1
00:00:01,960 --> 00:00:06,880
[संगीत] गोविंद जय जय गोपाल

2
00:00:06,880 --> 00:00:11,520
जय जय गोविंद

3
00:00:11,520 --> 00:00:15,920
जय जय गोपाल जय जय जय

4
00:00:15,920 --> 00:00:20,000
गोविंद जय जय गोपाल जय

5
00:00:20,000 --> 00:00:24,000
जय गोविंद जय जय

6
00:00:24,000 --> 00:00:28,080
जय जय गोपाल जय जय राधा

7
00:00:28,080 --> 00:00:32,880
रमण हरि हरि गोविंद जय जय

8
00:00:32,880 --> 00:00:37,040
राधा राधा रमण रमण जय

9
00:00:37,040 --> 00:00:41,360
जय जय जय गोविंद जय

10
00:00:41,360 --> 00:00:46,480
जय गोपाल जय जय गोविंद

11
00:00:46,480 --> 00:00:50,640
जय जय जय गोपाल जय जय

12
00:00:50,640 --> 00:00:54,720
गोविंद जय जय गोपाल जय

13
00:00:54,720 --> 00:00:58,880
जय गोविंद जय जय जय

14
00:00:58,880 --> 00:01:03,600
जय गोपाल जय जय राधा रमण

15
00:01:03,600 --> 00:01:08,480
हरि गोविंद जय जय राधा

16
00:01:08,480 --> 00:01:13,040
राधा रमण हरि गोविंद जय जय

17
00:01:13,040 --> 00:01:18,880
गोविंद जय जय गोपाल जय जय

18
00:01:18,880 --> 00:01:23,120
गोविंद जय जय [संगीत] जय

19
00:01:23,120 --> 00:01:27,920
जय जय जय जय प्रभु दीन दयाल

20
00:01:27,920 --> 00:01:32,000
हरे हरे जय जय जय

21
00:01:32,000 --> 00:01:36,240
प्रभु दी

22
00:01:36,240 --> 00:01:40,240
जय जय प्रभु दीन दयाल

23
00:01:40,240 --> 00:01:44,800
हरे जय जय प्रभु

24
00:01:44,800 --> 00:01:49,200
प्रभु दयाल हरे गोविंद

25
00:01:49,200 --> 00:01:54,080
हरे गोपाल हरे

26
00:01:54,080 --> 00:01:58,880
गोविंद हरे गोपाल हरे हरे

27
00:01:58,880 --> 00:02:04,880
जय जय प्रभु दीन दयाल हरे

28
00:02:04,880 --> 00:02:08,720
जय जय

29
00:02:08,720 --> 00:02:13,440
हरे जय जय प्रभु दीन दयाल

30
00:02:13,440 --> 00:02:17,840
हरे जय जय जय प्रभु

31
00:02:17,840 --> 00:02:22,080
प्रभु दीन दयाल हरे हरे अच्छा ये बताइए

32
00:02:22,080 --> 00:02:26,240
रघुपति राघव राजा राम जो शुद्ध वाला है गीत

33
00:02:26,240 --> 00:02:30,400
वो किसको सबको आता है ना? जी

34
00:02:30,400 --> 00:02:34,640
हां ठीक है तो वो कर लेते हैं। उसके बाद हम लोग कक्षा अध्ययन प्रारंभ

35
00:02:34,640 --> 00:02:37,680
करेंगे। है ना?

36
00:02:37,680 --> 00:02:42,160
ठीक है ना? जी भैया रघुपति

37
00:02:42,160 --> 00:02:47,200
राघव राजा

38
00:02:47,200 --> 00:02:51,360
मैं मैं एक बार कर लूंगा तब आप उसे रिसेट

39
00:02:51,360 --> 00:02:57,040
करिएगा तो थोड़ा सा मैनेज लगेगा सुनने में ना।

40
00:02:57,040 --> 00:03:02,000
रघुपति राघव राजा राम

41
00:03:02,000 --> 00:03:07,680
पतित पावन सीताराम

42
00:03:07,680 --> 00:03:10,720
रघुवर

43
00:03:10,720 --> 00:03:15,760
राजा राम पतित पावन

44
00:03:15,760 --> 00:03:20,640
सीताराम राम रघुपति

45
00:03:20,640 --> 00:03:25,520
राघव राजा राम पतित

46
00:03:25,520 --> 00:03:29,840
पावन सीताराम

47
00:03:29,840 --> 00:03:34,160
रघु रघुपति राधा राजा

48
00:03:34,160 --> 00:03:40,160
राम पतित पावन सीताराम

49
00:03:44,800 --> 00:03:50,480
भज प्यारे मन सीताराम

50
00:03:50,480 --> 00:03:56,480
सीताराम

51
00:03:57,040 --> 00:04:01,840
प्यारे सी रघुपति

52
00:04:01,840 --> 00:04:06,640
राघव राजा राम पतित

53
00:04:06,640 --> 00:04:10,560
पावन सीताराम

54
00:04:10,560 --> 00:04:14,240
रघुपति

55
00:04:14,240 --> 00:04:19,680
राजा राम पतित पावन

56
00:04:19,680 --> 00:04:24,560
सीताराम सुंदर विग्रह मेघा

57
00:04:24,560 --> 00:04:29,360
श्याम गंगा तुलसी शाल

58
00:04:29,360 --> 00:04:31,520
ग्राम

59
00:04:31,520 --> 00:04:36,880
सुंदर

60
00:04:36,880 --> 00:04:42,080
गंगा तुलसी

61
00:04:42,080 --> 00:04:45,920
गिरी सीताराम

62
00:04:45,920 --> 00:04:51,280
भगत जन प्रिया सीताराम

63
00:04:51,280 --> 00:04:57,200
भक्तग गिरीश्वर सीताराम

64
00:04:57,200 --> 00:05:02,480
भगत जन प्रिय सीताराम जानकी

65
00:05:02,480 --> 00:05:06,080
रमणा सीताराम

66
00:05:06,080 --> 00:05:11,200
जय जय राघव सीताराम

67
00:05:11,200 --> 00:05:17,120
जय जानकी रमणा सीताराम

68
00:05:17,120 --> 00:05:21,600
जय जय राघव सीताराम

69
00:05:21,600 --> 00:05:26,400
रघुपति राघव राजा राम

70
00:05:26,400 --> 00:05:32,000
पतित पावन सीताराम

71
00:05:32,000 --> 00:05:37,520
रघुपति राधा

72
00:05:37,520 --> 00:05:42,560
रघुपतिना

73
00:05:42,560 --> 00:05:46,960
पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र की जय जय जय

74
00:05:46,960 --> 00:05:51,440
पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण चन् की जय

75
00:05:51,440 --> 00:05:55,520
पंच परमेश्वर ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती और गणेश की

76
00:05:55,520 --> 00:06:00,320
जय भगवत आदि शंकराचार्य भगवान की

77
00:06:00,320 --> 00:06:04,560
जय धर्म सम्राट परम पूज्य गुरुदेव

78
00:06:04,560 --> 00:06:09,040
करपात्री जी महाराज की जय श्रीमद्

79
00:06:09,040 --> 00:06:14,160
जगतुगुरु शंकराचार्य पुरी पीठाधीश्वर गुरुदेव भगवान की जय

80
00:06:14,160 --> 00:06:18,400
जय ठीक है तो प्रारंभ

81
00:06:18,400 --> 00:06:24,400
करते हैं।

82
00:06:26,560 --> 00:06:31,280
नर देह वंदना प्रारंभ करनी है हमें शायद।

83
00:06:31,280 --> 00:06:37,280
है ना? और एक स्विच हो गया था कि जो

84
00:06:37,680 --> 00:06:41,840
मूर्ख के लक्षण हैं जो हमको इधर पढ़ने थे। हमने आगे वाले चैप्टर के पढ़

85
00:06:41,840 --> 00:06:46,000
लिए हैं और जब क्रमानुसार वह दोबारा आएगा तो हम यह

86
00:06:46,000 --> 00:06:50,240
जो छूट गया था यहां पर जो मूर्ख की बात हुई है वो हम वहां पर पढ़ लेंगे।

87
00:06:50,240 --> 00:06:54,240
ठीक है ना? और नरदेव वंदना रह गया था हमारा जो

88
00:06:54,240 --> 00:06:59,600
वंदना का क्रम चल रहा था उसमें

89
00:06:59,600 --> 00:07:03,920
यही दसवां समास है। इसके बाद जो है दूसरा दशक पहला समास प्रारंभ

90
00:07:03,920 --> 00:07:08,000
होगा। उसमें मूर्ख के लक्षण अगला चैप्टर होगा। तो वह हम ना पढ़

91
00:07:08,000 --> 00:07:12,800
के और जो है मूर्ख की जो इधर बात की गई है उसको हम पढ़ लेंगे।

92
00:07:12,800 --> 00:07:16,800
नरदेह वंदना नरदेह

93
00:07:16,800 --> 00:07:21,680
वंदना प्रारंभ करने से पहले मैं एक बात रखना चाहूंगा कि

94
00:07:21,680 --> 00:07:25,840
एक वक्तव्य हमें प्राप्त है। पूज्य ब्रह्मलीन

95
00:07:25,840 --> 00:07:29,920
स्वामी श्री स्वरूपानंद जी महाराज का वक्तव्य है। उसमें वह

96
00:07:29,920 --> 00:07:34,560
अपनी शैली में बड़ी विनम्रता से और बहुत धीरेधीरे

97
00:07:34,560 --> 00:07:38,720
करके आपको मुख्य जो उनका उद्देश्य

98
00:07:38,720 --> 00:07:42,800
होता है अपने वक्तव्य में वहां पर श्रोता को ले आते हैं और

99
00:07:42,800 --> 00:07:47,280
उन्होंने बड़ा मर्म के साथ वहां पर बताया है कि किस प्रकार 84

100
00:07:47,280 --> 00:07:51,360
लाख योनियों में भटकता भटकता जीव कुंडी खटखटाता

101
00:07:51,360 --> 00:07:55,360
खटखटाता जैसे कोई अंधा हो वो गेट खटखटा रहा है। खटखटा रहा

102
00:07:55,360 --> 00:07:59,520
है। करते करते वो उस गेट पे आता है जिस

103
00:07:59,520 --> 00:08:03,680
गेट से आपकी मुक्ति हो सकती है। 84 लाख योनियों पे खटखटाता

104
00:08:03,680 --> 00:08:07,840
रहा। खटखटाता रहा और उसमें भी खटखटाते खटखटाते

105
00:08:07,840 --> 00:08:11,920
फिर वो आता है। मतलब उन्होंने क्रम बताया कि कैसे वो वहां तक पहुंचता है। फिर

106
00:08:11,920 --> 00:08:14,640
उसके बाद वो मनुष्य का शरीर प्राप्त करता

107
00:08:14,640 --> 00:08:18,720
है। फिर उसके बाद वो मनुष्य में ब्राह्मण शरीर प्राप्त करता है। तो ऐसे करके

108
00:08:18,720 --> 00:08:22,720
क्रमानुसार उन्होंने वहां बहुत अच्छा किया है। तो आप सर्च करेंगे YouTube

109
00:08:22,720 --> 00:08:26,960
पर तो आपको वक्तव्य मिल जाएगा। तो जो मानवीय

110
00:08:26,960 --> 00:08:31,520
शरीर है मनुष्य शरीर वो बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण

111
00:08:31,520 --> 00:08:35,600
है। वो श्रवण करने के बाद आपको इसका बोध हो जाएगा। एक

112
00:08:35,600 --> 00:08:40,640
होता है कि हमें जानकारी जो है कई बार आप ये

113
00:08:40,640 --> 00:08:44,720
अपने जीवन में अनुभव करेंगे कि जो बातें आप

114
00:08:44,720 --> 00:08:48,800
अपने इर्दगिर्द यहां वहां सुनते रहते हैं। कई बातें उनमें से काम

115
00:08:48,800 --> 00:08:52,800
की होती है आपके बहुत जरूरी होती है। पर होता

116
00:08:52,800 --> 00:08:56,800
क्या है कि हम उन पर ध्यान नहीं देते हैं। हम उनकोेंस

117
00:08:56,800 --> 00:09:00,880
देते हुए भी वो हमारे जीवन में बदलाव नहीं ला पाती है। परंतु वही

118
00:09:00,880 --> 00:09:04,880
बात जब हम कभी गुरु मुख से सुन लेते हैं तो उस बात

119
00:09:04,880 --> 00:09:09,040
का वजन अलग हो जाता है और वह श्रवण करते ही उसका प्रभाव हमारे

120
00:09:09,040 --> 00:09:13,040
जीवन में कुछ अलग आ जाता है। इसी को कहते हैं ना गुरुदेव कहते हैं कि आप जो है

121
00:09:13,040 --> 00:09:17,200
बुलेट लो और सामने वाले में मार दो तो वो असर

122
00:09:17,200 --> 00:09:21,280
नहीं करेगी बुलेट। पर वही बुलेट जब रिवाल्वर के अंदर से आएगी

123
00:09:21,280 --> 00:09:25,840
तो सामने लक्ष्य को अपने भेज देगी। उसी तरीके से जो सिद्धांत

124
00:09:25,840 --> 00:09:29,920
होते हैं कई बार ऐसा होता है कि वह सिद्धांत या कुछ अच्छी

125
00:09:29,920 --> 00:09:34,320
जीवन में परिवर्तनकारी जो सीखे हैं शिक्षाएं हैं

126
00:09:34,320 --> 00:09:38,320
वो हमें प्राप्त हो जाती है या हो सकता है हमारे चिंतन मनन से हमें समझ

127
00:09:38,320 --> 00:09:42,400
में आ जाता है हां ये ठीक है ये ठीक नहीं है मगर उसको ही जब एक दिन हम गुरु मुख से

128
00:09:42,400 --> 00:09:46,400
सुनते हैं जैसे मान लीजिए कि हम लोगों

129
00:09:46,400 --> 00:09:50,640
को पता है कि ब्रह्म मुहूर्त में उठना कितना

130
00:09:50,640 --> 00:09:54,640
अच्छा होता है पर यही और और हम जानते हैं कितना अच्छा होता है

131
00:09:54,640 --> 00:09:58,880
पर हम उसको नहीं कर पा रहे और एक दिन हमने गुरु मुख से सुन लिया

132
00:09:58,880 --> 00:10:02,960
उस बात को उस बात के महत्व को अगले दिन से ब्रह्म मुहूर्त में उठने

133
00:10:02,960 --> 00:10:07,120
लगे या फिर संध्या वंदन त्रिकाल संध्या नहीं कर पा रहे हैं

134
00:10:07,120 --> 00:10:11,120
मालूम है कि त्रिकाल संध्या बहुत जरूरी है नहीं कर पा रहे हैं या सवा घंटे

135
00:10:11,120 --> 00:10:15,280
की भक्ति जरूरी नहीं है कि सब लोग मतलब जिनका जिनके जीवन में विपरीत

136
00:10:15,280 --> 00:10:19,280
परिस्थितियां हो रात की शिफ्ट हो काम करने की वो उनकी बात नहीं कर रहा हूं मैं एक

137
00:10:19,280 --> 00:10:23,360
उदाहरण मात्र ले रहा हूं कि आप आपको ज्ञात है

138
00:10:23,360 --> 00:10:27,600
कि सवा घंटे की भक्ति बहुत आवश्यक है। मगर एक दिन वही बात किसी दिन वृतांत

139
00:10:27,600 --> 00:10:31,600
में गुरुदेव के मुख से जब सुन लेता है व्यक्ति अपने गुरु मुख से

140
00:10:31,600 --> 00:10:35,680
केवल यह नहीं कि पूज्य जो जगुरु शंकराचार्य जी महाराज

141
00:10:35,680 --> 00:10:39,680
हैं उन्हीं के मुख से नहीं जो व्यक्ति उसके लिए उसके जो गुरु हैं उनके

142
00:10:39,680 --> 00:10:43,920
मुख से जब वो सुन लेता है तो वह बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।

143
00:10:43,920 --> 00:10:44,960
तो इसी प्रकार से यह

144
00:10:44,960 --> 00:10:49,040
जो नरदेह वंदना है नरदेह के लिए मुझे याद आया कि मैंने

145
00:10:49,040 --> 00:10:53,360
उनका वक्तव्य सुना था बहुत प्रभावशाली वक्तव्य है तो वो आप अवश्य

146
00:10:53,360 --> 00:10:57,440
उसका श्रवण कर ले और जितनी भी जीवन की बातें होती है

147
00:10:57,440 --> 00:11:01,680
जैसे हमने कहीं से सुन रखी है फिर भी वो गुरु मुख से जब सुनते हैं ना तो उनका महत्व

148
00:11:01,680 --> 00:11:05,680
बदल जाता है तो आप अवश्य सुने कभी भी गुरुदेव के

149
00:11:05,680 --> 00:11:09,760
जो लेक्चर्स होते हैं उन्हें इस कारण से अरे यह बात तो हमें पता है इस कारण

150
00:11:09,760 --> 00:11:13,840
से उन लेक्चर्स को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए क्यों

151
00:11:13,840 --> 00:11:18,000
नहीं करना चाहिए? क्योंकि जब आप वह गुरु मुख से सुन रहे हैं तो वह श्रवण करना

152
00:11:18,000 --> 00:11:22,160
भी आपके लिए बहुत ज्यादा उसका महत्व हो जाता है।

153
00:11:22,160 --> 00:11:26,240
और इस प्रकार की चीजें देखिए अभी

154
00:11:26,240 --> 00:11:30,400
गुरुदेव का रिसेंट कोई वो था उसमें गुरुदेव ने वीडियो में कहा था

155
00:11:30,400 --> 00:11:34,640
जैसे कि जो मंत्र इत्यादि हैं संस्कृत के अर्थ नहीं आते हैं मंत्र हो रहा है उच्चारण

156
00:11:34,640 --> 00:11:38,960
हो रहा है अर्थ नहीं मालूम परंतु उसका जो श्रवण हो रहा है वह दवाई की तरह है

157
00:11:38,960 --> 00:11:43,200
दवाई के बारे में आपको ज्ञान हो ना हो गुरुदेव एक सिद्धांत

158
00:11:43,200 --> 00:11:47,520
बताते हैं वस्तु शक्ति ज्ञान की अपेक्षा नहीं करती।

159
00:11:47,520 --> 00:11:51,760
तो वस्तु की जो शक्ति जैसे जो बीमारी से लड़ने के लिए टेबलेट

160
00:11:51,760 --> 00:11:55,920
है उसका काम है आपके बुखार वाले तत्व से लड़ना। है ना?

161
00:11:55,920 --> 00:12:00,000
तो आपको उसके बारे में ज्ञान नहीं पर आप अगर वो खाओगे तो उससे आपको जो

162
00:12:00,000 --> 00:12:04,320
वो अपना काम करेगी। उसी प्रकार से जो श्रवण होता है संत

163
00:12:04,320 --> 00:12:08,720
महात्माओं का और शास्त्रों का श्रवण चिंतन

164
00:12:08,720 --> 00:12:12,880
मनन यह आप समझ में नहीं भी आ रहा है तब भी आप इसका

165
00:12:12,880 --> 00:12:18,400
यदि श्रवण करते हैं तो आपके लिए बहुत ज्यादा लाभदायक होता है।

166
00:12:18,400 --> 00:12:23,280
नरदेह वंदना प्रारंभ करते हैं। धन्य है

167
00:12:23,280 --> 00:12:28,080
यह नर देह। जरा इसकी अपूर्वता देखिए।

168
00:12:28,080 --> 00:12:32,160
इसके द्वारा परमार्थ के उद्देश्य से जो कुछ सिखाया जाता है उस सब की सिद्धि हो

169
00:12:32,160 --> 00:12:36,320
जाती है। इस नर देह के द्वारा ही कुछ लोग भक्ति में लगे हैं। कुछ

170
00:12:36,320 --> 00:12:40,800
लोग परम वीतराग होकर गिरि कंदराओं में रहते हैं। कुछ लोग तीर्थटन

171
00:12:40,800 --> 00:12:45,040
करते हैं। कुछ पुरचरण करते हैं और कुछ निष्ठावान

172
00:12:45,040 --> 00:12:49,200
होकर अखंड नाम स्मरण करते हैं। कोई तपस्या करता है। कोई बहुत

173
00:12:49,200 --> 00:12:53,440
बड़ा योगाभ्यासी होता है। कोई अध्ययन करके वेदों और शास्त्रों

174
00:12:53,440 --> 00:12:57,600
का परम पंडित होता है। किसी ने हठ योग किया और कोई अपने शरीर को बहुत

175
00:12:57,600 --> 00:13:03,600
पीड़ा पहुंचाई और किसी ने भाव के बल से ईश्वर की प्राप्ति की।

176
00:13:04,320 --> 00:13:08,640
कोई प्रसिद्ध महापुरुष हुआ, कोई विख्यात भक्त हुआ। कोई सिद्ध

177
00:13:08,640 --> 00:13:12,960
होकर अकस्मात आकाश में विचरने लगा। कोई तो तेज

178
00:13:12,960 --> 00:13:17,040
में मिलकर स्वयं तेज ही हो गया। कोई जल में मिल गया। कोई

179
00:13:17,040 --> 00:13:21,200
देखतेदेखते वायु के समान अदृश्य हो गया। कोई एक से अनेक

180
00:13:21,200 --> 00:13:25,440
हो जाते हैं। कोई देखतेदेखते गायब हो जाते हैं। और कोई बैठे-बैठे

181
00:13:25,440 --> 00:13:29,680
अनेक स्थानों और समुद्रों में भ्रमण करते हैं। कोई प्रेत पर जा बैठते

182
00:13:29,680 --> 00:13:33,840
हैं। कोई अचेतन को चलाते हैं। कोई तपोबल से मुर्दे को जलाते

183
00:13:33,840 --> 00:13:37,840
हैं। कोई अग्नि को मंद करते हैं। कोई लोगों की प्राण वायु

184
00:13:37,840 --> 00:13:42,000
से मुर प्राण वायु रोकते हैं। ऐसे लाखों

185
00:13:42,000 --> 00:13:46,320
सिद्ध हट निग्रही और कृत बुद्धि हो गए हैं। जिन्हें

186
00:13:46,320 --> 00:13:50,560
नाना अब यहां निग्रही शब्द आ गया। यही है। निग्रह संप्रदाय

187
00:13:50,560 --> 00:13:54,800
की प्रमाणिकता निग्रह शब्द आ गया ना हां प्रमाणिक प्रमाणिक

188
00:13:54,800 --> 00:13:59,360
हो गया समर्थ रामदास जी ने भी प्रमाणिक कर दिया भाई बहुत बढ़िया

189
00:13:59,360 --> 00:14:03,760
है ना जिन्हें नाना सिद्धियां

190
00:14:03,760 --> 00:14:08,480
प्राप्त हुई है ऐसे अनेक प्रकार के सिद्ध हुए हैं जिन्होंने मनो सिद्धि

191
00:14:08,480 --> 00:14:12,800
वाचा सिद्धि अल्प सिद्धि और सर्व सिद्धि प्राप्त हुई है।

192
00:14:12,800 --> 00:14:17,200
कोई नवधा भक्ति के राजमार्ग में चले और परमार्थ

193
00:14:17,200 --> 00:14:19,360
के साधक हुए और कोई

194
00:14:19,360 --> 00:14:23,600
योगी गुप्त मार्ग में चलकर ब्रह्म भवन में पहुंचे। कोई बैकुंठ गए,

195
00:14:23,600 --> 00:14:27,760
कोई सत्यलोक गए, सत्यलोक में रह गए और कोई शिव रूप होकर

196
00:14:27,760 --> 00:14:31,760
कैलाश में जा बैठे। कोई इंद्र लोक में जाकर इंद्र हुए, कोई पितृ

197
00:14:31,760 --> 00:14:36,080
में जा मिले, कोई नक्षत्रों में जा बैठे तो कोई छर सागर में

198
00:14:36,080 --> 00:14:40,320
सलोकता, समीपता, स्वरूपता और सायोजता

199
00:14:40,320 --> 00:14:44,640
इन चारों प्रकार की मुक्तियों का वे मनमाना भोग करते हैं।

200
00:14:44,640 --> 00:14:49,360
ऐसे अनंत सिद्ध साधु और जी भैया। हम

201
00:14:49,360 --> 00:14:53,600
तो कोई इंद्रलोक में जाकर इंद्र हुए, कोई पितृ

202
00:14:53,600 --> 00:14:57,600
में जा मिले, कोई नक्षत्रों में जा बैठे और कोई छर सागर में

203
00:14:57,600 --> 00:15:03,520
सलोकता, समीपता, स्वरूपता और सायोजता

204
00:15:03,520 --> 00:15:08,400
इन चारों प्रकार की मुक्तियों का वह मनमाना भोग करते हैं।

205
00:15:08,400 --> 00:15:12,480
ऐसे अनंत सिद्ध साधु और संत अपने हित में लगे हैं।

206
00:15:12,480 --> 00:15:16,880
जिस नर देह की इस प्रकार की प्रसिद्धि है उसका

207
00:15:16,880 --> 00:15:21,520
किस प्रकार वर्णन किया जाए

208
00:15:21,520 --> 00:15:26,000
उसका किस प्रकार वर्णन किया जाए इस नर देह के द्वारा

209
00:15:26,000 --> 00:15:30,960
ही बहुत से लोग अनेक प्रकार के साधनों और सारासार

210
00:15:30,960 --> 00:15:35,040
विचार से युक्त हुए हैं। इस नर देह की कृपा से बहुत

211
00:15:35,040 --> 00:15:39,280
बहुतों ने उत्तम पद पाया और अभिमान छोड़कर आत्मंद

212
00:15:39,280 --> 00:15:43,600
से सुखी हुए। नर देह से ही सब ने उत्तम गति प्राप्त

213
00:15:43,600 --> 00:15:48,560
की है और समस्त संशयों का समूल नाश किया है।

214
00:15:48,560 --> 00:15:52,720
सभी जगह कहा गया है कि पशु देह से गति नहीं होती। इसलिए नर

215
00:15:52,720 --> 00:15:57,680
देह से ही परलोक की प्राप्ति होती है। संत महंत ऋषि मुनि सिद्ध साधु

216
00:15:57,680 --> 00:16:02,320
समाधानी भक्त मुक्त ब्रह्म ज्ञानी विरक्त योगी तपस्वी तत्वज्ञानी

217
00:16:02,320 --> 00:16:07,200
योगाभ्यासी ब्रह्मचारी दिगंबर सन्यासी शद दर्शनी

218
00:16:07,200 --> 00:16:11,760
तापस सब इसी नर देह से हुए हैं। इसलिए नर देह

219
00:16:11,760 --> 00:16:15,760
सब देहों में देहों से श्रेष्ठ और बड़ा है। जिससे

220
00:16:15,760 --> 00:16:20,080
यम यातना का अरिष्ट दूर होता है। नर देह स्वाधीन

221
00:16:20,080 --> 00:16:24,080
है और सहसा पराधीन नहीं होता। पर इसे परोपकार में

222
00:16:24,080 --> 00:16:28,400
लगाकर संसार में कीर्ति प्राप्त करनी चाहिए। घोड़े,

223
00:16:28,400 --> 00:16:32,880
गौ, बैल, भैंस आदि पशुओं, स्त्रियों और दासियों

224
00:16:32,880 --> 00:16:36,640
को यदि कोई कृपा कर छोड़ भी देगा तो उन्हें कोई

225
00:16:36,640 --> 00:16:40,640
ना कोई पकड़ लेगा। पर नर देह की यह बात नहीं है। यह

226
00:16:40,640 --> 00:16:44,880
अपनी इच्छा से चाहे रहे और चाहे जाए। पर दूसरा

227
00:16:44,880 --> 00:16:48,880
कोई इसे बंधन में नहीं रख सकता। नर देह यदि पंगू हो

228
00:16:48,880 --> 00:16:52,960
तो काम में नहीं आता। यदि लूला हो तो उससे परोपकार नहीं

229
00:16:52,960 --> 00:16:56,960
होता। यदि वह अंधा हो तो निरर्थक है। और यदि बहरा

230
00:16:56,960 --> 00:17:01,040
हो तो उससे निरूपण नहीं हो सकता। यदि गूंगा हुआ तो वह

231
00:17:01,040 --> 00:17:05,600
शंका आदि नहीं कर सकता। और यदि अशक्त रोगी या अपाहिज

232
00:17:05,600 --> 00:17:09,760
हुआ तो भी व्यर्थ है। यदि वह मूर्ख हो या फेफड़े की तरह रोगी

233
00:17:09,760 --> 00:17:13,840
हो तो भी अवश्य ही निरर्थक है। जिस नर देह में यह

234
00:17:13,840 --> 00:17:18,320
सब त्रुटियां ना हो और जो सब प्रकार से ठीक हो उसे तुरंत परमार्थ

235
00:17:18,320 --> 00:17:23,120
का पथ ग्रहण करना चाहिए। यह देखिए कितने

236
00:17:23,120 --> 00:17:27,520
मतलब वद एक विवेचन किया गया है

237
00:17:27,520 --> 00:17:31,760
कि आपको जो प्रारब्ध पूर्वक प्राप्त हो गया है उसकी

238
00:17:31,760 --> 00:17:36,800
कद्र करना आप सीखें उसे वैल्यू देना

239
00:17:36,800 --> 00:17:40,880
हम इसको पढ़ के आप लोगों के मन में आ रहा हो आपको क्या

240
00:17:40,880 --> 00:17:44,880
प्राप्त हो गया है ये इसीलिए श्रवण करना

241
00:17:44,880 --> 00:17:48,960
चाहिए किसी भी चीज जो संत है या

242
00:17:48,960 --> 00:17:51,840
ग्रंथ है उनको लेकर के ऐसी दृष्टि

243
00:17:51,840 --> 00:17:55,840
नहीं रखनी चाहिए कि यह बात तो हमें ज्ञात है।

244
00:17:55,840 --> 00:17:59,920
जिस नर देह में यह सब त्रुटियां ना हो और जो सब प्रकार से ठीक हो उसे तुरंत

245
00:17:59,920 --> 00:18:03,920
परमार्थ का पथ धारण करना चाहिए। लोग

246
00:18:03,920 --> 00:18:07,920
सर्वांग पूर्ण नर देह पाकर भी परमार्थ का विचार

247
00:18:07,920 --> 00:18:12,160
भूल जाते हैं। वह मूर्ख माया जाल में कैसे फंसे हुए हैं।

248
00:18:12,160 --> 00:18:16,400
मिट्टी के बने हुए घर को इन लोगों ने निश्चित रूप से अपना मान रखा है। पर

249
00:18:16,400 --> 00:18:20,720
उन्हें नहीं ज्ञात कि यह घर बहुतों का है। चूहा,

250
00:18:20,720 --> 00:18:24,720
छिपकली, मक्खी, मकड़ी, चींटे, चीटियां, बिच्छू,

251
00:18:24,720 --> 00:18:28,960
सांप, गिलहरी, भोरे, बर्रे, बिल्ली,

252
00:18:28,960 --> 00:18:33,840
कुत्ते, नेवले, पिशु, खटमल, झींगुर, कन, खजूरे

253
00:18:33,840 --> 00:18:38,000
आदि सभी जीव इसे अपना ही घर समझते हैं। देखो

254
00:18:38,000 --> 00:18:42,080
यह बात चली है तो एक मुझे बात याद आ गई

255
00:18:42,080 --> 00:18:46,640
कि अभी पीछे पिछले कुछ दिनों

256
00:18:46,640 --> 00:18:50,720
यह बात बहुत चली थी कि जो जो कलियों में रहने वाले जो

257
00:18:50,720 --> 00:18:55,040
कुत्ते हैं स्वान इत्यादि उन पर जो है उन उनका

258
00:18:55,040 --> 00:18:59,360
निग्रह किया जाए और उनको यथा स्थान पहुंचाया जाए

259
00:18:59,360 --> 00:19:03,760
और लोगों ने काफी बर्बरता भी दिखाई है। चलिए उनको

260
00:19:03,760 --> 00:19:07,760
व्यवस्थित रूप से कहीं पर पहुंचाने की बात तो अलग है। मगर

261
00:19:07,760 --> 00:19:13,440
कुछ लोग हत्या भी कर देते हैं मार मार के और तो

262
00:19:13,440 --> 00:19:17,520
हम लोग सिर्फ मानवीय दृष्टि से ही देखते हैं। एक

263
00:19:17,520 --> 00:19:21,600
हमें यह भी देखना चाहिए कि हमने कैसे विकास के नाम

264
00:19:21,600 --> 00:19:26,000
पर धीरे-धीरे हम लोग कंजशन जो कर रहे हैं प्रकृति

265
00:19:26,000 --> 00:19:30,000
का, धरती का, पानी का, वायु का तो

266
00:19:30,000 --> 00:19:34,000
हमारे उस कंजशन में हमको जैसे हमारा

267
00:19:34,000 --> 00:19:38,160
वो संसार है ऐसे ही पशुओं का भी है। तो हम कहीं ना कहीं यह भूल

268
00:19:38,160 --> 00:19:42,240
जाते हैं कि भाई ये हम सोचते हैं कि वह यहां क्यों

269
00:19:42,240 --> 00:19:46,240
है? हमारी गली में क्यों है? कहीं और हो कहीं किसी और

270
00:19:46,240 --> 00:19:51,680
सड़क पे हो। हालांकि जब वो कोई अगर ऐसा पशु है जिससे कि

271
00:19:51,680 --> 00:19:55,760
आने जाने वालों को दिक्कत हो रही है तो मैं उसके समर्थन में है कि उस पशु

272
00:19:55,760 --> 00:20:00,080
को जो है दंड दिया जाना चाहिए जिससे वो सीखे कि ऐसा नहीं करना है। परंतु

273
00:20:00,080 --> 00:20:01,760
केवल एक दृष्टि कि हमारी गली

274
00:20:01,760 --> 00:20:05,840
में है ये है। इस तरह से एक दूसरी चीज भी सोचनी चाहिए कि वो

275
00:20:05,840 --> 00:20:09,920
जो जगह है उस पे हमने शहरीकरण करके और अपना जो

276
00:20:09,920 --> 00:20:14,320
है रजिस्टर्ड करवा लिया है। मकान पंजीकरण वहां पर एक व्यवस्था

277
00:20:14,320 --> 00:20:18,720
चालू की है और उसमें पंजीकरण करवा लिया और सोच रहे हैं यह हमारा है। नहीं

278
00:20:18,720 --> 00:20:22,800
यह सिर्फ हमारा नहीं है। यह वहां रहने वाले बहुत से जीव जंतुओं का

279
00:20:22,800 --> 00:20:26,800
है। यह बात अवश्य है कि नर देह क्योंकि इंपॉर्टेंट है

280
00:20:26,800 --> 00:20:30,800
तो उसको जितना ज्यादा व्यवस्थित रखने के लिए जिससे कि

281
00:20:30,800 --> 00:20:34,960
उससे हम परमार्थ को प्राप्त कर सके। इसलिए उसको बचा के रखना बहुत

282
00:20:34,960 --> 00:20:39,440
आवश्यक है। उस दृष्टिकोण से व्यवस्था के लिए उनको

283
00:20:39,440 --> 00:20:43,440
अमुक अमुक स्थानों पर भेज दिया जाए या उनका निग्रह कर दिया

284
00:20:43,440 --> 00:20:47,440
जाए शानों का तो वो उचित है मगर उनके

285
00:20:47,440 --> 00:20:52,080
प्रति ऐसी दृष्टि रखना चिन कुन द्वेष मूलक

286
00:20:52,080 --> 00:20:56,720
ना वो दृष्टि रख वो जो दृष्टि है उसको अपनी

287
00:20:56,720 --> 00:21:00,800
उसको विचलित ना होने दें क्योंकि ये ठीक ऐसे

288
00:21:00,800 --> 00:21:06,080
है जैसे मान लीजिए कि हमारे यहां पर खेती होती है भारत में अब

289
00:21:06,080 --> 00:21:10,160
अमेरिका ने क्या किया कि एक खेती करने का एक जो तरीका

290
00:21:10,160 --> 00:21:14,400
है उस तरीके को पेटेंट करा लिया। पेटेंट का कानून भी खुद ही बनाया

291
00:21:14,400 --> 00:21:16,800
और फिर उस कानून में उस खेती करने के उस तरीके

292
00:21:16,800 --> 00:21:20,960
को पेटेंट करा लिया। रजिस्टर्ड कर लिया। अब हम टैक्स

293
00:21:20,960 --> 00:21:24,960
दे रहे हैं यहां पर उसी तरीके से खेती करने के लिए हमको वहां

294
00:21:24,960 --> 00:21:28,960
पर टैक्स देना पड़ रहा है। अमेरिका ने जिस पद्धति को पेटेंट

295
00:21:28,960 --> 00:21:33,040
कर लिया है अमेरिका को हम टैक्स दे रहे हैं। तो इसी तरीके से

296
00:21:33,040 --> 00:21:37,360
हमने खुद ही एक लॉ बनाया कि यहां पर जिसका यहां पंजीकरण होगा

297
00:21:37,360 --> 00:21:41,600
उसका यहां पे जमीन मानी जाएगी। हम यह भूल गए कि हमें

298
00:21:41,600 --> 00:21:45,600
लॉ बनाने का अधिकार किसने दिया था? पंजीकरण वाला। तो हम यह सोचते हैं

299
00:21:45,600 --> 00:21:49,760
ये हमारा मकान है तो यहां पे पशु इत्यादि नहीं होने चाहिए। तो सामंजस्य

300
00:21:49,760 --> 00:21:54,080
की स्थिति है। जीव जंतुओं का भी है। यद्यपि वह मानव जीवन में बाधित

301
00:21:54,080 --> 00:21:58,240
हो रहे हैं तो वहां पर प्रतिकार भी आवश्यक है। परंतु अपनी दृष्टि

302
00:21:58,240 --> 00:22:02,480
को विचलित ना होने दें। वो घृणा वो शत्रुता

303
00:22:02,480 --> 00:22:06,480
का मन में भाव नहीं होना चाहिए उनके प्रति।

304
00:22:06,480 --> 00:22:10,560
ठीक है? तो

305
00:22:10,560 --> 00:22:15,040
मगर ऐसा नहीं है कि जो यह जो आवारा जानवर होते हैं दौड़ाते

306
00:22:15,040 --> 00:22:19,120
हैं कोई परिवार वाला जा रहा है अपनी मोटरसाइकिल पर

307
00:22:19,120 --> 00:22:23,120
पीछे जो है पत्नी है पति जो है गाड़ी चला रहा है उसकी गोद में पत्नी की

308
00:22:23,120 --> 00:22:27,280
गोद में जो है बिटिया है या कोई नवजात शिशु

309
00:22:27,280 --> 00:22:31,520
है और कुत्तों ने दौड़ाना चालू कर दिया सोचिए उस समय क्या हो सकता है वो गिर सकता

310
00:22:31,520 --> 00:22:35,520
है चोट लग सकती है तो ऐसे शानों का निग्रह भी करना चाहिए मगर अपनी

311
00:22:35,520 --> 00:22:39,600
दृष्टि वो वाली नहीं रखेगी ये हमारी जगह ये आंख क्या कर रहे हैं। ये विचार नहीं आना

312
00:22:39,600 --> 00:22:43,680
चाहिए। और ये सारे विचार तभी नहीं आते जो वो चार 34 भगवत गीता पढ़ते

313
00:22:43,680 --> 00:22:48,080
हैं ना तत्वदृष्टि तत्वदृष्टि से क्या मिलता है? पहले पूरे संसार में

314
00:22:48,080 --> 00:22:52,240
मुझे और पीछे स्वयं को देखेगा। तो जब

315
00:22:52,240 --> 00:22:56,400
आप अध्यात्म के मार्ग पर आते हैं तो आपकी अंदरूनी दृष्टि जो है

316
00:22:56,400 --> 00:23:00,560
गुरुदेव एक बात कहते हैं ना कि हम किसी को अपना शत्रु मानते ही नहीं है। इसीलिए

317
00:23:00,560 --> 00:23:04,560
कोई हमारा शत्रु होता नहीं है। कोई हमारा हमसे जीत नहीं पाता है।

318
00:23:04,560 --> 00:23:08,880
बजरंगबली भी जब बाली के सामने गए तो बाली को कहा था कि हम तुम्हारे शत्रु

319
00:23:08,880 --> 00:23:12,880
नहीं मित्र हैं। तो कहने का भाव यह है

320
00:23:12,880 --> 00:23:17,120
कि दुनिया को जीतना है तो उसमें यदि आप मित्रता का भाव रखेंगे

321
00:23:17,120 --> 00:23:21,360
और मित्रता का भाव आता है संतों की शरण से भगवत मार्ग

322
00:23:21,360 --> 00:23:25,440
अध्यात्म के मार्ग ठीक है। आगे चलते

323
00:23:25,440 --> 00:23:26,560
हैं।

324
00:23:26,560 --> 00:23:30,720
तो सभी कहते हैं कि अवश्य ही यह घर हमारा

325
00:23:30,720 --> 00:23:34,720
है। पशु कहते हैं मेरा घर है। दासियां और घर की स्त्रियां कहती है हमारा घर

326
00:23:34,720 --> 00:23:38,720
है। मेहमान कहते हैं कि हमारा घर है। मित्र कहते हैं कि हमारा घर है। गांव में

327
00:23:38,720 --> 00:23:42,800
रहने वाले कहते हैं उसे अपना बतलाते हैं। चोर कहते हैं कि हमारा घर है।

328
00:23:42,800 --> 00:23:47,280
राजा के नौकर चाकर कहते हैं कि हमारा है। और अग्नि कहती है कि मेरा है।

329
00:23:47,280 --> 00:23:51,440
मैं इसे भस्म करूंगी। इस प्रकार सभी इसे अपना बतलाते हैं और यह मूर्ख

330
00:23:51,440 --> 00:23:55,520
मनुष्य भी इसे अपना ही बतलाते हैं और अंत में आपत्ति आने पर घर

331
00:23:55,520 --> 00:24:00,960
को कौन कहे स्वयं देह छोड़कर भाग जाते हैं।

332
00:24:00,960 --> 00:24:05,280
गांव उजड़ जाते हैं। उनमें जंगली जानवर आकर रहने लगते हैं। वस्तुतः

333
00:24:05,280 --> 00:24:09,600
यह घर कीड़े मकोड़ों, नेवलों और चूहों आदि का है। बेचारे

334
00:24:09,600 --> 00:24:13,840
मूर्ख प्राणी तो उसे छोड़ ही जाते हैं। अपने अनुभव से जाना

335
00:24:13,840 --> 00:24:18,240
कि घर की यही मिथ्या स्थिति है। यह जीवन दो दिनों का है।

336
00:24:18,240 --> 00:24:22,560
जहां कहीं हो रहकर बिताना चाहिए। इस

337
00:24:22,560 --> 00:24:26,560
बारे में एक व्यक्तिगत बात भी है। फिर किसी दिन

338
00:24:26,560 --> 00:24:30,560
इसको बताएंगे। यदि हम देह को अपना कहें तो इसका

339
00:24:30,560 --> 00:24:34,560
निर्माण भी व्यक्तिगत बात से मैं एक सैद्धांतिक तौर पर बता दूं

340
00:24:34,560 --> 00:24:38,560
कि लोग इस पर बहुत ज्यादा दृष्टि रखते हैं कि शहर में अपना एक मकान होना चाहिए। शहर में अपना

341
00:24:38,560 --> 00:24:41,760
एक मकान होना चाहिए। यद्यपि उसके

342
00:24:41,760 --> 00:24:46,160
उस उद्देश्य का पर्यावसान इस बात में है कि मैं वहां रहकर के भक्ति कर पाऊं।

343
00:24:46,160 --> 00:24:50,480
मेरे पास अपनी भक्ति करने के लिए एक अच्छा कक्ष नहीं है। इसलिए

344
00:24:50,480 --> 00:24:54,480
एक घर ऐसा हो जहां जिससे मेरी भक्ति सुलभ हो पाए। इस दृष्टि

345
00:24:54,480 --> 00:24:58,560
इस भाव को अंतरात्मा से जब ये भाव आए तो अगर ऐसा भाव

346
00:24:58,560 --> 00:25:02,880
है कि मेरा घर होना चाहिए कहीं पर तो तो ठीक है। मगर जो लोग बहुत परेशान

347
00:25:02,880 --> 00:25:06,960
रहते हैं ना कि मेरा घर नहीं है। मेरा घर नहीं है। मैं यहां हूं। मैं रेंट पे

348
00:25:06,960 --> 00:25:10,960
हूं। तो उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। वो

349
00:25:10,960 --> 00:25:14,960
आसक्ति है भौतिकता के प्रति। आप भगवान के पीछे जाइए।

350
00:25:14,960 --> 00:25:19,040
घर मकान द्वार सब अपने आप आपको मिल जाएगा। जो भी आपके लिए

351
00:25:19,040 --> 00:25:23,520
अपेक्षित होगा वह आ जाएगा। क्यों? क्यों होगा? क्यों मिल जाएगा?

352
00:25:23,520 --> 00:25:27,520
नोवाइस तू मेरी शरण में आजा। तेरी प्राप्ति की

353
00:25:27,520 --> 00:25:31,520
रक्षा और अप्राप्ति की चिंता मैं करूंगा। तो इस बात को ध्यान

354
00:25:31,520 --> 00:25:35,600
में रखना चाहिए कि बहुत ज्यादा इसके पीछे परेशान नहीं होना है कि नहीं नहीं

355
00:25:35,600 --> 00:25:39,760
अपना एक मकान होना चाहिए, यह होना चाहिए, वह होना चाहिए। ठीक है? जो

356
00:25:39,760 --> 00:25:44,240
बेसिक चीजें हैं वह होनी चाहिए। वह जो हमारी जरूरत

357
00:25:44,240 --> 00:25:48,240
है जिससे कि हम जीवित रहे जिससे कि हम धर्म रक्षा कर

358
00:25:48,240 --> 00:25:52,480
सके अपने धर्म का पालन कर सके। पहले पालन फिर रक्षा पहले पालन

359
00:25:52,480 --> 00:25:56,560
कर सके फिर रक्षा कर सकें और उस उसके निमित्त जो जो

360
00:25:56,560 --> 00:25:57,120
आवश्यक

361
00:25:57,120 --> 00:26:01,200
संसाधन है वो हमें प्राप्त होनी चाहिए। ये भाव रखेंगे तो

362
00:26:01,200 --> 00:26:06,240
जीवन बहुत सरल होगा और वो वाला भाव जब ले आएंगे कि

363
00:26:06,240 --> 00:26:10,560
मेरा मकान, मेरी दुकान, मेरी बिल्डिंग, मेरी कार, मेरी मोटरसाइकिल

364
00:26:10,560 --> 00:26:14,720
तो हो सकता है कि क्रमशः यह सब चीजें आपको प्राप्त भी होती

365
00:26:14,720 --> 00:26:18,960
रहे यदा कदा परंतु आप चैन की नींद कभी नहीं सो पाएंगे।

366
00:26:18,960 --> 00:26:23,200
यह निश्चित है। चैन की नींद सोनी है ना तो आपको

367
00:26:23,200 --> 00:26:27,520
अपना भाव भगवत प्राप्ति में लगाना चाहिए। भगवत प्राप्ति

368
00:26:27,520 --> 00:26:31,680
और उस रास्ते में आपको जो जो मिल मिल रहा है भगवान प्राप्त करवा रहे हैं

369
00:26:31,680 --> 00:26:36,160
वह आप एक फल की तरीके से वह भी उपभोग नहीं कर्मन्यवादी

370
00:26:36,160 --> 00:26:40,320
कारस्ते मा फले सुदा वो वाला पार्ट निकल चुका है या कई

371
00:26:40,320 --> 00:26:44,560
बार वीडियोस में बताया है कि अर्जुन के मन

372
00:26:44,560 --> 00:26:48,560
में अंतत गत्वा अगर जीतना जीतने की वह

373
00:26:48,560 --> 00:26:52,720
नहीं है चाह तो फिर वह ऐसा प्रहार कैसे कर पाएगा जिससे कि जीते

374
00:26:52,720 --> 00:26:56,880
तो हमें जीतना तो है लड़ना तो जीतने के पर

375
00:26:56,880 --> 00:27:00,960
क्यों जीतना है? क्योंकि शास्त्र ने कहा है, ईश्वर ने कहा

376
00:27:00,960 --> 00:27:05,040
है। अच्छा जीतने से भैया महल मिलेगा तो महल

377
00:27:05,040 --> 00:27:09,200
में नहीं रहना है क्या? तो महल में रहना है तो महल में रहना तो है पर

378
00:27:09,200 --> 00:27:12,160
इसलिए नहीं कि वहां से मुझे सुख मिले। उसमें

379
00:27:12,160 --> 00:27:16,160
अंत में जो अंतिम जो लक्ष्य है वो सुख नहीं होना चाहिए। अंतिम लक्ष्य होना चाहिए

380
00:27:16,160 --> 00:27:20,160
कर्तव्य। ठीक है? तो उसी तरीके से

381
00:27:20,160 --> 00:27:24,160
यह आसक्ति अपने जीवन से हटाएं। और हटेगी कैसे? आसक्तियां

382
00:27:24,160 --> 00:27:28,400
कम कैसे होती हैं? भगवान नाम जप से। नाम जप करिए।

383
00:27:28,400 --> 00:27:32,400
भगवान का चिंतन मनन श्रवण करिए। सत्संग करिए। उससे

384
00:27:32,400 --> 00:27:36,480
आपको जो आसक्ति है वो कम होती है। सब इंटरकनेक्टेड चीजें

385
00:27:36,480 --> 00:27:42,400
हैं ये सब। अ हम

386
00:27:42,400 --> 00:27:46,640
जहां कहीं हो रहकर बिताना चाहिए। जहां भी हो जिस हाल

387
00:27:46,640 --> 00:27:51,040
में भी हो। सबसे ज्यादा जरूरी अपने जीवन का वह पार्ट है

388
00:27:51,040 --> 00:27:55,040
जब हम भगवान से बात करने बैठते हैं वह समय नहीं मिल पाता बड़ी

389
00:27:55,040 --> 00:27:59,280
दिक्कत होती है मगर जिस समय बैठ जाते हैं एक बार आप देखना आपको कितना

390
00:27:59,280 --> 00:28:03,440
वहां पर आत्मसंतुष्टि का अनुभव होगा जब आप भगवान

391
00:28:03,440 --> 00:28:07,440
जैसे आप आसन पे आकर बैठ तो नहीं रहे बहुत टाइम लगा रहे

392
00:28:07,440 --> 00:28:11,520
हैं बैठने में अरे ये कर लूं इसको भी फोन कर लूं यह वाला मैसेज

393
00:28:11,520 --> 00:28:15,600
कर दूं यह WhatsApp आया होगा उसको कॉल करना जरूरी है तब बैठूंगा बहुत

394
00:28:15,600 --> 00:28:19,680
सारे बहाने माया माया है ना माया वो उससे बहुत

395
00:28:19,680 --> 00:28:23,760
लड़ना पड़ता है भगवान के पास बैठने से बैठने से तो

396
00:28:23,760 --> 00:28:27,360
पहले तक की यात्रा बहुत कठिन होती है पर जब आप बैठ गए

397
00:28:27,360 --> 00:28:32,080
और बैठ के जब सामने भगवान की मूरत है और जब वो

398
00:28:32,080 --> 00:28:36,080
उसको आप निहारते हैं वो आपको निहारती है तब

399
00:28:36,080 --> 00:28:40,240
आपको आत्मसंतुष्टि जो होती है वह पूरे दिन में दोबारा फिर कभी होने नहीं वाली

400
00:28:40,240 --> 00:28:44,240
है वह तभी होगी वह आत्मसंतुष्टि उसी समय फिर नहीं

401
00:28:44,240 --> 00:28:48,320
होने वाली है तो जहां कहीं हो रहकर

402
00:28:48,320 --> 00:28:52,320
आप भगवत प्राप्ति पर भगवत भजन का अवश्य ध्यान रखें। यदि हम

403
00:28:52,320 --> 00:28:56,640
देह को अपना कहें तो इसका निर्माण भी बहुतों के लिए हुआ है। जुए प्राणी

404
00:28:56,640 --> 00:29:00,960
के सिर में अपना घर बनाकर मस्तक खाती हैं। रोम रंध्रों में कीड़े

405
00:29:00,960 --> 00:29:05,120
पड़े खाते हैं। घाव होने पर उसमें कीड़े पड़ते हैं। प्राणियों के पेट

406
00:29:05,120 --> 00:29:09,360
में भी अनेक जंतु होते हैं। दांतों, कानों और आंखों

407
00:29:09,360 --> 00:29:13,360
में कीड़े पड़ते हैं और शरीर का मांस खाते हैं।

408
00:29:13,360 --> 00:29:17,760
अभी माघ में है। गुरुदेव से किसी व्यक्ति ने प्रश्न कर दिया था

409
00:29:17,760 --> 00:29:22,800
कि गुरुदेव एक शरीर में दो आत्माएं निवास कर सकती हैं क्या?

410
00:29:22,800 --> 00:29:27,040
क्योंकि लोग कहते हैं कि उसमें प्रेत आ गया है, भूत आ गया है। तो वो प्रेत

411
00:29:27,040 --> 00:29:31,200
आ गया, भूत आ गया वाली बात तो अलग हो गई। मगर जो मूल प्रश्न है कि एक शरीर में एक

412
00:29:31,200 --> 00:29:35,440
से अधिक आत्माएं निवास कर सकती है क्या? तो गुरुदेव ने यही आंसर दिया था।

413
00:29:35,440 --> 00:29:40,000
एक ही व्यक्ति के शरीर में ना जाने कितने जो

414
00:29:40,000 --> 00:29:42,480
जीव होते हैं वह रहते

415
00:29:42,480 --> 00:29:46,720
हैं। वही बात यहां हो रही है।

416
00:29:46,720 --> 00:29:50,800
तो दांतों, कानों और आंखों में कीड़े पड़ते हैं। शरीर का मांस खाते हैं। मच्छर

417
00:29:50,800 --> 00:29:54,960
खून पीते हैं। और किलनिया मांस में घुसती हैं। पिसू

418
00:29:54,960 --> 00:29:59,360
काट कर भागते हैं। बर्रे और भरे काटते हैं। जो खून चूसती

419
00:29:59,360 --> 00:30:03,440
हैं। सांप बिच्छू आदि आदि दशते हैं।

420
00:30:03,440 --> 00:30:07,680
जन्म भर शरीर की रक्षा की और अकस्मात उसे बाग उठा

421
00:30:07,680 --> 00:30:12,080
ले गया। भेड़िया खा गया। चूहे और

422
00:30:12,080 --> 00:30:16,880
भेड़िया खा गया। चूहे और बिल्लियां काटती हैं। कुत्ते और घोड़े मांस नोचते हैं।

423
00:30:16,880 --> 00:30:20,880
भालू और बंदर मार डालते हैं। ऊंट काट खाते हैं। हाथी

424
00:30:20,880 --> 00:30:24,960
चीर डालते हैं। बैल अचानक सींगों से मार डालते हैं। चोर

425
00:30:24,960 --> 00:30:29,040
लाठियां बरसाते हैं। भूत डराकर मार डालते हैं। यही इस शरीर की

426
00:30:29,040 --> 00:30:33,040
स्थिति है। है तो यह शरीर बहुतों का पर मूर्ख समझते

427
00:30:33,040 --> 00:30:37,360
हैं कि हमारा है। पर आगे चलकर ताप तापत्रय

428
00:30:37,360 --> 00:30:41,680
नामक समास में बतलाया गया है कि यह शरीर

429
00:30:41,680 --> 00:30:45,680
अनेक प्रकार के जीवों का खाद्य है। यदि यह

430
00:30:45,680 --> 00:30:49,760
शरीर परमार्थ में लगाया जाए तब तो यह सार्थक होता है और

431
00:30:49,760 --> 00:30:53,920
नहीं तो अनेक प्रकार के आघातों के कारण व्यर्थ ही मृत्यु

432
00:30:53,920 --> 00:30:58,800
पथ में चला जाता है जो प्रपंची और मूर्ख है।

433
00:30:58,800 --> 00:31:04,800
तो ये इस तरह से हमारी निर्देह वंदना भी कंप्लीट हो गई।

434
00:31:06,400 --> 00:31:10,560
करपात्री जी के द्वारा स्थापित जो उप पीठ के शंकराचार्य के साथ जो

435
00:31:10,560 --> 00:31:14,560
लाइव चर्चा किया था तो उसमें आपने कहा कि ईश्वर का सगुण

436
00:31:14,560 --> 00:31:18,560
साकार रूप भी नित्य है। तो ये तो मतलब थोड़ा

437
00:31:18,560 --> 00:31:24,560
सा बात समझ में नहीं आ रहा कि सगुण साकार रूप नित्य कैसे हो सकता है?

438
00:31:25,280 --> 00:31:29,840
व्यवहार में उसे अनित्य कैसे सिद्ध करेंगे?

439
00:31:29,840 --> 00:31:33,840
अनित्य कैसे सिद्ध करोगे व्यवहार में?

440
00:31:33,840 --> 00:31:38,080
उनका कंधा इधर से शुरू होगा। इधर खत्म हो रहा है। जहां खत्म

441
00:31:38,080 --> 00:31:43,200
होगा वहां भी वो आपको देखेंगे।

442
00:31:43,200 --> 00:31:47,520
जहां पर खत्म होगा वहां पर है। भगवान

443
00:31:47,520 --> 00:31:51,600
सुनिए जब भगवान अपनी माया से दो और दो को पांच

444
00:31:51,600 --> 00:31:55,760
दिखा सकते हैं तो भगवान आपको ये फील नहीं करा

445
00:31:55,760 --> 00:32:01,280
सकते कि वो हर जगह है अपने स्वरूप से और

446
00:32:01,280 --> 00:32:05,280
जो कंधा इधर से शुरू हो रहा है इधर पे खत्म हो रहा है यह तो दृष्टिगोचर होना

447
00:32:05,280 --> 00:32:10,320
और और अगोचर होना है मात्र

448
00:32:10,320 --> 00:32:14,400
वहां पर भी वह है जहां कंधा खत्म हो रहा है बस वहां पर आंखों का

449
00:32:14,400 --> 00:32:18,320
विषय नहीं बनाया आपको

450
00:32:18,320 --> 00:32:22,400
नहीं तो फिर ऐसे तो मतलब सगुण साकार के लिए सर्वव्यापी मतलब कह ही

451
00:32:22,400 --> 00:32:26,400
नहीं सकते। अगर आप कह दोगे कि उनका कंधा हर जगह है तो फिर आप उसे कंधा

452
00:32:26,400 --> 00:32:30,560
भी नहीं कह पाओगे। क्योंकि कंधे का एक सीमा है तभी हम उसे कंधा कह

453
00:32:30,560 --> 00:32:34,560
पा रहे। है ना। मैंने आपको दोनों तरीके से आंसर दिया है किरण जी उसमें

454
00:32:34,560 --> 00:32:38,560
आप मनन करिए। जब तक हम व्यवहार में है तब तक हम यह नहीं

455
00:32:38,560 --> 00:32:42,960
कह सकते वो नित्य नहीं है।

456
00:32:42,960 --> 00:32:46,960
नहीं वो शगुन साकार रूप की बात मैं नहीं कर रहा। मैं मैं तो ईश्वर

457
00:32:46,960 --> 00:32:51,040
को नित्य मानता ही हूं। लेकिन उस रूप को क्या माने सगुण साकार रूप को? नित्य

458
00:32:51,040 --> 00:32:55,040
मानना पड़ेगा। उस ईश्वर सिद्ध कर देंगे ना। जब तक आप माया में हो तब

459
00:32:55,040 --> 00:32:59,520
तक वो आपको हर वो चीज समझा दिखा सकते हैं जो आप जो

460
00:32:59,520 --> 00:33:03,760
वो हर वो चीज कर करके दिखा सकते हैं जो आप कहो। तो

461
00:33:03,760 --> 00:33:07,920
हम लेकिन वो भी माया ही होगा। असल में नहीं करेगा वो। तो फिर हमने कहा

462
00:33:07,920 --> 00:33:12,240
तो व्यवहार में आप सुनो तो पहले पूरी बात असल

463
00:33:12,240 --> 00:33:18,000
में नहीं करेगा तो हम भी तो तत्व से कुछ और बात कह रहे हैं।

464
00:33:18,000 --> 00:33:22,160
यानी कि तत्व के दृष्टि से वो वो जो सगुण साकार रूप है वो

465
00:33:22,160 --> 00:33:26,240
अनित्य ही है। हां तो मानना ही पड़ेगा ना। जब

466
00:33:26,240 --> 00:33:32,000
भगवान ज्ञान स्वरूप प्राप्त हो रहे हैं, शरीर स्वरूप थोड़ी ना प्राप्त हो रहे हैं।

467
00:33:32,000 --> 00:33:36,000
यही बात मैं कह रहा हूं कि जितना सत्य निर्गुण निराकार है, उतना नित्य ये वाला

468
00:33:36,000 --> 00:33:40,240
नहीं है, सगुण साकार नहीं है। अरे तो भाई तत्व की दृष्टि से तो हमने कब कहा है?

469
00:33:40,240 --> 00:33:44,480
आप समझने का प्रयास करो। उसको दो चार बार रिपीट करके देखो। व्यवहार

470
00:33:44,480 --> 00:33:48,640
में भगवान का स्वरूप अनित्य

471
00:33:48,640 --> 00:33:52,800
है। ये हम सिद्ध कैसे करेंगे? भगवान तो जितनी बार अपनी देह का नाश करेंगे उसके बाद फिर

472
00:33:52,800 --> 00:33:57,280
प्रकट हो जाएंगे। तो इसका मतलब वो केवल प्रकट और अप्रकट

473
00:33:57,280 --> 00:34:01,440
हुआ। उसको अनित्य घोषित कैसे करेंगे? आपने उनका पैर

474
00:34:01,440 --> 00:34:05,680
पकड़ लिया मान लीजिए भगवान का। ठीक? अब पैर पकड़ने

475
00:34:05,680 --> 00:34:09,760
के बाद आपने कहा कि अब प्रभु आप जो है

476
00:34:09,760 --> 00:34:13,840
देह क्या कहते हैं? देह का नाश करके दिखाओ। उन्होंने देह

477
00:34:13,840 --> 00:34:17,840
का नाश भी किया। फिर भी आपको फील हुआ कि पैर पकड़ा हुआ है।

478
00:34:17,840 --> 00:34:22,080
वो दूर से खड़े होकर भी दिखाई दिए। आपको पता चला कि हमने तो कोई तना

479
00:34:22,080 --> 00:34:26,080
पकड़ा हुआ है। सिद्ध कैसे करोगे? वो हर वो काम

480
00:34:26,080 --> 00:34:30,640
करके दिखा देंगे। इसलिए व्यवहार

481
00:34:30,640 --> 00:34:33,600
में भगवान का जो स्वरूप होता है वो नित्य होता है।

482
00:34:33,600 --> 00:34:37,680
उसको आप सिद्ध नहीं कर सकते। वो अनित्य है। नहीं सिद्ध में कर

483
00:34:37,680 --> 00:34:42,720
सकता हूं लेकिन ठीक है। कैसे करेंगे बताइए?

484
00:34:42,720 --> 00:34:46,880
उनका जो वो सगुण साकार रूप है वो वो खुद बना ही माया से

485
00:34:46,880 --> 00:34:51,040
है तो फिर यहां से माया से बनना तत्व माया से बनना

486
00:34:51,040 --> 00:34:55,040
तत्व दृष्टि की बात हो गई ना अभी आप एक भौतिक

487
00:34:55,040 --> 00:34:59,040
संसार में आप केवल भौतिक बातें करिए सिद्ध करिए भगवान का स्वरूप

488
00:34:59,040 --> 00:35:03,040
नित्य नहीं है केवल भौतिकता से तत्व की दृष्टि से तो मैं भी बोल रहा हूं

489
00:35:03,040 --> 00:35:07,280
ना कि नित्य नहीं है जब आप माया से बना होना बता रहे हैं तो आप तात्विक दृष्टि

490
00:35:07,280 --> 00:35:10,720
से बता रहे हैं ना

491
00:35:10,720 --> 00:35:14,720
तो भौतिक संसार में जो हमें दिख रहा है सगुण साकार रूप वो क्या दिख रहा है

492
00:35:14,720 --> 00:35:19,120
वो तो वो तो हमें निर्गुण निराकार ब्रह्म तत्व पर डायरेक्ट नहीं दिख रहा

493
00:35:19,120 --> 00:35:23,280
वो तो भगवान सामने खड़े हैं उनको अनित्य

494
00:35:23,280 --> 00:35:27,120
अनित्य सिद्ध करो आप

495
00:35:27,120 --> 00:35:31,840
करो सिद्ध क्योंकि वो पंचभूतों से बने है इसलिए अनित्य है पंचभूत

496
00:35:31,840 --> 00:35:35,920
फिर तत्व पे जा रहे हो मैं कह रहा हूं भौतिकता से सिद्ध

497
00:35:35,920 --> 00:35:41,200
करो कि भगवान का स्वरूप नाशवान है

498
00:35:41,200 --> 00:35:45,280
अरे शिव जी पंचभूत कोई तत्व नहीं होता। पंचभूत कार्य ही है

499
00:35:45,280 --> 00:35:48,640
माया के।

500
00:35:48,640 --> 00:35:52,640
पंचभूत से बना होना मालूम कैसे पड़ रहा है आप? गढ़ता में जा रहे हो तब

501
00:35:52,640 --> 00:35:55,440
ना।

502
00:35:55,440 --> 00:35:59,520
पंचभूत से बना होना तभी हम जान पा रहे हैं। क्योंकि जो रूप पंचभूत नहीं

503
00:35:59,520 --> 00:36:03,520
है। किरण जी आपने कहा माया के कार्य फिर माया का होना फिर आपने आप पहुंच

504
00:36:03,520 --> 00:36:07,600
गए तात्विक दृष्टि में। आपको बोल तो

505
00:36:07,600 --> 00:36:11,760
रहा हूं आप मनन करिए पहले। आप जब जब भगवान दो

506
00:36:11,760 --> 00:36:15,760
और दो को पांच आपके मन में डाल सकते हैं। भाई इस समय

507
00:36:15,760 --> 00:36:19,760
मैसेज मत करो आप प्लीज थोड़ा सा रुक जाइए। जब

508
00:36:19,760 --> 00:36:23,760
भगवान दो और दो को पांच डाल सकते हैं। अपनी माया शक्ति से

509
00:36:23,760 --> 00:36:28,800
आपके मन में तो आप अपने स्वरूप की नित्यता नहीं डाल सकते।

510
00:36:28,800 --> 00:36:34,080
सिंपल सी बात नहीं समझ रहे हो आप।

511
00:36:34,080 --> 00:36:38,240
तो व्यवहार में ठीक है। मैं व्यवहार नहीं करूंगा

512
00:36:38,240 --> 00:36:42,720
मैं। व्यवहार में हम ये सिद्ध नहीं कर सकते। भगवान का स्वरूप

513
00:36:42,720 --> 00:36:46,720
अनित्य है। हां तात्विक दृष्टि से वो

514
00:36:46,720 --> 00:36:50,800
ज्ञान स्वरूप हमें प्राप्त होते हैं। परंतु व्यवहार

515
00:36:50,800 --> 00:36:55,040
में तो उनका अपनी देह का नाश करना हमें प्रकट और अप्रकट मानना

516
00:36:55,040 --> 00:36:59,040
पड़ेगा। उनका दृष्टिगोचर होना और अगोचर होना मानना

517
00:36:59,040 --> 00:37:03,520
पड़ेगा। तो वो अनित्य सिद्ध कहां हुए? नित्य हुए। तो जब तक हम व्यवहारिक

518
00:37:03,520 --> 00:37:07,520
हैं तब तक हमारे लिए वो स्वरूप हमारी जानकारी में व्यवहारिक जानकारी यही

519
00:37:07,520 --> 00:37:11,600
है कि वो नित्य है। वो स्वरूप नित्य है। उसको नित्य समझ के ही तो पूजा करते

520
00:37:11,600 --> 00:37:15,440
हैं हम।

521
00:37:15,440 --> 00:37:19,440
समझ रहे हैं? अविनाशी जैसे मान लीजिए सिंपल

522
00:37:19,440 --> 00:37:23,440
सी बात है कि उन्होंने अपनी देह का नाश किया। पंच भौतिक देह है।

523
00:37:23,440 --> 00:37:27,520
उन्होंने अपनी देह का नाश किया। नाश हो गया। हम दोबारा प्रकट

524
00:37:27,520 --> 00:37:31,680
हो सकते हैं कि नहीं? हां वो तो हो सकते हैं।

525
00:37:31,680 --> 00:37:35,680
इसका मतलब क्या मानना पड़ेगा कि देह का नाश नहीं हुआ था। अगर हम यह कहेंगे दूसरा

526
00:37:35,680 --> 00:37:39,760
व्यक्ति दूसरा जन्म है तो हम लोग किन पैराटर्स से नापेंगे कि

527
00:37:39,760 --> 00:37:44,160
दूसरा है वो सारे पैराटर्स क्या होंगे? भौतिक यानी कि फिंगरप्रिंट्स,

528
00:37:44,160 --> 00:37:48,160
तिल, मस्सा, चोट का निशान। क्या वो सारे निशान, वो सारे

529
00:37:48,160 --> 00:37:54,160
फिंगरप्रिंट्स आ सकते हैं कि नहीं? उनकी नई बॉडी पर।

530
00:37:54,880 --> 00:37:58,880
जी हां, आ सकते हैं। तो इसीलिए हम लोग अविनाशी सिद्ध नहीं कर सकते व्यवहार

531
00:37:58,880 --> 00:38:03,040
में। दो पक्ष है। एक आर्य समाज का पक्ष है जो यह कहता

532
00:38:03,040 --> 00:38:07,440
है कि भगवान व्यवहार में अनित्य है और तत्व

533
00:38:07,440 --> 00:38:11,440
से कहता है कि तत्व से भी अनित्य है और

534
00:38:11,440 --> 00:38:15,680
व्यवहार में भी अनित्य है। दूसरा पक्ष है ये रामपाल

535
00:38:15,680 --> 00:38:19,920
और ये इस टाइप का जो कहता है कि भगवान जो है तत्व

536
00:38:19,920 --> 00:38:23,920
में भी नित्य है और यहां भी नित्य है। तो ये वाला इसलिए गलत है

537
00:38:23,920 --> 00:38:28,240
क्योंकि ये तत्व को व्यवहार में डाल रहा है। तत्व की अनित्यता को व्यवहार

538
00:38:28,240 --> 00:38:32,640
में अनित्यता में डाल रहा है और यह वाला इसलिए गलत है क्योंकि यह

539
00:38:32,640 --> 00:38:36,800
अह क्या कहते हैं अह तत्व की नित्यता को व्यवहार में नित्यता

540
00:38:36,800 --> 00:38:41,040
में डाल रहा है। व्यवहार से नित्य है। व्यवहार व्यवहारिक जगत

541
00:38:41,040 --> 00:38:45,200
से वो नित्य है व्यवहारिक दृष्टि से और जो है तत्व की दृष्टि

542
00:38:45,200 --> 00:38:49,280
से अनित्य है। ठीक है? और

543
00:38:49,280 --> 00:38:53,280
सोचिए जो वो थोड़े समय के लिए जो तिरोभाव उनका हो गया। ठीक है?

544
00:38:53,280 --> 00:38:57,520
हम तो उस समय तो वो आंखों से ओझल हो गए ना। तो बात वहां

545
00:38:57,520 --> 00:39:01,600
ये आएगी कि वो आंखों से ओझल हुए कि आप अंधे हुए। आप

546
00:39:01,600 --> 00:39:05,600
समझिए बात को उन्होंने आपको अंधा किया है ना वहां। वो

547
00:39:05,600 --> 00:39:09,600
कहां प्रकट अप्रकट हुए? उन्होंने आपको अंधा बनाया। फिर

548
00:39:09,600 --> 00:39:10,100
उन्होंने

549
00:39:10,000 --> 00:39:16,000
आपको आंखें दे दी। लो कैसे सिद्ध करोगे अनित्यता?

550
00:39:19,120 --> 00:39:23,120
तो जब तक आप जीव भाव को प्राप्त हो तो ईश्वर के जो स्वरूप

551
00:39:23,120 --> 00:39:27,440
है वह नित्य है। ठीक है। ऐसा

552
00:39:27,440 --> 00:39:31,520
ठीक है। वो तत्व की दृष्टि है कि माया से बना है। माया

553
00:39:31,520 --> 00:39:35,680
के कार्य हैं। वो सब तत्व की दृष्टि से जीवित हो मनुष्य हो

554
00:39:35,680 --> 00:39:40,080
भगवान नित्य है। सिंपल ठीक है।

555
00:39:40,080 --> 00:39:46,080
जी जी धन्यवाद। जय श्री राम। हां जी।

556
00:39:47,120 --> 00:39:50,960
हेलो जय

557
00:39:50,960 --> 00:39:54,960
भैया मेरा एक प्रश्न था जैसे जैसे आपने बताया जीव की

558
00:39:54,960 --> 00:39:59,120
चाह का उद्देश्य सच्चिदानंद है मतलब इस दुनिया में जो भी जीव चाहता

559
00:39:59,120 --> 00:40:03,360
है सब सब कुछ ना कुछ व्यवस्था है जैसे भूख है तो खाना मौजूद

560
00:40:03,360 --> 00:40:07,360
जी आपसे कई बार बात कर चुके हैं क्या लगभग लगभग इसी टॉपिक पर बुद्ध

561
00:40:07,360 --> 00:40:11,600
इत्यादि के विषय में भी जी जी जी बस बस इसमें इसी में थोड़ा सा

562
00:40:11,600 --> 00:40:15,440
कन्फ्यूजन है बस उसी को क्लियर करना है

563
00:40:15,440 --> 00:40:19,440
मेरा इसमें प्रश्न है कि जैसे सब कुछ का है तो हम ये कैसे

564
00:40:19,440 --> 00:40:23,760
मान जो जीव का उद्देश्य है वो सच्चिदानंद है वो ईश्वर है

565
00:40:23,760 --> 00:40:27,760
ये भी कह सकते हैं कि वो जो पहले ये समझिए

566
00:40:27,760 --> 00:40:31,920
हां ठीक है बोल लीजिए आप बोल लीजिए हां मैं ये कह सकता हूं कि

567
00:40:31,920 --> 00:40:35,920
क्या पता जैसे बौद्ध लोग बौद्ध लोग कहते हैं कि वो निर्माण

568
00:40:35,920 --> 00:40:39,920
को प्राप्त करना है ठीक है मैं ये भी कह सकते हैं कि मान लीजिए कोई ऐसी

569
00:40:39,920 --> 00:40:44,000
जगह हो सच्चिदानंद एक जगह हो हम लोग एक ईश्वर कैसे डिफाइन

570
00:40:44,000 --> 00:40:48,000
कर सकते क्या पता वो एक ऐसी प्लेस हो उस प्लेस में जाके ईश्वर दुनिया

571
00:40:48,000 --> 00:40:52,160
के सारे मोह खत्म हो जाए या मतलब सच्चिदानंद को प्राप्त कर ले आप

572
00:40:52,160 --> 00:40:57,360
एक जगह को एक ईश्वर कैसे बना सकते हैं ये चीज

573
00:40:57,360 --> 00:41:01,600
पहली बात ये है कि आप यह मत देखिए कि

574
00:41:01,600 --> 00:41:02,160
जीव की

575
00:41:02,160 --> 00:41:06,160
चाह से सिद्ध होता है कि भगवान क्या है पहले आप ये समझिए भगवान है क्या

576
00:41:06,160 --> 00:41:10,160
जो सच्चिदानंद स्वरूप हो अब हमारे अंदर चाह

577
00:41:10,160 --> 00:41:14,480
क्या है सच्चिदानंद की चाह है तो सच्चिदानंद की चाह का अवतार

578
00:41:14,480 --> 00:41:18,640
क्या है? व्यवहारिक जीवन में हमारे मन में चाह विद्यमान

579
00:41:18,640 --> 00:41:22,800
है सतचित आनंद की। यह चाह अवतार लेती है। किस

580
00:41:22,800 --> 00:41:26,960
रूप में? कि कोई अगर हमें मार रहा है तो हम भागते हैं। हमें

581
00:41:26,960 --> 00:41:31,120
कूदने से डर लगता है। यह अवतार है हमारी चाह का। सर्वाइवल

582
00:41:31,120 --> 00:41:35,120
जो चाह है ना हमारी उसका यह अवतार हो गया।

583
00:41:35,120 --> 00:41:39,120
कि हमें पता कैसे लग रहा है कि हमारे अंदर ये चाह है इनबिल्ट। यह

584
00:41:39,120 --> 00:41:43,280
चाह है। ये तो मानते हैं ना बुद्ध वाले भी। जी

585
00:41:43,280 --> 00:41:47,440
ठीक है तो हमारे अंदर इनबिल्ट चा जो है वह अवतार लेती है

586
00:41:47,440 --> 00:41:51,520
और वह दुनिया के हर कार्य को करने वाली होना चाहती है।

587
00:41:51,520 --> 00:41:55,600
जितनी भी विपरीत परिस्थितियां हैं जो हमें अपने अनुकूल नहीं लग

588
00:41:55,600 --> 00:42:00,480
रही है उन्हें अपने अनुकूल बनाना चाहती हैं। इतनी बात समझ में आ गई?

589
00:42:00,480 --> 00:42:04,560
जी। ठीक है। तो अब इस चाह का विषय कौन है? सच्चिदानंद

590
00:42:04,560 --> 00:42:08,880
स्वरूप परमेश्वर। तो सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर होगा। यदि वह एक जगह मात्र

591
00:42:08,880 --> 00:42:12,960
होगा तो क्या उसका अवतरण ऐसा हो पाएगा जो दुनिया के

592
00:42:12,960 --> 00:42:16,960
समस्त कार्य कर सके? क्योंकि हमारी चाह का अवतार क्या है? हमारी चाह

593
00:42:16,960 --> 00:42:17,680
का अवतार

594
00:42:17,680 --> 00:42:21,840
है कि हम दुनिया की जितनी अपने अनुकूल परिस्थितियां नहीं है उनको अपने

595
00:42:21,840 --> 00:42:26,240
अनुकूल बनाना चाहते हैं। जितनी प्रतिकूल परिस्थितियां हैं उनको अपने अनुकूल

596
00:42:26,240 --> 00:42:30,560
बनाना चाहते हैं। तो इसका मतलब जो सच्चिदानंद होगा वो ऐसा

597
00:42:30,560 --> 00:42:34,720
अवतार ऐसा रूप धारण कर सकेगा उसका अवतार हो जैसे हमारी चाह

598
00:42:34,720 --> 00:42:38,880
का अवतार है वैसे ही उसका भी अवतार हो जो सब कुछ कर सकता हो।

599
00:42:38,880 --> 00:42:43,040
अपने अनुकूल पूरी दुनिया को बना सकता हो। मगर यदि वो एक जगह मात्र है

600
00:42:43,040 --> 00:42:47,280
तो वह जगह बना सकती है। अपने अनुकूल ऐसा

601
00:42:47,280 --> 00:42:52,240
रूप धारण करके वह भी अवतरित हो सकती है जिससे कि हम पता लगा सके कि हमारी

602
00:42:52,240 --> 00:42:56,640
जिन इच्छाओं के मूल में सच्चिदानंद है उसका भी निवारण

603
00:42:56,640 --> 00:43:01,760
यही है जिसके मूल में सच्चिदानंद है। समझ पा रहे हैं जो कह रहा हूं

604
00:43:01,760 --> 00:43:05,920
बहुत कंफ्यूजन हो रही है। तो वो जो जगह है जब आप उसको केवल एक स्पेस

605
00:43:05,920 --> 00:43:10,000
तक सीमित रख रहे हैं तो यानी कि वो सर्वशक्तिमान नहीं

606
00:43:10,000 --> 00:43:14,320
है। कुल मिलाकर के बात आ जाती है सर्वशक्तिमान की। हमारी चाह

607
00:43:14,320 --> 00:43:18,400
है सर्वशक्तिमान की तो उस चाह का निवारण करने वाली जो

608
00:43:18,400 --> 00:43:23,040
जगह होगी अगर वह जगह मात्र स्थान मात्र है तो वो सर्वशक्तिमान

609
00:43:23,040 --> 00:43:27,040
नहीं है और यदि वो सब कुछ कर सकती तो वही तो सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर

610
00:43:27,040 --> 00:43:31,040
है। अगर वो सब कुछ अगर वो वास्तविकता में

611
00:43:31,040 --> 00:43:32,880
सच्चिदानंद है तो

612
00:43:32,880 --> 00:43:37,840
वो उसका व्यवहारिक जो अवतरण होगा वो होगा सर्वशक्तिमान

613
00:43:37,840 --> 00:43:42,320
ईश्वर में। जैसे हमारी जो मूल चाह है उसका अवतरण

614
00:43:42,320 --> 00:43:47,520
है। सर्वशक्तिमान की चाह है कि नहीं है?

615
00:43:47,520 --> 00:43:51,680
बिल्कुल। है ना? तो तो जो हमारी चाह का विषय होगा

616
00:43:51,680 --> 00:43:55,760
उसका भी अवतरण होगा। किस रूप में? सर्वशक्तिमान में जो वहां

617
00:43:55,760 --> 00:44:00,000
व्यवहार में व्यवहार से टकरा पाए। हमारी चाह का अवतरण हुआ। सर्वशक्तिमान

618
00:44:00,000 --> 00:44:04,160
की चाह। तो इधर सच्चिदानंद का अवतरण हुआ सर्वशक्तिमान में। तो

619
00:44:04,160 --> 00:44:08,160
सर्वशक्तिमान की चाह का निवारण किसने किया? सर्वशक्तिमान ने। तो हमारी चाह

620
00:44:08,160 --> 00:44:12,240
के मूल में क्या था? सच्चिदानंद। सर्वशक्तिमान के मूल में क्या है? सच्चिदानंद।

621
00:44:12,240 --> 00:44:16,240
यहां पर जो क्या कहते हैं? पारमार्थिक धरातल पर इसको यह मिल गया।

622
00:44:16,240 --> 00:44:20,480
व्यवहारिक धरातल पर उसको वह मिल गया। व्यवहारिक धरातल

623
00:44:20,480 --> 00:44:24,560
पर हम सारी परिस्थितियों को अपने अनुकूल करना चाहते

624
00:44:24,560 --> 00:44:28,560
थे। तो हमें ऐसा कोई मिल गया जो सारी परिस्थितियों के अपने अनुकूल कर

625
00:44:28,560 --> 00:44:32,880
सकता है। तो वहां पर व्यवहारिक धरातल पर निराकरण मिला हमें

626
00:44:32,880 --> 00:44:36,960
और फिर उसके द्वारा हमने उस जगह को प्राप्त किया जहां

627
00:44:36,960 --> 00:44:41,440
पर हमारे मन के अंदर इस तरफ सच्चिदानंद की चाह है तो उसका निरा निराकरण

628
00:44:41,440 --> 00:44:45,600
करने वाला कौन है? सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर। ठीक है? अगर उसको स्थान

629
00:44:45,600 --> 00:44:48,160
मात्र तक सीमित कर देंगे तो वो

630
00:44:48,160 --> 00:44:52,240
सर्वशक्तिमान व्यवहार जगत में आकर के सर्वशक्तिमत्ता सिद्ध

631
00:44:52,240 --> 00:44:56,240
नहीं कर पाएगा। सर्वशक्तिमत्ता सिद्ध नहीं कर पा रहा है। यानी व्यवहारिक जगत में जो

632
00:44:56,240 --> 00:45:00,320
हमारी चाह का जो अवतरण हो रहा है उसका ही निराकरण हमें प्राप्त नहीं हो रहा है।

633
00:45:00,320 --> 00:45:04,400
तो फिर हम ऐसे जो आ ही नहीं रहा है जो हमारा निराकरण की

634
00:45:04,400 --> 00:45:10,080
शुरुआत ही नहीं दे रहा है तो उसको किसको प्राप्त करके हम सर्वशक्तिमान तक पहुंचेंगे।

635
00:45:10,080 --> 00:45:15,520
हम किसका आलंबन लेकर पहुंचेंगे?

636
00:45:15,520 --> 00:45:19,520
ठीक है। तो जैसे आपने कहा कि हमारे जैसे

637
00:45:19,520 --> 00:45:23,520
हमारे जो शास्त्र है वो सब कुछ शब्द प्रमाण पे वो है तो

638
00:45:23,520 --> 00:45:27,520
ये सिर्फ शब्द प्रमाण पे ही क्यों है? और कोई क्यों नहीं है और कोई

639
00:45:27,520 --> 00:45:33,520
कई बार बता चुका हूं। आप बार-बार एक ही प्रश्न करते हैं।

640
00:45:33,520 --> 00:45:38,000
तर्क की पराकाष्ठा है, आस्था भी है। मगर आस्था

641
00:45:38,000 --> 00:45:43,440
किस पर है? तर्क की पराकाष्ठा पर। ठीक है?

642
00:45:43,440 --> 00:45:47,840
जी इसको समझिए जाकर के हमारे हमारा

643
00:45:47,840 --> 00:45:52,000
भी एक आस्था से ही शुरुआत है कि हमें वेदों पर आस्था है। पर हमें जिस

644
00:45:52,000 --> 00:45:56,320
पर आस्था है वो ये क्लेम नहीं करते कि हमें भगवान ने रचा।

645
00:45:56,320 --> 00:46:00,320
वो ये क्लेम करते हैं कि हम अपुरुष हैं। सिंपल जब

646
00:46:00,320 --> 00:46:03,360
तक किसी और चीज का आलंबन लेना होगा किसी की

647
00:46:03,360 --> 00:46:07,440
प्रमाणिकता सिद्ध करने के लिए तब तक दुनिया की कोई चीज प्रमाणिक सिद्ध हो ही

648
00:46:07,440 --> 00:46:11,600
नहीं पाएगी। कुछ भी ले आइए आप तो कोई

649
00:46:11,600 --> 00:46:15,760
ऐसी चीज होनी होगी जिसका वह स्वतः प्रमाण हो वही स्वयं को प्रमाणित

650
00:46:15,760 --> 00:46:19,200
करे।

651
00:46:19,200 --> 00:46:23,280
ठीक है जी बहुत ही लास्ट क्वेश्चन ये निर्गुण और निराकार अब

652
00:46:23,280 --> 00:46:28,640
आप अगली बार सेम क्वेश्चन सेम पृष्ठभूमि लेके नहीं आएंगे।

653
00:46:28,640 --> 00:46:33,440
कई बार आपका निराकरण कर चुका हूं। लगभग इसी के इर्दगिर्द घूमता है सारा।

654
00:46:33,440 --> 00:46:39,040
लास्ट क्वेश्चन और निराकर का मतलब क्या होता है?

655
00:46:39,040 --> 00:46:41,760
हेलो

656
00:46:41,760 --> 00:46:45,920
देवांश जी को बोल देने दीजिए बोलिए भैया ये निर्गुण

657
00:46:45,920 --> 00:46:49,920
निराकार क्या होता है क्योंकि ये स्पॉन वाले कहते हैं जो व्यवहार में

658
00:46:49,920 --> 00:46:54,160
ना आ सकने वाला सीधी बात वो लाइट वो लाइट समझती है ईश्वर को

659
00:46:54,160 --> 00:46:58,320
सीधी बात समझ लीजिए जो व्यवहार का विषय ना हो सके

660
00:46:58,320 --> 00:47:02,400
इंद्रियों का विषय ना हो सके वो है निर्विशेष निर्गुण

661
00:47:02,400 --> 00:47:08,240
निराकार ठीक है धन्यवाद धन्यवाद

662
00:47:08,240 --> 00:47:12,560
हेलो

663
00:47:12,560 --> 00:47:16,720
किसकी बारी है? किसकी बारी है? जी

664
00:47:16,720 --> 00:47:21,120
आप म्यूट करो म्यूट करो विशाल बोल रहे हैं भैया

665
00:47:21,120 --> 00:47:25,120
हां विशाल जी जय श्री राम आपको जय श्री राम जी मेरा

666
00:47:25,120 --> 00:47:29,520
प्रश्न भैया ये था कि जैसे कि मोक्ष में जो मोक्ष में भी हायरार्की

667
00:47:29,520 --> 00:47:34,000
होती है क्या जैसे कि केवल मोक्ष सायुज मोक्ष और एक जो होता है जो

668
00:47:34,000 --> 00:47:40,000
ईश्वर के जैसे निराकार रूप रूप को प्राप्त होना

669
00:47:44,720 --> 00:47:49,200
जितने भी ये जो मोक्ष हैं कैवल्य को छोड़कर के इनकी

670
00:47:49,200 --> 00:47:53,200
प्राप्ति का पर्यावसान भी कैवल्य में ही है। वहां पर

671
00:47:53,200 --> 00:47:57,360
आपकी अपनी इच्छा पर होता है कि प्रभु से यदि आप कुछ वहां ऐसा

672
00:47:57,360 --> 00:48:01,520
व्यवहार नहीं करना पड़ता। प्रभु आपको ज्ञान दे देते हैं। ज्ञान ज्ञान स्वरूप

673
00:48:01,520 --> 00:48:06,720
मोक्ष भी प्राप्त हो जाता है। ठीक है? जी

674
00:48:06,720 --> 00:48:11,040
मोक्ष तो जैसे थोड़ा सा जैसे मोक्ष तो नित्य होता है ना

675
00:48:11,040 --> 00:48:15,040
मोक्ष मिलने के बाद फिर वापस तो नहीं आना होता है इस बारे में हम लोग

676
00:48:15,040 --> 00:48:19,200
विचार काफी कर चुके हैं और दोबारा जब चैप्टर आएगा तो ठीक से बात

677
00:48:19,200 --> 00:48:23,200
करेंगे है ना काफी सारी बातें इस पर कर चुके हम लोग हां

678
00:48:23,200 --> 00:48:27,600
भैया ठीक है भैया तो एक दूसरा और प्रश्न है छोटा सा जैसे महाभारत

679
00:48:27,600 --> 00:48:32,160
से रिलेटेड जैसे महाभारत जो हमारा ग्रंथ है तो उसकी प्रमाणिकता को लेकर

680
00:48:32,160 --> 00:48:36,320
अह जैसे कौन पब्लिकेशन का है जो

681
00:48:36,320 --> 00:48:41,600
वो प्रमाण देखिए कोई भी पब्लिकेशन प्रमाणिक नहीं है।

682
00:48:41,600 --> 00:48:45,600
किसी भी पब्लिकेशन को आंख बंद करके प्रमाण के रूप में नहीं

683
00:48:45,600 --> 00:48:49,600
माना जा सकता। जिस पब्लिकेशन का जो ग्रंथ हमारे परंपरा

684
00:48:49,600 --> 00:48:53,760
प्राप्त आचार्य गण प्रमाणित कर दें। इस आधार पर कि उन्होंने

685
00:48:53,760 --> 00:48:57,840
अपने पूर्वाचार्यों से पढ़ा अपने सिद्धांतों के आधार पर वही प्रमाणिक होता

686
00:48:57,840 --> 00:49:02,080
है। अब काफी हद तक चौखंबा और गीता

687
00:49:02,080 --> 00:49:06,160
प्रेस के जो ग्रंथ हैं। उनके प्रामाणिक आचार्यों के

688
00:49:06,160 --> 00:49:10,320
द्वारा नाम सुझाए जाते हैं। तो आप उनको अध्ययन करें। परंतु

689
00:49:10,320 --> 00:49:14,400
यदि कोई कहीं ऐसी विपरीतार्थक बात आ जाती है तो उसके बारे

690
00:49:14,400 --> 00:49:18,560
में गुरुदेव से प्रश्न करें कि गुरुदेव हमारे सिद्धांतों के विरुद्ध जाती हुई ये बात दिख

691
00:49:18,560 --> 00:49:22,560
रही है। तो वह बताएंगे आपको कहीं कुछ मिक्स तो नहीं हो गया, कुछ

692
00:49:22,560 --> 00:49:26,640
नहीं हो गया या फिर इसमें जो आपको भ्रम उत्पन्न हो रहा है, वह क्यों हो

693
00:49:26,640 --> 00:49:30,720
रहा है? जैसे कभी किसी ने यही कह दिया। एक बार मैंने

694
00:49:30,720 --> 00:49:34,720
बताया था कि हनुमान जी की दृष्टि जो है वह सीता माता के विषय में मनन कर रहे

695
00:49:34,720 --> 00:49:38,720
हैं। उनके अंग प्रत्यंगों के बारे में विचार कर रहे हैं। सीता

696
00:49:38,720 --> 00:49:42,640
माता को जब अशोक वाटिका में जाते हैं सूचना देने श्री राम जी

697
00:49:42,640 --> 00:49:46,960
की तो वहां माता के अंग प्रत्यंगियों के बारे में बहुत साफ-साफ

698
00:49:46,960 --> 00:49:51,440
लिखा है वाल्मीकि जी ने। सभी अंगों के बारे में।

699
00:49:51,440 --> 00:49:55,440
तो वहां पर यह विचार आ जाएगा अरे हनुमान जी तो बाल ब्रह्मचारी है। ऊपर से सीता

700
00:49:55,440 --> 00:49:59,440
माता के लिए कैसी-कसी बातें सोच रहे हैं। तो ये क्या हुआ? हमारे जो

701
00:49:59,440 --> 00:50:03,520
सिद्धांत है सिद्धांत क्या है? वो बाल ब्रह्मचारी हैं और वह

702
00:50:03,520 --> 00:50:08,000
उनकी माता के तुल्य हैं। फिर ऐसी बात क्यों आ रही है इनके मन में? तो सिद्धांतों

703
00:50:08,000 --> 00:50:12,160
के विपरीत जाता हुआ दिखेगा तो उस पर आपको मनन मनन

704
00:50:12,160 --> 00:50:16,320
की आवश्यकता है। अपने गुरु के सानिध्य की आवश्यकता है। गुरु आएंगे वो

705
00:50:16,320 --> 00:50:20,560
बताएंगे कि यहां पर हनुमान जी के द्वारा इस इस तरह के विचारों

706
00:50:20,560 --> 00:50:25,520
का अर्थ क्या है? तो अर्थ ये था कि जब भी हम किसी स्त्री को ढूंढने जाते हैं,

707
00:50:25,520 --> 00:50:29,680
भीड़ में देखने जाते हैं तो स्त्री की शुरुआत उसके शरीर शारीरिक

708
00:50:29,680 --> 00:50:33,680
संरचना से होती है। वो हमारे सतह कई

709
00:50:33,680 --> 00:50:37,680
परतों के बाद जो है वो फीड है। वो इंफॉर्मेशन कि हम एक

710
00:50:37,680 --> 00:50:41,920
अपनी माता जी को ढूंढने जा रहे हैं। बहन जी को ढूंढने जा रहे हैं। तो वो फीड है कि वो किसको

711
00:50:41,920 --> 00:50:46,080
ढूंढने जा रहे हैं। वो स्त्री है। उसका शरीर एक स्त्री है जैसा होगा। तो वह जो

712
00:50:46,080 --> 00:50:50,160
इतने अंदरूनी जो विचार हैं यहां पर होगा कि उनके

713
00:50:50,160 --> 00:50:54,560
शारीरिक संरचना भी का विचार भी बहुत गढ़ता

714
00:50:54,560 --> 00:50:58,080
के साथ आपके मनन में आएगा। परंतु

715
00:50:58,080 --> 00:51:02,560
सतह स्तर पर ना होने से आप यह समझ नहीं पाएंगे कि आपने ये बात सोची कि नहीं सोची।

716
00:51:02,560 --> 00:51:06,640
तो वहां पर बहुत क्लेरिटी के साथ वो बात बताई गई है कि

717
00:51:06,640 --> 00:51:10,640
इस स्तर तक की बात वहां पर बताई गई। एक स्त्री को आप ढूंढने जाएंगे तो

718
00:51:10,640 --> 00:51:14,800
स्त्री की पहली पहचान क्या है? वो स्त्री जैसी लगे। तो स्त्री जैसी

719
00:51:14,800 --> 00:51:19,280
लगने के लिए जो अंग प्रत्यंगियों की संरचना की बात आएगी तो उस विचार होता है

720
00:51:19,280 --> 00:51:23,520
सबकॉन्शियस माइंड में कई लेयर्स के बाद और ऊपरी

721
00:51:23,520 --> 00:51:27,600
मस्तिष्क से हम ये सोचते हैं कि हमने तो केवल बहन जी को ढूंढा नहीं ढूंढ लिया

722
00:51:27,600 --> 00:51:31,600
केवल चेहरे से ढूंढ लिया। हम सर्वप्रथम

723
00:51:31,600 --> 00:51:36,080
वो एक स्त्री है। तो स्त्री के अनुकूल जो शारीरिक संरचना

724
00:51:36,080 --> 00:51:40,080
आती है मन में वो शारीरिक संरचना उनके आई थी। उनका कोई

725
00:51:40,080 --> 00:51:44,320
भाव ऐसा नहीं था कि कोई कु दृष्टि से उन्होंने वह विचार किए थे। तो

726
00:51:44,320 --> 00:51:48,320
यह हमको क्या हुआ कि एक विपरीत अर्थक कुछ सिद्धांतों के विरुद्ध जाती हुई

727
00:51:48,320 --> 00:51:52,400
कोई बात नजर आई तो हमने गुरु की शरण ली उसको सत्यापित करवा लिया कि

728
00:51:52,400 --> 00:51:56,400
भैया प्रक्षिप्त नहीं है यहां पर ये क्या है ये ऐसा ऐसा

729
00:51:56,400 --> 00:52:00,560
यहां पर अर्थ है इस बात का इसीलिए गुरु गोविंद और ग्रंथ केवल गुरु नहीं केवल

730
00:52:00,560 --> 00:52:04,960
ग्रंथ नहीं केवल गोविंद नहीं केवल ग्रंथ ले लेंगे तो ग्रंथ को सत्यापित कौन करेगा

731
00:52:04,960 --> 00:52:09,680
केवल गुरु को ले लेंगे गुरु को सत्यापित कौन करेगा गुरु कोई भी कह रहा है मैं गुरु मान ले

732
00:52:09,680 --> 00:52:13,360
उसकी बातें हमारे ग्रंथों से मैच नहीं खा रही मान ले तो गुरु गुरु

733
00:52:13,360 --> 00:52:17,840
की बातें ग्रंथ से और ग्रंथ की बातें गुरु से सामंजस्य

734
00:52:17,840 --> 00:52:21,840
से ये समझना होगा हमारे सनातन समाज को ठीक है

735
00:52:21,840 --> 00:52:25,440
चलिए

736
00:52:25,440 --> 00:52:30,640
प्रणाम शिवश भैया जय श्री राम बताइए

737
00:52:30,640 --> 00:52:34,640
भैया मैं राजस्थान से हूं और मेरा ये प्रश्न

738
00:52:34,640 --> 00:52:38,640
था कि जो राज की व्यवस्थाएं

739
00:52:38,640 --> 00:52:42,640
पहली थी वैसी अब वाणी क्या आप पॉसिबल है

740
00:52:42,640 --> 00:52:46,720
अब जो चल रहा है आजकल जो अभी पूरे हमारे देश में चल रहा

741
00:52:46,720 --> 00:52:50,720
है वै जो वैदिक था वैसा अभी आना क्या पॉसिबल

742
00:52:50,720 --> 00:52:55,360
है? हां जो पहली जो व्यवस्थाएं

743
00:52:55,360 --> 00:52:59,440
थी वैदिक काल में भैया वो पूछ रहे हैं कि वैदिक काल में जो व्यवस्था थी क्या वो

744
00:52:59,440 --> 00:53:03,520
पुनः आ सकती है आज के काल को देखते हुए ऐसा मतलब क्या पॉसिबल है कि

745
00:53:03,520 --> 00:53:07,680
वैसी ही व्यवस्था वैसा ही गुरुकुल आदि सब आचार विचार सब आ जाए

746
00:53:07,680 --> 00:53:11,680
इस कलयुग में इस बारे में करपात्री जी महाराज ने बहुत बढ़िया

747
00:53:11,680 --> 00:53:14,400
कहा है

748
00:53:14,400 --> 00:53:18,640
गर्मी का मौसम है यह ज्ञात होने पर भी हम

749
00:53:18,640 --> 00:53:22,640
गर्मी से बचने के उपाय करना नहीं छोड़

750
00:53:22,640 --> 00:53:27,200
देते हैं। सर्दी का मौसम है यह ज्ञात होने पर भी

751
00:53:27,200 --> 00:53:28,480
हम सर्दी से बचने

752
00:53:28,480 --> 00:53:33,120
का उपाय नहीं छोड़ देते हैं। तो उसी प्रकार कलयुग है।

753
00:53:33,120 --> 00:53:37,120
यह सब होगा ही। यह सोच करके हम कलयुग से बचने का उपाय

754
00:53:37,120 --> 00:53:40,480
करना नहीं छोड़ सकते।

755
00:53:40,480 --> 00:53:45,840
ठीक है। थैंक यू भैया। बस यही था। चलिए

756
00:53:45,840 --> 00:53:50,160
जी।

757
00:53:50,160 --> 00:53:54,240
भैया मेरा प्रश्न था अजपा जप तक कैसे पहुंचे?

758
00:53:54,240 --> 00:54:00,240
उस स्थिति तक कैसे पहुंचे और साथ ही साथ आत्मज्ञान के लिए किन ग्रंथों का अध्ययन करें।

759
00:54:01,200 --> 00:54:06,000
आत्मज्ञान के लिए सर्वप्रथम आप ये जो पांच ग्रंथ

760
00:54:06,000 --> 00:54:10,560
बताए जा रहे हैं। पहला ग्रंथ है ज्ञानेश्वरी गीता

761
00:54:10,560 --> 00:54:15,360
उसका अध्ययन कर लीजिए। रामचरितमानस हिंदी

762
00:54:15,360 --> 00:54:19,600
दास बोध भक्ति सुधा गर्व

763
00:54:19,600 --> 00:54:22,320
से कायम हिंदु

764
00:54:22,320 --> 00:54:27,520
ये पांचों का अध्ययन कर लीजिए फिर आपकी गति सभी में हो जाएगी

765
00:54:27,520 --> 00:54:31,760
और जो दूसरा क्या था विधि विषयक प्रश्न था तो वह आचार्य श्री

766
00:54:31,760 --> 00:54:35,920
सेम इत्यादि क्या प्रश्न है आपका

767
00:54:35,920 --> 00:54:40,080
मेरा था कि अजपा जप की स्थिति तक कैसे पहुंचा जा सके उसमें क्या क्या

768
00:54:40,080 --> 00:54:44,560
बाधाएं आती है या क्या विशेष ध्यान रखा जाए कि वहां तक जल्दी से जल्दी पहुंचा जाए

769
00:54:44,560 --> 00:54:48,960
हम अजपा की स्थिति तक हम

770
00:54:48,960 --> 00:54:54,960
उसमें जल्दी से जल्दी पहुंचे किस प्रकार से उसमें क्या-क्या ध्यान रखें

771
00:54:56,160 --> 00:55:01,760
वो आपका प्राप्तव्य है अपने जीवन को जितना ज्यादा संयमित रखिए

772
00:55:01,760 --> 00:55:05,840
और आहार की शुद्धि पर ध्यान दीजिए आहार की शुद्धि से ही चित्त की शुद्धि

773
00:55:05,840 --> 00:55:09,920
होती है जितना ज्यादा हो जितना ज्यादा अपने आचार

774
00:55:09,920 --> 00:55:14,160
विचार आपकी चित्त की शुद्धि होती जाएगी उतना ही ज्यादा आपकी

775
00:55:14,160 --> 00:55:18,400
गति इसमें होती जाएगी जो आप अनुशासन से भगवान की भक्ति करेंगे

776
00:55:18,400 --> 00:55:22,480
फिर वह अपना काम करेगी वह प्राप्तव्य में आ जाएगा जो आप

777
00:55:22,480 --> 00:55:26,480
जो अगले चरण होंगे वो सब प्राप्तव्य में आपको प्राप्त होने लगते

778
00:55:26,480 --> 00:55:30,560
हैं आपका कार्य बस इतना करना है कि अनुशासन से मन

779
00:55:30,560 --> 00:55:34,960
नहीं कह रहा है फिर भी जो है वो सवा घंटे की जो भक्ति है वो करते रहे

780
00:55:34,960 --> 00:55:40,880
फिर आपकी गति भगवान को जहां करानी होगी जिस रूप में करानी होगी वो कराएंगे

781
00:55:40,880 --> 00:55:44,880
ठीक ठीक है भैया बस बस इसमें एक ही दिक्कत आ रही है क्या है कि घर में प्याज

782
00:55:44,880 --> 00:55:48,880
लहसुन वगैरह कभी कभी बन जाता है हम उसमें ना नहीं कर पाते अब घर में

783
00:55:48,880 --> 00:55:53,200
पक रहा है कोई खा रहा है तो क्या करें बाकी जप वगैरह इत्यादि

784
00:55:53,200 --> 00:55:57,440
जितना भी भगवान की भक्ति बढ़ाएंगे

785
00:55:57,440 --> 00:56:01,520
अपनी तरह अपने घर वालों को भी भक्ति कराइए धीरे-धीरे उनके मन में शुद्धि

786
00:56:01,520 --> 00:56:05,920
होने लगेगी उनके मन में प्याज लहसुन या कोई भी और जो ऐसी

787
00:56:05,920 --> 00:56:10,640
चीजें खा रहे होंगे उनके प्रति घृणा वाले विचार आने लगेंगे

788
00:56:10,640 --> 00:56:12,400
तो

789
00:56:12,400 --> 00:56:16,640
अपनी तरह अपने घर को बनाइए। यदि आप सवा

790
00:56:16,640 --> 00:56:20,640
घंटे की भक्ति कर पा रहे हैं तो अपने घर में किसी और को

791
00:56:20,640 --> 00:56:24,640
चालू करवाइए। दो लोगों को देखेंगे तो तीसरी माता जी या जो भी और

792
00:56:24,640 --> 00:56:30,640
परिवार के लोग होंगे वो भी प्रभावित होंगे।

793
00:56:36,640 --> 00:56:42,560
ठीक है वनखेड़े जी आप प्रश्न पूछ सकते हैं माइक ऑन करके

794
00:56:42,560 --> 00:56:48,080
जी भैया जी हेलो हम क्लियर आ रही है जी भैया आवाज

795
00:56:48,080 --> 00:56:53,280
आवाज क्लियर आ रही है हां क्लियर आ रही है जी भैया

796
00:56:53,280 --> 00:56:57,520
भैया जी मैं ये इसी विषय में और थोड़ा बात करना चाह रहा था कि सच्चिदानंद

797
00:56:57,520 --> 00:57:02,720
के इस विषय हम कि जैसे आपने सत्य के विषय में कहा कि

798
00:57:02,720 --> 00:57:06,960
सत का मतलब ऐसा है कि आप पूरे ब्रह्मांड में जितना नॉलेज है

799
00:57:06,960 --> 00:57:11,200
और धरती में जितना नॉलेज है वो सब जान जाते हो। तो मैं

800
00:57:11,200 --> 00:57:16,880
तो मतलब हम तो एक इंसान है। स्वरूप स्वरूप से

801
00:57:16,880 --> 00:57:22,880
मेरी आवाज रिटर्न आ रही मुझे।

802
00:57:23,120 --> 00:57:27,200
जय श्री राम। वानखेड़े जी आपका माइक जो है वो आवाज

803
00:57:27,200 --> 00:57:31,680
रिपीट कर रहा है। अच्छा अब आ रही है ये आवाज?

804
00:57:31,680 --> 00:57:37,440
ठीक है अब बोलिए सत्य का मतलब है मेरा म्यूट हो जा रहा है पता नहीं क्यों

805
00:57:37,440 --> 00:57:41,440
हेलो आ रही है अभी आवाज जी

806
00:57:41,440 --> 00:57:45,440
हां बोलिए बोलिए भैया जी का

807
00:57:45,440 --> 00:57:49,040
अर्थ है स्वरूप से मृत्यु हो जाना

808
00:57:49,040 --> 00:57:55,040
चित का मतलब है अखंड ज्ञान

809
00:57:55,280 --> 00:57:58,480
जड़ताित

810
00:57:58,480 --> 00:58:02,880
चित का मतलब है अखंड ज्ञान तो

811
00:58:02,880 --> 00:58:07,040
भैया मतलब वही हो गया ना मतलब पूरे ब्रह्मांड में जितना नॉलेज है और पूरे धरती

812
00:58:07,040 --> 00:58:11,040
में जितना नॉलेज है मतलब वो सब हमें पता चल जाता है

813
00:58:11,040 --> 00:58:15,200
तो अभी इंसान की दृष्टि से वो कैसा पॉसिबल मतलब हम कैसे

814
00:58:15,200 --> 00:58:19,520
मान ले कि मतलब वैसा हो सकता है

815
00:58:19,520 --> 00:58:24,080
नहीं हो सकता तो मान

816
00:58:24,080 --> 00:58:28,080
लेकिन जो चीज पे आपको विश्वास

817
00:58:28,080 --> 00:58:32,080
नहीं है कि अस्तित्व है तो उसे एक मिनट भैया

818
00:58:32,080 --> 00:58:36,240
वानखेड़े जी अपना माइक जो है उसको ऑफ रखें या एक बार आप लीव करके जॉइ करें

819
00:58:36,240 --> 00:58:40,320
वो रिपीट कर रहा है आवाज को आप समझ रहे हैं बार-बार मुझे म्यूट करना पड़ रहा है क्योंकि जिस

820
00:58:40,320 --> 00:58:44,560
चाह को आप छोड़ नहीं पा रहे हैं चाहकर

821
00:58:44,560 --> 00:58:48,720
भी नहीं छोड़ पा रहे हैं रोबोट जैसे बन जाइए मृत्यु से मत

822
00:58:48,720 --> 00:58:52,880
भागिए जड़ता से मत भागिए इससे तो आप है नहीं

823
00:58:52,880 --> 00:58:57,840
क्यों नहीं छोड़ पा रहे जब जब हमें मालूम है तो

824
00:58:57,840 --> 00:59:02,000
तो जिस चीज का अस्तित्व नहीं होता है उसको मांगने वाले को

825
00:59:02,000 --> 00:59:06,080
भौतिकवादी भी पागल कहते हैं पागल घोषित कर दीजिए

826
00:59:06,080 --> 00:59:10,720
अपने को तो ऐसा पॉसिबल है

827
00:59:10,720 --> 00:59:13,280
इसीलिए

828
00:59:13,280 --> 00:59:13,780
ज्ञान

829
00:59:13,760 --> 00:59:17,760
स्वरूप भगवान होते हैं आप यही बैठे-बैठे अभी

830
00:59:17,760 --> 00:59:22,160
विचार करें तो आप अमेरिका के बारे में भी सोच सकते हैं सबके बारे में सोच सकते हैं

831
00:59:22,160 --> 00:59:26,240
बैठे-बैठे। अच्छा आपको एक बात बताता हूं। चलिए

832
00:59:26,240 --> 00:59:30,240
एक तरीके से बताता हूं। यह बताइए जैसे किसी

833
00:59:30,240 --> 00:59:34,560
व्यक्ति ने पहले कभी भी गुलाब जामुन नहीं खाया है।

834
00:59:34,560 --> 00:59:37,600
ठीक है।

835
00:59:37,600 --> 00:59:41,680
हां भैया जी। मेरी आवाज रिपीट हो रही है क्या? मतलब कोई बात नहीं।

836
00:59:41,680 --> 00:59:45,840
कोई बात नहीं। कोई बात नहीं। अब उसने पहली बार गुलाब जामुन खाया।

837
00:59:45,840 --> 00:59:51,040
हां हम बंद कर दीजिए।

838
00:59:51,040 --> 00:59:55,040
अच्छा अब पहली बार उसने जब गुलाब जामुन खाया

839
00:59:55,040 --> 00:59:59,120
तो उसे एक सुख की अनुभूति हुई। वो

840
00:59:59,120 --> 01:00:03,360
सुख जो है पहले कहां था? क्या

841
01:00:03,360 --> 01:00:08,800
भाई उसने तो गुलाब जामुन खाया है। क्या वो जो सुख उसने फील किया

842
01:00:08,800 --> 01:00:13,200
उस सुख का जो ज्ञान था वो पहले कहां था? अधिष्ठान क्या था उसका पहले?

843
01:00:13,200 --> 01:00:17,440
रसगुल्ले में तो ज्ञान था नहीं। उसके पास तो रसगुल्ला आया है या

844
01:00:17,440 --> 01:00:21,440
कोई इंजेक्शन लगाया गया हो ज्ञान रूपी आपको ज्ञान आपके ही

845
01:00:21,440 --> 01:00:25,440
अंदर था। इसका मतलब क्या हुआ कि रसगुल्ले का भी ज्ञान

846
01:00:25,440 --> 01:00:28,800
रसगुल्ले से प्राप्त होने वाले सुख का ज्ञान भी आपको पहले से ही

847
01:00:28,800 --> 01:00:33,360
था। बस उसके साथ आप कनेक्ट नहीं थे।

848
01:00:33,360 --> 01:00:37,360
अभी आप कनेक्ट मात्र हुए हो। ज्ञान तो पहले से था। और ऐसा

849
01:00:37,360 --> 01:00:41,440
बहुत बार होता है हमारे पास। हम लोग कई बार कहते हैं कि अरे यार मैंने

850
01:00:41,440 --> 01:00:45,760
उसको देखा तो है। देखा तो है याद नहीं आ रहा। याद नहीं आ रहा है। यानी

851
01:00:45,760 --> 01:00:49,840
वह आपके अंदर है वह जानकारी पर वह आपकी इंद्रियों के साथ

852
01:00:49,840 --> 01:00:53,920
कनेक्ट नहीं हो पा रही है। मन रूपी इंद्रिय के साथ वो कनेक्ट नहीं हो पा रही है।

853
01:00:53,920 --> 01:00:58,080
थोड़ी देर बाद एक घंटे के बाद याद आ जाता है। कहां थी उस समय?

854
01:00:58,080 --> 01:01:02,240
भाई अगर वह आपके ही अंदर थी। एक घंटे के बाद वो जानकारी आपको आ गई

855
01:01:02,240 --> 01:01:06,320
तो उस समय कहां चली गई थी? यानी कि संसार का समस्त

856
01:01:06,320 --> 01:01:10,320
जो ज्ञान विज्ञान है यह आपके अंदर ही है। इसीलिए

857
01:01:10,320 --> 01:01:14,320
आप जो है उसको मांग रहे हो क्योंकि मन यह बता रहा

858
01:01:14,320 --> 01:01:19,280
है मन जो है आपको यह कह रहा है कि नहीं है मगर

859
01:01:19,280 --> 01:01:24,080
क्योंकि आप स्वरूप से वही हो।

860
01:01:24,080 --> 01:01:28,160
ज्ञानी ही हो। इसलिए वह आवाज आ रही है अंदर से कि नहीं उसी

861
01:01:28,160 --> 01:01:32,240
उसी स्टेज को वापस पहुंचना है। इसीलिए आप मांग रहे हो वरना

862
01:01:32,240 --> 01:01:36,320
मांगते नहीं। अंशी हो ना सच्चिदानंद स्वरूप

863
01:01:36,320 --> 01:01:40,320
परमेश्वर के इसलिए तो अंश हमेशा अंशी नहीं अंश हो तो

864
01:01:40,320 --> 01:01:43,840
अंश हमेशा अंशी की ओर आकृष्ट होता है

865
01:01:43,840 --> 01:01:48,160
ठीक है तो आप अपूर्ण हो और अपूर्ण अपूर्ण

866
01:01:48,160 --> 01:01:52,240
जो है वो पूर्ण की ओर आकर्षित हो

867
01:01:52,240 --> 01:01:57,440
ठीक है अब आपका माइक काम नहीं कर रहा है फिर बात करेंगे

868
01:01:57,440 --> 01:02:03,440
जी भैया

869
01:02:04,960 --> 01:02:09,040
विनीत जी बोले हरे कृष्णा भैया

870
01:02:09,040 --> 01:02:13,360
हरे कृष्णा बताइए मैं पहले ना इस से कनेक्टेड

871
01:02:13,360 --> 01:02:17,440
था तो मैं ना महाराज माना करता था हरे राम हरे कृष्णा

872
01:02:17,440 --> 01:02:21,440
की तो मैं अभी मैं इस से कनेक्टेड तो नहीं हूं तो

873
01:02:21,440 --> 01:02:25,440
आपने बोला था कि सवा घंटा जाप करना चाहिए तो क्या मैं हरे

874
01:02:25,440 --> 01:02:30,000
कृष्णा हरे राम मां का कर सकता हूं जरूर करिए

875
01:02:30,000 --> 01:02:34,000
और कितनी माला करते थे पहले आप? 16 अभी

876
01:02:34,000 --> 01:02:38,880
भी 16 ही करता हूं। दो मालाएं बढ़ा दीजिए।

877
01:02:38,880 --> 01:02:43,120
ओके। ये मेरा आदेश समझ लीजिए और निवेदन

878
01:02:43,120 --> 01:02:48,160
समझ लीजिए और परामर्श भी समझ लीजिए। तीनों रूप में।

879
01:02:48,160 --> 01:02:52,240
परामर्श समकक्ष समझते हुए, आदेश वरिष्ठ समझते

880
01:02:52,240 --> 01:02:56,880
हुए और निवेदन कनिष्ठ समझते हुए।

881
01:02:56,880 --> 01:02:58,880
और एक बात और पूछनी थी कि

882
01:02:58,880 --> 01:03:02,880
जैसे भगवत गीता में लिखा हुआ है कि कृष्णा बोल रहे होते हैं कि जो

883
01:03:02,880 --> 01:03:07,200
निरंतर मेरी भक्ति करेंगे वह मेरे धाम को प्राप्त होएंगे। तो जो उनका

884
01:03:07,200 --> 01:03:11,440
धाम है वहां पे ऐसे जैसे लाइक यहां पे है सब कुछ ऐसे

885
01:03:11,440 --> 01:03:15,440
लोग वहां पर होंगे कि कृष्णा भी वहां पर है सब कुछ ऐसे सोसाइटी बनी

886
01:03:15,440 --> 01:03:19,680
हुई है। ऐसा कुछ होगा या फिर वैसे ही है कि जैसे बैकुंठ धाम हो गया

887
01:03:19,680 --> 01:03:23,680
तो ऐसे कुछ सोसाइटी बनी हुई है। भगवान के जिस स्वरूप में

888
01:03:23,680 --> 01:03:29,520
उनका चिंतन करेंगे उस स्वरूप से वह प्राप्त होंगे।

889
01:03:29,520 --> 01:03:33,760
और और जो व्यवहार में ना आ सकने वाला

890
01:03:33,760 --> 01:03:38,400
रूप है उसकी भी यदि कामना होगी तो वह भी भगवान आपको प्राप्त कराएंगे।

891
01:03:38,400 --> 01:03:42,480
ठीक है। एक भैया एक क्वेश्चन और था लास्ट जैसे बुद्ध

892
01:03:42,480 --> 01:03:46,720
में बोलते हैं कि ना बस कर्म अच्छे करो भक्ति की जरूरत नहीं है। तो जो सिर्फ कर्म

893
01:03:46,720 --> 01:03:50,800
अच्छे कर रहा भक्ति नहीं कर रहा क्या उसको भी मोक्ष मिलेगा? उसके

894
01:03:50,800 --> 01:03:54,800
कर्म अच्छे सस्टेंड नहीं रह पाते हैं। जिसके

895
01:03:54,800 --> 01:03:58,880
पीछे राम है जिसके पीछे राम है उसी के कर्म

896
01:03:58,880 --> 01:04:03,040
अच्छे हो पाते हैं। क्योंकि राम से क्या होता है? हमें

897
01:04:03,040 --> 01:04:07,200
जो विपरीत परिस्थितियां होती हैं जो माया रूपी प्रपंच

898
01:04:07,200 --> 01:04:11,280
रूपी जगत है जो बार-बार यह विश्वास दिलाने पर तुला हुआ है

899
01:04:11,280 --> 01:04:14,240
कि भगवान जैसी कोई चीज होती ही नहीं है। आपकी

900
01:04:14,240 --> 01:04:18,640
इंद्रियों का काम दिन भर यही है। आपको ये इंफॉर्मेशन पहुंचाना

901
01:04:18,640 --> 01:04:22,720
कहां तुम लगे हुए हो भक्ति में। है ही नहीं ईश्वर। इंद्रियां दिनभर यही

902
01:04:22,720 --> 01:04:26,960
बता रही है। तो इंद्रियां जब आपको दिन भर यही बता रही हैं

903
01:04:26,960 --> 01:04:31,120
तो जो अती्द्रिय विषय के कर्म अच्छे करो अच्छा फल मिल जाएगा। अती्द्रिय

904
01:04:31,120 --> 01:04:35,280
विषय में भी उनकी गति तो है नहीं। झूठ ना बोलने पर जो है आपको

905
01:04:35,280 --> 01:04:39,600
कहीं साइंस से प्राप्त होकर फल मिलेगा। हम

906
01:04:39,600 --> 01:04:43,840
तो क्या होता है? इंद्रियां जब अपने दिन भर बता ऐसा कर रही हैं तो भक्ति

907
01:04:43,840 --> 01:04:48,080
से हमें सामर्थ्य प्राप्त होता है। इंद्रियों की उन इंफॉर्मेशन से लड़ने

908
01:04:48,080 --> 01:04:52,800
का। वो सामर्थ्य हमें नहीं मिल पाएगा भक्ति के बिना।

909
01:04:52,800 --> 01:04:56,960
ठीक है? तो कर्म करना अच्छा जो है वह सस्टेन तभी रह पाता

910
01:04:56,960 --> 01:05:01,200
है किसी भी व्यक्ति का जो भक्त भी हो

911
01:05:01,200 --> 01:05:05,200
भगवान में आस्था रखने वाला भी हो और भगवत भक्ति भी करता

912
01:05:05,200 --> 01:05:09,200
हो उसी के कर्म भी अच्छे होते हैं और उसी को ज्ञान भी होता है ये सब

913
01:05:09,200 --> 01:05:13,200
आपस में इंटरकनेक्टेड है एक भी खंबे को हटाएंगे और सब दूसरा

914
01:05:13,200 --> 01:05:16,000
चरमरा जाएगा

915
01:05:16,000 --> 01:05:20,000
फिर भैया अगर मानो किसी का कर्म है कि वह सस्टेन रख पा रहा है

916
01:05:20,000 --> 01:05:26,000
बिना भक्ति के तो क्या वह मोक्ष को प्राप्त होगा

917
01:05:27,120 --> 01:05:31,200
देखिए कर्म अगर वह कर पा रहा है बिना भक्ति के तो वह कर्म भी

918
01:05:31,200 --> 01:05:37,200
उसकी भक्ति सिद्ध हो रही है ना जिसकी आस्था है

919
01:05:37,280 --> 01:05:41,440
भाई सही और गलत की पहचान कैसे हुई जिसका ईश्वर में अस्तित्व

920
01:05:41,440 --> 01:05:45,520
ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास है जिसका विश्वास जितना दृढ़ होगा वही

921
01:05:45,520 --> 01:05:49,600
तो सही और गलत में तय कर पाएगा कि मुझे गलत नहीं करना है तो वहां से

922
01:05:49,600 --> 01:05:53,680
भी उसकी भक्ति सिद्ध हो रही है तो कर्म करने के रूप में भी

923
01:05:53,680 --> 01:05:58,160
उसकी यदि भक्ति सिद्ध हो रही उसकी जो आस्था है वह डगमगाई नहीं। अब ज्यादातर

924
01:05:58,160 --> 01:06:02,320
यह होता है अधिकांशता यह होता है कि भक्ति करने

925
01:06:02,320 --> 01:06:06,400
से भगवान का अस्तित्व और दृढ़ होता चला जाता है। है है

926
01:06:06,400 --> 01:06:10,560
आस्तिकता बढ़ती है। हम लोग सभी मूल रूप से नास्तिक

927
01:06:10,560 --> 01:06:14,560
हैं। अगर वैसे देखेंगे तो क्योंकि हम

928
01:06:14,560 --> 01:06:18,720
लोग दिन भर में जितनी बार छिपाते हैं तो अपनी अंतरा अपने से कहते हैं हमें कोई नहीं

929
01:06:18,720 --> 01:06:22,800
देख रहा। छिपाने वाले काम दिन भर में कितनी बार करते हैं? जितना इंद्रिय भोग

930
01:06:22,800 --> 01:06:26,960
करते हैं उतना ज्यादा छिपाते हैं। जितना विषयों में चिंतन है उतना

931
01:06:26,960 --> 01:06:31,040
ज्यादा छिपाना है। जितनी बार छिपा रहे हैं उतनी बार कह रहे हैं कोई नहीं देख रहा है।

932
01:06:31,040 --> 01:06:35,520
उस रूप में भगवान का भी खंडन हो रहा है। चोर और बड़ा नास्तिक है।

933
01:06:35,520 --> 01:06:39,600
जो कह रहा है मुझे कोई नहीं देख पाए। भगवान देख रहा है। जो भगवान से डर नहीं रहा है कि

934
01:06:39,600 --> 01:06:42,320
भगवान उसको देख रहा है। तो वो नास्तिक

935
01:06:42,320 --> 01:06:46,560
सिद्ध हो रहा है ना वहां पे। भले ही वो मंदिर जाता हो। तो

936
01:06:46,560 --> 01:06:50,560
भक्ति क्या कराती है? आपको यह विश्वास दिलाती है कि भगवान है। सारी

937
01:06:50,560 --> 01:06:54,640
लड़ाई इसी बात की है। जितना ज्यादा भक्ति करेंगे

938
01:06:54,640 --> 01:06:58,720
उतना ज्यादा आस्तिक बनेंगे। आस्तिक बनेंगे। आस्तिक बनने के कारण

939
01:06:58,720 --> 01:07:02,880
भगवान है के कारण आपके कर्म सुधरेंगे। छिपाने वाले काम कर्म

940
01:07:02,880 --> 01:07:06,880
होने लगेंगे। छिपाने वाली जो धारणा है वो

941
01:07:06,880 --> 01:07:10,880
कम होती चली जाएगी तो आपको मुक्ति मिलेगी। तो आस्तिक तो

942
01:07:10,880 --> 01:07:15,040
कर्म यदि कोई अच्छे कर पा रहा है तो इसका अर्थ है कि वह भक्त भी है।

943
01:07:15,040 --> 01:07:19,040
वह भक्त के बिना नहीं है। हां यह है कि वह नाम जप नहीं करता मगर दिन भर

944
01:07:19,040 --> 01:07:23,120
कर्म करते रहता है। अच्छे-अच्छे उसकी उसमें गति हो गई है। प्रारब्ध

945
01:07:23,120 --> 01:07:27,120
से उसको ऐसे ऐसा चित्त प्राप्त हो गया है। संतों की शरण प्राप्त

946
01:07:27,120 --> 01:07:31,840
हो गई है। उसका उसी में बीत रहा है। है ना? सद्गति मिलती है उसको भी।

947
01:07:31,840 --> 01:07:34,400
जी भैया

948
01:07:34,400 --> 01:07:38,400
भैया लास्ट क्वेश्चन एक और था कि ना मैं गुरु नहीं चूस कर पा रहा हूं कि

949
01:07:38,400 --> 01:07:42,400
मैं गुरु किसको बनाऊं मैं जिसको सुनता हूं मैं कौन ना वही अच्छा लगने लगता

950
01:07:42,400 --> 01:07:46,480
है गुरु के जो सिद्धांत

951
01:07:46,480 --> 01:07:50,560
है वह हम आपको बता सकते हैं बाकी आपका स्वयं का स्वाविवेक है आप किसको

952
01:07:50,560 --> 01:07:54,720
गुरु के रूप में स्वीकार करें पहला सिद्धांत है

953
01:07:54,720 --> 01:07:57,440
कि वह सन्यासी होना चाहिए

954
01:07:57,440 --> 01:08:01,600
अंतिम निर्णायक अगर आपका कोई गृहस्थ गुरु के प्रति आकर्षण हो रहा तो

955
01:08:01,600 --> 01:08:06,000
वह गृहस्थ गुरु भी किसी सन्यासी आचार्य के

956
01:08:06,000 --> 01:08:10,320
अधीन उसकी सीमा में रह के आपको ज्ञान विज्ञान देगा। पहली

957
01:08:10,320 --> 01:08:14,560
बात। दूसरी बात है अब इसमें भागवतानंद

958
01:08:14,560 --> 01:08:19,040
तो फेल हो जाते हैं। क्योंकि वहां तो सन्यास है नहीं।

959
01:08:19,040 --> 01:08:23,680
अंतिम निर्णायक कौन हुआ? फिर अगर आप भागवतानंद को गुरु बनाएंगे तो।

960
01:08:23,680 --> 01:08:29,680
हां। अंतिम निर्णायक तो विरक्त को बताया गया ना। धर्म का अंतिम निर्णायक कौन है? सन्यासी।

961
01:08:29,760 --> 01:08:34,000
उसके पीछे तो कोई है ही नहीं। स्वयंभू है वह। तो

962
01:08:34,000 --> 01:08:38,320
पहला पहला कार्य है कि वह अंतिम निर्णायक ऐसा गुरु बनाइए

963
01:08:38,320 --> 01:08:42,400
जिसके द्वारा आपके आपका अंतिम निर्णायक सन्यासी

964
01:08:42,400 --> 01:08:45,520
सिद्ध हो रहा हो। दूसरा

965
01:08:45,520 --> 01:08:49,760
कि वो परंपरा से हो। तीसरा श्रुति स्मृति शास्त्रों

966
01:08:49,760 --> 01:08:53,760
में सामंजस्य की शिक्षा दे। ऐसे नहीं यह मान लिया, वो नहीं माना, वो मान लिया,

967
01:08:53,760 --> 01:08:58,000
यह नहीं माना। और चौथा गुरु

968
01:08:58,000 --> 01:09:02,080
वही जो अपने शिष्य का संशय दूर कर दे। गुरु का

969
01:09:02,080 --> 01:09:06,560
मतलब अंधकार, रूह का मतलब निकालने वाला। और यदि वो

970
01:09:06,560 --> 01:09:10,560
अंधकार से निकालने वाला नहीं है, आपके संशय का निराकरण नहीं कर पा रहा है

971
01:09:10,560 --> 01:09:13,920
तो वो आपका गुरु नहीं है।

972
01:09:13,920 --> 01:09:18,000
ठीक है? तो भैया मेरे को वही गुरु चूज़

973
01:09:18,000 --> 01:09:22,160
करना चाहिए जो कृष्णा को ही भक्ति करवाते हो क्योंकि मैं कृष्णा के प्रति प्रेम

974
01:09:22,160 --> 01:09:26,240
ज्यादा है मेरा। कृष्ण की भक्ति तो शंकराचार्य जी भी

975
01:09:26,240 --> 01:09:30,560
करवाते हैं और कृष्ण की भक्ति जो है जो प्रामाणिक गौडिया

976
01:09:30,560 --> 01:09:35,040
वैष्णव है वो भी करवाते हैं और कृष्ण की भक्ति मधवाचार्य में भी संभवत

977
01:09:35,040 --> 01:09:39,360
प्राप्त होता है भगवान श्री कृष्ण का मंत्र और जो राधा वल्लभ संप्रदाय

978
01:09:39,360 --> 01:09:43,360
है वहां भी कृष्ण की भक्ति हो रही है। वल्लभाचार्य जी का संप्रदाय है वहां

979
01:09:43,360 --> 01:09:47,440
भी कृष्ण की भक्ति हो रही है। ठीक है?

980
01:09:47,440 --> 01:09:50,480
ओके भैया

981
01:09:50,480 --> 01:09:54,480
ठीक है। जो शंकराचार्य हैं उनके पास

982
01:09:54,480 --> 01:09:58,560
भी जाते हैं जब आप तो आप बताते हैं कि मुझे कृष्ण भगवान का मंत्र चाहिए तो

983
01:09:58,560 --> 01:10:04,560
वहां से कृष्ण भगवान का ही मंत्र प्राप्त होता है।

984
01:10:05,600 --> 01:10:08,320
हां जी

985
01:10:08,320 --> 01:10:12,400
प्रज्वल जी आपका तो हो गया ना? जी भैया अभी

986
01:10:12,400 --> 01:10:16,640
रिपीट हो रहा है आवाज? नहीं रिपीट नहीं हो रहा है। जी भैया

987
01:10:16,640 --> 01:10:20,720
जी कैसा है? अभी मैं भी पूजा पाठ वगैरह करता हूं लेकिन कैसा है

988
01:10:20,720 --> 01:10:24,720
दिमाग के कॉर्नर में लेकिन फिर भी रहता है कि मतलब करते तो है

989
01:10:24,720 --> 01:10:28,800
पूजा पाठ लेकिन भगवान है नहीं है लेकिन वो

990
01:10:28,800 --> 01:10:32,880
अभी मैंने बताया ना आपको वो अभी मैंने बताया ना इंद्रियां आपको लगातार ये

991
01:10:32,880 --> 01:10:36,880
इंफॉर्मेशन दे रही है नहीं नहीं नहीं गलत कर रहा है तू तो उससे

992
01:10:36,880 --> 01:10:41,120
जीतने का तरीका ही यही है कि आप जो है

993
01:10:41,120 --> 01:10:45,280
शब्द प्रमाण पर ध्यान देते हुए और नाम

994
01:10:45,280 --> 01:10:50,080
जप करिए जितना का नाम जप करेंगे भगवान के प्रति आस्था हो जाएंगे।

995
01:10:50,080 --> 01:10:54,400
ठीक है? अच्छा और हर तरह से अकाट सिद्धांतों

996
01:10:54,400 --> 01:10:58,640
के द्वारा सिद्ध तो हमने कर ही दिया है। फिर भी थ्योरिकली आपको प्रूफ

997
01:10:58,640 --> 01:11:03,040
हो गया मगर जो है आपकी इंद्रियां मना कर रही है फिर भी।

998
01:11:03,040 --> 01:11:05,520
इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने के लिए राम की शरण

999
01:11:05,520 --> 01:11:09,600
ले लीजिए। ठीक है। जी भैया।

1000
01:11:09,600 --> 01:11:13,680
विनीत जी और प्रज्वल जी आप अपना हैंड डाउन कर लीजिए।

1001
01:11:13,680 --> 01:11:17,760
करणजीत सिंह जी बताइए।

1002
01:11:17,760 --> 01:11:21,840
भैया मुझे अभी 10 10 दिन पहले के गुरु

1003
01:11:21,840 --> 01:11:26,000
के दर्शन हुए हैं स्वप्न में हम तो इसका क्या मतलब हो

1004
01:11:26,000 --> 01:11:30,320
सकता है जो गुरु है वो बहुत बड़े और मैंने ना ही ज्यादा

1005
01:11:30,320 --> 01:11:34,560
नाम जप किया और ऐसा कुछ नहीं बस मुझे आस्था थी गुरु के प्रति अब क्या

1006
01:11:34,560 --> 01:11:40,320
ये किसका संकेत है कि स्वप्न में मुझे उनके दर्शन हुए

1007
01:11:40,320 --> 01:11:44,480
और मैंने किसी एक बार जिनके दर्शन हुए हैं उन्हीं के पास जाकर के अपनी

1008
01:11:44,480 --> 01:11:49,280
बात रखें संतों का दर्शन तो वैसे भी हितकारी होता है।

1009
01:11:49,280 --> 01:11:53,440
तो हितार्थ चले जाए, दर्शनार्थ जाए और वहां इस बात को रख

1010
01:11:53,440 --> 01:11:58,320
भी दे तो वही मार्ग प्रशस्त भी कर देंगे। ठीक है?

1011
01:11:58,320 --> 01:12:02,320
और निमंत्रण तो है ही संकेत तो है ही। उनके दर्शन आपको

1012
01:12:02,320 --> 01:12:06,320
स्वप्न में प्राप्त होना ये तो शुभ संकेत है।

1013
01:12:06,320 --> 01:12:11,040
तो उनके साथ मुझे आपके भी दर्शन हुए उस स्वप्न में।

1014
01:12:11,040 --> 01:12:15,200
तो मेरे से तो आपने बात कर ही ली। तो आप वहां पहुंचे जिनके दर्शन

1015
01:12:15,200 --> 01:12:19,200
हुए थे। हां वो गुरु जी अभी विद्वान

1016
01:12:19,200 --> 01:12:20,720
है जो उनसे आगे कोई नहीं है

1017
01:12:20,720 --> 01:12:24,720
उनके मुझे दर्शन हुए। ठीक है तो आप वहां जाए।

1018
01:12:24,720 --> 01:12:30,720
चलिए फिर मुझे लगता है सभी के प्रश्न हो गए हैं और

1019
01:12:30,800 --> 01:12:36,800
जय श्री राम। सभी को जय श्री राम।

1020
01:12:38,720 --> 01:12:44,720
जी

1021
01:13:01,280 --> 01:13:05,280
आ
