1
00:00:03,840 --> 00:00:08,240
तो एक महत्वपूर्ण बात है कि आपने देखा होगा कि

2
00:00:08,240 --> 00:00:12,960
हमारे शास्त्रों में अलग-अलग जगह कहीं पर कई जगह लिखा होता है कि आप

3
00:00:12,960 --> 00:00:15,360
अ

4
00:00:15,360 --> 00:00:19,520
नाम जपिए या फिर कहीं पर लिखा होता है कि सहस्त्र नामों का जो पाठ करता

5
00:00:19,520 --> 00:00:23,760
है या फिर कहीं पर लिखा होता है कि जो है जो

6
00:00:23,760 --> 00:00:27,840
इस अध्याय का पाठ करता है तो इस तरीके से कई

7
00:00:27,840 --> 00:00:31,920
प्रकार से भगवान में लीन रहने की

8
00:00:31,920 --> 00:00:35,920
विधाएं बताई गई होती हैं। तो यहां पर भी चौथे दशक में

9
00:00:35,920 --> 00:00:40,160
उसी तरह की कोई बात की जा रही है। श्रवण भक्ति,

10
00:00:40,160 --> 00:00:44,400
कीर्तन भक्ति, स्मरण भक्ति, पाद सेवन भक्ति, अर्चन भक्ति,

11
00:00:44,400 --> 00:00:49,040
वंदन भक्ति, दास्य भक्ति, सख्य भक्ति,

12
00:00:49,040 --> 00:00:53,840
अह आत्म निवेदन भक्ति, सृष्टि वर्णन और चारों मुक्तियां।

13
00:00:53,840 --> 00:00:58,240
पांचव दशक में बहुत इंपॉर्टेंट चीज आ गई है।

14
00:00:58,240 --> 00:01:02,640
गुरु निश्चय गुरु का निश्चय कैसे सद्गुरु लक्षण

15
00:01:02,640 --> 00:01:06,640
सद शिष्य लक्षण उपदेश लक्षण अनेक प्रकार

16
00:01:06,640 --> 00:01:10,960
के ज्ञान शुद्ध ज्ञान बद्ध लक्षण मुमुक्षु लक्षण

17
00:01:10,960 --> 00:01:15,120
साधक लक्षण सिद्ध लक्षण ये सब आत्म

18
00:01:15,120 --> 00:01:19,040
चिंतन के विषय हैं। ये लक्षण पढ़ के हम आत्म

19
00:01:19,040 --> 00:01:23,280
चिंतन कर पाएंगे। परमात्मा की पहचान छठा

20
00:01:23,280 --> 00:01:27,280
दशक परमात्मा की पहचान परमात्मा की

21
00:01:27,280 --> 00:01:31,760
प्राप्ति माया की उत्पत्ति माया का विस्तार माया और ब्रह्म

22
00:01:31,760 --> 00:01:37,120
ईश्वर का निरूपण सगुण भक्ति दृश्य जगत का मिथ्याभास

23
00:01:37,120 --> 00:01:43,120
गुप्त परमात्मा की खोज अनुभव की अनिर्वचनीयता

24
00:01:43,840 --> 00:01:48,240
अनुभव की अनिर्वचनीयता क्या है? इस

25
00:01:48,240 --> 00:01:52,400
पर आज हम अच्छा यह तो चैप्टर पता नहीं कब आएगा तब

26
00:01:52,400 --> 00:01:56,800
हम इस पर बात करेंगे सातवां दशक

27
00:01:56,800 --> 00:02:00,960
माया की खोज ब्रह्म निरूपण 14 मायिक

28
00:02:00,960 --> 00:02:01,600
ब्रह्म

29
00:02:01,600 --> 00:02:05,680
केवल ब्रह्म द्वैत कल्पना का निरसन मुक्ति

30
00:02:05,680 --> 00:02:10,160
के लक्षण साधन का निश्चय श्रवण महिमा श्रवण

31
00:02:10,160 --> 00:02:15,040
का निरूपण देहांत निरूपण

32
00:02:15,040 --> 00:02:21,040
एक मिनट

33
00:02:40,000 --> 00:02:46,000
हां

34
00:02:50,560 --> 00:02:54,720
केवल ब्रह्म द्वैत कल्पना का निरसन

35
00:02:54,720 --> 00:02:59,760
मुक्त के लक्षण साधन का निश्चय

36
00:02:59,760 --> 00:03:04,480
श्रवण महिमा श्रवण का निरूपण देहांत

37
00:03:04,480 --> 00:03:09,600
निरूपण तो ये सारी चीजें जो हमारी चल रही हैं

38
00:03:09,600 --> 00:03:13,840
ये अलंकार समाधि जो बात किया करते हैं।

39
00:03:13,840 --> 00:03:18,320
हमने बहुत सारे क्रांतिकारी खड़े किए हैं। अरे भैया

40
00:03:18,320 --> 00:03:23,120
संसार में ईश्वर का अस्तित्व हमने सिद्ध किया है।

41
00:03:23,120 --> 00:03:27,120
तो संसार में जितनी भी मानवता है उसके

42
00:03:27,120 --> 00:03:31,120
मूल में अगर जाओगे तो शंकर का सिद्धांत मिलेगा। उस सिद्धांत

43
00:03:31,120 --> 00:03:35,360
के बिना उस मानवता को माता को माता मानने

44
00:03:35,360 --> 00:03:39,520
वाले नियमों को आप स्थापित ही नहीं कर पाओगे संसार में।

45
00:03:39,520 --> 00:03:43,520
और यदि सतही स्तर की बात कर ले

46
00:03:43,520 --> 00:03:47,520
मूर्ति पूजक होने के नाते पुराण को मानने वाले होने के नाते की बात

47
00:03:47,520 --> 00:03:52,080
कर ले तो हमने ऐसे लोगों को खड़ा किया है

48
00:03:52,080 --> 00:03:56,480
और कहीं ज्यादा वृहद संख्या में जिनको

49
00:03:56,480 --> 00:04:00,560
आप भी प्रणम्य मानते हैं शिवाजी छत्रपति

50
00:04:00,560 --> 00:04:04,640
शिवाजी को कौन नहीं मानता प्रणम्य क्या ये लोग नहीं मानते आज

51
00:04:04,640 --> 00:04:05,600
एक हर्ष

52
00:04:05,600 --> 00:04:11,600
मैंने थोड़ा सा विनोद की बात मैंने देखी

53
00:04:12,080 --> 00:04:17,520
आर्य समाज का जो सम्मेलन चल रहा है दिल्ली में उसमें

54
00:04:17,520 --> 00:04:21,280
कोई आए हुए थे

55
00:04:21,280 --> 00:04:25,360
ऐसे जो नाम चिन्ह व्यक्ति थे वो आए हुए थे उनसे कोई इंटरव्यू हो रहा

56
00:04:25,360 --> 00:04:29,600
था तो उनसे जब पूछा गया माइक लेकर के कि

57
00:04:29,600 --> 00:04:33,680
भाई अ आप क्या कहना चाहते

58
00:04:33,680 --> 00:04:37,920
हैं कार्यक्रम के बारे में तो वहां पर जो ऐसे लोग थे जो मुख्य

59
00:04:37,920 --> 00:04:42,000
अतिथि के रूप में वक्ता के रूप में आए थे। जिनका डायरेक्ट मतलब कोई कनेक्शन

60
00:04:42,000 --> 00:04:46,080
नहीं पर वो वहां एक अतिथि के रूप में आए। तो उनका सारा जो

61
00:04:46,080 --> 00:04:50,160
वक्तव्य था आर्य समाज को लेकर के वह इस

62
00:04:50,160 --> 00:04:54,240
बारे में था कि आर्य समाज बहुत बढ़िया क्रांतिकारी है। इस बारे

63
00:04:54,240 --> 00:04:58,240
में नहीं था कि आर्य समाज के जो दर्शन इत्यादि के सिद्धांत है वो बहुत

64
00:04:58,240 --> 00:05:03,120
बढ़िया है या उन्होंने जो दर्शन का सिद्धांत दिया है वो

65
00:05:03,120 --> 00:05:07,360
या अन्य जो उन्होंने धर्म और ब्रह्म की परिभाषाएं दी है उस संबंध में

66
00:05:07,360 --> 00:05:11,360
गढ़ता या कोई तात्विक विवेचना बहुत महान है। यह

67
00:05:11,360 --> 00:05:15,600
सब कोई नहीं बात करता है। वहां पर क्या बात होती है कि वो भैया देश

68
00:05:15,600 --> 00:05:19,760
के लिए लड़ने मरने वाले हैं। बहुत अच्छे हैं और इस तरीके की उनके संबंध

69
00:05:19,760 --> 00:05:21,200
में बात है।

70
00:05:21,200 --> 00:05:25,600
तो अच्छी बात है। हमारा उन हमारे और उनके बीच

71
00:05:25,600 --> 00:05:29,600
इन बातों को लेकर के कोई मतभेद थोड़ी ना है। मतभेद

72
00:05:29,600 --> 00:05:33,840
है कि जब आप गढ़ में जब आप मूल में ही

73
00:05:33,840 --> 00:05:37,920
व्यक्ति को खोखला कर दोगे तो ऊपर से उसको कितना भी ड्रेस अप कर दो। मगर

74
00:05:37,920 --> 00:05:42,000
क्योंकि वह अंदर से खोखला है। वह ड्रेस अप करने के बाद भी व्यक्ति वह

75
00:05:42,000 --> 00:05:46,000
आपके काम नहीं आ पाएगा। अंतगत तो मूल में भी काम करने की आवश्यकता

76
00:05:46,000 --> 00:05:50,480
है ना। ड्रेसअप के साथ-साथ आपने तो कह दिया कि मूर्ति पूजा

77
00:05:50,480 --> 00:05:54,560
व्यर्थ है। तो जब व्यक्ति की मूर्ति पूजा के प्रति निष्ठा ही तुम

78
00:05:54,560 --> 00:05:58,640
भंग कर दोगे तो कितना भी उसको ड्रेसअप करके बना दो कि हमने देखो योद्धा खड़ा

79
00:05:58,640 --> 00:06:02,800
किया है। सनातन धर्म को बचाने के लिए, हिंदू धर्म को बचाने के लिए। उस

80
00:06:02,800 --> 00:06:06,800
योद्धा के अंदर आत्मा से निकलने वाली आवाज नहीं

81
00:06:06,800 --> 00:06:11,200
होगी कि मुझे मूर्ति की रक्षा करनी है। ठीक है?

82
00:06:11,200 --> 00:06:15,200
यूं ही कर दे अंतरात्मा से उसके नहीं

83
00:06:15,200 --> 00:06:19,200
आएगा कि मुझे मूर्ति की रक्षा करनी है। और वो भावना उसके अंदर

84
00:06:19,200 --> 00:06:23,200
आपने भरी है। तो उन पर भी बात होगी ना। अब रामपाल वाले आजकल कह रहे

85
00:06:23,200 --> 00:06:27,520
हैं कि हमने पाइप दिए हैं। पाइप दिए हैं। पाइप दिए हैं। अनाकोंडा के बराबर लंबे

86
00:06:27,520 --> 00:06:32,320
पाइप यही तो कह रहे हैं फराने हजार फुट यह फट यह फुट

87
00:06:32,320 --> 00:06:36,640
अनाकोंडा के बराबर लंबाई में पाइप दिए होंगे चार पांच अनाकोंडा

88
00:06:36,640 --> 00:06:40,720
को मिलाकर के तो अनाकोंडा के बराबर पाइप दिए

89
00:06:40,720 --> 00:06:44,800
तो उस बात को लेकर के कोई थोड़ी ना विवाद है विवाद

90
00:06:44,800 --> 00:06:48,960
इस बात को लेकर है कि तुमने हमारे भगवान के बारे में उल्टा सीधा

91
00:06:48,960 --> 00:06:53,200
क्यों बोला विवाद इस बात को लेकर है कि तुम

92
00:06:53,200 --> 00:06:57,200
जो परंपरा से प्राप्त ज्ञान है वह अपने उनका उनका

93
00:06:57,200 --> 00:07:01,520
अपने मन मुताबिक अर्थ क्यों करते हो इन बातों को लेकर विवाद

94
00:07:01,520 --> 00:07:05,840
अब किसी व्यक्ति ने मंदिर में चंदा दे दिया, भूखों को खाना खिला दिया

95
00:07:05,840 --> 00:07:09,840
या और कोई कार्य अच्छा कर दिया और बाहर जाकर के किसी छोटी

96
00:07:09,840 --> 00:07:14,480
बच्ची के साथ कोई दुष्कर्म कर दिया। तो इसलिए क्योंकि उसने मंदिर में चंदा दिया है

97
00:07:14,480 --> 00:07:18,480
या उसने भूखों को भोजन कराया है। इसलिए उसके

98
00:07:18,480 --> 00:07:20,640
उस

99
00:07:20,640 --> 00:07:25,440
अमानवीय व्यवहार के लिए उसको सजा ना दी जाए। यह कहां का न्याय है?

100
00:07:25,440 --> 00:07:29,680
और यह अगर न्याय है तो तुम्हारा न्याय होगा। यह हमारा सनातन सिद्धांत

101
00:07:29,680 --> 00:07:33,840
नहीं है। ठीक है। कई अंशों में रावण भी अच्छा था।

102
00:07:33,840 --> 00:07:38,880
कई अंशों में दुर्योधन भी अच्छा था।

103
00:07:38,880 --> 00:07:43,120
हां। नहीं था क्या अच्छा? कई अंशों में अच्छा था। परंतु

104
00:07:43,120 --> 00:07:47,920
उस अच्छे होने के कारण क्या उसने जो पाप किया उसको भूल जाए?

105
00:07:47,920 --> 00:07:51,840
ये कौन सी बात है भाई? तो तुमने अगर क्रांतिकारी खड़े

106
00:07:51,840 --> 00:07:56,000
भी किए यद्यपि बात क्या हो रही है? क्रांतिकारी हमने

107
00:07:56,000 --> 00:08:00,320
तुमसे कहीं ज्यादा और बहुत बड़ी

108
00:08:00,320 --> 00:08:04,560
वृहत संख्या में खड़े किए हैं। और उसके बावजूद एक जो मूल तात्विक विषय

109
00:08:04,560 --> 00:08:08,800
है यदि कोई व्यक्ति आज मानवता को मानवता को मान

110
00:08:08,800 --> 00:08:13,440
रहा है। माता को माता की दृष्टि से देख रहा है तो उसके मूल में

111
00:08:13,440 --> 00:08:18,480
सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष है।

112
00:08:18,480 --> 00:08:22,480
और वो मिलता है अद्वैत से शंकर सिद्धांत से।

113
00:08:22,480 --> 00:08:26,720
उसको नकार के आप अपनी बिल्डिंग नहीं खड़ी कर पाओगे। उसको पहले नीचे बिल्डिंग

114
00:08:26,720 --> 00:08:30,880
जमा लो। उसके बाद उसके अंदर हमने एक कमरा बनाया है। इस कमरे

115
00:08:30,880 --> 00:08:35,200
के अंदर हमारे कोई नहीं आ सकता। ये आप कर सकते हो। परंतु

116
00:08:35,200 --> 00:08:40,160
आप यह कहो कि हम जो है उस बड़ी बिल्डिंग के बाहर हमने फ्लैट ले लिया है।

117
00:08:40,160 --> 00:08:44,400
तो बाहर जैसे ही जाओगे तो तुम्हारा वो जो कमरामरा है तो नष्ट भ्रष्ट हो जाएगा।

118
00:08:44,400 --> 00:08:48,400
आपको उस अपार्टमेंट के अंदर अपना एक फ्लैट लेना है तो ले लो।

119
00:08:48,400 --> 00:08:52,560
ठीक है? खूब रस रसगत भक्ति कर लो, खूब भेद

120
00:08:52,560 --> 00:08:56,720
कर लो कि हम तो केवल कृष्ण को मानेंगे। राम को भी नहीं मानेंगे। उसके

121
00:08:56,720 --> 00:09:01,600
अंदर रहते हुए खूब कर लो ये सब बात कि हमारे कमरे के अंदर तो केवल कृष्ण।

122
00:09:01,600 --> 00:09:05,680
मगर फिर आप जो है विरोध करने मत आओ। लोहा

123
00:09:05,680 --> 00:09:07,840
मत लो फिर

124
00:09:07,840 --> 00:09:12,800
है ना पूरे पूरे अपार्टमेंट्स हम तो

125
00:09:12,800 --> 00:09:17,920
यह बात है कि हमने हरिहर बुक्का शिवाजी

126
00:09:17,920 --> 00:09:22,240
और ऐसे सभी क्रांतिकारी देशभक्त

127
00:09:22,240 --> 00:09:26,240
हमने खड़े किए हैं जो आर्य समाजी नहीं थे

128
00:09:26,240 --> 00:09:30,240
और हिंदू थे संख्या लगा लो कितनी है वो सब हमने खड़े

129
00:09:30,240 --> 00:09:34,240
किए परंपरा प्राप्त आचार्यों ने खड़े किए मूर्ति पूजक थे

130
00:09:34,240 --> 00:09:38,960
जो आर्य समाज नहीं था मूर्ति पूजक था वर्ण व्यवस्था को मानने वाला था

131
00:09:38,960 --> 00:09:43,760
मंगल पांडे नहीं थे क्या वर्ण व्यवस्था को मानने वाले क्रांति की शुरुआत किसने की

132
00:09:43,760 --> 00:09:47,840
किसने की क्रांति की शुरुआत मंगल पांडे ने की नहीं

133
00:09:47,840 --> 00:09:51,840
थे क्या मूर्ति को मानने वाले वर्ण व्यवस्था को मानने वाले

134
00:09:51,840 --> 00:09:57,840
थे ठीक है ये सब

135
00:09:57,840 --> 00:10:02,160
मुझे फिर वही कहा जाता है कि फिल्मों का उदाहरण देता है एक मैंने फिल्म देखी

136
00:10:02,160 --> 00:10:07,600
थी कॉमेडी मूवी उसमें क्या होता है

137
00:10:07,600 --> 00:10:11,600
कि कुछ करतूत कर

138
00:10:11,600 --> 00:10:15,600
रहे हैं। नवयुवक हैं वो मिलकर के कुछ करतूत कर रहे हैं।

139
00:10:15,600 --> 00:10:19,920
ऐसे में जो घर के अभिभावक हैं

140
00:10:19,920 --> 00:10:24,000
मामा इत्यादि वो आने लगते हैं। तो नवयुवक जो करतूत कर

141
00:10:24,000 --> 00:10:28,160
रहे थे वो अक्षय कुमार था उसमें। तो ये

142
00:10:28,160 --> 00:10:32,160
लोग जो मिलकर के करतूत कर रहे थे तो मामा आने लगते हैं तो डर जाते हैं मामा आ रहे हैं। मामा

143
00:10:32,160 --> 00:10:36,320
आ रहे हैं। तो मामा जब आते हैं तो मामा को मामा बनाने

144
00:10:36,320 --> 00:10:40,720
के लिए अरे मामा आ गए अरे मामा आ गए अरे मामा आ गए इतना

145
00:10:40,720 --> 00:10:44,720
चिल्लाने लगते हैं मामा आ गए मामा आ गए मामा परेशान होकर पूछता है क्या हो

146
00:10:44,720 --> 00:10:48,960
गया भाई इतना क्यों चिल्ला रहे हो अरे मामा आ गए इतना चिल्लाओ

147
00:10:48,960 --> 00:10:52,960
पहले से कि जो मूल विषयों पर ध्यान देना व्यक्ति भूल ही

148
00:10:52,960 --> 00:10:58,560
जाए

149
00:10:58,560 --> 00:11:03,040
है ना तो इतना जो है चिल्लाने

150
00:11:03,040 --> 00:11:07,200
लगते हैं कि मामा आ गए मामा आ गए। मूल विषयों पर व्यक्ति ध्यान देना

151
00:11:07,200 --> 00:11:11,360
भूल ही जाए। वाह मामा आ गए साहब। मामा आ

152
00:11:11,360 --> 00:11:16,160
गए। [हंसी] तो इसी तरीके से हट क्रांतिकारी हट क्रांतिकारी।

153
00:11:16,160 --> 00:11:20,320
अरे भैया है क्रांतिकारी तो ईश्वर सर्वशक्तिमान हो गया

154
00:11:20,320 --> 00:11:24,720
क्या? मोक्ष तुम्हारा परम स्वतंत्र हो गया क्या? और मैं वहां

155
00:11:24,720 --> 00:11:28,960
नाटक क्या देख रहा हूं? वहां पर आर्य समाज

156
00:11:28,960 --> 00:11:33,280
की ओर से आर्य समाज के पक्षधर के रूप में

157
00:11:33,280 --> 00:11:37,440
खड़ा होकर के कौन बात कर रहा है जो ये आचार्य प्रशांत जी हैं ये

158
00:11:37,440 --> 00:11:41,840
वाले मुरैना रहते हैं जो शायद एमपी में

159
00:11:41,840 --> 00:11:46,000
जिन्होंने खुद ये कहा है कि मोक्ष को लेकर के मैं दयानंद सरस्वती

160
00:11:46,000 --> 00:11:50,080
जी से संतुष्ट नहीं हूं। हो गया सिद्धांत

161
00:11:50,080 --> 00:11:54,320
ये सिद्धांत है जो खुद को प्रामाणिक कार्य समाधि

162
00:11:54,320 --> 00:11:58,720
कह रहा है गुरुकुल चला रहा है

163
00:11:58,720 --> 00:12:02,800
वो कह रहा है कि मैं अपने मोक्षों से संतुष्ट नहीं हूं और धर्म का

164
00:12:02,800 --> 00:12:06,800
पर्यावसान किस में है महाभारत में लिखा है धर्म

165
00:12:06,800 --> 00:12:10,800
का पर्यावसान है मोक्ष में जहां मोक्ष

166
00:12:10,800 --> 00:12:13,760
नहीं है वहां धर्म कैसे सिद्ध कर दे रहे हो तुम काहे

167
00:12:13,760 --> 00:12:18,080
का धर्म जब तुम मोक्ष के लिए किसी और के पास जा रहे हो

168
00:12:18,080 --> 00:12:22,080
तो तुम्हारा धर्म कहां बचा भाई? और फिर जब तुम मोक्ष

169
00:12:22,080 --> 00:12:26,160
से तुम संतुष्ट नहीं हो, तुम्हारा धर्म सिद्ध नहीं हो रहा तो तुम

170
00:12:26,160 --> 00:12:30,320
वहां क्या पक्ष लेने के लिए खड़े हुए हो आर्य समाज का?

171
00:12:30,320 --> 00:12:34,560
क्या ये नाटक चल रहा है? और बस

172
00:12:34,560 --> 00:12:38,560
मूल विषयों पर ध्यान ना दें। और कोई आया तो वाह क्रांतिकारी मामा

173
00:12:38,560 --> 00:12:42,800
आ गए। मामा आ गए। मामा आ गए। मामा आ गए। ये चिल्लाते

174
00:12:42,800 --> 00:12:46,880
रहो। मूल विषयों पर बात ही नहीं करनी। मामा आ गए सब। मामा आ गए

175
00:12:46,880 --> 00:12:51,040
वो करतूत पे या वह जो जो गुण

176
00:12:51,040 --> 00:12:55,280
उसमें छुपी हुई चीजें उस पे मामा का ध्यान ना जाए तो पहले इतना चल लो

177
00:12:55,280 --> 00:13:00,160
मामा आ गए [हंसी] खैर चलिए

178
00:13:00,160 --> 00:13:05,760
विनोद हो गया मूल विषय पे वापस आते हैं

179
00:13:05,760 --> 00:13:10,160
अच्छा ये जो मैसेजेस हम लोग करते हैं ना बीच में इससे थोड़ा सा

180
00:13:10,160 --> 00:13:14,160
विघ्न पड़ता है तो बहुत आवश्यक हो तो करें अन्यथा

181
00:13:14,160 --> 00:13:18,160
फिर बाद के लिए अपनी चीजें रख लें कोई कॉपी पेन लेकर के कि मुझे

182
00:13:18,160 --> 00:13:22,640
यह बात कहनी है। नोट करते जाए।

183
00:13:22,640 --> 00:13:26,720
आठवां दशक है परमात्मा का निश्चय माया के अस्तित्व

184
00:13:26,720 --> 00:13:31,200
में संदेह निर्गुण से माया की उत्पत्ति

185
00:13:31,200 --> 00:13:35,520
सूक्ष्म पंचमहाभूत स्थूल पंचमहाभूत

186
00:13:35,520 --> 00:13:40,320
सत्संग और मोक्ष मोक्ष के लक्षण परमात्मा

187
00:13:40,320 --> 00:13:43,840
के दर्शन

188
00:13:43,840 --> 00:13:48,400
रिसीव्ड ऑन फोन पे अनेक प्रकार के अनुभव

189
00:13:48,400 --> 00:13:53,280
ब्रह्म का निरूपण नवा दशक ब्रह्म का निरूपण

190
00:13:53,280 --> 00:13:58,640
आत्मज्ञान ज्ञानी के जन्म मरण का अभाव

191
00:13:58,640 --> 00:14:02,640
अजान और सुजान पिंड और ब्रह्मांड

192
00:14:02,640 --> 00:14:07,600
पांचों भूत और तीनों गुण विकल्प

193
00:14:07,600 --> 00:14:12,080
निरसन बद्ध का पुनर्जन्म

194
00:14:12,080 --> 00:14:16,160
ब्रह्म में ब्रह्मांड आत्म स्थिति दवा

195
00:14:16,160 --> 00:14:20,240
दशक अंतःकरण की एकता उत्पत्ति के विषय

196
00:14:20,240 --> 00:14:24,960
में शंका सृष्टि की उत्पत्ति उत्पत्ति निरूपण

197
00:14:24,960 --> 00:14:28,960
ब्रह्म पंच प्रलय ब्रह्म निरूपण

198
00:14:28,960 --> 00:14:33,440
साधु चमत्कार नहीं दिखलाते प्रतीति निरूपण

199
00:14:33,440 --> 00:14:37,760
पुरुष और प्रकृति फिर निश्चल

200
00:14:37,760 --> 00:14:42,640
और चंचल ये बहुत अच्छा वो आया है। साधु चमत्कार नहीं दिखलाते।

201
00:14:42,640 --> 00:14:47,040
जो लोग कहते हैं मधुमक्खियों की सेना ये यहां पे आ रहा है।

202
00:14:47,040 --> 00:14:51,040
यह पढ़ने में आनंद आएगा। मधुमक्खियों की सेना नागोक की

203
00:14:51,040 --> 00:14:55,040
सेना विश्वामित्र की धनुर विद्या अपने पर बात आएगी तो

204
00:14:55,040 --> 00:14:58,880
क्या करेंगे भाग जाएंगे अपनी बातें आएंगी भगवती पढ़ाने

205
00:14:58,880 --> 00:15:04,640
आती है भगवती ने पूछा मांगो क्या मांगते हो मांग लो राष्ट्र हित में चीजें

206
00:15:04,640 --> 00:15:09,600
सारी मलेच्छ शक्तियों का नाश हो जाए मलेच्छ का नाश हो जाए मांग लो

207
00:15:09,600 --> 00:15:13,600
पर नहीं वो भगवती उनको पढ़ाने पढ़ा के जाती है

208
00:15:13,600 --> 00:15:18,560
क्या जो शंकराचार्य जी ने पहले ही पढ़ा रखा है वो पढ़ा के जाती है भगवती में

209
00:15:18,560 --> 00:15:21,200
हम

210
00:15:21,200 --> 00:15:25,360
आगे क्या है हम प्रतीति निरूपण पुरुष और

211
00:15:25,360 --> 00:15:29,360
प्रकृति निश्चल और चंचल 11वां दशक सिद्धांत

212
00:15:29,360 --> 00:15:33,600
निरूपण सृष्टि का क्रम शिक्षा निरूपण विवेक

213
00:15:33,600 --> 00:15:37,840
निरूपण राजनीति निरूपण महंत के लक्षण

214
00:15:37,840 --> 00:15:42,240
माया रूपी चंचल नदी अंतरात्मा का निरूपण उपदेश

215
00:15:42,240 --> 00:15:47,200
निरूपण निष्प्रह व्यवहार

216
00:15:47,200 --> 00:15:52,800
देखो देखो परमार्थ और व्यवहार की बात यहां भी चल रही है। ध्यान दीजिए।

217
00:15:52,800 --> 00:15:56,800
12वां दशक विमल लक्षण अनुभव

218
00:15:56,800 --> 00:16:01,600
का निरूपण भक्त निरूपण विवेक वैराग्य

219
00:16:01,600 --> 00:16:05,600
निरूपण आत्म निवेदन सृष्टि क्रम

220
00:16:05,600 --> 00:16:10,640
निरूपण विषय त्याग काल का रूप

221
00:16:10,640 --> 00:16:14,720
प्रयत्न संबंधी उपदेश उत्तम पुरुषों के लक्षण

222
00:16:14,720 --> 00:16:20,000
आत्मा और अनात्मा सारासार विचार

223
00:16:20,000 --> 00:16:23,280
उत्पत्ति निरूपण

224
00:16:23,280 --> 00:16:27,760
प्रलय निरूपण सृष्टि की कहानी लघु

225
00:16:27,760 --> 00:16:33,760
बोध अनुभव का विचार कर्ता का निरूपण

226
00:16:35,280 --> 00:16:40,240
आत्मा का विवरण उपदेश निरूपण निष्प्रह लक्षण

227
00:16:40,240 --> 00:16:44,880
भिक्षा निरूपण

228
00:16:44,880 --> 00:16:48,960
काव्य कला कीर्तन लक्षण हरि कथा के

229
00:16:48,960 --> 00:16:53,520
लक्षण चातुर्य के लक्षण युग धर्म निरूपण

230
00:16:53,520 --> 00:16:59,040
अखंड ध्यान शाश्वत निरूपण माया का निरूपण

231
00:16:59,040 --> 00:17:03,440
चतुरों के लक्षण निष्प्रहता के लक्षण श्रेष्ठ

232
00:17:03,440 --> 00:17:08,080
अंतरात्मा ब्रह्म निरूपण चंचल के लक्षण

233
00:17:08,080 --> 00:17:12,320
चातुर्य विवरण प्रकृति और पुरुष के लक्षण

234
00:17:12,320 --> 00:17:17,600
सूक्ष्म जीव निरूपण पिंड की उत्प उत्पत्ति

235
00:17:17,600 --> 00:17:20,960
सिद्धांत निरूपण

236
00:17:20,960 --> 00:17:25,840
16वा दशक वाल्मीकि स्तवन सूर्य स्तवन

237
00:17:25,840 --> 00:17:30,240
पृथ्वी स्तवन जल स्तवन अग्नि स्तवन वायु

238
00:17:30,240 --> 00:17:34,640
स्तवन महाभूत निरूपण आत्माराम निरूपण

239
00:17:34,640 --> 00:17:38,960
उपासना निरूपण गुणों और भूतों का निरूपण सत्रवा

240
00:17:38,960 --> 00:17:44,080
दशक अंतरात्मा का भजन शिव शक्ति निरूपण आध्यात्म

241
00:17:44,080 --> 00:17:48,160
श्रवण संशय का नाश देखो हमारे सारे मूल टॉपिक

242
00:17:48,160 --> 00:17:50,640
देखो घूमते हैं कि नहीं

243
00:17:50,640 --> 00:17:55,280
संशय का नाश अजपा निरूपण देह और आत्मा का निरूपण

244
00:17:55,280 --> 00:18:00,560
सांसारिक गति तत्व निरूपण तनु चतुष्टय

245
00:18:00,560 --> 00:18:04,640
मूर्ख और साधु के लक्षण 18वा दशक विविध

246
00:18:04,640 --> 00:18:09,360
देवता सर्वज्ञ की संगति निष्प्रह शिक्षा

247
00:18:09,360 --> 00:18:13,440
दुर्लभ शरीर का महत्व समाधान

248
00:18:13,440 --> 00:18:17,440
का उपाय उत्तम पुरुषों के लक्षण लोगों

249
00:18:17,440 --> 00:18:21,840
का स्वभाव अंतदेव निरूपण निद्रा निरूपण

250
00:18:21,840 --> 00:18:24,960
श्रोताओं के अवलक्षण

251
00:18:24,960 --> 00:18:29,200
लेखन क्रिया अर्थभेद का ज्ञान 19वां अभागों

252
00:18:29,200 --> 00:18:34,400
के लक्षण भाग्यवानों के लक्षण शरीर का महत्व बुद्धिवाद

253
00:18:34,400 --> 00:18:38,400
यत्न निरूपण उपाधियों के लक्षण राजनीति निरूपण

254
00:18:38,400 --> 00:18:43,280
विवेक के लक्षण 20वां दशक पूर्ण और अपूर्णवाह

255
00:18:43,280 --> 00:18:49,280
फिर आ गया हमारा बाधित और अभाध्य हां

256
00:18:49,520 --> 00:18:53,680
तीन प्रकार की सृष्टियां सूक्ष्म नाम आत्मा का निरूपण

257
00:18:53,680 --> 00:18:58,080
चारों पदार्थ आत्मा के गुण आत्म निरूपण देह

258
00:18:58,080 --> 00:19:02,080
क्षेत्र निरूपण सूक्ष्म निरूपण विमल ब्रह्म

259
00:19:02,080 --> 00:19:06,160
निरूपण ये है हमारी विषय सूची मुझे

260
00:19:06,160 --> 00:19:10,240
लगता है विषय सूची को पढ़ने में भी आनंद आया होगा देखो इस ऐसे करना चाहिए

261
00:19:10,240 --> 00:19:14,400
ग्रंथ का अध्ययन है ना विषय सूची को पढ़ के

262
00:19:14,400 --> 00:19:18,480
भी मन आनंदित हो गया। आप कभी भी कोई पुराण खोले, कभी भी

263
00:19:18,480 --> 00:19:22,640
अपना कोई धार्मिक सनातन ग्रंथ खोलें तो उसमें आप देखिए

264
00:19:22,640 --> 00:19:26,720
उसकी आप विषय सूची को ही आप पढ़ ले तो आपको लगेगा वाह। अच्छा ये

265
00:19:26,720 --> 00:19:31,120
भी है इसमें इतनी जानकारियां तो वही आपको मिलंगी विषय सूची में।

266
00:19:31,120 --> 00:19:35,200
खैर आगे बढ़ते हैं।

267
00:19:35,200 --> 00:19:39,680
श्री गणेशाय नमः हिंदी बोध पहला दशक

268
00:19:39,680 --> 00:19:44,320
पहला समास ग्रंथ आरंभ निरूपण

269
00:19:44,320 --> 00:19:48,320
श्रोता पूछते हैं कि यह कौन ग्रंथ है? इसमें क्या-क्या बातें कही गई

270
00:19:48,320 --> 00:19:52,320
है और इसे सुनने से क्या लाभ होता है? इसका उत्तर यह है कि इसका नाम

271
00:19:52,320 --> 00:19:56,560
दात बोध है। इसमें गुरु और शिष्य का संवाद है और इसमें भक्ति

272
00:19:56,560 --> 00:20:00,960
मार्ग का विस्तृत वर्णन है। इसमें नवदा भक्ति

273
00:20:00,960 --> 00:20:05,040
और ज्ञान का वर्णन है। वैराग्य के लक्षण कहे गए हैं और आध्यात्म का

274
00:20:05,040 --> 00:20:09,360
निरूपण किया गया है। इस ग्रंथ का यह मतलब है

275
00:20:09,360 --> 00:20:13,360
कि भक्ति की सहायता से मनुष्य अवश्य ही ईश्वर को प्राप्त कर

276
00:20:13,360 --> 00:20:17,360
सकता है। करता है। इसमें मुख्यत भक्ति, शुद्ध

277
00:20:17,360 --> 00:20:21,440
ज्ञान, आत्म स्थिति, शुद्ध उपदेश सायुज्य मुक्ति, मोक्ष

278
00:20:21,440 --> 00:20:26,720
प्राप्ति, ईश्वर के शुद्ध स्वरूप, विदेह, स्थिति, अलिप्तता,

279
00:20:26,720 --> 00:20:30,720
मुख्य देवता या ईश्वर, अच्छे भक्त, जीव और शिव,

280
00:20:30,720 --> 00:20:34,720
जीवात्मा और परमात्मा मुख्य, ब्रह्म और

281
00:20:34,720 --> 00:20:38,960
नाना मतों आदि का निश्चय या निरूपण किया गया है।

282
00:20:38,960 --> 00:20:43,520
इसमें मुख्य उपासना, नाना प्रकार के कवित्व और चातुर्य

283
00:20:43,520 --> 00:20:47,520
के लक्षण कहे गए हैं। माया की उत्पत्ति और पंचभूतों

284
00:20:47,520 --> 00:20:50,320
के लक्षण बतलाते गए हैं। और बतलाया गया

285
00:20:50,320 --> 00:20:54,480
है कि कर्ता कौन है। इसमें नाना प्रकार के संशयों

286
00:20:54,480 --> 00:20:59,120
और शंकाओं का निवारण किया गया है और अनेक

287
00:20:59,120 --> 00:21:03,200
प्रकार के प्रश्नों का उत्तर भी दिया गया है। इस प्रकार की जो बहुत सी बातें

288
00:21:03,200 --> 00:21:08,480
इस ग्रंथ में बतलाई गई हैं। उन सब का वर्णन यहां नहीं संभव है।

289
00:21:08,480 --> 00:21:12,560
पूरा दास बोध दशकों में विभक्त किया गया है और

290
00:21:12,560 --> 00:21:16,640
हर एक दशक का विषय उसी उसी दशक के आरंभ

291
00:21:16,640 --> 00:21:20,640
में बतला दिया गया है। इसमें उपनिषद, वेदांत, श्रुति आदि

292
00:21:20,640 --> 00:21:25,360
अनेक ग्रंथों के मत दिए गए हैं और शास्त्रों के प्रमाण सहित

293
00:21:25,360 --> 00:21:30,080
आत्म प्रतीति या अपने अनुभव की बातें बतलाई गई।

294
00:21:30,080 --> 00:21:34,240
इसमें अनेक ग्रंथों के मत हैं जो मिथ्या नहीं कहे जा सकते। तथापि वह

295
00:21:34,240 --> 00:21:38,960
बातें अब अनुभव की सहायता से प्रत्यक्ष कर दी गई हैं।

296
00:21:38,960 --> 00:21:44,240
यदि मत्सर के कारण कोई इसकी बातों को मिथ्या कहे तो वह मानो

297
00:21:44,240 --> 00:21:48,480
समस्त धर्म ग्रंथों के मतों और ईश्वरीय वाक्यों का उच्छेद

298
00:21:48,480 --> 00:21:52,560
या खंडन करेगा। शिव गीता राम गीता गुरु

299
00:21:52,560 --> 00:21:56,960
गीता गर्भ गीता उत्तर गीता अवधूत गीता

300
00:21:56,960 --> 00:22:01,200
वेद वेदांत भगवत गीता ब्रह्म गीता हंस

301
00:22:01,200 --> 00:22:04,000
गीता

302
00:22:04,000 --> 00:22:09,040
पांडव गीता गणेश गीता यम गीता समस्त उपनिषद

303
00:22:09,040 --> 00:22:13,040
भागवत आदि अनेक ग्रंथों के मत इसमें दिए गए हैं।

304
00:22:13,040 --> 00:22:17,120
वे सब वास्तव में भगवत वाक्य हैं और बिल्कुल ठीक है।

305
00:22:17,120 --> 00:22:21,280
ऐसा कौन पथित है जो भगवत वचन में अविश्वास करे एक

306
00:22:21,280 --> 00:22:25,440
तरीके से यह ग्रंथकार के द्वारा स्वयं ग्रंथकार के द्वारा

307
00:22:25,440 --> 00:22:29,680
लिखी गई भूमिका है जो हम पढ़ रहे हैं। इसमें

308
00:22:29,680 --> 00:22:33,840
जो बातें कही गई है वह भगवत वाक्य ही है। उनसे रहित या भिन्न नहीं

309
00:22:33,840 --> 00:22:37,840
है। जो बिना पूरा ग्रंथ देखे झूठ-मूठ इस पर दोष लगावे

310
00:22:37,840 --> 00:22:42,320
वह दुरात्मा और दुराभिमानी केवल मत्सर

311
00:22:42,320 --> 00:22:46,640
के कारण ही दोष लगावेगा। अभिमान से मत्सर

312
00:22:46,640 --> 00:22:51,120
और मत्तर से तिरस्कार उत्पन्न होता है और

313
00:22:51,120 --> 00:22:55,280
तब क्रोध का भाव प्रबल हो उठता है। यह

314
00:22:55,280 --> 00:22:59,920
प्रत्यक्ष है कि ऐसा मनुष्य काम और क्रोध से विचलित हो गया है।

315
00:22:59,920 --> 00:23:04,160
अहम भाव ने उसकी बुद्धि पलट दी है। जो व्यक्ति काम और क्रोध

316
00:23:04,160 --> 00:23:08,240
में पीड़ित हो वह कैसे अच्छा कहा जा सकता

317
00:23:08,240 --> 00:23:12,400
है। अमृत पान करने पर भी राहु मर गया। परंतु

318
00:23:12,400 --> 00:23:16,400
अब इन बातों को जाने दो। जो जैसा अधिकारी होगा वह इससे

319
00:23:16,400 --> 00:23:19,280
वैसा लाभ उठावेगा। परंतु अभिमान

320
00:23:19,280 --> 00:23:23,360
छोड़ देना सबसे उत्तम है। पहले श्रोता ने पूछा था कि इस ग्रंथ में

321
00:23:23,360 --> 00:23:27,760
कौन-कौन सी बातें कही गई हैं? इसलिए वह सब बातें संक्षेप में बतला

322
00:23:27,760 --> 00:23:32,000
दी गई हैं। अब इसे श्रवण करने का फल सुनिए।

323
00:23:32,000 --> 00:23:36,400
इसको श्रवण करते ही तुरंत आचरण बदल जाता है और संशय

324
00:23:36,400 --> 00:23:40,480
का समूल नाश हो जाता है। सुगम मार्ग दिखाई पड़ने लगता है

325
00:23:40,480 --> 00:23:44,560
और दुर्गम साधन की आवश्यकता नहीं रह जाती है। सायुज्य मुक्ति

326
00:23:44,560 --> 00:23:48,880
का रहस्य खुल जाता है। अज्ञान, दुख और भ्रांति का नाश हो जाता है

327
00:23:48,880 --> 00:23:54,640
और शीघ्र ही ज्ञान प्राप्त 15

328
00:23:54,640 --> 00:24:00,400
यदि

329
00:24:00,400 --> 00:24:06,400
किसी की आवाज आ रही है म्यूट कर दे उनका

330
00:24:06,560 --> 00:24:10,960
म्यूट कर दिया भैया कंटिन्यू करें। हम जो लोग भ्रांत अवगुणी

331
00:24:10,960 --> 00:24:15,120
और बुरे लक्षणों वाले होते हैं वे भी अच्छे लक्षणों से युक्त

332
00:24:15,120 --> 00:24:19,120
हो जाते हैं और धूर्तों तार्किकों

333
00:24:19,120 --> 00:24:23,280
तथा विचक्षणों को समय का ज्ञान होने लगता

334
00:24:23,280 --> 00:24:27,440
है। आलसी भी कर्मण्य हो जाते हैं और पापी पश्चाताप

335
00:24:27,440 --> 00:24:28,080
करने लगते हैं।

336
00:24:28,080 --> 00:24:32,240
भक्ति मार्ग की निंदा करने वाले उसकी स्तुति करने लगते हैं।

337
00:24:32,240 --> 00:24:36,240
संसार के बंधन में पड़े हुए लोग मोक्ष की कामना करने लगते हैं। अब देखिए

338
00:24:36,240 --> 00:24:41,840
कुछ लोग कहते हैं कि शंकर मत वाले ज्ञान मार्गी होते हैं।

339
00:24:41,840 --> 00:24:46,400
शंकराचार्य शंकर मत वाले हैं और

340
00:24:46,400 --> 00:24:52,320
उनके हिसाब से ज्ञान मार्गी है। भक्ति मार्ग के विरोधी हैं। और शंकराचार्य

341
00:24:52,320 --> 00:24:56,400
दास बोध पढ़ने को दे रहे हैं। और दास बोध कह रहा है कि इसमें भक्ति मार्ग के

342
00:24:56,400 --> 00:25:00,800
द्वारा मुक्ति बताई गई है। क्या इस वाले कभी कहते हैं

343
00:25:00,800 --> 00:25:04,800
दास बोध पढ़ो जाकर के? नहीं कहते। क्या इस वाले

344
00:25:04,800 --> 00:25:09,040
कभी कहते हैं कि ज्ञानेश्वरी गीता पढ़ो जो डायरेक्ट उनके संप्रदाय से संबंध

345
00:25:09,040 --> 00:25:13,280
ग्रंथ नहीं है उनको पढ़ने के लिए कभी इस वाले कहते हैं मैं

346
00:25:13,280 --> 00:25:17,600
पहली बार जब शंकराचार्य भगवान के दर्शन करने गया था उनके दर्शन मुझे सुलभ

347
00:25:17,600 --> 00:25:21,760
हुए थे तो उन्होंने जब मैंने अपनी शंका उनको व्यक्त की थी तो

348
00:25:21,760 --> 00:25:26,400
उन्होंने मुझको शंकर परंपरा का ग्रंथ पढ़ने के लिए नहीं कहा था।

349
00:25:26,400 --> 00:25:31,600
उन्होंने मुझे कहा था कि रामानुज संप्रदाय के

350
00:25:31,600 --> 00:25:36,960
महान शास्त्रार्थ के मर्मज्ञ महान शास्त्रार्थी

351
00:25:36,960 --> 00:25:41,200
पंडित माधवाचार्य शास्त्री जी का ग्रंथ क्यों और पुराण

352
00:25:41,200 --> 00:25:43,520
दिग्दर्शन आप ले लीजिए

353
00:25:43,520 --> 00:25:47,520
और उसका अध्ययन करिए। बताइए

354
00:25:47,520 --> 00:25:51,600
ये इस वाले करते हैं क्या जाकर के उनका ग्रंथ ले लो इस कार्य

355
00:25:51,600 --> 00:25:56,080
के लिए करते हैं क्या यहां होता है रामानुजियों

356
00:25:56,080 --> 00:26:00,320
के यहां होता है शंकराचार्यों के यहां होता है जहां

357
00:26:00,320 --> 00:26:04,400
एक दूसरे के ग्रंथ पढ़ने को दिए जाते इसलिए

358
00:26:04,400 --> 00:26:08,640
कहते हैं कि इस वाले तोड़ रहे हैं हिंदुओं को आपस बांट

359
00:26:08,640 --> 00:26:12,960
रहे हैं इसलिए ये कहा जाता है वैष्णवता

360
00:26:12,960 --> 00:26:17,200
के नाम पर एक दूसरे से दूर कर दो। भाई को भाई से अलग

361
00:26:17,200 --> 00:26:21,680
कर दो।

362
00:26:21,680 --> 00:26:25,920
आज भी मेरे पास वो ग्रंथ जो गुरुदेव के द्वारा बताया गया पहला

363
00:26:25,920 --> 00:26:30,000
ग्रंथ वो यह है। और कोई ग्रंथ नहीं बताया था गुरुदेव ने। यह बताया

364
00:26:30,000 --> 00:26:34,400
था। इसको कहते हैं सिद्धांत।

365
00:26:34,400 --> 00:26:38,720
उनको सत्य की रक्षा थी। सत्य की चिंता थी कि सत्य बोलना

366
00:26:38,720 --> 00:26:43,200
है। भले ही वो रामानुजाचार्य जी का ग्रंथ क्यों ना पढ़ने को कहना पड़े।

367
00:26:43,200 --> 00:26:47,280
रामानुज परंपरा का ग्रंथ क्यों ना पढ़ने को कहना पड़े पर उनको

368
00:26:47,280 --> 00:26:51,440
सत्य बोलना था सत्य निष्ठ थे ठीक है वहां

369
00:26:51,440 --> 00:26:55,440
ये भेदभाव नहीं था कि नहीं रामानुज परंपरा का ग्रंथ हम क्यों बताएं भाई अपने ही

370
00:26:55,440 --> 00:26:59,440
आचार्यों को बताएं जो सबसे उनको सुलभता से दिखाई दिया

371
00:26:59,440 --> 00:27:03,680
मेरे लिए अनुकूल हो सकता है वो ये ग्रंथ था

372
00:27:03,680 --> 00:27:09,680
वो पुराण दिग्दर्शन था जो पीछे रखा हुआ यह

373
00:27:09,840 --> 00:27:13,920
ग्रंथ मुझे मेरे गुरुदेव ने सबसे पहले पढ़ने को दिए इस वाले

374
00:27:13,920 --> 00:27:17,920
इस वालों की तरह नहीं किया उन्होंने कि नहीं नहीं दूसरे के ग्रंथ मत

375
00:27:17,920 --> 00:27:22,160
पढ़ो दूसरे संप्रदाय के ग्रंथ मत पढ़ो इसको कहते

376
00:27:22,160 --> 00:27:26,160
हैं सिद्धांत और इसको कहते हैं निडरता

377
00:27:26,160 --> 00:27:31,040
अभय इसको ये भी कहते हैं कि

378
00:27:31,040 --> 00:27:35,200
पढ़ लेने दो पुराणिक दर्शन पढ़ लेने दो जिसको अपने

379
00:27:35,200 --> 00:27:39,280
सिद्धांत पर विश्वास होता है वो ये नहीं सोचता कि ये व्यक्ति कहीं भटक ना जाए

380
00:27:39,280 --> 00:27:43,600
कहीं यहां ना चला जाए कहीं वहां ना चला जाए ऐसे ही रामानुज परंपरा वाले भी बताते हैं कि अमुक

381
00:27:43,600 --> 00:27:47,680
कार्य के लिए आप अमुक ग्रंथ पढ़ लीजिए। शंकर परंपरा बताते हैं। कई

382
00:27:47,680 --> 00:27:51,840
जगह संदर्भ देते हैं शंकराचार्य का और सभी परंपरा प्राप्त आचार्य

383
00:27:51,840 --> 00:27:55,840
अपने वक्तव्यों में अपनी वाणी में कहीं ना कहीं दूसरे संप्रदाय के

384
00:27:55,840 --> 00:27:59,840
आचार्यों का संदर्भ देते हुए बात करते हैं। क्यों? रामानुज परंपरा वाले

385
00:27:59,840 --> 00:28:03,840
क्या रामानंद परंपरा का संदर्भ देते हुए रामचरितमानस का संदर्भ देते हुए

386
00:28:03,840 --> 00:28:07,840
बात नहीं करते। कई बार करते हैं? शंकर संप्रदाय वाले

387
00:28:07,840 --> 00:28:12,560
क्या रामचरितमानस जो रामानंदी परंपरा का ग्रंथ है उसका संदर्भ देते हुए बात नहीं करते

388
00:28:12,560 --> 00:28:17,440
हैं इस वाले नहीं करेंगे कभी भी वो हमेशा वही चिल्लाएंगे

389
00:28:17,440 --> 00:28:21,760
जीव गोस्वामी श्रील प्रभुपाद जी और

390
00:28:21,760 --> 00:28:24,960
कुछ और नाम होंगे गौरंग दास जी और

391
00:28:24,960 --> 00:28:29,040
चैतन्य महाप्रभु इनहीं सबके इर्दगिर्द बाकी गाड़ी

392
00:28:29,040 --> 00:28:35,040
घूमती रहेगी खैर कम टू द पॉइंट

393
00:28:35,920 --> 00:28:40,560
तो

394
00:28:40,560 --> 00:28:44,880
भक्ति मार्ग की निंदा करने वाले उसकी स्तुति करने लगते हैं। संसार

395
00:28:44,880 --> 00:28:48,880
के बंधन में पड़े हुए लोग मोक्ष की कामना करने लगते हैं। मूर्ख

396
00:28:48,880 --> 00:28:52,960
भी दक्ष हो जाते हैं और भक्ति मार्ग पर चलकर

397
00:28:52,960 --> 00:28:57,200
अभक्त भी मोक्ष प्राप्त करते हैं। इससे अनेक दोषों का नाश

398
00:28:57,200 --> 00:29:01,600
होता है और पतित लोग पावन हो जाते हैं। श्रवण मात्र से प्राणी

399
00:29:01,600 --> 00:29:05,600
प्राणी को उत्तम गति प्राप्त होती है। इसे सुनने से शारीरिक बुद्धि

400
00:29:05,600 --> 00:29:09,680
के अनेक भ्रम और संदेह तथा संसार के अनेक प्रकार

401
00:29:09,680 --> 00:29:13,760
के उद्वेग नष्ट हो जाते हैं। अधोगति का अंत हो जाता है और

402
00:29:13,760 --> 00:29:17,760
उनको शांति तथा समाधान मिलता है। जिसका जैसा भाव होता

403
00:29:17,760 --> 00:29:21,840
है उसे वैसा ही लाभ भी प्राप्त होता है। जो मन के मन

404
00:29:21,840 --> 00:29:26,160
में मत्सर रखकर प्रश्न करता है उसे मत्सर की ही प्राप्ति होती है।

405
00:29:26,160 --> 00:29:32,000
देखिए अगर वास्तविकता में देखा जाए

406
00:29:32,000 --> 00:29:36,320
तो लोग ज्ञान मार्ग के नाम पर भक्ति का विरोध करना कि

407
00:29:36,320 --> 00:29:40,160
भाई सिर्फ मतलब हमारे जो हमारी जो मुक्ति

408
00:29:40,160 --> 00:29:44,320
वो ज्ञान से है इसलिए हम भक्ति नहीं करेंगे। तो यह

409
00:29:44,320 --> 00:29:48,320
तो ठीक नहीं है। परंतु भक्ति का नाम लेकर

410
00:29:48,320 --> 00:29:52,320
के ज्ञान की प्राप्ति होने के विषय में काउंटर करना

411
00:29:52,320 --> 00:29:56,880
या मना करना यह अपने आप में एक बहुत बड़ा कुचेष्टा

412
00:29:56,880 --> 00:30:01,920
कहेंगे इसे। क्यों? क्यों कहेंगे कुचेष्टा? क्योंकि

413
00:30:01,920 --> 00:30:06,000
परलोक की बात कहें या फिर इस्लोक की बात कहें। व्यक्ति

414
00:30:06,000 --> 00:30:10,960
ढूंढ तो ज्ञान ही रहा है। ज्ञान का मतलब समझ रहे हैं आप?

415
00:30:10,960 --> 00:30:15,360
यदि आपको रसगुल्ला खाना है, गुलाब जामुन खाना है

416
00:30:15,360 --> 00:30:19,840
तो क्या आपको वह जो मटेरियल है उससे मतलब है या उससे

417
00:30:19,840 --> 00:30:24,400
मिलने वाली जो सूचना है इंफॉर्मेशन ये मीठा है, गुदगुदा

418
00:30:24,400 --> 00:30:28,480
है उससे मतलब है। आपका मूल विषय क्या है? कि

419
00:30:28,480 --> 00:30:32,480
आपके दिमाग को आपके मस्तिष्क को वो खोवा है,

420
00:30:32,480 --> 00:30:37,200
जो उसके अंदर जो उसके अंदर मिठास है, वह सूचना मिलनी चाहिए।

421
00:30:37,200 --> 00:30:41,360
अच्छा यदि आपको जो रसगुल्ले की सूचना

422
00:30:41,360 --> 00:30:45,360
है वह किसी कुछ ऐसा इंतजाम कर दिया जाए कि आपको जो है

423
00:30:45,360 --> 00:30:49,520
किसी और टेक्नोलॉजी के द्वारा वह सूचना प्राप्त होने लग जाए रसगुल्ले

424
00:30:49,520 --> 00:30:53,680
की तो क्या आपको रसगुल्ले की नीड रह जाएगी? नहीं रह जाएगी। तो हम

425
00:30:53,680 --> 00:30:55,200
आफ्टर ऑल एट दी एंड

426
00:30:55,200 --> 00:30:59,200
हर चीज में ढूंढ क्या रहे हैं? इंफॉर्मेशन तो आप ज्ञान

427
00:30:59,200 --> 00:31:03,200
मार्ग को सर्वदा कि भाई यह ज्ञान मार्ग ही है या इस इस तरह

428
00:31:03,200 --> 00:31:07,280
की बातें करके ज्ञान मार्ग को सर्वदा खंडित नहीं कर सकते। क्योंकि एट द एंड

429
00:31:07,280 --> 00:31:11,520
भगवान को सामने देख के भी आपको सोचना चाहिए कि भगवान

430
00:31:11,520 --> 00:31:15,520
मेरे सामने हैं। इस बात की सूचना अंतिम लक्ष्य

431
00:31:15,520 --> 00:31:19,920
आपका क्या है? सूचना ज्ञान इंफॉर्मेशन

432
00:31:19,920 --> 00:31:24,080
आजकल देखो बहुत ये पूरा अद्वैत दर्शन आपको

433
00:31:24,080 --> 00:31:29,040
दिखेगा। इसमें फोन पे से लोग पैसे दे रहे हैं। लोग ले रहे हैं।

434
00:31:29,040 --> 00:31:33,200
बने बेवकूफ चले जा रहे हैं। ये क्या हुआ भाई कि भैया मुझे

435
00:31:33,200 --> 00:31:37,280
₹50 चाहिए। व्यक्ति ने कुछ किया। एक आवाज आई टिंग टिंग

436
00:31:37,280 --> 00:31:41,600
टिटिंग और पैसे उसमें चले गए। सामने वाला खुश हो गया।

437
00:31:41,600 --> 00:31:45,920
अब हुआ क्या? केवल इंफॉर्मेशन मिली कि हां तुम्हारे पास पैसे आ गए।

438
00:31:45,920 --> 00:31:50,240
केवल इंफॉर्मेशन मिली कि तुम्हारे पैसे कट गए। इतना ही तो हुआ। इंफॉर्मेशन

439
00:31:50,240 --> 00:31:54,240
का आदान प्रदान हुआ। उसके अलावा उस व्यक्ति को भौतिक रूप से कुछ मिला

440
00:31:54,240 --> 00:31:58,560
क्या? वहां पर इंफॉर्मेशन मिल गई। व्यक्ति संतुष्ट हो गया। इसी

441
00:31:58,560 --> 00:32:02,560
प्रकार से यदि इंफॉर्मेशन अमुक अमुक चीजों में हमें ठंड लग रही है। हमें

442
00:32:02,560 --> 00:32:06,560
गर्मी लग रही है। हमें सुख हो रहा है। सुख मिल रहा है। यदि हमें इंफॉर्मेशन

443
00:32:06,560 --> 00:32:10,800
मिलने लग जाएगी तो क्या हमें भौतिक भौतिकता की आवश्यकता रह जाएगी?

444
00:32:10,800 --> 00:32:14,800
नहीं रह जाएगी। तो हम मूल रूप से किसे ढूंढ रहे हैं? इंफॉर्मेशन

445
00:32:14,800 --> 00:32:18,800
को। तो सतही स्तर पर भी जब हमारे

446
00:32:18,800 --> 00:32:22,800
संशय निराकरण होने लगता है तो वह हृदय में संतोष

447
00:32:22,800 --> 00:32:26,960
पहुंचता है कि फिर वो जो भौतिक ताप हमें दिख रहे होते हैं वो कम होने

448
00:32:26,960 --> 00:32:31,120
लगते हैं। सामान्य व्यक्ति के स्तर से भी मैं आपको दिखा रहा हूं। बता

449
00:32:31,120 --> 00:32:35,600
रहा हूं जब हमारे अंतःकरण से हमारी अंतरात्मा

450
00:32:35,600 --> 00:32:40,000
से निकलने वाले जो प्रश्न है और वो प्रश्न कौन से मैं कई बार अपने वक्तव्यों

451
00:32:40,000 --> 00:32:44,320
में आपको बता चुका हूं। असतो मा सद्गमया तमसो मा ज्योतिगमया

452
00:32:44,320 --> 00:32:48,880
मृत्यम गमया जब हम इस पर बात करने लगते हैं

453
00:32:48,880 --> 00:32:52,880
इसका जब हमें निराकरण प्राप्त होने लगता है तो हम बहुत संतोषमय हो जाते

454
00:32:52,880 --> 00:32:56,960
हैं बहुत संतोषमय इतने संतोषमय हो जाते हैं कि

455
00:32:56,960 --> 00:33:01,040
धीरे-धीरे उस संतोष के कारण हमारे पास वो क्षमता भी आ जाती

456
00:33:01,040 --> 00:33:05,280
है कि कोई समसी लेकर के हमारी आंख निकाल रहा है ना

457
00:33:05,280 --> 00:33:09,520
आंख तब भी हम लोग उस समय विचलित

458
00:33:09,520 --> 00:33:13,600
नहीं होते क्योंकि हमारे हृदय में वह संतोष होता

459
00:33:13,600 --> 00:33:16,160
है।

460
00:33:16,160 --> 00:33:20,240
एक बस इसमें कुल मिलाकर बात यह है कि

461
00:33:20,240 --> 00:33:24,320
हम अपने अंतरात्मा की अपने जो अंतःकरण से निकलने

462
00:33:24,320 --> 00:33:26,000
वाली वो आवाज है अथातो धर्म

463
00:33:26,000 --> 00:33:31,200
जिज्ञासा अथातो ब्रह्म जिज्ञासा आत्म जिज्ञासा

464
00:33:31,200 --> 00:33:35,200
उस आवाज को हम कब सुन रहे हैं? जैसे भगवत गीता में एक बात

465
00:33:35,200 --> 00:33:39,440
आती है और कई शास्त्रों में एक बात आती है कि

466
00:33:39,440 --> 00:33:43,520
अश्रद्धावान को इसका श्रवण ना कराया जाए। जिसकी

467
00:33:43,520 --> 00:33:47,520
श्रद्धा नहीं है उसको इसका श्रवण ना कराया जाए। यह शास्त्रों

468
00:33:47,520 --> 00:33:51,520
में कई बार आया है। अच्छा तर्क तर्क की बात क्या होती है?

469
00:33:51,520 --> 00:33:55,520
अब जैसे हम लोग क्वेश्चन करते हैं स्कॉन वालों से तो हम

470
00:33:55,520 --> 00:33:59,760
कहते हैं कि भाई ये सवाल क्या है? ये सवाल क्या है? कि नहीं नहीं तुम अवक्त हो। तुमसे बात करना बेकार

471
00:33:59,760 --> 00:34:04,000
है। अश्रद्धावान इसलिए तुमसे बात करना बेकार है। आजकल निग्गू फॉलोवर्स

472
00:34:04,000 --> 00:34:08,880
निग्गू एंड कंपनी भी वही कर रही है। तो

473
00:34:08,880 --> 00:34:13,040
यदि अश्रद्धावान को उत्तर नहीं

474
00:34:13,040 --> 00:34:17,440
देना श्रद्धावान से बात करना व्यर्थ है तो

475
00:34:17,440 --> 00:34:21,520
किससे बात की जाएगी? क्योंकि जो भी व्यक्ति जब तक

476
00:34:21,520 --> 00:34:25,600
शास्त्र को नहीं जानता है, जब तक भगवान को नहीं जानता है, जब तक कुछ

477
00:34:25,600 --> 00:34:29,840
नहीं जानता है, उससे पहले तक वह अश्रद्धावान ही तो है। क्या

478
00:34:29,840 --> 00:34:34,480
गीता को जानने से पहले किसी व्यक्ति का गीता के प्रति

479
00:34:34,480 --> 00:34:38,560
भावनाएं होती है? क्या श्रद्धा की? भगवान को जानने से पहले

480
00:34:38,560 --> 00:34:41,360
भगवान के प्रति भावनाएं कैसे होंगी?

481
00:34:41,360 --> 00:34:45,920
नहीं होती। तो इसका मतलब क्या है? फिर शास्त्रों ने क्या गलत कहा है?

482
00:34:45,920 --> 00:34:50,160
क्या शास्त्रों ने यह लाइन गलत लिखी है? कि अश्रद्धावान को मत पढ़ाना

483
00:34:50,160 --> 00:34:54,320
यह शास्त्र नहीं गलत नहीं लिखी है। इस लाइन का

484
00:34:54,320 --> 00:34:58,960
सही मतलब क्या है? सही इस पंक्ति का सही अर्थ क्या हो सकता है?

485
00:34:58,960 --> 00:35:03,280
तो वो अर्थ यह यह है कि

486
00:35:03,280 --> 00:35:07,280
अश्रद्धावान सभी हैं। परंतु ये आत्मा से निकलने

487
00:35:07,280 --> 00:35:11,360
वाले जो प्रश्न है इन प्रश्नों पर कौन ध्यान दे

488
00:35:11,360 --> 00:35:16,240
रहा है? असतो मा सदगमया तमसो मागया

489
00:35:16,240 --> 00:35:20,480
इन पर ध्यान कौन दे रहा है जो इन पर ध्यान दे रहा है उसको

490
00:35:20,480 --> 00:35:24,800
ये ग्रंथ आप पढ़ा सकते हैं वो श्रद्धावान है यानी कि जो अपनी आत्मा

491
00:35:24,800 --> 00:35:28,800
की आवाज सुन रहा है वो श्रद्धावान है भले

492
00:35:28,800 --> 00:35:33,440
ही उसने गीता अभी नहीं जानी है भले ही भगवान के बारे में नहीं जानता है पर वो श्रद्धावान

493
00:35:33,440 --> 00:35:37,440
है क्यों क्योंकि वो आत्मा की आवाज सुन रहा है वो वो

494
00:35:37,440 --> 00:35:41,680
खोज रहा है कि पहले मुझे मेरा गंतव्य बताओ क्या गंतव्य

495
00:35:41,680 --> 00:35:45,920
है अथो ब्रह्म जिज्ञासा उसके बाद उस गंतव्य तक

496
00:35:45,920 --> 00:35:50,000
किस प्रकार की गति के द्वारा पहुंचा जा सकता है वह बताओ अथातो धर्म

497
00:35:50,000 --> 00:35:54,000
जिज्ञासा तो जो इस प्रकार से अपनी आत्मा की

498
00:35:54,000 --> 00:35:56,560
आवाज सुन रहा है वो श्रद्धावान है वो कोई

499
00:35:56,560 --> 00:36:00,960
भी हो सकता है वो मच्छ भी हो सकता है अब

500
00:36:00,960 --> 00:36:05,040
कोई व्यक्ति है जिसको इससे मतलब ही नहीं है कि भैया ईश्वर सर्वशक्तिमान है

501
00:36:05,040 --> 00:36:09,200
कि नहीं अगर ईश्वर ने सृष्टि बनाई तो उस समय वो कहां था कहां खड़ा

502
00:36:09,200 --> 00:36:13,360
था या इन विषयों पर उसका चिंतन नहीं उसके मन से आवाज ही नहीं आ रही है। यह

503
00:36:13,360 --> 00:36:17,520
सब बातें वह सोच ही नहीं रहा है कि मैं 70 साल का हो जाऊंगा तो भोग कैसे करूंगा?

504
00:36:17,520 --> 00:36:21,600
रसगुल्ला कैसे खाऊंगा? या जो बॉडी बिल्डिंग मैं आज कर रहा हूं तो अपनी

505
00:36:21,600 --> 00:36:25,760
बॉडी कैसे मेंटेन करूंगा? या अगर मैं काम वासना से युक्त हूं तो उस समय

506
00:36:25,760 --> 00:36:30,080
अपनी लालसाओं को पूरा कैसे करूंगा? मेरे दांत टूट जाएंगे। मैं वैसा

507
00:36:30,080 --> 00:36:34,160
नहीं दिखूंगा। मेरे झुर्रियां आ जाएंगी। वह इन सब बातों पर जब नहीं ध्यान

508
00:36:34,160 --> 00:36:38,240
दे रहा है कि कुछ इसके पार भी है या यही अंत है। जब

509
00:36:38,240 --> 00:36:42,240
मैं अकेला पड़ जाऊंगा कोई नहीं होगा मेरे पास।

510
00:36:42,240 --> 00:36:46,400
उस समय मैं क्या करूंगा इन सब विषयों पर जो चिंतन नहीं कर रहा है और वह क्या

511
00:36:46,400 --> 00:36:50,400
क्या कर रहा है? वो यह देख रहा है कि भाई एसी है कि नहीं? टीवी है

512
00:36:50,400 --> 00:36:54,560
कि नहीं? मेरे पास कार है कि नहीं? स्कूटर है कि नहीं? वो

513
00:36:54,560 --> 00:36:58,560
इन सब चीजों पर ध्यान दे रहा है। तो और फिर आप उससे कहने जाओ

514
00:36:58,560 --> 00:37:02,640
कि तुम्हें पता है ईश्वर सब शक्तिमान है कि नहीं? तुम तुम क्या

515
00:37:02,640 --> 00:37:06,880
कहते हैं? तुमको इससे मतलब है ईश्वर सर्वशक्तिमान से। परम स्वतंत्र

516
00:37:06,880 --> 00:37:10,960
मोक्ष से तो वो क्या कहेगा भैया मैं एसी लेने जा रहा हूं

517
00:37:10,960 --> 00:37:12,080
नया एलजी

518
00:37:12,080 --> 00:37:16,160
का मुझे माफ कर दो तू ऐसे पकाऊ लोग आपको मिलेंगे कि

519
00:37:16,160 --> 00:37:20,160
नहीं पकाऊ मतलब जिनके लिए आप पकाऊ ये बातें करने वाले

520
00:37:20,160 --> 00:37:24,320
जिनके लिए पकाऊ है वो आपको बहुत मिलेंगे

521
00:37:24,320 --> 00:37:28,480
वो सब अश्रद्धावान है तो पहले उनको टटोलिए कि वो अपनी

522
00:37:28,480 --> 00:37:32,960
आत्मा की आवाज सुन रहे हैं कि नहीं और यदि वो सुन रहे हैं उनको

523
00:37:32,960 --> 00:37:37,040
उन सवालों से मतलब है तब उनको बताइए यदा यदा

524
00:37:37,040 --> 00:37:41,920
धर्मस गन भवती भारत अभसम

525
00:37:41,920 --> 00:37:47,680
तदा सजा तब उनको बताइए

526
00:37:47,680 --> 00:37:51,840
भगवान की शक्ति के बारे में ईश्वर के बारे में ग्रंथ के

527
00:37:51,840 --> 00:37:55,920
बारे में तो इसलिए यह वाला जो एक संशय

528
00:37:55,920 --> 00:37:59,920
बना रहता है कि अश्रद्धावान को नहीं पढ़ाना ग्रंथ देना

529
00:37:59,920 --> 00:38:04,080
है या बात बतानी है भगवान की या यह है यह वो है ऐसे

530
00:38:04,080 --> 00:38:08,160
नहीं होता है। आपको यह जानना होगा कि वह अपनी आत्मा की आवाज जान सुन रहा

531
00:38:08,160 --> 00:38:12,880
है कि नहीं। आपको उसके प्रश्नों से समझ में आ जाएगा। ठीक है?

532
00:38:12,880 --> 00:38:16,880
तो अश्रद्धावान कौन है? वहां पर उस परिपेक्ष में जो अपनी आत्मा की

533
00:38:16,880 --> 00:38:21,040
आवाज नहीं सुन रहा है। जिसको उन प्रश्नों से कोई सरोकार नहीं

534
00:38:21,040 --> 00:38:26,400
है। दूसरा समास गणेश स्तुति। गणनायक

535
00:38:26,400 --> 00:38:30,800
कर्म सिद्धि फलदायक अज्ञान और भ्रांति का नाश करने वाले

536
00:38:30,800 --> 00:38:35,200
बोध रूप। देखिए बोध रूप यानी ज्ञान रूप। गणेश जी को नमस्कार है।

537
00:38:35,200 --> 00:38:39,280
बस शंकराचार्य भगवान ने क्या किया कि हम जो यह

538
00:38:39,280 --> 00:38:43,520
कह रहे हैं ना फाइनली हमको इंफॉर्मेशन चाहिए इंफॉर्मेशन तो शंकराचार्य

539
00:38:43,520 --> 00:38:47,680
भगवान ने कह दिया फाइनली जो इंफॉर्मेशन आपको मिल रही है ये है ईश्वर

540
00:38:47,680 --> 00:38:51,840
का अंतिम स्वरूप उन्होंने इस इस इंफॉर्मेशन से

541
00:38:51,840 --> 00:38:55,840
अलग नहीं किया भगवान को नहीं तो नहीं

542
00:38:55,840 --> 00:39:00,000
तो क्या होता कि ईश्वर से भी बड़ी कोई चीज हो जाती इस दुनिया में

543
00:39:00,000 --> 00:39:02,880
समझ रहे हैं जो लोग कहते हैं ना कि हम बहुत बड़े भक्त

544
00:39:02,880 --> 00:39:06,880
हैं वो अपने ईश्वर को छोटा कर रहे उनसे बड़ा

545
00:39:06,880 --> 00:39:11,120
ज्ञान है जो व्यक्ति को चाहिए और ईश्वर मात्र

546
00:39:11,120 --> 00:39:15,520
एक साधन बन के रह जाता तो शंकरा आदि शंकराचार्य जी ने क्या सिद्धांत

547
00:39:15,520 --> 00:39:20,000
स्थापित किया ये जो ज्ञान तुम्हें मिल रहा है ये ईश्वर का फाइनल जो रूप

548
00:39:20,000 --> 00:39:24,080
जो तुमको चाहिए जो ज्ञान स्वरूप प्रबोध रूप गणेश जी

549
00:39:24,080 --> 00:39:25,360
को नमस्कार

550
00:39:25,360 --> 00:39:29,360
आप कृपा कर मेरे हृदय में विराजे सदा

551
00:39:29,360 --> 00:39:33,920
वही वास करें और मुझ वाक्य शून्य से कुछ कहलावे

552
00:39:33,920 --> 00:39:38,000
आपकी कृपा कृपा से जन्म जन्मांतर की भ्रांति का नाश

553
00:39:38,000 --> 00:39:42,240
होता है और विश्व भक्षक काल भी दासत्व

554
00:39:42,240 --> 00:39:46,560
करने लगता है। आपकी कृपा का प्रवाह होते ही बेचारे

555
00:39:46,560 --> 00:39:50,560
विघ्न कांपने लगते हैं। यह सब उन्होंने अपनी भाषा शैली में मराठी में लिखा

556
00:39:50,560 --> 00:39:54,720
होगा तो एक गीत जैसा होगा। परंतु हम हिंदी में पढ़ रहे हैं। कांपने

557
00:39:54,720 --> 00:39:58,800
लगते हैं और आपका नाम लेने से ही वह तितर विितर

558
00:39:58,800 --> 00:40:03,280
हो जाते हैं। इसी से आपका नाम विघ्न हर है।

559
00:40:03,280 --> 00:40:07,840
आप हम अनाथों के नाथ हैं। हरि से हर तक सभी देवता

560
00:40:07,840 --> 00:40:12,480
आपकी वंदना करते हैं। पंच देवोपासना आ गई। बता दो हमने शिवाजी

561
00:40:12,480 --> 00:40:16,640
छत्रपति शिवाजी को हमने खड़ा किया है। तुमने कितने

562
00:40:16,640 --> 00:40:21,520
वो छत्रपतियों को खड़ा किया है बताओ।

563
00:40:21,520 --> 00:40:25,600
यही सब चला करता है। इसी बात का कंपटीशन है। हमारा सिद्धांत

564
00:40:25,600 --> 00:40:29,760
इसलिए मान लो कि हमने अनाकोंडा के बराबर पाइप लगा दिए। साहब

565
00:40:29,760 --> 00:40:35,760
इसलिए हमारा सिद्धांत मान लो। वेदों में प्रमाण है कबीर भगवान है। वाह।

566
00:40:42,480 --> 00:40:46,640
मंगल निधि का वंदन करके जो कार्य किए जाते हैं उनमें सभी सिद्धियां प्राप्त

567
00:40:46,640 --> 00:40:51,040
होती है और विघ्न बाधाएं मार्ग में नहीं आती। आपका ध्यान करते ही परम समाधान

568
00:40:51,040 --> 00:40:55,120
होता है। सब अंगों को छोड़कर मन की मन केवल आंखों में

569
00:40:55,120 --> 00:40:59,520
आ बसता है। बाकी सब अंग पंगू हो जाते हैं।

570
00:40:59,520 --> 00:41:03,840
आपका सगुण रूप भी बहुत ही सुंदर है। आपके नृत्य करते ही

571
00:41:03,840 --> 00:41:07,840
सब देवता स्तब्ध हो जाते हैं। वे सदा आनंद से मत होकर

572
00:41:07,840 --> 00:41:12,160
घूमते रहते हैं। और हर्ष से सुप्रसन्न वंदन

573
00:41:12,160 --> 00:41:16,160
वन रहते हैं। आपका भव्य रूप और भीम मूर्ति

574
00:41:16,160 --> 00:41:20,400
महा प्रचंड है। विस्तर्ण और उन्नत मस्तक सिंदूर

575
00:41:20,400 --> 00:41:24,480
से चर्चित है। गंड स्थल से नाना प्रकार की सुगंधियां निकलती

576
00:41:24,480 --> 00:41:28,640
है और भ्रमर वहां आकर गुंजारते हैं। सूंड सरल

577
00:41:28,640 --> 00:41:33,040
और कुछ मुड़ा हुआ है। अभिनव कपोल शोभित है।

578
00:41:33,040 --> 00:41:37,200
अधर लंबा है। जिसमें क्षण क्षण

579
00:41:37,200 --> 00:41:42,400
पर तीक्षण मद टपकता है। 14ों विद्याओं के स्वामी

580
00:41:42,400 --> 00:41:47,040
छोटी-छोटी आंखें हिला रहे हैं और कोमल तथा लचीले

581
00:41:47,040 --> 00:41:51,520
कान फड़फड़ा रहे हैं। रत्न जटित मुकुट झिलमिला

582
00:41:51,520 --> 00:41:56,000
रहा है। जिस पर अनेक प्रकार के रंग चमक रहे हैं। कुंडलों

583
00:41:56,000 --> 00:42:00,240
में जड़े हुए नीलम चमक रहे हैं। दृढ़ और

584
00:42:00,240 --> 00:42:04,560
शुभ्र दांतों में सोने के जड़ाऊ

585
00:42:04,560 --> 00:42:08,560
कड़े पड़े हैं। जिनके नीचे छोटे-छोटे

586
00:42:08,560 --> 00:42:12,560
स्वर्ण पत्र चमक रहे हैं। तोंद थलथला रही है और

587
00:42:12,560 --> 00:42:16,720
उस पर सांप का पट्टा पड़ा हुआ है। क्षुद्र घटिका

588
00:42:16,720 --> 00:42:21,040
मंद मंद झनकार रही है। चतुर्भुज लंबोदर स्वरूप

589
00:42:21,040 --> 00:42:25,280
है। कमर में पीतांबर है। तोंद पर सांप का फन फड़फड़ा

590
00:42:25,280 --> 00:42:29,360
रहा है। जो फुबकार रहा है। वह फन हिलाता हूं

591
00:42:29,360 --> 00:42:33,680
और जीभ लपलपाता है। नाभि कमल पर

592
00:42:33,680 --> 00:42:37,760
कुंडली मार कर बैठा हुआ है और टक लगाकर देख रहा है।

593
00:42:37,760 --> 00:42:41,760
अनेक प्रकार के फूलों की माला गले में पड़ी हुई उस नाग तक

594
00:42:41,760 --> 00:42:46,000
लटक रही है। हृदय कमल पर रत्न जटित पद पदक

595
00:42:46,000 --> 00:42:50,000
है। परस और कमल शोभित है। और तीक्ष्ण

596
00:42:50,000 --> 00:42:52,480
अंकुश चमक रहा है। एक हाथ

597
00:42:52,480 --> 00:42:56,880
में गोल मोदक है। जिस पर आपकी बहुत प्रीति है। नट

598
00:42:56,880 --> 00:43:01,600
लोग अपनी नाट्यक कला दिखलाते हुए अनेक प्रकार के नृत्य कर रहे हैं।

599
00:43:01,600 --> 00:43:05,840
ताल और मृदंग आदि बज रहे हैं। चारों ओर नृत्य काल

600
00:43:05,840 --> 00:43:09,840
में होने वाली प्रतिध्वनि हो रही है। उन्हें क्षण भर भी स्थिरता

601
00:43:09,840 --> 00:43:14,000
नहीं है और वह चपलता में अग्रगण्य है।

602
00:43:14,000 --> 00:43:18,160
सजी हुई और अच्छे लक्षणों से युक्त मूर्ति

603
00:43:18,160 --> 00:43:22,160
सुंदरता की खान है। नपुर झुनझुन बज रहे हैं और

604
00:43:22,160 --> 00:43:26,240
पैजनी की झकार हो रही है। घुंघरूओं से दोनों

605
00:43:26,240 --> 00:43:30,320
पैर सुशोभित है। गणेश जी के कारण शिव जी की सभा

606
00:43:30,320 --> 00:43:34,400
की भी शोभा बढ़ गई और दिव्य अंबर की छटा छाई

607
00:43:34,400 --> 00:43:38,400
हुई है। आपके साथ साहित्य में निपुण आठ

608
00:43:38,400 --> 00:43:42,560
नायिकाएं भी हैं। ऐसे सर्वांग सुंदर और सब विद्याओं

609
00:43:42,560 --> 00:43:46,960
में अग्रगण्य गणेश जी को मेरा साष्टांग नमस्कार

610
00:43:46,960 --> 00:43:51,440
है। गणेश जी के ध्यान का वर्णन करते ही भ्रांत लोगों की

611
00:43:51,440 --> 00:43:55,680
मति भी प्रकाशित हो जाती है। उनका गुणानुवाद

612
00:43:55,680 --> 00:44:00,160
करने वाले पर सरस्वती प्रसन्न होती है। जिनकी

613
00:44:00,160 --> 00:44:04,560
वंदना ब्रह्मा आदि तक करते हो उनके सामने बेचारा

614
00:44:04,560 --> 00:44:07,520
मनुष्य क्या चीज है? भगवान श्री कृष्ण ने भी इनकी

615
00:44:07,520 --> 00:44:11,760
वंदना की है। ध्यान रखिएगा कहां पर है?

616
00:44:11,760 --> 00:44:16,080
ब्रह्म वैवर पुराण में भगवान गणेश जी से सब कुछ

617
00:44:16,080 --> 00:44:20,160
प्रकट हो रहा है। है ना? जो यह इस वाले

618
00:44:20,160 --> 00:44:24,320
कहते हैं कि भैया श्री कृष्ण से ही सब कुछ प्रकट हुआ है तो वहां ब्रह्म

619
00:44:24,320 --> 00:44:29,360
वैभव पुराण में उनसे भी प्रकट होता है। जिनकी

620
00:44:29,360 --> 00:44:33,600
अतः मंदमती लोगों को गणेश जी का चिंतन करना

621
00:44:33,600 --> 00:44:38,160
चाहिए। जो लोग मूर्ख, बुरे लक्षणों से युक्त और हीनों से भी हीन होते हैं।

622
00:44:38,160 --> 00:44:42,160
वह भी सब विषयों में दक्ष तथा प्रवीण हो जाते हैं। वह परम समर्थ

623
00:44:42,160 --> 00:44:46,160
हैं और सभी मनोरथ पूर्ण करने वाले हैं। यह अनुभव सिद्ध है

624
00:44:46,160 --> 00:44:50,240
कि उनका भजन करने से सब कार्य सिद्ध होते हैं। कलयुग में

625
00:44:50,240 --> 00:44:54,320
चंडी और विनायक ही मुख्य देवता कहे गए हैं। ऐसे मंगल मूर्ति

626
00:44:54,320 --> 00:44:58,800
गणेश जी का मैंने मन में परमार्थ की कामना करते हुए यथामति

627
00:44:58,800 --> 00:45:03,760
स्तवन किया। तो

628
00:45:03,760 --> 00:45:06,400
आप देखिए

629
00:45:06,400 --> 00:45:10,960
यह जो हमारे धर्म ग्रंथों में इस तरह से एक एक बात

630
00:45:10,960 --> 00:45:15,120
एक भगवान के एक-एक अंग प्रत्यंग पर बात करते हुए

631
00:45:15,120 --> 00:45:19,520
चर्चा की जाती है। उसकी आवश्यकता क्या है?

632
00:45:19,520 --> 00:45:23,520
उसकी आवश्यकता यही है कि अभी देखिए जब हम लोग यह बातें कर रहे

633
00:45:23,520 --> 00:45:27,600
थे और धीरे धीरे धीरे धीरे जब हम ध्यान से वह बातें सुन रहे थे तो

634
00:45:27,600 --> 00:45:32,400
हमारे मन में वही चिंतन चलने लगा जो हम पढ़ रहे हैं और मन में एक

635
00:45:32,400 --> 00:45:36,480
भावनाएं भगवान के प्रति उमड़ आई। भगवान के प्रति

636
00:45:36,480 --> 00:45:40,560
दुलार या स्नेह या जो भी है जो भी हम उन्हें अर्पित कर

637
00:45:40,560 --> 00:45:44,800
सकते हैं वो सारी भावनाएं उमड़ आई। जो भी कोई ध्यान से सुन रहा होगा वो उसमें डूबने

638
00:45:44,800 --> 00:45:48,880
लगा होगा। तो इसीलिए भगवान की जब

639
00:45:48,880 --> 00:45:53,120
व्याख्या करते हैं, उनके स्वरूप का वर्णन करते हैं तो एक एक बारीक

640
00:45:53,120 --> 00:45:57,920
से बारीक चीजों पर भी बात की जाती है। अब क्या है

641
00:45:57,920 --> 00:46:01,920
कि हमारे कई धर्म धर्म ग्रंथ ऐसे हैं जिसमें कि इन

642
00:46:01,920 --> 00:46:06,080
बातों को ऐसे ना बता करके कि आप ऐसे हो।

643
00:46:06,080 --> 00:46:10,400
ऐसे ना बता करके भगवान को चित्रित करने के लिए कि भगवान कैसे दिखते

644
00:46:10,400 --> 00:46:14,560
थे। इसे चित्रित करने के लिए उन्होंने कथाओं के रूप में

645
00:46:14,560 --> 00:46:18,560
कि भाई उसने उसको देखा तो उस समय वह ऐसे दिख रहे

646
00:46:18,560 --> 00:46:19,360
थे।

647
00:46:19,360 --> 00:46:23,440
उन्होंने वो ये उन्होंने यह देखकर उनकी पहचान की। इस

648
00:46:23,440 --> 00:46:27,520
तरीके से कथा के रूप में सीधे सीधे ना कह करके कथा के

649
00:46:27,520 --> 00:46:31,840
रूप में उसको कथा का एक अंश बना देते हैं। फॉर एग्जांपल रामायण

650
00:46:31,840 --> 00:46:36,080
में भगवान जो हनुमान है हनुमान जी हैं वो सीता माता को देख

651
00:46:36,080 --> 00:46:40,080
के उनकी उनके पूरे शारीरिक वर्णन उनका

652
00:46:40,080 --> 00:46:44,080
कर रहे हैं। जब वो वर्णन वहां पर किया गया है हमारे शास्त्रों में। वो क्यों

653
00:46:44,080 --> 00:46:48,160
कर रहे हैं? क्योंकि उन्हें सीता माता को पहचानना था कि सीता माता

654
00:46:48,160 --> 00:46:52,240
को मैं ढूंढने आया हूं। राक्षसियों के बीच में कोई स्त्री

655
00:46:52,240 --> 00:46:56,320
बैठी हुई है। यही वो सीता माता है जिनको मैं ढूंढ रहा हूं। इन्हीं

656
00:46:56,320 --> 00:47:00,320
को मुझे राम जी द्वारा दी गई जो मुद्रा है वो प्रदान करनी है। तो यह

657
00:47:00,320 --> 00:47:04,560
कैसे निश्चित हुआ? तो उसके लिए उन्होंने वहां से जब वह चले थे तो उन्होंने

658
00:47:04,560 --> 00:47:08,880
सुना था कि सुंदर है। वह एक राजकुमारी है। तो एक राजकुमारी

659
00:47:08,880 --> 00:47:13,040
सुंदर स्त्री का उस स्त्री के शरीर का अंग

660
00:47:13,040 --> 00:47:17,760
प्रत्यंग किस प्रकार से हो सकते हैं। सारी वहां पर बहुत ही

661
00:47:17,760 --> 00:47:21,920
स्पष्टता के साथ वहां हनुमान जी के मन में चलने वाले विचारों

662
00:47:21,920 --> 00:47:26,000
को व्यक्त किया है वाल्मीकि रामायण में। अब यहां पर क्या होता है कि

663
00:47:26,000 --> 00:47:30,000
लोग इस परिपेक्ष से ना समझते हुए एक

664
00:47:30,000 --> 00:47:34,080
अपने से वह निकाल लेते हैं कि भाई देखो यहां हनुमान जी देखो क्या सोच रहे हैं

665
00:47:34,080 --> 00:47:34,580
जबकि

666
00:47:34,560 --> 00:47:38,800
वास्तविकता क्या है कि जब भी हम अपने घर की किसी भी स्त्री

667
00:47:38,800 --> 00:47:42,800
को ढूंढने जाएंगे अपने घर की जिसको हम जानते हैं और

668
00:47:42,800 --> 00:47:47,200
हम जाएंगे कि भाई वो वहां मंदिर में है या हम जाएंगे वो

669
00:47:47,200 --> 00:47:51,200
मेले में है कहीं भी जाए ढूंढने जाएंगे या लेने जाएंगे कुछ

670
00:47:51,200 --> 00:47:55,200
भी हो उनकी पहचान के लिए जो सबसे पहली पहचान होगी

671
00:47:55,200 --> 00:47:59,760
हमारे पास हमारे घर की मातृशक्तियों के लिए। वो पहली पहचान क्या होगी?

672
00:47:59,760 --> 00:48:03,840
पहली पहचान होगी कि वह एक स्त्री है। हम एक स्त्री को ढूंढने

673
00:48:03,840 --> 00:48:08,080
आए हैं। तो सबकॉन्शियसली हमारे माइंड की जो लेयर्स

674
00:48:08,080 --> 00:48:12,080
हैं उसमें कहीं ना कहीं वो निहित होगा जो स्त्री से संबंधित जो

675
00:48:12,080 --> 00:48:16,640
उसके शरीर विशेष की पहचान होते हैं वो सब वहां पर उस

676
00:48:16,640 --> 00:48:20,800
सबकॉन्शियसली वहां पर हमारे मन के अंदर उस लेयर में व्याप्त है।

677
00:48:20,800 --> 00:48:24,800
तभी हम यह निश्चित कर पा रहे हैं ऊपरी तौर पर कि हम एक स्त्री को ढूंढने

678
00:48:24,800 --> 00:48:28,880
आए और वह हमारी माताजी बो रही क्योंकि हम जानते हैं कि हमारे माता जी के शरीर की

679
00:48:28,880 --> 00:48:33,040
बनावट कैसी है। मगर इसमें दृष्टिकोण बदल करके

680
00:48:33,040 --> 00:48:37,280
लोग जो दुष्प्रचारक होते हैं वो सनातन धर्म ग्रंथों की ऐसी जो बातें लिखी

681
00:48:37,280 --> 00:48:41,280
हुई है स्पष्टता के लिए समझने के लिए उन बातों का दुष्प्रचार करते

682
00:48:41,280 --> 00:48:45,520
हैं। अब उनसे भी पूछा जाए कि भैया तुम आंख बंद करके जाते

683
00:48:45,520 --> 00:48:49,520
हो। कैसे निश्चय करते हो तुम्हारी माताएं? तुम अपनी

684
00:48:49,520 --> 00:48:50,020
माता

685
00:48:49,760 --> 00:48:53,760
के लिए कैसे निश्चय करते हो वह माता तो निश्चय वो कहेगा मैंने

686
00:48:53,760 --> 00:48:58,000
चेहरा देखा है उनको देखा है तो उनको क्या क्या देखा है तो उसमें सब आ जाएगा

687
00:48:58,000 --> 00:49:02,000
फिर तो वो सत ही जो हमारे मस्तिष्क की लेयर्स

688
00:49:02,000 --> 00:49:06,000
है बुद्धि की जो लेयर्स है उसमें एक लेयर में पीछे वो भी है

689
00:49:06,000 --> 00:49:10,000
कि वो एक स्त्री है और स्त्री के शरीर विशेष की ये पहचान होती है वो

690
00:49:10,000 --> 00:49:14,000
सारी बातें भी वहां पर हनुमान जी ने सोची अपने मन में परंतु

691
00:49:14,000 --> 00:49:18,560
उनका उद्देश्य दूसरा नहीं था परंतु दुष्प्रचार के रूप में

692
00:49:18,560 --> 00:49:22,560
वो प्रस्तुत किया जाता है विरोधियों के द्वारा। तो हमें जान इसीलिए

693
00:49:22,560 --> 00:49:26,960
कहते हैं ना कि मनुष्य चाहे चारों वेद पढ़ ले, सारे पुराण पढ़ ले, सारे उपनिषद

694
00:49:26,960 --> 00:49:31,040
पढ़ ले, जब तब वृत दान, पुण्य, यज्ञ, तीर्थ यह सब व्यर्थ

695
00:49:31,040 --> 00:49:35,200
है। यदि कोई प्रामाणिक आचार्य गुरु नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि

696
00:49:35,200 --> 00:49:39,360
यह भी कहा लिखा हुआ है शास्त्रों में कि ये सभी चीजें गुरु के बिना

697
00:49:39,360 --> 00:49:43,360
मति भ्रष्ट कर देने वाली है। अब वो गुरु वो पर्सपेक्टिव तो

698
00:49:43,360 --> 00:49:47,440
पता नहीं है। हनुमान जी ने ये कैसे सोचा? अरे सीता माता के बारे में कैसे सोचा? भाई

699
00:49:47,440 --> 00:49:51,440
तुम भी सोच रहे हो तुम्हारी भी मस्तिष्क की ऐसी एक

700
00:49:51,440 --> 00:49:56,640
लेयर है जिसमें शरीर विशेष के बारे में बात हो रही है तुम्हारे अंदर। ठीक है?

701
00:49:56,640 --> 00:50:01,440
तो अगर हम हमारे ग्रंथों में इस तरह से

702
00:50:01,440 --> 00:50:05,040
भगवान के एक एक अंग को लेकर के बात नहीं की जाएगी

703
00:50:05,040 --> 00:50:09,200
तो हम कैसे उनके सगुण साकार की कल्पना कर पाएंगे। फिर कैसे उनकी मूर्ति

704
00:50:09,200 --> 00:50:13,520
बनेगी? आप देखिए जो पूरी के शंकराचार्य जी वर्तमान

705
00:50:13,520 --> 00:50:17,920
जगतगुरु शंकराचार्य पूरी पीटाधीश्वर जी उनका जो ग्रंथ है

706
00:50:17,920 --> 00:50:22,800
भगवत पाद आदि शंकराचार्य उसमें

707
00:50:22,800 --> 00:50:26,880
जब वो चैप्टर आता है मंडन मिश्र जी वाला जो ब्रह्मा जी अवतरित हुए हैं मंडन

708
00:50:26,880 --> 00:50:30,960
मिश्र के रूप में और उनकी पत्नी के रूप में सरस्वती माता-

709
00:50:30,960 --> 00:50:35,280
अवतरित हुई है। तो वहां पर गुरुदेव ने जो उभय भारती

710
00:50:35,280 --> 00:50:39,280
उनकी पत्नी के रूप में जो अवतरित हुई है उनका भी विवेचन इसी प्रकार

711
00:50:39,280 --> 00:50:43,280
से किया है स्पष्ट। क्यों? हम कैसे कल्पना करेंगे कि भाई वो

712
00:50:43,280 --> 00:50:47,280
ऐसी दिखती थी। कैसी दिखाए उन्हें? अगर कल को कहीं मूर्तित्र बनाना

713
00:50:47,280 --> 00:50:51,440
है, मूर्ति बनानी है, कुछ करना है या उनका ध्यान ही करना है। तो

714
00:50:51,440 --> 00:50:55,680
हम कैसे निश्चित करेंगे कि वो कैसे कैसी दिखती थी? वो वो बहुत

715
00:50:55,680 --> 00:50:59,760
ज्यादा पतली दुबली थी या बहुत ज्यादा क्या कहते हैं?

716
00:50:59,760 --> 00:51:04,160
हष्टपष्ट थी। कैसी थी? तो इसके लिए इस प्रकार से एक एक

717
00:51:04,160 --> 00:51:09,200
चीज पर बात की जाती है भगवान से जुड़ी हुई।

718
00:51:09,200 --> 00:51:13,760
तो मुझे लगता है कि आज का काफी हो गया है। 958 हो चुके हैं।

719
00:51:13,760 --> 00:51:18,240
तीसरा समास यानी शारदा स्तुति से हम अगला सेशन

720
00:51:18,240 --> 00:51:20,080
प्रारंभ करेंगे। अब दो

721
00:51:20,080 --> 00:51:24,080
चार दो तीन बातें कर लेते हैं आपस में और फिर हम लोग विराम

722
00:51:24,080 --> 00:51:28,320
लेंगे। जी जिनजिन को प्रश्न है ना वो सब अपने

723
00:51:28,320 --> 00:51:34,320
हैंड रे कर एक-एक करके हम देख लेंगे किस-किस का हैंड रेज है।

724
00:51:38,840 --> 00:51:42,840
[संगीत]
