1
00:00:04,160 --> 00:00:08,160
तो सभी को जय श्री राम। आशा करते

2
00:00:08,160 --> 00:00:12,320
हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे और

3
00:00:12,320 --> 00:00:16,000
इस बात का मुझे

4
00:00:16,000 --> 00:00:20,160
फेर है इन दिनों मैं आप लोगों को समय

5
00:00:20,160 --> 00:00:24,560
कुछ कम दे पा रहा हूं। YouTube पर बहुत ज्यादा एक्टिव

6
00:00:24,560 --> 00:00:28,640
नहीं हूं। बट इसके साथ ही साथ मुझे भी प्रसन्नता

7
00:00:28,640 --> 00:00:33,120
है और आप लोगों को भी इस बात का संतोष होगा। प्रसन्न

8
00:00:33,120 --> 00:00:37,280
आप अवश्य यह जानकर प्रसन्न हुए होंगे

9
00:00:37,280 --> 00:00:40,000
कि हमने

10
00:00:40,000 --> 00:00:46,000
विधर्मियों की अधर्मियों की पाखंडियों की खाट खड़ी कर रखी है

11
00:00:46,160 --> 00:00:50,400
धरातल पर।

12
00:00:50,400 --> 00:00:54,880
तो इसीलिए थोड़ा सा समय कम मिल पा रहा है।

13
00:00:54,880 --> 00:00:59,120
पर जो इस कारण से हम पिछले सप्ताह उपस्थित नहीं हो पाए

14
00:00:59,120 --> 00:01:03,440
थे मगर ना उपस्थित होने की स्थिति में आपको

15
00:01:03,440 --> 00:01:07,520
कई सारी शुभ सूचनाएं अच्छे समाचार अच्छे

16
00:01:07,520 --> 00:01:12,080
संकेत प्राप्त हुए तो थोड़ा सा

17
00:01:12,080 --> 00:01:16,160
विवरण भी बात कर लेते हैं। जैसा आप सभी को पता ही होगा कि

18
00:01:16,160 --> 00:01:20,480
रामपाल का एक व्यक्ति

19
00:01:20,480 --> 00:01:25,360
यहां पर ठेले पर किताबें बेचते बेचते पकड़ा गया है

20
00:01:25,360 --> 00:01:30,640
और उस पर जो है मुकदमा दर्ज हो गया है। अ

21
00:01:30,640 --> 00:01:34,640
इस संबंध में किसी का फोन भी मेरे पास आया

22
00:01:34,640 --> 00:01:40,640
था तो उससे वार्ता हुई है।

23
00:01:40,800 --> 00:01:45,040
उनकी उनके पक्ष से रखने वाला एक व्यक्ति तो

24
00:01:45,040 --> 00:01:49,840
इस संबंध में वार्ता हुई है। आने वाले समय में वह वीडियो भी आपको मिल जाएगा

25
00:01:49,840 --> 00:01:54,080
कि किस तरह के कुतर्क करते हैं ये लोग? क्या पराकाष्ठा

26
00:01:54,080 --> 00:01:58,320
है? कहां तक जा सकते हैं? कुतर्कों में इनका लेवल क्या हो सकता है? किस

27
00:01:58,320 --> 00:02:02,480
तरह जब बात इनकी खंडित होने लगती है तो टॉपिक

28
00:02:02,480 --> 00:02:07,920
बदल करके दूसरा टॉपिक लाने का प्रयास करते हैं। वो

29
00:02:07,920 --> 00:02:12,160
सभी आपको आने वाले टाइम में दिख जाएगा। जो बात हुई फिलहाल हम लोग जल्दी

30
00:02:12,160 --> 00:02:16,320
से जो पिछला वाला हमारा चैप्टर था

31
00:02:16,320 --> 00:02:20,400
उसका कुछ बुलेट पॉइंट्स हमने तैयार किए वो हम ले

32
00:02:20,400 --> 00:02:23,920
लेते हैं।

33
00:02:23,920 --> 00:02:29,920
सबसे

34
00:02:30,240 --> 00:02:34,240
पहला है 319 से स्टार्ट करेंगे। तो

35
00:02:34,240 --> 00:02:40,000
319 का संभवत इन्होंने अर्थ लिया नहीं है।

36
00:02:40,000 --> 00:02:45,040
पष्ठ संख्या 3 20 पृष्ठ संख्या 48

37
00:02:45,040 --> 00:02:49,040
इसमें इन्होंने 48वें पृष्ठ में गरिमा गीता की हम पढ़ रहे

38
00:02:49,040 --> 00:02:53,200
हैं। 48वें पृष्ठ में तीसरे अध्याय के 20वें श्लोक का अर्थ

39
00:02:53,200 --> 00:02:57,600
दिया है और इससे पहले यानी कि

40
00:02:57,600 --> 00:03:01,680
पष्ठ संख्या 43 में इन्होंने तीसरे अध्याय के 17 से 18

41
00:03:01,680 --> 00:03:05,840
श्लोक का अर्थ दिया है। इन्होंने 19वें

42
00:03:05,840 --> 00:03:09,840
श्लोक का अर्थ नहीं किया है। तो इसका अर्थ है कि हमें जो है 19व श्लोक को

43
00:03:09,840 --> 00:03:14,240
अमान्य मानना पड़ेगा। उस कैटेगरी में डालना पड़ेगा कि भाई वह

44
00:03:14,240 --> 00:03:18,320
काल ने अपने मन से बोल दिया था इसलिए इन्होंने लिया नहीं। तो हम ये भी

45
00:03:18,320 --> 00:03:22,560
काउंट करते जा रहे हैं कि कितने श्लोक इन्होंने अमान्य घोषित किए हैं। कितने श्लोकों

46
00:03:22,560 --> 00:03:26,880
की बात को इन्होंने माना नहीं। तो इसको भी उसमें

47
00:03:26,880 --> 00:03:32,160
डाल दिया। और इसके बाद इन्होंने तीन 20 में सीधे

48
00:03:32,160 --> 00:03:35,600
अगली बात कही है

49
00:03:35,600 --> 00:03:38,960
कि जो श्रद्धालु किसी मनोकामना

50
00:03:38,960 --> 00:03:43,040
की पूर्ति की इच्छा ना रखकर अपना धार्मिक कर्तव्य जानकर दान करता है वह

51
00:03:43,040 --> 00:03:47,040
वास्तविक दान है। जबकि उसमें और कुछ कहा जा रहा

52
00:03:47,040 --> 00:03:50,720
है।

53
00:03:50,720 --> 00:03:55,040
तो उसमें बताया जा रहा है कि जो भगवान

54
00:03:55,040 --> 00:03:59,200
ने धर्म धर्म यज्ञ बताया है उसके अनुसार चलने वाले

55
00:03:59,200 --> 00:04:03,200
जो लोग हैं जनक आदि वह भी मोक्ष को प्राप्त कर गए थे।

56
00:04:03,200 --> 00:04:07,200
मतलब वहां भगवान ये बता रहे थे गृहस्थ होते हुए भी जनक ने मुक्ति प्राप्त की थी। वो बता

57
00:04:07,200 --> 00:04:11,440
रहे थे। तो यहां पे इन्होंने पूरा अर्थ ही बदल दिया। मुक्ति

58
00:04:11,440 --> 00:04:16,320
वाला हिस्सा हटा ही दिया। यहां सिद्धि की कोई बात ही नहीं की। है ना?

59
00:04:16,320 --> 00:04:20,880
और अलग ही एक इनका गाना चलने लगा। 320

60
00:04:20,880 --> 00:04:25,520
में इसके बाद 32 से 24 में इन्होंने क्या किया है?

61
00:04:25,520 --> 00:04:31,360
तुलना की है काल और कृष्ण की। यह बहुत जरूरी है।

62
00:04:31,360 --> 00:04:35,360
काल और कृष्ण की तुलना कैसे की है? कि 31 से 24 में इन्होंने बताया है

63
00:04:35,360 --> 00:04:39,600
कि गीता को बोलने वाला यह कह रहा है यदि मैं अच्छे कर्म

64
00:04:39,600 --> 00:04:43,760
ना करूं तो मुझे क्योंकि मैं श्रेष्ठ हूं तो मुझे फॉलो

65
00:04:43,760 --> 00:04:47,920
करने लगेंगे लोग और मैं अगर अच्छे कर्म नहीं करूंगा तो

66
00:04:47,920 --> 00:04:52,080
लोग भी अच्छे कर्म नहीं करेंगे। मतलब बुरे कर्म करने लगेंगे। अब यहां पे रामपाल

67
00:04:52,080 --> 00:04:54,320
ने अपनी पुस्तक में यह बताने

68
00:04:54,320 --> 00:04:58,320
की कोशिश की है कि विचार करें कृष्ण भगवान के तो इतने बुरे बुरे कर्म है

69
00:04:58,320 --> 00:05:02,400
उसके अनुसार। तो फिर जब कृष्ण भगवान के इतने बुरे बुरे कर्म है तो

70
00:05:02,400 --> 00:05:06,560
वह यहां पर यह कैसे कह सकते हैं कि मैं अगर अच्छे कर्म ना करूं तो इससे

71
00:05:06,560 --> 00:05:10,960
पता लगता है गीता बोलने वाले कृष्ण नहीं है बल्कि काल है

72
00:05:10,960 --> 00:05:14,960
काल है कृष्ण से सेपरेट है तो

73
00:05:14,960 --> 00:05:19,200
कृष्ण भगवान अच्छे कर्म करने वाले नहीं है रामपाल के अनुसार

74
00:05:19,200 --> 00:05:23,360
तो क्या काल अच्छे कर्म करने वाला है बलात्कारी झूठा

75
00:05:23,360 --> 00:05:28,080
राक्षस अपना उल्लू सीधा करने वाला

76
00:05:28,080 --> 00:05:32,400
हम जो उसकी भक्ति करे उसको वह खा जाता है।

77
00:05:32,400 --> 00:05:36,400
तो कृष्ण भगवान अच्छे कर्म करने वाले नहीं है। मगर रामपाल

78
00:05:36,400 --> 00:05:41,120
यहां पर काल को अच्छा कर्म करने वाला मान रहा है। ये क्यों?

79
00:05:41,120 --> 00:05:45,120
पहली बात। दूसरी बात यह है इसने यहां

80
00:05:45,120 --> 00:05:49,600
पर इस पृष्ठ पर 48 वे पृष्ठ पर 48 पृष्ठ की बात चल रही है।

81
00:05:49,600 --> 00:05:54,720
इसने इस पृष्ठ पर जो है

82
00:05:54,720 --> 00:05:58,880
बहुत सारी बुराई की है। कृष्ण भगवान के जो लीलाएं उनका जो

83
00:05:58,880 --> 00:06:03,120
वृतांत है उनका अपार्थ करके बहुत सारी बकवास यहां लिखी है।

84
00:06:03,120 --> 00:06:07,840
तो इसने ये दर्शाने की कोशिश की है। कृष्ण भगवान तो इतने बुरे कर्म करने वाले थे।

85
00:06:07,840 --> 00:06:09,440
तो फिर वह यह क्यों कह

86
00:06:09,440 --> 00:06:13,600
रहे हैं कि अगर मैं अच्छे कर्म ना करूं इससे पता लगता है कि अच्छे कर्म जो ना

87
00:06:13,600 --> 00:06:17,600
करने की बात जो कह रहा है वह काल है जो कृष्ण से अलग है। मगर

88
00:06:17,600 --> 00:06:21,600
मैं आपको एक बात बताऊं ये इनका कबीर सागर का सरल

89
00:06:21,600 --> 00:06:24,400
अर्थ है।

90
00:06:24,400 --> 00:06:30,400
और इसमें

91
00:06:34,640 --> 00:06:40,240
प्रश्न संख्या 70

92
00:06:40,240 --> 00:06:45,760
कबीर सागर का सरलार्थ प्रश्न संख्या 70

93
00:06:45,760 --> 00:06:51,760
यहां पर 71 में आप पढ़िए 71 वे पृष्ठ में और

94
00:06:56,560 --> 00:07:02,560
नीचे से तीसरा पैराग्राफ है ना

95
00:07:02,960 --> 00:07:07,440
वास्तव में यह काल का जाल है मन मन काल का सूक्ष्म

96
00:07:07,440 --> 00:07:11,520
रूप है। काल ने प्रत्येक प्राणी को धोखे में रखकर अपना स्वार्थ

97
00:07:11,520 --> 00:07:15,840
सिद्ध करने के लिए 100 छल कपट किए हैं। श्री कृष्ण में प्रवेश

98
00:07:15,840 --> 00:07:20,240
करके अनेकों रूप बनाकर काल ब्रह्म स्वयं भोग

99
00:07:20,240 --> 00:07:24,320
विलास करता था। भार श्री कृष्ण जी के सर पर रख

100
00:07:24,320 --> 00:07:28,480
देता था। अर्थात रामपाल के अनुसार

101
00:07:28,480 --> 00:07:32,560
कृष्ण जी ने कोई बुराई नहीं की है। काल ने की है। तो

102
00:07:32,560 --> 00:07:38,160
फिर वहां यह क्यों कह रहा है कि भाई कृष्ण जी तो बुरे हैं। काल अच्छा है।

103
00:07:38,160 --> 00:07:42,320
तो ये पहले खुद डिसाइड कर ले कि कृष्ण और काल में से कौन अच्छा? फिर तत्व

104
00:07:42,320 --> 00:07:47,200
ज्ञान के रूप में बता दे अपने चंपूओं को। हम

105
00:07:47,200 --> 00:07:50,880
चलिए आगे चलते हैं। बुलेट पॉइंट।

106
00:07:50,880 --> 00:07:55,040
इसके बाद काल ने यहां पर तो कहना पड़ेगा कि यह

107
00:07:55,040 --> 00:07:59,200
इस श्लोक को अमान्य मानना पड़ेगा। कौन सा श्लोक

108
00:07:59,200 --> 00:08:00,880
जिसमें यह कहा है कि यदि मैं अच्छे

109
00:08:00,880 --> 00:08:04,880
कर्म ना करूं तो श्लोक चाहे वो कृष्ण के रूप

110
00:08:04,880 --> 00:08:08,960
में मान लीजिए या या वो काल के रूप में मान लीजिए अच्छे कर्म कहने वाली बात

111
00:08:08,960 --> 00:08:13,040
दोनों ही तरीके से लागू नहीं होती है। तो जब लागू नहीं होती है तो

112
00:08:13,040 --> 00:08:17,040
फिर ये इस बात को भी अमान्य मानना पड़ेगा। हम इसलिए काउंट करते चल

113
00:08:17,040 --> 00:08:21,120
रहे हैं क्योंकि इसने कहा है 5% ज्ञान जो है वो काल ने दिया है। तो हम

114
00:08:21,120 --> 00:08:25,440
ये देखेंगे कितने श्लोकों को ना मानने के बाद इसकी गीता बचती

115
00:08:25,440 --> 00:08:29,520
है और क्या वो 5% ही है या 5% से ज्यादा है। हालांकि

116
00:08:29,520 --> 00:08:34,160
आपको बता दूं अभी तक 17 श्लोक तो अमान्य हो चुके हैं। उन श्लोकों के अलावा

117
00:08:34,160 --> 00:08:38,480
जो मोटे तौर पर अमान्य हुए हैं। ठीक है? जैसे

118
00:08:38,480 --> 00:08:43,760
अभी मोटे तौर पर अमान्य हुआ है। 21वा श्लोक यदि मैं अच्छे कर्म ना करूं।

119
00:08:43,760 --> 00:08:47,040
इसके बाद

120
00:08:47,040 --> 00:08:51,680
इसने यहां पर यह माना है कि गीता बोलने वाला यह कह रहा है

121
00:08:51,680 --> 00:08:54,000
कि

122
00:08:54,000 --> 00:08:58,560
मेरा कोई प्रयोजन शेष नहीं है। हम

123
00:08:58,560 --> 00:09:03,360
ये इसने माना है। मेरा कोई भी प्रयोजन

124
00:09:03,360 --> 00:09:07,520
मेरा तीनों लोकों में ना तो कुछ कर्तव्य है ना प्राप्त करने योग्य कोई वस्तु

125
00:09:07,520 --> 00:09:12,400
अप्राप्त है। ठीक है? कुछ भी अप्राप्त नहीं है।

126
00:09:12,400 --> 00:09:16,640
ठीक है? मतलब काल को कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। मगर

127
00:09:16,640 --> 00:09:21,040
यह कहां पर कहा है इसने? 49व प्रश्न में। 49वा

128
00:09:21,040 --> 00:09:26,160
प्रश्न दिखा दीजिए गरमा गीता का।

129
00:09:26,160 --> 00:09:32,160
49व प्रश्न में इसने ये कहा है और आपको बताएं

130
00:09:33,200 --> 00:09:39,200
52 वे प्रश्न में 49व प्रश्न में गरमा गीता की में क्या कहा है?

131
00:09:50,640 --> 00:09:54,640
49वा प्रश्न जिसमें ये इसने माना कि

132
00:09:54,640 --> 00:09:59,360
काल को ना तो कोई कर्तव्य शेष है और ना ही कोई

133
00:09:59,360 --> 00:10:03,440
प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है। कुछ भी अप्राप्त नहीं है। कुछ करने की

134
00:10:03,440 --> 00:10:07,600
आवश्यकता नहीं है। गीता बोलने वाला वह है। गीता बोलने वाला कौन

135
00:10:07,600 --> 00:10:11,840
है? जिसे कुछ भी

136
00:10:11,840 --> 00:10:16,240
प्राप्तव्य अप्राप्त नहीं है और

137
00:10:16,240 --> 00:10:20,240
ऐसा कुछ नहीं जो उसको कुछ करना पड़े हाथ पैर मारना पड़े मगर यही

138
00:10:20,240 --> 00:10:24,480
व्यक्ति यही रामपाल यही जेलधाव निवासी पष्ठ संख्या 52

139
00:10:24,480 --> 00:10:28,720
में क्या लिख रहा है गरिमा गीता की दिखाइए

140
00:10:28,720 --> 00:10:34,720
पष्ठ संख्या 52 निकालिए

141
00:10:39,280 --> 00:10:44,400
हां इसमें देखिए क्या है काल को डर है कि

142
00:10:44,400 --> 00:10:48,560
क्या डर है काल को काल को डर बना रहता है कि कहीं जीव

143
00:10:48,560 --> 00:10:53,280
मेरे जाल से निकल ना जाए ठीक है

144
00:10:53,280 --> 00:10:57,440
इसको कुछ करने की जरूरत नहीं है। ये खुद मान रहा है रामपाल गीता

145
00:10:57,440 --> 00:11:01,760
बोलने वाले को मगर काल को डर बना रहता है। इसलिए

146
00:11:01,760 --> 00:11:05,920
काल को झूठ बोलना पड़ता है। इसलिए काल को यह सब

147
00:11:05,920 --> 00:11:09,920
रचना पड़ता है। तो या तो यह तय कर ले तो यहां

148
00:11:09,920 --> 00:11:14,160
पर यह जो श्लोक है इसको भी अमान्य मानना पड़ेगा कि

149
00:11:14,160 --> 00:11:18,320
गीता बोलने वाले को कुछ भी प्राप्त करने योग्य अप्राप्त नहीं

150
00:11:18,320 --> 00:11:23,760
है। ठीक है। आगे चलते हैं। क्या कहा है?

151
00:11:23,760 --> 00:11:26,880
अच्छा एक बात है एक काल को श्राप मिला

152
00:11:26,880 --> 00:11:31,040
था कि काल इतनी

153
00:11:31,040 --> 00:11:35,120
इतनी आत्माएं बार-बार पैदा करेगा। ये श्राप मिला

154
00:11:35,120 --> 00:11:39,440
था काल को। हां। तो काल जीव पैदा

155
00:11:39,440 --> 00:11:44,800
करता है। प्राणी पैदा करता है।

156
00:11:44,800 --> 00:11:49,840
आत्मा पैदा करता है। वैसे फॉर योर काइंड इन आपको बता दूं।

157
00:11:49,840 --> 00:11:55,840
काल आत्मा भी पैदा करता है। यह बात भी लिखी है।

158
00:11:56,480 --> 00:12:02,400
अब बताइए यदि काल आत्मा को बना रहा है आत्मा

159
00:12:02,400 --> 00:12:08,400
हम।

160
00:12:18,320 --> 00:12:22,560
अच्छा वह उसमें है चौथे अध्याय चलिए खैर आगे बुलेट पॉइंट

161
00:12:22,560 --> 00:12:26,720
में चलते हैं क्या है कि इसने

162
00:12:26,720 --> 00:12:30,720
बता दिया कृष्ण का चरित्र बोला नहीं है फिर इसने 49 पृष्ठ में पृष्ठ संख्या

163
00:12:30,720 --> 00:12:35,280
49 है इसमें इसने माना है यजुर्वेद

164
00:12:35,280 --> 00:12:39,360
के अध्याय 40 के मंत्र 13

165
00:12:39,360 --> 00:12:43,760
में 13 का समर्थन कहा है कि भाई धीरा नाम पुरुषों से जाकर के

166
00:12:43,760 --> 00:12:48,080
अह मोक्ष का ज्ञान जो है तत्व ज्ञान वो पूछो जबकि

167
00:12:48,080 --> 00:12:52,240
वहां पर ऐसा नहीं है। वहां यह कहा गया है कि धीरा नाम जो

168
00:12:52,240 --> 00:12:56,320
बुद्धिमान होते हैं, मनीषी होते हैं, वह ऐसा बताते हैं। तो यहां से

169
00:12:56,320 --> 00:13:00,320
उसने हिंदी पलट दी है। खैर चार 13 में धीरा नाम

170
00:13:00,320 --> 00:13:04,800
पुरुषों का मंडन कर रहा है, समर्थन कर रहा है।

171
00:13:04,800 --> 00:13:09,360
मगर यजुर्वेद के 40 वे अध्याय के दव मंत्र का

172
00:13:09,360 --> 00:13:13,520
दव मंत्र के मंत्र में ये धीरा नाम पुरुषों का विरोध

173
00:13:13,520 --> 00:13:17,600
करता है। तो पहले तय कर ले कि धीरा नाम से ज्ञान लेना है कि नहीं लेना

174
00:13:17,600 --> 00:13:22,000
है क्योंकि 40 वे अध्याय के दव

175
00:13:22,000 --> 00:13:28,000
दव मंत्र में लिखा है कि

176
00:13:29,600 --> 00:13:34,080
पवित्र वेदों को बोलने वाले ब्रह्म ने कहा 39वा प्रश्न निकालिए

177
00:13:34,080 --> 00:13:36,640
39

178
00:13:36,640 --> 00:13:40,640
39वा प्रश्न निकालिए इसका पवित्र वेदों

179
00:13:40,640 --> 00:13:44,720
को बोलने वाले ब्रह्म ने कहा कि पूर्ण परमात्मा के विषय में कोई तो कहता है

180
00:13:44,720 --> 00:13:49,200
कि यह वह अवतार रूप में उत्पन्न होता है। अर्थात आकार में कहा जाता है।

181
00:13:49,200 --> 00:13:55,200
कोई उसे कभी अवतार रूप में आकार में भी

182
00:13:57,680 --> 00:14:02,240
हां चार 10 का समर्थन किया है। यहां पे समर्थन है।

183
00:14:02,240 --> 00:14:06,240
ठीक है? धीराम पुरुषों से जाकर के सुनने वाली जो बात इसने मानी है

184
00:14:06,240 --> 00:14:10,240
वो 40व अध्याय के दव मंत्र में माना है कि धीराम

185
00:14:10,240 --> 00:14:14,240
पुरुषों से सुनो। फिर उसके बाद 49 वे प्रश्न पर दोबारा आ

186
00:14:14,240 --> 00:14:18,320
जाइए। 49वा प्रश्न 49 वे प्रश्न में 40 वे

187
00:14:18,320 --> 00:14:22,480
अध्याय के 13 वे मंत्र का खंडन कर रहा है और उस खंडन में धीरा

188
00:14:22,480 --> 00:14:26,640
नाम पुरुषों का की बुराई कर रहा है। क्या बुराई है कि

189
00:14:26,640 --> 00:14:30,000
भाई

190
00:14:30,000 --> 00:14:34,160
जिसको ये यहां ये कह रहा है जिस व्यक्ति को अक्षर ज्ञान है उसे

191
00:14:34,160 --> 00:14:38,880
विद्वान कहते हैं। और ये ज्ञान देने वाले वहां पर धीरा नाम कहे गए हैं।

192
00:14:38,880 --> 00:14:43,040
जो ज्ञान यजुर्वेद के 40वें अध्याय के 13वे मंत्र

193
00:14:43,040 --> 00:14:47,120
में है वह ज्ञान देने वाले धीरा नाम है और यहां पर यह कह रहा है कि

194
00:14:47,120 --> 00:14:51,280
नहीं नहीं ये बात वेद की गलत है कि जिस व्यक्ति को हालांकि

195
00:14:51,280 --> 00:14:55,440
इसने अर्थ गलत लिया है ये जो अर्थ इसने लिया है वो गलत है वहां पर अलग अर्थ है

196
00:14:55,440 --> 00:14:59,760
मगर अगर इसने यह अर्थ लिया है कोई भी अर्थ लिया बात तो धीराम

197
00:14:59,760 --> 00:15:03,920
पुरुषों की है ना तो जब ये धीराम पुरुषों के पास जाने को कह चुका

198
00:15:03,920 --> 00:15:08,240
है 40 वे अध्याय के द मंत्र का अर्थ बताते हुए अपनी ही किताब में 39

199
00:15:08,240 --> 00:15:12,320
वे प्रश्न प्रश्न पर तो फिर 49व पृष्ठ पर धीरम पुरुषों की बात को खुद

200
00:15:12,320 --> 00:15:16,560
ही गलत क्यों कह रहा है क्योंकि यह पोलू है दिमाग से इसके

201
00:15:16,560 --> 00:15:20,640
दिमाग में पोल है खाली पड़ा है इसलिए ऐसा

202
00:15:20,640 --> 00:15:24,800
करता है ठीक है आगे चलते हैं अच्छा एक चीज

203
00:15:24,800 --> 00:15:28,880
और है तीसरे अध्याय के ये 48वा

204
00:15:28,880 --> 00:15:33,120
पेज निकालिए 48वा प्रश्न संख्या 48 इसमें

205
00:15:33,120 --> 00:15:37,120
इसने क्या किया है तीसरे अध्याय के 31 से 32

206
00:15:37,120 --> 00:15:41,200
श्लोक में गीता कहने वाले भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि ऐसा मेरा

207
00:15:41,200 --> 00:15:45,120
मत है। तो इसने अपने अनेकों जगह

208
00:15:45,120 --> 00:15:49,120
कहा है कि हम केवल वह मानते हैं जो उसको भगवान ने दिया। उसने जहां पर अपना मत

209
00:15:49,120 --> 00:15:53,120
दिया तो बताया कि अपना मत है वो हमें नहीं मानना है। काल का अपना मत नहीं

210
00:15:53,120 --> 00:15:57,440
मानना है। मगर

211
00:15:57,440 --> 00:16:00,400
इसने जो है

212
00:16:00,400 --> 00:16:06,400
काल का मत माना है। कहां पे माना है? 50व पृष्ठ में निकालिए। 50वा

213
00:16:06,480 --> 00:16:10,560
50वें पृष्ठ में इसने काल का मत मान लिया। क्या लिखा

214
00:16:10,560 --> 00:16:15,920
है? गीता अध्याय तीन के श्लोक 31 32 का सात सबसे नीचे

215
00:16:15,920 --> 00:16:18,640
सबसे नीचे

216
00:16:18,640 --> 00:16:22,960
जो ऊपर लिखे मेरे मत का अनुसरण करते हैं। वे सब बुरे

217
00:16:22,960 --> 00:16:27,120
कर्मों से बच जाते हैं। जो ऐसा नहीं करते हैं, वह मूर्ख

218
00:16:27,120 --> 00:16:31,200
अज्ञानी है। अब इसमें यहां पर रामपाल ने काल का

219
00:16:31,200 --> 00:16:35,520
मत मान लिया। तो यह नहीं कह सकते हैं काल का मत नहीं मानना है।

220
00:16:35,520 --> 00:16:39,520
ठीक है? आगे चलते हैं। फिर इसने

221
00:16:39,520 --> 00:16:44,800
51 वे प्रश्न में फिर वही किया है। राग द्वेष

222
00:16:44,800 --> 00:16:48,960
ना करने का राग द्वेष का करने का जो विरोध

223
00:16:48,960 --> 00:16:54,960
होता है। है ना?

224
00:16:56,080 --> 00:17:01,600
राग द्वेष का यहां पर समर्थन किया है।

225
00:17:01,600 --> 00:17:05,920
33 34 कि क्या कहा है कि शिक्षित व्यक्ति जो

226
00:17:05,920 --> 00:17:10,000
तत्व ज्ञान हां 33 34 में ये कहा

227
00:17:10,000 --> 00:17:14,160
है कि क्या कहते हैं? राग राग

228
00:17:14,160 --> 00:17:18,160
द्वेष नहीं करना चाहिए। स्वयं भगवान श्री कृष्ण जी भी राग

229
00:17:18,160 --> 00:17:22,160
द्वेष के बिना नहीं रह पाए थे। मतलब यहां पर राग द्वेष ना करने की

230
00:17:22,160 --> 00:17:28,160
जो शिक्षा दी जा रही है उसका विरोध कर रहा है। ठीक है?

231
00:17:29,920 --> 00:17:34,000
और एक बात और है इसी में 33 34 में क्या

232
00:17:34,000 --> 00:17:38,000
कहा है कि शिक्षित व्यक्ति जो तत्वज्ञान हीन है। मूल स्वभाव

233
00:17:38,000 --> 00:17:42,400
वाले शिक्षित व्यक्ति कौन है?

234
00:17:42,400 --> 00:17:46,560
और हां पीछे एक बात और है। तत्वदर्शी के पास कौन जाता है? 49 वां

235
00:17:46,560 --> 00:17:52,560
प्रश्न दिखा दीजिए एक बार। 49वा

236
00:17:54,000 --> 00:17:58,800
49 वे प्रश्न में इस बेवकूफ व्यक्ति ने यह भी लिखा है

237
00:17:58,800 --> 00:18:00,960
कि

238
00:18:00,960 --> 00:18:06,960
तत्वज्ञानी से तत्वदर्शी से जो

239
00:18:07,760 --> 00:18:12,160
ज्ञान लेने जाते हैं शास्त्रानुकूल साधना प्राप्त

240
00:18:12,160 --> 00:18:16,960
करने जाते हैं वो कौन होते हैं? अविद्वान भोलेभाले

241
00:18:16,960 --> 00:18:20,960
अशिक्षित अर्थात अनपढ़ और गवार जितने लोग

242
00:18:20,960 --> 00:18:26,080
यहां पर हैं लिखे मैं गवार हूं मैं अनपढ़ हूं

243
00:18:26,080 --> 00:18:32,080
दोबारा आ जाइए वहां पर 33 34 वाले में

244
00:18:36,480 --> 00:18:40,640
तो 33 34 का वह बात करते समय इसने जो

245
00:18:40,640 --> 00:18:45,840
है राग द्वेष नहीं करना चाहिए इस बात का जो है

246
00:18:45,840 --> 00:18:49,200
विरोध किया है

247
00:18:49,200 --> 00:18:53,840
और जबकि 52 वे प्रश्न में राग द्वेष ना

248
00:18:53,840 --> 00:18:57,840
करने का समर्थन किया है। देखिए कैसे 52 वे प्रश्न

249
00:18:57,840 --> 00:19:02,080
में क्या लिखा है? काल को डर बना रहता है। कहीं जीव तेरे जाल से निकल ना जाए।

250
00:19:02,080 --> 00:19:06,400
इसलिए तत्व ज्ञान सुनकर पूर्ण संत की शरण ग्रहण करके पूर्व

251
00:19:06,400 --> 00:19:10,480
परमात्मा की भक्ति करो। तब राग द्वेष समाप्त हो जाएंगे।

252
00:19:10,480 --> 00:19:14,720
राग द्वेष समाप्त हो जाएंगे। यानी होने चाहिए। राग द्वेष समाप्त होने चाहिए।

253
00:19:14,720 --> 00:19:18,880
तो जब समाप्त होने चाहिए तो बार-बार तू यह क्यों कह रहा है कि राग द्वेष समाप्त

254
00:19:18,880 --> 00:19:23,040
नहीं हो पाए, समाप्त नहीं हो पाए। क्यों कह रहा है? क्योंकि

255
00:19:23,040 --> 00:19:27,120
हमें तो हर बात का विरोध करना है। फिर हमें खुद वही बात कह देनी है।

256
00:19:27,120 --> 00:19:32,240
जैसे कि कभी-कभी ऐसा हुआ हो आपके घर में शायद

257
00:19:32,240 --> 00:19:38,000
कि मान लीजिए कोई आप लोग चुनाव कर रहे हैं कि

258
00:19:38,000 --> 00:19:42,480
दीवार का जो कलर है वह हरा किया जाए।

259
00:19:42,480 --> 00:19:46,640
या सफेद किया जाए या पीला किया जाए या इस तरह

260
00:19:46,640 --> 00:19:50,800
से घर घर से जुड़ा हुआ कोई भी प्रसंग ले लीजिए जिसमें कि

261
00:19:50,800 --> 00:19:54,960
घर के जितने भी सदस्य हैं वो चुनाव कर रहे हैं कि कौन सी चीज किस तरह से इसको

262
00:19:54,960 --> 00:19:59,120
करना चाहिए विषय वस्तु अथवा स्थिति को चुन रहे हैं। तो

263
00:19:59,120 --> 00:20:03,200
एक कोई ऐसा आया भैया अहंकारी व्यक्ति

264
00:20:03,200 --> 00:20:07,360
उसने कहा नहीं ना पीला ना हरा ना

265
00:20:07,360 --> 00:20:11,600
लाल ना सफेद उसने घर की घर घर के सभी सदस्यों की सारी बातों को काट

266
00:20:11,600 --> 00:20:16,320
दिया तो फिर सब ने उससे पूछा कि फिर कौन सा पीला

267
00:20:16,320 --> 00:20:18,960
समझ रहे हैं

268
00:20:18,960 --> 00:20:22,320
इस बात को समझ रहे हैं ना

269
00:20:22,320 --> 00:20:26,480
जो बात पहले ही कही जा रही है उसको तो मना कर दिया गलत बोल रहा है मूर्ख

270
00:20:26,480 --> 00:20:30,800
है ये तो पीला कहने वाला ये क्या है सही पीला?

271
00:20:30,800 --> 00:20:36,080
यह तरीका है रामपाल का।

272
00:20:36,080 --> 00:20:40,080
खैर आगे चलते हैं। कृष्ण ने एक बात

273
00:20:40,080 --> 00:20:44,160
मानी है काल के अवतार। काल ने जब ये घोषणा कर रखी

274
00:20:44,160 --> 00:20:49,120
है कि मैं किसी को दर्शन नहीं दूंगा तो काल का अवतार कहां से हो रहा है भाई?

275
00:20:49,120 --> 00:20:53,200
काल का अवतार कहां से हो रहा है? घोषणा कर रखी है।

276
00:20:53,200 --> 00:20:57,280
मैं किसी को दर्शन नहीं दूंगा। तो काल का अवतार क्यों हो रहा है? और कौन से अवतार है फिर

277
00:20:57,280 --> 00:21:01,440
वो बताएं। हालांकि बताए गए हैं महा विष्णु ये है वो है वो अवतार सिद्धि

278
00:21:01,440 --> 00:21:07,440
नहीं होते काल के। खैर आगे चलते हैं।

279
00:21:11,920 --> 00:21:17,920
हां इसने यहां पर

280
00:21:18,240 --> 00:21:22,240
देखिए इसने यहां पर भी द्वेष बिना युद्ध हो ही नहीं सकता। फिर इस

281
00:21:22,240 --> 00:21:26,480
बात को माना है राग द्वेष को त्यागने को।

282
00:21:26,480 --> 00:21:30,720
द्वेष बिना युद्ध हो ही नहीं सकता। इसका मतलब इसके

283
00:21:30,720 --> 00:21:34,960
जितने भक्त इस समय कोर्ट कचहरी में जा रहे हैं। इसका जो

284
00:21:34,960 --> 00:21:38,960
भाई जो अरेस्ट हुआ है गलत किताबों के साथ जिसमें

285
00:21:38,960 --> 00:21:43,040
हिंदू देवी देवताओं के बारे में अभद्र आपत्तिजनक अश्लील टिप्पणियां

286
00:21:43,040 --> 00:21:47,440
लिखी हुई है। उसको बचाने के लिए जो वो न्यायालय

287
00:21:47,440 --> 00:21:51,920
में जो युद्ध लड़ने जा रहे हैं तो ये राग द्वेष ले जा रहे हैं।

288
00:21:51,920 --> 00:21:55,920
और राग द्वेष के बिना क्योंकि युद्ध हो नहीं सकता। इसका बाबा खुद कह रहा है। यानी

289
00:21:55,920 --> 00:22:00,080
कि यह लोग अभी सही तत्वदर्शी की शरण में नहीं है। पूर्ण संत की शरण

290
00:22:00,080 --> 00:22:05,360
में नहीं है। इसी के अनुसार इसी का खंडन ठीक है ना?

291
00:22:05,360 --> 00:22:10,720
क्यों? क्योंकि राग द्वेष के बिना युद्ध हो ही नहीं सकता।

292
00:22:10,720 --> 00:22:15,120
हम

293
00:22:15,120 --> 00:22:19,280
अच्छा इसने क्या किया है? फिर तीन 35

294
00:22:19,280 --> 00:22:23,680
का अर्थ करते हुए कहा है कि

295
00:22:23,680 --> 00:22:28,080
दूसरों की गलत साधना से शास्त्र अनुकूल नहीं है। इसने

296
00:22:28,080 --> 00:22:32,000
52 वे उसमें कहा है

297
00:22:32,000 --> 00:22:36,080
52 वे अध्याय में 52 वे प्रश्न में कहा है वही

298
00:22:36,080 --> 00:22:40,320
वाला निकालिए 52 प्रश्न गरिमा

299
00:22:40,320 --> 00:22:44,320
गीता की क्या कहा है कि

300
00:22:44,320 --> 00:22:47,760
भैया

301
00:22:47,760 --> 00:22:52,560
दूसरों की गलत साधना से जो शास्त्रानुकूल

302
00:22:52,560 --> 00:22:56,720
नहीं है चाहे वे कितनी भी कितनी ही अच्छी नजर आए वैज्ञानी चाहे आपको कितना

303
00:22:56,720 --> 00:23:01,200
ही डराए उनकी साधना भयवश होकर स्वीकार नहीं करनी चाहिए

304
00:23:01,200 --> 00:23:05,040
अब यहां क्या हुआ

305
00:23:05,040 --> 00:23:09,040
यहां भगवान कह रहे हैं कि जो स्वधर्म होता है दूसरे का धर्म जो है भले

306
00:23:09,040 --> 00:23:13,120
ही गुणवान दिख रहा हो अपना धर्म जो है गुणहीन दिख रहा हो

307
00:23:13,120 --> 00:23:17,120
ठीक है यहां पे इस बात का खंडन किया है कि भाई ब्राह्मण क्यों नहीं बन सकता

308
00:23:17,120 --> 00:23:21,840
वो क्यों नहीं बन सकता क्योंकि शद्र का जो धर्म है वही उसके लिए

309
00:23:21,840 --> 00:23:26,000
उपयोगी है क्षत्रिय का जो धर्म है वही उसके लिए उपयोगी है तो किसी

310
00:23:26,000 --> 00:23:30,000
भी हाल में स्वधर्म को त्यागना नहीं चाहिए भले ही दूसरे का धर्म कितना

311
00:23:30,000 --> 00:23:34,080
भी श्रेष्ठ दिख रहा हो ठीक है तो क्या हुआ

312
00:23:34,080 --> 00:23:38,080
यहां पर अब इसने इसकी गाथा ही बदल दी इसने कहा कि दूसरे की

313
00:23:38,080 --> 00:23:42,080
साधना नहीं करनी चाहिए गलत साधना नहीं करनी चाहिए तो जब

314
00:23:42,080 --> 00:23:46,080
यहां गलत साधना की बात हो रही है तो स्वधर्म का पालन किस हिसाब से करना

315
00:23:46,080 --> 00:23:50,080
चाहिए? स्वधर्म मतलब कि अगर मैं मैं जो

316
00:23:50,080 --> 00:23:54,400
है शिवाश नारायण द्विवेदी होते हुए किसी का पुत्र हूं, किसी का भाई हूं।

317
00:23:54,400 --> 00:23:58,400
ठीक है? तो मेरा धर्म है। यह स्वधर्म में आ गया कि मैं किसका

318
00:23:58,400 --> 00:24:02,560
भाई हूं। मैं किसका पुत्र हूं। तो उनकी सेवा जिनका मैं पुत्र

319
00:24:02,560 --> 00:24:03,060
हूं।

320
00:24:02,880 --> 00:24:06,880
उनकी सेवा उनके प्रति जो भी कार्य करने हैं वो कार्य करना मेरा

321
00:24:06,880 --> 00:24:10,880
धर्म है। तो भले ही कोई कोई और व्यक्ति अपने पिता

322
00:24:10,880 --> 00:24:15,200
की सेवा करते हुए मुझसे ज्यादा सुखी हो। मुझसे ज्यादा आनंदमय

323
00:24:15,200 --> 00:24:19,360
जीवन जी रहा हो अपने पिता की सेवा करते समय तो मैं यह नहीं

324
00:24:19,360 --> 00:24:23,360
मैं यह नहीं कर सकता वहां पर कि अपने पिता की सेवा छोड़ के क्योंकि

325
00:24:23,360 --> 00:24:27,760
वहां वहां जिस पिता की सेवा हो रही है जिसके पिता की सेवा हो रही है

326
00:24:27,760 --> 00:24:31,920
उस सेवा को करते समय आनंद मिल रहा है सांसारिक तो मैं उससे

327
00:24:31,920 --> 00:24:36,240
आकर्षित हो के अपना जो स्वधर्म का पालन है वो मुझे नहीं त्यागना है।

328
00:24:36,240 --> 00:24:40,320
अपने पिता की सेवा को नहीं त्यागना है कि भाई यहां पे भी तो मैं पिता एक पिता की

329
00:24:40,320 --> 00:24:44,960
सेवा कर रहा हूं। मेरा नहीं है तो क्या हुआ? तो यानी कि उसके पिता की सेवा

330
00:24:44,960 --> 00:24:49,120
मेरा स्वधर्म नहीं है। ठीक है? तो उसके उससे आकर्षित

331
00:24:49,120 --> 00:24:53,120
होकर के मुझे अपने स्वधर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। यह वहां पर कहा जा

332
00:24:53,120 --> 00:24:57,280
रहा है। मगर इसने पूरा बदल दिया कि भैया दूसरे की गलत

333
00:24:57,280 --> 00:25:01,440
साधना से अपनी अच्छी साधना और यही बात वर्णाश्रम में भी आती

334
00:25:01,440 --> 00:25:05,520
है। यही बात वर्णाश्रम में आती है। यही आपको लग

335
00:25:05,520 --> 00:25:09,760
रहा है कि ब्राह्मण का क्षत्रिय का श्रेष्ठ जीवन है ये है वो है मगर

336
00:25:09,760 --> 00:25:13,760
उससे आकर्षित हो के अपना जो आपको गुणहीन दिख रहा

337
00:25:13,760 --> 00:25:18,080
है। हालांकि है नहीं मगर चलो मान लो दिख भी रहा है तो उसको त्यागना

338
00:25:18,080 --> 00:25:22,080
नहीं चाहिए। भले ही आपको लग रहा है कि उसका जीवन जो है सरल है जबकि

339
00:25:22,080 --> 00:25:26,320
वह कठिन है। फिर भी आप उसके लालच में आ के अगर आपको दिख भी रहा है तो उसके

340
00:25:26,320 --> 00:25:30,320
लालच में आकर के अपने स्वधर्म को नहीं छोड़ना चाहिए। यह कहा

341
00:25:30,320 --> 00:25:34,320
जा रहा है। ठीक है? ये सार्वभौम सिद्धांत भी है ले

342
00:25:34,320 --> 00:25:40,320
लीजिएगा। अब आगे क्या है कि

343
00:25:55,120 --> 00:26:00,000
हां इसने एक बात और मान ली है कि

344
00:26:00,000 --> 00:26:04,960
संसार के नर नारी पृष्ठ संख्या 59 संसार

345
00:26:04,960 --> 00:26:09,520
के नर नारी सनक सनंदन सनत कुमार सनातन

346
00:26:09,520 --> 00:26:14,240
नारद व्यास जी पाराशर जी प्रह्लाद मुेंद्र ऋषि

347
00:26:14,240 --> 00:26:18,400
ये सब स्वयं कबीर थे। भक्त

348
00:26:18,400 --> 00:26:22,400
प्रह्लाद कौन थे? कबीर थे। ये

349
00:26:22,400 --> 00:26:26,400
बात किसने मान ली? रामपाल ने। ठीक

350
00:26:26,400 --> 00:26:30,480
है? और एक चीज और देख

351
00:26:30,480 --> 00:26:36,480
लेते हैं। हां, यहां पर लालच भी दिया गया है।

352
00:26:37,840 --> 00:26:42,000
ज्ञानी विद्वान पुरुष मानवश ज्ञानी

353
00:26:42,000 --> 00:26:46,080
विद्वान पुरुष मानवश पैसा प्राप्ति व

354
00:26:46,080 --> 00:26:50,240
अधिक शिष्य बनाने की इच्छा के कारण गलत कर्म

355
00:26:50,240 --> 00:26:55,280
छोड़कर यह पृष्ठ संख्या है 53 छोड़कर

356
00:26:55,280 --> 00:26:59,680
सच्चाई का अनुसरण नहीं करते दोनों ज्ञानी व अज्ञानी

357
00:26:59,680 --> 00:27:03,760
स्वभाव व चल रहे हैं इसलिए भक्ति मार्ग गलत दिशा

358
00:27:03,760 --> 00:27:08,880
पड़ चुका है तो अब क्या है जो ज्ञानी है

359
00:27:08,880 --> 00:27:12,960
जो गलत मार्ग पर चलने वाला है वो ज्ञानी कैसे

360
00:27:12,960 --> 00:27:15,760
है

361
00:27:15,760 --> 00:27:20,000
जब मार्ग ही गलत है तो वो अज्ञानी कैसे

362
00:27:20,000 --> 00:27:24,400
है वो तो अज्ञानी कहा जाना चाहिए तो ये एक बात सोचने

363
00:27:24,400 --> 00:27:28,720
वाली ठीक है ये बेवकूफियां

364
00:27:28,720 --> 00:27:33,840
है हर पन्ने पर की है इसने तो उसी का आप लोग मनोरंजन

365
00:27:33,840 --> 00:27:38,000
लीजिए और समय पढ़ने पर चैप्टर वाइज ये जो व्याख्या

366
00:27:38,000 --> 00:27:42,000
चल रही है इसको देखते रहिए। 59व पे 59व प्रश्न

367
00:27:42,000 --> 00:27:46,240
में क्या माना है कि स्वयं कबीर परमात्मा

368
00:27:46,240 --> 00:27:51,280
ही प्रह्लाद थे। हम भी तो यही कहते हैं प्रह्लाद थे।

369
00:27:51,280 --> 00:27:56,880
हां मान लिया ना 59 में

370
00:27:56,880 --> 00:28:00,480
रख लो इसको संभाल के।

371
00:28:00,480 --> 00:28:06,240
आगे चलते हैं।

372
00:28:06,240 --> 00:28:10,320
वह परमात्मा उस परमात्मा यह कहता है ना जब वह जब वह स्वयं ही

373
00:28:10,320 --> 00:28:14,320
परमात्मा थे तो उन्होंने यह क्यों कहा कि वह परमात्मा उस परमात्मा तो यहां

374
00:28:14,320 --> 00:28:18,640
पे तुम्हारे कबीर बाबा जी भी कह रहे हैं क्या कह रहे हैं वह परमात्मा

375
00:28:18,640 --> 00:28:22,640
जिसका काल ना हो यानी अविनाशी सत्पुरुष वह सच्चा परमात्मा

376
00:28:22,640 --> 00:28:26,720
जिसका नाश ना हो यानी अविनाशी वह परमात्मा जिसकी वास्तविक वह

377
00:28:26,720 --> 00:28:30,800
परमात्मा जो अविनाशी है भाई वह परमात्मा क्यों कह रहे हो मुझ परमात्मा

378
00:28:30,800 --> 00:28:35,440
कहो ना मुझ परमात्मा मुझ परमात्मा ये कहो

379
00:28:35,440 --> 00:28:40,400
ठीक कबीर साहब कह रहे हैं ये नहीं कहना चाहिए

380
00:28:40,400 --> 00:28:46,400
वह नहीं कहना चाहिए वह और उस वो तो थर्ड पर्सन हो गया ना

381
00:28:47,440 --> 00:28:50,960
और क्या है

382
00:28:50,960 --> 00:28:55,280
69

383
00:28:55,280 --> 00:28:59,280
काल जब दोबारा सृष्टि रचेगा वही बात आ गई दोबारा सृष्टि रचेगा

384
00:28:59,280 --> 00:29:03,600
दोबारा जो है उसमें जीवात्माएं फसेंग तो कौन सी जीवात्माएं होंगी

385
00:29:03,600 --> 00:29:07,680
काल के लिए दोबारा से जीवात्माएं बनाई जाएंगी। पहले वाली जीवात्माएं कहां

386
00:29:07,680 --> 00:29:11,840
होंगी? क्या होगा? बहुत सारे क्वेश्चनंस हैं। हालांकि

387
00:29:11,840 --> 00:29:16,160
हमने इनकी सृष्टि रचना कबीर सागर का सरलार्ध में भी पढ़ी है।

388
00:29:16,160 --> 00:29:20,240
तो उसमें बहुत सारी खामियां है। हालांकि आगे चलते हैं। श्लोकबद्ध तरीके से चलते

389
00:29:20,240 --> 00:29:24,240
हैं। इसने रामपाल ने नाम देने

390
00:29:24,240 --> 00:29:28,880
का अधिकारी माना है। किसको?

391
00:29:28,880 --> 00:29:34,880
जिसको नाम देने का अधिकार मिला हो। प्रश्न क्रमांक 70

392
00:29:35,440 --> 00:29:41,440
हम

393
00:29:43,760 --> 00:29:49,760
नाम देने का अधिकारी

394
00:30:01,600 --> 00:30:05,600
इसने कहा है कि नाम देने का अधिकार केवल उसी को है

395
00:30:05,600 --> 00:30:08,080
जिसने

396
00:30:08,080 --> 00:30:12,160
अपने गुरु से उस नाम को लिया हो। तो

397
00:30:12,160 --> 00:30:16,960
क्या नाम देने का अधिकार अगर

398
00:30:16,960 --> 00:30:21,120
सिर्फ उसे है जिसने अपने गुरु से उसको ज्ञान को लिया हो।

399
00:30:21,120 --> 00:30:25,360
तो रामपाल का गुरु जो था वह तत्व ज्ञानी था। जिससे

400
00:30:25,360 --> 00:30:29,440
रामपाल ने ज्ञान लिया वो तत्वदर्शी था। वो गुरु था।

401
00:30:29,440 --> 00:30:33,440
यह प्रश्न आ जाता है। ठीक है? क्योंकि इसने

402
00:30:33,440 --> 00:30:37,920
79 नंबर के पृष्ठ में कहा है

403
00:30:37,920 --> 00:30:42,000
इसने कहा है कि केवल मुझ

404
00:30:42,000 --> 00:30:46,080
संत रामपाल सारनाम दान करने का केवल मुझ संत रामपाल

405
00:30:46,080 --> 00:30:50,160
दास को आदेश मिला है। केवल संत

406
00:30:50,160 --> 00:30:50,880
रामपाल

407
00:30:50,880 --> 00:30:55,280
दास को आदेश मिला है। आदेश किससे मिला भाई? यह तो खुद कबीर का अवतार है।

408
00:30:55,280 --> 00:30:59,360
यह तो खुद कबीर है। तो आदेश किससे मिल रहा है? यानी कबीर के ऊपर भी कोई और

409
00:30:59,360 --> 00:31:03,680
है। और अगर गुरु से मिल रहा है तो वो गुरु कौन है?

410
00:31:03,680 --> 00:31:07,280
हम

411
00:31:07,280 --> 00:31:10,560
बहुत सी बातें हैं।

412
00:31:10,560 --> 00:31:15,680
आगे चलते हैं। पृष्ठ क्रमांक

413
00:31:15,680 --> 00:31:18,080
76

414
00:31:18,080 --> 00:31:22,400
वही ब्रह्मा विष्णु महेश की पूजा करने वाले मनुष्यों में नीच

415
00:31:22,400 --> 00:31:27,120
दूषित कर्म करने वाले हैं। ठीक है?

416
00:31:27,120 --> 00:31:31,120
और फिर भगवान का अपमान है 88 से 89 पृष्ठ में शिव भगवान

417
00:31:31,120 --> 00:31:35,440
से सेक्स कंट्रोल नहीं हुआ। सीता माता वाला

418
00:31:35,440 --> 00:31:40,160
विवरण है। यहां पर शिव जी को काल ने भड़काया।

419
00:31:40,160 --> 00:31:44,400
जैसे काल वहां कृष्ण को भड़काता है। मगर फिर भी ये कृष्ण को दोषी

420
00:31:44,400 --> 00:31:50,400
मानते हैं। यहां शिव जी को काल ने भड़काया।

421
00:31:50,480 --> 00:31:54,960
89 नंबर पर है

422
00:31:54,960 --> 00:31:59,280
और यह सब होते होते फिर

423
00:31:59,280 --> 00:32:03,520
अर्धनग्न शरीर वाली पोशाक पहनी ये सब बातें

424
00:32:03,520 --> 00:32:08,000
हैं सब निर्लज्जता पूर्वक लिखी गई है यहां

425
00:32:08,000 --> 00:32:12,080
विष्णु भगवान से सेक्स कंट्रोल नहीं हुआ एक बात ध्यान

426
00:32:12,080 --> 00:32:17,600
रखने के लिए मन स्वयं काल ब्रह्म है और

427
00:32:17,600 --> 00:32:21,920
3.35 के बात 3.35 का अर्थ क्या है जो हमने बता

428
00:32:21,920 --> 00:32:25,920
दिया है कि अगर सभी कार्य धर्म

429
00:32:25,920 --> 00:32:30,160
है तो दूसरे का धर्म क्या है? धर्म उसे

430
00:32:30,160 --> 00:32:34,240
कहते हैं धर्म किसे कहते हैं? समझिए जो

431
00:32:34,240 --> 00:32:38,320
मोक्ष दिलाए। तो दूसरे का जो धर्म है जो

432
00:32:38,320 --> 00:32:42,320
इसने व्याख्या की है कि दूसरे की साधना नहीं लेनी चाहिए। वहां शब्द क्या

433
00:32:42,320 --> 00:32:46,400
आया है? धर्म। दूसरे के धर्म में नहीं जाना चाहिए।

434
00:32:46,400 --> 00:32:50,720
तो स्वधर्म से तो वो बात समझ में आ रही है। मगर जब दूसरे की साधना

435
00:32:50,720 --> 00:32:54,880
की बात आ जाएगी तो वहां साधना नहीं कहा गया। वहां धर्म कहा गया है तो

436
00:32:54,880 --> 00:32:59,200
उसको साधना क्यों बोल रहे हो? और जब धर्म कहा गया है ठीक है?

437
00:32:59,200 --> 00:33:03,520
तो धर्म का तो अर्थ ही है जो मोक्ष दिलाए। फिर

438
00:33:03,520 --> 00:33:08,960
आप उसमें भेद कैसे कर रहे हो? हम

439
00:33:08,960 --> 00:33:10,160
या तो उसको दूसरे

440
00:33:10,160 --> 00:33:14,160
की साधना को धर्म मत कहो। अगर धर्म के अर्थ

441
00:33:14,160 --> 00:33:18,400
में तुम जब साधना ले रहे हो तो दूसरे की साधना को आप धर्म मत कहिए

442
00:33:18,400 --> 00:33:22,480
क्योंकि वह गलत है। वह मोक्ष नहीं दिला रही तो उसको धर्म क्यों कह रहे हो? यह

443
00:33:22,480 --> 00:33:26,480
है कहने का मतलब। तो यह थे बुलेट पॉइंट्स। [संगीत]
