 --> 00:23:58,400
कार्य हो रहे हैं उनका अधिष्ठान ईश्वर नहीं है। बुराई जो हो रही है उनका

349
00:23:58,400 --> 00:24:02,560
अधिष्ठान ईश्वर नहीं है। तो ईश्वर को सिद्ध करने के केवल दो ही

350
00:24:02,560 --> 00:24:06,720
तरीके हैं। एक कि हमारे अंदर सच्चिदानंद की प्यास

351
00:24:06,720 --> 00:24:10,720
है। तो इसका मतलब है कि दुनिया के अंदर कोई सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर

352
00:24:10,720 --> 00:24:14,880
है। और उसके साथ एकत्व को प्राप्त करके हम सच्चिदानंद

353
00:24:14,880 --> 00:24:18,960
हो जाएंगे। मगर ब्रह्मा कुमारी ने इस इस कांसेप्ट

354
00:24:18,960 --> 00:24:24,640
को काट दिया यह कहते हुए कि भाई मुक्ति है ही नहीं। सच्चिदानंद है ही नहीं। सच्चिदानंद

355
00:24:24,640 --> 00:24:28,960
आनंद अनंत अबाध्य मुक्ति है। अनंत अबाध्य मुक्ति नहीं है।

356
00:24:28,960 --> 00:24:33,280
तो यह कांसेप्ट कट गया। अब दूसरा कांसेप्ट है कि सारी

357
00:24:33,280 --> 00:24:37,440
चीजों सारी चीजें जिस पर निर्भर हैं जो सभी चीजों का अधिष्ठान

358
00:24:37,440 --> 00:24:41,440
है वो ईश्वर है। ये दूसरा कांसेप्ट है। तो ये ऐसे कट गया कि

359
00:24:41,440 --> 00:24:46,080
बुराई का अधिष्ठान ईश्वर नहीं है। देखो मैं बताती हूं संक्षिप्त।

360
00:24:46,080 --> 00:24:50,160
जी। परमात्मा सने का पिता हो। अच्छा हो, बुरा हो, कातिल

361
00:24:50,160 --> 00:24:54,240
हो, जुल्मी हो, पापी हो। बस पिता है। पिता सबका है।

362
00:24:54,240 --> 00:24:56,880
लेकिन जिस प्रकार आपके दो बच्चे हैं, सब

363
00:24:56,880 --> 00:25:00,880
कुछ है। लेकिन पढ़ाई तो आपको पढ़ना पड़ता। जीवन आपको जीना

364
00:25:00,880 --> 00:25:05,040
पड़ता। पिता आपको एक समय तो उंगली पकड़ कर चला

365
00:25:05,040 --> 00:25:09,360
सकता, बता सकता, शिक्षित कर सकता है, समझा नहीं दे सकता। लेकिन उसके

366
00:25:09,360 --> 00:25:13,520
बाद जब हम बड़े होते जो भी कार्य करेंगे उस कारण के अच्छे

367
00:25:13,520 --> 00:25:17,680
अथवा बुरे परिणाम के हकदार हम हैं। हमारा पिता नहीं

368
00:25:17,680 --> 00:25:21,840
है। अगर इनवॉल्व नहीं है तो इनवॉल्व है तो वो

369
00:25:21,840 --> 00:25:26,160
एक अलग बात हो जाती। नहीं वो नहीं बात ये है कि पिता

370
00:25:26,160 --> 00:25:30,320
जब बुराई को कंट्रोल नहीं कर सकता है जी इसका मतलब कि

371
00:25:30,320 --> 00:25:34,560
बुराई का अधिष्ठान वो नहीं है जैसे उसने बना के छोड़ दिया मान

372
00:25:34,560 --> 00:25:38,640
लीजिए और उसका कंट्रोल नहीं है अब तो इसका मतलब वो कंट्रोलर नहीं है बुराई का

373
00:25:38,640 --> 00:25:42,880
तो बुराई का यदि कंट्रोलर नहीं है यानी कि बुराई अपने आप एग्जिस्ट कर रही है

374
00:25:42,880 --> 00:25:46,960
बुराई जो है वो अपने आप एक्सिस्ट कर रही है उसका उसको भगवान ने नहीं बनाया

375
00:25:46,960 --> 00:25:51,040
वो अपने आप इवॉल्व हो रही है तो जब हम ऐसा कह देंगे कि दुनिया

376
00:25:51,040 --> 00:25:55,120
में कुछ है जो अपने आप एक इवॉल्व हो रहा है। अपने आप काम कर रहा है। वह किसी पे निर्भर नहीं

377
00:25:55,120 --> 00:25:59,280
है। वह ईश्वर पे भी निर्भर नहीं है। बुराई अपने आप में स्वतंत्र है।

378
00:25:59,280 --> 00:26:03,680
तो ईश्वर पे निर्भर नहीं है। तो ये जो ईश्वर की सिद्धि वाले जो दो कांसेप्ट हैं

379
00:26:03,680 --> 00:26:07,680
कि या तो ईश्वर ऐसे सिद्ध होता है कि हर आत्मा के अंदर सच्चिदानंद की प्यास है तो

380
00:26:07,680 --> 00:26:11,680
मुक्ति से कट गया। और दूसरा कांसेप्ट ये वाला है कि हम लोग दुनिया

381
00:26:11,680 --> 00:26:12,180
में सभी

382
00:26:12,160 --> 00:26:16,400
चीजें किसी ना किसी पर निर्भर है। मगर आप कह रहे हो कि जो बुरा हो रहा है दुनिया में वो

383
00:26:16,400 --> 00:26:20,400
ईश्वर पर निर्भर नहीं है। तो फिर यहां से भी ईश्वर की सिद्धि नहीं हो इसीलिए मैंने पूछा कि

384
00:26:20,400 --> 00:26:24,480
फिर बी के ईश्वर की सिद्धि के कैसे करता है? क्या मैंने बताया ना

385
00:26:24,480 --> 00:26:28,560
आपको जैसे जिस प्रकार आपने देखा कई बीज होते हैं समय पर अंकुरित

386
00:26:28,560 --> 00:26:32,720
होते हैं। धरती में रहते हैं लेकिन जैसे नीम है इस समय अंकुरित संभवता

387
00:26:32,720 --> 00:26:36,960
नहीं होगी। जैसे बरसात गिरेगी नीम अंकुरित होगी।

388
00:26:36,960 --> 00:26:41,040
कुछ सीजन भर चलते रहते हैं। ऐसे ही पर जैसे मैंने फिर

389
00:26:41,040 --> 00:26:45,360
उसके बाद बताया कि एक बच्चे का आपको उदाहरण दिया था कि जो बुराई

390
00:26:45,360 --> 00:26:49,520
है उसका भी बीज कहीं ना कहीं सूक्ष्म में बहुत

391
00:26:49,520 --> 00:26:53,520
पिछले हिसाब के उसमें कोई चीज आपको पता है तो संसार

392
00:26:53,520 --> 00:26:57,680
में नष्ट नहीं होती है। बीज सबका होता है। पड़ा रहता है। बीज सबका पड़ा

393
00:26:57,680 --> 00:27:01,680
रहता है। लेकिन जैसे जिसका सीजन आता है, जैसे उसका

394
00:27:01,680 --> 00:27:06,720
वातावरण आएगा, जैसे ही लोग उस पे कंट्रोल नहीं है ना ईश्वर का। नहीं

395
00:27:06,720 --> 00:27:10,720
जैसे मान लीजिए कहीं चोरी हो रही है। एक बात बताओ जैसे चोर

396
00:27:10,720 --> 00:27:14,800
अगर घंटा चुरा लेता कहते मंदिर में भगवान बचाने नहीं आए जबकि वो भगवान का

397
00:27:14,800 --> 00:27:18,960
ही मंदिर है। बराबर क्यों? क्यों नहीं? इसलिए क्योंकि मैं बताता हूं।

398
00:27:18,960 --> 00:27:22,960
इसलिए क्योंकि भगवान को घंटा चुराने से फर्क नहीं पड़ता। सुनिए। जैसे

399
00:27:22,960 --> 00:27:26,960
जैसे आपने वो कहानी सुनी होगी दयानंद जी की। दयानंद जी आर्य समाज वाले

400
00:27:26,960 --> 00:27:27,460
जानते

401
00:27:27,200 --> 00:27:31,200
हैं ना? उसमें उन्होंने एक तर्क दिया कि मैं शिवलिंग की

402
00:27:31,200 --> 00:27:35,280
पूजा क्यों करूं? ये तो खुद अपनी ही रक्षा नहीं कर पा रही। इस पे चूहे कूद रहे हैं।

403
00:27:35,280 --> 00:27:39,280
जी। तो उसमें बात ये बनती है कि हमें बुरा लग

404
00:27:39,280 --> 00:27:43,360
रहा है कि चूहे उस पे कूद रहे हैं। भगवान के तो बच्चे हैं वो। उनको तो

405
00:27:43,360 --> 00:27:47,520
गुदगुदी हो रही है। हो सकता है। मासूमियत देख रहे हो चूहों की। [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो घंटा

406
00:27:47,520 --> 00:27:51,520
चुराना बुरा हमारे लिए है। जैसे कि ईश्वर को तो पता है कि

407
00:27:51,520 --> 00:27:55,600
मुझे दोबारा आना है। आपने अभी यहां लिखा हुआ आपके पोस्टर में कि मैं आज से

408
00:27:55,600 --> 00:27:59,680
पहले 5000 साल पहले यहां इसी समय आ चुका हूं। लिखा है। ये चीज मैं

409
00:27:59,680 --> 00:28:03,840
नहीं जानता हूं। मेरे लिए सच्चाई क्या है कि मैं तो आज ही आया हूं। यह सच्चाई ईश्वर जानते

410
00:28:03,840 --> 00:28:08,160
हैं आपके हिसाब से। जी। तो ईश्वर को ईश्वर जानता है घंटा चुराना

411
00:28:08,160 --> 00:28:12,160
बुरा नहीं है। क्यों बुरा नहीं है? क्योंकि 4:24 में लिखा हुआ

412
00:28:12,160 --> 00:28:16,240
है सब कुछ ब्रह्म ही है। घंटा भी ब्रह्म है। क्रिया भी ब्रह्म

413
00:28:16,240 --> 00:28:20,240
है। और फल स्वरूप जो प्राप्त होने वाला है वो भी ब्रह्म है। अलग मैं उसमें बता

414
00:28:20,240 --> 00:28:24,320
रहा हूं। तो जब उस कांसेप्ट को हम लेते हैं सब कुछ ब्रह्म ही है। तो ब्रह्म ये जानता है

415
00:28:24,320 --> 00:28:28,880
कुछ हो ही नहीं रहा है। ये घंटा चुराना ये सब होना तो यह समझ रहा है। वास्तविकता

416
00:28:28,880 --> 00:28:32,960
तो क्या है? कुछ हो ही नहीं रहा है। तो ये ये बताना चाहूंगी क्योंकि

417
00:28:32,960 --> 00:28:36,960
वो क्यों मना नहीं कर मैं पूरा कर लूं। एक मिनट तक

418
00:28:36,960 --> 00:28:41,280
मैं पूरा कर लूं। तो क्या है कि इस पे आ जाते हैं घंटा चुराने पे कि भगवान

419
00:28:41,280 --> 00:28:42,240
को घंटा चुराना

420
00:28:42,240 --> 00:28:46,480
बुरा लग रहा है। भगवान को क्षति पहुंचा इसका मतलब भगवान भी दुखी

421
00:28:46,480 --> 00:28:50,560
हो सकता है। यदि उसको कोई चीज बुरी लग रही है तो इसका मतलब वो भी दुखी हो

422
00:28:50,560 --> 00:28:54,560
सकता है। तो फिर वो परम मुक्त नहीं कहलाएगा। परम मुक्त नहीं कहलाएगा तो हमें

423
00:28:54,560 --> 00:28:58,640
कहां से मुक्ति देगा? तो हमें मानना पड़ेगा वो परम मुक्त है। उसको कोई चीज प्रभावित नहीं

424
00:28:58,640 --> 00:29:02,720
करती। घंटा चुराना चूहों का कूदना उसको प्रभावित नहीं करता। तो चूहे कूद के

425
00:29:02,720 --> 00:29:06,720
कूदा के ले जा रहे तो अपना आनंद ले रहा है उससे। उसने सत्य

426
00:29:06,720 --> 00:29:10,880
और असत्य का बोध बहुत पहले दे दिया। ऋषि मुनियों के माध्यम

427
00:29:10,880 --> 00:29:14,880
से भी। बात ब्रह्मा कुमारी इसकी नहीं है कि आज ब्रह्मा कुमारी कह रही है।

428
00:29:14,880 --> 00:29:19,040
सबको पता है अच्छे और बुरे का ज्ञान है। क्या चोर को नहीं पता? पता है

429
00:29:19,040 --> 00:29:23,200
सब कुछ पता है अच्छे बुरे का लेकिन वह पिता है क्योंकि

430
00:29:23,200 --> 00:29:27,440
जिसने मंदिर बनवाया क्या पता उसमें जिसने पैसा उसने भी चोरी

431
00:29:27,440 --> 00:29:31,520
का हो रिश्वत का हो जब एक चोर बनवा सकता है साहूकार जो भी

432
00:29:31,520 --> 00:29:35,600
हो उससे कोई लेना देना लेकिन बात ये है उसको एक बात हंसी मैं एक

433
00:29:35,600 --> 00:29:39,760
हंसी में कहूंगी कि पिता परमात्मा है और उसे इस बात का जिसके

434
00:29:39,760 --> 00:29:44,240
पास जो कमी हो बेटा ले जाओ तुम मैंने इसका मतलब

435
00:29:44,240 --> 00:29:48,480
है वो मना नहीं क्योंकि बच्चा है तुम ले जाओ बाकी ताकि उसका

436
00:29:48,480 --> 00:29:52,640
परिणाम लोगे तो परिणाम नहीं मिलना

437
00:29:52,640 --> 00:29:56,800
नहीं मिलना है। वो इसलिए परे है इसलिए दूर रहता है

438
00:29:56,800 --> 00:29:57,600
क्योंकि उसने

439
00:29:57,600 --> 00:30:01,600
सब चीज का बोध दिया है। आप जो करेंगे उसका परिणाम उस

440
00:30:01,600 --> 00:30:05,600
तक नहीं जाने वाला है। इसका इसका मतलब ये है

441
00:30:05,600 --> 00:30:09,600
कि सब कुछ का आधार तो ईश्वर ही है।

442
00:30:09,600 --> 00:30:13,600
चाहे वो अच्छा दिख रहा है, बुरा दिख रहा है, आधार उसका ईश्वर ही होगा। यह हमें

443
00:30:13,600 --> 00:30:18,000
मानना पड़ेगा। हां ये बात अलग है कि जैसे एक बच्चा होता है ना उसको जब डॉक्टर इंजेक्शन

444
00:30:18,000 --> 00:30:22,240
लगाता है तो बच्चे के अकॉर्डिंग वो बुरी चीज है इंजेक्शन लगना।

445
00:30:22,240 --> 00:30:26,720
मगर डॉक्टर जानता है कि मैं इसके भले के लिए वो लगा रहा हूं। तो हमारी जानकारी

446
00:30:26,720 --> 00:30:30,880
यानी हमारा जो पर्सपेक्टिव है उसमें ऐसा हो सकता है कि भगवान बुराई करता हुआ

447
00:30:30,880 --> 00:30:34,880
दिखे। यानी कि फिर वही बात आ गई कि दुनिया में अगर जैसे कोई नवजात शिशु

448
00:30:34,880 --> 00:30:38,880
हुआ और सुनामी आ गई। भगवान के कहर से वो नहीं जी

449
00:30:38,880 --> 00:30:43,200
पाया। तो हमें यह मान हमारी दृष्टि में वही बहुत बुरा हुआ। एक नवजात

450
00:30:43,200 --> 00:30:47,280
शिशु खत्म हो गया। मगर जब ईश्वर की दृष्टि से मानेंगे तो उसने उसको एक और बेहतर जन्म

451
00:30:47,280 --> 00:30:51,280
दे दिया। उसके जरा से पाप बचे होंगे। उसको देवत्व प्राप्त करना होगा। तो उसने उसको

452
00:30:51,280 --> 00:30:55,360
तुरंत ही उसके इस जीवन में जो उसको कष्ट भोगने थे उससे बचा लिया।

453
00:30:55,360 --> 00:30:59,600
ईश्वर के नजरिए से। जैसे हम आप मंदिर जाते तो दो चीजें पहले भी देखती

454
00:30:59,600 --> 00:31:03,600
थी। मैं कई मंदिरों में गई हूं। तो चमड़ी और चमड़ी की कोई

455
00:31:03,600 --> 00:31:07,680
चीज अलाउ नहीं होता। हम हम चीजें जिन नेत्रों द्वारा जो

456
00:31:07,680 --> 00:31:11,680
कुछ देखते हैं उसी बारे में सोचते हैं। संभवत सुनते तो सोचते,

457
00:31:11,680 --> 00:31:12,880
पढ़ लिया तो सोचते।

458
00:31:12,880 --> 00:31:16,880
बस इस इतने तक हमारी सीमित है। जैसे आपने कई फिल्में देखी होगी लाइफ में।

459
00:31:16,880 --> 00:31:20,880
हमने भी देखी उस पुरानी दुनिया में तो एक जगह मैंने

460
00:31:20,880 --> 00:31:24,960
देखा कई बार देखते जैसे हम आप जब कभी टीवी नहीं हुआ करती तो किसी घर

461
00:31:24,960 --> 00:31:29,120
जाते थे और अपने घर में कोई आराम से अपना सीरियल देख रहा

462
00:31:29,120 --> 00:31:33,280
है और उसका एंड हो सीरियल का। तो हम चिल्लाते फिर भाई आप

463
00:31:33,280 --> 00:31:37,360
मेरे से थोड़ी बात कर लो मेरे को जरूरत तो बोल आप चुप हो बोले इसमें क्या

464
00:31:37,360 --> 00:31:41,520
है क्यों हो रहा है क्या हो रहा है कहता आप चुप रहिए चुप रहिए चुप रहिए आपको

465
00:31:41,520 --> 00:31:45,520
कुछ नहीं पता मैं आपको बाद में बताऊंगा और वो कितने मजे

466
00:31:45,520 --> 00:31:50,240
से मजा लेता ताली बजाता हंसता है या रोता जो भी उस समय

467
00:31:50,240 --> 00:31:54,960
उसको लग रहा हो तो उसके अनुसार वो प्रेडिक्शन करता है देख के

468
00:31:54,960 --> 00:31:59,040
लेकिन हम बेकार में ये सोचा करते पता नहीं इसमें क्या मजा ले रहा है उसको

469
00:31:59,040 --> 00:32:03,040
मार रहा है वो रो रहा है ऐसा हो रहा जब पूरी मूवी खत्म हो जाती

470
00:32:03,040 --> 00:32:07,200
है। बस यही का्सप्ट जब पूरी मूवी खत्म एक सेकंड सेकंड

471
00:32:07,200 --> 00:32:11,200
तब हम बताता आपको नहीं पता ये मेरा बहुत समय सीरियल चल रहा था। मैं

472
00:32:11,200 --> 00:32:15,440
देख रहा था इसको आज इसका एंड होना था। आज मजा आज हीरो उसको

473
00:32:15,440 --> 00:32:19,600
मारना था क्योंकि इसने उसकी बहन को चुराया था। मां को तंग किया था। इसलिए उसको

474
00:32:19,600 --> 00:32:23,680
मारना था। जिसने पूरी फिल्म देखी थी। जिसने पूरी फिल्म देखी थी। चिल्लाए क्यों?

475
00:32:23,680 --> 00:32:27,840
क्योंकि जिसने पूरा देखा उसे ही ज्ञान होगा। जिसने अधूरा

476
00:32:27,840 --> 00:32:28,340
देखा

477
00:32:28,240 --> 00:32:32,240
अधल गगरी छलक जाएगी। व्यवधान पैदा करेगा। ठीक

478
00:32:32,240 --> 00:32:36,240
ऐसे हम आप दो नेत्रों से वही देख सकते हैं। वही सुन सकते

479
00:32:36,240 --> 00:32:40,400
हैं जितनी हमारी एक कैपेसिटी है। उसे हम कहे दिल्ली देख ले। हम

480
00:32:40,400 --> 00:32:44,560
देख नहीं सकते। हम सोच सकते दिल्ली के बारे में। ठीक परमात्मा हमारी

481
00:32:44,560 --> 00:32:48,560
सारी फिल्मों को देखता है। हमारे सारे जीवन के कालचक्र को उसने जाना

482
00:32:48,560 --> 00:32:52,880
है। इसलिए वो साइलेंट है। इसलिए चुप है। उसके बावजूद

483
00:32:52,880 --> 00:32:57,120
भी फिर भी ज्ञान देता है कि बच्चे सुधार हो जाए। परिवर्तन हो जाए।

484
00:32:57,120 --> 00:33:01,280
नहीं करते हैं तो उससे फिर कोई लेना देना नहीं। उसका हिसाब

485
00:33:01,280 --> 00:33:05,280
किताब परिणाम का हमें ही मिलना है। अच्छा तो तो इसका मतलब ये तो

486
00:33:05,280 --> 00:33:09,440
क्लियर हुआ ना कि जो हमें दिखते तो चिल्लाना है। नहीं नहीं जैसे जो हमें

487
00:33:09,440 --> 00:33:13,680
बुराई दिख रही है जी हमें जो बुराई दिख रही है वो असल में

488
00:33:13,680 --> 00:33:17,920
उसका भी अधिष्ठान भगवान है। वो बात अलग है। वो बुराई है ही नहीं। वो वो सब जानता

489
00:33:17,920 --> 00:33:21,920
है किसके साथ अगर मैं मान लीजिए फॉर एग्जांपल जैसे मैंने अभी आपको ये जो

490
00:33:21,920 --> 00:33:26,000
आपने फिल्म का उदाहरण दिया ना ये बिल्कुल परफेक्ट है इसके लिए। जैसे मैंने आपको मारा और

491
00:33:26,000 --> 00:33:30,240
हमें मार दिया आपको। ठीक है? आप हमें नहीं मार पाए किसी कारणवश

492
00:33:30,240 --> 00:33:34,240
अगला जन्म लिया। मैं बन गई साधु आप नॉर्मल इंसान रहे।

493
00:33:34,240 --> 00:33:38,320
अब मैं भगवान के मंदिर में गई भगवान मैं 20 सालों से सन्यासी बन गया हूं।

494
00:33:38,320 --> 00:33:42,560
मेरे सारे पाप नष्ट कर देना। मेरा कोई दुश्मन ना हो। मुझे कुछ ना हो।

495
00:33:42,560 --> 00:33:43,280
हम कह रहे

496
00:33:43,280 --> 00:33:47,280
ना हम वर्तमान जीवन को देख रहे हैं। और आप भी कहते हे

497
00:33:47,280 --> 00:33:51,600
मालिक जिसने मुझे कष्ट दिया हो। बड़ी पीड़ा दी हो किसी तरीके से

498
00:33:51,600 --> 00:33:55,680
मेरे परिवार को या मुझे जो कुछ कह रहे हो आप भी तो भगवान सामने कह रहे हो

499
00:33:55,680 --> 00:33:59,840
और हम बन गए सन्यासी अब हम चाहते हैं सन्यासी बन गए तो पूरा दोष मुक्त

500
00:33:59,840 --> 00:34:03,840
हो जाए लेकिन आप भी भगवान के हम भी भगवान के तो उसने

501
00:34:03,840 --> 00:34:08,080
ज्ञान तो मुझे दे दिया साधु तो मुझे बना दिया लेकिन आपके

502
00:34:08,080 --> 00:34:12,080
साथ कभी नाइंसाफी नहीं कर सकता कई बार साधु संत

503
00:34:12,080 --> 00:34:16,240
होने बावजूद गिरे क्यों लोग जेल में क्यों लोग गए क्यों उनके साथ कई

504
00:34:16,240 --> 00:34:20,240
घटनाएं कभी रेल से कट गए या गैस सिलेंडर फट गया या जल गए या मर्डर हो

505
00:34:20,240 --> 00:34:24,240
गया। कई साधु संतों का भी मर्डर हो गया। वर्तमान आप

506
00:34:24,240 --> 00:34:28,400
थर्ड ने देखा कि ये तो साधु था 40 साल से। इसका मर्डर

507
00:34:28,400 --> 00:34:32,480
क्यों हो गया? उसका मर्डर इसलिए नहीं हुआ कि वो साधु है। वो वर्तमान

508
00:34:32,480 --> 00:34:36,480
उसने कुछ और ऐसा किया जिसकी वजह से हुआ है। वो भी भगवान का बच्चा।

509
00:34:36,480 --> 00:34:40,560
आप भी भगवान के बच्चे। आपका इंसाफ वो कहते हैं ना जब मरा तो उसने कहा ऊपर

510
00:34:40,560 --> 00:34:44,880
वाला देखेगा। तो उसने कहा तुम साधु बन गए तो वर्तमान के हो। लेकिन जो पिछला

511
00:34:44,880 --> 00:34:49,040
हिसाब है जो मेरे बच्चे के साथ इसके साथ किया था उसका तो तुम्हें साधु

512
00:34:49,040 --> 00:34:53,280
बन करके भी चुकाना पड़ेगा ही और आपने कहानी सुनी

513
00:34:53,280 --> 00:34:57,360
थी ना मैं इससे संक्षिप्त कहूंगी कि उसने कहा था एक साधु जेल में चला गया

514
00:34:57,360 --> 00:34:58,320
बोला जब आप

515
00:34:58,320 --> 00:35:02,400
जज ने उससे दोष मुक्त वरी कर दिया तो उसने कहा कि किसी ने

516
00:35:02,400 --> 00:35:06,640
पूछा आप कुछ भी नहीं किए तो फिर आपको ये तीन साल या एक साल जेल में क्यों

517
00:35:06,640 --> 00:35:10,960
रहना पड़ा बोला इस जन्म का थोड़ी ना पिछले जन्म का वो तो

518
00:35:10,960 --> 00:35:15,120
तो बस यही है हम नेत्रों से तो कहने का मतलब मतलब सिद्धांत यही प्राप्त हुआ

519
00:35:15,120 --> 00:35:19,120
कि दुनिया में जो भी कुछ हो रहा है उसका दृष्टांत भगवान ही है। वो बात अलग है कि

520
00:35:19,120 --> 00:35:23,360
हमें जो बुरा दिख रहा है वो बुरा है ही नहीं। उसके पीछे भी कोई अच्छाई है। कारण

521
00:35:23,360 --> 00:35:27,440
है ना? हिसाब की तरह। हां मतलब जैसे मान लीजिए कहीं अगर चोरी भी हुई

522
00:35:27,440 --> 00:35:31,680
है तो हमारे लिए वो चोरी बुरी चीज है तो हम तो वो हमारे लिए बुराई

523
00:35:31,680 --> 00:35:35,760
है मगर ईश्वर के मतलब ईश्वर का वहां पे भी ईश्वर की

524
00:35:35,760 --> 00:35:39,840
सत्ता है चोरी होने में भी उसकी स्वीकृति है स्वीकृति नहीं है हमारे कर्मों

525
00:35:39,840 --> 00:35:44,000
का रोल है नहीं जैसे अभी आप जैसे अभी आपने कहा ना कि उसको सजा दे दी ईश्वर ने

526
00:35:44,000 --> 00:35:48,320
दूसरे को कर्मों का फल हिसाब उसके पास रहता सजा प्रकृति

527
00:35:48,320 --> 00:35:52,400
देती प्रकृति के द्वारा ईश्वर कर्मों का फल नहीं देता है नहीं बिल्कुल नहीं

528
00:35:52,400 --> 00:35:56,480
देता हम जो कर रहे हैं ना उसका अपने आप समय आने पर अपने आप

529
00:35:56,480 --> 00:36:00,480
आपको मिलना है। सेट है कई चीजें होती है। यह जो जो भी हम कर रहे हैं

530
00:36:00,480 --> 00:36:04,720
यह ईश्वर की सत्ता के अंदर है या नहीं है? सत्ता के अंदर है लेकिन वो साइलेंट

531
00:36:04,720 --> 00:36:08,880
साक्षी भाव साक्षी हो सकता है। नहीं वो कंट्रोल कर सकता है कि नहीं?

532
00:36:08,880 --> 00:36:13,200
कंट्रोल तब कर सकता है जब आप उसके अनुसार हो। अर्जुन से श्री कृष्ण ने कहा

533
00:36:13,200 --> 00:36:13,700
क्या

534
00:36:13,600 --> 00:36:17,600
मैं जानता हूं किसने मतलब जैसे जो ईश्वर को नहीं मानता है उसको ईश्वर कंट्रोल नहीं

535
00:36:17,600 --> 00:36:21,600
कर सकता? नहीं मैं बताती हूं। जैसे जुआ किसने खेला? क्या श्री कृष्ण से पूछ

536
00:36:21,600 --> 00:36:26,800
के जुआ खेला गया? नहीं खेला गया और जब वो मांगने गए

537
00:36:26,800 --> 00:36:30,960
तो मांगने गए सुनिए तो तो बताया कि मैं क्यों नहीं युद्ध में एक

538
00:36:30,960 --> 00:36:35,120
सवाल आप युद्ध में क्यों नहीं लड़ेंगे क्यों नहीं उठाऊंगा है ना

539
00:36:35,120 --> 00:36:39,280
क्यों क्योंकि वो पांडवों को भी जानता है उसने जब उसके उसके अनुसार

540
00:36:39,280 --> 00:36:43,360
जब आप नहीं चले जब आपने जुआ खेला तब तो उससे पूछकर नहीं खेला तो युद्ध

541
00:36:43,360 --> 00:36:47,360
में आपका साथ क्यों दें तो वो साक्षी हो के वो खड़ा रहा सारथी

542
00:36:47,360 --> 00:36:51,520
होकर बनकर रथ को चलाता रहा और चुपचाप देखता रहा

543
00:36:51,520 --> 00:36:55,760
ज्ञान भी देता रहा। उसने सद विवेक का भी ज्ञान दिया। लेकिन उसके बावजूद

544
00:36:55,760 --> 00:36:59,840
अगर कोई परिवर्तन होता तो ठीक और नहीं हुआ। दुर्योधन को भी

545
00:36:59,840 --> 00:37:03,840
समझाया। सब कुछ किया। जब सब कुछ होने के बाद व्यक्ति नहीं सुधरता

546
00:37:03,840 --> 00:37:07,920
है तो वो उसका मालिक नहीं होता है। जब हम भी आपको भी समझाएं।

547
00:37:07,920 --> 00:37:11,920
आप हमें समझा दे। नहीं समझेंगा तो उसका कोई दोष नहीं है। उसका

548
00:37:11,920 --> 00:37:16,240
कोई रोल नहीं है। बताना उसका कर्तव्य है। बड़े होने पर कई बच्चे भी मां-बाप

549
00:37:16,240 --> 00:37:20,320
से कहते आप चुप रहिए। हम कोई छोटे थोड़ी ना हमें जो करना है हम

550
00:37:20,320 --> 00:37:24,400
करेंगे और पीछे जो कुछ होगा उसे देख लिया जाएगा। हम आप बोलते ऐसे

551
00:37:24,400 --> 00:37:28,400
ईश्वर से बोलते कई तो हम लोगों से जवाब देते हैं। बहन जी आप मुझे मत समझाइए

552
00:37:28,400 --> 00:37:28,900
जो

553
00:37:28,640 --> 00:37:32,800
कुछ होगा हम देख लेंगे। मैं ईश्वर को नहीं मानता हूं। मैं ही उसका मालिक हूं और आप

554
00:37:32,800 --> 00:37:36,880
मुझे इसका कोई भय ना करें। धर्म के लोग ऐसे हैं। कोई भय की सवाल

555
00:37:36,880 --> 00:37:40,960
नहीं। बस सुधरात्मक दृष्टिकोण से कहा जाता है। नहीं यहां पे ना दो बातें हो

556
00:37:40,960 --> 00:37:44,960
गई। एक बात तो यह हो गई कि जो परमात्मा है वही सबका

557
00:37:44,960 --> 00:37:49,040
अधिष्ठान है। अच्छाई बुराई सबका अधिष्ठान मतलब उसकी सत्ता में ही

558
00:37:49,040 --> 00:37:53,200
है। उसके कंट्रोल में ही है। वो बात अलग है कि उसके पर्सपेक्टिव से वो बुराई बुराई

559
00:37:53,200 --> 00:37:57,280
है ही नहीं जो हमें बुराई दिख रही है। मगर जो हमें बुराई दिख

560
00:37:57,280 --> 00:38:01,520
रही है हमें ये मानना पड़ेगा। वो भी ईश्वर की सत्ता में ही है। वो फिर आप

561
00:38:01,520 --> 00:38:05,600
ये ये एक तो ये कांसेप्ट हो गया। फिर आपने दूसरी बात ये कही है कि

562
00:38:05,600 --> 00:38:09,600
नहीं ईश्वर कुछ नहीं करता है। आपको आपके कर्मों का फल मिलता

563
00:38:09,600 --> 00:38:13,840
है। स्वतः जो प्रकृति देती रहती है आपको। ईश्वर उसमें केवल दृष्टा

564
00:38:13,840 --> 00:38:18,000
भाव है। ईश्वर की सत्ता नहीं है। तो इसमें से कौन सा लेना है? ईश्वर की सत्ता है

565
00:38:18,000 --> 00:38:22,080
कि नहीं है? नहीं उसने जब आपको ज्ञान ईश्वर की सत्ता का मतलब मैं बता

566
00:38:22,080 --> 00:38:26,160
दूं पूरे संसार का मालिक वही मैं एक मिनट ईश्वर की सत्ता का मतलब यह

567
00:38:26,160 --> 00:38:30,480
बता दूं जैसे हम कहते हैं कि सर्वशक्तिमान यानी कि समस्त कार्यों

568
00:38:30,480 --> 00:38:34,800
को करने की शक्ति उसमें क्षमता रख क्षमता है तो दुनिया

569
00:38:34,800 --> 00:38:38,880
में जो भी कुछ घटित हो रहा है वो उसका जो मूल

570
00:38:38,880 --> 00:38:43,040
है वो ईश्वर ही है। अगर ये हम मानेंगे कि सब कुछ का ईश्वर मूल

571
00:38:43,040 --> 00:38:43,920
है तो ही

572
00:38:43,920 --> 00:38:48,000
ईश्वर की सिद्धि वाला जो दो कांसेप्ट मैंने आपको बताए थे ना कि ऐसे ईश्वर को हम

573
00:38:48,000 --> 00:38:52,240
सिद्ध कर सकते हैं। उस कार्य का वो मूल नहीं है। वो मूल है हम मनुष्यों

574
00:38:52,240 --> 00:38:56,480
की जो पिता है वो जड़ है। वो मैं मैं बता रहा हूं कैसे

575
00:38:56,480 --> 00:39:00,560
कैसे मूल नहीं है। जैसे कि मेरे पास मेरे सामने एक

576
00:39:00,560 --> 00:39:04,560
व्यक्ति चोरी कर रहा है और मैं वहां खड़ा हूं।

577
00:39:04,560 --> 00:39:09,520
जी और मेरे पास ताकत है कि उसको मैं रोक सकूं।

578
00:39:09,520 --> 00:39:13,520
ठीक है और मैं नहीं रोक रहा हूं। मैं नहीं रोक रहा हूं।

579
00:39:13,520 --> 00:39:17,520
जैसे कि भीष्म पितामह चाहते तो द्रोपदी का चरण रुक जाता।

580
00:39:17,520 --> 00:39:21,680
परंतु भीष्म पितामह ने अपनी जो प्रतिज्ञा है उसको वरीयता दी कि मैं तो राजगद्दी

581
00:39:21,680 --> 00:39:26,080
के साथ खड़ा रहूंगा। मैं विरुद्ध नहीं जाऊंगा। तो सबसे पहले विवेकी

582
00:39:26,080 --> 00:39:30,240
का दायित्व ज्यादा होता है तो उनको ही सजा दी भगवान ने। क्योंकि तुम तो जानते थे अधर्म

583
00:39:30,240 --> 00:39:34,240
और अधर्म क्या है? हां रोक तो सकते। बात कह तो सकते थे। हां तुम वहां पे ऑब्जेक्शन

584
00:39:34,240 --> 00:39:38,320
कर सकते थे। तो तुम मौन मौन स्वीकृति थी तुम्हारी। तो भगवान की सत्ता अगर

585
00:39:38,320 --> 00:39:42,320
हम सब जगह मान रहे हैं। अब मैं और एक मिनट भगवान की सत्ता हम सब जगह

586
00:39:42,320 --> 00:39:46,320
जब मान रहे हैं और फिर वहां पर ये हो रहा है कि भाई कुछ हो रहा है तो हमें ये

587
00:39:46,320 --> 00:39:50,400
मानना पड़ेगा कि भगवान की सत्ता तो है वो बुराई हमें दिख

588
00:39:50,400 --> 00:39:54,480
रही है। भगवान के अनुसार वो बुराई नहीं है। इसलिए भगवान का मन है। वो उसका हिसाब किताब है कि

589
00:39:54,480 --> 00:39:58,640
कहां पे वो बोले, कहां पे ना बोले वो उसका हिसाब किताब है। वो हिसाब किताब हम नहीं जानते

590
00:39:58,640 --> 00:39:59,140
हैं।

591
00:39:59,040 --> 00:40:03,280
उसके हिसाब किताब में उसने तो इसलिए हम भगवान को दोष नहीं दे सकते। तो एक बड़ा है

592
00:40:03,280 --> 00:40:07,360
और बड़े के नाते उसने एक संस्कार का और इस संसार में कईयों का निर्माण

593
00:40:07,360 --> 00:40:11,680
किया जज का पुलिस का कोर्ट कचहरी जो भी डीएम

594
00:40:11,680 --> 00:40:15,920
एसडीएम जो भी हो उनका भी तो इस संसार को जिस प्रकार से संसार चलता

595
00:40:15,920 --> 00:40:19,920
है उस प्रकार के उसने उच्च अधिकारी भी दिए। इस संसार को कंट्रोल करने के

596
00:40:19,920 --> 00:40:24,000
लिए उसने अपने बच्चों को बिठाया है ताकि आराम से ये सुचारू रूप से

597
00:40:24,000 --> 00:40:28,160
सही कह रहे हैं मगर जब बेस में जाएंगे मूल में तो मूल में तो हमें

598
00:40:28,160 --> 00:40:32,160
मानना पड़ेगा कि सबका आधार वही है इसलिए क्यों जब आप जैसे आप

599
00:40:32,160 --> 00:40:36,400
दो भाई लड़ जाए और आपके पिता समझाएं खूब समझाए बचपन से समझाते

600
00:40:36,400 --> 00:40:40,720
हैं लेकिन आप तो वो सर्वशक्तिमान नहीं है ना पिता नहीं लेकिन

601
00:40:40,720 --> 00:40:45,120
एक समय ऐसा आएगा लड़का बड़ा हो जाएगा अपने पिता को धक्का दे देगा सर्वशक्तिमान

602
00:40:45,120 --> 00:40:49,280
होने का अर्थ नहीं है कि वो छोटी-छोटी बातों में में आकर छोटी-छोटी चीजों

603
00:40:49,280 --> 00:40:53,360
में आके वो आए और आपको कहे आकर आपको समझाए आपको क्यों

604
00:40:53,360 --> 00:40:57,680
क्योंकि इसलिए नहीं बोला मैंने अभी आपको कि

605
00:40:57,680 --> 00:41:01,920
भाई वो सबकी रील को जानता है वो जो गाली हमें कोई प्यार

606
00:41:01,920 --> 00:41:06,240
कर रहा है वो दोनों को जान रहा है कि इसका पास्ट और कितने जन्म का क्या हिसाब

607
00:41:06,240 --> 00:41:10,240
है इसलिए बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल इसका मतलब जैसे छोटी-छोटी बातों में

608
00:41:10,240 --> 00:41:14,240
पिताजी नहीं बोलते हैं इसका मतलब है कि वहां पे उनकी वो होने देना

609
00:41:14,240 --> 00:41:18,240
चाह रहे हैं क्योंकि वो जानते हैं इसका क्या हिसाब किताब है वो वो रोक सकते हैं

610
00:41:18,240 --> 00:41:22,480
मगर वहां वो छोटी-छोटी बातें हैं क्योंकि उनको व्यर्थ लग रही है। रोक दे वो

611
00:41:22,480 --> 00:41:26,640
तो फिर आपके साथ अन्याय नहीं हो रहा। मैं रोकने की बात नहीं कह रहा हूं

612
00:41:26,640 --> 00:41:30,720
कि वो रोक दें मगर उनकी सत्ता में हो रहा है ये तो मानना पड़ेगा।

613
00:41:30,720 --> 00:41:34,880
उनकी साक्षी हो करके देख नहीं उनकी उनकी सत्ता उनकी स्वीकृति में हो रहा है।

614
00:41:34,880 --> 00:41:38,880
स्वीकृति नहीं। स्वीकृति हमेशा आपने कहा मैं छोटी-छोटी बातों में नहीं बोलूंगा तो इस

615
00:41:38,880 --> 00:41:43,200
मौन स्वीकृति तो हो गई। स्वीकृति इसलिए नहीं कहेगी कि समझाने के बाद नहीं

616
00:41:43,200 --> 00:41:47,280
सुलझा मामला तो वहां पर फिर अपने आप इंटरफेयर नहीं करता

617
00:41:47,280 --> 00:41:51,280
क्योंकि वो फिर पास्ट को देखता है इसलिए देखता कि हिसाब किताब जो

618
00:41:51,280 --> 00:41:55,440
कुछ चुकता तो मैं कह तो रहा मैं इस बात को मान रहा हूं आपकी कि वो मैं

619
00:41:55,440 --> 00:41:59,680
इस मैं आपकी ये बात मान रहा हूं कि उसकी मौन स्वीकृति

620
00:41:59,680 --> 00:42:03,760
इसलिए होती है क्योंकि उसने पूरी पिक्चर देखी है। हां इसलिए यहां पर और

621
00:42:03,760 --> 00:42:08,080
हम लोग ऐसा इसलिए कहते हैं कि सबका अधिष्ठान वही है तो बुराई

622
00:42:08,080 --> 00:42:12,080
बुराई दुनिया में एकिस्ट ही कहां करती है वास्तविकता तो यह है क्योंकि

623
00:42:12,080 --> 00:42:16,080
जो जिसने जैसा किया उस जैसे जैसे वो वाली बात

624
00:42:16,080 --> 00:42:20,080
है नैनम चिंताती अब कोई मर रहा है वो दुखी हो रहा है अब वो भगवान को दोष

625
00:42:20,080 --> 00:42:24,080
दे इसका भी कारक जो है भगवान ही है अब भाई तू मर ही नहीं रहा है तू तो आत्मा है

626
00:42:24,080 --> 00:42:28,320
तू मर ही नहीं सकता तू क्यों सोच रहा है कि तू मर रहा है तो कहने का मतलब ईश्वर जानता

627
00:42:28,320 --> 00:42:29,280
है कि तुम आत्मा हो

628
00:42:29,280 --> 00:42:33,360
तुम नहीं जानते हो कि तुमने अभी अब अगर थ्योरिकली पढ़ भी लिया है तो हमने अभी

629
00:42:33,360 --> 00:42:37,440
महसूस नहीं किया है कि हम अमर हैं। है ना? तो ईश्वर

630
00:42:37,440 --> 00:42:41,440
जानता है कि तुम अमर हो। तो इसलिए ईश्वर वहां नहीं बचा रहा तुमको। अब तुम दोष

631
00:42:41,440 --> 00:42:45,840
दे दोष दे रहे हो। देखो ईश्वर तो हमारे पर्सपेक्टिव से जो बुराई हो रही है

632
00:42:45,840 --> 00:42:50,000
वास्तव में बुराई हो ही नहीं रही कहीं। कहीं कुछ है ही नहीं। मगर हमारे पर्सपेक्टिव

633
00:42:50,000 --> 00:42:54,000
में यदि कोई लिखा ना जो कुछ हो रहा है सब अच्छा है।

634
00:42:54,000 --> 00:42:58,000
सब कुछ सबका अधिष्ठान। क्योंकि जो जिसको ये ज्ञान

635
00:42:58,000 --> 00:43:02,000
हो गया आत्मा का दृष्टि से वो समझा तो सकता है।

636
00:43:02,000 --> 00:43:06,000
अब इसमें इसमें एक चीज और है। जैसे उन्होंने कहा सातवें अध्याय में कि समस्त भूतों का सनातन

637
00:43:06,000 --> 00:43:10,000
बीज मैं हूं। ठीक है? अब हमने कहा कि सब कुछ उत्पन्न उसी से हुआ है।

638
00:43:10,000 --> 00:43:14,000
पर फिर उसके बाद लोगों ने अपने-अपने मन के अनुसार काम कर लिया। तो इसमें फिर

639
00:43:14,000 --> 00:43:18,080
ये मानना पड़ेगा क्या भगवान को मालूम नहीं था कि मैं किसको बना रहा हूं। चोर को बना रहा हूं। डकैत को बना रहा हूं

640
00:43:18,080 --> 00:43:22,080
कि लुटेरे को बना रहा हूं। तो वहां पे मानना पड़ेगा ईश्वर ने अपनी सत्ता, ईश्वर की

641
00:43:22,080 --> 00:43:26,240
स्वीकृति के साथ ही है जो भी है। हां। मगर यह है कि भाई वो

642
00:43:26,240 --> 00:43:30,240
क्या कहां पे मौन है, कहां पे एक्टिव है, कहां रोक रहा है। यह हम इसलिए नहीं कह सकते

643
00:43:30,240 --> 00:43:34,320
क्योंकि उसने पूरी पिक्चर देखी और हमें इतनी दिखाई दे रही है। और रही भैया यानी कि

644
00:43:34,320 --> 00:43:38,480
वही वाली बात कि समस्त कर्मों को करते हुए भी तू मुझे अकर्ता जान। और

645
00:43:38,480 --> 00:43:42,560
रही उसकी चोरच के जब हमारे मां-बाप हमें जन्म देते तब ये थोड़ी ना सोचते

646
00:43:42,560 --> 00:43:44,320
हमारा बच्चा चोर चक्का अच्छा बुरा

647
00:43:44,320 --> 00:43:48,560
निकल जाएगा। वो बच्चे की भावना से ही सदैव देखते हैं और निकल जाए

648
00:43:48,560 --> 00:43:52,720
तो उसके बीज पर निर्भर करता है। उसकी अपनी जैसे जैसे रहा होगा संस्कार

649
00:43:52,720 --> 00:43:56,800
उसके अनुसार वो चल रहा है। तो परमात्मा किसी को पैदा नहीं करता। वो

650
00:43:56,800 --> 00:44:00,960
सिर्फ बच्चा समझ के सृष्टि पे आता है। वही बच्चा समझ के ही देखता है उस बच्चे

651
00:44:00,960 --> 00:44:05,200
को बाकी उसका अपना भी केवल सारे काम करे तो फिर हमें जन्म क्यों दिया

652
00:44:05,200 --> 00:44:09,200
सृष्टि पे भेजा। सब कुछ उसे ही करना पड़ेगा। तो फिर होने का मतलब ऐसे पिता ही

653
00:44:09,200 --> 00:44:13,520
हमारा सारे काम करे तो कहते भैया तुम्हारे होने का फायदा क्या है? तो परमात्मा

654
00:44:13,520 --> 00:44:17,520
ने हमें अपने जैसी संरचना जानवर नहीं बनाया है। जानवर

655
00:44:17,520 --> 00:44:21,760
को भी समझ हमें आहार विहार और आचार दे दिया परमात्मा ने तो

656
00:44:21,760 --> 00:44:26,000
अपनी जैसी समक्ष रचना दो वो कांसेप्ट आ गए निकल के समक्ष रचना

657
00:44:26,000 --> 00:44:30,000
बनाई अपने जैसा हमें बनाया विवेक दिया समझ दिया सब कुछ फिर भी

658
00:44:30,000 --> 00:44:34,240
हम गलती करे तो उसे दोष देना ये मिथ्या है मेरे सामने जी बाकी

659
00:44:34,240 --> 00:44:38,320
कौन कैसे सोचता है वो दो कांसेप्ट आ गए निकल के एक कि हमारी मुक्ति कैसी

660
00:44:38,320 --> 00:44:42,560
है ब्रह्माकुमारीज की और दूसरा कि अह क्या कहते हैं

661
00:44:42,560 --> 00:44:47,040
ईश्वर ही अच्छाई बुराई सबका मूल है नहीं मूल नहीं मौन है वहां

662
00:44:47,040 --> 00:44:51,280
मूल तो मैं जड़ क्यों चलिए इसमें इसमें इसको ऐसे ही इसको

663
00:44:51,280 --> 00:44:55,440
जो है हमारे पिता ने हमें समझाया जब पिता हमारा समझा सकता है उसे दोष

664
00:44:55,440 --> 00:44:59,520
नहीं दे सकते तो हम इसमें आगे बढ़ जाते हैं इसको छोड़ के अब

665
00:44:59,520 --> 00:45:03,600
इसमें एक अगली चीज ये आती कि जैसे हमने कई जगह कहा कि

666
00:45:03,600 --> 00:45:08,080
वो ये नहीं है तो क्या ब्रह्मा कुमारीज के द्वारा

667
00:45:08,080 --> 00:45:12,320
जो ईश्वर जिसे माना जा रहा है वो सर्वशक्तिमान है

668
00:45:12,320 --> 00:45:17,120
देखो आपको मैं एक बात समझाना चाहती हूं जी इसे मक्का मदीना में संज्ञा

669
00:45:17,120 --> 00:45:21,280
नाम का काला पत्थर रखा क्या अपने हम उसको शिवलिंग बोलते हैं छोटा

670
00:45:21,280 --> 00:45:25,360
पत्थर रखा है शालिग्राम शिव जो भी वो मानते हैं पत्थर पत्थर है उसको

671
00:45:25,360 --> 00:45:29,440
निराकार को मानते हैं मानते हैं बराबर जी काशी विश्वनाथ

672
00:45:29,440 --> 00:45:33,920
में शिवलिंग है हम अपने सनातन ने मानते हैं

673
00:45:33,920 --> 00:45:38,240
अमरनाथ में बरफ की शिवलिंग बनती है मानते हैं उन्होंने

674
00:45:38,240 --> 00:45:42,800
भी मान्यता दी सन्यासियों ने सनातनियों ने पशुपतिनाथ नेपाल

675
00:45:42,800 --> 00:45:47,040
में भी शिवलिंग है मानते हैं 12 ज्योति ज्योतिर्लिंग है। हां नहीं

676
00:45:47,040 --> 00:45:51,520
राम को भी राम ने भी शिवलिंग को स्थापित किया पूजित किया माना

677
00:45:51,520 --> 00:45:55,600
बराबर गोपेश्वर नाथ का मंदिर मथुरा में है। नहीं नहीं मैं

678
00:45:55,600 --> 00:45:59,840
मैं ये कह रहा हूं ईश्वर सर्वशक्तिमान केवल ब्रह्मा कुमारी

679
00:45:59,840 --> 00:46:04,080
ना कहते कि वो जो मान रही जिस ईश्वर को वो मान रही है वही सत्य है। मैं उसके फॉर

680
00:46:04,080 --> 00:46:08,160
एग्जांपल दे रहा हूं। नहीं नहीं ईश्वर मेरा क्वेश्चन मेरा क्वेश्चन आप समझ नहीं

681
00:46:08,160 --> 00:46:12,240
पाए। एक्चुअली क्या है? ईश्वर तो सब लोग मानते हैं जी

682
00:46:12,240 --> 00:46:14,800
कि क्रिश्चियंस भी कहते हैं गॉड है।

683
00:46:14,800 --> 00:46:18,880
मुस्लिम भी कहते हैं गॉड है। मैं बता रही थी। जी मैं वही कह रहा हूं। मगर क्या है कि

684
00:46:18,880 --> 00:46:23,280
ईश्वर की जो थ्योरी देते हैं वो सबकी अलग-अलग हो जाती है।

685
00:46:23,280 --> 00:46:28,000
कहीं पे कुछ ईश्वर के बारे में जैसे मोक्ष की थ्योरी अभी आप मैंने रामपुर का हाथी

686
00:46:28,000 --> 00:46:32,080
था ना जिससे देखा उसका वर्णन विज्ञान वैसे ही तो फिर वो चेक करना

687
00:46:32,080 --> 00:46:36,080
पड़ेगा कि इसमें से अंधा कौन है और देखने वाला कौन है। यह चेक करना

688
00:46:36,080 --> 00:46:40,320
पड़ेगा। तो खैर वो तो एक अलग बात हो गई चेक करने वाली बात। मगर जैसे हम

689
00:46:40,320 --> 00:46:44,880
बात कर रहे हैं कि थ्योरी अलग-अलग है। अब क्या है कि

690
00:46:44,880 --> 00:46:48,960
अ ब्रह्मा कुमारीज ये मानता है कि जैसे आपने कहा कि हम मौन

691
00:46:48,960 --> 00:46:53,040
है यहां पर तो और ब्रह्मा कुमारीज मेरे ख्याल से ये भी नहीं मानता कि ईश्वर

692
00:46:53,040 --> 00:46:57,200
अवतार लेते हैं। ईश्वर पर काया प्रवेश करते हैं। ऐसा मैं जानता

693
00:46:57,200 --> 00:47:01,520
हूं। तो अवतार आपकी दृष्टि में अवतार क्या है? स्वयं ईश्वर ऐसे

694
00:47:01,520 --> 00:47:06,000
ऐसा रूप धारण कर ले जो आंखों का विषय बन जाए। यह अवतार है। अवतरित

695
00:47:06,000 --> 00:47:10,240
माने क्या होता है? अवतरित मतलब अपने अपने नीचे उतरता है। जो उतरता

696
00:47:10,240 --> 00:47:14,480
है उसे शंभू भी कहते हैं। खुदा भी कहते हैं।

697
00:47:14,480 --> 00:47:18,560
खुदा तो आप कहते हैं मैं नहीं कहता। नहीं देखिए शब्द

698
00:47:18,560 --> 00:47:22,720
जो होता है भैया वो किसी धर्म के लिए नहीं बना होता। मैं मैं उस

699
00:47:22,720 --> 00:47:27,280
हम लोग इस बात अभी बदल जाएगा टॉपिक। तो कहने का मतलब अवतरित

700
00:47:27,280 --> 00:47:30,160
मतलब जो ऊपर से नीचे की ओर आता

701
00:47:30,160 --> 00:47:34,320
है फिर वो परकाय प्रविष्ट देवताएं जन्म लेते

702
00:47:34,320 --> 00:47:38,480
हैं। वो भी आते हैं। लेकिन मनुष्यों जैसा उनका वैसा जन्म कष्टदायक

703
00:47:38,480 --> 00:47:42,560
जन्म नहीं जैसे हम जैसे एक मान्यता है कि भगवान के भगवान

704
00:47:42,560 --> 00:47:46,560
जो हैं वो राम कृष्ण इत्यादि रूपों में अवतरित होते हैं। बिल्कुल मनुष्यों

705
00:47:46,560 --> 00:47:50,640
जैसे ही हमारे बीच में आकर के रहते हैं। और ब्रह्मा कुमारी इसकी मान्यता है कि वो

706
00:47:50,640 --> 00:47:54,960
अवतार नहीं लेते। स्वयं मतलब मनुष्यों जैसा रूप नहीं धारण करते। शरीर

707
00:47:54,960 --> 00:47:59,120
वो किसी और के शरीर में प्रवेश करके बात इत्यादि कर सकते हैं। यह बात

708
00:47:59,120 --> 00:48:03,200
है। तो यहां पे फिर वो जो वाली मान्यता आपने कहा था ना

709
00:48:03,200 --> 00:48:07,360
कि सब जगह भगवान ही है। फिर ब्रह्मा आपने कहा

710
00:48:07,360 --> 00:48:11,680
नहीं आपने ये कहा कि क्या कहते हैं

711
00:48:11,680 --> 00:48:15,680
ये जो बात आई थी ना कि केवल ब्रह्मा कुमारी का ईश्वर नहीं है वो। हां मैं बता रहा हूं। है

712
00:48:15,680 --> 00:48:19,920
ना? तो ईश्वर तो सबका एक ही है। मगर ईश्वर को लेकर के सबने अपनी-अपनी

713
00:48:19,920 --> 00:48:24,080
मान्यताएं अलग कर रखी हैं। भी बताने जा रहा हूं। हां। तो अब

714
00:48:24,080 --> 00:48:28,080
यदि हम यह कहते हैं कि क्या ब्रह्मा कुमारी के द्वारा

715
00:48:28,080 --> 00:48:32,480
जो माना जाने वाला ईश्वर है कि यह ईश्वर है ब्रह्मा कुमारी इसकी वहां पर डेफिनेशन

716
00:48:32,480 --> 00:48:36,720
है ईश्वर की जो धारणा है तो उस धारणा के अनुसार जो है क्या

717
00:48:36,720 --> 00:48:41,120
ईश्वर सर्वशक्तिमान है? अभी मैं बता रही हूं अगर केवल ब्रह्मा कुमारी

718
00:48:41,120 --> 00:48:45,840
नहीं क्योंकि आप ये मान लीजिए जो सत्य है वही सर्वमान्य

719
00:48:45,840 --> 00:48:50,000
है और जो सर्वमान्य है वो सत्य है और बहुत सूक्ष्म भी

720
00:48:50,000 --> 00:48:54,160
है जिसे इन नेत्र द्वारा नहीं देखा जा सकता जी तो आप

721
00:48:54,160 --> 00:48:58,240
जापान में भी ले लीजिए स्टैंड पर उन्होंने लाइट को जलाया उन्होंने भी प्रकाश

722
00:48:58,240 --> 00:49:02,320
कोष निराकार को माना आप बौद्ध धर्म में भी ले लीजिए कहीं

723
00:49:02,320 --> 00:49:06,480
पर भी उन्होंने ही लाइट को ही ज्यादातर महत्व दिया है हमने

724
00:49:06,480 --> 00:49:10,560
नहीं बल्कि जब आप ये हेतु मंत जब सारे धर्म चारों पांचों धर्म जितने भी

725
00:49:10,560 --> 00:49:14,800
धर्म है छोटे बड़े भी है ना वैसे तो चार ही बड़े-बड़े हैं अन्य सभी

726
00:49:14,800 --> 00:49:18,880
धर्मों ने जब उसकी स्वीकृति दी है स्वीकृति दी है तो

727
00:49:18,880 --> 00:49:23,040
फिर निश्चित रूप से वो सत्य इसका मतलब क्योंकि जो बात कई

728
00:49:23,040 --> 00:49:27,280
लोग कह रहे हैं जो उसके अनुसार वो चीज वही कई लोग कह रहे हैं मान्य

729
00:49:27,280 --> 00:49:31,440
है और जो मान्य है वो सत्य है भाई अब कोई

730
00:49:31,440 --> 00:49:35,440
ना कोई एक धर्म को मानने वाला होता है और उसमें भी प्रकाश का निराकार

731
00:49:35,440 --> 00:49:39,520
का वर्णन किया गया है और जहां

732
00:49:39,520 --> 00:49:43,520
तक आप गीता में भी एक जगह वर्णन लिया उन्होंने कहा मैं नहीं करा रहा हूं कोई और

733
00:49:43,520 --> 00:49:47,600
सत्ता हमारे पास शायद कटिंग अभी नहीं मौजूद होगी कभी संभवत कटिंग मिली तो

734
00:49:47,600 --> 00:49:51,600
मैं दिखाऊंगी कोई और करा रहा है श्री कृष्ण देखो देवताएं

735
00:49:51,600 --> 00:49:55,680
मां से जन्म लेते हैं थोड़ा विषय बदल जाएगा जो विषय

736
00:49:55,680 --> 00:50:00,320
चल रहा है बड़ा इंटरेस्टिंग चल रहा है कि मान्यता जी बस मैं इतना

737
00:50:00,320 --> 00:50:01,200
क्योंकि धर्म

738
00:50:01,200 --> 00:50:05,200
के विषय में जितनी भी मान्यताएं हैं उनमें जो चीज

739
00:50:05,200 --> 00:50:09,520
इक्वल आ रही है कि निराकार निराकार निराकार तो हम निराकार तो मानते हैं पर अवतार

740
00:50:09,520 --> 00:50:13,760
वाला कांसेप्ट सब में नहीं है तो इसलिए हम नहीं मानते हैं। एक तो यह बात हो गई।

741
00:50:13,760 --> 00:50:17,920
अच्छा एक चीज ये क्लियर कर दीजिए थोड़ा सा कि वेद ने यह कहा है

742
00:50:17,920 --> 00:50:22,160
कि जो उसका अनुसरण करेगा यजुर्वेद 31 19 में है ना नंबर

743
00:50:22,160 --> 00:50:26,240
बदल सकता है उसमें उन्होंने कहा है वेद ने कि

744
00:50:26,240 --> 00:50:30,480
नान्यापनथा कि मेरे अलावा और

745
00:50:30,480 --> 00:50:34,480
कोई मार्ग नहीं है यह जीवन मरण के चक्र से छूटने का

746
00:50:34,480 --> 00:50:38,480
छूटने का जीवन मरण में नहीं आएगा दोबारा छूट ही जाएगा मुक्त

747
00:50:38,480 --> 00:50:42,720
हो जाएगा परम मुक्ति वो जो कैवल्य मोक्ष है तो

748
00:50:42,720 --> 00:50:46,960
क्या क्या आप वेद की इस बात को मानते हैं? देखिए

749
00:50:46,960 --> 00:50:51,200
रही जीवन मरण मैंने कहा कहा ना आपको मुक्ति किससे चाहिए?

750
00:50:51,200 --> 00:50:55,840
इंसान आपने बहुत पीछे अभी आधा घंटा पहले आपने कहा इंसान कभी-कभी

751
00:50:55,840 --> 00:51:00,160
अपने आप अपनी बीमारियों से या कोई कई ऐसी चीज

752
00:51:00,160 --> 00:51:04,320
शास्त्रों में ये लिखा है कि तुम्हारा जन्म होगा ही नहीं किसी रूप में। देव

753
00:51:04,320 --> 00:51:08,320
देवता के रूप में भी नहीं। एक मुक्ति की बात चली थी वहां पे तो मुक्ति वो

754
00:51:08,320 --> 00:51:12,640
इंसान किससे चाह रहा आखिर वो छुटकारा किस चीज से चाह रहा है? यह समझना

755
00:51:12,640 --> 00:51:16,240
होगा। वह स्थित प्रज्ञ होना चाह रहा है। मैं किसी के भी

756
00:51:16,240 --> 00:51:20,400
किसी के ऊपर निर्भर ना रहूं। मैंने इसको कहते हैं इसको कहते

757
00:51:20,400 --> 00:51:24,400
हैं परम स्वतंत्र मोक्ष। पर परिस्थिति बस कई बात कई इंसान कई

758
00:51:24,400 --> 00:51:28,400
बातें कहता है। लेकिन अगर मैंने पहले कहा ना फिर वही अगर व्यक्ति

759
00:51:28,400 --> 00:51:32,560
को सही कर दिया सुख हो जाए सब कुछ हो जाए फिर वह बदल जाता है। ये मनुष्यों

760
00:51:32,560 --> 00:51:36,720
की अपनी सोच है। वो तो परमात्मा को गाली भी देता है और अच्छा अगर

761
00:51:36,720 --> 00:51:40,800
हो जाए तो उसकी सराहना भी करता है। वो भी करता है। ठीक ऐसे ही मैं

762
00:51:40,800 --> 00:51:44,880
शास्त्रों की बात कह रही हूं। मुक्ति ऐसे कहा है ना कि उसमें लिखा है कि मुक्ति नहीं

763
00:51:44,880 --> 00:51:49,040
होगी। उसमें बोला है ना कि वो इंसान कह रहा है शास्त्रों के अनुसार।

764
00:51:49,040 --> 00:51:53,440
इंसान नहीं कह रहा है। अलग जी। हां जी शास्त्र में वर्णन आया है

765
00:51:53,440 --> 00:51:57,520
कि वेद के अलावा परम मुक्ति ये दो चीजें एक तो आपने

766
00:51:57,520 --> 00:52:01,520
कहा कि मुक्ति है ही नहीं मगर शास्त्र कह रहे है मुक्ति है दूसरा

767
00:52:01,520 --> 00:52:05,600
दूसरा आपने कहा मुक्ति मुक्ति अर्थात वो चलिए ठीक है वो वाली

768
00:52:05,600 --> 00:52:09,760
मुक्ति आपकी जो देवत्व वाली मुक्ति है उसका वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि

769
00:52:09,760 --> 00:52:13,840
भाई जो यह वाली मुक्ति प्राप्त करते हैं वो स्वर्ग में जाएंगे देवता स्वरूप हो जाएंगे देवता

770
00:52:13,840 --> 00:52:17,920
जैसा जीवन जी लेंगे मगर एक परम मुक्ति की बात वहां की गई है शास्त्रों में बहुत बार की

771
00:52:17,920 --> 00:52:22,320
गई है कैवल्य मोक्ष की बात की गई है सायुज्य मोक्ष की बात की गई है। सामिप्य

772
00:52:22,320 --> 00:52:26,320
मोक्षी परम मुक्ति की बात की गई जहां से वापस नहीं आना है। मुक्त ही हो

773
00:52:26,320 --> 00:52:30,320
गए। तो एक तो यह बात की गई केवल्य मुक्ति की। तो एक तो

774
00:52:30,320 --> 00:52:31,840
यह है कि इधर ब्रह्माकुमारीज

775
00:52:31,840 --> 00:52:35,920
ने माना कि मुक्ति वो वाली नहीं है केवल्य वाली। वो देवता बनेंगे।

776
00:52:35,920 --> 00:52:39,920
बहुत लंबे समय के बाद जो है उन्हें आना ही पड़ेगा। मगर शास्त्रों में ये

777
00:52:39,920 --> 00:52:44,000
कहा गया है कि बहुत लंबे समय के बाद तक भी नहीं आना पड़ेगा। एक तो ये बात। दूसरी बात

778
00:52:44,000 --> 00:52:48,240
ये वेद स्वयं श्वेता शत्रु उपनिषद और वेद घोषणा कर रहे हैं। मेरे

779
00:52:48,240 --> 00:52:52,320
अलावा दूसरा कोई मार्ग नहीं है। यानी कि किसने?

780
00:52:52,320 --> 00:52:56,640
ये कौन कह रहा है कि मेरे अलावा कोई मार्ग नहीं है। ये श्रुति

781
00:52:56,640 --> 00:53:01,040
शास्त्र है ना हमारे वेद। नहीं वेद को किसने उच्चारित किया ये बात?

782
00:53:01,040 --> 00:53:05,200
उच्चारित तो हम अगर जैसे आपने कोई भी बात कही। आपने जैसे

783
00:53:05,200 --> 00:53:09,520
कहा कि जो पान कह रहा है कि मेरे अलावा कोई भी आपको

784
00:53:09,520 --> 00:53:13,600
मतलब जो कर नहीं सकता। भगवान ने भी कहा है।

785
00:53:13,600 --> 00:53:17,840
भगवान ने भी कहा है। शास्त्रों में भगवान ने भी कहा है। वेद ने भी कहा है।

786
00:53:17,840 --> 00:53:22,000
गीता में भी कहा गया है ये कि मेरे परमधाम जाने के बाद वापस आने की जरूरत नहीं।

787
00:53:22,000 --> 00:53:26,320
वो मेरा परमधाम जहां से कोई वापस नहीं आता। ये बार-बार घोषणा की गई है। तो

788
00:53:26,320 --> 00:53:30,400
एक तो मुक्ति है। एक तो वो वाली मुक्ति है ही नहीं। फिर ये वापस आते कहां से

789
00:53:30,400 --> 00:53:34,400
हैं? जब उसने कह दिया मेरी चले गए। परमधाम में वापस नहीं

790
00:53:34,400 --> 00:53:38,560
आएंगे जो कुछ फिर ये आते कहां से मनुष्य भैया? अगर सब वही बैठ जाए

791
00:53:38,560 --> 00:53:42,560
तो सृष्टि कैसे चलेगी? सृष्टि नहीं चल सकती। ये ये एक अलग विषय हो

792
00:53:42,560 --> 00:53:46,640
जाएगा। नहीं अभी अभी अभी मैं ये पूछ रहा हूं। अभी मैं ये पूछ रहा हूं कि

793
00:53:46,640 --> 00:53:47,200
शास्त्र

794
00:53:47,200 --> 00:53:51,280
ये घोषणा कर रहे हैं कि जो मुक्त हो जाएगा वो वाली मुक्ति केवल

795
00:53:51,280 --> 00:53:55,360
वाली ये वाली नहीं बता दूं यहां पे संक्षेप कौन मेरा मेरा जो प्रश्न है ना वो

796
00:53:55,360 --> 00:53:59,440
क्लियर हो जाए एक बार कि शास्त्र ये घोषणा कर रहे हैं कि एक तो वो केवल वाली

797
00:53:59,440 --> 00:54:03,840
मुक्ति जहां से वापस नहीं आना पड़ता और दूसरी ये बात हो जाती है

798
00:54:03,840 --> 00:54:07,840
कि वो ये भी घोषणा कर रहे हैं मेरे अलावा और कोई मार्ग नहीं है। तो

799
00:54:07,840 --> 00:54:11,840
मैं बस इतना जानना चाह रहा हूं कि इस लाइन पर वेद की

800
00:54:11,840 --> 00:54:15,840
गीता की या जो शास्त्रों की ये जो पंक्ति है

801
00:54:15,840 --> 00:54:20,080
इस पर इसको मान रहा है ब्रह्मा कुमारी कि नहीं मानता है देखिए

802
00:54:20,080 --> 00:54:24,240
इस पंक्ति को अगर ईश्वर ने कहा मेरे अलावा कोई मार्ग

803
00:54:24,240 --> 00:54:28,320
नहीं है हां किस चीज का? मुक्ति का परम मुक्ति

804
00:54:28,320 --> 00:54:32,560
का केवल मुक्ति का हां आवागमन से छुटकारा पर ईश्वर ने कहा

805
00:54:32,560 --> 00:54:36,640
ईश्वर ने ही कहा है ईश्वर ने कहा ठीक है उसमें कोई हस्ताक्षर

806
00:54:36,640 --> 00:54:40,720
तो ईश्वर के है नहीं भाई ठीक है इंसान ने ही यानी कि बिलीव नहीं है

807
00:54:40,720 --> 00:54:44,960
हां इंसान ने ही लिखी है अभी और मत और मतांतर जैसे

808
00:54:44,960 --> 00:54:49,040
आप मुस्लिम धर्म में ऐसे अपने सनातन में भी देखो नहीं तो मैं मैं ये

809
00:54:49,040 --> 00:54:53,200
नहीं कह रहा कि मैं ये नहीं कह रहा कि आप क्यों नहीं मानते किस स्थिति में उस उन्होंने

810
00:54:53,200 --> 00:54:57,200
लिखी कौन सी अवस्था में लिखी हुई है ठीक किस परिस्थिति को देख

811
00:54:57,200 --> 00:55:01,280
के उन्होंने लिखा है वो उस समय उनके सामने कैसी रही होगी कौन सी

812
00:55:01,280 --> 00:55:02,240
मनुष्य की वृत्ति

813
00:55:02,240 --> 00:55:06,240
कैसा समाज कैसा क्या रागा उसके अनुसार लिखा होगा ठीक है मैं

814
00:55:06,240 --> 00:55:10,240
मैं उसपे नहीं जा रहा कि आप उसे क्यों नहीं मान रहे मैं बस ये जानना चाह रहा हूं

815
00:55:10,240 --> 00:55:14,720
मानते हैं कि नहीं तो नहीं मानते इस बात को नहीं मानते मुक्ति

816
00:55:14,720 --> 00:55:19,040
अगर उसने अपने करीब रख लिया मुक्त कर दिया है किससे मुक्ति है विकर्मों

817
00:55:19,040 --> 00:55:23,200
से मुक्ति उसने एक साफ कहा है कैवल्य मुक्ति जिसके बाद तुम्हारा जन्म

818
00:55:23,200 --> 00:55:27,280
मरण नहीं होगा दोबारा भैया कई जगह अगर जन्म मरण नहीं

819
00:55:27,280 --> 00:55:31,280
है तो ये आत्मा मैं ये नहीं मैं ये नहीं मैं तर्क मैं वहां पे वो

820
00:55:31,280 --> 00:55:35,440
नहीं पूछ रहा कि आप क्यों नहीं मानते मैं बस आपको जानना चाह रहा हूं कि आप इस शास्त्र

821
00:55:35,440 --> 00:55:39,440
की ये वाली बात मानते हैं कि नहीं मानते नहीं मैं तो प्रैक्टिकल देखूंगी ये वाली

822
00:55:39,440 --> 00:55:43,760
बात नहीं मानते मैं ये भी नहीं कह सकती मैं प्रैक्टिकल देख रही हूं मनुष्य आ रहे हैं धरती

823
00:55:43,760 --> 00:55:47,920
नहीं तो वेद की जो नाना नाना पंथ्या वाली बात जो

824
00:55:47,920 --> 00:55:52,240
है वो हमें छोड़नी पड़ेगी कि ये जो है किसी गलत

825
00:55:52,240 --> 00:55:56,560
स्थिति में या ऐसी स्थिति स्थिति में नहीं उनकी की क्या परिस्थिति रही होगी?

826
00:55:56,560 --> 00:56:00,720
कैसी हम नहीं मान रहे ना। वहां पे रहा हो तो उस स्थिति में उन्होंने लिखा

827
00:56:00,720 --> 00:56:04,880
तो ठीक लिखा होगा। ठीक है? उन्होंने उस नहीं तो फिर वेद

828
00:56:04,880 --> 00:56:08,880
ये भी घोषणा वेद मैं बता रहा हूं। वेद ये भी घोषणा करते हैं कि

829
00:56:08,880 --> 00:56:13,040
वेद के द्वारा दी गई जो शिक्षा है वो देश काल परिस्थिति से प्रभावित नहीं है।

830
00:56:13,040 --> 00:56:17,040
नहीं सनातन है। देखिए अब जो परिवेश है अब जो इस समय है

831
00:56:17,040 --> 00:56:17,540
हर

832
00:56:17,360 --> 00:56:21,520
चीज परिवर्तन होती है और हर चीज कई चीजें मैंने देखा तो ब्रह्माकुमारी

833
00:56:21,520 --> 00:56:25,520
का जो नियम है वो भी परिवर्तित हो सकता है नियम नहीं परिवर्तन होते नहीं जो

834
00:56:25,520 --> 00:56:29,520
ये देवत्व वाला कांसेप्ट है ये नहीं कहा कि गलत है या

835
00:56:29,520 --> 00:56:33,600
परिवर्तन हो गए कई बार क्या होता है जो मानने वाले

836
00:56:33,600 --> 00:56:37,760
लोग होते हैं उनको धारण करने वाले लोग होते हैं उनकी मानसिक

837
00:56:37,760 --> 00:56:42,000
परिस्थितियां चेंज होती रहती है परिवर्तन उन्होंने अपनी उस स्थिति में लिख दिया

838
00:56:42,000 --> 00:56:46,400
उन्हें कैसी जो रहे होगी उन्होंने उस हिसाब से बहुत अच्छा लिखा होगा।

839
00:56:46,400 --> 00:56:50,480
तो इसमें इसमें दिक्कत यह है। इसमें दिक्कत यह है इसमें दिक्कत यह है

840
00:56:50,480 --> 00:56:54,560
कि वेद के द्वारा दी जाने वाली जो शिक्षा है उसके लिए जगह-जगह पे आया है।

841
00:56:54,560 --> 00:56:58,640
सनातन मतलब वो सनातन का मतलब जो शाश्वत है।

842
00:56:58,640 --> 00:57:02,640
मतलब वो किसी देश काल परिस्थिति से प्रभावित नहीं है। वो शाश्वत सत्य

843
00:57:02,640 --> 00:57:07,600
उन्होंने लिखा है। तो अगर हम यह कहेंगे कि उन्होंने किसी परिस्थिति में लिख दिया होगा।

844
00:57:07,600 --> 00:57:11,760
अच्छा पहली बात तो यह है कि ये क्लियर है कि उस पंक्ति को हम हम अभी फिलहाल

845
00:57:11,760 --> 00:57:15,920
नहीं मानते। स्थिति जैसे शब्द भी नहीं लगाएंगे। क्या जरूरत रही होगी?

846
00:57:15,920 --> 00:57:20,160
वो परिस्थिति तो कहते हैं उसे। एक परिस्थिति एक हमारे

847
00:57:20,160 --> 00:57:24,240
हिसाब से होती है। जैसे एक कि हमें जरूरत पड़ी हमारी जैसे जैसे अभी

848
00:57:24,240 --> 00:57:28,400
क्या हुआ? अभी यहां पे गर्मी लगी। ये हो गई परिस्थिति। अब हमारी जरूरत हो गई पंखा चला

849
00:57:28,400 --> 00:57:32,400
दो। ये जरूरत हो गई। तो हो सकता है वहां परिस्थिति ना करके कि जरूरत

850
00:57:32,400 --> 00:57:37,120
वैसी जरूरत को कि नहीं। उसी भविष्य को सोच के उसी को परिस्थिति कहा

851
00:57:37,120 --> 00:57:41,120
मतलब कहने का मतलब यह है कि हमारे जो सनातन शास्त्र है उनको

852
00:57:41,120 --> 00:57:45,200
सनातन कहा ही इसलिए गया है कि वो देश काल परिस्थिति से प्रभावित हो के नहीं

853
00:57:45,200 --> 00:57:49,200
लिखे गए वो बिल्कुल शाश्वत सत्य के रूप में लिखे गए ये मान्यता है अब

854
00:57:49,200 --> 00:57:53,440
वो तर्क अब वो तर्क के रूप में कितना खरी उतरती है वो एक अलग विषय हो जाएगा

855
00:57:53,440 --> 00:57:58,240
मगर अभी वेद को मानने वाले उसको जो पंक्ति है उस पे ये

856
00:57:58,240 --> 00:58:02,320
नहीं लगाएंगे ये आरोप नहीं लगा सकते कि वो किसी जरूरत के कारण वो

857
00:58:02,320 --> 00:58:06,320
लिख दिया गया वो तो उन्होंने हर देश काल परिस्थिति में काम आने वाली

858
00:58:06,320 --> 00:58:12,160
बात उन्होंने लिखी। एक तो ये बात हो गई। दूसरी बात अब इस पे आते हैं कि

859
00:58:12,160 --> 00:58:16,160
जैसे हमने कहा ना सभी धर्म मानते हैं इसको। जी है ना? इसलिए हम वो वाली

860
00:58:16,160 --> 00:58:20,320
बात तो मानते हैं। ठीक है? मगर इसमें एक चीज एक क्लू छूट रहा है कि जैसे

861
00:58:20,320 --> 00:58:25,760
हमने कहा सर्वज्ञ। सर्वज्ञ का मतलब क्या हुआ? जो

862
00:58:25,760 --> 00:58:30,080
मतलब जो सत्य है वही सर्वमान्य और जो नहीं सर्वज्ञ हां

863
00:58:30,080 --> 00:58:34,240
सभी को जो ज्ञात है ज्ञात है सभी को नहीं सर्वज्ञ जैसे मैंने कहा कि यह

864
00:58:34,240 --> 00:58:38,560
सर्वज्ञ है जैसे मैंने कहा आप सर्वज्ञ हो तो यानी कि आप सर्वज्ञाता

865
00:58:38,560 --> 00:58:42,560
हो मैंने कहा ना ज्ञात सर्व को जिसके बारे में सबका

866
00:58:42,560 --> 00:58:46,640
सभी को ज्ञान जिसको सबका ज्ञान है देखो चाहे हमें

867
00:58:46,640 --> 00:58:47,520
ज्ञान हो और वो

868
00:58:47,520 --> 00:58:51,680
उसको भी ज्ञान हो हमें भी ज्ञान रहता है दोनों को ही ज्ञान रहता है ईश्वर सर्वज्ञ है ना

869
00:58:51,680 --> 00:58:56,080
सब उसको जानते हैं इसका का मतलब और वो सभी को भी जानता है। नहीं तो ईश्वर सर्वज्ञ

870
00:58:56,080 --> 00:59:00,240
तो है कि नहीं? सर्वज्ञ है मतलब वो सब कुछ जानता है। सब जानता

871
00:59:00,240 --> 00:59:04,560
है। सब कुछ जानता है। सब कुछ ऐसा उसकी है। ऐसा जानेंगे क्यों?

872
00:59:04,560 --> 00:59:08,720
आपको आपके बच्चे पिताजी ने जन्म दिया तो आपको आपके जब तक जीवित

873
00:59:08,720 --> 00:59:12,880
रहेंगे उस पूरे जीवन काल को वो जानेंगे ही। नहीं मेरे पिता मेरे जो

874
00:59:12,880 --> 00:59:16,960
ब्लड है उसका ब्लड का वो ग्रुप नहीं जानते। बात भी ब्लड ग्रुप की नहीं बात।

875
00:59:16,960 --> 00:59:21,040
मैं वही कह रहा हूं। क्या ईश्वर ऐसा पिता ऐसा पिता है या वो सर्वज्ञ वाला कि उसको

876
00:59:21,040 --> 00:59:25,520
मेरा ब्लड ग्रुप भी मालूम है। नहीं एक बात और ये ये भौतिक शरीर

877
00:59:25,520 --> 00:59:29,680
आपके पिता ने जन्म दिया पिता से बार-बार तुलना होती है तो पिता

878
00:59:29,680 --> 00:59:34,000
तो पंच भौतिक वाले हैं। उनको वो कई जगहों पे वो

879
00:59:34,000 --> 00:59:38,160
एग्जांपल तो जो चीज इस स्तर की है वो इस स्तर की।

880
00:59:38,160 --> 00:59:42,240
परमात्मा छोटी-छोटी चीजें अगर जानने के लिए बैठेगा तो उसके लिए और

881
00:59:42,240 --> 00:59:46,640
भी हो सकता है शायद कार्य हो। है ना? अब ब्लड ग्रुप जानेगा मुझे कब जुकाम

882
00:59:46,640 --> 00:59:50,960
हो रहा। देखिए तो यहां पे परमात्मा भी मुक्त नहीं है। सुनिए

883
00:59:50,960 --> 00:59:55,040
उसको मैंने कहा ना उस साक्षी हो के शुभ रहता है। वही पे मालूम

884
00:59:55,040 --> 00:59:59,280
है कि नहीं उसको सब कुछ पता होती है। उसको

885
00:59:59,280 --> 01:00:02,800
सब पता है। सृष्टि उसने बनाई है। तो सब

886
01:00:02,800 --> 01:00:06,800
कुछ उसकी स्क्रीन पे दिन भर घूमता रहता है। दिन भर चलता

887
01:00:06,800 --> 01:00:10,880
रहता है। यानी कि उसको पता सब है। वो कहीं पे मौन है, कहीं पे बोल रहा है वो अलग

888
01:00:10,880 --> 01:00:14,960
बात है। वो वो सब कुछ पता है। तो यानी कि यानी कि सर्वज्ञ

889
01:00:14,960 --> 01:00:18,960
का मतलब हुआ कि सब कुछ जानने वाला

890
01:00:18,960 --> 01:00:23,040
यानी कि सर्व का मतलब हुआ सब कुछ यही हुआ ना

891
01:00:23,040 --> 01:00:27,040
है ना सब यानी कि हम यह नहीं कह सकते हम ये नहीं कह सकते

892
01:00:27,040 --> 01:00:31,200
कि भाई नाली के अंदर क्या है वो उसे नहीं पता उसको वही पता है वो बात अलग है वो वहां पे मौन

893
01:00:31,200 --> 01:00:35,680
है कि क्या कर रहा है और उसको पता है यानी सर्व का अर्थ हम ले रहे हैं सब कुछ

894
01:00:35,680 --> 01:00:39,840
तो जब हम कहते हैं सर्वशक्तिमान तो वहां पे सर्वशक्तिमान

895
01:00:39,840 --> 01:00:44,240
अलग है और सर्वज्ञ अलग

896
01:00:44,240 --> 01:00:48,400
अर्थात कोई बात

897
01:00:48,400 --> 01:00:53,200
नहीं मतलब जिसके पास सभी कार्यों को करने की क्षमता है सबके

898
01:00:53,200 --> 01:00:57,280
पास तो फिर हम ये कहते कि क्योंकि

899
01:00:57,280 --> 01:01:01,280
मुसलमान ने ये माना है या बुद्ध ने ये माना है या क्रिश्चियनिटी ने

900
01:01:01,280 --> 01:01:05,760
ये माना है इसलिए भगवान अवतार नहीं ले सकता जबकि वो तो हम कह रहे हैं कि सर्वशक्तिमान

901
01:01:05,760 --> 01:01:10,080
है नहीं अवतार ऐसा ये किसने कहा अवतार अवतार लेने की उससे जरूरत

902
01:01:10,080 --> 01:01:14,480
क्या है भाई वो पावरफुल है वो पावर जैसे कई देवताओं

903
01:01:14,480 --> 01:01:18,560
उसको दुनिया बनाने की क्या जरूरत है कुछ भी कुछ भी पकड़ा दिया देवताओं के हाथों में मैं

904
01:01:18,560 --> 01:01:22,720
ये कहती हूं देवताओं जब देवताओं में अपनी खुद की चरित्र की पावर

905
01:01:22,720 --> 01:01:26,800
है उससे बड़ी कोई पावर नहीं है वो एक बार दृष्टि ऐसे डाले सब कुछ

906
01:01:26,800 --> 01:01:31,040
परिवर्तन हो सकता है लेकिन फिर भी उसके त्रिशूल पकड़ा दिया कुछ भी दिखा दिया जा

907
01:01:31,040 --> 01:01:35,040
के तो उसको ये सब करने की या पावरफुल दिखाने के लिए

908
01:01:35,040 --> 01:01:39,040
सब कुछ दुनिया मैं ये नहीं कह रहा मैं ये नहीं कह रहा कि वो ले लेता ही है

909
01:01:39,040 --> 01:01:43,120
लेगा ही मैं उस पे नहीं जा रहा मैं अभी ये कह रहा हूं ले सकता है कि नहीं

910
01:01:43,120 --> 01:01:47,280
क्योंकि अगर हम बात करें कि उसको आवश्यकता क्या है तो उसको तो आवश्यकता

911
01:01:47,280 --> 01:01:51,440
धर्म ग्लानी के समय ईश्वर आता है इसलिए संभोग उसको कहते हैं वो

912
01:01:51,440 --> 01:01:55,440
धर्म ग्लानी के समय आते हैं ठीक है धर्म ग्लानी के समय आते

913
01:01:55,440 --> 01:02:00,720
हैं परमात्मा एक मिनट एक मिनट इस कह रहे हैं भैया अपना कार्य करते हैं

914
01:02:00,720 --> 01:02:04,880
अच्छा अच्छा हां बस ठीक है कोशिश करते हैं जी [गला साफ़ करने की आवाज़] तो परमात्मा

915
01:02:04,880 --> 01:02:09,040
जो है धर्म वाणी के समय आते हैं और अगर वो होते तो

916
01:02:09,040 --> 01:02:13,200
ये भैया दुनिया मैं वो नहीं होती है। सर्वशक्तिमान था तब भी

917
01:02:13,200 --> 01:02:17,440
मैं वो नहीं कह रहा। अब वो अलग बात है कि वो क्यों आते हैं वो अलग अलग विषय है।

918
01:02:17,440 --> 01:02:21,760
हम कह रहे हैं कि सर्व का मतलब है सब कुछ मगर जब हम सर्वशक्तिमान

919
01:02:21,760 --> 01:02:25,840
कह रहे हैं तो हम कह रहे हैं कि वो अवतार नहीं ले सकता। या तो ये माने कि अवतार

920
01:02:25,840 --> 01:02:30,160
ले सकता है पर लेता नहीं है। ऐसा नहीं लेता है। हमारा आप जैसा मैं पूछ रहा हूं ले सकता है।

921
01:02:30,160 --> 01:02:34,160
मैं पूछ नहीं मतलब ले सकता है कि नहीं? नहीं ले सकता।

922
01:02:34,160 --> 01:02:38,720
जरूरत नहीं है मनुष्य ज्यादा खुद ताकतवर वो शरीर ले क्या अपनी ताकत

923
01:02:38,720 --> 01:02:42,880
मैं वो नहीं कह रहा हूं मैं कह रहा हूं कि बाधित है ना यहां पे फिर कोई उसे आवश्यकता

924
01:02:42,880 --> 01:02:47,120
नहीं है इसलिए नहीं आवश्यकता तो उसे दुनिया बनाने की भी नहीं है वो तो परम मुक्त

925
01:02:47,120 --> 01:02:51,280
है नहीं हम उसके आप कह दो परमात्मा का पिता कौन है वो एक

926
01:02:51,280 --> 01:02:55,440
अलग सब्जेक्ट हो गया नहीं सब्जेक्ट अलग नहीं आवश्यकता है नहीं हम उसपे उंगली नहीं

927
01:02:55,440 --> 01:02:59,680
उठा सकते उन्हें आवश्यकता होगी तो वो उनकी इच्छा होगी वो खुद

928
01:02:59,680 --> 01:03:03,840
करेंगे उन्हें जब सृष्टि को परिवर्तन करना होगा वो खुद करेंगे यानी

929
01:03:03,840 --> 01:03:07,920
उनकी अपने यानी उनका कोई यानी कि

930
01:03:07,920 --> 01:03:12,000
उनका निजी कोई स्वार्थ नहीं है दुनिया को बनाने में। फिर भी वह करते हैं।

931
01:03:12,000 --> 01:03:15,760
उनकी इच्छा है। हां। तो जैसे बिना इच्छा के वो दुनिया बना

932
01:03:15,760 --> 01:03:19,840
रहे हैं। जैसे बिना इच्छा के उनको कोई जरूरत नहीं है कि वो किसी के शरीर में आके भी बोले।

933
01:03:19,840 --> 01:03:24,320
उनको कुछ नहीं पड़ी है। वो तो परम मुक्त हैं। उनको आवश्यकता तो नहीं है। आवश्यकता होगी

934
01:03:24,320 --> 01:03:28,480
तब किसी में प्रवेश हो। उनको आवश्यकता है कि नहीं? नहीं। जब बच्चे

935
01:03:28,480 --> 01:03:32,480
त्राहिमाम हो जाते हैं। आवश्यकता पूछ रहा हूं। हां, मैं वही यानी वह दुखी

936
01:03:32,480 --> 01:03:36,560
होते हैं। दुखी नहीं होते हैं। हमारी दुख की करुणा पुकार सुनते हैं।

937
01:03:36,560 --> 01:03:40,720
दुखी कभी आवश्यकता नहीं होती ना? आवश्यकता उन्हें सुनिए। मैं वही उत्तर

938
01:03:40,720 --> 01:03:44,880
दे रही हूं। क्योंकि जब हम उनको लगता है हमारे बच्चे दुखी

939
01:03:44,880 --> 01:03:49,040
हो गए हैं। तब तब उस समय आवश्यकता होती है।

940
01:03:49,040 --> 01:03:53,040
आते हैं अपने ईश्वर की। ईश्वर की। हमारी आवश्यकता होती है।

941
01:03:53,040 --> 01:03:57,120
वो हमारी होती है। उनकी अपनी क्या आवश्यकता है? आते हैं आता है। नहीं नहीं

942
01:03:57,120 --> 01:04:01,200
आता है। आवश्यकता अगर नहीं संसार को परिवर्तन करने की है तो वो

943
01:04:01,200 --> 01:04:05,680
फिर क्यों आता है धर्म? मैं मैं बताता हूं क्यों आता है? क्योंकि जैसे

944
01:04:05,680 --> 01:04:10,160
जो ईश्वर के द्वारा जो सृष्टि का रचित होना है वो

945
01:04:10,160 --> 01:04:14,240
ईश्वर की शक्ति का परिणाम है। जैसे मैं बताता हूं। जैसे क्या है?

946
01:04:14,240 --> 01:04:18,400
जैसे अभी हम लोग बात कर रहे हैं। बात करते बीच में कई बार आपका अंगूठा हिला।

947
01:04:18,400 --> 01:04:22,400
कई बार मेरे पैर हिले। क्यों हिले? क्योंकि मेरे अंदर वो एनर्जी है।

948
01:04:22,400 --> 01:04:26,400
मुझे उसकी आवश्यकता नहीं थी। ऐसे ही ईश्वर जो है बिना किसी

949
01:04:26,400 --> 01:04:30,560
आवश्यकता के ही दुनिया निर्माण करते हैं और दुनिया संचालित करते हैं। उसका नाश

950
01:04:30,560 --> 01:04:31,060
भी करते

951
01:04:30,880 --> 01:04:35,120
हैं बिना किसी आवश्यकता के। और यह बात भी लिखी हुई है श्वेता चतुरपनिषद में चौथे

952
01:04:35,120 --> 01:04:39,120
अध्याय के पहले ही उसमें मंत्र में ये बात आई है। ईश्वर बिना अपने किसी निजी

953
01:04:39,120 --> 01:04:43,440
स्वार्थ के सृष्टि का निर्माण अगर हम ये कहेंगे ना कि ईश्वर को आवश्यकता

954
01:04:43,440 --> 01:04:47,520
थी। इसका मतलब ईश्वर में भी कुछ एक अभाव था। स्वार्थ और आवश्यकता दो

955
01:04:47,520 --> 01:04:51,760
अलग है। अलग शब्द है। आवश्यकता एक अलग चीज होती है। किसी

956
01:04:51,760 --> 01:04:56,000
किसी को आवश्यकता मदद करना अलग है। उसके तो मदद करने का भाव भी

957
01:04:56,000 --> 01:05:00,160
उसका सुनना और स्वार्थ नहीं। उसका कोई संसार से स्वार्थ नहीं है। बच्चों

958
01:05:00,160 --> 01:05:04,400
से बस हम बच्चों यानी उसका अपना उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं है।

959
01:05:04,400 --> 01:05:08,400
फिर भी वो आता है। ऐसे ही उसका ऐसे ही उसको कोई आवश्यकता नहीं है।

960
01:05:08,400 --> 01:05:12,880
फिर भी वो अवतार ले सकता है। नहीं अवतार एक शब्द है। मदद करना आना

961
01:05:12,880 --> 01:05:17,120
अवतार लेना मनुष्य। तो फिर सर्व का क्या करेंगे जो सर्वशक्तिमान है

962
01:05:17,120 --> 01:05:21,280
अवतार का आप यहां पे हमारे आपके पास थोड़ा भिन्नता है अवतार मतलब

963
01:05:21,280 --> 01:05:25,520
जैसे हमारे आप परकाया प्रवेश कर रहे हैं हां परकाया प्रवेश

964
01:05:25,520 --> 01:05:29,840
करते हैं अवतार मतलब दुनिया में मान्यता होती है कि उनका भी देवों

965
01:05:29,840 --> 01:05:34,720
जैसा शरीर होगा और कहने का मतलब है कहने का मतलब है परकाया

966
01:05:34,720 --> 01:05:38,720
कहने का मतलब है कांसेप्ट समझ लें कि परकाया प्रवेश के

967
01:05:38,720 --> 01:05:43,040
भी लिए भी उसकी कोई आवश्यकता नहीं होती है मगर वो करता है मगर

968
01:05:43,040 --> 01:05:45,920
ब्रह्मा [गला साफ़ करने की आवाज़] कुमारी फिर भी यह मानता है कि अवतार के

969
01:05:45,920 --> 01:05:50,240
लिए आवश्यकता नहीं होती इसलिए वो नहीं करता है। देखो इसलिए वो करता है क्योंकि

970
01:05:50,240 --> 01:05:54,320
किसी में प्रवेश इसलिए करता है क्योंकि मनुष्य अब वो गधे को समझाएगा

971
01:05:54,320 --> 01:05:58,640
तो उसका उत्तर गधा कैसे चिल्ला के उत्तर देगा वो आप समझ नहीं सकते तो मनुष्य

972
01:05:58,640 --> 01:06:02,800
के तन में इसलिए आ करके उसको आवश्यकता होती है कुछ समय के लिए आता करके अपना कार्य

973
01:06:02,800 --> 01:06:07,040
चला जाता है। मनुष्य की सुलभता के लिए ना। ताकि मनुष्य ही उसकी भाषा को समझ

974
01:06:07,040 --> 01:06:11,040
सकता है। वो ठीक है। तो इसीलिए वो जब अवतार ले लेगा तो भाषा

975
01:06:11,040 --> 01:06:15,200
ही क्या? तो उसका रूप देख के भी मुक्ति पा लेगा इंसान। किसके तन जो जिसके तन

976
01:06:15,200 --> 01:06:19,520
में आएगी? नहीं जैसे उसने अगर स्वयं से अवतार लिया सच्चिदानंद स्वरूप अवतार

977
01:06:19,520 --> 01:06:23,600
अपना नहीं लेगा। मैं ये नहीं कह रहा कि लेगा ब्रह्मा कुमारी के अनुसार नहीं

978
01:06:23,600 --> 01:06:27,600
लेगा। मगर ये वाली जो बात है कि वो साधु भक्तों के उद्धार

979
01:06:27,600 --> 01:06:31,840
के लिए परित्राणाय साधु नाम उद्धार के लिए परकाया

980
01:06:31,840 --> 01:06:35,840
प्रवेश करते हैं। ठीक है? तो जब हम ये मान रहे है किध

981
01:06:35,840 --> 01:06:39,840
बिना आवश्यकता के साधु भक्तों के उद्धार के लिए वो परकाया प्रवेश करते

982
01:06:39,840 --> 01:06:44,000
है तो बिना आवश्यकता के वो साधु भक्तों के उद्धार के लिए स्वयं

983
01:06:44,000 --> 01:06:48,160
अवतरित हो जाते है ये भी तो माना जा सकता है नहीं स्वयं अवतरित नहीं हो सकता वो

984
01:06:48,160 --> 01:06:52,560
आधार लेना ही तो फिर फिर वहां पे सर्व का क्या करेंगे देखिए मैं

985
01:06:52,560 --> 01:06:56,720
वो वो मान ली मैंने बात फिर सर्व का क्या करेंगे देखिए यहां पे सर्व का मतलब ज्ञाता

986
01:06:56,720 --> 01:07:00,800
आपने कहा था ज्ञाता सर्व का मतलब क्या है सब कुछ है कि नहीं सब कुछ सब

987
01:07:00,800 --> 01:07:01,300
कुछ

988
01:07:01,040 --> 01:07:05,440
वो जानता है बस यही हुआ नहीं अभी ज्ञाता हटा दी। अभी जो सर्व विशेषण

989
01:07:05,440 --> 01:07:09,600
यह एक विशेषण है। सर्वज्ञाता सर्वशक्तिमान सर्वव्यापक जो भी

990
01:07:09,600 --> 01:07:13,600
है मगर सर्व एक विशेषण है। विशेषण है ना? सर्व विशेषण

991
01:07:13,600 --> 01:07:17,840
का मतलब है सब कुछ। तो हमने

992
01:07:17,840 --> 01:07:22,080
जब जैसे सर्वज्ञ में सर्व लिया तो हमने कहा सब कुछ। तो जब यहां पे सर्वशक्तिमान

993
01:07:22,080 --> 01:07:26,800
में लेंगे तो सब कुछ करने की शक्ति माननी पड़ेगी। लेकिन है शक्ति।

994
01:07:26,800 --> 01:07:30,880
सब कुछ करने की शक्ति है। लेकिन वह दूसरों का भी हिसाब

995
01:07:30,880 --> 01:07:34,880
देख करके ही उसको उचित वो नहीं कह रहा। मैं कह रहा हूं कर सकता है कि नहीं?

996
01:07:34,880 --> 01:07:38,880
आवश्यकता वो अवतार ले सकता है कि नहीं? मेरे हिसाब से तो नहीं ले सकता। तो

997
01:07:38,880 --> 01:07:42,880
फिर सर्व विशेषण बाधित सर्व देखिए मेरे

998
01:07:42,880 --> 01:07:46,880
जरूरत होगी। मैं प्रवेश मैं वो नहीं कह रहा हूं। कैपेबिलिटी की

999
01:07:46,880 --> 01:07:51,120
बात कर रहा हूं। लेकिन यहां पर हम क्यों जब उसने अच्छा इसको एक दूसरे

1000
01:07:51,120 --> 01:07:55,200
तरीके से समझ सकते हैं। इसको एक दूसरे तरीके से समझ सकते हैं। जैसे हमने कहा

1001
01:07:55,200 --> 01:07:59,760
कि वो अवतार नहीं ले सकता है मगर फिर भी वो सर्वशक्तिमान है।

1002
01:07:59,760 --> 01:08:03,760
ठीक है? अब ये मान के चलिए कि मान लीजिए कि कोई ऐसी शक्ति है जो

1003
01:08:03,760 --> 01:08:08,080
अवतार ले सकती है। तो उसको हम फिर क्या कहेंगे? जैसे जो अवतार

1004
01:08:08,080 --> 01:08:12,160
नहीं ले पा रहा है वह भी सर्वशक्तिमान है। भैया

1005
01:08:12,160 --> 01:08:16,480
उससे बड़ा सर्वशक्तिमान हम लोग कई बातें अलंकार

1006
01:08:16,480 --> 01:08:20,480
में करते हैं ना अलंकार में करते हैं ना परमात्माकि मान लिया

1007
01:08:20,480 --> 01:08:24,640
जाए जैसा मैं मैं वो नहीं कह रहा मैं वो नहीं कह रहा मान लिया जाए मैं मान लिया

1008
01:08:24,640 --> 01:08:28,880
जाए वाली बात नहीं कर रहा कि जैसे कि अह हमने कहा

1009
01:08:28,880 --> 01:08:33,040
कि अवतरित नहीं हो सकता मगर वो सर्वशक्तिमान है। हालांकि सर्व सर्व

1010
01:08:33,040 --> 01:08:37,200
विशेषण में अवतरित बोला तो होता है अवतरित नहीं वो स्वयं से स्वयं

1011
01:08:37,200 --> 01:08:41,280
का रूप शरीर नहीं ले सकते लेते हैं वो लेते नहीं ठीक है वो आपकी

1012
01:08:41,280 --> 01:08:45,360
मान्यता है बीके की हां इसलिए फिर उसको भी दुख सुख में आना पड़ेगा फिर

1013
01:08:45,360 --> 01:08:49,440
हम सुख से क्यों मुक्त कोई करेगा नहीं तो वो तो परकाया में प्रवेश करके तब

1014
01:08:49,440 --> 01:08:53,680
भी तो दुख में आ रहे हैं दुख में नहीं जैसे आपके जैसे आपके

1015
01:08:53,680 --> 01:08:57,760
तन में कोई कई आपने देखा सूक्ष्म में भी कोई आत्माएं आ जाती है मानते हैं आप अरे आत्मा

1016
01:08:57,760 --> 01:09:01,840
है बहुत सारे कीटाणु है अभी भी वो वाली नहीं है ना

1017
01:09:01,840 --> 01:09:06,000
हां वो भूत प्रेत बाधा आ जाती है। उसमें कोई दुख सुख फर्क नहीं बॉडी

1018
01:09:06,000 --> 01:09:10,000
में कोई किसी को मारा बाद में हो रहा है। उसको पेन है तो परमात्मा अपना कुछ समय

1019
01:09:10,000 --> 01:09:14,000
के लिए आते हैं अपना कार्य कराते हैं और फिर वापस चले जाते हैं।

1020
01:09:14,000 --> 01:09:18,080
मगर जब हम ये मान रहे हैं कि वो परकाया प्रवेश में उसको दुख सुख नहीं हो रहा है तो हम ये क्यों मान रहे हैं कि

1021
01:09:18,080 --> 01:09:22,400
अवतार लेने पर उसको दुख सुख होगा। नहीं देखिए दुख क्योंकि

1022
01:09:22,400 --> 01:09:26,480
हमारी जो अपनी बॉडी होती है तो उसकी हमें संभाल भी तो करनी पड़ती

1023
01:09:26,480 --> 01:09:30,560
है। अब तो यही तो बात है ईश्वर के अवतार

1024
01:09:30,560 --> 01:09:31,680
लेने में हमारे में

1025
01:09:31,680 --> 01:09:37,680
अंतर यही है कि ईश्वर का अवतार जो सच्चिदानंद होता है जैसे अथर्ववेद में

1026
01:09:38,160 --> 01:09:42,160
श्वत शत्रु उपनिषद में बात आई कि जो ईश्वर के भागवत में भी आई है ईश्वर के जो

1027
01:09:42,160 --> 01:09:47,200
अवतार होते हैं वो सदैव 16 वर्ष की आयु वाले बने रहते हैं। अजर

1028
01:09:47,200 --> 01:09:51,520
अजरता रहती है उनमें वो कभी आपने देखा होगा राम और कृष्ण की कभी दाढ़ी मूछ

1029
01:09:51,520 --> 01:09:55,920
शास्त्रोक्त रूप से नहीं है लोग फिल्मों में दे दे वो बात अलग है क्योंकि क्योंकि

1030
01:09:55,920 --> 01:10:00,000
उनमें इतना देवत्व होता है उसमें हार्मोन डेवलप इस तरीके से तो

1031
01:10:00,000 --> 01:10:04,480
उनके तो उनके शरीर का उनका शरीर वैसा शरीर होता ही नहीं है। और देवता

1032
01:10:04,480 --> 01:10:08,720
एक जैसे मैंने कहा देवता अवतार इसलिए क्योंकि वो डिग्री है। देवता जो पढ़ाई हो

1033
01:10:08,720 --> 01:10:12,960
पढ़ाई तो कहने का मतलब है कि हम हम यह मान रहे हैं कि वो

1034
01:10:12,960 --> 01:10:17,040
अह परकाया प्रवेश करता है और वो अवतार

1035
01:10:17,040 --> 01:10:21,120
नहीं ले सकता मगर हम फिर भी उसको सर्वशक्तिमान कहते हैं। सर्व विशेषा

1036
01:10:21,120 --> 01:10:26,320
में बाधा भले ही आ रही है फिर भी हम सर्वशक्तिमान कहते हैं। और एक चीज और है कि

1037
01:10:26,320 --> 01:10:30,400
यदि कोई ऐसी एंटिटी जो अवतरित हो

1038
01:10:30,400 --> 01:10:34,720
जाए है ना? तो उसको हम क्या कहेंगे? ये विषय

1039
01:10:34,720 --> 01:10:38,880
नहीं है। वो अलग हो जाएगी। भूत प्रेत भी अपने को बहुत समझते हैं। मैं मैं यह हूं

1040
01:10:38,880 --> 01:10:42,960
वो हूं। बहुत सारे अब इसमें एक जो कई सारे कां्सप्ट कई

1041
01:10:42,960 --> 01:10:46,800
सारे कां्सप्ट क्लियर हुए। जी हां हां बस बस हो रहा है। कई सारे

1042
01:10:46,800 --> 01:10:50,960
कांसेप्ट क्लियर हुए। अच्छा बहुत जानने को मिला चीजें। अच्छा इसमें

1043
01:10:50,960 --> 01:10:55,200
अब हमने कहा एक बात ये कि कई लोग मानते हैं इसलिए हमने

1044
01:10:55,200 --> 01:10:59,280
माना है। तो हम किसी को भी किसी भी मान्यता को कई

1045
01:10:59,280 --> 01:11:03,440
लोग मानते हैं। वो एक अलग हो गया। धार्मिक धार्मिक वो मानते हैं। हां।

1046
01:11:03,440 --> 01:11:07,840
हां। प्रैक्टिकल देखिए मेरा अपना जीवन व्यक्तिगत बता दूं एक अनुभव

1047
01:11:07,840 --> 01:11:12,080
मैंने लाइफ में जो चीज प्रैक्टिकल देखी अपने मतलब आंखों से या छूते

1048
01:11:12,080 --> 01:11:16,160
हुए मन को लगी मतलब तो उसको स्वीकार करने में मुझे कोई

1049
01:11:16,160 --> 01:11:20,320
दिक्कत नहीं हुई तो ये तो ये जो प्रैक्टिकल वाली बात है इसमें दिक्कत

1050
01:11:20,320 --> 01:11:24,400
ये आती है जैसे जैसे आपने कहा कि प्रैक्टिकल आपने देखा और ये है इसलिए आप ये मान

1051
01:11:24,400 --> 01:11:28,720
रहे हो तो ऐसे कोई दूसरा व्यक्ति कहेगा कि मैंने भी प्रैक्टिकल देखा है और मैं इसलिए मान रहा हूं

1052
01:11:28,720 --> 01:11:32,880
अपनी धारणा ठीक है अब वो क्या करेगा कि मैंने प्रैक्टिकल देखा है के नाम पे कहेगा

1053
01:11:32,880 --> 01:11:36,880
कि मैं निठारी की तरह बच्चों को उबाल के खाना चाहता हूं। फिर वो देखो भैया हम

1054
01:11:36,880 --> 01:11:40,880
उसे रोके कि ना रोके? हमारा काम है समझाना। बाकी नहीं

1055
01:11:40,880 --> 01:11:44,880
मांगता है तो वो नहीं रोकेंगे कि नहीं रोकेंगे? बिल्कुल रोका तो

1056
01:11:44,880 --> 01:11:49,040
भाई मना तो तो फिर इसका मतलब प्रैक्टिकल के नाम पे किसी की बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

1057
01:11:49,040 --> 01:11:53,120
ऐसे नहीं कुछ चीज़ होती हमें भी प्रैक्टिकल देखनी पड़ती है। नहीं जैसे

1058
01:11:53,120 --> 01:11:57,280
हमारे वो नहीं अभी भी है भाई अमरनाथ अभी है बराबर

1059
01:11:57,280 --> 01:12:01,440
है आंखों से अभी भी है मौजूदा हालत में पशुमंतनाथ नेपाल

1060
01:12:01,440 --> 01:12:02,240
में मौजूदा

1061
01:12:02,240 --> 01:12:06,320
हालत में मौजूदा हालत में देखा केवल माना नहीं बल्कि मौजूद भी है चीज

1062
01:12:06,320 --> 01:12:10,880
आप मक्का मदीना मौजूद है ठीक है गुरु नानक का गुरुद्वारा

1063
01:12:10,880 --> 01:12:14,880
जो भी अमृतसर तो जैसे जो लेखराज जी आ रहे हैं जिस शरीर में

1064
01:12:14,880 --> 01:12:19,680
जैसे हम अमरनाथ लेखराज जो बाबा परमात्मा परमात्मा

1065
01:12:19,680 --> 01:12:23,920
उनके शरीर में आते थे। अब अभी अभी अभी और किसी के में आ रहे होंगे। अभी

1066
01:12:23,920 --> 01:12:28,000
तो किसी के दिन में नहीं आ रहे हैं। वो उनकी मुरलियां वही है जो चल रही हैं। हां

1067
01:12:28,000 --> 01:12:32,160
जी जो उनके द्वारा ज्ञान दिया गया तो इसको भी तो कुछ कुछ ही लोग देख

1068
01:12:32,160 --> 01:12:36,240
रहे हैं। जैसे अमरनाथ हैं जैसे आपने देखा मैंने भी देखा। है ना? और भी

1069
01:12:36,240 --> 01:12:40,640
कई जीवंत चीजें जिनको मैंने देखा आपने भी देखा। पर जो ब्रह्मा कुमारीज

1070
01:12:40,640 --> 01:12:44,720
में जो ये जो चमत्कारिक चीजें हो रही हैं इसको सब नहीं देख रहे।

1071
01:12:44,720 --> 01:12:48,800
किसी के कहने पे माना जा रहा है केवल। जिन्होंने जैसे कई जैसे अब

1072
01:12:48,800 --> 01:12:52,960
तमाम से वही वेद पुराण बहुत सारी चीजें हमने नहीं देखी किसने लिखी

1073
01:12:52,960 --> 01:12:56,960
कहते भगवान ने उचारी मान लिया हमारे हिंदुस्तान में एक चीज है हम तिथि भी

1074
01:12:56,960 --> 01:13:01,040
मानते तारीख भी मानते हम पहर भी मानते हम घड़ी भी मानते घड़ी

1075
01:13:01,040 --> 01:13:05,120
की हमको ये दिखाने की किसने जहमत की अंग्रेजों ने

1076
01:13:05,120 --> 01:13:09,200
फिर भी हम पहर पहले चलते दोनों को मानते हैं कि नहीं मानते हैं बरोबर

1077
01:13:09,200 --> 01:13:13,280
तो कुछ चीजें होती हैं कि ऐसे मानी इसलिए जाती है क्योंकि इसे लगता है

1078
01:13:13,280 --> 01:13:17,520
कुछ दिखती है कि हां भाई ये हो रहा है इसने कहा मानना पड़ रहा है कुछ

1079
01:13:17,520 --> 01:13:21,600
देखो लोकाचार की दृष्टि से तो भी अच्छा

1080
01:13:21,600 --> 01:13:25,760
चुप रहो मैं तो पहर से ही चलता था कौन सी घड़ी आई लेकिन घड़ी से हम थोड़ा कार्य

1081
01:13:25,760 --> 01:13:29,760
अच्छी तरीके से कर सकते हैं हमें हर चीज पता होती है एक घंटा 2 घंटा गाड़ी

1082
01:13:29,760 --> 01:13:34,080
कब आएगी अगर मुझसे कह दे शाम के पहर गाड़ी आएगी

1083
01:13:34,080 --> 01:13:38,160
तो मैं कब समझूं शाम के हो सकता है 4:00 से 6 7:00 बजे तक शाम में रहती

1084
01:13:38,160 --> 01:13:42,240
हो तो जब गाड़ी आई तो हमें एकदम बिल्कुल डिट्टो टाइम पता होगा 5:00 बजे

1085
01:13:42,240 --> 01:13:46,320
आएगी हम अपना कार्य सहज तरीके से कर सकते हैं तो मान्यता देखो देखो भारत में

1086
01:13:46,320 --> 01:13:50,400
दोनों चीजों की है और अपनी मत है और अपना मतांतर है। कोई कुछ मानता

1087
01:13:50,400 --> 01:13:54,480
है भैया नहीं जैसे जैसे आपने कहा कि प्रैक्टिकल जैसे हमारे शास्त्र में कहा गया कि

1088
01:13:54,480 --> 01:13:58,640
बहन से विवाह मत करो। अब इसमें व्यक्ति प्रैक्टिकल कैसे देखेगा? नहीं

1089
01:13:58,640 --> 01:14:03,680
बहन से विवाह ना करो। वर्जित है जाकर के। ठीक है। मनु

1090
01:14:03,680 --> 01:14:07,760
शत्रूपा ने भी एक बार ये कहा होगा शायद ज्ञान होगा। मैं कह रहा हूं इसका प्रैक्टिकल कैसे

1091
01:14:07,760 --> 01:14:11,840
करें? शादी करने का। उन्होंने भी मैं कह रहा हूं इसमें प्रैक्टिकल कैसे करें? जब

1092
01:14:11,840 --> 01:14:15,840
शादी है ही नहीं तो प्रैक्टिकल करेंगे क्या? अरे भाई कि मुझे इससे दुख

1093
01:14:15,840 --> 01:14:19,920
मिलेगा अगर मैं कर लूंगा तो इसमें प्रैक्टिकल क्या है भैया आज आप देख तो

1094
01:14:19,920 --> 01:14:24,000
रहे हो अखबारों में पढ़ रहे हो ना ये तो दुख मिल रहा है तो यानी

1095
01:14:24,000 --> 01:14:28,080
कि हमें किसी और के प्रैक्टिकल से मान लेना चाहिए नहीं प्रैक्टिकल क्या

1096
01:14:28,080 --> 01:14:32,240
आप करके देख लो अपना प्रैक्टिकल करके देख लो आपकी निंदा होगी तो आपको नहीं लगता

1097
01:14:32,240 --> 01:14:32,800
कि सबके

1098
01:14:32,800 --> 01:14:37,120
प्रैक्टिकल से ही वो मान लिया जाएगा अगर सबको सबके प्रैक्टिकल पे छोड़ दिया जाए

1099
01:14:37,120 --> 01:14:41,440
तो विप्लव आ जाएगा जैसे जैसे एक मिनट जैसे जैसे मैंने कहा ना कि निठारी

1100
01:14:41,440 --> 01:14:45,680
का कहना है कि मैं बच्चे कुकर में उबाल के खाऊंगा तो वह वहां से मुझे मुक्ति मिलेगी।

1101
01:14:45,680 --> 01:14:49,680
मान लीजिए तो क्या उसके प्रैक्टिकल को हम स्वीकार करेंगे या उसको रोकेंगे?

1102
01:14:49,680 --> 01:14:54,000
नहीं नहीं जिससे हमारी सामाजिक व्यवस्था बिगड़ जाए। वहां नहीं यानी कि बहन

1103
01:14:54,000 --> 01:14:58,080
यानी कि बहन भाई में विवाह को हम रोकने जाएंगे। व्यवस्था के अंतर्गत

1104
01:14:58,080 --> 01:15:02,080
मेरे पड़ोस में यदि बहन भाई का विवाह हो रहा होगा तो मैं वहां रोकूंगा। भाई गलत हो रहा है।

1105
01:15:02,080 --> 01:15:06,480
समझा सकते हम रोक जबरदस्ती नहीं कर सकते क्योंकि आज मामले की गंभीरता

1106
01:15:06,480 --> 01:15:10,640
के आधार पे करेंगे। जैसे पाकिस्तान हम पर अटैक कर रहा है तो हम वहां पे गोला

1107
01:15:10,640 --> 01:15:14,720
बारूद भी चलाएंगे। अध्यात्म का विषय चलना हमारा गोला विषय हमारे नहीं नहीं

1108
01:15:14,720 --> 01:15:18,800
वहां पे भी धर्म है दुनिया में कोई भी चीज धर्म अधर्म से बाहर है ही नहीं वो लोग हमें

1109
01:15:18,800 --> 01:15:23,040
क्यों मारना चाहते हैं कि भाई उनको चचेरी ममेरी फुफेरी बहनों से विवाह करना है हमें नहीं करना है

1110
01:15:23,040 --> 01:15:27,280
नहीं मूल में तो यही है ना नहीं नहीं कईयों की लड़ाई की भी वजह अपनी-अपनी

1111
01:15:27,280 --> 01:15:31,680
होती है जरूरी नहीं कि उनको फुफेरी बहन से शादी करने मैम मैं

1112
01:15:31,680 --> 01:15:36,400
उस मैं उसी पे आ रहा हूं थोड़ा सा भैया आप थोड़ा सा हमें समय थोड़ा सा

1113
01:15:36,400 --> 01:15:42,400
थोड़ा सा समय दे दे अच्छा बस 235

1114
01:15:42,800 --> 01:15:47,760
आपने अगर बताया होता तो मैं थोड़ा टाइम लेके आता। हां

1115
01:15:47,760 --> 01:15:51,840
देखिए कौन किस लिए लड़ाई कर रहा है धर्म के लिए अगर नहीं मैं

1116
01:15:51,840 --> 01:15:56,000
वो लड़ाई छोड़ दीजिए तो हम अपने धर्म को लड़ाई वो लड़ाई

1117
01:15:56,000 --> 01:16:00,240
छोड़ दीजिए हो सकता है किसी चीज के लिए लड़ाई कर रहा हो तो वहां पे फुफेरी नरेरी का

1118
01:16:00,240 --> 01:16:04,400
नहीं नहीं मैं वो लड़ाई लड़ाई छोड़ दीजिए मैं ये कह रहा हूं कि हम किसी भी मान्यता

1119
01:16:04,400 --> 01:16:09,040
को धर्म रूप से मैंने कहा घड़ी और पहर का जवाब दिया कुछ चीजें

1120
01:16:09,040 --> 01:16:13,040
देखी जाती है मूल क्या है? मूल क्या है? उससे सामाजिक दृष्टि

1121
01:16:13,040 --> 01:16:17,120
से वो सही है तो मान्यता है। ठीक है? कोई कई चीजें ऐसी

1122
01:16:17,120 --> 01:16:21,200
होती है नहीं नहीं मेरा कहने का मतलब यह है कि

1123
01:16:21,200 --> 01:16:25,200
जैसे हमने कहा कि देवत्व को प्राप्त हो जाएगा। ठीक है?

1124
01:16:25,200 --> 01:16:29,440
तो देवत्व को एक एक मिनट 1 मिनट। देवत्व को प्राप्त कराने

1125
01:16:29,440 --> 01:16:33,600
वाली जो नियमावली है वह धर्म है। तेरे लिए कर्तव्य कर्तव्य के विषय में शास्त्र प्रमाण

1126
01:16:33,600 --> 01:16:37,600
है। तो देवत्व को प्राप्त हो जाएगा। उसके लिए जो प्रोसेस बताई गई

1127
01:16:37,600 --> 01:16:41,600
है वो धर्म है। अब हमने कहा कि मुसलमान भी धर्म है।

1128
01:16:41,600 --> 01:16:45,680
आपके ही अनुसार बता रहा हूं। फिलहाल इस्लाम धर्म इस्लाम भी धर्म है। ठीक है।

1129
01:16:45,680 --> 01:16:49,760
इस्लाम भी धर्म है और क्रिश्चियनिटी भी धर्म है और जो है आप बुद्ध

1130
01:16:49,760 --> 01:16:53,920
को भी धर्म कह रही हैं। अब इसमें दिक्कत ये है कह नहीं रही। बुद्ध क्या धर्म आप नहीं मानती?

1131
01:16:53,920 --> 01:16:58,160
मैं मैं पूछ मैं एक मिनट मेरा मेरा प्रश्न है। उसमें यह है कि क्या

1132
01:16:58,160 --> 01:17:02,560
इस्लाम ये मान रहा है कि 5000 वाली जो आपका जो देवत्व

1133
01:17:02,560 --> 01:17:06,720
प्राप्त होने वाली जो क्वालिटी है वह मिलेगा। उसको उसकी चीजों को मानने

1134
01:17:06,720 --> 01:17:10,960
से मतलब धर्म का मतलब क्या है? धर्म का मतलब है महाभारत

1135
01:17:10,960 --> 01:17:14,960
में आया है कि धर्म का मतलब है वह विधि जिससे मोक्ष प्राप्त

1136
01:17:14,960 --> 01:17:19,120
हो। अब मान लीजिए आपका वाला मोक्ष आपका वाला मोक्ष। एक और जगह मैं

1137
01:17:19,120 --> 01:17:23,280
आपको धर्म का मतलब है धारण। हां। जो चीज नहीं धारणा नहीं

1138
01:17:23,280 --> 01:17:27,280
धारण जिसको धारण किया जाए। यहां पर आप धारण किया

1139
01:17:27,280 --> 01:17:31,600
सब 60 में बताया। धारण मतलब धारण करना जो कुछ उसमें कहा गया अपने जीवन

1140
01:17:31,600 --> 01:17:35,680
में धारण धारण करना। ठीक है मैं अन्य चीजों

1141
01:17:35,680 --> 01:17:39,760
की व्याख्या नहीं धर्म के बारे में इतना सिंपल सी बात तो तो बात यह है अगर

1142
01:17:39,760 --> 01:17:43,840
अपने जैसे किसी को किसी ने चोरी करना अपने में उतार लिया तो क्या इसको धर्म

1143
01:17:43,840 --> 01:17:48,080
कहेंगे नहीं वो उसकी धर्म धारणा वाला धर्म कौन सा है जिसको

1144
01:17:48,080 --> 01:17:52,080
हम चोरी करने से हमको मिलेगा दुख तो चोरी करने से दुख मिलेगा

1145
01:17:52,080 --> 01:17:56,560
इसलिए हमें चोरी करना छोड़ना पड़ेगा तो धारणा के अंतर्गत

1146
01:17:56,560 --> 01:18:00,960
जो चीज की जाती है वो धारणा की वो तो वो तो फिर वो

1147
01:18:00,960 --> 01:18:04,960
वो धर्म डिसाइड कहां से हो रहा है कर्म वो वो उसका जो कर्म कर रहा

1148
01:18:04,960 --> 01:18:09,360
है वो एक अलग चीज है। नहीं नहीं मैं पूछ रहा हूं मैं पूछ रहा हूं जैसे मुसलमानों

1149
01:18:09,360 --> 01:18:13,280
की धारणाएं कुछ और हैं और हमारी धारणाएं कुछ और हैं। का अपना

1150
01:18:13,280 --> 01:18:17,360
धर्म है वो अपने धर्म के बारे में जाने उन्होंने लिखा तो वो

1151
01:18:17,360 --> 01:18:21,440
सब तो फिर आप उसे धर्म क्यों मान रही हो? माना नहीं मैंने। आपने

1152
01:18:21,440 --> 01:18:25,440
कहा ना जो अलग-अलग धर्मों में ये बात है इसलिए हमने ले ली। मैंने नहीं कहा धर्म

1153
01:18:25,440 --> 01:18:29,600
नहीं। मैंने कहा वो भी निराकार ईश्वर को मानते हैं। तो उनको

1154
01:18:29,600 --> 01:18:33,760
हमने धर्म क्यों माना? जो कट्टर विरोधी हैं सनातन के

1155
01:18:33,760 --> 01:18:37,760
वो भी हमारे निराकार परमात्मा जिसके बारे में एक वर्णन है

1156
01:18:37,760 --> 01:18:42,320
कि बिन पग चले सुने कर बिन कर्म करे विधि

1157
01:18:42,320 --> 01:18:46,320
रहित सकल रस भोगी बिन वाणी वक्ता ऐसा कितनी देर

1158
01:18:46,320 --> 01:18:50,320
की है क्लास को भी तो एक घंटे में आ जाए क्या दोबारा उस

1159
01:18:50,320 --> 01:18:54,320
निरा उस निरा सुनिए मैं आपको बता दे उस निराकार

1160
01:18:54,320 --> 01:18:58,640
को भी उन्होंने माना है मैं ये कह हम लोग अभी टाइम हो गया आपका

1161
01:18:58,640 --> 01:19:02,640
छोड़िए अभी अभी छोड़ दिए उसकी बात सुनिए टाइम कि अपनी धारणा

1162
01:19:02,640 --> 01:19:06,640
है और मैं किसी भी धर्म को गलत कभी नहीं कह रहा मैं ये

1163
01:19:06,640 --> 01:19:10,880
नहीं कह रहा वो क्या कर रहे हैं क्या नहीं कर रहे हैं मैं ये नहीं कह रहा धर्म हम किसे

1164
01:19:10,880 --> 01:19:14,880
कहते हैं ये क्लियर नहीं है जो हमें सदमार्ग पे

1165
01:19:14,880 --> 01:19:19,680
चलाए ठीक है उसे ही और सदमार्ग क्या है सदमार्ग

1166
01:19:19,680 --> 01:19:23,680
आप खुद पढ़े हुए हैं आपकी गीता भी है रामायण भी

1167
01:19:23,680 --> 01:19:27,680
है वेद है शास्त्र उसमें बड़ी अच्छी उसके विपरीत

1168
01:19:27,680 --> 01:19:28,320
उसके विपरीत

1169
01:19:28,320 --> 01:19:32,320
है इस्लाम देखिए भैया मैंने कहा था सुनिए जैसे

1170
01:19:32,320 --> 01:19:36,480
अगर अगर गीता में सन्मार्ग है क्यों ले रहे हो मैं अपने धर्म की बात कर तो नहीं

1171
01:19:36,480 --> 01:19:40,960
आपने आपने आप बात कही है बाकी वो हमारे

1172
01:19:40,960 --> 01:19:44,960
आपने उनको आधार बनाया ना ये मानने का कि अवतार नहीं लेता है ईश्वर ये पूछ

1173
01:19:44,960 --> 01:19:48,960
रहा हूं मेरी बात को समझ पाए कहने का मतलब

1174
01:19:48,960 --> 01:19:53,600
सब कितना भी कोई कट्टरी हो कितना भी कोई धारणाओं पर कितना भी व्यभचारी

1175
01:19:53,600 --> 01:19:58,080
दुराचारी हो फिर भी उनके भी जो बड़े रहे होंगे श्रेष्ठ रहे होंगे

1176
01:19:58,080 --> 01:20:02,400
अब की मान्यताओं को नहीं कह रहे थोड़ा अब तो बहुत मतलब अंतर आ उन्होंने

1177
01:20:02,400 --> 01:20:06,400
भी उस निराकार को कर लिया अवधारणाएं मतलब

1178
01:20:06,400 --> 01:20:10,400
उनमें लिखा गया हिंसा करना कोई बुरा उन्होंने निराकार को स्वीकार किया ये

1179
01:20:10,400 --> 01:20:14,640
हम जानते हैं ये हम कैसे जानते हैं जो अभी उनके परमात्मा

1180
01:20:14,640 --> 01:20:18,640
को स्वीकार करना अलग बात में बता रहे मैं वो नहीं कह रहा था नारायणणा को आपने कहा

1181
01:20:18,640 --> 01:20:22,720
कि वो क्योंकि उन्होंने निराकार को स्वीकार किया था अभी वह अंतर आ गया है

1182
01:20:22,720 --> 01:20:26,960
तो उन्होंने निराकार को स्वीकार किया था ये अभी वालों से ही पता चला उसकी बात को उसने

1183
01:20:26,960 --> 01:20:31,120
स्वीकार नहीं कर किया उन्होंने मैं यह कह रहा हूं उन्होंने निराकार को स्वीकार स्वीकार

1184
01:20:31,120 --> 01:20:35,200
किया था या नहीं किया था। यह जो अभी वाले लोग हैं उनसे ही हमें पता चला। उन्होंने

1185
01:20:35,200 --> 01:20:39,360
क्या किया था हमें नहीं पता। उनके जो अभी वाले लोग हैं उन वही हमें बता रहे हैं कि हमारे

1186
01:20:39,360 --> 01:20:43,760
लोगों ने यह कहा है। तो जब यही हमें यह बता रहे हैं कि उन्होंने निराकार को स्वीकार किया।

1187
01:20:43,760 --> 01:20:48,000
यही हमें यह बता रहे हैं कि उन्होंने वेद विरोधी चीजें कही तो फिर हम उसको धर्म कैसे

1188
01:20:48,000 --> 01:20:52,080
अगर वेद अगर वेद गीता धर्म है आपने कहा कि धर्म आप जानते हो क्या है? तो अगर

1189
01:20:52,080 --> 01:20:56,080
वेद गीता धर्म है तो वेद गीता के विरोध में बहुत सारी चीजें हैं। अब हम कह रहे हैं कि

1190
01:20:56,080 --> 01:21:00,240
जिनसे हमको ये पता चला है कि कहते हैं वो क्यों विरोध कर रहे हैं? या कोई विरोध किया

1191
01:21:00,240 --> 01:21:04,240
निजी स्वार्थ जब आता है तो व्यक्ति विरोध करता है। किसी को मांस मदिरा खाना

1192
01:21:04,240 --> 01:21:08,400
आप अगर मना कर रहे हो तो आपका विरोध करेगा। जबकि उसे भी पता है कि यह गलत है।

1193
01:21:08,400 --> 01:21:12,400
तो फिर भी कर रहे हैं। बात यह है कि उन्होंने एग्जैक्ट कहा क्या है ये तो हमें इनसे ही

1194
01:21:12,400 --> 01:21:16,480
पता चल रहा है ना जो अभी के लोग हैं। किसी चीज का विरोध कर रहे हैं तो वो उनकी

1195
01:21:16,480 --> 01:21:20,560
अपनी निजी धारणा हो गई। अब नहीं नहीं बात ये हो रही थी कि धर्म है कि नहीं

1196
01:21:20,560 --> 01:21:24,640
उनके द्वारा बताई गई बातें। देखिए उनके द्वारा उनका धर्म जाने मैं सीधी

1197
01:21:24,640 --> 01:21:28,720
सी बात कह तो यह कह दे ना कि हमें नहीं पता तो फिर हम उनके आधार पे ये क्यों नहीं चेक कर

1198
01:21:28,720 --> 01:21:32,720
यह क्यों कह रहे हैं कि सर ईश्वर अवतार नहीं मैं उनके उनकी किसी

1199
01:21:32,720 --> 01:21:36,960
भी बात को मैं ये उनको गलत भी नहीं कह सकती हूं और पीछे

1200
01:21:36,960 --> 01:21:40,960
भी किसी धर्म को नहीं तो आप मौन मौन रह जाइए ना वहां फिर आप ये क्यों कह रहे हैं

1201
01:21:40,960 --> 01:21:44,960
कि वो जो है अवतार को नहीं मानते इसलिए हम भी नहीं मान रहे अवतार की बात वो नहीं

1202
01:21:44,960 --> 01:21:49,280
मानते नहीं वो निराकार को मानते इसलिए हम निराकार को मानते हो मैंने पूछा कि जो वो नहीं मानते

1203
01:21:49,280 --> 01:21:53,840
सब लोगों में इक्वल नहीं होगी वो हम नहीं मानेंगे हमारा मतलब था कि संसार

1204
01:21:53,840 --> 01:21:58,080
का कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो परमात्मा

1205
01:21:58,080 --> 01:21:59,760
को उस निराकार

1206
01:21:59,760 --> 01:22:03,760
में ना मानता हो। धारणा कई लोग हैं जैसे आपने अभी बुद्ध की

1207
01:22:03,760 --> 01:22:08,880
बात की। बुद्ध की बात की। हां।

1208
01:22:08,880 --> 01:22:12,880
रही उसकी वो भी कहीं ना कहीं जैसे आपने बुद्ध की बात की ना। बुद्ध

1209
01:22:12,880 --> 01:22:16,880
ने तो ईश्वर को ही नहीं माना। नास्तिक नहीं ईश्वर नहीं माना। लेकिन कहीं ना कहीं

1210
01:22:16,880 --> 01:22:21,040
प्रकाश को तो माना। नहीं माना। शून्य माना। उन्होंने कुछ नहीं माना। जरा चित्र

1211
01:22:21,040 --> 01:22:25,040
दिखाते हैं आपको जी जरा दिखाना चित्र हां वो प्रकाश

1212
01:22:25,040 --> 01:22:29,120
स्वरूप देखो है यहां पर नहीं दिखा कई चित्र है वो परमेश्वर नहीं है ना

1213
01:22:29,120 --> 01:22:33,120
सुनिए उन्होंने कहा कि कोई भी मुक्त है ही नहीं परम मुक्त मैंने

1214
01:22:33,120 --> 01:22:37,120
कहा ना प्रकाश को मानो तो है जैसे आपके यहां पर परमेश्वर परम

1215
01:22:37,120 --> 01:22:41,200
मुक्त है ना वो कह रहे हैं परमेश्वर है ही नहीं मुक्त परम मुक्त वाला लेकिन

1216
01:22:41,200 --> 01:22:45,200
प्रकाश को उन्होंने भी आप जापान में उनके ही धर्म का मान्यता है

1217
01:22:45,200 --> 01:22:49,440
हां हां ज्यादातर तो वो भी एक देखिए ऐसा है मैंने ये प्रश्न किया क्यों

1218
01:22:49,440 --> 01:22:53,600
मैं आपको क्लियर कर दूं बस क्लियर हो जाएगा मैं अरे दीदी

1219
01:22:53,600 --> 01:22:57,680
सुनिए तो दीदी सुनिए तो क्लियर हो जाएगा एंडिंग कर दें ऐसा है

1220
01:22:57,680 --> 01:23:02,400
मैंने ये प्रश्न इसलिए किया क्योंकि धर्म का मतलब है कि वो व्यवस्थाएं

1221
01:23:02,400 --> 01:23:06,480
वो नियमावली जो हमें हमारे द्वारा मान्यता वाला

1222
01:23:06,480 --> 01:23:10,720
मोक्ष दिलाए जैसे आपकी मान्यता है कि वो वो देवत्व की प्राप्ति हमारी मान्यता

1223
01:23:10,720 --> 01:23:14,800
है कि कैवल्य मोक्ष आवागमन बंद ठीक है तो जो इस कैवल्य

1224
01:23:14,800 --> 01:23:18,880
की प्राप्ति कराएगा वो धर्म है अब जहां पर ये कैवल्य की प्राप्ति नहीं करा रहे हैं वो खुद

1225
01:23:18,880 --> 01:23:22,960
कह रहे कैवल्य की प्राप्ति नहीं या फिर जहां पे वो खुद कह रहे हैं कि हमारी द्वारा की गई बातों

1226
01:23:22,960 --> 01:23:27,200
से यह दैवत्व की प्राप्ति नहीं है। वो खुद कह रहे हैं। तो फिर उनके द्वारा चीजों

1227
01:23:27,200 --> 01:23:31,440
को जो बताई गई हैं उनको धर्म नहीं कह सकते। एक मिनट जब धर्म नहीं कह सकते

1228
01:23:31,440 --> 01:23:35,760
तो फिर हम जिसको हम सही नहीं मान रहे क्योंकि वो सही है नहीं। हमारी

1229
01:23:35,760 --> 01:23:39,760
मान्यता ये है और वो लोग ये कह रहे हैं उल्टा कह रहे हैं। तो जब वो लोग धर्म नहीं जब उनका

1230
01:23:39,760 --> 01:23:43,760
वो धर्म सिद्धि नहीं हो रही वहां पे तो हम उसको प्रमाण नहीं ले सकते। अगर हम ऐसे ही

1231
01:23:43,760 --> 01:23:47,760
किसी का भी प्रमाण ले लें तो फिर आईएस आईएस वाले भी कुछ ऐसी चीजें करेंगे उनका भी

1232
01:23:47,760 --> 01:23:51,840
हमें प्रमाण लेना पड़ेगा क्योंकि दुनिया में बहुत लोग हैं। दुनिया में नास्तिक

1233
01:23:51,840 --> 01:23:55,840
है बुद्ध है। बुद्ध उन्होंने कहा परमेश्वर है ही नहीं। आपको ये करोगे तो ये

1234
01:23:55,840 --> 01:23:59,920
मिलेगा केवल कर्म की फिलोसफी रही धारणाओं की वर्तमान

1235
01:23:59,920 --> 01:24:04,000
जीवन में अच्छा कुछ और इंटरेस्टिंग चीजें हैं जो ब्रह्माकुमारी से रिलेटेड

1236
01:24:04,000 --> 01:24:08,240
है। वन सेकंड बस वन सेकंड जैसे अब दीदी का निर्णय

1237
01:24:08,240 --> 01:24:12,320
होगा तो कहेंगी तो स्टॉप होगा नहीं तो चलता रहेगा। चार चार उसमें

1238
01:24:12,320 --> 01:24:16,800
है ना हमारा कहते हैं पहले ब्रह्मचर फिर होता है गृहस्थ

1239
01:24:16,800 --> 01:24:20,800
हां जी हां जी फिर होता है सन्यास फिर होता है वारदस्थ अब आप

1240
01:24:20,800 --> 01:24:25,200
हमें जैसे कई लोग हमसे सवाल उठते हैं कि आप लोग तो है ना

1241
01:24:25,200 --> 01:24:29,200
ऐसे ही आपने कोई चीज अपनाई नहीं आपको भगवान सूली पे कई बार

1242
01:24:29,200 --> 01:24:29,920
हमको सामने

1243
01:24:29,920 --> 01:24:34,080
बोलते हैं सूली पे लटका देगा आपने कोई आश्रम का नियम का पालन नहीं

1244
01:24:34,080 --> 01:24:38,240
किया मैं सिर्फ इतना कहूं अगर धर्म की बात चल रही है ना ये भी

1245
01:24:38,240 --> 01:24:42,320
तो लिखा है ना चार आश्रमों को पार करके ही मुक्ति मुक्ति मिल जाएगी जो भी हो जो भी

1246
01:24:42,320 --> 01:24:46,480
उनकी सोच हो सनातन में ठीक है हमारे सनातन में लेकिन क्या कोई

1247
01:24:46,480 --> 01:24:50,640
व्यक्ति इन चारों पहली बात किसी की सीमा नहीं रही मृत्यु की कब

1248
01:24:50,640 --> 01:24:55,200
कौन मर जाए क्या चारों चीजें कोई पालन कर रहा है अगर कर रहा हो

1249
01:24:55,200 --> 01:24:59,360
हजार लोग तो भी मैं मान लूंगी शायद मुश्किल में दो चार 10

1250
01:24:59,360 --> 01:25:03,440
लोग जो जीवित रहे तो माना भी जा सकता क्या ये तो वो

1251
01:25:03,440 --> 01:25:07,520
वाली बात है कि जैसे कि हमने बरसात से बचने के लिए अगर मान लीजिए

1252
01:25:07,520 --> 01:25:11,520
एक मिनट कंडीशन ही बदल गई है नहीं तो वही मैं कह रहा

1253
01:25:11,520 --> 01:25:15,680
हूं। वही मैं कह रहा हूं कि हम बरसात से बचने के लिए एक एक

1254
01:25:15,680 --> 01:25:19,760
मिनट हमने बरसात से बचने के लिए एक बालकनी के नीचे अगर खड़े हो गए तो हमने उसको अपना घर

1255
01:25:19,760 --> 01:25:23,760
मान लिया। यानी कि आज की परिस्थितियों में हम पालन नहीं कर पा रहे। इसका

1256
01:25:23,760 --> 01:25:27,920
मतलब ये थोड़ी ना धर्म गलत हो गया। मोक्ष तो गलत नहीं है। इसका मतलब ये है

1257
01:25:27,920 --> 01:25:32,000
मोक्ष तो वही नियमावली दिलाएगी जो हम जिसको

1258
01:25:32,000 --> 01:25:36,080
मान रहे हैं। हम कर पा रहे हैं कि नहीं कर पा रहे वो तो एक अलग मैटर है। मगर मोक्ष तो

1259
01:25:36,080 --> 01:25:40,160
वही दिलाएगा जैसे हमारी मान्यता है कि वेद ही दिलाएगा। नाना पंथिया

1260
01:25:40,160 --> 01:25:44,240
अरे इनकी अपनी मान्यता है उसमें डिबेट करने की कोई आवश्यकता नहीं अपने

1261
01:25:44,240 --> 01:25:44,960
मानने पर हम

1262
01:25:44,960 --> 01:25:49,760
जबरदस्ती ब्रह्मा कुमारी किसी को मनवा नहीं सकते इस ज्ञान को और जब

1263
01:25:49,760 --> 01:25:53,840
तुमको भी नहीं भाई इस्लाम को किसी को मनवा सकते और रही

1264
01:25:53,840 --> 01:25:58,480
अगर धर्म के अनुसार कोई चलता हो मुझे नहीं लगता कितने परसेंट लोग चलते हैं वो

1265
01:25:58,480 --> 01:26:02,480
अब ये जैसे आपने ना लगता वाली बात कही जैसे आपने कहा मैंने प्रैक्टिकल

1266
01:26:02,480 --> 01:26:06,560
किया है सुनिए तो क्योंकि मुझे मुझे लोग जब कहते हैं ना सनातन के

1267
01:26:06,560 --> 01:26:10,560
ही लोग कहते हैं कि आपने पूरे पूरे नियम नहीं किए हैं कि

1268
01:26:10,560 --> 01:26:14,560
चारों आश्रम पार नहीं किए आपको सूली पे भगवान लटका देगा। ठीक है?

1269
01:26:14,560 --> 01:26:18,640
हम कोई जवाब नहीं देते क्योंकि मुझे सत्य पता है एक ब्रह्मचर्य में

1270
01:26:18,640 --> 01:26:22,640
मैंने चारों आश्रम संभाल लिए हैं और जो लोग कहते हैं क्या

1271
01:26:22,640 --> 01:26:26,640
वो पालन कर रहे हैं सवाल उठता है ये वहां पे मिलता

1272
01:26:26,640 --> 01:26:30,880
है ना। नहीं तो इसमें ये वाली बात है जैसे अभी जैसे

1273
01:26:30,880 --> 01:26:34,960
जैसे अभी आपने ये वाली बात कही कि मैंने प्रैक्टिकल किया है तो ऐसे कोई आके कह दे

1274
01:26:34,960 --> 01:26:39,040
कि नहीं सुनिए आप देख रहे हैं सुनिए तो तो जैसे आपको

1275
01:26:39,040 --> 01:26:43,040
जो लगता है जैसे आपको लगता है कि सब लोग गलत है नहीं कर रहे पालन

1276
01:26:43,040 --> 01:26:47,040
पालन नहीं कर रहे पालन नहीं कर रहे पालन पालन

1277
01:26:47,040 --> 01:26:51,280
नहीं कर रहे मतलब ये थोड़ी ना कि व्यक्ति गलत है यार और क्या हमने आप किस

1278
01:26:51,280 --> 01:26:55,280
जो जो अच्छा सच बोलना चाहिए इसका पालन नहीं किया तो झूठ हो

1279
01:26:55,280 --> 01:26:59,280
गया ना हम नहीं नहीं बात चलिए ठीक

1280
01:26:59,280 --> 01:27:00,080
है बंद करो

1281
01:27:00,080 --> 01:27:04,160
ठीक है बंद कर वो नहीं है हम किसी कल कर ले बंद करो मान लीजिए

1282
01:27:04,160 --> 01:27:08,240
आप हमारी बात नहीं मान ले तो इसका मतलब आप गलत नहीं हो हम

1283
01:27:08,240 --> 01:27:12,480
आपको गलत नहीं कहने का हमें राइट नहीं है वो अपनी सोच है अरे

1284
01:27:12,480 --> 01:27:16,640
दीदी दीदी अगर मेरे बगल में कोई गलत कार्य हो रहा होगा

1285
01:27:16,640 --> 01:27:20,640
तो मैं वहां रोकूंगा उसको गलत होने से अभी बाहर में आ रहा था वो

1286
01:27:20,640 --> 01:27:24,800
भगदड़ हो रही थी लड़ाई हो रही थी हम लोग उसको रोकते कि नहीं रोकते कोई कार में पत्थर मारेगा

1287
01:27:24,800 --> 01:27:29,360
तो नहीं हां रोकना अलग अलग बात है लेकिन वो परिस्थिति वश रोकना

1288
01:27:29,360 --> 01:27:33,600
परिस्थिति वश नहीं जब जो गलत है वो गलत है उसमें हम ऐसी

1289
01:27:33,600 --> 01:27:38,000
डिप्लोमेटिक बात कैसे कर सकते हैं नहीं मान लो मेरे सामने कोई किसी कन्या के साथ गलत दुष्कर्म

1290
01:27:38,000 --> 01:27:42,000
कर रहा है तो वहां ये कहूं मैं नहीं हो सकता इसको गलत कहने वाला बिल्कुल रोकना वहां पर

1291
01:27:42,000 --> 01:27:46,000
पड़ेगा लेकिन हर बात में जो है छोटी-छोटी बात हर बात में नहीं कह रहा हूं हर

1292
01:27:46,000 --> 01:27:50,000
बात में नहीं हर बात में नहीं कह रहा हूं मूल में किसी भी

1293
01:27:50,000 --> 01:27:54,080
कार्य के लिए करने में मूल में धर्म है अब वो बात अलग है कि

1294
01:27:54,080 --> 01:27:58,320
धर्म का अनुकरण ना कर पाना और धर्म का अनुकरण

1295
01:27:58,320 --> 01:28:02,400
ना कर पाने में मेरी व्यवस्था होनी चाहिए। चैन नहीं चयन पूर्वक धर्म

1296
01:28:02,400 --> 01:28:06,880
का अनुकरण त्याग नहीं करना चाहिए और व्यवस्था में अगर हो गया तो उसका पश्चाताप

1297
01:28:06,880 --> 01:28:11,280
नहीं करना चाहिए। देखिए वो आपातकालीन मर्यादा नष्ट कहा गया

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01:28:11,280 --> 01:28:15,360
कब कैसी परिस्थितियां बन जाए आपको डांटना भी पड़ेगा

1299
01:28:15,360 --> 01:28:19,760
और कहीं पर मुंह बर भी रहना पड़ता है। कहते हैं ना पड़ोसी के घर में बेवजह

1300
01:28:19,760 --> 01:28:23,760
कूदेंगे से आप लीजिए ना परमिशन ठीक है।
