1
00:00:01,960 --> 00:00:06,960
[संगीत] सातवा समास कवीश्वर वंदना।

2
00:00:06,960 --> 00:00:11,680
अब मैं कवि ईश्वर की वंदना करता हूं जो शब्द सृष्टि के ईश्वर

3
00:00:11,680 --> 00:00:17,040
बल्कि स्वयं परमेश्वर और वेदों के अवतार हैं।

4
00:00:17,040 --> 00:00:21,040
यह सरस्वती के वास स्थान है अथवा नाना कलाओं के जीवन

5
00:00:21,040 --> 00:00:25,120
हैं। यह सचमुच नाना शब्दों के

6
00:00:25,120 --> 00:00:29,360
भवन है। यह पुरुषार्थ के वैभव है अथवा

7
00:00:29,360 --> 00:00:33,360
जगदीश्वर के महत्व है। देखिए कविश्वर जब कहा जाता है तो

8
00:00:33,360 --> 00:00:37,920
कवि जो शब्द आया है।

9
00:00:37,920 --> 00:00:42,800
है ना? जिसका रामपाल फायदा उठाते हैं। भाई देखो वहां कवि कह दिया गया।

10
00:00:42,800 --> 00:00:46,800
तो वह सर्वज्ञता का द्योतक है। वो शब्द जो है।

11
00:00:46,800 --> 00:00:50,800
तो कबीश्वर तो सर्वज्ञों में भी उनका भी ईश्वर है

12
00:00:50,800 --> 00:00:55,040
ना सर्वज्ञों का। तो यहां उनकी बात हो रही है। यह

13
00:00:55,040 --> 00:00:59,040
पुरुषार्थ के वैभव है अथवा जगदीश्वर के महत्व हैं और

14
00:00:59,040 --> 00:01:03,280
अनेक प्रकार की लीलाओं तथा सत कीर्तियों के

15
00:01:03,280 --> 00:01:07,440
स्तव का निर्माण करने वाले कवि हैं। यह शब्द रत्नों के

16
00:01:07,440 --> 00:01:12,160
सागर अथवा मोतियों के उत्पन्न करने वाले सरोवर

17
00:01:12,160 --> 00:01:16,720
अथवा नाना प्रकार के बुद्धि के आगर हैं। या तो यह अध्यात्म

18
00:01:16,720 --> 00:01:17,280
संबंधी

19
00:01:17,280 --> 00:01:21,600
ग्रंथों की खान या बोलते हुए चिंतामणि है अथवा

20
00:01:21,600 --> 00:01:25,680
श्रोताओं के लिए अनेक कामधेनुओं के दूत की धाराएं हैं।

21
00:01:25,680 --> 00:01:29,840
या तो यह कल्पना के कल्पत्रु हैं या मोक्ष के

22
00:01:29,840 --> 00:01:34,080
मुख्य आधार या सायुज्य मुक्ति का विस्तार करने वाले

23
00:01:34,080 --> 00:01:39,120
और उसी के अनेक रूप हैं।

24
00:01:39,120 --> 00:01:43,280
या तो यह परलोक के स्वयं स्वार्थ या योगियों के गुप्त पंथ

25
00:01:43,280 --> 00:01:47,360
या नाना ज्ञानियों के परमार्थ रूप में प्रकट हुए हैं। या तो

26
00:01:47,360 --> 00:01:51,440
यह निरंजन की पहचान निर्गुण के लक्षण या माया से

27
00:01:51,440 --> 00:01:55,520
भिन्न परम परमात्मा के चिन्ह है। या तो

28
00:01:55,520 --> 00:01:59,600
यह श्रुतियों के भीतरी भाव या परमेश्वर का अलभ्य लाभ

29
00:01:59,600 --> 00:02:04,000
है और या स्वयं आत्मबध इनहीं कवियों

30
00:02:04,000 --> 00:02:09,040
के रूप में प्रकट हुआ है। कवि लोग सचमुक्ष

31
00:02:09,040 --> 00:02:13,680
मोक्ष चाहने वालों के लिए अंजन है।

32
00:02:13,680 --> 00:02:17,680
अब यहां पर जो सकारात्मक काव्य रचनाएं करने

33
00:02:17,680 --> 00:02:22,720
वाले और मुख्य रूप से जो धर्म

34
00:02:22,720 --> 00:02:27,280
से जुड़ी हुई धर्म को प्रोत्साहित करने वाली जो रचनाएं करने वाले कवि हैं उनकी

35
00:02:27,280 --> 00:02:31,280
यहां पर वंदना हो रही है और उसी उन्हीं की वंदना

36
00:02:31,280 --> 00:02:32,400
करते हुए उनकी तुलना

37
00:02:32,400 --> 00:02:36,000
वहां तक जा रही है। कबीश्वर तक

38
00:02:36,000 --> 00:02:40,560
साधकों के साधन और सिद्धों के समाधान है। वह स्वधर्म के आश्रय

39
00:02:40,560 --> 00:02:45,200
मन का मनोजय और धार्मिकों की विनय

40
00:02:45,200 --> 00:02:49,520
तथा उन्हें विनय की शिक्षा देने वाले हैं। वे वैराग्य

41
00:02:49,520 --> 00:02:53,920
के संरक्षण भक्ति के भूषण और नाना स्वधर्मों

42
00:02:53,920 --> 00:02:58,320
के रक्षण हैं। एक तरीके से कवि जो पीछे हमने जो सज्जनों

43
00:02:58,320 --> 00:03:00,640
की

44
00:03:00,640 --> 00:03:04,800
व्याख्या सुनी है ना स्तुति सुनी और

45
00:03:04,800 --> 00:03:09,360
एक और वंदना सुनी थी सद्गुरुओं की स्तुति सुनी थी

46
00:03:09,360 --> 00:03:13,360
है ना सद्गुरु की स्तुति और हमने

47
00:03:13,360 --> 00:03:18,080
स्तुति देखी थी सज्जनों की सद्गुरुओं की श्रोताओं की कविश्वर

48
00:03:18,080 --> 00:03:22,880
तो लगभग आसपास के ही सभी है ये

49
00:03:22,880 --> 00:03:27,280
विनय की शिक्षा देने वाले वैराग्य के संरक्ष लक्षण भक्ति के भूषण और नाना स्वधर्मों

50
00:03:27,280 --> 00:03:32,480
के लक्षण है। वह प्रेमियों की प्रेम स्थिति

51
00:03:32,480 --> 00:03:37,360
ध्यानस्थों की ध्यान मूर्ति और उपासकों की बढ़ती हुई कीर्ति है।

52
00:03:37,360 --> 00:03:41,440
वह अनेक साधनों के मूल और अनेक प्रयत्नों के फल

53
00:03:41,440 --> 00:03:46,240
हैं। और केवल उन्हीं की कृपा से अनेक कार्य सिद्ध हो जाते हैं।

54
00:03:46,240 --> 00:03:48,240
पहले कवि

55
00:03:48,240 --> 00:03:52,240
का वाग विलास होता है और तब कानों में उसका रस प्रविष्ट होता

56
00:03:52,240 --> 00:03:56,400
है। कविता में कवि का ही मत प्रकट होता है। कवि लोग ही विद्वानों

57
00:03:56,400 --> 00:04:00,880
की विद्वता, समर्थकों की सत्ता और विचक्षणों की कुशलता

58
00:04:00,880 --> 00:04:04,880
है। वे सृष्टि के भूषण, लक्ष्मी के श्रृंगार और समस्त सिद्धियों

59
00:04:04,880 --> 00:04:09,040
के निर्धार हैं। वे सभा के मंडन, भाग्य के भूषण

60
00:04:09,040 --> 00:04:13,040
और अनेक तपों के संरक्षण है। वही देवताओं के रूप

61
00:04:13,040 --> 00:04:17,360
बनाते हैं। ऋषियों का महत्व और अनेक शास्त्रों के सामर्थ्य

62
00:04:17,360 --> 00:04:21,840
बतलाते हैं। यदि कवि ना होते तो जगत का उद्धार

63
00:04:21,840 --> 00:04:26,480
किसी प्रकार ना होता। इसलिए कवि समस्त सृष्टि के आधार हैं।

64
00:04:26,480 --> 00:04:31,200
बिना कवियों या कविश्वरों के अनेक प्रकार की विधाओं का ज्ञान

65
00:04:31,200 --> 00:04:35,200
हो ही नहीं सकता। सारी सर्वज्ञता कवियों से ही प्राप्त

66
00:04:35,200 --> 00:04:39,760
होती है। प्राचीन काल में वाल्मीकि और व्यास आदि अनेक कवि हो गए हैं।

67
00:04:39,760 --> 00:04:43,920
जिनसे सब लोगों को विवेक प्राप्त हुआ। पहले काव्यों

68
00:04:43,920 --> 00:04:47,920
की रचना हो चुकी थी। इसलिए पंडितों को विद्वता

69
00:04:47,920 --> 00:04:52,240
और परम योग्यता प्राप्त हुई। पहले जो ऐसे अनेक

70
00:04:52,240 --> 00:04:56,560
बड़े-बड़े कवि हो गए हैं जो इस समय अथवा जो आगे होने

71
00:04:56,560 --> 00:05:01,040
वाला है होने वाले हैं उन सबको मैं नमस्कार

72
00:05:01,040 --> 00:05:03,840
करता हूं। वह सब प्रकार के चातुर्य

73
00:05:03,840 --> 00:05:07,920
की मूर्ति अब देखिए यहां पे सीधे-सीधे उन कवियों

74
00:05:07,920 --> 00:05:12,240
को तो बाहर ही निकाल दीजिए इस लिस्ट से जो धर्म

75
00:05:12,240 --> 00:05:18,240
विरुद्ध होते हैं। यहां केवल उनकी बात हो रही है जो धर्म के पक्षधर है।

76
00:05:20,320 --> 00:05:24,480
और यह बात हमें पता चलती है कि जो मोक्ष सायोज

77
00:05:24,480 --> 00:05:28,720
की मुक्ति के पक्षधर और पीछे जो बातें आई तो

78
00:05:28,720 --> 00:05:32,800
यहां साधारण कवियों से ना लिया जाए जिन कवियों ने धर्म क्षेत्र

79
00:05:32,800 --> 00:05:36,880
में धर्म के पक्ष में अथवा धर्म की व्याख्या करते

80
00:05:36,880 --> 00:05:41,360
हुए अपनी रचनाएं की है उनकी बात हो रही है। वे

81
00:05:41,360 --> 00:05:45,520
परोपकार के अनेक उपाय बतलाते हैं और अंत में सब संशयों का नाश करते

82
00:05:45,520 --> 00:05:49,840
हैं। वह या तो अमृत के मेघ है या नौ रसों के स्त्रोत या अनेक

83
00:05:49,840 --> 00:05:54,800
प्रकार के सुखों के उमड़े हुए सरोवर हैं।

84
00:05:54,800 --> 00:05:58,880
यह अनेक वस्तुओं के विचार से परिपूर्ण विवेक के भंडार

85
00:05:58,880 --> 00:06:02,960
हैं जो मनुष्य के लिए प्रकट हुए हैं। अथवा यह अनेक पदार्थों से कहीं

86
00:06:02,960 --> 00:06:06,960
बढ़कर आदि शक्ति के धरोहर हैं। जो पूर्व संचित भाग्य

87
00:06:06,960 --> 00:06:10,960
से प्राप्त हुए हैं।

88
00:06:10,960 --> 00:06:15,200
अथवा यह अनेक पदार्थों से कहीं बढ़कर या

89
00:06:15,200 --> 00:06:18,880
यह अक्षय आनंद से भरी हुई सुखों की नौकाएं

90
00:06:18,880 --> 00:06:23,360
हैं जो नाना प्रयोगों के लिए सांसारिक लोगों के

91
00:06:23,360 --> 00:06:25,920
अ

92
00:06:25,920 --> 00:06:31,920
सांसारिक

93
00:06:35,520 --> 00:06:39,520
के काम में आ रही है। यह निरंजन की संपत्ति है या

94
00:06:39,520 --> 00:06:43,680
विराट की योग्य स्तुति है या भक्ति की फल

95
00:06:43,680 --> 00:06:47,840
श्रुति इनके रूप में फलवती हुई है या यह ईश्वर की ऐसी स्तुति

96
00:06:47,840 --> 00:06:51,840
है जो आकाश से भी बढ़कर है क्योंकि कवियों की

97
00:06:51,840 --> 00:06:55,840
प्रबंध रचना ब्रह्मांड से भी बड़ी होती है। अब इस विषय

98
00:06:55,840 --> 00:06:59,840
को यहीं समाप्त करता हूं। कवीश्वर लोक जगत के आधार हैं। इसलिए

99
00:06:59,840 --> 00:07:04,480
उन्हें मेरा साष्टांग नमस्कार है।

100
00:07:04,480 --> 00:07:08,480
तो आठवां समास आ गया है। अब इसमें सभा की

101
00:07:08,480 --> 00:07:12,960
वंदना हो रही है। आवाज नहीं आ रही। म्यूट है आपका।

102
00:07:12,960 --> 00:07:18,240
आठवें समास पर आ गए हैं। सभा वंदना है। उसमें

103
00:07:18,240 --> 00:07:24,240
आगे मूर्ख के लक्षण भी है। वो भी पढ़ने में आनंद आएगा।

104
00:07:24,240 --> 00:07:28,240
अब मैं सकल सभा की वंदना करता हूं जिससे मुक्ति सुलभ

105
00:07:28,240 --> 00:07:33,120
है जिसमें जगदीश्वर स्वयं उपस्थित रहता है। कहा है

106
00:07:33,120 --> 00:07:34,000
नाहम

107
00:07:34,000 --> 00:07:38,960
वसामि वैुंठे योगिनाम हृदय रव

108
00:07:38,960 --> 00:07:43,280
मद भक्ता यत्र गायती तत्र निष्ठामि नारद अर्थात

109
00:07:43,280 --> 00:07:47,280
भगवान कहते हैं कि ना तो मैं वैुंठ में ही रहता हूं

110
00:07:47,280 --> 00:07:51,600
ना योगियों के हृदय में ही हे नारद जहां मेरे भक्त लोग गान

111
00:07:51,600 --> 00:07:55,760
करते हैं मैं वहीं रहता हूं। इसलिए वही सभा और श्रेष्ठ

112
00:07:55,760 --> 00:07:59,760
बैकुंठ है जिसमें भक्त लोग गान करते हैं।

113
00:07:59,760 --> 00:08:00,400
जिसमें

114
00:08:00,400 --> 00:08:04,400
ईश्वर के नाम का घोष और जय जयकार की गर्जना होती

115
00:08:04,400 --> 00:08:08,480
है। जहां निरंतर प्रेमी भक्तों के गायन

116
00:08:08,480 --> 00:08:12,560
भगवत कथा और वेदों आख्यानों तथा

117
00:08:12,560 --> 00:08:17,760
पुराणों का श्रवण होता रहता है। जहां परमेश्वर का गुणानुवाद

118
00:08:17,760 --> 00:08:21,120
या अनेक निरूपणों की बातचीत होती है।

119
00:08:21,120 --> 00:08:25,200
अब इससे मैं आप लोगों को एक बात स्मरण में आ रही

120
00:08:25,200 --> 00:08:31,200
तो मैं बताता चलूं कि कई बार क्या होता है कि

121
00:08:32,720 --> 00:08:36,720
यह बताने के लिए कि मैं माला जपने से नहीं

122
00:08:36,720 --> 00:08:41,920
मिलूंगा या मैं वेद अध्ययन करने से नहीं मिलूंगा।

123
00:08:41,920 --> 00:08:46,160
मतलब ईश्वर नहीं मिलेंगे या फिर मोक्ष नहीं मिलेगा

124
00:08:46,160 --> 00:08:50,320
या फिर फलाना कार्य कर लेने से नहीं मिलेगा।

125
00:08:50,320 --> 00:08:54,320
तो कैसे मिलेगा कि अमुक कार्य करने से मिलेगा। इस तरह की पंक्तियां आपने कई

126
00:08:54,320 --> 00:08:58,640
बार देखी होंगी और इस प्रकार की पंक्तियों का ही फायदा उठाते

127
00:08:58,640 --> 00:09:03,280
हैं जो छ भेषधारी हिंदू होते हैं कि भाई देखो यहां पे तुम्हारे द्वारा चयनित

128
00:09:03,280 --> 00:09:07,680
इस सिद्धांत का खंडन हो रहा है हम कि भैया वो जो है

129
00:09:07,680 --> 00:09:11,760
माला जपने से नहीं मिलेंगे योगियों से नहीं मिलेंगे ज्ञानियों से नहीं मिलेंगे

130
00:09:11,760 --> 00:09:15,840
या फिर जो भी जिस भी बात का उन्हें खंडन करना होगा वो इस तरीके

131
00:09:15,840 --> 00:09:20,080
से करने का प्रयास करते हैं रामपाल के द्वारा

132
00:09:20,080 --> 00:09:24,800
भी देखो या फिर स्कॉन के द्वारा भी देखिए जो वर्णाश्रम विरोधी तंत्र है

133
00:09:24,800 --> 00:09:28,880
इनके द्वारा यह समझाया जाता है अगर हम कहेंगे कि

134
00:09:28,880 --> 00:09:31,440
भाई

135
00:09:31,440 --> 00:09:35,520
वर्ण व्यवस्था ऐसी है या वर्ण व्यवस्था के अनुसार ऐसा होना

136
00:09:35,520 --> 00:09:36,320
चाहिए

137
00:09:36,320 --> 00:09:40,480
तो इनकी ओर से एक बहुत कमजोर स्तर के तर्क आते हैं। वो क्या होते हैं?

138
00:09:40,480 --> 00:09:44,560
कहते हैं कि अह अरे आजकल

139
00:09:44,560 --> 00:09:48,560
के ब्राह्मण तो मांस मछली खा रहे हैं। अरे भाई आजकल के ब्राह्मण

140
00:09:48,560 --> 00:09:52,560
ही नहीं बाकी के अन्य समुदाय से आने

141
00:09:52,560 --> 00:09:56,640
वाले लोग भी ऐसे कार्य कर रहे हैं जो उन्हें नहीं करने

142
00:09:56,640 --> 00:10:00,720
चाहिए। तो इसका अर्थ यह थोड़ी ना है कि हम सिस्टम से

143
00:10:00,720 --> 00:10:04,720
चलने का प्रयास छोड़ दें। आजकल रोड में एक्सीडेंट हो रहे हैं।

144
00:10:04,720 --> 00:10:09,040
तो इसका मतलब सब लोग लेफ्ट की जगह राइट चलना छोड़ दें। क्योंकि लेफ्ट से चलने

145
00:10:09,040 --> 00:10:13,040
वाले का एक्सीडेंट हो गया। तो यह कितना बड़ा कुतर्क होता

146
00:10:13,040 --> 00:10:17,520
है। लेफ्ट से चलने वाले का अगर एक्सीडेंट हो गया,

147
00:10:17,520 --> 00:10:21,680
गाड़ी पलट गई चार टप्पे खा के हाईवे पर तो अब जो है हम

148
00:10:21,680 --> 00:10:25,760
यह बात कहने के अधिकारी नहीं रह गए कि भैया यू शुड ड्राइव ऑन

149
00:10:25,760 --> 00:10:30,240
द लेफ्ट साइड ऑफ द रोड। है ना? हमें

150
00:10:30,240 --> 00:10:34,240
रोड के लेफ्ट साइड में गाड़ी चलानी चाहिए। ये नियम वो खारिज हो गया।

151
00:10:34,240 --> 00:10:38,240
अब जिसका जो मन आएगा वह वहां चलाए क्योंकि एक गाड़ी पलट गई है

152
00:10:38,240 --> 00:10:42,400
जो लेफ्ट साइड पर ड्राइव की जा रही थी। अच्छा जो गाड़ी

153
00:10:42,400 --> 00:10:46,640
लेफ्ट साइड पर ड्राइव हो रही थी उसका एक्सीडेंट यदि हो गया है तो क्या राइट साइड में रॉन्ग

154
00:10:46,640 --> 00:10:50,800
साइड में चलने वाले का एक्सीडेंट नहीं हुआ है क्या? तो उसी प्रकार से

155
00:10:50,800 --> 00:10:51,680
यदि किसी ब्राह्मण

156
00:10:51,680 --> 00:10:55,680
ने कोई गलती कर दी है तो उसके कारण से जो सिस्टम है उसी को ही

157
00:10:55,680 --> 00:11:00,400
नकार दो और फिर जिसका जो मना है वह करो।

158
00:11:00,400 --> 00:11:04,400
आप अपनी चीज को सही सिद्ध करने की बजाय जो

159
00:11:04,400 --> 00:11:08,480
चीज सिस्टम के अकॉर्डिंगली बताई जा रही है। केवल उस पर

160
00:11:08,480 --> 00:11:12,480
आक्षेप लगा रहे हो और उसके कारण उस पूरे के पूरे सिस्टम का

161
00:11:12,480 --> 00:11:16,480
गलत होना भी सिद्ध नहीं होता। क्या संसार में एक भी ब्राह्मण

162
00:11:16,480 --> 00:11:20,640
नहीं है जो मांस मछली ना खा रहा हो। और जब तक है तब तक आप

163
00:11:20,640 --> 00:11:24,640
यह बात कैसे कह सकते हैं? वो ब्राह्मण गलत है जो ऐसा कर रहा है।

164
00:11:24,640 --> 00:11:28,880
अनाधिकृत रूप से और जो है मर्यादाओं का अतिक्रमण करते हुए और

165
00:11:28,880 --> 00:11:33,200
सेवन कर रहा है। निषेध पदार्थों का

166
00:11:33,200 --> 00:11:38,480
तो यह इस तरह के कुतर्क लाते हैं और यह कुतर्क होते हैं। इसको अगर

167
00:11:38,480 --> 00:11:42,480
इंग्लिश में देख जाए तो इसे

168
00:11:42,480 --> 00:11:47,280
कहते हैं इमोशनल कार्ड एक तो विक्टिम कार्ड होता है

169
00:11:47,280 --> 00:11:51,520
और एक होता है इमोशनल कार्ड। इमोशनल कार्ड क्या होता है?

170
00:11:51,520 --> 00:11:55,920
ओशो और यह जो तथाकथित स्वषित आचार्य

171
00:11:55,920 --> 00:12:00,080
प्रशांत और

172
00:12:00,080 --> 00:12:04,160
आजकल ये लोग भी आर्य समाझी भी इसी तरीके से अरे उन लोगों ने

173
00:12:04,160 --> 00:12:06,800
तुमको जो है गायत्री मंत्र नहीं पढ़ने दिया।

174
00:12:06,800 --> 00:12:10,960
ओशो भी इस तरह की बातें आवाज साउंड करेगा और तुम्हारा यह प्रशांत

175
00:12:10,960 --> 00:12:15,040
भी इसी तरीके इसी तरीके की जो नाजुक स्थितियां होती हैं जहां

176
00:12:15,040 --> 00:12:19,200
पर व्यक्ति तुरंत आपसे जुड़ सकता है। ऐसे उसके इमोशंस को कुरेदने

177
00:12:19,200 --> 00:12:23,200
का प्रयास किया जाता है। बात को व्यवस्थित रूप से अगर करने को

178
00:12:23,200 --> 00:12:27,360
करने को बैठ जाए ना हां भैया बताइए इस बात का क्या पैरामीटर है आपने

179
00:12:27,360 --> 00:12:29,920
जो कहा है

180
00:12:29,920 --> 00:12:34,080
बस केवल बोल दो इमोशंस इमोशनल वाली बात अरे वो तुम्हें

181
00:12:34,080 --> 00:12:38,320
ध्वज वहां प्रवेश नहीं करने देते अरे

182
00:12:38,320 --> 00:12:42,480
भैया बहुत सी जगह बहुत से लोगों को प्रवेश नहीं करने देते मैं अपने घर के

183
00:12:42,480 --> 00:12:46,640
लोगों का इलाज कराने हॉस्पिटल जाता हूं मुझे रोक दिया जाता है आप बाहर रहिए

184
00:12:46,640 --> 00:12:50,800
यह पेशेंट अंदर जाएगा तो वहां मैं हो गया नीच वहां

185
00:12:50,800 --> 00:12:55,360
मेरे इमोशन इमोशनल कार्ड को नहीं छेड़ा जाता। तो कहीं पर भी आप इमोशनल

186
00:12:55,360 --> 00:12:59,360
वाली बातें और थोड़ा सा उसमें अभिनय डालते हुए और लोगों के इमोशंस

187
00:12:59,360 --> 00:13:03,440
को छूकर और जो है उनका समर्थन प्राप्त कर लो। क्योंकि लोग तो

188
00:13:03,440 --> 00:13:07,600
बिल्कुल बिना सोचे समझे बैठे हुए हैं। अपना खाली करके

189
00:13:07,600 --> 00:13:12,960
ऊपर वाला माला और किसी ने जैसे ही इमोशनल कार्ड

190
00:13:12,960 --> 00:13:17,040
फेंके तो आ यह तो मेरे हृदय की बात

191
00:13:17,040 --> 00:13:21,200
कर रहा है। हां। जो

192
00:13:21,200 --> 00:13:21,840
मीनाक्षी

193
00:13:21,840 --> 00:13:26,640
हरावत नाम है वह भी इसी तरीके से करती है और मीनाक्षी हरावत

194
00:13:26,640 --> 00:13:31,520
यह अभी बात देखी आपने कट्टर मनुवादी

195
00:13:31,520 --> 00:13:35,840
करपात्री जी महाराज के कृपा पात्र शिष्य का पुत्र भी और शिष्य

196
00:13:35,840 --> 00:13:40,640
भी अब उसने वो जो दंड क्रम से

197
00:13:40,640 --> 00:13:44,960
वेद पाठ किया नवयुवक ने

198
00:13:44,960 --> 00:13:49,040
और उनके द्वारा वेद पाठ किए जाने पर अब

199
00:13:49,040 --> 00:13:53,200
खूब तालियां पीट रहे हैं। क्यों? क्योंकि क्या कहते हैं?

200
00:13:53,200 --> 00:13:57,360
समुद्र की लहरों के साथ अगर नहीं तैरेंगे तो डूब जाएंगे। लहरों को चीर

201
00:13:57,360 --> 00:14:01,440
कर तैरने का तो साहस है नहीं। हां बहती

202
00:14:01,440 --> 00:14:06,160
है। हां। तो भाई इसका विरोध कैसे करें? वो वही है।

203
00:14:06,160 --> 00:14:10,720
आप उससे पूछो मीनाक्षी जी जाकर के। देवव्रत

204
00:14:10,720 --> 00:14:14,560
नाम है ना उनका?

205
00:14:14,560 --> 00:14:20,560
देवव्रत नाम है ना जिनोंने दंड क्रम से पयण किया है। जी भैया भैया

206
00:14:21,360 --> 00:14:26,320
खेरे देवत नहीं नहीं रेखे नाम है भैया रेखे

207
00:14:26,320 --> 00:14:30,400
देवव्रत रे तो अबो

208
00:14:30,400 --> 00:14:34,400
उनसे जाके पूछो मीनाक्षी जी उनकी उनका

209
00:14:34,400 --> 00:14:38,560
महिमा मंडन करने से पहले अपने ऑफिशियल पेजेस पर उनसे जाकर

210
00:14:38,560 --> 00:14:43,200
पूछो मीनाक्षी जी कि क्या स्त्रियां गायत्री मंत्र पढ़ सकती हैं

211
00:14:43,200 --> 00:14:48,320
और यदि वो कहते कि नहीं पढ़ सकती तो जाकर माइक पर चिल्लाओ

212
00:14:48,320 --> 00:14:52,320
उनका महिमा मंडन करना बंद करो, ढोंग करना बंद करो और वही करो

213
00:14:52,320 --> 00:14:56,320
जो शंकराचार्यों के साथ किया था। शंकराचार्यों के लिए बोले थे

214
00:14:56,320 --> 00:15:00,320
ना। अरे तुम्हें गायत्री मंत्र नहीं पढ़ने देते तो बोलो इसके लिए

215
00:15:00,320 --> 00:15:04,640
भी दंड कर्म पयण वाला महिमा

216
00:15:04,640 --> 00:15:08,720
बंद करो इनका। अरे भैया तुम अपनी एक बात के क्यों नहीं रहते हो? सबसे बड़ी

217
00:15:08,720 --> 00:15:12,880
बात तो यही है ना। अधर्म की एक पहचान होती है।

218
00:15:12,880 --> 00:15:16,880
वह हर अगले कदम पर अपने ही सिद्धांत का खंडन करता है।

219
00:15:16,880 --> 00:15:22,000
अपने ही सिद्धांत का गला घोट देता है। जैसे

220
00:15:22,000 --> 00:15:26,160
समाज एक बात कहता है कि जो आत्मा है वो एक देश है।

221
00:15:26,160 --> 00:15:29,680
बहुत से वो कहते हैं दर्शन आत्मा जो है वो एक

222
00:15:29,680 --> 00:15:33,840
देश है। अब उनसे पूछा जाए कि भैया आत्मा एक

223
00:15:33,840 --> 00:15:38,240
देश है तो क्या ऐसा हो सकता है कि नहीं हो सकता है कि

224
00:15:38,240 --> 00:15:42,960
भारत में किसी की मृत्यु हुई और उसी जीवात्मा ने तुरंत

225
00:15:42,960 --> 00:15:47,840
एक दो सेकंड में ही अमेरिका में जन्म ले लिया

226
00:15:47,840 --> 00:15:53,040
मतलब यहां मृत्यु हुई शरीर छोड़ा और वहां जन्म ले लिया कैसे लिया

227
00:15:53,040 --> 00:15:57,040
वो तो सर्वज्ञ है नहीं टाइम लगेगा भैया उसे पहुंचने में और

228
00:15:57,040 --> 00:16:02,080
भी मतलब यहां शरीर छोड़ा वहां जन्म हुआ बिल्कुल भी अंतर नहीं

229
00:16:02,080 --> 00:16:06,160
अगले ही क्षण वो जो कतरा होगा ना उसमें तो ले सकती है कि

230
00:16:06,160 --> 00:16:10,720
नहीं ले तो सकती है तो ले सकती है तो सर्वज्ञ के फिर

231
00:16:10,720 --> 00:16:14,720
कैसे लिया उसने यहां शरीर छोड़ा वहां शरीर

232
00:16:14,720 --> 00:16:18,960
प्राप्त किया कैसे कर लिया तो फिर वहां पर वो

233
00:16:18,960 --> 00:16:23,040
डायमेंशंस में आ जाएंगे फिर ये डायमेंशन जो है अविद्या युक्त हो जाएगी

234
00:16:23,040 --> 00:16:27,120
मानना पड़ेगा ना कोई मुक्ति का द्वार तो खुलता नहीं है कहीं कोई

235
00:16:27,120 --> 00:16:31,200
गेट तो है नहीं जिसमें प्रवेश करके वो जो अवेंजर्स वाले द्वार है

236
00:16:31,200 --> 00:16:35,280
इधर से उधर आने जाने वाले वो सब तो है नहीं ये गेट खुलता है कहीं पर है तो

237
00:16:35,280 --> 00:16:39,600
बता दो कितने किलोमीटर पर गेट है तो ये

238
00:16:39,600 --> 00:16:44,240
खुद की बातें खुद ही तोड़ते रहते हैं एक जो है सच्चिदानंद

239
00:16:44,240 --> 00:16:45,360
स्वामी जी

240
00:16:45,360 --> 00:16:48,800
वो बोलेंगे कि नहीं भैया

241
00:16:48,800 --> 00:16:53,280
जो हमारा जो समय है वो लीनियर

242
00:16:53,280 --> 00:16:57,360
लीनियर नहीं है वो जो है वो सर्कुलर है मानेंगे इस बात को

243
00:16:57,360 --> 00:17:01,520
फिर वहीं पर दूसरी और एक सज्जन वो आएंगे भारद्वाज

244
00:17:01,520 --> 00:17:05,840
योगेश भारद्वाज योगेश भारद्वाज ये बताएंगे कि हमारा जो कालक्रम

245
00:17:05,840 --> 00:17:09,840
है वो लीनियर नहीं है वो सर्कुलर है ठीक है भाई बात

246
00:17:09,840 --> 00:17:13,920
बिल्कुल सही है सर्कुलर है उसमें भी वो अपना कुछ कह रहे होंगे फिर वो

247
00:17:13,920 --> 00:17:17,920
सच्चिदानंद स्वामी आएंगे बताएंगे कि वेद में जो नाम पहले

248
00:17:17,920 --> 00:17:22,800
से वर्णित है उनके आधार पर नाम राम और कृष्ण रखते हैं।

249
00:17:22,800 --> 00:17:26,960
मगर नाम वेद के आधार पर रखने के कारण यह नहीं मानना

250
00:17:26,960 --> 00:17:30,960
चाहिए कि इन्हीं लोगों का नाम वेद में है। अरे भैया वहां पर भी लीनियर

251
00:17:30,960 --> 00:17:35,360
टाइम क्यों देख रहे हो? राम और कृष्ण भी तो वेद से पहले हो सकते हैं।

252
00:17:35,360 --> 00:17:39,600
वेद के प्राकट्य से पहले हो सकते हैं। राम और कृष्ण लीनियर

253
00:17:39,600 --> 00:17:43,600
नहीं है ना। सर्कुलर है ना? तो इन लोगों के आपस

254
00:17:43,600 --> 00:17:49,120
में ही एक दूसरे के ध्यान नहीं देते और खंडन चला करता है। खैर

255
00:17:49,120 --> 00:17:53,360
इस बात का ध्यान रखें कि यदि लेफ्ट में

256
00:17:53,360 --> 00:17:57,440
गाड़ी चलाने वाला कोई व्यक्ति किसी का एक्सीडेंट

257
00:17:57,440 --> 00:18:00,560
हो जाता है तो उससे रॉन्ग

258
00:18:00,560 --> 00:18:04,640
साइड गाड़ी चलाना सही सिद्ध नहीं होता है। और

259
00:18:04,640 --> 00:18:08,800
पूरी की पूरी लेफ्ट में चलाई जाने वाली जो व्यवस्था है उसको खत्म

260
00:18:08,800 --> 00:18:13,120
नहीं कर दिया जाता है। तो इसी तरीके से यदि कोई ब्राह्मण

261
00:18:13,120 --> 00:18:17,360
मांस, मछली, मदिरा का सेवन कर रहा है तो वह ब्राह्मण गलत है।

262
00:18:17,360 --> 00:18:21,920
ब्राह्मणों का यज्ञ पवित्र संस्कार होना या फिर उन्हें वेदाधिकार होना

263
00:18:21,920 --> 00:18:26,240
या ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य को वेदाधिकार होना वो पूरा का पूरा जो सिस्टम

264
00:18:26,240 --> 00:18:30,320
है उसको नहीं नकारा जा सकता और उसको जैसे ही नकारोगे तो

265
00:18:30,320 --> 00:18:34,480
आपको वैकल्पिक सिस्टम तैयार करना पड़ेगा जो कि काफी

266
00:18:34,480 --> 00:18:38,640
विकृत होगा। जब आप वैकल्पिक खड़े करोगे वैकल्पिक

267
00:18:38,640 --> 00:18:44,000
ब्राह्मण वैकल्पिक क्षत्रिय जैसे कि पुलिस डिपार्टमेंट आर्मी

268
00:18:44,000 --> 00:18:48,160
है ना ये सब वैकल्पिक क्षत्रिय हो गए

269
00:18:48,160 --> 00:18:52,560
टीचिंग डिपार्टमेंट तो इनके अंदर जो जन्मज जातीय

270
00:18:52,560 --> 00:18:57,040
निष्ठा होनी चाहिए ना अपने दायित्व के प्रति कर्तव्यों के प्रति

271
00:18:57,040 --> 00:19:01,040
वो जन्मजातीय निष्ठा अपेक्षा कहीं

272
00:19:01,040 --> 00:19:05,040
कठिन होगी डालना जो कि जन्म जाती है जब आप ब्राह्मण

273
00:19:05,040 --> 00:19:09,280
पकड़ोगे जन्म जाती है

274
00:19:09,280 --> 00:19:13,360
किसी के यहां से आवाज आ रही है बंद कर ठीक है

275
00:19:13,360 --> 00:19:18,160
म्यूट कर दिया जी

276
00:19:18,160 --> 00:19:20,880
अ

277
00:19:20,880 --> 00:19:26,880
भैया कंटिन्यू करें जी

278
00:19:28,160 --> 00:19:28,720
जिसमें

279
00:19:28,720 --> 00:19:33,680
प्रेमी और भावुक भक्त गंभीर और सात्विक सभ्य रम्य

280
00:19:33,680 --> 00:19:38,800
रसाल गायक निष्ठावान कर्मशील आचारशील दानशील

281
00:19:38,800 --> 00:19:42,800
धर्मशील पवित्र और पुण्यशील शुद्ध

282
00:19:42,800 --> 00:19:46,960
हृदय वाले कृपालु योगी वीतरागी उदास

283
00:19:46,960 --> 00:19:51,440
नियम से रहने वाले मुद्रा धारी बाल ब्रह्मचारी योगीश्वर

284
00:19:51,440 --> 00:19:56,240
पुर चरण और तपस्या करने वाले तीर्थवासी

285
00:19:56,240 --> 00:20:00,400
मनस्वी महायोगी और लोक सेवक जनता के

286
00:20:00,400 --> 00:20:04,720
अनुसार चलने वाले सिद्ध साधु और साधक मंत्र

287
00:20:04,720 --> 00:20:09,200
यंत्र शोधक एकनिष्ठ उपासक गुण ग्राही ही संत

288
00:20:09,200 --> 00:20:13,280
सज्जन विद्वान वेदज्ञ शास्त्रज्ञ महात्मा

289
00:20:13,280 --> 00:20:17,760
प्रबुद्ध सर्वज्ञ समाधान और शुद्धि करने वाले

290
00:20:17,760 --> 00:20:18,260
आप

291
00:20:18,000 --> 00:20:22,080
सबकी बाई हो रही है भाई यहां पर सभा के

292
00:20:22,080 --> 00:20:26,160
लोगों की

293
00:20:26,160 --> 00:20:30,240
शुद्धि करने वाले योगी विद्वान ऋषि ईश्वर अब

294
00:20:30,240 --> 00:20:34,400
ये सारी संज्ञाएं सबके लिए नहीं है जिसप जो सूट कर रहा हो वो ले ले अपने

295
00:20:34,400 --> 00:20:38,400
हिसाब से भैया वो शेयर कर सकते हैं जो साथ ग्रंथ

296
00:20:38,400 --> 00:20:42,400
है उसका। हां वो आप कर लीजिए। वैसे भी मेरा तो छोटा ही दिख रहा है स्क्रीन

297
00:20:42,400 --> 00:20:46,720
वो शेयर कर लीजिए। योग ज्ञानी उदासी पंडित

298
00:20:46,720 --> 00:20:51,360
पौराणिक विद्वान वैदिक भट्ट पाठक यजुर्वेदी

299
00:20:51,360 --> 00:20:56,000
उत्तम और बड़े श्रोत्रीय याज्ञ

300
00:20:56,000 --> 00:21:00,240
अग्निहोत्री वैद्य और पंचाक्षरी परोपकारी

301
00:21:00,240 --> 00:21:05,360
भूत भविष्य तथा वर्तमान तीन तीनों कालों का ज्ञान रखने वाले बहुश्रुत

302
00:21:05,360 --> 00:21:11,360
निरभिमान निरपेक्ष शांति दया और क्षमाशील

303
00:21:11,520 --> 00:21:16,080
पवित्र तथा सत्वशील शुद्ध हृदय वाले

304
00:21:16,080 --> 00:21:20,480
ज्ञानशील और ईश्वर पुरुष आदि सभा नायक उपस्थित

305
00:21:20,480 --> 00:21:24,800
हैं। जिनमें नित्य और अनित्य का विवेक है।

306
00:21:24,800 --> 00:21:29,280
उस सभा की अलौकिक महिमा का वर्णन कैसे हो सकता है? जहां परमार्थी

307
00:21:29,280 --> 00:21:33,440
लोगों के द्वारा कथा श्रवण के उपाय होते रहते हैं। वहां

308
00:21:33,440 --> 00:21:37,680
लोगों के तरण का उपाय सहज ही हो जाता है। जहां उत्तम गुणियों

309
00:21:37,680 --> 00:21:41,920
की मंडली है। जहां सत्य और धैर्य आदि उत्तम गुण

310
00:21:41,920 --> 00:21:45,920
वाले लोग रहते हैं। और जहां सदा सुख

311
00:21:45,920 --> 00:21:50,080
ही सुख रहता है। जहां विद्या पात्र कला पात्र

312
00:21:50,080 --> 00:21:54,400
विशेष गुणों के सत्पात्र भगवान के प्रति भगवान

313
00:21:54,400 --> 00:21:58,800
के प्रीति पात्र एकत्र होते हैं। जहां प्रवृत्ति वाले और निवृत्ति

314
00:21:58,800 --> 00:22:02,400
वाले प्रपंची और परमार्थी गृहस्थ और वानप्रस्थ,

315
00:22:02,400 --> 00:22:06,560
सन्यासी, वृद्ध, तरुण और बालक, पुरुष और स्त्रियां

316
00:22:06,560 --> 00:22:10,960
अब यह सभा हो गई कहां की? जो गुरुदेव की सभा होती है।

317
00:22:10,960 --> 00:22:15,120
उस सभा की बात हो रही है। अब हमारे लेवल से ऊपर निकल चुका है ये।

318
00:22:15,120 --> 00:22:19,360
ठीक है? तो, अपने ऊपर लागू ना करें। इन उपाधियों

319
00:22:19,360 --> 00:22:23,360
को। तरुण और बालक, पुरुष और स्त्रियां सभी

320
00:22:23,360 --> 00:22:27,440
मिलकर अखंड रूप से अंतर्यामी भगवान का ध्यान करते हैं। यह जो

321
00:22:27,440 --> 00:22:31,440
सब परमेश्वर के भक्त हैं और जिनसे अकस्मात समाधान

322
00:22:31,440 --> 00:22:35,040
होता है उन सबका मैं अभिवंदन करता हूं।

323
00:22:35,040 --> 00:22:39,440
वैसे एक तरीके से कर भी सकते हैं। जब हम

324
00:22:39,440 --> 00:22:43,440
गुरुदेव को यही उपस्थित माने क्योंकि हम उनके सिद्धांतों की

325
00:22:43,440 --> 00:22:47,920
सीमा में ही बात करें तो उस हिसाब से गुरुदेव यहां उपस्थित माने जाएं

326
00:22:47,920 --> 00:22:52,080
और तब ये उनकी सभा ऐसी हो सकती है जहां इतने इस

327
00:22:52,080 --> 00:22:56,160
स्तर के लोग भी उपलब्ध हो। उन सबका

328
00:22:56,160 --> 00:22:56,960
मैं अभिनंदन

329
00:22:56,960 --> 00:23:00,960
करता हूं। उस सभा को मेरा नमस्कार है जिसमें नित्य और निरंतर

330
00:23:00,960 --> 00:23:05,120
भगवान का कीर्तन होता है। अनेक ग्रंथों में बड़े लोगों ने कहा

331
00:23:05,120 --> 00:23:09,600
है कि जहां भगवान की मूर्ति होती है वहीं उत्तम गति मिलती है।

332
00:23:09,600 --> 00:23:13,680
कलयुग में कीर्तन ही सबसे बढ़कर होता है और जहां वह कीर्तन हो वही

333
00:23:13,680 --> 00:23:18,080
सभा श्रेष्ठ है। वहां कथा सुनने से

334
00:23:18,080 --> 00:23:20,640
अनेक प्रकार के कष्ट और संदेह नष्ट होते

335
00:23:20,640 --> 00:23:25,360
हैं। तो थोड़ा सा कीर्तन कर लेते हैं। कीर्तन की बात आ गई तो

336
00:23:25,360 --> 00:23:31,200
हां आप लोग दोहराइएगा माइक म्यूट हो तो अनम्यूट कर दीजिए

337
00:23:31,200 --> 00:23:36,800
श्री राम जय राम जय जय राम

338
00:23:36,800 --> 00:23:40,960
श्री राम जय जय राम जय

339
00:23:40,960 --> 00:23:45,520
राम श्री राम जय श्री राम जय जय

340
00:23:45,520 --> 00:23:48,000
राम

341
00:23:48,000 --> 00:23:53,040
श्री राम राम जय राम

342
00:23:53,040 --> 00:23:58,480
श्री राम जय राम जय जय राम

343
00:23:58,480 --> 00:24:02,960
श्री राम जय जय राम जय

344
00:24:02,960 --> 00:24:08,640
राम श्री राम जय राम जय जय राम

345
00:24:08,640 --> 00:24:14,080
श्री राम जय जय राम जय जय राम

346
00:24:14,080 --> 00:24:19,360
श्री राम जय राम जय जय राम

347
00:24:19,360 --> 00:24:25,360
श्री राम जय श्री राम

348
00:24:27,920 --> 00:24:31,920
मैं सच कहूं तो मैं भावुक हो जाता हूं कभी-कभी

349
00:24:31,920 --> 00:24:36,000
भगवान श्री राम का ध्यान करने का जब मुझे अवसर प्राप्त होता है

350
00:24:36,000 --> 00:24:40,080
क्योंकि जब मेरे पास दायित्व कम थे तो मुझे

351
00:24:40,080 --> 00:24:44,400
ज्यादा समय मिल जाता था भगवान का ध्यान करने का या भगवान की भक्ति

352
00:24:44,400 --> 00:24:48,560
करने का भजन करने का और दायित्व इतने ज्यादा

353
00:24:48,560 --> 00:24:52,720
बढ़ते चले जा रहे हैं कि इतने फुर्सत

354
00:24:52,720 --> 00:24:56,720
नहीं मिल पाती है कि कर सके। मगर फिर

355
00:24:56,720 --> 00:25:01,360
गुरुदेव की एक बात याद आती है कि

356
00:25:01,360 --> 00:25:05,360
संक्रमण काल में समाधि नहीं होती। ऐसी कोई बात है ना गुरुदेव ने

357
00:25:05,360 --> 00:25:09,920
कही थी जो वो फिर याद आ जाती है। कि भाई

358
00:25:09,920 --> 00:25:15,360
जब युद्ध की स्थिति हो तब समाधि समाधि वालों को भी उठकर के आ जाना चाहिए।

359
00:25:15,360 --> 00:25:19,360
खैर अराजकता की स्थिति में समाधि शोभा नहीं

360
00:25:19,360 --> 00:25:23,440
देती। हां अराजकता की स्थिति में समाधि शोभा

361
00:25:23,440 --> 00:25:27,600
नहीं देती। भैया आपकी लय बहुत अच्छी थी। दो बार दो चार बार और

362
00:25:27,600 --> 00:25:31,600
कर दीजिए। आपकी लय बहुत अच्छी लगती है। श्री राम जय राम जय जय राम। श्री

363
00:25:31,600 --> 00:25:36,320
राम जय राम जय जय राम

364
00:25:36,320 --> 00:25:40,400
श्री राम श्री राम जय राम जय जय

365
00:25:40,400 --> 00:25:44,960
राम श्री राम जय राम जय जय

366
00:25:44,960 --> 00:25:47,200
राम

367
00:25:47,200 --> 00:25:52,000
श्री राम जय [संगीत] राम जय जय राम

368
00:25:52,000 --> 00:25:57,520
श्री राम जय राम जय जय राम

369
00:25:57,520 --> 00:26:01,520
श्री राम जय राम जय जय

370
00:26:01,520 --> 00:26:05,760
राम श्री राम जय राम जय जय

371
00:26:05,760 --> 00:26:08,160
राम

372
00:26:08,160 --> 00:26:14,160
श्री राम [संगीत] जय राम जय जय राम

373
00:26:14,720 --> 00:26:18,800
जय राम जय जय राम श्री

374
00:26:18,800 --> 00:26:24,400
श्री राम जय राम जय जय राम

375
00:26:24,400 --> 00:26:28,720
हां क्या कह रहे थे प्रशांत जी भैया हम कह रहे हैं ये रिकॉर्ड

376
00:26:28,720 --> 00:26:32,880
हो सकता है वीडियो इतने समय समय का हां रिकॉर्ड आवाज रिकॉर्ड

377
00:26:32,880 --> 00:26:37,280
हो रही रिकॉर्ड हो रहा है हां तो भैया हमको हमको हम दे देंगे

378
00:26:37,280 --> 00:26:41,440
हां क्यों नहीं क्यों नहीं किया जाएगा अच्छा आवाज वाला यही श्री राम जय

379
00:26:41,440 --> 00:26:45,920
जय राम जी ठीक है तो

380
00:26:45,920 --> 00:26:50,720
आज का अध्ययन थोड़ा सा यहीं पर रुकते हैं और

381
00:26:50,720 --> 00:26:54,720
क्या है श्री राम जय राम जय जय राम हो जाता है मतलब जिस समय हो रहा होता

382
00:26:54,720 --> 00:26:58,960
है तो वो जो आत्मा की जो प्यास होती है ना असतो

383
00:26:58,960 --> 00:27:03,120
मा सद्गमय तम समाज क्यों आते हैं आंसू? जैसे भगवान गुरुदेव

384
00:27:03,120 --> 00:27:07,440
भगवान भी बताते हैं कि आपको आंसू आ जाए तो आंसू

385
00:27:07,440 --> 00:27:12,800
आने का मतलब यह है कि आप जो बोल रहे हो उससे कनेक्ट हो जाओ। तो जब

386
00:27:12,800 --> 00:27:16,960
वो तो एक अलग बात है कि आंसू आ जाए उस स्तर तक पहुंचना पड़ता है। मगर जैसे

387
00:27:16,960 --> 00:27:21,200
भावुक भी होता है व्यक्ति तो क्यों होता है कि उसकी जो आत्मा

388
00:27:21,200 --> 00:27:25,440
की मूल इच्छा है ना वो पूर्ति होने लगती है। श्री राम

389
00:27:25,440 --> 00:27:29,440
जय राम। अब उतनी देर के लिए सब कुछ भूलना पड़ता है। मतलब

390
00:27:29,440 --> 00:27:30,000
भूलना

391
00:27:30,000 --> 00:27:34,080
क्या पड़ता है? भूल ही जाते हैं। जितने भी झमेले हैं,

392
00:27:34,080 --> 00:27:38,080
सांसारिक प्रपंच है, बहुत सारी चीजें हैं।

393
00:27:38,080 --> 00:27:42,080
चल रही है जीवन में। नमक नहीं है, आटा नहीं है, चीनी

394
00:27:42,080 --> 00:27:46,240
नहीं है, फोन आ रहे हैं। किसी की गाड़ी खराब डली हुई है।

395
00:27:46,240 --> 00:27:50,240
किसी का कोई अस्वस्थ है, परिजन जो

396
00:27:50,240 --> 00:27:54,480
है प्रियजन कोई अस्वस्थ है। बहुत सारी तकलीफें हैं। उन

397
00:27:54,480 --> 00:27:58,720
तकलीफों के बीच में जब आप कभी कह देते हैं राम श्री राम

398
00:27:58,720 --> 00:28:02,800
जय राम। तो ऐसा आत्मसंतोष मिल जाता है। वो जो भूख है

399
00:28:02,800 --> 00:28:07,760
असली भूख असतो मा सदगमया तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्युमा मतमया

400
00:28:07,760 --> 00:28:12,160
वो भूख आपकी फिर वहां पर समाप्त होने लगती है। वो फुलफिल

401
00:28:12,160 --> 00:28:16,240
होने लगती है वो आपकी इसलिए भावुक हो जाते हैं हम। जैसे नहीं

402
00:28:16,240 --> 00:28:20,640
बिल्कुल आ बिल्कुल बहुत ज्यादा थकने और हार

403
00:28:20,640 --> 00:28:25,040
थकने और चूर थकान से चूरचूर हो जाने के बाद आपको जल मिल जाए।

404
00:28:25,040 --> 00:28:29,040
जब आपका कंठ सूख रहा हो तब आपको जल मिल जाए। तो

405
00:28:29,040 --> 00:28:34,080
ऐसा ही होता है भगवान का भजन जब आपको

406
00:28:34,080 --> 00:28:38,240
अपने जीवन से मिल रही विपरीत स्थितियों में भजन मिल जाए

407
00:28:38,240 --> 00:28:42,640
भगवान का नाम ध्यान करने का अवसर मिल जाए तो मुझे मिल गया अभी

408
00:28:42,640 --> 00:28:45,280
आप लोगों के बहाने तो कर लिया

409
00:28:45,280 --> 00:28:49,440
है ना चित्त को शांति भी मिलती है भजन के बाद

410
00:28:49,440 --> 00:28:52,960
बस बस बस वही चित्त को शांति

411
00:28:52,960 --> 00:28:57,280
तो अगर किसी के कोई प्रश्न है छोटे-मोटे बहुत बड़े-बड़े प्रश्न

412
00:28:57,280 --> 00:29:01,760
नहीं तो देवांश यादव जी

413
00:29:01,760 --> 00:29:05,920
बताएं जय सीताराम जय सीताराम

414
00:29:05,920 --> 00:29:11,920
भैया

415
00:29:13,280 --> 00:29:17,440
ठीक है शायद ये क्वेश्चन बड़ा हो सकता है लेकिन आप सुन

416
00:29:17,440 --> 00:29:21,600
लीजिए अगर आपका इच्छा होगी आप अभी लाइव में दे लीजिएगा लेकिन एक बार मेरे पास प्रश्न सुन

417
00:29:21,600 --> 00:29:25,200
लीजिए

418
00:29:25,200 --> 00:29:29,440
हेलो जी जी बोलिए बोलिए बोलिए आपको

419
00:29:29,440 --> 00:29:33,600
मेरी आवाज क्लियर आ रही है? बिल्कुल आ रही है। जी

420
00:29:33,600 --> 00:29:37,680
तो मेरा मतलब प्रश्न है अगर आपको ज्यादा बड़ा लगेगा तो आप आंसर मत

421
00:29:37,680 --> 00:29:42,320
करिएगा। अगले क्लास में कर लीजिएगा लेकिन एक बार एटलीस्ट सुन लीजिए।

422
00:29:42,320 --> 00:29:46,320
जी मेरा प्रश्न ये है कि जैसे जैसे हमारा जो

423
00:29:46,320 --> 00:29:50,400
सनातन धर्म है वो साइंटिफिक भी है और लॉजिक लॉजिकली

424
00:29:50,400 --> 00:29:54,400
भी है। ठीक है? और आप भी ये भी जानते हैं कि आज के जो लोग हैं

425
00:29:54,400 --> 00:29:58,720
वो साइंस को साइंस को अपना मतलब होता है नहीं माई बाप मानते हैं। जो साइंस करेगी

426
00:29:58,720 --> 00:30:03,200
उसी को मानेंगे। है ना तो जैसे आपने हमको असतो सद्गमया

427
00:30:03,200 --> 00:30:07,360
का वो बताया उपनिषदों से वेद से आपने प्रूफ किया कि भगवान एक्सिस्ट

428
00:30:07,360 --> 00:30:11,520
करते हैं लेकिन आजकल के जो लोग हैं वो वेदों को उपनिषद

429
00:30:11,520 --> 00:30:15,520
को फिलॉसफी मानते हैं दर्शन शास्त्र मानते हैं तो वो उसका

430
00:30:15,520 --> 00:30:19,680
यकीन नहीं करते हैं भले ही वो लॉजिक है तो लोगों का ये कहना है कि

431
00:30:19,680 --> 00:30:24,000
अगर मान लीजिए भगवान एक्सिस्ट करते हैं तो इसका साइंटिफिक प्रूफ क्या है मतलब

432
00:30:24,000 --> 00:30:28,080
क्वांटम थ्योरी है उसके उसके थ्रू प्रूफ करिए कि भगवान का

433
00:30:28,080 --> 00:30:33,120
साइंटिफिक रूप से प्रूफ करिए तो इस पे आप क्या कहना चाहेंगे?

434
00:30:33,120 --> 00:30:37,200
क्वांटम थ्योरी एक प्रूफ है। इसका क्या प्रूफ है? नहीं

435
00:30:37,200 --> 00:30:40,240
मतलब नहीं साइंटिफिक लेवल से या मैथमेटिकल थ्योरी से

436
00:30:40,240 --> 00:30:44,400
प्रूफ करिए कि भगवान ठीक है। देखिए उस तरीके से भी किया जा सकता है।

437
00:30:44,400 --> 00:30:48,720
वो बहुत सारी विधाएं मगर क्या है ना कि हम लोग टू द पॉइंट रहते हैं।

438
00:30:48,720 --> 00:30:54,720
क्वांटम थ्योरी एक प्रूफ है। इस बात का क्या प्रूफ है?

439
00:30:54,720 --> 00:30:58,800
अरे जब हमने आपको बताया कि अगर कोई अमर नहीं

440
00:30:58,800 --> 00:31:02,960
है तो आप अमरता को क्यों ढूंढ रहे हो? जब हमने आपको बताया

441
00:31:02,960 --> 00:31:07,040
कोई अखंड ज्ञानी नहीं है तो आप अखंड ज्ञान को क्यों ढूंढ रहे हो तो

442
00:31:07,040 --> 00:31:11,280
यहां तो आप निरुत्तर हो गए। तो आप ढूंढ तो सच्चिदानंद

443
00:31:11,280 --> 00:31:15,520
को ही रहे हो। जिसको आप ढूंढ रहे हो उसको आप सच्चिदानंद कहते हो या फिर आप

444
00:31:15,520 --> 00:31:20,000
अलग अलग कहते हो। क्या कहते हैं कि इमोर्टल

445
00:31:20,000 --> 00:31:24,160
ऑल नोइंग और एंडलेस जॉय इसको आप अलग-अलग

446
00:31:24,160 --> 00:31:28,480
कह देते हो ढूंढ तो आप इन तीन चीजों को ही रहे हो ना और हम इसको ही सच्चिदानंद

447
00:31:28,480 --> 00:31:32,480
स्वरूप परमेश्वर कहते हैं इतनी सी तो बात है आप भी तो उसको कुछ

448
00:31:32,480 --> 00:31:36,560
ना कुछ कह रहे हो ना एक्सिस्ट करता है तभी तो ढूंढ रहे हो ना अच्छा ऐसी कोई

449
00:31:36,560 --> 00:31:40,720
चीज है आज तक आज तक दुनिया में कोई ऐसी चीज हुई है जो

450
00:31:40,720 --> 00:31:44,720
पहले नहीं थी भाई अगर किसी ने

451
00:31:44,720 --> 00:31:48,800
ट्रेन का इन्वेंशन किया तो वह जो ट्रेन का फार्मूला था ज्ञान

452
00:31:48,800 --> 00:31:52,960
था वो एक्सिस्ट करता था ना पहले वो फार्मूला था ना दुनिया में कि ऐसा

453
00:31:52,960 --> 00:31:55,600
होगा तो ऐसे ट्रेन चलेगी

454
00:31:55,600 --> 00:32:00,000
तो वो एक्सिस्ट किया ना ज्ञान के रूप में व्यवहारिक

455
00:32:00,000 --> 00:32:04,400
वो कब हो पाया जब किसी ने उद्यम किया इसी प्रकार से भगवान एक्सिस्ट

456
00:32:04,400 --> 00:32:08,880
करते हैं व्यवहारिक कब होते हैं जब कोई भक्ति करता है उद्यम करता है

457
00:32:08,880 --> 00:32:13,040
संघर्ष करता है उनके लिए तब भगवान व्यवहारिक हो जाते है अब जब इतनी

458
00:32:13,040 --> 00:32:17,200
अच्छी व्याख्या के बाद भी आप कह रहे हो कि नहीं इससे नहीं मानेंगे इतने मानेंगे

459
00:32:17,200 --> 00:32:21,520
तो फिर हम भी तो क्वेश्चन कर सकते हैं कि क्वांटम ऑफ क्वांटम की थ्योरी जो है

460
00:32:21,520 --> 00:32:26,000
वो एक प्रूफ है। यह प्रूफ करो अब आप चलो आप

461
00:32:26,000 --> 00:32:30,160
निरुत्तर हो गए आप स्पीचलेस हो गए उसके बाद आप कह रहे हो कि नहीं

462
00:32:30,160 --> 00:32:34,320
जब रामपाल ये कह देगा कि ईश्वर है तो हम मानेंगे

463
00:32:34,320 --> 00:32:38,320
कि ईश्वर है तो रामपाल तो कभी कहेगा नहीं तो यह

464
00:32:38,320 --> 00:32:43,120
जो क्राइटेरिया तय करने वाले आप फिर कौन होते हो इसको सिद्ध करो फिर

465
00:32:43,120 --> 00:32:47,360
कि आप क्यों क्राइटेरिया तय करोगे और मुख्य बात

466
00:32:47,360 --> 00:32:51,360
यही है कि वो जिस दुनिया में जाकर

467
00:32:51,360 --> 00:32:56,000
के उत्तर चाह रहे हैं फिर उनको उस दुनिया को ही सर्वश्रेष्ठ होने का

468
00:32:56,000 --> 00:33:00,080
या अकाट्य प्रमाण माने जाने का फिर वो होना चाहिए। उसका

469
00:33:00,080 --> 00:33:04,400
भी सबूत होना चाहिए। वो दो। ये क्यों माना जाए?

470
00:33:04,400 --> 00:33:08,720
अब वो कहेंगे कि प्रत्यक्ष दिख रहा है तो हमने भी तो प्रत्यक्ष तुमको बताया।

471
00:33:08,720 --> 00:33:12,080
उस चीज को तो तुम नकार।

472
00:33:12,080 --> 00:33:16,240
खैर ऐसा ऐसे लोग अभी तक मिले नहीं है जो इस हद तक जाने

473
00:33:16,240 --> 00:33:20,240
के बाद भी जो है कुतर्क करें। ज्यादातर जब यहां तक ले आते

474
00:33:20,240 --> 00:33:24,560
हैं तो फिर वहां पर वो जो है सरेंडर हो जाते हैं और आस्तिक

475
00:33:24,560 --> 00:33:28,560
बन जाते हैं। कई आस्तिक बने भी हैं इस आर्गुमेंट पे और

476
00:33:28,560 --> 00:33:32,560
कुछ लाइन में लगे भी हुए हैं। उनको आस्तिक बनने का मन

477
00:33:32,560 --> 00:33:36,720
है इसलिए सही जगह पहुंच गए हैं। फॉर्म भरे हैं कुछ नास्तिकों

478
00:33:36,720 --> 00:33:40,880
ने। इससे जुड़ा हुआ एक छोटा सा प्रश्न था।

479
00:33:40,880 --> 00:33:46,080
मन में ऐसे आ गया अगर आप कहे तो पूछ लो।

480
00:33:46,080 --> 00:33:50,080
जैसे आपने बताया ना इमोर्टल और एंडलेस जॉय तो कई तर्क ऐसे

481
00:33:50,080 --> 00:33:54,240
आ सकते हैं कि मान लीजिए वो इस बात पे बिलीव करने लगे कि इमोर्टल

482
00:33:54,240 --> 00:33:58,560
एंडलेस जॉय बिल्कुल सही बात है। सब लोग इसी की सर्च में है। लेकिन वो सनातन

483
00:33:58,560 --> 00:34:02,560
विधा को ही क्यों अपनाए? सनातन विधा से ही वो उस चीज की प्राप्ति क्यों

484
00:34:02,560 --> 00:34:06,960
करें? कोई अलग मार्ग से वो उस चीज क्यों नहीं जा सकते? मतलब हमारी जो परंपराएं

485
00:34:06,960 --> 00:34:10,960
हैं तर्क तो यह है कि जो इसकी बात कर रहा है उसी उसी की विधा

486
00:34:10,960 --> 00:34:15,280
मानी जाए। दूसरा व्यक्ति बात ही कहां कर रहा है?

487
00:34:15,280 --> 00:34:20,480
सब लोग जो अविष्कारों में लगे हुए हैं वो सीधे-सीधे

488
00:34:20,480 --> 00:34:25,200
इमोर्टल और क्या कहते हैं? एंडलेस जॉय

489
00:34:25,200 --> 00:34:30,560
और अखंड ज्ञान की बात ही कहां कर रहा है?

490
00:34:30,560 --> 00:34:34,720
वो तो इसके अस्तित्व को ही नकार रहा है। पहली बात। और फिर

491
00:34:34,720 --> 00:34:39,520
दूसरी बात श्रद्धा भी आ जाती है। इसको इस तरह से ले लो

492
00:34:39,520 --> 00:34:43,520
कि आप वेद को हटा दो, वैदिक धर्म को हटा दो, सनातन धर्म को

493
00:34:43,520 --> 00:34:47,680
हटा दो और फिर आप जो है सच्चिदानंद तक

494
00:34:47,680 --> 00:34:51,760
पहुंचने का अपनी नियमावली लिखना शुरू करो।

495
00:34:51,760 --> 00:34:56,000
अगर सही लिख गई जो कि असंभव है। यदि सही लिख

496
00:34:56,000 --> 00:35:00,000
गई तो वैदिक धर्म होगी जो पहले से ही ख्यापित है

497
00:35:00,000 --> 00:35:01,120
और या फिर आप सही

498
00:35:01,120 --> 00:35:03,920
लिख नहीं पाओगे।

499
00:35:03,920 --> 00:35:08,160
अगर सही लिख गई पहली बात तो लिख नहीं पाओगे। लिख गई

500
00:35:08,160 --> 00:35:12,240
तो वेद की कॉपी होगी। वैदिक धर्म की कॉपी होगी। नहीं तो हम

501
00:35:12,240 --> 00:35:16,480
उसको काट देंगे। ले आओ सिद्धांत। भाई आपका कहना है कि आपको

502
00:35:16,480 --> 00:35:21,840
ही फॉलो क्यों करें? तो आप अपना ले आओ। हम उसको काट देंगे। आप हमारा काट के दिखा दो।

503
00:35:21,840 --> 00:35:26,320
तो भैया ये भारत में ही ऐसी अनुकंपा क्यों हुई ईश्वर की? मतलब यहीं पे ही

504
00:35:26,320 --> 00:35:31,390
सभ्यता जहां अनुकंपा हुई उसको भारत कहते हैं। उल्टा बोल रहे हो।

505
00:35:31,390 --> 00:35:35,520
[हंसी] ये सब के लिए पले बड़े हम

506
00:35:35,520 --> 00:35:39,760
भारत में ही अनुकंपा नहीं हुई। जहां भारत जहां अनुकंपा हुई उसको भारत

507
00:35:39,760 --> 00:35:44,000
कहते हैं। ठीक है? जी भैया। संसार के जिस हिस्से

508
00:35:44,000 --> 00:35:49,040
को ईश्वर ने चुना पृथ्वी के केंद्र के रूप में

509
00:35:49,040 --> 00:35:53,200
उसको भारत कहते हैं। भारत में ही भगवान अवतरित

510
00:35:53,200 --> 00:35:57,440
हुए ये लाइन गलत है। भगवान जहां अवतरित हुए उसको भारत

511
00:35:57,440 --> 00:36:01,440
कहते हैं। ये लाइन सही है। ठीक है? ये शिवा

512
00:36:01,440 --> 00:36:05,600
जी भैया एक प्रश्न था मेरा ये ये प्रश्न मैंने जब

513
00:36:05,600 --> 00:36:10,080
पांच छ साल का था तब अपने पिताजी से किया था ये

514
00:36:10,080 --> 00:36:14,480
बात भैया मेरा नास्तिक पर ही एक सवाल था हां कुछ

515
00:36:14,480 --> 00:36:16,800
नास्तिक ऐसे होते हैं जो मोरालिटी

516
00:36:16,800 --> 00:36:21,200
पर बात करते हैं जैसे कि हम लोग मानते हैं ना जैसे कि धर्म है तभी मोरालिटी

517
00:36:21,200 --> 00:36:25,360
है नैतिकता है तो वो लोग बोलते हैं कि नहीं ऐसा नहीं है मतलब

518
00:36:25,360 --> 00:36:29,360
नास्तिकों का ऐसा कहना है कि मोरालिटी के लिए धर्म की आवश्यकता नहीं है

519
00:36:29,360 --> 00:36:33,440
क्योंकि क्योंकि एक नास्तिक था जैसे वो बोल पडकास्ट देख रहा था। मैं वो

520
00:36:33,440 --> 00:36:37,520
बोल रहा था कि चोरी करना गलत है। मुझे मैं मैं खुद

521
00:36:37,520 --> 00:36:41,760
कहता हूं चोरी करना गलत है लेकिन मैं धर्म को नहीं मानता। तो मुझे यहां धर्म की आवश्यकता

522
00:36:41,760 --> 00:36:47,760
नहीं है चोरी करना गलत है को कहने के लिए। ऐसा उन लोग का कहना रहता है।

523
00:36:47,840 --> 00:36:51,840
और जैसे कोई भी क्राइम करनाचार करना किसी का मर्डर करना

524
00:36:51,840 --> 00:36:56,000
यह गलत है। लेकिन मैं अपने मुझे मुझे मेरी अंतरात्मा

525
00:36:56,000 --> 00:37:00,000
कह दिए ना कि कोई धर्म कहता है। ऐसा नास्तिक कह रहा था। तो उसको हम कैसे

526
00:37:00,000 --> 00:37:06,000
काउंटर करें? इस बात का प्रूफ क्या है? क्या अंतरात्मा कहती है?

527
00:37:06,480 --> 00:37:10,880
जैसे कि भाई तुम्हारी अंतरात्मा कहती है अच्छी बात है। सबकी

528
00:37:10,880 --> 00:37:15,360
अंतरात्मा कहती है। मगर धर्म क्या है? जो बाह्य

529
00:37:15,360 --> 00:37:19,440
बल आपको लगाया जा रहा है। बाहरी फोर्स बाहरी सीमा

530
00:37:19,440 --> 00:37:23,440
सबके अंतर अंतरात्मा यही कहती है कि अच्छा अच्छा करो अच्छा अच्छा

531
00:37:23,440 --> 00:37:27,440
करो। मगर कुछ लोग उस अंतरात्मा के जो

532
00:37:27,440 --> 00:37:32,080
आवाज है उसको वो मिटा देते हैं या फिर नजरअंदाज

533
00:37:32,080 --> 00:37:36,640
करते हैं और यह कहते हैं मेरी अंतरात्मा कह रही है बलात्कार करो

534
00:37:36,640 --> 00:37:40,720
तो ऐसे में उस व्यक्ति को सही क्या है और गलत क्या है यह निर्णय

535
00:37:40,720 --> 00:37:44,880
कहां से कराया जाएगा वहां पर आपका धरा का धरा रह जाएगा

536
00:37:44,880 --> 00:37:48,960
आप कहोगे मेरी अंतरात्मा कह रही है बलात्कार मत करो दूसरे कह रही है बलात्कार करो

537
00:37:48,960 --> 00:37:53,040
फिर अगर अंतरात्मा को सुनने के आधार

538
00:37:53,040 --> 00:37:59,040
पर नैतिकता का निर्णय होगा तो विप्लव हो जाएगा संसार में

539
00:37:59,040 --> 00:38:03,040
और फिर कहीं आप किसी को गलत कह ही नहीं पाओगे क्योंकि आपकी अंतरात्मा कह रही

540
00:38:03,040 --> 00:38:07,040
है ना चोरी ना करने को दूसरे अंतरात्मा को सुनना यदि धर्म है

541
00:38:07,040 --> 00:38:11,200
तो मेरी अंतरात्मा कह रही है कि चोरी कर करो तो चोरी करना फिर

542
00:38:11,200 --> 00:38:16,000
गलत कैसे है सिद्ध करो फिर आपको बाहरी कानून बनाना पड़ेगा

543
00:38:16,000 --> 00:38:20,000
और जो कानून पहले से बना हुआ है उसको आप मानते नहीं हो कानून

544
00:38:20,000 --> 00:38:24,080
तो बना ही रहे हो ना आप अपनी अंतरात्मा की

545
00:38:24,080 --> 00:38:28,080
आवाज को सामने वाले पर थोप नहीं सकते। तो आपने

546
00:38:28,080 --> 00:38:32,160
क्या किया? एक पैरेलल लॉ बनाया।

547
00:38:32,160 --> 00:38:36,320
पैरेलल जो सनातन नहीं है। जिसमें कई सारी विकृतियां

548
00:38:36,320 --> 00:38:40,320
है। और आपने क्या किया? जो पहले से जो सनातन

549
00:38:40,320 --> 00:38:44,480
लॉ है उसको नकार दिया। यही तो किया। उसको नकार

550
00:38:44,480 --> 00:38:49,200
के आपने एक पैरेलल लॉ बना दिया। अपनी अंतरात्मा की आवाज के अनुसार।

551
00:38:49,200 --> 00:38:53,360
अगर अंतरात्मा की आवाज अंतरात्मा की आवाज है अच्छी बात

552
00:38:53,360 --> 00:38:57,600
है वह होती सबके अंदर होती है वही धर्म है परंतु उसको

553
00:38:57,600 --> 00:39:01,760
व्यवहार में नहीं लाया जा सकता है उसको समाज के साथ एक्सचेंज

554
00:39:01,760 --> 00:39:05,840
नहीं किया जा सकता है आप आप कह रहे हो आप सच्चे इंसान

555
00:39:05,840 --> 00:39:09,920
हो आप सच्चे मनुष्य हो कि मेरी अंतरात्मा ये कह रही है भाई अच्छी बात है

556
00:39:09,920 --> 00:39:14,080
सामने वाले व्यक्ति की तो नहीं कह रही तो तो समाज के उसके लिए

557
00:39:14,080 --> 00:39:18,560
भी धर्म की आवश्यकता होती है कि भैया जब अंतरात्मा की आवाज

558
00:39:18,560 --> 00:39:22,560
दोनों आवाजें आ रही है कि बलात्कार कर लो यह भी आवाज आ रही है।

559
00:39:22,560 --> 00:39:26,720
वो इंद्रियों के कारण आ रही है। बलात्कार मत करो यह भी आवाज आ रही है।

560
00:39:26,720 --> 00:39:30,800
यह आत्मा के कारण आ रही है। मगर कौन सी आवाज आत्मा की है और कौन सी

561
00:39:30,800 --> 00:39:35,040
इंद्रियों की कई बार नहीं समझ पाता व्यक्ति। तो नहीं समझ पाने

562
00:39:35,040 --> 00:39:39,280
के लिए निश्चित बाउंड्री लाइन है बाहर जिसको धर्म कहते हैं।

563
00:39:39,280 --> 00:39:43,360
और वो फिर आपको तय करती है। यह आवाज आत्मा की है। आत्मा की

564
00:39:43,360 --> 00:39:47,440
आवाज यानी परमात्मा की आवाज। आत्मा की आवाज है क्या?

565
00:39:47,440 --> 00:39:51,840
परमात्मा की आवाज परमात्मा तक पहुंचने पहुंचाने

566
00:39:51,840 --> 00:39:56,080
वाली आवाज तो वही तो धर्म है परंतु उसको पहचाने

567
00:39:56,080 --> 00:40:00,240
कैसे उसके लिए बाहर एक बाउंड्री लाइन है जो व्यक्ति ऐसा कह

568
00:40:00,240 --> 00:40:05,360
रहा है कि मेरे अंदर चोरी ना करने की भावना है उससे बस ये पूछो

569
00:40:05,360 --> 00:40:09,360
कि तुमने पहली बार शौच के बाद हाथ धोना

570
00:40:09,360 --> 00:40:14,400
किसी के कहने से शुरू किया था या अपने से शुरू किया था

571
00:40:14,400 --> 00:40:18,480
बाहर नग्न कपड़ों में नग्न अवस्था स्था में ना जाना अपने से शुरू

572
00:40:18,480 --> 00:40:22,720
किया था या किसी के कहने से किया था। इसका मतलब अगर किसी

573
00:40:22,720 --> 00:40:26,800
के कहने से किया है तो तुम अपनी अंतरात्मा के आधार पर

574
00:40:26,800 --> 00:40:29,200
इंसान नहीं बने हो।

575
00:40:29,200 --> 00:40:33,520
तुम किसी बाह्य बल के आधार पर इंसान बने हो।

576
00:40:33,520 --> 00:40:37,520
क्योंकि अगर बाह्य बल ना होता अगर तुम्हारी माता जी तुमको चांटा ना

577
00:40:37,520 --> 00:40:41,600
मारती कि बाहर बिना कपड़ों के मत जाना। सोच करके

578
00:40:41,600 --> 00:40:45,600
ऐसे ऐसे करके हाथ धोना अगर तुमको ना किया जाता तो

579
00:40:45,600 --> 00:40:49,680
आज तुम भी वही जानवरों की तरह कर रहे होते। फिर तुम यह सब बकवाद

580
00:40:49,680 --> 00:40:53,840
ना करते कि भैया मेरी अंतरात्मा की आवाज है। हुआ

581
00:40:53,840 --> 00:40:58,000
क्या है? बाहर से तुम्हें धर्म मिला। उसको तुमने अपने अनुसार

582
00:40:58,000 --> 00:41:02,160
अब्सॉर्ब कर लिया। अपना वो उसको कहते हैं कस्टमाइज।

583
00:41:02,160 --> 00:41:06,240
कस्टमाइज करते हुए अपने अनुसार आपने अब्सॉर्ब कर लिया। आज आप कहते

584
00:41:06,240 --> 00:41:10,240
हो कि अंतरात्मा से आती है आवाज। ठीक है? निठारी हत्याकांड वालों

585
00:41:10,240 --> 00:41:14,480
को क्यों नहीं आई थी अंतरात्मा से आवाज बच्चों कुकर में उबाल के मत खाओ

586
00:41:14,480 --> 00:41:18,560
क्यों नहीं आई थी उन्हें आवाज अगर अंतरात्मा के आधार पर

587
00:41:18,560 --> 00:41:22,560
व्यक्ति मनुष्य बन जाए तो फिर दुनिया में

588
00:41:22,560 --> 00:41:27,120
हो होगा ही नहीं ना पाप कर्म इत्यादि

589
00:41:27,120 --> 00:41:31,360
उसके लिए एक बाउंड्री लाइन है संविधान सनातन

590
00:41:31,360 --> 00:41:36,640
संविधान जिसको कोई चैलेंज नहीं कर सकता ठीक है

591
00:41:36,640 --> 00:41:40,720
जी भैया बहुत जी शिवा भैया एक बस एक चीज बस पूछनी

592
00:41:40,720 --> 00:41:45,040
थी आपसे जैसे की आपने अभी बताया कि

593
00:41:45,040 --> 00:41:49,120
आपने जैसे बताया कि दुनिया में कितने सारे साइंटिस्ट मैंने मेरा मतलब प्रश्न जो

594
00:41:49,120 --> 00:41:53,280
था मैंने सबसे पहले प्रश्न किया था कि साइंस के थ्रू प्रूव करिए। मेरा ये प्रश्न

595
00:41:53,280 --> 00:41:57,440
इसलिए आया क्योंकि जैसे हमारे जो सनातन धर्म के जो आचार्य है वो

596
00:41:57,440 --> 00:42:01,600
कहते हैं कि जो लोग ये समझते हैं कि साइंस और सनातन धर्म एक दूसरे

597
00:42:01,600 --> 00:42:05,680
के विरोधी है। पर असल में ये एक दूसरे के पैरेलली चलती है।

598
00:42:05,680 --> 00:42:09,760
है ना? क्योंकि सनातन धर्म ही एक ऐसा है जो साइंटिफिक तो एक दूसरे के

599
00:42:09,760 --> 00:42:13,920
पैरेलल चलती है। तो इसीलिए मैंने आपसे प्रश्न पूछा कि शायद हमारे धर्म

600
00:42:13,920 --> 00:42:18,480
ग्रंथ में लिखा हो जो साइंटिफिक प्रूफ कर रहा हो कि भगवान करते हैं।

601
00:42:18,480 --> 00:42:23,280
अरे भाई पहली बात आप ये समझो

602
00:42:23,280 --> 00:42:27,360
कि साइंस में शब्द प्रमाण नहीं चलता है।

603
00:42:27,360 --> 00:42:31,840
ये तो मानना पड़ेगा। जी नहीं चलता है।

604
00:42:31,840 --> 00:42:35,840
तो फिर जो बात आप कह रहे हो वह साइंटिफिक बात है और

605
00:42:35,840 --> 00:42:40,320
जो मैं कह रहा हूं या मेरी बात छोड़ दो। आप जो बात कह रहे हो

606
00:42:40,320 --> 00:42:44,880
जैसे गुरुत्वाकर्षण ये साइंटिफिक बात है। ये कैसे माना जाए?

607
00:42:44,880 --> 00:42:48,880
ये विज्ञान फार्मूला से प्रूफ किया है।

608
00:42:48,880 --> 00:42:52,960
साइंटिफिक प्रूफ है डेरिवेशन फार्मूला से। मगर ये विज्ञान है इसको

609
00:42:52,960 --> 00:42:58,160
विज्ञान कैसे माना जाए? वो तो थ्योरी है ना प्रैक्टिकल रूप से कैसे माने?

610
00:42:58,160 --> 00:43:03,280
कैसे माने कि विज्ञान है?

611
00:43:03,280 --> 00:43:07,360
देखिए कहीं ना कहीं आपको कहीं ना कहीं आपको शब्द

612
00:43:07,360 --> 00:43:12,400
प्रमाण आना पड़ेगा ना। फलाने ने माना, इतने लोगों ने माना,

613
00:43:12,400 --> 00:43:18,000
इतनी दुनिया ने माना। हां।

614
00:43:18,000 --> 00:43:21,760
शब्द प्रमाण आना पड़ेगा ना।

615
00:43:21,760 --> 00:43:25,920
और शब्द प्रमाण को आप नकार रहे हो। तो शब्द

616
00:43:25,920 --> 00:43:30,000
प्रमाण को ना मानने की वजह से ही वजह से भी यह वाली बातें

617
00:43:30,000 --> 00:43:34,080
होती हैं। अब जिस बात को वेदों में कई

618
00:43:34,080 --> 00:43:38,160
जगह नासदकीय ना जो ना कौन

619
00:43:38,160 --> 00:43:43,600
सा सूत्र है उस पर ग्रंथ है गुरुदेव भगवान तो

620
00:43:43,600 --> 00:43:47,680
जिन बातों को काफी सारी ऐसी बातें हैं जो हमारे वेदों में हमारे

621
00:43:47,680 --> 00:43:51,920
ग्रंथों में लिखी हुई है और जिनको जिनको फॉलो किया भी जा रहा है और जिनसे

622
00:43:51,920 --> 00:43:56,080
मिलती जुलती चीजों पर ही नए-नए आविष्कार भी हो रहे हैं। बस बात इतनी

623
00:43:56,080 --> 00:44:00,320
है कि समय देश काल परिस्थिति के अनुसार वह जो ज्ञान विज्ञान

624
00:44:00,320 --> 00:44:04,320
होता है धीरे-धीरे लुप्त होता जाता है और यह माना

625
00:44:04,320 --> 00:44:08,560
गया कि हमारे जो जो आज से पहले के युग जो थे

626
00:44:08,560 --> 00:44:12,560
वहां पर बैलेंस समाज के अनुसार बहुत अच्छा रखा जाता था

627
00:44:12,560 --> 00:44:16,560
मगर विज्ञान का स्तर बहुत ज्यादा उन्नत था

628
00:44:16,560 --> 00:44:18,480
और जो चीजें नहीं थी वो इसलिए

629
00:44:18,480 --> 00:44:22,800
नहीं थी कि वो बना नहीं सकते थे वो इसलिए नहीं थी

630
00:44:22,800 --> 00:44:27,120
क्योंकि उनका ना होना ही पर्यावरण के लिए आवश्यक है।

631
00:44:27,120 --> 00:44:32,800
आज विकास के नाम पर विनाश हो रहा है। है ना?

632
00:44:32,800 --> 00:44:37,600
ये चीज है। तो भैया भैया एक ही शंकराचार्य

633
00:44:37,600 --> 00:44:41,840
गुरुदेव जी की बता दें। जी भैया जो

634
00:44:41,840 --> 00:44:46,000
चमत्कार होते हैं उसका जब ज्ञान प्राप्त हो जाता है तो वही साइंस हो

635
00:44:46,000 --> 00:44:50,000
जाता है। बस बस। और भैया एक

636
00:44:50,000 --> 00:44:54,080
चीज बता दे मैथ से गणित चीजों की गणना होती है। अगणी

637
00:44:54,080 --> 00:44:58,240
चीजों की असंख्य चीजों की गणना नहीं होती। जी

638
00:44:58,240 --> 00:45:02,480
बिल्कुल सही है। आप भैया छोटा सा सवाल मेरा हल कर दीजिए कि दो से दो

639
00:45:02,480 --> 00:45:06,480
को भाग देने पर क्या दो शेष बचता है? ये मैथ कहीं सिद्ध कर सकती

640
00:45:06,480 --> 00:45:09,920
है?

641
00:45:09,920 --> 00:45:14,000
हम हमारा सनातन धर्म सिद्ध करता है कि दो से दो को भाग दीजिए तो दो

642
00:45:14,000 --> 00:45:18,160
शेष बचता है। बताइए कैसे संभव है मैथ से?

643
00:45:18,160 --> 00:45:22,880
भाई देखिए एक बात और है कि

644
00:45:22,880 --> 00:45:26,880
साइंस आपको बता क्या रही है? जिस अभी वैसे

645
00:45:26,880 --> 00:45:30,880
साइंस क्या है क्या नहीं है यह भी चैलेंजिंग है क्योंकि शब्द प्रमाण को कोई मान नहीं रहा

646
00:45:30,880 --> 00:45:34,880
है और जब कोई शब्द प्रमाण को मान नहीं रहा है तो फिर किसी के भी शब्द प्रमाण को नहीं माना

647
00:45:34,880 --> 00:45:39,040
जाएगा तो साइंस साइंस जैसे मैंने कहा ना कि वो क्वांटम थ्योरी जो है

648
00:45:39,040 --> 00:45:43,520
वो भी एक अकाट्य प्रमाण है ये कैसे माना जाए है ना

649
00:45:43,520 --> 00:45:47,600
तो जब आप शब्द प्रमाण को ठुकरा देंगे तो आपके शब्द प्रमाण को भी

650
00:45:47,600 --> 00:45:51,680
ग्रहण नहीं किया जाएगा तो उस स्थिति में आप ये भी नहीं कह सकते पूरी दुनिया मान रही है

651
00:45:51,680 --> 00:45:55,680
फलाना मान रहा है पूरी दुनिया मान रही है तीन भी विरोधी से क्वांटम थ्योरी

652
00:45:55,680 --> 00:45:59,680
के आखिरी समय तक हां जैसे आइंस्टीन तो वो तो एक बात अलग

653
00:45:59,680 --> 00:46:03,680
हो गई मगर कुल मिलाकर के बात ये है कि साइंस आपको

654
00:46:03,680 --> 00:46:07,680
देती है इस दुनिया के संबंध में जो वो

655
00:46:07,680 --> 00:46:11,760
देखती है जो परखती है जो अनुभव करती है उसके आधार पे एक कलेक्ट करके एक नॉलेज

656
00:46:11,760 --> 00:46:16,160
देती है आपको कलेक्शन कलेक्शन ऑफ एक्सपीरियंसेस

657
00:46:16,160 --> 00:46:20,320
है ना प्रैक्टिकल्स एंड इफेक्ट हम

658
00:46:20,320 --> 00:46:25,360
और कहीं ना कहीं जो क्या कहते

659
00:46:25,360 --> 00:46:29,360
अगर जैसे दार्शनिक वाला भाग छोड़ दे तो कुछ कुछ ऐसी ही

660
00:46:29,360 --> 00:46:33,680
बातें कि कलेक्शन बुद्ध के उसमें यह नहीं है कि आपको मोक्ष मिलेगा।

661
00:46:33,680 --> 00:46:37,680
बुद्ध के उसमें क्या है कि भैया ऐसा करोगे तो ऐसा होगा। मतलब

662
00:46:37,680 --> 00:46:41,760
उसने यह देखा कि चोरी की तो उसके आगे जाकर के चोट लग गई। तो इसने इसको

663
00:46:41,760 --> 00:46:46,000
कलेक्ट किया और यह कहा कि चोरी करोगे तो भाई चोट लगेगी। अब इसमें

664
00:46:46,000 --> 00:46:50,080
इस तरीके से चले कि यह करोगे तो यह होगा यह करो। तो इसने कलेक्ट करके एक

665
00:46:50,080 --> 00:46:54,080
ग्रंथ लिख दिया और यह हो गया भैया फलाना बुद्ध दर्शन। तो

666
00:46:54,080 --> 00:46:58,560
वो कलेक्शन ऑफ थ्योरी है। अब बात यह आती है कि जब साइंस बात ही

667
00:46:58,560 --> 00:47:02,640
इस दुनिया की कर रहा है। दूसरी डायमेंशन की बात कर ही नहीं रहा है। तो

668
00:47:02,640 --> 00:47:06,800
दूसरी डायमेंशन का प्रूफ जो साइंस

669
00:47:06,800 --> 00:47:11,520
है उसके क्राइटेरिया में जाकर के कैसे दोगे? भाई

670
00:47:11,520 --> 00:47:15,920
आप वह ढूंढ रहे हो जो इस दुनिया से आपको नहीं मिल रहा है। जो संसार

671
00:47:15,920 --> 00:47:20,240
है वह दुखप्रद है। आप ढूंढ रहे हो कभी ना अंत होने वाला

672
00:47:20,240 --> 00:47:24,240
सुख। जो संसार है वो मूर्खता देता है। आपको

673
00:47:24,240 --> 00:47:28,640
मूर्ख बनाता है। आप ढूंढ रहे हो अखंड ज्ञान। और जो संसार

674
00:47:28,640 --> 00:47:32,640
है वो आपको देता है क्या कहते हैं? मृत्यु और

675
00:47:32,640 --> 00:47:36,800
आप ढूंढ रहे हो मृता। तो आप इस संसार

676
00:47:36,800 --> 00:47:40,800
के ठीक विपरीत चीज को ढूंढ रहे हो। ठीक है

677
00:47:40,800 --> 00:47:44,960
और जो साइंस है वह इस संसार की चीजें आपको बता रही है

678
00:47:44,960 --> 00:47:48,960
तो फिर जिस जहां पर आप इस संसार के विपरीत चीज को ढूंढ रहे

679
00:47:48,960 --> 00:47:53,600
हो उसकी नॉलेज आपको साइंस से कैसे मिलेगी साइंस के आधार पर कैसे मिलेगी

680
00:47:53,600 --> 00:47:57,600
प्रूफ कैसे मिलेगा ऐसा नहीं है काफी हद तक हम उसके साथ साथ चल सकते हैं

681
00:47:57,600 --> 00:48:01,680
मगर एक ना एक वक्त आएगा जहां पर ईश्वर वही है फिर

682
00:48:01,680 --> 00:48:06,000
जिसका उदाहरण मौजूद ना हो ये भी तो है अद्वैत

683
00:48:06,000 --> 00:48:10,000
जिसके जैसा दूसरा ना हो तो ईश्वर ईश्वर कौन है जिसका उदाहरण

684
00:48:10,000 --> 00:48:14,000
मौजूद ना हो अगर उदाहरण मौजूद है तो वो ईश्वर कैसा

685
00:48:14,000 --> 00:48:18,080
समझ रहे हो जाएगा उदाहरण से अगर उदाहरण हो गया तो ईश्वर

686
00:48:18,080 --> 00:48:23,600
कैसा रह गया जिसके जैसा दूसरा ना हो यहां है नातस प्रतिमास्त

687
00:48:23,600 --> 00:48:27,680
जिसका दुरुपयोग करते हैं नातस प्रतिमास्त दुनिया में जब

688
00:48:27,680 --> 00:48:31,760
कोई उसके जैसा है ही नहीं तो उसका उदाहरण कैसे दोगे उदाहरण का मतलब

689
00:48:31,760 --> 00:48:36,000
ही तो साइंस है कि आपने ईश्वर का उदाहरण दो ऐसे

690
00:48:36,000 --> 00:48:40,080
सिद्ध हुआ ईश्वर है उदाहरण दो तो जिस जिसका

691
00:48:40,080 --> 00:48:44,240
जिसका कोई उदाहरण है ही नहीं और वो वो ईश्वर भी इसीलिए

692
00:48:44,240 --> 00:48:48,400
है तभी तक है वो आपकी चाह का विषय भी तभी तक है वो एक

693
00:48:48,400 --> 00:48:52,880
नास्तिक व्यक्ति की चाह का भी विषय तभी तक है जब तक उसका कोई उदाहरण ना हो

694
00:48:52,880 --> 00:48:55,920
उदाहरण हो जाए बाधित हो जाएगा तो

695
00:48:55,920 --> 00:48:59,920
जिसका उदाहरण है ही नहीं उसका उदाहरण कैसे दोगे तो वहां

696
00:48:59,920 --> 00:49:04,160
पे आपको कहीं ना कहीं फिर शब्द प्रमाण आना पड़ेगा कि

697
00:49:04,160 --> 00:49:08,560
नहीं भाई कोई शास्त्र है जो इस हद तक बात करता है तर्क

698
00:49:08,560 --> 00:49:12,640
की पराकाष्ठा पर जाता है तो फिर उसकी उस पर जो है श्रद्धा रखनी

699
00:49:12,640 --> 00:49:16,640
पड़ेगी। कोई गुरु परंपरा है जो तर्क की पराकाष्ठा पर जाती

700
00:49:16,640 --> 00:49:20,960
है। साइंटिफिक लोगों को भी आकर्षित कर लेती है। साइंटिस्टों को भी आकर्षित

701
00:49:20,960 --> 00:49:25,200
कर लेती है और ऐसी ऐसी गुत्तियां सुलझाती है आपके मन की आपकी आत्मा

702
00:49:25,200 --> 00:49:29,200
की जो कोई ना सुलझा पाया तो फिर उसकी बात पर विश्वास करना

703
00:49:29,200 --> 00:49:33,440
पड़ेगा। वहां फिर आ जाता है शब्द प्रमाण। और यदि शब्द

704
00:49:33,440 --> 00:49:38,000
प्रमाण को बिल्कुल नहीं मानना है तो फिर यह क्यों माना जाए कि आप जो बात कर रहे हैं वह साइंटिफिक

705
00:49:38,000 --> 00:49:42,000
है। ठीक है? हो गया आज का। जी

706
00:49:42,000 --> 00:49:46,160
बस एक रिक्वेस्ट ये थी कि जो आपका ये वाला जो था क्वेश्चन सॉलिंग वाला जो

707
00:49:46,160 --> 00:49:50,160
डाउट सेशन था वो YouTube के प्रसारण होगा मतलब वो लाइव

708
00:49:50,160 --> 00:49:54,320
स्ट्रीम संभवता होगा। समय संसाधन का अभाव है।

709
00:49:54,320 --> 00:49:58,480
आप लोग सहयोग करें। प्रथम जी वालंटियर्स तो ढूंढ ही रहे हैं।

710
00:49:58,480 --> 00:50:02,960
उनसे संपर्क करिए जिससे कि ज्यादा से ज्यादा हम लोग अपने संदेश

711
00:50:02,960 --> 00:50:07,200
समाज में पहुंचा सके। ठीक है?

712
00:50:07,200 --> 00:50:12,640
अब किसके रह गए हैं क्वेश्चन? बहुत लंबा टाइम हो गया।

713
00:50:12,640 --> 00:50:16,800
मैं अनुरोध करूंगा अब प्रश्न ना पूछे सभी लोग। थोड़ा सा

714
00:50:16,800 --> 00:50:20,880
विश्राम दिया जाए। अभी संडे को फिर सत्र होगा। अभी कुछ ही दिन है। उस दिन पूछ लीजिएगा

715
00:50:20,880 --> 00:50:24,880
आप लोग। है नहीं? कोई एक एक लोग किरण दीक्षित जी का ले

716
00:50:24,880 --> 00:50:28,720
लेते हैं। किरण जी किरण जी चले गए क्या

717
00:50:28,720 --> 00:50:32,800
उनका स्क रिलेटेड आप आप बोल लीजिए वानखेड़े जी आप आप

718
00:50:32,800 --> 00:50:38,400
बोल लीजिए नहीं नहीं मैं बोलिए वानखेड़े जी

719
00:50:38,400 --> 00:50:42,720
जी भैया आवाज आ रही है मेरी हम

720
00:50:42,720 --> 00:50:46,960
जी भैया मैं आपको पहले ही फोन किया था मैंने

721
00:50:46,960 --> 00:50:50,960
तो भैया मेरा प्रश्न ये है कि मुझे यह बता सकते हैं आप कि मतलब

722
00:50:50,960 --> 00:50:55,280
मोक्ष है क्या मतलब

723
00:50:55,280 --> 00:50:59,360
जिसको पाने के बाद और कुछ पाने की इच्छा बाकी नहीं रह जाती। शेष नहीं रह

724
00:50:59,360 --> 00:51:03,440
जाता वो मोक्ष थोड़ा अच्छा मतलब थोड़ा डिटेल

725
00:51:03,440 --> 00:51:07,520
में बता सकते हैं। मतलब क्या है वैसे मतलब कुछ जगह है क्या

726
00:51:07,520 --> 00:51:12,240
है क्या है स्टेट एक स्टेट

727
00:51:12,240 --> 00:51:17,040
जहां तक आपको पहुंचने की आकांक्षा है क्योंकि आप

728
00:51:17,040 --> 00:51:21,120
प्राणी मात्र जो है सच्चिदानंद को ढूंढ रहा है। सच्चिदानंद की जो स्टेट है वही

729
00:51:21,120 --> 00:51:26,640
मोक्ष है। अच्छा

730
00:51:26,640 --> 00:51:32,640
जैसे कि मान लीजिए

731
00:51:32,800 --> 00:51:36,800
जब आप भोजन करते हैं

732
00:51:36,800 --> 00:51:42,800
तो भोजन करने से आपको एक संतोष प्राप्त होता है।

733
00:51:43,520 --> 00:51:48,320
वो क्या है? वो कोई जगह है या क्या है?

734
00:51:48,320 --> 00:51:53,120
वो एक स्टेट है। संकोष जनक स्टेट

735
00:51:53,120 --> 00:51:58,720
हम ऐसे ही सुखप्रद

736
00:51:58,720 --> 00:52:01,520
स्टेट की पराकाष्ठा

737
00:52:01,520 --> 00:52:04,720
वो मोक्ष

738
00:52:04,720 --> 00:52:07,920
अच्छा

739
00:52:07,920 --> 00:52:12,480
ऐसा

740
00:52:12,480 --> 00:52:16,800
ठीक है।

741
00:52:16,800 --> 00:52:20,800
ठीक है। बाकी सभी लोग जुड़े रहे और आगे हमें लगता है

742
00:52:20,800 --> 00:52:25,360
सारे ही किरण जी का ले लेते हैं। किरण जी हैं। गए

743
00:52:25,360 --> 00:52:29,440
लगता है। हां हूं हां हूं हां किरण जी कुछ लाइए कुछ

744
00:52:29,440 --> 00:52:34,000
कौन से संबंधित होगा आपका? बताइए।

745
00:52:34,000 --> 00:52:38,160
नहीं नहीं मैं बस एक प्रश्न था कि शिख

746
00:52:38,160 --> 00:52:42,720
जो है वो ब्राह्मणों के लिए ही होता है या फिर क्षत्रिय आदि के लिए

747
00:52:42,720 --> 00:52:47,280
होता है सबके लिए सबके लिए है हर कोई रख सकता है

748
00:52:47,280 --> 00:52:51,280
अंतज भी रख सकता है शिखा का विचार है कल मैं पोस्ट कर दूंगा ग्रुप

749
00:52:51,280 --> 00:52:55,360
में अभी पोस्ट कर दे सब रख सकते हैं जो उसका

750
00:52:55,360 --> 00:52:59,520
स्ट्रक्चर होता है उसके अनुपात में अंतर होता है शिखा सबके लिए होती

751
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है और जनरल साइज भी होगा तो आप ब्राह्मण के लिए

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ब्राह्मण के लिए कमर तक क्षत्रिय के लिए हृदय तक वैश्य के लिए

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कंठ तक और शूद्र के लिए कंठ से ऊपर तक बाकी मैं

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विचार भेज रहा हूं। सभी लोग ग्रुप में पढ़े उसको और अपने बंधु बांधव को और कोई

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है अभी

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किसी ने हाथ नहीं और कोई नहीं है। मेरा भी सिद्धांतिक एक प्रश्न था

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लेकिन बहुत देर हो गया। मैंने सबसे पहले हैं रेस्ट किया था। आप बताइए बताइए बताइए।

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नहीं नहीं आज रहने देते हैं। बताइए बताइए बताइए

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[हंसी] बोल लीजिए भाई

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मेरा प्रश्न था कि जो जीव है

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जीव वो है जो अविद्या अभिमानी है और जो जगदीश्वर

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है वो शुद्ध सतोगुणी अभिमानी है और

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इन दोनों से पृथक ब्रह्म है तो फिर

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जो जगदीश्वर है और जो जीव है ये दोनों ही तो मतलब

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ब्रह्म के ही दो लीलामय रूप हो गए ना

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हम

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एक माया से एक माया को ना जानने वाला और

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एक माया को जानने वाला हम

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एक अपने स्वरूप को भूल चुका और एक अपने स्वरूप को जानने वाला

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हां हां जी बिल्कुल ठीक है

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हां ठीक है।

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ठीक है। ठीक है। धन्यवाद। और कोई बस मेरे ख्याल से काफी है।

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किरण जी का रह गया था। मैंने इनका हैंड रे देखा था ना शुरू में ही।

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मैंने कहा ये कई बार रह जाता है इनका मामला। चलिए ठीक है।

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आप सभी के साथ भजन करके बहुत अच्छा लगा। आज हृदय को संतोष मिला।

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नारायण समारंभाम शंकराचार्य मध्यमाम असमदाचार्य

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परताम वंदे गुरु परंपरा सभी को जय श्री राम
