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00:00:00:02 विदेश में उनके लिए बोला है। यह नहीं कि ग्रंथों में नहीं लिखा हुआ है। अल्लाह सुप्रीम यह सब अथॉरिटी ऐसा नहीं कहीं आप यह जवाब दीजिएगा उसमें। मैं इसको काउंटर करूंगा। मेरे पास कुछ है चीज मैं काउंटर करूंगा। नहीं फिर भी आप बता दो क्या काउंटर करोगे ताकि मैं उसके लिए फिर और वो करूं ना। अरे तो फायदा क्या है? फिर मैनपुलेटेड नहीं नहीं बिल्कुल नहीं होगा। मैं सोच तो यही वही आप ऐसे ना होगा। मैं भी तो सोचूं कुछ हमें डिफेट ना करना है किसी मतलब चर्चा कर रहे हैं। इसमें डिफिट करना कोई उद्देश्य ऐसे ग्रंथ इस द्वारा क्यों प्रकाशित किए जा रहे हैं जिसमें लिखा है कि जो है कृष्ण और अल्लाह एक है। ऐसा तो कहीं नहीं लिखा। जो ऐसा बोला वो गलत है। जो ऐसा इस की माने कि आपकी प्रभुपाद जी की मानो ना। भाई इस हम इस से सवाल कर रहे हैं। प्रभुपाद जी ने कहा है कि नहीं कहा वो हमें इस मैं तो प्रभुपाद को मानता हूं। प्रभुपाद के ग्रंथों को आप समझिए। हम प्रभुपाद जी को जान रहे हैं इस से। इस हमें बता रहे हैं प्रपाद जी ने यह कहा था के जो न्यू फाइट लोग हैं अगर वह ऐसा बोल रहे हैं तो गलत है यह मेरा उत्तर है इसमें तो इस उन पे लगाम क्यों नहीं लगा रहा है ये काउंटर आएगा ना वो आएगा तब आप उसका जवाब अब नहीं मैं ये कह रहा हूं इस का ये जो सिद्धांत है वो गलत है लेकिन प्रभुपाद जी ने ऐसा नहीं बोला है हम तो ऐसा बोल मेरा सवाल तो इस से है ना इस ये क्यों कर रहा है प्रपाद जी
00:01:16:00 आप मेरे पास आए हो मैं भी इसी इस में हूं लेकिन मैं इसको गलत बोल रहा हूं ना इस चीज को। नहीं तो इस तो पेपर में इस उन लोगों अब देखो अब इसको गलत सिद्ध करवाना है आपको। अगर मेरे से उत्तर चाहिए तो मेरा उत्तर है कि वो गलत है। मेरा उत्तर गलत है। हम अब इसको गलत सिद्ध करना तो फिर इस का जो मैनेजर है मैनेजमेंट जो एरिया है फिर वहां जाके ये पूछ सकते हो आप। क्योंकि वो मैनेजमेंट एरिया है। शास्त्री है तो मुझसे पूछ मैं इस के साथ नहीं हूं। हां मैं नहीं हूं। वो ऐसे लोगों को क्यों खड़ा कर रहा है मंचों पे? नहीं इस इसीलिए कह रहा हूं भाई आप रिकॉर्ड होने दो। चलो रिकॉर्डिंग शुरू करो अब आप
00:01:58:28 तो राम कृष्ण से शुरू करना या शिव जी से ये तो बात का विषय है अल्लाह अल्लाह। जैसे आपने कहा कि देवताओं में की जो पूजा करते हैं। तो एक बात देखने में आती है कि शिवजी को भी देवता माना गया है। है ना? हम क्या कहते हैं शिव जी की जो तो वहां पर कहा गया एक तरीके से इसको भी मना किया जाता है कि शिव जी के नाम को जो है कृष्ण के नाम के समान समझने वाले मूर्ख हैं और ऐसा करना अपराध बताया गया है। तो सबसे पहली बात तो यह है कि इस शिव जी को भगवान के रूप में स्वीकार नहीं करता जबकि हमारे शास्त्र करते हैं। और यदि यह कहा जाए कि कहीं-कहीं पर देवता कहा गया है तो कहीं-कहीं पर तो सभी को देवता कहा गया है। है ना? परंतु उन्ही शास्त्रों में जिनमें इनको देवता कहा गया है वो कार्य कार्य कारण के भेद से कहा गया है। है ना? कारण के रूप में वो कारण ब्रह्म है और कार्य करने वाले के रूप में वो देवता है कि फलाना डिपार्टमेंट में वो दिखाई दे रहे हैं किसी में। तो इस बारे में इस्कॉन का क्या पक्ष है? क्या इस कौन यह मानता है कि शिव की पूजा करने पर भी कृष्ण जैसा जैसा कृष्ण का परमधाम प्राप्त हो रहा है वैसा ही परमधाम प्राप्त हो जाएगा
00:03:14:00 अथवा नहीं के विषय में हमारे शास्त्रों ने हमारे वैष्णव आचार्यों ने गौ वैष्णव आचार्यों ने शीला प्रभुपाद ने बहुत विस्तार से बताया है दो पक्ष हैं। एक रूप में शिव जी वैष्णव हैं। एक रूप में शिव जी परम भगवान हैं। हमारे शास्त्रों में युगल जोड़ी उपासना का विधान है। कोई चाहे तो राधा कृष्ण की उपासना कर सकता है। कोई चाहे तो सीता राम की उपासना कर सकता है। कोई चाहे तो लक्ष्मीारायण की उपासना कर सकता है। कोई चाहे तो शिव पार्वती की उपासना कर सकता है। तो यह युगल जोड़ी की उपासना शास्त्रों में दिया गया है। तो जो वैष्णव आचार्य हैं या जो वैष्णव परंपरा है उन वैष्णव परंपरा में अनन्यता रखते हुए एक निश्चता रखते हुए जी या तो राधा कृष्ण की उपासना की जाती है जो राधा कृष्ण के उपासक हैं जो सीताराम के उपासक हैं वो सीताराम की उपासना करते हैं। जैसे तुलसीदास जी महान भक्त हुए भगवान राम के। उन्होंने भी रामचर मानस में और दोहावली इत्यादि ग्रंथों में शिव जी को गुरु रूप में ही स्वीकार किया है और उनसे
00:04:29:03 भगवान राम की भक्ति को ही मांगा है। तो वैष्णव आचार्यों ने शिव जी को गुरु रूप में वैष्णव रूप में देखा है और अगर कोई उनको भगवान के रूप में देख रहा है। कोई भगवान के रूप में उनकी उपासना कर रहा है। सदा शिव रूप में तो यह बिल्कुल शास्त्रीय आधार है। शास्त्र के अनुसार है। और वैष्णव के अनुसार शिव जी भगवान भी हैं एक रूप में और दूसरे रूप में वह वैष्णव भी हैं। जैसे भागवत इत्यादि में कहा गया कि वैष्णवा नाम यथा शंभू शास्त्रों में ऐसे वचन भी हैं और दूसरे वचन भी है कि शिव जी स्वयं भगवान हैं। तो दोनों विचार ठीक है और जो वैष्णव की बात है क्योंकि वो अनन्यता रखने के लिए वो शिव जी से गुरु भाव में वैष्णव भाव में क्या करते हैं? आशीर्वाद लेते हैं। जैसे हम लोग हमारे संप्रदाय के एक महान आचार्य हुए हैं सनातन गोस्वामी जी। उन्होंने शिव जी को गुरु रूप में माना है। श्री धाम वृंदावन में गोवर्धन के तट पर चकलेश्वर महादेव के पास रहकर वो हरि नाम लेते थे। जी तो उनको वहां मच्छर काटने लगे। तो उस स्थान को छोड़कर वो कहीं और जाने लगे। तो रात्रि में शिव जी उनके सपने में प्रकट हुए। बोले सनातन
00:05:44:04 तुम इस स्थान को छोड़कर मत जाओ। जी मैं तुम्हारा संग चाहता हूं। कल से तुम्हें यहां मच्छर नहीं लगेंगे। तो शिव जी के साथ ऐसा संबंध रहा है हमारे वैष्णव आचार्यों का तो उन्होंने वैष्णव रूप में देखा है। और जो वैष्णव नहीं है वो अगर साक्षात भगवान के रूप में उनकी उपासना कर रहे हैं। वो निश्चित रूप से मुक्त होंगे। जैसा कि सनातन गोस्वामी जी ही वृद्ध भागवतामृति में कह रहे हैं कि कृष्णा विचस भेदक्षा महा दोषकारी मता आगो भगवता स्वामिन क्षमतेन शिव कृतम भगवान श्री कृष्ण से श्री शिव को प्रथक देखना भी महादोष है ऐसा बोल रहे हैं सनातन गोस्वामी जी वृद भागवतामृत में और जहां तक कई लोग कहते हैं कि शिव की भक्ति करने से मुक्त नहीं होंगे उनके लिए भी सनातन गोस्वामी जी ब्रद भागवतामृत में कह रहे हैं अहो सर्व अपीते मुक्त शिवलोक निवासिन मुक्तस्त कृपया कृष्ण भक्तस कति ना भवन श्रीपाद सनातन गोस्वामी कह रहे हैं कि जो शिवलोक में वास करते हैं वे सभी मुक्त हैं। शिव की कृपा से न जाने कितने जीव मुक्त हो गए और कितनों को कृष्ण भक्ति प्राप्त हो गई। ऐसा
00:06:59:10 सनातन गोस्वामी जी वर्णन कर रहे हैं। तो शिव जी कौन है? अह भगवान भी हैं सदा शिविव रूप में और वैष्णव भी हैं। क्योंकि शिव जी अपने एक स्वरूप में वैष्णव जैसे हनुमान जी हैं वो भक्त रूप में हैं। तो भगवान की उपासना सिखाते हैं। जी तो शिव जी क्या है? महाजन है। 12 महाजनों में शिव जी का नाम भी आता है। शंभू नारद शंभ शंभू कुमारो कपिलो मनु प्रहलादो जनको भीष्मो बलि वया सखिर वयं जो बार महाजन है उसमें शिव जी भी हैं। शिव जी ने भी एक परंपरा शुरू की है और किसकी परंपरा शुरू की? भगवान राम की भक्ति की। भगवान कृष्ण की भक्ति की। इसीलिए तो तुलसीदास जी कहते हैं कि महामंत्र जे जपत महेशु काशी मुक्ति हेतु उपदेशु तो राम का नाम शिव जी लेते हैं। जी तो इसीलिए इसमें कोई संशय नहीं है। अगर कोई शिव पार्वती की उपासना करता है वो शिवलोक जाएगा और मुक्त होगा। परभ्यम बिरजा नदी के उस पार है शिवलोक जहां से कभी उसको लौट के नहीं आना पड़ेगा। मतलब शिवलोक भी परमधाम है। परमधाम है। बिल्कुल परमधाम है। जो आपने अभी यहां पे वर्ष कोट किया है ना गोस्वामी जी का हां तो उसमें क्या
00:08:14:14 है कि जो इस वाले लोग हैं कई ऐसे दुष्प्रचारक भी मैं कहूंगा आप सज्जन हैं जो आप साफ-साफ बात बता रहे हैं कि नहीं भाई जो क्या कहते हैं कि शिव की भक्ति से भी मुक्ति प्राप्त होगी। उसके सनातन गोस्वामी सनातन गोस्वामी जी का आप कोट कर रहे हैं। मगर वो इसका अर्थ यह लेते हैं कि भाई वहां जाकर जैसे आपने जो पढ़ा है ना कि मुक्त वहां से वो मुक्त होने के लिए वहां जाएंगे। तो वो लोग परमधाम ना मान करके जैसे इसमें भी आया है ना कि वो लोग वहां नहीं जाएंगे। नहीं इसमें ऐसा नहीं आया है। इसमें कहा कि शिव लोक में वास करते हैं वो सभी मुक्त हैं। क्यों? आगे क्या लिखा है? शिव की कृपा से यहां के जो जीव है कई मुक्त हो गए। कईयों को कृष्ण भक्ति मिल गई। ऐसा मतलब कृष्ण भक्ति के अगली स्टेज है ना नहीं यहां के लोगों को वहां तो मुक्त है शिव लोक में जो शिव जी के अनन्य भक्त हैं वो शिव शिव धाम में वहां पे दो बातें हो रही है एक वो कह रहे हैं वो शिव धाम में मुक्त है क्यों है तो वहां आशा ये नहीं मुझे लग रहा है शायद आप इसको समझ नहीं पाए होंगे मैं एक बार मैं एक प्रश्न पूछ लूं क्योंकि वहां पर वो ये कहते हैं कह रहे हैं जो मैंने सुना कि वो शिव धाम में है वो भी मुक्त है क्योंकि शिव की कृपा से कई लोगों को कृष्ण भक्ति प्राप्त हुई है वो इस संसार की बात हो रही है वहां की बात नहीं हो रही है। इस संसार में जीव है जो शिव जी से कृष्ण भक्ति मांग रहे हैं। तो
00:09:29:15 इस की किसी बुक में जैसे कि परमधाम माना गया है इस गोलोक को श्री कृष्ण को ऐसे शिवलोक को परमधाम माना गया वहां से वो वापस नहीं आएंगे। बिल्कुल माना गया है। हमारे हमारे जो इस में एक गोलोक चार्ट आपको मिलेगा जिसमें पूरा सिद्धांत समझाया गौ वैष्णव परंपरा का इस से पब्लिश है वो भक्ति वेदांत बुक ट्रस्ट से उसमें विजा नदी के उस पार पर वम में शिवलोक को दिखाया है यानी वो में वो चार्ट मिलता है चार्ट मिलेगा आपको तो उसमें क्या लिखा गया है परम वोम यानी वो शिव धाम जो है बैकुंठ में है विजा नदी को लोक से नीचे है बराबर में है या केवल इतना है कि अभी भी गोलोक बाकी है। ऐसा तो नहीं है। उसमें हमारे शास्त्रों में तो ये क्रम है। पहले बिरजा नदी के उस पार नहीं नहीं गोलोक अभी भी बाकी है या नहीं बाकी है? बाकी है। गोलोक है। वैकुंठ मथुरा भेद नहीं है। उपासना का भेद है केवल लक्ष्य का भेद है। चलिए ठीक है। तो वो बैकुंठ है। इसमें एक एक बात तो ये हम समझ गए कि आप कहना नहीं चाह रहे हो। मगर थोड़ा सा है अभी। बिल्कुल भेद नहीं है। नहीं तो शिवलोक में गोलोक बाकी है कि नहीं? नहीं गोलोक बाकी मैं समझा नहीं शिवलोक पहुंचने के बाद भी गोलोक बाकी है कि नहीं यह प्रश्न करो ना आप जो शिवलोक
00:10:44:21 जा रहा है जो शिव जी का भक्त है वो गोलोक क्यों जाएगा वो तो शिव जी का भक्त है ना वो वही रहेगा तो शिव की कृपा से फिर जो शिव की भक्ति करेगा उनकी कृपा से फिर भक्ति शिव कृष्ण की क्यों प्राप्त होगी वो तो उनकी भक्ति रहेगी नहीं होगी ना कौन बोल रहा है ऐसा आप ही तो ये ये कह रहे हैं कि अगर कोई शिव जी से प्रार्थना करे कि मुझे कृष्ण की भक्ति दे दो तब शिव जी उनको कृष्ण की भक्ति दे देते हैं। यह कह रहे हैं। यह नहीं कह रहे हैं कि शिव जी मतलब कि शिव जी को प्राप्त कर लेने पर मुक्ति है। हां जी मुक्ति है। उसमें फिर और अगली कोई स्टेज स्टेज नहीं है। चलो ये बात बहुत अच्छी लगी। आपने बताई किसके लिए जो शिव जी के अनन्य भक्त हैं उनके लिए शिव जी के अनन्य भक्तों के लिए आगे जाने की आवश्यकता नहीं है। नहीं है। हां। जैसे राम के अनन्य भक्त हैं वो अयोध्या ही जाएंगे। स्वाभाविक बात है जो कृष्ण के साकेत अयोध्या एक ही है और जो कृष्ण की उपासक है वो ब्रज में जाएंगे वृंदावन गोलोक तो स्वाभाविक है जो जिसका भक्त होगा वो उसी धाम में जाएगा उसके लिए वो सर्वस्व है तो शिव जी की भक्ति करने पर भी मुक्ति है मुक्ति है निश्चित है तो इस के जो भक्त है जो आजकल कार्य काफी सोशल मीडिया इत्यादि पर जो फेमस हो रहे हैं और वो लोग कहते हैं कि नहीं शिव जी की भक्ति करने पर आपको मुक्ति उनका ज्ञान अधूरा हो सकता है उनको जरूरत है कि शास्त्रों को पढ़ें अच्छा और
00:11:59:25 हमारे जो सनातन गोस्वामी जी हैं हम या जो गौ वैष्णव हैं हम या जो मूल ग्रंथ है उनको पढ़ने की आवश्यकता है। अच्छा एक चीज और आपने कही है कि शिवजी को जो है जो भेद वाली बात है ना कि भेद करता है वो गलत है शिव और विष्णु है। मगर बात वहां पे यह लिखी है कि ना एक मानो इनको ना अलग मानो ना अलग मानो तो आपने आधी बात बोली है तो एक मानना है या अलग मानना है मतलब बहुत अच्छा प्रश्न किया श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर हमारे एक महान आचार्य हुए हैं जिन्होंने श्रीमद् भागवतम पर सार्थ दर्शनी टीका लिखा हुआ है बहुत भगवत गीता पे भी लिखा है भगवत गीता पर सार्थ वर्षणी टीका लिखा हुआ है तो ऐसे विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी ने एक ग्रंथ लिखा है माधुर्य कादंबरी हम उस ग्रंथ में इस प्रश्न का वह उत्तर दे रहे हैं कि शिव ब्रह्मा शिव को और विष्णु को एक माने तब भी अपराध हो रहा है। अलग माने तब भी अपराध हो रहा है। तो क्या माने? ये प्रश्न उठाया उन्होंने। वहां पर यह प्रश्न किया गया कि शिव ब्रह्मा को भगवान विष्णु से अलग मानना ये भी अपराध है। तत्व की दृष्टि से एक मानो। व्यवहारगत नहीं नहीं नहीं मैं इसको पूरा करना चाहता हूं इस प्रश्न को जैसा उन्होंने समझाया
00:13:15:03 है जी शिव ब्रह्मा को भगवान विष्णु के समान मानना ये अपराध अलग मानना तब तब भी अपराध तो माने क्या अब विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर उत्तर देते हैं कि किसी किसी कल्प में ब्रह्मा जी की पोस्ट पर जीव बैठता है कोई पुण्यवान जीव जिनको उनको वैराग ब्रह्मा कहते हैं। और किसी किसी महाकल्पों में ब्रह्मा जी की पोस्ट पर स्वयं भगवान बैठते हैं। जिनको हिरण्यकर्भ ब्रह्मा कहते हैं। जब ब्रह्मा और शिव के पोस्ट पर स्वयं भगवान विराजमान है। उनको अलग समझना वो अपराध है। जब इनके पदों पर कोई जीव बैठा पुण्य कर्म के बल पर शास्त्रों में आपको पता होगा ऐसे विधान है जो ब्रह्मा के पद को प्राप्त कर सकता है। जैसे 100 असमद यज्ञ करने से ब्रह्मा का पद प्राप्त होता है। तो किसी ने ऐसे पुण्य कर्म कर लिए कुछ ऐसा विधान कर लिया शास्त्रों का जिसको ब्रह्मा का पद प्राप्त हो गया। ऐसे जीव ब्रह्मा को भगवान के समान समझना वो अपराध होगा। ऐसा विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर वर्णन करते हैं। जब किसी किसी कल्प में भगवान
00:14:30:14 को नहीं दिखता कि कोई पुण्यवान जीव ब्रह्मा के पद पर बैठने योग्य नहीं मिल रहा है तो खुद संभालते हैं उस पद को फिर ब्रह्मा। इसीलिए शास्त्रों में भगवान ब्रह्मा शब्द प्रयोग होता है उनके लिए किन के लिए जो हिरण्य गर्भ ब्रह्मा है। बहुत अच्छी बात बताई है आपने। अच्छा इसमें एक यह वाली बात आती है कि कोई भी व्यक्ति जब भगवान की बात कर रहा होता है कोई भी सामान्य व्यक्ति जिसको हम ये बात बता रहे हैं सामान्य व्यक्ति है हम तो कोई भी सामान्य व्यक्ति जब शिव और विष्णु की बात कर रहा होता है तो कभी नहीं सोचता है कि पता नहीं कौन सा जीव यहां का महापुरुष वो बन गया है ब्रह्मा और अब मैं ब्रह्मा विष्णु को एक कर रहा हूं तो ये बात तो होती नहीं वो जब भी वो जब भी सोचता है वो सरस्वती माता के जो अह अधिष्ठान अधिष्ठान यानी ब्रह्मा जी उनहीं के बारे में सोच रहा होता है जो क्या कहते हैं उनका जो लोक है वहां पर बैठते हैं जो उन्हीं के बारे में सोच रहा होता है जब भी ब्रह्मा की बात करता है या फिर जब भी वो शिव जी की बात करता है तो वो जो पार्वती वाले जो शिव जी हैं उनकी बात कर रहा होता है ना कि शिव जी के पद को प्राप्त करने वाले यहां के किसी महापुरुष जो मुक्त होने के बाद वहां पहुंच गए हैं उसकी बात कर रहा होता है। अच्छा दूसरी बात एक ये आती है कि जैसे कई बार ये होता है कि वैष्णव हैं इसलिए वो ऐसा मानते हैं। कौन? जैसे वह वैष्णव
00:15:45:20 है इसलिए वह तो उनको वो देखते हैं शिव जी को। अच्छा शिव जी को क्या कहते हैं ये जो वैष्णव जन है वो वैष्णव के रूप में परम वैष्णव मानते हैं। तो इसमें ये बात आती है कि वैष्णव व्यक्ति भगवान विष्णु की भक्ति चालू करने के बाद वैष्णव माना जाएगा या उस पे कोई बाउंडेशन होती है कि तुमने वैष्णव कुल में जन्म लिया है। इसलिए तुम वैष्णव हो। जो भगवान विष्णु का उपासक है। यानी जब उसने उपासना शुरू कर दी उपासना जब उसने स्वीकार कर ली तब वैष्णव है ना उससे पहले तो उस पर वैष्णवता का वो नहीं ठोक सकते कि तुम वैष्णव हो इसलिए तुम्हें ये करना है। नहीं तो फिर जो हमारी शिक्षा होनी चाहिए वो तो स्वतंत्र रूप से होनी चाहिए ना कि भाई शिव और विष्णु शिव जी भी जो है भगवान ही है। वो यहां रोल निभा रहे हैं दास का। हमारी शिक्षा जो है वो स्वतंत्र रूप से होनी चाहिए। फिर इसमें इस हिसाब से नहीं होनी चाहिए कि वैष्णव की क्या शिक्षा है। शास्त्रों में जो चार वैष्णव संप्रदाय दिए हुए हैं संप्रदाय विहीनाय मंत्र निष्फला मता श्री ब्रह्म रुद्र सनका वैष्णवा पावन पद्म पुराण का ये वचन है तो चार वैष्णव परंपरा हमारे शास्त्रों में वर्णन है और चारों वैष्णव
00:17:00:24 परंपरा में भगवान विष्णु की उपासना है। उनके नाम लेने की उपासना उनके उनका लक्ष्य यानी विष्णु पद प्राप्त करने का लक्ष्य है। तो अब जो वैष्णव हैं वो क्या करेंगे? वो विष्णु भक्ति का ही प्रचार करेंगे। नहीं आप वो मैं जो शैव हैं वो शिव जी का प्रचार करेंगे। जैसे हम सिद्धांत दे रहे हैं। सिद्धांत इस रूप में दे सकते हैं कि अगर आप शिव जी की उपासना आप शिव जी की भक्ति करना चाहते हो आप करिए। हम् आपकी इच्छा है। आप राम की उपासना करना चाहते तो आप करिए। यह तो इस रूप में हम शिक्षा दे सकते हैं। वह तो उसके ऊपर निर्भर है कि वह किसकी उपासना करना चाहता है। तो इस के द्वारा छापी गई कौन सी किताब है जिसमें ये लिखा हो? प्रभुपाद जी या हमारे आचार्यों ने तो एक निष्ठता दिखाई है। मैं इस की बात कर रहा हूं। इस के द्वारा कोई छपी हुई पुस्तक हो जिसमें इसन के द्वारा तो मैं तो प्रभुपाद जी के अलावा और जो नए ग्रंथ हैं उनको तो पढ़ा नहीं। मैं इस की बात कर रहा हूं। क्या इस के द्वारा कोई पुस्तक प्रभुपाद जी के नाम से ही सही ऐसी है जिसमें ये लिखा है? इसकी जानकारी मुझे नहीं है क्योंकि प्रभुपाद जी के ग्रंथ के अलावा मैंने इस में जो नए ग्रंथ छपे हैं उनका अध्ययन मैंने प्रभुपाद जी का
00:18:15:25 कोई ग्रंथ है जिसमें ये लिखा हो जो इस से प्राप्त है। बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल भगवत गीता में उन्होंने बोला है। भागवतम में बोला है। चैतन्य चरितामृत में बोला है। वो मैं अभी मुझे इसका स्मरण नहीं है। लेकिन प्रभुपाद जी बोले हैं कि राम कृष्ण नरसिंह किसी एक की हम उपासना कर सकते हैं। नहीं नहीं शिव जी की भी कर सकते हैं। शिव जी की भी उपासना कर सकते हैं। सनातन गोस्वामी जी लिखे हुए हैं। ब्रज भागवतामृत्य में हमारे परंपरा के आचार्य हैं। अगर कोई शिव जी प्रभुपाद जी ने बोला है क्योंकि कुछ अंशों में मुझे लगता है कि हमारे जो इस या जो हमारा वैष्णव परंपरा है वो अनन्यता दिखाता है। तो हम लोग क्या करते हैं कि अनन्यता दिखाता है वो ठीक है। मगर सिद्धांत तो बताना पड़ेगा ना। हां सिद्धांत बता सकते हैं। आप जैसे हम देखिए मैं अपनी बात बताऊं शंकराचार्य जी का शिष्य हूं। मुझे क्या बताया गया? हां पांचों रूप एक है। अन्यथा के लिए क्या करिए कि एक को आप ईश्वर के रूप में देखिए। अन्यों को उनके परिकर के रूप में देखिए। अन्यों से उनकी भक्ति मांग लीजिए। अन्यों में भी अपने ही भगवान को देखिए कि देखिए यहां पर मेरे राम भगवती बन के प्रकट हो गए हैं। यहां पे मेरे राम शिवजी बनकर प्रकट हो गए हैं। ये भाव रखिए भगवान के प्रति। तत्वतः सब एक हैं। है ना? पांचों एक है। तो यह तो हमें सिखाया गया अनन्यता की रक्षा भी हो गई
00:19:30:28 कि अपने भगवान को ही सब में देखो। तो यह शिक्षा हमको मिलती है भगवत पाद आदि शंकराचार्य जी से प्राप्त होती है। मगर जब हम यह कहते हैं ना कि तुम वैष्णव हो इसलिए ऐसा मानो। तो वैष्णव भगवान विष्णु को स्वीकार करने से पहले हो तो ऐसा मानना है या फिर पहले हमें पूरी शिक्षा प्राप्त करनी है। फिर अपना चयन करना है कि हम वैष्णव बनेंगे कि शव बनेंगे कि राम भक्त बनेंगे कि हनुमान भक्त बनेंगे। तो ये एक दिक्कत आती है। मतलब वैष्णवता को वैष्णव होने से पहले हम किसी पर कैसे थोप सकते हैं? हां थोप नहीं सकते। जैसे सामान्य व्यक्ति आ रहा है। अभी ना वो वैष्णव है ना शैव है। फिर भी हम कहे नहीं जो है शिव जी को तो भगवान का दास मानो। ऐसा उपदेश नहीं दे सकते हैं किसी सामान्य व्यक्ति को। हां क्योंकि अभी तो बन गया है। अभी तो उसको कुछ ज्ञान ही नहीं है। उसने उसने स्वीकार कर लिया है। जब वो आपकी परंपरा में दीक्षित हो जाए तब आप कहो कि अब आपका कर्तव्य है इस रूप में ही शिव जी को देखो। तब तो ठीक है मगर स्वतंत्र रूप से जो व्यक्ति है उसको सनातन ज्ञान देने की बजाय किसी देश काल परिस्थिति से प्रभावित ज्ञान देना ये तो ठीक नहीं है। देखो अपने संप्रदाय हां अपने संप्रदाय का विचार उसका प्रचार जी हर संप्रदाय का एक कर्तव्य है जैसे रामानुज जी वैष्णव का वो
00:20:46:04 अपने संप्रदाय अपने उपासना अपनी पद्धति का प्रचार करेंगे आदि जगतगुरु शंकराचार्य जी अपने उसका प्रचार करेंगे सिद्धांतों का अपने उपासना पद्धति का तो हर वैष्णव आचार्य की क्या है प्रचार करने का वो है अधिकार है करने से अब इसमें क्या है ना शुरुआत में पहले तो अपने ही संप्रदाय के विचार बताए जाएंगे। अब व्यक्ति अगर जिज्ञासा करेगा मान लीजिए वह जिज्ञासा करता है कि मुझे क्या मैं शिव जी की उपासना कर सकता हूं? हां फिर उसको बता देगा आप कर सकते हो। यह आपकी इच्छा है। आप देखो यह हमारे वैष्णव संप्रदाय हैं। मतलब कहना चाहिए कि शिव जी और विष्णु जी में भेद बुद्धि ना रखना या ये कहना चाहिए कि शिवजी और विष्णु जी में भेद बुद्धि रखना ये सनातन सिद्धांत नहीं है। नहीं है बिल्कुल अपराध और ये हम तब कर रहे हैं जब कोई वैष्णव बन गया है। वैष्णव नहीं के बाद भी हम भेद नहीं रख रहे हैं। केवल हम उनको अरे व्यवहारिक रसगत भेद तो कर ही रहे हैं ना। व्यवहारिक रसगत रसगत भेद तो कर ही रहे हैं। जो शिव और विष्णु में भेद करना ये सनातन सिद्धांत नहीं है। ये पर्टिकुलर देश काल परिस्थिति से प्रभावित वैष्णव संप्रदाय का सिद्धांत है। वो जब आपने वैष्णवता हासिल कर ली है। वैष्णव आप हो गए हो डिस वो क्या कहते हैं? डिसाइपल
00:22:01:18 कहते हैं। जब आप डिसाइपल हो गए हो तब जो है आप उस चीज को ग्रहण करो। वरना आप सनातन सिद्धांत लो। तो सनातन सनातन सिद्धांत यही है कि आप राधा कृष्ण की उपासना करना चाहते हो करो। आप सीताराम की उपासना करना चाहते हो करो। आप लक्ष्मी नारायण की उपासना करना चाहते हो करो। आप शिव पार्वती की उपासना करना चाहते हो करो। अरे सनातन सिद्धांत तो और भी है भगवान कहते हैं गीता में याती देवता देवाने पित्त पितवता अरे आप देवताओं की उपासना करते हो वो भी करो नहीं मगर वो वहां ये तो बता रहे हैं कि करो वो भी मगर ये भी बता रहे हैं कि देवताओं से आपको मोक्ष प्राप्त यस बिल्कुल वो करने को तो आप अब देखो भगवान ने सब कुछ बता दिया भगवत गीता में उसके बाद कहा तुम अब तुम्हें अपनी मर्जी से लेकिन मूल बात यही है अगर मैं सार रूप में कहूं तो अगर कोई शिव पार्वती की उपासना करता है जी वो मुक्ति प्राप्त करेगा शिवलोक जाएगा कैलाश धाम जाएगा वहां से आगे कुछ बाकी तो नहीं कुछ वो आगे जाएगा नहीं क्योंकि उसकी अनन्यता उसकी निष्ठा शिव जी पर है। नहीं मतलब वो मुक्त हो गया कि नहीं मुक्त हो गया मुक्त हो गया तो वो तो नहीं गोलोक की सेवा अभी बाकी नहीं नहीं मुक्त हो गया उसके लिए वही सर्वस्व है ना मतलब गोलोक की सेवा के बिना भी मुक्ति है बिल्कुल है जैसे हनुमान जी तो अयोध्या वासी है ना साथ उसके लिए उसके लिए जो है शिवलोक ही गोलोक है सब कुछ है उसके लिए सर्वस्व है जैसे हनुमान जी के लिए अयोध्या सर्वस्व है जी और गोपियों के
00:23:16:21 लिए वृंदावन सर्वस्व है जी जी और गरुड़ जी के लिए बैकुंठ सर्वस्व एक ड्रॉबक रह गया कि इस के द्वारा कौन सी किताब ऐसी है प्रभुपाद जी की कौन सी चीज ऐसी है जिसमें उन्होंने उन्होंने कहा है कि शिव जी को भी मान सकते हो। शिव जी के द्वारा मुक्ति होगी। यह कहीं स्वीकार किया हो। ये नहीं। दूसरी बात आपने कहा कि सब नहीं मुझे अभी उसने बताया मैं आपको प्रमाण दूंगा। अभी मुझे स्मरण तो यह आप लोग ध्यान रखिएगा कि भैया जो है प्रभु जी हमें वो प्रमाण देंगे और हम उसको यहां पे लगा आपको मैंने सनातन गोस्वामी का तो प्रमाण दे दिया जो हमारे परंपरा के आचार्य हैं वो कई मामलों में इस और गौडियम में ये भी गौ वो अलग विषय है थोड़ा सा भेद है तो और दूसरी बात थोड़ा सा प्रभुपाद जी कहां पर ये बोले हैं मैं उसका प्रमाण वो आप देंगे तो उससे थोड़ा मैच हो जाएगा क्योंकि इसके क्या है ना दोहरे अर्थ निकल रहे हैं दोहरे अर्थ में दूसरा वाला व्यक्ति नहीं सनातन गोस्वामी तो हमारे परंपरा के हैं। जीव गोस्वामी हमारे परंपरा के हैं। परपा जी की परंपरा के हैं ना कहते हो कि हम गौडिया वैष्णव हैं। मगर कई गौडिया वैष्णव ऐसे हैं जो कहते हैं कि इस कौन हमसे नहीं है भाई। मैं तो मैंने कभी नहीं सुना ऐसा आज तक गौडिय वैष्णव हमारे हमसे बहुत परिचित हैं। कई लोग हैं। नहीं तो परिचित हमसे भी हैं। हां। इसीलिए करते हैं। गौर नहीं हमारा जो इस संस्था है वो गौ मठ से हो जाएगा।
00:24:31:27 हां क्या है कि जैसे गौडिया मठ की बात तो ऐसे सुनने में आई थी कि गौडिया वैष्णव संप्रदाय से मिलती जुलती एक संस्था डाली गई थी। ग वैष्णव मठ गौ मठ जो गौ मठ की स्थापना श प्रभुपाद मतलब वो इसलिए डाला गया था कि लोग ये सोचना भूल जाए कि प्रामाणिक है कि नहीं समझ रहे हैं गौडिया वैष्णव परंपरा है और गौडिया वैष्णव मठ एक संस्था डाल दी गई अब उस पर कोई क्लेम नहीं कर पाया नहीं उसने ध्यान दिया सोचा कि अच्छा है प्रचार कर गौ अब आज ये लोग भूल ही गए कि भैया अब हम लोग गौडिया वैष्णव मठ से निकल के आ रहे हैं ना कि गौ वैष्णव परंपरा से नहीं नहीं नहीं गौ मठ और गौ वैष्णव परंपरा दोनों दोनों एक ही है अलग एक नित्यानंद वो नित्यानंद परिवार शाखाएं हैं बहुत सारी नित्यानंद परिवार के हैं गौ वैष्णव जैसे राधा रमण वाले हैं गौडिया वैष्णव परंपरा के नित्यानंद परिवार के एक हैं
00:25:22:09 रघुनाथ दास शास्त्री जी आचार्य जी उन्होंने बहुत स्पष्ट कहा है कि इस जो है बहुत सारी शास्त्री वो उनका विचार हो सकता है बट गौ मठ प्रामाणिक आचार्य ये आपके लिए शोध का विषय है बाकी गौ मठ इस और गौ वैष्णव परंपरा एकद है तो इस बारे में आप मुझे प्रमाण दे दीजिएगा मैं इस वीडियो में लगा दूंगा अब आगे बात ये आती है कि जैसे केशवदास जी हैं मोहन प्रभु हैं कोई आपके यहां के अमोग लीला है ये लोग बहुत हास्य वाला वातावरण इस पर टिप्पणी नहीं करूंगा नहीं मैं वो नहीं कह रहा ये लोग कई बार इनमें भेद करते हैं और कहीं ना कहीं शिव जी की चीजों को जो है उपहास पूर्वक बताते हैं कि भाई वो दास हैं या उनको और एक बार तो मैंने देखा था कि अमुक लीला जी का एक इंटरव्यू आया था जिसमें वह कह रहे थे कि भाई अगर शिव और विष्णु एक हैं तो क्या पार्वती पार्वती के पति वही हैं क्या विष्णु जी तो फिर मैंने उनको कहा था कि ऐसे तो कृष्ण और राम भी एक हैं तो सीता माता के पति कृष्ण कहोगे क्या आप मतलब वो ये कहने लगे थे अगर शिव और विष्णु एक है तो पार्वती के पति आप विष्णु को कहने लगो तो वो व्यवहार में वो जो आध्यात्मिक वो उनका विचार है उनका विचार का समर्थन
00:26:37:27 उनके विचार की व्याख्या वह स्वयं कर पाएंगे। आप सहमत नहीं है। मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर पाऊंगा। अगर वो अगर वो शिव जी को भगवान नहीं मान रहे हैं या शिव जी की भक्ति करने से मोक्ष नहीं मिलता। मुक्ति दाता नहीं मान रहे। मुक्ति दाता नहीं मान रहे तो हम इसके पक्ष में नहीं है। हम हम इसके समर्थन में नहीं है। हां तो कई बार कई लोग हैं केशवदास जी हैं और भी खैर अच्छा जो एक इस के हमारा वो हुआ था इस के ही वो थे वो इंदौर के जोनल सेक्रेटरी उनका नाम नहीं याद है। महामना दास हम काफी वृद्ध थे। वो सीधे प्रभुपाद जी के नहीं नहीं वो मुझे उस पर चर्चा नहीं करनी। ये तो इस का हो गया ना जो जो मेरा अनुभव है जो मेरा अध्ययन है जो मेरा विचार है मैंने प्रस्तुत किया हां अब मैं अपने विचारों की व्याख्या तो कर सकता हूं हम लेकिन जो दूसरा व्यक्ति कब क्या कहां क्या बोल रहा है उसकी सफाई उसका इसमें एक दिक्कत आएगी हम कि आप भी स्कन से हो हां और अमोग लीला भी उस से मान लीजिए वो कह रहे हैं ए आप कह रहे हो बी मैंने सुना नहीं है ना क्लियर नहीं सुना उनके लेक्चरों को मैं सुन सुन नहीं पाता हूं तो मैं आपको बता रहा हूं ना कि वो ऐसा कह रहे हैं। अब कैसे कह रहे हैं,
00:27:53:01 क्या कह रहे हैं, कब कह रहे हैं, किस आप इसलिए हां मैं अगर एक सिद्धांत बोलूं शिव जी को अगर वो मुक्ति दाता नहीं मानते हैं हम तो मैं उसका समर्थन नहीं करता। नहीं तो दिक्कत दिक्कत ये है कि देखिए शिव जी को अगर वैष्णव मान रहे हैं एक पक्ष में वो तो ठीक है। वो अच्छा है। हां लेकिन मुक्ति दाता नहीं मान रहे हैं। हां वो कह रहे हैं कि शिव जी की पूजा करने से मुक्ति प्राप्त नहीं होगी। वो मेरे मैं उसका समर्थन इस विचार में नहीं करता हूं। तो फिर इसमें एक दिक्कत आती है कि इस से ही वो भी हैं और इस से ही आप भी हो। इस के ही प्रभुपाद जी की परंपरा के ब्रह्मचारी वो भी हैं। इसन के ही प्रभुपाद जी की परंपरा के ब्रह्मचारी आप भी हैं। तो दोनों में से किसकी बात को मान लिया जाए कि इस ये मानता है कि यह मानता है? क्या कहता है इस? कैसे माना जाए? जो प्रभुपाद जी बोलते हैं जो हमारे गौ वैष्णव बोलते हैं वो हमको मानना है। तो प्रभुपाद जी तो अभी नहीं है ना यहां पे बताने के लिए। उनके ग्रंथों में है। उनके ग्रंथों के आधार पे ही वो कुछ बोल रहे हैं ना। प्रमाण अगर वो ऐसा बोल रहा है तो कुछ प्रमाण दें तब ना माने तो या हमारे गौ आचार्यों के ग्रंथों से या प्रभुपाद के ग्रंथों से कुछ ऐसा प्रमाण दे तो किसी चीज के ना होने का प्रमाण नहीं आवश्यक होता है। किसी चीज के होने का प्रमाण आवश्यक होता है। अगर वो कह रहे हैं कि शिव की वो जो कह रहे हैं ना अगर
00:29:08:02 वो कह रहे हैं किस आधार पर कह रहे हैं? मैं बता तो रहा हूं। जैसे शिव की भक्ति से मोक्ष नहीं मिलेगा। किस आधार पर कह रहे हैं? सुनिए तो तो वहां पर विष्णु की कृष्ण की भक्ति से मोक्ष तो लिखा है ग्रंथों में साफ-साफ वो तो वैष्णव तो बोलेंगे ही सुनिए तो शास्त्री बोल रहे हैं नहीं उनके ग्रंथों में लिखा है तो वो उसमें बोल रहे हैं मगर यदि कोई कह रहा है कि शिव की भक्ति से भी मिलेगा हां तो उसको प्रमाण देना होगा कि शिव की भक्ति से मिलने के प्रमाण ये है तो वो प्रमाण वो प्रमाण तो मैंने आपको दे दिया सनातन गोस्वामी जी का हमारे घोड़े वैष्णव के कौन ये मानता है कि नहीं इस मतलब प्रभुपाद जी मैं तो प्रभुपाद जी को मानता हूं इस को नहीं मानते नहीं इसको इस के फाउंडर सारे प्रभुपाद जी है ना नहीं तो भाई हमें क्या पता इस का कोई व्यक्ति विशेष क्या बोल रहा है वो मेरे लिए प्रमाणित सुनिए इस के द्वारा ही हम प्रभुपाद जी को जान रहे हैं ना इसन की किताबों के द्वारा ही हम उनको जान रहे हैं ना इस आपको प्रोवाइड करा रहा है तो इस मानता है कि नहीं ये आपको बताना पड़ेगा क्योंकि इस के माध्यम से हम प्रभुपाद जी को जान रहे हैं। बिल्कुल इस के कोई व्यक्ति विशेष अगर अपूर्ण अध्ययन किया हो या कुछ ऐसे बोल रहे हैं तो उसका समर्थन मैं नहीं करता आपको वो प्रमाण देना होना होगा ना कि इस यहां पे क्लेम कर रहा है कि शिव की भक्ति से भी मुक्ति मिलेगी हां मैं दूंगा मैं दूंगा आपको प्रभुपाद के ग्रंथों से आपको
00:30:23:10 दूंगा मैं और एक बात ये भी आती है कि यदि आपको आपका ये मानना है कि जो ऐसे लोग हैं जो ये गलत बात बोलते हैं इस की ओर से मंचों पे खड़े होकर के बोलते तो इस इनको प्रोत्साहित क्यों कर रहा है? उसे इनको हटाना चाहिए इनके पद से। जैसे कि सुनिए तो जैसे कि विवेकानंद के बारे में इन्होंने अमोग लीला जी ने एक टिप्पणी कर दी थी विवेकानंद जी के बारे में। ठीक है? तो इस ने संज्ञान लिया हम और इस ने उन्हें एक महीने के लिए लगा दिया लगाम। हम अब इस इस इन्होंने अमोग लीला ने आदि शंकराचार्य जी की मरती हुई मां पर एक्टिंग की। हम ठीक है? हम और वो एक्टिंग कर करके बता रहे हैं कि शंकर तू आ गया शंकर तू मुझे भगवान के स्वरूप का वर्णन कर दे पहले मजाक बना रहे हैं हंस रहे हैं वहां लोग बाकी ठठा के लगा रहे हैं। नहीं मेरा विषय वो नहीं है प्रभु या कोई और नहीं देखिए मेरा विषय यह है कि इस क्या सही चीजें फैला रहा है कि नहीं फैला रहा है। अब वो प्रभुपाद जी की चीजें हैं कि नहीं है वो डजंट मैटर मेरे लिए। मैं ये कह रहा हूं कि क्या इस शास्त्रोक्त है? सनातन धर्म फैला रहा है या कुछ और फैला रहा है? अधिकतर लोग इस के जो अनुयाय हैं वो सनातन धर्म का ही वास्तविक प्रचार कर रहे हैं। अधिकतर लोग कुछ अपवाद हो सकते हैं।
00:31:38:16 कुछ ऐसे लोग हो सकते हैं जो जिनका अपूर्ण ज्ञान हो। जो कर जो कर रहे हैं उस पे इस कौन संज्ञान क्यों नहीं ले रहा है? वो तो मैनेजमेंट का विषय है। वो मेरा विषय है। यदि नहीं ले रहा है तो उतने अंश में तो फिर वो गलत कर रहा है ना। हां गलत है। अगर कोई गलत प्रचार कर रहा है, कोई गलत फिलोसफी बोल रहा है, अगर उस पर कोई संज्ञान नहीं ले रहा है तो गलत है। वो तो है ही। तो इस को ऐसा नहीं करना चाहिए। ये चीजें आपको समझ में आ रही होंगी। खैर श्रीमद् भागवतम में स्पष्ट रूप से लिखा है कि जो लोग शिव के नाम को भगवान श्री कृष्ण के नाम के समान समझते हैं, वो लोग मूर्ख हैं। और वो लोग ऐसा करना 10 अपराधों में से एक अपराध है। तो क्या ये लाइन गलत है? यह तो मैंने आपको समझा दिया विश्वनाथ चौथी ठाकुर जी के माध्यम से हां अह जो 10मा अपराध है पद्म पुराण में इसका वर्णन है उसी की तो व्याख्या हमने पहले की है ना वो जो जीव अगर शिव शिव के रूप में है हां अगर उस पोस्ट में है मगर आपके यहां तो कहा जाता है कि कोई भी जीव ब्रह्मा बन सकता है मगर शिव नहीं बन सकता बट विश्वनाथ ठाकुर ऐसा वर्णन किए हैं नहीं नहीं आपके यहां ये कहा जाता है गलत कहा जाता है कि सही हमारे यहां ऐसा मैंने सुना नहीं अभी तक ऐसा नहीं जो आपके यहां आगे प्रामाणिक लोग हैं जो अगर जो कह रहे हैं वो गलत
00:32:53:22 होंगे इस मामले में क्योंकि विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जो जो बता रहे हैं आपको नहीं लगता कि आप ऐसी संस्था का साथ दे रहे हो जो कई गलत लोगों का साथ दे रही है अपने मंदिरों का अध्यक्ष बना करके बिाल रही है देखो मेरा वो विषय नहीं है कोई कौन क्या कर रहा है इस को में बहुत सारे अच्छे प्रचारक भी हैं अच्छे सिद्धांत जानने वाले इस के बाहर भी तो है भाई साहब और अच्छा बोलने वाले हैं हम भी इस कोन में तो मुझे लगता है कि शायद आप भी मेरी बातों तो से सहमत हो ही रहे होंगे कुछ बहुत जी जी तो नहीं मेरा कहने का मतलब है कि इस ही क्यों फिर तो इस के बाहर भी बहुत कुछ है। अच्छा अच्छा इसलिए ना कि इस एक गौ वैष्णव संप्रदाय का ब्रांच है तो इसीलिए वो गलत कर रहा है ना कहीं जो गलत कर रहा है वो गलत है उसका विरोध होना चाहिए और उसको रोकना चाहिए जो विरोध कर रहे हैं वो ठीक मानते हो आप अब आप किस रूप में विरोध कर रहे हो क्या विरोध जिन बातों का आपसे पूछ रहे हैं आप कह रहे हैं जो आपका विरोध है जो मान लो आपका विरोध है जिनसे भी आपका विरोध है एक बार आप उनके पास जाकर ना और अच्छे से इसको वो कर सकते हो आप और आप मेरे पास आए तो मैं तो जो प्रभुपाद की सिद्धांत हैं जो हमारे ग वैष्णव के सिद्धांत हैं मैं अपने अनुभव अपने अध्ययन अपने उससे आपको बता अपने से कुछ मत बताइए आप प्रमाण
00:34:08:26 दीजिए प्रमाण ही शिव जी को कहां उन्होंने मुक्ति वाला माना प्रमाण ही दे रहा हूं आपको एक प्रमाण तो आपको मैंने दिया ही सनातन गोस्वामी इसमें इसमें ये फेल हो गया ना मामला आप जो ये कह रहे हैं कि जो ब्रह्मा जी की पोस्ट पे चला जाएगा उसके लिए मना किया है मगर शिव जी की पोस्ट पे तो कोई जा ही नहीं सकता ऐसा बताया जाता है इसको इस में शिव जी की पोस्ट में अच्छा इस की दृष्टि से फेल हो गया है। ऐसा बोल रहे हो? हां देखो विश्वनाथ जी हमारे लिए प्रमाण है। हमारे आचार्य है ना गौ वैष्णव में वो क्या बोल रहे हैं वो महत्वपूर्ण है। कोई आलतू-फा फालतू व्यक्ति क्या बोल रहा है वो महत्वपूर्ण नहीं है मेरे लिए। स्कॉन बोल रहा है ना। अब वो अज्ञानी होंगे जो बोल रहे होंगे ऐसा। उन्होंने पढ़ा नहीं होगा। यानी कि इतने अंशों में आप इस के उन लोगों के साथ नहीं है। हां अगर वो शास्त्र के हटकर कुछ बोल रहे हैं तो मैं उनके पक्ष में कैसे हो सकता? अगर नहीं वो ये बोल रहे हैं ये वाली बात मैंने आपको बता दी। वो बोल रहे हैं नहीं वो ठीक है लखनऊ का एक व्यक्ति है परम कोई भी हो श्यामदार कोई भी हो वो बोल रहे हैं शिव जी की पोस्ट पे कोई नहीं जा सकता कोई भी व्यक्ति अच्छा विष्णु की पोस्ट पे लोग जा सकते नहीं जा सकते विष्णु के पोस्ट को कोई नहीं ले सकता शिव जी की पोस्ट पे जा सकते हैं विश्वनाथ जी ऐसा वर्णन किए हैं शिव जी की पोस्ट पे जा सकते हैं कभी-कभी शिव के पद पर जीव भी बैठता है बहुत डिटेल में वर्णन नहीं किया हुआ है वो प्रमाण मैं आपको भेज दूंगा उसको स्क्रीन में आप लगा देना जी जी और नहीं मुख्य प्रमाण मुझे चाहिए होगा कि प्रभुपाद जी ने माना
00:35:24:02 है कि नहीं प्रभुपाद वैष्णव संप्रदाय और इस में काफी सारे अंतर आ रहे हैं। कोई अंतर नहीं है। अगर आप ग्रंथों को देखिए आज आपने मना किया है कि वर्णाश्रम पर बात नहीं करेंगे। नहीं तो मैं अभी वर्णाश्रम खेल दूंगा तो आप आपको जो गौडिया वैष्णव संप्रदाय से अंतर समझ में आ जाएगा। नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं है। वर्णाश्रम पर मैं इसलिए चर्चा नहीं करना चाहता हूं कि उस पर बहुत सारे कंट्रोवर्सी विरोधाभास हो जाते हैं। बाकी जो यह विषय है जो शिवजी का विषय है। हां जी। तो मैंने आपको समझा दिया है। हां प्रमाण आप दीजिएगा कि प्रभुपाद जी ने कहां माना है उनको मुक्ति दाता और और ये वाली लाइन में भी आप ये कह रहे हैं कि वहां पे जीव रूप वाले शिव जी के लिए मना किया गया है। मतलब आपका कहने का मतलब दूसरा प्रश्न था एक तो भेद अभेद वाला मैंने लास्ट बात ये पूछी ना आपसे कि अलग मानना और एक मानना। नहीं नहीं लास्ट बात मैंने ये पूछी आपसे कि भागवतम में भाष्य करते समय जो उन्होंने ये लिखा भागवतम में कहां पर लिखा 1525 में ऐसा लिखा हुआ है उसमें क्या लिखा है क्या लिखा है उसने बोला 10 अपराध बताए जा रहे हैं कि ऐसे 10 अपराध हैं जिनको नहीं करना चाहिए उसमें से शिव और विष्णु को शिव काली या दुर्गा के नाम को श्री कृष्ण के नाम के समान समझने
00:36:39:08 क्योंकि ये सभी समान है ऐसा सोचने वाले मूर्ख है ऐसा करना अपराध है हां मूर्खता तो है अगर कोई जीव वहां बैठा है जो विश्वनाथ जी बोल रहे हैं कि उनको भगवान के समान समझ रहे हो वो तो मूर्खता है वो तो जीव है ना अगर वो भगवान बैठे हो जीव वाली बात प्रभुपाद जी ने मानी है ये कहां से प्रमाण मिलेगा प्रभुपाद जी जो लिख रहे हैं ना वो वहां पर एक पक्ष लिख रहे हैं इतना विस्तार से उन्होंने नहीं समझाया भाष्य करते समय भी विस्तार से नहीं लिखेंगे तो कब लिखेंगे वो भक्तों के लिए वो व्याख्या है प्रभुपाद जी की अगर विस्तार से समझना है प्रभुपाद जी अपने ग्रंथों में लिखे हुए हैं किसी को बहुत विस्तार से समझ समझना है तो सनातन गोस्वामी जी की ग्रंथ पढ़ें। विश्वनाथ ठाकुर जी के ग्रंथों को पढ़ें विस्तार से क्योंकि प्रभुपाद जी का इतना समय नहीं था। वो प्रचार भी कर रहे थे। नहीं मगर उन्होंने सारे ग्रंथों पे नहीं किया। मगर जिस पे किया है तो उन्होंने 18 भागों में किया था। इसमें जो उन्होंने अनुवाद किया ना? सबसे वृहद व्याख्या तो उन्होंने ही की है भागवतम की। नहीं नहीं बहुत विस्तार से भी नहीं किया है। उनसे बड़ी व्याख्या है कोई? हां हां विश्वनाथ और ठाकुर जी की है। कितनी है? कितनी? सारा अर्थ दर्शनीय टीका है। बहुत विस्तार है। भागवत पर है। अच्छा विश्वनाथ उन्होंने ये माना है कि जीव रूप वाले शिव जी जो होते हैं उनको जीव रूप वाले शिव ब्रह्मा को अगर समान समझेंगे तो वो अपराध है। ये स्वीकार किया
00:37:54:09 है। और जो जीव रूप वाले शिव जी नहीं है उनको अलग समझेंगे तो वो अपराध है। अच्छा एक चीज और आ रही थी शिव जी वाली आप कह रहे हैं कि शिवजी को जो है मत समझो। तो सदा शिव जो है वो तो भगवान है। ही विश्वनाथ जी ऐसा बोल रहे हैं। सदा शिव स्वयं भगवान है। यहां हां तो सदा शिव जी के कई रूप है। तो सदा शिव किस सदा शिव की बात कर रहे हैं? जो परम भूम में है यानी बैकुंठ में जो बिरजा के उस पार जो सदा शिव धाम है। शिव पार्वती सदा शिव धाम मतलब पार्वती वाले जो शिव जी हैं सदा शिव वो मुक्ति दाता हैं। वो मुक्ति कौन से वाले नहीं है? नहीं मुक्ति दाता वही है। एक ही थे शिव और दो शिव कहां से आ गए? नहीं आपने कहा ना कि जो वो वाले जो शिव जी हैं नहीं सुनिए आपने ये कहा ना कि जो शिव और सदा शिव दो हैं दो रूप तो शिव को अगर आप मुक्ति दाता नहीं मानते भगवान नहीं मानते सदा शिव को मानते हैं नहीं शिव जी जो शिव है वो सदा शिव रूप में मुक्ति दाता है ये वही सदा शिविव है वही एक रूप में शिव जी है कैलाश में इस भोम वो जो उनका कार्य वाला जो रूप है जो वैष्णव वाला रूप जो त्रिगुण अवतार है वो अलग है जो परब्य में सदा सदा शिव है शिव पार्वती उस रूप में वो भगवान है भगवान है साक्षात भगवान है उनको अलग समझना वो अपराध है
00:39:09:15 वो साक्षात भगवान है तो ठीक है तो वो आप प्रमाण में दीजिएगा और मैं चाहूंगा कि इस बारे में भी खुल के सामने चीजें आनी चाहिए कि प्रभुपाद जी अगर यह कह रहे हैं कि भैया शिव दुर्गा काली के नाम को कृष्ण के नाम के समान समझना मूर्खता है पाप है पाप नहीं मूर्खता है पाप नहीं मैं कह रहा हूं कि अपराध तो बोला गया पाप नहीं बोला गया तो अपराध तो बोला गया किस चीज को कि शिव दुर्गा काली इनके इनके नामों को समान समझना अपराध है। अपराध है। है ना? और ऐसा करने वाले मूर्ख हैं। तो फिर अब जो नाम है वो तो शिव का ही नाम है ना। जैसे जो नाम है वो तो शिव का ही नाम है ना। उसमें तो कोई ये वाली बात है नहीं कि भाई जो क्या कहते हैं जीव जो शिव पद को प्राप्त कर लिया मैं उसके नाम की बात कर रहा हूं। शिव का नाम तो शिव का ही नाम है। हां शिव उसको एक समझने के बारे में क्यों लिखा हुआ है कि शिव के नाम की बात नहीं कर रहे हैं। शिव जी की बात नहीं वहां शिव के नाम की बात है। शिव के नाम हरे कृष्ण करो या शिव दुर्गा काली के नाम का जप करो। नाम आया है वहां। अंतर है। अंतर क्या है कि भाव का अंतर है। भाव का बहुत बड़ा अंतर है। फिर वही वाली बात है। क्या आप वैष्णव पहले हो या पहले एक जिज्ञासु हो के आओ पहले। भाई कोई भी व्यक्ति जब जन्म लेता है तो ये डंका पीटा जाता है। मैं तो आपके सामने वही पक्ष रखूंगा जो
00:40:24:19 हमारे वैष्णव आचार्य ने दिया है जो उन्होंने माना है जो उन्होंने स्वीकार किया तो मैं आपसे ये पूछ रहा हूं ना ये वाली जो लाइन है ये गलत है कि सही है कि शिव दुर्गा काली को काली के नाम को भगवान कृष्ण के नाम के समान समझना अपराध है ये सही बात है सही बात है तो फिर यहां तो शिव के नाम शिव का ही भेद हो गया ना भेद शिव सुनिए शिव पद को किसी जीव ने प्राप्त किया हो या स्वयं शिव जी आके शिव पद पे बैठे हो ठीक है? उनका नाम तो वही रहेगा ना। नाम तो वही रहेगा। देखो तो शिव के नाम कृष्ण के नाम के ऐसा नहीं होगा क्योंकि जैसे मेरा नाम भी लक्ष्मी नरसिंह है। तो क्या मैं भगवान हो गया? नहीं मैं क्या कह रहा हूं? मैं यही तो कह रहा हूं। भगवान होने की बात नहीं कर रहे। वहां नाम को ही मना कर दिया गया। नाम को मना वो वो जो विषय है वो थोड़ा गहराई से देखने का विषय है वहां पर। क्या विचार दिया और भी डिटेल में आचार्यों ने। लेकिन ठीक है। एक तो आप प्रभुपाद जी का प्रमाण देंगे। हां। एक कौन ऐसा क्यों कर रहा है कि उनका प्रोत्साहन कर रहा है तो इस पे हम लोग खुद बात करेंगे आप संपर्क स्थापित करेंगे और एक जो है ये गहराई का विषय ये वाला जो क्योंकि मैं तो मैं तो आपके सामने वही पक्ष रखा है कि जो हमारे आचार्य बोले हैं बाकी तो उसमें बहुत सारे विचार हो गया ना कि गहराई से
00:41:40:00 हां वो गहराई फिर शोध का विषय है और भी देखने का विषय है वो उसमें क्या और क्या है तो अब आगे बात आती है कि जो श्री राम जी हां और इनको लेकर के भी काफी सारे लोग इस के ही हैं जो भेद करते हैं। बताते हैं कि पूर्णिमा का चांद और यह चांद और वो चांद बहुत सारी बातें करते हैं। भाई वो वो पूर्णिमा में पूरा दिखता है। तो यहां पे जब पूर्णिमा में दिखता है मतलब एक वो है केशवदास जी करके हैं। वो बड़ा बोलते हैं उनका एक वीडियो है। वो बोलते हैं कि जैसे पूर्णिमा में पूरा चांद होता है। और बाकी सारे टाइम पे चांद जो है अधूरा दिखता है। ऐसे ही ये जो राम राम है नरसिंह है ये सब जो है वो पूर्ण नहीं है वो पूर्णिमा का चांद तो श्री कृष्ण है एक एक मिनट तो अब इसमें क्या कर दिया इन्होंने इन्होंने स्वयं ही जो शंकराचार्य जी की शिक्षा है ना उसका ही समर्थन कर दिया वो कैसे किया वो ऐसे किया कि चांद तो हमेशा चांद ही था तुम्हारी दृष्टि भ्रमवश उस चांद को अलग-अलग देख रही है तो भ्रम आ गया ईश्वर के अन्य रूपों को ही सही माया तो समझ समझ लिया ना माया के कारण तो देख लिया ना आपने तो वो खुद ही उनको नहीं पता है कि उन्होंने इस तरीके से शंकराचार्य के सिद्ध अच्छा दूसरी बात यह भी है कि किसी का मन ही लगता है ईश्वर
00:42:55:03 के उसी रूप में जो दूसरा रूप है धनुषधारी वाला किसी का मन ही लगता है ईश्वर के बांसुरी वाले रूप में इसीलिए तो ईश्वर ने इतने सारे रूप लिए तो फिर भी वो कहते हैं कि नहीं राम जी वगैरह जो है ये तो एक्सपेंशन है मैं आपको बता रहा हूं लखनऊ के इस मंदिर के अध्यक्ष के द्वारा गीता सेशन होता है। हर हफ्ते 500 से 600 लोग मुझे लगता है अब ज्यादा जुड़ते होंगे और वहां पर यही शिक्षा दी जा रही है कि राम की राम के नाम का जाप करने पर आपको जो है मुक्ति नहीं मिलेगी। बहुत बड़ा अपराध है। बहुत बड़ा अपराध है। मैं समझ में आऊंगा आपके पास। तो मैं एक बार मुझे किसी मेरे परिचित ने जोड़ दिया था उसमें और मैं हरे कृष्ण महामंत्र का जप करता हूं क्योंकि शंकराचार्य जी ने कहा है कि जिनका दोष हो गया हो यज्ञपति इत्यादि देर से हुआ हो भ्रात संध्या लगी हो वो इस नाम का जप करें महामंत्र का जप करें यद्यपि भगवान की अन्य नामों का जप करने से भी भ्रात दोष से मुक्ति मिलती परंतु गुरु मुख से मैंने वो सुना हरे कृष्णा तो मैं हरे कृष्णा का जप करता हूं हरे कृष्णा हरे राम का तो मैं कर रहा था और मेरे किसी परिचय के कारण मैं उसमें गया था आज आज से पांच छ साल पहले की बात है। तो मैं उसमें जब गया तो मैंने वहां पर अपने भाव बता दिए कि मैं हरे कृष्ण का जो जप करता हूं वो तो मैं राम को देख के करता हूं। कृष्ण को देख के नहीं करता हूं। तो भाई
00:44:10:07 वहां के मंदिर के अध्यक्ष बोल रहे हैं मुझसे क्या बोल रहे हैं? अच्छा तुम ऐसा करते हो तीन महीने बाद देख लेना तुम्हारे साथ क्या होगा? मैंने कहा क्या होगा भाई? राम की भक्ति करने पे एक्सीडेंट हो जाएगा मेरा। तो ये ये थोड़ी सी इस बारे में बताइए। ये तो अज्ञानता है। इस बारे में तो मैं भी यह समझता हूं कि प्रभुपाद जी का पक्ष कुछ और रहा होगा और ये जो मूर्ख लोग हैं ऐसी बातें और उस व्यक्ति ने बोला भी ये महामूर्ख की पराकाष्ठा है ऐसा बोलना ये ऐसे मूर्खों को मंदिर का कार्य वो तो बात का वाद है सिद्धांत पक्ष में आते हैं जब राम और कृष्ण की बात आपने किया राम और कृष्ण में कोई अंतर नहीं है। स्वयं भगवान है। वो परम भगवान है। इसलिए हमारे इस मंदिरों में शीला प्रभुपाद जी ने सीताराम की स्थापना करवाई इस मुंबई दिल्ली और अन्य मंदिरों में यहां तक कि हमारे इस के कई मंदिर रामनवमी के दिन ही उसका उद्घाटन हुआ है। तो भगवान राम स्वयं भगवान है। राम कृष्ण में कोई भी अंतर नहीं है। भगवान के जितने स्वरूप हैं भगवान के जितने नाम हैं उनमें कोई अंतर नहीं है। नाम कार्य बहुदा निज सर्व शक्ति चैतन्य महाप्रभु कहते हैं राम नरसिंह वामन कुर्म ये सब भगवान के नाम है कोई अंतर
00:45:25:08 नहीं है केवल रसगत विचार से अंतर है तत्वगत दृष्टि से इनमें कोई भी भेद नहीं है तो भगवान एक ही दास वगैरह ये जो बोलते हैं ये गलत बोलते गलत है रामकृष्ण में भेद करना ये गलत है वशगत दृष्टि से इसन के जो प्रामाणिक ये ब्रह्मचारी हैं यहां पर निवास भी है इनका वो यह बोल रहे हैं केशवदास जी के लिए है यह बात भेद है तो ये उपासना की दृष्टि से दृष्टि से भेद है और तत्व की दृष्टि से नहीं है ये बात हमारे शास्त्रों में मतलब इस से छपने वाली किताबों में है बिल्कुल है परपाद के ग्रंथों में है कहां पर भगवत गीता में भागवतम में चैतन्य गीता में दो मैं आपको भेजूंगा भगवत गीता में 2.2 में लिखा हुआ है कि विष्णु भगवान नारायण भी स्वयं को भगवान नहीं कह सकते क्योंकि वो पूर्ण ऐश्वर्यवान नहीं है। वह रस की दृष्टि से यह विचार किया गया तत्व कि
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इस्कॉन के हरिहर भेद की सच्चाई क्या है ?
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