1
00:00:02,640 --> 00:00:07,280
ईश्वर के नाम का घोष और जय जयकार की गर्जना होती है।

2
00:00:07,280 --> 00:00:11,360
जहां निरंतर प्रेमी भक्तों के गायन, भगवत कथा, हरि कीर्तन और

3
00:00:11,360 --> 00:00:15,680
वेदों, आख्यानों तथा पुराणों का श्रवण होता रहता है। जहां

4
00:00:15,680 --> 00:00:19,840
परमेश्वर का गुण गुणानुवाद या अनेक

5
00:00:19,840 --> 00:00:24,240
निरूपणों की बातचीत होती है और अध्यात्म विद्या

6
00:00:24,240 --> 00:00:28,240
के भेदों और अभेदों का विवेचन होता है। यह अपनी सभा

7
00:00:28,240 --> 00:00:34,240
की बात हो रही है क्या? या फिर YouTube लाइव स्ट्रीम चर्चाओं की बात हो रही है।

8
00:00:36,080 --> 00:00:40,160
जहां अनेक प्रकार के समाधान होते हैं। नाना शंकाओं की निवृत्ति होती। अब ये अपनी

9
00:00:40,160 --> 00:00:44,960
सभा नहीं है। अब ये गुरुदेव की सभा है। नाना प्रकार की शंका जो

10
00:00:44,960 --> 00:00:48,960
शंकाएं हैं उनकी निवृत्ति भी हो रही है ना। वो अपने पास उतनी अवेलेबिलिटी नहीं

11
00:00:48,960 --> 00:00:53,280
है। अ और

12
00:00:53,280 --> 00:00:57,680
वाग विलास से चित्त में ध्यान की मूर्ति बैठती है। जिसमें

13
00:00:57,680 --> 00:01:02,160
प्रेमी और भावुक भक्त गंभीर और सात्विक सभ्य

14
00:01:02,160 --> 00:01:06,320
रम्य रसाल गायक निष्ठावान कर्मशील

15
00:01:06,320 --> 00:01:10,480
आचारशील दानशील धर्मशील पवित्र और पुण्यशील

16
00:01:10,480 --> 00:01:14,720
शुद्ध हृदय वाले कृपालु योगी वीतरागी उदास

17
00:01:14,720 --> 00:01:19,280
जटाधारी नाथपंथी मुद्राधारी

18
00:01:19,280 --> 00:01:23,520
बाल ब्रह्मचारी योगीश्वर उरश चरण और

19
00:01:23,520 --> 00:01:27,680
तपस्या करने वाले तीर्थवासी मनस्वी महायोगी

20
00:01:27,680 --> 00:01:32,720
और लोक सेवक जनता के अनुसार चलने वाले सिद्ध साधु और साधक

21
00:01:32,720 --> 00:01:37,120
मंत्र यंत्र शोधक एकनिष्ठ उपासक गुण ग्राही

22
00:01:37,120 --> 00:01:41,280
संत सज्जन विद्वान वेदज्ञ शास्त्रज्ञ महात्मा प्रबुद्ध

23
00:01:41,280 --> 00:01:46,800
सर्वज्ञ समाधान और शुद्धि करने वाले योगी विद्वान

24
00:01:46,800 --> 00:01:49,520
ऋषिवर

25
00:01:49,520 --> 00:01:54,080
उत्कट तार्किक कवीश्वर मनोजय

26
00:01:54,080 --> 00:01:58,320
के मुनीश्वर और दिगंबर पौराणिक विद्वान

27
00:01:58,320 --> 00:02:02,960
वैदिक भट्ट पाठक यजुर्वेदी उत्तम और

28
00:02:02,960 --> 00:02:08,240
बड़े श्रोतय याज्ञकिक

29
00:02:08,240 --> 00:02:12,800
अग्निहोत्री वैद्य और पंचाक्षरी परोपकारी

30
00:02:12,800 --> 00:02:16,880
भूत भविष्य तथा वर्तमान तीनों कालों का ज्ञान रखने वाले

31
00:02:16,880 --> 00:02:20,640
बहुश्रत निराभिमानी

32
00:02:20,640 --> 00:02:23,280
निरपेक्ष

33
00:02:23,280 --> 00:02:27,520
शांति दया और क्षमाशील शील पवित्र

34
00:02:27,520 --> 00:02:32,160
तथा सत्वशील शुद्ध हृदय वाले ज्ञानशील

35
00:02:32,160 --> 00:02:36,400
और ईश्वर पुरुष आदि सभा नायक उपस्थित

36
00:02:36,400 --> 00:02:40,880
है। इतने लोग हुए भाई जिनमें नित्य और अनित्य का विवेक

37
00:02:40,880 --> 00:02:44,880
है। उस सभा की अलौकिक महिमा का वर्णन कैसे हो सकता है? जहां

38
00:02:44,880 --> 00:02:48,880
परमार्थी लोगों के द्वारा कथा श्रवण के उपाय होते रहते

39
00:02:48,880 --> 00:02:53,840
हैं। वहां लोगों के तरण का उपाय सहज ही हो जाता है।

40
00:02:53,840 --> 00:02:58,320
जहां उत्तम गुणियों की मंडली है। जहां सत्य और धैर्य

41
00:02:58,320 --> 00:03:02,480
आदि उत्तम गुणों वाले लोग रहते हैं। और जहां

42
00:03:02,480 --> 00:03:04,800
सदा सुख ही सुख रहता है।

43
00:03:04,800 --> 00:03:09,040
जहां विद्या पात्र कला पात्र विशेष गुणों

44
00:03:09,040 --> 00:03:13,200
के सत्पात्र भगवान के प्रीति पात्र एकत्र होते

45
00:03:13,200 --> 00:03:18,320
हैं। जहां प्रवृत्ति वाले, निवृत्ति वाले और प्रपंची

46
00:03:18,320 --> 00:03:22,560
और परमार्थी, गृहस्थ और वानप्रस्थ, सन्यासी, वृद्ध, तरुण

47
00:03:22,560 --> 00:03:26,720
और बालक पुरुष और स्त्रियां सभी मिलकर

48
00:03:26,720 --> 00:03:31,440
अखंड रूप से अंतर्यामी भगवान का ध्यान करते हैं।

49
00:03:31,440 --> 00:03:35,680
यह जो सब परमेश्वर के भक्त हैं और जिनसे अकस्मात समाधान होता

50
00:03:35,680 --> 00:03:39,680
है, उन सबका मैं अभिवंदन करता हूं। उस सभा

51
00:03:39,680 --> 00:03:44,160
को मेरा नमस्कार है जिसमें नित्य और निरंतर भगवान का कीर्तन

52
00:03:44,160 --> 00:03:48,320
होता है। अनेक ग्रंथों में बड़े लोगों ने कहा है कि जहां

53
00:03:48,320 --> 00:03:52,400
भगवान की मूर्ति होती है वहीं उत्तम गति मिलती है। कलयुग

54
00:03:52,400 --> 00:03:56,560
में कीर्तन ही सबसे बढ़कर है और जहां वह कीर्तन हो वही सभा श्रेष्ठ

55
00:03:56,560 --> 00:04:00,800
है। वहां कथा सुनने से अनेक प्रकार के कष्ट और संदेह नष्ट

56
00:04:00,800 --> 00:04:05,040
हो जाते हैं। देखिए यह हम पढ़ चुके हैं और आप नहीं थे

57
00:04:05,040 --> 00:04:09,680
और हम पहले समास पर आ गए थे।

58
00:04:09,680 --> 00:04:15,600
जिसमें मूर्ख के लक्षण है। है ना?

59
00:04:15,600 --> 00:04:20,160
ठीक है। एक बार रिवाइज हो जाएगा। तो

60
00:04:20,160 --> 00:04:24,960
यहां पर सभा में उपस्थित लोगों की अ

61
00:04:24,960 --> 00:04:30,960
महिमा गान करते हुए सभा के प्रति आपको

62
00:04:32,720 --> 00:04:37,200
एकाग्र बनाने का प्रयास किया गया है और

63
00:04:37,200 --> 00:04:42,400
इसमें एक अभी शब्द आया था पिछला जब हम पढ़ रहे थे निराभिमान

64
00:04:42,400 --> 00:04:44,800
निरभिमान

65
00:04:44,800 --> 00:04:48,880
निरभिमान शब्द इन दिनों मेरे जानकारी में फिर

66
00:04:48,880 --> 00:04:53,440
से आया है। उसका कारण है सत्यार्थ प्रकाश। सत्यार्थ

67
00:04:53,440 --> 00:04:59,200
प्रकाश में दयानंद जी लिखते हैं कि

68
00:04:59,200 --> 00:05:04,000
सत्यार्थ प्रकाश में दयानंद जी लिखते हैं कि भक्ति करने पर भगवान जो है

69
00:05:04,000 --> 00:05:06,480
वो

70
00:05:06,480 --> 00:05:10,720
कुछ ऐसे देते नहीं है मगर हां भक्ति

71
00:05:10,720 --> 00:05:15,520
करने से निरभिमानता आती है। अब ये निरभिमानता

72
00:05:15,520 --> 00:05:19,600
आने का आशय क्या है? यहां पे क्या हुआ ना? अप्रत्यक्ष

73
00:05:19,600 --> 00:05:23,840
रूप से दयानंद जी ने अपनी बात का खंडन सा कर लिया। जैसे वह अगर यह कहते हैं

74
00:05:23,840 --> 00:05:27,920
या तो वह यह कहते हो कि तात्विक रूप से वह यह मानते हैं कि भगवान

75
00:05:27,920 --> 00:05:32,080
कुछ देते नहीं है बल्कि अपने कर्मों का फल प्राप्त होता है। यह बात तो

76
00:05:32,080 --> 00:05:36,640
ठीक है। तात्विक रूप से ऐसा ही होता है। मगर व्यवहारिक रूप से क्या है? हमारी

77
00:05:36,640 --> 00:05:40,720
जो इंद्रियां हैं उनके द्वारा प्राप्त होने वाली सूचना क्या है? यह

78
00:05:40,720 --> 00:05:44,800
तो अनुमान और शब्द के द्वारा हमें प्राप्त हो रहा है कि कर्मों का फल मिलता है।

79
00:05:44,800 --> 00:05:48,800
इंद्रियों के द्वारा प्राप्त होने वाली प्राप्त होने वाली जानकारी यह है

80
00:05:48,800 --> 00:05:52,960
कि जब हम भगवान से कुछ मांगते हैं तो भगवान देते हैं। सच्चे हृदय से जब उनकी भक्ति

81
00:05:52,960 --> 00:05:58,560
करते हैं तो भगवान देते हैं। मगर इस इंफॉर्मेशन को वो कट कर देते हैं।

82
00:05:58,560 --> 00:06:01,680
मगर दूसरी ओर

83
00:06:01,680 --> 00:06:05,760
वो अपने ग्रंथ में नर निरभिमानता लिखते हैं

84
00:06:05,760 --> 00:06:09,760
कि जब भक्ति करते हैं ईश्वर की तो निरभिमानता आती है। अब निरभिमानता

85
00:06:09,760 --> 00:06:14,000
का मतलब क्या है? कि हमें जो भी प्राप्त हो रहा है उसका कारण

86
00:06:14,000 --> 00:06:14,500
हम स्वयं

87
00:06:14,480 --> 00:06:18,640
को ना उसका क्रेडिट हम स्वयं को ना दें। तो किसको दें?

88
00:06:18,640 --> 00:06:22,800
ईश्वर को। तो यानी कि एक तरफ हम क्या कह रहे हैं

89
00:06:22,800 --> 00:06:27,200
कि ईश्वर से कुछ नहीं मिलने वाला। व्यक्ति को अपने कर्मों का फल ही मिलेगा।

90
00:06:27,200 --> 00:06:31,440
दूसरी तरफ हम क्या कह रहे हैं कि भले ही ईश्वर

91
00:06:31,440 --> 00:06:35,600
से कुछ ना मिल रहा हो। अपने कर्मों का फल ही मिल रहा हो। मगर

92
00:06:35,600 --> 00:06:39,600
मानना यही है कि ईश्वर से मिल रहा है। तो यह पता कर ले कि मानना क्या

93
00:06:39,600 --> 00:06:43,840
है? सोचने वाली बात मानना क्या है

94
00:06:43,840 --> 00:06:47,920
भाई? ईश्वर से मिलना माने कि ना माने? कर्मों का फल

95
00:06:47,920 --> 00:06:52,080
भी ईश्वर से ही मिलेगा और अगर भक्ति करेंगे तो कल्याण भी उन्हीं से ही मिलेगा।

96
00:06:52,080 --> 00:06:56,320
यह मानना है। अंतत गतवा कुछ और है। तात्विक विवेचना जो

97
00:06:56,320 --> 00:07:00,640
आपको बता दी। मगर वह क्या कह रहे हैं कि मानो भी वही तात्विक विवेचना।

98
00:07:00,640 --> 00:07:06,640
फिर वह यह कह रहे हैं कि

99
00:07:09,040 --> 00:07:13,280
फिर वह यह कह रहे हैं जिनके क्वेश्चन है ना वो लास्ट में रख

100
00:07:13,280 --> 00:07:17,440
लीजिए अभी लास्ट में ले लेंगे। फिर वो ये कह रहे हैं कि नहीं नहीं ऐसा मत मानो

101
00:07:17,440 --> 00:07:21,680
कि स्वयं से किया है। तुमने स्वयं कुछ किया है। तुम्हें मानना

102
00:07:21,680 --> 00:07:25,840
यही पड़ेगा। तुम्हें मानना यही चाहिए कि भगवान ने किया

103
00:07:25,840 --> 00:07:29,840
है। तो जब हम मानना चाह रहे हैं कि सब कुछ भगवान ने ही किया है उस

104
00:07:29,840 --> 00:07:34,480
और से उस और अपना ध्यान ले जाना चाह रहे हैं। ना हमने कुछ अच्छा किया है ना हमने

105
00:07:34,480 --> 00:07:38,480
मतलब हमें हम अपने आप को जो अहम भाव है ना अहंकार जो

106
00:07:38,480 --> 00:07:42,480
गीता में मना किया गया है जो बाधक जो बंधन का वो है

107
00:07:42,480 --> 00:07:47,520
पर्याय है अहंकार तो उससे छूटने के लिए यही है कि भाई

108
00:07:47,520 --> 00:07:52,480
आप अपने आचार विचार में एक बात को डालें अपने

109
00:07:52,480 --> 00:07:56,720
आपको क्योंकि इंद्रियों से पता चल रहा है कि आपने किया है तो आप अपने आप को बताना

110
00:07:56,720 --> 00:08:00,880
शुरू करें कि नहीं मैंने नहीं किया है। विशेष तौर पर अच्छी चीज तो मैंने

111
00:08:00,880 --> 00:08:05,040
बिल्कुल नहीं की। तो किसने की है? ये भगवान ने की। तो क्या करें? भगवत

112
00:08:05,040 --> 00:08:09,040
कृपा से। भगवत कृपा से। भगवत कृपा से। यह कार्य कैसे हुआ? भगवत कृपा

113
00:08:09,040 --> 00:08:13,200
से। गुरु गोविंद और ग्रंथ की कृपा से। यह अपने

114
00:08:13,200 --> 00:08:17,200
को बार-बार बार-बार सुनाएं। जिससे कि आपका

115
00:08:17,200 --> 00:08:21,280
जो अहंकार है कि मैंने किया, मैंने किया, मैंने किया, मैंने किया।

116
00:08:21,280 --> 00:08:24,240
मैं मैं वो मैं नष्ट हो। जब

117
00:08:24,240 --> 00:08:28,800
नष्ट होगा तभी तो आप जो है आत्म स्वरूप ज्ञान स्वरूप भगवान

118
00:08:28,800 --> 00:08:32,880
के साथ एक ही भूत हो पाएंगे। जब तक आपका अहंकार बचा रहेगा कि आप

119
00:08:32,880 --> 00:08:36,960
कुछ हैं तब तक आप जो है एक ही भूत थोड़ी ना हो पाएंगे। तब तक आपकी

120
00:08:36,960 --> 00:08:41,280
मुक्ति संभव नहीं है। और भगवान

121
00:08:41,280 --> 00:08:45,680
के प्रति आसक्ति भी तभी उत्पन्न होगी। जब दिन भर आपके चिंतन गुजेगा।

122
00:08:45,680 --> 00:08:49,680
चिंतन की डेफिनेशन भी बता दी गई है। भगवत गीता के अनुसार चिंतन की

123
00:08:49,680 --> 00:08:54,480
डेफिनेशन क्या है? चिंतन से उत्पन्न होती है आसक्ति।

124
00:08:54,480 --> 00:08:58,560
आसक्ति से उत्पन्न होता है क्रोध। क्रोध

125
00:08:58,560 --> 00:09:02,800
से उत्पन्न होता है भ्रम। हम

126
00:09:02,800 --> 00:09:07,920
और भ्रम से उत्पन्न होता है कष्ट। है ना?

127
00:09:07,920 --> 00:09:10,080
तो

128
00:09:10,080 --> 00:09:14,160
इस क्रम को समझें और यह एक बात है

129
00:09:14,160 --> 00:09:18,320
कि आर्य समाज के जो विद्वान है उन्हें ऐसा कहने से बचना

130
00:09:18,320 --> 00:09:22,640
चाहिए कि ईश्वर कुछ नहीं देता है क्योंकि सतही

131
00:09:22,640 --> 00:09:27,280
स्तर पर हमको यही मानना है कि ईश्वर कुछ

132
00:09:27,280 --> 00:09:31,440
दे रहा है। ईश्वर ही कर रहा है जो भी कर रहा है। यह व्यवहारिक

133
00:09:31,440 --> 00:09:36,560
सत्य है। जैसे कर्म्यवादी कारस्ते मा फले कदाच

134
00:09:36,560 --> 00:09:39,440
अंतत कथवा हम ईश्वर की

135
00:09:39,440 --> 00:09:43,600
बात क्यों मानते हैं क्यों मानते हैं क्योंकि हमें संत

136
00:09:43,600 --> 00:09:47,760
सच्चित आनंद चाहिए मगर भगवत पाद शंकराचार्य जी लिखते हैं अपने

137
00:09:47,760 --> 00:09:51,840
ग्रंथ में कि हमें यह

138
00:09:51,840 --> 00:09:56,160
भी नहीं सोचना चाहिए भगवत कार्य करते समय शास्त्र वचन

139
00:09:56,160 --> 00:10:00,160
का कार्य शास्त्र वचनों का अनुसरण करते समय अनुकरण करते समय यह भी नहीं

140
00:10:00,160 --> 00:10:04,240
सोचना चाहिए कि हम मोक्ष के लिए कर रहे हैं। नहीं हम इसलिए

141
00:10:04,240 --> 00:10:08,640
कर रहे हैं क्योंकि शास्त्र ने कहा है वहां से भी अपने को ध्यान हटाना है।

142
00:10:08,640 --> 00:10:12,720
अद्वैत से हमें ध्यान हटाना है। इस चीज से ध्यान

143
00:10:12,720 --> 00:10:16,720
हटाना है कि भगवान सब जानते हैं। भगवान ने जो प्रारब्ध में लिखा होगा वही

144
00:10:16,720 --> 00:10:20,880
होगा। नहीं यहां से भी ध्यान हटाना है। फिर मोक्ष

145
00:10:20,880 --> 00:10:24,960
से भी ध्यान हटाना है। हमें मालूम सब पड़ गया। सब मालूम पड़ गया। अब क्या करना

146
00:10:24,960 --> 00:10:29,760
है? शास्त्र ने जो कहा है वो करिए और द्वैत का भाव है।

147
00:10:29,760 --> 00:10:33,760
ध्यान हटाना है। पृथ्वी गोल है। ध्यान हटाना है तो कहां

148
00:10:33,760 --> 00:10:38,320
लाना है? चपटेपन पर, द्वैत पर, भक्ति पर।

149
00:10:38,320 --> 00:10:42,640
इस पर ध्यान लगाना है। हम तब हम

150
00:10:42,640 --> 00:10:46,720
उस लक्ष्य को प्राप्त कर पाएंगे जो लक्ष्य बहुत दुर्गम है। व्यवहार में

151
00:10:46,720 --> 00:10:50,960
ना आ सकने वाला। अब मैं उस परमार्थ की वंदना करता हूं जो साधकों

152
00:10:50,960 --> 00:10:54,640
का मुख्य स्वार्थ है। लोग जिसकी बात कर रहे थे वही आ

153
00:10:54,640 --> 00:10:58,720
गया। यह योग सभी योगों से बढ़कर

154
00:10:58,720 --> 00:11:02,800
है। जो लोग आज पहली बार आए हैं वो अपने थोड़ा

155
00:11:02,800 --> 00:11:07,040
सा धैर्य रखें। अभी अंत में क्वेश्चन आंसर्स

156
00:11:07,040 --> 00:11:13,040
लिए जाएंगे, क्वेश्चंस लिए जाएंगे तो आप उसमें अपनी बात को पूछिएगा।

157
00:11:14,560 --> 00:11:18,800
योगों से बढ़कर है। यह योग सभी योगों से बढ़कर है। है तो परम

158
00:11:18,800 --> 00:11:23,200
सुगम पर उन लोगों के लिए बहुत दुर्गम है जो सत समागम

159
00:11:23,200 --> 00:11:27,440
का मर्म नहीं जानते। अनेक साधनों का फल तो उधार मिलने

160
00:11:27,440 --> 00:11:31,840
वाली चीज है पर यह ब्रह्म का नगद साक्षात्कार है।

161
00:11:31,840 --> 00:11:36,720
इसी से वेदों और शास्त्रों का सार ज्ञात होता है। यह परमार्थ

162
00:11:36,720 --> 00:11:40,960
चारों ओर फैला हुआ होने पर भी कहीं अणु मात्र भी नहीं दिखाई

163
00:11:40,960 --> 00:11:45,200
देता। लोग संसार से उदासीन हो जाने पर ही पर

164
00:11:45,200 --> 00:11:49,280
एक ही ओर देखते रहने के कारण कुछ देख नहीं सकते। आकाश

165
00:11:49,280 --> 00:11:53,360
मार्ग के गुप्त पंथ हैं। उन्हें केवल समर्थ योगी

166
00:11:53,360 --> 00:11:57,520
ही जानते हैं। दूसरों के लिए वह पंथ बहुत ही गुप्त

167
00:11:57,520 --> 00:12:01,600
हैं और सहसा उनका पता नहीं चलता। यह परमार्थ

168
00:12:01,600 --> 00:12:05,600
सार का भी सार और अखंड अक्षय तथा अपार है। चोर

169
00:12:05,600 --> 00:12:09,760
इसे किसी प्रकार चुरा नहीं सकते। उसे ना तो राजा का ना अग्नि का

170
00:12:09,760 --> 00:12:13,840
ना आपत्ति का कोई भय परम ब्रह्म अपने साथ

171
00:12:13,840 --> 00:12:18,000
स्थान से नहीं हटता अपनी जगह नहीं छोड़ने देता छोड़ता

172
00:12:18,000 --> 00:12:22,000
कालांतर में भी नहीं टलता सदा जहां का तहां रहता

173
00:12:22,000 --> 00:12:26,080
है शाश्वत सत्य है यह ऐसी बड़ी अमानत है जो

174
00:12:26,080 --> 00:12:30,560
ना कभी लौटाई जा सकती है ना कभी घटती है बढ़ती है वह

175
00:12:30,560 --> 00:12:34,720
ना कभी खींचती है और ना अदृश्य होती है पर गुरु

176
00:12:34,720 --> 00:12:39,360
के अंजन दिए बिना वह दिखाई भी नहीं देता गुरु अद्वतार

177
00:12:39,360 --> 00:12:45,360
का उपनिषद गुरु का मतलब अंधकार रू का मतलब निकालने वाला

178
00:12:48,560 --> 00:12:52,720
यह परम गण ज्ञान है इसलिए

179
00:12:52,720 --> 00:12:56,880
इसे परमार्थ कहते हैं। छिपा

180
00:12:56,880 --> 00:13:00,880
हुआ ज्ञान है। जिसने बहुत ध्यान पूर्वक ढूंढा

181
00:13:00,880 --> 00:13:04,880
और देखा उसी को यह अर्थ प्राप्त हुआ। औरों के लिए वर्तमान रहने पर भी जन्म

182
00:13:04,880 --> 00:13:08,880
जन्मांतर के लिए अलभ्य हो गया। इस परमार्थ की अपूर्वता

183
00:13:08,880 --> 00:13:13,040
यह है कि इसके लिए जन्म और मृत्यु कोई बात ही नहीं है। इसके

184
00:13:13,040 --> 00:13:17,280
द्वारा सायोजता की पदवी तुरंत ही मिल जाती है। इसके द्वारा

185
00:13:17,280 --> 00:13:21,280
विवेक से माया बाहर आ जाती है। सार और असार का

186
00:13:21,280 --> 00:13:25,840
ज्ञान होता है। और मन में परम ब्रह्म का ज्ञान होता है।

187
00:13:25,840 --> 00:13:30,160
जहां उस ब्रह्म का ज्ञान हुआ। उसमें यह ब्रह्मांड लीन हुआ।

188
00:13:30,160 --> 00:13:36,160
तहां पंचभूतों का खेल तुच्छ जान पड़ता है।

189
00:13:37,440 --> 00:13:41,520
जो ही विवेक में शुद्ध आत्मा आती है त्यों ही प्रपंच में माया

190
00:13:41,520 --> 00:13:46,480
झूठी जान पड़ने लगती है। माया आ गई।

191
00:13:46,480 --> 00:13:51,280
है कोई माया के बिना? जो ही अंतःकरण में

192
00:13:51,280 --> 00:13:55,360
ब्रह्म स्थित होता है त्यों ही संदेह मानव ब्रह्मांड के बाहर चला

193
00:13:55,360 --> 00:13:59,520
जाता है और दृश्य पदार्थ पुराने जजर और बिगड़े हुए जान

194
00:13:59,520 --> 00:14:04,560
पड़ते हैं। तो मुक्ति का अनुभव करा रहे हैं। भाई मुक्ति कैसे

195
00:14:04,560 --> 00:14:08,560
जो इस प्रकार परमार्थ करता है

196
00:14:08,560 --> 00:14:12,640
स्वयं उसी का स्वार्थ सिद्ध होता है। श्रेष्ठों से भी श्रेष्ठ।

197
00:14:12,640 --> 00:14:17,120
इस परमार्थ का कहां तक और क्या वर्णन किया जाए? इस परमार्थ

198
00:14:17,120 --> 00:14:21,280
से ब्रह्मा आदि को भी विश्राम मिलता है और योगियों को

199
00:14:21,280 --> 00:14:25,600
परम ब्रह्म में तन्मयता प्राप्त होती है। सिद्ध साधु

200
00:14:25,600 --> 00:14:30,400
और महानुभावों के लिए यह परमार्थ विश्राम स्थान

201
00:14:30,400 --> 00:14:34,400
और अंत में सतोगुणी जड़ जीवों के लिए भी यह सत्संग के द्वारा सुलभ

202
00:14:34,400 --> 00:14:38,800
हो जाता है। यह परमार्थ ही जन्म को सार्थक करने वाला

203
00:14:38,800 --> 00:14:43,120
संसार से तारने वाला और धार्मिक परलोक दिखना दिखलाने

204
00:14:43,120 --> 00:14:47,120
वाला है। यह तपस्वी का आश्रय साधकों को

205
00:14:47,120 --> 00:14:51,440
आधार और भवसागर के पार ले जाने वाला है। परमार्थी

206
00:14:51,440 --> 00:14:53,200
मानव राज्य को

207
00:14:53,200 --> 00:14:57,280
धारण करने वाला है और जिसमें

208
00:14:57,280 --> 00:15:01,280
परमार्थ नहीं वह भिखारी है। इसकी उपमा किससे दी

209
00:15:01,280 --> 00:15:05,600
जाए? अनंत जन्मों का पुण्य संचित होने पर ही

210
00:15:05,600 --> 00:15:09,680
परमार्थ का साधन होता है और स्वयं परमात्मा

211
00:15:09,680 --> 00:15:14,160
का अनुभव होता है। जिसने परमार्थ को पहचाना

212
00:15:14,160 --> 00:15:19,040
उसने अपना जन्म सार्थक कर लिया और नहीं तो

213
00:15:19,040 --> 00:15:23,200
उस पापी ने कुल का क्षय करने के लिए भी कोई कुल का

214
00:15:23,200 --> 00:15:27,440
क्षय करने के लिए ही जन्म लिया। जो बिना भगवान को प्राप्त किए

215
00:15:27,440 --> 00:15:31,760
संसार का काम करता है। उस मूर्ख का कभी मुंह भी नहीं देखना चाहिए।

216
00:15:31,760 --> 00:15:35,760
अच्छे लोगों को उचित है कि परमार्थ की सिद्धि करते हुए

217
00:15:35,760 --> 00:15:39,760
अपना शरीर सार्थक करें और ईश्वर की भक्ति करके अपने

218
00:15:39,760 --> 00:15:43,360
पूर्वजों का उद्धार करें।

219
00:15:43,360 --> 00:15:47,520
यह परमार्थ की महिमा गान गाई है। अभी तो हमारा

220
00:15:47,520 --> 00:15:52,080
जो मुख्य जो चैप्टर है ना वो मेरे ख्याल से आज

221
00:15:52,080 --> 00:15:56,880
हम लोग वहां तक पहुंच जाएंगे। मुख्य चैप्टर अगली बार से चालू हो जाएगा।

222
00:15:56,880 --> 00:16:00,960
आज इसको पूरा कर लेते हैं। दसवां समास ले। तो अभी

223
00:16:00,960 --> 00:16:05,120
ऐसा करते हैं कुछ क्वेश्चन आंसर्स कर लेते हैं। वैसे भी काफी दिनों बाद

224
00:16:05,120 --> 00:16:08,640
हम लोग एकत्रित हुए हैं। थोड़ा फ्लो में अब अगले

225
00:16:08,640 --> 00:16:14,640
रविवार से ही चालू करते हैं। तो

226
00:16:15,200 --> 00:16:20,480
क्या प्रश्न थे? कोई पूछ रहा था। प्रकृति जो है मूल उपादान कारक

227
00:16:20,480 --> 00:16:24,560
जो पुराने लोग कृपया पुराने लोग हैं कृपया आज प्रश्न अपना रहने दे। जो नए लोग हैं

228
00:16:24,560 --> 00:16:28,560
उनके हम डाउट्स ले लेंगे। जी अनुरुद्ध शर्मा जी पहले आप बोले श्री

229
00:16:28,560 --> 00:16:32,880
राधे गुरु जी दंडवत प्रणाम गुरु जी ना कहे

230
00:16:32,880 --> 00:16:37,120
गुरु जी ना या तो जी कह ले या सम्मान प्रकट

231
00:16:37,120 --> 00:16:41,360
करना है तो भैया कह ले गुरु जी ना कह जी भैया

232
00:16:41,360 --> 00:16:45,360
जी भैया जी मेरा एक प्रश्न था मतलब बहुत समय

233
00:16:45,360 --> 00:16:49,520
से मैं इसे जानना चाह रहा हूं कि हमारे धर्म धर्म सनातन

234
00:16:49,520 --> 00:16:53,760
धर्म में बताया गया कि अगर धर्म के लिए हिंसा की

235
00:16:53,760 --> 00:16:58,080
जाती है तो वह धर्म युक्त होता है। लेकिन अब यह कैसे निर्णय

236
00:16:58,080 --> 00:17:02,160
लिया जाए कि कोई हिंसा की जा रही है वह धर्म युक्त है या अधर्म युक्त

237
00:17:02,160 --> 00:17:07,120
है? तो एक उदाहरण यदि आपके समक्ष प्रकट करना चाहूं तो

238
00:17:07,120 --> 00:17:11,200
अब जैसे कि मैं पाश्चात्य जगत में मैंने देखा था उनकी हिस्ट्री में कि

239
00:17:11,200 --> 00:17:15,360
वह दासों को जो है बेड़ियों से बांध के वगैरह रखते थे तो

240
00:17:15,360 --> 00:17:20,080
वह ऐसा कहते थे कि मैं ऐसा इसलिए करता हूं ताकि यह

241
00:17:20,080 --> 00:17:23,920
अपने कर्तव्यों सेित ना हो जाए और यह भाग ना जाए।

242
00:17:23,920 --> 00:17:28,240
तो इस कारण से अगर उस दृष्टि से देखा जाए तो वह अपने परिवार

243
00:17:28,240 --> 00:17:32,240
के प्रति धर्म को धर्म का पालन करते हुए उनके साथ

244
00:17:32,240 --> 00:17:36,320
ऐसी हिंसा कर रहे हैं। तो लेकिन ये तो अधर्म हुआ तो ये सुनने

245
00:17:36,320 --> 00:17:40,640
में तो लगता है कि ये धर्म है लेकिन देखिए

246
00:17:40,640 --> 00:17:44,880
कई बार प्रज्ञा शक्ति की कमजोरी

247
00:17:44,880 --> 00:17:49,040
की वजह से हम लोग अपने सामने सत्य होता है।

248
00:17:49,040 --> 00:17:53,120
पर उसको देख नहीं पाते। जी मैं एक

249
00:17:53,120 --> 00:17:57,360
बार बैंक में गया था। कुछ पैसे जमा करने

250
00:17:57,360 --> 00:18:01,920
थे। चेक से पैसे आए थे। जी। ठीक है।

251
00:18:01,920 --> 00:18:06,080
तो वहां का जो मैनेजर था वो जो चेक

252
00:18:06,080 --> 00:18:10,320
था वो था बिहार का और मेरा अकाउंट और कहीं

253
00:18:10,320 --> 00:18:15,600
का था और मैं पंजाब नेशनल बैंक की एक ब्रांच में उस चेक को

254
00:18:15,600 --> 00:18:19,680
लगाने के लिए गया था कि सर यह चेक यहां से कैश हो जाएगा। तो

255
00:18:19,680 --> 00:18:23,840
मैंने औपचारिकता के लिए मात्र उसके मैनेजर

256
00:18:23,840 --> 00:18:28,160
से यह परमिशन मांगने में गया। मैनेजर ने

257
00:18:28,160 --> 00:18:32,160
मना कर दिया नहीं नहीं ये तो दूसरी ब्रांच का है। यहां से कैसे होगा? ये है वो है।

258
00:18:32,160 --> 00:18:36,640
उसने मना कर दिया। मैंने कहा यह क्या सेंट्रलाइज़्ड जब सिस्टम है तो पूरी

259
00:18:36,640 --> 00:18:40,160
इंडिया में पूरे भारत में हम कहीं भी

260
00:18:40,160 --> 00:18:45,200
अह चेक से हम अपना कैश ले सकते हैं। जी

261
00:18:45,200 --> 00:18:49,680
तो ये बात मुझे कुछ ग्रहण

262
00:18:49,680 --> 00:18:53,760
नहीं कर पाया। स्वीकार नहीं कर पाया। और फिर मैंने क्या किया

263
00:18:53,760 --> 00:18:57,840
जो कैश की लाइन होती है ना उसमें लग गया। और कैशियर

264
00:18:57,840 --> 00:19:02,000
ने कोई बात नहीं पूछी। कोई आपत्ति प्रकट नहीं की। और जो उसमें कैश पेमेंट करना

265
00:19:02,000 --> 00:19:06,080
था वो उसने मुझे कर दिया। फिर मैं ऐसे हिलाते हुए गया उस वो जो मेरे

266
00:19:06,080 --> 00:19:10,240
हाथ में रुपए आए थे ना वो ऐसे हिलाते हुए गया। मैंने

267
00:19:10,240 --> 00:19:14,320
सर ये तो दे दिया। आप झूठ बोल रहे थे। उसको

268
00:19:14,320 --> 00:19:18,480
मैंने बताया मैनेजर को। तो ये क्या है कि कई बार हम

269
00:19:18,480 --> 00:19:22,560
लोग टेबल के पीछे जाने का प्रयास नहीं करते हैं। बस इस ये

270
00:19:22,560 --> 00:19:26,640
टेबल आखिरी है हमारे लिए। हमने सोचा ही नहीं कि हमारे लिए टेबल आखरी

271
00:19:26,640 --> 00:19:30,720
है कि नहीं। उसने जो टेबल ने कह दिया वही हमारे लिए अंत है। उसके पीछे का

272
00:19:30,720 --> 00:19:35,120
हम सोचते ही नहीं है। तो बैंक में जाने के बाद अगर कोई वहां का सरकारी कर्मचारी

273
00:19:35,120 --> 00:19:39,120
हमको कोई झूठी बात भी बता देगा तो हम पूरी तरीके से उस पर निर्भर हो जाते हैं।

274
00:19:39,120 --> 00:19:43,280
हालांकि आजकल जागरूकता बढ़ गई है कि भाई इसने जो बोला है यही यहां का नियम

275
00:19:43,280 --> 00:19:48,000
है। उसने हमको भटकाया था और क्यों भटकाया था?

276
00:19:48,000 --> 00:19:52,880
उसके बैंक का काम कम हो जाए। एक चेक कम लगे उसके बैंक में। बस

277
00:19:52,880 --> 00:19:55,360
उसने भटका दिया। जबकि वो नियम

278
00:19:55,360 --> 00:19:59,520
नहीं था। तो अब मैंने यह कहानी आपको क्यों सुनाई? जैसे

279
00:19:59,520 --> 00:20:03,600
उसने यह कहा कि भाई मैं यह चाहता हूं कि वह उसकी निष्ठा अपने कर्तव्य से ना

280
00:20:03,600 --> 00:20:08,480
चूक जाए। किसका कर्तव्य क्या है? यह तय कौन कर रहा है?

281
00:20:08,480 --> 00:20:12,640
शास्त्र तो वहां शास्त्रों का अनुगमन है।

282
00:20:12,640 --> 00:20:16,960
नहीं नहीं है। नहीं हो गया निर्णय। जी गुरु जी और

283
00:20:16,960 --> 00:20:21,600
यानी कि यानी कि वहां होने वाली हिंसा धर्म नहीं थी।

284
00:20:21,600 --> 00:20:25,920
हम तो भैया धर्म तब है जब

285
00:20:25,920 --> 00:20:30,080
शास्त्र वचनों के आधार पर शास्त्र के वचनों की रक्षा के लिए

286
00:20:30,080 --> 00:20:34,320
शास्त्र के द्वारा प्रतिपाद्य धर्म सिद्धांतों की रक्षा

287
00:20:34,320 --> 00:20:38,480
के लिए हिंसा हो

288
00:20:38,480 --> 00:20:44,240
हिंसा है और उसमें फिर भगवत

289
00:20:44,240 --> 00:20:48,240
रामानुजाचार्य भगवान ने तर्क दिया कि

290
00:20:48,240 --> 00:20:52,480
एक डॉक्टर आपको एक आपको सुई भी चुबो

291
00:20:52,480 --> 00:20:57,120
दी जाए ना। एक डॉक्टर आपका मांस काट लेगा।

292
00:20:57,120 --> 00:21:01,360
मगर उसका क्योंकि उद्देश्य धर्म है।

293
00:21:01,360 --> 00:21:05,360
आपका मांस काट लेगा। आपके उसमें सुइयां घुसेड़ेगा

294
00:21:05,360 --> 00:21:09,440
बार-बार सिलने के लिए। मगर वो हिंसा भी हिंसा नहीं है। वो धर्म

295
00:21:09,440 --> 00:21:13,680
है। क्यों? क्योंकि वो आपके हित के लिए आपका उसका

296
00:21:13,680 --> 00:21:18,160
उद्देश्य वहां धर्म पूर्वक उद्देश्य है। तो वो भी

297
00:21:18,160 --> 00:21:22,880
अहिंसा कहलाएगी। हिंसा नहीं है। जी और

298
00:21:22,880 --> 00:21:26,880
वही पर दूसरा कोई व्यक्ति आपके जरा सा चुकोटी भी काट लेगा वो

299
00:21:26,880 --> 00:21:30,880
भी हिंसा कहलाएगी। ठीक है

300
00:21:30,880 --> 00:21:34,880
जी भैया जी अभी बस एक अंतिम प्रश्न और था जैसे कि

301
00:21:34,880 --> 00:21:39,120
मैंने शास्त्रों का थोड़ा अध्ययन किया तो वहां पर बताया गया कि एक पत्नी

302
00:21:39,120 --> 00:21:43,120
का मुख्य कर्तव्य होता है पतिव्रता होना। तो जैसे कि वहां पर

303
00:21:43,120 --> 00:21:47,360
एक कहा गया कि पत्नी को पति के सोने के बाद

304
00:21:47,360 --> 00:21:51,680
सोना चाहिए और उठने से पहले उठकर घर की क्रियाओं में संलग्न

305
00:21:51,680 --> 00:21:53,520
हो जाना चाहिए। तो यहां पर

306
00:21:53,520 --> 00:21:58,160
मेरा यह प्रश्न है जैसे कि मैं मम्मी को भी देखता हूं तो यहां पे पत्नी

307
00:21:58,160 --> 00:22:02,320
पत्नी को तो विश्राम करने का समय पति की तुलना में कम मिलेगा

308
00:22:02,320 --> 00:22:07,120
ना और ये नींद भी उनकी पूरी नहीं हो पाएगी इस दृष्टि से। क्यों?

309
00:22:07,120 --> 00:22:11,120
दिन में विश्राम करने का समय नहीं मिल जाएगा। जब

310
00:22:11,120 --> 00:22:15,280
पति बाहर आजीविकोपार्जन के लिए बाहर जाएगा पत्नी

311
00:22:15,280 --> 00:22:19,920
के जो नित्य कर्म होंगे घर के दफाई इत्यादि के

312
00:22:19,920 --> 00:22:24,160
लालन पालन पोषण के उसके बाद उसके पास काफी पर्याप्त समय

313
00:22:24,160 --> 00:22:28,160
उसको मिल सकता है यदि वो एक अच्छी गणी अनुशासित तो उसको बहुत

314
00:22:28,160 --> 00:22:33,200
समय मिल सकता है वो दिन में अपनी नींद की पूर्ति कर सकती है

315
00:22:33,200 --> 00:22:37,280
और और यह आवश्यक नहीं है कि यदि पति ज्यादा

316
00:22:37,280 --> 00:22:41,280
सो रहा है तो पत्नी के घंटे कम हो गए। मान लीजिए पति

317
00:22:41,280 --> 00:22:45,360
अगर आठ घंटे सो रहा है और उससे पहले जगने के कारण

318
00:22:45,360 --> 00:22:50,080
पत्नी को 7 घंटे की नींद मिल जा रही है तो वो भी पर्याप्त है।

319
00:22:50,080 --> 00:22:54,640
यदि पति छ घंटे सो रहा है और उससे पहले उससे

320
00:22:54,640 --> 00:22:58,880
उसके बाद सोने और उसके पहले जागने के कारण पत्नी को

321
00:22:58,880 --> 00:23:02,880
6:30 घंटे की या पति की अगर छ है तो उसको 5:30 घंटे की नींद

322
00:23:02,880 --> 00:23:06,960
मिल जा रही है। तो इससे कौन सी गाज गिर गई? हां समझ

323
00:23:06,960 --> 00:23:09,360
गया। केवल

324
00:23:09,360 --> 00:23:13,360
सामंजस्य बिाने का आपके पास

325
00:23:13,360 --> 00:23:16,080
वो होना चाहिए।

326
00:23:16,080 --> 00:23:20,080
नजरिया जी मतलब ये नेगिजिबल अमाउंट

327
00:23:20,080 --> 00:23:24,400
है बस उतना कुछ नहीं। हम ऐसा कुछ खास नहीं है। जी जी

328
00:23:24,400 --> 00:23:28,560
धन्यवाद भैया। और दूसरी बात यह है

329
00:23:28,560 --> 00:23:32,560
कि जैसे कि मेरे जैकेट का जो मैंने अभी

330
00:23:32,560 --> 00:23:36,880
पहन रखा है सर्दी का उपाय है ना इसका जो कलर

331
00:23:36,880 --> 00:23:41,280
है ना इसको पहचानने के लिए इसको पहचानने

332
00:23:41,280 --> 00:23:45,280
के विषय में आंख ही प्रमाण है। अगर मैं यह कहने लगूं

333
00:23:45,280 --> 00:23:49,280
कि नहीं मैं कान से पहचानूंगा इसका कलर तो गलत

334
00:23:49,280 --> 00:23:53,280
होगा। और अगर आप कुछ बोल रहे हैं उस विषय

335
00:23:53,280 --> 00:23:57,440
में मेरे कान ही प्रमाण है। अगर मैं कहने लगूं

336
00:23:57,440 --> 00:24:02,320
कि भाई मैं आंखों से प्रमाणित करूंगा कि आपने क्या कहा

337
00:24:02,320 --> 00:24:06,400
तो वो गलत होगा। इसी प्रकार से डस एंड

338
00:24:06,400 --> 00:24:10,400
डोंट्स में शास्त्र ही प्रमाण होते हैं। अती्द्रिय

339
00:24:10,400 --> 00:24:14,640
विषय जो भी लिखा गया है सोच समझ के ही लिखा गया है। कई

340
00:24:14,640 --> 00:24:18,720
चीजें हैं जो हमारी समझ में आ सकती हैं। है ना?

341
00:24:18,720 --> 00:24:22,720
हम लोग तर्क की पराकाष्ठा तक गए हैं सनातनी पर आप यह

342
00:24:22,720 --> 00:24:24,400
कहो कि नहीं यह

343
00:24:24,400 --> 00:24:28,400
भी समझाओ तो कई अती्द्रिय विषय भी है वो इंद्रियों के द्वारा समझने

344
00:24:28,400 --> 00:24:32,400
योग्य है ही नहीं वहां पर शास्त्र ही प्रमाण है गुरु जी तो उन्हें

345
00:24:32,400 --> 00:24:36,560
सॉरी भैया जी तो उन्हें समझने के लिए प्रज्ञा शक्ति की वृद्धि करनी पड़ेगी ना

346
00:24:36,560 --> 00:24:40,640
हमें मतलब एक व्यक्ति को प्रज्ञा शक्ति की वृद्धि

347
00:24:40,640 --> 00:24:45,200
तो मुक्ति का हेतु है ना अच्छा हां जी सब

348
00:24:45,200 --> 00:24:49,440
हां जो शास्त्र आज समझ में नहीं आ रहे हैं वो जो जो आ सकते हैं भविष्य

349
00:24:49,440 --> 00:24:53,440
में आने लगेंगे ये है मगर ऐसा नहीं है कई विषय ऐसे हैं जो

350
00:24:53,440 --> 00:24:57,600
अती्द्रिय है वो आपको इंद्रियों के द्वारा

351
00:24:57,600 --> 00:25:03,600
उनका भान नहीं हो सकता

352
00:25:05,520 --> 00:25:09,840
ठीक है विनीत सोनी जी आप पूछे प्रश्न अपना जय श्री राम

353
00:25:09,840 --> 00:25:14,080
भाई जय श्री राम जो इंसान

354
00:25:14,080 --> 00:25:18,160
को दुख मिलता है या फिर उसको किसी भी तरह का दुख मिल रहा है तो क्या

355
00:25:18,160 --> 00:25:22,400
उसके वह उसकी कर्म की ही सजा है या फिर अगर दुख मिल रहा है तो कोई

356
00:25:22,400 --> 00:25:27,120
कर्म कट रहा है जो पहले कभी गलत किया हो हम

357
00:25:27,120 --> 00:25:31,360
दुख का मतलब है आपने कोई गलती की है तो बिना गलती

358
00:25:31,360 --> 00:25:35,440
के दुख नहीं मिलेगा ऐसा नहीं है

359
00:25:35,440 --> 00:25:40,160
कुछ परमानेंट दुख है ही है जैसे मृत्यु आनी ही है

360
00:25:40,160 --> 00:25:44,320
और अगर मूल में जाएंगे तो मृत्यु वाला जीवन भी आपको आपके

361
00:25:44,320 --> 00:25:48,400
कर्मों का फल ही तो है जो फसे हो जो मृत्यु वाला

362
00:25:48,400 --> 00:25:52,800
जीवन प्राप्त है या फिर प्रकृति के बोझ में आप हो, प्रकृति

363
00:25:52,800 --> 00:25:56,800
के दायरे में आप हो तो यह जीवन भी आपको कर्मों के फल के अनुसार ही

364
00:25:56,800 --> 00:26:00,800
मिला है ना। नहीं तो मोक्ष ना मिल जाता। तो यही कहना ही होगा कि कर्मों

365
00:26:00,800 --> 00:26:04,800
के ही कारण है। प्रारब्ध है। ये जो सभी दुख

366
00:26:04,800 --> 00:26:09,440
है वो कर्मों का ही फल है। हां।

367
00:26:09,440 --> 00:26:13,680
अब इसमें यह अती्द्रिय विषय है कि पूर्व जन्म के कर्म

368
00:26:13,680 --> 00:26:17,840
कर्मों का फल कौन सा वाला है? इसी जन्म के कर्मों का फल कौन सा वाला

369
00:26:17,840 --> 00:26:20,000
है?

370
00:26:20,000 --> 00:26:24,080
यह अती्द्रिय विषय इसलिए अपने कर्मों को सुधारने पर

371
00:26:24,080 --> 00:26:28,080
ध्यान दें और प्रारब्ध की जानकारी इसलिए नहीं दी

372
00:26:28,080 --> 00:26:32,240
जाती कि उनके अनुसार आप जो है अपने वर्तमान

373
00:26:32,240 --> 00:26:36,240
को प्रभावित कर उस तरह से कार्य करें। प्रारब्ध की

374
00:26:36,240 --> 00:26:38,720
जानकारी

375
00:26:38,720 --> 00:26:42,720
क्या कहते हैं? ईश्वर इत्यादि जो जटिल विषय हैं उनको समझने के

376
00:26:42,720 --> 00:26:47,760
लिए होती है मात्र जिससे कि हम मोक्ष की कामना कर पाए।

377
00:26:47,760 --> 00:26:52,000
उनको लागू करने के लिए नहीं होता है कि इसी जन्म में लागू कर लो।

378
00:26:52,000 --> 00:26:56,320
जैसे कि मान लो कहा गया कि आपको तो आपके कर्मों का फल मिलना ही है

379
00:26:56,320 --> 00:27:00,880
तो फिर कोई भी कर्म करने की आवश्यकता क्या है? हम

380
00:27:00,880 --> 00:27:05,040
तो आपने लागू कर लिया प्रारब्ध को यहीं पे। आवश्यकता

381
00:27:05,040 --> 00:27:09,440
क्या है? आवश्यकता वो है जो व्यवहार है। इंद्रियों

382
00:27:09,440 --> 00:27:13,600
से प्राप्त होने वाली जानकारी क्या है कि आजीव को पार्जन करना

383
00:27:13,600 --> 00:27:18,000
है तो हमें भोजन मिलेगा। यह इंद्रियों से प्राप्त होने वाली जानकारी

384
00:27:18,000 --> 00:27:22,160
है। इसके अनुसार आपको कर्म करना है। प्रारब्ध के अनुसार नहीं। प्रारब्ध

385
00:27:22,160 --> 00:27:24,720
के अनुसार जो मिल रहा होगा मिलता रहेगा वो

386
00:27:24,720 --> 00:27:28,960
तात्विक चीजें हैं। वो इसलिए बताई जाती है जिससे कि आपका आपकी

387
00:27:28,960 --> 00:27:33,040
धर्म और ईश्वर में निष्ठा हो सके। इसलिए वो सच्चाइयां आपको बताई

388
00:27:33,040 --> 00:27:37,040
जाती हैं। है ना? उनके अनुसार व्यवहार में नहीं

389
00:27:37,040 --> 00:27:41,600
लाना होता है। जी तो क्या यह बोलना सही रहेगा कि

390
00:27:41,600 --> 00:27:45,840
मतलब दुख मिलेगा ही नहीं क्योंकि आपको दुख मिल रहा है तो आपको आपने कुछ ना कुछ बुरा कर्म

391
00:27:45,840 --> 00:27:50,000
किया ही है इसलिए आपको दुख मिल रहा है। वरना आपको दुख मिलता ही नहीं। बिल्कुल

392
00:27:50,000 --> 00:27:54,000
बिल्कुल मगर आप मगर आप नकारात्मकता से भी बचे ना जिस चीज का

393
00:27:54,000 --> 00:27:58,000
चिंतन करेंगे उसी चिंतन के कारण

394
00:27:58,000 --> 00:28:02,000
उसी प्रकार का व्यक्तित्व का निर्माण भी हो जाएगा। इसलिए

395
00:28:02,000 --> 00:28:06,000
यह कहना प्रारंभ करिए कि भाई यह तो कष्ट कम

396
00:28:06,000 --> 00:28:10,080
है। भगवान ने हमें बहुत सुख दे रखा है। जो इतने आसानी

397
00:28:10,080 --> 00:28:14,160
से जीवन निकल रहा है। भगवान की कृपा है। जो इतने कम

398
00:28:14,160 --> 00:28:18,320
कष्ट मिल रहे हैं। इस प्रकार का चिंतन करेंगे जब तो

399
00:28:18,320 --> 00:28:22,480
इस प्रकार के चिंतन से सात्विक आसक्ति होगी। सतोगुणी

400
00:28:22,480 --> 00:28:26,560
आसक्ति होगी। ईश्वर इत्यादि विषयों में ज्यादा चिंतन

401
00:28:26,560 --> 00:28:30,880
रहेगा। ज्यादा गति रहेगी। उसके कारण धीरे धीरे धीरे धीरे प्रज्ञा

402
00:28:30,880 --> 00:28:34,960
शक्ति मजबूत होती चली जाएगी। प्रारब्ध अथवा इस जन्म के जो कर्म

403
00:28:34,960 --> 00:28:38,960
होंगे उनके फल भी यदि मिल रहे होंगे तो आपको कब आए और कब

404
00:28:38,960 --> 00:28:39,760
गए पता ही नहीं

405
00:28:39,760 --> 00:28:45,360
चलेगा। हम है कि नहीं? जगदंबा

406
00:28:45,360 --> 00:28:50,160
आंख निकाल रहे हैं संभाजी की। संभाजी क्या कह रहे हैं?

407
00:28:50,160 --> 00:28:52,320
जगदंबा

408
00:28:52,320 --> 00:28:54,880
कैसे

409
00:28:54,880 --> 00:28:59,040
प्रज्ञा शक्ति मजबूत है ना आंख

410
00:28:59,040 --> 00:29:03,040
निकाल रहे हैं मगर वो जगदंबा कह रहे हैं ठीक है तो ऐसा नहीं है

411
00:29:03,040 --> 00:29:07,040
रियल में होता है ना ऐसा तो ये विल पावर कहां से आती है

412
00:29:07,040 --> 00:29:11,920
चिंतन से अच्छा चिंतन करेंगे तो अच्छी विल पावर होगी

413
00:29:11,920 --> 00:29:15,920
और नकारात्मक चिंतन करेंगे तो नकार घटेगी

414
00:29:15,920 --> 00:29:20,160
विल पावर आपकी और इसी का खेल है विल पावर या प्रज्ञा शक्ति

415
00:29:20,160 --> 00:29:24,240
या इसी का पूरा खेल कॉन्शियसनेस ये पूरा

416
00:29:24,240 --> 00:29:28,240
जो साम्राज्य है सब कुछ कॉन्शियसनेस के इधर-उधर

417
00:29:28,240 --> 00:29:34,240
घिरा हुआ है। ठीक है चलिए जी

418
00:29:34,800 --> 00:29:38,800
वैभव और राज जी का और ले लेते हैं। अभी बस जितने लोगों

419
00:29:38,800 --> 00:29:42,880
का है ना हैंड रेज उतने लोगों का ले लेते हैं। उसके बाद जो है फिर अब नेक्स्ट

420
00:29:42,880 --> 00:29:46,880
वीक मिलेंगे। ठीक है। वैभव और राज जी आपका ले लेते हैं।

421
00:29:46,880 --> 00:29:52,000
वैभव जी आप बोले।

422
00:29:52,000 --> 00:29:56,160
आज बी वाले बहुत लोग आए हैं। वैभव, विनीत,

423
00:29:56,160 --> 00:30:02,160
विशाल और और भी हैं।

424
00:30:05,040 --> 00:30:09,120
कौन? और नहीं है। अच्छा वो एक

425
00:30:09,120 --> 00:30:15,120
साथ दिख रहे हैं। वैभव, विनीत, विशाल। वैभव जी बोले

426
00:30:17,600 --> 00:30:22,160
राज जी आप बोलिए राज कमल जी आप बोलिए

427
00:30:22,160 --> 00:30:26,160
शिवश जी जय श्री राम जय श्री राम शिवश

428
00:30:26,160 --> 00:30:30,160
जी मेरे दो सवाल है दो प्रश्न है आपसे सवाल तो

429
00:30:30,160 --> 00:30:34,320
उर्दू का वर्ड है तो मैं उसे आई एम सॉरी टू यूज़ दैट वर्ड कोई

430
00:30:34,320 --> 00:30:38,800
बात नहीं आ जाते हैं उर्दू के वर्ड जी जी जी

431
00:30:38,800 --> 00:30:43,440
एक तो मैं आपसे ये जानना चाह रहा था किसी को गुरु गुरु बनाने का प्राथमिकताएं

432
00:30:43,440 --> 00:30:47,520
क्या होनी चाहिए? कैसे आप आइडेंटिफाई करेंगे कि कोई सही गुरु है या

433
00:30:47,520 --> 00:30:51,920
नहीं है? ये तो मेरा प्रश्न नंबर एक है।

434
00:30:51,920 --> 00:30:56,080
दूसरा मेरा यह है कि नित्य दिन प्रतिदिन

435
00:30:56,080 --> 00:31:00,160
के कार्यों से समय निकालकर प्रतिदिन

436
00:31:00,160 --> 00:31:04,160
भक्ति के मार्ग पर क्या-क्या नित कर्म करने चाहिए जो कि महत्वपूर्ण

437
00:31:04,160 --> 00:31:08,480
है करना और जिससे कि हम अपने मन को भी शांत और प्रसन्न

438
00:31:08,480 --> 00:31:11,680
रख सके।

439
00:31:11,680 --> 00:31:17,680
गुरु बनाने के लिए प्राथमिकताएं सुन लीजिए।

440
00:31:18,320 --> 00:31:22,400
लक्षण संपन्न सन्यासी होना चाहिए आपका जो गुरु विरक्त

441
00:31:22,400 --> 00:31:26,560
होना चाहिए। यदि विरक्त नहीं है गृहस्थ है कोई व्यक्ति

442
00:31:26,560 --> 00:31:31,280
और यदि वह किसी विरक्त के सीमा में रहकर

443
00:31:31,280 --> 00:31:35,840
आपको शिक्षा दीक्षा दे रहा है तो वह भी आपका गुरु बनने के योग्य है

444
00:31:35,840 --> 00:31:40,320
परंतु अंतिम निर्णायक आपके धर्म का वो एक सन्यासी

445
00:31:40,320 --> 00:31:46,320
या विरक्त होना चाहिए विरक्त ठीक है सन्यासी विरक्त

446
00:31:46,800 --> 00:31:50,800
होता है अर्थ क्या होता है विरक्त सन्यासी जिसका जिसने

447
00:31:50,800 --> 00:31:55,120
घर बार को त्याग दिया हो जी जी और

448
00:31:55,120 --> 00:31:59,440
कहना चाहिए कि अगर शास्त्र सम्मत्ता से चले तो जिसने

449
00:31:59,440 --> 00:32:01,920
ऑफिशियली

450
00:32:01,920 --> 00:32:06,000
जो है सन्यास ग्रहण किया हो किसी गुरु से ऐसे अपने

451
00:32:06,000 --> 00:32:10,240
मन से वाले वालों से भी बचे यद्यपि वो भी है

452
00:32:10,240 --> 00:32:14,640
परंतु सबसे ज्यादा जो उनमें भी सन्यासियों में जो प्योर है

453
00:32:14,640 --> 00:32:19,040
वो वो सन्यासी है जो ऑफिशियली सन्यासी अब

454
00:32:19,040 --> 00:32:23,280
ये जो सन्यासी हैं इनकी सीमा में यदि कोई और व्यक्ति आपको ज्ञान

455
00:32:23,280 --> 00:32:27,040
विज्ञान दे रहा है वो भी आपका गुरु बन सकता है।

456
00:32:27,040 --> 00:32:31,120
इनकी सीमा में यदि कोई और विरक्त है जो आपको ज्ञान विज्ञान दे रहा है

457
00:32:31,120 --> 00:32:35,520
वो भी आपका गुरु बन सकता है। मगर वो किसी ना किसी ऐसे प्रामाणिक सन्यासी

458
00:32:35,520 --> 00:32:40,400
की सीमा में वो ये सब सन्यासी हैं। शंकराचार्य

459
00:32:40,400 --> 00:32:45,760
रामानुजाचार्य मधवाचार्य नारकाचार्य ये सब सन्यासी हैं।

460
00:32:45,760 --> 00:32:49,920
ठीक है? इसमें गडिया गिया

461
00:32:49,920 --> 00:32:53,920
वैष्णव में या राधा वल्लभ ये वल्लभ संप्रदाय है

462
00:32:53,920 --> 00:32:58,080
संभता उसमें शायद सन्यास को जो है कट किया गया है। परंतु अगर

463
00:32:58,080 --> 00:33:02,160
शास्त्र को देखेंगे शास्त्रों की अंतिम बात जो है वो सन्यास पर

464
00:33:02,160 --> 00:33:06,240
जाके ही रुकती है। वहां पर भी जहां पर गृहस्थ है वहां पर भी

465
00:33:06,240 --> 00:33:10,400
विरक्तता ही है। भगवत गीता में विरक्तता ही कही गई है वो हथियार

466
00:33:10,400 --> 00:33:14,720
जिससे कि प्रकृति का जो पेड़ है उसकी शाखाएं उसको काटा

467
00:33:14,720 --> 00:33:18,880
जाता है। विरक्तता ठीक है जी तो

468
00:33:18,880 --> 00:33:22,880
पहला लक्षण है सन्यासी दूसरा लक्षण है परंपरा

469
00:33:22,880 --> 00:33:27,120
से हो परंपरा आप समझ ही गए होंगे अगर आप हमारा चैनल

470
00:33:27,120 --> 00:33:32,400
देख के पहुंचे यहां तक जी जी समझ गया तीसरा लक्षण है

471
00:33:32,400 --> 00:33:36,400
श्रुति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा दें। जैसे अभी कुछ दिन

472
00:33:36,400 --> 00:33:40,560
पहले एक विवाद हुआ कि अवतार होगा तो उसको पहचाना कैसे

473
00:33:40,560 --> 00:33:42,240
जाएगा कि शास्त्र

474
00:33:42,240 --> 00:33:46,400
में यदि उनका अवतार होना लिखा है तो यह भी लिखा है कि वो जो है भूल

475
00:33:46,400 --> 00:33:50,640
गए थे तो कैसे यदि भूल गए मान रहे हो तो फिर अवतार

476
00:33:50,640 --> 00:33:55,440
भी मानना पड़ेगा यदि अवतार पर विश्वास नहीं तो भूल भूल गए पर विश्वास कैसे

477
00:33:55,440 --> 00:33:59,520
यहां तक कि राम पर विश्वास कैसे तो अर्ध कुकुट न्याय नहीं

478
00:33:59,520 --> 00:34:03,760
कर सकते ऐसी बात निकालनी पड़ेगी जिसमें दोनों बातें रह जाए

479
00:34:03,760 --> 00:34:07,840
भूलना भी आ जाए और अवतार होना भी आ

480
00:34:07,840 --> 00:34:12,080
जाए। तो दोनों बातें क्या है कि भगवान जो परम तत्व

481
00:34:12,080 --> 00:34:16,080
है मनुष्यों के बीच में उत्पन्न होकर लीला जब करता

482
00:34:16,080 --> 00:34:20,240
है तो वो इस तरह का अभिनय अगर परमार्थ की ब्रह्म की दृष्टि दिव्य दृष्टि

483
00:34:20,240 --> 00:34:24,320
से देखें तो वो अभिनय करता है और मनुष्यों के बीच में मनुष्य

484
00:34:24,320 --> 00:34:29,040
दृष्टि से वो एक मनुष्य ही होता है। ठीक है?

485
00:34:29,040 --> 00:34:33,200
जी। अब जितने लोगों को वो दिव्य दृष्टि मिलती जाएगी उनके लिए वो अवतार

486
00:34:33,200 --> 00:34:37,200
होते चले जाएंगे। जिनके जितने लोगों को दिव्य दृष्टि नहीं मिलेगी उनके

487
00:34:37,200 --> 00:34:41,680
लिए वो क्या रह जाएंगे सामान्य मानव मनुष्य

488
00:34:41,680 --> 00:34:45,680
जिसके बारे में भगवान ने कहा कि मेरे ब्रह्म भाव

489
00:34:45,680 --> 00:34:49,680
को भूल जाते हैं उन्हें मानव देह में देखकर वो मूर्ख

490
00:34:49,680 --> 00:34:54,720
है मूर्ख होते हैं दिव्य दृष्टि नहीं होती उनके पास तो

491
00:34:54,720 --> 00:34:57,280
सामंजस्य की शिक्षा साधु सम्मत

492
00:34:57,280 --> 00:35:01,600
धर्म धर्म और लास्ट जो पॉइंट

493
00:35:01,600 --> 00:35:05,680
है वो क्या है कि गुरु वही जो

494
00:35:05,680 --> 00:35:10,000
अपने शिष्य का संशय रूपी अंधकार दूर कर दे। गुरु

495
00:35:10,000 --> 00:35:14,480
का मतलब अंधकार रू का मतलब निकालने वाला। अज्ञानता

496
00:35:14,480 --> 00:35:18,480
रूपी अंधकार से निकालने वाला ही आपका गुरु होगा। ठीक

497
00:35:18,480 --> 00:35:20,720
है।

498
00:35:20,720 --> 00:35:24,960
चलिए हां जी। नाथ संप्रदाय भी प्रमाणिक। आपने दूसरे

499
00:35:24,960 --> 00:35:29,440
प्रश्न का मुझे नहीं बताया। मैंने आपसे पूछा था कि नित

500
00:35:29,440 --> 00:35:33,520
जो प्रश्न का उत्तर वैसे यह क्लास का विषय नहीं है मगर

501
00:35:33,520 --> 00:35:37,840
मैं बता देता हूं सवा घंटे की भक्ति नाम जप इत्यादि

502
00:35:37,840 --> 00:35:41,920
के रूप में आप प्रतिदिन चालू कर दीजिए और मैं ये सभी भाइयों से

503
00:35:41,920 --> 00:35:45,920
दोबारा विनती कर रहा हूं आपके जीवन के जितने भी रोग

504
00:35:45,920 --> 00:35:49,920
दोष क्लेश हैं सब कुछ शांत हो सकते हैं भगवान

505
00:35:49,920 --> 00:35:54,960
का पैर पकड़ लो आज से अभी से ठान लो

506
00:35:54,960 --> 00:35:59,280
भगवान के पीछे पड़ जाओ नहीं छोड़ेंगे पैर तुम्हारा जय भद्रकाली

507
00:35:59,280 --> 00:36:03,520
वाले बन जाओ पकड़ लो उनका पैर भगवान मजबूर

508
00:36:03,520 --> 00:36:07,600
हो जाएंगे विवश हो जाएंगे आपके सारे रोग दोष क्लेश को शांत कर

509
00:36:07,600 --> 00:36:12,000
सकने की क्षमता रखते हैं सम अनंत सामर्थ्यवान

510
00:36:12,000 --> 00:36:12,560
है

511
00:36:12,560 --> 00:36:17,200
सवा घंटे की भक्ति करने लग जाओ मित्रों बंधुओं

512
00:36:17,200 --> 00:36:22,560
आप देखो आपके जीवन में चमत्कारिक परिवर्तन

513
00:36:22,560 --> 00:36:26,640
मुझे ऐसा लगता है कि शायद आप लोग मुझसे कुछ प्रेरणा लेते होंगे मैं

514
00:36:26,640 --> 00:36:31,360
कुछ भी नहीं हूं। मैं जानता हूं ना मैं कितना बड़ा पापी हूं।

515
00:36:31,360 --> 00:36:35,440
मेरे से ज्यादा आप लोग मुझे नहीं जानते हैं। मैं कितना बड़ा निकृष्ट व्यक्ति

516
00:36:35,440 --> 00:36:39,680
हूं। ये मैं जानता हूं ना। मैं बता रहा हूं मेरे जीवन को उन्होंने

517
00:36:39,680 --> 00:36:43,760
ही बदला है। मेरे जीवन को राम ने ही बदला है।

518
00:36:43,760 --> 00:36:48,480
आप लोग राम के पीछे पड़ जाओ। भगवान के नाम के पीछे पड़ जाओ।

519
00:36:48,480 --> 00:36:54,480
यहीं से शुरुआत करो। ठीक है

520
00:36:55,200 --> 00:36:59,280
जी शिव जी बहुत-बहुत धन्यवाद जी और

521
00:36:59,280 --> 00:37:04,080
ये जो जानकारी आपने मुझे उपलब्ध कराई है इस पर मैं जरूर अपना

522
00:37:04,080 --> 00:37:08,080
आने वाले जीवन का यू नो कुछ अपना समय व्यतीत

523
00:37:08,080 --> 00:37:12,480
कर बिल्कुल और किसी प्रकार का यदि

524
00:37:12,480 --> 00:37:16,720
वो उसको क्या कहते हैं कंपनी सत्संग अगर

525
00:37:16,720 --> 00:37:21,040
आपको प्राप्त करने की इच्छा है तो आहान द्वारा नामास्त के सेशन

526
00:37:21,040 --> 00:37:25,040
आयोजित करवाए जा रहे हैं। वो इसीलिए कि आप अपने जीवन का पहला

527
00:37:25,040 --> 00:37:29,120
कदम बढ़ा सके। यह जो संसार है ना वह आपको हर

528
00:37:29,120 --> 00:37:33,200
क्षण खींचने में लगा हुआ है और पता है संसार की

529
00:37:33,200 --> 00:37:37,200
समस्त जानकारियां जो आपके पास आ रही है इंफॉर्मेशन वो

530
00:37:37,200 --> 00:37:41,200
सारी जानकारियां इन केन प्रकारन प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप

531
00:37:41,200 --> 00:37:45,360
से आपको ये बताने में लगी हुई है ईश्वर नहीं है ईश्वर नहीं

532
00:37:45,360 --> 00:37:49,520
है ईश्वर नहीं है और इस इन जानकारियों से

533
00:37:49,520 --> 00:37:53,760
ही हमारी प्रज्ञा शक्ति घटती है अब ऐसे

534
00:37:53,760 --> 00:37:57,920
में यदि हम ईश्वर का चिंतन नहीं करेंगे तो प्रज्ञा शक्ति घटते घटते

535
00:37:57,920 --> 00:38:01,920
घटते घटते खत्म हो जाएगी। ये मैं तात्विक विवेचना बता रहा हूं। भक्ति

536
00:38:01,920 --> 00:38:05,920
से क्या प्राप्त होता है? तो जब हम सत्य का चिंतन करते हैं, सत्य

537
00:38:05,920 --> 00:38:09,920
का चिंतन करते हैं, माया रूपी झूठ का चिंतन छोड़ते हैं। कुछ

538
00:38:09,920 --> 00:38:10,420
समय

539
00:38:10,240 --> 00:38:14,560
के लिए तो प्रज्ञा शक्ति पीक पे जाती है। फिर क्या होता है? छोटी

540
00:38:14,560 --> 00:38:18,560
छोटी बातों में हमारी बुद्धि इतनी शार्प होती चली जाती है। हमारी

541
00:38:18,560 --> 00:38:22,880
निर्णायक क्षमता इतनी बढ़ जाती है कि कहना

542
00:38:22,880 --> 00:38:26,880
ही क्या है? आपका जो नुकसान हो सकता होगा, आप

543
00:38:26,880 --> 00:38:31,360
जो बीमार पड़ सकते होगे, आप जो अस्वस्थ हो सकते होगे, आपके गलत निर्णय

544
00:38:31,360 --> 00:38:35,360
कम हो सकते होंगे। जिसके कारण आपके जीवन में

545
00:38:35,360 --> 00:38:39,440
विप्लव आ सकता होगा, उन सब से आप बचते निकल जाओगे। क्यों? क्योंकि

546
00:38:39,440 --> 00:38:43,840
राम का नाम जप रहे हो। तो सत्य के पीछे पड़ जाओ। असत

547
00:38:43,840 --> 00:38:47,840
आपसे वैसे ही भागने लगे बुलंदशहर में या

548
00:38:47,840 --> 00:38:53,360
नोएडा में आपका कोई रिप्रेजेंटेटिव है आहान संस्था के

549
00:38:53,360 --> 00:38:58,000
नोएडा में हमारे पंडित जी रहते हैं श्वेतांग जी

550
00:38:58,000 --> 00:39:02,320
और बुलंदशहर में बुलंदशहर के आसपास

551
00:39:02,320 --> 00:39:06,400
तो है हाथरस में है बुलंदशहर में इनको पता होगा प्रथम जी

552
00:39:06,400 --> 00:39:10,640
आपको ज्ञात है बुलंदशहर में हूं ठीक है तो आप इनसे संपर्क करिएगा

553
00:39:10,640 --> 00:39:14,720
ये आपको बताएंगे जो भी जी जी जी बहुत-बहुत धन्यवाद। जय श्री मैडम

554
00:39:14,720 --> 00:39:17,760
कौन सेक्टर?

555
00:39:17,760 --> 00:39:22,160
हां अभी अभी क्लास की बातें कर ली जाए। बाकी आप एडमिन से बात करिएगा।

556
00:39:22,160 --> 00:39:26,160
है ना? ठीक है। जी भैया हम देख लेंगे जो भी बात होगी। वो

557
00:39:26,160 --> 00:39:30,320
भैया फोन आ रहा है। आप देख लीजिए यहां पे। ठीक है। एक प्रश्न और ले लें।

558
00:39:30,320 --> 00:39:34,640
इनका वैभव जी तो बोले नहीं। विशाल जी का ले लेते हैं। पंकज जी आप क्षमा करें।

559
00:39:34,640 --> 00:39:38,720
अगली बार आपका प्रश्न हम लेंगे। हां। जी भैया कोई। विशाल जी

560
00:39:38,720 --> 00:39:42,800
का हाथ हैंड रेज था। विशाल जी बोले। जी भैया जय श्री राम

561
00:39:42,800 --> 00:39:46,880
जय श्री राम जी भैया प्रश्न यह था मेरा कि जैसा कि

562
00:39:46,880 --> 00:39:51,040
अभी कर्म कर्मों के फलों पर चर्चा हो रही थी तो मेरा इसमें

563
00:39:51,040 --> 00:39:55,120
यह प्रश्न था कि जैसे कि अगर हमारे बुरे

564
00:39:55,120 --> 00:39:59,120
कर्म का फल हमें मिल रहा है अच्छा या बुरा तो ये

565
00:39:59,120 --> 00:40:03,360
एक मतलब ये एक बात हो गई और दूसरी तरफ अगर हम यह कहते हैं कि ईश्वर

566
00:40:03,360 --> 00:40:07,440
सर्वशक्तिमान है ऑल नोइंग है ऑल कंट्रोलेबल है तो उस हिसाब

567
00:40:07,440 --> 00:40:11,440
से देखा जाए तो वो भी तो ईश्वर की इच्छा से ही हो रहा है जैसा कि हम बुरा कर्म

568
00:40:11,440 --> 00:40:16,640
कर रहे हैं तो इसमें ईश्वर का हस्तक्षेप होगा तभी तो हमेशा कर रहे होंगे।

569
00:40:16,640 --> 00:40:20,720
इसका उत्तर दिया हमने क्या इसका

570
00:40:20,720 --> 00:40:25,200
उत्तर तो हमने दे दिया ना पारमार्थिक सच्चाइयों

571
00:40:25,200 --> 00:40:29,760
के आधार पर अपने व्यवहार को मत बिगाड़ो। पारमार्थिक सच्चाइयां

572
00:40:29,760 --> 00:40:33,520
पारमार्थिक विषय बताने का उद्देश्य भगवान

573
00:40:33,520 --> 00:40:38,080
धर्म और ब्रह्म में निष्ठा जागृत करना है। परमार्थिक

574
00:40:38,080 --> 00:40:42,400
वास्तविकता बताना बताने का उद्देश्य आपके व्यवहार

575
00:40:42,400 --> 00:40:47,040
को प्रभावित करना नहीं है। जैसे कि

576
00:40:47,040 --> 00:40:51,120
पृथ्वी गोल है। इसका क्या आप व्यवहार

577
00:40:51,120 --> 00:40:55,120
में लेते हो अपने इस जानकारी का? समय आने पर क्वेश्चन

578
00:40:55,120 --> 00:40:59,280
का आंसर दे देते हो। जनरल साइंस का पेपर होगा तो पृथ्वी गोल

579
00:40:59,280 --> 00:41:03,280
है कि नहीं हां बोल दोगे मगर जब मोटरसाइकिल चलाओगे किसी

580
00:41:03,280 --> 00:41:07,280
को रास्ता बताओगे तो कैसे बताओगे गोल के रूप में बताओगे कि

581
00:41:07,280 --> 00:41:10,480
चपटे के रूप में बताओगे

582
00:41:10,480 --> 00:41:14,560
चपटे के रूप में हां तो वो जो दूसरा पर्सपेक्टिव है वह

583
00:41:14,560 --> 00:41:18,800
तात्विक विवेचना दूसरे विषयों में गति प्राप्त करने हेतु

584
00:41:18,800 --> 00:41:22,880
है और जो आपका पर्सपेक्टिव है वह आपके

585
00:41:22,880 --> 00:41:27,280
व्यवहार के व्यवहार का हेतु उसके अनुसार व्यवहार

586
00:41:27,280 --> 00:41:31,360
करिए। तो भगवान करा रहे हैं। भगवान सब जानते हैं। सब तात्विक

587
00:41:31,360 --> 00:41:36,240
चीजें हैं। यह आप जानिए। क्यों? इसलिए जिससे कि भगवान की सर्वशक्तिमत्ता

588
00:41:36,240 --> 00:41:40,320
का भान हो पाए। जिससे कि भगवान में निष्ठा हो पाए। भगवान

589
00:41:40,320 --> 00:41:44,560
का जो जो आतुल्य है बल है

590
00:41:44,560 --> 00:41:48,560
उसको आप पहचान पाए। उनसे प्रेम हो पाए। इसलिए बताया जा रहा

591
00:41:48,560 --> 00:41:52,560
है। मगर उसके आधार पे अरे मुझे अब क्या करना? भगवान ही तो करा रहे। मेरा

592
00:41:52,560 --> 00:41:56,560
क्या दोष? नहीं। दोष यह है कि यह जो आपको जानकारी प्राप्त हो रही

593
00:41:56,560 --> 00:42:00,640
है ना भगवान वाली वह इंद्रियों से प्राप्त नहीं हो रही है।

594
00:42:00,640 --> 00:42:05,040
वह जानकारी आपको या तो शब्द प्रमाण से प्राप्त हो रही है या अनुमान

595
00:42:05,040 --> 00:42:09,040
प्रमाण से प्राप्त हो रही है। वो आप फील नहीं कर रहे हो। फील आपको क्या हो रहा

596
00:42:09,040 --> 00:42:13,040
है? अहंकार मैं ही कर रहा हूं। गलत मैं ही कर रहा हूं। तो

597
00:42:13,040 --> 00:42:17,200
आपको फल किस हिसाब से मिलेगा? मैं ही कर रहा हूं के हिसाब से।

598
00:42:17,200 --> 00:42:21,280
ठीक है? इंद्रियों से प्राप्त होने वाली जानकारी क्या है?

599
00:42:21,280 --> 00:42:25,600
कि पैसे कमाऊंगा। आजीव कोपार्जन करूंगा तो भोजन

600
00:42:25,600 --> 00:42:29,760
प्राप्त होगा। यह है इंद्रियों से प्राप्त होने वाली जानकारी

601
00:42:29,760 --> 00:42:33,840
और शब्द प्रमाण के अनुसार अनुमान प्रमाण के अनुसार

602
00:42:33,840 --> 00:42:38,000
अनुमान प्रमाण क्या कोई तो सत्ता है जो सब सर्वज्ञ है। तो

603
00:42:38,000 --> 00:42:42,000
भैया जब सर्वज्ञ है तो उसकी जब वो सत्ता है तो उसकी ही सीमा में सब

604
00:42:42,000 --> 00:42:46,240
कुछ हो रहा है। ये अनुमान हो गया। और शब्द क्या हो गया? शास्त्रों ने कह दिया, गुरुजनों

605
00:42:46,240 --> 00:42:50,480
ने कह दिया ईश्वर सर्वशक्तिमान है। वह सर्वज्ञ है और उसकी सीमा

606
00:42:50,480 --> 00:42:54,480
के बाहर कुछ नहीं है। यह शास्त्र के वचन मगर इनका इनका पर्यावसान किस में

607
00:42:54,480 --> 00:42:58,480
है? इनका पर्यावसान है भगवान की भक्ति। भगवान के प्रति

608
00:42:58,480 --> 00:43:02,560
निष्ठा धर्म के प्रति निष्ठा जागृत करने के लिए। इसलिए नहीं

609
00:43:02,560 --> 00:43:03,600
कि शत्रु आपके

610
00:43:03,600 --> 00:43:07,680
घर की स्त्री पर आक्रमण कर रहा हो। आप खड़े हो। यह भी भगवान की मर्जी से हो

611
00:43:07,680 --> 00:43:12,000
रहा है। इसमें इसका नहीं है। इसका भी खंडन कर दिया। रामायण

612
00:43:12,000 --> 00:43:16,000
में देखिए वाल्मीकि रामायण में वचन है जो लोग भाग्य के भरोसे रहते हैं वो लोग

613
00:43:16,000 --> 00:43:20,480
नपुंसक होते हैं। ठीक है? जी

614
00:43:20,480 --> 00:43:24,560
ये वैसा ही हो गया जैसे कि वो ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या में

615
00:43:24,560 --> 00:43:28,720
जैसे बोला गया है कि परमार्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो सब ये मिथ्या ही है एक

616
00:43:28,720 --> 00:43:32,720
तरह से लेकिन हम हम अभी रहते हैं व्यवहारिक संसार में तो हमें

617
00:43:32,720 --> 00:43:36,800
व्यवहारिक संसार के अनुसार ही करना आप क्योंकि ब्रह्म नहीं हो ना। ब्रह्म दृष्टि से

618
00:43:36,800 --> 00:43:40,880
वो यह मिथ्या है। आपकी दृष्टि से मिथ्या नहीं है। अब

619
00:43:40,880 --> 00:43:44,960
ब्रह्म दृष्टि बताई क्यों? जिससे ब्रह्म में निष्ठा हो पाए। है

620
00:43:44,960 --> 00:43:49,360
ना? बताना आवश्यक इसलिए नहीं तो बिना बताए भी काम चल जाता। अगर

621
00:43:49,360 --> 00:43:53,920
हमारे जैसे लोगों के अंदर असतो मा सद्गमया जैसी कुलबुलाहट ना हो

622
00:43:53,920 --> 00:43:58,240
तो ब्रह्म जो पारमार्थिक धरातल है बताने की आवश्यकता ही नहीं है। केवल द्वैत बताकर

623
00:43:58,240 --> 00:44:02,240
भक्ति करवाकर भी मुक्ति पाई जा सकती थी। मगर हम जैसे लोग आ जाते

624
00:44:02,240 --> 00:44:06,320
हैं। वहां मा सद्गमया। अद्वत का उपनिषद गुरु वही जो

625
00:44:06,320 --> 00:44:10,400
संशय को दूर कर दे तो तब बताना पड़ता है भाई ब्रह्म

626
00:44:10,400 --> 00:44:15,280
दृष्टि से तो यह सब मिथ्या है ठीक है इसलिए

627
00:44:15,280 --> 00:44:18,800
कई आचार्य ऐसे भी हुए जिन्होंने उस लेवल से आगे

628
00:44:18,800 --> 00:44:23,040
की बात नहीं की ब्रह्म दृष्टि की बात नहीं की तो ऐसे भी आचार्य

629
00:44:23,040 --> 00:44:27,920
हुए इसीलिए तो अलग-अलग संप्रदाय बने और

630
00:44:27,920 --> 00:44:31,920
उन्होंने जो है शंकराचार्य जी ने पूरी बात की वो

631
00:44:31,920 --> 00:44:35,920
हम जैसे लोगों के लिए कर दिया नहीं भाई जब

632
00:44:35,920 --> 00:44:40,080
भगवान जो निर्गुण निराकार है तो उसने सृष्टि की रचना

633
00:44:40,080 --> 00:44:44,080
कैसे की क्योंकि वो जैसे ही कहीं पर धक्का लगाएगा तो वो

634
00:44:44,080 --> 00:44:48,240
कम ज्यादा हो जाएगा देखा था अभी लास्ट वाली लाइव चर्चाएं आपने देखी

635
00:44:48,240 --> 00:44:52,320
हो तो समझ निर्गुण से सगुण कैसे हो रहे हैं

636
00:44:52,320 --> 00:44:56,640
भगवान तो मानना पड़ेगा ना कि माया जगत में अवतार

637
00:44:56,640 --> 00:45:00,720
लेते हैं सगुण अवतार नहीं तो परिवर्तनशील हो जाएंगे नित्यता

638
00:45:00,720 --> 00:45:06,720
में वो आ जाएगा बाधा आ जाएगी हम शाश्वतता भंग हो जाएगी।

639
00:45:07,200 --> 00:45:12,480
ठीक चलिए। अच्छा एक लास्ट बात करके

640
00:45:12,480 --> 00:45:16,480
जी कुछ कह रहे हैं? नहीं अगर जल्दी है

641
00:45:16,480 --> 00:45:20,720
तो ठीक है हम अगले संडे को पूछ लेंगे लेकिन एक प्रश्न था। चलिए

642
00:45:20,720 --> 00:45:26,720
कोई नहीं अगले संडे अगले रविवार को कर लीजिएगा। सभी को जय श्री राम।

643
00:45:26,720 --> 00:45:30,960
जय श्री राम भैया। जय श्री राम। जय जय श्री

644
00:45:30,960 --> 00:45:36,960
जय श्री राम जय श्री राम

645
00:45:52,340 --> 00:45:56,340
[संगीत]
