1
00:00:02,720 --> 00:00:07,360
नारायण समारंभाम शंकराचार्य मध्यमाम सदाचार्यता

2
00:00:07,360 --> 00:00:12,160
वंदे गुरु परंपरा तो दसवा

3
00:00:12,160 --> 00:00:18,000
समास है हमारा पठित मूर्खों के लक्षण

4
00:00:18,000 --> 00:00:22,400
ऊपर जो लक्षण बतलाए गए हैं उससे मूर्खों में भी चतुरता

5
00:00:22,400 --> 00:00:26,640
आ जाती है जो पीछे अब उन लोगों के लक्षण

6
00:00:26,640 --> 00:00:31,040
बतलाए जाते हैं जो सयाने और समझदार होकर कर भी मूर्ख होते हैं।

7
00:00:31,040 --> 00:00:35,600
ऐसे लोगों को पढ़ा लिखा मूर्ख कहते हैं। इससे श्रोता

8
00:00:35,600 --> 00:00:39,200
लोग दुखी ना हो।

9
00:00:39,200 --> 00:00:43,280
अवगुणों का परित्याग करने से सुख प्राप्त होता है। पढ़ा लिखा मूर्ख

10
00:00:43,280 --> 00:00:47,520
वह होता है जो बहुश्रत और विद्वान तो होता है और

11
00:00:47,520 --> 00:00:51,520
बहुत अच्छी तरह ब्रह्म ज्ञान बतलाता है पर फिर

12
00:00:51,520 --> 00:00:56,960
भी मन में दुराशा और अभिमान रखता है। ऐसा व्यक्ति

13
00:00:56,960 --> 00:01:01,360
मुक्ति का प्रतिपादन करता हुआ भी सगुण भक्ति का खंडन या उच्छेद

14
00:01:01,360 --> 00:01:05,680
करता है और अपने धर्म तथा साधनों

15
00:01:05,680 --> 00:01:09,680
की निंदा करता है। अपने ज्ञान के आवेश में वह

16
00:01:09,680 --> 00:01:14,080
सबको दोषी या खराब बतलाता है। प्राणी

17
00:01:14,080 --> 00:01:18,800
मात्र के दोष ढूंढता है। यह वो है लोकेश वाला दंभी

18
00:01:18,800 --> 00:01:22,880
है ना यह दंभ जो है कहां पर आता

19
00:01:22,880 --> 00:01:28,560
है इसको हमें ध्यान रखना चाहिए। जब

20
00:01:28,560 --> 00:01:34,560
कोई सामान्य व्यक्ति, सामान्य साधक, कोई सामान्य

21
00:01:37,040 --> 00:01:41,040
सत्य की खोज करने वाला किसी समर्थवान गुरु

22
00:01:41,040 --> 00:01:45,040
के श्री चरणों में पहुंच जाता है। वहां पर ये बहुत ज्यादा होता

23
00:01:45,040 --> 00:01:50,080
है। तो होता क्या है कि वहां पर पहुंच गए

24
00:01:50,080 --> 00:01:54,960
तो उसको ये दिखाई देता है। उसको तब ये पता चलता है भाई कि

25
00:01:54,960 --> 00:01:58,960
जो अब जितने भी और लोग हैं यह सब तो पता नहीं क्या बता रहे

26
00:01:58,960 --> 00:02:03,040
हैं। इन्होंने तो सब मतलब ऐसा बता करके रख दिया कि सब नगण्य नजर आ रहा

27
00:02:03,040 --> 00:02:07,120
है। तो उसको उस आचार्य चरणों को

28
00:02:07,120 --> 00:02:11,520
लेकर के कारण उसके अंदर दंभ भी आ जाता है।

29
00:02:11,520 --> 00:02:16,640
और दंभ के कारण वह हर एक के साथ रोकना टोकना

30
00:02:16,640 --> 00:02:21,200
और अनावश्यक रूप से जहां पर आवश्यकता

31
00:02:21,200 --> 00:02:25,520
नहीं भी है वहां पर भी सिद्धांत के द्वारा जो है दूसरों का दमन

32
00:02:25,520 --> 00:02:29,600
करना उन्हें डोमिनेट करना क्योंकि उनको नॉलेज

33
00:02:29,600 --> 00:02:34,800
हो गई है। इस कारण से जो व्यवहारिकता है

34
00:02:34,800 --> 00:02:38,800
उसमें रूखापन या फिर अहंकार

35
00:02:38,800 --> 00:02:43,120
इस तरह की चीजें आपको दिखाई देने लगती है। जबकि इस संबंध में गुरुदेव

36
00:02:43,120 --> 00:02:43,620
के वचन

37
00:02:43,600 --> 00:02:47,760
प्राप्त है। हमें पता नहीं किस संबंध में मैंने ही प्रश्न किया

38
00:02:47,760 --> 00:02:53,760
था गुरुदेव से एक बार तो गुरुदेव ने बोला था कि

39
00:02:53,920 --> 00:02:58,000
अ किसी को भी एक दिन में घी नहीं पिला देना चाहिए सारा

40
00:02:58,000 --> 00:03:00,400
का सारा।

41
00:03:00,400 --> 00:03:04,640
अब यह क्या है कि आपको ऐसे बहुत से लोग मिल जाएंगे परंपरा प्राप्त आचार्यों

42
00:03:04,640 --> 00:03:09,440
से जुड़े हुए और मैं कहूंगा उनमें से एक

43
00:03:09,440 --> 00:03:13,760
अपने बाबूजी भी है ना वो जो

44
00:03:13,760 --> 00:03:17,760
परिसाधना वाले तो होता क्या है कि जब आप

45
00:03:17,760 --> 00:03:21,920
प्रामाणिक चीजों से जुड़ते हैं परंपरा प्राप्त अकाट्य सिद्धांत आपको मिलते

46
00:03:21,920 --> 00:03:26,240
हैं तो आपके अंदर एक दम आ जाता है। अब आप हर सामान्य

47
00:03:26,240 --> 00:03:30,240
व्यक्ति को उस चश्मे के द्वारा लगा करके देखने लगते हो। यह कर रहा

48
00:03:30,240 --> 00:03:34,240
है कि नहीं? अच्छा जनेऊ हो जाना चाहिए। आठ वर्ष की आयु तक जनेऊ हो

49
00:03:34,240 --> 00:03:38,640
जाना चाहिए। अच्छा नहीं हुआ इसका। अच्छा। तुम पते

50
00:03:38,640 --> 00:03:42,720
हो तुम ये हो, तुम वो हो। तुम यह नहीं कर रहे हो। वह दिन भर उसका

51
00:03:42,720 --> 00:03:46,800
यही समीक्षा लोगों की समीक्षा करते रहना उसका काम हो

52
00:03:46,800 --> 00:03:50,880
जाता है। खैर यह जो अपना जिन्न वाले

53
00:03:50,880 --> 00:03:55,280
बाबा है इनकी तो बात ही अलग है। खैर मगर जो एक सामान्य

54
00:03:55,280 --> 00:03:59,520
आचार्यों के जो शिष्य हैं और उनको जो है

55
00:03:59,520 --> 00:04:03,520
विद्वान भी हैं। तो कई उसमें कई परिस्थितियों में

56
00:04:03,520 --> 00:04:07,520
ऐसा दम आ जाता है। वो यह निश्चित करना भूल जाते हैं कि

57
00:04:07,520 --> 00:04:12,160
हमको यह जो बात है

58
00:04:12,160 --> 00:04:16,720
हां, है ना? तो वो यह

59
00:04:16,720 --> 00:04:20,960
तय करना भूल जाते हैं कि यह जो बात है, इसको कहां पर हमें कठोरता

60
00:04:20,960 --> 00:04:25,120
के साथ रखना है और कहां पे हमें विनम्रता पूर्वक निवेदन पूर्वक रखना

61
00:04:25,120 --> 00:04:29,440
है। कहां पे हमें इन दोनों के बीच की स्थिति में रखना है।

62
00:04:29,440 --> 00:04:33,440
इसी को गुरुदेव ने कहा था दर्शन विज्ञान और व्यवहार। बहुत कई

63
00:04:33,440 --> 00:04:37,600
वर्ष पूर्व जब मैं उनके आश्रम में गया था प्रयागराज जोशी। तो आज

64
00:04:37,600 --> 00:04:41,600
वो जो उनका वह वक्तव्य है ना वह शायद थोड़ा सा

65
00:04:41,600 --> 00:04:46,160
धुंधला गया है। फेड हो गया है। कागज में छपा हुआ वक्तव्य है।

66
00:04:46,160 --> 00:04:50,160
जो व्यक्ति अपने अपनी बात को दर्शन विज्ञान और

67
00:04:50,160 --> 00:04:54,400
व्यवहार में सामंजस्य पूर्वक रखता है। सामंजस्य बनाते

68
00:04:54,400 --> 00:04:58,480
हुए अपनी बात को रखता है वह कभी भी असफल नहीं होता है। यह उन्होंने

69
00:04:58,480 --> 00:05:02,480
कहा उस उनका यह कोड जो है वहां पर लगा हुआ है। अभी भी

70
00:05:02,480 --> 00:05:06,720
लगा है पर वह मतलब फेड हो गया क्योंकि कागज में लगा था ना सीधेसीधे

71
00:05:06,720 --> 00:05:10,960
पेपर में फेड हो गया मगर यहां से कभी फेड नहीं हुआ वो वक्तव्य

72
00:05:10,960 --> 00:05:14,720
यहां छप गया है और यही कारण है कि

73
00:05:14,720 --> 00:05:18,720
हम लोग इतने मोर्चे संभाल रहे हैं और

74
00:05:18,720 --> 00:05:22,960
इस हद तक हम बोल रहे हैं बड़ी-बड़ी बड़े-बड़े जो तंत्र

75
00:05:22,960 --> 00:05:26,960
हैं जो अच्छे खासे फैले हुए हैं उनसे भी लोहा ले रहे

76
00:05:26,960 --> 00:05:31,200
हैं। परंतु कहीं पर भी ऐसी चीज हमने नहीं निर्गत

77
00:05:31,200 --> 00:05:35,600
कर दी अपने द्वारा जिससे कि हम फंस जाएं। यह उस वक्तव्य

78
00:05:35,600 --> 00:05:39,680
का ही एकमात्र वो है प्रभाव। हमने उसको गांठ

79
00:05:39,680 --> 00:05:44,960
बांध ली। कैसे बोलना है अपनी बात को? तो

80
00:05:44,960 --> 00:05:49,040
यह हमें ध्यान रखना चाहिए। जब हम सामर्थ्यवान हो जाते हैं कि

81
00:05:49,040 --> 00:05:53,120
हमारा जो व्यवहार है वह कैसा रहे। सामर्थ्यवान का

82
00:05:53,120 --> 00:05:57,520
एक व्यवहार कैसा रहे। आप सामर्थ्यवान गुरु के सानिध्य

83
00:05:57,520 --> 00:06:01,520
में आ गए। उसके बाद जो है आपको ऐसी चीजें प्राप्त

84
00:06:01,520 --> 00:06:05,520
हुई कि जो कहीं और से प्राप्त नहीं हो सकती। तो आपका नजरिया ही चेंज हो

85
00:06:05,520 --> 00:06:09,600
गया। दूसरों को हीन भावना की दृष्टि से देखने लगे। लोकेशणा आ गई।

86
00:06:09,600 --> 00:06:13,600
दंभ आ गया तो वो दंभ और लोकेशना नहीं आना चाहिए।

87
00:06:13,600 --> 00:06:17,680
आपके अंदर इस इसमें गुरुदेव ने देखिए एक बार बात कही थी। गुरुदेव का

88
00:06:17,680 --> 00:06:21,760
एक तरीका देखिए। गुरुदेव जब कोई

89
00:06:21,760 --> 00:06:25,920
महिला मातृ शक्ति उनके पास आती और बोलती है कि क्या मैं गायत्री

90
00:06:25,920 --> 00:06:29,920
मंत्र का जाप कर सकती हूं तो गुरुदेव ये नहीं कहते वहां पर

91
00:06:29,920 --> 00:06:34,240
कि आपको आपको अधिकार नहीं है नहीं तुम नहीं जप सकती ऐसे नहीं बोलते

92
00:06:34,240 --> 00:06:38,240
क्या बोलते हैं कि अपने ऊपर कल्याण करने की भावना से

93
00:06:38,240 --> 00:06:42,240
आपको इसके प्रयोग से बचना चाहिए

94
00:06:42,240 --> 00:06:46,720
इतना अच्छा बोला और इसके प्रयोग से बचते हुए आपको

95
00:06:46,720 --> 00:06:51,520
दूसरा वो देते भी हैं इसका जो मानस में रामचरितमानस

96
00:06:51,520 --> 00:06:55,680
में जो भावार्थ किया है उसको जपना जनक सुता

97
00:06:55,680 --> 00:06:59,840
जग जननी जान जनक सुता जग जननी जानकी अतिशय प्र करुणा निधान की

98
00:06:59,840 --> 00:07:04,080
ताके चुप पर कमल मनाऊं जासु कृपा निर्मल मति पाव निर्मल मति

99
00:07:04,080 --> 00:07:08,480
पा तो अब इसमें क्या हुआ कि व्यक्ति को अचानक

100
00:07:08,480 --> 00:07:12,640
से ये भी नहीं लगा कि मेरे पास कुछ था और वो चला गया जब

101
00:07:12,640 --> 00:07:17,360
हमने उससे कुछ लिया तो एट दी सेम टाइम उसको कुछ दिया भी। पहली बात

102
00:07:17,360 --> 00:07:22,160
दूसरी बात को रखने का ढंग क्या है कि यू

103
00:07:22,160 --> 00:07:26,480
मतलब आपको नहीं करना चाहिए अपने ऊपर कल्याण

104
00:07:26,480 --> 00:07:31,120
की भावना से ये नहीं है नहीं तुम स्त्री हो तुम तुम नहीं कर सकती

105
00:07:31,120 --> 00:07:35,200
ताप ऐसे नहीं इसको कहते है दर्शन

106
00:07:35,200 --> 00:07:39,200
विज्ञान और व्यवहार तो कई बार आपको ऐसे

107
00:07:39,200 --> 00:07:43,440
बड़े-बड़े आचार्यों से जुड़े हुए शिष्य मिल सकते हैं जो दंभ

108
00:07:43,440 --> 00:07:45,520
के कारण क्या बोलेंगे

109
00:07:45,520 --> 00:07:49,680
नहीं तुम्हें अधिकार नहीं है। तुम ये नहीं कर सकते। अब जो व्यक्ति अभी आपका

110
00:07:49,680 --> 00:07:53,840
अपना हुआ नहीं है। जिसने अभी आपका अधिकार अपने ऊपर आपकी सत्ता

111
00:07:53,840 --> 00:07:58,000
स्वीकार नहीं की है। हां जो अभी आपको जान रहा है।

112
00:07:58,000 --> 00:08:02,080
यदि आप उसको प्रारंभिक स्तर पर ऐसा इस तरह से कठोर वचन

113
00:08:02,080 --> 00:08:06,560
बोलोगे आदेश पूर्वक बोलोगे। क्या वो आपका आगे का दर्शन सुनेगा?

114
00:08:06,560 --> 00:08:10,560
क्या वो आपकी जो वो सौंदर्यता है वो देखने का उसका मन होगा। उसकी अनास्था तो

115
00:08:10,560 --> 00:08:15,040
वही उत्पन्न हो जाएगी आपके प्रति। वो क्यों आगे आएगा? तो

116
00:08:15,040 --> 00:08:19,120
हमें जो है यह ध्यान रखना चाहिए कि इसी

117
00:08:19,120 --> 00:08:24,000
संदर्भ में गुरुदेव ने कहा था कि अ

118
00:08:24,000 --> 00:08:28,080
सारा घी एक दिन में नहीं पिलाया जाता और मैंने अपने कई लाइव में कई लोगों

119
00:08:28,080 --> 00:08:32,480
के साथ जो अनुभव है उसमें बताया है कि

120
00:08:32,480 --> 00:08:36,800
अ किस तरह से अच्छा कई लोग यहां पर भी उपस्थित

121
00:08:36,800 --> 00:08:41,200
हैं। यहां पर कई लोग उपस्थित है जो मेरे साथ कई

122
00:08:41,200 --> 00:08:45,200
वर्षों से जुड़े हुए हैं और बहुत दिनों से साथ में कार्य

123
00:08:45,200 --> 00:08:49,200
भी कर रहे हैं और ऐसे भी कुछ लोग हैं जिनमें जिन्होंने अभी तक गुरुदेव के

124
00:08:49,200 --> 00:08:53,360
प्रति पूर्ण निष्ठा है परंतु अभी तक उनसे दीक्षा नहीं

125
00:08:53,360 --> 00:08:58,080
ली है पूर्ण निष्ठा होती तो आप बताइए

126
00:08:58,080 --> 00:09:00,720
जो ऐसे लोग हैं यहां पर जो काफी दिनों से जुड़े

127
00:09:00,720 --> 00:09:04,880
मैंने कभी किसी से कहा हो कि तुम मेरे गुरुदेव से दीक्षा ले लो कभी किसी

128
00:09:04,880 --> 00:09:08,880
से कहा केवल केवल सिद्धांत बताएं। फोन आता

129
00:09:08,880 --> 00:09:13,040
है गुरु गुरु कौन होना चाहिए? तो क्या करते हैं? सिद्धांत बताते

130
00:09:13,040 --> 00:09:17,440
हैं। आप उस सिद्धांत के अकॉर्डिंग अपने हिसाब से चुनिए। विकल्प

131
00:09:17,440 --> 00:09:22,320
पूछोगे तो विकल्प भी बता दूंगा। उसमें से एक विकल्प होगा हमारे गुरुदेव।

132
00:09:22,320 --> 00:09:26,480
ठीक है? मगर ऐसा नहीं है कि हमारे ही क्या कहते हैं?

133
00:09:26,480 --> 00:09:30,480
हमारे मेरे ही जिन जिनको मैं गुरु मानता हूं, जिनको मैंने जिनसे मैंने मंत्र

134
00:09:30,480 --> 00:09:34,480
लिया उनको आप भी ले लो। वरना आप खराब हो, आप ये हो, आप वो ना। ऐसे

135
00:09:34,480 --> 00:09:38,640
नहीं। तो गुरुदेव जिस तरह से सिखाते हैं, गुरुदेव जिस तरह से दृष्टांत

136
00:09:38,640 --> 00:09:42,720
बताते हैं और गुरुदेव जिस मार्ग को प्रशस्त करते हैं,

137
00:09:42,720 --> 00:09:47,120
उसी पर चलने का प्रयास करना चाहिए और यह जो

138
00:09:47,120 --> 00:09:51,920
सगुण भक्ति का खंडन दूसरी परंपराओं का अनादर,

139
00:09:51,920 --> 00:09:56,800
प्रामाणिक परंपराओं का अनादर, प्रामाणिक आचार्यों का अनादर

140
00:09:56,800 --> 00:10:02,160
अगर अपने मत मत की पुष्टि भी करनी है तो करिए। परंतु उसमें

141
00:10:02,160 --> 00:10:06,640
दूसरे के दूसरी किसी संप्रदाय आचार्य या उनका

142
00:10:06,640 --> 00:10:10,800
या उनकी विधि विधान का उनकी भक्ति का जो है अनादर

143
00:10:10,800 --> 00:10:14,960
पूर्वक नहीं करना चाहिए। तो यह दंभ के कारण करते हैं। मेरा एक निजी व्यक्तिगत

144
00:10:14,960 --> 00:10:16,160
अनुभव था तो

145
00:10:16,160 --> 00:10:20,320
इसलिए बताना आवश्यक था और यहां पर कई लोग हैं आहान के जो साथ

146
00:10:20,320 --> 00:10:24,320
में कार्य कर रहे हैं और हम लोग इन स्थितियों से जूझे हैं

147
00:10:24,320 --> 00:10:26,480
और

148
00:10:26,480 --> 00:10:31,360
ऐसा ही कोई ऐसे ही गुट से निकला हुआ कोई व्यक्ति जब

149
00:10:31,360 --> 00:10:35,440
अपने आप को स्वयंभू बना लेता है तो वह बन जाता

150
00:10:35,440 --> 00:10:39,520
है। जैसे कोई विकृति फैलना चालू हुई, चालू हुई, चालू हुई। फिर

151
00:10:39,520 --> 00:10:43,600
एक दिन उस विकृति ने एक प्रॉपर एक स्वरूप ले लिया। जैसे किसी के अंदर कोई

152
00:10:43,600 --> 00:10:47,840
विक्षिप्तता आई, पागलपन आया और उस पागलपन ने फिर एक दिन कोई

153
00:10:47,840 --> 00:10:52,240
रूप धारण कर लिया तो वैसा ही वो रूप हो जाता है कालिया चिन्ह वाले बाबा का।

154
00:10:52,240 --> 00:10:56,240
वो हो गए सब। हालांकि उनके में केवल दंब

155
00:10:56,240 --> 00:11:00,320
नहीं है। उनके में योजनाबद्ध वो भी है, षड्यंत्र भी है, द्वेष भी है।

156
00:11:00,320 --> 00:11:04,960
बहुत सी चीजें हैं। उसमें पक्षपात भी है। खैर

157
00:11:04,960 --> 00:11:09,120
आगे चलते हैं। तो अपने ज्ञान के आवेश में वह सबको

158
00:11:09,120 --> 00:11:13,440
दोषी या खराब बतलाता है और प्राणी मात्र के दोष ढूंढता है।

159
00:11:13,440 --> 00:11:17,680
यदि उसके शिष्य से कोई अवज्ञा हो जाए या उस पर कोई संकट आ पड़े

160
00:11:17,680 --> 00:11:22,000
तो वह अपने कठोर शब्दों से उसे और भी दुखी कर देता है। वह रजोगुणी

161
00:11:22,000 --> 00:11:26,160
कपटी कुटिल अंतःकरण वाला और धनवानों की स्तुति करने

162
00:11:26,160 --> 00:11:30,160
वाला है। वह बिना किसी ग्रंथ को पूरी तरह से देखे

163
00:11:30,160 --> 00:11:31,440
ही उसके दोष बतलाने

164
00:11:31,440 --> 00:11:35,680
लगता है। और यदि उससे गुण की कोई बात कही जाए तो उसमें

165
00:11:35,680 --> 00:11:39,920
भी अवगुण ही ढूंढता है। वह लक्षण सुनकर मन में बुरा मानता है। मत्सर

166
00:11:39,920 --> 00:11:44,640
के कारण झगड़ा करता है और नीति तथा न्याय की जगह

167
00:11:44,640 --> 00:11:48,480
उद्धत व्यवहार करता है।

168
00:11:48,480 --> 00:11:52,560
वह अपने ज्ञान के अभिमान में हट या दुराग्रह करता है। क्रोध को

169
00:11:52,560 --> 00:11:57,200
रोक नहीं सकता और उसके कार्यों तथा बातों में अंतर होता है।

170
00:11:57,200 --> 00:12:01,360
वह बिना अधिकार के वक्ता बनना और उपदेश देना चाहता है।

171
00:12:01,360 --> 00:12:05,360
बिना अधिकार के वक्ता और उपदेश कहां जा रही

172
00:12:05,360 --> 00:12:11,040
लाइन हमें

173
00:12:11,040 --> 00:12:15,200
शंकराचार्य के यहां पर मंचन करने को नहीं मिलेगा तो हम ऐसा करते हैं अपनी पीठ

174
00:12:15,200 --> 00:12:19,760
बनाते हैं अपनी परंपरा बनाते हैं और माताजी से हम ले लेते हैं वो

175
00:12:19,760 --> 00:12:24,240
परम अक्षर सूत्र ब्रह्मसूत्र की जगह विकल्प वैकल्पिक ब्रह्मसूत्र

176
00:12:24,240 --> 00:12:30,240
शारीरिक भाष

177
00:12:32,160 --> 00:12:36,640
यदि वह श्रोता है तो अपनी बहु शुद्धता और वाचलता वाचालता

178
00:12:36,640 --> 00:12:40,800
से वक्ता के दोष बतलाता है। वह दूसरों के तो दोष बतलाता है पर उसे यह नहीं

179
00:12:40,800 --> 00:12:45,120
पता होता कि यह सब दोष स्वयं मुझ में वर्तमान वर्तमान

180
00:12:45,120 --> 00:12:49,360
है। विद्यमान होना चाहिए था। वर्तमान सबके वह

181
00:12:49,360 --> 00:12:53,680
चाहे अध्ययन करके सब विधाओं

182
00:12:53,680 --> 00:12:58,560
वह चाहे अध्ययन करके सब विद्याओं का ज्ञान भी प्राप्त कर ले। पर

183
00:12:58,560 --> 00:13:02,640
अपने ज्ञान से लोगों को संतुष्ट नहीं कर

184
00:13:02,640 --> 00:13:06,640
सकता। वह उसी प्रकार माया के फेर में फंसता है जिस प्रकार

185
00:13:06,640 --> 00:13:11,600
स्पर्श सुख के लोभ से हाथी ऊन की डोरी से बंधता है।

186
00:13:11,600 --> 00:13:15,760
या जिस प्रकार फूलों के रस के लोभ से भरा मृत्यु मुख

187
00:13:15,760 --> 00:13:19,760
में पड़ता है। वह स्त्रियों के साथ रहता है। उन्हीं

188
00:13:19,760 --> 00:13:23,840
को ब्रह्म ज्ञान बतलाता है और निंदनीय वस्तु अंगीकार करता है।

189
00:13:23,840 --> 00:13:26,160
वह अपने मन में उन्हीं बातों को दृढ़ता

190
00:13:26,160 --> 00:13:30,320
पूर्वक धारण करता है जिनसे मनुष्य तुच्छ बनता है और

191
00:13:30,320 --> 00:13:35,040
अपने शरीर को ही सब कुछ समझता है। वह श्रीपति या भगवान को छोड़कर

192
00:13:35,040 --> 00:13:39,200
मनुष्यों की स्तुति करता है अथवा जो उसके सामने आ जाए

193
00:13:39,200 --> 00:13:43,360
उसकी कीर्ति का वर्णन करने लगता है। वह स्त्रियों के अवयवों

194
00:13:43,360 --> 00:13:47,920
और अनेक प्रकार के नाटकों तथा हावभाव आदि का वर्णन करता है।

195
00:13:47,920 --> 00:13:52,080
अथवा ईश्वर को भूल जाता है। वह अपने वैभव के अभिमान में

196
00:13:52,080 --> 00:13:56,320
जीव मात्र को तुच्छ समझता है। पाखंड पूर्ण मत का स्थापन

197
00:13:56,320 --> 00:14:00,640
करता है। यानी कि अवैदिक

198
00:14:00,640 --> 00:14:04,960
चीजों का स्थापन करता है। यदि कोई व्यक्ति विद्वान, वीतराग, ब्रह्म ज्ञानी

199
00:14:04,960 --> 00:14:09,120
और महायोगी होने पर भी संसार को उसका भविष्य बतलाने

200
00:14:09,120 --> 00:14:14,320
लगे तो वह भी पढ़ा लिखा मूर्ख होता है।

201
00:14:14,320 --> 00:14:18,480
पढ़ा लिखा मूर्ख कोई बात सुनकर मन में उसके दोषों का ही विवेचन

202
00:14:18,480 --> 00:14:22,560
करता है और दूसरों उसकी अच्छी बातों को देखकर मत्सर

203
00:14:22,560 --> 00:14:24,960
करता है।

204
00:14:24,960 --> 00:14:29,440
वह भक्ति का साधन या भजन नहीं करता है और ना उसमें वैराग्य

205
00:14:29,440 --> 00:14:34,000
ही होता है। जो बिना क्रिया के ही ब्रह्म ज्ञान छांटता है,

206
00:14:34,000 --> 00:14:38,320
वह भी पढ़ा लिखा मूर्ख होता है। वह तीर्थ, क्षेत्र

207
00:14:38,320 --> 00:14:42,400
वेदों और शास्त्रों आदि को थोड़ा अलग-अलग वैरायटी के मूर्ख भी हैं।

208
00:14:42,400 --> 00:14:46,960
है ना? एक जैसे ही नहीं है। लगातार

209
00:14:46,960 --> 00:14:51,680
क्षेत्र वेदों और शास्त्रों आदि को नहीं मानता। और पवित्र

210
00:14:51,680 --> 00:14:55,680
कुल में भी जन्म लेकर अपवित्र होता है। जो केवल अपना अनादर करने वाले

211
00:14:55,680 --> 00:14:59,920
से प्रेम करता है। बिना किसी की कीर्ति देखे ही उसकी स्तुति

212
00:14:59,920 --> 00:15:04,000
करता है। तुरंत ही उसकी और तुरंत ही

213
00:15:04,000 --> 00:15:08,000
उसकी निंदा करता हुआ अनादर भी करने लगता है। वह

214
00:15:08,000 --> 00:15:12,080
भी पढ़ा लिखा मूर्ख होता है। अब स्तुति और निंदा का देख

215
00:15:12,080 --> 00:15:17,120
लीजिए। यह भी सिद्ध हो रहा है जिन्न वाले बाबा जी पर।

216
00:15:17,120 --> 00:15:21,120
कई लोगों की स्तुति करे बैठे थे और थोड़ा सा

217
00:15:21,120 --> 00:15:25,200
विपरीत परिस्थितियां आई तो ये शंकराचार्य होने के

218
00:15:25,200 --> 00:15:29,440
योग्य नहीं है। ये ये है ये पतलूून पहनता है। ये पेंट पहनता है। ये राक्षस

219
00:15:29,440 --> 00:15:33,600
है ये है वो है। सब चालू कर दिया। इसीलिए ऐसी

220
00:15:33,600 --> 00:15:38,080
बातें बोलने से बचना चाहिए जिनको हम परिवर्त जिनको हम बाद में जाकर के

221
00:15:38,080 --> 00:15:42,400
अस्वीकार करना हो। ऐसी बातें नहीं बोलनी चाहिए। और

222
00:15:42,400 --> 00:15:46,400
मेरा यह प्रयास रहता है। मैं हालांकि इसको सिद्ध पुरुष तो नहीं हूं पर यह

223
00:15:46,400 --> 00:15:50,560
मेरा प्रयास रहता है कि मैं बात वही बोलूं जिसको बदलना ना पड़े

224
00:15:50,560 --> 00:15:54,720
क्योंकि वो श्री राम जी की कुछ शिक्षाएं

225
00:15:54,720 --> 00:15:59,040
हैं ना उनका पालन करने का मन करता है।

226
00:15:59,040 --> 00:16:03,760
श्री राम जैसा बनने का मन करता है। तो इसलिए

227
00:16:03,760 --> 00:16:08,160
ऐसा है। हालांकि बन तो नहीं पाएंगे। उसके

228
00:16:08,160 --> 00:16:12,240
लिए तो अनंत जन्मों भी लग जाए तो बन नहीं पाएंगे। मगर

229
00:16:12,240 --> 00:16:16,480
फिर भी कुछ कर पाए उनके जैसा।

230
00:16:16,480 --> 00:16:22,480
तो आगे जो है

231
00:16:30,160 --> 00:16:34,240
जिसका नियम ही यह हो कि पिछली बातें तो कुछ और अगली बातें कुछ

232
00:16:34,240 --> 00:16:38,400
और जो कहता है कुछ और तथा करता है कुछ।

233
00:16:38,400 --> 00:16:42,560
वह भी पढ़ा लिखा मूर्ख है। जो प्रपंच या माया का तो आदर करता है और परमार्थ

234
00:16:42,560 --> 00:16:46,640
का अनादर करता है। और जो जानबूझकर भी अंधकार में फंसता है वह

235
00:16:46,640 --> 00:16:50,720
भी पढ़ा लिखा मूर्ख। तो पढ़ा लिखा मूर्ख

236
00:16:50,720 --> 00:16:55,120
यथार्थवाद को छोड़कर केवल दूसरों को प्रसन्न करने वाली बातें कहता है

237
00:16:55,120 --> 00:16:59,280
और पराधीनता में जीवन बिताता है। वह ऊपर से दिखलाने

238
00:16:59,280 --> 00:17:03,600
के लिए ढोंग रचता है। ना करने योग्य काम करता है।

239
00:17:03,600 --> 00:17:07,840
उचित मार्ग से हट जाने पर भी हट करता है। वह दिन

240
00:17:07,840 --> 00:17:12,000
रात अच्छी-अच्छी बातें सुनने पर भी अवगुण नहीं छोड़ता। और

241
00:17:12,000 --> 00:17:16,160
यह नहीं जानता कि मेरी भलाई किस बात की। कथा निरूपण

242
00:17:16,160 --> 00:17:20,320
में अच्छे-अच्छे श्रोताओं के आकर बैठने पर उनके संबंध

243
00:17:20,320 --> 00:17:24,720
की शद्र बातें उनके दोष बतलाने लगता है।

244
00:17:24,720 --> 00:17:28,800
यदि उसका शिष्य अनाधिकारी होता है और उसकी अवज्ञा करता

245
00:17:28,800 --> 00:17:33,840
है तो वह उससे भी आशा रखता है।

246
00:17:33,840 --> 00:17:38,400
अब देखिए फिर आगे क्या बात आ रही है। मैंने एक बात यह कही थी

247
00:17:38,400 --> 00:17:42,080
कि

248
00:17:42,080 --> 00:17:46,560
अन्य संप्रदाय और जो प्रामाणिक आचार्य उनका जो है

249
00:17:46,560 --> 00:17:50,560
कोई बात देख के वो उससे भी पीछे नहीं हटता अनादर करने से।

250
00:17:50,560 --> 00:17:54,880
तो अभी ऐसी बहुत सी स्थितियां आई थी जब जो है

251
00:17:54,880 --> 00:17:58,960
जो हमारा बहुत कट्टर विरोधी है उनको

252
00:17:58,960 --> 00:18:03,120
ऐसे आचार्यों की शरण प्राप्त थी जो दूसरे संप्रदाय

253
00:18:03,120 --> 00:18:07,360
के प्रामाणिक और वरिष्ठतम आचार्य हैं। पर फिर भी हमने कहीं

254
00:18:07,360 --> 00:18:11,520
पर भी अपनी मर्यादा को लांगा नहीं। हमने कहीं पर भी वह जो आचार्य

255
00:18:11,520 --> 00:18:15,520
गण हैं जिनकी शरण उन्हें उसे प्राप्त है। हमने कहीं पर

256
00:18:15,520 --> 00:18:19,600
भी उनका अनादर उनके लिए अनादर पूर्वक एक शब्द भी नहीं

257
00:18:19,600 --> 00:18:24,240
कहा। हां हमने कुछ चीजें बताई मगर उसमें ना तो उनकी

258
00:18:24,240 --> 00:18:28,480
शिक्षा के प्रति ना उनकी प्रामाणिकता के प्रति ना उनकी धर्म ब्रह्म की व्याख्या

259
00:18:28,480 --> 00:18:32,480
के प्रति कहीं पर भी विरोधा विरोधपूर्ण कोई बात

260
00:18:32,480 --> 00:18:36,640
नहीं कही। तो इसमें

261
00:18:36,640 --> 00:18:42,640
आगे अगर हम चले कि

262
00:18:43,200 --> 00:18:47,200
यदि कथा श्रवण के समय यदि कथा श्रवण के समय किसी से

263
00:18:47,200 --> 00:18:51,360
कोई दोष हो जाए मैं इस समय 37वा पे पृष्ठ

264
00:18:51,360 --> 00:18:55,360
संख्या पे हूं। है ना? 37वीं पृष्ठ संख्या

265
00:18:55,360 --> 00:18:58,960
बुक के अनुसार

266
00:18:58,960 --> 00:19:01,680
तो

267
00:19:01,680 --> 00:19:05,920
हो जाए तो वह क्रोध पूर्वक चिड़चिड़ाने लगता है। वह अपने वैभव

268
00:19:05,920 --> 00:19:10,320
के अभिमान में सद्गुरु की उपेक्षा करता है। अथवा अपनी गुरु परंपरा

269
00:19:10,320 --> 00:19:14,560
छिपाता है। क्या छिपाता है? क्या छिपाता

270
00:19:14,560 --> 00:19:18,960
है? गुरु परंपरा। पठित मूर्खों के लक्षण तो पर्टिकुलर

271
00:19:18,960 --> 00:19:24,960
किसी एक व्यक्ति की ओर इशारा कर रहे हैं। वैसे जितने भी

272
00:19:24,960 --> 00:19:27,520
जो

273
00:19:27,520 --> 00:19:31,840
वर्णाश्रम विरुद्ध या फिर प्रामाणिक परंपराओं के विरुद्ध

274
00:19:31,840 --> 00:19:35,840
से जो तंत्र है तैयार होते हैं। वो भले ही

275
00:19:35,840 --> 00:19:40,240
झूठी परंपरा तैयार हो या फिर तंत्र तैयार हो। वह सब देखिए

276
00:19:40,240 --> 00:19:44,560
कि वह अपने गुरु का नाम नहीं बताएंगे। वह अपनी परंपरा

277
00:19:44,560 --> 00:19:48,640
नहीं बताएंगे। तो यहां क्या कहा जा रहा है? वह अपनी परंपरा छिपाता है। क्यों

278
00:19:48,640 --> 00:19:53,600
छिपाता है? क्योंकि

279
00:19:53,600 --> 00:19:57,680
इसलिए छिपाता है क्योंकि अगर उसने अपने गुरु का नाम बताया तो उसकी

280
00:19:57,680 --> 00:19:58,320
पोल खुल

281
00:19:58,320 --> 00:20:02,400
सकती है। खैर वह ज्ञान का उपदेश करके अपना

282
00:20:02,400 --> 00:20:06,480
मतलब निकालता है। कृपणों के समान धन संग्रह करता है

283
00:20:06,480 --> 00:20:10,640
और धन संग्रह के लिए परमार्थ का उपयोग करता है। वह दूसरों को तो अच्छे

284
00:20:10,640 --> 00:20:14,880
उपदेश देता है पर स्वयं उसके अनुसार आचरण नहीं करता और फिर सदा ब्रह्म ज्ञान

285
00:20:14,880 --> 00:20:19,200
की पधारता है और गोस्वामी कहलाकर

286
00:20:19,200 --> 00:20:23,280
भी पराधीन रहता है। वह भक्ति मार्ग का नाश करता है। स्वयं अपनी हानि करने

287
00:20:23,280 --> 00:20:28,000
वाला काम करता है। यदि उसके हाथ से गृहस्ती आदि सब कुछ निकल जाए

288
00:20:28,000 --> 00:20:32,000
तो भी उसमें परमार्थ का लेश नहीं होता अथवा वह ब्राह्मणों तथा

289
00:20:32,000 --> 00:20:36,000
देवताओं का द्वेषी होता है। पढ़े लिखे मूर्खों के यह लक्षण या अवगुण इसलिए

290
00:20:36,000 --> 00:20:40,080
यहां बतलाए गए हैं कि लोग इनका परित्याग करें। भाई

291
00:20:40,080 --> 00:20:44,240
इसमें से जो भी बात हमारे ऊपर भी लागू हो रही हो उसे अवश्य

292
00:20:44,240 --> 00:20:48,560
त्याग दें। ये नहीं कि हम किसी और के बारे में ही सोचे। इसमें से कई बातें हैं जो हमसे

293
00:20:48,560 --> 00:20:53,920
भी होकर गुजरी होंगी। तो उसका चिंतन मनन अवश्य करें।

294
00:20:53,920 --> 00:20:58,160
और आत्मचिंतन अवश्य किया करिए। बहुत

295
00:20:58,160 --> 00:21:02,400
लाभदायक होता है।

296
00:21:02,400 --> 00:21:07,120
यदि इसमें कोई त्रुटि रह गई हो तो विचक्षण लोग इनके

297
00:21:07,120 --> 00:21:11,360
लिए मुझे क्षमा करें। जो लोग इस संसार में सुख मानते हैं, वे परम

298
00:21:11,360 --> 00:21:15,520
मूर्खों से भी बढ़कर मूर्ख हैं। इस संसार के दुखों से बढ़कर कोई दुख नहीं

299
00:21:15,520 --> 00:21:19,520
है। अगले समास में संसार के इन्हीं सब दुखों का निरूपण किया गया है

300
00:21:19,520 --> 00:21:23,520
और यह बतलाया गया है कि गर्भ में आने और जन्म धारण करने पर

301
00:21:23,520 --> 00:21:27,520
मनुष्यों को कैसे-कैसे दारुण दुख भोगने पड़ते हैं। ठीक है?
