1
00:00:02,480 --> 00:00:06,720
हैदर जी बोले जी भैया मैं

2
00:00:06,720 --> 00:00:10,800
एक लिटरेचर पढ़ रहा था तो उसमें ये लिखा हुआ था जैसा अन्न वैसा मन ठीक

3
00:00:10,800 --> 00:00:14,960
है तो मैं ये जानना चाहता हूं कि हमारा जो

4
00:00:14,960 --> 00:00:19,520
बेसिक मील्स मतलब खाना जो होता है हमारा उससे हमारे

5
00:00:19,520 --> 00:00:23,600
मतलब आध्यात्मिक और बौद्धिक ये दोनों में क्या फर्क

6
00:00:23,600 --> 00:00:27,840
पड़ता है क्योंकि अगर आदमी को आध्यात्मिक तौर पर आगे जाना है

7
00:00:27,840 --> 00:00:33,040
तो फिर बौद्धिक तौर पे क्या-क्या चीजें चेंज करनी पड़ती है?

8
00:00:33,040 --> 00:00:37,040
समझ पाए आप मेरी बात? मैं समझ रहा हूं। मैं समझ रहा हूं। बस बस हां बस यही

9
00:00:37,040 --> 00:00:41,040
पूछना चाहता था। आप मुझे बताएं इसके बारे में थोड़ा बहुत। ऐसा होता

10
00:00:41,040 --> 00:00:45,120
है ये बात हम कई बार आपको बता चुके

11
00:00:45,120 --> 00:00:49,120
हैं। हम कि हमारी कर्मेंद्रियों से मिलने

12
00:00:49,120 --> 00:00:53,120
वाली जो सूचनाएं हैं वो लगातार

13
00:00:53,120 --> 00:00:57,600
हमें बता रही हैं कि दुनिया में कोई मोक्ष नहीं है।

14
00:00:57,600 --> 00:01:03,280
कर्मेंद्रियां यानी कि 5 अप्रैल

15
00:01:03,280 --> 00:01:07,440
जितने भी कर्म करने वाले हमारे हम जिनसे काम

16
00:01:07,440 --> 00:01:11,600
करते हां जिससे हम देखते हैं सुनते

17
00:01:11,600 --> 00:01:16,400
हैं छूते हैं सूंघते हैं

18
00:01:16,400 --> 00:01:18,000
है ना बोलते

19
00:01:18,000 --> 00:01:20,160
हैं

20
00:01:20,160 --> 00:01:24,160
तो जो कर्मेंद्र्रियों के द्वारा मिलने

21
00:01:24,160 --> 00:01:29,760
वाली जो हमारी सूचनाएं हैं वह लगातार हमें यह बता रही है

22
00:01:29,760 --> 00:01:34,720
इस भौतिक जगत से जोड़ रही है वह हमें जी

23
00:01:34,720 --> 00:01:40,720
और भौतिक जगत से जोड़ने के कारण

24
00:01:41,360 --> 00:01:45,680
हमें यह सूचना देने का प्रयास कर रही है। हमें विश्वास दिला देने का प्रयास

25
00:01:45,680 --> 00:01:49,760
कर रही है कि ईश्वर नहीं है।

26
00:01:49,760 --> 00:01:53,920
ना ही मोक्ष की कोई स्थिति है। तुम मुक्त नहीं हो

27
00:01:53,920 --> 00:01:58,480
सकते। तुम सत स्वरूप नहीं हो सकते। तुम सच्चिदानंद नहीं हो सकते।

28
00:01:58,480 --> 00:02:02,640
तुम सच्चिदानंद को प्राप्त नहीं कर सकते। ईश्वर को प्राप्त नहीं

29
00:02:02,640 --> 00:02:07,040
कर सकते। बार-बार बार-बार जितनी बार वो कर्मेंद्रियां प्रभावित

30
00:02:07,040 --> 00:02:11,600
होती हैं, उतनी बार वो आपको

31
00:02:11,600 --> 00:02:15,840
कर्मेंद्रियां ही क्यों? ज्ञानेंद्रियां भी कर्मेंद्रियों के द्वारा मिलने

32
00:02:15,840 --> 00:02:20,560
वाला जो ज्ञानेंद्रियां हो गई ये क्या होता है? ज्ञानेंद्रियां

33
00:02:20,560 --> 00:02:24,720
जिसके द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जाता है। ओके। सूचना

34
00:02:24,720 --> 00:02:27,920
प्राप्त की जाती है। जैसे

35
00:02:27,920 --> 00:02:32,880
अह जैसे कर्म इंद्र हो गए। जैसे हम हाथ से लिखेंगे,

36
00:02:32,880 --> 00:02:33,380
किसी

37
00:02:33,200 --> 00:02:37,360
को छुएंगे। ज्ञान इंद्र हो गई। जैसे कोई सूचना केवल प्राप्त करेंगे। जैसे

38
00:02:37,360 --> 00:02:42,240
कान कान से केवल सूचना प्राप्त कर रहे हैं और

39
00:02:42,240 --> 00:02:46,720
आंख आंख से केवल सूचना प्राप्त कर रहे हैं। हम

40
00:02:46,720 --> 00:02:51,040
जी

41
00:02:51,040 --> 00:02:55,840
तो

42
00:02:55,840 --> 00:02:59,840
अ ये हमें बार-बार

43
00:02:59,840 --> 00:03:04,080
भौतिक दुनिया से जोड़ती है। इसीलिए कर्मेंद्र्रियों

44
00:03:04,080 --> 00:03:08,960
के लिए फर्स्ट ऑफ ऑल जी

45
00:03:08,960 --> 00:03:13,680
कार्य बताए गए हैं कि आप

46
00:03:13,680 --> 00:03:18,160
कोई भी कार्य कर कार्य करो तो ऐसे करो ऐसे करो

47
00:03:18,160 --> 00:03:22,400
है ना ताकि वो हमें जोड़ ना ताकि उसका

48
00:03:22,400 --> 00:03:26,720
जो कनेक्शन वो आपका उधर जुड़ रहा है प्रपंच रूपी संसार में

49
00:03:26,720 --> 00:03:30,720
जी वो कम होता चला जाए अब कुछ लोग कहते हैं जो

50
00:03:30,720 --> 00:03:33,840
व्यक्ति

51
00:03:33,840 --> 00:03:38,160
शिख नहीं करेगा शिख नहीं बांधेगा उसको क्या दर्शन नहीं देंगे?

52
00:03:38,160 --> 00:03:42,240
उसको क्या भगवान नहीं मिलेंगे? मैं पूछता हूं जो व्यक्ति शौच

53
00:03:42,240 --> 00:03:47,040
से आने के बाद हाथ नहीं धोएगा उसको क्या भगवान नहीं मिलेंगे?

54
00:03:47,040 --> 00:03:51,840
जी। मगर ये एक कर्मेंद्र द्वारा किया गया निग्रह है।

55
00:03:51,840 --> 00:03:56,160
आपका अपने ऊपर कंट्रोल किया। आपने वापस आए तो आपने

56
00:03:56,160 --> 00:04:00,160
हाथों को स्वच्छ किया। है ना? ये डिमांड

57
00:04:00,160 --> 00:04:04,240
है ना जी। कि भाई नहा धोकर पूजा करें।

58
00:04:04,240 --> 00:04:08,480
ऐसा करें वैसा करें तो आपके कर्मेंद्रियों

59
00:04:08,480 --> 00:04:12,880
को एक निश्चित कर्म में लगाया गया जिसका परवसान किस में हो

60
00:04:12,880 --> 00:04:17,120
जिसका परवसान आपके शरीर का इस

61
00:04:17,120 --> 00:04:21,440
योग बन इस योग्य बन जाने में हो

62
00:04:21,440 --> 00:04:24,000
कि वो

63
00:04:24,000 --> 00:04:24,500
जो

64
00:04:24,320 --> 00:04:28,480
यह सरलता से भौतिक प्रपंच रूपी

65
00:04:28,480 --> 00:04:32,720
संसार जो आपको झुठलाने में लगा है आपके

66
00:04:32,720 --> 00:04:36,800
समक्ष भगवान भगवान के अस्तित्व को उसका प्रभाव

67
00:04:36,800 --> 00:04:40,880
कम रहे आपके शरीर पर और जो दिव्य ज्ञान है अध्यात्म का ज्ञान

68
00:04:40,880 --> 00:04:44,960
है जो प्रज्ञा शक्ति है आपकी वो

69
00:04:44,960 --> 00:04:49,680
इतनी सामर्थ्यवान हो जाए कि वो इस ज्ञान को

70
00:04:49,680 --> 00:04:54,560
ले सके इस ज्ञान के इस ज्ञान को समझ सके

71
00:04:54,560 --> 00:04:59,200
और उसका वो जो उधर वाला प्रभाव है वो कम हो सके इसलिए

72
00:04:59,200 --> 00:05:03,440
यह सारे कर्तव्य कर्म निश्चित किए गए हैं कि अपने शरीर

73
00:05:03,440 --> 00:05:07,680
को काम में लगाए रहो। जीवा को राम राम बोलने में लगाए

74
00:05:07,680 --> 00:05:11,760
रहो। है ना? इतनी बार तो दिन भर में बोल

75
00:05:11,760 --> 00:05:14,080
ही दो।

76
00:05:14,080 --> 00:05:18,160
हम उसका प्रभाव कर्म ज्ञानेंद्रियों पर पड़ जाएगा।

77
00:05:18,160 --> 00:05:21,520
वो उसी तरह का ज्ञान

78
00:05:21,520 --> 00:05:25,520
बटोरने लगेंगी। फिर हर जगह राम को देखने लगेंग। हर

79
00:05:25,520 --> 00:05:29,520
जगह राम को सुनने लगेंगी। सदा चिंतन चलने

80
00:05:29,520 --> 00:05:34,720
लगेगा राम का। यह तो रही है बात कि हम

81
00:05:34,720 --> 00:05:39,520
कर्मेंद्रियों का निग्रह हमें क्यों बताया जाता है। अब जैसा कि आपने कहा कि

82
00:05:39,520 --> 00:05:43,600
भोजन हम भोजन का

83
00:05:43,600 --> 00:05:47,600
प्रभाव कैसे पड़ता है कि मैंने आपको बताया

84
00:05:47,600 --> 00:05:52,240
था ना कि छिपाने वाला कर्म जो होता है

85
00:05:52,240 --> 00:05:54,400
जी

86
00:05:54,400 --> 00:05:56,800
वो

87
00:05:56,800 --> 00:06:01,440
हमारी प्रज्ञा शक्ति पर चोट पहुंचाता है। जितनी बार छिपाएंगे

88
00:06:01,440 --> 00:06:05,440
दिन भर में उतनी बार हमारी प्रज्ञा

89
00:06:05,440 --> 00:06:09,520
शक्ति प्रभावित होती है। तो स्वयं को ऐसा

90
00:06:09,520 --> 00:06:13,760
बनाएं जीवन में कि हम कम से कम छिपाए।

91
00:06:13,760 --> 00:06:19,760
इसीलिए शास्त्रों के अनुसार

92
00:06:20,320 --> 00:06:24,560
सन्यास आश्रम को सबसे सम्मानित और सबसे

93
00:06:24,560 --> 00:06:28,640
बड़े पद पर रखा गया है। क्यों? क्योंकि सभी आश्रमों में

94
00:06:28,640 --> 00:06:32,640
सन्यास आश्रम वो आश्रम है जिसमें कि व्यक्ति का

95
00:06:32,640 --> 00:06:36,800
जीवन अत्यंत पारदर्शी होता है। जी

96
00:06:36,800 --> 00:06:40,880
और आप देखिए दुनिया के सभी पाप छिपाने ना छिपाने

97
00:06:40,880 --> 00:06:46,880
पर टिके हैं। इसके साथ ही साथ अ

98
00:06:48,880 --> 00:06:53,360
यहां तक कि

99
00:06:53,360 --> 00:06:57,520
पूरी तरह फॉलो नहीं भी कर पाया। मगर जहांजहां पे फॉलो

100
00:06:57,520 --> 00:07:02,240
किया है, जहांजहां पे कुछ वैदिक

101
00:07:02,240 --> 00:07:06,480
पकड़ रह पाई तो कुरान में भी इतना

102
00:07:06,480 --> 00:07:12,240
तो है ही कुफ्र ना करो कुफ्र।

103
00:07:12,240 --> 00:07:16,320
अब कुफ्र का मीनिंग क्या है? एक पर्टिकुलर मीनिंग

104
00:07:16,320 --> 00:07:20,400
तो ये निकाला जाता है कि भाई जो संदेश भेजा गया है

105
00:07:20,400 --> 00:07:24,400
जी। ईश्वर के द्वारा उस संदेश को मत

106
00:07:24,400 --> 00:07:28,800
झुठलाओ। उससे मत मना करो। यानी कि उसको

107
00:07:28,800 --> 00:07:32,960
मत छुपाओ संसार से। यही तो है

108
00:07:32,960 --> 00:07:37,760
जी बिल्कुल। और कुफ्र कुफ्र का और

109
00:07:37,760 --> 00:07:42,480
विश्लेषण क्या है? छिपाओ मत।

110
00:07:42,480 --> 00:07:46,960
कुफ्र मत करो का अर्थ हो गया छिपाओ मत। तो किस पर खड़ा हुआ है? फिर वो

111
00:07:46,960 --> 00:07:52,960
वहां पर भी छिपाने पर ही खड़ा हुआ है। तो

112
00:07:53,440 --> 00:07:59,040
जब हम कोई गलत कार्य करते हुए

113
00:07:59,040 --> 00:08:03,920
कोई भोजन प्राप्त बना हुआ भोजन

114
00:08:03,920 --> 00:08:08,720
गलत यानी छिपाने वाला कर्म करते हुए

115
00:08:08,720 --> 00:08:09,280
बनाया

116
00:08:09,280 --> 00:08:14,080
गया भोजन प्राप्त किया गया भोजन जब हम ग्रहण करते हैं

117
00:08:14,080 --> 00:08:18,640
तो फिर वह हमारे चित्त में आ जाता है वह दोष

118
00:08:18,640 --> 00:08:22,880
जैसे कोई गाली बकरा है और साथ में वह समोसे तल

119
00:08:22,880 --> 00:08:27,440
रहा है और हमने जाके वह समोसा खाया

120
00:08:27,440 --> 00:08:31,520
तो गाली बकते हुए उसने किया है तो वह दोष उसमें समोसे में

121
00:08:31,520 --> 00:08:35,040
भी अनाज में आ गया

122
00:08:35,040 --> 00:08:39,360
और फिर वो आपके पास गया तो आपके पास भी आ गया वो दोष

123
00:08:39,360 --> 00:08:43,680
तो आपके चित्त में अशुद्धि आई

124
00:08:43,680 --> 00:08:47,760
प्रज्ञा शक्ति जो आप स्ट्रांग कर रहे थे आप उस पर

125
00:08:47,760 --> 00:08:52,160
वर्क कर रहे थे कि आपकी प्रज्ञा शक्ति दिन प्रतिदिन

126
00:08:52,160 --> 00:08:56,160
वो इतनी योग्य हो सके कि आप जो है यह

127
00:08:56,160 --> 00:09:00,240
सत्य के ज्ञान को वह ज्ञान भगवत गीता में जो कहा गया है जिसको

128
00:09:00,240 --> 00:09:04,400
जान लेने के बाद कुछ और जानना बाकी नहीं रह जाता उस ज्ञान

129
00:09:04,400 --> 00:09:08,400
को ग्रहण करने योग्य आप बन पाए तो उसमें बाधा आती

130
00:09:08,400 --> 00:09:12,400
है। इसीलिए ऐसा कहा गया है कि

131
00:09:12,400 --> 00:09:16,480
बाहर का खाइए ही मत। कोई विषम परिस्थिति

132
00:09:16,480 --> 00:09:20,480
पड़ गई तो बात अलग है। मगर

133
00:09:20,480 --> 00:09:24,480
ज्योतिष पीठ वाले जो महाराज जी हैं अब मुक्तेश्वर जी उनकी एक

134
00:09:24,480 --> 00:09:28,560
दिन की

135
00:09:28,560 --> 00:09:32,720
जनेऊ और चोटी और घर की रोटी ऐसे वो किसी इंटरव्यू

136
00:09:32,720 --> 00:09:37,840
में बोल रहे थे। है ना? अच्छा।

137
00:09:37,840 --> 00:09:42,000
तो इसीलिए कि कोई व्यक्ति पता नहीं किस मंशा के

138
00:09:42,000 --> 00:09:46,320
साथ मन में विचार करता हुआ गाली बकता हुआ

139
00:09:46,320 --> 00:09:50,640
कुछ और के जूते पहन के करता हुआ गलत

140
00:09:50,640 --> 00:09:55,040
तरीके से वहां पर आचार विचार प्रकट करते हुए और

141
00:09:55,040 --> 00:09:59,840
खाना जब बनाएगा तो उस खाने में

142
00:09:59,840 --> 00:10:04,080
दोष आएगा। वह दोष आपके पास भी आ जाएगा।

143
00:10:04,080 --> 00:10:08,160
उपनिषदों के अनुसार जो जीव का जन्म होता

144
00:10:08,160 --> 00:10:13,760
है वह अन्न से ही होता है। भगवत गीता में भी अन्न से ही लिखा है जन्म।

145
00:10:13,760 --> 00:10:17,920
मतलब अन्न से अन्न आता है बारिश के द्वारा।

146
00:10:17,920 --> 00:10:22,000
अन्न उपजता है और फिर वो अन्न हमारे शरीर में

147
00:10:22,000 --> 00:10:28,000
जाता है। वही एक दिन जीव का रूप धारण करता है।

148
00:10:29,680 --> 00:10:35,440
जो प्राण जो मनुष्य बन के जन्म लेता है ना

149
00:10:35,440 --> 00:10:39,440
तो इसलिए अनाज का बहुत महत्व है। जितना साफ सुथरा जितना

150
00:10:39,440 --> 00:10:43,520
अच्छे मन से बनाया हुआ भोजन आप ग्रहण

151
00:10:43,520 --> 00:10:47,760
करेंगे उतना ही आपका जो मन है

152
00:10:47,760 --> 00:10:52,160
वो बलिष्ठ रहेगा योग्य रहेगा और

153
00:10:52,160 --> 00:10:54,320
जितना

154
00:10:54,320 --> 00:10:58,400
आप बिना ध्यान दिए कुछ भी खा लेंगे तो

155
00:10:58,400 --> 00:11:04,320
कई ज्यादातर चांसेस है कि उसमें तामस प्रवृत्ति ज्यादा रहेगी।

156
00:11:04,320 --> 00:11:08,400
जी तामस यानी कि छिपाने वाली छिपाने वाली रहेगी तो

157
00:11:08,400 --> 00:11:13,280
क्या रहेगा या आपकी प्रज्ञा शक्ति घटती जाएगी

158
00:11:13,280 --> 00:11:15,920
जी

159
00:11:15,920 --> 00:11:21,280
जी बोले किरण दास

160
00:11:21,280 --> 00:11:25,680
जी भैया भैया ये प्रश्न भगवत गीता से है

161
00:11:25,680 --> 00:11:29,920
जैसे उसमें हम चर्चा देखते हैं भगवान कृष्ण अर्जुन

162
00:11:29,920 --> 00:11:34,000
के बीच तो जब वो आत्मा के शाश्वत और सनातन होने

163
00:11:34,000 --> 00:11:38,160
की बात बताते हैं। जिसमें वो कहते हैं कि युद्ध करना ही तेरा धर्म

164
00:11:38,160 --> 00:11:42,240
है। स्वधर्म है। और क्योंकि तुझे जो लगता है कि तू

165
00:11:42,240 --> 00:11:46,480
किसी को मार रहा है वास्तव में ना कोई किसी के द्वारा मारता है ना मारा जाता है। फिर

166
00:11:46,480 --> 00:11:50,880
वह भगवान कृष्ण ऐसे भी कहते हैं कि यदि तुझे लगता है कि

167
00:11:50,880 --> 00:11:54,960
शरीर रूपी देहात्मा है तो उसका तो मरना

168
00:11:54,960 --> 00:11:58,960
निश्चित ही है क्योंकि जन्म हुआ है तो मरेगा ही। तो इस विचार से भी तुझे युद्ध ही करना

169
00:11:58,960 --> 00:12:03,280
चाहिए। तो ऐसे दो विकल्प क्यों देते हैं विचार करने के भगवान

170
00:12:03,280 --> 00:12:08,720
कृष्ण ये प्रश्न था भैया

171
00:12:08,720 --> 00:12:14,720
हां भैया अरे मैं इतनी देर से बोल रहा था

172
00:12:15,440 --> 00:12:19,360
जी भैया वो ऑडिबल ही नहीं था

173
00:12:19,360 --> 00:12:22,400
अच्छा ठीक है

174
00:12:22,400 --> 00:12:26,400
तो तभी मैं बार-बार बीच में पूछ रहा था

175
00:12:26,400 --> 00:12:30,400
ना कि ऐसा वैसा तो कोई रिप्लाई नहीं मिल रहा था। फिर ध्यान

176
00:12:30,400 --> 00:12:35,360
दिया तो माइक जो है मेरा ऑफ। खैर

177
00:12:35,360 --> 00:12:39,600
देखिए एक तरफ भगवान ने बताया है कि क्योंकि आत्मा नित्य

178
00:12:39,600 --> 00:12:43,760
है। उसको कोई कुछ नहीं कर सकता। जो वास्तविक स्वरूप है हमारा

179
00:12:43,760 --> 00:12:47,920
वो आत्मा है और आत्मा नित्य है। पहले थी

180
00:12:47,920 --> 00:12:51,920
अब भी है और आगे भी रहेगी। अविनाशी है। तो दो 17

181
00:12:51,920 --> 00:12:55,920
से लेकर के 2 31 तक भगवान ने यही बताया है कि आत्मा

182
00:12:55,920 --> 00:13:00,000
को कुछ नहीं हो सकता। तो तू फिर यह क्या दिखावे का मरने का

183
00:13:00,000 --> 00:13:04,080
शोक कर रहा है कि मैं नहीं मारूंगा। पहली बात और यदि

184
00:13:04,080 --> 00:13:08,080
तू इनको शरीर ही समझ रहा है, आत्मा के गुण को नहीं

185
00:13:08,080 --> 00:13:12,240
जान पा रहा है, शरीर से ही देख रहा है तो तुझे इतना तो मानना

186
00:13:12,240 --> 00:13:16,480
पड़ेगा ना कि ये पहले नहीं थे, अभी सिर्फ है और आगे

187
00:13:16,480 --> 00:13:21,680
भी नहीं होंगे। यानी अगर तू इनको नहीं भी मारेगा

188
00:13:21,680 --> 00:13:24,560
तो

189
00:13:24,560 --> 00:13:30,560
मैं आगे मृत्यु तो अपना ग्रास बनाएगी ना इन्हें

190
00:13:31,040 --> 00:13:35,280
जी तो इस दृष्टिकोण से भी अगर तू शरीर को ही देख रहा है

191
00:13:35,280 --> 00:13:39,440
आत्मा के गुण को नहीं पहचान रहा है तो तुझे मानना पड़ेगा

192
00:13:39,440 --> 00:13:43,680
कि अगर आज तू इनको नहीं मारता है तो आगे चलकर के मरेंगे

193
00:13:43,680 --> 00:13:48,000
ही इनकी मृत्यु निश्चित है तेरे ना मारने

194
00:13:48,000 --> 00:13:54,000
से ऐसा तो है नहीं कि अमर हो जाएंगे कभी नहीं मरेंगे और

195
00:13:58,640 --> 00:14:02,880
तो इसका अर्थ क्या है कि अगर शरीर की दृष्टि से भी देख तो तेरा

196
00:14:02,880 --> 00:14:07,120
चिंता करना व्यर्थ है। तो ये ये लाइन भी भगवत गीता में आई

197
00:14:07,120 --> 00:14:11,120
है कि यह पहले थे पहले नहीं थे

198
00:14:11,120 --> 00:14:15,120
आगे भी नहीं होंगे केवल बीच में ही है। तो ऐसे में

199
00:14:15,120 --> 00:14:19,280
तेरा व्यर्थ करना बेकार हो जाता है। तो शरीर के दृष्टिकोण

200
00:14:19,280 --> 00:14:23,280
से इसलिए व्यर्थ है क्योंकि धर्म की रक्षा के लिए तू इनको नहीं मार

201
00:14:23,280 --> 00:14:27,520
रहा है। जबकि आज नहीं तो कल ये लोग मरेंगे ही।

202
00:14:27,520 --> 00:14:31,680
और आत्मा के दृष्टिकोण से ये विकल्प है कि आत्मा तो नित्य है।

203
00:14:31,680 --> 00:14:35,760
यदि तू इनके वास्तविक गुण को समझ पा रहा है तो फिर तुझे शोक करने की चिंता

204
00:14:35,760 --> 00:14:39,840
नहीं है। ये दोनों विकल्प ऐसे कहते हैं भगवान।

205
00:14:39,840 --> 00:14:45,840
जी। ठीक है। जी भैया। समझ गए ना आप? जी

206
00:14:45,840 --> 00:14:51,520
भैया मैं कुछ पूछ सकता हूं। हां किरण जी बोले किरण

207
00:14:51,520 --> 00:14:55,520
भैया मेरा तीन दिनों से बहुत बुखार है। मैं बस एक प्रश्न पूछने के लिए

208
00:14:55,520 --> 00:14:59,520
आया था। बहुत अच्छा बहुत अच्छा।

209
00:14:59,520 --> 00:15:03,600
अच्छा ये है कि आप प्रश्न पूछने आए। यह नहीं कि आपको तीन दिन से बुखार

210
00:15:03,600 --> 00:15:07,360
है।

211
00:15:07,360 --> 00:15:12,320
भैया वो कहकर मतलब चला जाता हूं तो इसलिए हां

212
00:15:12,320 --> 00:15:16,720
मतलब वो जानकर मतलब चला जाऊंगा इसलिए बिल्कुल

213
00:15:16,720 --> 00:15:20,880
बिल्कुल बताएं प्रश्न बताएं। जी वो मेरा एक निजी था

214
00:15:20,880 --> 00:15:25,200
और यहां आपके कुछ बात सुनकर भी दो मतलब आए

215
00:15:25,200 --> 00:15:29,280
मन पर मन में। तो पहला एक ये

216
00:15:29,280 --> 00:15:33,280
था आपने जो कहा था कि यह जो

217
00:15:33,280 --> 00:15:37,760
मतलब क्या कहते हैं ना उसको हां जो छिपाने का भाव आता है या बताने

218
00:15:37,760 --> 00:15:41,840
का भाव आता है तो इस पर एक चिंतन किया था मैंने कि अगर

219
00:15:41,840 --> 00:15:45,920
समझ लीजिए कि एक बालक है जो

220
00:15:45,920 --> 00:15:49,920
चोटी रखता है या नहीं रखता तो अगर वो मंदिर में

221
00:15:49,920 --> 00:15:53,920
जाएगा या जो मतलब सद्गुरु या वो सब मतलब

222
00:15:53,920 --> 00:15:55,760
मतलब होते हैं ना जो आध्यात्मिक

223
00:15:55,760 --> 00:15:59,920
लोग तो उनके पास जाएगा तो उसको अगर मतलब दिखाएंगे उन

224
00:15:59,920 --> 00:16:04,000
लोगों को कि देखिए मेरा चोटी है तो उसको बहुत अच्छा लगेगा एक भाव आएगा कि हां मैम

225
00:16:04,000 --> 00:16:08,000
मैं उनको दिखाऊं परंतु अगर वो अपने दोस्तों के साथ अगर रहता है

226
00:16:08,000 --> 00:16:12,240
तो दोस्त उनका मजाक उड़ाएंगे तो उस वक्त वो उसको मतलब दिखाना

227
00:16:12,240 --> 00:16:16,400
नहीं चाहेगा कि नहीं भाई मेरे पास कोई चोटी नहीं है मैं भी तुम्हारे जैसा ही हूं या

228
00:16:16,400 --> 00:16:20,640
फिर अगर कोई गाली गलौज करता है तो मंदिर में या अच्छे जो लोग हैं उनके सामने

229
00:16:20,640 --> 00:16:24,640
गाली देने से वह मतलब गाली नहीं देता परंतु दोस्तों के सामने उसको देने में

230
00:16:24,640 --> 00:16:28,640
बहुत अच्छा लगता है और मजा आता तो अगर हम देखेंगे यह जो

231
00:16:28,640 --> 00:16:32,720
कार्य है कि ये जो छिपाने का भाव या

232
00:16:32,720 --> 00:16:36,880
बताने का जो भाव आता है उसका कारण तो व्यक्ति तो नहीं है

233
00:16:36,880 --> 00:16:40,960
वो स्थान और काल ही उसका कारण है ना पर वो खड़ा

234
00:16:40,960 --> 00:16:45,040
है अभी यही पर तो शास्त्र पर विश्वास आता है जिस

235
00:16:45,040 --> 00:16:49,280
आदमी को अपने शास्त्रों पर ईश्वर पर धर्म

236
00:16:49,280 --> 00:16:53,440
पर डंके की चोट पर विश्वास होगा वह अपनी चोटी को छुपाने

237
00:16:53,440 --> 00:16:57,760
के लिए उसके अंदर कभी भाव नहीं आएगा उसको लेकर के कभी उसको लज्जित

238
00:16:57,760 --> 00:17:01,760
फील नहीं होगा। डंके की चोट पर कह गए शिख मुझे कहां से मिली

239
00:17:01,760 --> 00:17:05,920
है? जहां ईश्वर का वह वचन हमें प्राप्त हुआ है। कर्मवादी

240
00:17:05,920 --> 00:17:10,320
कारस्ते मा फले कदाचना। ये चोटी हमें कहां से मिली है?

241
00:17:10,320 --> 00:17:11,200
जहां

242
00:17:11,200 --> 00:17:15,200
रामो विग्रहवान हमें मिला है। तो जिसको

243
00:17:15,200 --> 00:17:19,280
अपने शास्त्रों के प्रति निष्ठा होगी, श्रद्धा होगी, वह अपनी शिख,

244
00:17:19,280 --> 00:17:23,440
सूत्र इत्यादि को लेकर के कभी भी लज्जित अनुभव

245
00:17:23,440 --> 00:17:27,600
नहीं कर सकता। इसीलिए आवश्यक है कि आपकी ईश्वर में

246
00:17:27,600 --> 00:17:31,840
निष्ठा हो और उससे पहले आवश्यक है कि आपकी

247
00:17:31,840 --> 00:17:36,480
सत्य की खोज में निष्ठा हो और उससे भी पहले आवश्यक है कि

248
00:17:36,480 --> 00:17:40,720
आपकी आपकी आत्मा की आवाज में निष्ठा हो।

249
00:17:40,720 --> 00:17:44,720
कहते हैं ना कि मूर्ख

250
00:17:44,720 --> 00:17:48,880
को ज्ञान नहीं देना चाहिए।

251
00:17:48,880 --> 00:17:53,280
या फिर इस तरह के कई वाक्य आते हैं कि जो व्यक्ति अडियल

252
00:17:53,280 --> 00:17:57,280
टाइप का हो और

253
00:17:57,280 --> 00:18:01,360
मतलब या जो व्यक्ति समझना ना चाहता हो या जो व्यक्ति

254
00:18:01,360 --> 00:18:05,440
मूर्ख हो मूढ़मती हो उसको ज्ञान नहीं देना चाहिए तो

255
00:18:05,440 --> 00:18:09,920
मूढ़ मति ये कुपात्र को नहीं देना चाहिए है ना

256
00:18:09,920 --> 00:18:13,920
जो उसके योग्य ना हो उसको नहीं देना चाहिए अब योग्य कौन नहीं

257
00:18:13,920 --> 00:18:17,920
है अच्छा हर व्यक्ति या अश्रद्धावान

258
00:18:17,920 --> 00:18:22,480
हो श्रद्धावान को देना चाहिए अश्रद्धावान हो उसको नहीं देना चाहिए ज्ञान

259
00:18:22,480 --> 00:18:26,800
शास्त्र का धर्म धर्म का ब्रह्म का अच्छा तो

260
00:18:26,800 --> 00:18:30,800
यहां पर बात आती है कि फिर भाई अश्रद्धावान व्यक्ति तो

261
00:18:30,800 --> 00:18:35,600
हर वो व्यक्ति है जो ज्ञान मिलने से पहले तक

262
00:18:35,600 --> 00:18:41,120
अज्ञानी है तो वो अश्रद्धावान ही है हर दूसरा

263
00:18:41,120 --> 00:18:45,760
हर दूसरा व्यक्ति हर दूसरा व्यक्ति क्या हर पहला व्यक्ति अश्रद्धावान

264
00:18:45,760 --> 00:18:50,080
है शास्त्रों के प्रति तो फिर फिर किसको

265
00:18:50,080 --> 00:18:54,160
देने की बात यहां पे की गई है किसके प्रति श्रद्धा भाई भाई श्री कृष्ण

266
00:18:54,160 --> 00:18:58,240
के प्रति श्रद्धा तो तब आएगी ना जब व्यक्ति श्री कृष्ण को

267
00:18:58,240 --> 00:19:00,560
जानेगा।

268
00:19:00,560 --> 00:19:04,560
कम से कम नाम और मूर्ति विग्रह कुछ तो देखा होगा तब

269
00:19:04,560 --> 00:19:10,320
तो श्रद्धा आएगी। तो वो ज्ञान उसको क्यों दिया गया?

270
00:19:10,320 --> 00:19:12,400
तो यहां पर यह नहीं कहा जा रहा है

271
00:19:12,400 --> 00:19:16,800
कि जो मूर्ख है या जो अश्रद्धावान है उसको

272
00:19:16,800 --> 00:19:20,880
मत दो। तो यहां पर किस मूर्ख की बात की जा रही है? किस अश्रद्धावान

273
00:19:20,880 --> 00:19:23,840
की बात की जा रही है?

274
00:19:23,840 --> 00:19:28,160
यहां पर बात की जा रही है कि हम सभी प्राणियों

275
00:19:28,160 --> 00:19:32,320
के अंदर हृदय में एक सवाल है जो

276
00:19:32,320 --> 00:19:37,200
गूंजता है और उस सवाल को हम कहते हैं

277
00:19:37,200 --> 00:19:41,440
असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय

278
00:19:41,440 --> 00:19:45,520
मृत्यु मा मृतम गमय

279
00:19:45,520 --> 00:19:49,520
यह सवाल ये प्रश्न ये क्वेश्चन हम

280
00:19:49,520 --> 00:19:53,600
सबके अंदर है जो व्यक्ति इस क्वेश्चन

281
00:19:53,600 --> 00:19:58,080
पर ध्यान दे रहा है, वह व्यक्ति श्रद्धावान

282
00:19:58,080 --> 00:20:02,320
है। जो व्यक्ति अपनी आत्मा की पुकार सुन

283
00:20:02,320 --> 00:20:06,400
रहा है, भूखी है, प्यासी है, आ्यात्म का भोजन

284
00:20:06,400 --> 00:20:10,480
चाहिए उसे। भगवान की भक्ति रूपी भोजन चाहिए

285
00:20:10,480 --> 00:20:14,640
उसे। वो चित्कार कर रही है, परेशान है, जो व्यक्ति इसको

286
00:20:14,640 --> 00:20:18,880
सुन रहा है, ध्यान दे रहा है, बैठ रहा है, मनन कर रहा है, अपने

287
00:20:18,880 --> 00:20:21,600
में चिंतन किया।

288
00:20:21,600 --> 00:20:25,680
वह व्यक्ति श्रद्धावान है। वह व्यक्ति नहीं जिसने गीता नहीं

289
00:20:25,680 --> 00:20:29,680
पढ़ी तो गीता पढ़ने से पहले ही वह श्रद्धावान हो जाए। ना

290
00:20:29,680 --> 00:20:33,760
उसने श्री कृष्ण के बारे में अपने माता-पिता से जाना वो श्री कृष्ण के

291
00:20:33,760 --> 00:20:38,480
प्रति श्रद्धावान हो जाए। वो नहीं उसको आप बताइए।

292
00:20:38,480 --> 00:20:44,000
सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म कृष्णस्तु भगवान स्वयं

293
00:20:44,000 --> 00:20:48,080
उसको आपको बताना पड़ेगा ना तब वो श्रद्धावान बनेगा। तो

294
00:20:48,080 --> 00:20:52,160
यहां पर बात होती है कि श्रद्धावान कौन है? श्रद्धावान वह है

295
00:20:52,160 --> 00:20:56,720
जो अपनी आत्मा को सुन रहा है। उस

296
00:20:56,720 --> 00:21:01,040
पर विचार कर रहा है। तो बैक

297
00:21:01,040 --> 00:21:06,960
टू द पॉइंट क्या है? कि जो व्यक्ति अपनी आत्मा की आवाज सुनेगा,

298
00:21:06,960 --> 00:21:11,360
अपनी आत्मा के प्रति श्रद्धावान होगा। जब आप उसको आत्मा

299
00:21:11,360 --> 00:21:15,920
की प्यास का विषय बताएंगे परमात्मा

300
00:21:15,920 --> 00:21:19,920
तो वह उसके प्रति श्रद्धावान होगा। फिर परमात्मा कहां

301
00:21:19,920 --> 00:21:24,480
का प्रतिपाद्य विषय है, कहां से प्रतिपादित है, कैसे परिभाषित है?

302
00:21:24,480 --> 00:21:28,640
तो वह शास्त्र के प्रति श्रद्धावान होगा। तो जो इस

303
00:21:28,640 --> 00:21:32,880
क्रम से आता है शास्त्रों तक उसको कभी अपनी

304
00:21:32,880 --> 00:21:37,200
शिख पर लज्जा का अनुभव नहीं होगा। दूसरी

305
00:21:37,200 --> 00:21:42,640
बात आपने कही गाली का उदाहरण आपने दिया तो

306
00:21:42,640 --> 00:21:46,800
ऐसा नहीं है गाली अपने मित्रों के बीच में देते हुए

307
00:21:46,800 --> 00:21:51,200
भी व्यक्ति ये जान रहा होता है ये गलत है सीधी

308
00:21:51,200 --> 00:21:55,360
सी बात है कि जो

309
00:21:55,360 --> 00:21:59,360
भी कार्य आप करें वह आप सबके सामने कर पा रहे हैं कि नहीं

310
00:21:59,360 --> 00:22:03,520
कर पा रहे हैं यह है छिपाने का भाव वह

311
00:22:03,520 --> 00:22:07,760
अपने दोस्तों के बीच में गाली दे रहा और कहीं

312
00:22:07,760 --> 00:22:11,920
पर नहीं दे रहा है तो इसके अंदर भय क्यों आ रहा है अगर वह यदि वह सही

313
00:22:11,920 --> 00:22:16,000
कार्य है तो और जो जो शास्त्रों पर श्रद्धा

314
00:22:16,000 --> 00:22:16,500
रखता

315
00:22:16,320 --> 00:22:22,320
होगा वो ना मित्रों में भय खाएगा ना वो अपने परिजनों में भय खाएगा

316
00:22:22,320 --> 00:22:26,320
शास्त्रों पर विश्वास के द्वारा जिसके पास शिख आई होगी या

317
00:22:26,320 --> 00:22:30,640
और कोई सत्य कार्य मंदिर जाने वाला और

318
00:22:30,640 --> 00:22:34,960
यदि वो वहां पर भय खा रहा है तो ये उसकी अज्ञानता वश है जो उसका चुनाव

319
00:22:34,960 --> 00:22:38,960
नहीं और यहां पर जो भय खाना है, गाली

320
00:22:38,960 --> 00:22:42,960
खाना वो उसका चुनाव है। अज्ञानता वश नहीं है। वो

321
00:22:42,960 --> 00:22:47,120
डिसाइड कर रहा है कि गाली देना तो पाप है। बहन के सामने नहीं दे सकता,

322
00:22:47,120 --> 00:22:52,240
मां के सामने नहीं दे सकता। यहीं पर दे रहा हूं। और समझिए

323
00:22:52,240 --> 00:22:56,240
जब व्यक्ति इस तरह के कर्म करता है जो

324
00:22:56,240 --> 00:23:02,240
घ्रणित होते हैं त्याज्य होते हैं तो

325
00:23:02,240 --> 00:23:06,720
इन सब इस प्रकार के कर्मों को करने से पहले ही

326
00:23:06,720 --> 00:23:10,720
वह अपनी आत्मा की हत्या करता है। वह

327
00:23:10,720 --> 00:23:15,520
अपने आप से कहता है मैं बुरा हूं।

328
00:23:15,520 --> 00:23:20,080
इसलिए मेरा गाली दे देना ठीक है। कहता है कि नहीं?

329
00:23:20,080 --> 00:23:25,040
अपने आप को जस्टिफाई करता है कि नहीं? मैं ऐसा ही हूं। मैं तो दूंगा।

330
00:23:25,040 --> 00:23:29,040
जो भी व्यक्ति गलत कार्य करने जाता है, वह पहले अपने

331
00:23:29,040 --> 00:23:31,600
आप को गलत कार्य करने वाला स्वीकार कर

332
00:23:31,600 --> 00:23:34,320
लेता है।

333
00:23:34,320 --> 00:23:38,080
एक दिन की बात है।

334
00:23:38,080 --> 00:23:42,640
एक कोई मशीन थी जो इंस्टॉल होनी थी।

335
00:23:42,640 --> 00:23:46,720
उस मशीन को इंस्टॉल करने के लिए एक जो लेबर क्लास का कोई लड़का

336
00:23:46,720 --> 00:23:51,120
है जो दिहाड़ी पर काम करते हैं दुकानों

337
00:23:51,120 --> 00:23:55,280
में वह आने वाला था। ठीक

338
00:23:55,280 --> 00:23:57,760
है?

339
00:23:57,760 --> 00:24:02,080
तो सुबह 10:00 बजे उसे निकलना था और

340
00:24:02,080 --> 00:24:06,880
मुझे आवश्यक था कि वह मशीन उसी दिन इंस्टॉल हो जाए।

341
00:24:06,880 --> 00:24:12,400
क्योंकि मेरे किसी मित्रव थे वहां पर जानी थी वह मशीन।

342
00:24:12,400 --> 00:24:16,960
और काफी दिन से पेंडिंग चल रहा था वह मामला।

343
00:24:16,960 --> 00:24:19,840
तो

344
00:24:19,840 --> 00:24:23,920
मतलब एक दायित्व था मेरा कि मैं परेशान था

345
00:24:23,920 --> 00:24:28,400
कि आज के दिन मशीन इंस्टॉल हो जाए। और वो व्यक्ति

346
00:24:28,400 --> 00:24:32,640
मैं वहां पर शॉप पर फोन किया कि मशीन आपने निकाल

347
00:24:32,640 --> 00:24:36,640
दी। मतलब वहां से निकल गई घर यहां आने के लिए तो बोले कि

348
00:24:36,640 --> 00:24:40,720
10:00 बजे हां यह लड़के को आपका कार्य दे दिया। ये लड़का जो फिर मैं लड़के

349
00:24:40,720 --> 00:24:44,720
से कोऑर्डिनेट करने लगा। लड़के से समन्वय स्थापित करने लगा

350
00:24:44,720 --> 00:24:48,800
कॉल के द्वारा कि भाई निकलेगी नहीं निकलेगी। तो उसने मुझे 11:00 बजे कहा कि मैं निकल

351
00:24:48,800 --> 00:24:52,880
चुका और जो वो शॉप से जहां पर वो

352
00:24:52,880 --> 00:24:57,680
इंस्टॉल होनी थी उसकी दूरी कितनी थी? मात्र

353
00:24:57,680 --> 00:25:01,840
10 से 15 कि.मी. के बीच की दूरी। बस वो 11:00

354
00:25:01,840 --> 00:25:05,920
बजे मुझसे बोला कि मैं निकल चुका हूं।

355
00:25:05,920 --> 00:25:09,920
1:00 बजे तक नहीं पहुंचा। दो घंटे में नहीं पहुंचा। लोडर

356
00:25:09,920 --> 00:25:14,400
जाना था मशीन को लोड करके

357
00:25:14,400 --> 00:25:18,480
तो दो 1:00 बजे मैं फोन कर रहा हूं तो कह रहा बहुत जाम है। बहुत जाम

358
00:25:18,480 --> 00:25:22,640
है। पहुंच रहे हैं। पहुंच रहे हैं। 2:00 बजे फोन कर रहा हूं तो बहुत जाम है। पहुंच रहे हैं। पहुंच

359
00:25:22,640 --> 00:25:26,720
रहे हैं। बहुत सरलता से झूठ बोल रहा है।

360
00:25:26,720 --> 00:25:31,200
मतलब एक होता है ना कि झूठ बोलने में व्यक्ति थोड़ा

361
00:25:31,200 --> 00:25:35,440
घबराता है या ऐसा सोचता है कि

362
00:25:35,440 --> 00:25:39,840
मैं ये ना करूं, करूं कि ना करूं। थोड़ा असमंजस वाली स्थिति होती तो समझ में आती।

363
00:25:39,840 --> 00:25:43,120
मगर वो तो बिल्कुल जैसे

364
00:25:43,120 --> 00:25:47,120
दही खाना होता है ना सिंपल तरीके से

365
00:25:47,120 --> 00:25:51,120
उस तरह से बोल रहा था। तो 2:00 बजे

366
00:25:51,120 --> 00:25:55,120
भी यही हो रहा है। 2:30 बजे भी यही हो रहा है। तो मैं समझ गया। मैंने उसके उसको ये बोला कि

367
00:25:55,120 --> 00:25:59,440
अपनी करंट लोकेशन भेजो जरा यह पता करने के लिए कि

368
00:25:59,440 --> 00:26:03,520
वो कहां पर है एक्सैक्टली। जहां वो कह रहा है वहां है कि नहीं। तो बोला मुझे लोकेशन

369
00:26:03,520 --> 00:26:07,520
भेजना नहीं आता। दिन भर यह लोग मोबाइल चलाया

370
00:26:07,520 --> 00:26:11,680
करते हैं। मगर उसको लोकेशन भेजना उस समय नहीं आता।

371
00:26:11,680 --> 00:26:15,680
एट द एंड वो शाम के 6:00 बजे पहुंचा। उस दिन

372
00:26:15,680 --> 00:26:19,760
मशीन इंस्टॉल नहीं हो पाई या शायद हो गई थी मगर रात

373
00:26:19,760 --> 00:26:24,560
हो गई थी। मतलब मेरी जो कहीं पर कही हुई बात थी वो

374
00:26:24,560 --> 00:26:29,200
उसका मोल उसका मान नहीं रह पाया था।

375
00:26:29,200 --> 00:26:33,280
तो लास्ट में जब वह व्यक्ति काम वगैरह

376
00:26:33,280 --> 00:26:37,360
करके और फिर जब मैं उससे किसी दिन मिला तो मैंने उससे यह

377
00:26:37,360 --> 00:26:42,160
कहा कि क्या तुम अपने जीवन में

378
00:26:42,160 --> 00:26:46,400
बड़ा व्यक्ति बनना चाहते हो या नहीं?

379
00:26:46,400 --> 00:26:50,000
बोला हां बनना चाहता हूं।

380
00:26:50,000 --> 00:26:50,500
तो फिर

381
00:26:50,480 --> 00:26:54,640
मैंने उससे कहा कि बड़ा व्यक्ति क्यों बनना चाहते हो? अगर मैं तुमसे कहूं कि तुम

382
00:26:54,640 --> 00:26:59,280
दिन भर पत्थर पर सोओ। मगर जब तुम बाहर निकलो

383
00:26:59,280 --> 00:27:03,760
तो तुम्हारे पास वह BMW कार हो तुम्हारा बंगला

384
00:27:03,760 --> 00:27:07,920
लोगों को दिखाई दे रहा हो तुम्हारे सारे माता-पिता वगैरह सब सुखी हो

385
00:27:07,920 --> 00:27:11,920
केवल तुम ही हो जो शारीरिक कष्ट के साथ में

386
00:27:11,920 --> 00:27:16,320
मतलब जैसे बिल्कुल सामान्य जीवन जी रहे हो

387
00:27:16,320 --> 00:27:21,040
प्याज रोटी खा रहे हो सूखा खाना

388
00:27:21,040 --> 00:27:25,440
हां या फिर और भी बिल्कुल कठिन जो जीवन

389
00:27:25,440 --> 00:27:29,440
की स्थिति हो सकती है कठिन वैसी नहीं कि कोई सजा मिल

390
00:27:29,440 --> 00:27:33,520
रही है मगर जो एक लेबर क्लास की जीवन होता है वह जीवन

391
00:27:33,520 --> 00:27:37,600
तुम जी रहे हो परंतु बाहरी तुम्हारा जो अवयव है वह सब

392
00:27:37,600 --> 00:27:42,720
सुधर गया है लोग तुम्हें आते जाते समय

393
00:27:42,720 --> 00:27:46,720
मतलब देख रहे तो तुम कारों में चल रहे हो सब कुछ है बस तुम्हारा

394
00:27:46,720 --> 00:27:51,600
जो अभी निजी जीवन है वो लेबर क्लास का रह गया तो कैसा रहेगा

395
00:27:51,600 --> 00:27:56,000
तो वो कहेगा अरे मैं कोई दिक्कत नहीं भैया मैं कुछ भी मैं अपने शरीर

396
00:27:56,000 --> 00:28:00,640
को कोई भी कष्ट देने के लिए तैयार हूं। पर मेरे परिवार

397
00:28:00,640 --> 00:28:04,800
पे यह मतलब परिवार सुखी हो जाए। यह बंगला मेरा दिखने लगे। फिर मुझे

398
00:28:04,800 --> 00:28:05,520
कोई दिक्कत नहीं

399
00:28:05,520 --> 00:28:09,760
है। मैं अपने शरीर के लिए कोई भी कष्ट

400
00:28:09,760 --> 00:28:13,760
प्राप्त कर लूंगा। तो मैंने कहा तो इसका अर्थ यह है कि तुम अपने शरीर

401
00:28:13,760 --> 00:28:18,480
के लिए नहीं तुम अपने सम्मान के लिए मेहनत कर रहे हो कि लोग एक दिन कहे

402
00:28:18,480 --> 00:28:22,560
लोग एक दिन तुम्हें बड़ा व्यक्ति समझे। ये युद्ध जो है वो सम्मान

403
00:28:22,560 --> 00:28:26,960
का है। बोला हां बिल्कुल सही। बिल्कुल सही सम्मान

404
00:28:26,960 --> 00:28:31,200
का है कि लोग देखें लोग कहे कि BMW में चल रहा है या फलानी

405
00:28:31,200 --> 00:28:35,360
में चल रहा है Thar में चल रहा है लोग ये कहे मैंने

406
00:28:35,360 --> 00:28:39,600
कहा इसका मतलब तुम चाहते हो कि संसार तुम्हारा सम्मान करे

407
00:28:39,600 --> 00:28:43,920
कि हां हां बिल्कुल चाहता हूं तो फिर मैंने उससे कहा क्या तुम स्वयं

408
00:28:43,920 --> 00:28:48,320
का सम्मान करते हो

409
00:28:48,320 --> 00:28:52,800
तुमने यह सोच लिया है कि तुम एक निचले स्तर के व्यक्ति हो तुमने

410
00:28:52,800 --> 00:28:56,880
मान लिया है कि मैं बेकार का व्यक्ति हूं। बहुत आसान है मेरे

411
00:28:56,880 --> 00:29:00,960
लिए झूठ बोल देना। तभी तो दिन भर में तुमने मुझसे 50

412
00:29:00,960 --> 00:29:05,440
झूठ बोले। जो व्यक्ति स्वयं का सम्मान करेगा

413
00:29:05,440 --> 00:29:09,440
वो सरलता से झूठ नहीं बोल पाएगा। उसको कठिनाई होगी झूठ

414
00:29:09,440 --> 00:29:12,960
बोलने में।

415
00:29:12,960 --> 00:29:17,520
तो

416
00:29:17,520 --> 00:29:21,600
यह वाली जो बातें हैं गाली इत्यादि वाली इसमें व्यक्ति पहले

417
00:29:21,600 --> 00:29:26,080
अपनी आत्मा की हत्या ही करता है। अपना अस्तित्व स्वीकार करता है। मैं गालीबाज

418
00:29:26,080 --> 00:29:29,920
हूं। मैं गाली दूंगा।

419
00:29:29,920 --> 00:29:34,000
अब मेरे पास अगर भगवान श्री कृष्ण की तरह शास्त्र

420
00:29:34,000 --> 00:29:38,160
वो दिव्यास्त्र नहीं है तो मैं क्या वाचिक प्रतिकार भी ना

421
00:29:38,160 --> 00:29:42,800
करूं? पता है किसी किसने बोला है ये

422
00:29:42,800 --> 00:29:47,040
पता ही होगा आप लोगों को खैर

423
00:29:47,040 --> 00:29:51,040
मुझे नहीं पता भैया ये एक है गाली

424
00:29:51,040 --> 00:29:54,640
बाजाचार्य है अपने

425
00:29:54,640 --> 00:29:58,800
ना जी भैया समझ गए समझ गए

426
00:29:58,800 --> 00:30:04,080
ना समझ गए वो ये कहते हैं

427
00:30:04,080 --> 00:30:08,160
वो ये कहते हैं कि मैं गाली

428
00:30:08,160 --> 00:30:14,160
दूंगा ठीक है [संगीत]

429
00:30:16,080 --> 00:30:20,240
जी भैया धन्यवाद एक और प्रश्न था जो आपने

430
00:30:20,240 --> 00:30:24,320
अभी कहा था ना कि कर्मेंद्रिय ज्ञानेंद्र जो होते हैं तो

431
00:30:24,320 --> 00:30:28,880
इंद्रिय से हम जो विषय भोग करते हैं तो उसको वहां से हटाकर

432
00:30:28,880 --> 00:30:32,960
भगवान की सेवा में हमें नियोजित करना चाहिए तो ये

433
00:30:32,960 --> 00:30:37,360
जो 10 इंद्रिय है इन द 10ों का मतलब कैसे कैसे

434
00:30:37,360 --> 00:30:43,360
हम उनका का व्यवहार कर सकते हैं। उसको अगर आप क्रम से बताएं

435
00:30:47,760 --> 00:30:51,600
जैसे जीवा से नाम जप

436
00:30:51,600 --> 00:30:55,600
है ना और मन

437
00:30:55,600 --> 00:30:59,680
से भगवान का चिंतन मनन अन्य जितनी

438
00:30:59,680 --> 00:31:04,160
भी कर्मेंद्रियां हैं ज्ञानेंद्रियां हैं कर्मेंद्रियां

439
00:31:04,160 --> 00:31:08,800
मुख्य रूप से उनका प्रवसार निग्रह में करें

440
00:31:08,800 --> 00:31:14,000
निग्रह निग्रह कैसे कि कार्य कोई करना है,

441
00:31:14,000 --> 00:31:18,640
भोजन प्राप्त करना है। है ना? तो

442
00:31:18,640 --> 00:31:22,720
इस तरह से करें। स्त्री संग करना है तो इस

443
00:31:22,720 --> 00:31:28,160
तरह से करें। विधि लगा के तो उसका पर्यावसार

444
00:31:28,160 --> 00:31:31,680
आत्म कल्याण में हो जाएगा।

445
00:31:31,680 --> 00:31:32,320
निग्रह

446
00:31:32,320 --> 00:31:37,360
विधि द्वारा विधि पूर्ण निग्रह करते हुए

447
00:31:37,360 --> 00:31:41,360
उसको आप जब अपनी कर्मेंद्रियों का व्यवहार करेंगे कोई भी

448
00:31:41,360 --> 00:31:45,920
व्यवहार कुछ भी करिए तो उससे भगवान को जोड़िए

449
00:31:45,920 --> 00:31:50,160
स्त्री संग करिए भगवान को कैसे जोड़ा आपने विवाह भगवान

450
00:31:50,160 --> 00:31:54,160
जुड़ गए कि नहीं जुड़ गए जी बिना

451
00:31:54,160 --> 00:32:00,160
बिना विवाह के स्त्री संग अवैध वैभचार

452
00:32:00,560 --> 00:32:04,560
और आगे भी मनुस्मति तो कहती है कि अमुक अमुक

453
00:32:04,560 --> 00:32:08,640
काल में अमुक अमुक उद्देश्य के लिए ही स्त्रीषण करना

454
00:32:08,640 --> 00:32:12,640
चाहिए। तो ऐसे ही

455
00:32:12,640 --> 00:32:16,640
जीवन के हर क्षेत्र में हमारी कर्म इंद्रियों से होने वाले

456
00:32:16,640 --> 00:32:20,960
जो कर्म है उनके निमित्त ही भगवान

457
00:32:20,960 --> 00:32:25,040
ने स्वरूप लीलाओं अपने स्वरूपों अपनी लीलाओं का

458
00:32:25,040 --> 00:32:30,400
वर्णन किया है और कहीं ना कहीं वही वाली बात जैसे

459
00:32:30,400 --> 00:32:34,560
मांस अथवा जो यह मदिरा पान है यह जब आवश्यक

460
00:32:34,560 --> 00:32:39,040
हो जाए तो उस समय भी अपने ऐसे स्वरूप ऐसी विधि

461
00:32:39,040 --> 00:32:43,040
वर्णन किया है जिससे कि आप वहां भी इस कर्म को भी

462
00:32:43,040 --> 00:32:46,320
भगवान से जोड़ पाओ।

463
00:32:46,320 --> 00:32:48,640
ठीक है?

464
00:32:48,640 --> 00:32:52,640
जी भैया और भैया एक मेरा तो

465
00:32:52,640 --> 00:32:56,800
एक निजी प्रश्न था और ये दो तो हो गए। इसको आपने ही पहले

466
00:32:56,800 --> 00:33:01,040
बता दिया कि वो जो कर्मवाधिकारस्ते मा फलेशु कदाचन

467
00:33:01,040 --> 00:33:05,280
है कि तुम कर्म करते जाओ फल की आशा मत करो। तो

468
00:33:05,280 --> 00:33:09,280
इसका जो इंटरप्रिटेशन है ना यह मैंने बहुत से लोगों से

469
00:33:09,280 --> 00:33:13,520
सुना है। सभीियों का एक ही बात है कि कर्म तो करेंगे

470
00:33:13,520 --> 00:33:17,520
परंतु फल की आशा क्यों ना करें? क्योंकि अगर हम कहीं

471
00:33:17,520 --> 00:33:21,600
ऑफिस में या कहीं पर भी अगर कुछ काम करते हैं तो उसको अगर हमें फल नहीं

472
00:33:21,600 --> 00:33:25,680
मिलेगा कोई अगर रिवार्ड नहीं मिलेगा तो हमें उसकी करने की इच्छा

473
00:33:25,680 --> 00:33:29,840
क्यों जागेगी? अगर हम कोई ऑफिस में काम करते हैं हमें सैलरी

474
00:33:29,840 --> 00:33:34,480
मिलती है तो हमें आशा आएगा कि हां मुझे अभी करना है तो

475
00:33:34,480 --> 00:33:38,880
अगर मुझे पता चलेगा कि मैं कर्म करूंगा कुछ मुझे मिलेगा ही नहीं तो उसको

476
00:33:38,880 --> 00:33:43,040
तो मुझे मतलब कुछ लाभ नहीं है ना तो दिमाग में बैठ जाएगा तो मैं तो

477
00:33:43,040 --> 00:33:47,120
करना चाहूंगा ही नहीं तो इसका एक्चुअल इंटरप्रिटेशन मतलब एक्चुअल व्याख्या क्या

478
00:33:47,120 --> 00:33:51,680
होगा

479
00:33:51,680 --> 00:33:57,680
इसको ऐसे समझ लीजिए कि जैसे मान लीजिए मैं पत्थर तोड़ रहा हूं

480
00:33:58,400 --> 00:34:02,560
तो यदि मैं इस बात पर ध्यान ना दूं कि पत्थर टूटेगा कि नहीं

481
00:34:02,560 --> 00:34:06,720
टूटेगा तो मैं क्या उतनी जोर से मारूंगा कि पत्थर

482
00:34:06,720 --> 00:34:09,680
टूट जाए।

483
00:34:09,680 --> 00:34:13,840
है ना? तो इसका मतलब पत्थर तोड़ने के लिए ही

484
00:34:13,840 --> 00:34:17,920
मारा जाएगा जब तभी पत्थर टूटेगा ना। तो फिर यहां

485
00:34:17,920 --> 00:34:22,000
क्यों कहा जा रहा है कि परिणाम पर ध्यान मत दो। परिणाम पर ध्यान देने

486
00:34:22,000 --> 00:34:26,160
का मतलब है कि वह जो भी कर्म का परिणाम

487
00:34:26,160 --> 00:34:31,600
हो रहा है उस परिणाम से मिलने वाला जो भोग है

488
00:34:31,600 --> 00:34:34,320
सांसारिक

489
00:34:34,320 --> 00:34:39,040
उसमें आसक्ति उसको इस कार्य का हेतु ना मानकर

490
00:34:39,040 --> 00:34:43,600
भगवान को शास्त्र को उसका हेतु मानो। जैसे

491
00:34:43,600 --> 00:34:47,680
कि अर्जुन से कहा यह इंटरप्रिटेशन

492
00:34:47,680 --> 00:34:51,760
बहुत लोगों ने गलत बताई है। बहुत लोगों ने गलत

493
00:34:51,760 --> 00:34:56,240
बताई। आप प्रामाणिक आचार्यों का पढ़िए। वहां आपको सही आंसर मिलेगा।

494
00:34:56,240 --> 00:35:00,320
शंकराचार्य जी ने बोल दिया कि वहां पर यह

495
00:35:00,320 --> 00:35:04,640
कहा जा रहा है कि आपको कर्म करते समय यह भाव रखना

496
00:35:04,640 --> 00:35:08,880
चाहिए कि मैं जीतूंगा। जीतने के लिए ही लड़ना है।

497
00:35:08,880 --> 00:35:12,880
ऐसा नहीं है कि जीतने पर ध्यान नहीं देना है। जीतने के लिए लड़ना है।

498
00:35:12,880 --> 00:35:17,200
पर जीतना क्यों है? क्यों जीतना है? क्यों जीतना

499
00:35:17,200 --> 00:35:21,200
है? बताइए। युद्ध क्यों जीतना धर्म की स्थापना

500
00:35:21,200 --> 00:35:25,600
करना है। धर्म की स्थापना करना है। हां

501
00:35:25,600 --> 00:35:29,600
क्योंकि शास्त्र ने कहा है क्योंकि ईश्वर ने कहा

502
00:35:29,600 --> 00:35:34,560
है जीत करके मुझे महल मिलेगा इसलिए नहीं जीतना है।

503
00:35:34,560 --> 00:35:40,080
जब यह भावना आपकी आ जाती है तो आप बिल्कुल एक

504
00:35:40,080 --> 00:35:44,080
मशीन की तरह लड़ पाते हैं। जिसको ना जीत का लालच

505
00:35:44,080 --> 00:35:48,160
है ना हार का भय है। जिसको सिर्फ अपने लक्ष्य को भेद कर वापस

506
00:35:48,160 --> 00:35:50,320
आना है।

507
00:35:50,320 --> 00:35:54,320
है ना जो समत्व हो जाता है हार और जीत में एक जैसी

508
00:35:54,320 --> 00:35:58,800
बुद्धि हो जाती है उसकी क्योंकि वह क्यों लड़ रहा है

509
00:35:58,800 --> 00:36:02,800
क्यों जीतेगा क्योंकि ईश्वर ने कहा है आगे

510
00:36:02,800 --> 00:36:07,200
उसको महल मिलेगा तो क्यों महल में रहेगा

511
00:36:07,200 --> 00:36:11,360
इसलिए नहीं कि वहां पर ठंडक मिलेगी इसलिए क्योंकि ईश्वर

512
00:36:11,360 --> 00:36:15,520
ने कहा है वहां रह के उसको और भी गृहस्थ आश्रम के भोग

513
00:36:15,520 --> 00:36:18,960
भोगने होंगे भोगेगा

514
00:36:18,960 --> 00:36:23,040
मगर उनसे मिलने वाले भोग की आसक्ति हो भोग के प्रति

515
00:36:23,040 --> 00:36:27,120
आसक्ति ना होकर उसके मन में भाव योगा मैं इसलिए कर रहा हूं क्योंकि

516
00:36:27,120 --> 00:36:31,520
ईश्वर ने कहा इसको कहते हैं कर्म निवार आसक्ति

517
00:36:31,520 --> 00:36:35,680
नहीं रहनी चाहिए मन में तो उन कार्यों को करने का हेतु

518
00:36:35,680 --> 00:36:39,840
क्या होना चाहिए शास्त्र ने कहा है ईश्वर ने कहा है ना कि

519
00:36:39,840 --> 00:36:45,840
यह कि मैं जीतूंगा तो भोगूंगा ठीक है

520
00:36:47,120 --> 00:36:52,320
भैया मेरे जी भैया धन्यवाद [संगीत]

521
00:36:52,320 --> 00:36:56,480
हां विश्वजीत जी बोलिए भैया जब जैसे कि

522
00:36:56,480 --> 00:37:00,560
आत्मा को कभी मार नहीं सकते तो फिर जब हम मतलब

523
00:37:00,560 --> 00:37:04,720
और मोक्ष को भी जब प्राप्त रहते भगवान के अंदर रहते हैं जब भगवान में मिले हुए रहते

524
00:37:04,720 --> 00:37:09,760
हैं तो फिर उसके बाद जन्म नहीं होता हम लोग का तो भैया आत्मा

525
00:37:09,760 --> 00:37:14,560
सबसे पहले जैसे हम लोग इंसान है सबका एक एक आत्मा है तो वह कहां से आए

526
00:37:14,560 --> 00:37:18,720
पहले तो सब भगवान में ही थे तो मोक्ष के

527
00:37:18,720 --> 00:37:23,040
स्थिति में ही सब थे और स्वर्ग और नर्क

528
00:37:23,040 --> 00:37:28,240
तो भैया नित्य नहीं है। ऐसा मैंने सुना है। तो भगवान

529
00:37:28,240 --> 00:37:32,560
के मतलब भगवान के पास जब जाते हैं मोक्ष के लिए सबका कामना रहती है।

530
00:37:32,560 --> 00:37:35,760
कहीं से आई नहीं है।

531
00:37:35,760 --> 00:37:40,400
विभिन्न भावों से भावित होकर के जो जीव भाव है

532
00:37:40,400 --> 00:37:45,520
ब्रह्म ही जीव भाव में

533
00:37:45,520 --> 00:37:49,040
परिलक्षित होता है।

534
00:37:49,040 --> 00:37:53,040
और भैया स्वर्ग और नर्क नित्य नहीं है क्या?

535
00:37:53,040 --> 00:37:57,120
नहीं। तो भैया जैसे कि हम लोग ऐसा चाहते

536
00:37:57,120 --> 00:38:01,520
हैं कि सबको मोक्ष मिल जाए ताकि दोबारा जन्म और मरण के चक्र में फंसना

537
00:38:01,520 --> 00:38:02,400
ना पड़े।

538
00:38:02,400 --> 00:38:06,640
तो भगवान वह भी चीज एक बनाएं। कि मोक्ष का स्थिति

539
00:38:06,640 --> 00:38:10,880
मिले और यह भी बनाया कि बार-बार जैसे इंसान का जन्म होता है किसी भी प्राणी

540
00:38:10,880 --> 00:38:15,280
के रूप में आत्मा का जन्म होता है तो उसको कोई एक्सेप्ट

541
00:38:15,280 --> 00:38:19,360
क्यों नहीं करना चाहता ताकि दुख मिलता है इसीलिए क्या किसको

542
00:38:19,360 --> 00:38:23,440
एक्सेप्ट नहीं करना चाहता है दोबारा जैसे भैया हम

543
00:38:23,440 --> 00:38:27,600
लोग जन्म लेते हैं फिर जन्म लेने के समय में भी तो कष्ट होता है और मरने

544
00:38:27,600 --> 00:38:31,680
के समय में भी कष्ट होता है इंसान को और जो जीवन काल में भी तो अनेक प्रकार

545
00:38:31,680 --> 00:38:35,840
के कष्ट आते हैं झगड़ा लड़ाई होता है तो तो

546
00:38:35,840 --> 00:38:40,080
इन सबको कोई मतलब यह नहीं चाहता कि मेरे जीवन में ऐसा आए

547
00:38:40,080 --> 00:38:44,160
इसीलिए मुझको मोक्ष मिल जाए तो अब दोबारा जन्म मरण के चक्र में नहीं

548
00:38:44,160 --> 00:38:48,400
फंसना पड़ेगा। तो भगवान जब मोक्ष की स्थिति को भी बनाए तो फिर उस स्थिति

549
00:38:48,400 --> 00:38:52,400
को सब पाना चाहते हैं तो फिर इस स्थिति को कोई क्यों नहीं पाना चाहता?

550
00:38:52,400 --> 00:38:58,400
मतलब वो भी तो भगवान का बनाया हुआ एक रूप है। एक सिस्टम है।

551
00:39:02,240 --> 00:39:07,520
भगवान का बनाया हुआ एक सिस्टम है। तो इसको

552
00:39:07,520 --> 00:39:11,680
पालन ना करने के प्रति भावना होना भी तो भगवान का बनाया हुआ एक सिस्टम है। फिर आपको

553
00:39:11,680 --> 00:39:16,080
प्रॉब्लम क्या है?

554
00:39:16,080 --> 00:39:20,080
जैसे भैया मतलब जैसे जैसे भगवान का बनाया हुआ

555
00:39:20,080 --> 00:39:24,320
इंसान अपने जीवन में गलत मृत्यु जैसे जीवन में कष्ट

556
00:39:24,320 --> 00:39:28,480
मिलना है, जन्म मृत्यु में कष्ट मिलना है। तो ये तो भगवान का

557
00:39:28,480 --> 00:39:32,720
बनाया हुआ नियम है। हम ठीक है? इसलिए आपका कहना

558
00:39:32,720 --> 00:39:36,880
है कि व्यक्ति को उससे मुंह नहीं फेरना चाहिए। उस कष्ट से उसे

559
00:39:36,880 --> 00:39:41,040
दुखी नहीं होना चाहिए। हम और जब

560
00:39:41,040 --> 00:39:45,120
मोक्ष मिलेगा तब मिलेगा। मगर उसको इससे भागना नहीं

561
00:39:45,120 --> 00:39:49,840
चाहिए। जीवन की सत्यता से व्यवहारिक सत्यता से।

562
00:39:49,840 --> 00:39:55,120
तो जैसे आपने यह स्वीकार किया कि ईश्वर ने कष्ट बनाया है

563
00:39:55,120 --> 00:39:59,120
तो आपको यह भी तो स्वीकार करने करना होगा कि जीव के अंदर की

564
00:39:59,120 --> 00:40:04,560
जो प्रकृति है इन त्रिविध तापों से

565
00:40:04,560 --> 00:40:08,560
भागने की वो भी तो भगवान ने बनाई है। फिर

566
00:40:08,560 --> 00:40:12,560
उसको आप क्यों विरोध कर रहे हैं? नहीं हां विरोध नहीं कर हम

567
00:40:12,560 --> 00:40:16,640
दोनों चीज को लेकर के चलने के लिए और भैया एक बात और दोनों

568
00:40:16,640 --> 00:40:18,080
चीज को ले

569
00:40:18,080 --> 00:40:22,080
मैं कह तो रहा हूं दोनों चीज को ना कर ना लेकर चलने की भावना

570
00:40:22,080 --> 00:40:26,320
ईश्वर ने ही दी है ना हां भैया तो फिर आपके

571
00:40:26,320 --> 00:40:30,480
विरोध क्यों कर रहे हैं अच्छा दोनों चीज को ना लेकर

572
00:40:30,480 --> 00:40:36,480
चलने की भावना ईश्वर ने ही दी है कि मरने से डरो

573
00:40:37,280 --> 00:40:41,360
और भैया जब हम सब एक ना एक दिन मोक्ष को जीव तो मोक्ष को

574
00:40:41,360 --> 00:40:45,760
प्राप्त होगा ही कभी नहीं यदि इन त्रिव यदि इन त्रिविध तापों को हम एक्सेप्ट

575
00:40:45,760 --> 00:40:49,760
ही कर लेंगे तो काहे के लिए हमें मोक्ष की चिंता होगी काहे के लिए हम

576
00:40:49,760 --> 00:40:54,320
धर्म का पालन करेंगे फिर क्यों हम एक तरह से नास्तिक बन जाएंगे

577
00:40:54,320 --> 00:40:58,080
क्या मतलब है फिर उसका

578
00:40:58,080 --> 00:41:02,720
शास्त्रों का भैया एक छोटा सा प्रश्न और था कि

579
00:41:02,720 --> 00:41:07,120
कोई भी जीव हो एक ना एक दिन मोक्ष को जरूर प्राप्त होगा तो उस जब

580
00:41:07,120 --> 00:41:11,440
ऐसा समय आ जाएगा सभी जीव मोक्ष क्ष प्राप्त हो चुके होंगे। उसके बाद संसार

581
00:41:11,440 --> 00:41:15,520
का क्या होगा? संसार नहीं चलेगा। जीव तो फिर भगवान के

582
00:41:15,520 --> 00:41:19,840
पास ही रहेंगे ना मोक्ष मिल जाएगा। खुद को प्रलय काल कहते हैं।

583
00:41:19,840 --> 00:41:23,920
ब्रह्म के रूप में सब कुछ स्थित रहेगा। ब्रह्म में फिर समय आने पर जब दोबारा

584
00:41:23,920 --> 00:41:28,160
सृष्टि होगी तो फिर

585
00:41:28,160 --> 00:41:32,400
ब्रह्म अपनी शब्द शक्ति जो उनकी

586
00:41:32,400 --> 00:41:33,280
बाया शक्ति

587
00:41:33,280 --> 00:41:38,960
होती है उसके द्वारा जो है संसार रच देते हैं। जी

588
00:41:38,960 --> 00:41:42,960
ठीक है। ठीक है भैया। धन्यवाद। किरण जी

589
00:41:42,960 --> 00:41:47,280
आपका हो गया है। अब

590
00:41:47,280 --> 00:41:51,280
मैंने तो प्रश्न पूछा ही नहीं। तो हां पूछना

591
00:41:51,280 --> 00:41:54,800
नहीं है तो हाथ नीचे कर लीजिए।

592
00:41:54,800 --> 00:41:58,960
पूछना है। मैंने पूछना है। मैंने प्रश्न पूछा

593
00:41:58,960 --> 00:42:03,200
ही नहीं है अभी तक। अच्छा एक

594
00:42:03,200 --> 00:42:07,440
मिनट जरा आपसे प्रश्न अभी तो बात हुई थी। नहीं करण

595
00:42:07,440 --> 00:42:11,440
दास जी से बात है। अच्छा आपसे बात नहीं हुई है। करण दास जी

596
00:42:11,440 --> 00:42:15,760
से बात हुई है। मैंने नाम आपका ही लिया। जी बताइए किरण

597
00:42:15,760 --> 00:42:20,240
किरण जी जी मेरा ये प्रश्न है कि

598
00:42:20,240 --> 00:42:24,480
द्वैतवादी भागवत गीता का एक श्लोक देते हैं। मतलब ज्यादातर इस

599
00:42:24,480 --> 00:42:28,480
वाले देते हैं कि जीव और ब्रह्म की मतलब अलग सत्ता सिद्ध करने के

600
00:42:28,480 --> 00:42:32,480
लिए कि मामे वांसो जीव लोक जीव भूते सनातन। वो यह सिद्ध

601
00:42:32,480 --> 00:42:36,560
करना चाहते हैं कि देखो जीव भी सनातन है, जगत भी सनातन है और ईश्वर

602
00:42:36,560 --> 00:42:40,960
तो सनातन है ही। तो तीनों की अलग-अलग सत्ता है तात्विक रूप से भी मतलब परमार्थ

603
00:42:40,960 --> 00:42:46,960
में भी। तो इस पर आप क्या कहेंगे?

604
00:42:47,440 --> 00:42:51,520
ब्रह्म के रूप में इस मेरा भी एक सोच है। मैं वो भी बताऊंगा।

605
00:42:51,520 --> 00:42:56,560
ब्रह्म के रूप में सब सनातन है।

606
00:42:56,560 --> 00:43:01,360
ब्रह्म के रूप में सब सनातन है। उसको

607
00:43:01,360 --> 00:43:05,360
तीन नाम लेकर इसलिए बताया जा रहा है या दो नाम लेकर इसलिए बताया जा रहा

608
00:43:05,360 --> 00:43:10,000
है जिससे कि क्योंकि आप दो नामों में ही जानते हो उसे

609
00:43:10,000 --> 00:43:14,160
अलग-अलग ही जानते हो तो अलग-अलग के अनुसार वहां पर

610
00:43:14,160 --> 00:43:18,880
बताया जा रहा है हम है ना और

611
00:43:18,880 --> 00:43:23,040
देखने की बात एक ये भी है आप बता दीजिएगा जैसे अर्जुन

612
00:43:23,040 --> 00:43:27,200
जैसे अर्जुन जब उनके उनके उस स्वरूप

613
00:43:27,200 --> 00:43:31,520
को नहीं जान पा रहा था हम तो जब श्री

614
00:43:31,520 --> 00:43:36,160
कृष्ण को वो अलग देख रहा है परम ब्रह्म से

615
00:43:36,160 --> 00:43:40,160
हम तो कई बार भगवान ने कहा तू उस परमात्मा की शरण

616
00:43:40,160 --> 00:43:44,880
में जा परमात्मा क्या उनसे कोई भिन्न है क्या वही तो थे

617
00:43:44,880 --> 00:43:48,960
मगर वो जिस तरीके से जानता है उसी

618
00:43:48,960 --> 00:43:53,440
तरीके की उसी भाषा में उसको बताया जा रहा है कि तुझे उस परमात्मा

619
00:43:53,440 --> 00:43:57,600
की शरण में जाना है जो सर्वशक्तिमान है जो सनातन है जो समस्त भूतों का

620
00:43:57,600 --> 00:44:02,480
ईश्वर है स्वामी है और वो वो परमात्मा मैं ही हूं।

621
00:44:02,480 --> 00:44:06,640
हम ठीक है? तो तो वो जो ये जान रहा

622
00:44:06,640 --> 00:44:11,920
है कि वो परमात्मा अलग है तो पहले उस परमात्मा की शरण में जाना है।

623
00:44:11,920 --> 00:44:15,920
इसी को तो रामपाल ही पकड़ते हैं। हम तो जिस रूप

624
00:44:15,920 --> 00:44:19,920
में जिस रूप में सुनने वाला श्रोता जानता है उसी रूप

625
00:44:19,920 --> 00:44:25,040
में उन उन तीनों चीजों को पकड़ के उसकी उनकी व्याख्या की गई।

626
00:44:25,040 --> 00:44:28,880
हां।

627
00:44:28,880 --> 00:44:33,120
और शिवशी अगर तीनों की अलग सत्ता मान ले तो तीनों ही बाधित हो जाएंगे। परमात्मा

628
00:44:33,120 --> 00:44:37,200
भी ब्रह्म भी सच्चिदानंद नहीं रहेगा। सब बाधित हो

629
00:44:37,200 --> 00:44:41,360
जाएगा। मेन बात यही है। सब कुछ सही है।

630
00:44:41,360 --> 00:44:45,600
ईश्वर को सर्वशक्तिमान आप सिद्ध कर दीजिए। बस हम

631
00:44:45,600 --> 00:44:51,200
अद्वैत का खंडन करके ईश्वर को सर्वशक्तिमान

632
00:44:51,200 --> 00:44:55,520
सिद्ध नहीं किया जा सकता। करेंगे यदि

633
00:44:55,520 --> 00:44:59,520
वह यह कहेंगे कुछ भी कर सकता है हम तो

634
00:44:59,520 --> 00:45:04,400
वह कहीं ना कहीं अपने ही किसी ना किसी नियम को बाधित कर देंगे।

635
00:45:04,400 --> 00:45:08,400
हम हम जैसे बाधित कर देंगे और फिर

636
00:45:08,400 --> 00:45:12,400
जब हम प्रश्न पूछेंगे ये यहां ऐसा क्यों हो रहा है? ये आपका नियम टूट रहा है

637
00:45:12,400 --> 00:45:16,800
यहां पे तो वो आपसे अचिंत बोलने लगेंगे।

638
00:45:16,800 --> 00:45:17,920
हां हां

639
00:45:17,920 --> 00:45:22,000
भगवान को समझा नहीं जा सकता। यह हमने पिछली वाली क्लास में

640
00:45:22,000 --> 00:45:26,400
भी बात की है। हां। जैसे कि

641
00:45:26,400 --> 00:45:30,800
जिस प्रकार दूध से दही बन सकता है पर दही से दूध नहीं उसी प्रकार कृष्ण

642
00:45:30,800 --> 00:45:35,040
से तो शिव बनते हैं पर शिव से कृष्ण नहीं बन सकते।

643
00:45:35,040 --> 00:45:39,040
तो यहां कृष्ण ही तो बाधित हो गए। हम अब जब हमने

644
00:45:39,040 --> 00:45:44,160
ये प्रश्न किया अरे ये तो अचिंत विषय है। हम

645
00:45:44,160 --> 00:45:50,160
ऐसे तो कहीं भी बोलते चले जाओ अचिंत। यह बात हां

646
00:45:50,400 --> 00:45:54,480
और एक वर्ण व्यवस्था पर एक क्वेश्चन था। अब ठीक

647
00:45:54,480 --> 00:45:58,560
है काफी देर हो गई। एक घंटा हो गया। नेक्स्ट ले लेंगे। अब थोड़ा सा इन

648
00:45:58,560 --> 00:46:02,560
अन्य लोगों के प्रश्न लेकर के पूरा करें। मुझे लग रहा था कि आप ही

649
00:46:02,560 --> 00:46:06,720
से बात हो रही है। नहीं आपने तो बस मेरा एक ही क्वेश्चन लिया

650
00:46:06,720 --> 00:46:09,200
अभी तक।

651
00:46:09,200 --> 00:46:13,600
अच्छा देखते हैं जरा इन चार लोगों के नाम दिख रहे हैं। हर्ष

652
00:46:13,600 --> 00:46:17,200
जी बोले।

653
00:46:17,200 --> 00:46:21,600
जय श्री राम भैया जय श्री राम। जय श्री राम।

654
00:46:21,600 --> 00:46:26,160
भैया पूछ रहे थे एक से बात हुआ था जो हम बोले थे कि

655
00:46:26,160 --> 00:46:30,240
जो मांसाहार होता है अगर वो वैष्णव को दिया जाए

656
00:46:30,240 --> 00:46:34,560
तो द उसे सम्मान पूर्वक मतलब मतलब मना

657
00:46:34,560 --> 00:46:38,800
कर दे। बलि वाला जो होता है ना प्रसाद वाला भी

658
00:46:38,800 --> 00:46:42,800
का तो उसको सम्मान पूर्वक मना कर दे। उसे द्वेष ना रखे

659
00:46:42,800 --> 00:46:46,800
और फिर वो मतलब ना खाएं एक तरह से। ठीक

660
00:46:46,800 --> 00:46:51,120
है? तो फिर दिमाग में आता है एक बार कि

661
00:46:51,120 --> 00:46:55,200
भक्त राज प्रहलाद जी थे। है ना? वो तो पूरे दत्य वंश में

662
00:46:55,200 --> 00:46:59,360
ही थे। उनके यहां तो मतलब वो तो परम वैष्णव

663
00:46:59,360 --> 00:47:03,440
है। परम भागवत है। लेकिन फिर भी उनका ऐसा परिस्थिति था

664
00:47:03,440 --> 00:47:05,760
जिसमें मतलब भोजन

665
00:47:05,760 --> 00:47:10,080
तो सात्विक था ही नहीं उसके यहां पे। उनके यहां पे तो फिर

666
00:47:10,080 --> 00:47:14,320
वो कैसे रहते होंगे उस समय पर? मतलब वो जब कुछ

667
00:47:14,320 --> 00:47:18,320
खाएंगे नहीं तो जीवित कैसे रहेंगे वहां पर तो सात्विक भोजन का तो कुछ

668
00:47:18,320 --> 00:47:22,560
प्रबंध तो बहुत ही सरल सवाल बहुत ही जगजाहिर प्रश्न

669
00:47:22,560 --> 00:47:26,800
है यह भावना आपके तब भी तो आनी चाहिए जब व्यक्ति

670
00:47:26,800 --> 00:47:30,880
को खाई में फेंका जा रहा है जब व्यक्ति को

671
00:47:30,880 --> 00:47:34,880
अग्नि में जलाया जा रहा है तब भी तो यह भावना आनी चाहिए कि वह कैसे जीवित

672
00:47:34,880 --> 00:47:38,880
रहेंगे अग्नि में जा रहे हैं कैसे रहे होंगे कैसे बताइए अग्नि

673
00:47:38,880 --> 00:47:42,880
में जाने के बाद भी वह जीवित कैसे रहे वो

674
00:47:42,880 --> 00:47:47,600
तो भगवान रक्षण किए उनका तो बस भगवान रक्षा किए

675
00:47:47,600 --> 00:47:51,680
तो बस तो मतलब ये तो एक सामान्य व्यक्ति

676
00:47:51,680 --> 00:47:55,680
के लिए परिस्थिति नहीं बन सकता ना मतलब वैसा परम भाव नहीं पहली बात तो

677
00:47:55,680 --> 00:47:59,680
ये है कि क्या आपने शब्द प्रमाण में ये जांच लिया है कि हर वक्त वहां

678
00:47:59,680 --> 00:48:04,080
पर केवल मास ही मिलता था जिस वस्तुनिष्ठता

679
00:48:04,080 --> 00:48:08,320
के साथ आपने देखा है वहां

680
00:48:08,320 --> 00:48:12,320
नहीं ऐसा तो नहीं कि अगर ऐसा तो नहीं अगर प्रह्लाद मांस

681
00:48:12,320 --> 00:48:18,320
नहीं खाते थे तो उनके लिए उन्हें शाकाहारी भोजन मिल जाता था।

682
00:48:18,640 --> 00:48:22,960
नहीं जैसा कि वहां का खुद का राजा जो उसके पिता था नहीं

683
00:48:22,960 --> 00:48:26,960
राजा पिता का पिता का पिता का राजा है। पिता होते हुए भी बहुत

684
00:48:26,960 --> 00:48:31,600
सारे ऐसे कार्य है जो पिता ने नहीं किए जो वो कर सकता था।

685
00:48:31,600 --> 00:48:35,600
भाई नीचता की कोई पराकाष्ठा तो है नहीं। कुछ

686
00:48:35,600 --> 00:48:39,840
भी कर सकता है वो उसके साथ। मगर उसकी

687
00:48:39,840 --> 00:48:44,080
भी एक मर्यादा थी। तो यह कहां से

688
00:48:44,080 --> 00:48:48,480
यह कहां से उद्भाषित हो रहा है कि वो अपने

689
00:48:48,480 --> 00:48:52,800
जो उसका बेटा यदि शाकाहारी और वो केवल मांसाहारी है

690
00:48:52,800 --> 00:48:57,280
तो वो अपने बेटे को विवश करता था कि तू मांस खा

691
00:48:57,280 --> 00:49:00,160
नहीं किया विवश

692
00:49:00,160 --> 00:49:04,160
नहीं वो तो वो प्रकरण नहीं मिलता लेकिन ये बात मन में आता

693
00:49:04,160 --> 00:49:08,320
है कि जैसे कि उसका जो राजा था वो उसको खुद ही एक दत्य बनाना चाहता

694
00:49:08,320 --> 00:49:12,320
था मतलब दैत्य राज बनाना चाहता था कि वो विष्णु का पूजन छोड़

695
00:49:12,320 --> 00:49:16,560
दे। उसको बहुत सारी यातनाएं दिया गया था ताकि वो अपना

696
00:49:16,560 --> 00:49:20,560
दैत्य वंश का जो मतलब राक्षस बन

697
00:49:20,560 --> 00:49:23,760
सके पूरा राक्षस मतलब विष्णु से द्रोही बने और

698
00:49:23,760 --> 00:49:29,760
वो ऐसा कहीं पर मेंशन है कि वो दैत्य बनाना चाहता था।

699
00:49:30,480 --> 00:49:34,640
उसको उसी के लिए तो यात्रा दिया कि तुम उसको छोड़ो। विष्णु को नहीं

700
00:49:34,640 --> 00:49:38,800
विष्णु को छोड़ो मतलब मेरी पूजा करो। मुझे भगवान मानो।

701
00:49:38,800 --> 00:49:43,040
दैत्य बनाना चाहता था। यह कहीं मैंने तो अभी जाना नहीं है।

702
00:49:43,040 --> 00:49:47,200
और अगर बनाना भी चाहता होगा तो उसकी मर्जी कि वह किस टेक्निक का यूज़

703
00:49:47,200 --> 00:49:49,680
करे।

704
00:49:49,680 --> 00:49:53,760
उसको दैत्य बनाने के लिए ये आवश्यक थोड़ी ना है कि उसको मांस खिला

705
00:49:53,760 --> 00:49:57,840
के ही शुरुआत की जाए। हो सकता है यह सोचा हो जब दैत्य बन जाएगा तब इसको मांस खिलाया

706
00:49:57,840 --> 00:50:01,040
करेंगे।

707
00:50:01,040 --> 00:50:05,200
मांस खिलाने से ना बनाकर दैत्य बनाने से

708
00:50:05,200 --> 00:50:09,280
मांस खिलाना शुरू करेंगे। ये भी तो हो सकता है तो इसमें शब्द प्रमाण

709
00:50:09,280 --> 00:50:13,680
की आवश्यकता होगी।

710
00:50:13,680 --> 00:50:17,920
लेकिन वो वो ठीक है वो जो भी करे वो

711
00:50:17,920 --> 00:50:22,080
लेकिन इसका जो चरित्र पढ़ते हैं तो ऐसे ही मेरे को लगता है कि वो बहुत विषम परिस्थिति

712
00:50:22,080 --> 00:50:26,080
था और उसका जो राज्य था वो तो दैत्य का ही था

713
00:50:26,080 --> 00:50:30,240
ना और दैत्य लोग तो शाकाहारी खाते नहीं है। ऐसा नहीं

714
00:50:30,240 --> 00:50:34,480
है। दैत्य केवल मांस खाता है। ये कहीं नहीं लिखा

715
00:50:34,480 --> 00:50:38,560
है। मांस भी खाता है यह ठीक है मगर

716
00:50:38,560 --> 00:50:43,840
केवल मांस खाता है यह नहीं

717
00:50:43,840 --> 00:50:48,000
अच्छा हां तो ये माना जा सकता है कि उनको मतलब

718
00:50:48,000 --> 00:50:52,320
सात्विक भोजन मिलता होगा हां कंध

719
00:50:52,320 --> 00:50:56,400
मिलते होंगे सीता माता भी तो दैत्यों के बीच में रही एक वर्ष तक तो

720
00:50:56,400 --> 00:51:00,800
उनको भोजन ही नहीं मिला इसका मतलब

721
00:51:00,800 --> 00:51:04,480
लग जाएगी

722
00:51:04,480 --> 00:51:08,960
हां लेकिन सीता सीता मैया के पास तो ये क्या बोलते हैं जो

723
00:51:08,960 --> 00:51:13,120
मंदोदरी देवी थी रावण की पत्नी वो तो खुद ही

724
00:51:13,120 --> 00:51:18,240
कुछ सुख सविदा भेजती थी ऐसा वर्णन मिलता है

725
00:51:18,240 --> 00:51:22,400
हां तो वर्णन का अभाव यहां भी है ना आप वर्णन का

726
00:51:22,400 --> 00:51:28,240
वो तो देखो कि वो वर्णन है कि नहीं कि मांस मांस ही मिलता था उसको

727
00:51:28,240 --> 00:51:32,560
उसके बाद यह माना जाएगा कि भाई भगवान ने उनकी रक्षा की मांस

728
00:51:32,560 --> 00:51:36,720
ना खाने की स्थिति में भी

729
00:51:36,720 --> 00:51:40,720
ठीक है। अच्छा अच्छा और एक और प्रश्न था जो कि

730
00:51:40,720 --> 00:51:45,280
आपसे पहले पूछे थे जो अनुलोम और प्रतिलोम

731
00:51:45,280 --> 00:51:50,560
वर्ण व्यवस्था का जो रावण का जो कैसे ब्राह्मण माना जाए क्योंकि

732
00:51:50,560 --> 00:51:55,360
कहा तो जाता है कि जो शद्रा से या फिर मतलब उससे नीचे से अगर

733
00:51:55,360 --> 00:51:59,840
किसी से संतान उत्पन्न होता है तो उसका वर्ण उसकी माता का ही हो जाता है।

734
00:51:59,840 --> 00:52:04,000
तो इसके हिसाब से रावण तो राक्षस वर्ण का था वो तो माना जाएगा लेकिन रावण

735
00:52:04,000 --> 00:52:06,880
कैसा

736
00:52:06,880 --> 00:52:11,200
नहीं ऐसा नहीं है

737
00:52:11,200 --> 00:52:15,200
हमने इस बारे में बताया है आपको कि द्वापर तक

738
00:52:15,200 --> 00:52:19,680
ऐसा था कि यदि

739
00:52:19,680 --> 00:52:23,920
पुरुष ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य होगा या

740
00:52:23,920 --> 00:52:28,240
अपने से जो जैसे ब्राह्मण

741
00:52:28,240 --> 00:52:32,320
क्षत्रिय से संग विवाह करेगा या क्षत्रिय वैश्य के

742
00:52:32,320 --> 00:52:37,840
साथ तो उत्पन्न होने वाली जो संतान है उसको पिता का

743
00:52:37,840 --> 00:52:41,840
वो मिल जाएगा कुल परंतु ऐसा

744
00:52:41,840 --> 00:52:46,400
नहीं वो श्रेष्ठतम क्षत्रिय नहीं हो पाएगा इस प्रकार से

745
00:52:46,400 --> 00:52:51,760
और कुछ लोगों के जो नाम लिए जाते हैं वो

746
00:52:51,760 --> 00:52:54,800
सामान्य

747
00:52:54,800 --> 00:52:58,800
प्रक्रिया नहीं है उनके जन्म की निम्न प्रक्रिया है

748
00:52:58,800 --> 00:53:03,280
कुछ अयोनेज है और कुछ की तो दिव्य ही प्रक्रिया

749
00:53:03,280 --> 00:53:08,320
है। जैसे उस उस दिन हमने लोम ऋषि के बारे में

750
00:53:08,320 --> 00:53:11,920
लोमर जी के बारे में

751
00:53:11,920 --> 00:53:16,080
जाना था। ठीक है। बाकी आपका मेरे पास लिखा रखा है। थोड़ा

752
00:53:16,080 --> 00:53:20,240
सा समय निकाल करके वो आपको भेजना भी

753
00:53:20,240 --> 00:53:24,560
है जिसमें कि जी भैया फिगर्स

754
00:53:24,560 --> 00:53:29,920
है वो लिखी हुई प्रमाण लिखे हुए हैं सब है ना श्लोक स्थल से

755
00:53:29,920 --> 00:53:33,920
जी जी वो लोग जो आज वो भी मैं भेज दूंगा वो भी मैं

756
00:53:33,920 --> 00:53:37,920
भेज दूंगा बाकी इसका निस्तारण यही है कि द्वापर

757
00:53:37,920 --> 00:53:42,240
तक ऐसा था कि श्रवण विवाह यदि

758
00:53:42,240 --> 00:53:46,480
अनुलोम हो रहा है। अनुलोम विवाह हो रहा है सवर्ण तो उसमें

759
00:53:46,480 --> 00:53:50,800
उत्पन्न होने वाली संतान को पिता का वर्ण प्राप्त

760
00:53:50,800 --> 00:53:54,800
होता था। परंतु अब क्या हुआ है कि माता-पिता की

761
00:53:54,800 --> 00:53:58,880
प्रज्ञा शक्ति ऑलरेडी इतनी कम हो गई है कि अब जब वो

762
00:53:58,880 --> 00:54:02,960
प्रज्ञा शक्ति घटेगी अनुलोम विवाह

763
00:54:02,960 --> 00:54:07,600
से। ठीक है? तो वो फिर वो जो एक डेडलाइन होगी ना

764
00:54:07,600 --> 00:54:10,160
कि इतनी प्रज्ञा शक्ति के बाद भैया वो ब्राह्मण

765
00:54:10,160 --> 00:54:14,560
क्षत्रिय वैश्य में नहीं आ पाएगा। है ना? तो उस डेडलाइन

766
00:54:14,560 --> 00:54:18,960
के अंदर क्रॉस हो जाने पर कलयुग में यह है कि अनुलोम विवाह

767
00:54:18,960 --> 00:54:23,200
यदि होगा

768
00:54:23,200 --> 00:54:27,440
अनुलोम विवाह यदि होगा तो उत्पन्न होने वाली संतान जो है वो वर्ण

769
00:54:27,440 --> 00:54:30,400
शंकर कहलाएगी।

770
00:54:30,400 --> 00:54:34,720
वर्ण संकट तो पूर्व भी है लेकिन अगर देखा जाए तो विदुर जी का भी तो द्वापर

771
00:54:34,720 --> 00:54:38,880
युग में ही थे उनको तो पारस कहा गया जो कि ब्राह्मण और शद्रा का कन्या

772
00:54:38,880 --> 00:54:42,960
उत्पन्न संतान को पारस्व कहा जाता है ना तो वो ब्राह्मण होता है और ना ही वो

773
00:54:42,960 --> 00:54:46,960
शद्र होता है वो पारस होता है ऐसा लिखा हुआ है विदुर जी का

774
00:54:46,960 --> 00:54:52,160
प्रकरण में तो विदुर जी को ब्राह्मण कहां माना गया है

775
00:54:52,160 --> 00:54:56,240
नहीं उनको ब्राह्मण नहीं आपने कहा ना कि पिता से उसको मान लिया

776
00:54:56,240 --> 00:55:00,560
जाता था द्वापर युग तक तो तो इस जगह पे तो विदुर जी का भी तो ब्राह्मण मान

777
00:55:00,560 --> 00:55:04,560
लिया जाता वो तो नहीं माना गया ना वही तो हम कह रहे कि वहां

778
00:55:04,560 --> 00:55:08,720
पे स्त्री का वर्ण भी मायने रखता है ना तो स्त्री का वर्ण

779
00:55:08,720 --> 00:55:12,720
रावण के केस में राक्षस ही है तो उसको रावण का तो

780
00:55:12,720 --> 00:55:16,480
द्वापर भी नहीं है

781
00:55:16,480 --> 00:55:21,360
रावण है

782
00:55:21,360 --> 00:55:25,520
ना तो ये तो ये तो तब भी था ना वर्ण संकर तो मतलब

783
00:55:25,520 --> 00:55:30,000
ये तो सनातन नियम है ना वर्ण का वर्ण संकर

784
00:55:30,000 --> 00:55:34,160
वाला जो नियम है उसमें जो परंपरा प्राप्त जो चीज है वह

785
00:55:34,160 --> 00:55:38,160
यही है कि जो मैंने आपको अभी बताया कि अनुलोम विवाह

786
00:55:38,160 --> 00:55:42,240
द्वापर तक यदि होता था तो उसमें ब्राह्मण जो पिता है उसका वर्ण मिल जाता

787
00:55:42,240 --> 00:55:46,400
था परंतु विदुर जी के साथ नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ ये देखना

788
00:55:46,400 --> 00:55:50,880
पड़ेगा और इसके संबंध में जो और वस्तुनिष्ठ जानकारियां

789
00:55:50,880 --> 00:55:55,360
है क्या कहते हैं कि

790
00:55:55,360 --> 00:55:59,440
अ ये अनुलोम वाली बात कहां लिखी है? द्वापरर्तक वाली

791
00:55:59,440 --> 00:56:03,600
बात कहां लिखी है? तो यह मैं आपको अभी भेज दूंगा। मेरे पास लिखा हुआ है।

792
00:56:03,600 --> 00:56:07,680
यह मैं आपको भेज दूंगा। जी ये देखने

793
00:56:07,680 --> 00:56:11,840
की बात है कि विदुर जी को क्यों नहीं माना गया? अगर ऐसा था।

794
00:56:11,840 --> 00:56:16,800
ठीक है। वो समझने वाली बात है। मगर परंतु

795
00:56:16,800 --> 00:56:20,880
परंपरा प्राप्त सिद्धांत क्या है? परंपरा प्राप्त

796
00:56:20,880 --> 00:56:25,200
सिद्धांत यही है कि द्वापर तक अनुलोम विवाह

797
00:56:25,200 --> 00:56:29,280
से उत्पन्न होने वाली जो संतान थी उनके पुत्र को भी अपने

798
00:56:29,280 --> 00:56:32,880
पिता का वर्ण ही प्राप्त था।

799
00:56:32,880 --> 00:56:36,960
यह परंपरा प्राप्त है। अब क्या होता है

800
00:56:36,960 --> 00:56:41,120
कि शास्त्र में कई जगह घुमा फिरा करके इस तरह की कई बातें होती

801
00:56:41,120 --> 00:56:45,440
है जिससे मन चकरा सकता है। इसीलिए तो गुरु होता है। है

802
00:56:45,440 --> 00:56:49,680
ना? तो उनके प्रति क्या भाव रखना चाहिए कि हां इसमें भी कुछ ना कुछ आंसर

803
00:56:49,680 --> 00:56:53,920
होगा जो हमें मिल जाएगा। तो इस भाव के साथ आप रहे आपको

804
00:56:53,920 --> 00:56:57,840
पहुंचा दिया।

805
00:56:57,840 --> 00:57:02,000
जी भैया कहने का मतलब है कि रावण को ब्राह्मण

806
00:57:02,000 --> 00:57:07,040
नहीं कहा जाना चाहिए था। नहीं नहीं मेरा यह कहने का या फिर

807
00:57:07,040 --> 00:57:11,840
या फिर यह कहने का कारण है यदि रावण

808
00:57:11,840 --> 00:57:17,120
को कहा गया तो विदुर जी को नहीं कहा जाना चाहिए था

809
00:57:17,120 --> 00:57:23,120
या विदुर जी को भी कहा जाना चाहिए था ब्राह्मण ये कहना चाहते

810
00:57:23,120 --> 00:57:27,200
नहीं शास्त्र में शंका इस बात की है कि यदि

811
00:57:27,200 --> 00:57:31,280
रावण को माना गया ब्राह्मण तो विदुर जी को क्यों नहीं माना गया

812
00:57:31,280 --> 00:57:35,600
अच्छा इसमें एक बात और है कि

813
00:57:35,600 --> 00:57:41,520
जिस तरीके से आप यह देख रहे हैं

814
00:57:41,520 --> 00:57:45,600
रावण का विवाह हुआ राक्षसी के साथ

815
00:57:45,600 --> 00:57:50,080
है ना हेलो जी राक्षसी

816
00:57:50,080 --> 00:57:54,000
कौन सा वर्ण है?

817
00:57:54,000 --> 00:57:58,240
राक्षस एक अलग वर्ण है। ऐसा पढ़े थे कहीं।

818
00:57:58,240 --> 00:58:02,320
राक्षस वर्ण है मतलब हर एक जो होता

819
00:58:02,320 --> 00:58:06,240
है ना इसके नीचे जाएंगे तो

820
00:58:06,240 --> 00:58:10,320
राक्षस योनि है राक्षस वर्ण नहीं

821
00:58:10,320 --> 00:58:13,040
है

822
00:58:13,040 --> 00:58:17,280
राक्षस योनि है

823
00:58:17,280 --> 00:58:21,440
हां वो तो है तो फिर इस तरह ब्राह्मण क्षत्रिय योनि भी है उसको

824
00:58:21,440 --> 00:58:25,440
वर्ण कैसे नहीं ब्राह्मण

825
00:58:25,440 --> 00:58:29,520
क्षत्रिय वैश्य योनि नहीं है ब्राह्मण क्षत्रिय

826
00:58:29,520 --> 00:58:33,520
वैश्य वर्ण है योनि मनुष्य है

827
00:58:33,520 --> 00:58:37,680
तो फिर इसमें लिखा हुआ है ना छंद उपनिषद पांच 10 सात में तो योनि वर्णन

828
00:58:37,680 --> 00:58:41,680
है ब्राह्मण योनि क्षत्रिय योनि इसमें वो तो

829
00:58:41,680 --> 00:58:45,920
वो तो वहां लोक व्यवहार की दृष्टि से कहा कह दिया गया उसको योनि

830
00:58:45,920 --> 00:58:48,880
मगर जब उसमें

831
00:58:48,880 --> 00:58:52,960
उसकी उस पर जाएंगे कि इसको किस रूप में लेना है योनि

832
00:58:52,960 --> 00:58:56,960
को तब तो वहां पर योनि तो मनुष्य हो गई भाई

833
00:58:56,960 --> 00:59:01,040
एक मनुष्य योनि है उससे उत्पन्न है। अब उसके अंतर्गत वो

834
00:59:01,040 --> 00:59:05,280
मनुष्य होते हुए ब्राह्मण योनि है तो उससे उत्पन्न है। ब्राह्मण योनि

835
00:59:05,280 --> 00:59:09,440
नहीं है। ब्राह्मण वर्ण का नाम है। योनि का नाम मनुष्य है।

836
00:59:09,440 --> 00:59:13,520
परंतु क्योंकि वो मनुष्य होते हुए ब्राह्मण योनि में उत्पन्न हुआ तो

837
00:59:13,520 --> 00:59:17,840
उसमें ब्राह्मण का एडजेक्टिव दे दिया गया है। वहां विशेषण

838
00:59:17,840 --> 00:59:22,000
दे दिया गया है। आप ब्राह्मण

839
00:59:22,000 --> 00:59:26,000
क्षत्रिय वैश्य को योनि ना माने। वह वहां पर एडजेक्टिव के रूप

840
00:59:26,000 --> 00:59:28,080
में है कि भाई मनुष्य

841
00:59:28,080 --> 00:59:32,400
होते हुए वह किस माता-पिता

842
00:59:32,400 --> 00:59:36,560
के गर्भ से जन्म लेगा तो ब्राह्मण

843
00:59:36,560 --> 00:59:41,520
योनि वहां कह दिया गया या चांडाल योनि वहां कह दिया गया

844
00:59:41,520 --> 00:59:43,760
डायरेक्ट

845
00:59:43,760 --> 00:59:47,760
मगर इसका मतलब ये थोड़ी ना है कि वो योनि का नाम है योनि का नाम है

846
00:59:47,760 --> 00:59:52,320
मनुष्य पशु योनि है अब

847
00:59:52,320 --> 00:59:56,400
उसके बाद पशु के बाद वो तो बाघ भी हो सकता है,

848
00:59:56,400 --> 01:00:00,400
गाय भी हो सकता है, सात्विक भी हो सकता

849
01:00:00,400 --> 01:00:03,680
है।

850
01:00:03,680 --> 01:00:08,320
मगर मुख्य रूप से योनि का जो प्रयोग जो

851
01:00:08,320 --> 01:00:12,400
वो होता है उपयोग वो इसी में होता है।

852
01:00:12,400 --> 01:00:18,400
कि वो मनुष्य है कि पशु है कि राक्षस है कि देवता है।

853
01:00:20,960 --> 01:00:25,040
भैया लेकिन ऐसा तो बहुत सारा

854
01:00:25,040 --> 01:00:29,040
जगह हम लिखा हुआ है भगवान कृष्ण भी भागवत में

855
01:00:29,040 --> 01:00:33,200
बोलते हैं आपको मैं जो बात बता रहा हूं

856
01:00:33,200 --> 01:00:37,840
ये परंपरा प्राप्त गुरुओं के द्वारा विवेचना की गई है जो वो बता रहा हूं

857
01:00:37,840 --> 01:00:41,920
आपने देखा है शास्त्र में शास्त्र के अर्थ को किस रूप में

858
01:00:41,920 --> 01:00:45,520
लेना है ये भी तो देखना पड़ेगा ना

859
01:00:45,520 --> 01:00:49,520
जी भैया लेकिन तो वहां पर वहां पर योनि का अर्थ

860
01:00:49,520 --> 01:00:55,520
है कि ब्राह्मण माता पिता के गर्भ से जन्म जन्म लेना

861
01:00:56,240 --> 01:01:00,320
वहां योनि का अर्थ ये नहीं है। योनि तो उसकी हो ही

862
01:01:00,320 --> 01:01:04,400
गई। अगर ब्राह्मण का मतलब ही है कि कोई मनुष्य है। ब्राह्मण, क्षत्रिय,

863
01:01:04,400 --> 01:01:08,400
वैश्य, चंद्राल इत्यादि की बात हो रही है।

864
01:01:08,400 --> 01:01:12,400
हम तो उसकी योनि तो निश्चित हो ही गई कि वो मनुष्य रूप में जन्म

865
01:01:12,400 --> 01:01:16,640
ले रहा है। फिर भी वहां ब्राह्मण योनि इसलिए कह दिया गया कि वो इनके गर्भ से जन्म

866
01:01:16,640 --> 01:01:20,720
लेगा। ब्राह्मण मां के गर्भ से जन्म लेगा। वहां पर भी तो योनि

867
01:01:20,720 --> 01:01:25,040
यूज़ होगा। अंग का नाम भी तो योनि है भैया यहां पर जनरेशन

868
01:01:25,040 --> 01:01:29,120
के लिए योनि का बात ब्राह्मण के जनरेशन के लिए ब्राह्मण योनि बट

869
01:01:29,120 --> 01:01:33,120
वहां पर योनि का अलग मतलब आता है जैसे पशु हो गया मनुष्य हो

870
01:01:33,120 --> 01:01:37,120
गया ये सब पेड़ पौधे हो गए ये सब अलग अलग ये

871
01:01:37,120 --> 01:01:43,120
जो राक्षस योनि है ये कौन से वर्ण में आएगी

872
01:01:43,840 --> 01:01:48,320
भैया हम इसमें देखे थे ना ये जो साधक संजीवनी है गीता में

873
01:01:48,320 --> 01:01:52,720
उसमें हम ये पढ़े थे कि हर सर हर एक का अपना अपना वर्ण

874
01:01:52,720 --> 01:01:56,880
पशु पक्षी में भी अपना अपना वर्ण होता है। सब इसको ये वर्ण मानेंगे

875
01:01:56,880 --> 01:02:01,040
इसको जैसे कि मैं वही तो आपसे पूछ रहा हूं कि राक्षस योनि

876
01:02:01,040 --> 01:02:05,120
में जो जिस माता से रावण के पिता

877
01:02:05,120 --> 01:02:09,360
की पिता का विवाह हुआ था उनकी उनका क्या

878
01:02:09,360 --> 01:02:12,880
वर्ण था?

879
01:02:12,880 --> 01:02:16,960
यह तो स्पष्ट नहीं है ना। उसमें वह तो राक्षस ही था और वर्ण तो फिर

880
01:02:16,960 --> 01:02:21,920
आप उसको उसके पीछे आपको पढ़ना ही नहीं चाहिए था। उसको एक दय

881
01:02:21,920 --> 01:02:26,080
आदि भौतिक वहां देखना चाहिए। फिर मनुष्य दृष्टि से उसको

882
01:02:26,080 --> 01:02:30,400
देखना ही नहीं चाहिए। वैसे भी समझ

883
01:02:30,400 --> 01:02:34,480
भैया भैया हम उसको समझ जाएंगे कि ये जो है राक्षस में भी कोई अलग

884
01:02:34,480 --> 01:02:38,800
वर्ण की होगी। ब्राह्मण वर्ण की मान लेते हैं। राक्षस में भी ब्राह्मण वर्ण होता है। तो

885
01:02:38,800 --> 01:02:42,880
बात ये हो गई कि जब मनुष्य की विवाह मनुष्य से हो

886
01:02:42,880 --> 01:02:47,440
ही नहीं रहा है। तो वहां पर तो ये वाला मामला

887
01:02:47,440 --> 01:02:51,760
खत्म ही हो गया ना। जो मनुष्य के ऊपर जो नियम लागू है वह वाला

888
01:02:51,760 --> 01:02:55,760
वो मनुष्य दृष्टि से देखी जाने वाली घटना है ही नहीं जो वहां

889
01:02:55,760 --> 01:02:59,520
पर मनुष्य के नियम लगे

890
01:02:59,520 --> 01:03:03,600
जैसे कि वर्ण को लेकर के जो विधि निषेध यहां

891
01:03:03,600 --> 01:03:07,680
पर है सेम विधि निषेध जो देवताओं में है वो

892
01:03:07,680 --> 01:03:12,240
नहीं है वहां पर भी ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र है मगर

893
01:03:12,240 --> 01:03:16,240
वो नियम नहीं है जो यहां पर है तो

894
01:03:16,240 --> 01:03:20,240
फिर तो महाभारत के हिसाब से तो घटोत्कच जो था वो तो राक्षस से

895
01:03:20,240 --> 01:03:26,240
जो उत्पन्न है तो उसको क्षत्रिय माना जा

896
01:03:28,160 --> 01:03:32,560
हां तो क्षत्रिय पिता से उत्पन्न है तो माना जा सकता है क्षत्रिय क्षत्रिय

897
01:03:32,560 --> 01:03:36,640
कुल का लेकिन सब जगह उसे तो केवल राक्षस वर्ण

898
01:03:36,640 --> 01:03:41,280
है खाली राक्षस ही लिखा है राक्षस क्यों नहीं बताई गई है ना

899
01:03:41,280 --> 01:03:46,000
अगर कहीं वर्ण बताया गया हो विपरीत तो बताइए

900
01:03:46,000 --> 01:03:50,160
वर्ण ही तो नहीं बताया तो उसे तो राक्षस ही बोलेंगे तो फिर तो फिर आपको

901
01:03:50,160 --> 01:03:55,680
उसे क्षत्रिय मानने में क्या आपत्ति हो रही है?

902
01:03:55,680 --> 01:03:59,840
क्योंकि श्रेष्ठतम मनुष्य है। मनुष्य से नीचे सबसे

903
01:03:59,840 --> 01:04:03,920
नीचे जो आता है मतलब एक क्या बोलते हैं? पद

904
01:04:03,920 --> 01:04:08,240
के हिसाब से अगर नीचे जाएगा तो शूद्र आएगा। शूद्र से नीचे जाएगा तो चांडाल

905
01:04:08,240 --> 01:04:12,480
उससे नीचे जाएंगे तो राक्षस। उसके नीचे जाएंगे तो पशु पक्षी। इस तरह से एक

906
01:04:12,480 --> 01:04:16,640
क्रमावली क्रम है। ऐसा हम कहीं पढ़े

907
01:04:16,640 --> 01:04:21,520
थे इसको कि इस तरह से कहां कहां पढ़ी है ये वाली

908
01:04:21,520 --> 01:04:25,520
ये तो कहीं तो हम पढ़े थे अभी उसका स्क्रीनशॉट नहीं है

909
01:04:25,520 --> 01:04:29,680
लेकिन जो राक्षस योनि है वो ये नीचे

910
01:04:29,680 --> 01:04:33,840
जाएगा तो नीचे जाएगा वो ठीक है नीचे जाना

911
01:04:33,840 --> 01:04:37,840
परंतु यदि राक्षस ये आप जन्मांतर का भेद बता

912
01:04:37,840 --> 01:04:40,320
रहे हैं।

913
01:04:40,320 --> 01:04:44,320
यह आप जन्मांतर का भेद बता रहे हैं ना। परंतु यदि

914
01:04:44,320 --> 01:04:48,320
वो राक्षस बनके सामने उसी जन्म में उसी समय पर एक ही

915
01:04:48,320 --> 01:04:52,400
समय धारा में दोनों लोग खड़े हुए हैं तो वो क्षत्रिय

916
01:04:52,400 --> 01:04:56,960
पिता से उत्पन्न ही तो माना जाएगा।

917
01:04:56,960 --> 01:05:01,520
अब क्योंकि उसके अंदर जो लक्षण है

918
01:05:01,520 --> 01:05:05,600
वह राक्षस वाले ही ज्यादा परिलक्षित हो रहे हैं।

919
01:05:05,600 --> 01:05:10,320
ज्यादा वो राक्षस से ही दिख रहा है। इसलिए लोकाचार में उसे राक्षस ही कहा गया।

920
01:05:10,320 --> 01:05:13,920
इतनी सी बात है।

921
01:05:13,920 --> 01:05:17,920
परंतु अपना धर्म होता है। परंतु उसका वर्ण भी ऐसा नहीं

922
01:05:17,920 --> 01:05:22,000
बताया गया कि वो जो है वर्ण से क्षत्रिय नहीं है या ये

923
01:05:22,000 --> 01:05:26,080
नहीं है या वो नहीं है। क्षत्रिय क्षत्रिय जो है

924
01:05:26,080 --> 01:05:30,800
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र ये

925
01:05:30,800 --> 01:05:35,520
इसी पर्टिकुलर योनि के अंतर्गत आने वाले भेद हैं।

926
01:05:35,520 --> 01:05:40,080
और मनुष्य राक्षस पशु

927
01:05:40,080 --> 01:05:44,080
यह जीव के द्वारा अमुक अमुक योनि

928
01:05:44,080 --> 01:05:48,880
में उत्पन्न होने वाले भेद है। जैसे

929
01:05:48,880 --> 01:05:52,480
दूध की तुलना

930
01:05:52,480 --> 01:05:57,040
गाय के दूध की तुलना भैंस के दूध से हो सकती है। भैंस के दूध की तुलना

931
01:05:57,040 --> 01:06:01,120
बकरी के दूध से हो सकती है कि इनमें कितने गुण है। इनमें कितना गुण

932
01:06:01,120 --> 01:06:05,120
है। इनमें कितना गुण है। मगर दूध से बनने वाले प्रोडक्ट

933
01:06:05,120 --> 01:06:09,120
से ही दूध की तुलना नहीं होती है। दूध की तुलना

934
01:06:09,120 --> 01:06:14,560
पनीर से नहीं होगी। पनीर का उपयोग परवसान अलग चीज अलग चीजों में है।

935
01:06:14,560 --> 01:06:18,560
तो इसी प्रकार से मनुष्य और

936
01:06:18,560 --> 01:06:22,560
राक्षस की तुलना हो रही है। मनुष्य और देवताओं की

937
01:06:22,560 --> 01:06:27,440
तुलना होगी। राक्षस और देवताओं की तुलना होगी। परंतु

938
01:06:27,440 --> 01:06:33,440
ऐसा नहीं होगा कि मनुष्य की तुलना ब्राह्मण से हो जाए।

939
01:06:35,280 --> 01:06:39,520
उसी प्रकार से यहां पर आप जो कह रहे हैं ना कि वो

940
01:06:39,520 --> 01:06:43,600
राक्षस था तो उसका वर्ण अलग था तो

941
01:06:43,600 --> 01:06:48,000
राक्षस होना एक योनि ही अलग हो गई। इसका अर्थ क्या हुआ

942
01:06:48,000 --> 01:06:52,800
कि वो जो मनुष्य वाला विवाह है ही नहीं।

943
01:06:52,800 --> 01:06:56,800
मनुष्य दृष्टि से देखा जाने वाला विवाह है ही नहीं। वो

944
01:06:56,800 --> 01:07:00,800
भैया। लेकिन स्कंद पुराण में जो रावण का वर्णन आता

945
01:07:00,800 --> 01:07:05,040
है कि उनसे जो प्रश्न पूछा गया था कि यह तो राक्षस था तो फिर राम जी को ब्रह्म

946
01:07:05,040 --> 01:07:09,360
हत्या का दोष कैसा लगा है ना तो फिर उसप जो

947
01:07:09,360 --> 01:07:13,360
जो ऋषि है वो बताते हैं कि वो ब्रह ब्रह्म के अंश से

948
01:07:13,360 --> 01:07:18,480
उत्पन्न हुआ था ब्राह्मण के अंश से इसलिए उसका वध करने से वो

949
01:07:18,480 --> 01:07:22,480
राम जी को ब्रह्म हत्या का दोष लगा जैसे कि वृतरासुर को इंद्र जब मारा

950
01:07:22,480 --> 01:07:26,640
था तो वो भी ब्रह्म अंश से उत्पन्न था इसलिए उसको भी ब्रह्म हत्या का दोष लगा

951
01:07:26,640 --> 01:07:30,720
लेकिन लेकिन वो उत्पन्न हुआ था ब्रह्म अंश से लेकिन उसको ब्राह्मण

952
01:07:30,720 --> 01:07:35,040
नहीं बताया गया। उसको राक्षस आपकी गलती है यहां

953
01:07:35,040 --> 01:07:39,200
यही आपकी गलती है। यहां पे

954
01:07:39,200 --> 01:07:43,520
एक किसी ने बात कही कि वो तो राक्षस था। उसको ब्राह्मण

955
01:07:43,520 --> 01:07:47,520
क्यों ब्रह्म हत्या का पाप क्यों लगा? तो

956
01:07:47,520 --> 01:07:50,560
वहां उसकी उस शंका को दूर कर दिया गया। क्योंकि

957
01:07:50,560 --> 01:07:55,120
वह ब्राह्मण पिता के उससे उत्पन्न है इसलिए वह ब्राह्मण है।

958
01:07:55,120 --> 01:07:59,120
उसकी गलतफहमी को दूर कर दिया गया। जैसे कि आप ही की बात

959
01:07:59,120 --> 01:08:03,200
ले लो। आप ही ने कई बार बताया है। यह गलतफहमी युधिष्ठिर को हुई थी कि

960
01:08:03,200 --> 01:08:07,200
भैया वो विश्वामित्र जी वहां पर क्यों हुए?

961
01:08:07,200 --> 01:08:11,440
तो विश्वा तो युधिष्ठिर ने यदि ये गलतफहमी अपनी

962
01:08:11,440 --> 01:08:16,080
प्रकट कर दी। विश्वामित्र जी को लेकर के तो उससे

963
01:08:16,080 --> 01:08:20,320
वो प्रमाण थोड़ी ना हो गया। वो तो शंका के रूप में पूछा ही जा रहा है।

964
01:08:20,320 --> 01:08:25,120
उसका उसका निदान किया भीष्म जी भीष्म जी ने

965
01:08:25,120 --> 01:08:29,360
तो वो शंका के रूप में कहा गया वाक्य है। उसको आप प्रमाण के रूप में क्यों

966
01:08:29,360 --> 01:08:34,000
ले रहे हैं कि उसको राक्षस माना जा रहा है। ब्राह्मण ना माने नहीं नहीं

967
01:08:34,000 --> 01:08:38,160
वो नहीं वो नहीं इस तरह से अगर विश्वामित्र जी का बात अगर करें

968
01:08:38,160 --> 01:08:43,680
तो विश्वामित्र जी का में ये प्रकरण है कि जो

969
01:08:43,680 --> 01:08:48,080
बोल रहे हैं हर्ष आप वो विश्वामित्र जी वाला प्रसंग मत छेड़िए आप

970
01:08:48,080 --> 01:08:52,560
मैं ये कह रहा हूं कि यह शंका में बोला गया वाक्य है

971
01:08:52,560 --> 01:08:56,640
जो आपने स्कंद पुराण का वचन बताया है यह शंका में बोला

972
01:08:56,640 --> 01:09:01,520
गया वाक्य है यह ऐसा नहीं है कि रावण तो

973
01:09:01,520 --> 01:09:05,520
रावण तो इन इन सिद्धांतों के अनुसार राक्षस है।

974
01:09:05,520 --> 01:09:06,080
ब्राह्मण

975
01:09:06,080 --> 01:09:10,320
नहीं है। तो ब्राह्मण क्यों कह रहे हैं आप उसे?

976
01:09:10,320 --> 01:09:14,720
तो उन्होंने बताया क्योंकि ये ब्राह्मण से उत्पन्न है इसलिए ब्राह्मण

977
01:09:14,720 --> 01:09:18,960
भी है। इसलिए ब्रह्मत्या का दोष लगा। जो आपने

978
01:09:18,960 --> 01:09:22,960
जो संदर्भ दिया है उसी संदर्भ में आपका उत्तर प्राप्त

979
01:09:22,960 --> 01:09:27,040
है। आपको कि ब्राह्मण से उत्पन्न होने के कारण रावण को

980
01:09:27,040 --> 01:09:31,360
ब्राह्मण भी माना गया है। राक्षस उसकी योनि

981
01:09:31,360 --> 01:09:35,680
थी और ब्राह्मण उसका रक्त था। उसका बीज

982
01:09:35,680 --> 01:09:41,680
था जो उसे उसके पिता से प्राप्त हुआ था।

983
01:09:42,160 --> 01:09:47,120
मेरा इसमें प्रश्न उठ रहा है लेकिन शायद अभी

984
01:09:47,120 --> 01:09:51,440
बात से रिलेटेड है या कोई और है? नहीं यही वर्ण

985
01:09:51,440 --> 01:09:55,440
को लेकर के ही जो मेरा जो दिमाग में जितना सारा हम जो पढ़े है ना तो उसको उठा

986
01:09:55,440 --> 01:10:00,080
उठा के जो आ रहा है बीच में तो अभी हम यहां पे बोलेंगे तो लंबा चल जाएगा शायद

987
01:10:00,080 --> 01:10:04,160
आप सबसे पहले एक सिद्धांत को समझ लीजिए। परंपरा प्राप्त आचार्यों

988
01:10:04,160 --> 01:10:08,160
द्वारा बताया गया है कि द्वापर तक यदि

989
01:10:08,160 --> 01:10:12,240
अनुलोम विवाह होता है। प्रतिलोम नहीं अनुलोम अनुलोम

990
01:10:12,240 --> 01:10:16,400
विवाह होता है तो उससे उत्पन्न संतान को ब्राह्मणत्व क्षत्रियत्व

991
01:10:16,400 --> 01:10:20,480
अपने पिता का जो वर्ण है वो प्राप्त हो जाता है। पहली बात यह परंपरा

992
01:10:20,480 --> 01:10:24,880
प्राप्त सिद्धांत है। इसके समर्थन में काफी सारी बातें अभी हो गई है।

993
01:10:24,880 --> 01:10:29,200
कुछ और भी चीजें हैं जो लिखित में है वह हम आपको भेज देंगे। दूसरी

994
01:10:29,200 --> 01:10:33,280
बात यह है कि रावण के पिता का विवाह एक राक्षसी से

995
01:10:33,280 --> 01:10:37,360
होने को आप मनुष्य दृष्टि से ना देखें क्योंकि वह

996
01:10:37,360 --> 01:10:41,520
दो अलग-अलग योनियों में होने वाला विवाह है। जैसे किसी देवता

997
01:10:41,520 --> 01:10:45,760
से विवाह हो जाए किसी मनुष्य का

998
01:10:45,760 --> 01:10:51,360
देवता। अब उसको आप मनुष्य कृत ढंग से देखेंगे क्या?

999
01:10:51,360 --> 01:10:55,360
चलिए वो तो हम समझ गए। यह तो हम समझ गए

1000
01:10:55,360 --> 01:10:57,200
कि अगर वो मनुष्य में नहीं वर्ण में नहीं

1001
01:10:57,200 --> 01:11:01,360
आता तो हम उसको अलग तरीका से देख लेंगे तो उसमें वर्ण जो अप्लाई होगा वो मनुष्य

1002
01:11:01,360 --> 01:11:05,440
के हिसाब से वर्ण अप्लाई होगा जैसे रावण ब्राह्मण है ऋषि के पुत्र था

1003
01:11:05,440 --> 01:11:09,440
उसको ब्राह्मण बोल इसी तरीके से कक्ष को भी

1004
01:11:09,440 --> 01:11:13,760
इसी तरीके से घटोत्कक्ष को भी आप क्षत्रिय पिता से उत्पन्न होने के कारण क्षत्रिय

1005
01:11:13,760 --> 01:11:17,920
के रूप में ही देखें। हां उसकी योनि उसे

1006
01:11:17,920 --> 01:11:22,240
माता की वजह से राक्षस की प्राप्त हो गई।

1007
01:11:22,240 --> 01:11:24,480
ठीक है?

1008
01:11:24,480 --> 01:11:28,480
अच्छा पर भैया ये जो विवाह ये

1009
01:11:28,480 --> 01:11:33,360
विवाह भी दय है।

1010
01:11:33,360 --> 01:11:37,520
यह विवाह भी दय है। घटोत्कक्ष के साथ जो

1011
01:11:37,520 --> 01:11:41,840
इनका है भीम का। ठीक है? साधारण दृष्टि से देखा जाने

1012
01:11:41,840 --> 01:11:45,920
योग्य नहीं है। अब जैसे कई बार लोग द्रोपदी पर कहते हैं उनके

1013
01:11:45,920 --> 01:11:51,920
पांच पति द्रोपदी अयोनिस्ट थी।

1014
01:11:52,800 --> 01:11:56,960
अयोनिस्ट थी ना तो उनप से वैसे ही नियम लागू

1015
01:11:56,960 --> 01:12:02,480
नहीं होंगे जैसे मनुष्यों पे होते हैं लागू।

1016
01:12:02,480 --> 01:12:06,560
मैंने अभी कहा ना कि देवताओं के यहां भी नियम है पर वो

1017
01:12:06,560 --> 01:12:09,600
हमसे अलग है।

1018
01:12:09,600 --> 01:12:12,080
ठीक है।

1019
01:12:12,080 --> 01:12:16,640
जी वो तो हम इसको हम इस तरह से हम समझ लेंगे। लेकिन

1020
01:12:16,640 --> 01:12:20,720
क्या बोलते हैं? यह जो राक्षस में वर्ण होता है,

1021
01:12:20,720 --> 01:12:24,800
पशु पक्षी में भी वर्ण होता है, पौधों में भी पेड़ पौधों में भी

1022
01:12:24,800 --> 01:12:28,800
वर्ण होता है। इसका कोई है मतलब शास्त्र में इसका कोई वर्णन होगा

1023
01:12:28,800 --> 01:12:33,360
कहीं ना कहीं वो तो हम जानते कि उसमें

1024
01:12:33,360 --> 01:12:37,680
उपनिषदों में है। अगर उसका कोई रेफरेंस

1025
01:12:37,680 --> 01:12:43,680
मिल जाता ना तो हम मतलब रेफरेंस भेज दूंगा।

1026
01:12:43,760 --> 01:12:47,760
जी भैया तब मेरा हो जाएगा। तब हम वो लोग हम भड़ पाएंगे नहीं

1027
01:12:47,760 --> 01:12:53,760
तो वो लोग बहुत अनर्ग प्रलाप करता रहता है।

1028
01:12:54,720 --> 01:12:59,120
किसी व्यक्ति से प्रभावित मत होइए आप। भैया

1029
01:12:59,120 --> 01:13:03,120
भक्ति का बल बढ़ाइए। भक्ति का बल बढ़ाइए

1030
01:13:03,120 --> 01:13:07,120
जिससे कि मन व्यथित ना हो, विचलित

1031
01:13:07,120 --> 01:13:11,200
ना हो, परेशान आप ना हो। किसी के भी उससे

1032
01:13:11,200 --> 01:13:14,240
कर्म अवश्य करें।

1033
01:13:14,240 --> 01:13:20,240
कर्म अवश्य करें। परंतु

1034
01:13:21,440 --> 01:13:27,440
आप रुक जाइए। मैं आपको बता रहा हूं प्रमाण।

1035
01:13:32,960 --> 01:13:38,960
उपनिषद में चौथे अध्याय में दिया गया है।

1036
01:13:46,960 --> 01:13:51,120
दूसरा तैत उपनिषद में दिया गया है। जैसे मनुष्य में ब्राह्मण है वैसे ही पशुओं

1037
01:13:51,120 --> 01:13:55,440
में अज छाग है। जैसे मनुष्यों में क्षत्रिय है वैसे ही पशुओं

1038
01:13:55,440 --> 01:13:59,680
में मेढ़ा है। जैसे मनुष्यों में वैश्य है वैसे ही पशुओं में गाय

1039
01:13:59,680 --> 01:14:04,480
है। जैसे मनुष्यों में शूद्र है वैसे ही पशुओं में घोड़ा है।

1040
01:14:04,480 --> 01:14:10,080
ठीक है? यह किस में दिया है? तैत्री उपनिषद

1041
01:14:10,080 --> 01:14:14,160
अग्नि पुराण में क्या गाय गाय को तो ब्राह्मण

1042
01:14:14,160 --> 01:14:19,360
वर्ण में माना गया है। उसमें लिखा कहां लिखा है?

1043
01:14:19,360 --> 01:14:23,440
साधक संजीव विधि में लिखा हुआ था। लड़की है। वैसे एक

1044
01:14:23,440 --> 01:14:29,440
मिनट बताएंगे कहां पर लिखा है ये? याद है आपको?

1045
01:14:30,720 --> 01:14:34,880
आपका आवाज नहीं आ रहा। साधक संजीवनी में कहां पर लिखा है? याद

1046
01:14:34,880 --> 01:14:38,320
है आपको?

1047
01:14:38,320 --> 01:14:43,920
चतुर वर्ण नया सिस्टम वाला उसी में एक मिनट

1048
01:14:43,920 --> 01:14:46,320
चार 13

1049
01:14:46,320 --> 01:14:50,400
आपका मुख्य विषय क्या था

1050
01:14:50,400 --> 01:14:54,720
कि रावण को लेकर के जानकारी का अभाव

1051
01:14:54,720 --> 01:15:00,720
कि उनके पिता जो है अगर ब्राह्मण थे

1052
01:15:00,720 --> 01:15:05,600
और आपके प्रश्न में ही आपके प्रश्न का उत्तर है।

1053
01:15:05,600 --> 01:15:09,920
रावण को राक्षस भी कहा गया है और ब्राह्मण भी कहा गया है।

1054
01:15:09,920 --> 01:15:14,080
तो क्योंकि वह राक्षस योनि उसको प्राप्त हुई थी माता के कारण

1055
01:15:14,080 --> 01:15:18,240
तो वो राक्षस हुआ और क्योंकि वो ब्राह्मण पिता से उत्पन्न

1056
01:15:18,240 --> 01:15:22,800
था तो ब्राह्मण हुआ। सर उनको ज्ञान

1057
01:15:22,800 --> 01:15:27,280
एक मिनट उसको केवल ब्राह्मण या केवल राक्षस तो नहीं कहा गया है।

1058
01:15:27,280 --> 01:15:31,680
उसको ब्राह्मण और राक्षस दोनों कहा गया। हां

1059
01:15:31,680 --> 01:15:35,840
यदि उसको केवल ब्राह्मण कहा गया होता तो यह कहते हम कि

1060
01:15:35,840 --> 01:15:39,920
उसकी वो राक्षस वाली जो चीज थी वह कैसे गण कर दी गई

1061
01:15:39,920 --> 01:15:44,000
या उसको केवल राक्षस कहा गया होता तो हम कहते वहां

1062
01:15:44,000 --> 01:15:45,760
ये नियम लागू क्यों नहीं हुआ

1063
01:15:45,760 --> 01:15:49,920
उसको ब्राह्मण क्यों नहीं वहां पे वहां वहीं पे क्योंकि योनि के

1064
01:15:49,920 --> 01:15:53,920
अनुसार वो राक्षस है तो उसको राक्षस कहा गया वर्ण के

1065
01:15:53,920 --> 01:15:58,960
अनुसार वो ब्राह्मण है तो ब्राह्मण कहा गया ये आपका मूल प्रश्न था

1066
01:15:58,960 --> 01:16:03,360
अभी की रामायण में भैया वाल्मीकि रामायण में उसको

1067
01:16:03,360 --> 01:16:07,520
कहां-कहां पे ब्राह्मण जिक्र है तो हम ये दिखा पाए

1068
01:16:07,520 --> 01:16:11,920
रखेंगे ना इसका प्रमाण कई जगह होगा कई जगह होगा अध्ययन करिए

1069
01:16:11,920 --> 01:16:14,720
मिल जाएगा

1070
01:16:14,720 --> 01:16:18,800
नहीं आपको पता होगा इसलिए पूछ लिए उसमें होगा कहीं ना कहीं

1071
01:16:18,800 --> 01:16:22,880
तो आपको याद हो एक नहीं

1072
01:16:22,880 --> 01:16:27,520
है तो

1073
01:16:27,520 --> 01:16:32,000
एक जगह भी अगर ब्राह्मण दिख वाल्मीकि रामायण में तब तो नया प्रमाण इसमें

1074
01:16:32,000 --> 01:16:36,000
स्पष्ट हो जाता है कि स्मृति का जो प्रमाण है वो त्रेता पे अप्लाई नहीं होता

1075
01:16:36,000 --> 01:16:40,320
है। स्कंद पुराण में ही आपका उत्तर मिल गया। हालांकि रामायण

1076
01:16:40,320 --> 01:16:44,560
में मिल जाएगा। स्कंद पुराण में मिल तो गया क्योंकि वो ब्राह्मण से उत्पन्न है इसलिए

1077
01:16:44,560 --> 01:16:49,360
ब्राह्मण है।

1078
01:16:49,360 --> 01:16:53,520
ब्रह्म राक्षस का उपाधि है वहां पर तो ना ब्रह्म

1079
01:16:53,520 --> 01:16:57,760
राक्षस अलग हो गया। ब्रह्म राक्षस का अर्थ ब्रह्म

1080
01:16:57,760 --> 01:17:01,760
ब्राह्मण और राक्षस नहीं है। ब्रह्म राक्षस का

1081
01:17:01,760 --> 01:17:06,000
अर्थ वहां पर जो दय उसके द्वारा बनाया

1082
01:17:06,000 --> 01:17:12,000
गया बना हुआ राक्षस है। श्राप इत्यादि के द्वारा

1083
01:17:12,240 --> 01:17:18,240
चार 13 में

1084
01:17:20,000 --> 01:17:24,160
पक्षियों में कबूतर आदि ब्राह्मण बाज आदि क्षत्रिय चील आदि

1085
01:17:24,160 --> 01:17:28,320
वैश्य और कौवा आदि शूद्र पक्षी है। इसी प्रकार

1086
01:17:28,320 --> 01:17:32,560
वृक्षों में आदि ब्राह्मण, नीम, पीपल

1087
01:17:32,560 --> 01:17:35,840
आदि ब्राह्मण ये हैं।

1088
01:17:35,840 --> 01:17:41,840
हम और

1089
01:17:43,120 --> 01:17:49,120
यहां पे गाय के बारे में तो नहीं लिखा है।

1090
01:17:51,840 --> 01:17:55,840
नहीं पढ़े थे उसमें था शायद। नहीं शायद नहीं यहां पर

1091
01:17:55,840 --> 01:18:00,240
आ गया हूं मैं उस पैराग्राफ पर यहां देखिए चातुर्व्यम

1092
01:18:00,240 --> 01:18:04,400
पद प्राणी मात्र का उपलक्षण है। इसका तात्पर्य

1093
01:18:04,400 --> 01:18:08,640
है कि मनुष्य ही चार प्रकार के नहीं होते अपितु पशु पक्षी वृक्ष

1094
01:18:08,640 --> 01:18:12,880
आदि भी चार प्रकार के होते हैं। जैसे पक्षियों में कबूतर

1095
01:18:12,880 --> 01:18:17,120
आदि ब्राह्मण बाज आदि क्षत्रिय चील आदि

1096
01:18:17,120 --> 01:18:21,360
वैश्य कौवा आदि शूद्र पक्षी है। इसी प्रकार वृक्षों

1097
01:18:21,360 --> 01:18:25,680
में पीपल आदि ब्राह्मण, नीम आदि क्षत्रिय, इमली

1098
01:18:25,680 --> 01:18:30,240
आदि वैश्य और बबूल आदि शूद्र वृक्ष हैं। परंतु

1099
01:18:30,240 --> 01:18:34,800
यहां चातुर्व्यम पद से मनुष्यों को ही लेना चाहिए।

1100
01:18:34,800 --> 01:18:40,800
तो इसमें अब गाय की बात तो हुई नहीं कहीं। पशुओं की बात ही नहीं की है इन्होंने।

1101
01:18:44,800 --> 01:18:48,960
और आप हमको बार-बार कह रहे हैं कि साधक संजीवनी

1102
01:18:48,960 --> 01:18:53,120
में जो है राम सुखदास जी ने गाय को ब्राह्मण कह

1103
01:18:53,120 --> 01:18:55,760
दिया है

1104
01:18:55,760 --> 01:18:59,760
और उसकी वजह से कम से कम हमारे 15 मिनट 20 मिनट तो एक्स्ट्रा गए

1105
01:18:59,760 --> 01:19:05,760
हैं। अब आप हमें बताएं कि गाय कहां कहां है?

1106
01:19:06,560 --> 01:19:11,440
हो सकता है गलती हो गया। यह आपका

1107
01:19:11,440 --> 01:19:15,600
मनोनीत भ्रम है क्योंकि आपने गाय

1108
01:19:15,600 --> 01:19:19,600
को ब्राह्मण के रूप में देखा होगा इसलिए आपने सोच लिया

1109
01:19:19,600 --> 01:19:23,600
कि साधक संजीवनी में गाय को ब्राह्मण लिख दिया है

1110
01:19:23,600 --> 01:19:28,560
राम सुखदास जी ने हां

1111
01:19:28,560 --> 01:19:32,800
हां भैया ऐसा ही होगा और हमसे भी दोष करवा रहे हो हमें

1112
01:19:32,800 --> 01:19:37,200
हमें वहां पर जो है राम सुखदास जी के लिए कहना पड़ रहा है कि वह हमारे लिए

1113
01:19:37,200 --> 01:19:42,000
प्रमाण नहीं है नहीं नहीं ऐसा तो आपने कहा ही नहीं

1114
01:19:42,000 --> 01:19:46,000
हां ऐसा बोले ही नहीं क्योंकि आप तो सभी प्रमाणिक आचार्य

1115
01:19:46,000 --> 01:19:50,000
का मानते ही

1116
01:19:50,000 --> 01:19:54,240
कहीं तो हम इसको पढ़े थे ऐसा इसी वो आपका भ्रम है

1117
01:19:54,240 --> 01:19:58,480
मनोनीत भ्रम है आपका क्योंकि आपका पहले से एक

1118
01:19:58,480 --> 01:20:02,480
वो है कि गाय को ब्राह्मण के क्योंकि गाय सर्वश्रेष्ठ

1119
01:20:02,480 --> 01:20:06,640
पशु है तब सर्वाधिक महत्वपूर्ण है सनातन धर्म के

1120
01:20:06,640 --> 01:20:10,640
लिए तो उसी दृष्टि के कोण से आपने उसे ब्राह्मण माना हो।

1121
01:20:10,640 --> 01:20:15,600
ठीक है।

1122
01:20:15,600 --> 01:20:21,040
चलिए ठीक है। फिर आज की हम पूरी करें।

1123
01:20:21,040 --> 01:20:26,560
हो गया काफी किरण जी आप बताएं।

1124
01:20:26,560 --> 01:20:30,560
ये शिवा जी जो आप कहते हो ना कि मतलब जन्म से नॉमिनेशन और

1125
01:20:30,560 --> 01:20:34,720
करण से सिलेक्शन। तो आप ये कहते हो कि व्यवस्था होगा

1126
01:20:34,720 --> 01:20:38,800
तो फिर पैरामीटर्स क्या होंगे कर्म के कि हम सिलेक्ट कर सके तो ये

1127
01:20:38,800 --> 01:20:43,040
बात तो जनना पर भी लागू होता है कि सोचे हमने जन्म से नॉमिनेट

1128
01:20:43,040 --> 01:20:49,040
कर लिया फिर कर्म कैसे चेक करेंगे क्या पैरामीटर

1129
01:20:49,680 --> 01:20:55,680
कर्म से कैसे चेक करेंगे

1130
01:20:56,480 --> 01:21:01,200
मतलब सोचिए किसी को आपने नॉमिनेट कर लिया कि हां यह ब्राह्मण

1131
01:21:01,200 --> 01:21:05,280
तो फिर उसके बाद कैसे पैराटर्स मतलब कर्म के पैरामीटर्स कैसे

1132
01:21:05,280 --> 01:21:09,440
मतलब कैसे चेक करेंगे कि ये तो चलो ब्राह्मण है अब इसके गुण कर्म कैसे

1133
01:21:09,440 --> 01:21:13,920
चेक करेंगे वो जो काम कर रहे हो उसके

1134
01:21:13,920 --> 01:21:19,440
ब्राह्मण का जीवन जी रहा है कि नहीं जी रहा है

1135
01:21:19,440 --> 01:21:23,520
ब्राह्मण का जीवन तो ऐसा कोई नियम है शास्त्रों में जहां पर कहा गया हो

1136
01:21:23,520 --> 01:21:27,520
मतलब फिर तो सभी के अपने अपने मत अनुसार होगा ना नहीं

1137
01:21:27,520 --> 01:21:31,600
शास्त्रों में भर भर के नियम है जब जब आप ब्राह्मण को लेने

1138
01:21:31,600 --> 01:21:35,840
जाए तो ये ये चेक करें। ऐसा ऐसा चेक करें।

1139
01:21:35,840 --> 01:21:40,000
उसके इतनी पीढ़ियों का चेक करें। उसके

1140
01:21:40,000 --> 01:21:44,800
ये ये कर्म देखें। ये सब शास्त्रों में वर्णित है।

1141
01:21:44,800 --> 01:21:49,600
उसके कुछ प्रमाण होते तो मतलब मनुस्मति में दिया गया है।

1142
01:21:49,600 --> 01:21:53,680
मनुस्मृति में दिया गया है।

1143
01:21:53,680 --> 01:21:57,680
कौन सा अध्याय और श्लोक बता? मैं आपको लिखित में

1144
01:21:57,680 --> 01:22:02,240
भिजवा दूंगा। ठीक है। वर्ण

1145
01:22:02,240 --> 01:22:06,240
व्यवस्था वाला चैप्टर आएगा तो उसमें आएगा। अभी कोर्स चलेगा उसमें

1146
01:22:06,240 --> 01:22:12,160
है। ये अभी मेरे पास स्टार्ट होगा धार्मिक क्लासेस।

1147
01:22:12,160 --> 01:22:16,800
हां बस कुछ हफ्तों में ही स्टार्ट हो जाएगी।

1148
01:22:16,800 --> 01:22:20,640
ठीक है। पर ऐसा है

1149
01:22:20,640 --> 01:22:26,400
कि हमको कर्म तो चेक करने हैं मगर किसके करें?

1150
01:22:26,400 --> 01:22:30,880
किसके करें? इस इसके लिए

1151
01:22:30,880 --> 01:22:34,960
इसके लिए जन्म है। उसके बाद कर्म चेक करके उसको हम स्वीकार करेंगे कि

1152
01:22:34,960 --> 01:22:39,200
ब्राह्मण हमारे योग्य है। ठीक है। तो

1153
01:22:39,200 --> 01:22:43,760
कर्म चेक करने के ऊपर निर्भर है। हां।

1154
01:22:43,760 --> 01:22:47,760
हां। मतलब योग्यता कर्म के ऊपर है। हां। योग्यता

1155
01:22:47,760 --> 01:22:52,000
कर्म के ऊपर। अच्छा।

1156
01:22:52,000 --> 01:22:58,000
ठीक है। ठीक है। ठीक है।

1157
01:22:58,080 --> 01:23:02,400
उपनिषद में है ना उसका प्रमाण चौथे अध्याय में जो आप बोल रहे थे अभी

1158
01:23:02,400 --> 01:23:06,720
उपनिषद

1159
01:23:06,720 --> 01:23:12,480
उपनिषद का अध्याय

1160
01:23:12,480 --> 01:23:16,480
उसका मतलब एग्जैक्ट हो जाएगा। देखना

1161
01:23:16,480 --> 01:23:20,400
पड़ेगा।

1162
01:23:20,400 --> 01:23:24,480
ठीक है भैया हम खोज लेंगे तब तक कोशिश करिएगा नहीं

1163
01:23:24,480 --> 01:23:29,040
तो फिर बताइएगा तो देख के कर लीजिए भैया

1164
01:23:29,040 --> 01:23:35,040
जी भैया अग्नि पुराण में भी है अग्नि पुराण में भी है

1165
01:23:35,600 --> 01:23:39,680
अग्नि पुराण में कहां पर है वृक्ष आयुर्वेद

1166
01:23:39,680 --> 01:23:44,480
प्रकरण है कहीं पर वहां पर है

1167
01:23:44,480 --> 01:23:48,480
ठीक है जो लकड़ी हल्की नरम और सुविधा से

1168
01:23:48,480 --> 01:23:52,880
घड़ा जा सकती हो वह ब्राह्मण

1169
01:23:52,880 --> 01:23:56,880
जो हल्की मजबूत और गढ़ने में दुष्कर

1170
01:23:56,880 --> 01:24:00,880
हो वह क्षत्रिय जाति जो

1171
01:24:00,880 --> 01:24:05,040
नरम और भारी हो वह वैश्य जाति और जो

1172
01:24:05,040 --> 01:24:10,640
मजबूत और भारी हो वह शूद्र जाति

1173
01:24:10,640 --> 01:24:13,360
अब देख लो इसमें पैरामीटर बदल गए और

1174
01:24:13,360 --> 01:24:17,760
इसमें यह भी है कि जो मजबूत भूत और भारी योग।

1175
01:24:17,760 --> 01:24:23,760
अब सबसे ज्यादा उपयोगी लकड़ी कौन सी हो गई? शूद्र।

1176
01:24:25,040 --> 01:24:31,040
तो लकड़ियों में सर्वश्रेष्ठ क्या हो गई मनुष्यों के लिए? शूद्र।

1177
01:24:31,440 --> 01:24:35,520
हो गई ना? ऐसे ही देखो गाय को वैश्य कहा गया।

1178
01:24:35,520 --> 01:24:39,520
तो वहां पर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कौन सा वर्ण हो गया हमारे? हमारे

1179
01:24:39,520 --> 01:24:45,120
लिए पशुओं में शूद्र व वैश्य

1180
01:24:45,120 --> 01:24:47,920
है ना?

1181
01:24:47,920 --> 01:24:52,000
जी जी भैया ये तो मेरे को पता चल गया उसमें राक्षस का भी वर्णन

1182
01:24:52,000 --> 01:24:58,000
है क्या

1183
01:24:58,160 --> 01:25:01,360
देवताओं का है

1184
01:25:01,360 --> 01:25:05,760
देवताओं में ब्रदारक उपनिषद चौथे अध्याय में दिया गया है देवताओं

1185
01:25:05,760 --> 01:25:08,480
की वर्ण व्यवस्था

1186
01:25:08,480 --> 01:25:12,880
ये देवताओं का तो वो लोग बोलते हैं कि वो लोग कर जब देवताओं का है तो राक्षसों

1187
01:25:12,880 --> 01:25:17,600
का भी होगा जाहिर सी बात है।

1188
01:25:17,600 --> 01:25:21,600
ठीक है? हम उसको देख और प्रश्न का सबसे बड़ा उत्तर

1189
01:25:21,600 --> 01:25:26,320
तो यही है कि

1190
01:25:26,320 --> 01:25:30,320
यह प्रमाण तो आपको मिल ही जाएंगे कि श्री राम जी को ब्रह्म हत्या

1191
01:25:30,320 --> 01:25:34,320
का दोष लगा तो उन्होंने वापस आकर के शिवलिंग बना के पूजा

1192
01:25:34,320 --> 01:25:38,320
की। पाताल पद्म पुराण में

1193
01:25:38,320 --> 01:25:41,520
है ना यह बात।

1194
01:25:41,520 --> 01:25:45,760
ठीक है? तो रावण को ब्राह्मण भी माना गया

1195
01:25:45,760 --> 01:25:49,760
और राक्षस भी माना गया। तो इससे ही पता चल रहा है कि ब्राह्मण और राक्षस

1196
01:25:49,760 --> 01:25:54,080
दोनों अलग-अलग चीजें हैं।

1197
01:25:54,080 --> 01:25:58,160
ब्राह्मण और ब्राह्मण होने के कारण उसका राक्षस

1198
01:25:58,160 --> 01:26:02,160
होना गौ नहीं हुआ। राक्षस होने के कारण उसका ब्राह्मण होना

1199
01:26:02,160 --> 01:26:05,120
गौ नहीं हुआ।

1200
01:26:05,120 --> 01:26:09,280
जबकि ब्राह्मण और क्षत्रिय में क्या होगा? यदि ब्राह्मण

1201
01:26:09,280 --> 01:26:14,880
माना जाएगा तो क्षत्रिय होना गौ हो जाएगा।

1202
01:26:14,880 --> 01:26:19,200
है ना जी या तो वर्ण शंकर

1203
01:26:19,200 --> 01:26:23,280
ही हो जाएगा मगर फिर ब्राह्मण भी नहीं कहा जाएगा यदि

1204
01:26:23,280 --> 01:26:27,280
ब्राह्मण मान लिया तो क्षत्रिय होना गौण हो जाएगा पूर्णतया गायब

1205
01:26:27,280 --> 01:26:32,000
हो जाएगा मगर वहां नहीं हुआ रावण के केस में ऐसा वहां

1206
01:26:32,000 --> 01:26:36,080
क्षत्रिय वो वहां ब्राह्मण होने पर ऐसा नहीं कहा गया कि वो राक्षस

1207
01:26:36,080 --> 01:26:40,320
नहीं है या राक्षस होने पर ऐसा नहीं कहा गया कि वो ब्राह्मण नहीं है। इसी

1208
01:26:40,320 --> 01:26:45,200
से पता चलता है कि दोनों अलग-अलग चीजें हैं। जैसे मैं

1209
01:26:45,200 --> 01:26:50,160
मैं मनुष्य हूं और मैं

1210
01:26:50,160 --> 01:26:54,320
ब्राह्मण भी हूं। ठीक है? तो मनुष्य मेरी

1211
01:26:54,320 --> 01:27:00,080
योनि हो गई और ब्राह्मण मेरा वर्ण हो गया।

1212
01:27:00,080 --> 01:27:04,960
इसी तरीके से ब्राह्मण इसी तरीके से रावण

1213
01:27:04,960 --> 01:27:09,600
राक्षस भी था और ब्राह्मण भी था। ब्राह्मण भी था।

1214
01:27:09,600 --> 01:27:13,680
हम तब तो समझ आ गया। बस आप विदुर जी का एक

1215
01:27:13,680 --> 01:27:17,840
बार प्रकरण देख लीजिएगा और उसमें पता है एक तो डाउट मेरे को ये हो गया था

1216
01:27:17,840 --> 01:27:22,000
कि वो ब्राह्मण नहीं जो पारस उसमें लिखा हुआ है विदुर जी के लिए वो

1217
01:27:22,000 --> 01:27:26,160
ब्राह्मण भी नहीं क्षत्रिय भी नहीं वैश्य भी नहीं ठीक है द्वजाती तो नहीं रहे तब वो

1218
01:27:26,160 --> 01:27:30,160
जब द्वजाती नहीं रहे तब भी उनका वेद इनके बारे में लिखा आपको मैं बता

1219
01:27:30,160 --> 01:27:34,240
दूं इनमें ज्यादातर जो घटनाएं घटनाक्रम है वह ज्यादातर

1220
01:27:34,240 --> 01:27:39,760
तो वैसे हैं अलौकिक

1221
01:27:39,760 --> 01:27:44,480
उनको मनगत रूप से देखना ही नहीं चाहिए। चलिए

1222
01:27:44,480 --> 01:27:48,800
आज के लिए हो गया मेरे ख्याल से एक घंटा 51 मिनट भी हो गया। जय

1223
01:27:48,800 --> 01:27:53,120
घोष कर जी बोलिए

1224
01:27:53,120 --> 01:27:58,960
जयघोष कर लीजिए हो जाएगा चलिए

1225
01:27:58,960 --> 01:28:03,360
श्री राम जय राम जय जय राम

1226
01:28:03,360 --> 01:28:08,240
श्री राम जय राम जय जय राम जय जय राम

1227
01:28:08,240 --> 01:28:12,560
श्री राम जय राम जय जय राम

1228
01:28:12,560 --> 01:28:18,480
श्री राम श्री राम जय राम जय राम जय जय राम

1229
01:28:18,480 --> 01:28:22,880
श्री राम जय राम जय जय राम

1230
01:28:22,880 --> 01:28:27,040
श्री राम राम जय जय

1231
01:28:27,040 --> 01:28:31,040
राम धर्म की जय जय हो जय हो

1232
01:28:31,040 --> 01:28:34,240
अधर्म का नाश हो नाश हो

1233
01:28:34,240 --> 01:28:38,960
प्राणियों में सद्भावना विश्व का

1234
01:28:38,960 --> 01:28:43,040
कल्याण हो कल्याण हो गौ माता की जय

1235
01:28:43,040 --> 01:28:47,120
हो जय हो गौ हत्या बंद हो बंद हो बंद

1236
01:28:47,120 --> 01:28:51,360
भारत अखंड हो भारत

1237
01:28:51,360 --> 01:28:56,560
अखंड हो हर हिंदू सेना

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हर हिंदू सनातन

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अखंड हिंदू राष्ट्र भारतवर्ष की जय हो

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नमः पार्वती पतय हर हर महादेव
