1
00:00:00,650 --> 00:00:04,720
[संगीत] हे माता मैं आपको अभी

2
00:00:04,720 --> 00:00:09,360
यहां से लवा जाऊंगा। पर श्री रामचंद्र जी की शपथ है मुझे

3
00:00:09,360 --> 00:00:13,440
प्रभु उनकी आज्ञा नहीं अन्यथा मैं इसी समय आपको ले

4
00:00:13,440 --> 00:00:18,160
चल देता हूं। हे माता कुछ दिन और धीरज धर लो।

5
00:00:18,160 --> 00:00:22,320
श्री रामचंद्र जी वानरों सहित यहां आवेंगे और

6
00:00:22,320 --> 00:00:26,480
राक्षसों को मार करके आपको ले जाएंगे। नारद आदि

7
00:00:26,480 --> 00:00:30,720
ऋषि मुनि तीनों लोकों में उनका यश गावेंगे। सीता जी ने कहा

8
00:00:30,720 --> 00:00:34,800
हे पुत्र जब वानर तुम्हारे ही समान है। नन्हे नन्हे

9
00:00:34,800 --> 00:00:38,960
से होंगे। राक्षस तो बड़े बलवान योद्धा होंगे। कहां

10
00:00:38,960 --> 00:00:43,600
वानर छोटे-छोटे से और यहां पे ये राक्षस इतने बलवान

11
00:00:43,600 --> 00:00:48,800
इनसे वानर लड़ेंगे। क्या बात कहते हो?

12
00:00:48,800 --> 00:00:53,280
अतः मेरा हृदय में बड़ी भारी संदेह हो रहा है

13
00:00:53,280 --> 00:00:59,200
कि तुम जैसे बंदर राक्षसों को कैसे जीतोगे।

14
00:00:59,200 --> 00:01:03,520
यहां सुनकर के हनुमान जी ने अपने शरीर को प्रकट

15
00:01:03,520 --> 00:01:08,880
किया। बोलो सियावर रामचंद्र की।

16
00:01:08,880 --> 00:01:13,440
जैसे श्री रामचंद्र जी का नाम लिया। उन्होंने

17
00:01:13,440 --> 00:01:15,840
सोने के पर्वत सुमेरू का

18
00:01:15,840 --> 00:01:20,000
आकार ले लिया। अत्यंत विशाल शरीर धारा और

19
00:01:20,000 --> 00:01:24,320
जो युद्ध में शत्रुओं को हृदय में भय उत्पन्न कराने वाला था। अत्यंत

20
00:01:24,320 --> 00:01:28,720
बलवान और वीर था तब उसे देख कर के सीता जी के मन में विश्वास

21
00:01:28,720 --> 00:01:32,720
हुआ। हनुमान जी ने फिर छोटा सा रूप धारण कर लिया कि

22
00:01:32,720 --> 00:01:36,720
कहीं मेरी माता भयभीत ना हो जाए इस रूप को देख कर। कहीं मेरी

23
00:01:36,720 --> 00:01:40,800
माता इस पुत्र को देख करके भयभीत ना हो जिससे मेरे

24
00:01:40,800 --> 00:01:44,960
इस पुत्र धर्म का पालन नहीं हो। हनुमान जी

25
00:01:44,960 --> 00:01:49,920
ने तुरंत फिर से छोटा सा रूप धारण कर लिया। फिर

26
00:01:49,920 --> 00:01:54,160
कहते हैं कि हे माता सुनो वानरों में बहुत बल बुद्धि

27
00:01:54,160 --> 00:01:58,160
है। यह मत सोचिए कि ये जो छोटे-छोटे से वानर हैं

28
00:01:58,160 --> 00:02:02,400
ये सिर्फ छोटे-छोटे से ही हैं। ये वानर अपने बल

29
00:02:02,400 --> 00:02:06,480
और बुद्धि से बहुत ही महान है।

30
00:02:06,480 --> 00:02:10,560
प्रभु के प्रताप से बहुत ही छोटा सा सर्प

31
00:02:10,560 --> 00:02:14,880
भी गरुड़ को खा सकता है। जो छोटा सा सर्प है, अगर प्रभु

32
00:02:14,880 --> 00:02:19,040
का प्रताप उसके ऊपर है, तो वह सर्प भी उस गरुड़ को खा सकता है। बोलिए

33
00:02:19,040 --> 00:02:23,200
सियावर रामचंद्र की। हनुमान जी इस प्रकार कह

34
00:02:23,200 --> 00:02:27,280
रहे हैं कि जब अगर प्रभु ने कृपा कर दी

35
00:02:27,280 --> 00:02:30,880
किसी दीन दुखी के ऊपर तो वह दीन दुखी दीन दुखी

36
00:02:30,880 --> 00:02:35,600
नहीं रहता है। वो प्रभु के चरणारविंद को प्राप्त हो जाता है।

37
00:02:35,600 --> 00:02:40,320
अत्यंत निर्बल भी महान बलवान मार सकता है।

38
00:02:40,320 --> 00:02:44,400
भक्ति प्रताप तेज और बल से सनी हुई हनुमान जी की वाणी को

39
00:02:44,400 --> 00:02:48,400
सुनकर के सीता जी के मन में संतोष हुआ। उन्होंने श्री

40
00:02:48,400 --> 00:02:52,720
राम जी के प्रिय जान के हनुमान जी को आशीर्वाद दिया।

41
00:02:52,720 --> 00:02:56,880
तुम बल और शील के निधान हो। हे पुत्र

42
00:02:56,880 --> 00:03:00,880
तुम अजर बुढ़ापे से रहित हो। अमर

43
00:03:00,880 --> 00:03:05,200
और गुणों के खजान हो। श्री रघुनाथ जी तुम पर

44
00:03:05,200 --> 00:03:09,440
बहुत कृपा करें। प्रभु की कृपा करें।

45
00:03:09,440 --> 00:03:13,440
प्रभु तुम पर कृपा करें। ऐसा कानों से सुनते ही हनुमान जी

46
00:03:13,440 --> 00:03:17,920
पूर्ण प्रेम से मग्न हो गए। हनुमान जी ने बार-बार

47
00:03:17,920 --> 00:03:22,160
सीता जी के चरणों में सिर नवाया और हाथ जोड़कर के हे

48
00:03:22,160 --> 00:03:26,160
माता अब मैं कृतार्थ हो गया। आपका

49
00:03:26,160 --> 00:03:30,960
आशीर्वाद अमोग अचूक है। यह बात प्रसिद्ध है। हे माता सुनो

50
00:03:30,960 --> 00:03:35,120
सुंदर फलों वाले वृक्षों को देखकर के मुझे बड़ी ही भूख लगी

51
00:03:35,120 --> 00:03:40,960
है। मैं बहुत ही भूखा हूं और मैंने अभी तक कुछ भी खाया

52
00:03:40,960 --> 00:03:46,480
जिस कारणवश मुझे छुरा छुदा हो रही है।

53
00:03:46,480 --> 00:03:46,980
मैं

54
00:03:46,800 --> 00:03:49,840
क्या करूं बताइए?

55
00:03:49,840 --> 00:03:54,560
सीता जी ने कहा हे बेटा सुनो बड़े

56
00:03:54,560 --> 00:03:58,560
भारी योद्धा राक्षस इस वन की रखवाली करते हैं।

57
00:03:58,560 --> 00:04:03,440
हनुमान जी ने कहा हे माता यदि आप

58
00:04:03,440 --> 00:04:07,920
मन में सुख माने प्रसन्न होकर के अगर आप मुझे आज्ञा दे दे

59
00:04:07,920 --> 00:04:12,240
तो मैं तो मुझे उनका भय भी बिल्कुल नहीं रहेगा।

60
00:04:12,240 --> 00:04:16,400
अगर आप मुझे कह दो कि जाओ पुत्र मैं तुम्हें आशीर्वाद देती हूं

61
00:04:16,400 --> 00:04:21,520
तब मुझे इतने बड़े-बड़े राक्षसों का भी भय नहीं रहेगा।

62
00:04:21,520 --> 00:04:25,840
क्योंकि प्रभु का प्रताप तो मुझ पर पहले ही है और माता का आशीर्वाद

63
00:04:25,840 --> 00:04:29,920
मिल जाएगा तो क्या ही बात। हनुमान जी की

64
00:04:29,920 --> 00:04:33,920
बुद्धि और बल में निपुण देखकर के जानकी जी ने

65
00:04:33,920 --> 00:04:38,240
कहा जाओ हे तात श्री रघुनाथ

66
00:04:38,240 --> 00:04:42,320
जी के चरणों को हृदय में धारण करके मीठे-मीठे फल

67
00:04:42,320 --> 00:04:46,400
खाओ वे सीता जी के सिर को नवा कर वे

68
00:04:46,400 --> 00:04:50,400
सीता जी के सम्मुख अपने सिर को नवा करके चले और बाग में घुस

69
00:04:50,400 --> 00:04:54,400
गए फल खाए और वृक्षों को तोड़ने लगे और

70
00:04:54,400 --> 00:04:58,720
वहां बहुत से योद्धा को रखवा ले थे उनमें से

71
00:04:58,720 --> 00:05:01,280
कुछ को

72
00:05:01,280 --> 00:05:01,840
क्या कहते

73
00:05:01,840 --> 00:05:06,080
हैं सुनिए चले ना सिरो

74
00:05:06,080 --> 00:05:10,160
बैठे भागा फल खायसी

75
00:05:10,160 --> 00:05:14,640
तरु तोरे लागा रहे तहा बहु

76
00:05:14,640 --> 00:05:18,720
भट रखवारे कछु मारसी कछु

77
00:05:18,720 --> 00:05:22,800
जाई पुकारे नाथ एक

78
00:05:22,800 --> 00:05:26,960
आवा कप भारारे तेह अशोक

79
00:05:26,960 --> 00:05:31,280
बाटिका उजारी

80
00:05:31,280 --> 00:05:35,200
कह रहे हैं

81
00:05:35,200 --> 00:05:39,440
वे सीता जी को सिर नवा करके उस बाघ के अंदर चले

82
00:05:39,440 --> 00:05:43,520
गए फल खाए और बच्चों को तोड़ने लगे छोटे-छोटे

83
00:05:43,520 --> 00:05:47,920
वृक्ष थे खींचा फल खाया फेंक दिया

84
00:05:47,920 --> 00:05:52,400
बहुत से योद्धा रखवाल कर रहे रखवाली कर रहे थे

85
00:05:52,400 --> 00:05:56,480
उनमें से कुछ योद्धा दौड़ते हुए देख के आए कि वानर

86
00:05:56,480 --> 00:06:00,480
क्या कर रहा है? उस वानर के पास पहुंचे और उस वानर

87
00:06:00,480 --> 00:06:05,760
को वृक्ष तोड़ते हुए लड़ने लगे।

88
00:06:05,760 --> 00:06:09,760
तो हनुमान जी ने भगवान श्री रामचंद्र

89
00:06:09,760 --> 00:06:13,760
जी का नाम लेकर के उन सभी को परास्त कर दिया। कुछ

90
00:06:13,760 --> 00:06:18,000
को मार डाला और कुछ ने जाकर के रावण से पुकार की

91
00:06:18,000 --> 00:06:22,960
और कहा कि हे नाथ एक बड़ा भारी बंदर आया है।

92
00:06:22,960 --> 00:06:27,120
उसने अशोक वाटिका उजाड़ डाली है। फल

93
00:06:27,120 --> 00:06:31,200
खाए हैं। वृक्षों को उखाड़ डाला है और रखवालों

94
00:06:31,200 --> 00:06:35,840
को मसल मसल कर जमीन पर मार डाला है।

95
00:06:35,840 --> 00:06:39,920
जमीन पर इस प्रकार मसला है जिस प्रकार

96
00:06:39,920 --> 00:06:44,480
कोई बच्चा अपनी गेंद को रगड़ता है।

97
00:06:44,480 --> 00:06:48,560
रगड़ने के कारण उनके शरीर से खाल

98
00:06:48,560 --> 00:06:50,240
हट गई।

99
00:06:50,240 --> 00:06:54,000
खून का प्रसव होने लगा।

100
00:06:54,000 --> 00:06:58,400
ऐसा कह रहे हैं। यह सुनकर के रावण

101
00:06:58,400 --> 00:07:02,480
ने बहुत से योद्धाओं को भेजा कि जाओ तुम उस वानर को मार

102
00:07:02,480 --> 00:07:06,560
करके बंदी बना करके मेरे सामने लेकर के आओ। उन्हें देखकर

103
00:07:06,560 --> 00:07:10,560
के हनुमान जी ने गर्जना करी।

104
00:07:10,560 --> 00:07:15,040
श्री रामचंद्र जी का नाम लिया। हनुमान जी ने सभी राक्षसों

105
00:07:15,040 --> 00:07:18,480
को मार डाला।

106
00:07:18,480 --> 00:07:24,400
कुछ जो अधर्म थे चिल्लाते हुए गए।

107
00:07:24,400 --> 00:07:28,560
फिर रावण ने अक्षय कुमार को भेजा। वहां असंख्य श्रेष्ठ

108
00:07:28,560 --> 00:07:32,640
योद्धाओं के साथ अपनी सेना को लेकर के हनुमान जी से लड़ने

109
00:07:32,640 --> 00:07:36,800
चला। उसे आते देख के हनुमान

110
00:07:36,800 --> 00:07:42,800
जी ने एक वृक्ष के वृक्ष को हाथ में तोड़ लिया

111
00:07:42,960 --> 00:07:45,200
और

112
00:07:45,200 --> 00:07:49,440
ललकार लगाई और उसे मार करके महाध्वनि बड़ी

113
00:07:49,440 --> 00:07:53,760
जोर से गर्जना करी उन्होंने सेना में कुछ को मार डाला

114
00:07:53,760 --> 00:07:58,240
और कुछ करके कुछ को मच्छर के समान मसल डाला हाथों से

115
00:07:58,240 --> 00:08:03,760
कुछ को पकड़ पकड़ कर के धूल में मिला दिया रगड़ दिया कस करके

116
00:08:03,760 --> 00:08:05,280
और कुछ ने फिर

117
00:08:05,280 --> 00:08:08,160
जाकर के पुकार

118
00:08:08,160 --> 00:08:12,160
अपने प्रभु से लगाई। कहने लगे कि प्रभु

119
00:08:12,160 --> 00:08:16,400
बंदर बहुत ही बलवान है। दिखता छोटा है

120
00:08:16,400 --> 00:08:20,720
परंतु बहुत ही बलवान कार्य करता। किसी को नहीं छोड़ा

121
00:08:20,720 --> 00:08:26,000
उसने। किसी किसी को तो उसने अपने शरीर से रगड़ दिया।

122
00:08:26,000 --> 00:08:30,080
उसके जो रोए थे कांटों के समान हो गए। वह

123
00:08:30,080 --> 00:08:34,160
कांटे समान रोए में रगड़ करके समाप्त कर दिया। कहीं मिट्टी में कहीं

124
00:08:34,160 --> 00:08:38,560
किसी को हाथ मार के किसी को मसल करके।

125
00:08:38,560 --> 00:08:42,560
जब रावण पुत्र का वध सुना कि मेरा पुत्र

126
00:08:42,560 --> 00:08:48,560
समाप्त हो गया तब वह रावण क्रोधित हो उठा।

127
00:08:55,140 --> 00:08:59,140
[संगीत]
