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00:00:01:22 हे पुरुषों में श्रेष्ठ अर्जुन सुखदख में सम रहने वाले जिस बुद्धिमान मनुष्य को यह मात्रा स्पर्श पदार्थ विचलित सुखी दुखी नहीं करते वह अमर होने में समर्थ हो जाता है अर्थात वह अमर हो जाता है तो वही बात आ गई ना जिसके समबुद्धि आ जाएगी लाभ हानि में वो मुक्ति की ओर अग्रसर हो जाएगा तो ये समत्व बुद्धि की बात हो रही है लाभ हानि में अंतर ना करने वाला नहीं उसमें अमर होने का अर्थ क्या देहधारी में अमर होना या फिर अगर नहीं है तब भी वो यहां जन्म और मरण के बंधन से मुक्त हो जाना उसको उस अमरता की बात हो रही है।

00:00:41:10 अच्छा इसमें मेरे को फिर मुक्ति का समझ नहीं आया। जैसे इसमें अमरता की बात आई ना तो इसमें मुक्ति का आश्रय अगर लूं मैं तो इसमें मुक्ति की बात क्या इनहीं सब चीजों से कह रखी है क्या जो राग द्वेष वगैरह इनहीं से मुक्ति हो गई तो मुक्ति ही मानी गई ये मुक्ति नहीं है राग द्वेष से जो मुक्त हो गया वो मुक्त होने के योग्य है उसके बाद मुक्ति बाकी जैसे जैसे शंकराचार्य सन्यास जो आश्र सन्यासी है उसको सबसे फाइनल स्टेज बताई गई है मुक्ति से जस्ट पहले की तो सन्यास जो होता है उसमें लाभ हानि राग द्वेष ये सब चीजें अलग हो जाती है व्यक्ति से तो तभी उसको विरक्ति आती है ना इसीलिए किसी को भी तत्व ज्ञानी तत्वदर्शी के रूप में स्वीकारने के लिए आचार्य की दृष्टि से स्वीकारने के लिए प्रामाणिक आचार्य की दृष्टि से स्वीकारने के लिए जो परम लक्षण बताया है वह बताया है विरक्तता उसके अंदर विरक्तता होनी चाहिए। तो इसीलिए हमारे यहां जो सबसे बड़े-बड़े पद हैं, वह सब सन्यासियों को ही मिलते हैं।

00:01:59:01 सन्यासी कौन है? जिसको किसी से कुछ लाभहानि नहीं है। कुछ उसके पर्सनल जीवन को आप देखिए। सन्यासी का व्यक्तिगत जीवन उसका क्या है? कुछ भी नहीं। हम् कुछ भी नहीं। तो बस वही बात है। अच्छा वो मेरे दिमाग में अब्दुल दत्तात्रेय की बात आ रही थी। वो अब्दुल दत्तात्रेय ऐसे भ्रमण नहीं करते रहते थे मुक्त होकर। तो मैं सोचा जैसे वो मुक्त करेंगे तो हम भी मुक्त हो गए। हां। क्यों मुक्त हो सकते हैं ना? इसको वो कहते हैं ना सारूप पे मुक्ति सामी पर मुक्ति। इस तरह की मुक्ति आपको मिल सकती है। और एक और 18व अध्याय में जैसे यह कहते हैं सर्व धर्म परज माम शरणम गजम अहम तम सर्व पाप मोक्ष मा तो उसमें जो शरणार्थी की बात कहेंगे उसमें शरणार्थ किस प्रकार की बात कही गई क्या करने की जो शरण में आने की भगवान बात कहते हैं उसमें शरण जो है क्या बताया गया शरण के लिए शरण में आना

00:03:14:12 ज्ञानार्थक दृष्टि से आना जाना जो हम लोग बात करते हैं वह गत्यार्थक भी होता है और ज्ञानार्थक भी होता है तो गत्यार्थक इसलिए नहीं कह सकते क्योंकि अर्जुन वहीं पर हैं ऑलरेडी तो कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है मगर ज्ञानार्थक दृष्टि से अर्जुन ने अभी उन्हें अगर एक मनुष्य के रूप में स्वीकार कर रखा है तो अर्जुन उन्हें परम ब्रह्म के रूप में स्वीकार करें। परम ब्रह्म के रूप में उनकी शरण में जाए। उस दृष्टि से भगवान कह रहे हैं मेरी शरण में आ जाओ। इसमें जो मैंने तात्पर्य समझा था उसमें ऐसा नहीं है जैसे भगवत गीता में सब चीज लिखा हुआ है। उसको अगर मान के चलो जो भी चीज इसमें लिखा है तो वही शरणार्थी हो सकता है। हम वही शरण में है। क्या कह रहे हैं आप? दोबारा बोलिए। नहीं मैं यह समझ रहा हूं शरणार्थी मतलब जैसे भगवान के इसमें जितने भी है सब तो उपदेश ही है। उसी उपदेश पर अगर चले तो वो शरणार्थी हो शरण ही माना जाएगा ना।

00:04:24:16 यहां वो वाली बात नहीं है। बात यह है कि अर्जुन यदि उन्हें जानता होता पहले से ही अर्जुन यदि उन्हें यह जानते होते कि परम ब्रह्म यही हैं। यत्र तत्र सर्वत्र यही हैं। तो फिर ये भगवत गीता की आवश्यकता ही नहीं थी। हम वहां पर जो बातचीत हुई तो ज्ञानार्थक दृष्टि से मुझे ईश्वर के रूप में स्वीकार करते हुए उस रूप में मेरी शरण में आओ। मेरी शरण को स्वीकार करो। उसको शरणागति करो। तो उसमें शरण को स्वीकार करें कैसे? जैसे यहां भाई ने कमेंट किया फुल सरेंडर तो सरेंडर करें कैसे?

00:05:08:24 मैंने कह दिया कि हां मैं ज्ञानार्थक दृष्टि से ज्ञानार्थक दृष्टि से फुल सरेंडर किया जाता है। जैसे आप अभी हो आप राम के भक्त नहीं हो। आपने मन में निर्णय लिया कि मैं राम का भक्त हूं। ये हो गया फुल सरेंडर। अब चाहे मैं कुछ भी करो। बस कह दिया हो गया। मतलब कह दिया अब हो गया। तो ज्ञानार्थक दृष्टि से जब आपने सरेंडर हो गया अपने मन में कहा ना किसी को गवाही थोड़ी ना देनी है। आपने अपने आप से कहा ना हम तो आपने किसी और से थोड़ी ना कहा कहने की बात ही नहीं है। वहां केवल मन में सोच लिया कि मैं भगवान की शरण में आ गया हूं। केवल मन में सोचने से ही वो हो गया। अब अगर आप अगर नहीं करते हैं, कुछ और करते हैं तो और ऐसा कुछ करते हैं जो भगवान के विपरीत है तो आपने झूठ कहा था। आप शरण में नहीं है, शरण में नहीं है तो मुक्ति नहीं होगी।

00:06:10:07 अच्छा ठीक है। ठीक है। एक और था। अब रुक जाइए। एक मिनट और किसी ने भी हाथ उठाए थे बीच में। और किसी का प्रश्न है क्या? किसी ने कहा था? नयन चक्रवर्ती जी भैया राम राम क्या एक ये जो चर्चा हो रहा था तो इसी से ही एक दिमाग में आया था कि क्या केवल ब्राह्मण ही मोक्ष के अधिकारी है या बाकी वर्ण भी और क्या सन्यासी ही मोक्ष के अधिकारी है या बाकी आश्रमों के भी सभी मोक्ष के अधिकारी हैं और मोक्ष से जस्ट पहले वाला एक लक्षण है विरक्तता हो सकता है उसने हो सकता है किसी ने अपनी भक्ति की प्रकर्बता इतनी पहुंचा दी हो सकता है कि वह ऑफिशियली आपको दिखाई ना दे कि उसने सन्यास लिया या हो सकता है कि उस सन्यास का अधिकारी ना हो मगर उसके जीवन में विरक्तता आ चुकी होती है। मगर जो शूद्र है उसका तो मतलब शास्त्र ज्ञान तो नहीं है तो उससे क्या मतलब ज्ञान मार्ग में आगे बढ़ना क्या संभव

00:07:25:13 है ऐसा किसने कहा कि शूद्र को ज्ञान का वो नहीं है मतलब शास्त्र पढ़ने का तो अधिकार नहीं है ना उपदेश सुनने का तो है ना शास्त्रों का अर्थ सुनने का है ना संतों के द्वारा भगवान जो जगतगुरु गुरु शंकराचार्य जी महाराज हैं वर्तमान पूरी पीठाधीश्वर उनका जो विवेचना है तत्व के संबंध में जो उन्होंने उच्चतम न्यायालय में दी है वो नहीं सुन सकता शूद्र उसी से कल्याण हो जाएगा भगवत गीता में भी धर्म ब्रह्म की व्याख्या की है। भगवत गीता का अर्थ नहीं पढ़ सकते। भगवत गीता का जो प्रवचन है वो नहीं सुन सकते। भगवत गीता का श्लोक पढ़ सकते हैं या फिर केवल अर्थी पढ़ सकते हैं जी मगर और मगर वो एक ऑब्जरवेशन चाहिए उसमें और सभी को चाहिए क्योंकि स्कंद पुराण में तो यह तक कह दिया गया ना कि जिसको ऑब्जरवेशन किसकी चाहिए? प्रामाणिक आचार्य की। तो स्कंद पुराण में तो यह कह दिया गया बिना किसी शूद्र ब्राह्मण के।

00:08:40:28 वहां यह कहा गया कि मनुष्य चाहे चारों वेद पढ़ ले सारे उपनिषद पढ़ ले छह वेदांग पढ़ ले जब तप व्रत दान पुण्य कर्म यह सब व्यर्थ है यदि आप प्रामाणिक आचार्य की शरण में नहीं है क्यों व्यर्थ है तो आगे कहा गया अगले श्लोक में कि क्योंकि यह सभी चीजें प्रामाणिक आचार के बिना मनुष्य की बुद्धि को भ्रष्ट कर देती हैं।

00:09:16:04 तो गुरु के सानिध्य में भगवत गीता और रामचरितमानस ही पर्याप्त है मुक्ति के लिए। जी ठीक है। मुख्य और दो प्रश्न थे कि एक यह प्रश्न आया था कि जो भगवान का जो मतलब निराकार स्वरूप है तो उससे वो कार्य साधन करने के लिए अपने साकार रूप में आते हैं। तो अब यह प्रश्न उठता है तो साकार रूप में अगर आएंगे तो पांचों रूप ही क्यों बनाएंगे? एक रूप से क्या पांच कार्य वो कर नहीं सकते? तो ऐसा

00:09:55:22 ऐसा नहीं है। बात यह है कि जब वह करते हैं तो उनका एक रूप होता है। जब वह विनाश कर रहे हैं तो वो शिव कहलाए। जब वो पालन कर रहे हैं तो विष्णु कहलाए। इस तरह से ऐसे तो अनेकों कार्य हो सकते हैं ना। मतलब पांच मुख्य कार्य कोई अनेकों हो सकते हैं तो वह अनेकों इसमें से किसी एक डिपार्टमेंट में समाहित हो जाते हैं। जैसे इस समय वायु चल रही है। हवा लग रही है। यह भी एक कार्य है ना। जी हां। तो वायु का चलना किसी एक डिपार्टमेंट में आएगा। हां तो भगवान हां तो वो पवन देव का लय हो जाएगा। किस में? विष्णु भगवान।

00:10:42:14 व्यवस्था बना के रखने वाले में। तो उनका लय हो जाएगा। ऐसे ही लय हुआ है। 33 करोड़ जो कहा जाता है 33 कोटि वो बात नहीं आएगी। कार्य बहुत सारे हैं। वह सारे कार्यों में एक्सप्लोर यही पांच रूप होते हैं। और यह पांच रूप भी एक्सप्लोर कहां से होते हैं? भगवत जो परम तत्व का रूप है उनका उससे। दूसरी बात यह भी है कि भगवान को यह मालूम है कि कौन सा जो रूप है उनका वो कल्याण का हेतु बन सकता है। उसके कारण उसकी उसकी शरणागति उसकी भक्ति प्राप्त करके भगवान की इस रूप की व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त हो सकता है। तो उस रूप में प्रतिपादन इनका इन रूपों का हुआ जो ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती गणेश और उनके साक्षात अवतार जो बताए गए प्रपंच रूपी संसार में ठीक है जी अच्छा और दो चीज जानना है एक क्या श्री राम जी ने क्या मांस खाए थे वास्तविक में

00:11:54:00 वाल्मीकि रामायण में क्या उल्लेख है श्री राम जी मांसाहारी नहीं थे परंतु अ नहीं हमारे यहां के मतलब स्मार्थ विद्वान जी ने ही मुझे कहे थे कि वो उन्होंने खाए थे हां मांसाहारी नहीं थे मैं वही बता रहा हूं आपको परिस्थितियों के कारण उन्होंने ग्रहण किया है एक दो बार इस तरह से है संदर्भ तो उनके संदर्भ में ऐसे मतलब दो प्रश्न ने सुना था कि एक उन्होंने ऐसा मांस का आहार कभी तो किया था और दूसरा जो शास्त्रों में विदेश गमन को गित किया गया है तो उन्होंने तो लंका में मतलब समुद्र पार करके लंका गए थे तो यह सब कार्य जो है इससे क्या उनका जो मर्यादा पुरुष होता है ना मर्यादा का क्या भंग नहीं होता इससे मर्यादा तब भंग मानी जाती है जब शास्त्र के बाहर की चीज हो। यदि शास्त्र में कहा गया है कि इस स्थिति के लिए यह वाला जो निषेध कार्य है वो कर कर सकते हो तो फिर वो मर्यादा भंग नहीं मानी जाती।

00:13:09:22 मर्यादा शास्त्र है। मर्यादा केवल जो यह कह दिया गया कि सत्य बोलना है, असत्य नहीं बोलना है। यह मर्यादा नहीं है। मर्यादा वो है जो शास्त्र ने बताई है। जहां पर जहां पर नारियां छुपी हुई हैं। स्त्रियां छुपी हुई हैं डाकुओं से बचने के लिए और वहां आपसे रास्ता पूछा जा रहा है कि स्त्रियां कहां छुपी हैं? डाकू पूछ रहे हैं तो वहां पर शास्त्र की मर्यादा क्या है? वहां पर झूठ बोल दीजिए आप। वहां आप झूठ बोल दीजिए। तो जिस झूठ से मनुस्मृति का सिद्धांत है शास्त्र में। जिस झूठ से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र के प्राणों की रक्षा हो रही हो वहां पर झूठ भी सत्य है। हो गया। तो मर्यादा शास्त्र की है। यदि शास्त्र ने जो जो

00:14:11:22 आज्ञाएं दी हैं। किन-किन स्थितियों में जो ऐसे वचन है अब जैसे मास वाली बात तो जो वैदिक हिंसा होती है उसे हिंसा नहीं कहा जा सकता है। जैसे चिकित्सक जो होते हैं उसे वह हिंसा नहीं कहा जा सकता जो अग्रह है। क्यों? जैसे चिकित्सक जो होते हैं जैसे जो चिकित्सक होते हैं वो किसी का किसी की चिकित्सा करने के लिए उसके मांस को काटते हैं। हटा देते हैं, चाकू लगाते हैं। तो क्या यह हिंसा है? जी नहीं हां तो इसी प्रकार से जो वेदानुकूल जो इस तरह का विधान होता है उसमें बहुत सारे कारण होते हैं कि

00:15:12:02 अब जैसे मान के चलिए हमने कहा कि मुक्ति से पहले का भाव होता है विरक्ति धर्म का लय किस में है? विरक्ति में है। परंतु फिर भी यदि कोई विवाह करता है तो क्या अधर्मी है? नहीं वह तो अपना आश्रम का पालन कर रहे हैं। हां तो धर्म धर्म के अनुकूल ही तो है। धर्म का धर्म का जो लय है किस में है? धर्म का वास्तविक फल है मोक्ष और मोक्ष से जो पहले वाली स्थिति है वो है विरक्त विरक्ति। परंतु ऐसा नहीं है कि क्या कहते हैं? यह शास्त्र के अनुसार यदि कोई विवाह करता है तो उसको अधर्मी कहा जाएगा या शास्त्र विरोधी कहा जाएगा। क्योंकि विवाह करने का पर्यावसान भी निवृत्ति में ही है। तो इसी प्रकार से जो वैदिक जो ऐसी ऐसी ऐसे यज्ञ हैं ऐसा विधान है उसमें जो मांस का बहुत रेयर उसमें जब दिया गया है तो उसका पर्यावसान भी मांस के मांस की न्यूनता में है। मांसाहार को प्रोत्साहन नहीं है। वो मांसाहार की न्यूनता है। उसका परेशान

00:16:27:27 तो इसीलिए जो शास्त्र के द्वारा बताई गई मर्यादा मर्यादा होती है। इस तरीके से केवल सच ही बोलना है। झूठ नहीं बोलना है। अलग बातें हो जाएंगी या किसी का मांस नहीं काटना है। हिंसा वो भी है यदि किसी ने किसी के नोच खा ली और उसकी आह निकल आई। उसको कष्ट हो गया। वह भी हिंसा है। मगर हित में की जाने वाली हिंसा जैसे मैंने बताया चिकित्सक ब्लेड से मांस काट लेता है। सुई चुबोता है कई बार हम वो भी हिंसा नहीं है। क्योंकि उसमें उद्देश्य बदल गया। ठीक है। जी जी। अच्छा एक चीज है कि जो जितने तंत्र है ना अभी भारत में और भारत के बाहर जो चल रहे हैं तो उनमें से भारतीय जो है जैसे बौद्ध जैन सिख आदि तो उनके ऊपर तो हम प्रहार नहीं करते क्योंकि वो भारतीय मतलब सनातन धर्म के मूल धारा के साथ वो कभी ना कहीं जुड़े हुए हैं। परंतु अगर हम देखें जो पाश्चात्य तंत्रों की बात कहा जाए हम मैं ईसाई धर्म का ही बात कर रहा हूं। तो एक तरफ हम ऐसा कहते हैं कि जो गुरुदेव जी ने ही कहा था कि

00:17:43:01 जो जीससुल यशु जो थे तो वो वैष्णव थे विष्णु के भक्त थे उनके ऊपर मतलब तिलक था ऐसा उध पुंड्र और जीसस क्राइस्ट मतलब कृष्ण का कोई पुत्र था इसलिए आगे ऐसा नाम बैठता है तो एक तरफ तो हम उसको कहते हैं कि वो सनातन से ही आया है और दूसरी तरफ हम उसको मतलब ऐसे काट रहे हैं तो ऐसा क्यों अगर हम ऐसा सोचे पाश्चात्य में सनातन धर्म का जो विस्तार हुआ था वही उसी का एक मतलब धारा से आपने ये वीडियो देखा है क्या गुरुदेव का जो प्रॉपर उन्होंने वैष्णव की बात उन्होंने हां उन्होंने कहा था कि वो रोम का जो है मैं मैं क्या कह रहा हूं वीडियो देखा है आपने यह वाला हां हां ये वाला देखा था प्रॉपर पूरा वीडियो देखा है जिसमें उन्होंने आज से करीब पांच छ साल पहले का वीडियो संभव था वो 2017 18 हो गया या शायद पूरा अभी तो मतलब काफी पुराना

00:18:46:26 पूरा अभी मतलब श बस ख्याल में नहीं श नहीं आप पूरा वीडियो देखिए चैनल पर है गोवर्धन मटके और संभवत रायपुर से उन्होंने बोला है तो मतलब इस इस से क्या नहीं देख मैं बता रहा हूं बता रहा हूं आपको उसमें उन्होंने ईसा का जो रूप स्वीकार किया है जिसको उन्होंने वैष्णव कहा है वह वह रूप है जिसने बाइबल नहीं लिखी। बाइबल लिखने वाले ईसा को उन्होंने स्वीकार नहीं किया। उन्होंने वहां पर उनके बाइबल लिखने पर प्रश्न खड़ा किया है कि ईसा के नाम पर जो क्रिश्चियन तंत्र जो उन्माद फैला रहा है सनातन धर्म का विरोध कर रहा है वो ना मत करें ना करें ईसा के नाम पर यानी जो बाइबल का प्रचार प्रसार किया जा रहा है ईसा के नाम पर यानी उन्होंने अपने वक्तव्य में ईसा को बाइबल लिखने वाला यानी एक क्रिश्चियन तंत्र का उद्भाषक नहीं माना है तब तब उन्होंने ईशा को कहा है कि वो यहां आकर के रहे थे भारत में आकर। तो इससे किसी को क्या आपत्ति है? जब वो यही नहीं मान रहे कि उन्होंने बाइबल लिखी है।

00:20:04:09 है ना? और यह मान रहे हैं कि ईसा जो है वास्तविकता में वैष्णव उसको फॉलो करते थे। बाइबल यदि वास्तविकता में बाइबल लिखने वाला ही वह ईसा है तो उसको शंकराचार्य ने स्वीकार नहीं किया है कि वह वैष्णव है। ठीक है। जी। अच्छा मेरा एक आखरी प्रश्न करके मैं अभी मतलब अच्छा इसमें इसमें एक पक्ष और भी है। ये तो रही ये वाली बात कि उन्होंने स्वीकार ही नहीं किया। मगर वैष्णव का मतलब यह भी हो सकता है। जैसे कोई शैव होते हुए भी राक्षस हो सकता है ना। रावण था ना? जी जी होते हुए दुराचारी हो सकता है। हम तो कोई वैष्णव होते हुए मान लीजिए किसी ने वैष्णव धर्म को स्वीकार किया। वैष्णवता की उसमें चला मगर उसने जो है वहां जाकर के और वैष्णवता से जो उसे चीजें प्राप्त हुई थी उनका भी उपयोग करते हुए परंतु उसमें मिलावट के साथ समाज को प्रस्तुत करते हुए और एक नई चीजें कुछ दे दी तो उसमें उसमें किसी का

00:21:19:10 क्या हो दोष मतलब मैं कह रहा हूं कि इसे इसे क्या ऐसे नहीं देख सकती कि समझ लीजिए जैसे भारत जो आर्यावर्त भूमि है वही तो वर्णाश्रम धर्म है। एक मिनट उसके बाहर तो नहीं है। एक मिनट तो कोई वैष्णव या शैव या साक्त भी गलत हो सकता है। तो ऐसा भी इसमें इसको मानने में भी कोई वो नहीं है आपत्ति समस्या। परंतु पहला पहला वह तो क्या है दृष्टिकोण वह तो यही है कि जो पूज्य जगतगुरु शंकराचार्य जी महाराज हैं पूरी पीठाधीश्वर उन्होंने अपने वक्तव्य में बाइबल लिखने के वाले के रूप में जीसस को स्वीकार नहीं किया है वैष्णव के रूप में। ठीक है? यह तो प्रथम दृष्ट्या है। दूसरी बात यह भी है तर्क पूर्ण कि अगर यदि कोई वैष्णव है, कोई शैव है तो ऐसा नहीं है कि वो राम है। हम राम तो नहीं कह दिया ना? नहीं नहीं बस

00:22:30:02 जी। अब बताइए आप कुछ कह रहे थे आर्यवर्त वाली बात वो बता दीजिए। मैं वो कह रहा था कि हम अगर ऐसा समझे कि जो भारत भूमि है तो उसमें ही केवल वर्णाश्रम धर्म है और वहीं पर मोक्ष मिल सकता है। उसके बाहर तो म्लेच्छ भूमि है तो वहां पर तो धर्म का पालन भी नहीं होता। तो उनके अनुकूल अगर ऐसा जो सनातन धर्म का एक अनुकूल रूप उसको खड़ा करने के लिए अगर उन्होंने वहां पर कुछ भेजा था। ऐसा अगर समझे तो क्या उसमें कोई नहीं नहीं ये सब समझने की आवश्यकता नहीं है। अह यही है कि जिसको भी शरण में भगवान को लेना होता है तो उसकी अनुकूल परिस्थितियां भगवान भक्ति के कारण वहां पर मिल जाती है उसे तो भक्ति जब वो करेगा तो उसके जीवन में जो भी अपेक्षित होगा उसके कल्याण हेतु वो सब उसके जीवन में आने लगेगा वो दुनिया संसार के किसी भी कोने में और भक्ति वो तब करेगा जब वो कहीं ना कहीं से जो सनातन ज्ञान है उसको को प्राप्त होने लगेगा तब वो भक्ति भी करेगा या फिर उसके पास वो लेके जन्मा होगा। तो इन सब चीजों में भगवान की कृपा है। भगवान की कृपा जिस पर होती है

00:23:45:08 उसी को भगवान का ज्ञान मिलता है। उसी को भगवान की भक्ति मिलती है। कृपा नहीं है तो कुछ नहीं है। जी भैया जब मैं बस आखरी एक प्रश्न करके हो जाए कि आप बस मुझे हां या ना में कह दीजिए। मैं मतलब बहुत तर्क सुने हैं इसके तर्क और वितर्क में बस मैं ये जानना चाहता हूं कि जो अभी के ज्योतिष पीठ और द्वारकापीठ के जो शंकराचार्य जी है तो वो क्या वास्तविक में शंकराचार्य है या नहीं? मतलब मैं कोई प्रश्न नहीं पूछूंगा। आप अगर ना है तो ना कह दीजिए। बात है। देखिए प्रश्न तो मैं आपका समझ रहा हूं। मगर यह प्रश्न ऐसा है नहीं कि जिसका उत्तर हां और ना में दिया जाए। इसको थोड़ा सा समझ लीजिए। क्या करपात्री जी महाराज शंकराचार्य थे क्या? हां वो थे शंकराचार्य थे।

00:24:42:26 करपात्री जी महाराज शंकराचार्य थे। कौन सी पीठ के थे? वो तो दोनों पीठ के थे ना। करपात्री जी महाराज किसने कहा आपको? नहीं वो कौन थे ना वो दोनों पीठ को एक साथ वो तो स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज थे ना। मैं करपात्र महाराज के पूरी पीठ के मैं करपात्री जी महाराज की बात कर रहा हूं। पूरी पीठ के नहीं आप अपनी जानकारी का शोधन करें। करपात्री जी महाराज शंकराचार्य नहीं थे कभी भी।

00:25:19:25 परंतु क्या हमारे मन में उनके प्रति श्रद्धा में कहीं कोई कमी है? नहीं। वह शंकराचार्य नहीं तो शंकराचार्य होने और ना होने से धर्म ब्रह्म के बारे में मिलने वाली व्याख्या पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यदि वह परंपरा से प्रामाणिक आचार्य भी हैं, विरक्त हैं, आचार्य हैं तो इस सवाल को ढूंढने का ढूंढने से हमारा जो वो है धर्म क्या है और ब्रह्म क्या है? इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और प्रभाव तभी पड़ेगा हमें तब जानना होगा कि उनकी प्रामाणिकता यदि वह धर्म ब्रह्म की व्याख्या शंकर परंपरा के विपरीत करने लगे कोई भी करपात्री जी महाराज देखिए शंकर परंपरा के अनुकूल धर्म ब्रह्म की व्याख्या की बल्कि बहुत सारे ऐसे ऐसे ऐसे तर्क दिए जो नास्तिक कभी मुंह ना उठा पाए। हम जबकि वह शंकराचार्य नहीं थे। शंकराचार्य

00:26:35:10 ना होते हुए भी प्रामाणिक आचार्य और बहुत ही सम्मान की दृष्टि से देखे जाने वाले आचार्य हमारे करपाती जी महाराज सबके लिए आदरणीय सबके लिए मतलब चारों शंकरा चारों पीठ के शंकराचार्य जो होते हैं वर्तमान के उन सबके लिए वो सम्मान की दृष्टि से देखे जाने वाले पहले आचार्य कृपात्री जी महाराज ऐसे एक वृंदावन के अखंडानंद जी महाराज भी थे वो भी शशांकर परंपरा के ही थे वो भी बहुत सम्मान की दृष्टि से उनका देखा जाता है नाम प्रमाण के रूप में उनके वचनों को लिया जाता है करपाती जी महाराज के वचनों को प्रमाण के रूप में लिया जाता है शंकर परंपरा में तो इस प्रश्न से हमें कोई समस्या होनी नहीं चाहिए कि वह शंकराचार्य है कि नहीं क्योंकि यह एक जो मानव समाज व्यवस्था है उससे संबंधित एक बात है कि इस पद पर कौन है कौन नहीं है। परंतु शंकर परंपरा के अनुसार शंकर गुरु शिष्य परंपरा से मिलने वाला जो धर्म ब्रह्म का ज्ञान है वो उनसे

00:27:50:14 भी वही मिल रहा है। जो पूज्य अभिेशरण जी हैं और जो निर्विवाद रूप से शंकराचार्य पीठ पर विराजमान है उनसे भी वही मिल रहा है। यह समस्या तब होनी चाहिए जब वह ऐसा कुछ बताने लगे धर्म ब्रह्म के विषय में जो निर्विवाद रूप से जो बैठे हुए हैं उनके विरुद्ध हो तब हमें परेशान होने की आवश्यकता है। अन्यथा गुरु के रूप में स्वीकार करने हेतु आप उनके पास भी जा सकते हैं और सभी चारों में से किसी के भी पास जा सकते हैं। ठीक है जी मतलब मतलब उन दोनों से भी दीक्षा लिया जा सकता है तो हां जिसके भी देखिए शास्त्र में यह नहीं लिखा है कि आप शंकराचार्य से ही दीक्षा लें ऐसा लिखा है क्या कहीं मतलब लिखा है शास्त्र में लिखा है पहला लक्षण सन्यासी दूसरा लक्षण परंपरा प्राप्त ज्ञान तीसरा लक्षण समस्त श्रुति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य

00:29:05:15 की शिक्षा चौथा लक्षण जो अपने शिष्य का संशय दूर कर दे। इसमें कहीं भी ऐसा नहीं आया कि शंकराचार्य के जो पद पर होगा उसी से दीक्षा ली जाए। शंकर शंकर परंपरा में ही अभी बहुत से ऐसे शंकर परंपरा के अनुयाई हैं। जिन्होंने डायरेक्ट शंकराचार्य से शिक्षा नहीं ली। वह दीक्षा नहीं ली है। शंकर परंपरा के प्रति वह शरणागत है मगर शंकर शंकराचार्य से ही दीक्षा नहीं ली है। ठीक है जी मतलब अगर हमें अगर हमें जो है

00:29:48:14 बात करनी चाहिए जिससे हमारा धर्म ब्रह्म प्रभावित हो। हम जी बताइए मतलब अगर वह बाद में अगर शंकराचार्य नहीं है ऐसा प्रमाणित होता है तब तो वो मतलब ऐसे दुराचार्य जैसा सिद्ध होते हैं ना तो अपने गुरु को ऐसे मतलब क्या क्या कह रहे हैं मतलब बाद में अगर ऐसा प्रमाणित होता है कि वो शंकराचार्य नहीं है और जोर से मतलब दखल करके बैठे थे तब तो ऐसा मतलब दुराचार्य जैसा मतलब सिद्ध होता है ना तो अपने गुरु का ऐसा मतलब देखना तब यदि आपको किसी के ऊपर लेश मात्र भी संशय आ रहा है तो आप उसको गुरु के रूप में कैसे स्वीकार कर सकते हैं? हमने क्या कहा? विरक्तता होनी चाहिए। यदि आपके मन में यह यह निर्णय नहीं हो पा रहा है कि वह विरक्त है कि नहीं? उनको शंकराचार्य की गद्दी से मोह है कि नहीं। यदि आपके मन में यह संशय आ रहा है तो फिर वह आप उनको गुरु के रूप में क्यों स्वीकार करें? जी है ना भाई आपके गुरु के रूप में उसको स्वीकार किया जाता है जिसके लिए हमारे मन में संशय ना आ रहा हो आपके मन में आ रहा है

00:31:03:20 ऐसा नहीं है बहुत से लोग हैं जिनके मन में नहीं आ रहा है इस प्रकार का संशय उनको यह पूर्ण विश्वास है कि नहीं ये कभी ऐसा नहीं होगा कि इनको कहा जाए अंतत तो गतवा के शंकराचार्य नहीं थे और ये बन के बैठे थे ऐसे भी कई लोग हैं उनको को विश्वास है हम जी तो आपको विश्वास नहीं हो पा रहा है तो फिर आप यह समझ जाइए कि आप आपके व्यक्तिगत रूप से गुरु के रूप में स्वीकार किए जाने नहीं चाहिए आप स्वीकार करेंगे तो आपका वो संशयात्मा विनश्यति जिस पर आपको भरोसा हो जिसका शब्द आपके लिए प्रमाण हो जिसकी शरण में पूरा जीवन बिताने का मन करे संशय मिट जाए आपके उसको गुरु के रूप में स्वीकार करें। गुरु का अर्थ गुरु का मतलब अंधकार रूह का मतलब निकालने वाला। इसका अर्थ है कि

00:32:04:14 अज्ञानता रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश डालकर निकालने वाला। हम जी तो जब आपका जब आपका यही बना हुआ है कि हो सकता है यह जो है कोई वो हो या रूप बदलने वाला हो या इस तरह का आपके मन में संशय आ रहा है उनके प्रति उनकी असत्यवादिता सिद्ध हो रही है वहां पर इत्यादि इत्यादि तो फिर ऐसे में आप क्यों गुरु की ओर अग्रसर होंगे उनको लेकर के ऐसे बहुत से लोग हैं जिनको उनके वचनों पर विश्वास है प्रमाण है उनके वचन उनके लिए और गुरु के रूप में वह स्वीकार करते हैं उन्हें और किया भी है। ठीक है? जी भैया हम् ठीक है। जय श्री राम। जय श्री राम।

00:32:54:02 आप पूछते भैया एक मिनट। अनुज झा जी बताइए। बताएं भैया जैसे आपने बताया था अभी जितने पिछले क्लासेस हो रखी है उसमें आपने बताया था कि ब्रह्मा विष्णु महेश उनहीं में सब निकलते हैं मतलब जो भी अवतार होते हैं जितने राम अवतार कृष्ण अवतार सब विष्णु भगवान से हो रखे हैं तो वही मैं अभी रामायण का पाठ पढ़ना स्टार्ट किया था वाल्मीकि रामायण का तो वहां दे रखा है ब्रह्मा विष्णु महेश साध्य यशसा लोक साधका नाम देवम सिद्ध रूपम विशुद्धम परम भजे संपूर्ण जगत के अभीष्ट मनोरथ को सिद्ध करने वाले अथवा सृष्टि पालन एवं संहार के द्वारा जगत की व्यवहारिक सत्ता को सिद्ध करने वाले ब्रह्मा विष्णु और महेश आदि देवता जिनके अभिन्न अंश मात्र हैं। उन परम विशुद्ध सच्चिद सच्चिदानंदमय परमात्मा देवता श्री रामचंद्र जी को मैं नमस्कार करता हूं तथा उनके भजन को आए हैं। बाकी विष्णु में से आए हैं। राम जी मात्र कह रहे हैं उनको।

00:34:10:04 लीला भेद है। लीला भेद राम जी और विष्णु जी में अंतर नहीं है। जहां पर विष्णु को कहा जा रहा है कि विष्णु के अंश मात्र हैं। जहां पर विष्णु को कहा जा रहा है कि विष्णु के अंश मात्र हैं। तो वहां पे राम की भी बात हो रही है। जहां राम को कहा जा रहा है कि राम के अंश मात्र है वहां विष्णु की भी बात हो रही है। हम्म यानी यानी ऐसा देखा कि विष्णु भगवान से निकले ये बस उनके बारे में पढ़ रहे इसलिए उनके उनके लिए हम ऐसा कह रहे हैं। जहां पर विष्णु भगवान को दास भाव में दिखाया जाता है वहां पर उनके जो कार्य कारण भेद से जो उपाधिक भेद है विष्णु भगवान और शिव भगवान वाला जो जिसमें वो एक पोस्ट के जैसे शिव भगवान की पोस्ट है एक तो देवता की तरीके से कार्य करते हैं तो जहां पर भी दासत्व भाव भाव की बात हो रही होती है उनके उस रूप को जिसमें वह एक कार्य करने वाली प्रणाली है देवता हैं कार्य करने वाले उस रूप के लिए बात हो रही होती है जो उनका परम ब्रह्म पूर्ण रूप है उसकी बात नहीं हो रही होती है कि वह दास भाव को प्राप्त हो

00:35:25:08 दूसरी बात वहां पर यह बात इसलिए भी लिखी होती है कि जो वहां के इष्ट है आराध्य हैं उस प्रकरण में उस विषय में उनके प्रति अनन्यता का भाव स्थापित हो सके तो वैसे तो लिखा है यद्यपि यद्यपि राम और विष्णु एक ही हैं और उसके और ऊपर लेवल पर जाएंगे तो विष्णु और शिव भी एक हैं। हम परंतु जिस रूप की वहां पर गुणगान हो रहे हैं, महिमागान हो रहा है। उस रूप के प्रति अनन्यता को स्थापित करने हेतु इस प्रकार की पंक्तियां होती हैं। उन पंक्तियों के द्वारा भी

00:36:13:25 शिव जी और उन पंक्तियों के द्वारा भी जिन भगवान के जिन रूपों का दासत्व भाव जो कहा जा रहा होता है वो कार्य करने वाले जो उनका देवता रूप है उसकी बात हो रही होती है और एक और प्रश्न था जैसे हम जानते हैं कि जैसे किसी शिव लोक की प्राप्ति हो गई विष्णु लोक की प्राप्ति हो गई राम की प्राप्ति हो गई तो जन्म मरण से मुक्ति हो जाती है लेकिन यही रामायण के मैं तीसरे अध्याय में देखता हूं कि वहां एक राजा थे। राजा के नाम अभी ध्यान में नहीं है। खोजना पड़ेगा तो उसमें दे रखा था वो पहले विष्णु धाम में गए। फिर विष्णु राम धाम में थे। फिर वो ब्रह्मा धाम में रहे। फिर उसके बाद इंद्र लोक में रहे। फिर वापस धरती पर आए। ऐसा प्रक्रम भी चलता। फिर तो जन्म मरण से मुक्ति कहां हुई? कहां पर रहे? सबसे पहले विष्णु लोक मतलब राम कहां पर आया संदर्भ? यह तृतीय अध्याय वाल्मीकि रामायण जो व्यक्ति की आस्था जो व्यक्ति की अनन्यता राम के प्रति है वो अगर विष्णु लोक में चला भी जाएगा तो उसको वहां मुक्ति नहीं मिलेगी यही तो बताया जा रहा है नहीं नहीं नहीं साकेत धाम में गए वो सबसे पहले साकेत

00:37:28:28 धाम में जाने के बाद फिर वो ब्रह्मलोक फिर ब्रह्मलोक में जाने के बाद फिर इंद्रलोक इंद्रलोक में जाने के बाद फिर भवल लोक भवलोक के बाद यहां पे पृथ्वी लोक जब वहां चले गए फिर जन्म उनका जन्म हुआ था पृथ्वी रूप में। हां हां हां किस रूप में? मानव के रूप में, क्षत्रिय कुल में। क्या नाम है उनका? नाम मैं आपको खुद का बता देता हूं। दो मिनट इसी पेज में है। पेज में देख के बता रहा हूं। हम्म।

00:38:27:10 काली नाम की उनकी पत्नी थी और उनके पति का नाम बताता हूं। इन दोनों का ही जन्म हुआ था। नहीं साकेत धाम की मुक्ति मिल गई थी। हम हां साकेत दान से मुक्ति मिलने के बाद ये ब्रह्मलोक में आए फिर इंद्रोक में आए फिर इंद्रोलोक से महर लोक में भवर लोक में आए भवर लोक से पृथ्वी लोक में आए हम हां तो आ सकते हैं लीला पूर्वक हो सकता है कि वहां जाने के बाद उन्होंने केवल मुक्ति की इच्छा ना की हो या उन्होंने वहां की वहां वो साकेत धाम का सुख तो प्राप्त करने पहुंचे पहुंचे हो मगर अभी उनके अंदर यह लालसा बाकी रह गई हो कि हमें वापस जाना है। जब यह जो धाम के बारे में अभी हमने बात की ना कि वहां पर भगवान की कृपा से आगे की मुक्ति सुलभ हो जाती है। व्यक्ति के मन में यही आ रहा है कि नहीं मुझे अभी और जाना है नीचे जाना है। तो वो आ भी सकते। उनके मन में कुछ नहीं आया। बसवा उन्होंने कहा हमने वहां जितने समय तक बड़े-बड़े भोग हो गए वहां बता रहे हैं शून्य कोटि सहस्त्र और कोटि सतयुगों तक श्री राम धाम में निवास करके हम लोगों ने ब्रह्मा लोक आए वहां भी उतने ही समय तक रहकर हम

00:39:42:14 इंद्रोलोक आ गए मुनि इंद्रलोक में भी उतने ही काल तक परम उत्तम भोग भोग के भोगने के पश्चात हम क्रमश इस पृथ्वी पर आए हैं। जन इस पृथ्वी पर आए हैं तो बालक रूप में बता रहे हैं कि वैसे बड़े होने के बाद बता रहे हैं? नहीं बालक रूप में आए हैं। ऐसे बड़े होने बालक रूप में आए। फिर उनकी उम्र पूरी चली है। और अभी ये विभंडक मुनि को कहानी सुना रहे हैं। तो अपने जन्म से हम ऐसेसे आए हैं। हां हां तो वो यहां से मुक्त होके वहां गए थे। साकेत धाम या फिर वहां से उनकी जर्नी स्टार्ट ही हुई है। नहीं नहीं वहां से यहां से मुक्त हो के गए यहां पे वो शूद्र कुल में थे जो चुगली फुगली करते थे और फिर बाद में वो रामायण की कथा में लग गए थे हम रामायण की कथा सुनने लग गए थे तो वहां पे विष्णु धाम से उनके लिए वो आया था रथ आया था उस पर बैठकर वो विष्णु विष्णु धाम कह रहा हूं साकेत धाम पर चले गए थे हम हां तो इसका यही अर्थ है ना कि भाई यह सृष्टि जो है बनती है अगर प्रप जो प्रपंच के अनुसार देखें तो सृष्टि का निर्माण कहां से हुआ है कैसे हुआ जो भी आत्माएं हैं जीवात्माएं लीला रूप से अगर देखें

00:40:58:04 तो वह आत्माएं यहां बंधन में होने से पहले कहां थी वही स्थित कैवल्य में ही थी स्थित थी जब तक कैवल्य तो कैवल्य तो वो हो गई उसके बाद जब लीला कैवल्य तो परमार्थिक हो गया हम मगर लीला लीला दृष्टि से देखेंगे तो ये जो आत्माएं ये कहां थी धाम विष्णु विष्णु धाम यही तो थी तो वही तो अपनी भोग की लालसा से वो यदि उनके अंदर इच्छा आती तो फंसती है तो तो वहां पे भी इच्छा आती है वहां तो कोई इच्छा आनी नहीं चाहिए तो तो ये बात हो तो चुकी है कि परम मुक्ति कैवल्य है अच्छा अच्छा अच्छा अच्छा वहां पर भी मतलब इच्छाएं आ सकती है तो यह बात हो चुकी है कि परम मुक्ति जो है कैवल्य है। जब भगवान के साथ

00:41:58:14 क्या कहते हैं ज्ञान स्वरूप भगवान को जब भगवान के साथ स्वरूप भूत हो जाते हैं। समुद्र में मिल जाए। इस प्रकार ज्ञान ज्ञान स्वरूप भगवान के साथ जब स्वरूप भूत हो जाते हैं वह परम मुक्ति होती है। और जब तक हमें अपना अस्तित्व अलग से मिल रहा है कि हम कुछ हैं। हम साकेत धाम में हम कुछ हैं। तब तक वहां पर उसको परम मुक्ति नहीं कहा जा सकता है। और तब तक जो है इच्छा के अनुसार आपकी इच्छा ऐसी ऐसी मुक्ति मिल गई तो आपकी इच्छा के अनुसार आप जो है आवागमन भी आपका सिद्ध हो जाएगा। ठीक है? जैसे इनका तो इनका तो जन्म हुआ। इनका तो जन्म हुआ परंतु

00:42:53:22 सुखदेव जी को देखिए उनको भी मोक्ष मुक्ति प्राप्त हो गई थी है ना पर उनको क्या कहते हैं स्वरूप पे मुक्ति हुई थी या सायुज्य हुई थी शायद मतलब वो सशरीर सशरीर गए थे थे सशरीर वो गए थे सशरीर उनको मुक्ति प्राप्त हो गई थी तो सशरीर मुक्ति प्राप्त हुई थी। उनका आवागमन होता है। है ना? अच्छा। फिर उनकी इच्छा के अनुसार होता है कि वह भगवान के साथ जो है वो परम मुक्ति अगर उनके मन के अंदर यह भाव है कि मैं परम मुक्ति को प्राप्त हो जाऊं तो भगवान उन्हें परम मुक्त कर देते हैं। अन्यथा फिर वह इच्छा के अनुसार वह लीला में फिर आ जाते हैं। प्रवत्त होते हैं। मतलब वहां आप बंधन में इस बंधन में नहीं है। कि आपकी इच्छा के बिना भी आप प्रपंच रूपी संसार में हैं। वहां से इच्छा स्टार्ट होती है। ठीक है? अच्छा तो इसमें हम ये मान सकते हैं जो उस लोक के अष्ट देव जो है जैसे विष्णु लोक के विष्णु देव हैं। हम वो भी उ उस उस काल तक में बंधे हुए हैं। उनकी

00:44:08:26 भी मुक्ति नहीं हुई। क्यों बंधे हुए हैं? क्योंकि वहां पर उनको भी इच्छा आ रही होती है। वो वहां पर यह जानते हैं ना कि मैं कौन हूं। वहां पर अपना अस्तित्व थोड़ी ना सोच रहे हैं कि मैं अलग से कोई एक आइडेंटिटी वो जानते हैं कि मैं कौन हूं। मैं ब्रह्म हूं वो जानते हैं। अविद्या से मुक्त है। और अगर हम पृथ्वी लोक पर ही जान ले कि हम ब्रह्म है। अगर उसका ज्ञात हो जाए तो हमारी व मुक्ति हो गई। बिल्कुल हो गई।

00:44:43:20 मगर पृथ्वी लोक पर पृथ्वी लोक पर शब्द प्रमाण से आपको पता लगता है थ्योरिकली कि ऐसा ऐसा है परंतु उसे आप कभी अपनी कर्मेंद्रियों से फील नहीं कर पाते और कर्म और जो है फील होने की जो यात्रा है कि आपको फील भी हो थ्योरिकली तो आपने सुना मगर फील भी हो उसकी यात्रा के लिए ही धर्म है। उसकी यात्रा के लिए ही सारा विधि विधान है। या आपको अनुभव भी होने लगे कि हां मैं कौन हूं? अपनी आइडेंटिटी आपकी भगवान से भिन्न आइडेंटिटी जब तक आप समझ रहे हैं अपनी तब तक आप पूर्णतया मुक्त नहीं है। जब आप भगवान से अलग अपनी कोई आइडेंटिटी नहीं समझ रहे हैं। तभी आप पूर्णतया मुक्त हैं। है ना? क्या ये अहंकार का विषय नहीं होता? अगर मैं कहूं अगर इस प्रकार कह रहा हूं मैं ही ब्रह्म हूं मैं ही सब कुछ अहंकार ऐसा नहीं लगेगा कि हमें ज्ञात हम कैसे पता लगा कि हमें ज्ञात हो गया कि हम ये हैं हमने जान तो लिया पढ़ लिया कि ये हम हैं अब दूसरी जगह दूसरा विषय आ रहा है

00:45:59:22 हम ब्रह्म हैं। यह जो है मुक्ति का विषय है। और मुक्ति क्या है? परमार्थ। व्यवहार का विषय नहीं है। व्यवहार में यह नहीं है कि हम ब्रह्म है। हमें पूजो। हम ब्रह्म है। हमारी पूजा होने लग जाए या हम ही स्वयं की पूजा होने लग जाए। मगर यह प्राप्तव्य का विषय है। जहां पर आपको पहुंचना है। पहुंचना कैसे है? हम ब्रह्म नहीं है। यह मानते हुए आप वहां तक पहुंच सकते हैं। आप अपने आप को ब्रह्म मानते हुए वहां तक नहीं पहुंच सकते। व्यवहारिक रूप से अपने आप को ब्रह्म के रूप में स्वीकार करते हुए आप वहां तक नहीं पहुंच सकते। तो आप का व्यवहार क्या हुआ कि मैं ब्रह्म नहीं हूं। भगवान अलग हैं। हमें उनकी पूजा करनी है। भक्ति करनी है। तब जाकर के एक दिन आपकी अविद्या आपसे दूर हो सकेगी। भक्ति के कारण कि हां आप भगवान के ही मतलब स्वरूप भूत जहां पर आप अपने आप को अपील करने लगेंगे भगवान को

00:47:10:09 और क्या हम इसको स्वधर्म का पालन से ही मुक्ति ये वाली पा सकते हैं जैसे वहां भगवत गीता के द्वितीय अध्याय में बताया जाता है तो स्वधर्म के पालन से ही मुक्ति प्राप्त हो जाती है तो क्या यह वाली मुक्ति प्राप्त होती है या फिर वो लोक धर्म वाली मुक्ति प्राप्त होती है वह आपकी पराकाष्ठा है। अगर भक्ति धर्म के पालन से यह वाली मुक्ति प्राप्त भी हो जाएगी तो वहां पर भी आपकी इच्छा के ऊपर होगा ना कि आपको और आगे परम मुक्ति में जाना है कि नहीं जाना है। तो वहां पर मुक्ति का तो स्पेस है ही।

00:47:45:10 कुल मिला के यह है कि कल्याण हो जाता है। स्वधर्म के पालन से आपका जो कल्याण अपेक्षित है वह हो जाता है और भगवान की शरणागति से अगर आप स्वधर्म का पालन भी करते हो तो उसको भी भगवान की शरणागति ही कहा जाता है। क्योंकि धर्म क्या है? भगवान की आज्ञा युति स्मृति क्या है? भगवान की आज्ञा तो आप यदि उसका पालन कर रहे हो तो आप भगवान की शरण में ही कहे जाओगे। हम तो उससे भी आपका कल्याण होगा। परम कल्याण होगा। ठीक है? अब भगवान भगवान यह भी कहते हैं कि जैसे कि यह भी आशा रखना छोड़ दे कि हमें मुक्ति चाहिए। अगर हम आशा ही रखना बंद तो भगवान करेंगे ही।

00:48:32:12 सत ही स्तर पर छोड़ देना चाहिए। सतही स्तर पर मैं बता रहा हूं आपको। ऐसी बहुत सी सच्चाइयां हैं जो हमारे हृदय में तो होती हैं। मगर सतही स्तर पर व्यवहार में उनको हम नहीं लेकर के काम करते। मृत्यु हो गया। अभी एक दो दिन पहले ही मेरे पास एक उदाहरण आया था। मृत्यु हो गया, बिटिया की विदाई हो गई। ऐसी बहुत सी स्थितियां हैं। ऐसी बहुत सी सत्य है जीवन के जो हमें मालूम है कि हैं। मगर फिर भी हम सतह स्तर पर उनके अनुसार व्यवहार नहीं करते। और फिर मैं बता रहा हूं पृथ्वी जैसे गोल है। साइंस के अनुसार पृथ्वी गोल बताई गई। मगर जो साइंस के अनुसार पृथ्वी को जिसने गोल स्वीकार किया भी है। वो इस सच्चाई को जानते हुए भी इस सच्चाई को हृदय में दबाते हुए व्यवहार किस स्तर किस हिसाब से करता है? हम् टप्पा मान के। हां। तो इसी सतही स्तर पर व्यवहार के लिए बताया गया कि वहां पर इस फायदे के लिए भी आप कार्य ना करें।

00:49:48:21 अच्छा हम और एक श्लोक स्तर पर आपके मन में भाव क्या होने चाहिए? उन भावों की वहां पर बात हो रही है। अच्छा जैसे यहां कुछ श्लोक और थे। इसमें भी थोड़ा संशय था। अब आप रुक जाइए थोड़ा सा किसी और को अगर करना हो तो काफी टाइम से आपसे हो रहा है बात जी किसी और का हाथ उठा हुआ है हर्ष जी बताएं जय श्री राम भैया जय श्री राम

00:50:21:01 भैया हम ये पूछना चाहते हैं कि एक समय एक एक बात मैं क्लियर कर दूं अभी कौन बात कर रहे थे अनुज बात कर रहे थे अभी किससे बात हो रही थी मेरे ऐसे ही होते अनुज अनु हां अनुज जी एक बात क्लियर कर दूं जो एक प्रश्न आया था कि अहंकार अहंकार तब है जब आप अपने अपना अस्तित्व भगवान से इत भी स्वीकार कर रहे हैं। उसे घमंड कहेंगे या उसे घमंड कहेंगे जब हम भगवान से इत अपना अस्तित्व भी स्वीकार ना करें। कुछ स्वीकार ना करें। अपना अस्तित्व भी स्वीकार ना करें। भगवान से इनमें से घमंड क्या कहलाएगा? अहंकार क्या कहलाएगा? अहंकार मैं अलग अस्त समझ रहे हैं। हां जब हम भगवान से जब तक हम भगवान से अलग स्वयं को समझेंगे तब तक अहंकार है। तो ये मैं की निवृत्ति अलग कब कब होगी? इसमें भी भगवत गीता में दूसरे अध्याय में मैं को हटाने का कहा गया। लेकिन ये मैं हटेगा कैसे? तो जब भी हम अपना परिचय देंगे तो मैं तो निकल ही जाता है। परिचय देना क्या है? किसको दे रहे हैं परिचय? परिचय

00:51:36:24 परिचय देना व्यवहार है। प्रपंच रूपी संसार है। जब संसार शुरू होता है तो संसार है तो इसका मतलब है कि आपसे भिन्न बहुत सारी चीजें हैं। है ना? वहां पर मैं शब्द का परिचय दिया जा रहा है। जहां पर आपके किसी भी चीज का अस्तित्व ही नहीं है भगवान के अलावा वहां पर कैसा परिचय देना कैसा व्यवहार? हम्म उसमें बताया जाता मैं नहीं रहता सिर्फ है रह जाता है। है ही सब कुछ। ये मैं पढ़ तो लिया समझ में कुछ नहीं आया। बता तो रहा हूं। जब प्रपंच है ही नहीं। जब कोई दूसरी कोई दूसरी एंटिटी है ही नहीं तो वहां पर कैसा मैं परिचय ठीक है जी हर्ष जी बताएं जी भैया भैया पूछना था कि एक समय आपने कहा था ना कि विदेश यात्रा धर्म विरुद्ध है हम तो वो कैसा विदेश मतलब कि एक समय तो भारत अखंड था। एक समय तो बहुत विशाल क्षेत्र अखंड भारत के अनुसार जो विदेश हैं उनकी बात हो रही है। जैसे

00:52:52:12 कि यहां से अगर हम आज अगर मान लीजिए नेपाल चले गए या फिर अब ये इधर उधर ये ये उसमें देख देख लीजिए वो अखंड भारत से इधर जो समुद्र पार वाले जो विदेश कहे गए हैं उसमें कुछ वस्तुनिष्ठ जानकारियां है जो वर्बली मुझे याद नहीं है। वह मिल जाएगा। पर विदेश वही है जो अखंड भारत से इतर है। जी भैया तो उसमें यह भी तो है कि उसमें लिखा था कि समुद्र पार करके विदेश जाना मतलब वो विरोध है ना तो समुद्र पार करके ना जाते हुए जो धरातल से जो विदेश जाया जा सकता है वो वो कई ऐसी जगह हैं जहां जल थल यात्रा के थ्रू जाया जा सकता है तो वो जो है वहां निषेध नहीं है जाने का और कई जगह ऐसी है जहां दोनों तरीके से है समुद्र से भी है और थल थल से भी है तो थल वाली जो यात्रा है उसके लिए वो है निषेध नहीं है और जलीय यात्रा के लिए निषेध है ऐसा कुछ है इसको देखना पड़ेगा कंठस्थ नहीं है ये वस्तुनिष्ठ जानकारी है वो उपलब्ध करा दी जाएगी आपको ठीक है ऐसा तो भारत में भी टिकट प्रदेश वगैरह आ जाते हैं जहां नहीं जा सकते फल द्वारा भी

00:54:06:00 शुद्धि जी ठीक है हर्ष जी जी भैया एक और प्रश्न था कि जैसे कि एक समय कमेंट हम देख रहे थे किसी का तो उसमें था लिखा कि माता काली का या श्री गणेश जी का कोई लोक नहीं है कोई धाम नहीं है तो फिर जब उनका कोई लोकधाम है ही नहीं तो फिर उनका भक्ति करके लोक किस धाम में जाएगा अगर इस तरह से देखा जाए तो सारे धाम माता के ही तो हैं। ऐसा कौन सा धाम है जहां माता विराजमान नहीं है?

00:54:47:22 जी भैया वो तो एक एक रूपता की बात आ गई। लेकिन अगर उस जैसे कि जो राम जी का भक्ति करते हैं तो उनको यह होता है कि हम साकेत धाम जाएंगे। कोई कृष्ण भगवान का भक्ति करता है तो गोलोक धाम जाएंगे। विष्णु भगवान वैकुंठ धाम महादेव कैलाश जो धाम भगवान शिव का धाम है वही धाम मां काली का धाम भी है वही धाम मां पार्वती का धाम भी है इसी प्रकार से सीता माता के वो सारे धाम है जो धाम राम के हैं श्री राम के हैं। ठीक है? जी भैया तो वही वाला सब बात था कि इसमें जाएगा तो अब इसमें है कि वो कैलाश धाम में ही जाएगा। भाई मां काली है कौन? आप ही बताइए। माता महाकाली को तो मतलब अदांगिनी है ना उनहीं उन्होंने ही तो काली रूप लिया है। जी जी भैया तो परम तत्व दो रूपों में विराजमान है। शिवलोक में शिव और पार्वती जी वो जो शिवलोक है तो शिव किसके हैं? मां पार्वती के जी

00:56:02:24 भैया उस हिसाब से व्यक्ति वहीं पहुंचेगा। और शास्त्रों में तो माता महालक्ष्मी सब कोई एक ही एक ही रूप में है ना। माता महालक्ष्मी, माता सरस्वती, माता पार्वती मैया सबको एक साथ रख के देखा जाए तो वह एक रूपता में ही माता महाकाली भी है। वही एक रूपता में माता दुर्गा भी है। हम तो तो इस हिसाब से एक रूपता की बात आ जाएगी तो फिर वो बैकुंठ में भी जाया जा सकता है। अगर ऐसा किया गया तो मतलब उनका भक्ति वो और पीछे की बात है। एक ही परम तत्व जो है पांच रूपों में फिर उनकी उसमें भी विवाह प्रकट हो रहा है। मगर जब आपने शिव, विष्णु और ब्रह्मा को अलग-अलग माना है तो उस समय आपको मां पार्वती, माता लक्ष्मी और माता सरस्वती को भी अलग-अलग मानना पड़ेगा। और जब आप शिव जब आप उससे पीछे वाले लेवल पर जाएंगे कि शिव, विष्णु, ब्रह्मा भी अलग-अलग नहीं है तो आप वहां पे इन तीनों की एक रूपता। जब तक आप यह कह रहे हैं कि शिवलोक अलग है, विष्णु लोक अलग है, वैकुंठ लोक अलग है। तो आपको यह कहना होगा कि पार्वती माता अलग है, लक्ष्मी माता अलग है और वो अलग है। और जब

00:57:17:25 आप यह कहोगे कि एक ही रूप इन तीनों जगह पर विद्यमान है। तब आप यह कह सकते हो कि एक ही जो मातृशक्ति है, जो माया भगवान की माया शक्ति है, वो एक ही शक्ति विराजमान है। जी भैया। ठीक है जी भैया हम अभी किसने हाथ उठाया था एक नया नाम मुझे यज्ञ दत्त जी बताएं जी किरण जी अब अब जो है अगली बार बात हो पाएगी समय हो गया है विश्वजीत जी आप भी मैं कहूंगा कि अब नीचे कर ली हैंड रेज अगली बार बात होगी। समय अधिक हो गया है। जी यज्ञ जी बताएं। जी सादर प्रणाम। जी जय। मुझे पूछना था गुरुदेव जो गुरुदेव जी के जो प्रवचन है उसमें आता है जो अपना स्वरूप का निर्धारण रहता है जैसे निरूपाधिक धरातल पे आप साक्षात ईश्वर हैं। स्वरूपादिक धरातल पर जीव और मतलब भक्त और भगवान हैं। इस टाइप का जो अपने

00:58:33:01 वर्ण फिर नीचे लेवल तक जो आता है तो वह विभिन्न लेवलों का आप व्याख्या कर दीजिए जो जैसा वो बताते हैं उस टाइप से क्रमबद्ध तरीके से क्रमबद्ध तरीके से पहले मैंने तैयारी की होगी तो मैं करूंगा। आपका कोई प्रश्न है तो पूछ लीजिए। अन्यथा ये किसी शास्त्र का संदर्भ उपलब्ध करा दिया जाएगा। मुझे अभी वर्बली तो ध्यान में नहीं है। क्या प्रश्न करना है आप? एक्सजेक्टली क्या कह रहे हैं आप? गुरुदेव जी की जो भी धर्म सभा होती है वहां पर वो आपको जैसे कि भाई मैं हूं मैं वैसे हूं आप ब्राह्मण है अच्छा वो अच्छा अच्छा अच्छा ये तो आप तो वहां से उस कोटि से सरपादिक धरातल निरपादिक से सपादिक में फिर उसके बाद निरपादिक तो आपको मालूम ही है और हमें आवश्यकता जो भी है वो तो मुझे पता ढंग से नहीं है मैं आपको बोल रहा हूं मैं आपको बता रहा हूं निरपादिक धरातल की बात तो हम लोग यहां है ही इसलिए क्योंकि हम लोग अद्वैत को स्वीकार करते हैं। ठीक है? तो उसको कहने की आवश्यकता तो है नहीं कि केवल एक बार थोड़ा सा उस बारे में भी हल्का सा बोल दीजिए कि निरुपादिक धरातल क्या होता है? क्या है? कैसा क्या है? थोड़ा सा एक्सप्लेन

00:59:48:16 हल्का सा। निरपादिक धरातल तो वही हो गया ना कि जहां पर कोई उपाधि नहीं है आपकी अलग से। अच्छा निरुपादिक ओके और उसके बाद आप किसी भी हिंदू राष्ट्र संगोष्ठी में देखिएगा तो वहां अगर बैनर लगा होता है तो गुरुदेव के वचनों के द्वारा ही वहां पर लिखा होता है कि सर्वप्रथम मैं यह वो मुझे एक्जेक्टली वर्डिंग याद नहीं है। ऐसा होते हुए फिर यह और यह होते हुए फिर यह ऐसा है ना वह भी भेज दिया जाएगा आपको वो अभी शेयर कर दिया जाएगा मतलब कि विभिन्न भेदों को अपन एक रूपता में कैसे समायोजित कर ले इस बारे में ये क्रम क्रमानुसार उन्होंने कहा है कि व्यक्ति स्वयं को सबसे सर्वप्रथम यह और ऐसा होते हुए फिर यह फिर ऐसा होते हुए फिर यह और ऐसा होते हुए फिर इसके लिए इस के अनुसार कार्य करना चाहिए। सर अपने विभिन्न भेदों का सदुपयोग कैसे कर सकते हैं? आप उसको जड़ से समझिए तो आपके मन में सबके प्रति मतलब सौहार्द और प्रेम बना रहेगा। तो इस चीज को मैं एक अच्छे रूप उसमें विस्तार से समझना

01:01:03:18 चाह रहा हूं कि ये क्या है? क्या-क्या है? इस टाइप से भले ही आप बाद में वो जो गुरुदेव का जो वो कोट है वो आपको भिजवा देते हैं। ठीक है? नहीं कोर्ट तो है पर उसकी थोड़ी व्याख्या थोड़ा उनके शब्दावली थोड़ी क्लिष्ट रहती है। वो तो मैंने कोई बहुत सारी वीडियो में सुना हूं। उसका थोड़ा सा मैं इस समय कोर्ट अगर सामने होता तो मैं फिर उस पर हम लोग बात भी करते। आपको अभी कोड भिजवा देते। फिर आप अगली बार आइएगा तो उस पर हम लोग बात कर लेंगे। चर्चा कर लेंगे। ठीक है। बिल्कुल जी।

01:01:46:04 चलिए फिर आज की चर्चा काफी अच्छी रही। हो सकता निराण का प्रमाण लाएंगे तो अच्छा रहेगा। सनातन ब्रह्म का और निरावरण ब्रह्म का सावरण ब्रह्म और निरावरण ब्रह्म का तो [संगीत] यह प्रमाण भी है कि जैसे प्रपंच रूपी संसार में सभी वस्तुओं को कहा जा रहा है कि वह मुक्ति नहीं दे सकती। ठीक है? मगर प्रपंच रूपी संसार में ही दिखने वाला परम तत्व जो है श्री राम कृष्ण आदि के रूप में उसको कहा जा रहा है कि वह मुक्ति दे सकती है। जबकि सब कई जगह शास्त्रों में वचन आया है कि जो परम तत्व है वही प्रपंच रूपी संसार के रूप में प्रकट है। फिर भी वह मुक्ति नहीं दे पा रहा है। मगर यह मुक्ति दे पा रहे हैं। तो वहां हमें स्वीकार करना पड़ेगा कि अविद्या के साथ आवरण के साथ है इसलिए मुक्ति नहीं मुक्ति का हेतु नहीं है और वो अविद्या से मुक्त रूप है इसलिए मुक्ति का हेतु

01:03:01:15 है तो सावरण और निरावरण डेफिनेशन के द्वारा तो यहां से हमें प्राप्त हो जाएंगे बहुत सारे प्रमाण कि भगवान ही प्रपंच रूपी संसार के रूप में प्रकट हुए हैं। है ना? और यह भी यह भी यह भी यह भी प्राप्त हो जाएगा कि भगवान के अमुक अमुक रूप जो है, वह आपकी मुक्ति के हेतु है। तो दोनों चीजें हो गई। संसार हेतु नहीं है और भगवान के जो रूप हैं वो हेतु हैं। ठीक है? और दूसरी चीज भगवान ही प्रकट इधर भी हो रहे हैं। अपने मुक्ति स्वरूप में और इधर भी हो रहे हैं। फंसाने वाले स्वरूप में। है ना? हम्म तो फिर वहां पर इस आवरण निरावरण सिद्ध हो रहा है। फिर भी प्रॉपर बिल्कुल शब्द के अनुसार अगर कहीं मिलेगा तो आपको उपलब्ध करा देंगे। अन्यथा ऐसी कोई वो जटिल समस्या का विषय नहीं है। नहीं मैं समझ गया। आपका जो मतलब आप दृष्टांत जो समझाना चाह रहे हैं वो मैं समझ गया। लेकिन क्या होता है कि मतलब अगर किसी वाले से बात करते हैं तो वो मतलब प्रॉपर्ली प्रमाण मांगते हैं। जैसे वालों से इस वालों से जब हम बात करते हैं तो मैंने आपको प्रमाण दे तो दिए तब तक के लिए मैंने

01:04:16:19 आपको प्रमाण दे दिया। आप इन प्रमाणों से भी उसको निरुत्तर कर सकते हैं। भाई भगवान ही तो प्रकट हो रहे हैं संसार के रूप में। हां ये शास्त्रों में वचन मिल जाएगा कि नहीं? मतलब शिव जी एक और बात है कि सर्वव्यापी का मतलब क्या है कि ईश्वर कण-कण में है या फिर ईश्वर स्वयं कण-कण है? स्वयं कण-कण क्योंकि अगर यह कहेंगे कण-कण में है तो कोई एक हिस्सा ऐसा मानना पड़ेगा ना जहां वो नहीं है। तभी तो मैं आएगा। हां। जिस चीज में उनको मैं माना जा रहा है कि एक चीज में वह है उसको खोखला मानना पड़ेगा ना। वहीं पर तो वो मानने पड़ेंगे। तो ईश्वर कण-कण में है तब वो सर्वव्यापी है। कण-कण है स्वयं कण-कण है तब वो सर्वव्यापी है। ठीक है? अगर हम यह मानेंगे कि मैं है तो इसका मतलब कि वह जगह ऐसी है जिसमें एक मतलब एक जैसे कोई डब्बा वब्बा और जिसमें वो हैं और डब्बे में जब वो हैं तो डब्बे में ही ऐसा स्पेस भी है जहां वो नहीं है। तो सर्वव्यापी कहां हो गए? फिर जो कण-कण है जो स्वयं कण-कण है वही स्वयं कण-कण

01:05:31:25 में है। हां तो इससे शिवशी तो मतलब इससे तो मतलब अद्वैत भी सिद्ध हो रहा है कि जो कहते हैं कि जीव और ईश्वर अलग है। तो अगर आप जीवों को ईश्वर से अलग कर देंगे तब भी तो ईश्वर सर्वव्यापी नहीं होगा ना। जो पारमार्थिक जगत है और गुरुदेव का भी ऐसा वाक्य है कि जो व्यापक वो होती है ना व्यापक तत्व होता है वो क्षेपक नहीं होता है स्थान का मतलब कि ऐसा नहीं है कि अलग-अलग होते हुए भी ऐसी चीजें साथ में नहीं रह सकती हैं। है ना? हम हम एक ही जगह पर ब्रह्म भी अगर द्वैत की रक्षा करनी है तो इस इस तर्क को काटा जा सकता है जो आपने दिया है। क्यों? क्योंकि अ जहां पर एक ही समय में आत्मा है वहीं पर उसी समय में ब्रह्म भी हो सकता है। ऐसा नहीं है कि जहां ब्रह्म है वहां आत्मा नहीं हो सकती। और ऐसे बहुत से हमारे पास वो है जैसे कि

01:06:46:26 विद्या और अविद्या साथ में रहती है। हम है ना? तो जो व्यापक चीजें हैं वो छिपक नहीं होती हैं। ये भी वचन है। तो द्वैत की रक्षा मतलब द्वैत को इससे समस्या नहीं होगी। आप आपने जो कहा है उसके लिए द्वैत मतलब व्यवहार में तो द्वैत है ही। ऐसा तो है नहीं कि व्यवहार में भी ना हो। मगर परमार्थिक दृष्टि से केवल मुक्ति के लिए दूसरे हमको तर्क का सहारा लेना पड़ेगा। मगर ऐसा नहीं कह सकते कि जीव में भी ब्रह्म है। क्योंकि एक ही समय पर एक ही स्थान में जीव और ब्रह्म जो ऐसी चीजें हैं वह साथ में रह सकती हैं और साथ रहते हुए भी अलग हो सकती है। जैसे कि विद्या और अविद्या साथ में रहते हुए भी अलग है। है ना?

01:07:45:22 जी ठीक है ठीक है सभी को आने का बहुत-बहुत आभार राम नाम का स्मरण कर ले श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय जय राम श्री राम जय जय राम जय जय राम जय राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम श्री राम जय जय नारायण समारंभम शंकराचार्य समारंभ शंकराचार्यम अस्मदाचार्य पर्यंतमदाचार्य

01:09:03:13 पर्यंतम वंदे गुरु परम्पराम वंदे गुरु परंपरा वंदे गुरु परंपरा सभी को जय श्री राम जय जय भैया क्लास में कब से लेंगे भैया? [संगीत]

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B: SARVASHAKTIMAAN DHARMA Video 1:09:25 · 28 Jun 2025

आह्वान कक्षाएं : प्रश्नोत्तरी सत्र Part -2

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