1
00:00:05,280 --> 00:00:09,600
इसमें संदेह नहीं है कि दास बोध मुख्यत अध्यात्म संबंधी ग्रंथ है और इसमें

2
00:00:09,600 --> 00:00:14,000
यही प्रतिपादित किया गया है कि मनुष्य को समस्त सांसारिक विषयों

3
00:00:14,000 --> 00:00:18,400
का परित्याग करके अपनी दृष्टि और विचारों का इतना अधिक विस्तार

4
00:00:18,400 --> 00:00:22,400
करना चाहिए कि अपने समेत सारा संसार

5
00:00:22,400 --> 00:00:26,640
ब्रह्ममय दिखाई पड़ने लगे स्वयं अपनी

6
00:00:26,640 --> 00:00:30,960
आत्मा में 435 भगवत गीता स्वयं अपनी आत्मा

7
00:00:30,960 --> 00:00:35,600
में, लोगों की आत्मा में और विश्व आत्मा में किसी प्रकार का भेद ना रह जाए।

8
00:00:35,600 --> 00:00:39,600
आध्यात्मिक विचारों की यही चरम सीमा और

9
00:00:39,600 --> 00:00:43,600
यही परम लक्ष्य है। दास बोध का प्रतिपाद्य विषय क्या

10
00:00:43,600 --> 00:00:47,680
है? वही है जो शंकर परंपरा के द्वारा आपको

11
00:00:47,680 --> 00:00:51,680
अद्वैत का ज्ञान मिलता है। जो परमार्थ है। व्यवहार में

12
00:00:51,680 --> 00:00:56,320
तो द्वैत है। परंतु द्वैत व्यवहार में द्वैत पर चलके

13
00:00:56,320 --> 00:01:00,320
आपको प्राप्त क्या होने वाला है? परमार्थ में अद्वैत

14
00:01:00,320 --> 00:01:04,640
तो छत्रपति शिवाजी के जो गुरु थे समर्थ

15
00:01:04,640 --> 00:01:09,680
रामदास भी रामदास जी भी उन्होंने भी

16
00:01:09,680 --> 00:01:12,480
अद्वैत

17
00:01:12,480 --> 00:01:16,560
का ही प्रतिपादन किया है अपने ग्रंथ दास बोध में यहां ये निश्चित हो

18
00:01:16,560 --> 00:01:20,560
गया आध्यात्मिक विचारों की यही चरम

19
00:01:20,560 --> 00:01:24,800
सीमा और यही परम लक्ष्य है। इस प्रकार भागवत का भी देखिए भागवत

20
00:01:24,800 --> 00:01:28,880
में भी 12व स्कंध में आया है ना कि

21
00:01:28,880 --> 00:01:33,040
अह यह स्पष्ट वचन है भागवत में श्रीमद् भागवत में

22
00:01:33,040 --> 00:01:37,120
कि इस भागवत का जो प्रतिपाद्य विषय

23
00:01:37,120 --> 00:01:41,520
है वो है जीव और ब्रह्म की एकता

24
00:01:41,520 --> 00:01:47,520
परमार्थ अच्छा

25
00:01:48,160 --> 00:01:52,480
इस प्रकार का भाव स्वयं अपने लिए और समस्त संसार के लिए भी परम

26
00:01:52,480 --> 00:01:57,680
कल्याणकारक होता है और इसीलिए अध्यात्म संबंधी अन्य

27
00:01:57,680 --> 00:02:01,760
अनेक ग्रंथों की भांति दास दास बोध में भी इसी पर

28
00:02:01,760 --> 00:02:05,760
सबसे ज्यादा जोर दिया गया है। इस जब मनुष्य

29
00:02:05,760 --> 00:02:10,080
यह समझने लगता है कि जैसी मेरी आत्मा है वैसी ही जीव मात्र की आत्मा

30
00:02:10,080 --> 00:02:14,400
है और हम सब में वहां एक परमात्मा या विश्व आत्मा

31
00:02:14,400 --> 00:02:18,640
निवास करता है। तब यह किसी के साथ राग

32
00:02:18,640 --> 00:02:22,640
द्वेष वैमनस्य आदि नहीं रख सकता और ना किसी

33
00:02:22,640 --> 00:02:26,720
को कोई हानि ही पहुंचा सकता है। यही कारण है कि इस ग्रंथ में श्री

34
00:02:26,720 --> 00:02:30,880
समर्थ ने अनेक स्थानों पर बहुत दृढ़ता पूर्वक यह

35
00:02:30,880 --> 00:02:35,120
उपदेश दिया है कि सब लोगों को सुखी प्रसन्न और संतुष्ट

36
00:02:35,120 --> 00:02:39,440
रखना चाहिए। हिंदू राष्ट्र का उद्देश्य क्या है?

37
00:02:39,440 --> 00:02:44,000
सुसंस्कृत सुरक्षित स्वस्थ संपन्न सेवा परायण

38
00:02:44,000 --> 00:02:49,680
व्यक्ति और समाज की संरक्षणा और तदानुसार

39
00:02:49,680 --> 00:02:53,680
अन्यों के हित का ध्यान रखते हुए सबके हित का ध्यान रखते हुए

40
00:02:53,680 --> 00:02:58,160
हिंदुओं के अस्तित्व और आदर्श की रक्षा करना। हिंदू

41
00:02:58,160 --> 00:03:02,240
है तभी संसार सुरक्षित है। हिंदू

42
00:03:02,240 --> 00:03:03,520
जैसे ही हटेगा

43
00:03:03,520 --> 00:03:07,760
वैसे वह स्वयं जो हिंदुओं से लड़ लड़ के अपना जीवन बिता रहे हैं ना

44
00:03:07,760 --> 00:03:12,160
फिर वो स्वयं आपस में ही एक दूसरे को नष्ट भ्रष्ट कर डालेंगे।

45
00:03:12,160 --> 00:03:16,160
वो थॉमस अलवा एडिसन वाला याद है ना? संसार

46
00:03:16,160 --> 00:03:20,320
में यदि कहीं पर भी बल्ब जल रहा है तो उसका कारण क्या है?

47
00:03:20,320 --> 00:03:24,400
व्यवहारिक धरातल पर थॉमस अलवा एडिसन। उसी प्रकार

48
00:03:24,400 --> 00:03:28,960
से संसार में जहां कहीं भी शांति है जहां कहीं भी धर्म

49
00:03:28,960 --> 00:03:33,120
अपने प्रत्यक्ष रूप से स्थापित है या फिर किसी और

50
00:03:33,120 --> 00:03:37,360
नाम से वहां पर वही सब चीजें हो रही हैं। उतने अंशों

51
00:03:37,360 --> 00:03:41,440
में वहां पर गुप्त या प्रकट रूप से सनातन का ही आलंबन लिया जा

52
00:03:41,440 --> 00:03:46,400
रहा है।

53
00:03:46,400 --> 00:03:50,480
अपने साथ ही साथ आपने साथ ही साथ यह भी कहा है कि सब

54
00:03:50,480 --> 00:03:55,040
प्राणियों और जीवों को सुखी करने से ही परमात्मा प्रसन्न होता है।

55
00:03:55,040 --> 00:03:59,120
जन या जनता में ही जनार्दन है और सबको पहले उसी जनता रूपी

56
00:03:59,120 --> 00:04:03,120
जनार्दन की पूजा और सेवा करनी चाहिए। लोक कल्याण

57
00:04:03,120 --> 00:04:07,200
का कैसा सुंदर आदर्श है? यदि इस आदर्श पर ठीक तरह से

58
00:04:07,200 --> 00:04:11,280
लक्ष्य रखा जाए तो फिर संसार में कहीं दुख, कष्ट,

59
00:04:11,280 --> 00:04:15,360
संकट, संघर्ष, अनर्थ या पाप आदि के लिए

60
00:04:15,360 --> 00:04:19,600
स्थान ही ना रह जाए। इस पृथ्वी पर ही स्वर्ग के दर्शन होने

61
00:04:19,600 --> 00:04:23,760
लगे। अनायास ही सारे संसार में राम राज्य की स्थापना

62
00:04:23,760 --> 00:04:27,920
हो जाए। धन्य है वह महापुरुष जो इस आदर्श पर ध्यान रखकर

63
00:04:27,920 --> 00:04:33,280
जीवन निर्वाह करते हैं और जो महापुरुष

64
00:04:33,280 --> 00:04:37,280
लोगों के सामने इस प्रकार के आदर्श रखते हो उनकी धन्यता का तो

65
00:04:37,280 --> 00:04:40,960
कहना ही क्या है

66
00:04:40,960 --> 00:04:43,840
तो

67
00:04:43,840 --> 00:04:48,640
देखा जाए जितने भी आपने संभवत

68
00:04:48,640 --> 00:04:52,720
आहान जो मुख्य चैनल है आहान का उसका एक संदेश पढ़ा

69
00:04:52,720 --> 00:04:57,040
हो पीछे डिस्क्रिप्शन जो पढ़ा हुआ है चैनल का डिस्क्रिप्शन उसको जब आप करके

70
00:04:57,040 --> 00:05:01,120
आप जाकर के पढ़ेंगे ना तो उसमें एक बात लिखी हुई है जो मैंने काफी समय पहले लिखी

71
00:05:01,120 --> 00:05:03,760
थी 2000

72
00:05:03,760 --> 00:05:07,840
शायद 11 या 12 में लिखी होगी जब मैं अपने सनातन संस्कृति को नष्ट होता

73
00:05:07,840 --> 00:05:12,240
हुआ देखता था तो दुख होता था मुझे दिशा नहीं मालूम थी मेरे अंदर था

74
00:05:12,240 --> 00:05:16,400
कि मैं रामचंद्र जी के पथ का पथ की स्थापना अपने समाज

75
00:05:16,400 --> 00:05:20,480
में कर पाऊं पर मैं दिशाहीन था मुझे गुरु तत्व प्राप्त नहीं था

76
00:05:20,480 --> 00:05:24,880
गुरु से अनभिज्ञ था तो उस समय समय जो चिंता मेरी

77
00:05:24,880 --> 00:05:30,560
थी उस चिंता को ही मैंने इस पंक्ति में व्यक्त किया था

78
00:05:30,560 --> 00:05:35,040
कि भगत सिंह सुखदेव राजगुरु इत्यादि जो क्रांतिकारी

79
00:05:35,040 --> 00:05:40,480
हुए ये भी स्वार्थी थे।

80
00:05:40,480 --> 00:05:45,040
संसार में जितने भी लोग हैं वह सब स्वार्थी हैं। इस

81
00:05:45,040 --> 00:05:49,200
प्रकार से स्वार्थी है कि सबकी सबका जो भी वो कुछ

82
00:05:49,200 --> 00:05:53,760
कर रहे हैं कुछ भी कर रहे हैं उसमें उनका ये स्वार्थ निहित है कि भैया

83
00:05:53,760 --> 00:05:57,760
मुझे इससे खुशी प्राप्त होती है इसलिए मैं यह कर रहा हूं। मुझे

84
00:05:57,760 --> 00:06:01,840
आनंद मिलता है इसलिए मैं ये कर रहा हूं। तो वह जो

85
00:06:01,840 --> 00:06:05,920
है वह स्वार्थी है। तो सब लोगों की लड़ाई जो है वह मेरी होती है।

86
00:06:05,920 --> 00:06:10,080
मेरी लड़ाई जैसे कि किसी की किसी की लड़ाई कहां तक सीमित

87
00:06:10,080 --> 00:06:14,160
है? किसी की लड़ाई केवल उसके अपने शरीर तक

88
00:06:14,160 --> 00:06:18,560
सीमित है। कि भाई मुझे मेरे शरीर को कुछ ना हो जाए।

89
00:06:18,560 --> 00:06:22,560
किसी की लड़ाई उसके अपने जो परिवार है मेरी माता, मेरी बहन, मेरी

90
00:06:22,560 --> 00:06:26,640
पिता, मेरी पत्नी, मेरी बेटी, मेरा बेटा यहां तक सीमित

91
00:06:26,640 --> 00:06:30,800
है। या फिर किसी की लड़ाई उसके कुल खानदान तक सीमित

92
00:06:30,800 --> 00:06:34,960
है। मेरे चाचा, मेरे ताऊ, मेरे भतीजे,

93
00:06:34,960 --> 00:06:40,320
मेरी ब्याह चुकी बहने इस तरीके से

94
00:06:40,320 --> 00:06:44,400
और किसी किसी की लड़ाई फिर जो उसका जो कुटुंब का वृक्ष

95
00:06:44,400 --> 00:06:48,960
है उसके भी बाहर जहां वो रह रहा है। उसका नगर, गली, मोहल्ला

96
00:06:48,960 --> 00:06:53,440
वहां तक सीमित है। फिर किसी की लड़ाई

97
00:06:53,440 --> 00:06:55,600
अ नगर, गली, मोहल्ला

98
00:06:55,600 --> 00:06:59,760
छोड़कर के उसमें भी सीमित है। प्रदेश में अगर

99
00:06:59,760 --> 00:07:04,320
भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो किसी की लड़ाई क्षेत्र क्षेत्रवाद

100
00:07:04,320 --> 00:07:08,320
को छोड़कर के फिर वो देशगत आ जाती है तो

101
00:07:08,320 --> 00:07:13,280
मेरा देश भारत वहां तक सीमित है और किसी की लड़ाई

102
00:07:13,280 --> 00:07:17,520
पूरा संसार है मानवता है प्राणी मात्र है वहां

103
00:07:17,520 --> 00:07:21,760
तक सीमित है तो सबकी लड़ाई के पीछे एक वर्ड तो है

104
00:07:21,760 --> 00:07:26,320
चाहे वो सन्यासी हो चाहे गृहस्थ हो चाहे वो बिल्कुल कोई

105
00:07:26,320 --> 00:07:30,720
अ क्या कहूं दुर्व्यसनी स्मैक का सेवन

106
00:07:30,720 --> 00:07:35,120
करने वाला क्यों ना हो। सबकी लड़ाई के पीछे, सबके संघर्ष के पीछे

107
00:07:35,120 --> 00:07:38,880
शब्द एक ही है। मैं

108
00:07:38,880 --> 00:07:43,280
सबके पीछे एक ही शब्द है। मैं बस देखना

109
00:07:43,280 --> 00:07:47,280
यह है कि आपका ये मैं कितना बड़ा है। भगत सिंह,

110
00:07:47,280 --> 00:07:51,360
सुखदेव, राजगुरु इत्यादि का मैं आपसे बड़ा था।

111
00:07:51,360 --> 00:07:55,680
तो वह आज कहीं ना कहीं स्वतंत्रता संग्राम इत्यादि के अगर

112
00:07:55,680 --> 00:08:00,320
उसमें देखा जाए तो वह आदर्श माने जाते हैं और

113
00:08:00,320 --> 00:08:04,880
उनका मैं देशगत था और शंकराचार्य

114
00:08:04,880 --> 00:08:09,200
रामानुजाचार्य इनका मैं पूरे मानवता

115
00:08:09,200 --> 00:08:10,800
के लिए था। संसार

116
00:08:10,800 --> 00:08:15,120
के लिए था। श्री रामचंद्र जी का जो मैं था पूरे

117
00:08:15,120 --> 00:08:19,840
संसार के लिए था। प्राणी मात्र के लिए था।

118
00:08:19,840 --> 00:08:24,240
तो आपका यह मैं कितना बड़ा है यह देखने वाली बात होती है।

119
00:08:24,240 --> 00:08:28,640
तो हमें देखने में ऐसा लगता है जो वास्तविकता

120
00:08:28,640 --> 00:08:32,720
में देखा जाए तो जो मोक्ष प्राप्ति के लिए कार्य कर रहा है जो धर्म की

121
00:08:32,720 --> 00:08:36,800
रक्षा करने के लिए कार्य कर रहा है या जो सन्यासी हो गया हमारे मन

122
00:08:36,800 --> 00:08:40,880
में उनके प्रति आती है एक भावना कि भैया ये भी अपने सुख के लिए

123
00:08:40,880 --> 00:08:45,040
ही तो कर रहे हैं। बस इनका सुख जो है इसमें ना निहित

124
00:08:45,040 --> 00:08:49,360
हो के जिन चीजों में जिन निकृष्ट चीजों में हमारा सुख है उसमें

125
00:08:49,360 --> 00:08:53,520
ना निहित हो कर के इनका जो सुख है इन विभूतियों का सुख जो

126
00:08:53,520 --> 00:08:57,600
है वो सन्यास में है धर्म रक्षा में है या

127
00:08:57,600 --> 00:09:02,320
देश की रक्षा में है मानवता की रक्षा में है इत्यादि इत्यादि में है

128
00:09:02,320 --> 00:09:06,320
या इनका सुख जो है ईश्वर प्राप्ति में है भगवान की

129
00:09:06,320 --> 00:09:10,400
भक्ति में इनका सुख है तो फिर जब दोनों का

130
00:09:10,400 --> 00:09:14,800
ही मूल उद्देश्य सुख है तो वो धन्य क्यों और हम जो है निकृष्ट

131
00:09:14,800 --> 00:09:18,800
क्यों ये एक विचार आता है वो महापुरुष क्यों और हम सामान्य पुरुष

132
00:09:18,800 --> 00:09:22,960
क्यों इसलिए क्योंकि उनका सुख जिसमें

133
00:09:22,960 --> 00:09:26,080
निहित है उसमें सुख देख पाना

134
00:09:26,080 --> 00:09:30,880
उसमें सुख की दृष्टि रख पाना अत्यंत कठिन होता है

135
00:09:30,880 --> 00:09:35,440
वो भावना व्याप्त जिसने कर ली वो महापुरुष है

136
00:09:35,440 --> 00:09:39,760
जो यह सामाजिक प्रपंच रूपी संसार से अलग

137
00:09:39,760 --> 00:09:44,080
होकर के अपने सुख को किसी और में देख पाए किसी और में चिंतन

138
00:09:44,080 --> 00:09:48,160
कर पाए। इसलिए शास्त्रों में ऐसी बात भी कही गई

139
00:09:48,160 --> 00:09:52,560
है और एक मैंने पता नहीं अभी कहां एक दो दिन पहले ही किसी शायद किसी

140
00:09:52,560 --> 00:09:56,880
आचार्य जी की वाणी सुनी थी मैंने उन्होंने कहा था और शास्त्रों में

141
00:09:56,880 --> 00:10:02,000
स्कंद पुराण में आया है कि यदि आप हर क्षण

142
00:10:02,000 --> 00:10:06,240
यदि आपकी जो जैसे होता है गोसिप कहते हैं जिसे आप अपने मित्रों के साथ बैठकर

143
00:10:06,240 --> 00:10:10,320
के गप्पे मार रहे हैं या इधरउधर की बातें कर रहे हैं। मगर वो इधर उधर

144
00:10:10,320 --> 00:10:14,560
की बातें किस बारे में है? रामायण के बारे में, भगवत गीता

145
00:10:14,560 --> 00:10:18,720
के बारे में। आपकी जो चर्चा का विषय है वो क्या है?

146
00:10:18,720 --> 00:10:22,960
चाय पीते समय कई लोग चाय पीते होंगे। यद्यपि निषेध है चाय का। मगर एक

147
00:10:22,960 --> 00:10:26,960
हमारे जो आज का जो सामान्य जनजीवन है

148
00:10:26,960 --> 00:10:32,160
उसमें चाय पीना या आजकल की भाषा में कहे तो स्नैक्स

149
00:10:32,160 --> 00:10:36,400
खा रहे हैं पी रहे हैं या जो भी है एक सामान्य समय है मगर वहां पर भी अगर बातें

150
00:10:36,400 --> 00:10:40,400
कर रहे हैं तो धर्म का निर्धारण हो रहा है कि भाई ये धर्म कैसे ब्रह्म

151
00:10:40,400 --> 00:10:41,440
ये कैसे अद्वैत

152
00:10:41,440 --> 00:10:45,440
कैसे द्वैत कैसे भगवान श्री कृष्ण चंद्र की बातें चल रही है राम श्री

153
00:10:45,440 --> 00:10:49,840
रामचंद्र जी की लीलाओं की बातें चल रही है तो स्कंद पुराण मेंशन है

154
00:10:49,840 --> 00:10:54,000
यदि आपकी चर्चाओं का विषय भगवान है धर्म है तो

155
00:10:54,000 --> 00:10:59,600
आप कल्याणकारी पथ पर चल रहे हो और इसी बात को

156
00:10:59,600 --> 00:11:04,000
किनहीं महापुरुष की भी मैंने बात सुनी थी जिन्होंने कहा था कि यदि

157
00:11:04,000 --> 00:11:08,080
आप एकांत में बैठकर के भी श्री रामचंद्र इत्यादि का चिंतन कर

158
00:11:08,080 --> 00:11:12,080
रहे हो जहां पर आपको कोई व्यवस्था नहीं है उस समय उन्हीं का

159
00:11:12,080 --> 00:11:16,240
चिंतन करने की यदि आप कर रहे हो तो आप कल्याणकारी

160
00:11:16,240 --> 00:11:20,480
पथ पर हो और जब आप ऐसे कल्याणकारी पथ पे हैं तो आप उन

161
00:11:20,480 --> 00:11:24,880
लोगों की दृष्टि से महापुरुष हो जाते हैं, धन्य हो जाते हैं। क्योंकि आप

162
00:11:24,880 --> 00:11:29,200
का बिना किसी व्यवस्था के चिंतन में आज राम है।

163
00:11:29,200 --> 00:11:33,360
आपके बिना किसी व्यवस्था के चिंतन में आज कृष्ण है। धर्म है।

164
00:11:33,360 --> 00:11:37,440
रामो विग्रहवान धर्म। चलो मान लिया कि

165
00:11:37,440 --> 00:11:39,760
आपका

166
00:11:39,760 --> 00:11:44,000
क्या कहते हैं? विषय यह है कि हमको जो है धर्म का

167
00:11:44,000 --> 00:11:48,240
नाश करने वाले इत्यादि जो सनातना भाष है स्पॉन है आर्य समाज

168
00:11:48,240 --> 00:11:52,240
है या ये ब्रह्मा कुमारीज है इनको उत्तर देना है

169
00:11:52,240 --> 00:11:56,320
आपके अंदर वो एक जुनून है कि भाई इन्होंने ऐसी गलत बात क्यों कर दी

170
00:11:56,320 --> 00:11:56,820
है

171
00:11:56,640 --> 00:12:00,720
जिसकी वजह से हमारे सनातन समाज को हानि हो रही है मानवता को हानि हो

172
00:12:00,720 --> 00:12:04,800
रही है यह बातें ये क्यों निर्गत कर रहे हैं और उसको लेकर के आपको जवाब

173
00:12:04,800 --> 00:12:09,040
देना वही जवाब देने का चिंतन यद्यपि ऐसा आवश्यक

174
00:12:09,040 --> 00:12:13,120
नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति जवाब जवाब दे। मगर यदि उसको लेकर के भी चिंतन चल रहा है।

175
00:12:13,120 --> 00:12:17,200
आपको दिन और रात वही दिख रहा है कि मुझे जो है धर्म स्थापना के लिए जो है

176
00:12:17,200 --> 00:12:21,280
इसका उत्तर निकालना है। कम से कम मैं समाज को ना दे पाऊं तो अपने घर के लोगों

177
00:12:21,280 --> 00:12:25,280
को तो बता पाऊं। ये भ्रांति है। स्त्रियों को यज्ञ पवीत नहीं कराना

178
00:12:25,280 --> 00:12:29,600
चाहिए क्योंकि स्त्रियों का जो संरचना है वो अमुक रूप से है।

179
00:12:29,600 --> 00:12:33,920
उनके लिए अमुक धर्म है और पुरुषों के लिए अमुक धर्म है। तो कितने

180
00:12:33,920 --> 00:12:38,000
विधिवत तरीके से सिस्टमेटिकली मैं यह बात इस बात की

181
00:12:38,000 --> 00:12:42,000
सिद्धांत की स्थापना कर पाऊं। इस बारे में आपका चिंतन चल रहा है। तो आप उन

182
00:12:42,000 --> 00:12:46,160
करोड़ों लोगों से कितने अलग हैं। कितने धन्य हैं आप। इतने

183
00:12:46,160 --> 00:12:50,160
स्तर पर भी कितने धन्य है आप जिनके मन में यह चिंतन चल रहा है कि

184
00:12:50,160 --> 00:12:54,560
Netflix पर कौन सी मूवी आई है या आज मॉल में कौन सी मूवी

185
00:12:54,560 --> 00:12:58,560
चल रही है या और बहुत सारे प्रपंच मैकडोनाल्ड्स

186
00:12:58,560 --> 00:13:03,040
पिज़्ज़ा या जो भी जिसमें भी आज सामान्य जन जीवन की आसक्ति

187
00:13:03,040 --> 00:13:07,600
है तो ये सोचने वाली बात है कि एन केन प्रकारन

188
00:13:07,600 --> 00:13:11,680
आपके मन में चिंतन किसका चल रहा है तो उन्हीं को धन्य कहा जाता

189
00:13:11,680 --> 00:13:15,840
है जो इस प्रपंच रूपी संसार में जिनकी आसक्ति कम होती

190
00:13:15,840 --> 00:13:20,000
चली जाती है या रही नहीं जाती उनहीं को धन्य कहा जाता है। वही महापुरुष

191
00:13:20,000 --> 00:13:24,080
हो सकते हैं। तो भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु इनको धन्य क्यों

192
00:13:24,080 --> 00:13:28,400
कहा गया? क्योंकि इनकी आसक्ति किस में हो गई? इनकी आसक्ति

193
00:13:28,400 --> 00:13:33,280
हो गई स्वतंत्रता संग्राम में। जिनको मरने से भय ना लगा।

194
00:13:33,280 --> 00:13:37,360
हम इनकी आसक्ति हो गई ना उसमें। तो जो हम जैसे

195
00:13:37,360 --> 00:13:41,440
निकृष्ट लोग जो अपनी आसक्ति को हटा नहीं

196
00:13:41,440 --> 00:13:45,600
पाते हैं प्रपंच रूपी संसार से वह सामान्य रह जाते हैं और जो हटा

197
00:13:45,600 --> 00:13:49,840
करके और जिनका मैं बड़ा हो जाता है और मैं बड़े होने

198
00:13:49,840 --> 00:13:53,920
के रूप में परिणाम स्वरूप जिनका लक्ष्य बड़ा हो जाता है जिनके चिंतन का

199
00:13:53,920 --> 00:13:55,840
विषय वृहद होता चला जाता

200
00:13:55,840 --> 00:14:00,640
है वो महापुरुष और वो धन्य कहलाते हैं। है ना?

201
00:14:00,640 --> 00:14:04,960
तो ऐसे ही थे हमारे श्री समर्थ राम दास जी।

202
00:14:04,960 --> 00:14:08,960
परंतु यह आध्यात्मिक आदर्श बहुत ऊंचा है और सब लोग इस आदर्श

203
00:14:08,960 --> 00:14:13,200
तक तो ना पहुंच ही सकते हैं और ना इसके अनुसार काम ही कर सकते हैं और जो

204
00:14:13,200 --> 00:14:17,360
थोड़े से लोग ऐसे आदर्श तक पहुंच सकते हैं या इनके अनुसार

205
00:14:17,360 --> 00:14:21,520
काम कर सकते हैं उनके लिए भी एक और बात की जरूरत होती है और वह

206
00:14:21,520 --> 00:14:24,560
है भक्ति।

207
00:14:24,560 --> 00:14:28,720
भारतीय विचारशीलों ने बहुत कुछ सोच विचार कर अंत

208
00:14:28,720 --> 00:14:32,720
में यही निश्चित किया है कि मनुष्य को सत्य

209
00:14:32,720 --> 00:14:36,720
के मार्ग पर लगाए रखने के लिए सदा आस्तिक

210
00:14:36,720 --> 00:14:41,040
और सतचरित्र रखने के लिए यदि सबसे अधिक किसी चीज को सहायता

211
00:14:41,040 --> 00:14:45,440
किसी चीज से सहायता मिल सकती है तो वह भक्ति से ही मिल सकती है।

212
00:14:45,440 --> 00:14:49,520
यही बात अभी कुछ दिनों पहले मैंने अपने एक वीडियो में भी कही

213
00:14:49,520 --> 00:14:53,600
एक लाइव स्ट्रीम हो रही थी और उसमें कोई इस्लाम को मानने वाला व्यक्ति जो

214
00:14:53,600 --> 00:14:57,760
है हमारे धर्म के बारे में बहुत ही आपत्तिजनक कुछ वक्तव्य वहां पर कमेंट्स

215
00:14:57,760 --> 00:15:02,000
में लिख रहा था। मैं सदैव यही कहता हूं कि अपने जीवन

216
00:15:02,000 --> 00:15:06,320
की सभी विपरीत परिस्थितियों से गुरुदेव भी यही बताते हैं कि

217
00:15:06,320 --> 00:15:10,560
आपको आपके जीवन की सभी विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करने

218
00:15:10,560 --> 00:15:11,600
में

219
00:15:11,600 --> 00:15:15,600
सबसे अधिक जो लाभप्रद है वो है भक्ति। भक्ति का

220
00:15:15,600 --> 00:15:19,600
बल बढ़ाइए और जीवन में सरलता पाइए। विषम से विषम

221
00:15:19,600 --> 00:15:23,680
परिस्थितियों में भी आप चट्टान की तरह सीना तान कर खड़े रह सकते

222
00:15:23,680 --> 00:15:28,400
हैं। तो वह भक्ति के कारण इसलिए भक्ति का बल बढ़ाएं।

223
00:15:28,400 --> 00:15:32,640
तो वही समर्थ रामदास जी भी कह रहे हैं। सच चरित्र रखने के लिए मैंने

224
00:15:32,640 --> 00:15:36,640
इस बारे में बहुत से उदाहरण दिए हैं कि किस तरीके से आपके जीवन में भक्ति के

225
00:15:36,640 --> 00:15:40,640
कारण जो बल आता है उसके कारण आप ये निर्णय कर पाते हैं।

226
00:15:40,640 --> 00:15:44,880
जैसे मान लीजिए मैं एक छोटा सा उदाहरण दे दूं। मैंने

227
00:15:44,880 --> 00:15:50,720
किसी को कहा कि मैं आपको जो है अमुक

228
00:15:50,720 --> 00:15:54,800
दिनांक को मैं जो है आपसे मैंने धन लिया है। मैं आपको यह

229
00:15:54,800 --> 00:15:59,600
धन आपको वापस कर दूंगा या फिर वापस कर दूंगा। छोड़ दीजिए। मैंने

230
00:15:59,600 --> 00:16:03,680
किसी को कहा कि दान स्वरूप भेंट स्वरूप मैं

231
00:16:03,680 --> 00:16:07,760
आपको जो है धन यह दे दूंगा। इतना धन मेरे पास मैं इतनी दिनांक को आपको

232
00:16:07,760 --> 00:16:11,920
दे दूंगा। या फिर

233
00:16:11,920 --> 00:16:16,160
कोई मेरे अनुगत कार्य कर रहा है और उसका वेतन मान है मुझे उसको

234
00:16:16,160 --> 00:16:20,320
देना है। मगर कई बार होता क्या है कि जब वो

235
00:16:20,320 --> 00:16:24,720
राशि वो धन मेरे हाथ में आ गया जिस समय

236
00:16:24,720 --> 00:16:28,800
उस समय मेरे अंदर लालच आ जाता है। अरे आज नहीं किसी और

237
00:16:28,800 --> 00:16:32,960
दिन दे देंगे। जैसे वेतन किसी को देना है और मैं आज ना देकर

238
00:16:32,960 --> 00:16:36,960
के चार दिन के बाद दूं हो सकता है कि आज उसको कोई औषधि लेनी

239
00:16:36,960 --> 00:16:41,040
हो अपने घर में किसी के लिए कोई रोगी हो उसके यहां वो उस चिंता

240
00:16:41,040 --> 00:16:45,120
में बैठा हो और मेरे मन में लालच आ गया कि कुछ दिन और इस पैसे

241
00:16:45,120 --> 00:16:49,200
को देख लूं अपने पास ₹100 उसको देने हैं कुछ दिन और बाद दे

242
00:16:49,200 --> 00:16:53,200
दूं ऐसा लालच आ गया या फिर मैंने किसी को दान स्वरूप भेंट स्वरूप

243
00:16:53,200 --> 00:16:57,280
दे देने को कहा था कि ठीक है मैं तुम्हें इतनी मदद कर दूंगा परंतु जिस

244
00:16:57,280 --> 00:17:01,280
समय मेरे पास धन आ गया तो मैंने सोचा कि अरे क्या फायदा

245
00:17:01,280 --> 00:17:05,360
या मैंने कुछ और बहाने ढूंढे उसको ना देने के या फिर मैंने

246
00:17:05,360 --> 00:17:05,860
किसी से

247
00:17:05,840 --> 00:17:10,000
लिया है और मेरे पास आ गया या फिर मुझे उसके

248
00:17:10,000 --> 00:17:14,240
लिए प्रयत्न करना है कोई कठिन कार्य करना है तो मेरे

249
00:17:14,240 --> 00:17:18,320
पास जब वो आ गया या कठिन कार्य के लिए तो मैं सोचूं कि क्या करना है

250
00:17:18,320 --> 00:17:22,560
उसके पास जाना है ये अभी-अभी मेरे पास हरी-हरी गड्डी है वो गायब

251
00:17:22,560 --> 00:17:26,640
हो जाएगी आता है निश्चित रूप से आता है विचार

252
00:17:26,640 --> 00:17:30,640
आपके पास हरी-हरी गड्डी यह आएगा जब वो गड्डी जा रही

253
00:17:30,640 --> 00:17:34,720
होगी ना तो हृदय में उसकी अभाव की अनुभूति होगी।

254
00:17:34,720 --> 00:17:38,720
उस अनुभूति से लड़ने के लिए उस विचार को परास्त करने के

255
00:17:38,720 --> 00:17:42,960
लिए आपके पास एक भावना होनी चाहिए और वही भावना

256
00:17:42,960 --> 00:17:47,120
है हमारे साथ श्री रघुनाथ तो किस बात की चिंता हमें

257
00:17:47,120 --> 00:17:51,360
जब ये विचार आते हैं निर्णय लेने की गड्डी कम करनी है कि

258
00:17:51,360 --> 00:17:55,680
नहीं करनी है यह धन इतना मोटा अमाउंट जाना है कि नहीं जाना

259
00:17:55,680 --> 00:17:59,920
है उस समय जब व्यक्ति विचार करता है नहीं रघुकुल रीत सदा चली

260
00:17:59,920 --> 00:18:03,920
आई प्राण जाई पर वचन ना जाई तो व्यक्ति वहां पर

261
00:18:03,920 --> 00:18:08,000
धर्मज्ञ हो पाता है। क्यों हो पाता है? क्योंकि उसको मालूम है कि दुनिया

262
00:18:08,000 --> 00:18:13,120
इधर से उधर हो सकती है। मगर मेरे पीछे खड़े कौन है? राम।

263
00:18:13,120 --> 00:18:17,200
और ये राम के पीछे खड़े होने की भावना आपको आती है भक्ति से।

264
00:18:17,200 --> 00:18:20,880
यह जो भावना है मेरे पीछे खड़े हैं राम। यह भावना आपको भक्ति

265
00:18:20,880 --> 00:18:24,880
से मिलती है। इसीलिए कहा जाता है कि भक्ति का बल

266
00:18:24,880 --> 00:18:29,040
एकत्र करिए। तभी आप अपने धर्म पर अ होकर के खड़े रह सकते हैं। आज

267
00:18:29,040 --> 00:18:33,760
हमने देखिए बहुत क्या कहते हैं?

268
00:18:33,760 --> 00:18:37,920
हमें ऐसे बहुत से वीडियोस प्राप्त हुए हैं अलंकार समाजियों

269
00:18:37,920 --> 00:18:42,560
के जिसमें कि वह गाली बक रहे हैं सीधेसीधे

270
00:18:42,560 --> 00:18:46,720
और गाली बक रहे हैं और बहुत गंदी गंदी अश्लील बातें वहां पर कर रहे हैं।

271
00:18:46,720 --> 00:18:50,720
हो सकता है कि जो सामने उनके प्रतिद्वंदी है उनका वो और भी ज्यादा

272
00:18:50,720 --> 00:18:54,960
निकृष्ट व्यक्ति हो। मगर गाली बकना मर्यादा नहीं है। यदि रावण

273
00:18:54,960 --> 00:18:59,520
ने मंदो सीता माता का हरण किया है तो श्री रामचंद्र जी ने मंदोदरी

274
00:18:59,520 --> 00:19:03,520
का हरण करने की मर्यादा को स्थापित नहीं किया है। आप

275
00:19:03,520 --> 00:19:07,520
गाली नहीं बख सकते। महाभारत के एक श्लोक का उदाहरण ले

276
00:19:07,520 --> 00:19:11,600
ले के क्योंकि कहीं भी किसी भी अंश में गाली को स्वीकृत नहीं

277
00:19:11,600 --> 00:19:16,000
किया गया। हर जगह गाली को निषेध किया गया है। तो ऐसी

278
00:19:16,000 --> 00:19:20,160
विपरीत परिस्थितियों में भी आप अपने धर्म पर कैसे

279
00:19:20,160 --> 00:19:24,320
टिके रह सकते हैं? विपरीत परिस्थितियों में जब आपके अंदर भक्ति

280
00:19:24,320 --> 00:19:28,400
का बल होगा तब आप अपने प्राणों को भी न्योछावर कर

281
00:19:28,400 --> 00:19:32,400
दे कर देने पर भी धर्म की रक्षा के लिए धर्म के निर्वाह के

282
00:19:32,400 --> 00:19:35,920
लिए खड़े हो पाएंगे। तो इसीलिए कहा जाता है कि आपको

283
00:19:35,920 --> 00:19:40,240
कोई सत चरित्र रखने के लिए सबसे सरल साधन है

284
00:19:40,240 --> 00:19:44,240
अच्छा चरित्र रखने के लिए तो वो है भक्ति। क्यों नहीं रह पाते

285
00:19:44,240 --> 00:19:48,880
ये अलंकार वाले? क्योंकि इनके पास भक्ति नहीं है।

286
00:19:48,880 --> 00:19:52,960
क्यों नहीं रह पाते ये इस्लाम को मानने वाले? क्योंकि इनके पास

287
00:19:52,960 --> 00:19:57,040
भक्ति नहीं। भक्ति है ही नहीं। तो जब

288
00:19:57,040 --> 00:20:01,120
भक्ति ही नहीं होगी तो आपके अंदर अपने धर्म के प्रति निष्ठा कहां से

289
00:20:01,120 --> 00:20:05,440
आएगी? और फिर वह सर्वशक्तिमान ईश्वर की जो आवश्यकता है वह क्यों है?

290
00:20:05,440 --> 00:20:09,440
जब तक ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं होगा, मोक्ष परम स्वतंत्र नहीं

291
00:20:09,440 --> 00:20:13,520
होगा तो आपका धर्म शाश्वत नहीं होगा। यह सब क्रम है।

292
00:20:13,520 --> 00:20:17,520
जब तक ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं होगा, उसके साथ

293
00:20:17,520 --> 00:20:21,680
एकत्व के रूप में प्राप्त होने वाला मोक्ष परम स्वतंत्र नहीं होगा

294
00:20:21,680 --> 00:20:25,760
तो आपका धर्म शाश्वत कहां से होगा? बदलेगा। अरे कर लेता हूं। अरे उसको

295
00:20:25,760 --> 00:20:29,920
चार दिन बाद दे दूंगा यार। 10 दिन और इस गड्डी के दर्शन कर लो।

296
00:20:29,920 --> 00:20:34,240
यह विचार आते हैं तो जो व्यक्ति अपने धर्म से चूकता है ना

297
00:20:34,240 --> 00:20:38,400
उसके पास भक्ति का बल नहीं है। यह मानना चाहिए तो फिर वो कालिया

298
00:20:38,400 --> 00:20:44,400
जिन अथवा परी की साधना में व्यस्त है। ऐसा फिर मान लेना चाहिए।

299
00:20:48,400 --> 00:20:51,360
अच्छा।

300
00:20:51,360 --> 00:20:55,360
भक्ति ही मनुष्य में सबसे अधिक गुणों की स्थापना कर सकती है

301
00:20:55,360 --> 00:20:59,600
और संसार को अनेक प्रकार के अनर्थों से बता बचा सकती है।

302
00:20:59,600 --> 00:21:03,600
श्री समर्थ की सूक्ष्म दृष्टि से भला इतनी बड़ी बात

303
00:21:03,600 --> 00:21:07,680
कैसे छूट सकती थी। इसलिए उन्होंने धर्म मार्ग में भक्ति को

304
00:21:07,680 --> 00:21:11,840
बहुत बड़ा स्थान दिया है। उन्होंने जनसाधारण के लिए तो भक्ति की व्यवस्था दी

305
00:21:11,840 --> 00:21:16,160
ही है। पर साथ ही ऐसे लोगों के लिए भी भक्ति की आवश्यकता बतलाई

306
00:21:16,160 --> 00:21:20,400
है। जो संसार से सब प्रकार से विरक्त होकर

307
00:21:20,400 --> 00:21:24,480
उनके उच्च आदर्श तक पहुंच गए हो। उनकी आज्ञा है कि जो

308
00:21:24,480 --> 00:21:28,720
लोग परमात्मा तक पहुंच गए हो उन्हें उन्हें भी भक्ति यानी तत्वदर्शी

309
00:21:28,720 --> 00:21:32,880
संत सन्यासी विरक्त संत उन्हें भी भक्ति

310
00:21:32,880 --> 00:21:37,200
मार्ग का कभी त्याग नहीं करना चाहिए बल्कि सदा उस पर आरूढ़ रहना

311
00:21:37,200 --> 00:21:41,360
चाहिए। मनुष्य मात्र को सनमार्ग में लगाए रखने वाले इस

312
00:21:41,360 --> 00:21:45,680
दूसरे साधन का भी श्री समर्थ ने जो विवेचन और प्रतिपादन

313
00:21:45,680 --> 00:21:49,760
किया है वह भी उनकी लोक कल्याणकारिणी बुद्धि का एक अच्छा

314
00:21:49,760 --> 00:21:54,160
नमूना है। संसार के सभी लोग विरक्त त्यागी और वीतराग

315
00:21:54,160 --> 00:21:58,160
नहीं हो सकते। अधिकांश लोगों को संसार में रहकर गृहस्थ

316
00:21:58,160 --> 00:22:02,240
घर गृहस्ती के कामों में ही जीवन बिताना पड़ेगा। ऐसे अधिक से

317
00:22:02,240 --> 00:22:04,000
अधिक साधन करें।

318
00:22:04,000 --> 00:22:08,320
ऐसे लोगों के लिए श्री समर्थ का आदेश है कि वह गृहस्थ

319
00:22:08,320 --> 00:22:12,400
आश्रम में रहकर ही परमार्थ का अधिक से अधिक साधन करें। उन्होंने इस

320
00:22:12,400 --> 00:22:16,400
गृहस्थ आश्रम का बहुत अधिक महत्व बतलाया है। इन

321
00:22:16,400 --> 00:22:22,400
लोक तथा परलोक के साधन का मुख्य आधार है।

322
00:22:22,400 --> 00:22:26,400
इससे सिद्ध है कि श्री समर्थ कभी यह नहीं चाहते थे कि सभी लोग

323
00:22:26,400 --> 00:22:29,040
घर बार छोड़कर

324
00:22:29,040 --> 00:22:33,040
सिर मुड़ा ले। क्योंकि ना तो सब लोग साधुओं का सा आचरण ही

325
00:22:33,040 --> 00:22:37,280
कर सकते हैं ना सब लोगों के त्यागी होने से संसार

326
00:22:37,280 --> 00:22:41,680
का काम ही चल सकता है। जो बने हुए साधु और महात्मा लोगों को

327
00:22:41,680 --> 00:22:46,960
चारों ओर ठगते फिरते हैं।

328
00:22:46,960 --> 00:22:50,960
उनसे भी श्री समर्थ ने सबको बहुत सचेत किया है। उन्होंने

329
00:22:50,960 --> 00:22:55,360
ऐसे पाखंडियों के बहुत से लक्षण बतलाए हैं और सबको ऐसे पाखंड

330
00:22:55,360 --> 00:22:59,440
तथा पाखंडियों से बचने के उपदेश दिए हैं। दिया है। एक सच्चा

331
00:22:59,440 --> 00:23:03,440
साधु और महात्मा इसके सिवा और कर ही क्या सकता है। एक

332
00:23:03,440 --> 00:23:07,600
सच्चे हिंदू के समान श्री समर्थ ने वर्णाश्रम धर्म पर

333
00:23:07,600 --> 00:23:11,680
अपनी पूरी आस्था प्रकट की है। क्या बात है? अब तो

334
00:23:11,680 --> 00:23:15,680
मुझे बहुत ज्यादा प्रेम हो रहा है धीरे-धीरे इनके चरित्र को जैसे जैसे जान रहा

335
00:23:15,680 --> 00:23:19,280
हूं। यदि सच पूछिए तो इस संबंध में

336
00:23:19,280 --> 00:23:23,360
अच्छा गुरुदेव ऐसे ही नहीं कहते हैं कि वो पढ़ो,

337
00:23:23,360 --> 00:23:27,360
दास बोध पढ़ो। इसलिए कहते हैं इनमें और

338
00:23:27,360 --> 00:23:31,520
शंकराचार्य में क्या अंतर है बताइए? पर

339
00:23:31,520 --> 00:23:36,160
फिर भी वह वर्णाश्रम संस्था के अंधभक्त

340
00:23:36,160 --> 00:23:40,160
भी नहीं है। यानी वर्णाश्रम के नाम पर जो क्या कहते

341
00:23:40,160 --> 00:23:44,240
हैं? घृणा मूलक वर्ण वो जातिवाद की जो प्रचार

342
00:23:44,240 --> 00:23:48,800
इत्यादि कर दिया जाता है जिसके कारण जो व्यवस्था मूलक शास्त्र मूलक जातिवाद

343
00:23:48,800 --> 00:23:52,800
है उसकी लोग अवमानना करने लगते हैं तो इन्होंने वहां पर उस पर चोट

344
00:23:52,800 --> 00:23:56,800
की है ऐसी चीजों पर उन्होंने ब्राह्मणों को सबसे

345
00:23:56,800 --> 00:24:01,200
अधिक पूज्य अवश्य कहा है पर साथ ही साथ यह भी कहा है कि भगवान

346
00:24:01,200 --> 00:24:05,680
जातपात कुछ भी नहीं देखते बिल्कुल सही बात है हम भी यही कहते हैं

347
00:24:05,680 --> 00:24:09,920
कि जातपात का अर्थ व्यवहार में भगवान

348
00:24:09,920 --> 00:24:14,960
यानी परमार्थ में नहीं है।

349
00:24:14,960 --> 00:24:19,040
वह केवल भाव के भूखे हैं। और यह दोनों बातें एक

350
00:24:19,040 --> 00:24:23,360
ही साथ एक सांस में कही गई है। इस प्रकार आपने मनुष्य

351
00:24:23,360 --> 00:24:27,600
मात्र के साम्य की भी स्थापना की है। वस्तुतः जो मनुष्य

352
00:24:27,600 --> 00:24:32,080
दूसरे मनुष्यों को अपने से छोटा, नीच, तुच्छ या हीन समझता हो।

353
00:24:32,080 --> 00:24:36,160
वह स्वयं कभी अब यह छोटा नीच

354
00:24:36,160 --> 00:24:40,640
तुच्छ या हीन यह सब बातों इन सब शब्दों का पर्यावरण

355
00:24:40,640 --> 00:24:44,720
किस में घृणा में अगर व्यवस्था में देखा जाए तो भाई

356
00:24:44,720 --> 00:24:49,200
क्या मुझे अपने से छोटे भाई को अपने से छोटा नहीं मानना चाहिए

357
00:24:49,200 --> 00:24:53,440
क्या यह समझना चाहिए कि उसका और मेरा जन्म दिनांक एक ही है

358
00:24:53,440 --> 00:24:57,760
तो इसका पर्यावसान कहां है घृणा मूलक नहीं होना चाहिए व्यवस्था

359
00:24:57,760 --> 00:25:01,760
मूलक होना चाहिए कि कोई अगर मुझसे पूछे कि आपका छोटा छोटा भाई

360
00:25:01,760 --> 00:25:05,840
आपसे कितना छोटा है तो मैं बताऊंगा कि भैया चार साल छोटा है कि पांच साल छोटा

361
00:25:05,840 --> 00:25:10,880
है कि छ साल छोटा है हम

362
00:25:10,880 --> 00:25:15,040
अन्यथा जब सब कुछ देश काल परिस्थिति का भेद ही नहीं रखा

363
00:25:15,040 --> 00:25:19,120
जाएगा तो तो सबको मोक्ष ही प्राप्त हो गया फिर तो संसार है ही नहीं

364
00:25:19,120 --> 00:25:24,240
भेद है ही नहीं सब हां

365
00:25:24,240 --> 00:25:26,400
तो

366
00:25:26,400 --> 00:25:30,480
वस्तुत जो मनुष्य दूसरे मनुष्यों को अपने से छोटा

367
00:25:30,480 --> 00:25:33,200
नीच

368
00:25:33,200 --> 00:25:37,680
या हीन समझता हो वह स्वयं कभी मनुष्य हो ही नहीं सकता। गौरव

369
00:25:37,680 --> 00:25:41,680
अपने आपको दूसरे से बड़ा समझने में नहीं है बल्कि अपने

370
00:25:41,680 --> 00:25:45,840
आप को सबसे छोटा समझने और भूले हुए लोगों का हाथ पकड़

371
00:25:45,840 --> 00:25:49,840
कर और उन्हें गले लगाकर ठीक मार्ग पर लाने में ही मनुष्य की

372
00:25:49,840 --> 00:25:54,160
महत्ता है। जनता को लोक कल्याण

373
00:25:54,160 --> 00:25:58,400
का यह प्रशस्त मार्ग दिखलाने में भी समर्थ नहीं चुके हैं।

374
00:25:58,400 --> 00:26:02,480
अभी मैं बहुत जल्द एक वीडियो लाने वाला हूं जो छूत अछूत

375
00:26:02,480 --> 00:26:06,480
की जो बात है। कहां पर लागू है और उसका कितना दुष्प्रचार किया जाता

376
00:26:06,480 --> 00:26:10,800
है। कितने अंशों में छूत अछूत और यह जो स्पष्टता

377
00:26:10,800 --> 00:26:14,880
स्पष्टता की बात है शास्त्रों से जो है वो कितने अंश में है?

378
00:26:14,880 --> 00:26:19,120
क्या एक तरफ से प्रत्येक शूद्र मात्र के लिए जो

379
00:26:19,120 --> 00:26:23,680
स्पष्टता का व्यवहार निषेध किया गया है। क्या है? तो इस पर मैं एक बहुत

380
00:26:23,680 --> 00:26:26,400
एक वृहद विषय एक वीडियो लाने वाला हूं।

381
00:26:26,400 --> 00:26:31,440
तो ऐसा नहीं है कि सबको एक तरफ से शूद्र मात्र को जो है छुआछूत

382
00:26:31,440 --> 00:26:35,440
निषेध कर दिया है। शूद्र वर्ण में आने वाले अमुक

383
00:26:35,440 --> 00:26:39,680
कार्य को करने वाले जो संलग्न है अभी भी उसमें अस्पष्टता

384
00:26:39,680 --> 00:26:43,680
दी गई है और उसमें अस्पष्टता पतित ब्राह्मणों की भी दी गई है जो अपने धर्म

385
00:26:43,680 --> 00:26:47,760
से चूक चुके हैं या फिर उन लोगों की भी दी गई जो है तो

386
00:26:47,760 --> 00:26:51,840
उच्च कुल में मगर उन्होंने निषेध भक्षण कर रखा

387
00:26:51,840 --> 00:26:56,560
है उनके साथ भी अस्पष्टता का दिया गया है प्रावधान

388
00:26:56,560 --> 00:27:00,880
तो इस पर एक हम बहुत जागरूकता वाला वीडियो लाने वाले हैं।

389
00:27:00,880 --> 00:27:04,000
अच्छा

390
00:27:04,000 --> 00:27:08,080
अब जैसे आदित्य वाहिनी है, हिंदू राष्ट्र अभियान है। इन सब में

391
00:27:08,080 --> 00:27:12,480
क्या ऐसा कहा गया कि आपको शूद्रों को अपनी सेना में भर्ती नहीं करना है? नहीं। ब्राह्मण,

392
00:27:12,480 --> 00:27:16,720
क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सभी का स्वागत है। सभी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर

393
00:27:16,720 --> 00:27:20,960
के धर्म की रक्षा के लिए खड़े होना है हमें। तो वो

394
00:27:20,960 --> 00:27:24,960
स्पष्टता, अस्पष्टता की बात कहां पर लागू होती है? और जो ये

395
00:27:24,960 --> 00:27:28,960
विरोधी लोग हैं सनातन विरोधी इन्होंने किस तरीके से इन शब्दों को बुनाया है

396
00:27:28,960 --> 00:27:33,040
इस पर एक वृहद वीडियो लाने वाले हैं। संसार में रहने

397
00:27:33,040 --> 00:27:37,120
वालों के लिए लोकमत का आदर करना बहुत ही आवश्यक होता है। देखिए लोकमत की बात भी है।

398
00:27:37,120 --> 00:27:41,440
इसमें मैं क्या कहूं बिल्कुल ऐसा लग रहा है कि गुरुदेव ही है। ग्रंथ में गुरुदेव

399
00:27:41,440 --> 00:27:45,440
ही है। लोकमत का आदर करना भी बहुत आवश्यक होता है।

400
00:27:45,440 --> 00:27:49,520
जो लोकमत को तुच्छ समझता है और उसकी उपेक्षा की दृष्टि से

401
00:27:49,520 --> 00:27:53,920
देखता है। वह बहुदा उदंड और स्वेच्छाकारी हो जाता है। श्री रामचंद्र

402
00:27:53,920 --> 00:27:57,920
ने क्या कहा था? सीता माता के परित्याग के समय वो

403
00:27:57,920 --> 00:28:02,480
जानते हैं कि सीता माता निर्दोष है। परंतु लोकमत

404
00:28:02,480 --> 00:28:06,480
की रक्षा करने के लिए ऐसी प्रजा की रक्षा करने के

405
00:28:06,480 --> 00:28:10,720
लिए ऐसे ऐसी प्रजा के कष्ट को हरने के लिए जो अपने

406
00:28:10,720 --> 00:28:14,880
स्वधर्म निष्ठ है। जो अपने स्वधर्म का पालन करती

407
00:28:14,880 --> 00:28:19,120
है। पूरी तन्मयता के साथ उसके कष्ट को हरने

408
00:28:19,120 --> 00:28:23,200
के लिए अपनी निर्दोष पत्नी को भी

409
00:28:23,200 --> 00:28:27,280
जो है कष्ट दिया और निर्दोष पत्नी को कष्ट देने के

410
00:28:27,280 --> 00:28:31,440
रूप में स्वयं भी कष्ट को प्राप्त किया। ऐसा तो नहीं है उन्होंने दूसरे दिन

411
00:28:31,440 --> 00:28:35,440
विवाह कर लिया हो। कर सकते थे मगर नहीं

412
00:28:35,440 --> 00:28:39,760
किया। उन्होंने अपने को भी उस विरह की अग्नि

413
00:28:39,760 --> 00:28:45,120
में जलाया जिस कष्ट की अग्नि में सीता माता जली।

414
00:28:45,120 --> 00:28:51,120
परंतु उन्होंने अपनी प्रजा को कष्ट नहीं दिया।

415
00:28:51,120 --> 00:28:55,600
तो अपनी पत्नी से दूर रहने की स्थिति में भी

416
00:28:55,600 --> 00:28:59,760
एक पत्नी व्रत धारण पूर्वक कैसे अपनी पत्नी को समर्पित

417
00:28:59,760 --> 00:29:03,840
जीवन जीना चाहिए यह भी हमें श्री रामचंद्र जी से सीखने को

418
00:29:03,840 --> 00:29:07,920
मिलता है। इसीलिए चाहे दुनिया में दुनिया

419
00:29:07,920 --> 00:29:11,920
इधर से उधर हो जाए पर एक मुसलमान स्त्री भी

420
00:29:11,920 --> 00:29:16,000
अपने मन में ये कामना करती है कि मुझे पति मिले तो राम जैसा

421
00:29:16,000 --> 00:29:20,000
मिले। मुझे पति ये इन

422
00:29:20,000 --> 00:29:24,000
जैसा ना मिले। खुदा के संदेश वाहक जैसा इतना तो करती

423
00:29:24,000 --> 00:29:28,000
है ना नहीं तो वह तो फिर कहेगा उन्होंने

424
00:29:28,000 --> 00:29:32,560
तो कह दिया है उनकी ओर से कि संसार की प्रत्येक स्त्री मेरे लिए

425
00:29:32,560 --> 00:29:35,120
वो है हलाल

426
00:29:35,120 --> 00:29:39,200
वैध है तो उनका तो कहना ही क्या है

427
00:29:39,200 --> 00:29:45,200
खैर

428
00:29:45,360 --> 00:29:49,520
तो यही विचार यहां भी प्रकट हो रहे हैं जो रामायण में श्री रामचंद्र जी ने कहा है

429
00:29:49,520 --> 00:29:53,600
और समाज पर अनेक प्रकार के अत्याचार करने लगता है। यदि यह

430
00:29:53,600 --> 00:29:57,840
सब बातें ना हो तो भी उसके द्वारा समाज का कुछ ना कुछ अपकार अवश्य

431
00:29:57,840 --> 00:30:02,080
होता है। अतः समर्थ की यह भी आज्ञा है कि लोकमत के विरुद्ध

432
00:30:02,080 --> 00:30:06,160
कभी कोई कार्य नहीं करना चाहिए। सामंजस्य बैठाकर चलना

433
00:30:06,160 --> 00:30:10,320
चाहिए। उन्होंने तो यहां तक कहा है कि लोक मत के विरुद्ध

434
00:30:10,320 --> 00:30:14,400
आचरण करने करना ही सबसे बड़ा पाखंड है और पाखंड

435
00:30:14,400 --> 00:30:19,440
सदा अवस्थाओं अवस्थाओं में त्याज्य है।

436
00:30:19,440 --> 00:30:23,520
मतलब यह है कि श्री समर्थ ने आचार और विचार दोनों की ही शुद्धता पर

437
00:30:23,520 --> 00:30:27,680
बहुत जोर दिया है। मनुष्य को जन्म से मरण

438
00:30:27,680 --> 00:30:31,680
पर्यंत अपना आचार और विचार दोनों को कैसे रखना चाहिए यही

439
00:30:31,680 --> 00:30:36,240
इस दास बोध में बतलाया गया है और बहुत ही विषद रूप से बतलाया गया है।

440
00:30:36,240 --> 00:30:40,480
ज्ञान की सबसे अधिक सीमा अधिक महिमा बतलाई गई है क्योंकि आचार और विचार

441
00:30:40,480 --> 00:30:44,640
दोनों की ही शुद्धि उसी से होती है और इस ज्ञान की प्राप्ति का उपाय

442
00:30:44,640 --> 00:30:48,720
उन्होंने सद्गुरु की प्राप्ति और सेवा बतलाया है। बात भी बहुत

443
00:30:48,720 --> 00:30:50,400
ठीक है। लोग अनेक प्रकार के ज्ञान

444
00:30:50,400 --> 00:30:54,640
प्राप्त करते हैं। पर समर्थ उन ज्ञानों को ज्ञान नहीं मानते। और यदा

445
00:30:54,640 --> 00:30:58,800
यदि विचार पूर्वक देखा जाए तो वह ज्ञान है ही किस

446
00:30:58,800 --> 00:31:02,800
काम का जिससे इहोक और परलोक दोनों ना सुधरे। इसी

447
00:31:02,800 --> 00:31:07,280
बात को संशय आत्मा विनश्यति भगवत गीता चार चार 40 संशय

448
00:31:07,280 --> 00:31:11,280
ज्ञान के अभाव में क्या होता है जहां ज्ञान नहीं है वहां क्या है अंधकार

449
00:31:11,280 --> 00:31:15,520
अज्ञान संशय और संशय आत्मा विनश्यति जिसके

450
00:31:15,520 --> 00:31:19,760
मन में संशय है वह ना तो इस लोक में सुखी रह सकता है परलोक

451
00:31:19,760 --> 00:31:23,920
की तो बात ही क्या प्राय कहा जाता है कि

452
00:31:23,920 --> 00:31:28,080
आधुनिक पाश्चात्य जातियों ने ज्ञान का भंडार बहुत

453
00:31:28,080 --> 00:31:32,240
अधिक बढ़ाया है। उसकी अनेक प्रकार से वृद्धि की है। पर

454
00:31:32,240 --> 00:31:36,400
उस ज्ञान का उपयोग कैसे कामों में होता है? एक दूसरे को काटने, मारने,

455
00:31:36,400 --> 00:31:40,960
लूटने और दबाने में ही ना विकास विमर्श

456
00:31:40,960 --> 00:31:45,120
गुरुदेव का अद्भुत ग्रंथ है। विकास के नाम पर आपने टेक्नोलॉजी

457
00:31:45,120 --> 00:31:49,600
तो ले ज्ञान से मगर उसका पर्यावसान

458
00:31:49,600 --> 00:31:53,600
किस में हो रहा है? ना मिट्टी सुलभ है, ना पानी सुलभ

459
00:31:53,600 --> 00:31:57,840
है, ना हवा सुलभ है, ना हंसी सुलभ है। क्या सुलभ

460
00:31:57,840 --> 00:32:03,200
है? स्मार्ट सिटी के नाम पर बताइए

461
00:32:03,200 --> 00:32:07,200
उसी प्रकार तो वह ज्ञान किसी कार्य का

462
00:32:07,200 --> 00:32:11,200
नहीं है तो फिर ऐसे ज्ञान में मानव जाति का उपकार हुआ या उपकार यदि

463
00:32:11,200 --> 00:32:15,440
उपकार हुआ तो ऐसे ज्ञान की आवश्यकता ही क्या है

464
00:32:15,440 --> 00:32:19,600
ऐसे ज्ञान से तो ना होना कहीं अच्छा है फिर कुछ

465
00:32:19,600 --> 00:32:23,760
ज्ञान ऐसा भी होता है जो लोकोपकार के लिए उपयोगी हो

466
00:32:23,760 --> 00:32:27,920
सकता है लोग इस प्रकार का ज्ञान साधारण शिक्षकों और पुस्तकों आदि

467
00:32:27,920 --> 00:32:33,120
से प्राप्त कर लेते हैं। पर फिर भी उसका ठीक-ठीक उपयोग करना नहीं जानते।

468
00:32:33,120 --> 00:32:37,440
इसलिए श्री समर्थ ने कहा है कि सच्चा और वास्तविक

469
00:32:37,440 --> 00:32:42,320
ज्ञान वही है जो इहलोक और परलोक के साधन में पूर्ण रूप से सहायक हो।

470
00:32:42,320 --> 00:32:46,400
इसके सिवा जितना ज्ञान है वह सब अज्ञान की कोटि

471
00:32:46,400 --> 00:32:50,400
में रखने के लायक है। और फिर ऐसे ज्ञान का वास्तविक उपयोग तभी

472
00:32:50,400 --> 00:32:54,400
हो सकता है जब वह सद्गुरु से प्राप्त किया जाए। अब

473
00:32:54,400 --> 00:32:58,800
चाहे प्राचीनों की दृष्टि से देखिए चाहे अर्वाचीनों

474
00:32:58,800 --> 00:33:03,920
की दृष्टि से चाहे पौवाकात की दृष्टि से देखिए

475
00:33:03,920 --> 00:33:07,920
और चाहे पाश्चात्यों की दृष्टि से सद्गुरु की आवश्यकता हर

476
00:33:07,920 --> 00:33:12,160
प्रकार से सिद्ध होती है। और समर्थ की आज्ञा है कि ऐसा ही सद्गुरु

477
00:33:12,160 --> 00:33:16,400
ढूंढना चाहिए। उसकी शरण में जाना चाहिए। उससे ज्ञान

478
00:33:16,400 --> 00:33:18,320
प्राप्त करना चाहिए। अपने

479
00:33:18,320 --> 00:33:23,040
दैनिक जीवन व्यवहारों में उस ज्ञान का उपयोग करना चाहिए।

480
00:33:23,040 --> 00:33:28,160
और संसार के सब लोगों में उस ज्ञान का प्रचार करना चाहिए।

481
00:33:28,160 --> 00:33:32,480
साधारणत धार्मिक आचार्य और समाज सुधारक राजनीति के अनभिज्ञ

482
00:33:32,480 --> 00:33:37,200
हुआ करते हैं। अथवा कम से कम राजनीति के साथ कोई संपर्क नहीं रखते।

483
00:33:37,200 --> 00:33:41,600
पर श्री समर्थ में यह बात नहीं थी। वे राजनीति के बहुत बड़े ज्ञाता

484
00:33:41,600 --> 00:33:45,680
थे और लोगों को समय-समय पर राजनीति के गढ़ तत्वों का उपदेश देते

485
00:33:45,680 --> 00:33:49,680
रहते थे। इस दास मोद में भी दो तीन समासों

486
00:33:49,680 --> 00:33:53,680
में राजनीति संबंधी अनेक ऐसी बातें बतलाई गई हैं जो

487
00:33:53,680 --> 00:33:58,000
सभी कालों, सभी देशों और सभी जातियों के लिए समान

488
00:33:58,000 --> 00:34:02,240
रूप से उपयोगी रही हैं। भविष्य में भी रहेंगी। श्री

489
00:34:02,240 --> 00:34:06,720
समर्थ को राजनीतिक विषय को हाथ में लेने की आवश्यकता

490
00:34:06,720 --> 00:34:11,040
कदाचित देश की उस समय की दुराव

491
00:34:11,040 --> 00:34:15,200
दुर्वस्था के कारण पड़ी पड़ी थी। उन्होंने धर्म

492
00:34:15,200 --> 00:34:19,520
प्रचार और लोक कल्याण का कार्य आरंभ करने से पहले सारे

493
00:34:19,520 --> 00:34:23,760
भारत में भ्रमण किया था। उसका कोना कोना छान डाला था।

494
00:34:23,760 --> 00:34:28,320
अतः सारे देश और समाज की हीन अवस्था उनके लिए करतलगत

495
00:34:28,320 --> 00:34:32,640
हो रही थी। ऐसी अवस्था में यदि यह राजनीति की ओर ध्यान ना देते

496
00:34:32,640 --> 00:34:33,680
तो उनका उद्देश्य

497
00:34:33,680 --> 00:34:38,560
कभी पूर्ण रूप से सिद्ध नहीं हो सकता था। संयोग से उन्हें

498
00:34:38,560 --> 00:34:42,560
छत्रपति महाराज शिवाजी के समान योग्य शिष्य और

499
00:34:42,560 --> 00:34:46,640
कार्यकर्ता भी मिल गए थे। अतः उन्हें राजनैतिक तत्वों पर और

500
00:34:46,640 --> 00:34:50,640
भी गढ़ विचार करने का बहुत अच्छा अवसर मिला। बल्कि हम कह

501
00:34:50,640 --> 00:34:54,960
सकते हैं कि उन्होंने इस बात की बहुत बड़ी आवश्यकता उन्हें इस बात की बहुत बड़ी

502
00:34:54,960 --> 00:34:59,440
आवश्यकता आ पड़ी थी। यदि इन सब बातों का विचार करते हुए हम श्री

503
00:34:59,440 --> 00:35:03,520
समर्थ की राजनीति में भी अन्य विषयों की ही भांति परम

504
00:35:03,520 --> 00:35:07,680
दक्ष तथा निपुण पाते हैं। श्री

505
00:35:07,680 --> 00:35:11,920
समर्थ को राजनीति में भी अन्य विषयों की भांति परम दक्ष तथा

506
00:35:11,920 --> 00:35:16,160
निपुण पाते हैं। तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। तात्पर्य

507
00:35:16,160 --> 00:35:20,240
यह है कि चाहे जिस दृष्टि से देखिए समर्थ छोटे

508
00:35:20,240 --> 00:35:24,560
बड़े सभी विषयों के उभट विद्वान और परम ज्ञाता

509
00:35:24,560 --> 00:35:28,640
थे। वे सभी विद विद्याओं और कलाओं के

510
00:35:28,640 --> 00:35:32,720
पूर्ण थे। कलाओं से परिपूर्ण थे। और संसार के इस

511
00:35:32,720 --> 00:35:36,880
प्रकार के पूर्ण पुरुष देवता और अवतार माने जाते हैं। ऐसे ही महापुरुषों

512
00:35:36,880 --> 00:35:40,880
के उपदेश और शिक्षाएं छोटे बड़े

513
00:35:40,880 --> 00:35:45,920
शिक्षित अशिक्षित स्त्री पुरुष और बाल वृद्ध

514
00:35:45,920 --> 00:35:50,320
सबके काम की होती है। श्री समर्थ के इन उपदेशों और शिक्षाओं

515
00:35:50,320 --> 00:35:54,480
आदि का महत्व इसलिए और भी अधिक हो जाता है कि वह बहुत ही

516
00:35:54,480 --> 00:35:58,800
तौली हुई और विचार पूर्ण और उनमें

517
00:35:58,800 --> 00:36:03,280
की अधिकांश बातें स्वयं श्री समर्थ की अनुभव की हुई होती हैं।

518
00:36:03,280 --> 00:36:07,520
गुरुदेव ने कई अपने प्रवचनों में और

519
00:36:07,520 --> 00:36:11,600
वक्तव्यों में बताया है कि एक आदर्श

520
00:36:11,600 --> 00:36:15,680
जो आचार्य गण होते हैं या मुख्य रूप से अगर शंकराचार्य की बात करें तो

521
00:36:15,680 --> 00:36:19,760
उनका मुख्य कार्य क्या है? आचार्य के रूप में उनका

522
00:36:19,760 --> 00:36:24,000
मुख्य कार्य होता है कि जो काल क्रम से विलुप्त

523
00:36:24,000 --> 00:36:28,080
ज्ञान विज्ञान है उसको जो है अपने तपोबल के

524
00:36:28,080 --> 00:36:32,400
द्वारा पुन उद्भाषित करना और

525
00:36:32,400 --> 00:36:36,640
अ एक उनकी भाषा में तो मुझे नहीं याद है मगर

526
00:36:36,640 --> 00:36:40,880
एक उनका आता है कार्य जो उन्होंने बताया है कि सिस्टमेटिकली

527
00:36:40,880 --> 00:36:45,040
उसको कहते हैं वो सूत्र सूत्र शैली में देना तो

528
00:36:45,040 --> 00:36:49,600
काल क्रम से विलुप्त है उसको पुन्हा परिभाषित करना और जो है

529
00:36:49,600 --> 00:36:54,320
उसको जो है सूत्र शैली में देना। एक कार्य और है जो मुझे अभी

530
00:36:54,320 --> 00:36:58,400
विस्मरण हो गया है पर बहुत ही सूत्रात्मक है तो कुछ वही भाव यहां

531
00:36:58,400 --> 00:37:03,120
पर भी आ रहा है श्री समर्थ रामदास जी कि तौली हुई चीजें जैसे

532
00:37:03,120 --> 00:37:07,280
उन्होंने सूत्रात्मक शैली में जैसे गुरुदेव भगवान ने कितने सरलता

533
00:37:07,280 --> 00:37:11,440
से सूत्रात्मक शैली में बता दिया कि जीव की चाह का जो वास्तविक विषय

534
00:37:11,440 --> 00:37:15,520
है उसी का नाम सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर है। उसी का नाम भगवान

535
00:37:15,520 --> 00:37:19,680
ये सूत्रात्मक शैली कहते हैं। सिद्धांत समझ में आ गया। बहुत लंबी

536
00:37:19,680 --> 00:37:23,760
चौड़ी बातें नहीं करनी पड़ी। मेरे जानकारी में

537
00:37:23,760 --> 00:37:27,840
एक व्यक्ति थे जो इस के बहुत प्रबल प्रचारक थे

538
00:37:27,840 --> 00:37:32,000
और वह मेरे को सदैव पेन कॉपी लेकर के कृष्ण का एक्सपेंशन

539
00:37:32,000 --> 00:37:36,160
ये है कृष्ण का एक्सपेंशन वो है यह सब बातें बताने का प्रयास

540
00:37:36,160 --> 00:37:40,320
करते थे। एक बार उन्होंने मुझसे मेरी क्योंकि

541
00:37:40,320 --> 00:37:44,480
मैं गुरुदेव को गुरुदेव का अनुसरण कर रहा था उन दिनों

542
00:37:44,480 --> 00:37:47,600
और उनको सुनता था। उनके उनकी चीजें पढ़ता था। उनकी

543
00:37:47,600 --> 00:37:51,760
बताई हुई चीजों को करने की कोशिश करता था। तो उन्होंने

544
00:37:51,760 --> 00:37:56,160
एक दिन मेरी योग्यता का आकलन करने के लिए मुझसे पूछ लिया

545
00:37:56,160 --> 00:38:00,160
कि बताओ अच्छा तुम धर्म क्या है? एक इस

546
00:38:00,160 --> 00:38:04,320
वाले व्यक्ति ने एक शंकराचार्य के अभी-अभी बने

547
00:38:04,320 --> 00:38:08,560
अल्पज्ञ शिष्य से है ना अभी तो मुझको तब भी काफी समय हो गया

548
00:38:08,560 --> 00:38:12,880
छ सात वर्ष होने जा रहे हैं। मगर

549
00:38:12,880 --> 00:38:17,120
उस समय जब मैं नवीन था उस रास्ते में और अल्पज्ञ था। बहुत कम

550
00:38:17,120 --> 00:38:21,600
सुन पाया था गुरुदेव उस समय एक वरिष्ठ

551
00:38:21,600 --> 00:38:25,600
सीनियर व्यक्ति इसका पूछ रहा है। उस समय मुझे यह भी यह

552
00:38:25,600 --> 00:38:29,680
दिशा भी प्राप्त नहीं हुई है कि मुझे अपने जीवन में धर्म के लिए ही समय बिताना

553
00:38:29,680 --> 00:38:33,840
है। यह भी नहीं है। एक गृहस्थ व्यक्ति जिसके उद्देश्य

554
00:38:33,840 --> 00:38:38,080
में यही है कि मकान कैसे बनना है या मकान बनना ना भी हो तो अपने जीवन

555
00:38:38,080 --> 00:38:42,080
को देखना है। दाल भात का इंतजाम कैसे करना है। रोटी कपड़ा और

556
00:38:42,080 --> 00:38:46,800
मकान इन सब में पूरा ध्यान है। उस समय पर शंकराचार्य

557
00:38:46,800 --> 00:38:51,040
के एक अल्पज्ञ एक अभी-अभी नवीन शिष्य

558
00:38:51,040 --> 00:38:55,280
से एक इसन के सात आठ 10 साल पुराने

559
00:38:55,280 --> 00:38:59,280
अनुगामी ने प्रश्न किया अच्छा बताओ धर्म क्या है? तो

560
00:38:59,280 --> 00:39:02,640
उस नवीन शिष्य ने वहां पर उसको बता दिया सूत्रात्मक शैली

561
00:39:02,640 --> 00:39:06,880
में कि जीव की चाह के वास्तविक विषय

562
00:39:06,880 --> 00:39:10,960
को परिभाषित कर सकने वाले वेदाद शास्त्रों द्वारा

563
00:39:10,960 --> 00:39:14,960
जीव की चाह के वास्तविक विषय को प्राप्त कराने के

564
00:39:14,960 --> 00:39:18,960
निमित्त बताई गई मर्यादा का नाम धर्म है। और जो वो

565
00:39:18,960 --> 00:39:23,040
स्कॉन का अनुगामी था पेन कॉपी लेकर एक्सपेंशन बता रहा था। उसका मुंह

566
00:39:23,040 --> 00:39:27,280
इतना बड़ा खुल गया। ये क्या था? और फिर वो क्या बोलता है मालूम

567
00:39:27,280 --> 00:39:31,280
है? फिर वह बोलता है इतनी क्रष्ट वाली नहीं

568
00:39:31,280 --> 00:39:35,680
चाहिए सरल वाली परिभाषा चाहिए धर्म की

569
00:39:35,680 --> 00:39:39,680
ठीक है तो इसको कहते हैं तौली

570
00:39:39,680 --> 00:39:43,760
हुई सूत्रात्मक शैली में जब आपको सिद्धांत प्राप्त होते हैं

571
00:39:43,760 --> 00:39:47,840
जिनका ईश्वर जगत बनाता ही नहीं बनता भी है उन्हीं का ईश्वर श्री

572
00:39:47,840 --> 00:39:52,480
राम कृष्ण आदि के रूपों में अवतार लेता है। गुरुदेव से यदि कोई स्वतंत्र

573
00:39:52,480 --> 00:39:56,640
रूप से बात करने की अह अगर जैसे उनका

574
00:39:56,640 --> 00:40:00,800
दिन होता है राष्ट्रीय राष्ट्रीय उत्कर्ष दिवस या उनका वो

575
00:40:00,800 --> 00:40:05,200
है प्राकट्य उत्सव है तो स्वतंत्र रूप से जब भी गुरुदेव

576
00:40:05,200 --> 00:40:09,200
बोलना चालू करते हैं तो उनका जो प्रवचन होता है

577
00:40:09,200 --> 00:40:13,280
वो इन्हीं पांच सिद्धांतों के इर्दगिर्द होता है। उनके उनके द्वारा

578
00:40:13,280 --> 00:40:17,840
निर्गत जो सर्वोच्च न्यायालय में जो दिया गया संभाषण

579
00:40:17,840 --> 00:40:22,000
है उसी का उसी का जो है परवसान इन पांच

580
00:40:22,000 --> 00:40:26,000
सिद्धांतों में आप कभी देखिएगा चालू होता है जीव की चाह के वास्तविक

581
00:40:26,000 --> 00:40:30,080
विषय यानी नास्तिकता के खंडन से और खत्म होता है श्री रामचंद्र

582
00:40:30,080 --> 00:40:34,400
जी पर आकर गुरु प्रामाणिक गुरु आचार्य

583
00:40:34,400 --> 00:40:38,560
यहां पर आकर के उनका वो समाप्त होता है तो उसको आप देखिएगा आपको

584
00:40:38,560 --> 00:40:42,800
यही ध्वनित होंगे यही सिद्धांत सब ध्वनित होंगे जिसको हमने और सामान्य

585
00:40:42,800 --> 00:40:46,960
जन के लिए और जो है उनकी भाषा में ये क्या कहते हैं

586
00:40:46,960 --> 00:40:50,880
संसार का प्रत्येक मनुष्य भगवान कोई ही ढूंढ रहा है। फिर वह भले ही स्वयं

587
00:40:50,880 --> 00:40:55,120
को नास्तिक ही क्यों ना कहता हो। इस तरीके से और बिल्कुल बच्चों वाली भाषा

588
00:40:55,120 --> 00:41:00,240
में उसको प्रस्तुत करने का प्रयास किया।

589
00:41:00,240 --> 00:41:01,040
तो यह होती

590
00:41:01,040 --> 00:41:05,280
है सूत्रात्मक शैली की उपयोगिता। ऐसे

591
00:41:05,280 --> 00:41:09,280
सूत्रात्मक शैली में आप देखिएगा जिनके यहां पर बिखराव है।

592
00:41:09,280 --> 00:41:13,360
वहां पर ऐसे आपको सिद्धांत नहीं मिलेंगे। इतने जटिल विषयों में

593
00:41:13,360 --> 00:41:17,360
इतने जटिल विषयों में गए। नास्तिकता को कैसे हराया जाए? जीव की चाह के वास्तव

594
00:41:17,360 --> 00:41:21,520
के विषय का नाम ही ईश्वर लोहार गई नास्तिकता विधर्मी

595
00:41:21,520 --> 00:41:25,600
ईश्वर को कैसे बाधित ईश्वर को कैसे हराया जाए ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है

596
00:41:25,600 --> 00:41:30,080
लोहार गया विधर्मी नास्तिक विधर्मी ग्रंथों को कैसे हराया जाए

597
00:41:30,080 --> 00:41:34,240
कि ईश्वर के विषय में केवल वही शास्त्र प्रमाणिक जिन्हें

598
00:41:34,240 --> 00:41:38,240
ईश्वर ने भी ना रचा हो अपुरुष ग्रंथ तो यह होता

599
00:41:38,240 --> 00:41:42,320
है सूत्रात्मक शैली में ज्ञान विज्ञान को फैलाना प्रचारित करना

600
00:41:42,320 --> 00:41:45,920
तो उसी को यहां पर कहा जा रहा है तौली हुई विचार

601
00:41:45,920 --> 00:41:50,320
श्री समर्थ स्वयं सदा पुण्य मार्ग पर चलते थे और दूसरों को भी चलाते

602
00:41:50,320 --> 00:41:54,320
थे। अनीति और अन्याय का सदा दमन करते थे। निष्काम

603
00:41:54,320 --> 00:41:59,120
भाव से सबकी सेवा करते थे। सबकी ऐ पारलौकिक

604
00:41:59,120 --> 00:42:03,280
उन्नति करते थे। एकांत में रहकर बड़े-बड़े गढ़ प्रश्नों पर

605
00:42:03,280 --> 00:42:07,360
विचार करते थे और सबके सामने वे विचार उपदेश रूप में

606
00:42:07,360 --> 00:42:11,360
रखते थे। वह जो कुछ कहते थे उसी के अनुसार आचरण करते

607
00:42:11,360 --> 00:42:15,920
थे और जो कुछ स्वयं करते थे वही कर वही करने

608
00:42:15,920 --> 00:42:19,920
कल्याण करने में ही वही करने का औरों को उपदेश

609
00:42:19,920 --> 00:42:23,920
देते थे। उनका सारा जीवन संसार के उपकार और

610
00:42:23,920 --> 00:42:28,000
जनता के कल्याण में ही बीता था। अब

611
00:42:28,000 --> 00:42:32,000
देखिए होता क्या है कि किसी किसी को लगता है कि भाई इन लोगों के पास कितना टाइम

612
00:42:32,000 --> 00:42:36,000
है यही सब बातें करने का यही करते रहने का। ऐसे लगता

613
00:42:36,000 --> 00:42:40,160
है लोगों को और जिसकी आसक्ति हो गई हो कि मुझे जो

614
00:42:40,160 --> 00:42:44,720
है धर्म की रक्षा करनी है जिसको उसमें सुख मिलता हो

615
00:42:44,720 --> 00:42:49,520
तो उसके उसको तो दिन भर वही दिखेगा नास्तिक का फोन आया

616
00:42:49,520 --> 00:42:53,840
अच्छा तुम भगवान को नहीं मानते हमारे श्री रामचंद्र जी का खंडन करते हो मूर्ति पूजा खंडन

617
00:42:53,840 --> 00:42:59,200
करते हो आ जाओ आ जाओ सामने आ जाओ

618
00:42:59,200 --> 00:43:00,960
क्या है फालतू

619
00:43:00,960 --> 00:43:05,120
नहीं है हमारे पास भी भूख है

620
00:43:05,120 --> 00:43:09,440
हमारे पास भी अन्य हमारी आवश्यकताएं हैं। मगर वह आवश्यकता नगण्य है।

621
00:43:09,440 --> 00:43:13,440
गौ है। क्यों है? क्योंकि आसक्ति कहां हो गई? प्रभु

622
00:43:13,440 --> 00:43:17,520
में। इसने मूर्ति पूजा का खंडन कैसे किया? इसमें हो

623
00:43:17,520 --> 00:43:21,760
गई। इसने मूर्ति पूजा को मना कैसे किया? इसमें हो गई।

624
00:43:21,760 --> 00:43:26,080
है ना? उसमें आसक्ति हो गई। भगवान के कार्यों में, धर्म के कार्यों में भगवान

625
00:43:26,080 --> 00:43:30,080
में आसक्ति हो गई। और वहां पर भी वर्चस्वता नहीं होनी चाहिए।

626
00:43:30,080 --> 00:43:34,480
वहां पर भी लोकेशना नहीं होनी चाहिए। मेरी बाबाई हो गई। नास्तिक

627
00:43:34,480 --> 00:43:38,960
व्यक्ति सामने आएगा इसको मैं निरुत्तर करूंगा तो वाहवाही होगी नहीं नास्तिक

628
00:43:38,960 --> 00:43:43,120
व्यक्ति निरुत्तर होगा तो भगवान के मार्ग पर आजा भाई तू भी साथ देने लगे

629
00:43:43,120 --> 00:43:47,600
इस वाला भी साथ देने लगे विचार करो भाई इसमें

630
00:43:47,600 --> 00:43:51,840
उसका पर्यावसान हो ना कि इसमें वाह हरा दिया

631
00:43:51,840 --> 00:43:55,840
हम तो आप देखिएगा वैसे मैं अपनी

632
00:43:55,840 --> 00:44:00,160
प्रशंसा में नहीं कह रहा हूं मगर ऐसा कई बार हुआ है कि कुछ लोगों का जब हृदय

633
00:44:00,160 --> 00:44:04,480
परिवर्तन हुआ है तो जिनका हृदय परिवर्तन हुआ उनका हमने

634
00:44:04,480 --> 00:44:08,560
उस स्थिति का फायदा उठाने का प्रयास नहीं

635
00:44:08,560 --> 00:44:12,720
किया है। जिनका हृदय परिवर्तन हुआ है आवान के द्वारा ऑन स्क्रीन लाइव

636
00:44:12,720 --> 00:44:16,000
स्ट्रीम में चलते-चलते जिन्होंने जिनका हमारे पास प्रमाण

637
00:44:16,000 --> 00:44:20,000
है फिर हमने उनका वो लोकेशन में उसको यूज़ नहीं किया बल्कि वो आज हमारा

638
00:44:20,000 --> 00:44:25,120
साथ दे रहे हैं। हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर के चल रहे हैं।

639
00:44:25,120 --> 00:44:29,840
ठीक है? तो हां यह आ गए वो

640
00:44:29,840 --> 00:44:34,160
काल क्रम से विलुप्त

641
00:44:34,160 --> 00:44:38,160
देखो क्या आया है काल क्रम से विलुप्त ज्ञान विज्ञान

642
00:44:38,160 --> 00:44:42,400
को विशुद्ध करना विलुप्त ज्ञान विज्ञान को तपोबल से उभाषित

643
00:44:42,400 --> 00:44:46,480
करना तथा सूत्रात्मक शैली में हां विशुद्ध करना मतलब

644
00:44:46,480 --> 00:44:50,560
जो विकृत हो गया उसको विशुद्ध करना और जो विलुप्त हो गया

645
00:44:50,560 --> 00:44:54,720
है उसको उद्भाषित करना और फिर जो यह सब कुछ सब कुछ प्राप्त

646
00:44:54,720 --> 00:44:58,960
है उसको सूत्रात्मक शैली में जितना ज्यादा से ज्यादा हो सके वह

647
00:44:58,960 --> 00:45:03,120
पहुंचाना। अब बात आती है

648
00:45:03,120 --> 00:45:07,200
आप लोग कह रहे होंगे मगर अब चल रहा है तो मैं हर भाव को प्रस्तुत करता

649
00:45:07,200 --> 00:45:10,880
जाता हूं कि एक प्रश्न

650
00:45:10,880 --> 00:45:14,960
आता है भाई ये विशुद्ध करने की ये सूत्रात्मक शैली में देने की आवश्यकता क्या

651
00:45:14,960 --> 00:45:19,200
है? लोग ये आरोप लगाते हैं। मुसलमान आरोप लगाता है कि

652
00:45:19,200 --> 00:45:23,280
भाई वेद में इतनी घुमा फिरा के बात क्यों कही गई है? उपनिषदों में इतनी घुमा फिरा करके बात क्यों

653
00:45:23,280 --> 00:45:27,520
कही गई है? यह सूत्रात्मक शैली में देने के लिए ही आचार्य गण समय-समय

654
00:45:27,520 --> 00:45:31,760
पर आते हैं। उस समय के वातावरण के अनुसार सूत्रात्मक

655
00:45:31,760 --> 00:45:35,760
शैली में देते हैं। पर ये आवश्यकता भगवान ने सीधे सूत्रात्मक शैली में

656
00:45:35,760 --> 00:45:40,160
क्यों नहीं दिया? भाई भगवान ने सूत्रात्मक शैली में ही दिया था।

657
00:45:40,160 --> 00:45:44,160
ब्रह्मा जी को तो केवल प्रणव मिला था। जिसको कहते हैं

658
00:45:44,160 --> 00:45:48,160
सूक्ष्म वेद कहते हैं ना सूक्ष्म वेद क्या

659
00:45:48,160 --> 00:45:52,240
है? केवल प्रणव उसमें मिला। लो इससे बड़ा सूत्र क्या है? केवल

660
00:45:52,240 --> 00:45:56,480
प्रणव। मगर जैसे जैसे हमारी प्रज्ञा शक्ति घटती है, विकृति

661
00:45:56,480 --> 00:46:00,880
आती है, हम प्रपंच रूपी संसार में फंसते चले जाते हैं। वैसे वैसे

662
00:46:00,880 --> 00:46:05,120
उन सूत्रों को जो उस समय की काल परिस्थिति के अनुसार दिए गए थे।

663
00:46:05,120 --> 00:46:09,680
उन सूत्रों को समझ पाना हमारे लिए कठिन हो कठिन हो जाता है। तब

664
00:46:09,680 --> 00:46:13,920
जब कठिनता होती है तो उस देश काल परिस्थिति के अनुसार दोबारा पुनः

665
00:46:13,920 --> 00:46:18,000
उसको सूत्रों में पिरोहित करके दिया जाता है। इसलिए जैसे अपने

666
00:46:18,000 --> 00:46:22,240
समय में तुलसीदास जी की भी आवश्यकता थी उसी प्रकार आज रामानुजाचार्य

667
00:46:22,240 --> 00:46:26,000
की गद्दी पर बैठने वाले आचार्यों की आवश्यकता है। शंकराचार्य की गद्दी

668
00:46:26,000 --> 00:46:30,160
पर बैठने वाले शंकराचार्यों की आवश्यकता है। आज के समय अनुसार

669
00:46:30,160 --> 00:46:34,240
जो है सूत्रात्मक शैली में ज्ञान विज्ञान की फिर से आवश्यकता है और आने

670
00:46:34,240 --> 00:46:38,560
वाले समय में जैसे जैसे और विकृति आएगी तब भी हमें आचार्यों की आवश्यकता

671
00:46:38,560 --> 00:46:42,880
रहेगी सूत्रात्मक शैली में देने के लिए वरना तो फिर वेद ही पर्याप्त

672
00:46:42,880 --> 00:46:48,240
थे। किसी को सत्यार्थ प्रकाश लिखने की क्या आवश्यकता है? गो बैक टू द वेदास।

673
00:46:48,240 --> 00:46:52,720
भाई वो लेके चलते हैं। हम वेद वेद गो बैक टू द वेदास।

674
00:46:52,720 --> 00:46:56,720
वेद को ही मानेंगे। सूत्रात्मक शैली में जो पुराण में दिया गया पुराण

675
00:46:56,720 --> 00:47:00,880
के बाद जो है जो और अन्य आचार्यों के ग्रंथों में दिया उनको नहीं सुनेंगे। खुद

676
00:47:00,880 --> 00:47:04,880
जो है वेद को गो बैक टू द वेदास गो बैक टू द वेदास गो बैक

677
00:47:04,880 --> 00:47:09,200
टू द वेदास चिल्ला चिल्ला कर फिर कहां ले जाएंगे व्यक्ति को सत्यार्थ

678
00:47:09,200 --> 00:47:13,200
प्रकाश समुल्लास फिर उसमें ले जाएंगे तो

679
00:47:13,200 --> 00:47:17,440
कहने का मतलब तो यह है ना उनका भी कि भाई सुत्मक शैली में हमने भी दिया है

680
00:47:17,440 --> 00:47:21,600
मगर वही जब तुलसीदास जी दे देंगे तो वहां कहेंगे देखो देखो ये तो तुलसीदास जी का ग्रंथ

681
00:47:21,600 --> 00:47:26,320
पढ़ने कह रहे है वेद पढ़ने की बात नहीं कह रहे और

682
00:47:26,320 --> 00:47:30,640
यदि उनके हिसाब से कुछ ये सब प्रश्न आते हैं कि जब सबको वेद ही पढ़ने

683
00:47:30,640 --> 00:47:34,640
हैं तो फिर सत्यार्थ प्रकाश क्यों लिखी जा रही बताओ? जब

684
00:47:34,640 --> 00:47:38,800
सबको वेद ही पढ़ने हैं तो सत्यार्थ प्रकाश लिख लिखी क्यों जा रही है?

685
00:47:38,800 --> 00:47:41,280
क्योंकि जाहिर सी बात है कि सबको वेद नहीं समझ

686
00:47:41,280 --> 00:47:45,360
में आएंगे। इसलिए सत्यार्थ प्रकाश भी है और जब तक लोग

687
00:47:45,360 --> 00:47:49,360
किसी किसी की सीमा के बाहर वेद और अन्य गढ़ ग्रंथ नहीं होंगे तब तक

688
00:47:49,360 --> 00:47:53,440
सत्यार्थ प्रकाश जैसे स्वरचित ग्रंथों की क्या आवश्यकता है मार्केट

689
00:47:53,440 --> 00:47:57,600
में? तो उनका सत्यार्थ प्रकाश को लिखना

690
00:47:57,600 --> 00:48:01,680
ही इस बात का द्योतक है कि सबके लिए वेद उपनिषद

691
00:48:01,680 --> 00:48:05,760
सब कुछ नहीं है। सबका सम अधिकार नहीं है। इस बात का द्योतक

692
00:48:05,760 --> 00:48:11,760
है उनके द्वारा सत्यार्थ प्रकाश की रचना करना।

693
00:48:13,120 --> 00:48:17,120
उनकी गणना संसार के प्रसिद्ध महापुरुषों में की जाती है। उनका सारा

694
00:48:17,120 --> 00:48:21,520
जीवन संस्कार संसार के उपकार और जनता के कल्याण में ही बीता था।

695
00:48:21,520 --> 00:48:25,600
श्री समर्थ स्वामी रामदास सचमुच सभी विषयों में समर्थ और राम के सच्चे

696
00:48:25,600 --> 00:48:29,840
दास थे। ऐसे महापुरुषों के गुणों का कीर्तन करने में इन

697
00:48:29,840 --> 00:48:33,920
पंक्तियों का तुच्छ लेखक अपने आप को नितांत अयोग्य तथा

698
00:48:33,920 --> 00:48:38,000
असमर्थ समझता है। हर बात में तो कोई ना कोई ऐसी गढ़ बात आ जाती है

699
00:48:38,000 --> 00:48:42,000
और किसी ना किसी सनातना भाष की याद आ जाती है। अब

700
00:48:42,000 --> 00:48:46,400
जैसे इन्होंने अपने आप को अयोग्य कहा है। इन्होंने अपने आप को

701
00:48:46,400 --> 00:48:50,720
दृष्टता करने वाला समझा है। नितांत अयोग्य असमर्थ

702
00:48:50,720 --> 00:48:54,720
समझा है। अब इसी प्रकार से तुलसीदास जी ने अपने लिए शब्द कहे

703
00:48:54,720 --> 00:48:59,360
हैं। अपनी दासता को प्रकट करने के लिए भगवान के प्रति

704
00:48:59,360 --> 00:49:03,440
उस बात को वो लोग क्या कह रहे देखो तुलसीदास जी खुद कह रहे हैं मैं बेकार हूं मैं

705
00:49:03,440 --> 00:49:07,600
बेकार हूं फिर हमने उनको याद दिलाया भैया रामपाल

706
00:49:07,600 --> 00:49:11,920
खुद कह रहा है मैं कुत्ता हूं अब क्या हुआ

707
00:49:11,920 --> 00:49:16,880
तो वैसे याद दिलाना पड़ता है व्यक्ति को तो

708
00:49:16,880 --> 00:49:21,280
खैर अतः यह विषय यही कहकर समाप्त किया जाता है कि पाठक

709
00:49:21,280 --> 00:49:25,600
स्वयं ही रत्नों के सागर में अवगाह करें और अपनी

710
00:49:25,600 --> 00:49:28,320
रुचि तथा सामर्थ्य के अनुसार इसमें से रत्न

711
00:49:28,320 --> 00:49:32,560
निकालकर अपने आप को अलंकृत तथा कृत

712
00:49:32,560 --> 00:49:36,560
कृत करें। जय श्री राम रामचंद्र वर्मा जी

713
00:49:36,560 --> 00:49:40,880
ने ये भूमिका लिखी है और रक्षाबंधन के दिन

714
00:49:40,880 --> 00:49:44,960
संभवत ये पूर्ण हुई थी। तो ये संवत लिखा

715
00:49:44,960 --> 00:49:50,960
है शायद इन्होंने 1900 अ 89

716
00:49:51,920 --> 00:49:56,560
बहुत सुंदर दिन पे इन्होंने लिखा है श्रावणी का दिन है और बहुत अच्छा

717
00:49:56,560 --> 00:50:01,040
भूमिका भी बहुत अच्छी इन्होंने जो है अब हम अगली जब

718
00:50:01,040 --> 00:50:05,200
अगली हमारा ये होगा अगली कक्षा होगी तब हम हिंदी

719
00:50:05,200 --> 00:50:09,280
दास बोध का पहला समास प्रारंभ करेंगे और उसी दिन हम विषय सूची

720
00:50:09,280 --> 00:50:13,520
पर भी एक नजर डालेंगे एक भी प्रश्न को छोड़ते नहीं है किसी भी ग्रंथ

721
00:50:13,520 --> 00:50:17,680
को पढ़ते समय यह आप सब सदैव ध्यान रखें। ठीक है?

722
00:50:17,680 --> 00:50:21,840
अब बहुत ज्यादा प्रश्न तो नहीं मगर आज के विषय आज जो हमने

723
00:50:21,840 --> 00:50:26,000
पढ़ा है उस विषय से रिलेटेड अगर कुछ एक आध प्रश्न है तो

724
00:50:26,000 --> 00:50:32,000
हम ले लेते हैं। जी विश्वजीत जी पूछिए।

725
00:50:32,400 --> 00:50:37,120
एक एक करके सबके प्रश्न लेंगे। विश्वजीत भैया आप पूछिए। शिवश

726
00:50:37,120 --> 00:50:41,120
भैया जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम। भैया एक

727
00:50:41,120 --> 00:50:45,520
चीज पूछना था बिना शिक्षा के दीक्षा लिया जा सकता है क्या मतलब पहले शिक्षा

728
00:50:45,520 --> 00:50:48,320
लेना पड़ता है

729
00:50:48,320 --> 00:50:52,640
आपका जिनके प्रति आपकी आस्था हो रही है

730
00:50:52,640 --> 00:50:57,440
उनकी शिक्षा आपने ली ही है ना तभी तो दीक्षा ले रहे हैं उनसे

731
00:50:57,440 --> 00:51:01,600
जैसे मतलब गुरुदेव को देखते हैं मतलब YouTube वीडियोस में तो

732
00:51:01,600 --> 00:51:06,800
तो गुरुदेव की शिक्षा ली है ना आपने तभी तो उनसे दीक्षा का मन हो रहा है आपका

733
00:51:06,800 --> 00:51:11,120
जितनी शिक्षा की आवश्यकता है वो आपने ले के लिए कहने का तात्पर्य

734
00:51:11,120 --> 00:51:15,520
ये है जी भैया हम धन्यवाद

735
00:51:15,520 --> 00:51:18,240
भैया

736
00:51:18,240 --> 00:51:24,160
भैया हमें एक प्रशांत जी हमें एक कृपया

737
00:51:24,160 --> 00:51:28,480
प्रशांत जी हमें पूछना भैया हमें पूछना नहीं है

738
00:51:28,480 --> 00:51:32,720
आपने बताया कि रक्षाबंधन था तो कल भैया दूज भूमिका

739
00:51:32,720 --> 00:51:36,800
आपने समाप्त की है यही बताना जी बहुत

740
00:51:36,800 --> 00:51:40,880
सुंदर है बहुत अच्छा है जी हेलो जी

741
00:51:40,880 --> 00:51:45,040
हां यादव जी यादव जी मेरा एक प्रश्न

742
00:51:45,040 --> 00:51:49,280
है कि जैसे आपने बताया जीव का वास्तविक विषय सच्चिदानंद की प्राप्ति

743
00:51:49,280 --> 00:51:53,680
है। है ना? लास्ट बार मैंने एक बार आपसे क्वेश्चन पूछा था कि

744
00:51:53,680 --> 00:51:57,760
आप तो आपने एक चीज बताई थी कि जिनके अंदर कॉनशसनेस होती है

745
00:51:57,760 --> 00:52:02,080
उनको सच्चिदानंद की प्राप्ति होती है। है ना? आपकी आवाज थोड़ी सी डिस्टर्ब

746
00:52:02,080 --> 00:52:06,400
हो गई। दोबारा बोलिए।

747
00:52:06,400 --> 00:52:10,480
आपने यह कहा था कि जिसके अंदर कॉनशसनेस होती है, चेतना

748
00:52:10,480 --> 00:52:14,640
होती है उनको सच्चिदानंद मतलब कि उनको सच्चिदानंद

749
00:52:14,640 --> 00:52:18,800
की तरफ जाना है। है ना? हम तो मेरा एक प्रश्न

750
00:52:18,800 --> 00:52:23,680
है कि जैसे आपने बताया था असतो समसो ज्योति

751
00:52:23,680 --> 00:52:27,840
सत्य से असत्य से सत्य की ओर अंधकार से प्रकाश की ओर। इसमें कहीं

752
00:52:27,840 --> 00:52:33,840
चेतना तो नहीं है कि जो जिनके अंदर चेतना है वही जा सकते हैं।

753
00:52:33,920 --> 00:52:38,000
वही जा सकते हैं। चेतना में ही तो यह विचार आ रहा है।

754
00:52:38,000 --> 00:52:41,200
यह विचार कहां आएगा?

755
00:52:41,200 --> 00:52:45,600
नहीं मतलब उसमें जैसे वो श्लोका में ऐसे वर्णन नहीं है कि चेतना याित

756
00:52:45,600 --> 00:52:50,400
ऐसा कुछ वर्णन अगर दुनिया में हम विचार की बात कर रहे हैं।

757
00:52:50,400 --> 00:52:54,640
उसमें वस्तुनिष्ठता के साथ दिया गया हो या ना दिया गया हो। अगर

758
00:52:54,640 --> 00:52:58,640
हम विचार की बात कर रहे हैं तो विचार का अधिष्ठान तो चेतना ही होगा

759
00:52:58,640 --> 00:53:04,640
ना। बिना चेतना के विचार का अस्तित्व कैसे होगा?

760
00:53:05,760 --> 00:53:10,640
जैसे जैसे आपने बोला था सच्चिदानंद हमें हर

761
00:53:10,640 --> 00:53:14,720
हर जीवात्मा का विषय सच्चिदानंद के पास जाना है लेकिन उसमें

762
00:53:14,720 --> 00:53:19,040
सेित जो सच्चिदानंद जोित है जो वो कॉनशियसनेस है

763
00:53:19,040 --> 00:53:23,280
लेकिन जैसे आपने वैिक उपनिषद का वो श्लोक लिखा उसमें श्लोक

764
00:53:23,280 --> 00:53:27,760
बताया लेकिन वो उसमें कोईित का वर्ड यूज़ नहीं हुआ है

765
00:53:27,760 --> 00:53:32,480
ये क्या है ये क्या कहते हैं

766
00:53:32,480 --> 00:53:36,880
असतोमा सद्गम तमसो ज्योतिर्गमया तमसो ज्योतिर्गमया का परवसान

767
00:53:36,880 --> 00:53:41,040
किस में मतलब अंधकार से प्रकाश की ओर जाना है

768
00:53:41,040 --> 00:53:45,520
हां तो वही तो अज्ञान से अज्ञान से ज्ञान की ओर जाना है ना अंधकार

769
00:53:45,520 --> 00:53:49,520
सूचक ही है अज्ञानता का जब हमें कुछ दिख नहीं रहा है हमारे पास शेर खड़ा है कि

770
00:53:49,520 --> 00:53:53,840
कुत्ता खड़ा है हमें नहीं ज्ञान है इस बात का अंधकार का पर्यावसान किस में है अज्ञानता

771
00:53:53,840 --> 00:53:57,840
में ही तो है अगर शाब्दिक रूप से देख ले अलंकृत रूप से तब भी है

772
00:53:57,840 --> 00:54:02,000
और व्यवहारिक दृष्टि से देख ले तब भी है अलंकृत रूप से अंधेरे

773
00:54:02,000 --> 00:54:06,000
को अज्ञान और प्रकाश को ज्ञान से जोड़ा जाता है। मगर

774
00:54:06,000 --> 00:54:10,000
उसको और उसमें जो है व्यवहारिक रूप से देखें तो

775
00:54:10,000 --> 00:54:14,080
अंधकार से हमें परेशानी क्या होती है? क्या होती है कि

776
00:54:14,080 --> 00:54:18,400
हमें पता नहीं चलता है कि हमारे आसपास क्या है? यानी

777
00:54:18,400 --> 00:54:21,520
कि अज्ञान है ना

778
00:54:21,520 --> 00:54:25,600
तो असतो मा सद्गमया तमसो मा ज्योतिर्गमया

779
00:54:25,600 --> 00:54:29,600
तमसो मा ज्योतिर्गमया का पर्यावसान ही उसमें है

780
00:54:29,600 --> 00:54:33,600
चित्त की ओर जाने में और एक और एक

781
00:54:33,600 --> 00:54:37,600
और क्वेश्चन था कि जैसे आपने एक बहुत लॉजिकल सािक उपनिषद

782
00:54:37,600 --> 00:54:41,760
का श्लोक लिया जिससे नास्तिकों का खंडन हो जाता है और ऐसे रिलेटेड

783
00:54:41,760 --> 00:54:46,240
कोई श्लोकात है उपनिषदों में वेदों में जैसे

784
00:54:46,240 --> 00:54:50,480
ये बहुत अच्छी तरीके से यह श्लोक बहुत अच्छी तरीके से नास्तिकों का खंडन

785
00:54:50,480 --> 00:54:55,040
करता है। है ना? तो तो और भी कोई श्लोक है इससे रिलेटेड

786
00:54:55,040 --> 00:54:59,360
जो कि नास्तिकों का खंडन करें। और भी होंगे

787
00:54:59,360 --> 00:55:03,360
संभवत अभी मेरे जानकारी में वर्बली तो मुझे याद नहीं है। वो कई बार होता

788
00:55:03,360 --> 00:55:07,440
है कि ग्रंथ पढ़ते-पढ़ते मिल जाता है। परंतु होता क्या है कि उस समय अगर

789
00:55:07,440 --> 00:55:11,520
नोट करने में बुद्धि लगाएंगे तो उसका जो रस ग्रहण करना है वो

790
00:55:11,520 --> 00:55:15,760
नहीं मिल पाता। और यदि रस में बुद्धि लगाएंगे

791
00:55:15,760 --> 00:55:20,320
तो फिर हम नोट नहीं कर पाते। तो यह एक दिक्कत होती है ग्रंथ पढ़ते समय।

792
00:55:20,320 --> 00:55:24,400
जो व्यक्ति जिसके चित्त में ज्यादा खंडन मंडन

793
00:55:24,400 --> 00:55:28,480
का रहेगा वो इस पर रहेगा ग्रंथ पढ़ते समय वो नोट करता जाए। श्लोक

794
00:55:28,480 --> 00:55:32,640
क्रमांक ये सब आजकल ज्यादा है तो वो फिर रस को ग्रहण कर पाने में उसे दिक्कत

795
00:55:32,640 --> 00:55:37,280
होती है और दुविधा हो जाती है तो इसलिए

796
00:55:37,280 --> 00:55:41,440
ऐसा है कि कई ऐसे श्लोक हैं जो नास्तिकता के खंडन में मिले हैं।

797
00:55:41,440 --> 00:55:45,440
जैसे भगवत गीता में भी नास्तिकता के खंडन में क्या कहते

798
00:55:45,440 --> 00:55:49,680
हैं कुछ हैं श्लोक। अभी जब मैं ये रामपाल

799
00:55:49,680 --> 00:55:53,680
की जो भगवत गीता का एक एक श्लोक के आधार पर जो है उसका वो कर रहा

800
00:55:53,680 --> 00:55:57,760
था मैं तो मुझे मिल रहे थे चीजें मिल रही थी। अब

801
00:55:57,760 --> 00:56:01,920
पर वर्बली मैंने क्योंकि उस रूप में कि भाई रामपाल

802
00:56:01,920 --> 00:56:06,240
की बजाय जो है इस रूप में यहां नास्तिकता का मिला उस रूप में उसको नोट नहीं किया है।

803
00:56:06,240 --> 00:56:10,720
गीता में है भगवत गीता में जैसे कि तत्व

804
00:56:10,720 --> 00:56:14,800
जो तत्वदर्शी की बात हुई है शायद 216 में है वो श्लोक जहां पर

805
00:56:14,800 --> 00:56:19,040
तत्वदर्शी कहा गया है उसको जो अविद्या को समझ लेता है।

806
00:56:19,040 --> 00:56:23,200
ठीक है? उसका पर्यावरण भी आप नास्तिकता के खंडन में कर सकते हो। तो

807
00:56:23,200 --> 00:56:27,200
चेक कर लेना एक बार बाकी और होगा तो बताएंगे। मगर जो सबसे

808
00:56:27,200 --> 00:56:31,600
विशाल काय मुझे अभी तक जो नास्तिकता के खंडन में जो

809
00:56:31,600 --> 00:56:36,320
प्राप्त है ग्रंथ का वचन वो यही है असतो मा सद्गमय

810
00:56:36,320 --> 00:56:40,640
वैसे तो भगवान को प्रतिष्ठित करने वाला प्रत्येक श्लोक जो है वो नास्तिकता

811
00:56:40,640 --> 00:56:45,120
के खंडन में ही है अब जैसे अस्तो मा सद्गमया

812
00:56:45,120 --> 00:56:49,440
तमसो मा ज्योतिर्गमया ये हो गया अथात तो ब्रह्म जिज्ञासा अब जिज्ञासा शांत

813
00:56:49,440 --> 00:56:52,560
कैसे होगी वो भी तो नास्तिकता का खंडन ही है तो

814
00:56:52,560 --> 00:56:57,360
शांत होगी किससे सत्यम ज्ञानम अनंत ब्रह्म

815
00:56:57,360 --> 00:57:01,520
इस ये जो पूछा जा रहा है यह क्वेश्चन है। इसका आंसर क्या है? आंसर

816
00:57:01,520 --> 00:57:05,760
भी उपनिषद में है। सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह ये इसका आंसर

817
00:57:05,760 --> 00:57:09,840
है। अस्तोमा सद्गमया प्रश्न है और ये उसका आंसर

818
00:57:09,840 --> 00:57:15,360
है। सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह। ठीक है।

819
00:57:15,360 --> 00:57:19,680
ठीक है देवांश जी। किरण जी से बात कर ले।

820
00:57:19,680 --> 00:57:24,320
दीक्षित जी आप बोलिए दीक्षित जी।

821
00:57:24,320 --> 00:57:29,280
दीक्षित जी तो पहले से

822
00:57:29,280 --> 00:57:33,280
हां वो तो है जी बताइए जी

823
00:57:33,280 --> 00:57:37,360
शिवा जी जो मैंने आपसे बहुत

824
00:57:37,360 --> 00:57:41,360
दिनों पहले कहा था ना कि जो ब्रह्मा विष्णु महेश उनके जो साकार

825
00:57:41,360 --> 00:57:45,600
शरीर है वो पंच भौतिक होते हैं तो दास बोध का मैं अध्ययन

826
00:57:45,600 --> 00:57:49,600
अभी कर रहा हूं तो इसमें मुझे प्रमाण भी मिल रहा था वहां पर

827
00:57:49,600 --> 00:57:53,760
डायरेक्टली तो नहीं कहा गया लेकिन थोड़ा सा चिंतन करने से ही पता पता चल जाता

828
00:57:53,760 --> 00:57:58,240
है। वहां पर कहा गया कि जब यह जो हमारा वैवान

829
00:57:58,240 --> 00:58:02,240
जगत और सूक्ष्म जगत जो है जिसे हिरण्य गर्भ जगत कहते हैं। सूक्ष्म जगत जो

830
00:58:02,240 --> 00:58:06,640
है इसकी रचना जब नहीं हुई थी तब उससे पहले भी माया

831
00:58:06,640 --> 00:58:10,800
था। माया मूल ब्रह्म तो पहले से ही है लेकिन माया भी

832
00:58:10,800 --> 00:58:15,120
था। माया के बाद इस तेजस यानी कि हिरण्य

833
00:58:15,120 --> 00:58:19,200
गर्भ संसार की और पंच भौतिक जो है यह वैवान जगत और

834
00:58:19,200 --> 00:58:23,360
ब्रह्मा विष्णु महेश की उत्पत्ति बाद में हुआ है। तो अब तात्विक रूप से अगर

835
00:58:23,360 --> 00:58:27,360
देखें तो फिर ब्रह्मा विष्णु महेश तो साक्षात ब्रह्म है। तो वो तो पहले

836
00:58:27,360 --> 00:58:31,360
से ही है। लेकिन फिर भी यहां पर कहा जा रहा है कि उनकी उत्पत्ति बाद में हुई

837
00:58:31,360 --> 00:58:35,360
है। और फिर ये भी कहा गया कि प्रलय के दशा में उनका अंत भी हो जाता है। तो इससे

838
00:58:35,360 --> 00:58:39,760
ही तो सिद्ध हो जाता है कि उत्पत्ति और प्रलय तात्विक रूप से तो हो नहीं सकता।

839
00:58:39,760 --> 00:58:44,000
तो फिर पंच भौतिक उन शरीरों का ही होगा। तो फिर उनका शरीर पंच भौतिक

840
00:58:44,000 --> 00:58:46,240
ही हुआ।

841
00:58:46,240 --> 00:58:51,040
हम एक तरह से है भी और एक तरह से नहीं भी।

842
00:58:51,040 --> 00:58:55,120
दोनों बातें स्वीकार करनी पड़ेगी। वो जो तत्व हमें मैंने कई बार बताया ना जो तत्व

843
00:58:55,120 --> 00:58:59,600
हमें दिख रहा है वो तत्व तो पंच भौतिक नहीं वो तो सच्चिदानंद है।

844
00:58:59,600 --> 00:59:03,600
मगर जिस कारण से उस तत्व की एक आकृति बनी है। वह कारण माया

845
00:59:03,600 --> 00:59:07,680
है। तो माया से भी निर्माण हो गया और उसका जो है सच्चिदानंद स्वरूप

846
00:59:07,680 --> 00:59:11,840
होना भी सिद्ध हो गया। है ना? उसको

847
00:59:11,840 --> 00:59:15,840
उस स्ट्रक्चर में दिखने का कारण माया है। क्योंकि उसके इर्दगिर्द माया है।

848
00:59:15,840 --> 00:59:20,560
इसलिए वह एक स्ट्रक्चर है। जैसे कि आकाश को खिड़की से देखने पर

849
00:59:20,560 --> 00:59:24,560
खिड़की से दिखाई देने वाला जो आकाश है उसके इर्दगिर्द

850
00:59:24,560 --> 00:59:28,720
दीवार है कमरे की। इसलिए उसका जो स्ट्रक्चर है वो चौकोर

851
00:59:28,720 --> 00:59:32,960
है। है ना? हां। इसी प्रकार से माया

852
00:59:32,960 --> 00:59:36,960
को चीर करके भगवान दिख रहे हैं तो माया से घिरा होने के कारण

853
00:59:36,960 --> 00:59:41,120
वो स्ट्रक्चर है तो उसको मायामई भी कह सकते हैं। मगर क्योंकि जो तत्व हमें

854
00:59:41,120 --> 00:59:45,120
दिख रहा है वो तो सच्चिदानंद स्वरूप ही है तो उसको सीधेसीधे सच्चिदानंद

855
00:59:45,120 --> 00:59:49,680
स्वरूप भी कह सकते हैं। मोक्ष कारक भी कह सकते हैं। हां

856
00:59:49,680 --> 00:59:53,680
लेकिन मेरा ये कहना है कि जो लोग निर्गुण का खंडन कर देते

857
00:59:53,680 --> 00:59:57,680
हैं ना वो तो ईश्वर को फिर आध्यात्मिक सिद्ध ही नहीं कर पाएंगे ना। भौतिक सिद्ध हो

858
00:59:57,680 --> 01:00:02,160
जाएगा। तो वो तो है ही है भाई शंकराचार्य का विरोध करते हुए

859
01:00:02,160 --> 01:00:06,240
आप बहुत कुछ सिद्ध नहीं कर पाएंगे ये तो बिल्कुल सर्वविदिित बात है

860
01:00:06,240 --> 01:00:10,800
शंकराचार्य विरोध करते हुए धर्म की स्थापना हो ही नहीं सकती

861
01:00:10,800 --> 01:00:15,280
शंकराचार्य को स्वीकार करते हुए आप व्यवहार में उनकी सीमा में रहते हुए

862
01:00:15,280 --> 01:00:19,360
अपने दर्शन का प्रतिपादन कर सकते हैं। प्रचार प्रसार कर सकते हैं। मगर

863
01:00:19,360 --> 01:00:23,680
आप सिरे से नकार दें कि अद्वैत है ही नहीं।

864
01:00:23,680 --> 01:00:27,840
निर्गुण भगवान स्वरूप है ही नहीं भगवान का। आखिर

865
01:00:27,840 --> 01:00:32,400
में वो कोई ना की तरह खड़ा हुआ ईश्वर है। इसको तो यही बोलता है।

866
01:00:32,400 --> 01:00:36,560
यहां बैठा होगा वहां बैठा होगा। बस उनके वर्ड्स ऐसे होते हैं मीठेमीठे

867
01:00:36,560 --> 01:00:40,720
कि व्यक्ति सोचता है आ बहुत हरे कृष्णा वर्ड्स

868
01:00:40,720 --> 01:00:45,040
उनके इतने मीठे-मीठे होते हैं। व्यक्ति हमारा जो हमारे यहां भी ब्राह्मण भी हैं

869
01:00:45,040 --> 01:00:49,360
जिनके यहां आज आज भी जो है कुल खानदान वंश जो है सुरक्षित

870
01:00:49,360 --> 01:00:53,520
रहा। मगर आज की पीढ़ी जो है उफी जा रही है। अरे बहुत अच्छा कार्य करते

871
01:00:53,520 --> 01:00:57,920
हैं। है ना? जी पंडित जी और

872
01:00:57,920 --> 01:01:02,000
जी जो वो लोग कहते हैं कि भगवान जो है

873
01:01:02,000 --> 01:01:06,000
सिर्फ मतलब इंद्रियातीत है लेकिन वो तो भगवान में इंद्रियों को भी

874
01:01:06,000 --> 01:01:10,240
मानते हैं कि भगवान के आंख है पैर है नाक है और फिर उनका भगवान सबसे बड़ा

875
01:01:10,240 --> 01:01:14,240
तो पुरुष है यही सब लेकिन भगवान काउंटर क्वेश्चन है

876
01:01:14,240 --> 01:01:17,520
बहुत सारे हैं यही सब काउंटर क्वेश्चन

877
01:01:17,520 --> 01:01:21,680
है ना ठीक है चलिए मुझे

878
01:01:21,680 --> 01:01:25,840
लगता है और किसी का हाथ नहीं है और काफी लंबी क्लास भी हो गई

879
01:01:25,840 --> 01:01:29,840
आज। हालांकि थोड़ी सी विलंब से शुरू हुई थी मगर काफी तात्विक विवेचना

880
01:01:29,840 --> 01:01:34,080
हुई है। तो देर ना करते हुए अविलंब इसको

881
01:01:34,080 --> 01:01:38,880
जो है विराम देते हैं।

882
01:01:38,880 --> 01:01:43,200
रस की चाह रास की राह में इसको

883
01:01:43,200 --> 01:01:47,440
चलिए संडे को ही सत्र होगा ना। अगला वाला अगला संडे को होगा

884
01:01:47,440 --> 01:01:51,520
और बस थोड़ा सा आप लोगों से मेरा यही निवेदन है कि इसके लिए अनुशासित

885
01:01:51,520 --> 01:01:55,600
रह आए यहां पर ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ें इसमें

886
01:01:55,600 --> 01:01:59,600
जो है नहीं धीरेधी दिखने लगा है अब जो संख्या

887
01:01:59,600 --> 01:02:03,600
घट रही है यही लोग और जो कभी-कभी जो ऐसा हो

888
01:02:03,600 --> 01:02:08,240
जाता है कि मैं विलंब से आता हूं या जो है

889
01:02:08,240 --> 01:02:12,240
आगे बढ़ गई डेट तो इसमें बस आप ये हर्ष मनाया करिए

890
01:02:12,240 --> 01:02:16,480
कि इस समय कहीं ना कहीं धर्म के लिए कुछ ना कुछ और ऐसा कार्य हो रहा होगा जो इससे

891
01:02:16,480 --> 01:02:20,640
भी ज्यादा लाभकारी होगा। बस इतना आप मन में विचार पाया करिए।

892
01:02:20,640 --> 01:02:26,080
है ना? बस इतने निवेदन के साथ नारायण समारंभाम

893
01:02:26,080 --> 01:02:30,960
शंकराचार्य मध्यमाम अस्मदाचार्य पर्यंतम

894
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वंदे गुरु परंपरा गुरु

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परंपरा सभी को जय श्री राम जय

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[संगीत]
