1
00:00:02,720 --> 00:00:06,800
तो सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप

2
00:00:06,800 --> 00:00:11,920
सभी कुशल पूर्वक होंगे और

3
00:00:11,920 --> 00:00:16,640
धरातल पर कार्यों की अधिकता होने के कारण

4
00:00:16,640 --> 00:00:20,800
आपके समक्ष यथावत जिस तरह से

5
00:00:20,800 --> 00:00:26,000
पूर्व में YouTube चैनल के माध्यम से इनेटिव

6
00:00:26,000 --> 00:00:30,400
वीडियोस हम प्रदान कर रहे थे। उसमें

7
00:00:30,400 --> 00:00:35,280
थोड़ी सी रुकावट आई धरातल पर ज्यादा एक्टिव होने के कारण।

8
00:00:35,280 --> 00:00:39,600
परंतु जो भी हम कर रहे हैं यहां समय ना देकर के जो धरातल

9
00:00:39,600 --> 00:00:43,600
पर समय अधिक दे रहे हैं। धरातल पर पहले भी समय देते थे

10
00:00:43,600 --> 00:00:47,920
पर इस समय बहुत ज्यादा दे रहे हैं। तो उसका जो अभी जो ऐसा परिवर्तन

11
00:00:47,920 --> 00:00:51,920
किया तो उसके द्वारा मिलने वाले जो परिणाम है जो फल

12
00:00:51,920 --> 00:00:56,320
हैं वो आपको आपके लिए अत्यंत लाभदायक

13
00:00:56,320 --> 00:01:00,480
होंगे। आपको जब प्राप्त होंगे वो फल जब आपको सूचनाएं प्राप्त होंगी

14
00:01:00,480 --> 00:01:06,480
तो आपको अत्यंत हर्ष होगा।

15
00:01:06,880 --> 00:01:11,680
तो सबसे पहले आ जाते हैं आज के बुलेट पॉइंट्स पर

16
00:01:11,680 --> 00:01:17,680
बिना विलंब के।

17
00:01:27,600 --> 00:01:31,760
हम तो हमने पिछले अध्याय में पिछले एपिसोड

18
00:01:31,760 --> 00:01:37,280
में जो चौथा अध्याय है उसके कुछ 15

19
00:01:37,280 --> 00:01:41,600
श्लोकों की विवेचना कर ली थी। उसमें

20
00:01:41,600 --> 00:01:45,920
रामपाल ने अपनी गरिमा गीता की पृष्ठ संख्या

21
00:01:45,920 --> 00:01:50,560
94 हम उसमें

22
00:01:50,560 --> 00:01:56,560
रामपाल ने माना है रामपाल की गरिमा गीता की खोल लीजिए

23
00:01:56,560 --> 00:02:00,560
रामपाल के द्वारा लिखी गई या जो भी है पता नहीं किसने लिखा

24
00:02:00,560 --> 00:02:03,600
है

25
00:02:03,600 --> 00:02:09,600
प्रश्न संख्या 94

26
00:02:12,240 --> 00:02:16,160
तो इसमें रामपाल ने सर्वप्रथम

27
00:02:16,160 --> 00:02:20,160
गीता जी के अध्याय चार से चार के श्लोक एक से

28
00:02:20,160 --> 00:02:24,320
तीन में इसने माना है कि गीता कहने वाला अर्जुन को बोल

29
00:02:24,320 --> 00:02:28,640
रहा है कि तू मेरा प्रिय मित्र है। अब यदि गीता

30
00:02:28,640 --> 00:02:32,640
बोलने वाला गीता बोलने वाले भगवान श्री कृष्ण नहीं है। कोई

31
00:02:32,640 --> 00:02:37,440
और एंटिटी इनके द्वारा बनाई गई जो तथाकथित इनका जो काल है

32
00:02:37,440 --> 00:02:41,440
वह है जो कि ब्रह्मा विष्णु महेश नहीं है, जो कृष्ण नहीं है, जो

33
00:02:41,440 --> 00:02:45,680
राम नहीं है, जो ईश्वर भी नहीं है, जो एक राक्षस है।

34
00:02:45,680 --> 00:02:50,240
तो यदि इस राक्षस यह राक्षस

35
00:02:50,240 --> 00:02:55,120
अर्जुन को अपना प्रिय मित्र बता रहा है।

36
00:02:55,120 --> 00:02:59,520
क्यों बता रहा है? भगवान श्री कृष्ण की

37
00:02:59,520 --> 00:03:01,920
और

38
00:03:01,920 --> 00:03:06,160
अर्जुन की मित्रता प्रासंगिक है। हम सब लोग जानते हैं।

39
00:03:06,160 --> 00:03:10,400
जग जाहिर है। परंतु ये अर्जुन

40
00:03:10,400 --> 00:03:14,960
को अपना प्रिय मित्र क्यों बोल रहा है? कब हुई? इनकी मित्रता कैसे हुई?

41
00:03:14,960 --> 00:03:18,720
इस बारे में कोई विवेचना नहीं है। कोई शास्त्र नहीं है। कुछ नहीं है। क्योंकि

42
00:03:18,720 --> 00:03:23,200
वास्तविकता क्या है कि भगवान श्री कृष्ण ने ही गीता का ज्ञान दिया है।

43
00:03:23,200 --> 00:03:27,600
उसके बाद इसने इसमें शब्दों

44
00:03:27,600 --> 00:03:30,560
की

45
00:03:30,560 --> 00:03:35,520
चोरी भी बहुत सारी की है। हम

46
00:03:35,520 --> 00:03:39,760
बहुत सारी इस में चोरी की है। तो आप उसको देख सकते हैं जाकर

47
00:03:39,760 --> 00:03:43,840
के। कहा जो इसका जिस एपिसोड के हम बुलेट

48
00:03:43,840 --> 00:03:47,920
पॉइंट्स आज बता रहे हैं उस एपिसोड को आप देख लेंगे तो कई ऐसे शब्द बोले जो

49
00:03:47,920 --> 00:03:51,920
है ही नहीं। जैसे फॉर एग्जांपल मैं दे देता हूं। जैसे आगे

50
00:03:51,920 --> 00:03:57,680
अगले पैरा अगले दूसरे पैराग्राफ में ये कह रहा है कि

51
00:03:57,680 --> 00:04:01,680
चार के श्लोक पांच से नौ तक गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि अर्जुन तेरे और मेरे

52
00:04:01,680 --> 00:04:06,240
बहुत से जन्म हो चुके हैं। इन सबको तू नहीं जानता मैं जानता हूं। इसके बाद

53
00:04:06,240 --> 00:04:10,560
इसने कहा कि मैं मनुष्यों की तरफ तरह जन्म ना लेने वाला अविनाशी

54
00:04:10,560 --> 00:04:14,640
आत्मा होते हुए भी यह मनुष्यों की तरह ये क्या है?

55
00:04:14,640 --> 00:04:18,960
अच्छा सर्व के बाद इसने कोष्टक में लिखा है 21

56
00:04:18,960 --> 00:04:21,840
ब्रह्मांड।

57
00:04:21,840 --> 00:04:27,200
ये दिखाइए जरा ये वाला। सर्व का अर्थ 21 ब्रह्मांड कैसे हुआ?

58
00:04:27,200 --> 00:04:31,360
सर्व प्राणियों का स्वामी होते हुए भी ये कौन से हिसाब से स्वामी

59
00:04:31,360 --> 00:04:35,440
है? सर्व प्राणियों का हम किस हिसाब से स्वामी

60
00:04:35,440 --> 00:04:39,600
है ये तो एक चोर टाइप का व्यक्ति है ना स्वामी तो कोई

61
00:04:39,600 --> 00:04:43,920
और है 21 ब्रह्मांडों के लोगों का भी ये स्वामी

62
00:04:43,920 --> 00:04:48,080
नहीं है स्वामी तो कोई और है कबीर है रामपाल के हिसाब

63
00:04:48,080 --> 00:04:52,160
से ये किस हिसाब से स्वामी हुआ ये तो चोरी डकैती करने आया

64
00:04:52,160 --> 00:04:56,160
हुआ व्यक्ति है इसको आप स्वामी बोल रहे मूर्खता की

65
00:04:56,160 --> 00:05:00,160
पराकाष्ठा हर पन्ने पर मिलती रहेगी तो

66
00:05:00,160 --> 00:05:04,160
इस तरह से इसने जो बहुत सारे शब्दों का हेरफेर किया है। जो है ही

67
00:05:04,160 --> 00:05:08,240
नहीं वो शब्द बोले हैं। है ना? जैसे मैं इसी पैराग्राफ में

68
00:05:08,240 --> 00:05:12,240
देखिए अंतिम लाइन में उन्हीं में से अंश अवतार रूप में श्री कृष्ण राम

69
00:05:12,240 --> 00:05:16,240
श्री परशुराम आदि सजामि रचता हूं।

70
00:05:16,240 --> 00:05:20,240
अंश अवतार कहां लिखा है इसमें? उसमें तो लिखा है मैं

71
00:05:20,240 --> 00:05:25,120
अपना सजाम में हम। मैं अपना सृजन करता हूं।

72
00:05:25,120 --> 00:05:29,840
उसमें यही कहना पड़ेगा अपने रूप का सृजन करता हूं। परंतु

73
00:05:29,840 --> 00:05:33,840
इसमें कहां लिखा है कि अंश अवतार का सजन करता

74
00:05:33,840 --> 00:05:36,960
हूं और उनमें गुप्त रूप से प्रकट होता हूं।

75
00:05:36,960 --> 00:05:41,280
ये कहां लिखा है? इसकी संस्कृत कहां है?

76
00:05:41,280 --> 00:05:44,720
जेल वाले बाबा जी

77
00:05:44,720 --> 00:05:49,280
वाले बाबा मेरा गाना बजा दो। गाना बजा दो।

78
00:05:49,280 --> 00:05:53,440
ये रामपाल के जो फॉलोअर्स हैं वहां जाकर कहते

79
00:05:53,440 --> 00:05:58,000
होंगे जेल वाले बाबा मेरा गाना बजा दो। गाना बजा दो।

80
00:05:58,000 --> 00:06:04,000
वह गाना बजाता होगा।

81
00:06:05,360 --> 00:06:09,760
जेलर कहता होगा जेल वाले बाबा इसका गाना बजा दे कौन सा जनता

82
00:06:09,760 --> 00:06:14,000
कह रही है। बाकी फिर प्रशासन कहेगा बाकी

83
00:06:14,000 --> 00:06:19,280
पूरी कर दूंगा मैं। वही कसर जो रह रही है। हां

84
00:06:19,280 --> 00:06:23,280
नहीं वो शिवश कहेगा जेल वाले बाबा गाना

85
00:06:23,280 --> 00:06:27,600
बजा दो। कौन सा जनता कह रही है बाकी पूरी कर दूंगा मैं

86
00:06:27,600 --> 00:06:32,880
कोई कसर जो रह रही है हम

87
00:06:32,880 --> 00:06:37,920
खैर आगे चलते हैं तो क्या है

88
00:06:37,920 --> 00:06:42,400
कि

89
00:06:42,400 --> 00:06:46,480
काल ब्रह्म जो मुझे अब इसमें क्या

90
00:06:46,480 --> 00:06:52,160
है सा अच्छा हां दो चीजें हमें माननी पड़ेगी

91
00:06:52,160 --> 00:06:55,920
95वें पृष्ठ पर

92
00:06:55,920 --> 00:07:00,000
इसने मतलब गीता इस इस पृष्ठ के अंत से जो

93
00:07:00,000 --> 00:07:04,000
है इसने कहा है कि यह जो अवतार होता है साधुओं

94
00:07:04,000 --> 00:07:08,000
की रक्षा के लिए और असाधुओं के संहार के लिए होता है। ठीक

95
00:07:08,000 --> 00:07:12,160
है? जबकि यही अपने लेक्चर्स में यही लोग ढिंढोरा

96
00:07:12,160 --> 00:07:16,320
पीटते हैं कि जो लोग मर रहे हैं वह काल की वजह से मर रहे हैं और

97
00:07:16,320 --> 00:07:20,400
शास्त्र विरुद्ध भक्ति की वजह से इनके अनुसार जो शास्त्र विरुद्ध भक्ति है उसकी वजह से मर

98
00:07:20,400 --> 00:07:24,400
रहे हैं। तो पहले तय कर ले

99
00:07:24,400 --> 00:07:28,480
कि वो शास्त्र विरुद्ध जो लोग हैं जिनको धर्म और अधर्म का

100
00:07:28,480 --> 00:07:32,560
बोध नहीं है वह साधु है कि असाधु है धर्मी है कि

101
00:07:32,560 --> 00:07:36,560
अधर्मी है तो इनके अनुसार काल

102
00:07:36,560 --> 00:07:41,440
जो है खुद ही एक तरफ कहते हैं कि काल जो है वह आता है किस लिए

103
00:07:41,440 --> 00:07:45,680
लोगों को खाने के लिए लोगों को परेशान करने के लिए झूठ बोलने के लिए भ्रम

104
00:07:45,680 --> 00:07:48,000
में डालने के लिए इन सारे बुरे

105
00:07:48,000 --> 00:07:52,320
कारणों की वजह से काल है और यहां पर क्या आ रहा है

106
00:07:52,320 --> 00:07:56,480
चार सार्थ के अर्थ में खुद ही कह रहा है कि वह अवतार जो होते हैं वह साधुओं

107
00:07:56,480 --> 00:08:00,480
की रक्षा और असाधुओं का संहार करने के लिए होते हैं।

108
00:08:00,480 --> 00:08:04,720
ठीक है? तो इसके अलावा धर्म स्थापना

109
00:08:04,720 --> 00:08:09,040
तो चार सात चार आठ चार छ इन सब श्लोकों

110
00:08:09,040 --> 00:08:13,120
को अमान्य मानना पड़ेगा। अगर तुम यह मानते हो कि काल अपना

111
00:08:13,120 --> 00:08:17,760
उल्लू सीधा करता है या उसकी भक्ति घटिया है या ये है वो है जो पंचौरा

112
00:08:17,760 --> 00:08:22,000
अपना छाप रखा है। ठीक है? जो बकवास कर रखी

113
00:08:22,000 --> 00:08:26,800
है तो इन श्लोकों को भी अमान्य मानना पड़ेगा। कौन-कौन से हैं?

114
00:08:26,800 --> 00:08:30,880
चार, छ, सात, आठ ये सब अमान्य मानने पड़े। चार, तीन भी अमान्य

115
00:08:30,880 --> 00:08:35,440
मानना पड़ेगा जिसमें कि ये कहा है कि अर्जुन तू मेरा मित्र है इसलिए तुझे बता रहा हूं।

116
00:08:35,440 --> 00:08:39,440
इसने कहा नहीं है कि गलत श्लोक है। क्यों भाई? अर्जुन काल

117
00:08:39,440 --> 00:08:44,960
का मित्र था क्या? हां?

118
00:08:44,960 --> 00:08:49,440
कब हुई मित्रता? चलिए आगे चलते हैं। अब प्रश्न संख्या 95

119
00:08:49,440 --> 00:08:53,440
पर आ जाते हैं। क्या हुआ है? इसमें

120
00:08:53,440 --> 00:08:57,520
इसने माना है कि काल अच्छा जो मुझे

121
00:08:57,520 --> 00:09:01,360
तत्व से जान लेता है

122
00:09:01,360 --> 00:09:05,600
जो मुझे तत्व से जान लेता है वह पुनः जीवन

123
00:09:05,600 --> 00:09:09,600
मरण को प्राप्त नहीं होता। यह भगवत गीता में कहा

124
00:09:09,600 --> 00:09:13,600
गया है। जो भगवत गीता के श्लोक का अर्थ है। परंतु

125
00:09:13,600 --> 00:09:17,840
इसने क्या लिखा है? जो मुझे तत्व से जान लेता है

126
00:09:17,840 --> 00:09:22,240
उस पूर्ण ज्ञानी का पुनर्जन्म नहीं होता।

127
00:09:22,240 --> 00:09:26,320
तो जब काल को तत्व से जान लेना ही पूर्ण ज्ञान है

128
00:09:26,320 --> 00:09:30,400
तो फिर काल से अलग किसी और का ज्ञान क्यों लेने जाए?

129
00:09:30,400 --> 00:09:34,560
क्योंकि इसने यही कहा ना कि जो मुझ काल को तत्व से जान लेता है

130
00:09:34,560 --> 00:09:38,720
उस पूर्ण ज्ञानी का यानी काल को तत्व से जान लेने वाला पूर्ण

131
00:09:38,720 --> 00:09:43,680
ज्ञानी हो गया। पुनर्जन्म नहीं होता। ठीक है?

132
00:09:43,680 --> 00:09:45,840
और

133
00:09:45,840 --> 00:09:51,840
जो तत्व से नहीं जानता है वह मेरे जाल में फंसा रह जाता है।

134
00:09:52,480 --> 00:09:56,720
जो इस प्रकार तत्व से मुझे नहीं जानता है वो मेरे जान जाल में फंसा रहता

135
00:09:56,720 --> 00:10:01,040
फंसा रह जाता है। तो यानी

136
00:10:01,040 --> 00:10:05,120
कि गीता बोलने वाला ही यह कह रहा है यहां पर इसके हिसाब से भी

137
00:10:05,120 --> 00:10:09,200
कि जो उसको जान लेगा वो पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता। और

138
00:10:09,200 --> 00:10:13,440
ये बात भगवान ने और भी कई जगह पर कही है कि वो ऐसा

139
00:10:13,440 --> 00:10:17,600
ज्ञान है जिसके बाद और कुछ जानना बाकी नहीं रह जाएगा। मेरे बारे में अपने बारे में

140
00:10:17,600 --> 00:10:21,840
ये बात कही है। आगे के चैप्टर्स में आएगा। तो जब

141
00:10:21,840 --> 00:10:25,840
भगवान ने कह दिया कि मुझे ही जानना तत्व ज्ञान है और मुझे जान लेने के बाद

142
00:10:25,840 --> 00:10:30,240
पुनर्जन्म नहीं होता है। इसके हिसाब से काल ने कहा हमारे हिसाब से भगवान ने कहा।

143
00:10:30,240 --> 00:10:34,240
तो फिर क्यों जाए कबीर को जानने? जब यहां पर पूर्ण

144
00:10:34,240 --> 00:10:38,320
ज्ञान हो गया व्यक्ति पूर्ण ज्ञानी हो गया जान के वो किसी

145
00:10:38,320 --> 00:10:42,320
भी रूप में जाने तुम्हारे हिसाब से बुरे रूप में जाने हमारे हिसाब से

146
00:10:42,320 --> 00:10:46,320
अच्छे रूप में जाने मगर यहां पर जान करके तुमने भी मान लिया कि वो

147
00:10:46,320 --> 00:10:50,560
पूर्ण ज्ञानी हो गया पूर्ण ज्ञानी हो गया जिसने काल को तत्व से जान लिया

148
00:10:50,560 --> 00:10:54,640
तो कबीर को क्यों जाने सूक्ष्म वेद क्यों पड़े हो गया

149
00:10:54,640 --> 00:10:59,280
खत्म यही पर हो गया इनका चैप्टर क्लोज ठीक है आगे चलते है

150
00:10:59,280 --> 00:11:03,280
इसके आगे इसने क्या बेवकूफी की जेल वाले

151
00:11:03,280 --> 00:11:07,360
बाबा ने गाना बजाया है तो क्या बजाया है? काल ब्रह्म

152
00:11:07,360 --> 00:11:07,860
अच्छी

153
00:11:07,760 --> 00:11:11,760
आत्माओं को रचता है अर्थात पैदा करता है। अब

154
00:11:11,760 --> 00:11:16,640
ये बताओ आत्माओं को

155
00:11:16,640 --> 00:11:20,720
क्या कहते हैं? परमेश्वर रचता है क्योंकि इसने दो दूसरे

156
00:11:20,720 --> 00:11:24,880
अध्याय के 10व श्लोक में जो बातें की है उसमें यह माना

157
00:11:24,880 --> 00:11:29,280
है कि जो कबीर परमेश्वर है इनके हिसाब से वो आत्माओं को उत्पन्न

158
00:11:29,280 --> 00:11:33,440
करता है रचता है और यहां क्या कह रहा है कि

159
00:11:33,440 --> 00:11:37,680
काल ब्रह्म रचता है तो क्या काल ब्रह्म और कबीर एक ही है परमेश्वर काल ब्रह्म

160
00:11:37,680 --> 00:11:41,680
ही है और दूसरी बात यह है कि अच्छी आत्माओं को रचता है

161
00:11:41,680 --> 00:11:45,760
इसका अर्थ क्या हुआ कि वो अच्छा अच्छा है यानी कि काल ने

162
00:11:45,760 --> 00:11:50,000
अगर यह मानेंगे अगर अगर ये मानेंगे कि काल यहां पे जो है आत्मा

163
00:11:50,000 --> 00:11:54,080
जो मनुष्य रूप में जन्म लेती है। हालांकि वो अर्थ निकलेगा नहीं पर मान लेते हैं कि

164
00:11:54,080 --> 00:11:58,560
आत्मा जो है मनुष्य रूप में जो जन्म लेती है

165
00:11:58,560 --> 00:12:02,560
उसको काल रचता है। मतलब उसके शरीर को काल रचता है। तो फिर ये

166
00:12:02,560 --> 00:12:06,640
फिर क्या बुरे शरीर वाले जो मनुष्य है उनको काल नहीं

167
00:12:06,640 --> 00:12:12,640
रचता है क्या? तो अच्छी आत्माओं को रचता है। यह क्या है?

168
00:12:13,200 --> 00:12:19,200
तो खैर कुल मिला के बात यह है कि

169
00:12:19,600 --> 00:12:23,760
आत्माओं को रचने वाला परमेश्वर इसने ही माना है।

170
00:12:23,760 --> 00:12:27,760
यद्यपि आत्माओं को रचने वाला कोई है ही नहीं। परंतु इस मूर्ख

171
00:12:27,760 --> 00:12:31,840
ने माना है कि आत्माओं को परमेश्वर ने रचा। और यहां पे ये खुद कह रहा है कि आत्माओं

172
00:12:31,840 --> 00:12:37,520
को कौन रचता है? काल। ठीक है?

173
00:12:37,520 --> 00:12:41,680
और क्या है? आकार में प्रकट नहीं होता है। अब यहां आगे कह

174
00:12:41,680 --> 00:12:45,760
रहा है कि यह जो

175
00:12:45,760 --> 00:12:49,920
है आकार में प्रकट नहीं होता है। इसका अटल अविनाशी नियम है।

176
00:12:49,920 --> 00:12:54,000
क्या नियम है कि अपने आकार में प्रकट नहीं होता है।

177
00:12:54,000 --> 00:12:58,320
मतलब दिखाई देने वाला स्वरूप नहीं प्राप्त लेता है।

178
00:12:58,320 --> 00:13:02,640
तो फिर खुद ही कह रहा है कि मैं अवतार लेता हूं। मैं आता हूं। मैं ये करता हूं। मैं

179
00:13:02,640 --> 00:13:06,880
विष्णु रूप में प्रकट हो जाता हूं। ये वो ये क्या है? हम

180
00:13:06,880 --> 00:13:11,360
यानी वह आकार लेता है ना साकार रूप में

181
00:13:11,360 --> 00:13:17,200
आकार रूप में प्रकट होता है ना तो ये पूरी

182
00:13:17,200 --> 00:13:23,200
माथा पीटते रहो इसके बाद आगे क्या है कि

183
00:13:26,170 --> 00:13:30,800
[संगीत] 96 वे पृष्ठ पर इसने

184
00:13:30,800 --> 00:13:34,960
एक शब्द लिखा है अगला पृष्ठ है 96 इसमें दूसरी

185
00:13:34,960 --> 00:13:39,840
लाइन के अंत में इसने कहा है

186
00:13:39,840 --> 00:13:43,920
चार 10 का अर्थ करते समय कहा है कि काल ब्रह्म ने कहा कि जिनके राग द्वेष मर गए हैं

187
00:13:43,920 --> 00:13:48,080
जिसने मुझे यहां 21 ब्रह्मांड के कर्मों का कर्ता अर्थात मालिक हूं ऐसा

188
00:13:48,080 --> 00:13:52,400
तत्व से जान लिया है देखिए तत्व से जानने को बार-बार ये सीमित

189
00:13:52,400 --> 00:13:56,480
कर रहा है भगवान की असीमितता अलौकिकता जो

190
00:13:56,480 --> 00:14:00,800
उन्होंने बताई है कि मेरे मैं तू जानता है मैं नहीं जानता मेरे जन्म कर्म दिव्य

191
00:14:00,800 --> 00:14:04,960
होते हैं तो उसको बार-बार ये सीमित कर रहा है कि 21 ब्रह्मांड चलो चलो

192
00:14:04,960 --> 00:14:09,440
ठीक है। 21 ब्रह्मांड ठीक है मान लिया। फिर आगे वह मतावलंबी

193
00:14:09,440 --> 00:14:13,440
हो चुके हैं। ये शब्द कहां से आ गया? वह मतावलंबी हो

194
00:14:13,440 --> 00:14:18,800
चुके हैं। जबकि वहां भगवत गीता में कहा गया है कि वो

195
00:14:18,800 --> 00:14:22,800
सिद्ध माना गया उनको जो भगवान को तत्व से जान लेंगे। मगर

196
00:14:22,800 --> 00:14:26,800
इसने क्या किया? इसने उसको मतावलंबी कहा

197
00:14:26,800 --> 00:14:32,000
है। मतावलंबी का क्या अर्थ है यहां पर लेने का? हम

198
00:14:32,000 --> 00:14:36,080
तो यह भी एक हर बात में बोल वचन है भैया हर बात में कहां

199
00:14:36,080 --> 00:14:40,320
तक क्या क्या करोगे ठीक है इसको निकाल लेता हूं क्या कहा

200
00:14:40,320 --> 00:14:41,360
है जिनके

201
00:14:41,360 --> 00:14:45,520
राग द्वेष खत्म हो चुके हैं पहले भी जिनके राग द्वेष भय और क्रोध

202
00:14:45,520 --> 00:14:49,520
सर्वथा नष्ट हो गए थे और जो मुझ में अनन्य प्रेम पूर्वक स्थित रहते

203
00:14:49,520 --> 00:14:53,600
थे ऐसे मेरे आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त उपयुक्त ज्ञान

204
00:14:53,600 --> 00:14:57,760
रूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त कर चुके हैं।

205
00:14:57,760 --> 00:15:01,920
ठीक है? मतलब सच्चिदानंद वाला जो मोक्ष होता है उसको प्राप्त कर चुके

206
00:15:01,920 --> 00:15:05,920
हैं। मगर यहां पर वह मतावलंबी हो चुके हैं। यह क्या है? क्या

207
00:15:05,920 --> 00:15:10,160
बकवास है भाई? खैर आगे चलते हैं। इसी में इसने

208
00:15:10,160 --> 00:15:14,320
कहा है कि ज्ञानी मुझे अच्छे लगते हैं

209
00:15:14,320 --> 00:15:18,400
तथा मैं ज्ञानी को ज्ञानियों को प्रिय हूं। ठीक है?

210
00:15:18,400 --> 00:15:22,560
इसको क्या अच्छे लगते हैं? ज्ञानी और यह ज्ञानियों को प्रिय

211
00:15:22,560 --> 00:15:26,640
है। और क्योंकि वह तीनों गुणों की भक्ति

212
00:15:26,640 --> 00:15:32,000
ना करके मेरी अर्थात ब्रह्म की भक्ति करते हैं।

213
00:15:32,000 --> 00:15:36,000
तो जो व्यक्ति ज्ञानी है और जिसको

214
00:15:36,000 --> 00:15:40,080
यहां पर क्या कहा जा रहा है? उपयुक्त ज्ञान रूप तप से

215
00:15:40,080 --> 00:15:44,240
पवित्र होकर तपस्वी कहा गया है। ज्ञान तपसा चार

216
00:15:44,240 --> 00:15:49,600
दस भगवत गीता चार 10 ज्ञान तपसा

217
00:15:49,600 --> 00:15:55,360
ज्ञान तपसा ज्ञान रूप तप से हम

218
00:15:55,360 --> 00:15:56,400
और जो

219
00:15:56,400 --> 00:16:00,560
पवित्र है तो वो काल की भक्ति कैसे कर रहे हैं भाई? पहली बात तो जो

220
00:16:00,560 --> 00:16:04,960
का जो काल की भक्ति करने वाला वह काल की भक्ति करने वाला

221
00:16:04,960 --> 00:16:09,040
अज्ञानी वह अज्ञानी है। ज्ञानी कहां से हुआ? और फिर जब वो

222
00:16:09,040 --> 00:16:13,040
अज्ञानी है तो वो ज्ञान रूप तप से

223
00:16:13,040 --> 00:16:17,200
पवित्र कैसे हुआ? तपस्या से पवित्र कैसे हुआ? तप

224
00:16:17,200 --> 00:16:21,600
का तो ये खंडन करता है। इसी में आगे देखेंगे। तो यह भी एक

225
00:16:21,600 --> 00:16:25,600
झोल का ढोल में पोल और बहुत सारे यहां पर शब्द

226
00:16:25,600 --> 00:16:29,760
छिपए गए हैं बार-बार वो आप उसमें देख लीजिएगा जो

227
00:16:29,760 --> 00:16:34,240
पूरा एपिसोड है। इसके बाद इसने यहां पर देखिए देवताओं

228
00:16:34,240 --> 00:16:38,320
के लिए जहां शब्द आया देवताओं कि जो अपना

229
00:16:38,320 --> 00:16:42,480
लौकिक फल प्राप्त करने के लिए हम देवताओं का पूजन करते हैं। उनको जो देवताओं

230
00:16:42,480 --> 00:16:46,800
से मिलने वाली सिद्धि जल्दी प्राप्त हो जाती है। तो यह ब्रह्मा विष्णु महेश जबरदस्ती

231
00:16:46,800 --> 00:16:51,360
यहां बात बात में ब्रह्मा विष्णु महेश को डाल रहा है। ठीक है।

232
00:16:51,360 --> 00:16:55,520
इसके बाद क्या हुआ कि चार 13 में भगवान ने कहा

233
00:16:55,520 --> 00:16:59,920
कि समस्त कर्मों को करते हुए भी संपूर्ण

234
00:16:59,920 --> 00:17:03,920
सृष्टि की रचना करते हुए भी तू मुझे अकर्ता जान। क्यों?

235
00:17:03,920 --> 00:17:06,400
क्योंकि

236
00:17:06,400 --> 00:17:10,400
उनकी कर्म फल में आसक्ति नहीं है। केवल लग रहा है कि

237
00:17:10,400 --> 00:17:11,920
वो कर्म कर रहे हैं। वास्तविकता

238
00:17:11,920 --> 00:17:16,080
में वो कर्म कुछ वो कुछ नहीं कर रहे। सब कुछ करते हुए भी वह कुछ ना करने वाले

239
00:17:16,080 --> 00:17:20,160
हैं। इसलिए उनको कर्म बांधते नहीं है।

240
00:17:20,160 --> 00:17:23,840
ठीक है? यह

241
00:17:23,840 --> 00:17:28,000
चार 13 और 4 से हमें पता चलता है। पर इसने

242
00:17:28,000 --> 00:17:30,640
क्या किया?

243
00:17:30,640 --> 00:17:34,800
इसने क्या किया? कि इसने इस बारे में बात ही नहीं

244
00:17:34,800 --> 00:17:38,960
की है कि काल को जो है अकर्ता मानना है क्योंकि काल तो भाई अपने उल्लू

245
00:17:38,960 --> 00:17:43,040
सीधा करता है। काल तो अपने खाने पीने का इंतजाम करता है। तो

246
00:17:43,040 --> 00:17:47,040
काल ना ही कर्म फल से अनासक्त है

247
00:17:47,040 --> 00:17:51,040
और ना ही वो अकर्ता है। मगर इसने अपनी भगवत

248
00:17:51,040 --> 00:17:55,520
गीता का अर्थ करते समय इसने ये बात ही नहीं की। ठीक है?

249
00:17:55,520 --> 00:17:59,600
तो इस हिसाब से जो चार 13 है जिसमें गीता कहने वाले

250
00:17:59,600 --> 00:18:04,640
को अकर्ता कहा गया है। चार 14 है जिसमें गीता कहने वाले को

251
00:18:04,640 --> 00:18:08,720
क्या कहते हैं? कर्म फल से अनासक्त कहा गया है। ये

252
00:18:08,720 --> 00:18:13,200
दोनों ही अमान्य मानने पड़ेंगे। नोट करते जाना मैं कर रहा हूं।

253
00:18:13,200 --> 00:18:17,920
कितने श्लोक अभी तक अमान्य हो चुके हैं। इसकी थ्योरी के अनुसार

254
00:18:17,920 --> 00:18:22,080
है ना जो यह कहता है ना पांच परस ज्ञान गलत है। इसकी बैंड बजेगी

255
00:18:22,080 --> 00:18:26,160
कम से कम कुछ नहीं तो 80% श्लोक जो होंगे 70 से

256
00:18:26,160 --> 00:18:27,120
80%

257
00:18:27,120 --> 00:18:31,280
वो इसने नहीं माने हैं गीता के और कहने को कह दिया कि 5%

258
00:18:31,280 --> 00:18:37,280
ज्ञान गलत है। ठीक है? आगे चलते हैं।

259
00:18:38,320 --> 00:18:42,320
इसके लास्ट में इसी पैराग्राफ के लास्ट में इसने क्या बात

260
00:18:42,320 --> 00:18:46,960
मान ली है? इसलिए तू अपने पूर्वजों

261
00:18:46,960 --> 00:18:51,840
की तरह शास्त्रानुकूल भक्ति कर्म कर।

262
00:18:51,840 --> 00:18:55,840
अब यह बताओ कि इसके पूर्वजों को तत्वदर्शी कौन

263
00:18:55,840 --> 00:19:00,560
मिला था? और यह बात कह कौन रहे हैं?

264
00:19:00,560 --> 00:19:04,640
यह बात कह कौन रहे हैं? यह बात कह रहे हैं भगवान श्री

265
00:19:04,640 --> 00:19:09,200
कृष्ण यानी भगवान श्री कृष्ण तब कह रहे हैं जब तक कबीर नहीं आए हैं।

266
00:19:09,200 --> 00:19:13,360
तो कौन तत्वदर्शी मिला था जिसने गीता की

267
00:19:13,360 --> 00:19:17,840
व्याख्या या जो भी व्याख्या की थी तात्विक ज्ञान की वेदों की व्याख्या

268
00:19:17,840 --> 00:19:21,920
तो वो कौन सा तत्वदर्शी था जिसने ज्ञान दिया था जिसके

269
00:19:21,920 --> 00:19:26,000
कारण जो है वो पूर्वज ये लोग दिनभर गाली देते हैं

270
00:19:26,000 --> 00:19:30,320
कि पूर्वजों ने गलत भक्ति की और ये वो ये भक्ति हम बता रहे हैं आज

271
00:19:30,320 --> 00:19:34,560
कलयुग में आज हम भक्ति बता रहे हैं तब से कोई मुक्ति नहीं हुआ है और कुछ दो

272
00:19:34,560 --> 00:19:39,760
चार लोग जो इनकी चपेट में आ गए हैं जेल धाम जाकर के वो मुक्त होते

273
00:19:39,760 --> 00:19:42,800
जेल वाले बाबा का गाना सुन के।

274
00:19:42,800 --> 00:19:46,880
मगर यहां क्या कह रहा है कि तू अपने पूर्वजों की

275
00:19:46,880 --> 00:19:51,440
तरह शास्त्रानुकूल भक्ति कर्म कर। ये भी मान लिया इसने चार में।

276
00:19:51,440 --> 00:19:55,600
तो अब इनका कोई बेवकूफ फॉलोअ आए तो उनके मुंह पे मारना। ये देख तेरे बाबा

277
00:19:55,600 --> 00:20:00,480
ने क्या लिखा है। जेल वाले बाबा ने गाना बजाया तेरा। तो

278
00:20:00,480 --> 00:20:04,560
अब पहली बात है ज्ञान यज्ञ क्या है? इसके अनुसार ज्ञान

279
00:20:04,560 --> 00:20:08,720
यज्ञ है। शास्त्रों का पठनपाठन और शास्त्रों के पठन पाठन से मुक्ति नहीं है। इसने

280
00:20:08,720 --> 00:20:12,800
अपने कई पष्ठों में कह दिया है कि पांचों यज्ञों से मुक्ति नहीं

281
00:20:12,800 --> 00:20:16,800
है। मुक्ति किसी और चीज से है। और तो और अभी इसने

282
00:20:16,800 --> 00:20:20,880
थोड़ी देर पहले ही जो भगवत गीता का ज्ञान यज्ञ कहा गया है जो 25

283
00:20:20,880 --> 00:20:24,960
से 30 के बीच में उनका भी खंडन किया है। उनसे भी मुक्ति नहीं

284
00:20:24,960 --> 00:20:29,280
है। तो ज्ञान यज्ञ के ज्ञान को देने वाले को तत्वदर्शी कहा है। तो यदि

285
00:20:29,280 --> 00:20:33,360
रामपाल यह वाला तत्वदर्शी 434 का ठीक है?

286
00:20:33,360 --> 00:20:37,520
यदि रामपाल 434 का तत्वद है तो मुक्ति देने वाला नहीं है क्योंकि वह ज्ञान

287
00:20:37,520 --> 00:20:41,760
यज्ञ का ज्ञान देने वाला है। हां यदि वह नाम देने वाला है तो उसका

288
00:20:41,760 --> 00:20:44,880
श्लोक यहां होना चाहिए।

289
00:20:44,880 --> 00:20:48,960
उसके बारे में श्लोक यहां होना चाहिए कि वो ये ज्ञान यज्ञ का ज्ञान नहीं

290
00:20:48,960 --> 00:20:53,120
ये वाला ज्ञान भी देगा। ये भी देगा ये भी देगा। वो श्लोक होना चाहिए

291
00:20:53,120 --> 00:20:57,120
ना प्रमाण। तुम इस श्लोक के आधार पर उसको तत्वदर्शी

292
00:20:57,120 --> 00:20:58,240
सिद्ध मत करो।

293
00:20:58,240 --> 00:21:02,480
मोक्ष देने वाला सिद्ध मत करो। दूसरी बात यह है कि भगवान

294
00:21:02,480 --> 00:21:06,560
ने इसकी बेवकूफी की देखिए सीमाएं क्या है? इसने

295
00:21:06,560 --> 00:21:10,640
अपनी भगवत गीता में यह गरमा गीता की का कचरा करते समय

296
00:21:10,640 --> 00:21:14,720
और उसमें ये लिखा है कि अर्जुन को मोक्ष भी मिला। मोक्ष कैसे मिल गया? उसको

297
00:21:14,720 --> 00:21:18,720
तत्वदर्शी तो मिला नहीं था। अच्छा हम अगर देखें

298
00:21:18,720 --> 00:21:22,800
तो अर्जुन को मोक्ष मिला? बिल्कुल मिला। और जो गीता कहने वाला

299
00:21:22,800 --> 00:21:26,800
जो है यहां पर भगवान श्री कृष्ण गीता कहने वाले हैं और 216

300
00:21:26,800 --> 00:21:30,800
में विद्या और अविद्या को जानने वाला होने के रूप

301
00:21:30,800 --> 00:21:35,120
में वो वहां पर तत्वदर्शी सिद्ध हो रहे हैं। विद्या और अविद्या को जानने वाला तत्वदर्शी

302
00:21:35,120 --> 00:21:39,440
है। वहां पर कहा गया है। ठीक है? तो भगवान श्री कृष्ण तत्वदर्शी

303
00:21:39,440 --> 00:21:43,840
वहां सिद्ध हो रहे हैं। तो यहां पे भगवान कहना क्या चाह रहे हैं कि तू भैया उसको तत्वदर्शी के पास जाके

304
00:21:43,840 --> 00:21:48,240
जान। अच्छा उस समय तत्वदर्शी था कौन?

305
00:21:48,240 --> 00:21:53,760
जो कह रहे हैं कि तू ततस के पास जाके जान क्या वो

306
00:21:53,760 --> 00:21:57,840
लगभग महाभारत के कितने वर्षों के बाद ये आए हैं कबीर

307
00:21:57,840 --> 00:22:01,920
कुछ नहीं तो मेरे ख्याल से दो ढाई हजार वर्ष के बाद तो आए हैं तो क्या दो

308
00:22:01,920 --> 00:22:06,400
ढाई हजार वर्ष के लिए कह रहे थे कि अर्जुन तू जब मैं 600

309
00:22:06,400 --> 00:22:10,480
क्या कहते हैं कलयुग में जब ये कबीर आएंगे तो उससे लेना तुम ज्ञान कौन था

310
00:22:10,480 --> 00:22:13,280
उस समय तत्वदर्शी जिसके पास जाने को कह रहे हैं। दूसरी

311
00:22:13,280 --> 00:22:17,280
बात अर्जुन गया क्या? तीसरी बात भूलक से लिख दिया

312
00:22:17,280 --> 00:22:21,360
है रामपाल ने कि अर्जुन को मोक्ष मिला मगर क्या यह मानता है कि अर्जुन को मोक्ष

313
00:22:21,360 --> 00:22:25,360
मिला मिला तो उसको ज्ञान किसने दिया ये बहुत सारी बातें यहां पर खड़ी

314
00:22:25,360 --> 00:22:29,520
हो जाती है एक कि तत्वदर्शी गीता कहने वाले सिद्ध है दो

315
00:22:29,520 --> 00:22:34,080
16 से दूसरा कि चार 34 के अनुसार रामपाल

316
00:22:34,080 --> 00:22:38,160
के शब्दों में अगर कहा जाए तो तत्वदर्शी जो है चार 34

317
00:22:38,160 --> 00:22:42,560
वाला तत्वदर्शी मोक्ष देने वाला नहीं है मोक्ष ज्ञान देने वाला नहीं है बल्कि

318
00:22:42,560 --> 00:22:46,800
यज्ञों का ज्ञान देने वाला है अगर वो साथ में नाम भी देता है रामपाल

319
00:22:46,800 --> 00:22:51,120
के अनुसार तो वो नाम का नाम लेने जाने वाला श्लोक

320
00:22:51,120 --> 00:22:55,760
यहां होना चाहिए कि भैया तू उसको उस नाम को तू तत्व दृष्टि से जाके जान

321
00:22:55,760 --> 00:22:59,920
किस नाम को तुझे जपना है मगर यहां ऐसी कोई बात नहीं कही गई

322
00:22:59,920 --> 00:23:04,160
तो मोक्ष देने वाला सिद्ध नहीं है तीसरा क्या है कि भगवत

323
00:23:04,160 --> 00:23:08,400
गीता चार 35 के अनुसार तत्वदर्शी जो ज्ञान देगा उसके अनुसार

324
00:23:08,400 --> 00:23:12,400
आपको क्या प्राप्त होगा कि पहले पूरी दुनिया में पूरी दुनिया

325
00:23:12,400 --> 00:23:16,480
स्वयं में दिखने लगेगी और फिर सारे समस्त संसार

326
00:23:16,480 --> 00:23:20,560
तुम्हें ईश्वर में दिखने लगेगा। यह ज्ञान प्राप्त होता है तत्व ज्ञान

327
00:23:20,560 --> 00:23:24,720
से। तो ये सारी चीजें अप्लाई नहीं होती

328
00:23:24,720 --> 00:23:29,200
है और तुम तत्वदर्शी नहीं बन पाते हो। तुम बन पाओगे जेल वाले बाबा।

329
00:23:29,200 --> 00:23:33,440
ठीक है? तो ये है लास्ट एपिसोड

330
00:23:33,440 --> 00:23:38,720
के बुलेट पॉइंट्स। ठीक है? आप लोग नोट कर लीजिएगा।

331
00:23:38,720 --> 00:23:42,720
पूर्वजों की तरह भक्ति करना इसने मान लिया।

332
00:23:42,720 --> 00:23:47,120
तो अर्जुन के वह कौन से पूर्वज है जो शास्त्रानुकूल भक्ति करते थे

333
00:23:47,120 --> 00:23:51,520
वह बताए रामपाल का कोई

334
00:23:51,520 --> 00:23:55,760
नुमाइंदा अंधेरा कायम रहे का नुमाइंदा अंधेरा कायम

335
00:23:55,760 --> 00:24:00,320
रहे बाबा जेल में रहे बाबा का गाना बजता रहे खैर

336
00:24:00,320 --> 00:24:04,320
आगे चलते
