1
00:00:02,080 --> 00:00:06,080
मैं स्वयं इस बात को समझता हूं कि मैं खुद अव्वल दर्जे का मूर्ख

2
00:00:06,080 --> 00:00:10,240
हूं और मुझे कोई वेद, पुराण, उपनिषद का ज्ञान नहीं है।

3
00:00:10,240 --> 00:00:14,320
शास्त्रों में वेदों में भी विरोधाभास है। लेकिन वेदों में कोई

4
00:00:14,320 --> 00:00:18,480
विरोधाभास नहीं है। और वो शिक्षा मिलेगी हमको हमारे प्रमाणित

5
00:00:18,480 --> 00:00:22,720
ग्रंथों से। उनको जब हम सुनेंगे, समझेंगे तब हम जान पाएंगे।

6
00:00:22,720 --> 00:00:26,720
शास्त्र के विभिन्न गहराइयां इनमें जाना हमारा

7
00:00:26,720 --> 00:00:30,800
उद्देश्य नहीं है। यानी शिव को आप यह भी नहीं बोल सकते कि पूर्ण भौतिक

8
00:00:30,800 --> 00:00:35,040
है या जीवात्मा है और ना उनको ये बोल सकते हैं कि ये पूर्ण ब्रह्म

9
00:00:35,040 --> 00:00:39,280
परब्रह्म परमात्मा है। ये कोई अल्लाह अलग नहीं है। कृष्ण अलग नहीं

10
00:00:39,280 --> 00:00:43,920
है। गॉड अलग नहीं है। एक ही है।

11
00:00:43,920 --> 00:00:48,080
तो गुरु जी बहुत-बहुत धन्यवाद आपका। हमें अपना कीमती समय देने

12
00:00:48,080 --> 00:00:52,720
के लिए और हम अपने व्यूअर्स को थोड़ा सा बताना चाहेंगे आपके

13
00:00:52,720 --> 00:00:57,520
मुखारविंदु से कि इस

14
00:00:57,520 --> 00:01:01,680
इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ कृष्णा कॉन्शसनेस अंतरराष्ट्रीय

15
00:01:01,680 --> 00:01:05,840
कृष्ण भावनामृत संघ इस की स्थापना श्रील प्रभुपाद जी ने की

16
00:01:05,840 --> 00:01:10,160
और उनका मुख्य उद्देश्य था कि गीता तथा भागवत के प्रमाणिक संदेश

17
00:01:10,160 --> 00:01:14,640
को जनजन तक पहुंचाना। अच्छा और

18
00:01:14,640 --> 00:01:18,640
गुरु जी थोड़ा सा अपने बारे में भी बताएं हमें अपना व्यक्तिगत परिचय

19
00:01:18,640 --> 00:01:23,520
आपका कैसे आप इस भाग भावनात्मक संघ से जुड़े अ

20
00:01:23,520 --> 00:01:27,600
मैं मेरा नाम कर्मी नेम लीगल नेम

21
00:01:27,600 --> 00:01:31,920
जो है वो अनुराग दीक्षित था और मैं

22
00:01:31,920 --> 00:01:36,160
आईसीic बैंक में जॉब करता था लेकिन भगवान

23
00:01:36,160 --> 00:01:40,400
की विशेष कृपा हुई और खास करके हनुमान

24
00:01:40,400 --> 00:01:44,480
जी का क्योंकि मैं हनुमान जी को बहुत अधिक प्रेम करता था और उनके मंदिर

25
00:01:44,480 --> 00:01:48,720
जाता था और उनकी सेवा करता था। तो हनुमान जी की विशेष

26
00:01:48,720 --> 00:01:52,800
प्रेरणा से हमारे मन में राम भक्ति कृष्ण भक्ति के

27
00:01:52,800 --> 00:01:56,960
प्रति जागरूकता आई। बहुत ही

28
00:01:56,960 --> 00:02:01,040
बहुत ही सुंदर परिचय गुरुदेव। बहुत अच्छा लगा आपका सुन के।

29
00:02:01,040 --> 00:02:05,120
अच्छा गुरु गुरुदेव ये इसमें जैसे कि हम नाम सुनते

30
00:02:05,120 --> 00:02:09,440
हैं कि अंतरराष्ट्रीय कृष्ण भावनात्मक संघ

31
00:02:09,440 --> 00:02:12,720
तो हम जानना चाहते हैं कि ये

32
00:02:12,720 --> 00:02:17,440
हिंदुत्व में सनातन धर्म में कृष्ण जी का महत्व क्या है?

33
00:02:17,440 --> 00:02:21,760
देखिए सनातन धर्म को जानने वाले लोग समझेंगे कि क्या सनातन

34
00:02:21,760 --> 00:02:25,760
धर्म है। जब तक हम सनातन धर्म में जन्म लेने से हम सनातन धर्म

35
00:02:25,760 --> 00:02:29,760
को नहीं समझ पाएंगे। सनातन धर्म को जानने के लिए हमको ये शिक्षा

36
00:02:29,760 --> 00:02:34,000
लेना होगा। यह समझना होगा कि वास्तव में सनातन धर्म है क्या

37
00:02:34,000 --> 00:02:38,080
और वह शिक्षा मिलेगी हमको हमारे प्रमाणित ग्रंथों से वेद

38
00:02:38,080 --> 00:02:42,320
पुराण उपनिषद उनको जब हम सुनेंगे समझेंगे तब हम जान पाएंगे

39
00:02:42,320 --> 00:02:46,400
लेकिन अगर हम उनको पढ़ ही नहीं रहे उनको समझ ही नहीं रहे हैं तो हम कैसे सनातन धर्म

40
00:02:46,400 --> 00:02:50,400
को समझ पाएंगे तो श्रीमद् भागवत में श्रीमद् भगवत गीता में

41
00:02:50,400 --> 00:02:54,640
अन्य पुराणों में स्पष्ट रूप से वर्णन है कि वास्तविकता

42
00:02:54,640 --> 00:02:58,720
में परम ब्रह्म परम भगवान श्री कृष्ण है और सब उनके

43
00:02:58,720 --> 00:03:03,040
दास हैं। एक ले ईश्वर कृष्ण और सब वृत्य ईश्वर परम

44
00:03:03,040 --> 00:03:07,040
कृष्ण सच्चिदानंद विग्रह अनादि आदि का गोविंद

45
00:03:07,040 --> 00:03:12,400
सर्वकारण कारण अच्छा और

46
00:03:12,400 --> 00:03:16,480
बहुत अच्छा लगा गुरुदेव ये श्री कृष्ण के बारे में सुनकर के हमें भगवान श्री

47
00:03:16,480 --> 00:03:20,800
कृष्ण का मैं भी बहुत भक्त हूं अ एक अगला

48
00:03:20,800 --> 00:03:24,960
हमारा ये रहेगा कि जैसे आजकल हम देखते हैं कि

49
00:03:24,960 --> 00:03:28,160
धर्म के नाम पर काफी युद्ध हो रहा है दुनिया में

50
00:03:28,160 --> 00:03:32,320
पंथ के के नाम पर कई सारे पंथ बन गए हैं। तो इसमें

51
00:03:32,320 --> 00:03:36,480
आप किस तरह से देखना चाहेंगे कि जैसे क्रिश्चियनिटी है क्या

52
00:03:36,480 --> 00:03:40,560
जैसे हमें कई बार इस से इस की जब हम पढ़ाई करते

53
00:03:40,560 --> 00:03:44,720
हैं कुछ स्टडी करते हैं तो कई बार ऐसा आता है कि सारा धर्म एक ही है। कृष्णा

54
00:03:44,720 --> 00:03:49,440
और क्राइस्ट में कोई अंतर नहीं है। कृष्णा और मोहम्मद में कोई अंतर नहीं है।

55
00:03:49,440 --> 00:03:53,440
जी ऐसा नहीं। कृष्णा और क्राइस्ट में कोई अंतर नहीं है। नहीं बहुत बड़ा अंतर

56
00:03:53,440 --> 00:03:57,520
है। जी। कृष्णा मोहम्मद साहब ने कहां मोहम्मद साहब कहां कृष्ण कहां

57
00:03:57,520 --> 00:04:01,520
क्राइस्ट कहां वो इसको सीधा समझिए जैसे हमारे

58
00:04:01,520 --> 00:04:05,520
संस्थापकाचार्य हैं श्रील प्रभुपाद जी तो हम प्रभुपाद जी को भगवान नहीं

59
00:04:05,520 --> 00:04:10,800
बोलते प्रभुपाद जी हमारे गुरु हैं इसी तरह से जो

60
00:04:10,800 --> 00:04:14,800
जीसस है वो गुरु हैं वो और वो स्वयं बोलते

61
00:04:14,800 --> 00:04:18,880
हैं कि मैं भगवान का पुत्र हूं। जी जी मोहम्मद साहब

62
00:04:18,880 --> 00:04:22,960
स्वयं बोलते हैं मैं भगवान का दूत हूं। हां मैसेंजर हूं। मैं

63
00:04:22,960 --> 00:04:26,960
दास हूं। उनका पैगंबर हूं। तो उन्होंने कभी नहीं बोला कि वो भगवान है।

64
00:04:26,960 --> 00:04:31,200
तो अगर कोई उनको भगवान बोलता है तो ये गलत है। लेकिन भगवान ने स्वयं

65
00:04:31,200 --> 00:04:35,200
स्पष्ट बोला कि मैं भगवान हूं। जी श्री कृष्ण भगवत गीता में

66
00:04:35,200 --> 00:04:39,360
घोषणा कर रहे हैं कि मैं भगवान हूं। जी तो इसलिए हमको ये समझना

67
00:04:39,360 --> 00:04:43,440
चाहिए कि कभी भी हमको भगवान कृष्ण की तुलना मोहम्मद

68
00:04:43,440 --> 00:04:47,440
साहब या जीसस से या किसी और संत

69
00:04:47,440 --> 00:04:51,760
से नहीं कर सकते। संत और गुरु अलग है और भगवान अलग। भगवान

70
00:04:51,760 --> 00:04:56,800
का स्थान कोई नहीं ले सकता और वह भगवान एक हैं। उनका नाम है

71
00:04:56,800 --> 00:05:01,280
सनातन धर्म और वास्तविक आध्यात्मिक चेतना के अनुसार कृष्ण

72
00:05:01,280 --> 00:05:05,440
उनको अल्लाह भी बोलते हैं। उनको गॉड भी बोलते हैं। उनको जोोबा भी बोलते

73
00:05:05,440 --> 00:05:09,760
हैं। उसमें कोई भेद नहीं। कोई अल्लाह अलग नहीं है। कृष्ण अलग नहीं है।

74
00:05:09,760 --> 00:05:14,240
गॉड अलग नहीं है। एक ही है। अच्छा। अच्छा। नहीं। जैसे हम

75
00:05:14,240 --> 00:05:18,320
कभी-कभी ऑफिशियल वेबसाइट्स के थ्रू पढ़ाई करते हैं जब तो

76
00:05:18,320 --> 00:05:22,320
एक शीला प्रभुपाद जी का एक कथन मिलता है कि कृष्ण

77
00:05:22,320 --> 00:05:27,120
और क्राइस्ट के नाम में कोई फर्क नहीं है। तो इस पर थोड़ा सा प्रकाश डालेंगे।

78
00:05:27,120 --> 00:05:31,440
कृष्ण देखिए क्राइस्ट वो कृष्ण को शाब्दिक

79
00:05:31,440 --> 00:05:35,600
उन्होंने समानता बताई है कि कृष्ण कहें या क्राइस्ट कहें लगभग बात

80
00:05:35,600 --> 00:05:39,600
एक ही है ऐसे करके। नहीं नहीं नहीं क्र नहीं वो

81
00:05:39,600 --> 00:05:43,680
कृष्ण को उन्होंने एक्सप्लेन करने के लिए भले ही उसप में बोला हो लेकिन

82
00:05:43,680 --> 00:05:47,920
वास्तविकता में वो जो बोलना चाह रहे हैं वो बता रहे हैं कि कृष्ण

83
00:05:47,920 --> 00:05:51,920
ही एकमात्र भगवान का परफेक्ट नाम है क्योंकि अगर आप प्रभुपाद

84
00:05:51,920 --> 00:05:55,920
जी की पुस्तक लेंगे आत्म साक्षात्कार का विज्ञान पुस्तक हो

85
00:05:55,920 --> 00:06:01,280
तो मैं अभी आपको बोलता हूं

86
00:06:01,280 --> 00:06:05,120
हां

87
00:06:05,120 --> 00:06:10,160
ने कहा कि हमारे पिता तो यहां ये है ना क्राइस्ट शब्द को

88
00:06:10,160 --> 00:06:14,240
इन्होंने अंत में कहा कि क्राइस्ट और कृष्ण

89
00:06:14,240 --> 00:06:18,480
कहने का एक और तरीका है मतलब क्राइस्ट शब्द में और कृष्ण में एक्चुअली उनको

90
00:06:18,480 --> 00:06:22,560
समझाने के लिए उन्होंने इस चीज को लिया

91
00:06:22,560 --> 00:06:26,560
भाषा से उन्होंने जो बोला है ना जैसे ये बोल रहे हैं ना कि ग्रीस यहां

92
00:06:26,560 --> 00:06:31,040
पर

93
00:06:31,040 --> 00:06:35,040
क्राइस्ट ग्रीक शब्द जी क्रिस्टोन से आया है।

94
00:06:35,040 --> 00:06:39,280
जी ठीक है ना जी क्रिस्टोन शब्द कृष्णा का ग्रीक संस्करण है

95
00:06:39,280 --> 00:06:44,080
जी जब कोई भारतीय व्यक्ति कृष्ण को पुकारता है जी तो वह अक्सर

96
00:06:44,080 --> 00:06:48,160
कृष्ण कहता है जी कृष्ण एक संस्कृत शब्द

97
00:06:48,160 --> 00:06:52,240
है जी जिसका अर्थ है सर्वाकर्षण यानी आकर्षण की

98
00:06:52,240 --> 00:06:56,560
वस्तु बिल्कुल इसलिए जब भगवान को क्राइस्ट कृष्ण कृष्ण

99
00:06:56,560 --> 00:07:00,720
या कृष्ण के रूप में संबोधित करते हैं तो हम भगवान के

100
00:07:00,720 --> 00:07:04,880
समान सर्व आकर्षण सर्वोच्च व्यक्ति का संकेत देते हैं। जब

101
00:07:04,880 --> 00:07:09,040
यीशु ने कहा कि हमारे पिता हैं एक्चुअली क्राइस्ट जो है ना क्राइस्ट शब्द

102
00:07:09,040 --> 00:07:13,200
आया कहां कोई क्राइस्ट बोलता है क्या कृष्ण कृष्ण क्राइस्ट

103
00:07:13,200 --> 00:07:16,560
कहां से आया प्रश्न ये क्राइस्ट शब्द

104
00:07:16,560 --> 00:07:20,560
जो है इसका प्रयोग कहां से हुआ किसने बोला क्राइस्ट नहीं जैसे

105
00:07:20,560 --> 00:07:23,920
इनका नाम है ना जीसस क्राइस्ट

106
00:07:23,920 --> 00:07:27,920
तो क्राइस्ट जीसस खुद बोल रहे हैं कि वहां कृष्ण

107
00:07:27,920 --> 00:07:31,920
नहीं है आप उसको पढ़ जी जी कृष्ण नहीं है मतलब कहने का मेरा प्रश्न

108
00:07:31,920 --> 00:07:36,400
बस ये था कि जैसे यहां क्यों को बोल रहे हैं क्राइस्ट और कृष्ण क्या हम

109
00:07:36,400 --> 00:07:40,480
ऐसा मान सकते हैं सभी धर्म एक है नहीं क्राइस्ट इसको हमें

110
00:07:40,480 --> 00:07:44,480
समझना यही होगा उन्होंने कहा ना कि ग्रीक भाषा के अनुसार क्राइस्ट शब्द का

111
00:07:44,480 --> 00:07:48,880
अर्थ है आकर्षण और कृष्ण का भी अर्थ आकर्षण है संस्कृत के

112
00:07:48,880 --> 00:07:53,040
का मतलब भी सर्वकर्षण तो मतलब ये उन्होंने दी लेकिन

113
00:07:53,040 --> 00:07:57,520
हम ये कह के कंफ्यूज हो जाएंगे या जनरल पब्लिक को कंफ्यूज कर लेंगे

114
00:07:57,520 --> 00:08:01,760
कि क्राइस्ट यानी जीसस क्राइस्ट और कृष्ण एक ही है ये नहीं कह रहे प्रभुपाद

115
00:08:01,760 --> 00:08:05,760
जी नहीं अंत में ऐसा ही बोल रहे हैं ना कि क्राइस्ट केवल कृष्ण कहने

116
00:08:05,760 --> 00:08:09,840
का एक और तरीका है। हां। लेकिन वो क्या कह रहे हैं? वो शब्द को बोल रहे

117
00:08:09,840 --> 00:08:14,160
हैं। जीसस हम उस शब्द को कृष्ण जीसस क्राइस्ट

118
00:08:14,160 --> 00:08:18,560
ईसा मसीह को नहीं मान रहे। हम उस शब्द को कृष्ण मान सकते हैं। क्राइस्ट को

119
00:08:18,560 --> 00:08:22,880
अलग भाषा में कृष्ण मान सकते हैं। मतलब अच्छा

120
00:08:22,880 --> 00:08:27,360
ठीक है। ठीक है ना? ठीक है। क्राइस्ट शब्द जो है उसको कृष्ण मान सकते हैं।

121
00:08:27,360 --> 00:08:31,440
जीसस को कृष्ण उनको यीशु मसीह को नहीं। क्राइस्ट नाम कृष्ण का ही एक

122
00:08:31,440 --> 00:08:31,940
और

123
00:08:31,600 --> 00:08:36,160
नाम है। हां वो एक और नाम है। उसका जो अर्थ है सर्व आकर्षण

124
00:08:36,160 --> 00:08:40,400
इसका आकर्षण क्राइस्ट का क्या दिया है उन्होंने?

125
00:08:40,400 --> 00:08:44,400
गुरु जी यीशु जैसे ईसा मसीह है जो जीसस क्राइस्ट उनको हम किस रूप

126
00:08:44,400 --> 00:08:48,400
में देखें एक अवैदिक व्यक्ति के रूप में जो वेद विरोधी हैं या

127
00:08:48,400 --> 00:08:52,720
फिर हम उनको ऐसा माने कि हमारे ही धर्म के एक और वो मैसेंजर हैं दूत

128
00:08:52,720 --> 00:08:56,800
हैं क्या किस रूप में निश्चित रूप से वो हमारे ही धर्म के देखिए

129
00:08:56,800 --> 00:09:01,120
धर्म एक ही है। पहले तो ये समझना बहुत आवश्यक है धर्म क्या है?

130
00:09:01,120 --> 00:09:05,120
जी हिंदू धर्म, मुस्लिम धर्म, सिख धर्म यह धर्म नहीं

131
00:09:05,120 --> 00:09:09,360
है। जी धर्म क्या है? जिसको धारण किया जाए। जी।

132
00:09:09,360 --> 00:09:13,360
जैसे चीनी का धर्म क्या है? मिठास। चीनी मिठास को जी

133
00:09:13,360 --> 00:09:17,360
धारण किया है। अब चीनी से आप मिठास को हटा नहीं सकते। जी।

134
00:09:17,360 --> 00:09:21,360
अगर आप चीनी से मिठास को हटा दोगे तो फिर चीनी का अस्तित्व

135
00:09:21,360 --> 00:09:25,360
खत्म हो जाएगा। फिर चीनी नाम की कोई चीज नहीं रहेगी। जी। ऐसे ही नमक। नमक से जो

136
00:09:25,360 --> 00:09:29,360
नमकीनपन है आप उसको हटा नहीं सकते। अगर नमक से आपने नमकीनपन हटा

137
00:09:29,360 --> 00:09:33,600
दिया तो इसका मतलब है फिर नमक नाम की कोई चीज नहीं है। तो धर्म

138
00:09:33,600 --> 00:09:37,600
का मतलब जिसको धारण किया जैसे चीनी का धर्म है मिठास उसने मिठास को धारण कर

139
00:09:37,600 --> 00:09:41,680
रखा है। अब मिठास हटते ही चीनी नाम का अस्तित्व खत्म हो गया। जी तो

140
00:09:41,680 --> 00:09:45,840
इसी प्रकार से हम मनुष्य हैं। हम लोगों का धर्म क्या है? हिंदू

141
00:09:45,840 --> 00:09:46,880
धर्म, सिख धर्म,

142
00:09:46,880 --> 00:09:51,120
ईसाई धर्म, मुस्लिम धर्म नहीं। अगर यह होता

143
00:09:51,120 --> 00:09:55,280
तो पता चलता है एक सनातन धर्मी आने वाले समय

144
00:09:55,280 --> 00:09:59,520
में कोई व्यक्ति उसको समझाता है और वो मुस्लिम

145
00:09:59,520 --> 00:10:03,520
बन जाता है। फिर उसको कोई दूसरा व्यक्ति समझाता है तो वो अपनी घर

146
00:10:03,520 --> 00:10:07,760
वापसी कर लेता है और पुनः सनातन धर्म को स्वीकार कर लेता है। एक व्यक्ति

147
00:10:07,760 --> 00:10:12,080
उसको जो आध्यात्मिक ज्ञान नहीं है या वेदों का ज्ञान नहीं है उस व्यक्ति को कोई समझाता

148
00:10:12,080 --> 00:10:16,320
बोलता है कि आप क्रिश्चियन बन जाओ तो वो क्रिश्चियन

149
00:10:16,320 --> 00:10:20,320
बन जाता है। लेकिन उसके बाद में वो फिर समझ में आता है उसको वो

150
00:10:20,320 --> 00:10:24,480
घर वापसी करता है और फिर सनातन धर्म स्वीकार कर लेता है। जी तो यह अगर वह

151
00:10:24,480 --> 00:10:29,040
उसको बदल रहा है तो उसका अस्तित्व खत्म हो जाना चाहिए। तो यह धर्म नहीं है।

152
00:10:29,040 --> 00:10:33,120
मनुष्य का एकमात्र धर्म है सेवा। सेवा के

153
00:10:33,120 --> 00:10:37,280
बिना कोई मनुष्य नहीं रह सकता। चाहे मुस्लिम हो, हिंदू हो, ईसाई

154
00:10:37,280 --> 00:10:41,360
हो, सनातन धर्मी कोई भी हो बिना सेवा के नहीं रह सकते। तो सेवा परमो धर्म। सेवा

155
00:10:41,360 --> 00:10:45,360
ही वास्तविकता मूल धर्म है। क्या सेवा? किसकी सेवा? वो फिर

156
00:10:45,360 --> 00:10:49,520
अपने आप में एक अलग विषय, बड़ा गहरा विषय होगा। लेकिन इतनी बात हमें समझनी

157
00:10:49,520 --> 00:10:53,680
चाहिए कि सेवा धर्म है ना कि हिंदू मुस्लिम

158
00:10:53,680 --> 00:10:57,680
सिख ईसाई ये धर्म नहीं है। यह विचारधाराएं हैं। कोई किसी विचारधारा से प्रभावित

159
00:10:57,680 --> 00:11:01,680
है। आज वो उस विचारधारा को स्वीकार कर रहा है। कल वो किसी और विचारधारा से प्रभावित

160
00:11:01,680 --> 00:11:02,180
हुआ।

161
00:11:01,920 --> 00:11:05,920
उसको स्वीकार करने लगा है। लेकिन ये धर्म नहीं है। तो गुरुदेव इसका मतलब हमें ये

162
00:11:05,920 --> 00:11:10,160
मानना चाहिए कि सनातन नाम का कोई धर्म नहीं है। नहीं सनातन धर्म

163
00:11:10,160 --> 00:11:14,960
है। क्यों धर्म है? इसको भी समझ लीजिए। जी। सनातन का मतलब क्या है?

164
00:11:14,960 --> 00:11:19,040
प्राचीन शाश्वत। शाश्वत हमेशा से सनातन शाश्वत जो

165
00:11:19,040 --> 00:11:23,200
हमेशा से है और हमेशा रहेगा जी सेवा आपके अंदर हमेशा से

166
00:11:23,200 --> 00:11:27,200
है और हमेशा रहेगी आप किसी भी शरीर में रह हमारे शास्त्रों

167
00:11:27,200 --> 00:11:31,280
में वर्णन मिलता है कि 84 लाख प्रकार की योनियां हैं लेकिन आप किसी भी

168
00:11:31,280 --> 00:11:35,440
योनि में जाओगे आप सेवा को नहीं छोड़ पाओगे पशु हो पक्षी हो कीट

169
00:11:35,440 --> 00:11:39,520
हो चिड़िया हो चींटी हो कोई भी आप देखोगे बिना सेवा के नहीं रह

170
00:11:39,520 --> 00:11:43,680
सकता जी आप देखते हैं कुछ ना कुछ कोई ना कोई बराबर

171
00:11:43,680 --> 00:11:47,840
सेवा कर रहा है एक चींटी अपने बच्चों के लिए भोजन ले जा रही है, वो उठा रही है,

172
00:11:47,840 --> 00:11:51,840
दाना उठा रही है। कुछ भी किसी भी आप जीव को देखेंगे बिना सेवा के वो

173
00:11:51,840 --> 00:11:55,840
नहीं रह सकता। तो जो सनातन धर्म है, सनातन धर्म का मतलब क्या

174
00:11:55,840 --> 00:11:59,840
है? लोग सनातन धर्म ही नहीं समझते। सनातन का मतलब है शाश्वत। और हम

175
00:11:59,840 --> 00:12:03,840
कौन हैं? हम अपनी पहचान अपने शरीर, हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई,

176
00:12:03,840 --> 00:12:07,920
अमेरिकी, चीनी, भारतीय पाकिस्तानी इससे कर रहे हैं। ये हमारी वास्तविक पहचान

177
00:12:07,920 --> 00:12:12,000
नहीं है। हम वास्तविकता में शरणनी आत्मा हैं और हम हमेशा से हैं।

178
00:12:12,000 --> 00:12:16,080
हमेशा रहेंगे। तो कहा जा सकता है कि सनातन मात्र एक धर्म है

179
00:12:16,080 --> 00:12:17,520
दुनिया में। सनातन

180
00:12:17,520 --> 00:12:21,520
धर्म है। लेकिन सनातन धर्म को समझने के लिए हम कि सनातन धर्म

181
00:12:21,520 --> 00:12:25,600
क्या है? जी तो सेवा सनातन है। जो सेवा करना है हम

182
00:12:25,600 --> 00:12:29,680
लोगों का जो मूल तो जो जैसे कोई अगर मुस्लिम फिलॉसफी

183
00:12:29,680 --> 00:12:33,680
को फॉलो कर रहा है तो वो भी सनातनी है। बिल्कुल निश्चित रूप से

184
00:12:33,680 --> 00:12:38,080
उसको ऐसे भी समझ सकते हैं आप। आप देखिए 1400

185
00:12:38,080 --> 00:12:42,080
साल पहले दुनिया में कोई मुस्लिम था? नहीं। 2000

186
00:12:42,080 --> 00:12:46,080
साल पहले कोई दुनिया में ईसाई था? नहीं। अगर

187
00:12:46,080 --> 00:12:50,160
हम और 500 साल पहले कोई दुनिया में सरदार सिख था।

188
00:12:50,160 --> 00:12:54,320
जी नहीं बिल्कुल नहीं। तो ये कहां से आए? सनातन से। सनातन।

189
00:12:54,320 --> 00:12:58,400
तो पहले क्या था? बहुत अच्छी बात कही गुरु। सनातन यानी जो हमेशा से था। बिल्कुल

190
00:12:58,400 --> 00:13:02,400
बिल्कुल। चाहे जैन हो, चाहे बौद्ध हो, चाहे जो भी

191
00:13:02,400 --> 00:13:06,400
अपना अपना जब उनके पैगंबर आए, उनके मैसेंजर आए, उनकी विचारधारा

192
00:13:06,400 --> 00:13:10,480
आई, उस विचारधारा को जो फॉलो करने वाले लोग हैं ये आए कहां से? जी सनातन

193
00:13:10,480 --> 00:13:14,800
से सनातन मगर गुरु जी जैसे आपने अभी एक बात कही कि यह जैसे मोहम्मद

194
00:13:14,800 --> 00:13:18,800
हुए या फिर ये जीसस क्राइस्ट हुए यह

195
00:13:18,800 --> 00:13:22,800
मैसेंजर थे गॉड के मगर अगर हम इनकी जब बुक्स को

196
00:13:22,800 --> 00:13:26,800
पढ़ते हैं तो काफी ऐसी बातें मिलती हैं जो वेदों का बिल्कुल स्पष्ट रूप से विरोध कर

197
00:13:26,800 --> 00:13:30,800
रही हैं और हमारे शास्त्रों में कहा गया कि वेद विरोध करने वाला नास्तिक है।

198
00:13:30,800 --> 00:13:32,560
तो हम फिर उन्हें कैसे मान लें कि

199
00:13:32,560 --> 00:13:36,640
वह धार्मिक व्यक्ति थे। हां देखो समझने वाली बात यह है कई बार अगर हम

200
00:13:36,640 --> 00:13:40,640
वेदों वेदों को भी पढ़ते हैं वेदों को भी देखते हैं तो वेदों में

201
00:13:40,640 --> 00:13:45,040
वेदों का मतलब क्या है वेद का मतलब है ज्ञान और ज्ञान

202
00:13:45,040 --> 00:13:50,000
में सब कुछ आ जाता है जी थर्ड क्लास ज्ञान

203
00:13:50,000 --> 00:13:54,160
सेकंड क्लास ज्ञान फर्स्ट क्लास ज्ञान सारा ज्ञान आता है तो

204
00:13:54,160 --> 00:13:58,240
वास्तविकता में वेदों में भी अगर कोई देखे तो कहा जाएगा अरे एक

205
00:13:58,240 --> 00:14:02,560
जगह ये मना किया जा रहा है शराब और दूसरी जगह लोग शराब का भोग

206
00:14:02,560 --> 00:14:06,560
लगा रहे हैं शराब चढ़ा चढ़ा रहे हैं। एक तरफ मना किया जा रहा है कि यह

207
00:14:06,560 --> 00:14:10,640
मांस नहीं खाना चाहिए और एक तरफ लोग बड़ी चढ़ा रहे हैं। तो देखा जाए तो शास्त्रों में

208
00:14:10,640 --> 00:14:14,640
वेदों में भी विरोधाभास है। तो समझने वाली बात इतनी है

209
00:14:14,640 --> 00:14:18,720
जो व्यक्ति जिस लेवल को समझता समझता है उस लेवल की बात की

210
00:14:18,720 --> 00:14:22,960
जाती है। उतनी ही बात की जाती है। तो उस समय जिन परिस्थितियों में

211
00:14:22,960 --> 00:14:27,200
मोहम्मद साहब थे या जिन परिस्थितियों में आपके जीसस थे उनको वो

212
00:14:27,200 --> 00:14:31,200
समझ रहे थे कि जो लोग जितनी बात समझ पाएंगे उनको उतनी बात समझाई कि कम से

213
00:14:31,200 --> 00:14:35,520
कम इतना तो मानो लेकिन भगवान को याद करो लेकिन

214
00:14:35,520 --> 00:14:39,680
अगर कोई कहता है कि नहीं ईसाई धर्म ही पूर्ण

215
00:14:39,680 --> 00:14:44,320
है। इसमें पूरा ज्ञान है या कोई कहता है कि नहीं मुस्लिम धर्म

216
00:14:44,320 --> 00:14:47,760
पूर्ण है या कोई बोलता है कि नहीं यह सिख धर्म

217
00:14:47,760 --> 00:14:51,760
पूर्ण है या कोई बोलता है कि हम कोई हम हिंदू धर्म में ही कोई

218
00:14:51,760 --> 00:14:55,920
व्यक्ति बोलता है कि मैं जो बोल रहा हूं यही पूर्ण है या कोई संत महात्मा

219
00:14:55,920 --> 00:15:00,400
ये कहे कि यही पूर्ण है तो वास्तविकता में वहां पर थोड़ा सा समझदारी

220
00:15:00,400 --> 00:15:04,560
की जरूरत है पूर्ण एकमात्र भगवान है और उनकी वाणी

221
00:15:04,560 --> 00:15:08,560
है और ये जो वाणी है वो आपको वेदों के रूप में प्राप्त है और वेदों में

222
00:15:08,560 --> 00:15:12,560
जो ज्ञान दिया गया है वो वो बिल्कुल परफेक्ट है। हां उसको समझने के लिए

223
00:15:12,560 --> 00:15:16,880
जो पात्रता चाहिए वो हमारे पास ना होने के कारण कई बार हमें

224
00:15:16,880 --> 00:15:20,880
वेदों में भी विरोधाभास दिखता है। लेकिन वेदों में कोई विरोधाभास नहीं वास्तविकता में नहीं

225
00:15:20,880 --> 00:15:25,120
है वो दिखता है। जैसे इस पे मैं मैं अभी थोड़ा सा अभी मैं बढ़ाई कर रहा था।

226
00:15:25,120 --> 00:15:29,120
एक वैष्णवाचार्य जी थे माधवाचार्य शास्त्री

227
00:15:29,120 --> 00:15:33,600
जी रामानुजाचार्य परंपरा से थे। उनकी एक बुक उन्होंने बनाई। क्यों?

228
00:15:33,600 --> 00:15:37,920
उसमें उन्होंने बहुत सारे प्रश्नों के जवाब दिए। तो उसमें से एक जवाब उन्होंने दिया था

229
00:15:37,920 --> 00:15:42,160
कि ये जो जगह-जगह पे हमें पुराने शास्त्रों में मांस दिखता है। मांस मदिरा

230
00:15:42,160 --> 00:15:46,240
उनके उन्होंने वो वाले अर्थ दिए थे जो निरुक्त से निकले हमारे जो पुराना प्राचीन

231
00:15:46,240 --> 00:15:50,400
ग्रंथ है जिससे हमने वेदों को कहते हैं कि उसको हम समझ

232
00:15:50,400 --> 00:15:54,560
पाए वेदों को निरुक्त की सहायता से। बिल्कुल आपने ये चीज सही कही है।

233
00:15:54,560 --> 00:15:59,040
तो फाइनली हम क्या माने कि जीसस क्राइस्ट और मोहम्मद साहब

234
00:15:59,040 --> 00:16:03,120
हमारे धर्म के ही भगवान के ही भेजे हुए

235
00:16:03,120 --> 00:16:07,280
मैसेंजर थे या फिर कोई ऐसे लोग जो जिन्होंने वेदों का विरोध किया।

236
00:16:07,280 --> 00:16:11,360
नहीं नहीं निश्चित रूप से इस तरीके से बोलना उचित नहीं है। चाहे मोहम्मद

237
00:16:11,360 --> 00:16:15,520
साहब हो, चाहे जीसस हो, चाहे गुरु नानक देव जी हो, चाहे और

238
00:16:15,520 --> 00:16:19,920
अन्य जितने धर्म को स्थापित करने वाले धर्माचार्य

239
00:16:19,920 --> 00:16:24,400
हैं या धर्म को फैलाने वाले जो आप देखेंगे

240
00:16:24,400 --> 00:16:28,720
जो पैगंबर हैं, पुत्र हैं, मैसेंजर हैं। इनका वास्तविकता

241
00:16:28,720 --> 00:16:33,200
में इन्होंने लोगों की योग्यता के आधार पर बात कही। लेकिन सबने

242
00:16:33,200 --> 00:16:37,200
एक बात बोली ईश्वर को ध्यान करो। ईश्वर

243
00:16:37,200 --> 00:16:41,360
का स्मरण करो। वही सब कुछ है। आप

244
00:16:41,360 --> 00:16:45,840
देखेंगे चाहे ईसाई हो वह भी किसको याद करते हैं? गॉड को याद करते हैं।

245
00:16:45,840 --> 00:16:50,000
मुस्लिम्स को देखेंगे वो भी भगवान को याद यानी सब कहीं ना कहीं अगर देखा जाए

246
00:16:50,000 --> 00:16:54,160
तो ईश्वर से ही जुड़ रहे हैं। ईश्वर से कनेक्टेड होने के कारण समानता है।

247
00:16:54,160 --> 00:16:58,160
हां जी। लेकिन भेद कहां है? लोगों की योग्यता

248
00:16:58,160 --> 00:17:02,160
के अनुसार। तो इसी तरीके से भगवान के जितने भी ये मैसेंजर

249
00:17:02,160 --> 00:17:06,400
आए हैं, चाहे वो मोहम्मद साहब हो, चाहे वो जीसस हो, चाहे वो अन्य

250
00:17:06,400 --> 00:17:10,800
सनातन धर्म के लोग उन्होंने लोगों को आकर के उनकी चेतना उनके

251
00:17:10,800 --> 00:17:14,880
लेवल वर्तमान परिस्थिति के अनुसार ही बात कही कि इतना इतना समझ जाए

252
00:17:14,880 --> 00:17:18,240
लोग तो मतलब हम इन्हें ऐसा ही देखें कि हमारे ही भगवान

253
00:17:18,240 --> 00:17:22,400
द्वारा भेजे गए मैसेंजर्स हैं। हमारे भगवान उनके भगवान अलग नहीं है। भगवान भगवान

254
00:17:22,400 --> 00:17:26,400
है। श्री कृष्ण भगवान द्वारा ही एक ही परमात्मा द्वारा परमात्मा द्वारा श्री

255
00:17:26,400 --> 00:17:30,880
कृष्ण द्वारा ही सबको भेजा जाता है कि आप जाओ

256
00:17:30,880 --> 00:17:34,960
और धर्म की स्थापना करो। धर्म को समझो और धर्म की चर्चा

257
00:17:34,960 --> 00:17:39,440
करो और व्यक्ति को उसके अनुसार जिस जिस तरह के उसमें सामर्थ हो उसके अनुसार

258
00:17:39,440 --> 00:17:44,320
उसके अनुसार वो कार्य करें। जी अच्छा गुरुदेव एक

259
00:17:44,320 --> 00:17:50,320
ये पब्लिक में काफी ये बात है चर्चित कि जैसे

260
00:17:51,200 --> 00:17:54,400
हमारे

261
00:17:54,400 --> 00:17:58,560
श्रील प्रभुपाद जी हैं। इनके बारे में कई कहा जाता है कि शिव को नहीं मानते

262
00:17:58,560 --> 00:18:02,960
थे। ऐसा कई बार आता है कि कृष्ण को ही कहते हैं और शिव को नहीं मानते। इन्होंने भागवतम

263
00:18:02,960 --> 00:18:07,040
में अपने भाष्य में यह तीसरे शायद स्कंध

264
00:18:07,040 --> 00:18:11,280
है और 25वा चैप्टर है। 25वां श्लोक है। उसमें कहा है कि शिव

265
00:18:11,280 --> 00:18:15,840
को कृष्ण के तुल्य समझना समझने वाले मूर्ख हैं शिव और दुर्गा को।

266
00:18:15,840 --> 00:18:20,080
तो इस तरह की चर्चाएं फैली हुई है। ये बात सही है।

267
00:18:20,080 --> 00:18:25,040
कोई भी जब तक समझेगा नहीं सिद्धांतों को तो नहीं समझ पाएगा।

268
00:18:25,040 --> 00:18:29,600
मेरा आप सबसे यह प्रश्न है परमात्मा कितने हैं? परमात्मा

269
00:18:29,600 --> 00:18:33,760
कितने हैं? परम भगवान जी कितने हैं? आप

270
00:18:33,760 --> 00:18:37,840
बताइए कितने परमात्मा है? मेरी जानकारी के अनुसार तो एक ही है।

271
00:18:37,840 --> 00:18:41,840
आपकी जानकारी नहीं सबकी जानकारी के अनुसार हिंदू मुस्लिम, सिख, ईसाई किसी से भी पूछो

272
00:18:41,840 --> 00:18:46,160
कि भाई परम ब्रह्म परमात्मा, परम भगवान एक शक्ति सब बोले।

273
00:18:46,160 --> 00:18:50,400
मतलब मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति बोलेगा कोई शक्ति है। एक जो एक शक्ति

274
00:18:50,400 --> 00:18:54,800
है जो संसार को चला रही है। जी। तो यानी एक व्यक्ति। वो एक कौन है? जी

275
00:18:54,800 --> 00:18:58,800
इसको हमें वेदों से जानना है और वेदों में इसका स्पष्ट निर्देश है। वेदों में

276
00:18:58,800 --> 00:19:03,040
बताया गया है कि वास्तविकता में किसकी क्या स्थिति है। चैतन्य चरता में वर्णन

277
00:19:03,040 --> 00:19:06,400
आता है एकले ईश्वर कृष्ण और सब भ्रत

278
00:19:06,400 --> 00:19:10,560
एकमात्र ईश्वर परमेश्वर कौन है? कृष्ण है और सब क्या है? भ्रत।

279
00:19:10,560 --> 00:19:14,640
वृत्त मतलब होता है दास और सब सर्वेंट है। शिव जी

280
00:19:14,640 --> 00:19:18,800
भगवान के महान भक्त हैं। और शिव तत्व को समझने

281
00:19:18,800 --> 00:19:22,960
के लिए प्रभुपाद जी ने और भी जगह बहुत कुछ बोला है। शिव तत्व जो है वो

282
00:19:22,960 --> 00:19:26,960
जीव तत्व से ऊपर है। यानी ब्रह्मा जी के पोस्ट है। ब्रह्मा जी एक पद

283
00:19:26,960 --> 00:19:31,360
है। ब्रह्मा जी कोई व्यक्ति नहीं है। लेकिन शिव एक व्यक्तित्व

284
00:19:31,360 --> 00:19:35,520
है। और शिव को प्रभुपाद जी ने बताया शास्त्रों के आधार

285
00:19:35,520 --> 00:19:39,840
पर कि यह ब्रह्मा जी और कृष्ण के बीच की स्थिति

286
00:19:39,840 --> 00:19:43,920
है। अच्छा यानी शिव को आप यह भी नहीं बोल सकते कि ये

287
00:19:43,920 --> 00:19:48,160
पूर्ण भौतिक है या जीवात्मा है और ना उनको ये बोल सकते हैं कि ये

288
00:19:48,160 --> 00:19:52,400
पूर्ण ब्रह्म परब्रह्म परमात्मा है। तो ऐसा नहीं है कि हम शिव जी को मानते

289
00:19:52,400 --> 00:19:56,400
नहीं है। हम शिव जी का सम्मान करते हैं। वो महा भगवान के महान भक्त हैं। हम

290
00:19:56,400 --> 00:20:00,800
हनुमान जी का सम्मान करते हैं। वो हनुमान जी के महान भक्त हैं। आप देखेंगे हमारे कई मंदिरों

291
00:20:00,800 --> 00:20:04,800
में सीताराम, लक्ष्मण, हनुमान जी के आपको विग्रह मिलेंगे और हनुमान जी और

292
00:20:04,800 --> 00:20:08,800
शिव जी रुद्रावतार हैं। जी तो उनमें भेद नहीं

293
00:20:08,800 --> 00:20:12,960
है। तो ऐसा नहीं है कि हम उनको नहीं मानते या उनको उनका

294
00:20:12,960 --> 00:20:16,960
अपमान करते हैं या उनकी उपेक्षा करने वालों को मूर्ख कह दिया ना तो इससे आपको

295
00:20:16,960 --> 00:20:21,040
नहीं लगता कि पाखंडी पाखंडी कहा गया। ये मैं नहीं कह रहा। वेदों में अगर आप पढ़ेंगे,

296
00:20:21,040 --> 00:20:21,540
शास्त्रों

297
00:20:21,520 --> 00:20:25,840
को पढ़ेंगे तो शास्त्रों में यह बोला गया कि जो व्यक्ति भगवान को

298
00:20:25,840 --> 00:20:29,840
भगवान के समान अन्य देवी देवताओं को समझता है वो

299
00:20:29,840 --> 00:20:34,000
व्यक्ति पाखंडी है। जो व्यक्ति भगवान के समान समझता है। अच्छा

300
00:20:34,000 --> 00:20:38,000
मतलब ये जो शिव और दुर्गा है ये इनको अगर कोई भगवान के

301
00:20:38,000 --> 00:20:42,000
समान समझता है। शिव देवी देवता नहीं है। शिव देवी देवता

302
00:20:42,000 --> 00:20:46,160
से ऊपर है। देवी देवता अलग हैं। भगवान से श्री कृष्ण भगवान से

303
00:20:46,160 --> 00:20:50,400
देखिए बात वही फिर आ जाएगी कि अभी हमारा लेवल नहीं है। चर्चा करने का क्योंकि हम

304
00:20:50,400 --> 00:20:54,400
अगर हम जनरल पब्लिक को कुछ बोलेंगे तो वो समझ नहीं पाएगा। तो उसको वो समझने

305
00:20:54,400 --> 00:20:58,560
के लिए उस चेतना पे आना समझने में आता है कि परम वैष्णव शिव जी हैं। हां परम

306
00:20:58,560 --> 00:21:02,720
वैष्णव है और उनका स्थान अलग है। वो देवी उनको देवी देवता

307
00:21:02,720 --> 00:21:06,960
नहीं बोल सकते। देवी देवता तो पद है। जैसे सूर्य चंद्र ये पद है। जैसे

308
00:21:06,960 --> 00:21:11,120
मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री ये पद है। जी। इस पद पर आज कोई बैठा है। कल कोई

309
00:21:11,120 --> 00:21:15,120
बैठा होगा। तो इसी तरीके से जो सूर्य हैं, चंद्र हैं इन पर आज कोई व्यक्ति

310
00:21:15,120 --> 00:21:19,280
बैठा हुआ है। कल कोई बैठेगा। इंद्र पद है। जी। वर्तमान समय में इंद्र

311
00:21:19,280 --> 00:21:23,520
कौन है? तो शास्त्रों में ऐसा बताया गया। अगर हम शास्त्रों

312
00:21:23,520 --> 00:21:27,600
को पढ़ेंगे, समझेंगे, जानेंगे तो ये सब क्लियर है। ठीक है?

313
00:21:27,600 --> 00:21:31,600
तो मतलब ये कह सकते हैं कि शिव जी

314
00:21:31,600 --> 00:21:35,680
का और दुर्गा जी का नाम श्री कृष्ण के समान समझना नहीं

315
00:21:35,680 --> 00:21:36,800
चाहिए। हां

316
00:21:36,800 --> 00:21:40,800
शिव जी के समान उनको नहीं भगवान एक है परमात्मा

317
00:21:40,800 --> 00:21:45,040
एक है जी शिव जी को अगर कोई कृष्ण के समान सोचता

318
00:21:45,040 --> 00:21:49,040
है कि एक ही बात है भगवान कृष्ण कहो या शिव कहो एक ही बात है तब वो

319
00:21:49,040 --> 00:21:53,280
ठीक नहीं अच्छा लेकिन शिव से जो द्रोह करता है शिव

320
00:21:53,280 --> 00:21:57,360
जी का जो अपमान करता है शिव जी की जो उपेक्षा करता है उससे भगवान प्रसन्न नहीं होते

321
00:21:57,360 --> 00:22:01,680
उसे कभी भगवान की भक्ति नहीं मिलेगी जी अच्छा गुरुदेव

322
00:22:01,680 --> 00:22:05,840
एक ये जो शब्द आता है कि परम वैष्णव शिव

323
00:22:05,840 --> 00:22:09,920
जी परम वैष्णव है। इसको थोड़ा सा प्रकाश डालिए कि क्या है? देखिए वैष्णव

324
00:22:09,920 --> 00:22:14,080
एक होता है वैष्णव। वैष्णव मतलब बोलते हैं जो भगवान का भक्त है।

325
00:22:14,080 --> 00:22:18,240
भगवान के आदेशों के अनुसार जीवन जीता है। तो शिव जी को परम बोला जाता।

326
00:22:18,240 --> 00:22:22,640
शिव जी का और कोई उद्देश्य नहीं है। शिव जी सर्वश्रेष्ठ भगवान

327
00:22:22,640 --> 00:22:26,720
के भक्त हैं। अच्छा। अच्छा। ठीक है ना? अच्छा। परम मतलब बहुत श्रेष्ठ।

328
00:22:26,720 --> 00:22:30,880
मतलब उनसे श्रेष्ठ और कोई भक्त नहीं है। नहीं ऐसा नहीं कहेंगे। वो फिर वो एक डी

329
00:22:30,880 --> 00:22:34,960
विषय हो [हंसी] जाएगा। लेकिन क्योंकि एक्चुअली भगवत गीता

330
00:22:34,960 --> 00:22:39,040
के भाष्य में प्रभुपाद जी लिखते हैं कि शिव से परम

331
00:22:39,040 --> 00:22:43,040
और कोई भक्त को वहां मेंशन किया उन्होंने शिव जी से शिव जी

332
00:22:43,040 --> 00:22:47,040
से परम कोई हरिदास ठाकुर जी हैं उनको परम भक्त कहा है शिव जी से भी

333
00:22:47,040 --> 00:22:51,040
ऊपर हां तो ढेरों और भक्त बहुत भक्त मतलब शिव जी परम वैष्णव

334
00:22:51,040 --> 00:22:52,240
नहीं है फिर

335
00:22:52,240 --> 00:22:56,480
से परम वैष्णव नहीं शिव जी भगवान के महान भक्त हैं और वो भगवान

336
00:22:56,480 --> 00:23:00,800
के बहुत देखिए जैसे इसको ऐसे समझ सकते हैं कि भगवान

337
00:23:00,800 --> 00:23:04,960
को प्रेम करना करने वाली अनंत जीवात्माएं हैं। जी और

338
00:23:04,960 --> 00:23:09,040
उन अनंत जीवात्माओं में हर व्यक्ति का अपना अपना

339
00:23:09,040 --> 00:23:13,120
स्थान है। जी अब उनमें कुछ बहुत ऊपर लेवल पर

340
00:23:13,120 --> 00:23:17,440
है। तो जो बहुत ऊपर लेवल पर हैं उनमें भी बहुत वैरायटी है।

341
00:23:17,440 --> 00:23:21,520
जी तो इस तरह से हम देखेंगे अगर बहत भाव पढ़ेंगे

342
00:23:21,520 --> 00:23:25,520
और ग्रंथ पढ़ेंगे आचार्यों के ट गोस्वामियों के तो वहां आपको

343
00:23:25,520 --> 00:23:29,520
पता चलता है कि नहीं इनसे बड़े भक्त ये हैं। इनसे बड़े भक्त ये है उनसे

344
00:23:29,520 --> 00:23:33,760
बड़े भक्त ये हैं। और फाइनली पता चलता है कि नहीं सबसे बड़ी भक्त तो राधा रानी

345
00:23:33,760 --> 00:23:37,760
है। वह भगवान की महान भक्त हैं। उनसे बड़ा कोई भक्त नहीं है। तो

346
00:23:37,760 --> 00:23:41,840
मतलब शिव जी को परम वैष्णव माने या ना माने? नहीं निश्चित रूप से परम वैष्णव है।

347
00:23:41,840 --> 00:23:45,920
परम वैष्णव फिर हरिदास जी से तुलनात्मक रूप में उनको ऐसे मतलब

348
00:23:45,920 --> 00:23:50,000
क्या उसको समझाने के लिए प्रभुपाद जी ने कोई एक सिद्धांत दिया। उसके

349
00:23:50,000 --> 00:23:54,160
आधार पर यह बताया है कि हरिदास जी को बोला कि हरिदास जी इतने समर्पित

350
00:23:54,160 --> 00:23:58,320
थे कि उनको एक वैश्या पहुंचती है और वो उनको अप्रोच करती है अपना

351
00:23:58,320 --> 00:24:02,800
संग करने के लिए रात्रि के समय में अकेली पहुंचती है लेकिन नानाचार्य

352
00:24:02,800 --> 00:24:06,800
हरिदास ठाकुर विचलित नहीं होते अच्छा अच्छा बल्कि वो उसको

353
00:24:06,800 --> 00:24:07,440
भक्त बना

354
00:24:07,440 --> 00:24:11,440
देते हैं और शिवजी कैसे मतलब तो शिवजी के विषय में शिव जी की

355
00:24:11,440 --> 00:24:15,840
स्थिति भी साधारण स्थिति नहीं है। लेकिन अगर शिवजी के विषय में अह शास्त्रों

356
00:24:15,840 --> 00:24:19,920
में पढेंगे तो जब मोहिनी अवतार का दर्शन शिवजी बोलते हैं कि भाई

357
00:24:19,920 --> 00:24:23,920
आप मुझे अपना मोहिनी अवतार दिखाइए। तो भगवान कहते हैं नहीं तुम मोहिनी अवतार

358
00:24:23,920 --> 00:24:28,080
मत दो। तो शिव जी बोलते हैं नहीं मुझे आपका मोहिनी अवतार देखना है। वो बहुत सुंदर है। तो जब भगवान

359
00:24:28,080 --> 00:24:32,240
अपना मोहिनी अवतार लेते हैं तो पता चलता है शिवजी विचलित हो जाते हैं

360
00:24:32,240 --> 00:24:36,240
और उनके पीछे भागने लगते हैं। अच्छा। तो कहने का तात्पर्य है उस

361
00:24:36,240 --> 00:24:40,560
दृष्टांत को दिखाने के लिए प्रभुपाद जी ने एक बात बोली कि जो भगवान

362
00:24:40,560 --> 00:24:44,800
शिवजी उसको कंट्रोल नहीं कर पाए। शिव जी वहां कंट्रोल नहीं कर पाए

363
00:24:44,800 --> 00:24:49,360
और हरिदास जी ने कंट्रोल कर लिया। तो इस बात को समझाने के लिए ये बात बोली

364
00:24:49,360 --> 00:24:53,360
लेकिन शिव जी का स्थान कोई काम स्थान नहीं है। ऐसा सोचना कि नहीं वो

365
00:24:53,360 --> 00:24:57,760
हरिदास जी से छोटे हैं या हरिदास जी उनसे बड़े हैं। ये नहीं एक दृष्टांत

366
00:24:57,760 --> 00:25:02,800
देने के लिए बताया। वो भागवतम में कहा है ना कि जैसे यहां जो

367
00:25:02,800 --> 00:25:08,000
श्रीमद् भागवत में भगवत गीता में कहा प्रभुपाद जी ने कि

368
00:25:08,000 --> 00:25:12,000
शिव जी को जब पार्वती माता ने कामदेव ने उनको

369
00:25:12,000 --> 00:25:16,080
जब वो किया था तो प्रेरित तो पार्वती माता के समझाने पर वो

370
00:25:16,080 --> 00:25:21,040
मान गए थे और हरिदास ठाकुर जी नहीं माने थे ये दृष्टांत दिया था वही तो

371
00:25:21,040 --> 00:25:22,720
एक दूसरा दृष्टांत भी मैंने और बताया

372
00:25:22,720 --> 00:25:26,960
हां मोहिनी जी वाला मोहिनी वाला उसके अलावा ये भी तो कहने का तात्पर्य केवल इतना

373
00:25:26,960 --> 00:25:31,040
सा है कि आचार्य कुछ बोल रहे हैं तो वह कुछ प्रसंग से

374
00:25:31,040 --> 00:25:35,120
कुछ समझाने की बात कर रहे हैं। किसी बात को पकड़ कर के खींचना या

375
00:25:35,120 --> 00:25:39,200
उसको अलग तरीके जैसे राम जनमानस क्या करता है? वो बात को पकड़ता

376
00:25:39,200 --> 00:25:43,280
है। बोले अरे ऐसा कैसे हो गया? हरिदास ठाकुर कौन है? शिवजी से बड़ा कौन भक्त है?

377
00:25:43,280 --> 00:25:47,360
चारों तरफ शिव जी के मंदिर हैं। शिव जी की इतनी आराधना है। सनातन धर्म में शिव

378
00:25:47,360 --> 00:25:51,360
जी का कितना ऊंचा स्थान है। और आप कह रहे हैं कि हरिदास ठाकुर उनसे बड़े

379
00:25:51,360 --> 00:25:55,360
हैं। तो ये आम व्यक्ति नहीं समझ पाता है कि क्या ये क्या बोल दिया? ऐसा थोड़ी होता

380
00:25:55,360 --> 00:25:59,680
है। लेकिन हमें समझना होगा कि एक भक्त, एक संत प्रभुपाद

381
00:25:59,680 --> 00:26:03,760
जी किस आधार पर क्या बताना चाह रहे हैं। क्या मैसेज देना चाह रहे हैं? क्या समझाना

382
00:26:03,760 --> 00:26:07,840
चाह रहे हैं? वो हमें थोड़ा सा समझना होगा। लेकिन ऐसा नहीं है कि

383
00:26:07,840 --> 00:26:11,920
शिव जी की स्थिति कोई छोटी स्थिति है या वो छोटी नहीं है पर एक

384
00:26:11,920 --> 00:26:16,000
समय पर जाकर के हरिदास से कहीं ना कहीं वो उस परिपेक्ष में जिस घटना

385
00:26:16,000 --> 00:26:20,000
को लेकर के वो समझा रहे हैं। हरिदास जी ने कंट्रोल कर लिया इंद्रियों को और शिव

386
00:26:20,000 --> 00:26:24,160
जी नहीं कर पाए। उस समय हां ये बात बताने की जी। अच्छा तो

387
00:26:24,160 --> 00:26:28,560
आगे चलेंगे एक एक दूध दही वाला उदाहरण बहुत ख्यापित है हमारे

388
00:26:28,560 --> 00:26:32,880
शिव जी को जी शिव जी को लेकर के जिस प्रकार कृष्ण

389
00:26:32,880 --> 00:26:37,040
जी जिस प्रकार दूध से दही बन जाता है मगर दही से दूध नहीं बनता है उसी

390
00:26:37,040 --> 00:26:38,160
प्रकार

391
00:26:38,160 --> 00:26:42,320
श्री कृष्ण तो शंकर भगवान बन सकते हैं मगर शंकर जी पुनः श्री कृष्ण

392
00:26:42,320 --> 00:26:46,720
नहीं बन सकते बिल्कुल सही बात ये कैसे है और कहां से है ये शास्त्र में चैतन्य

393
00:26:46,720 --> 00:26:50,720
महाप्रभु ने इसको समझाने का प्रयास किया कि अचिंत

394
00:26:50,720 --> 00:26:54,960
भेदाभव दर्शन दिया अचिंत भदा वेद का मतलब होता है है भी और

395
00:26:54,960 --> 00:26:59,520
नहीं भी है। कृष्ण शिव है भी और नहीं भी है।

396
00:26:59,520 --> 00:27:03,840
तो लोगों ने पूछा कैसे है? कैसे नहीं है? तो उन्होंने उदाहरण दिया कि दूध

397
00:27:03,840 --> 00:27:08,080
से दही बनाया जा सकता है। तो जब दूध से जो दही बना है

398
00:27:08,080 --> 00:27:12,160
अगर दही को पूछा जाए कि उसमें क्या कंटेंट है? तो आप क्या कहेंगे? दूध ही तो है।

399
00:27:12,160 --> 00:27:16,160
जी केवल दही में और दूध में भेद क्या है? जाम का।

400
00:27:16,160 --> 00:27:20,160
बिल्कुल। उसमें जाम पड़ते ही वो दही बन जाता है। लेकिन है तो वो दूध का

401
00:27:20,160 --> 00:27:24,480
ही कंटेंट। तो दूध दही को भी दूध बोला जा सकता है। एक तरह से दही

402
00:27:24,480 --> 00:27:28,640
दूध है भी और नहीं भी है। जी जी जी तो दूध से दही बन सकता है।

403
00:27:28,640 --> 00:27:32,720
लेकिन अगर आप दही से दूध बनाना चाहो नहीं बन सकता तो नहीं बन सकता। इसी बात

404
00:27:32,720 --> 00:27:36,880
को समझाने के लिए बोला कि कृष्ण ये चैतन महाप्रभु ने मतलब मुझे लगता

405
00:27:36,880 --> 00:27:41,280
था कि ब्रह्म संहिता का श्लोक है ऐसा कुछ दूध दही वाला। नहीं एक्चुअली

406
00:27:41,280 --> 00:27:45,600
एक्सप्लेन करने के लिए आचार्यों ने चैतन्य महाप्रभु जी ने भी बोला है।

407
00:27:45,600 --> 00:27:50,320
ब्रह्म संहिता से आचार्यों ने कई तरह समझाया। अच्छा मतलब नहीं ये चरितामृत

408
00:27:50,320 --> 00:27:53,200
में भी है या फिर ब्रह्म संहिता में है? नहीं ब्रह्म

409
00:27:53,200 --> 00:27:57,280
संहिता में है। इसको एक्सप्लेन करने के लिए महाप्रभु ने अन्य आचार्यों ने

410
00:27:57,280 --> 00:28:01,360
सब लोगों ने इसको एक्सप्लेन किया। अच्छा अच्छा तो यहां पर

411
00:28:01,360 --> 00:28:05,600
एक क्वेश्चन ये बनता है गुरुदेव कि जैसे हमारे ईश्वर

412
00:28:05,600 --> 00:28:09,760
के लिए कहा गया पूर्ण ईश्वर ईश्वर अबाध्य है। कुछ भी कर सकता है।

413
00:28:09,760 --> 00:28:13,760
तो जब हम उसके सामने लगा देते हैं कि वो यह बन करके ही वापस नहीं बन

414
00:28:13,760 --> 00:28:17,840
सकता तो फिर यह अबाध्य हो गया। क्योंकि बृहधारण्य उपनिषद का एक ऐसे नियम

415
00:28:17,840 --> 00:28:22,240
है कि ईश्वर वही है जो जिसके सामने कोई लिमिट ना लग पाए। बाध

416
00:28:22,240 --> 00:28:26,400
बाधित नहीं हो सकता ईश्वर हमारा पूर्ण ईश्वर श्री कृष्ण भगवान

417
00:28:26,400 --> 00:28:30,400
कुछ भी कर सकते हैं। तो यहां पर हम कहीं ना कहीं उन्हें बाधित कर रहे हैं कि जैसे अब

418
00:28:30,400 --> 00:28:34,400
दही तो भाई पूर्ण नहीं है। वो तो अपूर्ण है। अब यहां पर श्री कृष्ण को

419
00:28:34,400 --> 00:28:38,640
हम बाधित कर रहे हैं कि वो शंकर बनने के बाद पुनः श्री कृष्ण नहीं बन सकते।

420
00:28:38,640 --> 00:28:42,720
तो यह एक ऐसा आता रहता है सवाल इस तरह से। एक बार फिर से

421
00:28:42,720 --> 00:28:46,800
रिपीट करिए अपना प्रश्न। जैसे हम सनातन धर्म का जो कांसेप्ट

422
00:28:46,800 --> 00:28:50,800
है पूर्ण ईश्वर वाला जिसमें जैसे अन्य जो पंथ हैं उसमें

423
00:28:50,800 --> 00:28:55,440
ईश्वर अवतार नहीं ले सकता यह नहीं कर सकता वो नहीं मगर हमारा क्या है कि

424
00:28:55,440 --> 00:28:59,520
ईश्वर ने कुछ भी कुछ भी का मतलब वो कुछ भी कर सकते हैं सब कुछ कर सकते हैं कहीं

425
00:28:59,520 --> 00:29:03,760
पे भी बाधित नहीं होते वो तो यही सर्वोच्च ईश्वर की सबसे बड़ी पहचान

426
00:29:03,760 --> 00:29:07,840
है कि वो बाधित नहीं हो सकता लिमिटेड नहीं हो सकता अनलिमिटेड है कुछ भी कुछ भी

427
00:29:07,840 --> 00:29:08,400
का मतलब कुछ

428
00:29:08,400 --> 00:29:12,400
नहीं अच्छा इस चीज को उपनिषद भी हमारे मानते हैं वेद भी मानते हैं कि वो बाधित नहीं हो

429
00:29:12,400 --> 00:29:16,400
सकता सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर तो यहां पर हम जब दूध दही

430
00:29:16,400 --> 00:29:20,640
से उनकी तुलना कर रहे हैं कि जिस प्रकार दूध से दही पुनः वापस दूध नहीं बन सकता

431
00:29:20,640 --> 00:29:24,960
उस उसी प्रकार श्री कृष्ण भी शंकर बनने के बाद पुनः कृष्ण नहीं बन सकते।

432
00:29:24,960 --> 00:29:29,120
तो यहां ना सकते वाला आ गया ही कांट। [हंसी] और सनातन धर्म

433
00:29:29,120 --> 00:29:33,360
के ईश्वर के सामने वही है कि ये नहीं लिखा जा सकता कि ही कांट डू इट। हां। तो देखिए समझने

434
00:29:33,360 --> 00:29:37,600
वाली बात यह है जब भी कोई भौतिक उदाहरण दिया जाता है तो वो केवल

435
00:29:37,600 --> 00:29:41,840
समझाने देखिए पहले तो यह बात समझना बहुत आवश्यक है। ईश्वरी विषय

436
00:29:41,840 --> 00:29:45,840
जो है ना वो अचिंत है। अचिंत का मतलब क्या होता

437
00:29:45,840 --> 00:29:50,160
है? विचारणीय नहीं है। हां जो आपकी बुद्धि से, आपकी

438
00:29:50,160 --> 00:29:54,560
सोच से, आपकी मन की पहुंच से परे है। हम

439
00:29:54,560 --> 00:29:58,560
तो इसको अचिंत बोला जाता है। तो अचिंत विषय को

440
00:29:58,560 --> 00:30:02,560
मानसिक चिंतन द्वारा एग्जैक्ट नहीं समझा जा सकता कभी भी। नहीं

441
00:30:02,560 --> 00:30:06,640
तो यहां पे ये दूध दही से उनका करें मिलान या ना करें। नहीं वो समझने

442
00:30:06,640 --> 00:30:10,800
के लिए जब किसी को कोई बात आपको बतानी है अब जो विषय अचिंत है और

443
00:30:10,800 --> 00:30:14,800
लोग चिंतन करना चाहते है लोग तर्क के आधार पर समझना चाहते हैं तब निश्चित

444
00:30:14,800 --> 00:30:18,880
रूप से उन्हें एक्सप्लेन करने के लिए भौतिक उदाहरण देके बात समझाई जाती है नहीं

445
00:30:18,880 --> 00:30:23,120
तो इसको निराधार माने या क्या माने कि ये ये इसको जैसे आप जैसे

446
00:30:23,120 --> 00:30:23,620
कोई

447
00:30:23,520 --> 00:30:27,600
हमारे गुरुदेव हम समझा रहे हैं किसी को डिवोटी को तो उसमें ये इसको

448
00:30:27,600 --> 00:30:31,840
तर्क को ले एक्सेप्ट करे या ना करें मतलब उसमें फिर बात ये तर्क निश्चित

449
00:30:31,840 --> 00:30:35,920
रूप से स्वीकार किया जाए गुरुजनों ने बोला है देखिए पहली चीज तो यह है कि हम

450
00:30:35,920 --> 00:30:40,000
लोग आचार्यों को फॉलो करते हैं। ठीक है ना? और हम लोग एक

451
00:30:40,000 --> 00:30:45,040
दूसरे को प्रभु संबोधित करते हैं। तो आप प्रभु बोलेंगे तो वो ज्यादा

452
00:30:45,040 --> 00:30:49,120
अच्छा होगा। और हमारे गुरु जो है वो परम पूज्य गोपाल कृष्ण गोस्वामी महाराज जी हैं।

453
00:30:49,120 --> 00:30:53,200
हमारे आचार्य प्रभुपाद जी हैं। तो गुरु एक बहुत बड़ा व्यापक

454
00:30:53,200 --> 00:30:57,200
शब्द है। वो अलग बात है कि गुरुजन बड़ी दयालता करके हम लोगों को कोई

455
00:30:57,200 --> 00:31:01,280
जिम्मेदारी देते हैं तो वो और हम उस पर सेवा करते हैं

456
00:31:01,280 --> 00:31:05,520
और उस पर कार्य करते हैं। तो ये समझना बहुत आवश्यक है। तो हम लोग एक दूसरे

457
00:31:05,520 --> 00:31:09,600
को प्रभु बोलते हैं। हम अपने को गुरु नहीं मानते। हम अपने को भगवान

458
00:31:09,600 --> 00:31:13,600
का सेवक और गुरु का दास मानते हैं। अच्छा अच्छा। तो कहने का

459
00:31:13,600 --> 00:31:17,760
तात्पर्य है कि जो आपने कहा कि हम दही दूध दही बोले

460
00:31:17,760 --> 00:31:21,760
कि ना बोले निश्चित रूप से बोलिए नहीं बोलेंगे तो समझेंगे कैसे लोग

461
00:31:21,760 --> 00:31:25,840
लेकिन इसके साथ-साथ ये भी बोलिए कि ये अचिंत विषय है

462
00:31:25,840 --> 00:31:29,920
इसको एग्जैक्ट तुलना करने की कोशिश मत करो अच्छा

463
00:31:29,920 --> 00:31:33,920
अच्छा मतलब एक कैजुअली इसको मान सकते हैं कि बच्चों को

464
00:31:33,920 --> 00:31:37,920
जैसे समझाने के लिए हम कुछ भी उदाहरण दे देते हैं बाकी इसका कोई मीनिंग नहीं

465
00:31:37,920 --> 00:31:38,960
है। इसको समझाने

466
00:31:38,960 --> 00:31:42,960
के लिए बताया गया कि शिव जी और कृष्ण में और भगवान में क्या भेद

467
00:31:42,960 --> 00:31:46,960
है इसको कैसे समझा जाए। हां ठीक है जी जी ठीक है

468
00:31:46,960 --> 00:31:52,620
आगे चलते हैं गुरुदेव एक आता है

469
00:31:52,620 --> 00:31:56,720
[हंसी] सॉरी प्रभु जी एक ये भी आता है निकल कर के

470
00:31:56,720 --> 00:32:00,720
कि जैसे क्या श्रीमद् भागवतम

471
00:32:00,720 --> 00:32:04,800
पुराण का कोई विशेष महत्व है 18 महापुराणों में या

472
00:32:04,800 --> 00:32:09,280
सभी पुराण बराबर है श्रीमद् भागवत पुराण का विशेष

473
00:32:09,280 --> 00:32:13,280
महत्व है और इसे मैं नहीं डिक्लेअ कर रहा हूं इसे स्वयं

474
00:32:13,280 --> 00:32:17,440
जिन्होंने ने लिखा है वो डिक्लेअर कर रहे हैं वेदव्यास जी। अच्छा अच्छा क्योंकि वेदव्यास

475
00:32:17,440 --> 00:32:21,600
जी ने जब 17 पुराण लिख लिए फिर भी अशांत

476
00:32:21,600 --> 00:32:25,680
थे। वेद, पुराण, उपनिषद सब लिख चुके हैं लेकिन फिर भी अशांत है। फिर

477
00:32:25,680 --> 00:32:29,920
भी उनको शांति नहीं मिल रही है। तो वो अपने गुरु का ध्यान करते हैं। जी।

478
00:32:29,920 --> 00:32:33,920
तो नारद मुनि प्रकट होते हैं और फिर उनको चतुश्लोकी

479
00:32:33,920 --> 00:32:38,080
भागवत सुनाते हैं। अच्छा। और फिर वो चतुश्लोकी भागवत को 18,000 श्लोकों

480
00:32:38,080 --> 00:32:42,160
में एक्सप्लेन करते हैं। और जब भागवत की रचना करते हैं

481
00:32:42,160 --> 00:32:46,560
तब वो पूर्ण रूप से शांत और आनंद का अनुभव करते हैं। अच्छा

482
00:32:46,560 --> 00:32:50,560
तो श्रीमद् भागवत वेदव्यास जी ने

483
00:32:50,560 --> 00:32:54,080
बड़ी ही परिपक्व अवस्था और अपने

484
00:32:54,080 --> 00:32:58,160
गुरु के निर्देशन में उसको एक्सप्लेन किया और उसको बताया। तो भागवत

485
00:32:58,160 --> 00:33:02,160
का सभी पुराणों से सभी वेद पुराण उपनिषद उन सब का सार

486
00:33:02,160 --> 00:33:06,240
है। भागवत जो है इसीलिए भागवत को सर्वश्रेष्ठ बोला जाता है। वो भी

487
00:33:06,240 --> 00:33:10,240
है पुराण लेकिन उसको महापुराण बोलते हैं और उसका बहुत विशेष

488
00:33:10,240 --> 00:33:14,240
स्थान है। अच्छा गुरुदेव जैसे प्रभु

489
00:33:14,240 --> 00:33:18,560
जी प्रभु जी जैसे हमारे 18 पुराणों की जब हम

490
00:33:18,560 --> 00:33:22,560
सूची को चेक करते हैं। जैसे देवी भागवत में आई है वो सूची। नारद पुराण में

491
00:33:22,560 --> 00:33:26,800
आई है। भागवत पुराण में भी अंत में तो उसमें सूची में वो अंत में नहीं आता है।

492
00:33:26,800 --> 00:33:31,040
वो मध्य में आता है। एक तो यह कंट्राडिक्शन हो गया। सूची में

493
00:33:31,040 --> 00:33:35,440
भागवत मध्य में भागवत पुराण मध्य में आता है। एक तो ये शंका

494
00:33:35,440 --> 00:33:39,440
संशय का विषय आ गया। दूसरा यह आ गया कि भागवत

495
00:33:39,440 --> 00:33:43,680
नाम के दो पुराण हैं। देवी भागवत और श्रीमद् भागवत। यह

496
00:33:43,680 --> 00:33:47,680
जो श्री कृष्ण बाला है और 18 महापुराणों में जो नाम मेंशन है

497
00:33:47,680 --> 00:33:51,760
वह सिर्फ भागवत मेंशन है। उसमें ना तो देवी भागवत कहा गया है तो ना ही ना

498
00:33:51,760 --> 00:33:56,560
ही उसमें श्रीमद् भागवत कहा गया है। तो जैसे वैष्णवाचार्य वैष्णवाचार्य

499
00:33:56,560 --> 00:34:00,560
माधवाचार्य शास्त्री जी ये कोट करते हैं कि एक ही पुराण के दो पार्ट

500
00:34:00,560 --> 00:34:04,800
हैं। एक देवी भागवत है और एक श्रीमद्

501
00:34:04,800 --> 00:34:08,960
भागवत है। अच्छा श्रीमद् जो देवी भागवत है उसमें भी ये चीज है कि

502
00:34:08,960 --> 00:34:09,460
उनका

503
00:34:09,280 --> 00:34:13,440
असंतुष्टि दिखाई गई है। ये हमारे महर्षि वेदव्यास

504
00:34:13,440 --> 00:34:17,440
जी की जो तो ये फिर संशय का विषय आ जाता है और अगर हम

505
00:34:17,440 --> 00:34:21,600
इनको दोनों को पुराणों को एक नहीं मानेंगे देवी भागवत को श्रीमद्

506
00:34:21,600 --> 00:34:25,600
भागवत को तो हमारे पुराण 18 से हो जाएंगे 19 तो वो हमारी

507
00:34:25,600 --> 00:34:29,840
सूची कैंसिल हो जाएगी। उस पे फिर प्रश्न चिन्ह उड़ जाएगा। तो इसको कैसे हम समझे?

508
00:34:29,840 --> 00:34:34,240
देखिए मूल बात यह है मैं यह कहना चाहूंगा कि जो जनरल आम व्यक्ति

509
00:34:34,240 --> 00:34:38,560
है वो इन सूची में इन नामों में इनमें

510
00:34:38,560 --> 00:34:42,640
ना फंस करके वह पहले मूल चेतना में आए क्योंकि हम

511
00:34:42,640 --> 00:34:46,720
अगर जनरल व्यक्ति को कुछ चर्चा करेंगे ना और उसका

512
00:34:46,720 --> 00:34:50,800
वह स्तर है नहीं वह उसको समझ नहीं सकता तो वो उस व्यक्ति को उसको स्वीकार नहीं

513
00:34:50,800 --> 00:34:54,880
कर पाएगा सबसे बेहतर ये है सबसे बेहतर तरीका जो हमारे आचार्यों ने

514
00:34:54,880 --> 00:34:59,040
बोला पहले जैसे चैतन्य महाप्रभु जो कि स्वयं भगवान है

515
00:34:59,040 --> 00:35:04,160
जी उनके गुरु ने उनसे क्या कहा जी कि तुम मूर्ख हो

516
00:35:04,160 --> 00:35:08,480
तुम भगवान का नाम जप करो जी जी ठीक है

517
00:35:08,480 --> 00:35:12,880
तो जब स्वयं भगवान भगवान श्री कृष्ण जो कि ज्ञान के स्रोत

518
00:35:12,880 --> 00:35:17,600
हैं और वो जब प्रकाश वाराणसी में आते हैं

519
00:35:17,600 --> 00:35:21,920
आचार्यों के बीच में जो वेदांती है तो वहां जाकर के जब वो पहुंचते

520
00:35:21,920 --> 00:35:24,320
हैं और लोग उनको बोलते हैं कि अरे ये क्या

521
00:35:24,320 --> 00:35:28,320
तुम नाचते हो गाते हो रोते हो कीर्तन करते हो ये क्या कुछ वेदांत पे चर्चा करो

522
00:35:28,320 --> 00:35:32,320
कुछ वेदों पे चर्चा करो कुछ तर्क वितर्क करो चीजों को आप करो आप तो

523
00:35:32,320 --> 00:35:37,920
इतने विद्वान आप कर सकते हो तो वो क्या बोलते हैं मेरे गुरु ने मुझसे बोला है कि तुम मूर्ख हो

524
00:35:37,920 --> 00:35:42,000
तुम भगवान के पवित्र नाम का जाप करो। तुम में इतना बुद्धि नहीं है

525
00:35:42,000 --> 00:35:46,000
कि तुम इन वेदों को पढ़ सको। इन पर चिंतन कर सको। इन मनन कर सको। इसमें

526
00:35:46,000 --> 00:35:50,080
बाल की खाल निकलेगी। तुम्हारे बहुत सारे प्रश्न होंगे और तुम कंफ्यूज होगे और तुम फिर किसी लायक

527
00:35:50,080 --> 00:35:54,400
नहीं रहोगे। इसीलिए अगर आप देखोगे चैतन्य महाप्रभु ने केवल हमें आठ श्लोक

528
00:35:54,400 --> 00:35:58,560
दिए। अच्छा शिक्षाष्टकम और उन्होंने कोई वेद, पुराण, उपनिषद,

529
00:35:58,560 --> 00:36:02,960
बहुत कुछ लिख के कुछ बहुत सारे ग्रंथ नहीं दिए। केवल उन्होंने आठ श्लोक दिए। इन आठ श्लोकों

530
00:36:02,960 --> 00:36:07,440
को बस कोई मान ले इन पर चल ले उसको जीवन का लक्ष्य मिल जाएगा।

531
00:36:07,440 --> 00:36:11,920
तो मेरा कहना यह है कि हम जनरल पब्लिक में जो भी तर्क

532
00:36:11,920 --> 00:36:15,920
वितर्क भागवत पुराण इसमें यह इसको यह वहां यह इन

533
00:36:15,920 --> 00:36:20,000
सब में ना पड़ के अगर हम कलयुग के मूल धर्म को समझे और

534
00:36:20,000 --> 00:36:24,000
उसको स्वीकार करें तो मनुष्य लक्ष्य जल्दी मिलेगा। मनुष्य जीवन का

535
00:36:24,000 --> 00:36:28,080
जो मूल लक्ष्य है वो जल्दी मिलेगा। नहीं वह तो ठीक है गुरु प्रभु जी मगर अभी जैसे

536
00:36:28,080 --> 00:36:32,240
आपने एक बात कही कि भागवतम पुराण श्रेष्ठ है तो उसको श्रेष्ठ माने

537
00:36:32,240 --> 00:36:36,320
या ना माने अगर माने तो फिर देवी भागवत भी उसी के तुल्य हो गई

538
00:36:36,320 --> 00:36:39,440
बराबर आ गई या फिर उसको क्या मतलब 19 पुराण माने

539
00:36:39,440 --> 00:36:44,080
18 माने फिर वो एक संशय बना रहेगा फिर संशया आत्मा विनश्यति

540
00:36:44,080 --> 00:36:48,080
भगवान श्री कृष्ण ने कहा [हंसी] चार में देखिए ऐसा है ना संशय

541
00:36:48,080 --> 00:36:52,160
आत्मा विनश्यति लेकिन आत्मा को ये समझना होगा कहां संशय करना है कहां नहीं

542
00:36:52,160 --> 00:36:56,320
करना है और संशय में भी प्रश्न जो हम करते हैं वो अलग-अलग स्तर

543
00:36:56,320 --> 00:37:00,480
पर अलग कई बार क्या होता है जब हम प्रश्न करते हैं गुरु से और

544
00:37:00,480 --> 00:37:04,720
गुरुजन क्या करते हैं हमें उसका उत्तर नहीं देते तो उसके दो कारण है

545
00:37:04,720 --> 00:37:08,880
एक कारण ये है कि वो जानते हैं कि अभी इस प्रश्न को समझने के

546
00:37:08,880 --> 00:37:13,440
ये योग्य नहीं है या वो उस विषय पर अभी चर्चा

547
00:37:13,440 --> 00:37:17,920
करना उचित नहीं समझते इसलिए मैं आपको सिंपल सी एक बात बोलूंगा कि

548
00:37:17,920 --> 00:37:22,000
हम कोई भी विषय को कुछ भी ऐसा नहीं बोलना चाहते जिसको कोई

549
00:37:22,000 --> 00:37:26,000
व्यक्ति अलग परिपेक्ष में देखे अच्छा अच्छा जो शास्त्र में

550
00:37:26,000 --> 00:37:30,240
बोला गया जो वेदव्यास जी ने कहा जो नारद मुनि ने

551
00:37:30,240 --> 00:37:34,320
बोला हम और जो हमारे माधवाचार्य ने कहा जो हमारे

552
00:37:34,320 --> 00:37:38,320
प्रमाणित आचार्यों ने बोला उस चीज को हम आपको रिपीट कर रहे हैं और

553
00:37:38,320 --> 00:37:42,400
उसी बात को बोल रहे हैं कि हम इतना समझे कि श्रीमद् भागवत

554
00:37:42,400 --> 00:37:46,640
पुराण सर्वश्रेष्ठ पुराण है। मतलब ये जो

555
00:37:46,640 --> 00:37:50,800
सवाल आएगा अगर पढ़ने पर तो इस पर ध्यान ना दें और अपनी

556
00:37:50,800 --> 00:37:54,720
बुद्धि को कृष्णा कॉन्शियसनेस में लगाएं। हां क्योंकि बुद्धि में तो बहुत सारे सवाल

557
00:37:54,720 --> 00:37:58,800
आएंगे। अगर हम उन सवालों की खोज में उनकी बाल की खाल में जाएंगे तो

558
00:37:58,800 --> 00:38:02,880
निश्चित रूप से जो मूल विषय है वो निकल जाएगा। पहले तो मुझे ये बताओ ये मनुष्य

559
00:38:02,880 --> 00:38:07,520
शरीर है कितने दिन के लिए? कितने दिन के लिए मिला है हमको? हम

560
00:38:07,520 --> 00:38:11,600
मानते हैं ज्यादा से ज्यादा 100 साल। हम मानते हैं 100 साल। ठीक है? 100 साल तक कोई

561
00:38:11,600 --> 00:38:16,080
जिंदा नहीं रह रहा। लेकिन हम मान लेते हैं आप 100 साल रहोगे। तो अभी 100 साल में

562
00:38:16,080 --> 00:38:20,080
50 साल तो सोने में निकल जाते हैं। 50 नहीं 40 साल है

563
00:38:20,080 --> 00:38:24,240
ना? जी जी। बचा हुआ कमाने में निकल जाता है।

564
00:38:24,240 --> 00:38:28,320
दैनिक दिनचर्या में निकल जाता है। गिना चुना समय है

565
00:38:28,320 --> 00:38:32,320
एक जीव के पास कुछ वर्ष जी

566
00:38:32,320 --> 00:38:36,480
और उन वर्षों को भी हम व्यर्थ के तर्क कुतर्क बहस और उसमें जबकि

567
00:38:36,480 --> 00:38:41,040
हमारी कोई योग्यता नहीं है। हमारे अंदर कोई स्तर नहीं है हमारा।

568
00:38:41,040 --> 00:38:45,120
तो अगर हम उन विषय में फसेंगे तो निश्चित रूप से हम अपने मूल लक्ष्य से डायवर्ट हो

569
00:38:45,120 --> 00:38:49,200
जाएंगे। इसलिए मेरा निवेदन है आम जन आपके माध्यम से

570
00:38:49,200 --> 00:38:53,280
जनरल यूथ को और जनरल लोगों को कृपया व्यर्थ की

571
00:38:53,280 --> 00:38:57,280
चीजों में अपने को मत फसाइए वरना आप लक्ष्य से भटक

572
00:38:57,280 --> 00:39:01,280
जाएंगे। मूल सिद्धांत को समझिए। अगर आचार्य ने बोला, चैतन्य

573
00:39:01,280 --> 00:39:05,440
महाप्रभु ने बोला, माधवाचार्य ने बोला, प्रभुपाद जी ने बोला, छठ गोस्वामियों

574
00:39:05,440 --> 00:39:09,760
ने बोला, पूरा संसार आप देख रहे हो। सब जगह आप स्वय विवेक

575
00:39:09,760 --> 00:39:14,080
से देखिए। घर जगह-जगह भागवत कथाएं ही क्यों हो रही है? अभी कलयुग

576
00:39:14,080 --> 00:39:18,080
का प्रभाव बढ़ रहा है तो नईनई चीजें आ रही हैं। कोई कुछ कर रहा है, कोई

577
00:39:18,080 --> 00:39:22,080
कुछ कर रहा है। नए-नए भगवान आ रहे हैं। नईनई खोजे आ

578
00:39:22,080 --> 00:39:26,400
रही है। ये सब मूर्खता है। कृपया भगवान भगवान है

579
00:39:26,400 --> 00:39:30,640
और भगवान का जो निर्देश है, गुरुजनों का जो निर्देश है, उसको

580
00:39:30,640 --> 00:39:34,640
हम स्वीकार करें और इस बात को समझे कि भागवत पुराण

581
00:39:34,640 --> 00:39:39,040
सर्वश्रेष्ठ पुराण है। मैं नहीं बोल रहा हूं कि मेरी कोई वैल्यू नहीं है।

582
00:39:39,040 --> 00:39:43,120
मेरी कोई वैल्यू नहीं है। लेकिन गुरुजनों का वैल्यू है,

583
00:39:43,120 --> 00:39:47,120
चैतन्य महाप्रभु का वैल्यू है। जो स्वयं साक्षात श्री कृष्ण है। वो कुछ कह

584
00:39:47,120 --> 00:39:51,120
रहे हैं। वो कुछ हमें बता रहे हैं। तो हम उनकी बात को स्वीकार करें

585
00:39:51,120 --> 00:39:55,280
और उस पर अपने जीवन को आगे बढ़ाएं। तो प्रभु जी

586
00:39:55,280 --> 00:39:59,520
एक एक चर्चा और है जो मैं देखता हूं कि कई बार

587
00:39:59,520 --> 00:40:04,000
इस के विरोध में कई ऐसे वीडियोस वगैरह आते हैं जिसमें कि क्लेम

588
00:40:04,000 --> 00:40:08,240
किया जाता है कि जैसे मधवाचार्य जी जो थे

589
00:40:08,240 --> 00:40:12,480
उन्होंने भी श्रीमद् भागवत पर भाष्य लिखा था और

590
00:40:12,480 --> 00:40:16,960
जो हमारे श्री चैतन्य महाप्रभु जी हैं उन्होंने मधवाचार्य

591
00:40:16,960 --> 00:40:21,120
जी के भाष्य को ना मान के उन्होंने श्रीधरी

592
00:40:21,120 --> 00:40:24,800
जो टीका है उसको प्रमाणिक माना इसके अलावा एक

593
00:40:24,800 --> 00:40:29,200
चीज और है कि जैसे इस की जो परंपरा है गुरु परंपरा

594
00:40:29,200 --> 00:40:33,200
वो ब्रह्मा जी से शुरू होते हुए मधवाचार्य जी तक आते हुए और फिर

595
00:40:33,200 --> 00:40:37,200
इस तरीके से चैतन महाप्रभु जी से होते हुए और फिर हमारे जो

596
00:40:37,200 --> 00:40:41,520
प्रभु जी हैं शीला प्रभुपाद जी उन तक आती है। पर मधवाचार्य

597
00:40:41,520 --> 00:40:45,760
के जो स्वयं के अधिकृत मठ हैं वहां पर ये क्लेम मतलब

598
00:40:45,760 --> 00:40:49,920
डिनाई किया जाता है और वहां पर क्योंकि श्री चैतन्य महाप्रभु जी ने

599
00:40:49,920 --> 00:40:54,400
मधवाचार्य जी के भागवतम भाष्य को नहीं अपनाया और

600
00:40:54,400 --> 00:40:58,800
उन्होंने जो तत्कालीन शंकराचार्य थे शायद श्रीधर स्वामी उनके

601
00:40:58,800 --> 00:41:03,120
भाष्य को उन्होंने अपनाया। तो इस कारणवश उनको अपनी लाइननेज

602
00:41:03,120 --> 00:41:07,120
में नहीं लिया गया है। तो मधवाचार्य जी की अधिकृत परंपरा

603
00:41:07,120 --> 00:41:11,120
में उनका नाम नहीं है और इस की जो गुरु परंपरा है उसमें उनका नाम है।

604
00:41:11,120 --> 00:41:15,520
मधवाचार्य जी कहते हैं कि जो हमारी गुरु परंपरा है वो हमसे स्वयं से

605
00:41:15,520 --> 00:41:20,080
प्रारंभ होती है। मगर इस कहता है कि मधवाचार्य की परंपरा

606
00:41:20,080 --> 00:41:24,160
कृष्ण भगवान स्वयं से प्रारंभ होती है। तो यह क्लेम उठाया किया जाता

607
00:41:24,160 --> 00:41:28,240
है। जो आप क्लेम बोल रहे हैं इसको मुझे रिटन में दीजिए क्योंकि इस

608
00:41:28,240 --> 00:41:32,480
पर मेरा कोई चिंतन मनन और श्रवण नहीं है। तो हम पहले इसको

609
00:41:32,480 --> 00:41:36,560
डीपली तर्कों के आधार पर और प्रमाणित तथ्यों के आधार पर समझेंगे तब आपको

610
00:41:36,560 --> 00:41:40,080
इसके विषय में बोलेंगे। अच्छा जैसे ये

611
00:41:40,080 --> 00:41:44,080
एक मेरे पास एक है जो मैं नोट एक्चुअली नोट करता रहता

612
00:41:44,080 --> 00:41:48,640
था। तो यह वाली चीज मुझे खराब लगी थी। किसी ने कही थी तो

613
00:41:48,640 --> 00:41:54,640
जैसे

614
00:41:56,320 --> 00:42:01,440
चैतन्य चरितामृत हमारी इस की पुस्तक है। इसमें

615
00:42:01,440 --> 00:42:05,440
जो हमारे चैतन महाप्रभु हैं, वह कह रहे हैं, "प्रभु हंसी कहे स्वामी

616
00:42:05,440 --> 00:42:09,440
ना माने यह जाना, वैश्यार भरे तारे करिए गाना, एता

617
00:42:09,440 --> 00:42:13,520
कहीं महाप्रभु मौना धारिला, सुनिया सवारा माने

618
00:42:13,520 --> 00:42:17,600
संतोष हैला।" तो इसमें ये आगे कह रहे हैं जो कोई स्वामी श्रीधर स्वामी की

619
00:42:17,600 --> 00:42:22,000
अवेलना करता है। तत्कालीन शंकराचार्य की अवहेलना करता है उसे वैश्याओं

620
00:42:22,000 --> 00:42:26,000
में गिना जाना चाहिए। ये वल्लभाचार्य जी से टॉक चल रहा है। जो है ना

621
00:42:26,000 --> 00:42:30,400
ये शंकराचार्य नहीं होंगे। नहीं नहीं ये उन्हीं के बारे में बात हो रही है। श्रीधरी

622
00:42:30,400 --> 00:42:34,560
टीका ये वही है। तत्कालीन शंकराचार्य जी हैं। तो

623
00:42:34,560 --> 00:42:38,560
ये उनके बारे में यहां लिखा हुआ है। तो जब मधवाचार्य जी

624
00:42:38,560 --> 00:42:42,800
ने खुद भागवतम पर भाष्य लिखा है जो जैसा कि इनकी परंपरा

625
00:42:42,800 --> 00:42:47,040
के वो गुरु हैं मधवाचार्य जी तो उनका भाष्य ना मान करके शंकराचार्य

626
00:42:47,040 --> 00:42:51,120
जी की परंपरा की शंकराचार्य का भाष्य जो है स्वीकार

627
00:42:51,120 --> 00:42:55,200
कर रहे हैं। कह रहे हैं कि अच्छा ये यहां पे ये भी कोट कर रहे हैं कि अगर

628
00:42:55,200 --> 00:42:59,440
कोई और लिखने की कोशिश करेगा तो उसे वैश्याओं में गिना

629
00:42:59,440 --> 00:43:03,760
जाना चाहिए। इस तरह का कोट किया है। तो अब यहां पे प्रभुपाद जी ने भागवत

630
00:43:03,760 --> 00:43:07,920
भाष लिखा है तो वो भी उन पर भी प्रश्न उठ गया। ये इस तरह से देखिए मूल

631
00:43:07,920 --> 00:43:11,920
चीज पता है हमें ये समझना चाहिए जी कि मैंने फिर एक बात कही

632
00:43:11,920 --> 00:43:16,800
मैं फिर उसी बात को फिर रिपीट करूंगा। देखिए हम लोग इन

633
00:43:16,800 --> 00:43:20,960
व्याख्याओं में इन विषयों में जब चैतन्य महाप्रभु जैसे

634
00:43:20,960 --> 00:43:25,040
स्वयं भगवान है। वो क्या कह रहे हैं कि मैं

635
00:43:25,040 --> 00:43:29,120
मूर्ख हूं। जी जबकि वो सब पर डिस्कशन कर सकते हैं। सब पर

636
00:43:29,120 --> 00:43:33,440
चर्चा कर सकते हैं। जी हम लोग वास्तविकता में बड़ी छोटी बुद्धि

637
00:43:33,440 --> 00:43:37,440
के साथ आए। ना हम श्रीधर को समझ पा रहे हैं,

638
00:43:37,440 --> 00:43:41,600
ना माधवाचार्य को समझ पाएंगे, ना महाप्रभु को समझ पाएंगे,

639
00:43:41,600 --> 00:43:45,760
ना कृष्णदास कविराज को समझ पाएंगे कि वो जो बोल रहे हैं। जी जी तो इन

640
00:43:45,760 --> 00:43:49,760
लोगों का जो स्तर है ये दिव्य धरातल पर हैं। हम और हम लोग जो

641
00:43:49,760 --> 00:43:53,760
है वो संसार की निकृष्ट चेतना वाले लोग हैं। तो

642
00:43:53,760 --> 00:43:58,160
हम इन विषयों में ना फंस करके हरे कृष्ण महामंत्र

643
00:43:58,160 --> 00:44:02,160
का जप करें और यही हमारा निवेदन सबसे है। और मैं

644
00:44:02,160 --> 00:44:06,160
जो महाप्रभु ने बोला वही बात मैं रिपीट करूंगा कि हम मूर्ख हैं।

645
00:44:06,160 --> 00:44:10,240
हम इन विषयों में ना पड़कर इससे क्या होगा कि हम केवल जब हम कोई

646
00:44:10,240 --> 00:44:14,480
चीज समझते नहीं है और उसको समझने की कोशिश करें तो या तो फिर हम

647
00:44:14,480 --> 00:44:18,720
महाप्रभु जैसी चेतना ले आए जी महाप्रभु जितना ज्ञान ले आए कि उन्होंने

648
00:44:18,720 --> 00:44:22,800
ऐसा क्यों किया इस इस किस परिपेक्ष में किया इसका कारण क्या था है

649
00:44:22,800 --> 00:44:26,800
ना क्योंकि आचार्य गण कुछ भी करते हैं कई बार वो हमें ऐसा

650
00:44:26,800 --> 00:44:31,520
लगता है कि अरे ये तो पथ से हटकर भी कुछ कर रहे हैं लेकिन

651
00:44:31,520 --> 00:44:35,600
हम उसको समझने के उतने योग्य नहीं होते कि वास्तविकता में यह कार्य

652
00:44:35,600 --> 00:44:39,600
किस स्तर पर हो रहा है और क्यों हो रहा है। हम तो मेरा निवेदन केवल

653
00:44:39,600 --> 00:44:43,760
इतना सा है कि हम इन सब में नफस करके हम मूल बात

654
00:44:43,760 --> 00:44:48,240
को समझे जिसे सब ने कहा है कलयुग केवल

655
00:44:48,240 --> 00:44:52,800
नाम आधार है ना इसमें तो कोई संदेह नहीं है किसी को जी

656
00:44:52,800 --> 00:44:56,960
अच्छा जितने लोग प्रश्न करने वाले हैं उन लोगों से अगर पूछो कि आप कितने माला

657
00:44:56,960 --> 00:45:00,960
जप करते हैं जैसे मेरा आपसे मैं आपसे प्रश्न है आप मुझसे प्रश्न कर

658
00:45:00,960 --> 00:45:05,440
रहे हो मेरा आपसे प्रश्न है आप कितनी माला रोज जप करते हो 16

659
00:45:05,440 --> 00:45:09,440
पर डे जी नियम से जी अच्छा तो भगवान की कृपा आपको मिलेगी

660
00:45:09,440 --> 00:45:13,520
और आप चीजों को समझ पाओगे। तो देखो आप सबको भी मैं बोलना चाहूंगा कि जैसे

661
00:45:13,520 --> 00:45:17,520
प्रभु जी 16 माला जप कर रहे हैं वैसे ही आप भी 16 माला करिए

662
00:45:17,520 --> 00:45:21,600
और इन तर्क कुतर्क वितर्क

663
00:45:21,600 --> 00:45:25,520
शास्त्र के विभिन्न गहराइयां इनमें जाना हमारा

664
00:45:25,520 --> 00:45:29,600
उद्देश्य नहीं है। हम कोई टीका लिखने नहीं आए हैं।

665
00:45:29,600 --> 00:45:33,840
हम कोई बहुत ज्ञान देने नहीं आए हैं। मैं स्वयं

666
00:45:33,840 --> 00:45:38,160
इस बात को समझता हूं कि मैं खुद अव्वल दर्जे का मूर्ख हूं और मुझे कोई

667
00:45:38,160 --> 00:45:42,320
वेद, पुराण, उपनिषद का ज्ञान नहीं है। मैं तो केवल गुरुजनों

668
00:45:42,320 --> 00:45:46,400
के मुख से जो श्रवण किया है उस पर पूर्ण श्रद्धा

669
00:45:46,400 --> 00:45:51,040
रखते हुए आगे बढ़ रहा हूं और निश्चित रूप से यही प्रत्येक

670
00:45:51,040 --> 00:45:55,200
अच्छे शिष्य का लक्षण है और उसे ऐसा ही करना

671
00:45:55,200 --> 00:45:59,440
चाहिए। उसे अपनी विवेक को अपनी बुद्धि अपनी

672
00:45:59,440 --> 00:46:03,760
भौतिक बुद्धि को तर्क वितर्क कोतर्क में फंसाना नहीं चाहिए। फिर भी

673
00:46:03,760 --> 00:46:08,080
अगर कोई प्रश्न किसी को परेशान कर रहा है तो निश्चित रूप से

674
00:46:08,080 --> 00:46:12,080
उसका समाधान लेना चाहिए। आपने मुझे बोला है। मैंने आपको यह भी बोला है कि

675
00:46:12,080 --> 00:46:16,240
हम इसको हां क्योंकि इसमें एक्चुअली इसलिए यह वाला प्रश्न था क्योंकि

676
00:46:16,240 --> 00:46:20,400
एक भक्तों को एक वो हो जाती है निश्चितता

677
00:46:20,400 --> 00:46:24,560
कि हम प्रमाणिक ज्ञान ले रहे हैं। तो इसलिए ये परंपरा पे जब प्रश्न उठता

678
00:46:24,560 --> 00:46:28,560
है तो प्रमाणिकता पे प्रश्न उठ जाता है। बिल्कुल मैंने आपसे बोला ना कि
