1
00:00:00,650 --> 00:00:05,040
[संगीत] तो सभी को जय श्री राम। इस समय हम हैं भिलाई

2
00:00:05,040 --> 00:00:09,200
में। ब्रह्मा कुमारीज का यहां पर केंद्र है और

3
00:00:09,200 --> 00:00:13,200
हमारे साथ में हमारी दीदी बैठी हुई हैं। और जैसा कि आप सब लोग

4
00:00:13,200 --> 00:00:18,400
जानते हैं विभिन्न जो धार्मिक मान्यताएं हैं उनको लेकर के हम

5
00:00:18,400 --> 00:00:22,640
चर्चाएं करते हैं और वो आपके समक्ष रखते हैं। तो आज हम इसी क्रम

6
00:00:22,640 --> 00:00:26,720
में यहां आए हुए हैं। तो सबसे पहले मैं दीदी आप अपना थोड़ा सा परिचय दे

7
00:00:26,720 --> 00:00:31,040
दीजिए। यहां का और थोड़ा सा अपने बारे में कि आप मतलब आपका

8
00:00:31,040 --> 00:00:36,560
परिचय देते हुए यहां के बारे में थोड़ा सा बता दीजिए जनसामान्य को।

9
00:00:36,560 --> 00:00:39,760
ओम शांति

10
00:00:39,760 --> 00:00:45,760
प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरी विश्वविद्यालय

11
00:00:45,840 --> 00:00:49,920
शाखा जो भिलाई के सरोदा पे

12
00:00:49,920 --> 00:00:54,000
है। संस्थान जो है वो

13
00:00:54,000 --> 00:00:58,000
माउंट आबू से रिले होती है। हमारा मुख्यालय

14
00:00:58,000 --> 00:01:02,160
माउंट आबू पर है और वहां से ही ऑल

15
00:01:02,160 --> 00:01:06,240
वर्ल्ड में यह सेवाएं होती हैं। वर्तमान

16
00:01:06,240 --> 00:01:08,480
समय

17
00:01:08,480 --> 00:01:12,640
मुख्यालय से जो हमारी संस्था है विश्व

18
00:01:12,640 --> 00:01:17,760
में वो 4500 से भी ज्यादा सेवा केंद्रों के माध्यम से

19
00:01:17,760 --> 00:01:22,080
मानव समाज कल्याण सेवा कर रही है। जहां

20
00:01:22,080 --> 00:01:26,080
विभिन्न वर्गों से सेवा होती है। समय-समय पर

21
00:01:26,080 --> 00:01:30,160
यहां सामाजिक कार्यक्रम के माध्यम से

22
00:01:30,160 --> 00:01:35,360
सभी विश्व की आत्माओं को परमात्म संदेश दिया जाता है।

23
00:01:35,360 --> 00:01:39,920
परमात्म संदेश से तात्पर्य कि आज हम

24
00:01:39,920 --> 00:01:44,320
भिन्न धर्मों से और भिन्न जातियों से जुड़े हुए हैं।

25
00:01:44,320 --> 00:01:48,400
लेकिन परमात्मा जो निराकार है वह निराकार

26
00:01:48,400 --> 00:01:52,560
परमात्मा इस सृष्टि पर अवतरित होकर के सत्य गीता

27
00:01:52,560 --> 00:01:55,040
ज्ञान जो हम आत्माओं को सुना

28
00:01:55,040 --> 00:01:59,200
रहे हैं और इसी गीता ज्ञान को सुनकर के जो

29
00:01:59,200 --> 00:02:03,200
हम आत्माओं की सद्गति होती है और फिर सृष्टि में एक

30
00:02:03,200 --> 00:02:07,680
नव परिवर्तन आता है वो नव परिवर्तन होता है सतयुगी

31
00:02:07,680 --> 00:02:12,240
सृष्टि के आरंभ से और इसके माध्यम से ही

32
00:02:12,240 --> 00:02:16,320
यह जो हमारे सेवा स्थान है। यह अपने राजयोग

33
00:02:16,320 --> 00:02:20,320
की जो सेवा देते हैं। उस राजयोग में ही हमें यहां आत्मा

34
00:02:20,320 --> 00:02:24,560
और परमात्मा का परिचय मिलता है। और आत्मा परमात्मा

35
00:02:24,560 --> 00:02:28,720
के परिचय से ही हम मेडिटेशन के माध्यम से अपने

36
00:02:28,720 --> 00:02:32,880
अंतर जगत की यात्रा करते हैं और अंतर जगत की यात्रा करके

37
00:02:32,880 --> 00:02:36,880
ही हम उस परम सत्य से जुड़ पाते हैं। जहां हमें

38
00:02:36,880 --> 00:02:42,880
आत्मिक शांति सुख, आनंद और प्रेम की प्राप्ति होती है।

39
00:02:42,960 --> 00:02:46,960
अच्छा दीदी जी थोड़ा सा हमारे दर्शकों को आप बताएंगे

40
00:02:46,960 --> 00:02:49,440
कि

41
00:02:49,440 --> 00:02:55,440
ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार धर्म क्या है?

42
00:02:55,440 --> 00:02:59,680
ब्रह्मा कुमारी के अनुसार से धर्म देहिक

43
00:02:59,680 --> 00:03:04,480
नहीं है। धर्म से तात्पर्य होता है धारणा।

44
00:03:04,480 --> 00:03:08,640
हम और धारणा सभी धर्मों की है। जो

45
00:03:08,640 --> 00:03:12,960
अपने धारणाओं में परिपक्व हो वही सही धर्म

46
00:03:12,960 --> 00:03:17,280
है। क्योंकि हमारा जो धर्म है वो है आदि

47
00:03:17,280 --> 00:03:21,280
सनातन देवी देवता धर्म जो सृष्टि के

48
00:03:21,280 --> 00:03:25,840
आदि से चला आया है। आदि सनातन आदि सनातन

49
00:03:25,840 --> 00:03:29,920
क्योंकि वर्तमान का जो समय चल रहा है परमात्मा के

50
00:03:29,920 --> 00:03:34,320
कहे अनुसार यह समय कल्याणकारी पुरुषोत्तम संगम

51
00:03:34,320 --> 00:03:39,200
युग का समय है और इसी संगम युग में परमात्मा

52
00:03:39,200 --> 00:03:43,520
एक मानव तन का आधार लेकर के ही सृष्टि की पुन

53
00:03:43,520 --> 00:03:47,600
स्थापना का कार्य कर रहे हैं। जिसे उन्होंने नाम दिया है

54
00:03:47,600 --> 00:03:52,000
प्रजापिता ब्रह्मा और इसी प्रजापिता ब्रह्मा

55
00:03:52,000 --> 00:03:56,080
के नाम से ही यह ब्रह्मा कुमारिस की जितनी भी शाखाएं

56
00:03:56,080 --> 00:04:01,120
हैं उसी नाम से ही चल रही नहीं नहीं

57
00:04:01,120 --> 00:04:05,440
जैसे मैंने पूछा ना कि धर्म किसे कहें? जैसे धर्म एक व्याख्या

58
00:04:05,440 --> 00:04:09,920
आई है भगवत गीता में कि अ तेरे

59
00:04:09,920 --> 00:04:10,640
लिए कर्तव्य

60
00:04:10,640 --> 00:04:14,960
और अकर्तव्य की स्थिति में विषय में केवल शास्त्र प्रमाण है।

61
00:04:14,960 --> 00:04:19,360
तो जैसे हमको विवाह किससे करना है यह भी एक धर्म है।

62
00:04:19,360 --> 00:04:23,360
या विवाह करना है कि नहीं करना है यह भी एक धर्म है। पिता की आज्ञा माननी है

63
00:04:23,360 --> 00:04:27,360
कि नहीं माननी यह भी एक धर्म है। किसकी आज्ञा माननी है, किसकी नहीं माननी यह भी

64
00:04:27,360 --> 00:04:31,840
एक धर्म है। तो क्या करना है और क्या नहीं करना है। इस विषय में एकमात्र

65
00:04:31,840 --> 00:04:36,400
शास्त्र प्रमाण है। कहा तो यह हमारा धर्म है। तो धर्म की

66
00:04:36,400 --> 00:04:40,400
उपयोगिता क्या है? मतलब धर्म को हम किसी को कैसे

67
00:04:40,400 --> 00:04:44,800
परिभाषित करते हैं? क्या है धर्म? जैसे

68
00:04:44,800 --> 00:04:49,520
आपने कहा विभिन्न धर्म तो जैसे

69
00:04:49,520 --> 00:04:54,080
आपके अनुसार क्या इस्लाम भी धर्म है? क्या क्रिश्चियनिटी

70
00:04:54,080 --> 00:04:58,160
भी धर्म है? क्योंकि वहां पर तो धर्म शब्द नहीं मिलता। दूसरे शब्द

71
00:04:58,160 --> 00:05:02,320
मिलते हैं तो फिर वह धर्म क्या चीज है जो जिसके कारण हम उसको भी धर्म

72
00:05:02,320 --> 00:05:08,320
कह रहे हैं

73
00:05:12,160 --> 00:05:17,680
इससे कैसे समझाया जाए हम

74
00:05:17,680 --> 00:05:21,840
इसको इस तरह से देख देख लेते हैं जैसे कि आपने कहा ना ईश्वर निराकार

75
00:05:21,840 --> 00:05:25,920
है हम फिर दूसरी तरफ हम कहते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है

76
00:05:25,920 --> 00:05:30,480
हम है ना तो निराकार है।

77
00:05:30,480 --> 00:05:34,640
वह किसी और शरीर का उपयोग करता है। है ना? क्या वो

78
00:05:34,640 --> 00:05:38,640
स्वयं से अवतरित होता है? क्या परमात्मा के बारे में

79
00:05:38,640 --> 00:05:43,280
जो स्वयं परमात्मा ने बताया है जी कि मैं स्वयं

80
00:05:43,280 --> 00:05:47,760
हूं। हम मना स्वयं से जन्म लेने वाला। हम

81
00:05:47,760 --> 00:05:51,840
ना ही मैं जन्म किसी मानव रीति से जन्म

82
00:05:51,840 --> 00:05:55,840
लेता ना ही मैं मरता। माना वो परमात्मा

83
00:05:55,840 --> 00:06:00,000
जो जन्म और मृत्यु दोनों से परे है।

84
00:06:00,000 --> 00:06:04,240
अर्थात वो सर्वशक्तिवान है। नहीं नहीं ये तो बताया

85
00:06:04,240 --> 00:06:08,320
उसने परमात्मा ने कि मैं जन्म और मृत्यु से परे हूं। मगर क्या वो चाहे तो

86
00:06:08,320 --> 00:06:12,640
ये जो लीला रूपी संसार है प्रपंच रूपी संसार है। इसमें जैसे

87
00:06:12,640 --> 00:06:16,800
कि हम हम लोग हैं। हम भी आत्माएं आत्माओं के रूप में सनातन

88
00:06:16,800 --> 00:06:20,960
है। है ना? हां। है ना? मगर फिर भी हम लीला

89
00:06:20,960 --> 00:06:25,040
रूपी संसार में रूप लेते हैं। शरीर धारण करते हैं। है ना? तो उसी

90
00:06:25,040 --> 00:06:27,360
तरीके से क्या ईश्वर भी इस तरह

91
00:06:27,360 --> 00:06:31,520
से शरीर धारण कर सकता है? नहीं। परमात्मा ने कहा कि

92
00:06:31,520 --> 00:06:36,000
मैं शरीर धारण कब करता हूं? जब मुझे इस सृष्टि

93
00:06:36,000 --> 00:06:40,400
का परिवर्तन करना होता है। तब मैं आकर

94
00:06:40,400 --> 00:06:44,400
किसी और शरीर में आता। किसी अपने से जैसे हम लोग अपने से शरीर

95
00:06:44,400 --> 00:06:48,480
में आ रहे हैं। वैसे परमात्मा नहीं आ सकता। परमात्मा ने कहा ना

96
00:06:48,480 --> 00:06:52,800
तो मैं पर काया प्रवेश करता हूं। पर काया प्रवेश तो इसमें

97
00:06:52,800 --> 00:06:56,800
इसमें वो जो टॉपिक है ना कि दूसरे चीजों को हम धर्म

98
00:06:56,800 --> 00:07:00,800
कैसे कह रहे हैं या फिर धर्म क्या होता है वो उससे रिलेटेड है। तो इसमें क्या है

99
00:07:00,800 --> 00:07:05,440
कि अ जब हमने यह कहा कि ईश्वर

100
00:07:05,440 --> 00:07:09,520
पर काया प्रवेश तो कर सकता है परंतु स्वयं से माता के गर्भ

101
00:07:09,520 --> 00:07:13,520
से प्रकट होकर नहीं दिखा सकता। तो इसमें फिर एक बाधा

102
00:07:13,520 --> 00:07:17,920
लग रही है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं रहा। क्योंकि सर्व का अर्थ है सभी।

103
00:07:17,920 --> 00:07:22,080
सभी कार्यों को करने की शक्ति जिसमें हो वो सर्वशक्तिमान है। जैसे हम कहें

104
00:07:22,080 --> 00:07:26,080
क्या ईश्वर उड़ सकता है? तो हां बिल्कुल उड़ सकता है। क्या ईश्वर गायब हो सकता है? तो गायब हो सकता

105
00:07:26,080 --> 00:07:30,080
है। क्या ईश्वर हर जगह हो सकता है? हां हो सकता है। क्या ईश्वर शेयर को

106
00:07:30,080 --> 00:07:34,640
हवा में उड़ा सकता है? बिल्कुल उड़ा सकता है। तो तभी उसको हम सर्वशक्तिमान

107
00:07:34,640 --> 00:07:39,280
कह रहे हैं। मगर यहां पे हम कह रहे हैं कि वो जन्म नहीं ले सकता। जी

108
00:07:39,280 --> 00:07:42,880
यहां हम इसको ऐसा भी कह सकते हैं हम कि

109
00:07:42,880 --> 00:07:46,880
परमात्मा निराकार है और बाकी

110
00:07:46,880 --> 00:07:51,520
सभी जो आत्माएं हैं उनमें कोई देव आत्मा है

111
00:07:51,520 --> 00:07:55,840
कोई धर्म आत्मा है कोई महान आत्मा है

112
00:07:55,840 --> 00:08:00,160
कोई पाप आत्मा है और कोई पुण्य आत्मा है हम

113
00:08:00,160 --> 00:08:04,240
हम कभी भी पुण्य परमात्मा नहीं कहते या

114
00:08:04,240 --> 00:08:08,240
पुण्य धर्मात्मा नहीं कहते या पुण्य महात्मा त्मा नहीं कहते।

115
00:08:08,240 --> 00:08:12,480
परमात्मा से तात्पर्य कि वह सर्वोपर है। सर्वोच्च

116
00:08:12,480 --> 00:08:16,640
है। और बाकी जो आत्माएं हैं चाहे वह देव आत्मा

117
00:08:16,640 --> 00:08:20,640
हो, धर्मात्मा हो, महान आत्मा हो, पुण्य आत्मा

118
00:08:20,640 --> 00:08:24,880
हो या पाप आत्मा हो ये हम सभी आत्माएं जो है जो

119
00:08:24,880 --> 00:08:29,200
माता के गर्भ में से जन्म लेती है, मृत्यु को प्राप्त करती हैं

120
00:08:29,200 --> 00:08:33,200
और फिर जन्म लेती है। और परमात्मा जो कि निराकार

121
00:08:33,200 --> 00:08:37,600
है, वो इस जन्म मरण के चक्कर से परे है। बहुत

122
00:08:37,600 --> 00:08:41,760
त्मा अलग है और देव आत्मा अलग नहीं वो तो है

123
00:08:41,760 --> 00:08:45,760
यदि वो चाहे वो चाहे तो वो कर सकता है ले सकता है जन्म या

124
00:08:45,760 --> 00:08:49,840
नहीं ले सकता है परमात्मा चाहे तो जैसे उसका मन हुआ कि भाई मैं लीला

125
00:08:49,840 --> 00:08:53,840
में आऊं खेलूं कूदूं या मतलब अपने मन से

126
00:08:53,840 --> 00:08:58,480
ये नहीं कि उसको बाध्य है कि अभी आज जैसे हम लोग अपनी मृत्यु को कंट्रोल नहीं कर सकते

127
00:08:58,480 --> 00:09:03,360
मगर वो चाहे कि मैं अपने इच्छा अनुसार जब चाहूं तब शरीर को त्यागूं

128
00:09:03,360 --> 00:09:07,520
मैं अपनी इच्छा अनुसार जब चाहूं तब आऊं। हमारे कंट्रोल में जन्म मृत्यु नहीं है। उसके

129
00:09:07,520 --> 00:09:11,520
कंट्रोल में है। तो क्या वह इस कंट्रोल के साथ आ सकता है

130
00:09:11,520 --> 00:09:15,600
या नहीं? और नहीं आ सकता है। अगर मान लिया कि उसने कहा है कि मैं नहीं

131
00:09:15,600 --> 00:09:20,400
आ सकता। फिर उसको हम सर्वशक्तिमान कैसे कहेंगे? परमात्मा

132
00:09:20,400 --> 00:09:25,200
को सर्वशक्तिमान कैसे कहेंगे? हम जैसे हम कहते हैं सर्वज्ञ।

133
00:09:25,200 --> 00:09:29,200
सर्वज्ञ का मतलब है ऐसा कुछ भी नहीं है जो उसको ज्ञात ना हो। है ना? हम

134
00:09:29,200 --> 00:09:33,520
कहते हैं सर्वव्यापी। तो सर्वव्यापी का अर्थ यह है हम उसको

135
00:09:33,520 --> 00:09:37,680
नहीं कहते। मान लीजिए हमने कहा आप नहीं कहते हैं कई आईडियोलॉजीस कहती

136
00:09:37,680 --> 00:09:41,840
भी हैं। तो मान लीजिए किसी ने कहा सर्व्यापी तो सर्वव्यापी का अर्थ आएगा कि ऐसी

137
00:09:41,840 --> 00:09:46,480
कोई जगह नहीं है जहां पर वो व्याप्त ना हो। तो जब हम कह रहे हैं सर्वशक्तिमान

138
00:09:46,480 --> 00:09:50,720
तो ऐसा कोई कार्य नहीं है जो वो ना कर पाए। कारण हां परंतु

139
00:09:50,720 --> 00:09:54,720
यहां पर एक प्रॉब्लम आ रही है कि वो जो है जन्म नहीं ले सकता। जी

140
00:09:54,720 --> 00:09:59,120
परमात्मा ने स्वयं भी कहा है ना कि मैं स्वयं

141
00:09:59,120 --> 00:10:03,200
हूं। मैं सर्वशक्तिमान हूं। लेकिन मैं अगर मैं

142
00:10:03,200 --> 00:10:07,360
भी जन्म ले लूं अगर मनुष्यों की भांति मैं भी जन्म ले लूं तो

143
00:10:07,360 --> 00:10:11,440
फिर मनुष्यों में और फिर मुझ परमात्मा में अंतर अंतर ये रह जाएगा

144
00:10:11,440 --> 00:10:13,600
कि मैं जब चाहूं तब मरूंगा मनुष्य जब

145
00:10:13,600 --> 00:10:17,840
चाहे तब नहीं मरता है। मैं जब चाहूं तब उत्पन्न होऊंगा। मनुष्य जब चाहे तब नहीं उत्पन्न

146
00:10:17,840 --> 00:10:22,400
होता है। उत्पन्न जी जो परमात्मा के ज्ञान के आधार पर

147
00:10:22,400 --> 00:10:26,400
जो परमात्मा से हम आत्माओं को ज्ञान मिला है तो उन्होंने

148
00:10:26,400 --> 00:10:30,480
जो बताया कि सृष्टि रूपी ड्रामा ये सृष्टि रूपी नाटक

149
00:10:30,480 --> 00:10:34,560
रंगमंच जो कि 5000 वर्ष का एक बना बनाया

150
00:10:34,560 --> 00:10:38,560
नाटक रंगमंच है जो एक ड्रामा की भांति चल रहा

151
00:10:38,560 --> 00:10:42,720
है। सिर्फ ब्रह्मा में परमात्मा का इस सृष्टि पर आना भी

152
00:10:42,720 --> 00:10:46,960
नो होता है लेकिन वो होता है परकाया प्रवेश परकाया प्रवेश

153
00:10:46,960 --> 00:10:50,960
वो तभी करते हैं जब कलयुग के अंत में अति धर्म

154
00:10:50,960 --> 00:10:55,440
ग्लानी का समय होता है तब वो परकाया प्रवेश करते हैं

155
00:10:55,440 --> 00:10:59,440
और फिर वो आकर के हम आत्माओं को यहां जो पुण्य आत्माएं

156
00:10:59,440 --> 00:11:03,600
होती है वो स्वयं अपना भी परिचय देते हैं और फिर वो

157
00:11:03,600 --> 00:11:07,760
यही कहते हैं कि जो गीता में लिखा हुआ है गीता में जो लिखा

158
00:11:07,760 --> 00:11:12,480
हुआ है यदा यदा धर्म से भारत

159
00:11:12,480 --> 00:11:16,560
धर्मस तदात्म तो इस सृष्टि

160
00:11:16,560 --> 00:11:20,800
रंगमंच पर कल्प में एक बार आता हूं 5000

161
00:11:20,800 --> 00:11:24,800
इसमें कल्प की बात तो नहीं आई है हां मतलब ये पूरा वो कहते हैं जब

162
00:11:24,800 --> 00:11:28,720
जब धर्म की हानि होती है तबतब मैं जो है अधर्म का नाश करने

163
00:11:28,720 --> 00:11:32,800
के लिए साधु भक्तों के उद्धारगणी परित्राणाय साधु नाम जी

164
00:11:32,800 --> 00:11:36,960
है ना विनाशाय चतुष्कताम तो वो तब तब मैं अपना स्वयं का सृजन

165
00:11:36,960 --> 00:11:41,040
करता हूं वहां पे ये भी नहीं कहा कि मैं परकाया में प्रवेश करता हूं। वहां पे कहा मैं सृजन करता

166
00:11:41,040 --> 00:11:45,200
हूं। अपने आप का स्वयं रूप बनाता हूं। तो परमात्मा ने यह भी कहा

167
00:11:45,200 --> 00:11:49,200
ना कि धर्म की ग्लानी केवल एक बार

168
00:11:49,200 --> 00:11:53,760
होती है। सतयुग और त्रेता युग में धर्म ग्लानी नहीं हुई।

169
00:11:53,760 --> 00:11:57,920
द्वापर और कलयुग के बीच में भी नहीं हुई। ये कलयुग अंत में

170
00:11:57,920 --> 00:12:03,440
नहीं दीदी वो जो विषय चल रहा है ना वो यह चल रहा है कि ईश्वर

171
00:12:03,440 --> 00:12:07,680
ये मनुष्यों की भांति अवतार ले सकता है कि नहीं? परकाया प्रवेश

172
00:12:07,680 --> 00:12:11,760
नहीं मगर मनुष्यों की भांति शरीर धारण कर सकता है कि नहीं अगर नहीं

173
00:12:11,760 --> 00:12:16,720
कर सकता है वो अलग बात है मगर नहीं कर सकता है तो फिर उसकी ये जो सर्वशक्तिमत्ता

174
00:12:16,720 --> 00:12:20,800
है उसमें क्वेश्चन उठ जाता है जैसे अगर दुनिया में कोई

175
00:12:20,800 --> 00:12:24,880
भी एक कार्य है जो वो नहीं कर पा रहा है तो उस पे फिर क्वेश्चन आ जाता है वो सर्व

176
00:12:24,880 --> 00:12:29,040
शब्द हट जाएगा फिर सर्व का मतलब तो सर्व ही है कि

177
00:12:29,040 --> 00:12:33,200
वो सब कुछ कर सकते हैं जी तो वो सब कुछ तो कर भी रहे हैं

178
00:12:33,200 --> 00:12:37,680
तो वो जन्म कहां ले रहे हैं अच्छा वो जन्म इसलिए नहीं ले रहे क्योंकि वो निराकार

179
00:12:37,680 --> 00:12:41,920
है तो इसका मतलब वो नहीं ले सकते ना बाधित हो गए ना तो वो कोई परया प्रवेश

180
00:12:41,920 --> 00:12:43,760
तो कर रहे हैं ना नहीं तो जन्म नहीं ले

181
00:12:43,760 --> 00:12:48,080
रहे ना हां जन्म नहीं ले रहे हैं जन्म मरण के चक्र से परे

182
00:12:48,080 --> 00:12:52,240
तो तो कहना चाहिए जो ये जो विशेषण है ना सर्व ये एक विशेषण

183
00:12:52,240 --> 00:12:56,400
है ये तब लग रहा है जब सर्व मतलब जिसमें सब हो गया सब

184
00:12:56,400 --> 00:13:00,480
हां या तो जैसे हम सर्वज्ञ कहेंगे तो हम कहें कि क्या ईश्वर ये जानता

185
00:13:00,480 --> 00:13:04,480
है कि नाली में कौन सा कीड़ा चल रहा है अब हम कह दे कि वो नाली में जानना उसका

186
00:13:04,480 --> 00:13:08,720
काम नहीं है हम कह दे वो अच्छी अच्छी चीज नहीं है। उसको क्यों जाने ईश्वर? तो मगर

187
00:13:08,720 --> 00:13:12,720
वो अगर नहीं जानता है कि नाली में क्या है तो वहां पर सर्वज्ञता नष्ट हो

188
00:13:12,720 --> 00:13:16,800
जाएगी। ये मानना पड़ेगा कि नाली की चीजें भी उसको पता है। यानी कि

189
00:13:16,800 --> 00:13:20,800
अच्छी और बुरी सब चीजें उसको पता है। इसीलिए अगर कोई छोटा काम है या

190
00:13:20,800 --> 00:13:24,800
बड़ा काम है। अगर छोटा भी है तो भी उसको करना होना चाहिए। तभी

191
00:13:24,800 --> 00:13:28,880
वह सर्वशक्तिमान होगा। इसको एक इसको एक

192
00:13:28,880 --> 00:13:32,960
एक तरीके से और देख सकते हैं। हम लोग यह कैसे किसी को

193
00:13:32,960 --> 00:13:38,320
सिद्ध करें कि ईश्वर है। ईश्वर है। हम

194
00:13:38,320 --> 00:13:42,480
ईश्वर की शक्तियों को अनुभव करके

195
00:13:42,480 --> 00:13:46,480
यह कैसे पता चलेगा कि उसी की शक्ति है? जैसे जो लोग कहते हैं मैं ईश्वर को नहीं

196
00:13:46,480 --> 00:13:51,600
मानता तो हम उसको क्या कहें? जिस प्रकार देखा जाए

197
00:13:51,600 --> 00:13:55,680
यह फैन चल रहा है हम हम इस फैन के नीचे बैठे हुए हैं

198
00:13:55,680 --> 00:13:59,040
जी और हमें ठंडी हवा लग रही है जी

199
00:13:59,040 --> 00:14:03,200
तो हम केवल फैन को देख रहे हैं ना क्योंकि वो स्थूल है जी

200
00:14:03,200 --> 00:14:07,760
लेकिन हवा को तो नहीं देखा जा रहा है उसकी हम महसूस तो कर रहे हैं ना

201
00:14:07,760 --> 00:14:11,840
तो उसी प्रकार परमात्मा है ना तो परमात्मा को हम

202
00:14:11,840 --> 00:14:16,400
अनुभव करते हैं ना परमात्मा की शक्तियों को हम अनुभव करते हैं ना

203
00:14:16,400 --> 00:14:20,960
लेकिन परमात्मा दिखाई नहीं दे रहा है। इसका यह मतलब तो नहीं कि परमात्मा

204
00:14:20,960 --> 00:14:25,200
नहीं है। नहीं वो तो दिखाई देना और ना देना तो इस पर निर्भर

205
00:14:25,200 --> 00:14:29,520
करता है कि भगवान ने हमें जो इंद्रियां दी हैं उसमें से एक इंद्री उसने नहीं दी देखने

206
00:14:29,520 --> 00:14:33,600
वाली जो ईश्वर को देख सके। मान लीजिए कि ईश्वर को देख सकने वाली इंद्री नहीं

207
00:14:33,600 --> 00:14:37,760
दी तो नहीं देख पा रहे। अभी वह दे दे तो हो सकता है देख ले तो उसके

208
00:14:37,760 --> 00:14:41,760
ऊपर कंट उसके ऊपर वो है सामर्थ्य कि वह चाहे तो अपने आप को दिखाए

209
00:14:41,760 --> 00:14:45,840
वो चाहे तो ना दिखाए वह तो एक अलग बात है। मगर एक व्यक्ति जैसे हमने कहा पंखा चल

210
00:14:45,840 --> 00:14:50,000
रहा है तो पंखा चलने से सिद्ध होता है कि इसके पीछे कोई शक्ति काम कर रही है। उसी

211
00:14:50,000 --> 00:14:54,000
प्रकार से उसी प्रकार से पूरी सृष्टि का संचालन हो रहा है। तो इसका मतलब

212
00:14:54,000 --> 00:14:58,240
है कि कोई पीछे शक्ति है। मगर इसमें दिक्कत ये आती है कि पीछे शक्ति

213
00:14:58,240 --> 00:15:02,240
है तो हम उस पीछे वाली शक्ति को शक्ति माने। ईश्वर माने

214
00:15:02,240 --> 00:15:06,240
कि यह सोचे हो सकता है इसके भी पीछे कोई शक्ति होगी फिर उसके भी पीछे

215
00:15:06,240 --> 00:15:10,480
कोई शक्ति होगी जी जैसे मान लीजिए शक्ति तो एक ही होगी हां

216
00:15:10,480 --> 00:15:14,240
शक्ति तो एक ही होगी ना हां और उस शक्ति को हम सर्वशक्ति

217
00:15:14,240 --> 00:15:18,320
भगवान का नाम देंगे ना नहीं ठीक है दे दिया मगर हम ये कैसे माने

218
00:15:18,320 --> 00:15:23,040
कि वो शक्ति ही हमारा गंतव्य है

219
00:15:23,040 --> 00:15:27,120
मतलब कि मेरा जैसे मान लीजिए भगवान है आपने कहा कि

220
00:15:27,120 --> 00:15:31,120
जो शक्ति सबसे लास्ट में इस पूरी सृष्टि को संचालित कर रही इसके

221
00:15:31,120 --> 00:15:35,200
पीछे कोई नहीं है। वही है। तो वो हमारा ऐ है। उसके

222
00:15:35,200 --> 00:15:39,280
बीच में मेरा संबंध है। मेरा और उसमें ये कैसे माने? जैसे मान

223
00:15:39,280 --> 00:15:43,280
लीजिए मान लीजिए कि इस दुनिया में कोई बहुत अमीर है। बहुत अमीर है। उसके

224
00:15:43,280 --> 00:15:47,600
पास बहुत पैसा है। तो मुझे क्या उससे मेरा संबंध स्थापित

225
00:15:47,600 --> 00:15:53,600
होना चाहिए ना। तभी तो मैं उसकी ओर आगे बढूंगा। तो वो कैसे हो?

226
00:15:54,480 --> 00:15:59,200
संबंध स्थापित करना। परमात्मा कहते हैं

227
00:15:59,200 --> 00:16:03,680
मैं परमात्मा और हम सब उसकी संतान आत्मा

228
00:16:03,680 --> 00:16:07,920
तो आत्मा का अपने पिता परमात्मा से संबंध ना

229
00:16:07,920 --> 00:16:12,240
होना ये तो कोई बात नहीं है। नहीं नहीं ये तो परमात्मा कह रहे हैं।

230
00:16:12,240 --> 00:16:16,320
फिर जो नास्तिक है ना जी हां उसको पहले मानना पड़ेगा कि परमात्मा

231
00:16:16,320 --> 00:16:21,200
है और ये जो कह रहा है वो सही कह रहा है। तब वो मानेगा इस बात को।

232
00:16:21,200 --> 00:16:25,360
नास्तिक अगर अपने मन में यह सोचे कि अगर मैंने इस सृष्टि पर

233
00:16:25,360 --> 00:16:29,520
जन्म लिया है, जन्म लिया है जी तो वो माता के गर्भ से जन्म

234
00:16:29,520 --> 00:16:33,760
लिया हुआ है। जी है ना? लेकिन माता के गर्भ में मैं जो

235
00:16:33,760 --> 00:16:38,000
आत्मा आई हूं वो कहां से आई है? उसका भी तो अपना

236
00:16:38,000 --> 00:16:42,080
कोई स्थान होगा ना। जब हम ये कहते हैं जब हम किसी से

237
00:16:42,080 --> 00:16:46,080
परिचय प्राप्त करते हैं तो हम कहते हैं कि भाई आप कहां से

238
00:16:46,080 --> 00:16:50,240
आए हैं? तो वह अपना स्थूल परिचय देते हैं।

239
00:16:50,240 --> 00:16:54,400
हम उनसे पुनः कहते हैं कि हम आपको पूछ रहे हैं। तो वह पुनः

240
00:16:54,400 --> 00:16:58,400
अपने शरीर का ही परिचय देते हैं। लेकिन वो शरीर ना हो के

241
00:16:58,400 --> 00:17:02,480
वो एक आत्मा है। जब हम कहते हैं कि नहीं आप एक आत्मा है

242
00:17:02,480 --> 00:17:06,720
तो आत्मा कहां से आई है? अब वो कहेगा कि मैं आत्मा तो

243
00:17:06,720 --> 00:17:09,760
भगवान के घर से आई हूं। तो अब वो भगवान रहता

244
00:17:09,760 --> 00:17:13,920
कहां है? तब वो भगवान तो इस पारबह्म के पार

245
00:17:13,920 --> 00:17:18,080
में रहता है। अर्थात इस सृष्टि से परे रहता है। नहीं नहीं इसमें इसमें

246
00:17:18,080 --> 00:17:22,080
दीदी ये बात है ना जैसे किसी ने मान लिया कि आत्मा है। ठीक है।

247
00:17:22,080 --> 00:17:26,160
हम उससे कह रहे हैं कि अब आत्मा कहां से आई है? तो ये सवाल तो जो आपने

248
00:17:26,160 --> 00:17:30,320
कहा ना जो समस्त सृष्टि के पीछे संचालित करने वाली जो शक्ति है

249
00:17:30,320 --> 00:17:34,640
उससे भी कहा जाता है। कहा जा सकता है कि तुम कहां से आई हो? कोई

250
00:17:34,640 --> 00:17:38,720
देखो कोई एक भी व्यक्ति हो सकता है ना। कोई एक ही

251
00:17:38,720 --> 00:17:42,880
व्यक्ति हो सकता है। अगर हम यह कहते हैं कि परमात्मा है

252
00:17:42,880 --> 00:17:47,120
तो परमात्मा एक ही होगा। परमात्मा एक ही होगा। आप बहुत

253
00:17:47,120 --> 00:17:51,200
सारी देव आत्माओं को देख लीजिए। आप बहुत सारी धर्मात्मा हो

254
00:17:51,200 --> 00:17:55,520
सकती हैं। महान आत्मा पुण्य आत्मा हो सकती हैं। लेकिन बहुत

255
00:17:55,520 --> 00:17:59,600
सारे परमात्मा नहीं हो सकते हैं। परमात्मा एक ही मेरा क्वेश्चन

256
00:17:59,600 --> 00:18:03,680
अलग है। मैं ये कह रहा हूं कि परमात्मा एक है। हमने मान लिया कि कोई

257
00:18:03,680 --> 00:18:07,920
एक शक्ति है जो इस पूरे संसार को चला रही है। ठीक है? मगर

258
00:18:07,920 --> 00:18:10,480
मेरा

259
00:18:10,480 --> 00:18:14,560
जो नाशिक वो नहीं मान मेरा मेरा उससे संबंध क्या है जो मैं

260
00:18:14,560 --> 00:18:18,640
उसकी पूजा करूं उसकी बातें मानू मेरा क्या संबंध है उससे ये कैसे

261
00:18:18,640 --> 00:18:22,640
सिद्ध होगा वो वो वो तो वो वो वो तो यह कह

262
00:18:22,640 --> 00:18:24,800
देगा जैसे बुद्ध बौद्ध दर्शन

263
00:18:24,800 --> 00:18:28,880
जो कहता है वो कहता है भाई प्रकृति सब कुछ है प्रकृति चला रही है अपने

264
00:18:28,880 --> 00:18:32,960
आप चल रहा है और जो है आप यह करोगे तो यह होगा यह करोगे तो यह होगा बात

265
00:18:32,960 --> 00:18:37,360
खत्म कोई ईश्वर ईश्वर नहीं है यह नास्तिकों का दर्शन भी कहता है

266
00:18:37,360 --> 00:18:41,440
बौद्ध दर्शन नास्तिक दर्शन है ही तो अब यदि

267
00:18:41,440 --> 00:18:45,440
मैंने मान लिया प्रकृति चला रही ठीक है चला रही उससे मेरा कोई रिलेशन नहीं है

268
00:18:45,440 --> 00:18:49,440
जब तक हम रिलेशन नहीं सिद्ध करेंगे तब तक ईश्वर सिद्ध नहीं होगा और जब तक ईश्वर

269
00:18:49,440 --> 00:18:53,520
नहीं सिद्ध करेंगे तब तक धर्म सिद्ध नहीं होगा और जब तक हम धर्म सिद्ध नहीं

270
00:18:53,520 --> 00:18:57,760
करेंगे तब तक हम ये पहचान नहीं पाएंगे कि इस्लाम और ईसाइयत को हम धर्म

271
00:18:57,760 --> 00:19:01,840
कहें ना कहें ये पॉइंट मतलब वहीं से कनेक्टेड है ये बात इसलिए आवश्यक

272
00:19:01,840 --> 00:19:06,400
है कि हम मतलब पहले ये जाने कि हम ये समझ पाए कि

273
00:19:06,400 --> 00:19:10,880
क्या कहते हैं कि ईश्वर सिद्ध कैसे होता है? अब जैसे हमने कहा एक्चुअली

274
00:19:10,880 --> 00:19:15,040
मेरी जानकारी में जो है ईश्वर नास्तिक से ही शुरू होती है

275
00:19:15,040 --> 00:19:19,440
सारी यात्रा। ईश्वर को सिद्ध करेंगे जब आप अगर सिद्ध करेंगे

276
00:19:19,440 --> 00:19:23,440
अगर सिद्ध नहीं करना केवल परमात्मा ने कहा है मान लो तो फिर तो वो वाली बात है कि

277
00:19:23,440 --> 00:19:27,920
जिसको मानना है मानेगा। जिसकी आस्था हो गई आपकी बातें उसको अच्छी लगी

278
00:19:27,920 --> 00:19:31,920
वो प्रभावित हुआ तो उसने मान लिया। मगर वो ठोस जो एक होता है

279
00:19:31,920 --> 00:19:35,920
ना कि उस फिर तस से मस ना होने वाली बात वो वाली बात नहीं

280
00:19:35,920 --> 00:19:39,840
हो पाएगी उसमें तो हम लोगों की जो व्याख्या है वो असुतो मा सद्गमया

281
00:19:39,840 --> 00:19:43,840
तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्यु मा मृतम गम से शुरू होती है एक

282
00:19:43,840 --> 00:19:48,080
जीव के अंदर एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी कभी ना मरने की प्यास है

283
00:19:48,080 --> 00:19:52,240
हम अखंड ज्ञानी बन जाने की प्यास है कोई आया तो कौन आया

284
00:19:52,240 --> 00:19:56,400
अपने आप सोचने लगे कल पाकिस्तान इंडिया में कौन जीतने वाला है अपने आप सोचने

285
00:19:56,400 --> 00:20:01,200
लगे और इसके साथ ही साथ सदा आनंद ंदित रहने की

286
00:20:01,200 --> 00:20:05,200
प्यास है। हमारे अंदर सच्चित आनंद की प्यास है। इसका

287
00:20:05,200 --> 00:20:09,200
मतलब जैसे हमारे अंदर ऐसी कोई प्यास नहीं है जिसका विषय इस दुनिया में ना

288
00:20:09,200 --> 00:20:13,360
हो। उसका निराकरण करने वाला। जैसे हम हमारे अंदर भूख है तो

289
00:20:13,360 --> 00:20:17,520
दुनिया में खाना है। हमारे अंदर प्यास है। दुनिया में पानी है। हमारे अंदर

290
00:20:17,520 --> 00:20:21,600
देखने की क्षमता है तो दुनिया में दृश्य है। सुनने की क्षमता है तो दुनिया में

291
00:20:21,600 --> 00:20:25,680
आवाज है। तो जिस प्रकार भूख होने से ही सिद्ध हो जाता है

292
00:20:25,680 --> 00:20:29,680
कि इस दुनिया में कुछ है जो आपकी भूख मिटा सकता है। प्यास होने से

293
00:20:29,680 --> 00:20:33,920
ही सिद्ध हो जाता है कि इस दुनिया में कोई आपकी प्यास मिटाने वाला तत्व है। उसी प्रकार

294
00:20:33,920 --> 00:20:38,240
से सच्चित आनंद की प्यास होने से ये कभी ना मरने की प्यास,

295
00:20:38,240 --> 00:20:42,240
अखंड ज्ञानी की प्यास और आनंद की प्यास। तो सच्चिदानंद की प्यास से ही सिद्ध हो

296
00:20:42,240 --> 00:20:46,320
जाता है कि दुनिया में सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर का अस्तित्व है। अच्छा

297
00:20:46,320 --> 00:20:50,320
इस प्यास को अगर हम थोड़ा निचोड़ करके देखें तो नास्तिक भी कभी-कभी

298
00:20:50,320 --> 00:20:54,480
ये सोचता है कि बारिश ज्यादा हो रही है तो कम हो जाए। जबकि वो

299
00:20:54,480 --> 00:20:54,980
सुपर

300
00:20:54,960 --> 00:20:58,960
सुप्रीम अथॉरिटी में विश्वास नहीं कर रहा है। मगर वो सोच रहा है कि बारिश

301
00:20:58,960 --> 00:21:02,960
कम हो जाए। और क्या कहते हैं? धूप ज्यादा पड़ रही है तो

302
00:21:02,960 --> 00:21:07,280
कम हो जाए। नास्तिक भी ऐसा सोच लेता है। इसका मतलब उसके अंदर भी सच्चिदानंद

303
00:21:07,280 --> 00:21:11,280
को ढूंढने की चाह है। और यह जो वो सोच रहा है ना

304
00:21:11,280 --> 00:21:15,600
ये बार-बार प्रकृति के नियमों के विपरीत है ना? तो

305
00:21:15,600 --> 00:21:19,600
इसका मतलब वो प्रकृति के सभी प्रकार के नियमों को तोड़ देने की

306
00:21:19,600 --> 00:21:23,600
चाह उसके अंदर विद्यमान है। और इसी से सिद्ध होता है

307
00:21:23,600 --> 00:21:28,000
कि इस संसार में कोई ऐसा है जो प्रकृति के सभी नियमों को तोड़ देता है। तो

308
00:21:28,000 --> 00:21:32,080
यहां से ईश्वर तो सिद्ध हो गया। मगर जो हम वो वाला ईश्वर जो

309
00:21:32,080 --> 00:21:36,080
प्रकृति के सभी नियमों को ना तोड़ पाए वो वाला ईश्वर यहां से सिद्ध

310
00:21:36,080 --> 00:21:40,320
नहीं होगा। अच्छा हां ये दिक्कत है। ईश्वर तो सिद्ध

311
00:21:40,320 --> 00:21:44,320
हो जाएगा मगर तब हमें कहना पड़ेगा कि हां प्रकृति के सभी नियमों को तोड़

312
00:21:44,320 --> 00:21:48,720
मां की कोख से भी आएगा। राम मतलब वो एक अलग वो आ जाएगी।

313
00:21:48,720 --> 00:21:52,720
राम में भी आएगा कृष्ण बन के भी आएगा। अब जब हम ये डिसाइड कर

314
00:21:52,720 --> 00:21:56,720
लेते हैं कि क्या कहते हैं? ईश्वर क्या कहते हैं?

315
00:21:56,720 --> 00:22:00,720
कैसे सिद्ध हुआ? तो इससे वह ईश्वर सिद्ध हुआ जो सब कुछ कर सकता है। फिर वहां बाधित

316
00:22:00,720 --> 00:22:04,800
ईश्वर नहीं है। अब जब हमने यह देखा कि बाधित ईश्वर सिद्ध हुआ

317
00:22:04,800 --> 00:22:08,800
उसके बिना नास्तिक नास्तिक अवधारणा खत्म ही नहीं हो सकती। बाधित ईश्वर के बिना

318
00:22:08,800 --> 00:22:10,000
बुद्धिज्म को हराने

319
00:22:10,000 --> 00:22:15,200
वाला भी सर्वशक्तिमान ईश्वर अद्वैत का ही था शंकराचार्य जी का। तो

320
00:22:15,200 --> 00:22:19,280
जब हमें यह पता चल जाता है कि बाधित ईश्वर ही है।

321
00:22:19,280 --> 00:22:23,360
अबाध्य ईश्वर ही है जो नास्तिकता को खत्म कर सकता है। अब देखते

322
00:22:23,360 --> 00:22:27,840
हैं कि जैसे हमने कहा कुरान भी धर्म है। तो धर्म

323
00:22:27,840 --> 00:22:31,840
यहां से क्या सिद्ध हुआ है? धर्म यहां से ये सिद्ध हुआ कि जीव की चाह का

324
00:22:31,840 --> 00:22:36,000
जो वास्तविक विषय है सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर उसको प्राप्त

325
00:22:36,000 --> 00:22:40,160
कराने वाली विधा का नाम धर्म है। कि आप यह करोगे तो ईश्वर

326
00:22:40,160 --> 00:22:44,240
प्राप्त होगा। आपका सच्चिदानंद जिसको आप खोज रहे हो और यह नहीं करोगे तो प्राप्त

327
00:22:44,240 --> 00:22:48,320
नहीं होगा। तो यह तो हमने सिद्ध कर लिया। अब बात यह आती है कि कुरान के द्वारा

328
00:22:48,320 --> 00:22:52,400
प्रतिपादित होने वाला ईश्वर क्या वही है? वैसा ही है जैसा यहां से हो

329
00:22:52,400 --> 00:22:56,480
रहा है। तो पता चलता है कि कुरान खुद कह रही है कि मेरा ईश्वर यह नहीं कर सकता। मेरा

330
00:22:56,480 --> 00:23:00,480
ईश्वर वो नहीं कर सकता। बाइबल खुद कह रही है मेरा ईश्वर यह नहीं कह सकता।

331
00:23:00,480 --> 00:23:04,640
तो फिर उसके द्वारा बताया गया उस बाधित एंटिटी को प्राप्त कराने

332
00:23:04,640 --> 00:23:08,640
वाली जो विधा है। उसको फिर धर्म नहीं कह पाएंगे। ये छोटा सा मेरा

333
00:23:08,640 --> 00:23:12,560
वो था। इसमें थोड़ा सा प्रकाश डालें। जी चल

334
00:23:12,560 --> 00:23:16,560
किरण दीदी आप क्लियर करेंगे? हां दीदी आप

335
00:23:16,560 --> 00:23:20,640
आ जाइए। और अच्छे से एक्सप्लेन कर दो भाई साहब के

336
00:23:20,640 --> 00:23:25,040
प्रश्न उत्तर को। वो क्लिप दे दीजिए दीदी को। देवता

337
00:23:25,040 --> 00:23:29,120
धर्म के बाद अब्राहम आया

338
00:23:29,120 --> 00:23:34,160
जिसने अपने आखरी बल से पवित्रता की शक्ति से

339
00:23:34,160 --> 00:23:40,160
इस्लाम धर्म

340
00:23:54,470 --> 00:23:58,470
[संगीत]
