1
00:00:04,480 --> 00:00:08,560
तो मैं आपको बता रहा था कि जो हमारा जो हम ज्ञानास्त्र

2
00:00:08,560 --> 00:00:12,720
का केंद्र बना रहे हैं यहां लखनऊ में वो काफी जो शहरी

3
00:00:12,720 --> 00:00:16,800
वातावरण है उससे काफी दूर है और वहां

4
00:00:16,800 --> 00:00:21,520
जाने आने में बीच में एक फ्लाई ओवर बन रहा है। निर्माणाधीन है जो

5
00:00:21,520 --> 00:00:25,920
और उसमें कोई डिस्प्यूट हो गया है। जिस कारण से उसका काम

6
00:00:25,920 --> 00:00:30,720
रुका हुआ है। उस कारण से आवागमन बहुत प्रभावित है। जो

7
00:00:30,720 --> 00:00:35,840
20 मिनट की यात्रा है वो क्या कहते हैं एक घंटे में होती है वहां।

8
00:00:35,840 --> 00:00:40,160
तो यह भी है और क्या है कि वह जो ज्ञानाश्र

9
00:00:40,160 --> 00:00:44,400
केंद्र है वहां पर अभी प्रत्येक

10
00:00:44,400 --> 00:00:48,400
सप्ताह रविवारीय संगोष्ठी नहीं कर रहे हैं। अभी वहां मासिक संगोष्ठी

11
00:00:48,400 --> 00:00:52,560
कर रहे हैं। तो प्रत्येक माह द्वितीय रविवार को

12
00:00:52,560 --> 00:00:56,640
वहां पर संगोष्ठी होती है और काफी भव्य आयोजन होता

13
00:00:56,640 --> 00:01:01,040
है। तो अभी मैं वहीं से आ रहा हूं सीधे-सीधे और

14
00:01:01,040 --> 00:01:05,040
वही वो ट्रैफिक वगैरह झेलते हुए अभी बहुत सारी

15
00:01:05,040 --> 00:01:09,920
वहां पर कमियां है जैसे वहां की जो बिल्डिंग है बहुत

16
00:01:09,920 --> 00:01:13,920
गलत तरीके से बनाई गई है पूर्व में जिसका जहां मन

17
00:01:13,920 --> 00:01:18,160
हुआ मतलब जैसे बनवाने वाला व्यक्ति है उसको कोई ज्ञान

18
00:01:18,160 --> 00:01:19,680
नहीं है बनवाने का

19
00:01:19,680 --> 00:01:23,840
तो वो अगर किसी मिस्त्री को लेकर आया मिस्त्री ने बताया कि ऐसे

20
00:01:23,840 --> 00:01:27,920
से ऐसे बना दें तो उसने वो बना दिया फिर अगली बार नया मिस्त्री लिया है तो उसने नए तरीके से

21
00:01:27,920 --> 00:01:32,640
बना दिया। तो ऐसे करके वो जो बिल्डिंग है वह फ्रेंकेस्टाइन

22
00:01:32,640 --> 00:01:37,280
जैसी बन गई। फ्रेंकेस्टाइन जानते हैं आप लोग क्या है? फ्रेंकिस्टाइन

23
00:01:37,280 --> 00:01:41,360
कोई जानता है क्या?

24
00:01:41,360 --> 00:01:45,360
जो हां हां मालूम जानता हूं भैया। जो

25
00:01:45,360 --> 00:01:49,840
ये ड्रैकुला की लोक कथाएं हैं ना उसमें एक

26
00:01:49,840 --> 00:01:53,920
पात्र आता है जो एक डॉक्टर ने मरे

27
00:01:53,920 --> 00:01:58,160
हुए लोगों की लाशें चुरा करके उनके अंग प्रत्यंग

28
00:01:58,160 --> 00:02:02,240
आपस में सी करके जोड़ा था और फिर उसमें जान डाल दी

29
00:02:02,240 --> 00:02:06,320
थी। तो उसकी आंख एक व्यक्ति की थी

30
00:02:06,320 --> 00:02:10,480
का एक आंख किसी व्यक्ति की एक आंख किसी व्यक्ति की एक कान किसी व्यक्ति का

31
00:02:10,480 --> 00:02:14,640
एक आंख एक कान किसी व्यक्ति का एक टांग किसी व्यक्ति की। इस तरीके

32
00:02:14,640 --> 00:02:18,640
से उसके शरीर का हर अंग अलग-अलग लाशों से लिया गया

33
00:02:18,640 --> 00:02:23,360
था। और उन सबको सी करके जोड़ करके वह व्यक्ति बना था।

34
00:02:23,360 --> 00:02:27,360
उसको नाम दिया गया था फ्रेंकेस्टाइन। तो वो जो बिल्डिंग

35
00:02:27,360 --> 00:02:31,760
हमें प्राप्त हुई है वह गुरुकुल के लिए तो कुछ फ्रेंकेस्टाइन की याद दिलाती है।

36
00:02:31,760 --> 00:02:34,800
है ना? कि कोई कोई कमरा

37
00:02:34,800 --> 00:02:39,200
किसी मिस्त्री के अनुसार बना है। कोई कमरा किसी मिस्त्री के अनुसार बना है।

38
00:02:39,200 --> 00:02:43,200
कोई तो वो भी वहां पर बहुत सारे कार्य

39
00:02:43,200 --> 00:02:48,880
हैं। निर्वाणाधीन है जो पर कर्मण्यवादी कारस्त माफ सुदाचना

40
00:02:48,880 --> 00:02:53,120
वही से आ रहे थे। इस कारण से देर हो गई।

41
00:02:53,120 --> 00:02:57,200
और आप लोगों का सेशन देखा हमने वह जो भाषण प्रतियोगिता का

42
00:02:57,200 --> 00:03:00,400
था जो

43
00:03:00,400 --> 00:03:04,560
बहुत अच्छा था प्रभावित कर दिया। काफी प्रशंसा

44
00:03:04,560 --> 00:03:08,560
भी मिल रही है उसको और प्रयास रहेगा कि

45
00:03:08,560 --> 00:03:14,160
भविष्य में भी इस प्रकार के आयोजन कराते रह।

46
00:03:14,160 --> 00:03:19,360
हमने पिछली बार कहां तक पढ़ लिया था?

47
00:03:19,360 --> 00:03:25,360
मां शारदा की स्तुति चालू होनी थी क्या

48
00:03:26,480 --> 00:03:31,120
नारायण समारंभाम शंकराचार्य मध्यमाम अस्मदाचार्य पर्यंतम

49
00:03:31,120 --> 00:03:34,080
वंदे गुरु परंपरा

50
00:03:34,080 --> 00:03:38,320
तो दास बोध हम पढ़ रहे हैं और हमने भूमिका बहुत रोचक तरीके

51
00:03:38,320 --> 00:03:42,720
से पढ़ ली है पिछली बार हमने

52
00:03:42,720 --> 00:03:46,800
कुछ स्तुतियां की थी ग्रंथारंभ

53
00:03:46,800 --> 00:03:50,880
निरूपण एक तरीके से यह भी भूमिका ही थी। उसके बाद गणेश जी की

54
00:03:50,880 --> 00:03:55,040
स्तुति और फिर हमने अब शारदा स्तुति

55
00:03:55,040 --> 00:03:59,040
पढ़नी है। तीसरा समास। अब मैं

56
00:03:59,040 --> 00:04:03,680
वेद का अब मैं वेद माता ब्रह्म ब्रह्मसता

57
00:04:03,680 --> 00:04:07,840
शब्द मूला वाग देवता महामाया

58
00:04:07,840 --> 00:04:12,880
वाग देवता वाग स्कलन वाला नहीं वाग देवता महामाया

59
00:04:12,880 --> 00:04:17,680
श्री शारदा की वंदना करता हूं। जो मुख से

60
00:04:17,680 --> 00:04:22,240
शब्द निकलवाती है। अपार वाणी कहलवाती है

61
00:04:22,240 --> 00:04:26,240
और जो निशब्द के मन का भाव भी भेदित कराती है। इससे मुझे

62
00:04:26,240 --> 00:04:29,200
याद आया कि कैसे

63
00:04:29,200 --> 00:04:33,280
बातों का बतंगड़ बनाया जाता है। पूज्य कृपात्री

64
00:04:33,280 --> 00:04:37,520
जी महाराज से प्राप्त जो सिद्धांत था कि जीव

65
00:04:37,520 --> 00:04:41,920
की चाह का वास्तविक विषय ही ईश्वर है और

66
00:04:41,920 --> 00:04:46,640
ईश्वर स्वरूप मोक्ष या मोक्ष स्वरूप ईश्वर ज्ञान स्वरूप ईश्वर

67
00:04:46,640 --> 00:04:51,040
को प्राप्त कराने वाली विधा का नाम धर्म है। यह सब मुझे

68
00:04:51,040 --> 00:04:55,520
इन आचार्यों के माध्यम से ही प्राप्त हुआ और

69
00:04:55,520 --> 00:05:00,000
इसी सिद्धांत को जब एक

70
00:05:00,000 --> 00:05:04,080
मतलब मैं किसी से भी मिलता हूं तो अगर कोई भी प्रसंग आ जाता

71
00:05:04,080 --> 00:05:08,160
है तो मैं इस सिद्धांत को जल्दी से जल्दी

72
00:05:08,160 --> 00:05:12,240
सामने वाले को देता हूं बताता

73
00:05:12,240 --> 00:05:17,360
हूं उसे कि यह सिद्धांत है सनातन का और ऐसे में

74
00:05:17,360 --> 00:05:21,520
मुझे ये विजयश्री जो तब रिदमम

75
00:05:21,520 --> 00:05:25,680
कपूर थी मेरे संपर्क में अभी-अभी आई थी और इनका

76
00:05:25,680 --> 00:05:29,760
कहीं पर इंटरव्यू होना था और मैंने पूर्व अपने आचार्यों से ली

77
00:05:29,760 --> 00:05:34,240
हुई जो वाणी थी वो वाणी एज इट इज उनको फॉरवर्ड

78
00:05:34,240 --> 00:05:38,400
कर दी कि जीव की चाह का वास्तविक विषय सच्चिदानंद स्वरूप

79
00:05:38,400 --> 00:05:42,480
परमेश्वर को प्राप्त कराने वाली विधा का नाम ही ईश्वर है। विधा का नाम ही धर्म

80
00:05:42,480 --> 00:05:44,400
है। तो जब मैंने उनको

81
00:05:44,400 --> 00:05:48,480
फॉरवर्ड कर दी और उन्होंने अपने और उन्होंने मुझसे पूछा था ये कोई

82
00:05:48,480 --> 00:05:53,120
प्रसंग वस नहीं है। उन्होंने मुझसे फोन करके पूछा था कि

83
00:05:53,120 --> 00:05:57,120
भाई मेरा इंटरव्यू होना है कहीं पर मुझे बुलाया गया है पडकास्ट

84
00:05:57,120 --> 00:06:01,120
के लिए तो हो सकता है कि वहां पर मेरे समक्ष ये सवाल आ जाए

85
00:06:01,120 --> 00:06:05,280
कि धर्म क्या है तो मैं मेरा क्या उत्तर होना चाहिए तो मैंने उनको

86
00:06:05,280 --> 00:06:09,440
ये उत्तर दिया था यही उत्तर एज इट इज जाकर के उन्होंने इंग्लिश में वहां

87
00:06:09,440 --> 00:06:13,920
पर बोला अब जब मैं मेरे आचार्य के द्वारा

88
00:06:13,920 --> 00:06:18,480
प्राप्त हमारे पूर्वाचार्य के द्वारा हमें प्राप्त जो सिद्धांत

89
00:06:18,480 --> 00:06:22,560
है वो जब हम किसी व्यक्ति के द्वारा सुन रहे हैं जिस जिसके बारे में

90
00:06:22,560 --> 00:06:27,040
हम जानते हैं कि उसकी गति अभी बहुत ज्यादा नहीं हुई है तो उसके

91
00:06:27,040 --> 00:06:31,120
प्रोत्साहन के लिए कि उसकी उसका और चिंतन हो आचार्यों

92
00:06:31,120 --> 00:06:35,200
की वाणी में उसके प्रोत्साहन के लिए और लोगों को यह बताने के लिए कि

93
00:06:35,200 --> 00:06:39,520
भाई ये जो बोल रहा है ये इसके पास कहां से आया है? मेरा कह देना

94
00:06:39,520 --> 00:06:43,520
यह कि आपके मुख से स्वयं श्री करपात्री

95
00:06:43,520 --> 00:06:47,520
जी महाराज ही बोल रहे हैं। यह कह देना कहां तक अनुचित है? इस

96
00:06:47,520 --> 00:06:52,080
बात का इतना पतंगड़ बनाया उस धूर्त व्यक्ति ने भागवतानंद

97
00:06:52,080 --> 00:06:56,240
ने कि अरे इसको तो करपात्री जी महाराज नजर आ रहे हैं। अब यह बताओ यहां पर क्या

98
00:06:56,240 --> 00:06:59,920
लिखा है? ये ग्रंथ में क्या लिखा है यहां पर?

99
00:06:59,920 --> 00:07:03,920
हां। स्वयं सरस्वती माता नजर आ रही है कि

100
00:07:03,920 --> 00:07:07,920
नहीं? ग्रंथ के माध्यम ग्रंथ में स्वयं सरस्वती माता के

101
00:07:07,920 --> 00:07:13,600
द्वारा शब्द निकलवाए जा रहे हैं ना। कहां गया सिद्धांत? उसका

102
00:07:13,600 --> 00:07:17,680
लोग कह देते हैं कि अरे इसकी ऐसे गलत

103
00:07:17,680 --> 00:07:21,920
बातें नहीं बोला करते हैं। कभी दिन भर में कभी-कभी सरस्वती माता बैठ जाती। सरस्वती

104
00:07:21,920 --> 00:07:26,320
मां की माता की तुलना हो गई उस व्यक्ति से। हो

105
00:07:26,320 --> 00:07:30,560
सकता है मदिरापान करने वाला हो, हो सकता है मांसाहारी व्यक्ति हो, व्यभचारी व्यक्ति

106
00:07:30,560 --> 00:07:34,720
हो। तो क्यों कह देते हैं? और यहां यहां ये ग्रंथ

107
00:07:34,720 --> 00:07:38,960
ये समर्थ रामदास जी के समर्थ रामदास जी भी गलत हो गए।

108
00:07:38,960 --> 00:07:42,960
जो यह कह रहे हैं कि जो जो मुख से शब्द निकलवाती हैं करपात्र्री जी को

109
00:07:42,960 --> 00:07:46,960
भूल जाओ छोड़ दो आचार्य जी को छोड़ दो आप

110
00:07:46,960 --> 00:07:51,520
यहां तो स्वयं सरस्वती माता निकलवा रही हैं मुख से वचन

111
00:07:51,520 --> 00:07:55,600
तो क्या किसी निकृष्ट व्यक्ति के मुख से जो वचन निकलते हैं

112
00:07:55,600 --> 00:07:59,760
वो सरस्वती माता की सीमा के बाहर निकलते हैं क्या मूर्ख

113
00:07:59,760 --> 00:08:01,920
व्यक्ति

114
00:08:01,920 --> 00:08:06,160
अरे सरस्वती माता की सीमा के बाहर तो वह वचन

115
00:08:06,160 --> 00:08:10,000
भी नहीं होते हैं जो धर्म विरुद्ध

116
00:08:10,000 --> 00:08:14,000
हम और जो धर्म संगत वचन है उनके लिए तू विरोध

117
00:08:14,000 --> 00:08:15,200
कर रहा है

118
00:08:15,200 --> 00:08:19,200
कि करपात्री जी नजर आ रहे हैं। इस बात का तू विरोध कर रहा है। यहां

119
00:08:19,200 --> 00:08:23,360
तो ग्रंथकार को सरस्वती माता नजर आ रही है। कर विरोध और

120
00:08:23,360 --> 00:08:28,640
हजारों लाखों जगह ऐसे और उदाहरण मिल जाएंगे।

121
00:08:28,640 --> 00:08:33,280
जहां पर इस तरह इस प्रकार से किसी ना किसी बड़े

122
00:08:33,280 --> 00:08:37,360
व्यक्तित्व का उदाहरण या बड़े व्यक्तित्व से तुलना की

123
00:08:37,360 --> 00:08:41,360
गई होगी किसी की वाणी की। हम

124
00:08:41,360 --> 00:08:45,360
खैर तो यहां पर समर्थ रामदास जी बोल रहे हैं कि जो मुख

125
00:08:45,360 --> 00:08:48,560
से शब्द निकलवाती है

126
00:08:48,560 --> 00:08:54,560
अपार वाणी कहलवाती है

127
00:08:55,440 --> 00:09:01,440
जो मुख से शब्द कहलवाती है अपार अपार वाणी

128
00:09:10,640 --> 00:09:16,640
वो मिली नहीं

129
00:09:20,240 --> 00:09:25,120
निश्चय लोगों दृढ़ निश्चय लोगों की दृढ़ता है

130
00:09:25,120 --> 00:09:29,600
और जो विद्या होने के कारण अविद्या को नष्ट करती है जो महापुरुषों

131
00:09:29,600 --> 00:09:33,600
की तुरिया अथवा चतुरता अवस्था में परम निकट रहने वाली

132
00:09:33,600 --> 00:09:37,600
माया आया है। अब देख लो भैया यहां पर किस

133
00:09:37,600 --> 00:09:42,960
सिद्धांत का प्रतिपादन हो रहा है। अक्सर लोग यह कहते हैं

134
00:09:42,960 --> 00:09:46,960
कि जब सब कुछ

135
00:09:46,960 --> 00:09:52,080
माया है तो फिर वेद को क्यों मान रहे हो?

136
00:09:52,080 --> 00:09:56,160
फिर आप जो है भगवान का आलंबन क्यों ले रहे हो? अब भगवान

137
00:09:56,160 --> 00:10:00,320
के अवतार का आलंबन क्यों ले रहे हो? जब सब कुछ माया है

138
00:10:00,320 --> 00:10:04,880
तो धर्म का आलंबन क्यों ले रहे वह भी तो माया हुआ। यह अद्वैत

139
00:10:04,880 --> 00:10:09,120
के विरोध में इस तरह के आते हैं ना कुतर्क। तो यह देख लो यहां पर क्या जवाब

140
00:10:09,120 --> 00:10:10,560
आ रहा है।

141
00:10:10,560 --> 00:10:14,560
जो विद्या होने के कारण अविद्या

142
00:10:14,560 --> 00:10:18,560
को नष्ट करती है। इसके आगे लिखा है जो

143
00:10:18,560 --> 00:10:22,880
महापुरुषों की तुरिया अथवा चतुरता अवस्था में परम निकट

144
00:10:22,880 --> 00:10:26,880
रहने वाली माया है। मुक्ति को प्राप्त होने

145
00:10:26,880 --> 00:10:31,120
की कगार पर हैं। उनके परम निकट जो माया रहती है। वह

146
00:10:31,120 --> 00:10:35,280
भी माया ही है। मगर माया का वह स्वरूप है जो आपको मुक्त कराएगी।

147
00:10:35,280 --> 00:10:39,520
इसी प्रकार से जो धर्म के रूप में हमें प्राप्त भेद है,

148
00:10:39,520 --> 00:10:43,520
वेद के रूप में प्राप्त जो हमें भेद है,

149
00:10:43,520 --> 00:10:47,760
शास्त्रों के रूप में प्राप्त जो हमें व्यवहारिक भेद है,

150
00:10:47,760 --> 00:10:52,400
वो भगवान की वही शक्ति है

151
00:10:52,400 --> 00:10:56,800
जो भगवान की शक्ति से निर्मित प्रपंच रूपी संसार

152
00:10:56,800 --> 00:11:00,880
में हम फंसे हुए लोगों को मुक्त

153
00:11:00,880 --> 00:11:06,880
कराएगी। ठीक है?

154
00:11:10,960 --> 00:11:15,040
जिसके लिए साधु लोग बड़े-बड़े कार्यों में प्रवत्त होते हैं। जो

155
00:11:15,040 --> 00:11:19,920
महान लोगों की शांति ईश्वर की निज शक्ति अरे वाह

156
00:11:19,920 --> 00:11:23,920
अभी मैंने यह शब्द बोले ज्ञानियों की विरक्ति और निराशा की

157
00:11:23,920 --> 00:11:28,080
भी शोभा है जो अनंत ब्रह्मांडों की रचना करती और

158
00:11:28,080 --> 00:11:32,080
विनोद में ही उन्हें नष्ट करती है और जो स्वयं आदि पुरुष की

159
00:11:32,080 --> 00:11:36,400
आड़ में खड़ी रहती है जो केवल प्रत्यक्ष देखने से ही दिखाई पड़ती

160
00:11:36,400 --> 00:11:40,800
है और विचार करने से अदृश्य हो जाती है

161
00:11:40,800 --> 00:11:45,040
और ब्रह्मा आदि भी जिसका पार नहीं पाते जो जगत

162
00:11:45,040 --> 00:11:49,680
के सभी नाटकों के भीतरी कला है। सभी नाटकों के भीतरी कला

163
00:11:49,680 --> 00:11:53,760
यह ध्यान रखो ईश्वर वही है जो सब कुछ कर

164
00:11:53,760 --> 00:11:58,000
सकता है। सभी नाटकों के भीतर की कला ईश्वर है।

165
00:11:58,000 --> 00:12:02,480
सभी नाटक वो आप उसमें फिर सिलेक्टिव नहीं हो सकते।

166
00:12:02,480 --> 00:12:08,480
अच्छा बुरा सभी नाटक

167
00:12:09,120 --> 00:12:13,120
जो निर्मल स्ूर्ति है और जिससे आत्मंद तथा

168
00:12:13,120 --> 00:12:17,120
ज्ञान शक्ति प्राप्त होती है जो लावण्य स्वरूप की

169
00:12:17,120 --> 00:12:21,280
शोभा है जो परम ब्रह्म सूर्य की शोभा है और जो

170
00:12:21,280 --> 00:12:25,440
शब्दों से बना बनाया संसार नष्ट करती है जो मोक्ष

171
00:12:25,440 --> 00:12:29,760
देने वाली लक्ष्मी और महामंगला है अब यहां देखिए यहां उनके व्यवहारिक

172
00:12:29,760 --> 00:12:33,920
स्वरूप की व्याख्या होने लगी अभी ये जो हो रही थी ना पारमार्थिक स्वरूप की व्याख्या

173
00:12:33,920 --> 00:12:39,760
हो रही थी तो अभी व्यवहारिक स्वरूप की व्याख्या होने लगी।

174
00:12:39,760 --> 00:12:43,760
महामंगला है जो 70वीं जीवन कला

175
00:12:43,760 --> 00:12:48,000
मनुष्य को अमर करने वाली ब्रह्म ब्रह्म

176
00:12:48,000 --> 00:12:52,080
रंद्र से निकलने वाली अमृत की

177
00:12:52,080 --> 00:12:56,960
धार सत लीला सुशी सुशीतला

178
00:12:56,960 --> 00:13:01,120
और लावण्य की खान है। जो अव्यक्त पुरुष की परम

179
00:13:01,120 --> 00:13:05,120
ब्रह्म की व्यक्त है। वाह अव्यक्त

180
00:13:05,120 --> 00:13:11,120
की व्यक्त कितना ऊंचा सिद्धांत

181
00:13:12,480 --> 00:13:17,600
जो शंकराचार्य नहीं होते ना तो पता नहीं हम जैसे लोगों का क्या होता

182
00:13:17,600 --> 00:13:21,920
मेरे जीवन का बहुत समय जाता था इन सब

183
00:13:21,920 --> 00:13:25,520
बातों पर चिंतन करने में

184
00:13:25,520 --> 00:13:29,520
कि भगवान खड़े थे तो कहां खड़े थे कहां

185
00:13:29,520 --> 00:13:33,360
खड़े होकर के उन्होंने पृथ्वी बनाई

186
00:13:33,360 --> 00:13:38,160
ऐसे कठिन प्रश्नों का उत्तर

187
00:13:38,160 --> 00:13:42,480
शंकराचार्य जैसे महान आचार्यों के पास ही था।

188
00:13:42,480 --> 00:13:46,560
वरना सतई लेवल पर भी चिंतन करने वाले लोग होते हैं और उन्हें मिल जाता

189
00:13:46,560 --> 00:13:51,600
है थोड़ा बहुत जो उनके मन में सवाल आ रहे हैं। पर जो

190
00:13:51,600 --> 00:13:55,600
बहुत ज्यादा अंदर तक गढ़ता तक प्रश्न करने वाले या

191
00:13:55,600 --> 00:13:59,760
और जानने की इच्छा रखने वाले जो और ज्यादा सुतो

192
00:13:59,760 --> 00:14:03,760
मा सद्गमया पर ध्यान देने वाले लोग हैं वो कभी तृप्त नहीं हो सकते

193
00:14:03,760 --> 00:14:07,920
थे। शंकराचार्य जी भगवान का ऐसा आशीर्वाद रहा हमारे

194
00:14:07,920 --> 00:14:12,480
ऊपर उन लोगों के ऊपर जो आज हम संतुष्ट होकर के

195
00:14:12,480 --> 00:14:16,800
धर्म चर्चा शास्त्र चर्चा कर पा रहे हैं।

196
00:14:16,800 --> 00:14:20,880
वो इसी कारण से

197
00:14:20,880 --> 00:14:24,960
अव्यक्त पुरुष की परम अव्यक्त पुरुष की परम ब्रह्म की

198
00:14:24,960 --> 00:14:29,440
व्यक्तता है। जो विस्तार से बड़ी

199
00:14:29,440 --> 00:14:33,840
हुई इच्छा शक्ति है जो कलिकाल का नियंत्रण करने वाली

200
00:14:33,840 --> 00:14:37,920
और सद्गुरु की कृपा है जो परमार्थ मार्ग का विचार

201
00:14:37,920 --> 00:14:42,080
सार और असार का निर्णय करने वाली और

202
00:14:42,080 --> 00:14:46,720
शब्द बल से ही भव सिंधु के पार पहुंचाने वाली

203
00:14:46,720 --> 00:14:50,800
इस प्रकार एक माता शारदा ने अनेक वेश धारण किए

204
00:14:50,800 --> 00:14:54,960
हुए हैं। वह स्वयं सिद्ध होकर अंतःकरण में

205
00:14:54,960 --> 00:14:59,040
चार प्रकार से परा पश्यती मध्यमा और वैकरी

206
00:14:59,040 --> 00:15:03,040
प्रकट होती है। परा पश्यती और मध्यमा

207
00:15:03,040 --> 00:15:07,200
इन तीन वाचाओं के द्वारा मन में जो बात आती है वह

208
00:15:07,200 --> 00:15:13,200
चौथी वाचा वैकरी के द्वारा प्रकट कराती है।

209
00:15:15,440 --> 00:15:20,000
इसलिए कहते हैं कि जो कृतत्व

210
00:15:20,000 --> 00:15:24,480
तत्व होता है वह शार के कारण ही होता है।

211
00:15:24,480 --> 00:15:28,480
भैया हां कह रहे हैं ये थोड़ा

212
00:15:28,480 --> 00:15:32,640
समझा दीजिए जो परा पशती मध्यम और वैरी वाण होती है इनके विषय में

213
00:15:32,640 --> 00:15:36,800
थोड़ा सा ये जो शब्द के

214
00:15:36,800 --> 00:15:40,880
वो है ना ये गुरुदेव का एक

215
00:15:40,880 --> 00:15:44,960
वीडियो है उसमें गुरुदेव ने बताया है कि हम

216
00:15:44,960 --> 00:15:48,960
लोग जो जाप करते हैं वो किस-किस प्रकार से हो सकता है वो भी

217
00:15:48,960 --> 00:15:53,440
इसी रूप में होता है शब्द के रूप होते हैं पराप पश्यती और मध्यमा

218
00:15:53,440 --> 00:15:57,520
ये आगे आगे चैप्टर्स में इनका खुल के जो है आने वाला है।

219
00:15:57,520 --> 00:16:00,800
हम लोग तब बात कर लेंगे।

220
00:16:00,800 --> 00:16:04,800
वह चौथी जो कुछ कृत्व है

221
00:16:04,800 --> 00:16:08,880
होता है वह शारदा के कारण ही होता है।

222
00:16:08,880 --> 00:16:12,960
जो ब्रह्मा आदि की जननी है मेरा

223
00:16:12,960 --> 00:16:16,960
एक प्रश्न था। गुरुदेव से किया था अभी कुछ समय

224
00:16:16,960 --> 00:16:21,360
पूर्व। होता क्या है? जब हम

225
00:16:21,360 --> 00:16:25,840
जाप कर रहे होते हैं ना बहुत मगन हो जाते हैं तो कई बार क्या होता है जैसे

226
00:16:25,840 --> 00:16:29,840
मान लीजिए हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे

227
00:16:29,840 --> 00:16:30,480
हरे

228
00:16:30,480 --> 00:16:35,040
ये मैंने शब्द से बोला है तो इसमें मुझे इतना टाइम लगा

229
00:16:35,040 --> 00:16:39,280
मगर इसका बहुत बड़ा हिस्सा केवल मैं

230
00:16:39,280 --> 00:16:43,280
हल्का सा अगर मन से ध्यान लगाऊं तो वो जाप हो गया समझ रहे

231
00:16:43,280 --> 00:16:47,280
हैं आप क्या कहना चाह रहा हूं मैं जब

232
00:16:47,280 --> 00:16:51,280
आप मन से बहुत ज्यादा ध्यान लगा के आप बोलेंगे

233
00:16:51,280 --> 00:16:55,680
तो इसका बहुत बड़ा हिश्ता केवल 0 पॉइंट समथिंग

234
00:16:55,680 --> 00:16:59,920
सेकंड्स में जाप हो जाएगा और जब उसी में आपका

235
00:16:59,920 --> 00:17:03,920
लेवल और बढ़ेगा तो ये पूरी दोनों पंक्तियां जो है हरे कृष्णा हरे कृष्ण कृष्ण कृष्णा हरे

236
00:17:03,920 --> 00:17:08,240
हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे केवल स्मरण से वो भी जाप

237
00:17:08,240 --> 00:17:12,240
हो जाएगा तो मैंने पूछा था क्या इस तरह से गुरुदेव मेरा जो टाइमिंग

238
00:17:12,240 --> 00:17:16,720
है जो छोटी होती जा रही है जाप करने की

239
00:17:16,720 --> 00:17:20,960
तो क्या इस तरह से जाप करना क्या मतलब वह माना

240
00:17:20,960 --> 00:17:25,120
जाए कि ठीक से नहीं हो रहा है प्रॉपर बोल के ही करो तब गुरुदेव

241
00:17:25,120 --> 00:17:29,120
ने बताया था कि अलग ये प्रभेद होते हैं

242
00:17:29,120 --> 00:17:33,360
परा पश्यती मध्यमा और वैकरी वा

243
00:17:33,360 --> 00:17:37,360
तो इसके रूप में जो ये फैल के जो

244
00:17:37,360 --> 00:17:41,360
हो रहा है और जो सूक्ष्म हो रहा है दोनों ही ग्रह हैं

245
00:17:41,360 --> 00:17:45,360
यद्यपि आपने वो जो सूक्ष्म वाला किया है ना वो आपको ज्ञात होना चाहिए कि हां वो

246
00:17:45,360 --> 00:17:45,860
किया

247
00:17:45,680 --> 00:17:49,760
मैंने क्योंकि क्योंकि मन ऐसा आपका है ना जो आप

248
00:17:49,760 --> 00:17:54,080
जो है मन से अगर करते हैं जाप बहुत कठिन होता है मन से जाप करना भगवान

249
00:17:54,080 --> 00:17:58,160
का नाम लेना मन ही मन केवल मतलब जीवा जो है वो

250
00:17:58,160 --> 00:18:03,120
आपकी गतिविधि ना करें वो जाप करना बहुत कठिन होता है

251
00:18:03,120 --> 00:18:07,120
तो जब वो करते हैं तो कई बार ऐसा होता है कि हम कर रहे हैं कर

252
00:18:07,120 --> 00:18:11,120
रहे हैं कर रहे हैं मगर फिर मिस हुआ अब मान लीजिए मैं माला

253
00:18:11,120 --> 00:18:15,680
जाप कर रहा हूं और जाप करतेकरते

254
00:18:15,680 --> 00:18:19,840
मेरा मेरा जो ये जो मोती है वो तो बदल

255
00:18:19,840 --> 00:18:23,840
रहा है दाना तो बदल रहा है माला का परंतु

256
00:18:23,840 --> 00:18:28,000
वो जो मैं मन से जाप कर रहा था वो नहीं हो रहा है उसकी जगह दूसरा विचार कोई

257
00:18:28,000 --> 00:18:32,080
चल रहा है हम छूट गया मगर हम लोग माला में

258
00:18:32,080 --> 00:18:36,240
आगे बढ़ गए तो ये नहीं होना चाहिए इस पर ध्यान देने

259
00:18:36,240 --> 00:18:40,320
की आवश्यकता यदि इतने आप बलवान हो गए हैं मन से जाप करते

260
00:18:40,320 --> 00:18:44,880
समय तब तो ठीक है तो आप फिर

261
00:18:44,880 --> 00:18:49,360
मन से जाप करिए और फिर अपनी वो बढ़ाइए

262
00:18:49,360 --> 00:18:55,360
कि और ज्यादा आप जाप में समय बिताएं। परंतु

263
00:18:55,680 --> 00:19:00,320
इस तरह से जाप करना गलत नहीं होता है। जैसे कि गायत्री

264
00:19:00,320 --> 00:19:04,480
मंत्र का जाप करते समय मैं जो भूर

265
00:19:04,480 --> 00:19:08,640
भुहा स्वाहा है ना यह मेरा बिल्कुल सूक्ष्म हो गया है। बहुत

266
00:19:08,640 --> 00:19:13,040
जल्दी हो जाता है। बाकी उसके बाद का जो है उसमें अभी

267
00:19:13,040 --> 00:19:17,360
समय लग रहा है। मगर यह जो ये भूहा स्वाहा है यह बहुत

268
00:19:17,360 --> 00:19:21,600
सूक्ष्म हो चुका है। ठीक है? तो इसी तरीके से वह सूक्ष्मता

269
00:19:21,600 --> 00:19:26,400
के लिए मैंने पूछा था क्या सूक्ष्म हो जाने पर क्या उसको अशास्त्रीयता

270
00:19:26,400 --> 00:19:30,480
के रूप में देखा जाएगा तब गुरुदेव ने यही बताया था कि परापश्यती

271
00:19:30,480 --> 00:19:34,480
मध्यमा और वैकरी के रूप में होता है। अभी आगे आएगा चैप्टर

272
00:19:34,480 --> 00:19:40,480
में। हम लोग इस पर और विशेष अध्ययन करेंगे।

273
00:19:41,680 --> 00:19:45,680
जो कुछ कर्तृत्व होता है

274
00:19:45,680 --> 00:19:50,960
वह शारदा के कारण ही होता है। जो ब्रह्मा आदि की जननी

275
00:19:50,960 --> 00:19:55,840
और

276
00:19:55,840 --> 00:20:00,240
अब देखिए वहां क्या कह रहे हैं भगवान गीता में समस्त

277
00:20:00,240 --> 00:20:04,480
कर्मों को करने वाला कौन? मैं यहां पर क्या कहा जा रहा है

278
00:20:04,480 --> 00:20:08,720
कि जो कुछ कर्तृत्व होता है वह शारदा के कारण होता है।

279
00:20:08,720 --> 00:20:12,800
तो एकत्व सिद्ध हो रहा है कि नहीं? अगर कारण दूसरा बना

280
00:20:12,800 --> 00:20:17,200
देंगे हेतु दूसरा बना देंगे कि ये लोग अलग-अलग है शारदा

281
00:20:17,200 --> 00:20:21,280
माता और भगवान श्री कृष्ण तो फिर

282
00:20:21,280 --> 00:20:25,680
किसी एक के कारण ही तो कर्तृत्व मानना पड़ेगा। यह

283
00:20:25,680 --> 00:20:29,840
सिद्धांत यहां से हमारा प्रतिपादित हुआ। जो ब्रह्मा आदि की जननी

284
00:20:29,840 --> 00:20:34,000
हरि और हर को उत्पन्न करने वाली है और जिसके विस्तार से सारी

285
00:20:34,000 --> 00:20:38,240
सृष्टि और तीनों लोक में जो परमार्थ का मूल

286
00:20:38,240 --> 00:20:42,960
और केवल सद विद्या ही है और जो

287
00:20:42,960 --> 00:20:47,520
शांत निर्मल निश्चल तथा

288
00:20:47,520 --> 00:20:51,600
स्वरूप स्थित है जो योगियों के ध्यान साधकों

289
00:20:51,600 --> 00:20:55,840
के चिंतन और सिद्धों के अंतःकरण में समाधि रूप में स्थित है।

290
00:20:55,840 --> 00:20:56,720
जो निर्गुण की

291
00:20:56,720 --> 00:21:01,280
पहचान अनुभव का लक्षण और सभी

292
00:21:01,280 --> 00:21:05,280
घटों में पूर्ण रूप से व्याप्त है। शास्त्र पुराण

293
00:21:05,280 --> 00:21:09,680
वेद और श्रुति जिसका अखंड स्तवन करते हैं

294
00:21:09,680 --> 00:21:13,840
और प्राणी मात्र अनेक प्रकार से जिसकी स्तुति करते हैं।

295
00:21:13,840 --> 00:21:17,920
जो वेदों तथा शास्त्रों की महिमा और निरूपमों की

296
00:21:17,920 --> 00:21:22,000
उपमा है और जिसके कारण परमात्मा को लोग

297
00:21:22,000 --> 00:21:26,000
परमात्मा कहते हैं। क्या बात है? जो

298
00:21:26,000 --> 00:21:30,400
अनेक प्रकार की विद्याओं, कलाओं, सिद्धियों

299
00:21:30,400 --> 00:21:34,800
और अनेक प्रकार के निश्चयों की बुद्धि और सूक्ष्म वस्तुओं

300
00:21:34,800 --> 00:21:39,200
का शुद्ध ज्ञान स्वरूप है। अब देखिए ज्ञान स्वरूप आ गया यहां पर। देखिए

301
00:21:39,200 --> 00:21:44,800
सभी प्रकार से हो गई। सगुण साकार की व्याख्या भी आ गई।

302
00:21:44,800 --> 00:21:48,800
निर्गुण निराकार की व्याख्या भी आ गई। और यहां पर

303
00:21:48,800 --> 00:21:52,560
ज्ञान स्वरूप के रूप में

304
00:21:52,560 --> 00:21:56,640
नहीं सगुण निराकार की व्याख्या भी आ गई। सगुण साकार की व्याख्या भी आ गई। और

305
00:21:56,640 --> 00:22:01,680
यहां ज्ञान स्वरूप के रूप में निर्गुण निराकार की व्याख्या भी आ गई।

306
00:22:01,680 --> 00:22:05,920
जो हरि भक्तों की स्वयं भक्ति अंतर्निष्ठों की अंतर

307
00:22:05,920 --> 00:22:11,120
स्थिति जीव जीवन मुक्तों की मुक्ति और सायोजता है

308
00:22:11,120 --> 00:22:11,920
जो अनंत

309
00:22:11,920 --> 00:22:16,160
माया और वैष्णवी है जिसकी लीला का कुछ भी पता नहीं चलता। और जो बड़े-बड़े

310
00:22:16,160 --> 00:22:20,160
लोगों को ज्ञान के अभिमान में फंसाती है। अब देखिए

311
00:22:20,160 --> 00:22:24,240
वहां पर निकालने वाली कौन थी? यही माया ही

312
00:22:24,240 --> 00:22:28,800
थी। और फसाने वाली कौन है? यही है। गायत्री

313
00:22:28,800 --> 00:22:32,960
माता का भी मंत्र इसीलिए सबसे बड़ा माना गया है कि नहीं? कि

314
00:22:32,960 --> 00:22:37,520
माया से आपको कौन छुड़ाएगा? माया ही छुड़ाएगी।

315
00:22:37,520 --> 00:22:41,760
तो इसीलिए गायत्री माता का मंत्र सबसे बड़ा है कि नहीं? और भगवान

316
00:22:41,760 --> 00:22:46,880
भी कहते हैं मंत्रों में मैं गायत्री हूं। तो

317
00:22:46,880 --> 00:22:52,880
हां तो फिर माया के सिद्धांत को कहां ले जाओगे आप ऐसे?

318
00:22:52,880 --> 00:22:55,360
अच्छा

319
00:22:55,360 --> 00:23:01,280
आंखों से जो जो कुछ दिखलाई पड़ता है शब्दों के द्वारा जो कुछ

320
00:23:01,280 --> 00:23:05,280
जाना जाता है और मन में जिन सब बातों का अनुभव होता है

321
00:23:05,280 --> 00:23:10,000
वह सब जिसके भाव

322
00:23:10,000 --> 00:23:14,480
वह सब जिसके रूप है अनुभवी लोग इस बात का अभिप्राय जानते हैं कि स्तवन

323
00:23:14,480 --> 00:23:18,720
भजन और भक्ति भाव सभी में बिन

324
00:23:18,720 --> 00:23:23,280
बिना माया के कहीं ठिकाना नहीं लगता इसलिए

325
00:23:23,280 --> 00:23:27,600
जो बड़े से बड़ों से बड़ी और ईश्वर की भी ईश्वर है

326
00:23:27,600 --> 00:23:31,760
उन्हें स्वयं उन्हीं के अंश अर्थात माया के ही रूप में

327
00:23:31,760 --> 00:23:35,520
मेरा नमस्कार है।

328
00:23:35,520 --> 00:23:40,160
शारदा मां की इतनी अच्छी कृति मैंने जीवन में मतलब

329
00:23:40,160 --> 00:23:44,800
बहुत सारे अध्ययन किए मगर संभवत

330
00:23:44,800 --> 00:23:49,040
प्रारब्ध वश नहीं पढ़ पाया मैं कहीं पर बहुत अच्छा

331
00:23:49,040 --> 00:23:52,000
बहुत अच्छा है।

332
00:23:52,000 --> 00:23:56,240
अब आ जाती है भाई आहान का एक विशेष

333
00:23:56,240 --> 00:24:00,400
स्तंभ गुरु हां

334
00:24:00,400 --> 00:24:04,480
गुरु कौन है गुरु का मतलब अंधकार

335
00:24:04,480 --> 00:24:08,560
रू का मतलब निकालने वाला अज्ञानता

336
00:24:08,560 --> 00:24:12,800
रूपी अंधकार से निकालने वाले को ही गुरु कहते हैं अद्वैत

337
00:24:12,800 --> 00:24:16,640
का उपनिषद

338
00:24:16,640 --> 00:24:20,880
सद्गुरु का वर्णन नहीं हो सकता जिसे माया भी स्पर्श

339
00:24:20,880 --> 00:24:25,120
ना कर सकती हो। उसका स्वरूप भला मेरे समान

340
00:24:25,120 --> 00:24:29,200
अज्ञान को कहां से विदित हो सकता है? जिसके संबंध में

341
00:24:29,200 --> 00:24:33,520
श्रुति नीति नीति कहती है अर्थात जिसका

342
00:24:33,520 --> 00:24:37,680
अंत श्रुति को भी नहीं मिलता। उस तक मुझ मूर्ख

343
00:24:37,680 --> 00:24:42,240
की मति भला कैसे पहुंच सकती है? वह मेरी

344
00:24:42,240 --> 00:24:46,240
समझ के बाहर है। इसलिए उस गुरुदेव के चरणों में मेरा

345
00:24:46,240 --> 00:24:50,080
दूर से नमस्कार है। दूर से

346
00:24:50,080 --> 00:24:54,480
कभी भी मठ में जाता हूं तो मेरी वहां पर

347
00:24:54,480 --> 00:24:59,120
जो स्थिति होती है ना ऐसी होती है कि

348
00:24:59,120 --> 00:25:03,040
जैसे भीगी बिल्ली

349
00:25:03,040 --> 00:25:07,200
कभी आप लोग मुझे मठ में देखोगे गुरुदेव के आसपास तो मैं

350
00:25:07,200 --> 00:25:11,840
सदैव इस चिंतन में रहता हूं कि

351
00:25:11,840 --> 00:25:16,800
मेरे से कोई ऐसी गलती ना हो जाए जिसके कारण

352
00:25:16,800 --> 00:25:20,800
गुरुदेव को कोई कष्ट हो या कोई गुरुदेव आहत हो केवल

353
00:25:20,800 --> 00:25:25,040
इसी चिंतन में वहां पर लगा रहता है और कभी भी मैंने वहां पर यह

354
00:25:25,040 --> 00:25:29,200
प्रयास नहीं किया कि मैं गुरुदेव के साथ

355
00:25:29,200 --> 00:25:33,280
में फोटो खिंचवा लूं या फिर उनके इर्दगिर्द जो है किसी प्रकार से आ

356
00:25:33,280 --> 00:25:37,520
जाऊं। मतलब ऐसी जगह पहुंचने पर या तो गुरुदेव

357
00:25:37,520 --> 00:25:42,400
हो या कोई हमारा बहुत बड़ा कोई तीर्थ हो यद्यपि

358
00:25:42,400 --> 00:25:46,480
जो हमारे जो वैष्णवाचार्य राघवाचार्य जी और

359
00:25:46,480 --> 00:25:51,040
विद्या भास्कर जी भी इनके भी मतलब निकट जाने में

360
00:25:51,040 --> 00:25:55,120
एक ऐसे तुच्छता सी फील होती है कि

361
00:25:55,120 --> 00:25:59,200
प्रश्न उठते हैं बहुत सारे कि या मैं उस योग्य हूं जो मैं इतना निकट जा

362
00:25:59,200 --> 00:26:03,360
रहा हूं उनके तो वहां पर मतलब दूर का ही व्यवहार

363
00:26:03,360 --> 00:26:07,440
होता है और वही मेरे लिए संतोषजनक होता है। हो सकता है मैं पास

364
00:26:07,440 --> 00:26:11,680
जाता ज्यादा गुरुदेव के तो शायद वो

365
00:26:11,680 --> 00:26:15,840
उतना संतुष्ट ना रहता मैं जितना दूर से तो दूर से ही

366
00:26:15,840 --> 00:26:18,960
गुरुदेव कहते भी हैं

367
00:26:18,960 --> 00:26:23,040
कि शिष्य गुरु और शिष्य के बीच में ऐसा संबंध होना चाहिए कि बहुत

368
00:26:23,040 --> 00:26:27,120
ज्यादा यह भी नहीं कि बैठ के आपस में गप्पे मार रहे हैं साथ में मिलकर के है

369
00:26:27,120 --> 00:26:31,120
ना ऐसा भी नहीं होना चाहिए भाई गप्पे चल रही है

370
00:26:31,120 --> 00:26:35,120
ह ठटठा चल रहा है गुरु और शिष्य के बीच में

371
00:26:35,120 --> 00:26:39,120
तो वह भाव यहां पर प्रस्तुत किया जा रहा है। दूर से

372
00:26:39,120 --> 00:26:43,920
दूर से ही नमस्कार है। हे गुरुदेव मुझे वह शक्ति दो

373
00:26:43,920 --> 00:26:48,080
जिससे मैं तुम्हारा पार पा सकू। मुझे आपके स्तवन

374
00:26:48,080 --> 00:26:52,560
की दुराशा थी पर अब माया से होने वाले

375
00:26:52,560 --> 00:26:56,720
वाला भरोसा नहीं रह गया। अतः हे सद्गुरु स्वामी तुम

376
00:26:56,720 --> 00:27:00,720
जैसे हो वैसे ही रहो। मैं माया के बल से उसका स्तवन

377
00:27:00,720 --> 00:27:04,720
करना चाहता हूं। पर जब स्वयं माया ही लज्जित हो गई तब मैं क्या

378
00:27:04,720 --> 00:27:09,120
कर सकता हूं? वास्तविक परमात्मा नहीं मिलता इसलिए प्रतिमा स्थापना

379
00:27:09,120 --> 00:27:13,360
करनी पड़ती है। बस इसी प्रकार से भी माया

380
00:27:13,360 --> 00:27:17,520
के योग से ही सद्गुरु की महिमा का वर्णन

381
00:27:17,520 --> 00:27:20,560
करूंगा।

382
00:27:20,560 --> 00:27:25,200
यहां कोई मूर्ति पूजा का खंडन नहीं है। ये ध्यान रखिएगा।

383
00:27:25,200 --> 00:27:29,280
है ना? परंतु यहां पर वह सिद्धांत समझाने का

384
00:27:29,280 --> 00:27:33,360
प्रयास किया जा रहा है। जगुरु शंकराचार्य पूरी पीठाधीश्वर जी अपने एक

385
00:27:33,360 --> 00:27:38,160
वक्तव्य में बताते हैं कि अलजेब्रा में

386
00:27:38,160 --> 00:27:42,560
सही उत्तर तक पहुंचने के लिए मानक लिए जाते हैं ना।

387
00:27:42,560 --> 00:27:46,640
a² x² मान लेते हैं कि वह x है।

388
00:27:46,640 --> 00:27:50,640
इस तरह से काम करते हैं। और एक उदाहरण

389
00:27:50,640 --> 00:27:54,720
और देते हैं कि वास्तविक जो दीवार होती है वो प्राप्त

390
00:27:54,720 --> 00:27:58,880
करने के लिए पहले पहाड़ लगाई जाती है। नकली दीवार पहाड़ के

391
00:27:58,880 --> 00:28:02,960
आधार पर वास्तविक दीवार को प्राप्त कर लिया जाता है। तो इसी प्रकार

392
00:28:02,960 --> 00:28:07,040
से वह कह रहे हैं कि भाई मेरे पास आपके लिए वास्तविक चीजें तो

393
00:28:07,040 --> 00:28:11,120
नहीं है। माया ही है। तो मैं माया के माया का ही आलंबन लेकर

394
00:28:11,120 --> 00:28:15,680
के आपकी महिमा का वर्णन कर रहा हूं।

395
00:28:15,680 --> 00:28:19,840
जिस प्रकार अपने भाव के अनुसार मन में देवता का ध्यान किया जाता है, उसी

396
00:28:19,840 --> 00:28:24,000
प्रकार मैं भी सद्गुरु का स्तवन करूंगा। हे सद्गुरु राज

397
00:28:24,000 --> 00:28:28,400
तुम्हारी जय हो। हे विषंवर विश्व बीज परम पुरुष

398
00:28:28,400 --> 00:28:32,720
मोक्ष ध्वज दीन बंधु तुम्हारी जय हो। तुम्हारे

399
00:28:32,720 --> 00:28:36,240
अभय रूपी हाथों से यह माया

400
00:28:36,240 --> 00:28:40,560
उस प्रकार नष्ट उसी प्रकार नष्ट हो जाती है जिस प्रकार

401
00:28:40,560 --> 00:28:44,960
सूर्य के प्रकाश से अंधकार नष्ट हो जाता है। देखो यह लोग

402
00:28:44,960 --> 00:28:48,320
कितना भी कर ले

403
00:28:48,320 --> 00:28:52,800
मुझे नहीं लगता कि जैसे यह लोग ढोल पीटते हैं अलंकार

404
00:28:52,800 --> 00:28:56,800
समाजी कि भाई हमारे यहां प्रधानमंत्री आए प्रधानमंत्री

405
00:28:56,800 --> 00:29:00,800
ने हमको यह कहा वो कहा पहली बात तो क्या इनके

406
00:29:00,800 --> 00:29:04,880
या इस वाले भी इस तरह की चीजें करते हैं कि हमारे ये कर दिया।

407
00:29:04,880 --> 00:29:10,160
पहली बात तो यह सोचने वाली बात है कि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री

408
00:29:10,160 --> 00:29:14,320
जब इन जैसे तथाकथित संस्थाओं के

409
00:29:14,320 --> 00:29:18,400
यहां पहुंचते हैं तो वहां पर इनका किस

410
00:29:18,400 --> 00:29:22,800
प्रकार का व्यवहार होता है? क्या यह वहां पर किसी के चरण छूते

411
00:29:22,800 --> 00:29:26,880
हैं? चरण स्पर्श करते हैं? मैंने तो यह देखा है कि जो

412
00:29:26,880 --> 00:29:32,320
इस के बहुत बड़े वाले बाबूजी होते हैं उनसे हाथ मिलाया जा रहा है।

413
00:29:32,320 --> 00:29:36,480
तो मैंने यह नहीं देखा कि उनको कहीं दंडवत प्रणाम किया गया हो या चरण

414
00:29:36,480 --> 00:29:40,800
स्पर्श किया गया हो, शीश नवाया गया हो। अभी ये इनका अलंकारियों

415
00:29:40,800 --> 00:29:44,800
का बहुत बड़ा आर्य सम्मेलन हुआ। वहां पर किसके पैर छुए

416
00:29:44,800 --> 00:29:48,880
हो मुझे नहीं ज्ञात है। यद्यपि मैंने देखा नहीं है। पर एक बार आप कंफर्म कर

417
00:29:48,880 --> 00:29:51,760
लीजिएगा। है ना?

418
00:29:51,760 --> 00:29:56,080
तो आर्य समाज में तो बहुत ही ज्यादा गुरु तत्व की कोई विवेचना

419
00:29:56,080 --> 00:30:00,720
है ही नहीं। वहां तो हम तो जब गुरु तत्व की विवेचना है ही नहीं।

420
00:30:00,720 --> 00:30:04,880
तो वहां पर ये कैसे संभव हो जाएगा कि आज भी कोई गुरु के रूप में उनके यहां

421
00:30:04,880 --> 00:30:09,520
मान माना गया हो। तो यह कैसे संभव हो जाएगा कि जब वह खुद

422
00:30:09,520 --> 00:30:13,520
जो वहां के बाशिंदे हैं जब वह वहां किसी को गुरु के

423
00:30:13,520 --> 00:30:19,520
रूप में स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं तो

424
00:30:20,160 --> 00:30:25,920
वहां का वहां के जो अतिथि गण होंगे यानी कि ये

425
00:30:25,920 --> 00:30:30,560
प्रधानमंत्री इत्यादि वो कहां से किसी के पैर छुएंगे हम

426
00:30:30,560 --> 00:30:34,560
तो यह अभाव है वहां पर गुरु वंदना है ही नहीं क्योंकि

427
00:30:34,560 --> 00:30:38,960
खुद गुरु को गुरु की पीठ पीठ में जो है वार

428
00:30:38,960 --> 00:30:43,120
करके तब सिद्धांतों को स्थापित किया है ना तो गुरु वंदना कहां

429
00:30:43,120 --> 00:30:47,280
से आ जाएगी वहां गुरु की महिमा गान कहां से होगा कभी सुना है आपने

430
00:30:47,280 --> 00:30:52,320
गुरु की महिमा गान वहां पर आर्य समाजियों के इसीलिए और इसीलिए

431
00:30:52,320 --> 00:30:56,800
हर कोई व्यक्ति शेर बन के घूम रहा है कोई भी किसी के भी विरोध में बोल देगा

432
00:30:56,800 --> 00:31:02,000
अरे भाई है क्या आर्य समाज पहले तुम तो समझ लो क्या है

433
00:31:02,000 --> 00:31:06,320
जो तुम्हारे वो हैं आचार्य प्रशांत दीक्षित

434
00:31:06,320 --> 00:31:07,040
क्या धोया

435
00:31:07,040 --> 00:31:11,040
है भाई उस व्यक्ति ने क्या धोया है आर्य समाज को ही

436
00:31:11,040 --> 00:31:15,040
धोया है एक तब भी धोया था आर्य समाज को जब

437
00:31:15,040 --> 00:31:19,680
ये कहा था कि दयानंद के दयानंद जी के द्वारा दिया गया

438
00:31:19,680 --> 00:31:23,680
जो मोक्ष का सिद्धांत है वो वो उससे मैं संतुष्ट नहीं हूं खत्म

439
00:31:23,680 --> 00:31:27,920
ही हो गया पूरा धर्म का पर्यवसान किस में है भाई

440
00:31:27,920 --> 00:31:32,960
मोक्ष में

441
00:31:32,960 --> 00:31:37,040
धर्म का पर्यवसान किस में है मोक्ष जब तुम मोक्ष से

442
00:31:37,040 --> 00:31:41,440
संतुष्ट नहीं हो तो तुम उस तक उस असंतुष्टि तक पहुंचाने

443
00:31:41,440 --> 00:31:45,440
वाली जो विधि विधान है उनको धर्म कैसे कह रहे हो और फिर उनको प्रचारित कैसे

444
00:31:45,440 --> 00:31:47,920
कर रहे हो

445
00:31:47,920 --> 00:31:52,480
तो क्या है आर्य समाज और वो क्यों क्यों ऐसा है

446
00:31:52,480 --> 00:31:57,520
आज हर व्यक्ति एक दूसरे पे ये कर रहा है वो कर रहा है क्यों ऐसा है आर्य समाज

447
00:31:57,520 --> 00:32:02,400
अपने ही मोक्ष से संतुष्ट नहीं मैं आर्य समाजी हूं मैं दयानंद को मानता हूं

448
00:32:02,400 --> 00:32:06,480
पर दयानंद ये कहते हैं कि भैया धर्म का परवसान मोक्ष में है

449
00:32:06,480 --> 00:32:10,560
पर मैं मोक्ष को नहीं मानता दयानंद के पर मैं आर समाजी हूं पर मैं जो

450
00:32:10,560 --> 00:32:15,040
है दयानंद को मान ऐसे ही ऐसे

451
00:32:15,040 --> 00:32:19,280
ही बिखराव पूर्ण जो वैचारिकता है

452
00:32:19,280 --> 00:32:22,560
उसका नाम है आर्य समाज हम

453
00:32:22,560 --> 00:32:26,640
अरे भैया जो अद्वैती होगा जो शंकराचार्य को मानने वाला

454
00:32:26,640 --> 00:32:30,640
होगा वो ये कहेगा क्या कि मैं शंकराचार्य के मोक्ष को नहीं मानता ये

455
00:32:30,640 --> 00:32:34,720
कहां की बात आ गई भाई अपना स्टेटस ही तुम लोग

456
00:32:34,720 --> 00:32:38,720
तय नहीं कर पा रहे हो कि तुम हो क्या तुम अभी पहले खुद

457
00:32:38,720 --> 00:32:43,040
को समझ लो कि तुम हो क्या व्यवहारिक धरातल की बात कर रहा हूं पारमार्थिक

458
00:32:43,040 --> 00:32:47,120
की बात नहीं कर रहा हूं फिर तुम आ जाना फिर ये लोग क्या करते हैं कि भावुक

459
00:32:47,120 --> 00:32:51,200
बातें करने लगते हैं अरे सब सब जगह ईश्वर है तू भी तो मानता है ऐसी बातें

460
00:32:51,200 --> 00:32:55,760
करने लगेंगे तो इसलिए ध्यान दिलाना पड़ता है व्यवहारिक बातें

461
00:32:55,760 --> 00:32:59,840
हं पहले तुम लोग तो तय कर लो कि तुम क्या

462
00:32:59,840 --> 00:33:04,080
हो एक व्यक्ति आकर के कह रहा है मैं मोक्ष से संतुष्ट नहीं हूं फिर

463
00:33:04,080 --> 00:33:08,080
भी तुम वो आर्य समाजी है। कैसे आर्य समाजी है भाई? तुम उसको

464
00:33:08,080 --> 00:33:12,160
मोक्ष दो ना उसकी संतुष्टि का। और यदि उसकी संतुष्टि तुम्हारे मोक्ष में नहीं है

465
00:33:12,160 --> 00:33:16,320
तो उसको आर्य समाजी क्यों बता रहे हो? हां फॉलोअर्स

466
00:33:16,320 --> 00:33:20,400
ज्यादा है इसलिए या फैन फॉलोइंग है इसलिए या कम

467
00:33:20,400 --> 00:33:25,440
से कम तुम्हारे पक्ष में बोलने वाला कोई ठीक-ठाक व्यक्ति है इसलिए

468
00:33:25,440 --> 00:33:29,920
और फिर उसने जो अभी की बातें प्रासंगिक

469
00:33:29,920 --> 00:33:34,080
बातें बताई बिल्कुल सही बताई। प्रधानमंत्री वो उसका यह

470
00:33:34,080 --> 00:33:37,760
कहना था आचार्य प्रशांत जी का यह कहना था

471
00:33:37,760 --> 00:33:42,320
कि वहां पर प्रधानमंत्री की ऐसे चापलूसी

472
00:33:42,320 --> 00:33:46,560
वगैरह हो रही है हां और बिल्कुल सही

473
00:33:46,560 --> 00:33:50,560
बात है भाई चलो मान लो वो आर्य समाज के सिद्धांत क्या है क्या

474
00:33:50,560 --> 00:33:54,560
नहीं है मगर आर्य समाज यदि स्वयं को एक राजनीतिक

475
00:33:54,560 --> 00:33:58,640
दल नहीं बल्कि एक धर्म का पक्षधर या धर्म का प्रचारक

476
00:33:58,640 --> 00:34:02,640
मानता है और धर्म की स्थापना करने वाले आचार्यों

477
00:34:02,640 --> 00:34:06,880
को वो निर्गत करता है अपनी फैक्ट्री से

478
00:34:06,880 --> 00:34:11,120
तो कम से कम वहां पर राजनेताओं से ऊंचा स्थान होना

479
00:34:11,120 --> 00:34:16,480
चाहिए आचार्यों का मगर वहां तो समतुल्यता है बल्कि

480
00:34:16,480 --> 00:34:20,640
उनका ये कहना था आचार्य प्रशांत जी का कि भैया वहां तो जो है उनकी पूजा हो

481
00:34:20,640 --> 00:34:24,800
रही थी। ऐसा लग रहा था कि आर्य समाज के बारे में

482
00:34:24,800 --> 00:34:29,200
प्रधानमंत्री आर्य समाज को बता रहे हैं।

483
00:34:29,200 --> 00:34:33,200
यह सब कहना था। आचार्य प्रशांत जी का वीडियो देख

484
00:34:33,200 --> 00:34:37,520
लेना आप लोग जाकर के बहुत सुनाया बहुत धोया

485
00:34:37,520 --> 00:34:41,680
और कि तुम सब चापलूसी हो रही है राजनेताओं

486
00:34:41,680 --> 00:34:45,680
की आर्य समाज के द्वारा वो स्थिति है

487
00:34:45,680 --> 00:34:49,680
अच्छा यहां पर मेरा एक प्रश्न है आचार्य प्रशांत जी से जब

488
00:34:49,680 --> 00:34:54,480
हमारे धर्माचार्य जब हमारे शंकराचार्य

489
00:34:54,480 --> 00:34:58,480
ठीक है उनका वो जो निर्णय था कि वो क्या था शास्त्रीयता

490
00:34:58,480 --> 00:35:02,800
उसमें आपका पक्ष कुछ और है उनका पक्ष है वो बात अलग है। मगर

491
00:35:02,800 --> 00:35:06,960
यदि उनको लगता है कि यह धर्म है और वह उसके लिए जब शासन के विरुद्ध चले

492
00:35:06,960 --> 00:35:11,440
गए थे तो तब उस समय आपने ध्यान दिया था कि देखिए

493
00:35:11,440 --> 00:35:15,600
यहां सिद्धांतों के लिए राजनीतिज्ञों की चापलूसी नहीं की जाती। वैसे

494
00:35:15,600 --> 00:35:19,760
जैसे आर्य सम्मेलन में आपके द्वारा राजनीतिज्ञों की चापलूसी की

495
00:35:19,760 --> 00:35:23,840
गई। है ना? तब आपको ध्यान देना चाहिए था।

496
00:35:23,840 --> 00:35:28,160
जब शंकराचार्य अशास्त्रीयता के विरुद्ध खड़े थे।

497
00:35:28,160 --> 00:35:34,160
खैर अच्छा लगा आपने साहस पूर्ण वक्तव्य दिया

498
00:35:35,440 --> 00:35:39,520
और सबसे पहले आर्य समाज ये सब चर्चा इत्यादि ये सब

499
00:35:39,520 --> 00:35:43,760
नाटकबाजी करने से पहले पहले खुद समझ ले कि आर्य

500
00:35:43,760 --> 00:35:48,000
समाज ही किसको कहा जाए किसको ना कहा जाए इसी प्रश्न पे यदि बात

501
00:35:48,000 --> 00:35:52,400
करने लगेंगे ना इसी प्रश्न पे ये लोग पसीने छोड़ देंगे वो दार्शनिक

502
00:35:52,400 --> 00:35:56,560
बातों पे तो दूर की बात है इसी प्रश्न पे इनके पसीने निकल

503
00:35:56,560 --> 00:36:00,880
आएंगे क्यों क्यों? क्योंकि सिद्धांत है ही नहीं कोई। क्यों नहीं है? क्योंकि परंपरा

504
00:36:00,880 --> 00:36:04,960
है ही नहीं कोई। जब तक कोई एक व्यक्ति दृढ़

505
00:36:04,960 --> 00:36:09,360
निश्चय यह बताने वाला नहीं बैठा होगा जहां पर

506
00:36:09,360 --> 00:36:14,560
कि भैया ये ये है। दयानंद जी ने ये बोला

507
00:36:14,560 --> 00:36:18,640
मैं तो जाता ना उनके अगर सम्मेलन में अगर बात बन जाती कुछ वो मैंने

508
00:36:18,640 --> 00:36:22,800
भी रिप्लाई देर से दिया। अगर मैं जाता तो मैं एक नकली सत्यार्थ प्रकाश छाप

509
00:36:22,800 --> 00:36:27,760
करके ले जाता। ग्ली डंडे से मोक्ष की बात लिखी होती उसमें

510
00:36:27,760 --> 00:36:31,920
दयानंद जी को मैं नहीं मानता मैं यह बोलता स्टेज पर जाकर मैं नहीं मानता

511
00:36:31,920 --> 00:36:36,000
दयानंद जी जो है एक बुद्धिमान व्यक्ति थे दयानंद जी किताब

512
00:36:36,000 --> 00:36:40,000
में लिख रहे हैं ग्ली डंडे से मोक्ष होगा अब वो कहते कहां लिखा दयानंद जी ने

513
00:36:40,000 --> 00:36:44,400
ये लिखा लो अब वो कहते ये तो नकली है कैसे नकली है

514
00:36:44,400 --> 00:36:49,200
बताओ कैसे नकली है

515
00:36:49,200 --> 00:36:50,640
कि हमारे पास तो ये है

516
00:36:50,640 --> 00:36:54,800
तो तुम्हारा क्यों माना जाए इसका क्यों क्यों ना माना जाए

517
00:36:54,800 --> 00:36:59,120
फस जाते इसी में इसी में फस जाएंगे

518
00:36:59,120 --> 00:37:03,200
जिसके पास जो परंपरा के सिद्धांत को नहीं मानता है वो कैसे बताएगा कि

519
00:37:03,200 --> 00:37:07,760
सत्यार्थ प्रकाश यही वाली है असली और

520
00:37:07,760 --> 00:37:12,080
इसीलिए इनके यहां पर शेरों का झुंड है। खैर वो शेर भी कैसे हैं?

521
00:37:12,080 --> 00:37:16,080
शेर है कि गीदड़ है वह बाद की बात है। मगर अगर उनकी दृष्टि में वह शेर

522
00:37:16,080 --> 00:37:20,800
है तो वह शेरों का झुंड है। गैर अनुशासित शेरों का झुंड

523
00:37:20,800 --> 00:37:25,200
जिसकी लगाम किसी के हाथ में नहीं है। सब अपने मन के राजा हैं।

524
00:37:25,200 --> 00:37:29,520
जिसका जो मन आएगा वो करेगा। किसी को भी कोई भी क्रिटिसाइज

525
00:37:29,520 --> 00:37:34,000
कर देगा। क्यों? क्योंकि सार्वभौमत्व है ही नहीं।

526
00:37:34,000 --> 00:37:38,720
जिसको सब मानते हो कि हां भाई वो जो बात बोलेंगे वो सब मानेंगे।

527
00:37:38,720 --> 00:37:42,720
कोई व्यक्ति आकर के किसी भी वरिष्ठ से वरिष्ठ का खंडन करने

528
00:37:42,720 --> 00:37:46,720
लगेगा। यहां पर एक सिद्धांत है। ऐसा नहीं

529
00:37:46,720 --> 00:37:50,960
खंडन का प्रयास यहां नहीं होगा। यहां होगा मगर उसका मुंह बंद कराया जाएगा।

530
00:37:50,960 --> 00:37:55,200
कैसे? सिद्धांत के अनुसार परंपरा आदि

531
00:37:55,200 --> 00:37:59,200
शंकराचार्य ने क्या बोला? ये उनकी परंपरा में प्रतिष्ठित जो

532
00:37:59,200 --> 00:38:05,200
प्रामाणिक आचार्य होगा वही बताएगा।

533
00:38:06,960 --> 00:38:10,800
तो परंपरा के प्रति

534
00:38:10,800 --> 00:38:14,800
जो शरणागति है बहुत आवश्यक है जो

535
00:38:14,800 --> 00:38:20,800
कि नहीं थी वहां पर

536
00:38:23,840 --> 00:38:29,040
और इसका एक अंतर है देखने को मिले देखिए एक तो चापलूसी

537
00:38:29,040 --> 00:38:33,040
एक तो पहली बात तो ये जो ढिंढोरा पीटते हैं कि यह प्रधानमंत्री हमारे यहां है तो आप

538
00:38:33,040 --> 00:38:37,120
देखो अगर हमारे हमारे यहां पर प्रधानमंत्री जी पहुंचेंगे, मुख्यमंत्री जी पहुंचेंगे तो वहां

539
00:38:37,120 --> 00:38:41,440
चरण स्पर्श होगा। वहां पर शीश नवाया जाएगा। आचार्य आचार्य

540
00:38:41,440 --> 00:38:45,680
रहेगा। और यदि ऐसा व्यवहार नहीं हो रहा है तो वहां से आचार्य दूरी

541
00:38:45,680 --> 00:38:49,760
बनाते हैं हमारे। और यही समस्या है आचार्य प्रशांत

542
00:38:49,760 --> 00:38:53,920
जी की जो वो कह रहे हैं अपने आर समाजियों को कि भैया धर्म जो जो

543
00:38:53,920 --> 00:38:58,480
धर्म धर्म का वक्ता है उसका स्थान ऊंचा होना चाहिए। जबकि आप चापलूसी

544
00:38:58,480 --> 00:39:02,560
कर रहे हो और वहां पर हो रही है तो आपका धार्मिक दल कैसे

545
00:39:02,560 --> 00:39:06,560
माना जाए वह तो आज का आधुनिक राजनीतिक दल माना जाए वो वाला भी

546
00:39:06,560 --> 00:39:10,640
नहीं राजनीतिक दल राजा रामचंद्र जी वाली राजनीति

547
00:39:10,640 --> 00:39:16,320
वो भी नहीं आज का जो ये तथाकथित राजनीति है

548
00:39:16,320 --> 00:39:20,400
उसका दल माना जाएगा तो दोनों ही चीजें एक जगह वो

549
00:39:20,400 --> 00:39:22,320
नहीं हो रही है व्यवहार अलग-अलग

550
00:39:22,320 --> 00:39:26,560
है चापलूसी नहीं हो रही है और समय आने पर अशास्त्रीयता दिखने पर

551
00:39:26,560 --> 00:39:32,560
विरोध भी हो रहा है। यह होते हैं सिद्धांत।

552
00:39:40,240 --> 00:39:44,400
सूर्य से अंधकार अवश्य नष्ट होता है। पर हमारे स्वामी सद्गुरु की

553
00:39:44,400 --> 00:39:48,560
यह बात नहीं है। वह जन्म और मृत्यु तथा अज्ञान का जड़ से ही नाश

554
00:39:48,560 --> 00:39:52,800
कर देते हैं। जिस प्रकार सोना कभी लोहा नहीं हो सकता।

555
00:39:52,800 --> 00:39:57,120
उसी प्रकार सद्गुरु का दास कभी संदेह में नहीं पड़ सकता। देखो

556
00:39:57,120 --> 00:40:01,120
संशयात्मा विनश्यति संशय का निवारण कौन

557
00:40:01,120 --> 00:40:05,520
करते हैं? गुरु गुरु गीता में लिखा है

558
00:40:05,520 --> 00:40:09,920
वह कभी संशय में नहीं पड़ सकता। गंगा में जो नदी मिलती

559
00:40:09,920 --> 00:40:13,920
है वह भी गंगा ही हो जाती है। फिर वह नदी किसी प्रकार

560
00:40:13,920 --> 00:40:18,080
से गंगा से अलग नहीं हो सकती। पर जब तक वह नदी गंगा

561
00:40:18,080 --> 00:40:22,560
से नहीं मिलती तब तक वह नदी नदी ही कहलाती है। गंगा नहीं कहलाती।

562
00:40:22,560 --> 00:40:26,720
पर शिष्य की वह बात नहीं है। वह पूर्ण रूप से स्वामी हो जाता है।

563
00:40:26,720 --> 00:40:31,200
पारस किसी पदार्थ को अपने समान पारस नहीं कर सकता।

564
00:40:31,200 --> 00:40:35,280
सोना कभी लोहे का रूप नहीं बदल सकता। पर सद्गुरु का भक्त

565
00:40:35,280 --> 00:40:37,520
अपने उपदेश से बहुत से लोगों को

566
00:40:37,520 --> 00:40:41,600
सद्गुरु बना देता है। शिष्य को गुरुत्व प्राप्त हो जाता

567
00:40:41,600 --> 00:40:45,600
है। पर पारस से बनाए हुए सोने से

568
00:40:45,600 --> 00:40:51,440
कोई चीज सोना नहीं बनाई जा सकती। इसलिए

569
00:40:51,440 --> 00:40:55,440
पारस के साथ गुरु की उपमा ठीक नहीं बैठती। यदि सागर से

570
00:40:55,440 --> 00:40:59,440
उपमा दी जाए तो वह भी बहुत ही खारा है। यदि छर सागर से

571
00:40:59,440 --> 00:41:03,440
उपमा दी जाए तो उसका भी कल्पांत में नाश हो

572
00:41:03,440 --> 00:41:07,520
जाना है। यदि मेरु से उपमा दी जाए तो

573
00:41:07,520 --> 00:41:11,600
वह जड़ और कठोर पाषाण है। पर सद्गुरु की वह बात नहीं

574
00:41:11,600 --> 00:41:15,680
है। वह दिनों के लिए बहुत कोमल है।

575
00:41:15,680 --> 00:41:19,840
यदि आकाश से उपमा दी जाए तो सद्गुरु का रूप आकाश से भी यदि

576
00:41:19,840 --> 00:41:23,840
सूक्ष्म तथा निर्गुण है। इसलिए यदि सद्गुरु की आकाश से

577
00:41:23,840 --> 00:41:28,000
उपमा दी जाए तो वह भी हीन ही ठहरती है। यदि

578
00:41:28,000 --> 00:41:32,160
धीरता में धीरता की उपमा के लिए वसुंधरा यदि

579
00:41:32,160 --> 00:41:36,320
धीरता में पृथ्वी के साथ उपमा दी जाए तो वह भी कल्पांत में नष्ट

580
00:41:36,320 --> 00:41:40,480
हो जाएगी। अतः धीरता की उपमा के लिए वसुंधरा भी हीन

581
00:41:40,480 --> 00:41:44,560
है। यदि सूर्य से उपमा दी जाए तो

582
00:41:44,560 --> 00:41:48,720
उसका प्रकाश ही कितना है? शास्त्र उसकी मर्यादा

583
00:41:48,720 --> 00:41:54,480
बतलाते हैं। पर सद्गुरु अमर्याद है।

584
00:41:54,480 --> 00:41:59,120
देखिए शब्द का थोड़ा सा भेद है। अगर यह अमर्याद

585
00:41:59,120 --> 00:42:03,200
को अमर्यादित कहते तो दूसरा

586
00:42:03,200 --> 00:42:07,440
अर्थ दूसरा भाव प्रकट होने लगता। सद्गुरु अमर्यादित है।

587
00:42:07,440 --> 00:42:12,480
पर यहां पर अमर्याद करके उन्होंने वही अर्थ प्रयोग

588
00:42:12,480 --> 00:42:17,040
में ले लिया जो अपेक्षित था। इससे

589
00:42:17,040 --> 00:42:21,280
सूर्य भी उपमा के योग्य नहीं है। सद्गुरु ज्ञान का बहुत

590
00:42:21,280 --> 00:42:25,280
अधिक प्रकाश करने वाले हैं। अतः यदि शेषनाग से उनकी उपमा दी

591
00:42:25,280 --> 00:42:29,440
जाए तो वह भी भार ढूंढने वाले हैं। यदि जल से उपमा

592
00:42:29,440 --> 00:42:34,160
दें तो वह भी कालांतर में सूख जाता है। पर सद्गुरु निश्चल है।

593
00:42:34,160 --> 00:42:38,400
वे कभी नहीं कभी जा नहीं सकते। यदि

594
00:42:38,400 --> 00:42:42,720
सद्गुरु की उपमा अमृत से दी जाए तो अमर लोग भी मृत्यु

595
00:42:42,720 --> 00:42:47,040
के मार्ग का अवलंबन करते हैं। पर सद्गुरु की कृपा सचमुच

596
00:42:47,040 --> 00:42:51,920
अमर करने वाली है। यदि सद्गुरु को कल्पतरु कहे

597
00:42:51,920 --> 00:42:56,400
तो भी ठीक नहीं क्योंकि सद्गुरु का रूप कल्पनातीत है।

598
00:42:56,400 --> 00:43:00,560
तो भला कल्पवृक्ष की उपमा कौन ग्रहण करेगा? जहां मन में चिंता

599
00:43:00,560 --> 00:43:04,960
ही नहीं है वहां चिंतामणि को कौन भला पूछेगा? जो निष्काम

600
00:43:04,960 --> 00:43:09,040
है उसे कामधेनु के दूध से क्या मतलब? यदि सद्गुरु

601
00:43:09,040 --> 00:43:10,000
को लक्ष्मीवान

602
00:43:10,000 --> 00:43:14,240
कहे तो लक्ष्मी भी नष्ट हो जाने वाली चीज है। और फिर

603
00:43:14,240 --> 00:43:18,480
मोह लक्ष्मी सदा स्वयं सद्गुरु के द्वार

604
00:43:18,480 --> 00:43:22,560
पर खड़ी रहती है। स्वर्ग लोक तथा इंद्र

605
00:43:22,560 --> 00:43:27,040
की संपत्ति का भी कालांत में नाश हो जाता है। पर सद्गुरु की कृपा

606
00:43:27,040 --> 00:43:31,600
सदैव बनी रहती है। ब्रह्मा विष्णु और महेश आदि

607
00:43:31,600 --> 00:43:35,760
सभी समय पाकर नष्ट हो जाते हैं। एक सद्गुरु के चरण

608
00:43:35,760 --> 00:43:39,600
ही सदा

609
00:43:39,600 --> 00:43:43,680
अभिनश्वर रहते हैं। फिर भला उनकी उपमा किससे

610
00:43:43,680 --> 00:43:47,680
दी जाए? सारी सृष्टि ही नष्ट हो जाती है। उसके सामने

611
00:43:47,680 --> 00:43:51,760
पंच भौतिक वस्तुओं का कुछ वश नहीं चलता। इसलिए मैं तो

612
00:43:51,760 --> 00:43:55,760
सद्गुरु का वर्णन यही कहकर करता हूं कि सद्गुरु

613
00:43:55,760 --> 00:43:59,840
का वर्णन हो ही नहीं सकता। मन की भीतरी दशा

614
00:43:59,840 --> 00:44:03,920
केवल अंतर्निष्ठ या अनुभव करने वाले लोग ही जान सकते

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हैं। यह थी सदगुरु की वंदना और

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जिन जो भी

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गुरुदेव की शरणागत प्राप्त है तो उनको बड़ा अच्छा लगा होगा। बड़ा रस आया होगा।

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इस तरह के पाठ करने से हमारे चिंतन में हमारे

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चिंतन का विषय हमारे गुरु बन जाते हैं। सरस्वती माता

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बन जाती है। तो बहुत भाव विभोर कर देने वाला पाठ

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था। अब आप कुछ छोटे-मोटे प्रश्न एक या दो बस

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[संगीत]
