⬜ Not used yet · 00:00:01:01 – 01:03:16:00 (1:03:15)
00:00:01:01 जो आने वाला रविवार है उसको पुनः एक डिबेट सेशन रखा जाएगा जिसमें ईश्वर किस विषय पर हम किस विषय पर ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता को एक पक्ष खंडन करेगा कि नहीं ईश्वर सब कुछ नहीं कर सकता है और दूसरा पक्ष उस जो किया जाने वाला खंडन है उसका उत्तर देगा, समाधान करेगा। ठीक है? ठीक है। जैसे कि क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बन सकता है जिसे वो स्वयं ना उठा सके? क्या ईश्वर मर सकता है? हम क्या ईश्वर दो और दो को पांच कर सकता है? ये सब इस तरह की चीज है। ठीक है? ठीक है। अपने शरीर का नाश कर सकते हैं। हां यही सब तो उसमें तो दो पक्ष बनेंगे। और कोई ऐसा ना समझे कि जो जिस पक्ष को मानता है वो उसी साइड हो। मतलब यदि वो एक अ समाज को एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करना चाहता है। उसको
00:01:16:04 लगता है कि मैं इस तरफ से दूसरी तरफ से भी बहुत अच्छा वो रख सकता हूं। तो दूसरी तरफ से भी आप खड़े हो। जैसे पिछली बार में क्या था कि सशक्त लोग ईश्वर के साकार स्वरूप का खंडन करने के लिए भी थे। तो काफी अच्छा लोगों को जानने को मिली चीज है ना। ठीक है। तो आप शुरू करें। किरण जी बताएं अपना प्रश्न। मेरे दो प्रश्न है कि जो ये कहा जाता है ना मैंने इस पर थोड़ा सा चिंतन मनन किया और उपनिषद से भी प्रमाण मिला तेजोबिंद उपनिषद से कि जब कहा जाता है ना कि केवल अवस्था में जीव का लय हो जाएगा। तो इसमें काउंटर किया जाता है कि मतलब जीव का लय हो गया तो जीव समझेगा कैसे कि मैं सच्चिदानंद हो गया। तो इस पर मेरा चिंतन मनन जो ये है आप बताइएगा कि सही है या नहीं कि जीव एक भाव मात्र है। जीव भाव का लय होगा। मेरे ऊपर से जीव रूपी आवरण का लय होगा। लेकिन मेरा लय नहीं होगा। ऐसा ही है ना? आप तो ब्रह्म स्वरूप हो ही गए ना। हां तो मैं कह
00:02:31:08 रहा हूं कि नहीं मतलब मैं क्या हूं? मैं आत्मा हूं। आत्मा के ऊपर जो आवरण है मतलब आवरण का लय होगा। जीव तो मात्र है। भाव मात्र है। हां हां जीव भाव का ही बोल रहा हूं। हम तो तो मैं तब भी रहूंगा। मेरा लय नहीं होगा। लोग समझ लेते हैं कि मेरा ही लय हो जाएगा। हां सही समझ रहे हैं आप। बिल्कुल। ठीक है। और दूसरा दूसरा प्रश्न ये है कि मतलब जो क्या कहता है? अरे भूल गया थोड़ी देर पहले करता हूं थोड़ी देर बाद करता हूं। सात्विक जी बताएं।
00:03:09:25 जय जगन्नाथ। मेरा मेरा प्रश्न ये है कि मैं हमारे घर में जो रसोई आदि होता है तो उसमें मैं नॉनवेज तो नहीं खाता लेकिन प्याज लहसुन पड़ता है। उससे अब मैं भगवान को समर्पित करके खा सकता हूं। नहीं खाना चाहिए। तो मैंने काफी जगह सुना है कि भगवान को समर्पित करके कुछ नहीं खाना चाहिए। तो मैं अब जो भी खा रहा हूं उसे मतलब क्या मतलब समर्पित अगर नहीं करूंगा तो
00:03:46:21 भगवान को समर्पित किए बिना नहीं खाना चाहिए। इसलिए ऐसी चीजें ही खानी चाहिए जो आप भगवान को समर्पित कर सकें। अच्छा अब यह जो प्याज लहसुन आप खा रहे हो यह भगवान को समर्पित नहीं करना है तो इसलिए इनको खाने से बचें। अच्छा लेकिन हमारे घर में तो मेरे मम्मा भरोसे ही करते हैं ना तो नहीं कर सकता। दुनिया में बहुत से घरों में बहुत सी चीजें ऐसी हो रही हैं जो धर्माचरण विरुद्ध हैं। जी तो ऐसा नहीं है कि कह दिया जाए कि हां ठीक है फिर करो। यही कहा जाएगा ना कि ठीक है प्रयासरत रहो अपने मन में संकल्पित रहिए कि वह चीजें बदले हम और और एक बात कृष्णा जी जो नाम जप में निरंतर कैसे लाए मतलब मन भागता है विषय चिंतनों की ओर तो अब उसे निरंतर नाम जप में कैसे लगाएं
00:04:50:16 अपने मन को विषय दीजिए भगवान का समझा नहीं इसीलिए स्वाध्यायन होता है। अच्छा सत्संग इसीलिए होता है। अच्छा कि आपके मन में भगवान के ही विचार चलने लगे। हम तो विषय जो होंगे आपकी जो इंद्रियां आपका जो मन है वह इधर-उधर भागेगा परंतु उनको आप विषय दे दीजिए भगवान के रूप में। भगवान को उन इंद्रियों का विषय बना दीजिए। ठीक है? समझा नहीं और थोड़ा सा अगर सरल भाषा से समझाएं इससे मतलब भगवान को इंद्रियों का मतलब मतलब इसे समझा नहीं जैसे कि आपका मन मोबाइल के बारे में सोच रहा है जी कि WhatsApp पे किसी का मैसेज आया होगा जी ये सोच रहा है ना आपका मन जी जब आप जब आप
00:06:06:07 स्वा अध्ययन करेंगे, सत्संग करेंगे तो वहां से वहां से मिलने वाली जो जानकारियां है वह भी आपके मन में चल रही होंगी। तो आप तो आप नाम जप करते समय फिर क्या होगा? धीरे-धीरे जब आप ये स्वाध्यायन बढ़ाएंगे, सत्संग बढ़ाएंगे, साधु भक्तों का साथ ज्यादा रहेंगे। तो आपकी जो चर्चाएं हैं, आपकी जो आपका जो स्वाध्यन है, इन कारणों से आपके मन में वह सब भी चलता रहेगा। तो तो जब आप नाम जप वगैरह करेंगे तो धीरे-धीरे क्या आने लगेगा कि भगवान ऐसे चल रहे थे। भगवान ने ऐसे धनुष उठाया था। भगवान ऐसे लेटते हैं। तो आपका क्या हुआ? मन जो इधर-उधर भाग रहा था उनके उनका विषय भी भगवान ही बन गए। ठीक है? अच्छा
00:06:57:27 बाकी क्या है कि गुरुदेव ने एक बात कही थी जगदगुरु शंकराचार्य जी ने कि वर्षों से बंद कमरे में जब झाड़ू लगाई जाती है तो वहां पे धूल उड़ती है। धूल उड़ने के कारण हम ऐसा नहीं कर सकते कि झाड़ू लगाना बंद कर दें। धीरे-धीरे वो धूल हटते हटते वो कमरा साफ हो जाता है। धूल उड़ना भी बंद हो जाती है। अच्छा तो कर्म निवादी कारस्ते मा फले गदाच।
00:07:35:08 ठीक है। और एक प्रश्न जी बोले। और जो मैं जो प्याज लहसुन खाता हूं तो मैं तुलसी की कंठी मैंने धारण किया है। तो क्या उसमें पाप नहीं लगेगा? मैंने आपको बताया ना कि नहीं खाना चाहिए। तो अब मैं तो बच्चा हूं तो हमारे घर में जो देंगे मैं उसे खाने को बाध्य हूं। तो क्या मैं कंठी उतार दूं? हां कंठी भी आप उतार दीजिए और जब आपकी वो बाध्यता ना हो तब कंठी धारण करिएगा।
00:08:13:18 धन्यवाद। जी नारायण जी बताइए। नयन नयन नयन नयन जी जय श्री राम मेरा तीन प्रश्न है कि पहला एक है कि जो हमारा धर्म का नाम सनातन धर्म और हिंदू धर्म ये दोनों शब्द है इसके अलावा क्या और कोई विशेषण क्या मतलब प्रयुक्त होता है धर्म के लिए वैदिक वैदिक धर्म है हमारा अच्छा मैंने एक शब्द शब्द सुना है आर्ष धर्म ये आर्ष शब्द क्या मतलब वैदिक है
00:08:54:21 देखिए अब विशेषण की बात तो यह है कि किसी को भी कोई भी ऐसा शब्द जो उपयुक्त लगे और आवश्यकता के अनुकूल लगे तो लगाया जा सकता है। तो ऐसा नहीं है कि आर्ष शब्द का उपयोग करना गलत ठहराया जाए। और एक चीज है कि जो एक मतलब शंकराचार्यों के नाम के पहले एक शब्द बैठता है क्षणता स्थापनाचार्य ये क्षण मत क्या है
00:09:38:24 स्थापनाचार्य उसको देखना पड़ेगा क्या इसका साथ मुझे एक अलग एक मतलब है जिसको मैं जानता हूं तो उसके साथ ये बैठता है या नहीं मुझे पता नहीं परंतु जो कहते हैं ना कि पंचदेवों का पूजन होता है तो वहां पर मैंने अब उनका तो अलग-अलग संप्रदाय भी है ना तो वहां पर मैंने देखा है कि एक और भी संप्रदाय होता है जिसको एक जो कौमार संप्रदाय होता है ना कार्तिकेय जी का तो इन छहों को लेकर कहा जाता है कि क्षण मार्ग या षट संप्रदाय परंतु स्मार्थों में मैंने देखा है कि केवल पांच देवता की ही मतलब पूजा होता है। तो जो छठे है कौमार जी या जो क्या कहे वो कार्तिकेय जी तो उनका तो मतलब पारबह्मता का उसका ऊपर कोई नहीं होता। कार्तिकेय जी का विभाग क्या लिया है उन्होंने? नहीं वो भी एक अलग है अलग है मतलब जैसे मुख्य रूप से जैसे उत्पत्ति स्थिति संहार निग्रह अनुग्रह इस तरह से उनका इसका तो पता नहीं होता तो ऐसा है ना कि ऐसा है कि कार्तिकेय जी
00:10:53:27 का जो लय है वो इन्हीं पांचों में से किसी एक में करके ऐसा नहीं है कार्तिकेय जी का मार्ग नहीं है यहां कार्तिकेय जी का लय किसी में हो रहा होगा शिव जी में मां भगवती वाले उसमें विभाग में जैसे वो जो 33 कोटि के देवता है ना उनका लय हुआ जी पांच पंच देवों में जी है ना तो इसी तरीके से कार्तिकेय भगवान है उनका भी लय हुआ है ये देखना पड़ेगा कितने रूप में हम ठीक है भैया और एक चीज है कि जितने भी संप्रदायों के आचार्य है मैंने देखा है कि वो लोग जब अपना सिद्धांत जब रखते हैं तो देखा है दूसरे सिद्धांतों का खंडन करते हैं। जैसे शंकराचार्य जी ने मीमांसकों का या और भी जितने दर्शन है रामानुजाचार्य जी ने शंकराचार्य का खंडन किया मधवाचार्य ने दोनों का खंडन किया तो ऐसे देखा है तो ऐसा क्यों होता है मतलब वो भी तो सभी तो वैदिक है ना सभी तो एक ही वेदांत दर्शन में आते हैं या वेदों को मानने वाले तो एक दूसरे का खंडन करके अपना सिद्धांत
00:12:09:01 मतलब ऐसा क्यों अभी आपने जो बोला है यह उन सबका खंडन है क्यों किया? नहीं मतलब क्या सभी तो मतलब ईश्वर के अवतार आए हैं ना यहां पर मतलब अपना दर्शन रखने के लिए आपका कहने का मतलब ये आपको यह कहना चाहिए कि क्या आचार्यों के अनुसार दूसरे जो मत है वो गलत है? हां वही खंडन तो यदि हम अपने उसकी मत की स्थापना कर रहे हैं तो उसमें खंडन का खंडन तो ध्वनित हो ही जाएगा। जैसे मान लीजिए कि वह नाम ना ले और कहे कि भाई अंतत तो गतत्वा जीव को बोध हो जाता है। ब्रह्म स्वरूप हो जाते हैं और द्वैत की स्थिति नष्ट हो जाती है। तो ये तो द्वैत का खंडन हो गया ना।
00:13:15:03 हम तो आपको यह कहना चाहिए कि वह एक दूसरे का खंडन क्यों करते हैं? हां खंडन हां खंडन क्यों करते नहीं है आपको यह कहना चाहिए कि वो क्या वो उसको वैदिक नहीं मानते हैं क्या दूसरे वाले को आवाज किसके पीछे से आ रही है जी भैया वो मतलब मेरा एक एक रिश्तेदार मतलब ठीक है ठीक है आपका प्रश्न हो गया तो आप म्यूट कर लीजिए हां जी तो ऐसा है कि एक बिंदु पर जाकर के सभी आचार्यों का यह कहना होता है कि भाई वेद की जो यह वाली पंक्ति है इसका सामने वाले ने गलत अर्थ निकाला है। ठीक है? और यह कहते हुए उसका खंडन किया जाता है। मतलब कि अंतत गत्वा कहीं ना कहीं एक पॉइंट ऐसा आता है जिसमें कि ये हम जब अपनी बात को रख रहे हैं तो वहां पर यह कहना होता है कि कहना पड़ता है
00:14:30:04 आवश्यकता होती है कि हां इतने अंशों में यह बात इनकी वैदिक नहीं है। तो यह कहना कि सभी आचार्य वैदिक ही हैं। जब तो तो क्या कहते हैं? उनका जो है उनको गलत क्यों कह रहे हैं? फिर क्या वेद को गलत कह रहे हैं? नहीं। वेद को गलत नहीं कह रहे हैं। वेद का जो अर्थ लिया गया है वहां पर ये कह रहे हैं कि यह वेद का अर्थ नहीं है। इतना अंश। अब बात यह है कि फिर सामंजस्य कैसे बैठता है? तो सामंजस्य ऐसे बैठता है। जगतगुरु शंकराचार्य जी जो कहते हैं कि सत्य सहिष्णुता की क्रमिक अभिव्यक्ति है। व्यक्तिगत जीवन अध्यात्मय शुरू होता है। द्वैत से
00:15:21:18 हम उसको सर्वप्रथम एक बालक अपने घर में मंदिर की ओर तब देखता है जब उसकी माताजी वहां खड़ी होती हैं। द्वैत की स्थिति होती है। वो उसके जीवन में अध्यात्म धर्म ये सब इन सब का जो कारण होता है वो द्वैत होता है। तो द्वैत से उसका जीवन शुरू होता है और द्वैत से विशिष्टाद्वैत विशिष्टाद्वैत से धीरे-धीरे पार करते हुए सभी घाटिया द्वैत तो इन सभी की अपनी-अपनी आवश्यकताएं हैं। है ना? इसलिए इनमें सामंजस्यता है। एक एक बिंदु एक ब्रह्म के स्वरूप को लेकर के थोड़ा सा अंतर है। अंतत गत्वा मगर वो सत्य सहिष्णता की क्रमिक अभिव्यक्ति में वो सब समाहित हो जाते हैं। और उसको खंडन नहीं कहा जाता है। दूसरे को गलत ठहराना नहीं कहा जाता है। इसको स्वमत की पुष्टि कहा जाता है। अपने मत की पुष्टि कर रहे हैं। दूसरे का खंडन नहीं।
00:16:29:15 इस दृष्टिकोण से देखना चाहिए। तो भैया पहले जब वेदव्यास जी थे उनके समय तो केवल एक ही वेदान दर्शन था और उनकी भी तो एक भी एक ही मतलब दृष्टिकोण था ना तो बाद में वो इतना इतने भागों में क्यों बिछड़ गए और अलग-अलग मतलब हो गए। [संगीत] पहले सतयुग था बाद में क्यों त्रेता आ गया? पहले त्रेता था बाद में क्यों द्वापर आ गया?
00:17:08:28 समझ रहे हैं? हां जी वो तो ठीक है परंतु बाकी जो है पहले ब्रह्म था वो क्यों जीव भाव को प्राप्त हो गया? कहने का अर्थ है इस प्रपंच का नाम ही संसार है। हम कौरव बने ही क्यों? कंस बना ही क्यों? दिक्कतें आई ही क्यों? समस्याएं उत्पन्न हुई ही क्यों? हम
00:17:45:25 इसी का नाम संसार है। भैया तो आज जितने सारे भी संप्रदाय है उनका तो जितने भी अलग-अलग दर्शन है अद्वैत वेदांत उनको तो छोड़िए उनको तो छोड़िए इस्लाम बना क्यों बाइबल आई क्यों जब ऐसा था तो क्यों आए नए-ए दर्शन? तो देखिए दर्शन की बात तो यह है की क्रमिक अभिव्यक्ति क्योंकि उसकी समाज को आवश्यकता थी द्वैत की विशेषता द्वैत की इनकी समाज को आवश्यकता है। धीरे-धीरे जो जितनी
00:18:26:21 जो जिस प्रवृत्ति का हो जिसका जो जिसकी प्रज्ञा शक्ति जिसके अनुसार हो उसके अनुसार एक वहां पर वैदिक दर्शन स्थापित है उसके अनुसार वो अपना आगे बढ़ सकता है। मगर अब जैसे इस्लाम बाइबल इत्यादि की बात की जाए तो यह सब चीजें आती हैं जब व्यक्ति मोक्ष मार्ग से भटकता है और जो सांसारिक मार्ग है उसके नए-नए उपाय सोचता है जब किसी के सांसारिक मार्ग में मोक्ष का मार्ग धर्म का मार्ग आड़े आने लगता है विघ्न डालने लगता है तो वह अपने और यदि उसके अंदर सांसारिक मार्ग की वरीयता है, प्राथमिकता है जो कि ज्यादातर लोगों में होती है हम तो जो वरीयता है सांसारिक मार्ग को लेकर के तो अपने सांसारिक मार्ग की रक्षा के लिए भी धर्म के मार्ग का खंडन करता है। मोक्ष के मार्ग का खंडन करता है। जैसे फॉर एग्जांपल
00:19:39:01 कि हमारे यहां पर विषम अथवा विशेष परिस्थितियों को छोड़कर अमुक अमुक स्थितियों को छोड़कर एक से ज्यादा विवाह करने को करने का समर्थन नहीं किया गया है। है ना? उसे त्याज्य दृष्टि से देखा गया है। एक से ज्यादा विवाह करने की स्थिति को। मगर वहीं पर क्या हुआ? किसी को एक से ज्यादा स्त्रियों के साथ भोग करने का मन है। उसके अंदर विचार है। तो उसको यह जो मोक्ष का मार्ग है ना सनातन धर्म वैदिक मार्ग यह समझ में नहीं आ रहा है। क्योंकि यह रोक रहा है भाई। एक नारी सदा ब्रह्मचारी हम रामो विग्रह बांध धर्म यहां रोक रहा है तो क्या करें कि मेरे पास फरिश्ता आया उसने बताया कि जिस खुदा को तुम पूज रहे हो वो खुदा वो नहीं है खुदा वास्तव में कोई और है मूर्ति पूजा करना गलत है अवतार नहीं ले सकता तुम गलत
00:20:54:04 कर रहे हो तो सही वाला मेरे मेरे पास आया है। अच्छा अच्छा ठीक है मान लिया। फिर उसी ने बताया है कि चार शादियां तक कर लो। कोई दिक्कत नहीं है। और मेरे लिए तो पूरी छूट है। मैं तो कितनी भी कर सकता हूं। तुम लोग चार तक कर सकते हो। ये क्या हुआ? हम सांसारिक मार्ग
00:21:25:13 की रक्षा के लिए अपनी सांसारिक भोग प्रवृत्ति की रक्षा के लिए जो निवृत्ति का मार्ग था उसका खंडन कर दिया। तो ऐसे आते हैं नए-नए मत। रामपाल कैसे आया? रामपाल को भी दिक्कतें आ रही थी। उसको पैसा चाहिए होगा शायद। धन यह सब चीजें चाहिए होंगी तो उसने भी चुना मैं कबीर का अवतार हूं मेरी पूजा करो हम
00:22:06:24 और ये अर्जी लगाओ प्रार्थना करो 21000 में ये करो कैंसर का इलाज करवाओ तो ऐसे बनते हैं नए मत वेद विरोधी मत ऐसे बन जाते हैं। ठीक है? नहीं भैया एक चीज जानना था कि वो जो मैंने कहा था ना कि जितने भी संप्रदाय है अभी भी तो वह सब तो मतलब एक वेदांत का ही विभिन्न सारे भाग है तो और भी जो पांच दर्शन है सांख्य या योग दर्शन तो उनके भी तो संप्रदाय है ना भारत में हम तो वो अभी मतलब कहां किस किस मठ में मतलब कुछ पता है देखना पड़ेगा सब तो वस्तुनिष्ठ जानकारियां मिल जाएंगी मेरे पास कॉल आया था शायद खुद को सांख्यवादी कह रहे थे। ईश्वर का खंडन करने के लिए आया था।
00:23:06:00 खुद को सांख्यवादी कह रहे थे कि मैं सांख्य मत को मानने वाला हूं। मगर ध्वन तो हो रहा था कि वो आर्य समाज थे। सब ठीक है। ठीक है भैया। वो देखने वाली बात है कि कौन कहां पर है। ठीक है। ये बात आपको समझ में आ गई ना कि इतने मत बने क्यों? जी जी और सामंजस्यता कैसे है और एक पॉइंट पर आकर के सभी ने एक दूसरे का खंडन किस भाषा में किया है? ये सब बातें क्लियर की है मैंने। ठीक है। भैया एक चीज रह गया। तो आपने राम जी का उदाहरण दिया ना तो पिछले दिनों मेरे प्रथम भैया के साथ वार्तालाप हुआ था वाली बात पर जी हां जो राम जी क्या मासाहार किए थे तो इस विषय पर भैया एक स्मार्थ के बहुत बड़े विद्वान है उन्होंने भी कहा था कि हां उन्होंने अगर किया है तो क्या समस्या है शास्त्र विधान तो यही है ना कि अगर बलि देकर खाओ तो खा सकते ही है तो मैंने कहा था कि भैया शास्त्र तो ऐसा भी हो सकता है कि विवाह अगर एक भी कर सकते हैं या तीन भी उनके पिताजी भी तीन विवाह किए थे तो उसमें क्या उनके पिताजी का मर्यादा खंडन हो गया तो मर्यादा
00:24:21:01 तो एक में है तो वैसे ही शास्त्र तो खाने का भी अनुमति देता है ना खाने का भी कहता है तो ना खाना ही तो मर्यादा है ना गलत विधि पूर्ण अविधि पूर्ण तरीके से एक विवाह भी गलत है। है कि नहीं? हां वैसे तो नैष्टिक ब्रह्मचर्य ही एक विवाह को भी गलत कहा गया ना आप बिना फेरे लिए बिना मंगलसूत्र और बिना जो वैद जो मंत्र होते हैं विवाह के उनके बिना किसी को जाकर के उसके साथ जो है स्त्री संग कर लेंगे तो वो गलत नहीं होगा।
00:25:03:18 तो जो विधि पूर्ण तरीके से आपके धर्म के उसमें आया है धर्म की सीमा में वो ग्रहण करने योग्य होता है और एक से ज्यादा विवाह जो व्यक्ति अमुक अमुक स्थिति के लिए करना पड़ जाए यदि किसी को ऐसा करना पड़ जाए वैसा स्थितियां उत्पन्न हो गई तो वो धर्म अधर्मी नहीं कहलाएगा यदि उसने विधिपूर्ण तरीके से कहा करा है हां हां पर जो मर्यादा पुरुषोत्तम वाली बात है वो तो घटेगी ही ना उससे तो वो दूर होगा ही मर्यादा पुरुषोत्तम वाली बात तो भगवान श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम थे पुरुषोत्तम ऐसा नहीं है कि जिन्होंने अमुक अमुक स्थितियों के लिए या अमुक अमुक अपने अधिकार की सीमा में रहते हुए एक से अधिक विवाह कर लिया वो अधर्मी थे अधर्मी नहीं थे धर्म की सीमा में ही थे मगर उनकी स्थितियां ऐसी ऐसी हुई कि उनको वो जो पुरुषोत्तम वाली जो बात थी उससे वो दूर हो गए। ठीक है? दूसरी बात यह है मांसाहार वाली बात है तो जो
00:26:20:14 जंगल में निवास होता है वहां पर मांसाहार का निषेध पूर्णतया खत्म हो जाता है। ठीक है? और दूसरी बात यह भी है कि कोई वो मांसाहारी नहीं थे। रेगुलरली मांस खाने वाले नहीं थे। जिस पूजा में उसकी आवश्यकता है, उस पूजा में उसका उपयोग किया गया था। ठीक है? तो वहां पर इनडेफिनेट नहीं लगेगा। जैसे मैंने अमुक अमुक स्थिति में मान लीजिए मुझे खांसी हुई और खांसी के समय मैंने कोई यह आधुनिक जो दवाइयां आ रही हैं, कोरेक्स आ रही है। इन सब में अल्कोहल होता है। तो मैंने अमुक अमुक स्थिति में अल्कोहल का पान कर लिया हम तो मैं क्या क्या कहा जाएगा कि मैं अल्कोहल का सेवन करता हूं या किया है
00:27:23:03 हां किया है किया है करता हूं नहीं कहा जाएगा क्योंकि वो मैं रेगुलरली उसको उसका सेवन नहीं करता हूं अल्कोहल का मैंने अमुक अमुक स्थितियों में अल्कोहल का सेवन किया है तो इसलिए इसलिए वो मांसाहारी नहीं थे। कुछ एक अंशों में उनको उन्होंने वो ग्रहण किया था जो कि उनके क्षत्रियत्व के अधिकार की सीमा में और अ वहां जहां वो रह रहे थे अह वन में। वन में रहने वाले जो नियम होते हैं उसके अनुसार ग्रहण में आ जाता है। विपरीत परिस्थितियां होती है ना। सामान्य जीवन तो होता नहीं वन का। ठीक है
00:28:10:19 भैया इसको लेकर एक अंतिम एक प्रश्न है रामायण के विषय में कि मुझे शायद उतना ठीक से वो कहानी पता नहीं परंतु अगर हम अगर एक बार ये जो विषय है ना इस पर हम एक प्रॉपर एक वीडियो बनाएंगे कि उन्होंने खाया था कि नहीं खाया था। मगर अभी जो मैंने उत्तर दिया है वह इस इस बात को रखते हुए दिया है कि अगर खाया था तो वन में जीवन के लिए वह होता है। मगर हम इस पर एक अलग से वीडियो बनाएंगे कि खाया था कि नहीं खाया था। है ना? और यदि खाया था तो वो क्यों ठीक है और नहीं खाया था तो वो क्यों ठीक है? सभी पक्ष को अच्छे से रखेंगे।
00:28:49:10 ठीक है भैया। तो जो विषय में कह रहा था कि अगर हम देखेंगे रावण जी ने वो सीता जी का हरण क्यों किया था? क्योंकि तो वन में राम और लक्ष्मण जी तो मतलब उनके बहन के साथ दुर्व्यवहार किए थे ना कि उन्होंने तो बस अपने विवाह का प्रस्ताव रखा था। परंतु राम जी ने कहा तुम लक्ष्मण के पास जाओ। लक्ष्मण ने कहा राम के पास जाओ ऐसे खेल रहे थे। तो उसके बाद जब उन्होंने ही ज्यादा जोर किया तब राम जी ने उनका नाक मतलब काट दिया था। तो ये तो मतलब ऐसे देखेंगे तो उचित तो नहीं है ना। अगर नहीं करना सीधा-सीधा कह दे तो क्योंकि वहां पर एक लाइन है वो कामातुर होकर आई थी इसलिए उसके साथ ऐसा किया गया। कामातुर होकर आई थी वो। कोई व्यक्ति आपके घर की स्त्रियों के साथ अथवा स्त्रियों के समक्ष कोई व्यक्ति आपके घर के पुरुषों के साथ बद नियत लेकर आएगा तो आप आप वो दंडनीय है कि नहीं और बद नियत पूर्वक व्यवहार भी करेगा
00:29:56:24 हम हां जी ये तो एक बात ये लाइन आपने नहीं पढ़ी वहां पर ये कहानी उसमें सर वहां देखिएगा बार-बार आया है वह कामातुर हो कामांद होकर आई थीमा और यह भी एक पाप ही तो है किसी पुरुष से जाकर के सीधे कहना चलो मेरे साथ क्या है ये हम जी भैया उस स्थिति में उसके साथ वहां पर वो विनोद पूर्वक व्यवहार किया गया ठीक है जी भैया
00:30:43:03 किरण जी आप पूछे हां शिवा जी ये पूछ रहा था कि मतलब जो कहा जाता है ना कि द्वैतवाद में जीव और ब्रह्म की दोनों की अलग सत्ता है। जगत की भी अलग सत्ता है। तो इससे तो मतलब जो है ब्रह्म ब्रह्म का जो स्वरूप है सच्चिदानंद उसमें तो सत स्वरूप में ही बाधा आ जा रहा है। ब्रह्म तो मतलब सर्वव्यापी सिद्ध ही नहीं होगा। अगर एक अलग सत्ता वाले उनसे जीव जो कुछ भेद है उसी के कारण तो संप्रदाय अलग-अलग हैं।
00:31:18:02 और यही तो ये तो द्वैतवाद का खंडन हुआ ना। तो इसीलिए तो द्वैतवाद को हम लोगों ने तो पूरी तरीके से अंतिम वो नहीं माना है। व्यवहार का विषय माना है। हां तो मैंने जो ये तर्क दिया है ये सही है या फिर गलत है? वो चर्चा और पहले जानना पड़ेगा उसके और कुछ स्तंभ है। समझना पड़ेगा उसको। हां उस उस ओर ही है। यही बात तो कही थी ना जब ऐसी कोई जगह है ही नहीं जहां ईश्वर नहीं है। तो फिर आप अलग कैसे कर रहे हो? हां। और जब जब आप कह रहे हो कि सर्वव्यापी का मतलब यही है कि ईश्वर कण कण में नहीं है। मतलब ईश्वर ही कण-कण है तो आप एक जीव को भी अलग कैसे कर रहे हो? जीव को अलग कैसे जीव को अलग कैसे कर रहे हो? जीव की सत्ता अलग कैसे कर रहे हो? क्या जीव के जीव की सत्ता ऐसी है कि वो बिना ब्रह्म के इच्छा के स्वतंत्र रूप से कुछ कर सके सोच सके। हां हां वो लोग ऐसा ही कहते हैं। तो मैं अलग सत्ता है और वो ब्रह्म के साथ ही अनादि है। तब तो मतलब दोनों की सीमा निश्चित हो जा रही है। हां तो इसी इसी
00:32:33:08 कारण से तो शंकराचार्य जी ने अद्वैत को माना। ये ये सही दिशा में है। उस पे जब और चर्चा होगी तो और कुछ चीजें होंगी अगर कुछ विपरीत तो वो ठीक हो जाएंगी। मगर ये आपका जो तर्क है वो सही दिशा में है। और दूसरी बात एक ये है हम कि जो अद्वैत के विरोध में जो मत खड़े होते हैं उसमें क्या होता है कि जब हम एक्सप्लेनेशन पूछते हैं ज्यादा डीप में जाकर के तो कहीं ना कहीं
00:33:16:00 एक बात आ जाती है कि यह जो है अचिंत है या यह जो है अनिर्वचनीय है। ठीक है हम तो है क्या? यह जो अनिर्वचनीय शब्द है या अचिंत शब्द है। हम इसका उपयोग आदि शंकराचार्य जी ने भी किया है। हां बिल्कुल। हम तो अब क्या होता है कि इस चीज का फायदा उठाया जाता है। जैसे मान लो हमने कहा कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है कि नहीं है। सामने वाले ने कहा कि है फिर अच्छा अगर वो है तो दूध से दही बनता है। दही से दूध नहीं तो ये फिर यहां पर ये बाधित हो रहा है। तो यहां पर उसने कह दिया कि भैया ये तो अचिंत विषय है। ठीक है? अब हमने कहा कि भाई ऐसे कैसे अचिंत विषय तुमने कह दिया बताओ यह जब जब ईश्वर सब कुछ कर सकते हैं तो दही दही दही से तुलना करके और जो है शिव जी के बाद वो कृष्ण क्यों नहीं बन रहे हैं तो सामने वाला ये कह देता है कि भैया ये जो है अचिंत विषय है और फिर वो कहता है कि अरे क्या आदि शंकराचार्य जी ने अचिंत शब्दों का उपयोग नहीं किया क्या
00:34:31:03 वो भी तो एक जगह जाकर कह देते हैं कि हम समझा नहीं पाएंगे इस बात को हम अनिर्वचनीय इसको कहा नहीं जा सकता हम तो इस अचिंत और अनिर्वचनीय शब्द का फायदा उठाया गया है। ठीक है? जैसे वेद का नीति आदि गुरु शंकराचार्य ने ब्रह्म के स्वरूप को मतलब मैं आपको पूरी बात बता रहा हूं। जैसे वेद ने भी नीति नीति कह दिया। है ना? हां। तो राम रामचरितमानस में भी आया शायद नीति नीति वाला। तो क्या है कि यह जो कह देना इसके भाव को ना समझ करके इसके शब्द को पकड़ करके अपने अपनी चीजें रखी गई हैं कि कई जगह पर क्या कहते हैं जैसे ये कह दिया गया कि उसका भगवान के स्वरूप का वर्णन तो स्वयं ब्रह्मा विष्णु महेश भी नहीं कर सकते। तो यहां से रामपाल ने उठा लिया। हां समझ रहे हो? वो तो पारमार्थिक स्वरूप की बात है। लेकिन जो सर्व सिद्ध हो। मैं वही कह रहा हूं। यह जो समझ में ना आ सकने वाली स्थिति प्रकट की गई है या कही ना जा सकने वाली स्थिति जो कही गई है। इस
00:35:47:01 इन पंक्तियों का इन वचनों का दुरुपयोग करते हैं। हालांकि वो जब बात आमने सामने आएगी तो वो बात भी क्लियर हो जाएगी। समझ रहे हो? क्लियर कैसे होगी वो भी मैं बता रहा हूं। परंतु जब तक दूर है तब तक तो ये कहीं कहा ही कह सकते हैं ना कि कि भैया जो है ये कहा ये ऐसा क्या वो वैसा क्या अचिंत है अचिंत है अच्छा अचिंत है तो ये तुम अचिंत क्यों कह रहे हो क्या शंकराचार्य ने नहीं कहा अचिंत है ये ऐसे करके बचने का प्रयास करते हैं हालांकि ये स्थिति जब सामने आएगी तो उसका जवाब है। जवाब क्या है? हम जवाब यह है कि आदि शंकराचार्य जी अनिर्वचनीय या अचिंत शब्द तब कहते हैं जब उनके द्वारा स्थापित मत का खंडन ना हो रहा हो।
00:36:36:24 समझ रहे हैं? उनके ही द्वारा कही गई बात से उनके ही द्वारा कहे गए मत का खंडन ना हो रहा हो। उन स्थितियों में वो कहते हैं कि यहां से आगे की स्थिति सिर्फ प्राप्त करने योग्य है। वो व्यवहार में ना आ सकने वाली है। वो वचनों में ना आ सकने वाली है। है ना? वो चिंतन में ना आ सके। बचने के लिए नहीं कहा। हां। अब यहां क्या हो रहा है? यहां आपने जो मत प्रस्तुत किया। आप ही के दूसरे वक्तव्य के द्वारा आप ही का पहला वक्तव्य कट रहा है और तब आप वहां पर कह रहे हैं कि भैया जब आपसे वो पूछा जा रहा है ये कट क्यों रहा है तो आप कह रहे हैं कि अरे ये तो अचिंत विषय है मत पूछो सवाल मत करो हम ये दोनों में अंतर है। अब आपने कहा कि भगवान सर्वशक्तिमान है। मगर फिर आप ही ने कहा कि भैया दूध दही अब पूछा जा रहा है कि अगर सर्वशक्तिमान है तो दूध दही नहीं और या फिर दूध दही दूध दही या तो दूध दही मान लो या सर्वशक्तिमान मान लो तो आप यहां पर जवाब देने से जवाब देने से बचने के लिए कह रहे हैं अचिंत हम अब दूसरी बात एक चीज ये है कि अगर अचिंत कहीं पर भी कहा जा सकता है है ना
00:37:52:02 तो इसका मतलब है कि भैया फिर तो मुस्लिम थ्योरी थ्योरी भी मान लो बाइबल थ्योरी भी मान लो अचिंत अचिंत अचिंत सब अचिंत कह देंगे एक बच्चा भी अचिंत कह देगा अचिंत कह दो एक बच्चा भी अचिंत कह देगा एक मां अचिंत कह देगी बच्चा जाके पूछेगा भगवान भगवान है कि नहीं मैं क्यों मतलब मुझे विश्वास नहीं होता बेटा ये विषय अचिंत है फिर तो तुम नास्तिक मत की पुष्टि कर दोगे नास्तिक आकर के कहे उससे कहोगे तुम भगवान को क्यों नहीं मानते भगवान को इसलिए नहीं मानता तक भगवान अचिंत है। क्यों मानू जब मेरे चिंतन में आ ही नहीं सकता तो मैं चिंता क्यों करूं उसकी? लोग हो गया। तो ऐसे नहीं होता है ना। कहने का अर्थ यह है कि आपके द्वारा आपका वचन नहीं कट रहा है और वहां पर जो असमर्थता है हमारी वाणी की हमारे व्यवहार की सीमा है उसके कारण वो असीमित का हम अनंत का अव्यवहार व्यवहार में ना आ सकने वाले का वर्णन नहीं कर पा रहे हैं तो हम कह रहे हैं कि वो अचिंत है हम तो उसका दुरुपयोग किया जाता है इस तरह से मगर यदि सामने से बात होगी तो वो चीजें क्लियर हो जाती है ठीक है जी ये आज एक विशेष टॉपिक पर हम लोगों ने बात की है। वाला है
00:39:07:20 हम कि भगवान से बढ़कर उनका नाम राम से बड़ा राम का नाम शिवांश भैया जय जगन्नाथ यह प्रश्न था कि भगवान से बढ़कर उनका नाम बताया गया। तुलसी बाबा ने भी मानस में इसका इसकी चर्चा किया है तो ऐसा क्यों कह दिया जाता है?
00:39:50:02 ऐसा इसलिए कहा जाता है जैसे कि भगवान का जो प्राप्त वाला रूप है वह उनका वही रूप है जो व्यवहार में नहीं आ सकता। निर्गुण निराकार फिर भगवान ने भगवत गीता में यह क्यों कह दिया कि वह भी मेरे ही आश्रित है। वो रूप सगुण साकार के आश्रित है। क्यों आश्रित है? क्योंकि अभिवंजक
00:40:25:27 अपने अभिवंजक अपनी अभिव्यक्ति के लिए अपने अभिवंजन अपनी अभिव्यक्ति के लिए अपनी अपने अपने अभिवंजक पर निर्भर करता है। अभिवंजक पर निर्भर करता है। तो मान लीजिए कि आप एक जगह खड़े हुए हैं और आपको जहां जाना है। ठीक है? वह आपसे काफी दूर है आपका गंतव्य और आप दूरबीन से उसे देख पा रहे हैं। अपनी आंखों से भी उसे नहीं देख पा रहे हैं। और आपके लिए उस गंतव्य को देखना बहुत आवश्यक है। तभी आप जा पाओगे तो आपके लिए गंतव्य से भी पहले दूरबीन आवश्यक है कि नहीं? हम है ना? हां बिल्कुल। इसी रूप में भगवान ने कहा कि वह जो अब वह जो गंतव्य है वह ज्यादा पावरफुल है दूरबीन से या वो चीजें हैं ना परंतु फिर भी वो निर्भर किस पर कर रहा है? आपके आपके समक्ष अपनी अभिव्यक्ति के लिए किस पर निर्भर कर रहा है? दूरबीन पर अभिवंजन
00:41:41:25 वो गंतव्य है और आपके आपका उसे देख पाना यह उसकी अभिव्यक्ति है और अभिवंजक क्या है? दूरबीन तो वो जो वो जो आपका जो लक्ष्य है वो दूरबीन पर निर्भर कर रहा है आपके समक्ष अभिव्यक्त होने के लिए। इसी प्रकार से भगवान भी तो निर्भर है उन्हें प्राप्त करने के लिए। नाम पे आपके समक्ष निर्भर निर्भरता है ना। तो इसलिए कहीं-कहीं पर महिमा नाम की कही जाती है। वस्तुत नाम अनामी में भेद मिट जाता है। नहीं होता है। अब देखिए कहीं-कहीं पर गुरु को भी बड़ा कहा जाता है कि नहीं ईश्वर से तुलनात्मक रूप में कहीं-कहीं पे कह दिया जाता है गुरु गोविंद दो खड़े का केला उपाय। यहां पे भी वही वाली बात है। अभिवंजक अभिवंजन और अभिव्यक्ति क्योंकि गुरु मार्ग है ना तो गुरु भी इंपॉर्टेंट हो जाता है। हम
00:42:42:16 समझ में आई ना मेरी बात जो मैंने कहीं करण जी से पूछ रहा हूं ठीक है तो इसी रूप में भगवान के सगुण साकार स्वरूप ने भी यह कहा कि वह जो है जो अव्यक्त रूप है मेरा वो भी जो अव्यक्त रूप है वो भी मुझ पर ही निर्भर करता है क्यों निर्भर करता क्योंकि मनुष्य के समक्ष उसकी अभिव्यक्ति ही नहीं हो सकती बिना सगुण साकार स्वरूप के। आर्य समाज जी कहते हैं ना कि भैया ईश्वर ने वो वेदों में ये किया, वेदों में वो किया। तो किसने किया? सबसे पहला गुरु तो कौन बना? अवतार तो वहीं सिद्ध हो रहा है। हां। अवतार सिद्ध हो रहा है ना? में ही शुरुआत में ही ईश्वर ने किया तो ईश्वर ने अवतार लिया हम ईश्वर को ईश्वर को आने की जरूरत क्यों पड़ी ठीक है अमन तिवारी जी पूछ रहे हैं किरण जी आप हाथ नीचे कर ले अब
00:43:59:13 भैया जिस प्रकार प्रभु श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम है श्री कृष्ण लीला पुरुषोत्तम है तो क्या अन्य अवतार श्री परशुराम श्री वामन श्री कल्कि आदि भी उसी प्रकार किसी विशेषण के साथ पुरुषोत्तम है पुरुषोत्तम तो सभी है वो विशेषण देखना पड़ेगा किसका क्या है क्या हुआ ठीक है ये देखना पड़ेगा कि अन्य जो भगवान के रूप है उनके साथ कौन सा विशेषण लगा है शास्त्रों के द्वारा ठीक है ऋषु जी बताएं जय श्री राम भैया मेरा एक प्रश्न था कि शाकपय ब्राह्मण कौन है तथा भगवान सूर्य के ऊपर प्रमाणिक ग्रंथ कौन सा है
00:44:54:02 ब्रह्मा जी के लिए जितने भी ग्रंथ है वह सब भगवान सूर्य के लिए भी ग्रंथ है ठीक है और शाक द्वीपीय ब्राह्मण जो यह वाली बात है यह आचार्य श्री से बात करें ज्यादा अच्छा होगा या फिर जो कर्मकांड वाला विभाग है उसके जो एडमिन है उनसे भी संपर्क वहां पर आप अपना प्रश्न ये डालिएगा तो आपको उत्तर प्राप्त हो जाएगा ठीक वो कौन नाम भैया जो कर्मकांड के एडमिन है उनका आप जिस ग्रुप में हैं उसी ग्रुप में आप पूछ लीजिएगा वो आपका यथोचित उपलब्ध करा देंगे चीजें जी और ये ब्रह्मा जी को लेकर के जो पुराण है उसमें वो सारे पुराण सूर्य को लेकर के हैं। बिल्कुल सूर्य और ब्रह्मा एक ही है। जी अच्छा ठीक है। अच्छा एक एक एक और प्रश्न था मेरा कि ये मैंने जैसे आप कुछ दिन पहले मतलब आपका जो वीडियो सीरीज वगैरह और एक निग्रह आचार्य का वीडियो सीरीज देख मतलब चल रहा था कुछ चीजें। मैंने ज्यादा तो वीडियो चीज नहीं देखी पर एक शब्द निकल के आया मलेश राज तो मतलब पूछना चाहता हूं कि मतलब ये कौन है क्या है मतलब और ये मतलब
00:46:09:13 क्या ये ऐसा कोई चीज सच में एक्सिस्ट करता है क्या मतलब हमारे आचार्य द्वारा भी ऐसी चीजें मान्य है देखिए जैसे मान लीजिए कि किसी ने कहा ईश्वर हैं इस दुनिया में। ठीक है। जी जी। अब किसी ने अपने हिसाब से कॉमिक्स के डिजाइन में, कार्टून के डिजाइन में अपने मनगढ़ंत कहानी किस्से जोड़ जाड़ के आधा रीडर वो क्या कहते हैं? कहीं-क कहीं का रोड़ा और भानुमती का कुबा जोड़ा। जी। किसी ने इस तरह से बिल्ड अप कर दिया कि जिस भगवान की वहां पर बात हुई है वह यही है जो मैंने बताया। मैंने दिखाया तो क्योंकि वहां पर भगवान शब्द आ गया कहीं पर या किसी प्रामाणिक आचार्य ने वो शब्द का उपयोग किया इसलिए आपके द्वारा दिया गया जो उसका स्वरूप है उस शब्द से रिलेटेड वो मान्य हो जाए प्रामाणिक हो जाए। यह कहां का सिद्धांत है? उसको मान्य मानने के लिए मेरी बात मान लो।
00:47:24:26 जिसको नहीं मानना है वीडियो मत देखो। तो ये सारी स्थितियां है उसके विषय में। वो शब्द जो है अगर कहीं शास्त्रों में मिल गया वो शब्द तो उसी से ये सिद्ध थोड़ी ना हो जाएगा कि तुम जिस तरह से उसकी भूमिका बना रहे हो। आप जिस तरह से उसका स्वरूप प्रस्तुत कर रहे हो जन सामान्य के समक्ष वही स्वरूप में वह है। उसी वही उसकी कथा है। वही उसकी कहानी है। बस वो शब्द क्योंकि आया है इसलिए आपकी सब बातें प्रमाणिक है। नहीं भाई हम जैसे ईश्वर जैसे ईश्वर शब्द आ गया कहीं पे तो अब कोई बालक भी रचना कर दे ईश्वर बनाया मैंने। ईश्वर का स्वरूप ईश्वर जब अवतार लेते तो ऐसे होते हैं तो उसको मानना चाहिए क्या
00:48:20:09 तो उसी तरीके से है ये जो मच्छराज है किसी की कल्पना है अब क्योंकि ग्रंथ में मलेच्छ शब्द आ गया तो इसलिए यह कहना यह मान लेना कि भैया उसके द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली भूमिका कथा स्वरूप यह सब प्रामाणिक हो गया उस पर सवाल नहीं कर सकते क्योंकि वह तो शास्त्र में आया है वह तो शंकराचार्य ने भी उपयोग में लिया वो शब्द तो ये गलत है। जी ठीक है। मतलब वो सही नहीं है। जैसे मतलब ये जिस तरह से बता रहे हैं कि मैं आपको मैं आपको उदाहरण दे रहा हूं। जैसे मान लीजिए कि हमारे शास्त्रों में कली राक्षस का वर्णन तो है ही। कली जी। अब मैं कल को एक राक्षस बना दूं पेंसिल से। यही है कली राक्षस। तो उसको माना जाएगा वो कली राक्षस वैसा ही है जैसा मैं दिखा रहा हूं।
00:49:18:02 जी मानक मतलब ऐसे मान तो नहीं सकते हैं लेकिन हां अगर शास्त्रों के बारे में शास्त्रों में जो उसके बारे में बता दिया गया है हम बस एक फिगर देख रहे हैं और हो सकता है हम उस फिगर को ना मानने के लिए तैयार हो लेकिन कली के बारे में जो जो बातें बताई गई वो सारी बातें हम उस फिगर को दिखा के बोल रहे हैं कि हां ये ये कर सकता है हो सकता है कि हम फिगर को ना जान रहे हो पर कली को अगर हम पहले से नहीं जान रहे हो मैं कह रहा हूं मैं कहूं यही फिगर है उसकी तो आप मानेंगे यह उसकी फिगर है ना फिगर तो मतलब नहीं माना जाता। फिगर को तो अप्रामाणिक मानना पड़ेगा ना। फिगर वही पूछना वही पूछ रहे थे कि जैसे वो जो मलेच्छ मलेच्छ शब्द है वो हमारे शास्त्रों में आया ही है। संभवत कहीं पर संदर्भ में मलेच्छों के संदर्भ में जी संभवत कहीं पर मलेच्छराज भी आ गया हो किसी क्या कहते हैं उस जो शक्ति है नकारात्मक शक्ति के लिए मलेच्छराज शब्द भी आ गया हो जैसे मान लीजिए कि मलेच्छों की बात हो रही है कि उनमें भी एक उनका लीडर था तो उस रूप में मलेच्छराजद शब्द भी आ गया मगर उससे
00:50:33:27 जो कहानी गड़ी गई है मलेच्छराज राज को लेकर के 50 100 एपिसोड जितने भी बने मुझे नहीं पता है। वो जो कहानी घड़ी हुई है वह प्रामाणिक नहीं हो जाती है। वो मनगढ़ंत कहानी है अन्यथा उसका शास्त प्रमाण दिखाना चाहिए उस कहानी का जो कि नहीं दिखाया गया है। और इस तरह के सवाल करने पर मना किया गया। उसको उसको उसको उसको एक फिक्शन ही मान लेना चाहिए। वो फिक्शन है। ठीक है। जी। अब कोई उसे कहे फिक्शन है तो वह लोग आकर कहने लगते हैं अरे तू तुम फिक्शन कह रहे हो तुम्हारे शास्त्रों में वर्णन है शंकराचार्य ने स्वयं उसको कहा है अरे भैया शंकराचार्य ने उस शब्द का उपयोग किया है उस स्वरूप का वर्णन नहीं किया जो स्वरूप तुम समाज में स्थापित कर रहे हो हम ठीक है तो वो अप्रामाणिक है वो कहानी कहानी अब जैसे मान लीजिए कि कंस के समय से पहले वह जो शास्त्र है वो मिल गए किसी को। अब उसमें कंस का वर्णन आया। ठीक है? अब कंस का वर्णन आ गया तो किसी ने जो है और बहुत ज्यादा वर्णन नहीं मिला। केवल कंस नाम मिल गया।
00:51:49:01 कंस नाम का एक राक्षस होगा जो ऐसा-सा करेगा। ठीक है? अब इसके बाद जो व्यक्ति है वह कंस का चित्र बनाने लगे और यह कहने लगे कंस जो है उस नदी के किनारे रहता है और कंस के ऊपर एक टीन का डब्बा रखा हुआ है सर पे और कंस जो है पूरे अपने बाजुओं में जो है वह पहनता है लोहे की जंजीरें और ऐसा ऐसा स्वरूप प्रस्तुत कर दिया जाए तो वो स्वरूप उसकी वो कहानी नदी के पास रहने की और वो मगरमच्छों को पकड़ पकड़ लेता है। उनसे लोगों को कटवाता है। यह सारी कहानियां कपोल कल्पति तो मानी जाएंगी। क्योंकि वस्तुत बाद में हमें क्या पता चला कि कंस का स्वरूप तो अलग है। कंस का निवास स्थान तो अलग है। यही पता चला ना। तो उसी तरीके से है कि वो बातें सब कपोल कथाएं हैं। काल्पनिक है। जो मलेच्छ शब्द का उपयोग करके घड़ी जा रही है। अब ऐसे काल शब्द हमारे में आया। ठीक है? रामपाल ने काल को लेकर के कहानियां ग डाली। हालांकि वही वह काल भगवान ही है। मगर उसने काल को भगवान से अलग करते हुए कहानियां गढ़ डाली कि नहीं गढ़ डाली? अब उसकी
00:53:04:02 कहानियों को इसलिए प्रमाणिक मान लिया जाए क्योंकि उसकी कहानी में जो शब्द आ रहा है, जो संज्ञा दी गई है मुख्य पात्र को वो संज्ञा शब्द वो हमारे शास्त्रों में उपलब्ध है। इसलिए उसकी कहानी को सही मान लिया जाए। यह उचित है क्या? नहीं। बस तो ऐसे ही जी भैया ठीक है जी भैया धन्यवाद बस करें अब
00:53:36:26 किरण जी बोले हैदर जी आपने आज कुछ जी मैं अभी फिलहाल तो सबके प्रश्न और उत्तर सुन रहा हूं उसी से ज्ञान अर्जित कर रहा हूं जी बताएं वैसे आप जो जी ये जो कहा जाता है कि ब्रह्मति प्रतिष्ठा अहम तो इससे इस वाले ये सिद्ध करना चाहते हैं कि देखो श्री कृष्ण ब्रह्म से भी एक बड़ी सत्ता है। तो इसमें ये आ जाता है कि श्री कृष्ण और ब्रह्म तो फिर अलग ईश्वरीय सत्ता सिद्ध हो जाएंगे। है ना? तो फिर श्री कृष्ण को अगर हम ब्रह्म नहीं कह देंगे तब तुम्हें गुस्सा भी नहीं आना चाहिए। है ना? हां ये तो बातें सही है। वहां पर मैंने कहा ना कि मनुष्य के लिए ब्रह्म से भी अधिक इंपॉर्टेंट भगवान का सगुण साकार स्वरूप है। ये भगवान ने दर्शाया है। और देखा जाए तो ब्रह्म की प्रतिष्ठा तो हर एक जीव में है। तो इससे थोड़ी ना हर एक जीव ब्रह्म से भी ज्यादा ऊंचा सत्ता सिद्ध हो जाता है। जब तक अग्नि जलेगी नहीं काठ की लकड़ी में तब तक सगुण साकार स्वरूप में नहीं आएगी अभिव्यक्त नहीं होगी। तब तक उसका जो काट की लकड़ी
00:54:52:00 में व्यापक स्वरूप जो है उसका बोध कैसे होगा? हां तो उसी तरीके से है उस भाव का दुरुपयोग है। सब जब बातें सामने से हो तो ठीक हो जाए। सामने से होने की बात ही नहीं आती। क्योंकि जो बड़े लोग होते हैं, वह जानते हैं कि सामने से होने में आने में दिक्कत है। तो हमारी जो ये सब चीजें हैं जो चल रही हैं विधिवत रूप से वो नष्ट हो जाने का खतरा है। क्यों जाए सामने? हम तो बच्चे टाइप के लोग ही वो करते हैं। सामने करते ही नहीं। सामने जाता ही नहीं। कोई ठीक है हम आपको ज्यादातर आप देखिए आप अधिकृत लोगों से बात करने जाओगे वो करने जाओगे चर्चा करने तो वो कटेंगे हां चर्चाओं से है ना और ये जो छुटकैया पहलवान है ये बहुत नॉर्मन उछलेंगे हां ये भव्य राधा के सदा जैसे हां तो वही वाली बात है उसमें
00:55:58:00 ठीक है ना? अधिकृत लोग जानते हैं कि यहां यहां पर हमारे पास उत्तर नहीं है। बहुत ज्यादा हमारी थ्योरी जो है वो क्लियर नहीं है। तो वो कहते हैं क्यों पड़ी क्यों पड़ी लकड़ी में पड़ी लकड़ी उठाएं? बढ़िया चल रहा है लोगों को। हरे कृष्णा हरे कृष्णा बोल बोल के अपना चला तो रहे हैं। बढ़िया हम और जो चुटकैया पहलवान होते हैं वो अपनी वर्चस्वता को सिद्ध कर रहे होते हैं। जो अधिकृत होते हैं। वो धन धनार्जन में लगे होते हैं। चुटकैया पहलवान वर्चस्वता में अंधे होते हैं। तो उनसे बात हो ही नहीं पाती अधिकृत लोगों से बड़े लोगों से। बहुत कम ऐसे वो आते हैं अवसर जब उनसे बात हो पाए। ठीक है? हां। हां और एक एक मतलब बात था आपको उस दिन कहते हुए सुना था कि आपका जो ये आध्यात्मिक की ओर मतलब यात्रा है इसमें इस का भी एक बड़ा हाथ था आपको कहते हुए सुना था कुछ दिन पहले तो वो क्या था मतलब
00:57:02:04 शिव का खंडन करते थे लोग हां शिवजी भगवान नहीं है हम यही यही था हम मेरे घर का ही कोई व्यक्ति उनका फॉलोअ बन गया था जो मुझे आकर समझाने लगा था कि शिवजी भगवान नहीं है मुझसे सहा नहीं गया एक दिन इसन मंदिर भी चला गया मैं और वहां पर पहला ही प्रश्न मेरा यह था हम जो वक्ता थे सभा को संबोधित कर रहे थे वहां पर जी उन्होंने एक प्रश्न किया कि धर्म क्या है? हम तो भगवत कृपा से आज जो धर्म की परिभाषा अकाट रूप से मुझे पता है ज्ञात है हम और जो मैं अपने ज्यादातर वीडियोस में बोलता हूं वो परिभाषा उस समय मुझे नहीं पता थी यद्यपि हम पर उस समय एक नाम मुझे पता था राम जी तो जब
00:58:17:08 ये प्रश्न आया कि धर्म क्या है? तो मैंने हाथ खड़ा किया और किसी ने नहीं खड़ा किया। तो बोले क्या है धर्म? मैंने कहा राम राम के पीछे पीछे चलना धर्म है। राम को फॉलो करना धर्म है। बोले वहां पर थोड़ा राम को भी थोड़ा वैसे देखा जाता है। खुल के वो लोग कहे ना दबी जुबान में वो लोग राम को भी खंडन करते हैं। तो उन्होंने कहा हां यह बात तो बिल्कुल सही है। राम जी को फॉलो करना और श्री कृष्ण को ओबे करना धर्म है। बैठ गया तो राम जी की पृष्ठभूमि मैंने तैयार कर ली पहले ही। उसके बाद अंत में वो बोले कि किसी का कोई प्रश्न हो तो पूछ ले। तो मैंने कहा खड़े होकर के कि राम जी ने शिव की भक्ति करके यह मत स्थापित किया कि शिव जी भगवान हैं। तो आप यहां पर इतने अंश में राम को अनफॉलो करने की बात क्यों कहते हैं? राम
00:59:32:19 ने तो उन्हें परम ब्रह्म कहा ना। हां बिल्कुल। तो कोई जवाब नहीं उनके पास। फिर बहुत सारे लोग मुझे घेर लिए पत्रकार टाइप पत्रकार टाइप से मेरे से सवाल करने लगे आप कहां रहते हैं यह है वो है मेरा नाम नोट कर लिया कई लोगों ने उस दिन मैं वहां पर उस सभा में चर्चा का विषय बन गया हां ऐसे बहुत करते हैं इस वाले ऐसे है इस की इस का जो है और आगे चलकर के मैंने ये जो वक्ता थे लगभग मुझे लगता है कि मुझे साल भर लग गया होगा। आगे चलकर के मैंने इस के इसी वक्ता का इंटरव्यू सबसे पहले लिया था। अच्छा वो लखनऊ वाले हम अच्छा
01:00:26:19 ठीक है जी कोई और प्रश्न सात्विक जी का प्रश्न जी जो हम जो हिंदू राष्ट्र बनाने का को कहते हैं क्या इसमें हम गणतंत्र शासन को लागू नहीं करेंगे राजतंत्र लाएंगे हिंदू राष्ट्र में हिंदू राष्ट्र के लिए जो अभी शासन तंत्र होगा वही किया जाएगा। आप उसके बारे में अध्ययन करें। क्या हिंदू राष्ट्र के लिए जो अभीष्ट शासन तंत्र बताया गया है जो विधि बताई गई है वही शासन लागू होगा। आप उसका अध्ययन करें। कहां से अध्ययन करेंगे वो उसका? गर्व से कहे हम हिंदू है। जी ठीक है। लेकिन मतलब मैं जो हमारा जो सामान्य वार्तालाप होता है टेलीग्राम में मैंने वहां पे भी पूछा था। तो वहां पे कुछ लोगों ने बताया गणतंत्र शासन हमारा नहीं है। तो क्या हम गणतंत्र मुझे लगा क्या हिंदू राष्ट्र में गणतंत्र शासन लागू नहीं होगा? इसलिए मैं मेरे मन में शंका उत्पन्न हुआ। मैंने आपको शंका का समाधान कहां से प्राप्त होगा वह बता दिया है। जी ठीक है जी
01:01:42:04 हम चलिए ठीक है श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम श्री राम जय राम जय जय राम राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम श्री राम जय राम जय जय राम नारायण समारंभम
01:02:33:25 शंकराचार्य अस्मदाचार्य पर्यताम वंदे गुरु परंपरा वंदे गुरु वंदे गुरु परंपरा ठीक है फिर मिलते हैं अगली बार और बीच से वो जो नेक्स्ट सेशन में डिबेट होनी है उसकी तैयारी करिएगा ठीक है ठीक है ना ठीक है और सशक्त लोग जो विपरीत वाला जो है जो कमजोर पक्ष है उसमें जरूर रहें जिससे कि एक अच्छी चर्चा देखने को हमें मिल पाए।
01:03:07:03 जय श्री राम। जय श्री राम। हर महादेव। हर हर महादेव। [संगीत]
Plans for this video (0)
No Plans yet. Press "✂️ Open Clip Cutter" to make one.
-
⬜Hindi SRT Required
YouTube Studio → Subtitles → Hindi → upload the SRT file. (Checked automatically once OAuth is connected.)
-
⬜English SRT
YouTube Studio → Subtitles → Add language → English → upload the SRT file.
-
⬜Title (per Rules)
Check the title against the RULES on honorifics, names and terms.
-
⬜Description
YouTube Studio → Details → Description. Write it as per the RULES.
-
⬜End Screen
YouTube Studio → Editor → End screen. The API does not report this, so press Done after adding it.
-
⬜Cards
YouTube Studio → Editor → Cards. The API does not report this, so press Done after adding them.
-
⬜Playlist Automatic
YouTube Studio → Details → add to Playlists. It gets ticked ✓ automatically at the next sync.
-
⬜Thumbnail
YouTube Studio → Details → Thumbnail → upload a custom thumbnail.
"Done" is your confirmation. The YouTube API does not report things like End Screen and Cards.
Playlists
Not in any public playlist (or YouTube sync has not run yet).
आह्वान कक्षाएं : प्रश्नोत्तरी सत्र Part-3
🔗 This video is made from parts of these videos
Description
(empty)
History
No changes yet.
✂️ Clip Cutter
⌨️ Keyboard shortcuts
Space Play/Pause · I Set start · O Set end · ←→ 1 second (Shift: 5) · ,. 1 frame · P Preview · Enter Add clip · Esc Stop
Start
End
✂ Remove (middle part: bad audio, bad section)
Move the video to that spot (click the SRT or the bar), then press "Start"/"End".
Clips () · Total
Add clips above. They will appear here; drag (⋮⋮) to reorder.
-
⋮⋮