1
00:00:02,880 --> 00:00:06,960
तो सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे।

2
00:00:06,960 --> 00:00:11,120
पुनः प्रारंभ हो चुका है जो पाखंडी के द्वारा गीता का अनर्थ किया

3
00:00:11,120 --> 00:00:15,200
गया है। मैं बस एक बात की चेतावनी आप लोगों को देना चाहता हूं

4
00:00:15,200 --> 00:00:19,360
कि आप लोग जो अपने दिमाग को पंचर

5
00:00:19,360 --> 00:00:23,360
करने का कष्ट सह सकते हैं। वही इस सीरीज को

6
00:00:23,360 --> 00:00:27,360
देखें। अन्यथा बूढ़े बच्चे और गर्भवती महिलाएं तो विशेष रूप से दूर

7
00:00:27,360 --> 00:00:31,520
रहे क्योंकि बहुत ज्यादा हॉरर और वैसा भी

8
00:00:31,520 --> 00:00:35,520
है। इस तरह का जो भयाव ऐसा कष्ट होता

9
00:00:35,520 --> 00:00:40,000
है इसने जो शटर घोट की है गीता का अर्थ करते समय

10
00:00:40,000 --> 00:00:44,000
तो आप परेशान हो जाएंगे कौन सी गलती पर मैं बात

11
00:00:44,000 --> 00:00:48,240
करूं। सबसे पहली बात है कि चार 13 में जो गीता कहने

12
00:00:48,240 --> 00:00:52,400
वाला है उसे कहा गया है अकर्ता। समस्त कर्मों को करते

13
00:00:52,400 --> 00:00:56,800
हुए भी तू मुझे अकर्ता जा। अब अकर्ता इसलिए कहा जाता है क्योंकि आगे के श्लोकों

14
00:00:56,800 --> 00:01:01,120
में बता रहे हैं क्योंकि मेरी कर्म के फल में आसक्ति नहीं होती है। कर्मों में लिप्त

15
00:01:01,120 --> 00:01:05,280
नहीं होता मैं। यानी कि क्योंकि उनको कुछ भी पाना शेष नहीं है। कुछ

16
00:01:05,280 --> 00:01:09,280
भी ऐसा नहीं है। अगर भगवान श्री कृष्ण के अकॉर्डिंग देखें तो उनको कुछ

17
00:01:09,280 --> 00:01:13,360
भी शेष नहीं है कुछ प्राप्त करना। इसलिए कर्मों को करते

18
00:01:13,360 --> 00:01:17,520
हुए भी वह अकर्ता है क्योंकि कर्मों के जो फल प्राप्त होने उसमें उनकी

19
00:01:17,520 --> 00:01:18,020
बिल्कुल भी

20
00:01:18,000 --> 00:01:22,000
रुचि नहीं है। आसक्ति नहीं है। तो यह तो श्री कृष्ण के भगवान के

21
00:01:22,000 --> 00:01:26,640
पर्सेक्टिव से तो सिद्ध हो जाता है। पर यदि

22
00:01:26,640 --> 00:01:30,800
इनके काल के अनुसार देखें कि समस्त कर्मों को करते हुए भी तू मुझे

23
00:01:30,800 --> 00:01:34,800
करता जान तो उसमें आपको काल को काल को

24
00:01:34,800 --> 00:01:38,960
तो पाना है। उसको तो डेली सवा लाख वो जो जीव

25
00:01:38,960 --> 00:01:43,440
है उनको हत्या करनी है उनको खाना है उनको पीसना है उनकी दुर्गंध

26
00:01:43,440 --> 00:01:47,920
लेनी है जो भी है मैल खाना है उनका तो उसको तो खाना है तो वो अकर्ता

27
00:01:47,920 --> 00:01:52,160
नहीं हुआ तो यह चार 13 वाला इन्होंने खा लिया चार 13

28
00:01:52,160 --> 00:01:56,400
वाला बाबा जी ने चार 13 के बारे में बात ही नहीं की जिसमें कि

29
00:01:56,400 --> 00:02:00,640
गीता कहने वाले को अकर्ता कहा गया खैर ये इतनी लेवल की बात इनको

30
00:02:00,640 --> 00:02:04,640
समझ में आया तब तो उस पर बात करें इतनी गढ़ विषयों पर बात

31
00:02:04,640 --> 00:02:09,120
तो तब करेंगे ना जब समझ में आएंगे तो हर जगह एक ही बात ले आएंगे कि भैया तत्व

32
00:02:09,120 --> 00:02:13,120
ज्ञान क्या है कि उसका नाम किस प्रभु की भक्ति

33
00:02:13,120 --> 00:02:17,440
करनी है किस नाम को जपना है यही तत्व ज्ञान तत्व ज्ञान

34
00:02:17,440 --> 00:02:21,600
यही है ये हर जगह बस ये यही ले आएंगे यही इनका तत्व

35
00:02:21,600 --> 00:02:25,840
दर्शन है और इनको कुछ नहीं पता चार 13 का अर्थ करते समय इन्होंने

36
00:02:25,840 --> 00:02:30,160
जो आसक्ति रहित वाली बात है गायब कर दी अकर्ता वाली बात है वह गायब

37
00:02:30,160 --> 00:02:33,040
कर दी गीता वक्ता का अकर्ता होना गायब कर

38
00:02:33,040 --> 00:02:37,200
दिया और ठीक से देखा जाए तो 43 पर बात ही नहीं की

39
00:02:37,200 --> 00:02:41,360
बहुत ज्यादा चार 24 का इन्होंने शब्द अर्थ नहीं किया क्योंकि शब्दार्थ तो इनके

40
00:02:41,360 --> 00:02:45,920
पल्ले पड़ेगा नहीं तो भाव यह है कि जो साधक सर्व कर्म परमात्मा

41
00:02:45,920 --> 00:02:50,080
को साक्षी रखकर कर रहा है उसके सर्व कर्म परमात्मा जैसे

42
00:02:50,080 --> 00:02:55,200
होते हैं। क्योंकि वह तत्व ज्ञानी साधक शास्त्र विधि

43
00:02:55,200 --> 00:02:59,200
रहित मनमाना आचरण नहीं करता इसलिए उसके वचन कर्म

44
00:02:59,200 --> 00:03:03,360
परमात्मा के गुणगान में करने में तथा सर्व समय प्रभु चिंतन

45
00:03:03,360 --> 00:03:08,000
में ही लीन रहता है तो अपना पूरा घपड़ घसला इन्होंने कर दिया जबकि

46
00:03:08,000 --> 00:03:12,800
चार 24 में कहा जा रहा है कि

47
00:03:12,800 --> 00:03:16,960
जिस यज्ञ में करने वाला भी ब्रह्म है सामग्री भी ब्रह्म है क्रिया भी ब्रह्म

48
00:03:16,960 --> 00:03:21,040
है तो ऐसे यज्ञ से फल स्वरूप प्राप्त होने वाला जो फल है वह

49
00:03:21,040 --> 00:03:25,200
भी ब्रह्म है। उसमें सब कुछ ब्रह्म ही है। यह बात कही जा रही है। यह

50
00:03:25,200 --> 00:03:29,200
इनके आउट ऑफ आउट ऑफ सिलेबस की बात है रामपाल के लिए। तो

51
00:03:29,200 --> 00:03:33,360
वो समझ कहां से पाएंगे हमारे तिरछादर्शी जी? तो यह सब बातें

52
00:03:33,360 --> 00:03:37,680
कर रहे हैं। अब दूसरी बात अब एक एक बात यह भी है कि यह

53
00:03:37,680 --> 00:03:41,760
कह रहे हैं कि जो साधक सर्व कर्म परमात्मा को

54
00:03:41,760 --> 00:03:45,840
साक्षी रखकर कर रहा है उसके सर्व कर्म परमात्मा जैसे

55
00:03:45,840 --> 00:03:49,840
होते हैं। सारे कर्म परमात्मा जैसे होते हैं। और यहां

56
00:03:49,840 --> 00:03:53,920
पर इसने भैया जो चौथे श्लोक

57
00:03:53,920 --> 00:03:58,160
में 23 24 चौथे अध्याय के 23 24 वे में ब्रह्म

58
00:03:58,160 --> 00:04:02,160
का अर्थ परमात्मा माना है। जैसे ये ब्रह्म को कहता है वो तो काल ब्रह्म है। मगर यहां

59
00:04:02,160 --> 00:04:06,400
पर ब्रह्म का अर्थ इसने परमात्मा मान लिया। तो ये कह रहा है कि वेदों

60
00:04:06,400 --> 00:04:10,480
और गीता जी में वर्णित साधना इसने लिखा है। यहां देखिए इससे

61
00:04:10,480 --> 00:04:14,480
सिद्ध है कि वेदों व गीता जी में वर्णित साधना

62
00:04:14,480 --> 00:04:18,880
से पाप विनाश नहीं होते। भोगने पड़ते हैं। अन्य उपलब्धियां

63
00:04:18,880 --> 00:04:22,880
जैसे सिद्धियां व स्वर्ग महा स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है। मतलब पाप

64
00:04:22,880 --> 00:04:26,960
नाश नहीं होते। अब पहली बात तो यहां पर फिर वही बात है कि यह

65
00:04:26,960 --> 00:04:27,920
सिद्धियां प्राप्त

66
00:04:27,920 --> 00:04:32,000
हो जाती है। यानी यह जो भौतिक संसार के जो फल है वह मिल जाते हैं।

67
00:04:32,000 --> 00:04:36,720
सांसारिक सुविधाएं आपको मिल जाती हैं। स्वर्ग महास्वर्ग भी मिल जाते हैं। परंतु

68
00:04:36,720 --> 00:04:41,840
पूर्ण मुक्ति नहीं मिलती। अब बात यह आती है कि इन्होंने

69
00:04:41,840 --> 00:04:46,480
सूक्ष्म वेद के रूप में उसको भी कहा तो वेद ही है। तो फिर

70
00:04:46,480 --> 00:04:50,480
अगर वेद से मुक्ति नहीं मिलती तो फिर सूक्ष्म वेद से भी नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि वेद तो वो

71
00:04:50,480 --> 00:04:54,640
भी है। तो ये बाबा जी कुछ अपनी बातों को काउंटर करते चले

72
00:04:54,640 --> 00:04:59,120
हैं। खैर अब इन्होंने वेद में

73
00:04:59,120 --> 00:05:03,200
इन्होंने नेति नेति की बात की है कि भाई वेदों में लिखा है

74
00:05:03,200 --> 00:05:07,280
कि नेति नेति करके बताया जा सकता है। पूरी तरीके से नहीं

75
00:05:07,280 --> 00:05:11,520
बताया जा सकता। तो जब हम इनसे पूछते हैं कि भैया जब कबीर

76
00:05:11,520 --> 00:05:15,520
जहां पर खड़ा था वो जगह किसने बनाई तो ये भाग लेते हैं। कम से कम इनसे

77
00:05:15,520 --> 00:05:19,840
ज्यादा आगे तक तो हमारे आचार्य गण बहुत

78
00:05:19,840 --> 00:05:23,920
कोई भी जितनी भी प्रामाणिक परंपराएं हैं सब सारी ऐसी परंपराएं

79
00:05:23,920 --> 00:05:28,400
जो जिनके चरणों की धूल के बराबर भी नहीं है। जहां तक ये बात करता है। कबीर

80
00:05:28,400 --> 00:05:32,880
खड़ा है। अनामय अनामय लोक से आ जाता है। सतलोक में

81
00:05:32,880 --> 00:05:36,960
फिर वो सतलोक बनाता है। अनामय लोक किसने बनाया भाई? फिर यहां पर इनका

82
00:05:36,960 --> 00:05:41,280
अपमान किया इसने रजगुण ब्रह्मा सतगुण विष्णु तमगुण शिव

83
00:05:41,280 --> 00:05:43,040
आदि आदि देवताओं की पूजा करने

84
00:05:43,040 --> 00:05:47,120
वाला वाले राक्षस को धारण किए हुए हैं। अब देखिए

85
00:05:47,120 --> 00:05:51,120
वही वाली बात है कि यह जो गुण है यह सीधे-सीधे इनको जो है जो

86
00:05:51,120 --> 00:05:55,120
भगवान है वही उनको गुण के रूप में एक व्यक्तित्व बना दे रहा है

87
00:05:55,120 --> 00:05:59,280
गुण को। अगर व्यक्तित्व बना देता बना दे रहा है तो यह गुण हमारे

88
00:05:59,280 --> 00:06:03,360
साथ भी चल रहे हैं। दूसरी बात यह भी है गुण के रूप में मतलब जो

89
00:06:03,360 --> 00:06:07,440
ब्रह्मा विष्णु महेश है वो सर्वव्यापी है। ईश्वर सर्वव्यापी नहीं है। ब्रह्मा

90
00:06:07,440 --> 00:06:11,440
विष्णु महेश सर्वव्यापी है क्योंकि वो गुण है और गुण तो सब जगह व्याप्त है।

91
00:06:11,440 --> 00:06:16,640
सबके पास गुण है कुछ ना कुछ। दूसरी बात यह है कि

92
00:06:16,640 --> 00:06:20,800
गुणों से प्रभाव जो उत्पन्न होते हैं जैसे कि व्यभचार करना इत्यादि यह सब

93
00:06:20,800 --> 00:06:24,800
जो होते हैं तो यह काल काल में भी इसकी स्टोरी के हिसाब से

94
00:06:24,800 --> 00:06:28,880
रामपाल की स्टोरी के हिसाब से काल में भी व्यभचार का प्रभाव

95
00:06:28,880 --> 00:06:33,360
उत्पन्न हुआ था। इसका मतलब कि काल भी सतज

96
00:06:33,360 --> 00:06:38,000
या तम गुण से प्रभावित था। इसका अर्थ यह मानना पड़ेगा कि काल से पहले

97
00:06:38,000 --> 00:06:42,160
ब्रह्मा विष्णु महेश थे। रामपाल के अनुसार तो इसका अर्थ यह

98
00:06:42,160 --> 00:06:46,400
हो गया कि काल ने इनको नहीं बनाया। काल ने इनको उत्पन्न नहीं किया इनहीं

99
00:06:46,400 --> 00:06:50,480
के अनुसार। ठीक है? खैर यहां इसने अपमान किया

100
00:06:50,480 --> 00:06:54,560
है और फिर चार के 31 32 श्लोक

101
00:06:54,560 --> 00:06:58,320
में लिखता है कि चार के श्लोक 31 32 में कहा है कि गीता

102
00:06:58,320 --> 00:07:02,400
अध्याय चार श्लोक 25 से 30 तक वर्णित शास्त्र साधना से बचे हुए

103
00:07:02,400 --> 00:07:07,200
साधक शास्त्र विधि अनुसार अर्थात नाम साधना करते हैं। जो

104
00:07:07,200 --> 00:07:11,600
यज्ञ का बचा हुआ जो होता है उसको यह कह रहा है कि

105
00:07:11,600 --> 00:07:15,680
वो जो शास्त्र विरुद्ध साधना है उससे बचे

106
00:07:15,680 --> 00:07:19,680
हुए जो चीजें हैं उससे बच के अब जो है उनका

107
00:07:19,680 --> 00:07:24,000
विरोध करके जो शास्त्र विरुद्ध साधना है वो कहां से कहां तक बताई है इसके अनुसार

108
00:07:24,000 --> 00:07:28,240
श्लोक 25 से 30 तक शास्त्र विरुद्ध चीजें बताई गई है कि क्या-क्या

109
00:07:28,240 --> 00:07:32,400
नहीं करना है तो उनसे बचा हुआ जो

110
00:07:32,400 --> 00:07:36,480
साधन है उसका जब आलंबन लेते हैं तो आपको फल की प्राप्ति होती

111
00:07:36,480 --> 00:07:40,560
है। श्लोक 25 से 30 में यज्ञ करने को कहा गया है। तो

112
00:07:40,560 --> 00:07:44,800
यज्ञ तो शास्त्र सम्मत साधना है। फिर यज्ञ को इसने शास्त्र

113
00:07:44,800 --> 00:07:48,880
विरुद्ध कैसे कह दिया? यज्ञ का अर्थ जो है भक्ति

114
00:07:48,880 --> 00:07:52,960
भी है। है ना? पेज नंबर 40 पे इसने

115
00:07:52,960 --> 00:07:57,280
3.1 में माना है ये बात रामपाल ने इसी में गरिमा गीता की।

116
00:07:57,280 --> 00:08:01,360
तो क्या भक्ति शास्त्र विरुद्ध होती है। अच्छा बचे होने का अर्थ

117
00:08:01,360 --> 00:08:05,760
क्या है? बचा होना क्या बच गया है? कौन सा मटेरियल

118
00:08:05,760 --> 00:08:10,000
है जो बच गया है जो बचा है उसका अमृत पान किया जा रहा है

119
00:08:10,000 --> 00:08:13,520
निषेध धर्म को जानने वाले मुक्ति नाम

120
00:08:13,520 --> 00:08:17,520
जप बिना यज्ञ करने को कौन बोला अगर यह यज्ञ को नाम

121
00:08:17,520 --> 00:08:21,520
जप से अलग मानता है तो यह किसने कहा है कि अपने इष्ट का जो नाम है या

122
00:08:21,520 --> 00:08:25,600
मंत्र है वह जाप नहीं करना है यदि यज्ञ करना है तो तो यज्ञ को

123
00:08:25,600 --> 00:08:29,840
इसने यहां पर शास्त्र के विरुद्ध खड़ा कर दिया तो यह भी एक सोचने वाली बात है कि यज्ञ शास्त्र

124
00:08:29,840 --> 00:08:34,880
के विरुद्ध कैसा कैसे नाम जप बिना यज्ञ निष्फल होता

125
00:08:34,880 --> 00:08:38,960
कहां लिखा है? यह भी बात सोचने की है कि नाम जप के बिना जो यज्ञ

126
00:08:38,960 --> 00:08:43,040
है वह निष्फल हो जाता है। क्योंकि यज्ञ में जो मंत्रो उच्चारण होते हैं वह अपने

127
00:08:43,040 --> 00:08:47,200
आप में ही नाम जप होता है। दूसरी बात यह है कि काल ने जब तप

128
00:08:47,200 --> 00:08:51,280
किया था तो उसने कौन सा नाम जप किया था

129
00:08:51,280 --> 00:08:55,280
जिससे कि वह फलित हो गया था। काल को उसने उन्होंने कबीर जी ने जो मांगा

130
00:08:55,280 --> 00:08:59,280
था दे दिया था ना। अगर काल ने जो तप किया और

131
00:08:59,280 --> 00:09:03,600
वह फलित हुआ तो इन्होंने कहा फलित किसका होता है? जो तत्वज्ञानी होता है। तो

132
00:09:03,600 --> 00:09:07,600
यहां से भी काल रामपाल के ही शब्दों में तत्व ज्ञानी भी

133
00:09:07,600 --> 00:09:11,840
सिद्ध हो जाता है। तो ये करना क्या कहना क्या चाहते हो रामपाल

134
00:09:11,840 --> 00:09:14,640
जी?

135
00:09:14,640 --> 00:09:18,880
कह रहे हो कि वो तत्व ज्ञानी नहीं है। फिर कह रहे हो वो तत्व ज्ञानी है। तुमने अभी बताया

136
00:09:18,880 --> 00:09:23,280
ना शास्त्र विरुद्ध साधना से बचे हुए साधक

137
00:09:23,280 --> 00:09:27,360
शास्त्र विधि अनुसार नाम साधना करते हैं।

138
00:09:27,360 --> 00:09:30,560
और यहां पर

139
00:09:30,560 --> 00:09:34,960
अभी कहीं पर इनको तत्व ज्ञानी भी कहा गया था। तत्व ज्ञान के आधार पर

140
00:09:34,960 --> 00:09:39,200
है ना। तो वो तत्व ज्ञानी होते हैं। कौन? जो जिनको फल की प्राप्ति

141
00:09:39,200 --> 00:09:43,280
होती है वह तत्व ज्ञानी होते हैं। तो काल को तब के फल की प्राप्ति हो गई थी क्योंकि

142
00:09:43,280 --> 00:09:47,280
कबीर ने काल की बात मान ली थी। तो कबीर दास जी ने जब काल

143
00:09:47,280 --> 00:09:51,280
की बात मान ली तो उसको फल उसका जो किया जाने वाला यज्ञ था

144
00:09:51,280 --> 00:09:55,280
वो फलित हो गया। फलित हो गया तो इसका मतलब काल जो है वो तत्व ज्ञानी सिद्ध हो

145
00:09:55,280 --> 00:09:59,360
गया। बाबा जी के अनुसार ही काल तत्व ज्ञानी भी सिद्ध होता है। हम

146
00:09:59,360 --> 00:10:03,840
लोग पहले भी पहले के चैप्टर आप देखेंगे कई बार अपनी आप हसी को रोक नहीं पाएंगे।

147
00:10:03,840 --> 00:10:08,240
वहां पर भी कई बार काल तत्व ज्ञानी सिद्ध हुआ है। बाबा जी की किताब के अनुसार ही

148
00:10:08,240 --> 00:10:12,320
तो इस पर ठोको ताली। यह क्या करता है कि खुद ही ब्रह्म

149
00:10:12,320 --> 00:10:16,400
का अर्थ यह कई जगह पर सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा मानता है। और

150
00:10:16,400 --> 00:10:20,480
कहीं पर ब्रह्म का अर्थ कहेगा कि नहीं नहीं ये तो काल ब्रह्म है। ब्रह्म का मतलब

151
00:10:20,480 --> 00:10:24,560
काल ब्रह्म और जब बात होगी परम ब्रह्म की तो वहां परम लिखा होगा

152
00:10:24,560 --> 00:10:28,720
या सच्चिदानंद घन ब्रह्म की बात होगी तो वहां लिखा होगा। तो यह अपनी

153
00:10:28,720 --> 00:10:29,840
बात को ऐसे काटता

154
00:10:29,840 --> 00:10:33,920
चलता है। इसने कई जगह किताबों में अपनी किताब में ब्रह्म

155
00:10:33,920 --> 00:10:37,920
का अर्थ सच्चिदानंद घन ब्रह्म भी लिया है और कई जगह इसने किताबों

156
00:10:37,920 --> 00:10:41,920
में अपनी में ब्रह्म का अर्थ जो है काल ब्रह्म भी लिया है। तो ठोको

157
00:10:41,920 --> 00:10:46,000
ताली। अच्छा अब इससे और आगे चलते हैं कि यह जो

158
00:10:46,000 --> 00:10:50,000
दावा करता है रामपाल तत्वदर्शी का वह करता है कि 434 में

159
00:10:50,000 --> 00:10:54,000
तत्वदर्शी के पास जाने को कहा है। हालांकि अगर आप दो 16

160
00:10:54,000 --> 00:10:58,160
को देखेंगे तो उसमें तत्वदर्शी उसको कहा गया है जो

161
00:10:58,160 --> 00:11:02,640
यह बात जानता हो कि सत्य का कभी अभाव नहीं होता। असत का कभी भाव नहीं होता।

162
00:11:02,640 --> 00:11:06,640
और यह बताने वाला वहां पर काल है दो में क्योंकि काल ने गीता बोली है

163
00:11:06,640 --> 00:11:10,640
रामपाल के अनुसार। इसका मतलब काल यह बात जानता है कि सत्य का कभी अभाव नहीं

164
00:11:10,640 --> 00:11:14,640
होता और असत का कभी नाश असत का कभी भाव नहीं होता

165
00:11:14,640 --> 00:11:18,640
और सत्य का कभी अभाव अभाव नहीं होता। तो काल ये बात जानता

166
00:11:18,640 --> 00:11:22,960
है क्योंकि वो अर्जुन को ये बात बता रहा है। इसका मतलब दो 16 के हिसाब से काल तत्वदर्शी

167
00:11:22,960 --> 00:11:26,960
सिद्ध होता है। तो कई तरीके से काल जो है तत्वदर्शी सिद्ध

168
00:11:26,960 --> 00:11:30,960
हो रहा है। कैसे? कि जिसकी साधना फलित हो जाती है वो

169
00:11:30,960 --> 00:11:35,040
भी तत्वदर्शी होता है। क्योंकि उसके पास तत्व ज्ञान है। इसीलिए उसकी साधना सिद्ध

170
00:11:35,040 --> 00:11:39,280
हो गई। तो काल की साधना तो सिद्ध हुई थी ना उसने तप किया था कबीर

171
00:11:39,280 --> 00:11:43,360
ने उसकी बात मान ली थी तो इस प्रकार से भी वह तत्वज्ञानी सिद्ध होता और

172
00:11:43,360 --> 00:11:45,200
भी पीछे आप रिकैप देखेंगे

173
00:11:45,200 --> 00:11:49,680
तो आपको कई जगह बहुत हास्यास्पद घटनाक्रम मिलेंगे

174
00:11:49,680 --> 00:11:53,760
और जो यह है ना रामपाल का काल

175
00:11:53,760 --> 00:11:58,000
यह तत्वदर्शी सिद्ध होगा बहरहाल 434

176
00:11:58,000 --> 00:12:03,200
का ये लोग बहुत डंका पीटते हैं कि तत्वदर्शी कहा गया है किसको

177
00:12:03,200 --> 00:12:07,280
तत्वदर्शी के पास जाने को कह रहे अच्छा तत्वदर्शी के पास जाने को

178
00:12:07,280 --> 00:12:11,440
क्यों कह रहे हैं? क्या जानना है? तो 433 में

179
00:12:11,440 --> 00:12:15,440
ज्ञान यज्ञ की बात हो रही है। 434 से पहले ज्ञान यज्ञ

180
00:12:15,440 --> 00:12:19,440
की बात हो रही है। उसके बाद 434 में कहा जा रहा है कि विभिन्न यज्ञों

181
00:12:19,440 --> 00:12:24,000
के उस ज्ञान को तू तत्वदशी से जान। अब ज्ञान यज्ञ के लिए ही रामपाल

182
00:12:24,000 --> 00:12:28,000
लिख चुका है ज्ञान यज्ञ से भी मुक्ति नहीं होगी। पांच प्रकार के यज्ञ उनमें

183
00:12:28,000 --> 00:12:32,160
से किसी से भी मुक्ति नहीं होगी। तो जब ज्ञान

184
00:12:32,160 --> 00:12:36,160
यज्ञ से मुक्ति ही नहीं होनी है तो इसका मतलब और फिर ज्ञान

185
00:12:36,160 --> 00:12:40,240
यज्ञ का ज्ञान देने वाला तत्वदर्शी है गीता के अनुसार तो फिर

186
00:12:40,240 --> 00:12:44,320
क्या यह लोग यह भी मानते हैं कि रामपाल के द्वारा मुक्ति नहीं होगी

187
00:12:44,320 --> 00:12:48,560
क्योंकि तत्वदर्शी तो वो सिद्ध हो रहा है रामपाल के अनुसार जो मुक्ति

188
00:12:48,560 --> 00:12:52,560
का ज्ञान नहीं दे सकता। दूसरी बात यह है कि 435 में ही यह

189
00:12:52,560 --> 00:12:56,800
कहा गया है कि जब तू तत्वदशी की शरण में जाएगा तो वह तुमको

190
00:12:56,800 --> 00:13:00,960
ऐसा ज्ञान देगा जिससे पहले तू पूरे संसार में

191
00:13:00,960 --> 00:13:05,440
पूरे संसार में मुझको और फिर बाद में स्वयं को देखेगा। तो यहां

192
00:13:05,440 --> 00:13:09,440
जो मोक्ष की जो धारणा होती है ना वो आती है।

193
00:13:09,440 --> 00:13:13,440
तो फिर क्या ऐसा कहीं पर आपने आज तक किसी

194
00:13:13,440 --> 00:13:17,600
रामपाली को देखा है क्या कि वो यह देख रहा हो कि सब जगह ईश्वर है। वो

195
00:13:17,600 --> 00:13:22,000
तो ईश्वर को सब जगह नहीं मानते। उसकी शक्ति को मानते हैं। वो बात अलग है कि वही

196
00:13:22,000 --> 00:13:26,160
सिद्धांत फेल हो जाता है। मगर ये अभ्रामिक आईडियोलॉजी से चलते हैं। तो

197
00:13:26,160 --> 00:13:30,160
ईश्वर को सब जगह नहीं देखते। तो फिर यहां चार 35 वाला ज्ञान कहां चला

198
00:13:30,160 --> 00:13:34,160
जाएगा? तत्वदर्शी तो वही ज्ञान देगा जिसमें ईश्वर सब जगह दिखाई दे।

199
00:13:34,160 --> 00:13:38,160
ईश्वर तो सब सब में ईश्वर दिखाई नहीं दे रहा है। तो यहां भी इनका ज्ञान पिट

200
00:13:38,160 --> 00:13:42,400
गया। यह सारी बातें हो गई। दूसरी बात तत्वदर्शी

201
00:13:42,400 --> 00:13:46,640
की बात बता दूं। रामपाल की ही किताबों में कबीर की

202
00:13:46,640 --> 00:13:50,800
वाणी को प्रस्तुत करते हुए तत्ववेत्ता कहा गया है वशिष्ठ

203
00:13:50,800 --> 00:13:54,880
जी को। ब्रह्म पुराण में तत्व ज्ञानी कहा

204
00:13:54,880 --> 00:13:58,880
गया व्यास जी को और अनेकानेक जगह तत्वदर्शी हमारे ऋषि

205
00:13:58,880 --> 00:14:02,880
महर्षियों को कहा गया है। इस

206
00:14:02,880 --> 00:14:07,360
शास्त्र चोर शास्त्र की चोरी करने वाला इस शास्त्र चोर रामपाल

207
00:14:07,360 --> 00:14:12,960
को नहीं कहा गया। है ना? तत्वदर्शी से नाम दीक्षा लेने की।

208
00:14:12,960 --> 00:14:16,160
अच्छा हां एक बात और है 437 में इसने फिर यह

209
00:14:16,160 --> 00:14:20,320
कहा है कि तत्व ज्ञान को जानकर तत्वदर्शी संत से नाम दीक्षा

210
00:14:20,320 --> 00:14:24,800
लेकर साधना करने से साधक के पाप कर्म भस्म हो जाते हैं। मगर यहां पे

211
00:14:24,800 --> 00:14:28,800
तत्वदर्शी से नाम दीक्षा लेने की कोई संस्कृत

212
00:14:28,800 --> 00:14:32,800
अवेलेबल नहीं है। श्लोक में अपने मन से जहां जो चाहा वो ये ठोक देता

213
00:14:32,800 --> 00:14:36,960
है। इसके बाद आगे चलते हैं। तो इसने जो है चार

214
00:14:36,960 --> 00:14:42,240
39 में क्या है कि इंद्रियों पर संयम करके

215
00:14:42,240 --> 00:14:46,240
उससे आगे का सूक्ष्म वेद वाला संपूर्ण ज्ञान प्राप्त करता है।

216
00:14:46,240 --> 00:14:50,240
तत्व ज्ञानी कौन कौन करता है? तत्व ज्ञानी उस तत्व ज्ञान को

217
00:14:50,240 --> 00:14:54,240
तत्व ज्ञानी से प्राप्त करके साधक शीघ्र

218
00:14:54,240 --> 00:14:58,560
ही ब्रह्म साधना से होने वाली गति से दूसरी गति होने वाली परम

219
00:14:58,560 --> 00:15:03,280
शांति को प्राप्त हो जाता है। यह चार 39 में आ गया।

220
00:15:03,280 --> 00:15:07,600
तो अब इसने इंद्रियों पर संयम करने को स्वीकार

221
00:15:07,600 --> 00:15:11,760
कर लिया। तो यह क्या करता है? कई जगह पर इंद्रियों के संयम

222
00:15:11,760 --> 00:15:15,920
इंद्रियों को संयम में लाने का खंडन करता है और उसको नाम देता

223
00:15:15,920 --> 00:15:19,920
है कि हट योग है। अपनी इंद्रियों पर संयम करो ना ये

224
00:15:19,920 --> 00:15:24,080
हट योग है। तो इसका हमें अनुसरण नहीं करना है। और फिर कहीं दूसरी जगह

225
00:15:24,080 --> 00:15:28,160
मान भी लेता है। तो ये इनका ज्ञान है

226
00:15:28,160 --> 00:15:31,520
रामपाल का। यह इस किताब

227
00:15:31,520 --> 00:15:35,920
को जब आप पढ़ेंगे ना तो इतनी जगह दिमाग पंचर होगा। उसने हर दूसरी

228
00:15:35,920 --> 00:15:40,160
लाइन में खुद को ही काटा है और किसी को नहीं काटा है। खुद को ही काटा

229
00:15:40,160 --> 00:15:44,480
है। ठीक है? अभी आगे देखिएगा मजा आएगा। आनंद आ जाएगा।

230
00:15:44,480 --> 00:15:48,960
अच्छा फिर एक

231
00:15:48,960 --> 00:15:53,280
इसका कुल मिलाकर के अर्थ है यह तत्व ज्ञान जो कहता है वह कहता है नाम दीक्षा

232
00:15:53,280 --> 00:15:57,280
को और 40 में

233
00:15:57,280 --> 00:16:01,520
चार 40 में क्या कहता है यह विवेकहीन यानी जिसको तत्व

234
00:16:01,520 --> 00:16:05,600
ज्ञान नहीं मिला यानी कि नाम नहीं मिला तो इसका मतलब है

235
00:16:05,600 --> 00:16:10,640
कि तत्व का मतलब है इसका मतलब नाम दीक्षा तो अब यह पूरा

236
00:16:10,640 --> 00:16:14,640
वैदिक वांग में उठा के दिखा दें कि तत्व ज्ञान का मतलब नाम

237
00:16:14,640 --> 00:16:18,800
दीक्षा कहां पर लिखा हुआ है? मैं चैलेंज दे रहा हूं पूरे रामपाली

238
00:16:18,800 --> 00:16:22,960
गैंग को। तत्व ज्ञान का मतलब नाम दीक्षा

239
00:16:22,960 --> 00:16:27,200
कहां पर लिखा हुआ है? तुम बता दो मुझे। ठीक है?

240
00:16:27,200 --> 00:16:31,200
तत्व ज्ञान का मतलब भागवत में श्लोक आया है। मैं वहां से आपको

241
00:16:31,200 --> 00:16:35,610
बता दूं कि तत्व किसे कहते हैं।

242
00:16:35,610 --> 00:16:39,760
[गला साफ़ करने की आवाज़] और जब तक वो संशय समाप्त नहीं होगा कि

243
00:16:39,760 --> 00:16:43,760
भाई अगर ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो वो सब जगह होना चाहिए।

244
00:16:43,760 --> 00:16:46,960
अगर वो सब जगह नहीं है उसकी शक्ति है सब जगह

245
00:16:46,960 --> 00:16:50,960
तो फिर वो शक्ति या तो बराबर हो जाएगी। फिर वही दूसरी चीजें

246
00:16:50,960 --> 00:16:55,120
हो जाएंगी। बहुत सारे क्वेश्चन रेज हो जाएंगे। इसको कहते हैं संशय। और

247
00:16:55,120 --> 00:16:59,120
इस प्रकार के संशयों का निराकरण करता है गुरु तत्व

248
00:16:59,120 --> 00:17:03,360
ज्ञान देकर के। यह तात्विक बातें हैं कि भाई अगर ईश्वर एक

249
00:17:03,360 --> 00:17:07,680
जगह खड़ा है तो पूरी दुनिया में कंट्रोल कैसे कर रहा है? अगर आप कहोगे कि मन

250
00:17:07,680 --> 00:17:11,920
से सोच कर कंट्रोल कर रहा है तो यानी कि उसकी सोच पूरे संसार

251
00:17:11,920 --> 00:17:16,400
में फैली हुई है। वो जो सोच है उसको

252
00:17:16,400 --> 00:17:20,400
ईश्वर के बराबर सामर्थ्यवान होना पड़ेगा। तो दो दो पदार्थ हो

253
00:17:20,400 --> 00:17:24,560
जाएंगे। दो तत्व हो जाएंगे। एक तो स्वयं ईश्वर और एक उसकी सोच। क्योंकि आपने उसको

254
00:17:24,560 --> 00:17:28,960
अलग माना है या फिर यह मान लो कि ईश्वर ही सोच के रूप में सर्वत्र

255
00:17:28,960 --> 00:17:33,280
व्याप्त है। तब तो मान लिया जाएगा। मगर तुम्हें तो अब्राहमिक आईडियोलॉजी फैलानी

256
00:17:33,280 --> 00:17:37,440
है। वो कुरान और बाइबल फैलानी है। तो तुम क्यों मानोगे ये बात? कि ईश्वर

257
00:17:37,440 --> 00:17:41,520
सर्वत्र व्याप्त है। तो इसलिए तुम अपनी ये अकचरी सी और

258
00:17:41,520 --> 00:17:45,520
घटिया टाइप की ये जो फिलोसफी है

259
00:17:45,520 --> 00:17:50,560
उसी को कहते रहोगे। यही तत्व ज्ञान है। मुझसे नाम दीक्षा ले लो। यह तत्व ज्ञान

260
00:17:50,560 --> 00:17:54,880
श्रीमद् भागवत में तत्व ज्ञान किसी और चीज को कहा गया। अपने हृदय

261
00:17:54,880 --> 00:17:59,040
में उत्पन्न अपने संशय को ज्ञान रूपी तलवार से काट

262
00:17:59,040 --> 00:18:02,320
कर। अब देखिए इसने मान लिया कि 4:42

263
00:18:02,320 --> 00:18:06,400
में काल यह कह रहा है कि तू भक्ति कर और भक्ति करने के लिए कमर

264
00:18:06,400 --> 00:18:10,560
कर। देखिए क्या कह रहा है। विवेचन देखिए। यह कह

265
00:18:10,560 --> 00:18:14,720
रहा है 4:42 में एक मिनट 442 आप खोल दीजिए। 101

266
00:18:14,720 --> 00:18:18,720
ये चार 42 में कह रहा है कि गीता अध्याय चार के

267
00:18:18,720 --> 00:18:22,960
श्लोक 42 के अनुवाद में मेरे यानी

268
00:18:22,960 --> 00:18:27,120
रामपाल के अनुवाद के अतिरिक्त सर्व अनुवादों ने अपने अनुवाद

269
00:18:27,120 --> 00:18:31,360
में लिखा है कि युद्ध के लिए खड़ा हो जा जो गलत है। क्योंकि पूरे अध्याय

270
00:18:31,360 --> 00:18:35,360
चार में परमात्मा के तत्व ज्ञान तथा अज्ञान का विश्लेषण है। स्पष्ट

271
00:18:35,360 --> 00:18:40,320
किया है कि शास्त्र विरुद्ध अधूरे व मनमाने भक्ति कर्मों को तत्व ज्ञान से समझकर

272
00:18:40,320 --> 00:18:44,480
उनको त्याग कर पूर्ण परमात्मा द्वारा

273
00:18:44,480 --> 00:18:48,720
अपने मुख कमल से बताए तत्व ज्ञान को तत्वदर्शी

274
00:18:48,720 --> 00:18:52,880
संतों से समझकर कर्तव्य भक्ति कर्म कर। अच्छा एक बात और है जैसे यह

275
00:18:52,880 --> 00:18:56,960
त्यागने की जो बात करता है ना कि मेरी भक्ति मत कर और या

276
00:18:56,960 --> 00:19:01,040
फिर यह 25 से 30 में कह रहा है कि इन इन कर्मों को त्याग दे।

277
00:19:01,040 --> 00:19:05,120
तो यह जो जो त्यागने की बातें कह रहा है वहां पर त्यागने की जो

278
00:19:05,120 --> 00:19:09,200
संस्कृत होती है ना वह उपलब्ध ही नहीं होता है क्योंकि वहां पर तो उन

279
00:19:09,200 --> 00:19:13,360
कर्मों में गति करने के लिए कहा जा रहा है उनको स्वीकार करने के लिए कहा जा रहा है

280
00:19:13,360 --> 00:19:17,360
तो यह जो कहता है कि मुझे छोड़कर उसकी भक्ति कर

281
00:19:17,360 --> 00:19:21,360
या इन कर्मों को त्याग कर यह वाला कर्म कर तो यह त्यागने वाली संस्कृत नहीं

282
00:19:21,360 --> 00:19:26,560
होती वहां पर ठीक है

283
00:19:26,560 --> 00:19:30,640
तो अ 42 40

284
00:19:30,640 --> 00:19:33,040
में

285
00:19:33,040 --> 00:19:37,680
यह इस बात का विरोध कर रहा है कि उसने जो है

286
00:19:37,680 --> 00:19:42,080
युद्ध के लिए खड़ा होने की बात कही। अब देखिए इसके अनुसार

287
00:19:42,080 --> 00:19:46,080
काल जो है युद्ध करवाना चाहता था क्योंकि उसको अपने खाने

288
00:19:46,080 --> 00:19:50,240
का इंतजाम करना था। तो खान काल जो है युद्ध करने

289
00:19:50,240 --> 00:19:54,640
के लिए नहीं कह रहा है। भक्ति करने के लिए कह रहा है। इसका मतलब अपने खाने का इंतजाम नहीं कर रहा है।

290
00:19:54,640 --> 00:19:58,640
कहीं पर कहेगा कि काल को अपने खाने का इंतजाम करना है इसलिए वो युद्ध करवाना

291
00:19:58,640 --> 00:20:02,960
चाहता है। कहीं पर वो श्री कृष्ण पर यह दोष लगाता है कि श्री कृष्ण जो है

292
00:20:02,960 --> 00:20:06,960
ठीक व्यक्ति नहीं थे। वो युद्ध करवाना चाहते थे। कहीं पर वो यह कहता है

293
00:20:06,960 --> 00:20:11,040
कि श्री कृष्ण तो अच्छे व्यक्ति थे। वही युद्ध नहीं करवाना चाहते थे। बल्कि

294
00:20:11,040 --> 00:20:15,200
काल प्रेत वश उनके अंदर प्रवेश करके वो युद्ध करवाना चाहता था। क्योंकि उसको

295
00:20:15,200 --> 00:20:19,280
अपना काम बनाना है क्योंकि वह अपना उल्लू सीधा करना चाहता है। यही सब लिखा

296
00:20:19,280 --> 00:20:23,760
है इसमें। यह टटपुंजिया और घटिया भाषा ही है इस संत की। इस तथाकथित

297
00:20:23,760 --> 00:20:27,760
संत की यही घटिया भाषा है। वो अपना उल्लू सीधा करना चाहता

298
00:20:27,760 --> 00:20:32,000
है। ये सब इनकी किताबों में छपा है। है ना? तो वो अपना उल्लू

299
00:20:32,000 --> 00:20:32,560
सीधा करना

300
00:20:32,560 --> 00:20:36,560
चाहता है। काल। तो कहीं पे श्री कृष्ण को जहां विलेन बनाना होगा वहां

301
00:20:36,560 --> 00:20:40,640
काल वाली बात अपनी ही छुपा लेगा। जहां पर काल को विलेन बनाना

302
00:20:40,640 --> 00:20:45,040
होगा वहां श्री कृष्ण वाली बात छुपा लेगा। दोनों ही इसके लिए सही नहीं है।

303
00:20:45,040 --> 00:20:49,120
और उसके बाद जब काल से भी युद्ध लड़वाना चाहता है तो यहां पर क्या कह रहा है कि

304
00:20:49,120 --> 00:20:53,280
काल युद्ध लड़ने को नहीं कह रहा। भक्ति करने को कह रहा है। दूसरी बात एक

305
00:20:53,280 --> 00:20:57,280
बात और है यहां पर आप ध्यान दीजिए कि खड़ा हो जा

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00:20:57,280 --> 00:21:01,360
वाली लाइन दिखाइए जरा बड़ी करके खड़ा हो जा। युद्ध के लिए खड़ा हो

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00:21:01,360 --> 00:21:05,440
जा। तो ये कह रहा है कि ये जो अर्थ

308
00:21:05,440 --> 00:21:09,520
किया है ना कि युद्ध के लिए खड़ा हो जा। यह युद्ध के लिए खड़ा नहीं होना

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00:21:09,520 --> 00:21:13,680
है। भक्ति के लिए खड़ा होना है। ठीक है? अब आप एक

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00:21:13,680 --> 00:21:17,920
बात बताइए भक्ति क्या बैठकर नहीं हो सकती है? क्या खड़े

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00:21:17,920 --> 00:21:22,080
होकर के ही भक्ति होती है? इसका विधान कहां लिखा हुआ है? जो

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00:21:22,080 --> 00:21:26,400
वो यह कहेगा कि भक्ति के लिए खड़ा हो जा। युद्ध के लिए खड़ा हो जा। अब

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00:21:26,400 --> 00:21:30,400
युद्ध के लिए खड़ा होना तो समझ में आता है। मगर भक्ति के

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00:21:30,400 --> 00:21:34,560
लिए खड़ा हो जा।

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00:21:34,560 --> 00:21:38,720
यह कहां से निश्चित होगा? ठीक है? तो, यह जो

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00:21:38,720 --> 00:21:42,720
अभी तक हम लोग पीछे पढ़ चुके तो लास्ट एपिसोड था, उसका मैंने कुछ बुलेट

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00:21:42,720 --> 00:21:46,800
पॉइंट्स बताने का प्रयास किया है। अब हम बात

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00:21:46,800 --> 00:21:50,800
करते हैं पांचव अध्याय की। पांचवा अध्याय खोल लीजिए। अगला
