1
00:00:01,520 --> 00:00:05,920
जय श्री राम सभी को। एक

2
00:00:05,920 --> 00:00:10,000
छोटा बच्चा देखा है आपने कभी लॉलीपॉप वाला जो

3
00:00:10,000 --> 00:00:14,000
लॉलीपॉप चूसता है। ऐसा ही छोटा बच्चा मुझे

4
00:00:14,000 --> 00:00:18,240
कभी-कभी भागवतानंद भी दिखता है। और

5
00:00:18,240 --> 00:00:22,720
ऐसा लगता है कि या तो वो बिल्कुल ही बेवकूफ है। उसके मस्तिष्क

6
00:00:22,720 --> 00:00:28,400
में भूसा भरा हुआ है। या फिर वो

7
00:00:28,400 --> 00:00:32,480
चीजों को समझना ही नहीं चाहता है। जििद कर बैठा है। और

8
00:00:32,480 --> 00:00:37,120
या फिर वह बहुत बड़ा षड्यंत्रकारी है जिसके कारण वह जो

9
00:00:37,120 --> 00:00:41,360
तार्किक दृष्टिकोण से प्रामाणिक दृष्टिकोण से जो बातें हैं उनको एक

10
00:00:41,360 --> 00:00:45,920
तरफ करते हुए केवल अंधी चाल चल रहा है और

11
00:00:45,920 --> 00:00:49,920
यह सोच रहा है कि जो भी नियम है शास्त्रों के या जो भी नियम है

12
00:00:49,920 --> 00:00:54,240
जो भी तर्क हैं जो भी लॉजिक है या प्रमाण है उनको

13
00:00:54,240 --> 00:00:59,200
वहीं पर लागू किया जाए उतने ही अंश में जितने अंश में

14
00:00:59,200 --> 00:01:03,360
भागवतानंद चाहता है। इसीलिए वह जो पूरी सीरीज है ना निग्रह निकासिका

15
00:01:03,360 --> 00:01:07,840
उसमें एक बात बार-बार आई है। क्यों? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है।

16
00:01:07,840 --> 00:01:11,920
अब क्या बात है? इसने एक वीडियो बनाया

17
00:01:11,920 --> 00:01:16,080
है। उसमें मेरा नाम ना लेते हुए कुछ चीजें कही है और कुछ मेरा नाम

18
00:01:16,080 --> 00:01:16,720
लेकर के कही

19
00:01:16,720 --> 00:01:20,800
है। और उसमें

20
00:01:20,800 --> 00:01:24,880
सबसे पहले इसने बताया है कि कुछ लोगों को यह शिकायत

21
00:01:24,880 --> 00:01:29,120
है भागवतानंद से कि यह जो भी कार्यकर्ता

22
00:01:29,120 --> 00:01:33,360
है प्रामाणिक आचार्यों के संबंध में उनको सार्वजनिक तरीके

23
00:01:33,360 --> 00:01:37,360
से क्यों करता है? यदि कोई शोधन है भी तो

24
00:01:37,360 --> 00:01:42,480
उसको आंतरिक तौर पर सुलझाने की बजाय अ

25
00:01:42,480 --> 00:01:46,560
ये सार्वजनिक रूप से प्रतिकार क्यों करने लग

26
00:01:46,560 --> 00:01:51,040
जाता है? तो इसका उसमें उत्तर यह था

27
00:01:51,040 --> 00:01:55,040
कि भाई जो मैंने कोई भी ऐसी चीज सार्वजनिक नहीं

28
00:01:55,040 --> 00:01:59,200
की है जो पहले से सार्वजनिक नहीं थी। पहली बात

29
00:01:59,200 --> 00:02:03,520
और दूसरी बात यह है कि इसका यह भी आंसर था

30
00:02:03,520 --> 00:02:07,760
कि क्या मैंने 3 साल से प्रयास नहीं किया है? 3 साल से मैं क्या कर रहा था?

31
00:02:07,760 --> 00:02:11,920
प्रयास ही तो कर रहा था। अच्छा। तो पहली बात तो

32
00:02:11,920 --> 00:02:16,000
यह है कि जो आरोप तुमने

33
00:02:16,000 --> 00:02:21,840
लगाए सार्वजनिक रूप से

34
00:02:21,840 --> 00:02:26,000
वो आरोप क्या सीधा आरोप है? क्या तुम

35
00:02:26,000 --> 00:02:30,000
उसको कहीं पर आकर के प्रूफ कर सकते हो जो मटेरियल तुमने

36
00:02:30,000 --> 00:02:34,160
सार्वजनिक किया है अपने सोशल मीडिया हैंडल से क्या तुम उसके

37
00:02:34,160 --> 00:02:38,320
आधार पर साबित कर सकते हो कि यह यहां पर ऐसी चीज है नहीं कर सकते

38
00:02:38,320 --> 00:02:42,400
तो मैं तुमको चुनौती दे रहा हूं विद्या भास्कर जी महाराज के यहां आ

39
00:02:42,400 --> 00:02:46,480
जाओ और बैठकर के आमने सामने बात कर लो और तुम अपनी उस

40
00:02:46,480 --> 00:02:50,880
सामग्री से सिद्ध कर दो कि जो तुमने

41
00:02:50,880 --> 00:02:55,360
दुराचरण दिखाने का प्रयास किया है पूरी पीठ के परिकरों में

42
00:02:55,360 --> 00:02:59,440
कर दो। मैं ठीक तुम्हारे द्वारा बनाई गई दिखाई

43
00:02:59,440 --> 00:03:03,840
गई जो सामग्री है वह ठीक तुम्हारे लिए वैसी सामग्री मैं प्रस्तुत कर दूंगा।

44
00:03:03,840 --> 00:03:07,440
सेम

45
00:03:07,440 --> 00:03:11,520
फिर क्या होगा? इसका मतलब उस सामग्री से यह सिद्ध नहीं

46
00:03:11,520 --> 00:03:16,800
हो रहा है कि वह आरोप जो है आरोप जिस पर लग रहे हैं उस पर सिद्ध हो रहे हैं।

47
00:03:16,800 --> 00:03:20,800
तो तुम्हारी वो जो सामग्री है जिसके आधार पर तुम ये सोचते हो कि मैंने जो है

48
00:03:20,800 --> 00:03:24,880
आरोप सिद्ध किए वो आरोप लगाने के लिए उपयोग में

49
00:03:24,880 --> 00:03:29,200
हो सकती है कि हां भाई इससे ऐसा लग रहा है कि ऐसा हो सकता है। मगर

50
00:03:29,200 --> 00:03:33,200
फिर भी वह जांच का विषय ही हो जाएगा और उसके बाद जांच का विषय होते हुए तुमने

51
00:03:33,200 --> 00:03:37,280
कुछ सिद्ध नहीं किया। ठीक। तो यदि तुमको ऐसा लग रहा है कि

52
00:03:37,280 --> 00:03:41,360
वह जो आरोप सिद्ध है तो तुम आ जाओ विद्या भास्कर जी के यहां पर आकर के

53
00:03:41,360 --> 00:03:45,360
बैठ लो और उनके सामने सिद्ध कर दो। तुम जो तुमने अभी

54
00:03:45,360 --> 00:03:49,520
तक जो सामग्री दिखाई है उससे कुछ भी सिद्ध नहीं होता है।

55
00:03:49,520 --> 00:03:54,000
उससे केवल प्रश्न खड़े होते हैं। ठीक? पहली बात।

56
00:03:54,000 --> 00:03:58,400
दूसरी बात तुमने कहा कि पहले से ही सार्वजनिक थी। किस स्तर पर सार्वजनिक

57
00:03:58,400 --> 00:04:02,560
थी वह बातें? क्या दो लोगों का आपस में बात कर

58
00:04:02,560 --> 00:04:06,720
लेना? तुम यह मानते हो कि प्रेस कॉन्फ्रेंस हो गई उसमें अखबार में छप गया या

59
00:04:06,720 --> 00:04:10,800
किसी बड़े सोशल मीडिया अकाउंट से उसको निर्गत कर दिया गया जानकारी को

60
00:04:10,800 --> 00:04:15,360
इसको तुम सार्वजनिक मानते हो। अगर पूरी पीठ के

61
00:04:15,360 --> 00:04:19,440
व्यवस्थापन कार्यों से कुछ लोग संतुष्ट नहीं है और वह आपस

62
00:04:19,440 --> 00:04:22,800
में चर्चा कर रहे हैं। किसी से कान्हा फूंसी कर रहे हैं।

63
00:04:22,800 --> 00:04:27,440
जो बात अभी पूरे पूरे तौर पर मटके जो

64
00:04:27,440 --> 00:04:32,000
ऐसे शिष्य हैं जो न्यूट्रल है। किसी के पक्ष में नहीं है।

65
00:04:32,000 --> 00:04:36,000
और न्याय के पक्ष में है। जो बात अभी

66
00:04:36,000 --> 00:04:40,080
तक उनको भी फील नहीं हुई है। वह बात तुम कह रहे हो कि वह सार्वजनिक

67
00:04:40,080 --> 00:04:45,360
है। कौन से न्यूज़ चैनल पर आ गई थी वह बात? आज तक पर आ गई थी।

68
00:04:45,360 --> 00:04:49,760
जी जी न्यूज़ पर आ गई थी। कहां पर आ गई थी? अगर किसी ने

69
00:04:49,760 --> 00:04:53,840
वह बात वैसे तो मुझे नहीं लगता कि किसी ने अपने सोशल मीडिया

70
00:04:53,840 --> 00:04:58,000
अकाउंट पर डाली थी तुम्हारे चिल्लाने से पहले। मगर यदि

71
00:04:58,000 --> 00:05:02,080
डाली भी थी तो उसका सोशल मीडिया अकाउंट क्या कोई सामाजिक

72
00:05:02,080 --> 00:05:06,320
छवि रखने वाला व्यक्ति था वो? जिसको बहुत सारे लोग फॉलो

73
00:05:06,320 --> 00:05:12,320
करते हो। बहुत सारे लोग जिसकी बातें सुनते हो और

74
00:05:12,960 --> 00:05:16,960
अंत में यह भी तर्क आएगा कि जो बालक

75
00:05:16,960 --> 00:05:21,040
पूरे वर्ष पढ़ाई नहीं करता है और अपने इम्तिहान

76
00:05:21,040 --> 00:05:25,120
के दिनों में वो पढ़ने बैठता है परीक्षा के दिनों में तो

77
00:05:25,120 --> 00:05:29,280
उस समय उसकी माताजी कहती है जाकर दूध लेकर के आओ। अब

78
00:05:29,280 --> 00:05:33,440
वो वो बालक कहता है कि मेरा इम्तिहान है मुझे पढ़ लेने दो। तो क्या

79
00:05:33,440 --> 00:05:37,520
वहां पर यह तर्क सही है कि पूरे वर्ष तो तू पढ़ा नहीं। अब

80
00:05:37,520 --> 00:05:41,760
बड़ा पढ़ने का ड्रामा कर रहा है। इसलिए तू अब दूध लेकर गया। क्या वहां पर यह

81
00:05:41,760 --> 00:05:46,160
कहना उचित होता है? तो अगर कोई चीज पहले से बिगड़ी

82
00:05:46,160 --> 00:05:51,600
हुई है, कितनी भी बिगड़ी हुई है, उसको और बिगाड़ना उचित होता है।

83
00:05:51,600 --> 00:05:55,840
अगर कोई चीज पहले से सार्वजनिक है, तो उसमें और उसको सार्वजनिक

84
00:05:55,840 --> 00:05:59,840
करना उचित होगा। यदि सार्वजनिकता से आपत्ति

85
00:05:59,840 --> 00:06:03,920
है तो यदि तुम्हारा यह तर्क है कि सार्वजनिक तो पहले से ही था।

86
00:06:03,920 --> 00:06:07,920
तो कितनी तरीके से कटा तुम्हारा यह तर्क? पहले

87
00:06:07,920 --> 00:06:11,920
नंबर बात कि सार्वजनिकता का स्तर क्या था? सार्वजनिक था ही नहीं।

88
00:06:11,920 --> 00:06:17,120
व्यक्तिगत तौर पर लोगों में कान्हा फूंसी हो रही थी।

89
00:06:17,120 --> 00:06:21,120
और कई लोग उस बात को मान रहे थे। तुम्हारे अनुसार बोल रहा हूं। तो कई

90
00:06:21,120 --> 00:06:25,680
लोग उस बात को मान रहे थे। कई लोग नहीं भी मान रहे थे। यह सार्वजनिक

91
00:06:25,680 --> 00:06:28,240
होना नहीं होता है। फिर

92
00:06:28,240 --> 00:06:32,480
अगर किसी ने सार्वजनिक किया भी तो उसका स्तर क्या था? उसकी सार्वजनिकता

93
00:06:32,480 --> 00:06:37,200
का। और तीसरा कि चलो दुर्जन तोष न्याय से अगर मान भी लिया जाए

94
00:06:37,200 --> 00:06:42,720
कि वह सार्वजनिक था तो उसको तुम और सार्वजनिक करोगे।

95
00:06:42,720 --> 00:06:46,800
पहली बात। दूसरी बात क्या है कि गुप्तचर के

96
00:06:46,800 --> 00:06:50,880
आधार पर प्राप्त जो सूचनाएं होती हैं वह प्रमाण के रूप में

97
00:06:50,880 --> 00:06:54,880
उपयुक्त नहीं होती है। गुप्तचर के आधार पर प्रमाण

98
00:06:54,880 --> 00:06:59,200
जुटाए जा सकते हैं। तुमने गुप्तचर के आधार

99
00:06:59,200 --> 00:07:03,200
को ही प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करते हुए और आरोप असिद्ध आरोप बोल

100
00:07:03,200 --> 00:07:07,760
दिए। अरे भाई चलो बोलते भी चलो तुम दुश्मनी मान लो।

101
00:07:07,760 --> 00:07:11,760
मान लो कि तुम्हें कोई मतलब नहीं है परंपरा की रक्षा से

102
00:07:11,760 --> 00:07:16,320
धर्म की रक्षा से जो मैंने पहले कहा ना या तो कोई बच्चा है लॉलीपॉप

103
00:07:16,320 --> 00:07:20,480
वाला और या फिर वो ना समझने की कसम खा बैठा है जिद कर बैठा

104
00:07:20,480 --> 00:07:24,800
है कि अब जो बंदूक से निकली गोली और जुबान से निकली गोली वापस नहीं जाएगा।

105
00:07:24,800 --> 00:07:28,800
अगर मैंने विरोध कर दिया है तो अब मैं उसी पर डटा रहूंगा। तो अब

106
00:07:28,800 --> 00:07:32,800
उसको ऐसा अब उस बच्चे अब तुम्हें ऐसा लगने लगा है कि भाई मैंने अगर यह

107
00:07:32,800 --> 00:07:36,880
चीज का पक्ष ले लिया है तो अब मैं इसी चीज पर अटका रहूंगा। इसके लिए लड़ता रहूंगा।

108
00:07:36,880 --> 00:07:40,880
चाहे जितने निराधार कुतर्क करने पड़ जाए,

109
00:07:40,880 --> 00:07:43,600
पागलपन अपना सिद्ध करना पड़ जाए, लॉलीपॉप

110
00:07:43,600 --> 00:07:47,680
वाला बच्चा स्वयं को सिद्ध करना पड़ जाए, मगर मैं उसको ही कुछ

111
00:07:47,680 --> 00:07:51,920
ना कुछ तरीके से उसको ही उसकी ही रक्षा करता रहूंगा। और या फिर

112
00:07:51,920 --> 00:07:56,160
कोई बहुत बड़ा षड्यंत्रकारी है जो जानबूझ के चीजों को समझने

113
00:07:56,160 --> 00:08:00,480
का प्रयास करने की बजाय और उसको

114
00:08:00,480 --> 00:08:04,560
एक साइड करते हुए तार्किकता को, लॉजिक को, प्रमाण को हर चीज

115
00:08:04,560 --> 00:08:08,960
को एक साइड करते हुए केवल उसका सिंगल पॉइंट एजेंडा है कि कैसे

116
00:08:08,960 --> 00:08:14,960
धर्म पर आघात पहुंचाया जाए। क्योंकि कई

117
00:08:15,200 --> 00:08:19,200
ऐसे चीजें भी प्राप्त हो गई है कि जिससे कि तुम मलच्छराज के ही जो

118
00:08:19,200 --> 00:08:23,360
तुम्हारे द्वारा गाड़ा गया मलिच्छराज या फ्री मिशन के ही एजेंट साबित

119
00:08:23,360 --> 00:08:28,160
हो रहे हो। क्यों? क्योंकि भाई निगमानंद जिनके

120
00:08:28,160 --> 00:08:32,240
यहां आज भी उनके वहां पर इस वाले अतिथि

121
00:08:32,240 --> 00:08:37,280
के रूप में आते हैं। निगमंद इत्यादि के यहां पर है ना।

122
00:08:37,280 --> 00:08:39,600
तो

123
00:08:39,600 --> 00:08:44,000
फिर फ्री मिशन का एजेंट कौन सिद्ध हो रहा है? जो अपने को भगवान

124
00:08:44,000 --> 00:08:48,240
के रूप में पुजवा रहा है। माता को अपनी पत्नी के रूप में रख रहा

125
00:08:48,240 --> 00:08:53,840
है। छूने की कोशिश कर रहा है। और

126
00:08:53,840 --> 00:08:57,840
इस जैसे लोगों को वहां पर अतिथि के रूप में बुलाया जा रहा है। पूरी

127
00:08:57,840 --> 00:08:59,120
में ही

128
00:08:59,120 --> 00:09:03,280
ह कौन कर रहा है फिर?

129
00:09:03,280 --> 00:09:07,280
अच्छा। तो फिर यह भी लगता है कि या तो छोटे

130
00:09:07,280 --> 00:09:11,440
बच्चे हो या फिर

131
00:09:11,440 --> 00:09:15,440
जििद कर बैठे हो या तो बुद्धू हो या जिद कर बैठे हो

132
00:09:15,440 --> 00:09:19,520
या फिर षड्यंत्रकारी हो। खैर तो अब दोबारा उस पर आ

133
00:09:19,520 --> 00:09:23,840
जाए कि सार्वजनिक पहले से नहीं

134
00:09:23,840 --> 00:09:27,840
थी। यदि थी तो उसका स्तर क्या था? और

135
00:09:27,840 --> 00:09:32,400
चलो मान लिया कि है भी तो तुम क्या और करोगे सार्वजनिक

136
00:09:32,400 --> 00:09:36,560
तो तुमसे पूछा जाएगा ना और तुमने जिनका भी नाम लिया है कि

137
00:09:36,560 --> 00:09:40,560
इन्होंने भी बोला था उन्होंने भी बोला था भाई जिसके जिसका हमारे संज्ञान में आएगा

138
00:09:40,560 --> 00:09:44,560
अगर हमें पता लगेगा कि इसके बोलने से कोई प्रभाव उत्पन्न हो रहा

139
00:09:44,560 --> 00:09:48,880
है तो हम अगर वो सार्वजनिक व्यक्तित्व होगा

140
00:09:48,880 --> 00:09:53,280
तो हम उसका सार्वजनिक विरोध करेंगे। अगर वह कोई सार्वजनिक

141
00:09:53,280 --> 00:09:57,520
व्यक्तित्व नहीं होगा और हमारे सामने या तो हमारे सामने पड़े ना और पड़ेगा

142
00:09:57,520 --> 00:10:02,160
तो हम उसका विरोध करेंगे। सीधी सी बात करेंगे

143
00:10:02,160 --> 00:10:06,320
विरोध और किया है। मगर यह नहीं है कि कोई जिसकी कोई

144
00:10:06,320 --> 00:10:10,400
सामाजिक छवि नहीं है और हमें पता लग गया कि भैया ये ऐसे ऐसी बात बोल रहा

145
00:10:10,400 --> 00:10:14,160
है जिससे कि प्रामाणिक आचार्यों के प्रति

146
00:10:14,160 --> 00:10:18,160
अनास्था उत्पन्न होगी समाज में तो हम उस पर वीडियो बना

147
00:10:18,160 --> 00:10:22,240
दें। यह तुम्हारा काम है। तुम्हें चाहिए होता है मसाला। सबसे

148
00:10:22,240 --> 00:10:25,120
बड़ी तुम्हारी

149
00:10:25,120 --> 00:10:29,200
प्लस पॉइंट तुम्हारा क्या है? और मेरा ड्रॉबैक क्या है?

150
00:10:29,200 --> 00:10:33,680
कि तुम कभी भी पहली बात तो

151
00:10:33,680 --> 00:10:37,920
तुम्हारे पास बहुत टाइम है। अगर किसी ने तुम्हें

152
00:10:37,920 --> 00:10:42,080
कमेंट के माध्यम से भी कुछ कहा है तो तुम उस पर भी वीडियो बना करके एक एक

153
00:10:42,080 --> 00:10:46,320
बात का जवाब दोगे। क्योंकि तुम्हारे पास और कोई काम नहीं

154
00:10:46,320 --> 00:10:50,720
है। इसलिए तुम्हारे पास हर बात का जवाब देने के लिए टाइम है

155
00:10:50,720 --> 00:10:55,040
लंबा लंबा वीडियो बनाने का। क्योंकि तुम्हारे पास कोई धरातली अभियान

156
00:10:55,040 --> 00:11:00,560
नहीं है। जिसके पास अभियान होता है

157
00:11:00,560 --> 00:11:04,880
उसको परेशानी होती है। हर बात को लेकर के सामने

158
00:11:04,880 --> 00:11:08,960
बोले कि ना बोले और समय है कि नहीं। तुम्हारे पास टाइम बहुत

159
00:11:08,960 --> 00:11:13,040
है। यह तुम्हारा प्लस पॉइंट है। दूसरा कि तुम जो है

160
00:11:13,040 --> 00:11:17,680
बेलगाम घोड़े की तरीके से स्वतंत्र हो।

161
00:11:17,680 --> 00:11:21,920
कोई तुम्हारे ऊपर तुमको यह निश्चित करने वाला नहीं है

162
00:11:21,920 --> 00:11:26,000
कि तुमको यह नहीं करना चाहिए या वो नहीं करना चाहिए। तुम्हारे आगे कोई नहीं है।

163
00:11:26,000 --> 00:11:29,280
तुम स्वयंभू हो। तो तुम कभी

164
00:11:29,280 --> 00:11:33,360
भी कहीं पर भी कपड़े फाड़ने लग जाते हो और स्वयंभू इसलिए भी हो क्योंकि

165
00:11:33,360 --> 00:11:37,440
तुम्हारा कोई उद्देश्य नहीं है। तुम्हारा कोई अभियान नहीं है धरातल पर। और

166
00:11:37,440 --> 00:11:41,440
धरातल पर अभियान से और क्या-क्या चीजें हैं वह आगे भी आएंगी।

167
00:11:41,440 --> 00:11:45,440
मगर अभी क्या है तुम्हारा प्लस पॉइंट इसलिए भी है कि तुम्हारा धरातल पर कोई अभियान नहीं

168
00:11:45,440 --> 00:11:49,600
है तो तुम कभी भी जटिल से जटिल मुद्दों पर कपड़े फाड़ने लग जाओगे। नग

169
00:11:49,600 --> 00:11:53,840
नंगे नंगपन दिखाने लगोगे। नग्न होने लग जाओगे। इसका

170
00:11:53,840 --> 00:11:57,920
जवाब दो। इसका जवाब क्यों नहीं दिया? यहां पे क्यों चुप रहे? वहां पे क्यों चुप रहे? असहज स्थिति में

171
00:11:57,920 --> 00:12:02,400
डालने लगोगे आचार्यों को। असहज स्थिति का मतलब समझते हो?

172
00:12:02,400 --> 00:12:06,560
जैसे कि कृपात्री जी महाराज ने जो वेदों के अनुसार परंपरा प्राप्त

173
00:12:06,560 --> 00:12:09,760
सिद्धांत है कि पृथ्वी

174
00:12:09,760 --> 00:12:14,000
घूमती है। पृथ्वी नहीं घूमती है। सूर्य घूमता

175
00:12:14,000 --> 00:12:18,400
है पृथ्वी के चारों ओर। यह उन्होंने कहा अब

176
00:12:18,400 --> 00:12:23,280
तुम्हारा अनुसार तुम्हारे अनुसार यह बात है। कि

177
00:12:23,280 --> 00:12:27,360
तुम जाकर के इसी विषय को भरे मंच पर पूछोगे। बार बार तो

178
00:12:27,360 --> 00:12:31,680
उससे होगा क्या? सब सब लोग जिनको सुन रहे हैं शंकराचार्यों

179
00:12:31,680 --> 00:12:35,680
को उनसे तुम यह बात पूछोगे। असहज स्थिति में डालोगे। अब असहज स्थिति क्यों

180
00:12:35,680 --> 00:12:40,240
है? कि आज का जो वातावरण है उसमें

181
00:12:40,240 --> 00:12:45,200
90% लोगों का यह 95%

182
00:12:45,200 --> 00:12:49,280
लोगों को इस बात में आस्था है कि पृथ्वी घूमती है

183
00:12:49,280 --> 00:12:53,280
सूर्य नहीं घूमता है। तो अब

184
00:12:53,280 --> 00:12:57,440
इस एक बात को असुतो मा सदगमया तमसो मा ज्योतिर्गमया मृत्युमा

185
00:12:57,440 --> 00:13:02,720
मृतम गमया यह जो सौंदर्यता है सनातन धर्म की यह सुनाने की बजाय

186
00:13:02,720 --> 00:13:06,800
फर्स्ट इंप्रेशन में श्रोताओं को यह सुनाया जाए सार्वजनिक

187
00:13:06,800 --> 00:13:10,880
मंच से कि पृथ्वी नहीं घूमती है सूर्य घूमता है जिससे कि वह समझे कि

188
00:13:10,880 --> 00:13:14,880
सना उनसे कि उनके मन में सनातन धर्म के प्रति अनास्था उत्पन्न हो

189
00:13:14,880 --> 00:13:18,880
जाए आचार्यों के प्रति अनास्था उत्पन्न हो जाए कि ये तो अरे ये तो गोबर बुद्धि वाली बातें

190
00:13:18,880 --> 00:13:22,960
वो जो फैलाई जाती है विरोधियों के द्वारा और

191
00:13:22,960 --> 00:13:27,040
फिर वह जो यह जो हमारे सनातन धर्म

192
00:13:27,040 --> 00:13:31,120
का मुख्य जो सौंदर्य है जहां पर सच्चिदानंद की प्यास की

193
00:13:31,120 --> 00:13:35,200
बात की गई है एकमात्र मोक्ष हमारे सनातन धर्म में है

194
00:13:35,200 --> 00:13:39,440
इस बात पर ध्यान इस बात से प्रभावित होने से पहले ही इस बात

195
00:13:39,440 --> 00:13:43,840
को आत्मसात करने से पहले ही वो इस जिसका

196
00:13:43,840 --> 00:13:48,160
नेगेटिव अर्थ निकाला जाता जा सकता है ऐसी बात को सुनकर के वो ना आस्थावान

197
00:13:48,160 --> 00:13:52,720
हो जाए तो या तो वो यह बोले कि भाई भैया अब अनास्थावान

198
00:13:52,720 --> 00:13:56,880
बनने से रोकना है क्योंकि उनको अपनी असतो सद्गमया वाली बात सुनानी है

199
00:13:56,880 --> 00:14:00,400
तो उसके लिए या तो वो ये बोले कि नहीं नहीं

200
00:14:00,400 --> 00:14:04,720
पृथ्वी नहीं पृथ्वी घूमती है सूर्य नहीं घूमता है तो अब क्या हो गया

201
00:14:04,720 --> 00:14:08,880
शास्त्रों का विरोध हो गया हां और

202
00:14:08,880 --> 00:14:12,880
अगर वो यह सोचे कि नहीं शास्त्रों का पक्ष रखना है और

203
00:14:12,880 --> 00:14:17,680
यह बात नहीं शास्त्रों का पक्ष रखना है तो वो यह बोल दे

204
00:14:17,680 --> 00:14:22,720
कि भैया पृथ्वी घूमती है सूर्य नहीं घूमता।

205
00:14:22,720 --> 00:14:27,760
पृथ्वी नहीं घूमती है। सूर्य घूमता है। तो दोनों ही

206
00:14:27,760 --> 00:14:31,760
सिचुएशंस में सिचुएशन में क्या हो रहा है? असहज स्थिति

207
00:14:31,760 --> 00:14:35,840
उत्पन्न हो रही है। जीवन में दो

208
00:14:35,840 --> 00:14:40,480
श्रेष्ठ मार्ग में से अधिक श्रेष्ठ चुनना

209
00:14:40,480 --> 00:14:44,560
और दो निम्न मार्गों में से कम

210
00:14:44,560 --> 00:14:48,800
निम्न चुनना यह कठिन विषय होता है। बालक बुद्धि

211
00:14:48,800 --> 00:14:52,800
हो ना तुम? बालक बुद्धि हो अभी तुम 28

212
00:14:52,800 --> 00:14:56,800
कितनी वर्ष की आयु है? 30 वर्ष मगर तुम्हारी बुद्धि अभी 14 15

213
00:14:56,800 --> 00:15:01,040
से आगे नहीं बढ़ पाई है। अब तुम क्या होगा कि यदि वो

214
00:15:01,040 --> 00:15:05,200
यह कह देंगे या तो वो यह कह दे कि भैया वो

215
00:15:05,200 --> 00:15:09,200
धरती जो है नहीं घूमती है। सूर्य घूमता है या वो यह कह

216
00:15:09,200 --> 00:15:13,840
दे तुम्हें संतुष्ट कर दे। और जो 90%

217
00:15:13,840 --> 00:15:17,200
जनता है जिसको सुधारना है।

218
00:15:17,200 --> 00:15:21,760
है ना? सच्चिदानंद का वो जो सिद्धांत है

219
00:15:21,760 --> 00:15:25,840
सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष और शाश्वत धर्म का धर्म ब्रह्म का जो

220
00:15:25,840 --> 00:15:29,840
सिद्धांत है उसके द्वारा उनको हिंदू बनाने की बनाने का जो

221
00:15:29,840 --> 00:15:34,080
प्रयास है उस पर मिट्टी फेर दे क्यों क्योंकि ऐसा सिद्धांत जब वो सुनेंगे

222
00:15:34,080 --> 00:15:38,240
जिस प्रायोरिटी में यही बात वो सुनेंगे तो वो आएंगे ही नहीं

223
00:15:38,240 --> 00:15:41,840
आगे बात सुनने के लिए

224
00:15:41,840 --> 00:15:46,080
और पहले ही वो नकारात्मकता उनके मन में घर कर जाएगी और फिर कौन

225
00:15:46,080 --> 00:15:50,160
उसका फायदा उठाएगा तुम जानते हो किस प्रकार के

226
00:15:50,160 --> 00:15:54,160
तत्व है जो फायदा उठाएंगे मगर तुम्हें इससे मतलब नहीं है यदि वहां

227
00:15:54,160 --> 00:15:58,960
पर वो मौन रह गए अरे देखो शंकराचार्य मौन क्यों आत्म मुग्धता

228
00:15:58,960 --> 00:16:03,040
यदि वहां पर उन्होंने जो है ऐसी बात कह दी जिसका यह अर्थ भी निकाला जा सकता है

229
00:16:03,040 --> 00:16:08,960
वो अर्थ भी निकाला जा सकता है तो खंडन ये है तुम्हारी बेवकूफी

230
00:16:08,960 --> 00:16:13,200
तुम्हें क्योंकि धर्म स्थापना से मतलब नहीं है यदि

231
00:16:13,200 --> 00:16:17,360
तुम छोटे बच्चे नहीं हो बुद्धू भोंदू वो नहीं हो यदि

232
00:16:17,360 --> 00:16:21,680
तुम तो फिर इसका अर्थ है कि तुमको धर्म स्थापना से कोई मतलब

233
00:16:21,680 --> 00:16:26,000
नहीं है। जिसको कार्य करना होता है, व्यवहार

234
00:16:26,000 --> 00:16:30,080
में उतरना होता है वो सामाजिक प्रपंचों की

235
00:16:30,080 --> 00:16:32,640
जो बुराइयां होती हैं उनसे

236
00:16:32,640 --> 00:16:36,720
छूता हुआ निकलता है। हीरा जब लेने

237
00:16:36,720 --> 00:16:40,720
जाते हैं ना तो सफेद कपड़े पहने

238
00:16:40,720 --> 00:16:44,880
होते हैं तो उस पर दाग लगते हैं तब हीरा निकलता है अंदर

239
00:16:44,880 --> 00:16:48,880
से। और धरती पर गिरा हुआ मनुष्य धरती का ही

240
00:16:48,880 --> 00:16:54,560
सहारा लेकर के उठ खड़ा होता है। तो

241
00:16:54,560 --> 00:16:58,640
तुमको कुछ भी समझने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि तुम्हारा धर्म है

242
00:16:58,640 --> 00:17:02,880
नहीं। तुम्हारा सनातन है नहीं। तुम्हारा

243
00:17:02,880 --> 00:17:07,360
कुछ नहीं है। तुम्हारा क्या है? निग्रह प्रवेशिका

244
00:17:07,360 --> 00:17:11,360
निग्रह प्रवेशिका लिखनी है मुझे सारे

245
00:17:11,360 --> 00:17:15,360
संप्रदायों का निग्रह कर दूंगा ब ये करना

246
00:17:15,360 --> 00:17:19,360
है तुम्हें खैर

247
00:17:19,360 --> 00:17:23,120
आगे क्या है

248
00:17:23,120 --> 00:17:27,200
तो ये वाली बात हो ही गई कि धर्म को क्षति

249
00:17:27,200 --> 00:17:31,600
कैसे पहुंचेगी इससे तुम्हें कोई मतलब नहीं

250
00:17:31,600 --> 00:17:35,680
फिर तुमने एक बात और कही कि 3

251
00:17:35,680 --> 00:17:40,000
साल से मैं प्रयास ही तो कर रहा था। क्या प्रयास किया भाई?

252
00:17:40,000 --> 00:17:44,960
कितनी बार तुमने मंच जहां पर गुरुदेव बैठे हुए थे और उनको

253
00:17:44,960 --> 00:17:48,960
ये बताने का प्रयास किया कि मठ में ऐसा-ऐसा हो रहा है। तुम्हारे अनुसार

254
00:17:48,960 --> 00:17:53,360
क्या प्रयास किया तुमने? क्या तुमने ऐसा प्रयास

255
00:17:53,360 --> 00:17:57,360
किया धरातल पर भागवतानंद वीडियो बनाने के अलावा, चिल्लाने के अलावा,

256
00:17:57,360 --> 00:18:01,600
आरोप लगाने के अलावा? क्या प्रयास किया है बताओ? क्या

257
00:18:01,600 --> 00:18:05,600
प्रयास किया तुमने? ठेंगा तो यह तुम्हारा झूठ

258
00:18:05,600 --> 00:18:09,760
कि तुमने प्रयास बहुत किया कुछ प्रयास नहीं किया तुमने तुमने केवल

259
00:18:09,760 --> 00:18:14,080
यहां वहां की बातों को लेकर के वीडियो बनाए हैं और व्यूज कमाए हैं तुमने

260
00:18:14,080 --> 00:18:19,760
ये प्रयास नहीं किया इसको प्रयास नहीं कहते हैं प्रयास उसको कहते हैं

261
00:18:19,760 --> 00:18:23,760
कि जहां पर हमारी मां को गाली देने वाली किताबें बट रही

262
00:18:23,760 --> 00:18:28,000
हो छप रही हो वहां सीना तान करके विरोध करना आपत्तिजनक

263
00:18:28,000 --> 00:18:33,280
सामग्री को जला देना कोर्ट की कारवाई में घसीटे जाना

264
00:18:33,280 --> 00:18:37,920
और उस कीमत पर भी जब सामने वाला

265
00:18:37,920 --> 00:18:38,420
अर्थ

266
00:18:38,320 --> 00:18:42,480
में सोर्स में संसाधनों में तुमसे

267
00:18:42,480 --> 00:18:46,480
कई 100 गुना ज्यादा अधिक है और

268
00:18:46,480 --> 00:18:50,560
तुम पर प्रत्येक हर प्रकार के आक्रमण

269
00:18:50,560 --> 00:18:53,600
कर रहा है।

270
00:18:53,600 --> 00:18:58,000
झूठे आरोप लगाते हुए मुकदमा कर रहा है। तरह-तरह के मुकदमे कर रहा है।

271
00:18:58,000 --> 00:19:02,000
दसियों बार मुकदमे कर रहा है। जान

272
00:19:02,000 --> 00:19:06,400
से मार देने का प्रयास कर रहा है तब भी

273
00:19:06,400 --> 00:19:11,120
डटे रहना अपने धर्म से नहीं होना

274
00:19:11,120 --> 00:19:15,600
यह प्रयास होता है वीडियो बना के पोस्टमार्टम करना और लथखोर

275
00:19:15,600 --> 00:19:19,760
कह देना प्रयास नहीं होता है वो भी सेलेक्टिव पॉलिटिक्स के अनुसार ये वर्ड तुम्हारा

276
00:19:19,760 --> 00:19:24,320
ही है ना सेलेक्टिव पॉलिटिक्स कि अपने पिता जब करेंगे

277
00:19:24,320 --> 00:19:29,360
उल्टी सीधी बातें तो मेरे पिता की प्रतिष्ठा मुझे जो है

278
00:19:29,360 --> 00:19:33,440
स्वयं की प्रतिष्ठा से भी ज्यादा प्रिय है। मैं उनको कुछ नहीं कह सकता। उनको

279
00:19:33,440 --> 00:19:37,440
लथखोर नहीं कह सकता। यह क्या है? सेलेक्टिव पॉलिटिक्स। अब इन सब

280
00:19:37,440 --> 00:19:41,680
बातों का एक निचोड़ क्या निकला अभी तक? ये जो चीजें मैं समझा रहा हूं ऐसा नहीं है कि मैंने

281
00:19:41,680 --> 00:19:45,680
इस व्यक्ति से व्यक्तिगत रूप से सब बातें करने की

282
00:19:45,680 --> 00:19:49,680
करने का प्रयास नहीं किया। किया। मैंने इसको इशारा किया कि भाई व्यक्तिगत

283
00:19:49,680 --> 00:19:53,440
रूप से बात कर लो। क्यों? क्योंकि धर्म को बचाने के

284
00:19:53,440 --> 00:19:57,600
लिए धर्म रक्षा के लिए जो हमारी रणनीतियां हैं उनको मुझे सार्वजनिक करना

285
00:19:57,600 --> 00:20:01,760
पड़ेगा। मगर यह व्यक्ति उसको तो धर्म से कोई मतलब नहीं है। तो ये व्यक्ति

286
00:20:01,760 --> 00:20:05,760
ये चाहता है कि ये जो सारी रणनीतियां है इसको मैं जो मैं जो

287
00:20:05,760 --> 00:20:09,840
है ये ये व्यक्ति जो है कपड़े फाड़ फाड़ के चिल्लाएगा ये बताओ ये बताओ

288
00:20:09,840 --> 00:20:13,920
ये बताओ उसको बताओ भैया और ना बताने पर देखो देखो आंसर नहीं है शास्त्रार्थ

289
00:20:13,920 --> 00:20:18,160
से भाग गए ये है वो है ये नगणता करने के लिए तैयार

290
00:20:18,160 --> 00:20:23,120
है हर वक्त क्यों क्योंकि इसके पास समय है और इसके आगे पीछे कोई है नहीं

291
00:20:23,120 --> 00:20:27,280
स्वयंभू है और ना ही इसका कोई उद्देश्य

292
00:20:27,280 --> 00:20:31,280
जिसकी रक्षा करने के लिए इसको यह तय करना पड़े कि अगर

293
00:20:31,280 --> 00:20:35,920
दो गलत रास्ते हैं तो उनमें से कम गलत कौन सा है मैं उसको चुनूंगा

294
00:20:35,920 --> 00:20:40,240
और दो सही रास्ते हैं तो उसमें से ज्यादा सही कौन सा है मैं उसको चुनूंगा। इसको

295
00:20:40,240 --> 00:20:44,400
ये निर्णय करने की आवश्यकता नहीं है। अगर दो गलत रास्ते हैं कि अमुक

296
00:20:44,400 --> 00:20:47,120
आचार्य ने

297
00:20:47,120 --> 00:20:51,120
हमारी जिसमें आस्था है उसका खंडन कर दिया। उसको यह कर दिया।

298
00:20:51,120 --> 00:20:55,200
तो भैया इसका जो है

299
00:20:55,200 --> 00:20:59,360
इसको सबक सिखाना इस आचार्य के बारे में ये सब फलाना फलाना

300
00:20:59,360 --> 00:21:03,520
बोलना इसका खंडन करना बहुत आवश्यक है। यह अच्छा

301
00:21:03,520 --> 00:21:07,520
रास्ता है। हम या एक मान लो

302
00:21:07,520 --> 00:21:08,800
कि यह भी अगर आचार्य

303
00:21:08,800 --> 00:21:12,880
है तो कुछ अन्य लोगों की जिस आचार्य में

304
00:21:12,880 --> 00:21:17,120
आस्था हो क्योंकि उस अमुक आचार्य ने इस जिसमें हमारी आस्था

305
00:21:17,120 --> 00:21:21,280
उसका खंडन किया है। तो भैया हमें तो क्योंकि उसने इसका खंडन

306
00:21:21,280 --> 00:21:25,360
किया तो हमें उससे बोलना है तो एक हो गया कि

307
00:21:25,360 --> 00:21:29,520
यह भी गलत है कि किसी आचार्य के प्रति तुम गलत बोलो

308
00:21:29,520 --> 00:21:33,520
यह भी गलत है और यह भी गलत है कि उस

309
00:21:33,520 --> 00:21:37,760
आचार्य से जुड़े हुए लोग जो वर्णाश्रमी

310
00:21:37,760 --> 00:21:42,000
है जो परंपरा प्राप्त हैं जो मूर्ति पूजा

311
00:21:42,000 --> 00:21:46,240
विश्वास रखते हैं और जो ऐसे रामपाल

312
00:21:46,240 --> 00:21:50,240
जैसे राक्षसों का नाश करने में साथ दे रहे

313
00:21:50,240 --> 00:21:55,040
हैं। ऐसे लोगों की जिनमें आस्था है

314
00:21:55,040 --> 00:21:59,200
उनका विरोध करके अपने इस रामपाल नामक राक्षस का जो वध

315
00:21:59,200 --> 00:22:03,200
होने वाला है उसमें तुम आग लगा दो। तो दोनों तरफ दोनों तरफ

316
00:22:03,200 --> 00:22:07,920
गलत रास्ते हैं। एक गलत रास्ता क्या है कि हमारे गुरु का विरोध हुआ है।

317
00:22:07,920 --> 00:22:12,000
तो हमें उसका भैया खंडन करना है। हमारे गुरु का विरोध हुआ

318
00:22:12,000 --> 00:22:16,160
है तो उसकी रक्षा में खड़े ना होना

319
00:22:16,160 --> 00:22:20,560
भी गलत रास्ता है। और एक तरफ रामपाल

320
00:22:20,560 --> 00:22:24,000
जैसे राक्षस का वध ना होना भी गलत रास्ता है।

321
00:22:24,000 --> 00:22:27,600
तो कम गलत क्या है?

322
00:22:27,600 --> 00:22:31,920
कम गलत क्या है? यह पूछ कभी

323
00:22:31,920 --> 00:22:35,920
दर्पण में खड़े होकर के पूछो कि कम गलत

324
00:22:35,920 --> 00:22:39,920
क्या है? क्या रामपाल जैसे राक्षस के वध को

325
00:22:39,920 --> 00:22:44,880
नजरअंदाज कर दिया जाए? इसलिए क्योंकि हमारे गुरु पर जो है वह हुआ है

326
00:22:44,880 --> 00:22:50,880
जिसमें कि गुरुदेव स्वयं सामर्थवान है अपनी बात कहने के लिए

327
00:22:51,760 --> 00:22:56,320
नहीं मगर हमें एक-एक करके प्रत्येक शिष्य को जो है वो करना चाहिए

328
00:22:56,320 --> 00:23:00,400
विरोध भले ही हमारा जो धरातल

329
00:23:00,400 --> 00:23:04,480
पे जो कार्य है धरातल पर जो एक चीजें

330
00:23:04,480 --> 00:23:08,560
चल रही है जो अभियान चल रहा है वह भले ही छिन्न भिन्न हो

331
00:23:08,560 --> 00:23:12,640
जाए और अगर कोई व्यक्ति कम गलत

332
00:23:12,640 --> 00:23:16,800
रास्ते को चुने यानी कि ठीक है

333
00:23:16,800 --> 00:23:20,800
भाई हम रामपाल का जो ये सेक्ट जो है हम

334
00:23:20,800 --> 00:23:24,880
नाश करने वाले हैं इस इसको नहीं रोकेंगे हम भले

335
00:23:24,880 --> 00:23:29,040
ही वहां पर मौन रह जाएंगे तो यदि कोई ऐसा करे तो उस पर तू तुझ जैसा नंगा

336
00:23:29,040 --> 00:23:33,040
व्यक्ति आरोप लगा दे पैसा आ रहा है मठों से पैसा आ

337
00:23:33,040 --> 00:23:37,920
रहा है मठों में पैसा आ रहा है क्या बोल क्या बोलने की जरूरत है

338
00:23:37,920 --> 00:23:39,120
तो जिसके

339
00:23:39,120 --> 00:23:43,360
पास उद्देश्य नहीं नहीं है। जिसके पास समय है और जिसका जो स्वयंभू है

340
00:23:43,360 --> 00:23:48,000
वह इस तरह से बार-बार नग्नता करने के लिए तैयार रहता है।

341
00:23:48,000 --> 00:23:52,000
जिसके पास उद्देश्य अभियान है उसको उसकी रक्षा करनी होती है।

342
00:23:52,000 --> 00:23:56,160
चुनना पड़ता है। क्या ज्यादा गलत होगा? रामपाल

343
00:23:56,160 --> 00:24:00,640
का जो ये तंत्र से लड़ाई लड़ रहे हैं उसको रोक देना ज्यादा

344
00:24:00,640 --> 00:24:04,640
गलत होगा या फिर वहां पर अमुक आचार्य

345
00:24:04,640 --> 00:24:08,640
का विरोध ना करना ज्यादा गलत होगा। क्या ज्यादा गलत होगा? और क्या ज्यादा

346
00:24:08,640 --> 00:24:12,720
सही होगा? अपने गुरुदेव के पक्ष में आकर के खड़े हो जाना सीना

347
00:24:12,720 --> 00:24:15,280
तान करके

348
00:24:15,280 --> 00:24:19,360
जबकि गुरुदेव वहां पर स्वयं अपना एक वाक्य बोलने से ही

349
00:24:19,360 --> 00:24:23,440
सारा तितर विितर कर देने में समर्थवान है। मगर प्रत्येक

350
00:24:23,440 --> 00:24:27,440
शिष्य को वहां पर आना चाहिए। ये अच्छी बात है भाई। अपने गुरुदेव के पक्ष में बोलना

351
00:24:27,440 --> 00:24:31,680
चाहिए। और जो व्यक्ति अपने गुरुदेव के पक्ष में इसलिए ना बोले

352
00:24:31,680 --> 00:24:35,920
कि वहां मां को गाली देने वाले लोग बच जाएंगे वो व्यक्ति

353
00:24:35,920 --> 00:24:40,880
खराब है। गलत है। उसके पास पैसा आ रहा है। हां

354
00:24:40,880 --> 00:24:45,040
तो यह है तुम्हारा या तो बुद्धूपन या

355
00:24:45,040 --> 00:24:49,600
जिद्दीपन या फिर षड्यंत्र

356
00:24:49,600 --> 00:24:53,600
रामपाल के ही भेजे हुए व्यक्ति हो सकता है मलेचराज द्वारा नियुक्त रामपाल भी

357
00:24:53,600 --> 00:24:54,240
हो सकता है

358
00:24:54,240 --> 00:24:58,640
और मलेच मलेच राज द्वारा तुम भेजे हुए हो और तुम सिद्ध हो रहे हो

359
00:24:58,640 --> 00:25:02,880
क्योंकि तुम्हारा व्यक्ति भी तो फ्री में उसका एजेंट रह चुका है सदस्य रह चुका

360
00:25:02,880 --> 00:25:07,120
है थियोसफिकल सोसाइटी का अब तुम कहोगे

361
00:25:07,120 --> 00:25:11,200
वो किसी देश कालखंड में रहा था तो भाई और भी तो लोग हैं जिस पर

362
00:25:11,200 --> 00:25:15,200
तुमने आरोप लगाया वह किसी देश कालखंड में रहे थे यह सब बातें कर लो आ जाओ

363
00:25:15,200 --> 00:25:20,080
विद्या भास्कर जी के यहां पर आ जाओ बैठकर के बातें कर लेते हैं

364
00:25:20,080 --> 00:25:25,760
हम अच्छा अब आगे और क्या है कि

365
00:25:25,760 --> 00:25:30,080
अब दूसरी बात ये आती है कि इसका यह कहना है इसका इसने इसमें

366
00:25:30,080 --> 00:25:34,480
प्रकट किया कि भाई इससे आपत्ति किसको

367
00:25:34,480 --> 00:25:38,720
है आपत्ति इस बात की इसने सार्वजनिक क्यों किया और इसने

368
00:25:38,720 --> 00:25:42,720
आंतरिक प्रयास क्यों नहीं किया? नहीं केवल यह वो नहीं है। अच्छा इसमें

369
00:25:42,720 --> 00:25:47,120
एक बात और है सार्वजनिक करने की। यदि इसके घर की स्त्रियों

370
00:25:47,120 --> 00:25:51,200
पर कोई लांछन लगने लगेगा कि वह

371
00:25:51,200 --> 00:25:55,200
व्यभचारणी है या यहां गई है वहां गई है। भगवान ना करे

372
00:25:55,200 --> 00:25:59,440
कभी लगे। मेरी माताएं बहने हैं। मगर ऐसा कठोर उदाहरण

373
00:25:59,440 --> 00:26:03,680
मुझे देना पड़ेगा। है ना? प्रासंगिक है क्योंकि आवश्यकता

374
00:26:03,680 --> 00:26:07,920
है उसकी। इसके घर की माताओं बहनों पर यदि कोई उंगली उठाने

375
00:26:07,920 --> 00:26:09,360
लगेगा कि वह वहां से निकलती

376
00:26:09,360 --> 00:26:14,000
हुई देखी गई वहां जाती हुई देखी गई वो व्यभचारणी

377
00:26:14,000 --> 00:26:18,080
है इस तरह का आरोप लगने लगेगा तो क्या यह अखबार में छाप

378
00:26:18,080 --> 00:26:22,560
करके उसका अनुसंधान करेगा शोधन करेगा या पहले

379
00:26:22,560 --> 00:26:27,040
आंतरिक तौर पर अनुसंधान करेगा उसके बाद चीजें जब प्रामाणिक

380
00:26:27,040 --> 00:26:31,120
रूप से प्राप्त हो जाएंगी तब वह कुछ करेगा उसको भी आंतरिक रूप से ही

381
00:26:31,120 --> 00:26:36,320
करेगा क्या करेगा अखबार में छपवाएगा

382
00:26:36,320 --> 00:26:40,640
कि फलाने फलाने स्वागोषित आचार्य की बीवी भाग गई

383
00:26:40,640 --> 00:26:44,000
किसी के साथ

384
00:26:44,000 --> 00:26:48,240
ये सब तुझे अच्छा लगेगा ना यही है ना तेरी रणनीति

385
00:26:48,240 --> 00:26:53,040
ठीक है तो तेरी हो सकती है हमारी नहीं हो सकती खैर

386
00:26:53,040 --> 00:26:58,800
आगे चलते हैं

387
00:26:58,800 --> 00:27:03,200
अब क्या है

388
00:27:03,200 --> 00:27:07,280
आपत्त त्ति केवल एक बात से नहीं थी कि सार्वजनिक

389
00:27:07,280 --> 00:27:09,840
से क्यों पूछा

390
00:27:09,840 --> 00:27:14,800
और भी चीजें पहली बात असिद्ध आरोप क्यों

391
00:27:14,800 --> 00:27:18,880
भाई तुम शोधन करना चाहते हो किन चीजों का कि वहां

392
00:27:18,880 --> 00:27:23,120
पर ऐसा ऐसा हो रहा है वो ऐसा ऐसा हो रहा है कि नहीं हो रहा है उसको पहले

393
00:27:23,120 --> 00:27:27,120
सिद्ध तो करो और सिद्ध नहीं हो रहा है तो तुम सार्वजनिक रूप से विरोध

394
00:27:27,120 --> 00:27:31,120
क्यों कर रहे हो तुम पहले उसकी जांच पड़ताल करो यदि

395
00:27:31,120 --> 00:27:35,200
तुम्हें शोधन और यदि तुम्हें रक्षा की चिंता है

396
00:27:35,200 --> 00:27:39,200
तो तुमने तो किसी ने तुमसे खाना फूसी की और

397
00:27:39,200 --> 00:27:44,640
तुम लगे अपने सार्वजनिक चैनल पर बोलने बकबकाने भूखने

398
00:27:44,640 --> 00:27:48,720
और तो वही घर की स्त्री वाली बात कि अगर

399
00:27:48,720 --> 00:27:52,880
तुम्हारे घर की स्त्री पर आरोप लगेंगे तो तुम क्या करोगे? अपने डेढ़

400
00:27:52,880 --> 00:27:57,040
लाख फॉलोवर्स होंगे। वहां बोलोगे कि मुझे किसी ने बताया है कि मेरी

401
00:27:57,040 --> 00:27:59,040
जो पत्नी है वो जो है वहां

402
00:27:59,040 --> 00:28:03,120
गई है। ऐसे बोलोगे यदि तुम पर आरोप लगने

403
00:28:03,120 --> 00:28:07,200
लगेंगे वहां गई थी फलाने के साथ और उसने भी बताया उसने

404
00:28:07,200 --> 00:28:11,520
भी बताया उसने भी बताया। मान लो अभी कल को 10 अकाउंट खुल जाए एफबी

405
00:28:11,520 --> 00:28:15,520
पर। एक-ए दो-दो फॉलोअ वाले। तुमने कहा ना पहले से सार्वजनिक

406
00:28:15,520 --> 00:28:19,600
नहीं थी क्या जो मैंने सार्वजनिक कर दी। मान लो अभी आने वाले दिनों में

407
00:28:19,600 --> 00:28:23,920
10 अकाउंट खुल जाए और किसी तरीके

408
00:28:23,920 --> 00:28:27,920
से तुम्हारे घर की किसी स्त्री के बारे में नाम पता था थोड़ा

409
00:28:27,920 --> 00:28:32,240
सा पता कर लिया जाए और फिर 101 अकाउंट खोल करके ये बोलने लग जाए

410
00:28:32,240 --> 00:28:36,320
लोग वहां पर कि भैया इसकी स्त्री तो यहां पर फलाने

411
00:28:36,320 --> 00:28:40,560
पराए पुरुष के साथ देखी गई है। फलाने पराए पुरुष के साथ आपत्तिजनक

412
00:28:40,560 --> 00:28:44,800
स्थिति में देखी गई है। फलाने पराए पुरुष के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखी गई है।

413
00:28:44,800 --> 00:28:49,200
ऐसे 15 20 लोग मैं कह रहा हूं 50 लोग क्या ये संभव नहीं है?

414
00:28:49,200 --> 00:28:53,280
अपनी भी अकाउंट खोल करके और Instagram अकाउंट खोल करके और कहने लग

415
00:28:53,280 --> 00:28:58,720
जाए WhatsApp करने लग जाएं एक दूसरे को। भाई देख ही गई है।

416
00:28:58,720 --> 00:29:03,200
तो अब तुम क्या करोगे? अपने ₹1.5 लाख या सवा लाख

417
00:29:03,200 --> 00:29:07,200
जो पेज है तुम्हारा उस पर फॉलोअर्स है तुम्हारे, वहां पर आकर

418
00:29:07,200 --> 00:29:13,200
कहोगे कि मेरी पत्नी पर ये 50 लोगों ने मुझसे कहा है कम से कम।

419
00:29:13,200 --> 00:29:17,680
हैं? मैं तो शोधन की प्रयास कर रहा हूं। इतने सालों से यह कहोगे?

420
00:29:17,680 --> 00:29:21,840
नहीं कहोगे। पहली बात तो ऐसे

421
00:29:21,840 --> 00:29:26,080
टट पुजिया लोगों पर विश्वास ही नहीं करोगे जो अपना नाम

422
00:29:26,080 --> 00:29:30,080
पता तक नहीं बता सकते हैं सामने आकर। जो कहीं पर सत्य

423
00:29:30,080 --> 00:29:34,160
की रक्षा के लिए खड़े नहीं हो सकते। और दूसरी बात यदि

424
00:29:34,160 --> 00:29:38,640
प्रश्न हो भी गया है तो आंतरिक रूप से अनुसंधान करोगे। उसका समाधान

425
00:29:38,640 --> 00:29:43,680
भी करोगे तो आंतरिक रूप से करोगे। उसको भी नहीं तुम बताना चाहोगे कि नहीं?

426
00:29:43,680 --> 00:29:47,680
मेरे घर की स्त्री व्यभचारणी थी। मैंने अनुसंधान किया। अनुसंधान भी

427
00:29:47,680 --> 00:29:51,840
आंतरिक किया और उसको उसका जो समाधान है वह भी आंतरिक किया।

428
00:29:51,840 --> 00:29:56,240
उसको भी तुमने आकर के नहीं बताया।

429
00:29:56,240 --> 00:29:58,720
तो

430
00:29:58,720 --> 00:30:02,720
क्यों? क्योंकि वहां पर डायरेक्ट तुमसे जुड़ी हुई चीजों पर चीजों

431
00:30:02,720 --> 00:30:06,720
की तुम्हें चिंता होगी कि अगर मेरी घर की किसी स्त्री के साथ ऐसा

432
00:30:06,720 --> 00:30:10,960
हो रहा है तो वहां पर जो उस स्त्री से जुड़े हुए उसके पति हैं उनका

433
00:30:10,960 --> 00:30:15,120
जो पौरुष है उन पर सवाल उठ जाएगा कि भाई उस

434
00:30:15,120 --> 00:30:20,240
स्त्री को किसी और पुरुष के पास जाना क्यों पड़ा? बहुत सी चीजें हो जाएंगी।

435
00:30:20,240 --> 00:30:24,480
भले ही वह स्त्री की ही गलती हो फिर भी उसमें जो है वह बदनाम हो जाएगा।

436
00:30:24,480 --> 00:30:28,480
कौन? जो उस स्त्री का पति होगा कि भैया उसमें पौरुष नहीं

437
00:30:28,480 --> 00:30:32,560
होगा। इसलिए पौरुष के कारण वो कहीं और गई। इसी

438
00:30:32,560 --> 00:30:37,200
तरीके से तुम कर रहे हो ना बदनाम।

439
00:30:37,200 --> 00:30:41,280
तो यह ध्यान देने वाली बात है। फिर तुमने और क्या-क्या

440
00:30:41,280 --> 00:30:45,360
किया है? तो कुल मिलाकर के क्या है

441
00:30:45,360 --> 00:30:49,520
कि गुप्त चर गुप्तचर्य के आधार पर

442
00:30:49,520 --> 00:30:55,520
जो प्राप्त होने वाली सूचनाएं होती हैं उनको

443
00:30:57,360 --> 00:31:01,120
प्रमाण के रूप में

444
00:31:01,120 --> 00:31:05,440
उपयोग में नहीं लिया जाता है। तुमने क्या किया? गुप्तच वाली

445
00:31:05,440 --> 00:31:09,760
चीजों को असिद्ध आरोपों को प्रमाण के रूप में उपयोग करने लगे। अनुसंधान

446
00:31:09,760 --> 00:31:13,920
तो दूर की बात है। यानी तुमने सार्वजनिक रूप से ये भी नहीं कहा कि इसमें अनुसंधान

447
00:31:13,920 --> 00:31:18,080
होना चाहिए। तुमने तो सीधे-सीधे समाधान को

448
00:31:18,080 --> 00:31:22,640
ही सार्वजनिक कर दिया। तो सार्वजनिक

449
00:31:22,640 --> 00:31:26,800
असिद्ध आरोप अनुसंधान रहित और उसके बाद

450
00:31:26,800 --> 00:31:31,040
जो तुम्हारी प्रक्रिया है जो समाधान की वो भी सार्वजनिक।

451
00:31:31,040 --> 00:31:36,000
अब आगे और क्या है? उपहास

452
00:31:36,000 --> 00:31:40,720
जो दिव्य अलौकिक बातें होती हैं जो ऐसी बातें होती हैं

453
00:31:40,720 --> 00:31:44,800
जिनका तुम्हें तुमसे विरोध है जिनसे तुम्हारा विरोध है जिनका तुम विरोध

454
00:31:44,800 --> 00:31:48,880
करना चाहते हो उनका उपस उड़ाओगे उनकी जो ऐसी

455
00:31:48,880 --> 00:31:52,480
दिव्य दिव्यानुभूति वाली बातें होंगी उसका

456
00:31:52,480 --> 00:31:56,640
हम और कहोगे अरे हिंदुओं के साथ छल है ये है वो

457
00:31:56,640 --> 00:32:00,720
है बहुत बड़ी-बड़ी बातें करोगे कौन ऐसा है तुमसे जुड़ा हुआ

458
00:32:00,720 --> 00:32:05,440
जिसके साथ कोई ना कोई दिव्य घटना ना जुड़ी जुड़ी हो बताओ

459
00:32:05,440 --> 00:32:09,600
तुमसे जुड़े हुए आचार्य हैं। उनके जो

460
00:32:09,600 --> 00:32:12,160
गुरु हैं

461
00:32:12,160 --> 00:32:16,320
हम मुझे बताया मुझे बड़ा अच्छा लगा कि उनको साक्षात डेली

462
00:32:16,320 --> 00:32:20,320
भगवान के दर्शन होते थे। उनकी जो माता थी वो

463
00:32:20,320 --> 00:32:24,400
80 वर्ष की आयु में भी स्तनपान कराती थी।

464
00:32:24,400 --> 00:32:28,560
इतनी क्षमता थी उनके अंदर। अब इन बातों की तुम खिल्ली उड़ाओ

465
00:32:28,560 --> 00:32:33,920
बैठकर के। अरे भैया वहां दूध की नदियां बह रही है। यह है वह है।

466
00:32:33,920 --> 00:32:38,080
ऐसे ही तो हो तुम। जिसका विरोध करना है उसकी किसी

467
00:32:38,080 --> 00:32:42,240
भी बात को लेकर के और जो है उसी की लय ऐसी केवल उसकी

468
00:32:42,240 --> 00:32:46,960
जो क्या उसको कहेंगे केवल

469
00:32:46,960 --> 00:32:51,360
उसकी जो शैली है उसको बदल दो।

470
00:32:51,360 --> 00:32:55,600
उपस करने लगो। अपने ही आचार्यों का परंपरा प्राप्त आचार्यों का। करने लगो

471
00:32:55,600 --> 00:33:00,720
उपस मगर वहां नहीं करोगे। वहां की जो दिव्य बातें होंगी

472
00:33:00,720 --> 00:33:04,720
वह नहीं करोगे उन पर बात नहीं करोगे उन पर मौन रहोगे क्योंकि सेलेक्टिव

473
00:33:04,720 --> 00:33:07,520
पॉलिटिक्स है ना यही बात मैं कहता

474
00:33:07,520 --> 00:33:11,760
हूं ना कि कहां पर किस नियम को लागू करना है कहां पर चुप रहना है

475
00:33:11,760 --> 00:33:17,040
ये सब तय कौन करेगा भागवतानंद तय करेगा क्योंकि

476
00:33:17,040 --> 00:33:21,040
भागवतानंद ने कहा है अच्छा ये सब छोड़ो कि अन्य आचार्यों के साथ भी

477
00:33:21,040 --> 00:33:27,040
दिव्यानुभूतिया जुड़ी हुई है यह सब छोड़ दो यह बताओ

478
00:33:27,520 --> 00:33:31,920
तुम्हारी खुद की आस्था नहीं थी क्या पूरी के शंकराचार्य जी में

479
00:33:31,920 --> 00:33:35,920
तुमने खुद अपना एक स्टेटमेंट दिया दैव बल से कर दे तो अलग बात है इसका

480
00:33:35,920 --> 00:33:40,240
मतलब उनके देव बल पर तुम्हें आस्था थी देवब बल का उपयोग कहां किसको

481
00:33:40,240 --> 00:33:44,400
कितना करना है ये वो ही तो तय करेंगे कि हम उसके आधार पर उन्हें

482
00:33:44,400 --> 00:33:48,240
आरोप लगाने लग जाए

483
00:33:48,240 --> 00:33:52,480
भगवान सर्व सामर्थ्यवान है अभी आ करके सब गौ

484
00:33:52,480 --> 00:33:56,960
गंगा गीता की रक्षा कर डाले भगवान तो है ना

485
00:33:56,960 --> 00:34:01,040
क्यों नहीं कर रहे? धर्म स्थापना कर दे। क्यों

486
00:34:01,040 --> 00:34:05,040
नहीं कर रहे? यही तो आर्य समाज कहते हैं। वही तुम कह रहे हो। शैली वही है।

487
00:34:05,040 --> 00:34:09,200
केवल तुम परंपरा के अंदर रहने का पाखंड करते हुए वही

488
00:34:09,200 --> 00:34:13,280
कार्य कर रहे हो जो परंपरा के बाहर रह के

489
00:34:13,280 --> 00:34:17,440
आर्य समाज जैसे तंत्र करते हैं। अरे ऐसा है तो ऐसा क्यों नहीं कर देते? अरे

490
00:34:17,440 --> 00:34:22,320
ऐसा है तो ऐसा क्यों नहीं हुआ? जो अलौकिक प्रश्न है वो तुरंत कर दो।

491
00:34:22,320 --> 00:34:26,320
भगवान वहां पर हैं। वह चूहे कूद रहे हैं। उसमें भगवान है। क्यों

492
00:34:26,320 --> 00:34:30,560
नहीं भगवान अपनी रक्षा कर पा रहे हैं? दयानंद

493
00:34:30,560 --> 00:34:34,960
वही वैसे ही कार्य तुम कर रहे हो। भाई सर्व सामर्थ्यवान

494
00:34:34,960 --> 00:34:38,960
है। मगर कहां पर उनको उपयोग में लेना है वो दूर दृष्टि

495
00:34:38,960 --> 00:34:42,960
भी तो है उनके पास। किस तरीके से धर्म की स्थापना करनी है।

496
00:34:42,960 --> 00:34:48,960
किस किस को उसमें निमित्त बनाना है। यह सब भी तो देखेंगे।

497
00:34:49,600 --> 00:34:52,080
ठीक।

498
00:34:52,080 --> 00:34:56,320
अच्छा चलो एक यह आ जाएगा चलो भगवान की तो सारी लीला

499
00:34:56,320 --> 00:35:00,320
ही है भगवान से प्रश्न नहीं करना चाहिए तो और अन्न ऋषि महर्षि ऐसे

500
00:35:00,320 --> 00:35:04,320
नहीं हुए सब छोड़ो तुम्हारे निगनंद तुम कह

501
00:35:04,320 --> 00:35:08,480
रहे हो कि उनको भगवती पत्नी के रूप में दिखती थी यद्यपि वो केवल दिखने

502
00:35:08,480 --> 00:35:12,640
तक सीमित नहीं था यद्यपि देखना भी अपराध है अरे भैया भगवती

503
00:35:12,640 --> 00:35:16,880
स्वयं क्यों दिख रही है आप यह क्लेम नहीं कर सकते हो भगवती ने उनकी पत्नी को उन्हें दिखाया

504
00:35:16,880 --> 00:35:20,960
बात खत्म हो गई तुम ये क्लेम क्यों कर रहे हो भगवती ही दिख रही पत्नी के

505
00:35:20,960 --> 00:35:23,360
रूप में

506
00:35:23,360 --> 00:35:27,680
क्योंकि मन में कहीं पाप है ना इसलिए और यद्यपि वह सीमित

507
00:35:27,680 --> 00:35:31,680
केवल वहां दिखने तक नहीं है तो छू भी रहे हैं छूना भी चाहते हैं। तब

508
00:35:31,680 --> 00:35:36,720
बाबा बाबा खेपा जी ने कहा कि आप किसी और गुरु के पास जाइए

509
00:35:36,720 --> 00:35:41,680
और तुम्हारे पास स्वयं भगवती आती है पढ़ाने

510
00:35:41,680 --> 00:35:47,680
हम और क्या कहते हैं ये

511
00:35:47,840 --> 00:35:52,160
अध्ययन कराने आती है तुम्हें वरदान देने आती है इस सब बातों के लिए हिंदुओं

512
00:35:52,160 --> 00:35:56,400
के लिए हिंदुओं के साथ छल क्यों नहीं निकला निगमंद

513
00:35:56,400 --> 00:36:00,480
जी के लिए इतनी सारी चमत्कारिक बातें व्याप्त है वो

514
00:36:00,480 --> 00:36:04,640
मुक्त हो गए परमहंस को प्राप्त हो गए तुम ही ने कहा अपने वीडियो में

515
00:36:04,640 --> 00:36:09,040
मुक्त हो गए थे तो फिर बाध्यता तो रही नहीं लौकिक

516
00:36:09,040 --> 00:36:13,200
तो क्यों नहीं धर्म स्थापना कर गए अपने समय में अभी क्यों नहीं कर रहे हैं मुक्त

517
00:36:13,200 --> 00:36:17,440
हो गए वो तो बहुत सी बातें हैं फस जाओगे आके

518
00:36:17,440 --> 00:36:21,440
करोगे ना जब सामना खैर निगमंद को लेकर के बात ना

519
00:36:21,440 --> 00:36:25,440
करना स्वयं स्वीकार करने के बाद दब बल है फिर स्वीकार ना करना

520
00:36:25,440 --> 00:36:29,440
फिर उपास उड़ाना अन्य आचार्यों से जुड़ी हुई दिव्यानुभूतियों

521
00:36:29,440 --> 00:36:33,760
पर बात ना करना जिनसे समर्थन प्राप्त है यह क्या है?

522
00:36:33,760 --> 00:36:38,240
सेलेक्टिव पॉलिटिक्स। तो तुमने ना केवल सार्वजनिक

523
00:36:38,240 --> 00:36:44,240
असिद्ध आरोपों के आधार पर प्रहार किया

524
00:36:44,240 --> 00:36:48,640
बल्कि साथ ही साथ सीधे-सीधे जो मान्य आचार्य

525
00:36:48,640 --> 00:36:52,720
हैं उनका भी उपहास उड़ाया और उनका भी विरोध किया और ऐसी

526
00:36:52,720 --> 00:36:57,200
बातों में विरोध किया जिन जैसी बातों में तुम खुद आगे अभी बताऊंगा।

527
00:36:57,200 --> 00:37:01,200
ऐसी बातों में विरोध किया जैसी बातों में तुम खुद वहीं पर अपने आप को खड़ा कर

528
00:37:01,200 --> 00:37:05,440
लेते हो तुरंत और उपास

529
00:37:05,440 --> 00:37:09,600
और तीसरी बात क्या है? अब तीसरी बात आती है आपत्ति कि

530
00:37:09,600 --> 00:37:13,920
कोई व्यक्ति, कोई भक्त, कोई श्रद्धालु के पुराने जीवन को आधार बना

531
00:37:13,920 --> 00:37:18,000
के पीठ पर आक्रमण करना। निगमंद

532
00:37:18,000 --> 00:37:22,560
अपने किसी देश कालखंड में यदि थियोसोफिकल सोसाइटी से जुड़े होंगे

533
00:37:22,560 --> 00:37:26,560
तो उनका अपराध नहीं माना जाएगा। उनको यह नहीं माना जाएगा कि वहीं के हो के

534
00:37:26,560 --> 00:37:30,640
रह गए। मगर विजय श्री अगर किसी देश कालखंड

535
00:37:30,640 --> 00:37:33,040
में

536
00:37:33,040 --> 00:37:37,200
थियोसोफिकल सोसाइटी से जुड़े हुए किसी व्यक्ति की संस्था में अध्यक्ष

537
00:37:37,200 --> 00:37:41,280
चुन ली जाएगी एक दिन के लिए तो उसको माना जाएगा कि वो

538
00:37:41,280 --> 00:37:45,440
वहीं की होके रह गई। हम

539
00:37:45,440 --> 00:37:49,520
ये है सेलेक्टिव पॉलिटिक्स। अब एक बात है जो मैं बार-बार कह रहा हूं कि

540
00:37:49,520 --> 00:37:53,520
भाई वहां आकर के तुम बात कर लो। हां हिंदुओं के साथ छल। हिंदुओं के

541
00:37:53,520 --> 00:37:57,520
साथ छल क्या है कि मैं शपथ लेकर के कह सकता हूं कि भगवती ने मुझे

542
00:37:57,520 --> 00:37:59,360
वरदान दिया है कि मेरे

543
00:37:59,360 --> 00:38:03,440
से कोई गलत क्रिया नहीं हो सकती। मेरा बुद्धि विवेक जो है उसका नियंत्रण कर

544
00:38:03,440 --> 00:38:07,600
लेगा। जबकि तुम अब 50ों बार बता चुके हो कि

545
00:38:07,600 --> 00:38:12,400
मेरे से वाक छल हो गया। यह कर्मेंद्रिय है ना जीवा।

546
00:38:12,400 --> 00:38:16,960
कर्म कर रहे हो ना इससे बोल रहे हो ना?

547
00:38:16,960 --> 00:38:22,240
जीवा तुम्हारी कुछ कर रही है ना भाई।

548
00:38:22,240 --> 00:38:26,480
तो गलत हो रहा है ना तुम्हारी जीवा से असत्य भाषण हो रहा है तो किसी और तुमने

549
00:38:26,480 --> 00:38:30,560
एक बार नहीं बोला मंच पर बैठी थी वो पांच छह बार कम से

550
00:38:30,560 --> 00:38:34,560
कम बोला कि मंच साझा कर रही मंच साझा कर रही मंच साझा कर रही है और

551
00:38:34,560 --> 00:38:38,560
उस मंच साझा होने को पुष्ट करने के लिए तुमने किसी और स्त्री का

552
00:38:38,560 --> 00:38:42,720
वहां पर मंचन दिखा दिया और यह बोल दिया कि देखो मंच साझा

553
00:38:42,720 --> 00:38:48,720
कर रही है तो यह क्या है

554
00:38:48,800 --> 00:38:52,160
हिंदुओं के साथ छल

555
00:38:52,160 --> 00:38:56,160
वाक स्खलन हो गया छह बार हो गया एक बार नहीं छह

556
00:38:56,160 --> 00:39:00,480
बार और तुम्हारा जो बुद्धि विवेक है उसको नियंत्रित नहीं कर पाया तुम्हारी जीवा

557
00:39:00,480 --> 00:39:04,560
को और भी ना जाने कितनी बार हुआ है जब ये अस्थाई पोस्ट और क्या होता

558
00:39:04,560 --> 00:39:08,640
है क्या है सत्य भाषण है असत्य भाषण है हटा

559
00:39:08,640 --> 00:39:12,640
क्यों रहे हो क्यों छिपा रहे हो ये सब उसी

560
00:39:12,640 --> 00:39:16,640
में आएगा और या फिर ये मानो कि हमारी भी एक

561
00:39:16,640 --> 00:39:20,720
रणनीति है क्या छिपाना है क्या हटाना है क्या दिखाना है। है

562
00:39:20,720 --> 00:39:24,720
ना? अगर सत्य है तो क्यों हटाना भाई? क्यों मौन रहना? क्यों अस्थाई पोस्ट है? यह भी

563
00:39:24,720 --> 00:39:28,720
रणनीति में आ गया। मगर जहां पर मुझे रणनीति अप्लाई करनी हो वहां तो मैं

564
00:39:28,720 --> 00:39:32,880
करूंगा। मगर आचार्य गण अगर कहीं करेंगे तो वहां नंगा होकर चिल्लाऊंगा।

565
00:39:32,880 --> 00:39:38,880
अच्छा आगे देखो क्या है कि

566
00:39:40,800 --> 00:39:44,960
श्रृंगेरी पीठ का विरोध गुरुदेव

567
00:39:44,960 --> 00:39:49,360
ने किया था। ये तुम्हारा कहना है। उस विरोध का स्तर क्या था? व्यक्तिगत

568
00:39:49,360 --> 00:39:53,440
विरोध था या प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर के विरोध किया था। उस समय

569
00:39:53,440 --> 00:39:57,520
उनकी छवि क्या थी? कितना उनका प्रसिद्ध व्यक्तित्व था? कितनी

570
00:39:57,520 --> 00:40:01,520
ख्याति थी उनकी गुरुदेव की जो शंगेरी का विरोध करने का तुम

571
00:40:01,520 --> 00:40:05,840
डंका पी रहे हो। तुम्हें तो उससे और सीख लेनी चाहिए कि उन्होंने कोई सार्वजनिक

572
00:40:05,840 --> 00:40:10,240
विरोध नहीं किया। यदि गुरु को लेकर के कोई ऐसी विरोधाभासी जिज्ञासा

573
00:40:10,240 --> 00:40:15,200
आ रही है मन में तो उन्होंने कोई उसको इशू नहीं बनाया।

574
00:40:15,200 --> 00:40:19,440
पब्लिक में अनास्था का विषय नहीं बना दिया उस बात को।

575
00:40:19,440 --> 00:40:23,520
तुम पब्लिक में अनास्था का विषय बना रहे हो। उसके आधार पर उस और

576
00:40:23,520 --> 00:40:27,520
उदाहरण किसका ले रहे हो? उनका यहां से तो तुम्हें सीख लेनी

577
00:40:27,520 --> 00:40:31,840
चाहिए ना। क्या स्तर था उनके विरोध का? क्या उन्होंने

578
00:40:31,840 --> 00:40:36,080
प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला के विरोध कर दिया था। क्या कर दिया था? शंकराचार्य शंकराचार्य

579
00:40:36,080 --> 00:40:40,160
का विरोध क्यों करते? भाई शंकराचार्य शंकराचार्य का विरोध कर सकते हैं। इसका मतलब

580
00:40:40,160 --> 00:40:44,880
यह नहीं कि हर एरागरा न्थू गहरा उनका विरोध करने लगे। क्योंकि शंकराचार्य

581
00:40:44,880 --> 00:40:48,880
और शंकराचार्य इक्वल है। दो भाई अगर

582
00:40:48,880 --> 00:40:53,040
घर के आपस में बात कर रहे हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि राह

583
00:40:53,040 --> 00:40:56,720
चलने वाला हर तट पुंजिया

584
00:40:56,720 --> 00:41:00,800
उस घर के भाई को मार मारने का प्रयास करने लगे क्योंकि दो भाई आपस में लड़

585
00:41:00,800 --> 00:41:06,800
रहे हैं। उस प्रयास को स्वीकार कर लिया जाए।

586
00:41:08,720 --> 00:41:13,360
भगवान विष्णु और शिव में भी युद्ध हुए तो इसका मतलब यह है

587
00:41:13,360 --> 00:41:17,520
कि भस्मासुर या हिरण्यकश्यप द्वारा जो है

588
00:41:17,520 --> 00:41:21,600
उन पर आप जो प्रहार करना है उसको स्वीकार कर लिया जाए।

589
00:41:21,600 --> 00:41:25,600
वो बिल्कुल सही बात है भाई। फिर ना बोलो। तो

590
00:41:25,600 --> 00:41:30,000
अगर शंकराचार्य शंकराचार्य को कुछ कह रहे हैं

591
00:41:30,000 --> 00:41:34,080
या फिर आचार्य स्तर के पीठाधीश्वर आपस में कोई बात कर

592
00:41:34,080 --> 00:41:38,160
रहे हैं तो उसमें आवश्यक नहीं कि हम भी बोले। सभी बोले जब वह जबकि

593
00:41:38,160 --> 00:41:42,240
वह बात हो रही है सबके बोलने की आवश्यकता नहीं है वहां पर

594
00:41:42,240 --> 00:41:46,880
और फिर देखना भी पड़ेगा कि क्या बोलने से क्या हो जाएगा क्या दुष्परिणाम

595
00:41:46,880 --> 00:41:50,960
प्राप्त हो सकते हैं क्या नहीं होंगे यह सब वो सोचेगा जिसको कोई

596
00:41:50,960 --> 00:41:54,960
युद्ध लड़ना होगा जिसकी जिसका कोई अभियान होगा

597
00:41:54,960 --> 00:41:58,960
उसको स्ट्रेटजी बनानी पड़ती है कब किसके लिए अभी बोलना है किसके लिए

598
00:41:58,960 --> 00:42:02,960
बाद में बोलना है किसके लिए नहीं बोलना है और किसका बिना बोले

599
00:42:02,960 --> 00:42:07,360
कार्य हो जाएगा कई बार ऐसा होता जो परंपरावादी

600
00:42:07,360 --> 00:42:11,520
परंपरानिष्ठ लोग हैं, वर्णाश्रमी हैं, मूर्ति पूजक है, अवतारवाद

601
00:42:11,520 --> 00:42:12,020
में विश्वास

602
00:42:12,000 --> 00:42:16,080
रखते हैं। उनके साथ मैंने अक्सर यह देखा है कि कई बार वो विरोधी होते

603
00:42:16,080 --> 00:42:20,320
हैं। मगर साथ में रहते रहते रहते रहते बातें सुनते सुनते सौंदर्य देखते

604
00:42:20,320 --> 00:42:24,480
देखते सार्वभौम सिद्धांतों का देखते देखते परचम वो

605
00:42:24,480 --> 00:42:29,280
स्वयं ही आस्थावान हो जाते हैं। और इसका सबसे बड़ा उदाहरण विजय श्री ही है।

606
00:42:29,280 --> 00:42:33,360
विजया श्री भी मुझे ऐसी ही मिली थी। उनको यह नहीं

607
00:42:33,360 --> 00:42:37,440
मालूम था धर्म में क्या लिखा है क्या नहीं लिखा है। और

608
00:42:37,440 --> 00:42:41,920
ना ही मैंने कभी उनको यह कहा कि भाई तुम यहां पर सद्गुरु का

609
00:42:41,920 --> 00:42:46,000
वो क्यों कर रही हो प्रशंसा? यहां पर तुम विवेकानंद की प्रशंसा क्यों कर रही देख लेना आईडी

610
00:42:46,000 --> 00:42:50,400
में जाकर के सद्गुरु विवेकानंद इन भाई वो योग सिखाती

611
00:42:50,400 --> 00:42:54,800
थी पता नहीं वहां हरिद्वार में कौन-कौन से अप्रामाणिक लोग जो है

612
00:42:54,800 --> 00:42:59,280
उनके संपर्क में आए हो। उनका भूतपूर्व

613
00:42:59,280 --> 00:43:02,640
का जीवन तो ऐसा ही है।

614
00:43:02,640 --> 00:43:06,720
पर इनके भूतपूर्व के जीवन पर तुम जो है मसाला खींचोगे

615
00:43:06,720 --> 00:43:10,720
और निगमंद के भूतपूर्व के जीवन पर तुम कहोगे वो अपने किसी देश कालखंड में

616
00:43:10,720 --> 00:43:15,280
गए थे साधना मार्ग में आने से पहले थोड़ी ना थी।

617
00:43:15,280 --> 00:43:19,360
ये क्या है? सेलेक्टिव पॉलिटिक्स। भाई यह भी तो शंकराचार्य के उसमें

618
00:43:19,360 --> 00:43:24,320
आने से पहले वह सब करती थी जो जिनका तुम आरोप लगा रहे हो।

619
00:43:24,320 --> 00:43:27,200
मगर इनको तुम खा लो उधेड़ लोगे और

620
00:43:27,200 --> 00:43:31,200
निगमानंद जो साधना मार्ग में आने के बाद पत्नी रूप में भगवती को देख

621
00:43:31,200 --> 00:43:35,200
रहे हैं तो उसमें लोप करो खैर वो बात अभी खत्म

622
00:43:35,200 --> 00:43:39,600
नहीं हुई है मैं उस पर अंत तक जाऊंगा ये मत सोचना निगमंद

623
00:43:39,600 --> 00:43:43,600
से जुड़े हुए बहुत सारी चीजें प्राप्त हो रही है अभी वो

624
00:43:43,600 --> 00:43:47,600
इस वाला बता रहा हूं देख लेना यही दिखा देंगे तो तुम

625
00:43:47,600 --> 00:43:52,000
सोचना कि तुम्हारा वो वो चैप्टर भी खुल चुका है ना

626
00:43:52,000 --> 00:43:56,480
क्योंकि मैंने कहा था तुम डाल डाल तो हम पातपात तो

627
00:43:56,480 --> 00:44:00,640
जब शंकरा जो वर्तमान पुरी शंकराचार्य उन्होंने अगर तत्कालीन

628
00:44:00,640 --> 00:44:06,240
जब वो शंकराचार्य नहीं थे तब शरीर पीठ वालों का उन्होंने विरोध किया था वो विरोध नहीं था

629
00:44:06,240 --> 00:44:10,240
वो उनका प्रश्न था विरोध तब माना जाता जब वो प्रेस कॉन्फ्रेंस करके

630
00:44:10,240 --> 00:44:14,320
कहते अपना YouTube चैनल 1.5 लाख फॉलोअ वाला बना लेते 500 फॉलोअ वाला बना

631
00:44:14,320 --> 00:44:18,720
लेते वहां से वो बात कहते कि ये कैसे है तुम यहां ये गलत हो

632
00:44:18,720 --> 00:44:22,880
इसको विरोध कहते हैं वो तो शोधन कार्य था शोधन

633
00:44:22,880 --> 00:44:26,560
का प्रयास व्यक्तिगत रूप से

634
00:44:26,560 --> 00:44:30,560
अब उसमें गलत कौन था सही कौन था यह निर्णय मैं नहीं दे रहा हूं यदि

635
00:44:30,560 --> 00:44:34,560
उनके अनुसार तुम जो तुमने जो जानकारी दी है उनके अनुसार अगर वह गलत

636
00:44:34,560 --> 00:44:38,880
थे कोई गलत था तो वहां वो तो शोधन का प्रयास है ना

637
00:44:38,880 --> 00:44:42,320
उससे तो तुम्हें सीख लेनी चाहिए तुमको किसने मना किया जाकर के

638
00:44:42,320 --> 00:44:46,320
फिर जाकर प्रश्न ना पूछो हिंदू राष्ट्र के बारे में जो तुम

639
00:44:46,320 --> 00:44:50,880
मधुमक्खी की सेना के बारे में मजाक उड़ाया करते हो किसने मना किया है जाओ

640
00:44:50,880 --> 00:44:55,600
पूछो जाकर के प्रश्न यह विरोध नहीं है। प्रश्न है।

641
00:44:55,600 --> 00:45:00,240
विरोध तुम्हारा है जो तुम सार्वजनिक मंचों से कर रहे हो। यह विरोध है।

642
00:45:00,240 --> 00:45:04,240
समझ रहे हो? और दूसरी बात कि

643
00:45:04,240 --> 00:45:08,400
शंकराचार्य शिष्य किसके थे? शंकर परंपरा के। अपने

644
00:45:08,400 --> 00:45:12,960
गुरु अपनी गुरु परंपरा में उनके कोई प्रश्न थे। वो उन्होंने किए।

645
00:45:12,960 --> 00:45:17,680
रखा उस बात को।

646
00:45:17,680 --> 00:45:21,680
मगर इसका मतलब यह नहीं कि प्रत्येक बाहर के व्यक्ति को व्यक्ति द्वारा जो है

647
00:45:21,680 --> 00:45:25,840
विरोध करना वो प्रश्न करना तो छोड़ो शोधन करना तो छोड़ो

648
00:45:25,840 --> 00:45:29,920
विरोध करना आक्रमण करना वो उसको स्वीकार कर लिया जाए वहां तो कहा जाएगा

649
00:45:29,920 --> 00:45:34,400
ना अच्छा

650
00:45:34,400 --> 00:45:38,560
अच्छा अब एक बात आती है कि अमुक आचार्य ने जो है पूरी

651
00:45:38,560 --> 00:45:43,040
के शंकराचार्य जी का नाम ले खंडन किया है। वैष्णवाचार्य

652
00:45:43,040 --> 00:45:47,120
का नाम ले खंडन नहीं किया है। वैष्णवाचार्यों का खंडन नहीं

653
00:45:47,120 --> 00:45:51,360
किया है। सबका खंडन किया है। सबका

654
00:45:51,360 --> 00:45:55,440
मगर तेरी तूती वहां बंद हो जाएगी। वहां तेरा जो भूकना है

655
00:45:55,440 --> 00:45:59,600
वो बंद हो जाएगा। और वहां पर तू ही तो कहता

656
00:45:59,600 --> 00:46:03,600
है भाई तुम मजबूर कर देते हैं अच्छी भाषा में कैसे बोले? तो इसलिए तुम मजबूर

657
00:46:03,600 --> 00:46:09,520
कर देते हो। अच्छी भाषा में कैसे बोले? खैर

658
00:46:09,520 --> 00:46:13,920
तो जिन आचार्यों का तुमको समर्थन

659
00:46:13,920 --> 00:46:18,080
प्राप्त है वो भी तो मौन है वो भी तो सार्वजनिक खंडन

660
00:46:18,080 --> 00:46:22,160
नहीं कर रहे हैं तो उनका

661
00:46:22,160 --> 00:46:26,400
क्या करोगे? नपुंसक कहोगे? तुम्हारे

662
00:46:26,400 --> 00:46:30,400
पिता भी तो नहीं कर रहे हैं। पिता तो तुम्हारे अनुसार कई बार गलत भी हो चुके हैं। तो

663
00:46:30,400 --> 00:46:34,640
तुम उनको नपुंसक मानोगे? यदि ऐसा मानोगे तो तुम्हारी उत्पत्ति

664
00:46:34,640 --> 00:46:39,200
पर ही प्रश्न हो जाएगा। कहोगे नपुंसक लतखोर

665
00:46:39,200 --> 00:46:43,280
कहोगे। अच्छा सब बातें छोड़ दो। विद्या भास्कर

666
00:46:43,280 --> 00:46:47,680
जी महाराज है परम आदरणीय

667
00:46:47,680 --> 00:46:51,840
इस या रामपाल इत्यादि विषयों में मैंने उनका वक्तव्य

668
00:46:51,840 --> 00:46:55,920
लेने के लिए कहा कि एक छोटा सा कुछ

669
00:46:55,920 --> 00:47:00,080
विषय मैंने बताए थे। दे दीजिए। उन्होंने कहा उन्होंने उसमें रुचि

670
00:47:00,080 --> 00:47:04,560
अरुचि दिखाई। उसका कारण है। उसका

671
00:47:04,560 --> 00:47:08,640
कारण है। रणनीतिक कारण है कि भाई वह अगर यहां कुछ

672
00:47:08,640 --> 00:47:13,520
नहीं बोल रहे हैं तो क्यों नहीं बोल रहे हैं? क्योंकि उन्हें कुछ बचाना है।

673
00:47:13,520 --> 00:47:17,600
इसमें श्रद्धा मेरे जैसों की हो जाएगी। मगर तेरे जैसे कल

674
00:47:17,600 --> 00:47:22,800
को उनका भी प्रतिकार करेंगे। कुर्ता फाड़ के

675
00:47:22,800 --> 00:47:27,200
ये कैसे किया तुमने? क्यों नहीं बोले? भले ही उस बोलने

676
00:47:27,200 --> 00:47:31,600
से लाभ कम हानि ज्यादा हो रही हो। यही तेरी दिक्कत

677
00:47:31,600 --> 00:47:35,680
है। क्यों? क्योंकि तू तेरा कोई उद्देश्य नहीं

678
00:47:35,680 --> 00:47:39,840
है। धरातल पर कोई अभियान नहीं है। जिस दिन करने निकलेगा उस दिन रेलवे स्टेशन पर

679
00:47:39,840 --> 00:47:43,040
गया था ना तू

680
00:47:43,040 --> 00:47:47,040
लाइव प्रपंच करने। वहां क्यों पुलिस वालों से परमिशन

681
00:47:47,040 --> 00:47:51,360
ले ली थी? उस विधान को तो तू मानता नहीं है ना। क्यों सहारा

682
00:47:51,360 --> 00:47:55,440
ले लिया था उससे? जैसे तू आरोप लगाता है कि पूरी शंकराचार्य जी जो

683
00:47:55,440 --> 00:47:59,520
है अपने आप को उन्होंने कोर्ट में साबित किया था। तो भाई तू

684
00:47:59,520 --> 00:48:03,520
जहां कथा कर रहा है, तू जहां अपने कार्य कर रहा है, वहां पुलिस की परमिशन के बिना कर

685
00:48:03,520 --> 00:48:07,840
लेगा। बड़े शहर में कोई राजधानी इत्यादि

686
00:48:07,840 --> 00:48:12,640
हो वहां पर कथा होगी तेरी। बता बिना परमिशन के हो जाए।

687
00:48:12,640 --> 00:48:16,240
परमिशन लेनी पड़ेगी ना।

688
00:48:16,240 --> 00:48:20,240
तो सिद्धांत सीख भाई छोटा है तू अभी।

689
00:48:20,240 --> 00:48:24,880
तेरी गति खाली इसी में है। यह नहीं खाना वहां यहां खाते हुए देख लिया गया। और

690
00:48:24,880 --> 00:48:28,320
कुछ लोग कहते हैं

691
00:48:28,320 --> 00:48:32,400
कि पहले सिद्धांत सीखने वाली बात है। सिद्धांत

692
00:48:32,400 --> 00:48:36,400
सीखो कि जिस हवाई जहाज को आसमान में उड़ना होता है,

693
00:48:36,400 --> 00:48:42,080
वह पहले धरती का ही सहारा लेता है उड़ने योग्य बनने के लिए।

694
00:48:42,080 --> 00:48:46,160
तो धरती पर गिरा हुआ व्यक्ति धरती का ही सहारा लेकर उठ खड़ा

695
00:48:46,160 --> 00:48:50,240
होता है। तो माया में फंसा हुआ व्यक्ति माया का ही सहारा लेकर के उठ खड़ा होता

696
00:48:50,240 --> 00:48:54,320
है। और सनातन विरोधी वातावरण में फंसा हुआ व्यक्ति सनातन विरोधी

697
00:48:54,320 --> 00:49:00,080
वातावरण का ही उपयोग करते हुए

698
00:49:00,080 --> 00:49:04,240
सनातन विरोधी वातावरण को नष्ट कर देता है। सीखना होगा

699
00:49:04,240 --> 00:49:08,480
तुम्हें। सिद्धांत सीखो। मैंने कभी तुम्हारे दार्शनिकता

700
00:49:08,480 --> 00:49:13,120
में गति तो देखी नहीं है। यही सब गति देखी है जो तुम यह

701
00:49:13,120 --> 00:49:17,120
विधि विषयक जो लाते हो यह होना चाहिए। ये विधि विषयक जो चीजें

702
00:49:17,120 --> 00:49:21,600
होती हैं। दार्शनिकता में तुम्हारी कभी गति मैंने सुनी नहीं कि तुमने

703
00:49:21,600 --> 00:49:25,600
अवतारवाद के लिए लड़ा हो कि भगवान अवतार ऐसे ऐसे ले सकते हैं।

704
00:49:25,600 --> 00:49:29,680
इस पर तुमने अपना चिंतन प्रस्तुत किया हो। या आर्य समाजियों के जो

705
00:49:29,680 --> 00:49:33,760
कुतर्क होते हैं विधर्मियों के कुतर्क होते हैं मूर्ति पूजा इत्यादि को

706
00:49:33,760 --> 00:49:38,080
लेकर के बिना केवल प्रमाण नहीं उसमें दार्शनिक तर्क तार्किक

707
00:49:38,080 --> 00:49:42,800
व्याख्या भी वो सब तुमने कर दी हो ऐसी गति तो मैंने तुम्हारी देखी नहीं

708
00:49:42,800 --> 00:49:46,800
है ना और कुछ लोग ये कहते हैं कि भाई तुम्हारी

709
00:49:46,800 --> 00:49:50,800
मेरी शास्त्रों की लड़ाई है तुम्हारी मेरी शास्त्रों की लड़ाई है ही नहीं

710
00:49:50,800 --> 00:49:55,040
कहां से है तुमने अशुद्ध आरोप लगाए तुमने

711
00:49:55,040 --> 00:49:59,120
ये बात कही कि वो पहले ऐसा करती थी अभी भी ऐसा कर रही तुमने पहले की बातों को

712
00:49:59,120 --> 00:50:03,200
अभी यह सब चीजें हैं ना इसमें शास्त्र कहां है क्या शास्त्र में लिखा

713
00:50:03,200 --> 00:50:07,440
है कि उनके वो जो तुमने आरोप लगाया था सम लैंगिकता का वो वैश्या

714
00:50:07,440 --> 00:50:11,680
आगमन है वो वैभवीचारी शास्त्र में लिखा है तो शास्त्रों

715
00:50:11,680 --> 00:50:15,200
की लड़ाई कहां से हो गई शास्त्रों की लड़ाई तो तब होगी जब तुम इसको

716
00:50:15,200 --> 00:50:19,360
पहले सिद्ध कर दो जो तुमने आरोप लगाए हैं और उसके बाद मैं यह

717
00:50:19,360 --> 00:50:23,360
कहने लगूं कि नहीं नहीं ये जो कार्य हुआ है सही हुआ है तो तुम उसको शास्त्रों

718
00:50:23,360 --> 00:50:27,360
से दिखाओगे कि ये ये गलत कार्य है और मैं कहूंगा मैं

719
00:50:27,360 --> 00:50:31,680
वहां पर गलत सिद्ध हो जाऊंगा। शास्त्रों की लड़ाई तब मानी जाएगी।

720
00:50:31,680 --> 00:50:36,000
ये शास्त्रों की लड़ाई नहीं है। ये तो लौकिक जानकारियों

721
00:50:36,000 --> 00:50:40,080
की लड़ाई है। तुम्हारा कहना है ये हुआ मेरा कहना है। नहीं हुआ।

722
00:50:40,080 --> 00:50:44,160
इसमें शास्त्रों लड़ाई कहां से आ गई? हां। बुद्ध और शबरी के विषय में है

723
00:50:44,160 --> 00:50:48,400
तो हम परंपरा प्राप्त आचार्य के शिष्य हैं। तुम्हारी चीज का खंडन

724
00:50:48,400 --> 00:50:52,480
हो के रहेगा। सामने से तुम उसको बचा नहीं पाओगे। क्योंकि तुम्हारे पास परंपरा

725
00:50:52,480 --> 00:50:56,720
नहीं है। यही तो जीत है परंपरावादियों

726
00:50:56,720 --> 00:51:00,880
की। तुम उसको बचा नहीं पाओगे। हारोगे

727
00:51:00,880 --> 00:51:05,360
उसमें क्योंकि तुम्हारे पास परंपरा नहीं है। ठीक है? और जो परंपरा

728
00:51:05,360 --> 00:51:09,520
है उसकी तो धज्जियां उड़ी ही रही है और आगे उड़ेगी भी। जो तुमने

729
00:51:09,520 --> 00:51:14,560
कपोल कल्पित परंपरा अपनी बनाई है जो ठीक है।

730
00:51:14,560 --> 00:51:19,520
आगे चलते हैं और क्या है?

731
00:51:19,520 --> 00:51:22,160
तो

732
00:51:22,160 --> 00:51:26,240
अमुक आचार्य ने हमारे आचार्य का खंडन कर लिया। इसलिए हम सारे

733
00:51:26,240 --> 00:51:30,560
जितने भी अभियान है उनको छोड़कर

734
00:51:30,560 --> 00:51:34,640
के उसके खंडन के पीछे लग जाए। केवल हमारे गुरु को कैसे कुछ कह

735
00:51:34,640 --> 00:51:37,360
दिया?

736
00:51:37,360 --> 00:51:42,000
तू क्यों कर पा रहा है ये नग्नता? यह जो नगनता तुम कर रहे हो

737
00:51:42,000 --> 00:51:46,320
अपने चैनल में बैठकर क्यों कर रहे हो? क्योंकि तुम्हारा कोई कार्य नहीं है

738
00:51:46,320 --> 00:51:50,320
कि मुझे वहां फलाने से जाकर मिलना है। यह बात करनी है। और फिर

739
00:51:50,320 --> 00:51:54,320
यह काम करवाना है और है भी तो बहुत

740
00:51:54,320 --> 00:51:58,400
व्यक्तिगत स्तर के समष्टि वाले नहीं है। होता तो

741
00:51:58,400 --> 00:52:02,400
तुम्हें निर्णय लेना पड़ता कि क्या यह छोटा नुकसान है या

742
00:52:02,400 --> 00:52:08,400
यह छोटा नुकसान है। दोनों में से एक को चुनना पड़ता।

743
00:52:08,720 --> 00:52:12,720
जब व्यक्तिगत जो लाभ है वह समष्टि पर हावी

744
00:52:12,720 --> 00:52:17,360
होने लगता है तो समष्टि वाला निर्णय लिया जाता है ना। मगर

745
00:52:17,360 --> 00:52:21,840
तुम यह सब बातों को कहां जानोगे? जैसे कोई अनाथ

746
00:52:21,840 --> 00:52:25,920
होता है ना अनाथ जिसका कोई पिता नहीं होता। कौन पिता

747
00:52:25,920 --> 00:52:30,240
है मालूम नहीं है। ऐसे ही तुम्हारी स्थिति धार्मिक उसमें है

748
00:52:30,240 --> 00:52:34,320
क्षेत्र में कौन गुरु है मालूम नहीं है। धार्मिक पिता

749
00:52:34,320 --> 00:52:38,320
तो गुरु ही होता है ना। तो कौन है पिता मालूम ही

750
00:52:38,320 --> 00:52:42,480
नहीं है। इसलिए अपना कपोल कल्पित परंपरा रच ली।

751
00:52:42,480 --> 00:52:46,640
वो स्थिति है इसलिए तुम्हारे ये सब चीजें हैं। ये इतने जटिल मुद्दे

752
00:52:46,640 --> 00:52:50,800
तुम्हारी बस के बाहर है। खैर

753
00:52:50,800 --> 00:52:54,800
फिर अमुक आचार्य का खंडन अगर कर रहे हो तो परोक्ष भाव से क्यों कर

754
00:52:54,800 --> 00:52:59,280
रहे हो? नाम लेकर खंडन क्यों नहीं कर रहे हो? कितने लोग बिगड़ जाएंगे? अब ये तुम्हारी अपनी वो है।

755
00:52:59,280 --> 00:53:02,560
कल्पना

756
00:53:02,560 --> 00:53:07,360
तुमने नाम लेके कर लिया। कितने लोग सही हो गए? बताओ।

757
00:53:07,360 --> 00:53:11,440
कितने लोग बीजेपी और आरएसएस के हैं जो शंकराचार्य को मानने वाले हो गए?

758
00:53:11,440 --> 00:53:14,880
तुमने नाम ले बचा लिया।

759
00:53:14,880 --> 00:53:19,120
कुछ नहीं। कुछ नहीं। केवल तुमने अपने कुछ व्यूज

760
00:53:19,120 --> 00:53:23,360
और बढ़ा लिए। केवल तुमने अपने कुछ सब्सक्राइबर्स और बढ़ा लिए। क्यों?

761
00:53:23,360 --> 00:53:27,360
क्योंकि चैन से सोना है तो जाग जाओ। सनसनीखेज

762
00:53:27,360 --> 00:53:32,080
खबरें में लाओ के दूंगा। उसको सुनने के लिए मसालेदार लोग बैठे हैं।

763
00:53:32,080 --> 00:53:36,240
आहा ये ये बोल रहा है। ये सही है। ये किसी को नहीं छोड़ता

764
00:53:36,240 --> 00:53:40,240
है। ये सही है भाई। इसको सुनो। कोई अभियान नहीं।

765
00:53:40,240 --> 00:53:46,240
कुछ नहीं। कोई धर्म संस्थापना नहीं वो है। अच्छा

766
00:53:46,960 --> 00:53:51,360
तो यहां पर एक बात है कि दो सही रास्तों में से ज्यादा

767
00:53:51,360 --> 00:53:55,520
सही और दो गलत रास्तों में से कम गलत चुनना होता है। कठिन

768
00:53:55,520 --> 00:53:59,520
होता है। माता सीता को वनवास भेजना भी कठिन था श्री राम के

769
00:53:59,520 --> 00:54:03,600
लिए। और अपनी वर्णाश्रमी स्वधर्म

770
00:54:03,600 --> 00:54:08,240
निष्ठ जनता को एक समस्या से जूझते

771
00:54:08,240 --> 00:54:12,240
रहने देना भी

772
00:54:12,240 --> 00:54:16,640
कष्टदायक था तो उन्होंने

773
00:54:16,640 --> 00:54:20,800
माता सीता को वनवास गमन देना

774
00:54:20,800 --> 00:54:26,640
उचित समझा क्योंकि वहां समष्टि का कष्ट हो रहा था

775
00:54:26,640 --> 00:54:30,720
और यह चुनना पड़ता है और यह जो बलि विधान है जो

776
00:54:30,720 --> 00:54:34,800
वेदों में दिया गया यह सब भी तो वही है ना कि इतनी बड़ी चीज को

777
00:54:34,800 --> 00:54:38,560
बचाना है तो इस एक चीज को

778
00:54:38,560 --> 00:54:42,800
उसमें उपयोग में ले लिया जाए। सब क्या है?

779
00:54:42,800 --> 00:54:46,880
मगर तुम्हें इन सब बातों से कोई मतलब नहीं कि दार्शनिकता में तो गति है ही नहीं। वह तो बात ही मत

780
00:54:46,880 --> 00:54:50,960
करो। कभी देखा ही नहीं कि इस तरह से चिंतन कभी किया

781
00:54:50,960 --> 00:54:54,960
हो। बस यहां ये लिखा है। ये यहां पे ये खाना गलत है या

782
00:54:54,960 --> 00:54:59,120
वहां पर वो विधान दिया गया है। वो क्षत्रिय है। वो वैश्य है वो कश्यप है। इससे

783
00:54:59,120 --> 00:55:02,080
बाहर निकले ही नहीं हो। तुम तुम कर क्या रहे हो? कभी देखा है

784
00:55:02,080 --> 00:55:06,240
अपने आप को? जो लोग वर्णाश्रमी

785
00:55:06,240 --> 00:55:10,480
हैं। जो लोग परंपरावादी हैं। परंपरावाद

786
00:55:10,480 --> 00:55:14,560
का परंपरा का जो घेरा है उसके अंदर के लोगों पर तुम कार्य करते

787
00:55:14,560 --> 00:55:19,120
हो केवल उसके अंदर के लोगों पर उसके बाहर

788
00:55:19,120 --> 00:55:23,120
जो लोग परंपरा में ही विश्वास नहीं रखते हैं भटके

789
00:55:23,120 --> 00:55:28,160
हुए विभिन्न सेक्स में और उसके बाहर विभिन्न विधर्म में

790
00:55:28,160 --> 00:55:34,160
उनको यहां इस परंपरा के घेरे के अंदर लाने का कार्य हम जैसे लोग करते हैं।

791
00:55:34,480 --> 00:55:38,640
तुम क्या कर रहे हो? जो वर्णाश्रमी है वो उसी में ये इसने

792
00:55:38,640 --> 00:55:42,640
गलत कह दिया वो उसने यहां गलत कह दिया यह है तुम्हारे चैनल का पूरा कंटेंट उठा के देख

793
00:55:42,640 --> 00:55:45,040
लो

794
00:55:45,040 --> 00:55:49,920
और वही कंटेंट वो है प्रचलित तुम्हारा बाहर

795
00:55:49,920 --> 00:55:54,560
से इस घेरे के अंदर तो लाओ वर्णाश्रमी तो बनाओ किसी को हमने बनाया

796
00:55:54,560 --> 00:55:58,880
विजय श्री को बनाया हमने हम छाती ठोक के कह सकते हैं इसीलिए

797
00:55:58,880 --> 00:56:03,280
उसकी रक्षा में खड़े हुए विजय श्री

798
00:56:03,280 --> 00:56:07,360
जैसे बहुत लोगों को हम भटके हुए हिंदुओं से लेकर के और इस

799
00:56:07,360 --> 00:56:11,360
घेरे में लाए। उनमें से एक विजयश्री थी जो आज हमारी

800
00:56:11,360 --> 00:56:15,760
गुरु बहन है बहन है और हम उसके लिए खड़े इसीलिए

801
00:56:15,760 --> 00:56:17,120
हुए क्योंकि आज

802
00:56:17,120 --> 00:56:22,960
अगर हम इसके लिए नहीं बोलेंगे तो कल को कोई बाहर से आएगा नहीं।

803
00:56:22,960 --> 00:56:28,960
परंपरा निष्ठ नहीं बनेगा। वर्णाश्रम निष्ठ नहीं बनेगा।

804
00:56:29,360 --> 00:56:33,680
बेवकूफ मूर्ख है तू। जिसे कोई चिंता

805
00:56:33,680 --> 00:56:38,960
नहीं है धर्म की जो अपनी लॉलीपॉप देख रहा है बस

806
00:56:38,960 --> 00:56:43,200
और सुनो क्या है

807
00:56:43,200 --> 00:56:45,440
कि

808
00:56:45,440 --> 00:56:49,680
अब बात आती है कुल मिलाकर के

809
00:56:49,680 --> 00:56:53,840
परोक्ष भाव से कहना या अमुक आचार्य का विरोध ना करना इसमें 100 की सीधी क्या

810
00:56:53,840 --> 00:56:57,840
बात है यह निर्णय लेना पड़ता है उनको जिनको युद्ध लड़ना होता

811
00:56:57,840 --> 00:57:01,920
है किससे बोलना बोलना है, किससे

812
00:57:01,920 --> 00:57:07,680
नहीं बोलना है, किससे कम बोलना है, किससे बोलना ही नहीं है।

813
00:57:07,680 --> 00:57:11,680
अपनी बड़ी चीज की रक्षा करने के लिए छोटी चीजों का बलिदान देना पड़ता

814
00:57:11,680 --> 00:57:15,760
है। समझ में आया मूर्ख? तुझको नहीं आएगा। तुझको तू

815
00:57:15,760 --> 00:57:20,000
इसमें भी अभी कुछ आगे अपना भूसा निकालेगा। तो भूसा भरा ही है तो क्या करें?

816
00:57:20,000 --> 00:57:24,160
भूसा ही निकलेगा। तुझको मतलब नहीं है धर्म से। तुझको

817
00:57:24,160 --> 00:57:28,160
मतलब नहीं है इस बात से कि मां को गाली देने

818
00:57:28,160 --> 00:57:32,320
वाले राक्षसों का वध कैसे किया जाए। कैसे एक चलता

819
00:57:32,320 --> 00:57:36,320
फिरता तंत्र खत्म होने के नष्ट होने के कगार पर है। तुझे इससे

820
00:57:36,320 --> 00:57:40,880
मतलब नहीं है। तुझे मतलब इससे है कि अमुक आचार्य ने अगर अमुक

821
00:57:40,880 --> 00:57:45,600
शिष्य के गुरु को कुछ कह दिया है तो उस शिष्य को बोलना चाहिए।

822
00:57:45,600 --> 00:57:49,840
उसको अपने व्यक्तिगत धर्म को प्रधानता देनी चाहिए। समष्टि को भूल

823
00:57:49,840 --> 00:57:54,480
जाना चाहिए। कुंभकरण बन जाना चाहिए।

824
00:57:54,480 --> 00:57:59,120
भीष्म जी बन जाना चाहिए। मगर प्रह्लाद नहीं बनना चाहिए।

825
00:57:59,120 --> 00:58:03,120
श्री राम नहीं बनना चाहिए। अब बात आती है कि भाई पीएन मिश्र जी

826
00:58:03,120 --> 00:58:07,280
का विरोध क्यों नहीं किया? मेरी जानकारी में

827
00:58:07,280 --> 00:58:09,440
कि

828
00:58:09,440 --> 00:58:13,440
जैसा कि तुम्हारे अनुसार भैया कि पीएन मिश्र जी ने शंकर

829
00:58:13,440 --> 00:58:17,600
के सिद्धांतों का खंडन किया और फिर भी शंकराचार्य के

830
00:58:17,600 --> 00:58:21,840
लोग और विशेष रूप से पूरी शंकराचार्य के लोग उस पर नहीं बोल रहे हैं। तो सेलेक्टिव

831
00:58:21,840 --> 00:58:22,880
पॉलिटिक्स तू अपनी

832
00:58:22,880 --> 00:58:26,960
देखना भाई। और मैं यकीन के साथ कह सकता हूं जिस दिन तुझसे कभी सामना

833
00:58:26,960 --> 00:58:30,960
हो गया तेरी थूथड़ी तेरी ही बातों से बंद

834
00:58:30,960 --> 00:58:35,040
हो जाएगी। तेरी बातों से लोग ऐसा सोचते हैं कि शास्त्र है शास्त्र

835
00:58:35,040 --> 00:58:39,280
है। मेरे और तेरे बीच में शास्त्र की कोई बात है ही नहीं। और क्योंकि

836
00:58:39,280 --> 00:58:43,440
मेरे पास परंपरा है यदि कभी होगी तो उसमें

837
00:58:43,440 --> 00:58:47,600
मैं पहले से ही विचित हूं। ध्यान रख। तेरी परंपरा के चित्रण

838
00:58:47,600 --> 00:58:51,600
तो उड़ रहे हैं जो तूने बताया है। खैर मैं इस बात के

839
00:58:51,600 --> 00:58:55,600
बारे में नहीं मैं मेन मुद्दे पे आता हूं। पीएन मिश्र जी ने जो है शंकर

840
00:58:55,600 --> 00:58:59,920
शंकराचार्य के सिद्धांतों का विरोध किया है और शंकराचार्य

841
00:58:59,920 --> 00:59:04,160
के जो शिष्य हैं वो चुप क्यों है वो क्यों नहीं बोल रहे अच्छा

842
00:59:04,160 --> 00:59:08,160
पहली बात यह है कि पूरी पीठ पर ही निशाना क्यों है जहां से

843
00:59:08,160 --> 00:59:12,480
तुम्हें समर्थन प्राप्त है और जहां से उनको प्रश्रय

844
00:59:12,480 --> 00:59:16,640
प्राप्त है पीएन मिश्र जी को वहां क्यों नहीं बोल रहे हो तुम उनका नाम ले ले

845
00:59:16,640 --> 00:59:20,800
के उनका नाम लेके क्यों नहीं फोटो लगा के वीडियो बना रहे हो कि

846
00:59:20,800 --> 00:59:24,960
क्यों मुंह मौन है ज्योतिष पीठ वाले महाराज

847
00:59:24,960 --> 00:59:29,040
क्यों आत्म मुग्ध है? यह सब लिखो उनके लिए। यह क्या है?

848
00:59:29,040 --> 00:59:33,200
सेलेक्टिव पॉलिटिक्स। आगे मैं बोलता हूं। पीएन

849
00:59:33,200 --> 00:59:38,320
मिश्र जी की धार्मिक सामाजिक छवि क्या है?

850
00:59:38,320 --> 00:59:42,320
कितने लोग उनको फॉलो करते हैं। जो वो कुछ कह देंगे तो

851
00:59:42,320 --> 00:59:46,560
बहुत बड़ा जो हिस्सा है जो वो प्रभावित होने लग जाए।

852
00:59:46,560 --> 00:59:50,880
अरे पीएन मिश्र को छोड़ दो। नित्यानंद मिश्र है

853
00:59:50,880 --> 00:59:56,080
कोई करपात्री जी का खूब उसने खंडन किया वही धरती

854
00:59:56,080 --> 01:00:02,080
घूमती वाली बात पर हम नहीं उसको समय दे पाए

855
01:00:03,680 --> 01:00:07,840
हाइपरक्वस्ट के चैनल पर विज्ञान दर्शन और वो जो स्वयं को पहले

856
01:00:07,840 --> 01:00:11,840
ऋषि वाच कहता था आर्य समाजी विज्ञान दर्शन भी आर समाजी इन लोगों

857
01:00:11,840 --> 01:00:16,400
ने जाकर खूब वहां पर जो है कचरा किया है

858
01:00:16,400 --> 01:00:20,960
कचरा फैलाया है हम नहीं समझ समय दे पाए।

859
01:00:20,960 --> 01:00:25,040
कलयुगी योगी ने बहुत बुरा बुरा कहा। हम

860
01:00:25,040 --> 01:00:29,120
नहीं समय दे पाए। तो इसका मतलब तूने तब क्यों नहीं विरोध किया था?

861
01:00:29,120 --> 01:00:33,280
इनके लिए क्यों नहीं बोला? क्योंकि इनसे तुम्हें कोई मतलब नहीं है। पी एन मिश्र क्योंकि तुम्हारा

862
01:00:33,280 --> 01:00:37,280
विरोधी है तो इसलिए पीएन मिश्र का हमने विरोध नहीं किया। उससे तुम्हें मतलब है। ये क्या है?

863
01:00:37,280 --> 01:00:41,280
सिलेक्टिव पॉलिटिक्स। अब दूसरी बात सुनो। कि जब

864
01:00:41,280 --> 01:00:45,600
हमें किसी का विरोध करना होता है तो हमें देखना होता है कि हम इसका

865
01:00:45,600 --> 01:00:49,760
विरोध करेंगे तो उसके परिणाम क्या-क्या होंगे। क्योंकि हमें युद्ध लड़ना

866
01:00:49,760 --> 01:00:54,160
है। हम वॉर में हैं। बैटल

867
01:00:54,160 --> 01:00:58,160
फील्ड में है हम। तुम नहीं हो। इसलिए तुम वहां पर

868
01:00:58,160 --> 01:01:02,240
नंगाई कर सकते हो। अरे इसने ये क्यों नहीं किया? अरे इसने वो क्यों

869
01:01:02,240 --> 01:01:06,800
नहीं किया? जिसको युद्ध में लड़ना होगा वो निर्णय लेगा।

870
01:01:06,800 --> 01:01:11,040
किस व्यक्ति की बात का विरोध हम अपने मंच से कर दें।

871
01:01:11,040 --> 01:01:16,240
वह प्रसिद्ध ना भी हो। खामखा हमारे से प्रसिद्ध हो जाए।

872
01:01:16,240 --> 01:01:20,400
दूसरी बात कि उसकी धार्मिक छवि कितनी है? धर्म

873
01:01:20,400 --> 01:01:24,480
की दृष्टि से उसको कितना देखा सुना समझा जाता है। धर्म की दृष्टि से

874
01:01:24,480 --> 01:01:28,640
यह भी देखना होता है। फिर तीसरी बात वो भी है कि हमें अगर हमारा

875
01:01:28,640 --> 01:01:32,640
अभियान जो है नुकसान में जा रहा है कि नहीं जा रहा है। ऐसा तो नहीं यह करने की वजह से

876
01:01:32,640 --> 01:01:36,800
दूसरी हमारी जो बड़ी चीजें वो उसमें आ जाए खतरे में। ये सब चीजें

877
01:01:36,800 --> 01:01:40,880
सोचने की है। मगर तू छोटा है। अभी तेरी नजर लॉलीपॉप

878
01:01:40,880 --> 01:01:46,320
में है। वो लॉलीपॉप क्या है वो तू जाने। या तो वो वर्चस्वता

879
01:01:46,320 --> 01:01:50,400
लोकेशना व्यूज YouTube चैनल कुछ भी

880
01:01:50,400 --> 01:01:55,600
हो सकता है या फिर एक अंदर से घमंड को पोषित करना

881
01:01:55,600 --> 01:01:59,760
कुछ भी हो सकता है और या फिर यह सब भी ना हो या

882
01:01:59,760 --> 01:02:04,080
फिर यह हो मलेच्छराज का एजेंट यह भी हो सकता है।

883
01:02:04,080 --> 01:02:08,400
खैर तो तार्किक बुद्धि से जरा सोचो

884
01:02:08,400 --> 01:02:09,440
कि किसका विरोध

885
01:02:09,440 --> 01:02:13,520
कैसे करना चाहिए और कब करना चाहिए उससे समष्टि तो प्रभावित नहीं हो

886
01:02:13,520 --> 01:02:17,520
रही है हमारे व्यक्तिगत धर्म की वजह से प्रह्लाद का व्यक्तिगत धर्म

887
01:02:17,520 --> 01:02:21,600
था पिता की आज्ञा मानना समष्टि में

888
01:02:21,600 --> 01:02:25,680
क्या था क्या किया उन्होंने और

889
01:02:25,680 --> 01:02:29,680
आदर्श कौन है हमारे लिए प्रह्लाद या कुंभकरण जिसने अपने व्यक्तिगत धर्म

890
01:02:29,680 --> 01:02:33,840
को वरीयता दे दी निर्णय कैसे करोगे

891
01:02:33,840 --> 01:02:37,920
अब कुंभकरण यदि अपने भाई का साथ दे दे तो उससे

892
01:02:37,920 --> 01:02:42,240
यह कहो अरे तुमने रावण का साथ दिया और यदि वह अपने

893
01:02:42,240 --> 01:02:46,320
भाई का साथ ना दे तो अरे तुमने यहां शास्त्रों का वो उल्लंघन किया तुमने भाई का साथ

894
01:02:46,320 --> 01:02:50,560
नहीं दिया ये हो तुम यही हो तुम

895
01:02:50,560 --> 01:02:54,640
और इससे ज्यादा कुछ नहीं हुआ इन टिपिकल विषयों का जटिल

896
01:02:54,640 --> 01:02:58,720
विषयों का ऐसे ही जटिल विषय क्या है हर्ष समाज जी ने क्या किया है

897
01:02:58,720 --> 01:03:02,800
अरे तुम लोग शूद्रों को मंदिर में नहीं जाने देते हो जाने दोगे क्या

898
01:03:02,800 --> 01:03:06,800
अभी अभी वो ज्योतिष पीठ वाले महाराज से पूछ रहा था। मुझे समय नहीं मिल पाया।

899
01:03:06,800 --> 01:03:11,280
उसका विरोध कर रहा था। कोई न्यूज़ चैनल वाला पूछ रहा था कि कोई शूद्र शंकराचार्य

900
01:03:11,280 --> 01:03:15,760
बना क्या? अब ज्योतिष पीठ वाले महाराज जी के सामने सहज स्थिति हो गई।

901
01:03:15,760 --> 01:03:20,080
क्योंकि एक वृहद विषय है। उसको सुनने का समय तो है नहीं किसी के पास।

902
01:03:20,080 --> 01:03:25,520
उसको एक लाइन में आंसर चाहिए। शूद्र को शंकराचार्य बनने दिया क्या?

903
01:03:25,520 --> 01:03:29,520
अब वहां क्या बोले? अगर नहीं बनने दिया तो यहां पे सामाजिक जो

904
01:03:29,520 --> 01:03:33,760
है ना क्योंकि समाज में इस समय पिरोया जा चुका है।

905
01:03:33,760 --> 01:03:38,560
भाई हम हिंदू किसके हिंदू किसको बनाएं?

906
01:03:38,560 --> 01:03:42,720
90% लोग भटके हुए हैं। उनको अपनी बात सुनाने

907
01:03:42,720 --> 01:03:46,720
से पहले ही ऐसी बात कह देना जिससे कि वो बात सुनने

908
01:03:46,720 --> 01:03:52,720
में आस्था रखने की बजाय दूर जाने में आस्था उनकी हो जाए। ये क्या उचित होगा?

909
01:03:53,280 --> 01:03:57,600
वैसे ही तू करता है। असहज स्थिति में डालता है

910
01:03:57,600 --> 01:04:01,760
और स्वयं की असहज स्थिति में खुद मौन होता है। तूने कहा परोक्ष

911
01:04:01,760 --> 01:04:05,920
रूप से किया। तूने यही कहा ना कि परोक्ष रूप से

912
01:04:05,920 --> 01:04:10,080
अमुक आचार्य का तुमने विरोध किया तो परोक्ष रूप से किया। नाम लेकर नहीं किया। तूने

913
01:04:10,080 --> 01:04:15,840
ये वीडियो बनाते समय भी तो परोक्ष रूप से ही बोला है

914
01:04:15,840 --> 01:04:19,920
कि लोगों को मेरे सार्वजनिक रूप से विरोध

915
01:04:19,920 --> 01:04:24,240
करने से आपत्ति है। कौन लोग भाई यह क्या है परोक्ष

916
01:04:24,240 --> 01:04:28,560
रूप नहीं तो क्या है तू खुद ही अपनी बात से ही फसता है सामना तो आ

917
01:04:28,560 --> 01:04:32,720
सामने तो आ कब आ रहा है अयोध्या बता चलो महाराज जी के पास विद्या भास्कर

918
01:04:32,720 --> 01:04:36,720
जी महाराज के साथ पास बैठकर के कर लेते हैं चल ठीक है एक बात

919
01:04:36,720 --> 01:04:40,800
और कह रहा हूं मैं वीडियो रिकॉर्डिंग भी नहीं करेंगे ठीक है अगर करनी है तो

920
01:04:40,800 --> 01:04:45,120
कर लेते हैं तेरी अगर इच्छा होगी तो कर लेते हैं वीडियो रिकॉर्डिंग

921
01:04:45,120 --> 01:04:49,360
अगर तू चाहेगा तो नहीं करेंगे क्योंकि तुझे पता है और मुझे पता है

922
01:04:49,360 --> 01:04:53,920
कि तुझे वहां पर जो मुंह देखना है पराजय

923
01:04:53,920 --> 01:04:58,080
का यदि वह कोई प्रतिस्पर्धा

924
01:04:58,080 --> 01:05:02,240
के रूप में आता है तो और यदि तुम आते हो कि भाई धर्म की रक्षा करनी

925
01:05:02,240 --> 01:05:06,240
है और एक चर्चा करनी है तो ठीक है उसमें तुम्हारे पक्ष को गलत साबित

926
01:05:06,240 --> 01:05:10,240
होना है यदि तुम्हारा पक्ष यही है जिस तरह जो ले चल रहे हो

927
01:05:10,240 --> 01:05:14,320
तो कब आ रहे हो बता दो आगे तुमने एक बात कही है

928
01:05:14,320 --> 01:05:18,320
कि जो मुस्लिमों से मिल रहा है जो गले लग

929
01:05:18,320 --> 01:05:22,800
रहा जो जो है मुस्लिमों से मिल रहा बागेश्वर वाले वह जो है

930
01:05:22,800 --> 01:05:28,000
उनसे गले कौन मिल रहा है? यह कह रहे हो ना तुम?

931
01:05:28,000 --> 01:05:31,040
अच्छा उनहीं बागेश्वर वालों से क्या विद्या भास्कर जी महाराज

932
01:05:31,040 --> 01:05:36,000
नहीं मिले? राघवाचार्य जी महाराज नहीं मिले। उनके

933
01:05:36,000 --> 01:05:40,240
आश्रमों में जाओगे, मंदिरों में जाओगे तो वहां फोटो नहीं लगी है मंत्रियों के साथ मिलने

934
01:05:40,240 --> 01:05:44,800
की। बागेश्वर वाले बागेश्वर वालों के साथ मिलने की।

935
01:05:44,800 --> 01:05:48,880
तो उनका विरोध क्यों नहीं? नाम ले ले के

936
01:05:48,880 --> 01:05:51,920
और तुम सोचो

937
01:05:51,920 --> 01:05:55,680
कि

938
01:05:55,680 --> 01:06:01,360
तुम तो हर जगह सही हो मेरे और तुम्हारे बीच में तो तुम सही हो

939
01:06:01,360 --> 01:06:05,360
और विद्या भास्कर जी महाराज ने तुम्हारा समर्थन भी किया है। वो समय मिलेगा

940
01:06:05,360 --> 01:06:09,600
तो उनसे जो बातचीत क्या हुई बहुत मार्गदर्शन उनसे प्राप्त हुआ।

941
01:06:09,600 --> 01:06:13,600
समय मिलेगा तो उसको भी साझा करेंगे। पर

942
01:06:13,600 --> 01:06:17,600
तुम तो हर मामले में सही हो। फिर तुम्हारी पुलिस में रिपोर्ट

943
01:06:17,600 --> 01:06:21,680
लिखाने वाले तुमको कोर्ट में घसीट लेने वाले और तुम्हारे जान माल के दुश्मन

944
01:06:21,680 --> 01:06:25,840
बने हुए शिवश नारायण द्विवेदी को उन्होंने क्यों आशीर्वाद दिया शुभ आशीष

945
01:06:25,840 --> 01:06:30,080
दिया इसीलिए दिया भाई कि एक व्यक्ति के जो

946
01:06:30,080 --> 01:06:34,080
गुण है उनका सम्मान होगा अवगुण है उनका अपमान होगा और

947
01:06:34,080 --> 01:06:38,080
तुम भी तो अपनी कथा में यही बोलते हो कि मैं तुम्हें जो है उनके

948
01:06:38,080 --> 01:06:42,160
आचार्यों के प्रति अनास्थावान नहीं बना रहा हूं। मैं तो उनके उन कृत्यों

949
01:06:42,160 --> 01:06:48,160
के प्रति अनास्थावान बना रहा हूं जो गलत है जो शास्त्रोक्त नहीं है।

950
01:06:49,360 --> 01:06:53,360
तो इसका अर्थ यही हुआ ना कि किसी अंश में यदि कोई बुराई कर रहा है मगर

951
01:06:53,360 --> 01:06:57,520
दूसरे अंश में कोई अच्छाई भी कर रहा है तो उसको वहां पर प्रशय दिया जा सकता

952
01:06:57,520 --> 01:07:01,520
है। अगर किसी अंश में कोई मुसलमान

953
01:07:01,520 --> 01:07:05,760
से मिल ले रहा है मगर दूसरे ही अंश में वो ईसाई क्रिश्चियन मिशनरियों से

954
01:07:05,760 --> 01:07:11,120
लोहा ले रहा है। अगर हमारा ऐसा तबका है

955
01:07:11,120 --> 01:07:15,360
अगर हमारा ऐसा एक बहुत बड़ा जन समूह है जो

956
01:07:15,360 --> 01:07:19,680
इसी तरह की चीजों में आस्था है तो उनको धीरे-धीरे तात्विक

957
01:07:19,680 --> 01:07:24,160
रूप से वेदांतवादी बनाने के लिए वही रास्ता सही

958
01:07:24,160 --> 01:07:28,160
मगर इन सब चीजों पर तुम्हें गौर नहीं करना और ऐसे प्रयास करने वालों को तुम

959
01:07:28,160 --> 01:07:32,480
सिरे से नकार दोगे फिर कहोगे कि हमने तुम्हें व्यक्ति के लिए नहीं व्यक्ति के द्वारा गलत

960
01:07:32,480 --> 01:07:37,120
कार्य के प्रति अनास्था किए गए गलत कार्य के प्रति अनास्था हमने

961
01:07:37,120 --> 01:07:41,840
जो है अनास्था उत्पन्न की है

962
01:07:41,840 --> 01:07:45,920
और कई अंशों में तो वह जो गलत कार्य है भी वह गलत कार्य है भी

963
01:07:45,920 --> 01:07:50,080
कि नहीं हुए भी है कि नहीं तो उसके उस पर भी चिंतन का विषय हो जाएगा

964
01:07:50,080 --> 01:07:54,560
हां तुम्हारा अस्तित्व यही है कि अगर

965
01:07:54,560 --> 01:07:58,640
राम जी ने सीता माता को वनवास भेजा तो अरे उसने अपनी पत्नी को वनवास

966
01:07:58,640 --> 01:08:02,800
भेज दिया और नहीं भेजा तो अरे उसने अपनी जनता को दुख में डाल दिया तुम्हारा

967
01:08:02,800 --> 01:08:05,280
अस्तित्व यही है

968
01:08:05,280 --> 01:08:09,360
इतना ही अस्तित्व है तुम्हारा इसी पे तुम खड़े हुए हो भरे हुए नाक डंडा

969
01:08:09,360 --> 01:08:12,400
लेकर के निगचार्य

970
01:08:12,400 --> 01:08:16,480
अच्छा

971
01:08:16,480 --> 01:08:20,480
तो कुल मिलाकर के बात क्या निकली सेलेक्टिव पॉलिटिक्स तुम्हारे बारे

972
01:08:20,480 --> 01:08:24,640
में कितनी बार आ चुका है वो देख लो तुम्हारे निगनंद के जो प्रामाणिक

973
01:08:24,640 --> 01:08:28,640
संस्थान है मठ है वहां पर क्या हो रहा है इस वाले अतिथि बनकर के आ

974
01:08:28,640 --> 01:08:32,880
रहे हैं उसका निग्रह कर लो हां और अमुक आचार्य

975
01:08:32,880 --> 01:08:36,960
ने यदि पूरी शंकराचार्य जी का विरोध किया है तो वैष्णवाचार्यों का भी विरोध किया

976
01:08:36,960 --> 01:08:42,080
है तो जिनको तुम्हें लगता है कि

977
01:08:42,080 --> 01:08:46,400
जो है जिनसे तुम्हें समर्थन प्राप्त है उनका भी निग्रह कर लो।

978
01:08:46,400 --> 01:08:50,560
यद्यपि मैं नहीं मानता कि उनको बोलना ही आवश्यक है। कहां बोलना है, कहां

979
01:08:50,560 --> 01:08:54,800
नहीं बोलना है। यह रणनीतिक विषय है। विशेष तौर पर तब

980
01:08:54,800 --> 01:08:58,960
जब जो वातावरण में वह हमारे अनुसार नहीं है। आचार्यों के अनुसार नहीं है। उनके

981
01:08:58,960 --> 01:09:03,840
कहने पर चलने वाले राजा नहीं है। तो इसलिए

982
01:09:03,840 --> 01:09:08,000
उनको रणनीतिक क्षत्रियोचित भाव से रणनीतिक विषय

983
01:09:08,000 --> 01:09:12,400
में निर्णय लेना होता है। कहा मौन रहना है। बिल्कुल ठीक है।

984
01:09:12,400 --> 01:09:17,040
यदि विद्या भास्कर जी महाराज अमुक अमुक विषय में मौन रहेंगे बिल्कुल ठीक है। राघवाचार्य

985
01:09:17,040 --> 01:09:20,640
जी मौन रहेंगे या कुछ अलग तरह की बात बोलेंगे।

986
01:09:20,640 --> 01:09:24,800
हां सबसे मुख्य बात क्या होती है कि

987
01:09:24,800 --> 01:09:28,880
वो सभी प्रामाणिक आचार्य जो होते हैं वो सारी रणनी रणनीतिक विषय

988
01:09:28,880 --> 01:09:33,040
में जितना हो सकता है उतना आलंबन लेते हैं। मगर कभी

989
01:09:33,040 --> 01:09:37,680
भी शास्त्र की व्याख्या गलत नहीं करते। कितनी बार तुमने

990
01:09:37,680 --> 01:09:41,680
इस बारे में बात की है जो तुम कहते हो। तो सब लोग कहते हैं शास्त्र शास्त्रज्ञ बातें

991
01:09:41,680 --> 01:09:45,920
करता है। शास्त्र की बातें और इसने खंडन किया है। कितनी बार तुमने पूरी शंकराचार्य

992
01:09:45,920 --> 01:09:50,160
जी के वचनों में शास्त्र का दोष निकाला

993
01:09:50,160 --> 01:09:55,040
है यहां उन्होंने शास्त्र का अर्थ गलत कर दिया। कितनी बार निकाला है?

994
01:09:55,040 --> 01:09:59,200
शास्त्र का गलत अर्थ कर दिया। पूरी शंकराचार्य जी ने। कितनी बार तुमने निकाला?

995
01:09:59,200 --> 01:10:03,360
या मैंने गलत अर्थ निकाल दिया। कितनी बार तुमने निकाला? अगर

996
01:10:03,360 --> 01:10:07,440
ऐसा तुम करते तब होती कि हां तुम बहुत बड़े शास्त्र हो। तुम्हारी शास्त्र

997
01:10:07,440 --> 01:10:11,520
की लड़ाई है ही नहीं। तुमने जो कहा कि भैया हिंदू

998
01:10:11,520 --> 01:10:15,520
एकता कैसे आएगी शास्त्रों को तिलांजलि देकर के तो तुम यदि

999
01:10:15,520 --> 01:10:19,600
किसी पर यह निराधार आरोप लगा रहे हो कि वो सम लैंगिक है वो वैभचारी है वो

1000
01:10:19,600 --> 01:10:25,600
वैश्या है ऐसे शास्त्रों में लिखा है क्या कि फलानी स्त्री वैश्या है

1001
01:10:25,760 --> 01:10:31,760
तो ये शास्त्रों को तिला देने की बात कहां से आ गई जबरदस्ती

1002
01:10:33,840 --> 01:10:38,240
तुम्हारे और ये जो मान्य आचार्य गण है पीठ पीठ है पीठाधीश्वर

1003
01:10:38,240 --> 01:10:42,320
है इनके के बीच में शास्त्रों को लेकर के लड़ाई नहीं है। कहां

1004
01:10:42,320 --> 01:10:47,840
पर पूरी शंकराचार्य जी ने शास्त्र की गलत विवेचना कर दी है। मूर्ख

1005
01:10:47,840 --> 01:10:53,840
आज भी तुझे उतना ज्ञान नहीं होगा जितना शास्त्रों का अर्थ उन्हें पता होगा।

1006
01:10:53,840 --> 01:10:57,920
जबकि भगवती तुझे स्वयं पढ़ा रही है आकर के। वही

1007
01:10:57,920 --> 01:11:02,400
भगवती जिनको तुम्हारा गुरु जो है

1008
01:11:02,400 --> 01:11:07,840
चलो छोड़ो किसी दिन और बात कर लेगी उस बारे में। तो

1009
01:11:07,840 --> 01:11:12,000
सेलेक्टिव पॉलिटिक्स यदि तू मानता है कि हर बात में बोलना ही है तो फिर

1010
01:11:12,000 --> 01:11:17,600
उनके बारे में बोल निगनंद के बारे में बोल आचार्यों के बारे में बोल

1011
01:11:17,600 --> 01:11:22,480
तो ये सेलेक्टिव पॉलिटिक्स है और

1012
01:11:22,480 --> 01:11:26,560
अयोध्या आ जाओ विद्या भास्कर जी के सामने बैठकर के बात करें महाराज जी के सामने बैठकर

1013
01:11:26,560 --> 01:11:30,640
के कि भाई तुमने जो आरोप लगाए हैं इनसे क्या सिद्ध हो रहा है अगर

1014
01:11:30,640 --> 01:11:34,880
सिद्ध नहीं हो रहा है तो सार्वजनिक क्यों किए आरोप क्यों लगाए पहले से सार्वजनिक

1015
01:11:34,880 --> 01:11:39,680
है तो क्या और सार्वजनिक करोगे पहले से सार्वजनिकता का स्तर क्या था

1016
01:11:39,680 --> 01:11:43,840
उपहास क्यों उड़ाया दिव्यानुभूति का वो भी पूछूंगा उनके

1017
01:11:43,840 --> 01:11:47,920
साथ भी जिस आचार्य से मिलोगे उसके साथ ही कोई ना कोई दिव्यानुभूति होगी

1018
01:11:47,920 --> 01:11:48,880
उसका मजाक उड़ाया

1019
01:11:48,880 --> 01:11:53,440
जा सकता है तो मैं वही तुम्हारा खाल खीच लूंगा निगमंद

1020
01:11:53,440 --> 01:11:57,680
का नाम लेकर के खाल खींच लूंगा उपास उड़ाया पुराने

1021
01:11:57,680 --> 01:12:02,480
जीवन को लेकर के भी निगमंद का उदाहरण अच्छा है तुम्हारा उदाहरण है

1022
01:12:02,480 --> 01:12:06,640
बाई पोलर के शिकार रहे हो गालीबाज

1023
01:12:06,640 --> 01:12:10,880
रहे हो, शायरियां करने वाले रहे हो, तुम्हारी खाल खींच लूंगा उससे।

1024
01:12:10,880 --> 01:12:14,880
आओ यह सब शास्त्रोक्त विषय नहीं है। ये तो हम तुम्हारे

1025
01:12:14,880 --> 01:12:19,280
ही मुंह की बातों से तुम्हारा ही खंडन कर दे रहे हैं। शास्त्रोक्त

1026
01:12:19,280 --> 01:12:24,080
लड़ाई नहीं है। ये हां दो जगह पर तुमने किया था।

1027
01:12:24,080 --> 01:12:28,160
करपात्री जी का खंडन सबरी और बुद्ध के विषय में।

1028
01:12:28,160 --> 01:12:32,400
अब बात ऐसी है कि हमने उसमें भी कुछ नहीं बोला। क्यों नहीं बोला? क्यों? खंडन

1029
01:12:32,400 --> 01:12:36,640
बहुत सारे लोग कर रहे हैं। पर किसका खंडन करना आवश्यक है, किसके विरुद्ध

1030
01:12:36,640 --> 01:12:41,360
बोलना आवश्यक है? देखा हमने। तुम्हारे ही विषय में ले लो। बहुत अच्छा याद आया।

1031
01:12:41,360 --> 01:12:45,520
तुम कह रहे हो कि अमुक आचार्य ने अमुक आचार्य का वो किया। तुमने कुछ नहीं कहा। अरे

1032
01:12:45,520 --> 01:12:49,680
भैया तुम तुम्हारे लिए भी तो हम तीन चार साल से कुछ नहीं बोल रहे थे।

1033
01:12:49,680 --> 01:12:54,080
तुम कर रहे थे ना बुद्ध। बुद्ध का खंडन और शबरी का खंडन हमने बनाया क्या वीडियो तुम्हारा?

1034
01:12:54,080 --> 01:12:58,320
क्योंकि तुम्हारे लिए वो व्यक्ति नहीं थे जिसका अह

1035
01:12:58,320 --> 01:13:02,800
जिसका विरोध करके कुछ लाभ प्राप्त हो। बल्कि हानि

1036
01:13:02,800 --> 01:13:04,160
ही होगी। यह हमारी

1037
01:13:04,160 --> 01:13:08,400
सोच थी। क्यों? क्योंकि वर्णाश्रमी हो। परंपरा प्राप्त

1038
01:13:08,400 --> 01:13:12,560
आचार्यों में निष्ठा है तुम्हारी। इसलिए हम मौन रहते थे। ठीक है थोड़ा बहुत अपना

1039
01:13:12,560 --> 01:13:17,600
खेलना है खेलने दो। चोट मिंट थोड़ा सा करने दो लॉलीपॉप बाजी।

1040
01:13:17,600 --> 01:13:21,600
मौन रहते थे। कहां बोला? यह तो सबसे बड़ा उदाहरण है।

1041
01:13:21,600 --> 01:13:25,920
तब बोला जब तुम्हारा जो पानी है सर से ऊपर निकल गया। व्यक्तिगत

1042
01:13:25,920 --> 01:13:30,640
नाम ले लेकर के पास उड़ाने लगे। चीजें बोलने लगे तब बोलना पड़ा।

1043
01:13:30,640 --> 01:13:35,040
अगर ऐसा ना करते तो हम बुद्ध और जो शास्त्रीय

1044
01:13:35,040 --> 01:13:40,640
विषय थे उसमें हमने तुमको कभी नहीं बोला था। यद्यपि उसका खंडन हम कर देंगे।

1045
01:13:40,640 --> 01:13:45,360
यद्यपि उसका खंडन कर देंगे वो बहुत आसान है। मत सोचना कि कोई कठिन है।

1046
01:13:45,360 --> 01:13:49,680
जो उसमें तुमने दो एक बातें बोली वो कुछ नहीं है। टटपुंजिया

1047
01:13:49,680 --> 01:13:53,680
बातें हैं। परंतु शास्त्रों की लड़ाई वो थी। अगर

1048
01:13:53,680 --> 01:13:57,760
हम तुम्हारा कर्पात्री जी वाले विषय में बुद्ध और शबरी के खंडन वाले में

1049
01:13:57,760 --> 01:14:01,840
हम तुम्हारा विरोध करते। वह होती है शास्त्रों की लड़ाई। जो लोग यह कहते हैं कि

1050
01:14:01,840 --> 01:14:06,880
शास्त्रज्ञा शास्त्र हमारे और तुम्हारे बीच में शास्त्र लड़ाई हुई नहीं। हां

1051
01:14:06,880 --> 01:14:11,200
जब ये चीजें आ गई है कि तुम भैया करपात्री

1052
01:14:11,200 --> 01:14:15,280
जी का खंडन जब दूसरी ओर से लड़ाई शुरू हो गई तो बुद्ध और शबरी के विषय में भी हम दे

1053
01:14:15,280 --> 01:14:19,520
देंगे। यद्यपि वो इतना महत्वपूर्ण विषय नहीं है हमारे लिए।

1054
01:14:19,520 --> 01:14:23,840
जब तक आर्य समाज जैसे इस जैसे सनातनाभाष

1055
01:14:23,840 --> 01:14:28,000
तंत्र रामपाल जैसे सनातना भाष तंत्र जो कि

1056
01:14:28,000 --> 01:14:32,080
शास्त्रों के आधार पे और हर प्रकार से

1057
01:14:32,080 --> 01:14:36,080
सनातन धर्म को क्षति पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में एक

1058
01:14:36,080 --> 01:14:40,160
तटपुंजिए के द्वारा दो विषयों में शंकराचार्य का

1059
01:14:40,160 --> 01:14:44,480
करपात्री जी का विरोध कर देने पर कर देने से हमें क्या

1060
01:14:44,480 --> 01:14:48,640
लाभ मिल जाएगा जब तक वो लोग हैं। हम पहले उनको देखें ना

1061
01:14:48,640 --> 01:14:50,960
भाई।

1062
01:14:50,960 --> 01:14:55,040
यह हमने चुना कि भागवतानंद का

1063
01:14:55,040 --> 01:14:59,120
विरोध करने से हमें क्या मिलेगा और ना करने से क्या मिलेगा।

1064
01:14:59,120 --> 01:15:03,600
करने से जो भागवतानंद को फॉलो करने वाले वर्णाश्रमी परंपरानिष्ठ

1065
01:15:03,600 --> 01:15:07,760
हैं उनका विरोध मिलेगा। और ना करने

1066
01:15:07,760 --> 01:15:12,080
से क्या मिलेगा? उनका भी समर्थन मिलेगा। और उस समर्थन के द्वारा हम

1067
01:15:12,080 --> 01:15:16,800
इन विधर्मी इन सनातना वासी तत्वों से लड़ेंगे। हम मौन रहे।

1068
01:15:16,800 --> 01:15:20,880
शास्त्रोक्त वाली बात में हमने नहीं बोला था। अब तुमने मजबूर किया कि

1069
01:15:20,880 --> 01:15:25,200
हम बोलेंगे। हर तरह से तुमको तुम्हारा जो वो है ना पोस्टमार्टम

1070
01:15:25,200 --> 01:15:29,520
पोस्टमार्टम करते हो ना हर तरह से पोस्टमार्टम करेंगे। अभी निग्रह निकास का आई है।

1071
01:15:29,520 --> 01:15:33,760
तुम्हें निगमानंद का चैप्टर खुल गया है। तुम्हारे वाकलन का चैप्टर खुल गया है।

1072
01:15:33,760 --> 01:15:34,880
और अनेकानेक

1073
01:15:34,880 --> 01:15:38,960
प्रकार से ये सब सिद्ध उसमें हो गया है। स्पष्ट हो गया है कि तुम्हारी

1074
01:15:38,960 --> 01:15:43,360
परंपरा कोई है ही नहीं। तुम्हारी जो बामा खेपा जी की परंपरा

1075
01:15:43,360 --> 01:15:47,920
है वह तंत्र मार्ग वाली ऐसा समझ में आता है।

1076
01:15:47,920 --> 01:15:52,480
निगमानंद जी के जो तंत्र मार्ग के गुरु हैं बामा खेपा इत्यादि

1077
01:15:52,480 --> 01:15:56,560
ठीक है। तंत्र मार्ग में तो रामायण है नहीं। तंत्र मार्ग

1078
01:15:56,560 --> 01:16:01,520
में तो महाभारत है नहीं। तंत्र मार्ग में तो ब्रह्मसूत्र है नहीं।

1079
01:16:01,520 --> 01:16:05,680
तो ये सब चीजें कहां से हैं? ये सब चीजें निगमंद

1080
01:16:05,680 --> 01:16:09,840
जी के पास आ रही हैं। शंकर परंपरा से। तो शंकर परंपरा

1081
01:16:09,840 --> 01:16:14,000
का विरोध तुम नहीं कर सकते। करोगे तो फिर यह शास्त्र की प्रमाणिकता पर सवाल

1082
01:16:14,000 --> 01:16:18,000
हो जाएगा। यह सबसे बड़ा है। बाकी तुम्हें शास्त्रों के आधार पर भी दे देंगे।

1083
01:16:18,000 --> 01:16:22,320
बुद्ध और शबरी का खंडन जो तुमने किया। ठीक है? तो सेलेक्टिव पॉलिटिक्स

1084
01:16:22,320 --> 01:16:26,400
मत करो और जो आरोप है उन पर ध्यान दो। जो शिकायतें उन पर ध्यान दो। क्या

1085
01:16:26,400 --> 01:16:30,560
की गई है? क्या की गई है? कि सार्वजनिक रूप से असिद्ध आरोपों

1086
01:16:30,560 --> 01:16:34,640
का के आधार पर विरोध, उपहास पुरानी बातों को

1087
01:16:34,640 --> 01:16:40,640
लेकर के किसी की टांग खींचना और किसी का समर्थन करना। और

1088
01:16:40,640 --> 01:16:44,960
गाली निंदनीय भाषा का प्रयोग करना यह सब आपत्ति है।

1089
01:16:44,960 --> 01:16:48,960
इन पर बात तुम जो है अयोध्या आकर के कर सकते हो विद्या भास्कर

1090
01:16:48,960 --> 01:16:50,320
जी के समक्ष।

1091
01:16:50,320 --> 01:16:54,320
ठीक है? और सेलेक्टिव पॉलिटिक्स मत करो। जिन आचार्यों

1092
01:16:54,320 --> 01:16:58,320
का समर्थन प्राप्त है। यदि तुम्हारे अनुसार हर बात में बोलना आवश्यक है तो

1093
01:16:58,320 --> 01:17:02,320
उनसे भी कहो कि हर बात में बोले। पूरी ज्योतिष पीठ वाले महाराज से

1094
01:17:02,320 --> 01:17:06,640
कहो बोले और यदि अन्यथा

1095
01:17:06,640 --> 01:17:10,880
उसमें देखने की कोशिश करो कि आचार्य कहां पर बैठे होते हैं कहां पर उन्हें बोलना

1096
01:17:10,880 --> 01:17:15,120
होता है उन्हें असहज स्थिति में मत डालो हम नहीं चाहते कि डालो परंतु

1097
01:17:15,120 --> 01:17:19,360
तुम्हारा सिद्धांत यदि यह है कि हर हर स्थिति में हर प्रश्न का जवाब देना है

1098
01:17:19,360 --> 01:17:23,360
तो फिर सबसे बोलो फिर वहां से एक्टिव मत करो और इन

1099
01:17:23,360 --> 01:17:27,840
सबसे भी पहले निगमंद का पहले पोस्टमार्टम करो

1100
01:17:27,840 --> 01:17:31,840
बाकी हम तो कर ही रहे हैं सभी को जय श्री राम।
