1
00:00:07,440 --> 00:00:11,680
अब मैं उन सज्जनों की वंदना करता हूं जो परमार्थ

2
00:00:11,680 --> 00:00:16,000
के अधिष्ठान या आधार है

3
00:00:16,000 --> 00:00:20,160
और जिनके द्वारा लोगों पर गुण ज्ञान प्रकट होता है

4
00:00:20,160 --> 00:00:24,400
जो वस्तु ब्रह्म वस्तु अर्थात

5
00:00:24,400 --> 00:00:28,800
यहां पर ब्रह्म से तात्पर्य परम दुर्लभ है यानी जो ब्रह्म परम

6
00:00:28,800 --> 00:00:33,040
दुर्लभ और कभी मिल ही नहीं सकती। वह संतों की संगति से

7
00:00:33,040 --> 00:00:37,200
सुलभ हो जाती है। वह वस्तु ब्रह्म रहती तो प्रकट ही

8
00:00:37,200 --> 00:00:41,280
है पर किसी को दिखाई नहीं पड़ती। अनेक प्रकार के उपाय

9
00:00:41,280 --> 00:00:45,360
करने पर भी वह नहीं मिलती। उसके सामने परीक्षा

10
00:00:45,360 --> 00:00:49,680
करने वाले स्तब्ध हो गए। आंखों वाले अंधे

11
00:00:49,680 --> 00:00:53,920
हो गए। अपनी ही वस्तु को देखते हुए भी धोखा खा गए।

12
00:00:53,920 --> 00:00:58,560
वह वस्तु दीपक से भी नहीं दिखाई पड़ती और अनेक प्रकार

13
00:00:58,560 --> 00:01:02,800
के देखते हुए भी धोखा खा गए। वह वस्तु दीपक से भी दिखाई

14
00:01:02,800 --> 00:01:08,160
नहीं पड़ती। भैया हो हां 16

15
00:01:08,160 --> 00:01:12,480
16ों कलाओं से पूर्ण चंद्रमा और तीव्र कला राशि सूर्य।

16
00:01:12,480 --> 00:01:16,960
लो भाई 16 कला के चंद्रमा

17
00:01:16,960 --> 00:01:21,120
और यह बात यहां पर प्रदर्शित हो रही है। 16 कला

18
00:01:21,120 --> 00:01:22,560
क्यों कहा जाता है? चंद्रवंशी

19
00:01:22,560 --> 00:01:27,040
श्री कृष्ण और सूर्यवंशी

20
00:01:27,040 --> 00:01:30,160
श्री राम

21
00:01:30,160 --> 00:01:34,480
अ माह को या फिर पक्ष को कृष्ण पक्ष को शुक्ल

22
00:01:34,480 --> 00:01:38,320
शुक्ल पक्ष को जो

23
00:01:38,320 --> 00:01:43,280
चंद्रमा के आधार पर चंद्रमा की स्थितियों के आधार पर बांटा जाता है।

24
00:01:43,280 --> 00:01:47,600
तो इस कारण से क्योंकि चंद्रमा का गुण है चंचलता। वह कभी-कभी

25
00:01:47,600 --> 00:01:51,600
अपनी स्थिति अधिक बार बदलता है और कभी-कभी अपनी स्थिति कम

26
00:01:51,600 --> 00:01:56,240
बार बदलता है। तो चंचलता का गुण उसमें भी प्रदर्शित होता है

27
00:01:56,240 --> 00:02:00,400
और वहीं पर सूर्य सूर्य की स्थितियां एक जैसी रहती है। वह 12 तरह

28
00:02:00,400 --> 00:02:04,400
से अपने स्थितियों को बदलता है। तो सूर्य की स्थितियों

29
00:02:04,400 --> 00:02:08,640
के आधार पर वर्ष की गणना होती है हमारे यहां। और चंद्रमा की स्थितियों

30
00:02:08,640 --> 00:02:14,480
के आधार पर हमारे यहां तिथियों की गणना होती है। अब क्योंकि चंद्रमा

31
00:02:14,480 --> 00:02:18,480
अधिक प्रकार से अपने अपने रूप दिखाता है। इस

32
00:02:18,480 --> 00:02:22,560
कारण से चंद्रवंशी होने के नाते श्री कृष्ण को

33
00:02:22,560 --> 00:02:26,880
16 कलाओं वाला कहा जाता है। और वहीं

34
00:02:26,880 --> 00:02:30,880
दूसरी ओर अह सूर्य भगवान

35
00:02:30,880 --> 00:02:34,880
तो सूर्य भगवान क्योंकि 12 तरह की स्थितियां अपनी दिखाते हैं, प्रदर्शित

36
00:02:34,880 --> 00:02:38,160
करते हैं तो उस कारण से

37
00:02:38,160 --> 00:02:42,160
सूर्यवंशी होने के नाते श्री रामचंद्र को 12 कलाओं

38
00:02:42,160 --> 00:02:46,480
का कहा जाता है। परंतु ऐसा नहीं है कि जो

39
00:02:46,480 --> 00:02:50,480
सूर्य है उसकी यहां पावर की बात हो रही है। उसमें सिर्फ 12 प्रकार की पावर

40
00:02:50,480 --> 00:02:54,720
है। चार प्रकार की पावर चंद्रमा में ज्यादा है। चंद्रमा का चंचलता

41
00:02:54,720 --> 00:02:58,800
का गुण हो जिस कारण से वो 12 से भी अधिक अपने रूप व्यक्त करता

42
00:02:58,800 --> 00:03:03,200
है। परंतु ऐसा नहीं वो वो जो चार रूपों को व्यक्त कर रहा है वह चार रूप

43
00:03:03,200 --> 00:03:07,360
सूर्य की स्थितियों में है नहीं वो शामिल है। जैसे ऐसे समझ लीजिए

44
00:03:07,360 --> 00:03:11,520
इसको क्योंकि सूर्य अपनी स्थिति 12 प्रकार से बदलता है तो इसलिए

45
00:03:11,520 --> 00:03:15,840
सूर्यवंशी होने के नाते अह भगवान श्री रामचंद्र

46
00:03:15,840 --> 00:03:20,320
जी को 12 कला का संबोधन कहीं-कहीं पर कर दिया गया। और क्योंकि चंद्रमा

47
00:03:20,320 --> 00:03:24,880
अपनी स्थिति 16 प्रकार से बदलता है। इसलिए चंद्रवंशी

48
00:03:24,880 --> 00:03:30,880
होने के नाते चंद्रवंशी होने के नाते

49
00:03:31,360 --> 00:03:35,440
श्री कृष्ण को कहीं-कहीं पर 16 कला का कह दिया जाता है। अब ऐसा नहीं है

50
00:03:35,440 --> 00:03:39,520
कि वो जो स्थितियां बदल रहे हैं वो मतलब वहां पर

51
00:03:39,520 --> 00:03:44,240
कोई पावर की बात हो रही है। इसको ऐसे समझ सकते हैं। दो उदाहरण मैं दूंगा।

52
00:03:44,240 --> 00:03:48,880
पहला उदाहरण है कि यदि हम ₹1

53
00:03:48,880 --> 00:03:52,080
की गणना

54
00:03:52,080 --> 00:03:56,080
अठन्नी के आधार पर करेंगे तो ₹1 के कितने टुकड़े हमें दिखाई

55
00:03:56,080 --> 00:04:00,400
देंगे? दो। और वहीं पे अगर चवन्नी

56
00:04:00,400 --> 00:04:04,800
के द्वारा ₹1 की गणना की जाएगी तो कितने टुकड़े दिखाई देंगे?

57
00:04:04,800 --> 00:04:08,960
चार। अब क्योंकि चवन्नी के आधार पर ₹1 के चार टुकड़े हुए हैं

58
00:04:08,960 --> 00:04:13,280
तो क्या यह माना जाए कि चवन्नी ज्यादा शक्तिशाली है?

59
00:04:13,280 --> 00:04:18,080
चार चवनियां दो अठनियों से ज्यादा शक्तिशाली हैं। यह माना जाए नहीं।

60
00:04:18,080 --> 00:04:22,160
दो अठनियां और चार चवनियां एक ही है। इसी तरीके से 16 16

61
00:04:22,160 --> 00:04:26,160
बार स्थिति बदलना और 12 बार स्थिति बदलना एक ही है। क्योंकि उनके द्वारा

62
00:04:26,160 --> 00:04:30,240
जब वो विभाजन के बाद जो अह निष्कर्ष प्राप्त

63
00:04:30,240 --> 00:04:34,560
हो रहा है, परिणाम प्राप्त हो रहा है उनके योग से वह एक समान है। जैसे चार चवन्नियों

64
00:04:34,560 --> 00:04:38,560
का योग क्या प्राप्त हुआ? ₹1. दो अठनियों का योग क्या

65
00:04:38,560 --> 00:04:43,120
प्राप्त हुआ? ₹1 तो इस हिसाब से दोनों बराबर हो गए।

66
00:04:43,120 --> 00:04:46,720
एक दूसरा उदाहरण और है कि

67
00:04:46,720 --> 00:04:51,920
हमने एक जगह पर अग्नि जलाई और

68
00:04:51,920 --> 00:04:56,480
अ संयोग से उस अग्नि की चपेट में एक सामान्य

69
00:04:56,480 --> 00:05:00,480
में जितनी भी चीजें आ सकती हैं, जल सकती है वो जल गई। और हमने

70
00:05:00,480 --> 00:05:06,240
एक दूसरी जगह पर अग्नि जलाई। उसकी चपेट में बहुत ज्यादा

71
00:05:06,240 --> 00:05:10,880
चीजें झुलस गई। तो क्या इस आधार पर हम

72
00:05:10,880 --> 00:05:14,960
यह कहेंगे कि जहां पर कम चीजें झुलसी हैं वहां पर जो अग्नि

73
00:05:14,960 --> 00:05:20,160
थी उसकी दाहक क्षमता कम थी। क्या ऐसा कहेंगे

74
00:05:20,160 --> 00:05:24,240
या फिर ऐसा कहेंगे कि उसके नजदीक में जलाशय अधिक पास था

75
00:05:24,240 --> 00:05:28,560
तो वो जितनी दूर तक चली उतनी दूर तक चली। जलाशय के कारण बुझ गई। और जो दूसरी अग्नि

76
00:05:28,560 --> 00:05:32,720
जली वो काफी देर तक इसलिए जली क्योंकि उससे कोसों दूर तक जलाशय

77
00:05:32,720 --> 00:05:36,720
नहीं था। उसकी चपेट में बहुत से चीजें आ गई। मगर जो दाहत क्षमता

78
00:05:36,720 --> 00:05:40,880
है जो गर्माहट है दोनों जगह प्रज्वलित होने वाली जो अग्नि

79
00:05:40,880 --> 00:05:44,960
है उसकी जो गर्माहट है वह तो एक ही जैसी है ना अग्नि तो अग्नि तभी कहलाएगी ना

80
00:05:44,960 --> 00:05:48,960
जब जलाएगी तो जलाने के स्तर के एक होने के कारण

81
00:05:48,960 --> 00:05:53,040
उन दोनों की दाहक क्षमता को एक माना जाएगा हां किसी की

82
00:05:53,040 --> 00:05:57,040
लीला ज्यादा देर तक चली हो किसी की किसी की लीला जलाने वाली कम देर तक

83
00:05:57,040 --> 00:06:01,280
चली हो मगर इसके कारण भेद करते हैं राम

84
00:06:01,280 --> 00:06:01,840
और कृष्ण

85
00:06:01,840 --> 00:06:06,560
में हालांकि अब वो भेद बंद करने लगे हैं धीरे-धीरे शटर डाउन हो रहा है।

86
00:06:06,560 --> 00:06:10,560
इस अपनी चीजों को परिवर्तित कर रहा है। और हमारा भी तो उद्देश्य यही है कि

87
00:06:10,560 --> 00:06:15,120
भैया शोधन करते चलो। धीरे से वर्णाश्रम भी

88
00:06:15,120 --> 00:06:19,360
अभी भी कुछ है लेकिन हमारी नजर में हां हां वो वो धीरे-धीरे होगा।

89
00:06:19,360 --> 00:06:23,920
मगर हमने जब से ये बात उठाई मैं देख रहा हूं करीब

90
00:06:23,920 --> 00:06:28,000
2000 21 कोरोना के बाद से लगातार देख

91
00:06:28,000 --> 00:06:32,240
रहा हूं। कोरोना के पहले अब समथिंग कोरोना के बाद से जब

92
00:06:32,240 --> 00:06:36,400
पहले बहुत जोर शोर से यह सब बातें होती थी इनके चैनल्स पर कि

93
00:06:36,400 --> 00:06:40,400
राम जो है पूर्ण है वो चंद्र पूर्णिमा का चांद है कृष्ण जी और

94
00:06:40,400 --> 00:06:44,400
ये दूसरे चांद है अन्य अवतार ये सब बातें होती थी। अब वो बातें गौर

95
00:06:44,400 --> 00:06:49,360
हो गई। अब प्रभुपाद जी का कोई वीडियो वायरल होता है जिसमें वह कहते हैं सब एक है।

96
00:06:49,360 --> 00:06:53,360
हरि हरि में तो भेद नहीं है। इतना करते हैं। वो बात

97
00:06:53,360 --> 00:06:57,520
और है कि प्रभुपाद जी जब

98
00:06:57,520 --> 00:07:01,600
हरि हरि में भेद नहीं मानते हैं। ठीक है? प्रभुपाद जी जब हरि हरि में भेद

99
00:07:01,600 --> 00:07:06,640
नहीं मानते हैं। फिर भी उन्होंने रसगत भेद को स्वीकार किया।

100
00:07:06,640 --> 00:07:10,800
वही व्यवहार वाला भेद रसगत भेद। अपने रस की दृष्टि से आपको किस में रस

101
00:07:10,800 --> 00:07:14,960
ज्यादा आ रहा है। तो रसगत भेद उन्होंने स्वीकार किया और रसगत भेद

102
00:07:14,960 --> 00:07:17,040
स्वीकार करते हुए उन्होंने अपनी भगवत गीता

103
00:07:17,040 --> 00:07:21,120
में 2.2 में यह लिख दिया कि नारायण भी संपूर्ण ऐश्वर्यवान

104
00:07:21,120 --> 00:07:25,680
नहीं है। यद्यपि वो मानते नहीं है। ये देखिए आप पर अब

105
00:07:25,680 --> 00:07:29,760
वो मानते नहीं है पर उन्होंने लिखा। तो इस आधार पे

106
00:07:29,760 --> 00:07:33,840
उनके लोग आकर के कहेंगे कि नहीं देखो प्रभुपाद नहीं मानते थे कि उनमें कोई भेद

107
00:07:33,840 --> 00:07:37,840
है। वो तो उन्होंने रस की दृष्टि से लिख दिया। सही बात है तो रस की दृष्टि

108
00:07:37,840 --> 00:07:42,000
से क्या व्यास जी नहीं लिख सकते जो उन्होंने कहीं-कहीं पर ज्यादा बखान कर दिया

109
00:07:42,000 --> 00:07:46,160
है विष्णु भगवान का और कहीं-कहीं पर शिव भगवान का

110
00:07:46,160 --> 00:07:50,240
तो शिव भगवान वाले बखान को छोड़कर के महिमा मंडन को छोड़कर के अब विष्णु

111
00:07:50,240 --> 00:07:54,240
भगवान वाले महिमा मंडन को ही केवल पकड़ते हैं वहां ये नहीं सोच सकते कि

112
00:07:54,240 --> 00:07:58,560
वो रसग भेद कर दिया उन्होंने उस समय उनको उसमें रस आ रहा था

113
00:07:58,560 --> 00:08:02,640
विष्णु स्वरूप में तो उन्होंने उसका महिमा मंडन किया और उस समय

114
00:08:02,640 --> 00:08:06,880
उनको उसमें आ रहा था तो उन्होंने उसका महिमा मंडन कर दिया

115
00:08:06,880 --> 00:08:11,200
तो यह प्रभुपाद जी का पक्ष रखने के लिए तो आएंगे

116
00:08:11,200 --> 00:08:15,520
मगर व्यास जी का पक्ष रखने नहीं आएंगे वहां पर

117
00:08:15,520 --> 00:08:19,600
नहीं व्यास जी ने जो शिव जी के बारे में कहा है वो तो तामसिकों के

118
00:08:19,600 --> 00:08:24,080
लिए है और जो इनके बारे में कहा है वो सात्विकों

119
00:08:24,080 --> 00:08:28,160
के लिए है। अब दिक्कत यह है कि जब सात्विकों के

120
00:08:28,160 --> 00:08:32,160
लिए है तो आप अपने निमंत्रण पत्रों में यह लिखा करो ना कि

121
00:08:32,160 --> 00:08:38,160
इस कौन वही आए जो सात्विक हो क्या मतलब क्या है

122
00:08:38,800 --> 00:08:42,880
आप कोई एक वो बनाओ एक मीटर वगैरह ले खड़े हो वहां के

123
00:08:42,880 --> 00:08:47,360
गेट पे स्कॉन के गेट पे और वहां पर जो है आप

124
00:08:47,360 --> 00:08:51,440
एक जो नहीं हथियार वगैरह चेक करते हैं आप कोई हथियार तो नहीं लाए

125
00:08:51,440 --> 00:08:57,440
साथ में ऐसा क्या कहते हैं उस मशीन को मेटल ल डिटक्टर

126
00:08:57,600 --> 00:09:02,000
हां हां तो ऐसे ही कोई मशीन डिटक्टर

127
00:09:02,000 --> 00:09:06,000
तो ऐसे ही मशीन मशीन तैयार करो क्या कहते हैं मेटल

128
00:09:06,000 --> 00:09:10,160
वो तामसिक डिटक्टर और उसी को लो अंदर

129
00:09:10,160 --> 00:09:14,320
भागवत उसके लिए है ना जो सात्विक है उसी को लो अंदर फिर

130
00:09:14,320 --> 00:09:18,400
सबको क्यों बांट रहे हो तुम तो मुसलमान को भी दे दे रहे हो वो चिकन खा के आ रहा है

131
00:09:18,400 --> 00:09:22,400
व्यक्ति वो कह रहा है मेरे हाथ गंदे वो श्रद्धा रख रहा है फिर तुम उसको भगवत गीता

132
00:09:22,400 --> 00:09:26,720
पकड़ा रहे अरे भैया वो तो सात्विक के लिए फिर तुम क्यों दे रहे हो तुम सिखों को मतलब

133
00:09:26,720 --> 00:09:31,040
क्या है इस बात का भाई इस बात का मतलब है नई वाली और

134
00:09:31,040 --> 00:09:35,200
इस बात नई वाली और पुरानी वाली गीता में ही भेद है पहले इस बात

135
00:09:35,200 --> 00:09:39,520
का मतलब ऐसा ही है कि जिसने जिसकी निष्ठा शिव

136
00:09:39,520 --> 00:09:43,520
में है उसके लिए विष्णु तत्व की महिमा करने वाले

137
00:09:43,520 --> 00:09:47,520
विष्णु विष्णु तत्व को प्रधान करने वाले शास्त्र तामसिक

138
00:09:47,520 --> 00:09:51,840
कहलाएंगे और जिसकी निष्ठा विष्णु में है उसके लिए शिव तत्व

139
00:09:51,840 --> 00:09:55,840
के वर्णन करने वाले जो शास्त्र है वो तामसिक कहलाएंगे।

140
00:09:55,840 --> 00:09:59,920
तो तामसिक होते हुए भी ऐसा नहीं कि उसको पढ़ना नहीं है।

141
00:09:59,920 --> 00:10:04,400
परंतु उसको अपने जो विष्णु तत्व के महिमा मंडलन के

142
00:10:04,400 --> 00:10:07,760
सीमा में रहते हुए उस

143
00:10:07,760 --> 00:10:11,920
शास्त्र को पढ़ना है। सिर्फ इतनी सी बात है वहां तामसिक और सात्विक

144
00:10:11,920 --> 00:10:16,400
की। वरना खड़े हो जाइए। वो ट वो टर्मिनेटर

145
00:10:16,400 --> 00:10:20,560
नहीं आता था। जो अपनी आंखों से सब देख लेता था। पूरा स्कैन करता था।

146
00:10:20,560 --> 00:10:24,560
ऐसे ही खड़े हो भैया गेट पर इस के गेट पर फिर तो तुम

147
00:10:24,560 --> 00:10:28,720
हरे अल्लाह अरे अल्लाह करवा रहे हो हां फिर भूल गए कि

148
00:10:28,720 --> 00:10:32,800
तुम्हारी चीजें सात्विकों के लिए है अब तुम हरे अल्लाह अरे अल्लाह करवा रहे

149
00:10:32,800 --> 00:10:37,360
हो मतलब किसी एक बात पर तो ठहर जाओ भाई

150
00:10:37,360 --> 00:10:41,360
खैर कैसे ठहरोगे जब तुम राम को नहीं जान पाए तो कैसे ठहर पाओगे

151
00:10:41,360 --> 00:10:45,600
चलिए और उनके वहां अगर सब कोई सात्विक है तो फिर पार्टनर जैसे केस

152
00:10:45,600 --> 00:10:49,760
कैसे हो रहे हैं? हां वो तामसिक थे। उनको सात्विक

153
00:10:49,760 --> 00:10:54,480
समझ के भर्ती कर लिया उन्होंने। ऐसा माना जा सकता है। खैर

154
00:10:54,480 --> 00:10:58,640
आगे चलते हैं। तो ये वाला क्लियर है ना

155
00:10:58,640 --> 00:11:02,720
कि कृष्ण और ये जो श्री रामचंद्र

156
00:11:02,720 --> 00:11:06,720
जी में क्या भेद कि ये जो बखान करते हैं लोग 16 कला

157
00:11:06,720 --> 00:11:12,720
12 गला। तो जिस सूर्य के प्रकाश से

158
00:11:13,840 --> 00:11:17,920
रोआ तक दिखाई पड़ता है। अणु रेणु आदि अनेक प्रकार के

159
00:11:17,920 --> 00:11:22,000
सूक्ष्म प्रकाश दिखाई देता है। चिरे हुए

160
00:11:22,000 --> 00:11:26,400
बाल का अगला भाग भी दिखाई देता है। वह सूर्य का प्रकाश भी

161
00:11:26,400 --> 00:11:30,480
वह वस्तु नहीं दिखा सकता। ब्रह्म पर सज्जनों

162
00:11:30,480 --> 00:11:35,200
की कृपा से साधकों को वह वस्तु भी दिखाई पड़ती है।

163
00:11:35,200 --> 00:11:39,600
जहां आक्षेपों का अंत हो जाता है। प्रयत्न व्यर्थ

164
00:11:39,600 --> 00:11:43,760
हो जाते हैं। तर्क मंद पड़ जाते हैं। अपनी वस्तु

165
00:11:43,760 --> 00:11:48,080
के संबंध में तर्क करते हुए जहां विवेक का भी वश नहीं चलता।

166
00:11:48,080 --> 00:11:52,560
शब्द लड़खड़ाते हैं। और मन की पहुंच नहीं हो सकती।

167
00:11:52,560 --> 00:11:57,280
सहस्त्र मुखी और परम वाचाल शेषनाग भी

168
00:11:57,280 --> 00:12:01,360
जिसका वर्णन करते करते थक गए वह भी नहीं बतला

169
00:12:01,360 --> 00:12:05,760
सकते कि वह वस्तु क्या है जिन वेदों ने सब कुछ प्रकाशित

170
00:12:05,760 --> 00:12:09,760
किया है और जिनके बाहर कुछ भी नहीं है वह भी किसी को वह

171
00:12:09,760 --> 00:12:14,000
वस्तु नहीं दिखा सकते वही वस्तु सत्संग और स्वानुभाव

172
00:12:14,000 --> 00:12:18,000
से समझ में आने लगती है। वही वस्तु सत्संग

173
00:12:18,000 --> 00:12:22,160
और स्वानुभाव से समझ में आने लगती है। भला ऐसा

174
00:12:22,160 --> 00:12:27,920
कौन है जो वचनों द्वारा उसकी महिमा बतला सकता हो अनिर्वचनीय

175
00:12:27,920 --> 00:12:32,080
इस माया की कला विचित्र है पर यह भी

176
00:12:32,080 --> 00:12:36,240
उस वस्तु की पहचान नहीं बतला सकती पर संत

177
00:12:36,240 --> 00:12:40,640
लोग पर संत लोग

178
00:12:40,640 --> 00:12:44,800
उसी मायातीत अनंत का मार्ग बतला सकते हैं। जिस वस्तु का वर्णन

179
00:12:44,800 --> 00:12:49,360
नहीं हो सकता वह यही संतों का स्वरूप है।

180
00:12:49,360 --> 00:12:54,240
इसलिए वचनों की आवश्यकता नहीं। संत आनंद के स्थल

181
00:12:54,240 --> 00:12:58,240
सच्चे सुख के स्वरूप और अनेक प्रकार के संतोषों के

182
00:12:58,240 --> 00:13:02,960
मूल हैं। संत स्वयं विश्रांति की भी विश्रांति

183
00:13:02,960 --> 00:13:06,960
और तृप्ति की भी तृप्ति है। यहां तक कि

184
00:13:06,960 --> 00:13:10,960
वही भक्त का परिणाम है। संत लोग धर्म के धर्म

185
00:13:10,960 --> 00:13:15,040
क्षेत्र स्वरूप के सत्पात्र और पुण्य की पवित्र भूमि

186
00:13:15,040 --> 00:13:19,600
है। वे समाधि के मंदिर विवेक के भंडार

187
00:13:19,600 --> 00:13:24,480
और सायुज्य मुक्ति के मात्र ग्रह या अधिष्ठान है।

188
00:13:24,480 --> 00:13:29,360
वे सत्य के निश्चय सार्थक की जय प्राप्ति के समय

189
00:13:29,360 --> 00:13:33,520
अब देखिए यहां पे एक बात देखने को मिल रही है। जब

190
00:13:33,520 --> 00:13:37,600
हम सज्जनों की वंदना कर रहे हैं तो बाकी सब चीजों को जितनी भी अन्य

191
00:13:37,600 --> 00:13:41,600
चीजें उनको हम उनके उसके सामने नगण्य

192
00:13:41,600 --> 00:13:45,600
बता रहे हैं। जैसे वेद के बारे में भी कहा वेद भी नहीं दिखा

193
00:13:45,600 --> 00:13:50,000
सकते और सज्जन दिखा सकते हैं। सज्जनों की वंदना चल रही है।

194
00:13:50,000 --> 00:13:54,400
तो सज्जन को भी यहां पर सद्गुरु के रूप में ही देखना चाहिए या जैसे

195
00:13:54,400 --> 00:13:58,400
सद्गुरु तक पहुंचाने वाले हो गए। सत्संग वहां करने वाले हो

196
00:13:58,400 --> 00:14:03,360
गए। पर यहां पर यह बात है कि

197
00:14:03,360 --> 00:14:07,520
हमारी चीजों को लेकर के सनातन धर्म से जुड़ी हुई घट

198
00:14:07,520 --> 00:14:12,320
सनातन धर्म से जुड़े हुए घटकों को लेकर के किस तरीके से

199
00:14:12,320 --> 00:14:16,400
समाज में समाज क्या विपक्षियों के द्वारा विरोधियों के द्वारा

200
00:14:16,400 --> 00:14:20,480
एक चवा बनाया जाता है। अरे माला फेरने से अगर

201
00:14:20,480 --> 00:14:24,480
भगवान मिल जाते या फिर पत्थर

202
00:14:24,480 --> 00:14:28,560
पूजने से यह हो जाता वह हो जाता या फिर क्या

203
00:14:28,560 --> 00:14:32,720
कहते हैं कुछ भी जो भी थोड़ा बहुत अब इसमें बात ऐसी है

204
00:14:32,720 --> 00:14:35,200
कि

205
00:14:35,200 --> 00:14:39,360
जैसे हम कहे कि हमें भोजन बनाना है भोजन बनाना है

206
00:14:39,360 --> 00:14:43,680
अब हम उसमें भोजन में आटा गथना भी है बर्नर

207
00:14:43,680 --> 00:14:47,760
को जलाना भी है रोटियां भी बेलनी है सब्जी भी

208
00:14:47,760 --> 00:14:48,800
छोंकनी

209
00:14:48,800 --> 00:14:52,880
सब्जी को भी काटना है और भी इस तरीके के भोजन बनाने

210
00:14:52,880 --> 00:14:56,880
के लिए अमुक अमुक बहुत से छोटे-छोटे से अलग-अलग कार्य हैं।

211
00:14:56,880 --> 00:15:00,880
अब जब हम बहुत वृहद हर चीज की

212
00:15:00,880 --> 00:15:05,280
व्याख्या करने पर उतर आए तो एक समय ऐसा आएगा जब हम सब्जी काटने

213
00:15:05,280 --> 00:15:09,360
की महत्ता बता रहे होंगे। है ना? और काफी

214
00:15:09,360 --> 00:15:13,600
लंबे समय तक बता रहे होंगे सब्जी काटने की महत्ता। और उस

215
00:15:13,600 --> 00:15:17,840
बात को पकड़ के कोई कहने लगे कि सब्जी काटने से भोजन मिल जाएगा।

216
00:15:17,840 --> 00:15:22,000
सब्जी काटने से भोजन कैसे मिटेगा भाई? अरे भैया जो

217
00:15:22,000 --> 00:15:26,160
भी चीजें जरूरी है भूख आपको तृप्त

218
00:15:26,160 --> 00:15:30,560
करने के लिए आपकी भूख को पूरा करने के लिए

219
00:15:30,560 --> 00:15:34,720
उन सभी घटकों को मिलाकर के जो सामंजस्य की शिक्षा

220
00:15:34,720 --> 00:15:38,880
निकलेगी या जो सामंजस्य से जो परिणाम प्राप्त होगा परिणाम पूर्वक

221
00:15:38,880 --> 00:15:43,120
जो भोजन प्राप्त होगा उससे आपकी भूख पिटेगी। तो ये बकवास

222
00:15:43,120 --> 00:15:47,120
की बातें होती है। अरे भगवान आता क्यों नहीं है? तो माला

223
00:15:47,120 --> 00:15:51,680
फेरने से भगवान नहीं मिलता। मान लो आप माला कर रहे। अरे मैं तो मन से करता हूं।

224
00:15:51,680 --> 00:15:55,920
माला फेरने से क्या हो जाएगा? या इस तरीके से आप लोग समाज

225
00:15:55,920 --> 00:16:00,080
में रहते होंगे तो आए दिन आपको इस तरह की चीजें दिखती होंगी।

226
00:16:00,080 --> 00:16:04,800
जैसे कि हम लोग जिस

227
00:16:04,800 --> 00:16:08,800
क्षेत्र में हमारी रुचि हो जाती है, जिस क्षेत्र में हमारी रुचि हो जाती है, तो

228
00:16:08,800 --> 00:16:12,800
उस क्षेत्र से जुड़ी हुई चीजें ही हमारे आसपास हमें दिखने लगती

229
00:16:12,800 --> 00:16:17,840
हैं। जैसे जब मैंने धर्म रक्षा का बीड़ा उठा लिया था तो नास्तिक

230
00:16:17,840 --> 00:16:23,120
विधर्मी हां और फिर जो है सनातना भाष

231
00:16:23,120 --> 00:16:27,200
और फिर वो जो है परंपरा भाष राम

232
00:16:27,200 --> 00:16:31,520
द्रोही शंकराचार्य द्रोही वो सब आए दिन टकराने लगे थे।

233
00:16:31,520 --> 00:16:35,520
अब इसका एक उदाहरण मैं आपको दूं। यदि आपने आप में से

234
00:16:35,520 --> 00:16:39,520
कई लोगों ने अपने घर में कोई वाहन खरीदा होगा कभी ना

235
00:16:39,520 --> 00:16:43,600
कभी है ना तो आप देखना कि जो वाहन लेने के लिए आप

236
00:16:43,600 --> 00:16:47,760
तैयारी करते हो ना मुझे यह वाला वाहन लेना है Pulsar लेनी है बुलेट लेनी

237
00:16:47,760 --> 00:16:52,320
है फिर आपको बुलेट के सारे मॉडल्स दिखने लगते हैं बाहर निकलते ही

238
00:16:52,320 --> 00:16:56,480
हां ये जा रही है ये आप उसको पीछे से ही देख के पहचान लोगे ये वो

239
00:16:56,480 --> 00:17:00,480
वाली है अभी तक नहीं जानते थे पता नहीं कितनी बार वो आंखें आंखों के

240
00:17:00,480 --> 00:17:04,560
सामने से गई होगी मगर जब आपकी रुचि हो गई ना बुलेट में या

241
00:17:04,560 --> 00:17:08,880
अमुक गाड़ी में तो आप उसके सारे मॉडल यह सेकंड मॉडल है यह फर्स्ट मॉडल

242
00:17:08,880 --> 00:17:13,120
है आप पूरा उसका देख लोगे क्योंकि अब आपको वो दिखाई देने लगेगा

243
00:17:13,120 --> 00:17:17,120
अपने आसपास तो उसी तरीके से क्या होता है

244
00:17:17,120 --> 00:17:20,320
कि अ जो

245
00:17:20,320 --> 00:17:24,400
ये जो विरोधी पक्ष है वो हमारी

246
00:17:24,400 --> 00:17:28,400
चीजों पर इस तरह से कटाक्ष करता है। अरे सद्गुरु की गुरु की

247
00:17:28,400 --> 00:17:32,400
वंदना से भगवान कैसे मिल जाएगा? अरे भाई गुरु की वंदना भगवान

248
00:17:32,400 --> 00:17:36,880
को मिलने का मिलने का एक सत्य सहता की क्रमिक अभिव्यक्ति

249
00:17:36,880 --> 00:17:40,960
है। उसका एक पायदान है। ऐसे तो आप

250
00:17:40,960 --> 00:17:44,560
ये कह दोगे कि भाई

251
00:17:44,560 --> 00:17:48,960
हमने कहा कि सुबह उठकर के और जो है

252
00:17:48,960 --> 00:17:54,000
फ्रेश होने के बाद जो है स्टच इत्यादि के बाद आपको

253
00:17:54,000 --> 00:17:58,320
हाथों को स्वच्छ अवश्य करना चाहिए। धोना चाहिए हाथों को

254
00:17:58,320 --> 00:18:02,400
और यह पवित्रता के लिए अत्यंत आवश्यक है। इससे आप

255
00:18:02,400 --> 00:18:06,640
पवित्र हो जाते हैं। अब व्यक्ति कहे अरे बिना नहाए पवित्र कैसे

256
00:18:06,640 --> 00:18:10,720
हो जाएंगे? तुमने हाथ धोने से पवित्रता कैसे मान ली भाई? हां।

257
00:18:10,720 --> 00:18:14,960
तो यह वही वाली बात है कि आप एक छोटी सी

258
00:18:14,960 --> 00:18:19,040
चीज को उसकी पूरी जो सामग्री है उसको तो आपने देखा नहीं। और आप उस एक

259
00:18:19,040 --> 00:18:23,120
चीज पर क्वेश्चन उठाने लगे। और इसीलिए हमारे यहां का क्या कहा

260
00:18:23,120 --> 00:18:27,120
गया है? समस्त श्रुति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की

261
00:18:27,120 --> 00:18:31,200
शिक्षा ही साधु संत धर्म है। किसी एक चीज को पकड़ के उसके

262
00:18:31,200 --> 00:18:35,280
पीछे वो नहीं करना है। और सामंजस्य आपको कैसे लगेगा

263
00:18:35,280 --> 00:18:35,780
कि

264
00:18:35,680 --> 00:18:39,760
आपने सनातन धर्म के सार्वभौम सिद्धांतों

265
00:18:39,760 --> 00:18:43,840
की सीमा में रहते हुए है ना जो आपके गुरुजन है

266
00:18:43,840 --> 00:18:47,840
परंपरा प्राप्त प्रमाणिक आचार्य द्वारा दिए गए सिद्धांतों की सीमा में

267
00:18:47,840 --> 00:18:52,240
रहते हुए आपने उन शास्त्रों का अध्ययन किया हो अथवा अध्ययन

268
00:18:52,240 --> 00:18:56,400
करने वाले को सुना हो तभी तो आप निचोड़ पाओगे

269
00:18:56,400 --> 00:19:00,400
कि शास्त्रों में अलग-अलग जगह अलग-अलग कई प्रकार की व्याख्या है

270
00:19:00,400 --> 00:19:04,960
तो उसका निचोड़ क्या आया व्हाट व्हाट टू डू एक्सजेक्टली जब

271
00:19:04,960 --> 00:19:09,120
भगवत पाद आदि शंकराचार्य जी अपने शिष्य के साथ बैठे तो ये संवाद उसमें

272
00:19:09,120 --> 00:19:13,280
है जो उनकी वो प्रश्न मालिका नाम का ग्रंथ

273
00:19:13,280 --> 00:19:17,760
है ना उसमें छोटा सा संवाद है बहुत सटीक

274
00:19:17,760 --> 00:19:21,920
उसमें शिष्य कहते हैं शंकराचार्य जी से कहते

275
00:19:21,920 --> 00:19:26,160
हैं कि अब मैंने सब समझ गया मैं अपने दिमाग का इस्तेमाल करके मैंने सब समझ

276
00:19:26,160 --> 00:19:30,240
लिया ब्रह्म माया दर्शन इत्यादि मैंने सब समझ गया अब ये

277
00:19:30,240 --> 00:19:35,840
बताओ मुझे करना क्या है व्हाट टू [हंसी]

278
00:19:35,840 --> 00:19:40,000
वो बड़ा कॉमिक सीन है कि भाई हम उसको घुमा तो लाए पूरा

279
00:19:40,000 --> 00:19:45,120
ब्रह्म माया हां स्वरूप भूत लक्षण सच्चिदानंद

280
00:19:45,120 --> 00:19:49,360
सब घुमा लाए नास्तिक और ये वो सब अब उसके बाद वो लास्ट

281
00:19:49,360 --> 00:19:53,680
में कहता है भाई प्रभु मुझे ये बता दो करना क्या है

282
00:19:53,680 --> 00:19:57,920
भगवान क्या कहते हैं पाद शंकराचार्य जी क्या कहते हैं

283
00:19:57,920 --> 00:20:02,640
कहते हैं कि तू कंस के शत्रु कृष्ण में

284
00:20:02,640 --> 00:20:07,120
अथवा काम के शत्रु शिव का भजन कर।

285
00:20:07,120 --> 00:20:12,000
ये कहा बहुदा आदि शंकराचार्य जी ने।

286
00:20:12,000 --> 00:20:16,480
वो पगला कोई कह रहा था मथुरा की धरती से कि

287
00:20:16,480 --> 00:20:20,480
मैं चैलेंज करता हूं सभी शंकराचार्यों

288
00:20:20,480 --> 00:20:24,480
को राम भद्राचार्यों को कि किसी ने जो है कोई यह सिद्ध करके

289
00:20:24,480 --> 00:20:29,440
बता दे कि शंकराचार्य ने कहीं पर भी भगवान के अवतार को स्वीकार किया हो।

290
00:20:29,440 --> 00:20:33,520
हम वो चैलेंज कर रहे थे। मैं अभी जब मथुरा गया था तो मैंने

291
00:20:33,520 --> 00:20:37,520
फोन मिलाया था उसको उस व्यक्ति को।

292
00:20:37,520 --> 00:20:41,520
मथुरा की पावन धरती से जिसने चैलेंज किया था ना कुछ दिनों पहले माइक

293
00:20:41,520 --> 00:20:45,680
पे देखा होगा आप लोगों ने। तो मैंने फोन मिलाया था मैं आ गया। व्हाट

294
00:20:45,680 --> 00:20:49,760
टू डू? कहां मिलोगे? तो फोन

295
00:20:49,760 --> 00:20:52,160
ही नहीं उठाया उसके बाद।

296
00:20:52,160 --> 00:20:56,160
उसने कहा मैं अभी थोड़ी देर सीधे डायरेक्ट वो व्यक्ति नहीं बोला था। वो

297
00:20:56,160 --> 00:21:00,400
नीचे उसके चैनल में जो पट्टी चलती है उस पर मैंने फोन किया था कि मैं मथुरा

298
00:21:00,400 --> 00:21:05,200
में हूं। बताइए कहां सिद्ध करना है अवतार को? बताइए मैं आ गया।

299
00:21:05,200 --> 00:21:09,200
तो बोला जो पट्टी पर जिसके पास फोन लगा था वो शायद

300
00:21:09,200 --> 00:21:13,280
व्यवस्थापक था उस कार्यक्रम का। उन्होंने कहा मैं अभी बताता हूं।

301
00:21:13,280 --> 00:21:17,360
उसने उसके बाद मैंने कई फोन मिलाए। बहुत फोन मिलाए। नो

302
00:21:17,360 --> 00:21:21,440
रिस्पांस। इसका मतलब केवल बातों के शेर

303
00:21:21,440 --> 00:21:25,520
बातों के शेर और हम बातों से ज्यादा काम करने में विश्वास रखते

304
00:21:25,520 --> 00:21:29,680
हैं कि भाई ऐसे नहीं कि हम आ जाएंगे हम आ जाएंगे हम पहुंच गए

305
00:21:29,680 --> 00:21:33,760
फिर फोन मिलाया मथुरा की पावन धरती से बताइए चलो ठीक

306
00:21:33,760 --> 00:21:37,920
है हो सकता है तुम मथुरा में नहीं हो तो बता दो कब रहोगे

307
00:21:37,920 --> 00:21:42,000
कब अरेंजमेंट हो सकता है तुमने गला फाड़ फाड़ के चिल्ला तो दिया मैं

308
00:21:42,000 --> 00:21:46,320
चैलेंज करता हूं चैलेंज करता हूं यह लोग यही है चुनौती चुनौती

309
00:21:46,320 --> 00:21:52,320
चैलेंज इसी पे ही टिके हुए थे। खैर

310
00:21:58,960 --> 00:22:03,360
जिस वस्तु का वर्णन नहीं हो सकता है वह यही संतों का स्वरूप है।

311
00:22:03,360 --> 00:22:07,360
इसलिए वचनों की आवश्यकता नहीं। संत आनंद के

312
00:22:07,360 --> 00:22:12,640
स्थल है। देखिए अनिर्वचनीय चीज में मैं आपको एक बहुत जरूरी बात बता दूं

313
00:22:12,640 --> 00:22:16,720
कि लगभग सभी विचारकों ने

314
00:22:16,720 --> 00:22:20,800
दार्शनिकों ने एक बात अंत में जाकर के कही है कि

315
00:22:20,800 --> 00:22:24,960
भाई इसके बाद की जो चीज है वो आपको बताई नहीं जा

316
00:22:24,960 --> 00:22:28,960
सकती। है ना? किसी ने उसको अचिंत कह दिया।

317
00:22:28,960 --> 00:22:33,200
किसी ने उसको तो लीला है भगवान की वो अचिंतनीय विषय है। हर जगह

318
00:22:33,200 --> 00:22:37,680
जाकर के एक यह वाली बात कहनी जरूर पड़ती है।

319
00:22:37,680 --> 00:22:43,520
पर जब आपके सामने यह वाली बात आ जाएगी कि कोई व्यक्ति अपने

320
00:22:43,520 --> 00:22:48,000
गलत बातों को छुपाने के लिए आपसे यह कह देगा कि भाई वो

321
00:22:48,000 --> 00:22:52,800
उसको समझा नहीं जा सकता तो आप वहां पर क्या करेंगे?

322
00:22:52,800 --> 00:22:57,200
जैसे आपसे स्कॉन वाला कोई कह सकता है कि भाई आपके

323
00:22:57,200 --> 00:23:01,280
जो शंकराचार्य उन्होंने भी तो अनिर्वचनीय

324
00:23:01,280 --> 00:23:05,760
कहा है यदि हम कहते हैं तो उन्होंने अनिर्वचनीय

325
00:23:05,760 --> 00:23:09,840
कहां जाकर के कहा है यह चीज देखनी होगी क्या उनके

326
00:23:09,840 --> 00:23:14,480
अनिर्वचनीय कहने से क्या ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता

327
00:23:14,480 --> 00:23:18,800
खंडित हो रही है नहीं हो रही सर्वशक्तिमान

328
00:23:18,800 --> 00:23:22,960
सिद्ध करते हुए आगे की एक स्थिति है कि गुड़

329
00:23:22,960 --> 00:23:27,200
जब खाते हो तो कैसा लगता है बताओ कौन सी नस फड़कती

330
00:23:27,200 --> 00:23:31,280
है गुड़ खाने से बताओ बता सकता है कोई तो

331
00:23:31,280 --> 00:23:34,240
यह विषय होता है अनिर्वचनी

332
00:23:34,240 --> 00:23:38,320
उसको सिर्फ फील किया जा सकता है तो महसूस किया जा सकता है

333
00:23:38,320 --> 00:23:42,480
उसको वर्णन नहीं किया जा सकता है कि हम तुम्हें बता

334
00:23:42,480 --> 00:23:46,640
सके कि हमारी आंतों में कौन सी आंत फड़कती है

335
00:23:46,640 --> 00:23:50,800
कहां से वो रिसाव होता है रस का जिसके कारण गुड़ हमें मीठा

336
00:23:50,800 --> 00:23:54,960
लगता है होता है क्या ऐसा और भी बहुत सी

337
00:23:54,960 --> 00:23:59,520
चीजें हैं जो अनिर्वचनीय है तो और शंकराचार्य

338
00:23:59,520 --> 00:24:03,520
जब अनिर्वचनीय कहते हैं तो उस अनिर्वचनीय में वह ऐसा नहीं होता

339
00:24:03,520 --> 00:24:08,160
है कि वह इस बात का जवाब ना दे रहे हो कि भैया सर्वशक्तिमान ईश्वर कैसे

340
00:24:08,160 --> 00:24:12,240
सिद्धि नहीं हो रहा है सर्वशक्तिमान और अगर इस तरीके से अनर्वचनीय

341
00:24:12,240 --> 00:24:16,400
को कहीं भी एक्सेप्ट कर लेना फिर तो रामपाल को भी एक्सेप्ट कर लो कोई प्रश्न पूछने जाओगे रामपाल

342
00:24:16,400 --> 00:24:20,480
से कह देगा अनिर्वचनीय अचिंत है लो तो रामपाल की बातें

343
00:24:20,480 --> 00:24:25,200
मान लो फिर नास्तिक कह देगा अचिंत है

344
00:24:25,200 --> 00:24:29,200
आईएस आईएस वाले कहेंगे हम कहेंगे तुम गोली क्यों दाग रहे हो गलत

345
00:24:29,200 --> 00:24:29,760
नहीं है गोली

346
00:24:29,760 --> 00:24:33,760
दागना अचिंत विषय है लो दाग दी गोली जाओ ये

347
00:24:33,760 --> 00:24:37,840
कोई बात है क्या तो उन्होंने कहां पर जाकर के

348
00:24:37,840 --> 00:24:41,920
निर्वचनीय का प्रयोग किया है ये भी समझना होगा सभी आचार्यों ने कहीं ना

349
00:24:41,920 --> 00:24:46,080
कहीं एक जगह जाकर के कहा है पर वो किस स्थिति में कहा है ऐसे नहीं

350
00:24:46,080 --> 00:24:50,240
कि जो सिद्धांत हम ही ने कहे कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है और उसी को काट

351
00:24:50,240 --> 00:24:54,720
दिया अवतार नहीं ले सकता ऐसे नहीं

352
00:24:54,720 --> 00:24:58,880
हां एक बा एक हद तक जाकर के उसको वाणी के द्वारा

353
00:24:58,880 --> 00:25:03,040
उसकी व्याख्या नहीं की जा सकती है। उस बात के लिए उन्होंने निर्वचनीय कहा है।

354
00:25:03,040 --> 00:25:07,680
तो आपको यह क्वेश्चन वहां पर करना होगा कि शंकराचार्य

355
00:25:07,680 --> 00:25:11,760
जी का कौन सा सिद्धांत है जिसको वो क्लेरिफाई बिना किए

356
00:25:11,760 --> 00:25:16,320
हुए निर्वचनीय कह रहे हैं। इस बात को याद रखिएगा। ये बात कभी ना कभी आपके सामने आ सकती है।

357
00:25:16,320 --> 00:25:19,200
है ना?

358
00:25:19,200 --> 00:25:23,120
तो इस बात को आप ध्यान रखिएगा।

359
00:25:23,120 --> 00:25:27,280
कि इस तरह की बात भी आ सकती है कि शंकराचार्य ने भी तो अनिर्वचनीय कहा है तो वहां

360
00:25:27,280 --> 00:25:31,760
पर हम कैसे उस चीज का अपना पक्ष रखेंगे।

361
00:25:31,760 --> 00:25:35,760
ठीक है? तो ये अनिर्वचनीय वाली बात बहुत रोचक रही आज

362
00:25:35,760 --> 00:25:41,760
की।

363
00:25:49,280 --> 00:25:54,240
भाई आपने जो जो क्लेम किए हैं ईश्वर सर्वशक्तिमान है

364
00:25:54,240 --> 00:25:58,640
परम स्वतंत्र मोक्ष है शाश्वत धर्म है आप ये इन क्लेम्स

365
00:25:58,640 --> 00:26:02,880
को क्लेरिफाई कर दो उसके बाद खूब कहो अनिर्वचनीय हमने

366
00:26:02,880 --> 00:26:07,520
तो कई बार कहा ना परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म सर्वशक्तिमान

367
00:26:07,520 --> 00:26:11,840
ईश्वर तीन चीजें दे दो हम आपके साथ भाई इन मामलों

368
00:26:11,840 --> 00:26:16,480
में तो हमको जाना ही जाता है कम से कम कि हमारे जो

369
00:26:16,480 --> 00:26:20,720
चीजें हैं बहुत क्लियर है। हमें क्या चाहिए?

370
00:26:20,720 --> 00:26:24,720
सब जानते हैं आवान को क्या चाहिए? एक आध व्यक्ति ने तो ऐसा वीडियो बनाया

371
00:26:24,720 --> 00:26:28,800
ऐसे करते हुए आवान को चाहिए सर्वशक्तिमान ईश्वर परम

372
00:26:28,800 --> 00:26:32,880
स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म [हंसी]

373
00:26:32,880 --> 00:26:34,480
मेरी फोटो लगाई है

374
00:26:34,480 --> 00:26:38,560
उसमें और एक व्यक्ति खड़ा कर दिया ऐसे करते

375
00:26:38,560 --> 00:26:42,560
हुए तो इतना तो जानते हैं ना क्लियर है थॉट्स हमारे हमें

376
00:26:42,560 --> 00:26:46,560
चाहिए क्या और छोटी-छोटी चीजों में अगर हम लोग जाएंगे कि ये

377
00:26:46,560 --> 00:26:50,640
ये सिद्ध करो यहां यह लिखा है या हिंदू शब्द जैसे उन्होंने कहा कि आप

378
00:26:50,640 --> 00:26:56,000
हिंदू शब्द में शास्त्रार्थ करिए हमें आर्य समाज को

379
00:26:56,000 --> 00:27:00,000
नीचा नहीं दिखाना है जो हम उसको उसको किसी छोटी सी बात पर

380
00:27:00,000 --> 00:27:04,080
जाकर के निरत्तर करके चले आए। हमें चाहिए वो

381
00:27:04,080 --> 00:27:08,400
सिद्धांत जिसको हम जहां रखें तो वहां पर हमारी

382
00:27:08,400 --> 00:27:12,800
बात कट ना पाए। बस जो जो व्यक्ति ऐसा सिद्धांत देता जाएगा

383
00:27:12,800 --> 00:27:17,200
वह सब हमारे साथ और जो जो व्यक्ति सनातन धर्म के नाम पर ऐसे सिद्धांत

384
00:27:17,200 --> 00:27:22,080
देगा जो कट रहे होंगे उन सब का हम प्रतिकार करेंगे।

385
00:27:22,080 --> 00:27:26,080
हां तो आप हमें वह सिद्धांत दीजिए। हम

386
00:27:26,080 --> 00:27:30,240
भी आर्य समाज है। क्या उसमें दिक्कत है? क्योंकि हमें लड़ना आपसे

387
00:27:30,240 --> 00:27:34,400
नहीं है। आर्य समाज से हमारी लड़ाई नहीं है। सनातन धर्म के शत्रुओं से हमारी

388
00:27:34,400 --> 00:27:38,720
लड़ाई है। और वहां पर अगर हम आपकी बातों को लेकर के जाएंगे

389
00:27:38,720 --> 00:27:42,000
तो वो

390
00:27:42,000 --> 00:27:47,760
उधर कोई ठीक-ठाक व्यक्ति आ गया तो गई भैंस पानी में।

391
00:27:47,760 --> 00:27:51,760
ठीक है तो उनको लगता है कि हम जो है उनको नीचा दिखाने

392
00:27:51,760 --> 00:27:55,760
के लिए कर रहे हैं। ये बातें मैंने की है ना पहले भी नीचा दिखाने की लड़ाई नहीं है।

393
00:27:55,760 --> 00:27:59,760
लड़ाई है अकाट्य सिद्धांतों की। हमें अकाट्य सिद्धांत दीजिए और

394
00:27:59,760 --> 00:28:03,920
हम आपके साथ हैं। क्या समझ में वो समझना ही नहीं चाहते। हिंदू

395
00:28:03,920 --> 00:28:08,240
शब्द पे करो। सर्वशक्तिमान ईश्वर बने। अरे भैया मैं कह तो रहा हूं कि एक

396
00:28:08,240 --> 00:28:13,200
ये तीन चीजें मुझे दे दो। मैं तुम्हारे सब चीजें मान लूंगा।

397
00:28:13,200 --> 00:28:17,200
और हिंदू शब्द के मानने से तुम मेरी सब चीजें नहीं मान पाओगे।

398
00:28:17,200 --> 00:28:21,440
हां ये मान सकते हो मैंने हिंदू शब्द सिद्ध कर दिया या तुमने हिंदू शब्द

399
00:28:21,440 --> 00:28:25,440
सिद्ध कर दिया तुम्हारा पक्ष तो उसमें ये हो सकता है कि हां ठीक है इस मामले में तुम

400
00:28:25,440 --> 00:28:29,520
सही थे और अगर मैंने सिद्ध कर दिया तो इस मामले में

401
00:28:29,520 --> 00:28:33,680
तुम सोच सकते हो कि मैं सही था या फिर यह सोच सकते हो कि मैं अपनी

402
00:28:33,680 --> 00:28:37,840
चीज को रख नहीं पाया ये सोच सकते हो परंतु सर्वशक्तिमान ईश्वर

403
00:28:37,840 --> 00:28:41,920
परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म तुम दोगे तो मुझे कहीं और जाने की आवश्यकता ही नहीं

404
00:28:41,920 --> 00:28:46,240
है क्योंकि यही तीन मुख्य घटक है जिनके ऊपर धर्म खड़ा हुआ है

405
00:28:46,240 --> 00:28:52,240
तो ये सोच सोचने वाली बात

406
00:28:57,920 --> 00:29:02,000
यहां तक कि वही भक्ति का परिणाम है। कौन? संत लोग। संत

407
00:29:02,000 --> 00:29:06,160
लोग धर्म के धर्म क्षेत्र स्वरूप के सत्पात्र और पुण्य की पवित्र

408
00:29:06,160 --> 00:29:10,240
भूमि है। वह समाधि के मंदिर विवेक

409
00:29:10,240 --> 00:29:14,240
के भंडार और सायुज्य मुक्ति के मात्र ग्रह या

410
00:29:14,240 --> 00:29:18,400
अधिष्ठान है। वह सत्य के निश्चय सार्थक की जय

411
00:29:18,400 --> 00:29:22,720
प्राप्ति के समय वह सत्य के निश्चय सार्थक की जय

412
00:29:22,720 --> 00:29:26,800
प्राप्ति के समय और सिद्ध स्वरूप है। वे ऐसे धनवान

413
00:29:26,800 --> 00:29:30,880
और संपन्न है जो मोक्ष स्त्री से अलंकृत है।

414
00:29:30,880 --> 00:29:35,120
इन्होंने असंख्य दरिद्र जीवों को राजा बना दिया है। जो

415
00:29:35,120 --> 00:29:39,600
दूसरे लोग बहुत समर्थ उदार तथा अत्यंत दानशूर हैं।

416
00:29:39,600 --> 00:29:43,920
वे किसी को यह ज्ञान नहीं दे सकते। बहुत से चक्रवर्ती महाराज

417
00:29:43,920 --> 00:29:48,080
हो गए हैं और आगे भी होंगे। पर वे भी किसी को

418
00:29:48,080 --> 00:29:54,080
यह सायुज्य मुक्ति नहीं दे सकते।

419
00:30:07,520 --> 00:30:11,680
बहुत से चक्रवर्ती महाराज संत और सज्जन

420
00:30:11,680 --> 00:30:15,840
ऐसा दान देते हैं जो तीनों लोकों में और कहीं भी नहीं मिल सकता। भला

421
00:30:15,840 --> 00:30:19,920
ऐसे संतों की महिमा का वर्णन किस प्रकार किया जा सकता है? जो परम

422
00:30:19,920 --> 00:30:24,640
ब्रह्म परबह्म त्रैलोक्य न्यारा

423
00:30:24,640 --> 00:30:28,640
है जो वेदों तथा श्रुतियों से भी जाना नहीं

424
00:30:28,640 --> 00:30:32,640
जा सकता वह परबह्म इन संतों की बातों

425
00:30:32,640 --> 00:30:37,120
से हृदय में प्रकट होता है। संतों की ऐसी ही महिमा है।

426
00:30:37,120 --> 00:30:41,600
उनकी जितनी उपमा दी जाए सब थोड़ी है। उनके द्वारा स्वयं परमात्मा

427
00:30:41,600 --> 00:30:44,720
प्रकट होता है। तो

428
00:30:44,720 --> 00:30:48,720
इसको भी आप सद्गुरु की वंदना ही मानिए। अब श्रोताओं

429
00:30:48,720 --> 00:30:52,960
की वंदना आ रही है। अब उन श्रोताओं की वंदना

430
00:30:52,960 --> 00:30:57,200
करता हूं जो भक्त, ज्ञानी, संत, सज्जन, विरक्त, योगी, गुण संपन्न

431
00:30:57,200 --> 00:31:01,520
और सत्यव्याधि है। इनमें से कोई सत्वगुण के सागर,

432
00:31:01,520 --> 00:31:05,600
कोई बुद्धि के आगर और कोई अनेक प्रकार के शब्दों शब्द रत्नों

433
00:31:05,600 --> 00:31:09,680
की खान है। यह अनेक प्रकार के अर्थ रूपी अमृत का

434
00:31:09,680 --> 00:31:13,760
भोग करने वाले हैं। अवसर पड़ने पर वक्ताओं के भी वक्ता

435
00:31:13,760 --> 00:31:18,160
और अनेक प्रकार के संशयों का नाश करने वाले दृढ़ निश्चय

436
00:31:18,160 --> 00:31:22,160
है। यह अपार धारणा वाले ईश्वर के अवतार और

437
00:31:22,160 --> 00:31:22,960
प्रत्यक्ष

438
00:31:22,960 --> 00:31:26,960
बैठे हुए देवता है अथवा यह शांत स्वरूप

439
00:31:26,960 --> 00:31:31,440
सात्विक ऋषि स्वरों की मंडली है। जिससे सभा

440
00:31:31,440 --> 00:31:35,840
स्थल परम सुशोभित है। इनके हृदय में परमात्मा और मुख पर सरस्वती

441
00:31:35,840 --> 00:31:39,920
विलास करती है। साहित्य विषयक बातें करने में यह

442
00:31:39,920 --> 00:31:43,920
साक्षात बृहस्पति हैं। यह पवित्रता में अग्नि के

443
00:31:43,920 --> 00:31:48,400
समान और स्फूर्ति किरणों के सूर्य हैं। इनकी

444
00:31:48,400 --> 00:31:52,480
ज्ञान दृष्टि के सामने ब्रह्मांड कोई चीज नहीं है।

445
00:31:52,480 --> 00:31:56,720
यह अखंड सावधान तीनों कालों का ज्ञान रखने वाले, सदा अभिमान

446
00:31:56,720 --> 00:32:00,880
शून्य रहने वाले और आत्मज्ञानी है। ऐसी कोई

447
00:32:00,880 --> 00:32:05,280
चीज नहीं है जो इनकी दृष्टि में ना आई हो। इनके मन में पदार्थ मार

448
00:32:05,280 --> 00:32:09,440
मात्र का ज्ञान है। इन्हें जो कुछ स्मरण कराया जाता है वह

449
00:32:09,440 --> 00:32:13,520
सब पहले से ही इन्हें ज्ञात होता है। तब भला इनके सामने अपना

450
00:32:13,520 --> 00:32:19,520
ज्ञान दिखलाते हुए क्या कहा जा सकता है? एक तरीके से यह

451
00:32:19,520 --> 00:32:23,760
सद्गुरु सद्गुरु के साथ-साथ अब संत जो अन्य

452
00:32:23,760 --> 00:32:27,840
संतों की उनको सज्जन कहा गया है। संतों की वंदना हो गई। अब उसके

453
00:32:27,840 --> 00:32:31,920
साथ-साथ फिर जो और जो परिकर श्रोताओं इत्यादि मतलब

454
00:32:31,920 --> 00:32:36,560
मुख्य शिष्य मान लीजिए या संतों को सुनने वाले मान लीजिए जो

455
00:32:36,560 --> 00:32:38,320
यथार्थ ज्ञान देते हैं। प्रामाणिक

456
00:32:38,320 --> 00:32:42,400
आचार्यों का यथार्थ ज्ञान नहीं देते। यथार्थ मार्गदर्शन करते

457
00:32:42,400 --> 00:32:46,560
हैं संतों के हेतु में। तब भला इन

458
00:32:46,560 --> 00:32:51,200
पर यह गुण गुण ग्राही है। मतलब यह

459
00:32:51,200 --> 00:32:55,360
चीजें सुनना चाहते हैं, समझना चाहते हैं। अतः निशंक होकर

460
00:32:55,360 --> 00:32:59,600
कहता हूं भला कौन सी ऐसी चीज है जिसका भाग्यवान लोग सेवन

461
00:32:59,600 --> 00:33:03,600
नहीं करते। वे भाग्यवान सदा अच्छे-अच्छे अन्न खाते हैं।

462
00:33:03,600 --> 00:33:07,680
पर फिर भी स्वाद बदलने के विचार से कभी रूखा सूखा अन्न भी खा

463
00:33:07,680 --> 00:33:11,920
ही लेते हैं। मेरे प्राकृत वचन भी इनके लिए उसी रूखे

464
00:33:11,920 --> 00:33:16,240
सूखे अन्न के समान है। अपनी शक्ति और भाव के अनुसार

465
00:33:16,240 --> 00:33:20,240
ईश्वर की पूजा की जाती है। यह कहीं नहीं कहा गया

466
00:33:20,240 --> 00:33:24,480
कि ईश्वर की पूजा ही ना की जाए। मेरी वाक शक्ति

467
00:33:24,480 --> 00:33:29,440
बहुत दुर्बल है और श्रोता स्वयं परमेश्वर है। अतः

468
00:33:29,440 --> 00:33:33,520
लड़खड़ाती हुई वाचा से ही इनका पूजन करना चाहता हूं।

469
00:33:33,520 --> 00:33:38,400
मुझ में विद्वता कला चातुर्य काव्य प्रबंधन की शक्ति

470
00:33:38,400 --> 00:33:42,880
भक्ति ज्ञान या वैराग्य आदि कुछ भी नहीं है। वचनों की मधुरता

471
00:33:42,880 --> 00:33:47,760
भी नहीं है। बस इसी प्रकार की मेरी बातें हैं।

472
00:33:47,760 --> 00:33:53,440
अब देखिए लिखने वाला अपने आप को दास्य भाव में प्रकट कर रहा है कि नहीं?

473
00:33:53,440 --> 00:33:53,940
अब

474
00:33:53,840 --> 00:33:57,920
यहां पर कह दिया जाए कि भैया वह देखो समर्थ रामदास

475
00:33:57,920 --> 00:34:02,160
जी ने तो कहा है कि मेरे अंदर कुछ भी नहीं है तो उनकी क्यों

476
00:34:02,160 --> 00:34:06,320
सुने तो पता ही होगा आप लोगों को इसका जवाब

477
00:34:06,320 --> 00:34:11,360
क्या है रामपाल ये कहते हैं ना हां

478
00:34:11,360 --> 00:34:15,760
कि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में स्वयं को

479
00:34:15,760 --> 00:34:19,840
तुच्छ कहा है गलत कहा है उल्टा सीधा कहा है तो क्या जवाब

480
00:34:19,840 --> 00:34:24,320
है उसका कि रामपाल ने भी स्वयं को कुत्ता कहा है।

481
00:34:24,320 --> 00:34:28,320
कि हम तो कुत्ते हैं। कबीर के ह? कुत्ते

482
00:34:28,320 --> 00:34:33,040
की बात क्यों सुने भाई? ह ये मैं नहीं कह रहा हूं। रामपाल

483
00:34:33,040 --> 00:34:37,760
ने ही स्वयं कहा है और फिर कबीर दास जी ने भी कहा है स्वयं को।

484
00:34:37,760 --> 00:34:42,320
तो ये दास्य भाव होता है। जिसका हम सम्मान कर रहे हैं उसके प्रति

485
00:34:42,320 --> 00:34:46,720
अपना दासता अपनी प्रकट करने के लिए जिससे कि उसको अपनी महानता

486
00:34:46,720 --> 00:34:50,720
दिखाई दे। समझ में आए। वचनों की मधुरता भी नहीं है। बस इसी प्रकार

487
00:34:50,720 --> 00:34:54,960
से मेरी बातें हैं। पर ईश्वर भाव का भोगता कहा गया है। अतः

488
00:34:54,960 --> 00:34:58,960
मैं स्वच्छंदता भाव से कुछ कहता हूं। हे श्रोताओं

489
00:34:58,960 --> 00:35:03,040
आप जगदीश की मूर्ति हैं। आपके सामने मेरी विद्या कुछ भी नहीं है।

490
00:35:03,040 --> 00:35:07,040
मैं बुद्धिहीन और अल्पमति आपके सामने दृष्टता करता

491
00:35:07,040 --> 00:35:08,880
हूं। संसार में समर्थ

492
00:35:08,880 --> 00:35:13,200
का पुत्र चाहे जितना चाहे कितना ही मूर्ख क्यों ना हो

493
00:35:13,200 --> 00:35:17,200
तो भी उसमें कुछ सामर्थ्य होती ही है। यही समझकर आप

494
00:35:17,200 --> 00:35:21,360
संतों के सामने दृष्टता करता हूं। भयानक बाघों

495
00:35:21,360 --> 00:35:25,360
और सिंहों को देखकर लोग भयभीत होते हैं। पर उनकी संतान

496
00:35:25,360 --> 00:35:29,600
निशंक होकर

497
00:35:29,600 --> 00:35:33,920
उनके सामने खेलती है। इसी प्रकार मैं भी आप संतों का सेवक हूं

498
00:35:33,920 --> 00:35:38,160
और आप लोगों से कुछ कहता हूं। आप लोग मेरी दृष्टता

499
00:35:38,160 --> 00:35:42,160
पर ध्यान देंगे।

500
00:35:42,160 --> 00:35:46,320
अपना आदमी जो कुछ कहता है उसका समर्थन करना ही पड़ता है। अतः

501
00:35:46,320 --> 00:35:50,320
मेरी बातों में जो न्यूनता हो। अब इसका अर्थ ये नहीं है अपना

502
00:35:50,320 --> 00:35:54,400
आदमी जो कुछ कहता है तो जो है वो रावण का

503
00:35:54,400 --> 00:35:58,480
साथ देना उचित है। हिरण्यकश्यप का साथ देना उचित है।

504
00:35:58,480 --> 00:36:02,480
हां। यहां पे रसगत बात कही जा रही है। अब यहां

505
00:36:02,480 --> 00:36:06,960
स्कॉल वाले एज इट इज मान ले। हिरण्याक्ष जो कहेगा हिरण्यकश्यप

506
00:36:06,960 --> 00:36:11,600
वही करेंगे प्रह्लाद वो उचित माना जाएगा

507
00:36:11,600 --> 00:36:17,600
ऐसे नहीं होता है या फिर जो बाली कहेगा वही सुग्रीव मानेगा

508
00:36:18,000 --> 00:36:22,400
ऐसे नहीं होता है तो यहां पर दासता

509
00:36:22,400 --> 00:36:26,480
प्रकट की जा रही है। उस भाव में बहते हुए ये बात कही जा रही

510
00:36:26,480 --> 00:36:30,400
है। अतः

511
00:36:30,400 --> 00:36:35,440
इसी प्रकार यह तो प्रीति का लक्षण है।

512
00:36:35,440 --> 00:36:39,600
अतः मेरी बातों में जो न्यूनता हो उसकी पूर्ति आप लोग कर लें। यह

513
00:36:39,600 --> 00:36:43,760
तो प्रीति का लक्षण है जो मन स्वभावतः कर लेता है। इसी प्रकार

514
00:36:43,760 --> 00:36:48,160
आप संत और सज्जन लोग विश्व के माता-पिता हैं। मेरा

515
00:36:48,160 --> 00:36:52,400
भाव जानकर जो उचित हो वह करें। अंत में यह दासानुदास

516
00:36:52,400 --> 00:36:57,040
यही कहता है कि आप लोग आगे कथा में ध्यान दें।

517
00:36:57,040 --> 00:36:57,540
अभी

518
00:36:57,440 --> 00:37:01,680
हम श्रोताओं से बात की जा रही है। जो पढ़ रहे हैं ना उसके

519
00:37:01,680 --> 00:37:05,680
लिए यह सब कहा गया है। सोचिए पढ़ने वालों से कितनी उन्होंने

520
00:37:05,680 --> 00:37:09,280
वो की है।

521
00:37:09,280 --> 00:37:12,000
क्या कहेंगे इसे? प्रार्थना।

522
00:37:12,000 --> 00:37:16,080
अब मैं कवि ईश्वर की वंदना करता हूं जो शब्द सृष्टि के ईश्वर

523
00:37:16,080 --> 00:37:20,400
बल्कि स्वयं परमेश्वर और वेदों के अवतार हैं। यह सरस्वती के वास स्थान

524
00:37:20,400 --> 00:37:22,560
है।

525
00:37:22,560 --> 00:37:23,920
अथवा नाना कलाओं

526
00:37:23,920 --> 00:37:27,920
इसको अगले अगली बार कर देते हैं। थोड़े से प्रश्न उत्तर ले

527
00:37:27,920 --> 00:37:33,920
लेते हैं। और

528
00:37:34,080 --> 00:37:38,240
जो जिनजिन का प्रश्न है वह अपने हैंड रे कर ले। एक एक करके

529
00:37:38,240 --> 00:37:42,240
सारे प्रश्न हो जाए।
