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00:00:04:04 ठीक है?

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00:00:05:06 तो यानी कि इस्लाम भी अंतर करता है। अब यह अंतर हो क्यों रहा है? हमें ऐसा लगता है कि केवल बस बिना कुछ सोचे समझे हमको बता दिया गया कि ये सही है ये गलत है। नहीं ऐसा नहीं है। इन सब में एक मूल बात छुपी हुई है। अब जब आप इस्लाम से इस्लामिक परिवार से बिलोंग करते हैं तो फिर मैं आपको इस्लाम की दृष्टिकोण को रखते हुए भी बताऊंगा। है ना? फिर अंतर बताऊंगा कि अंतर कहां रह गया। सनातन और इस्लाम। मोटा अंतर तो आप जानते ही हैं जो हमने अपने वीडियोस में कई बार बताया है। इस्लाम के द्वारा प्रतिपादित ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है। मिलने वाला मोक्ष परम स्वतंत्र नहीं है और जी आलंबन लिए जाने वाले धर्म जो है वो शाश्वत नहीं है। बदलता है। ठीक है? अब बात आती है कि यह जो चीजें हैं कि यह अच्छाई है और यह बुराई है। यह ईश्वर ने किस आधार पर सेलेक्ट की कि हां यह चीज जो है बुराई में आई। इस आधार पर सेलेक्ट की है। सारी बातें कुल मिलाकर के अ मेरे ख्याल से दूसरे अध्याय में या तीसरे अध्याय में भगवत गीता भगवान ने कहा है

00:01:21:21 कि जब हमारी बुद्धि खराब होती है। बुद्धि खराब होने का कारण होता है स्मरण शक्ति में जो गिरावट आती है। और अगर हम हमारी सनातन की जितनी भी फिलोसफी है उसमें अविद्या को माना गया है। कहीं ना कहीं माया को माना गया है। प्रपंच रूपी संसार को माना गया है। तो एक तरीके से हम भूल गए हैं कुछ चीजें जो हम बंधन में तो स्मृति भ्रम और भूल जाना और अविद्या ये चीजें सब लगभग आपको एक जैसा साउंड करेंगी। एक जैसा ध्वनित करेंगी। अब क्या है कि जितनी भी चीजें ऐसी हैं जिनके कारण हमारे मन में छिपाने का भाव उत्पन्न होता है। जितनी बार हम जीवन में छिपा रहे हैं जी उतनी बार वो उस पर चोट पहुंच रही है। हमारी जो प्रज्ञा शक्ति है जो पहले से ही हम बंधन में आए हैं। बंधन से मुक्ति प्रज्ञा शक्ति का इनक्रीस होना और बंधन में और लिप्त होना प्रज्ञा शक्ति का और क्षीण हो जाना। ठीक है? तो जितनी बार हम कुछ छुपाते हैं उतनी

00:02:36:26 बार हमारी वह जो प्रज्ञा शक्ति है उसको चोट पहुंचती है। तो ये सारी अच्छाई और बुराई है ये डिपेंड कर रही है छिपाने और ना छिपाने पर। जैसे अच्छा हां। जैसे कि जब हम टमाटर काटेंगे तो हमारे मन में भाव नहीं आएगा कि हम किसी से छिपाए। सही है। मगर यदि हम किसी पशु को काटेंगे तो हमारे मन में भाव आएगा कि हम यह ना देख ले, घर के स्त्रियां ना देखें, घर के जो छोटे बालक हो वो ना देखें। है ना? कम से कम कोई भाव आए ना आए तो वो जो जानवर को काटा जा रहा है उससे छिपाने का भाव तो आएगा ही आएगा। हां। कि उसको बिना बताए हम उसका वध करें, हत्या करें या जो भी है हलाल करें। जी हम हालांकि हलाल और वध में बहुत अंतर है हमारे यहां मगर एक बात आपके अनुसार मैं समझाने को प्रयास कर रहा हूं। तो यह जो छिपाने वाला यही भाव है जिसके बारे में कहा गया है मनुस्मृति में 12 अध्याय के 37 वे श्लोक में कि जिन कार्यों को करते समय छिपाने का भाव उत्पन्न हो वो तामसिक यानी कि आपको दूर ले जा रहे हैं और जिन

00:03:52:00 कामों को करते समय छिपाने का भाव बताने का भाव उत्पन्न हो उन कार्यों को सात्विक कहा गया है और इसी आधार पर जो कर्म आजीव कोपार्जन के निमित्त जो कर्म किए जाते हैं। इसी आईडियोलॉजी के आधार पर ये वर्गीकरण हुआ है कार्यों का। जो हमारे यहां जो वर्ण व्यवस्था है उसमें जो आजीविक कोपार्जन के जो माध्यम है उसमें छिपाने के भाव के आधार पर ही ये वर्गीकरण हुआ कि वो ब्राह्मण है वो क्षत्रिय वो वैश्य है वो वो है। ब्राह्मण अगर बात करें वैश्य की तो वैश्य का कार्य क्या है? कि वो पांच आप जैसे आपने बताया कि आपकी भी शॉप है। हम जी जी अभी मैं प्रश्न ले लूंगा बस इनका होने वाला है समाप्त। जैसे आपने बताया कि आपकी भी किसी चीज की शॉप है। जी तो उसमें क्या है कि आप ₹500 की चीज लाएंगे। आपको सामने वाले को बताना पड़ेगा मैं ये 600 की लाया हूं। जी। तो व्यापार करते समय हमें कई बार छिपाना पड़ेगा। अन्यथा हम

00:05:07:10 जो हमारा अपेक्षित मार्जन है वो नहीं ले पाएंगे या फिर हमारा हमारा निर्वाह नहीं हो सकेगा। अब जो क्षत्रिय है उसका कार्य क्या है? रक्षा करना, युद्ध करना। जी जी। तो युद्ध करते समय अपनी रणनीति को छिपाना पड़ेगा। हम कब कैसे कहां सामने वाले पर प्रहार करने वाले हैं। हम यह सुनिश्चित करके और सामने वाले को बताते हुए नहीं कर सकते। कहीं ना कहीं छिपाने का भाव उत्पन्न होगा। मगर ब्राह्मण की बात ब्राह्मण को क्यों कहा गया कि वो सबका नेतृत्व करे। क्योंकि ब्राह्मण का जो कार्य है वह है उसके अंदर जो चीजें हैं वो छिपा कर नहीं बल्कि बताकर उसे आज को पार्जन करना है। उसके पास ज्ञान है उसको बता के करना है। और दूसरी बात ब्राह्मण कहीं लोभवश या किसी भी कारणवश अपने ज्ञान को छिपाना छिपाना ना शुरू कर दे। इसीलिए वेतन भोगी ब्राह्मण को निषेध किया गया। वेतन के लिए मना है। शिक्षा को बेचने

00:06:22:26 के लिए मना है। वेतन लेने के लिए मना है। केवल आप दक्षिणा ले सकते हो। दक्षिणा मतलब मांग। दान के स्वरूप में जो मिला हुआ होगा उस पर निर्भर करेंगे आप। जिससे कि अगर वेतन लेगा तो क्या होगा? वेतन जब तक सुनिश्चित नहीं हो जाएगा तब तक वह अपना ज्ञान नहीं देगा। है ना कीमत जब तक सुनिश्चित नहीं हो जाएगी उसके ज्ञान की तब तक वो ज्ञान नहीं देगा वो तो कीमत सुनिश्चित हो जाएगी वो शूद्रवत हो जाएगा या वैश्यवत अगर बेचेगा तो वैश्य हो गया ज्ञान को बेचने वाला और अगर वेतन लेगा तो शद्रवत हो गया तो ब्राह्मण के लिए सबसे जो उच्चतम बात बताई गई है वो है कि आप दान लेके अपनी शिक्षा को दीजिए लोगों को दान वो भी उनके स्वेच्छा अनुसार जो देना चाहे वो हां अब इसमें एक प्रॉब्लम और आएगी आज की आज के हिसाब से देख तो ये सारी व्यवस्था पहले ही कर दी गई क्या एक एक समस्या और आ सकती है कि

00:07:37:28 अ जब ब्राह्मण ऐसा कर रहा होगा तो उसकी पत्नी जो है उससे कहेगी भाई मेरा का पति ऐसा मुझे नहीं चाहिए जो मांग कर खाता हो। हां हां ये व्यव ये समस्या आएगी ना तो ब्राह्मण के लिए पहले ही मनुस्मृति में लिख दिया गया कि तुम्हारा तुम्हें तुम्हारे लिए सम्मान विष के समान है और अपमान तुम्हारे लिए अमृत के समान है। जिससे कि ब्राह्मण को कभी ये हाथ फैलाने में समस्या ना हो। संकोट ना हो। मगर ये उन ब्राह्मणों के लिए है जो अपने ब्राह्मणत्व का पालन भी कर रहे हैं। इसका दुरुपयोग ना करें लोग। मगर जो अध्ययन करा भी रहे हैं, जो ज्ञान को बांट भी रहे हैं उनके लिए है। तो दान जो है दान के ऊपर निर्भर रहने के लिए ब्राह्मण को कहा गया। तो ये एक मेन जो आधार है अच्छाई और बुराई का कि आपके मन में जितनी बार छिपाने का भाव आएगा उतनी बार आपकी प्रज्ञा शक्ति कम होगी। तो इसी प्रज्ञा शक्ति कम होने के कारण लोगों को अलग-अलग काम दिए गए हैं और अलग-अलग कार्यों के कार्यों से होते हुए उनका जो है उनकी सद्गति उन्हें प्राप्त होती है। इसमें

00:08:53:08 आप एक चीज और देखिए जैसे कंपैरेटिवली टू मैन एक जो स्त्री होती है पुरुष के कंपैरिजन में उसके जीवन में भी कई सारी वो लगाई गई है कि आप यह नहीं करिए आप गायत्री का जप नहीं करिए। मगर आप देखिए कि यहां पर भी सूक्ष्म कारण वही है। स्त्री के जीवन में पुरुष की अपेक्षाकृत छिपाने का भाव ज्यादा होता है। तो प्रज्ञा शक्ति बार-बार हिट होती है वहां। तो जिसके जिसके जीवन में सबसे कम छिपाने का भाव है उसको सबसे ज्यादा वैसा कार्य दिया गया। ब्राह्मण के जीवन में सबसे कम छिपाने का कार्य है। अगर वो शास्त्रों के अनुसर अनुसार ब्राह्मण हो जीवन को जीने का प्रयास कर रहा हो यथासंभव तो क्या होगा? कि उसकी प्रज्ञा शक्ति बहुत हाई हो जाएगी। जैसे सन्यास आश्रम सन्यास आश्रम में क्या है जो गृहस्थ होता है उसको तब भी कहीं ना कहीं कुछ छुपाना पड़ेगा भले ही ब्राह्मण हो गस्थ होता है तो उसको छिपाना पड़ेगा मगर जब सन्यास में पहुंच जाएंगे तो वो जो गृहस्थ वाला छिपाना था वो भी गया तो वहां प्रज्ञा शक्ति और उसका लेवल इसलिए अंतिम निर्णय ब्रह्मचारी सन्यासी इत्यादि को बताया गया है क्योंकि प्रज्ञा शक्ति की आवश्यकता है ज्ञान को समझने के लिए और और फिर उस

00:10:08:12 ज्ञान को देने के लिए। अब बात आती है कि जो कार्य छिपाने वाले हैं मगर इस प्रपंच रूपी संसार से होकर गुजरते हुए पार पाने के लिए आवश्यक है तो उसमें क्या क्या व्यवस्था की? उसमें भगवान ने विधि विधान को जोड़ दिया। जैसे कि अच्छा जब कोई व्यक्ति अनाधिकृत रूप से स्त्री संग करता है तो क्या लोगों को बताता है? नहीं नहीं बताता। परंतु विवाह जब होता है तो कार्ड बांटे जाते हैं, बैंड बजाया जाता है, बुलाया जाता है। यानी कि जो कार्य ऐसे हैं जो आवश्यक है जिनमें छिपाने का भाव हो भी तो उन कार्य में भगवान ने ऐसे विधि विधान को जोड़ा गया कि उसकी वजह से जो प्रज्ञा शक्ति में अवनति आनी होगी उसको मतलब लीस्ट अमाउंट में किया जाए। जहां तक हो सके वहां तक उसको बचा लिया जाए। यदि बहुत आवश्यकता पड़ने पर आपके जीवन में मांसाहार आवश्यक हो गया है। प्राण की रक्षा होनी है या फिर आपका जन्म ही ऐसे परिवार में हो गया जहां मतलब प्रवृत्ति आपको मिल गई जन्म से ही है ना क्या किया गया कि विधि दी गई उस विधि से

00:11:23:18 क्या होगा कि आपका वो जो चेतना शक्ति पर प्रहार होना होगा वो कम होगा पहली बात जी हम दूसरी बात जी कि जो वो पशु है जो इस कारण से मानव जीवन को बचाने के लिए मानव जीवन को के सदुपयोग हेतु जिस पशु को लिया जा रहा है उसके भी कानों में उसके अंतिम क्षणों में क्या जा रहा होगा विधि युक्त मंत्र स्वर ध्वनि इत्यादि है ना जिससे कि उसके अगले जन्म की सद्गति उसको प्राप्त हो

00:11:59:00 और अंतत गत्वा अह व्यक्ति जो है ये जो विधि विधान भी दिया गया है इसमें क्या है कि यह जो विधि विधान दिया गया है कि भाई देखो देखो तुम्हारे यहां भी तो वेद में बलि दी गई है। इसका पर्यावसान उसके प्रोत्साहन में नहीं है। मांसाहार के इसका पर्यावसान उसकी न्यूनता में है। जैसे कि कोई व्यक्ति 10 सिगरेट पीता है और डॉक्टर ने उससे कहा कि आज से आठ सिगरेट पीना तुम। तो यहां पर आठ सिगरेट पीने का विधान नहीं बनाया है डॉक्टर ने। आठ सिगरेट कह करके वह जो 10 सिगरेट पीने वाला उसके उसमें जीवन में सिगरेट की न्यूनता ला रहा है। तो इसी प्रकार से इस विधि विधान के कारण जो व्यक्ति आज निर्दंध स्वतंत्र रूप से मांस खाता होगा। हां उस पर ये लगा दीजिए कि आप बलि देकर ही मांस खाएंगे। कितना मांस खा पाएगा वो? बहुत ही कम। हां। और उसके बाद धीरे धीरे धीरे करके उसके अंदर यह स्वतः भावना उत्पन्न होगी कि छोड़ो यार इतना झंझट इतना सब करना

00:13:14:02 पड़ता है हम उसका विकल्प ढूंढो यदि व्यक्ति धर्म के रास्ते पर चलेगा और धर्म के रास्ते पर चलते हुए वो मांस खाएगा उसका मांस छूट जाएगा अगर व्यक्ति करता क्या है हिंदू की बात कर रहा हूं हिंदू करता क्या है कि बलि के नाम पर वो कसाई की दुकान पर मिलने वाला मांस भी खा लेता है। जबकि कसाई की दुकान का मांस को मना किया गया है। 2 75 38 रामायण में मांस बेचने वाले को अपराधी कहा गया है। पापी कहा गया है। और मनुस्मृति में कसाय की दुकान से लाकर मांस खाने वाले को भी अपराधी कहा गया है। पापी कहा गया है। तो मेरे ख्याल से ये जो धर्म और अधर्म की जो व्यवस्था है वो आपको समझने में आई होगी कि छिपाने वाले भाव के ऊपर आधारित है। ठीक है? जी बिल्कुल।

⬜ Not used yet · 00:14:03:27 – 00:57:40:00 (43:36)

00:14:03:27 दूसरा प्रश्न हम ले लेते हैं। किरण जी बताएं। जी सुभान जी ये जो विश्व रूप दिखाया था भगवान ने वो साकार रूप था या फिर निराकार? क्योंकि कई लोग उस रूप को निराकार कह देते हैं। साकार साकार रूप था। जब रूप वहां पर आ गया तो साकार हो गया ना। हां बिल्कुल। और दूसरा प्रश्न यह है कि आजकल भाप के नाम पर लड्डू गोपाल को लेकर मतलब एक खेल चल रहा है कि मतलब कोई उन्हें ले जाकर एडमिशन करवा दे रहा है स्कूल में तो ऐसे ही तो मतलब अगर कोई कह दे कि मेरा भाव शिवजी के प्रति है और वो शिवलिंग के साथ ऐसा करने लगे तो क्या ये उचित है भाग के नाम पर? गलत है। देखिए जहां पर बहुत अच्छाई होती है वहां पर वहां पर कुछ ड्रॉबक्स भी आते हैं। हमारे भगवान का उपहास या हमारे भगवान की अवमानना क्यों हो पाती है? इसलिए हो पाती है क्योंकि वह सगुण साकार रूप में उपलब्ध है। आर्य समाजियों की क्यों नहीं हो पाती? या इस्लाम का जो ईश्वर है उसकी अवमानना क्यों नहीं हो पाती? इसलिए

00:15:19:10 नहीं हो पाती क्योंकि वहां पर ईश्वर का स्वरूप ही नहीं दिया गया है। स्वरूप प्राप्त ही नहीं है। व्यवहार करें तो किसके साथ करें? अगर हमें अपना द्वेष निकालना है तो हम व्यवहार किसके साथ करें? कैसे दिखाएं सामने वाले को? हम इसके साथ अपना द्वेष निकाल रहे हैं। तो यह कुछ प्रमाद हैं जो भक्ति के नाम पर प्रेम के नाम पर उत्पन्न हो रहे होते हैं। मगर जैसे कि आप देखो दिवाली पर जो लक्ष्मी गणेश की मूर्तियां आती हैं। कई बार आपने देखा होगा आपके घर के आसपास के मंदिरों में उनका अपमान होता है कि कहीं रखी है, नीचे रखी हैं। ठीक से उनका जो परवसान होना मूर्तियों का विग्रह जो होते हैं पहुंच नहीं पाते अपने गंतव्य तक क्योंकि व्यक्ति उस समय तो बड़े मन से लाके पूजा करता है मगर जब उनको गंतव्य तक पहुंचाना होता है बड़ा उसको उलझन होती है कि इसके साथ अंतिम समय तक बिल्कुल वही सदाचरण रखें जो हम लाते समय है ना हम तो क्या होता है कि हमारे भगवान की मूर्ति है इसलिए कोई उनका अपमान अपमान कर सकता है। हमारे भगवान का रूप है इसलिए कोई उनका अपमान कर

00:16:34:14 सकता है। मगर एट दी सेम टाइम आप देखो आर्य समाज जो है क्या वो अपना प्रचार अपने ईश्वर के नाम पर करता है? नहीं नहीं करता। जिनका ईश्वर भी निराकार है वो अपना प्रचार अपने निराकार ईश्वर के आधार पर नहीं कर सकते। इस्लाम भी नहीं करता। इस्लाम को भी मोहम्मद की आवश्यकता पड़ती है। आर्य समाज को दयानंद की आवश्यकता है ही नहीं इस्लाम का जो ईश्वर है वो तो निराकार है ही नहीं ना नहीं मैं एक बात जिसका स्वरूप हमें प्राप्त नहीं है मैं उसकी बात कर रहा हूं तो इस्लाम को अपने प्रचार के लिए किसकी आवश्यकता पड़ती है प्रचार किस नाम पे होता है शायद क्या कहते हैं रसूल कहते हैं रसूल हां रसूल हां तो प्रचार के लिए किसकी आवश्यकता पड़ी आपको एक सगुण साकार की आवश्यकता ही पड़ी। आप अपने धर्म का अपनी चीजों का प्रचार कर सकते हो। आपने कभी आर्य समाज को प्रसिद्ध होते हुए देखा है कि वो ईश्वर की बात कर रहा हो वो उसका प्रसिद्धि पा गया हो। वीडियो प्रसिद्धि खंडन से है। उसका जो वीडियो वायरल होगा वो

00:17:49:18 या तो एक खंडनात्मक चल रहा होगा। उससे होगा और या फिर वो अपने धर्म रक्षा और क्या कहते हैं? राष्ट्र रक्षा की पाखंड दिखा रहा होगा। उससे होगा। उसका कभी कोई वीडियो ऐसा वायरल होगा ही नहीं जिसमें वो ईश्वर की बात कर रहा हो और होगा भी तो अपवाद होगा। आप देखिए प्रेमानंद जी महाराज के और ईश्वर पर बात करने वाले हमारे कितने सारे वीडियो वायरल है। शंकराचार्य के प्रेमानंद जी के राघवाचार्य जी महाराज के है कि नहीं वायरल? तो ये प्लस पॉइंट है कि हमने अपने ईश्वर को व्यवहारिक स्वीकार किया। व्यवहार में आ सकने वाला स्वीकार किया तो ईश्वर से कनेक्टिविटी तो ईश्वर से जुड़ना समाज का यहां पर सुलभ है और साथ ही साथ कुछ ड्रॉबक्स हैं कि प्रमाद भी हो जाता है कि उनके साथ अपमान हो जाए द्वेष हो जाए द्वेष वश है ना मगर जहां पर वो व्यवहारिक रूप से उपलब्ध ही नहीं है ईश्वर तो वहां चलो मान लिया कि वो ईश्वर के नाम पे अपमान नहीं होता वहां पे उनके इस्लाम के अनुसार जो पैगंबर कहे जाते हैं उनका अपमान किया जाता है। भाई इस्लाम का अपमान करना होता है आज किसी को तो वो अल्लाह का अपमान करता है क्या? इस्लाम का जो

00:19:04:21 ईश्वर है उसका अपमान नहीं करता सामने वाला। किसका अपमान करेगा? हम और किसके अपमान से चोट पहुंचेगी? मैं कह रहा हूं आज जितनी सिंपैथी इस्लामिक समाज को मोहम्मद से है उतनी सिंपैथी क्या इस्लाम के ईश्वर से है? नहीं है। एक बार को इस्लाम के ईश्वर पर कोई उंगली उठा दे कोई दिक्कत नहीं है। मगर मोहम्मद के बारे में अगर गलत बात कही तो दिक्कत है। इसी प्रकार से आर्य समाज के ईश्वर पर कोई उंगली उठा दे कोई दिक्कत नहीं। निराकार है। उससे किसी का मन जुड़ा ही नहीं है। जुड़ा किससे है? दयानंद से। दयानंद जी से ही तो जुड़ा है। आर्य समाजियों का हृदय। इसी प्रकार से इस्लामिकों का जो हृदय है वो किससे जुड़ा है? जो जो उनके यहां पैगंबर कहे जाते हैं। अपने ईश्वर से आपका डायरेक्ट वो जो एक जैसे हमारा राम के साथ कृष्ण के साथ शिव के साथ जो हमारा हृदय जुड़ा हुआ है इनका जुड़ा हुआ है क्या? नहीं। क्योंकि वो व्यवहारिक रूप से प्राप्त ही नहीं है। व्यवहार के लिए तो वहां भी दयानंद और वहां भी मोहम्मद की आवश्यकता है। तो प्रेम किससे है? प्रेम ईश्वर से नहीं है। प्रेम वहां पर

00:20:20:00 ईश्वर के बारे में ईश्वर को निराकार बताने वाले से है। तो हमारे यहां क्या है कि हमारे यहां भगवान सगुण साकार स्वरूप में प्राप्त है। तो आप देखो कितने वीडियोस होंगे ईश्वर पर बात करने वाले जो उनकी व्याख्या कर रहे होंगे ईश्वर की वायरल होंगे। इनका कभी भी कोई वायरल होगा तो यही सब वायरल होता है। ईश्वर की बातों बातें वायरल नहीं है। वायरल प्रसिद्ध क्या मन मन मंत्र मुग्ध हो गए सुन के। आप देखो हमारे यहां कितनी सारी लीलाएं हैं। कितने सारी चीजें हैं जो सुनते ही व्यक्ति सुनते सुनते जुड़ जाता है। तो ये ड्रॉबक ये क्या कहते हैं हमारा वो है सनातन सिद्धांत अकाट्य और ये कुछ ड्रॉबैक होते हैं कि जब समाज में लागू किया जाता है तो है तो मध्यमास मैथुन के प्रकृति के साथ ही जन्मा है ना व्यक्ति भाई व्यक्ति फंसा तो इसीलिए है ना कि वो भगवान से दूर हुआ सत स्वरूप से दूर हुआ इसीलिए तो बंधन में है तो इसलिए ये वाली बाधाएं तो आएंगी वो किसी ना किसी तरह से भगवान से दूर दूर होने वाली बातें तो करेगा ही। उसी को मैनेज करना धर्म है। उसी प्रकृति को मैनेज कर लेना धर्म है। ठीक है करण जी बताएं। और

00:21:35:18 मेरा प्रश्न बाकी रह गया जी। अच्छा बताइए एक और बताइए। प्रश्न था कि केवल नाम जप के द्वारा ही आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है या फिर नाम जप हमें आत्मज्ञान की ओर आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है। नाम जप से जो भी आपको प्राप्त होना होगा वो होने लगेगा। जो आपके लिए अपेक्षित होगा नाम जप से यदि आपके जीवन में ज्ञान का अभाव होगा किसी किसी क्षेत्र में नहीं आत्म ज्ञान हां हां वो आत्मज्ञान भी नाम जप से आने लगेगा

00:22:10:14 भाई ज्ञान ज्ञान के ज्ञान के माध्यम से ही तो आत्मज्ञान भी आएगा जो भी चीजें अपेक्षित होती हैं भगवान की शरणागति में होने पर वो प्राप्त होने लगती तो नाम जप आप करेंगे तो जो भी आपके जीवन में आवश्यकता होगी जिस कारण से आपके अंदर आत्मज्ञान उद्भाषित होना है वो सब चीजें ऑटोमेटिकली होने लगी। अच्छा ठीक है। करण जी समस्त सदस्यों से अनुरोध है कि एक बार में एक ही प्रश्न पूछे सभी को पूछना होता है तो थोड़ा सा वो परेशानी होती है। आप उसके बाद अपना प्रश्न रख लीजिए तो एक एक करके पूछिए। नहीं नहीं शिवश भैया तो चले जाएंगे ना भाई। जी जी कोई बात नहीं जी बताइए करण जी जी भैया ये प्रश्न था कि जैसे गीता में अपन देखते हैं कि आत्मा अव्यक्त है अचिंत और सर्व्यापी अचल बताया गया है और परंतु गरुड़ पुराण आदि हम जब पढ़ते हैं घर में जब देखते हैं तो पढ़ने का मन करता है तो देखते हैं उसमें अनेक प्रकार के कष्ट मतलब जिस तरह से देखा जाता है कि सांप के द्वारा कटवा लिया जाता है उसके पाप आचरण के कारण बाद में जब जीवन खत्म हो जाता है तो आत्मा यहां पर विभिन्न प्रकार के कष्ट भोगता हुआ नजर आता है। सूक्ष्म

00:23:25:15 शरीर होता है। तो यह दोनों आत्मा की जो चर्चा होती है गीता में और वहां पे जो आत्मा की बात है सूक्ष्म शरीर होता है। कारण शरीर आत्मा जो है वो अव्यक्त है अचिंत है। निर्विकार है। सत स्वरूप स्वयं है। सूक्ष्म शरीर होता है। जैसे स्टेजेस आपने देखी हो वीडियो गेम वगैरह खेला हो कभी तो। डायमेंशन चेंज हो जाता है ना। जी यहां पर आप हैं। आप यह वाला संसार देख रहे हैं। जब यहां से आपका यहां से आप मुक्त हुए किसी अगली स्टेज में गए तो वहां के संसार के अनुसार वहां का शेष शरीर आपको प्राप्त होता है। जी हां यहां के शरीर से वो डिफरेंट होता है। जी ठीक है। जी

00:24:14:00 किरण जी के पास प्रश्न बहुत सारे होते हैं। किसी और का हो तो ठीक है। नहीं तो फिर किरण जी का पुनः ले ले सत्य सनातन जी बताएं जय श्री राम भैया जय श्री राम भैया मेरा प्रश्न ये था कि जैसे बलि में जब बलि चढ़ता है तो वह तो एक मां देवी मां का प्रसादी हो जाता है। तो अगर कोई देवी मां का प्रसादी किसी वैष्णव को दे खाने के लिए तो क्या वैष्णव उसे खा सकता है? अगर वह नहीं खाएगा मना करेगा तो देवी मां का प्रसादी का अपमान होगा और अगर खा अगर खा लेगा तो वैष्णव सिद्धांत का खंडन होगा तो क्या करना चाहिए उसे? अच्छा इसको छोड़ दीजिए। अगर यह बताइए कि उस दिन उसका व्रत हो तो फिर क्या होगा?

00:25:13:06 देवी मां का ही प्रसाद है और वैष्णव छोड़ दीजिए सा है और सा है उसको प्रसाद मिला है तो क्या कहते हैं ये उसको जो प्रसाद मिला है उसने नहीं खाया तो क्या होगा अपमान नहीं होगा या वह खा ले अपना व्रत उपवास बंद कर दे कहने का अर्थ यह है कि अगर हम नहीं उसको केवल सम्मान से हाथ भी जोड़ देंगे। है ना? और उसके प्रति अनास्था नहीं दिखाएंगे तो उसका अपमान नहीं माना जाएगा। और उसको जो क्या कहते हैं जो उसके लिए जो अनुगम में हो वो कार्य किया जाए अपेक्षित जो जिसके जो उसको ग्रहण कर सकता हो वह उसको ले ले। तो इसी प्रकार से ऐसा नहीं है। आप उसके प्रति अनास्था ना दिखाइए और

00:26:10:19 प्रणम में बुद्धि रखते हुए उसको अन्य किसी जो उसके लिए योग्य हो ग्रहण करने के लिए वो ग्रहण करवा दीजिए। उसमें कोई अपमान नहीं है। ठीक है। जी भैया हम और किसी का है क्या कोई प्रश्न? यज्ञदत्त जी, नरेंद्र जी, रितिक जी बोलिए किरण भैया एक और भैया एक और प्रश्न था हां एक मिनट अब किरण जी का ले बताइए किरण

00:26:48:19 जी शिवश जी एक ब्रह्म ज्ञानी जब ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर लेता है तब वो जान लेता है कि मैं ब्रह्म हूं और एक सगुण साकार ईश्वर भी ये जान रहा होता है कि मैं ब्रह्म हूं तो क्या एक सगुण साकार ईश्वर और ब्रह्म ज्ञानी में कोई अंतर होता है देखा जाए तो ब्रह्म ज्ञानी ही सगुण साकारी दो तरीके से है। एक आपको थ्योरिकली ये मालूम पड़ा कि ब्रह्म कौन है? उस तक कैसे की बात कर रहा हूं मैं। अपरोक्ष की बात कर रहा हूं। किसकी? प्रैक्टिकली जब जान लेते हैं जब वो प्रैक्टिकली वहां कैवल्य रहा वहां तो अद्वत अद्वैत हो गया। तो दो चीजें वर्णन आप कैसे कर रहे हैं? परिभाषित कैसे कर रहे हैं? दो चीजों का प्रेम गली में रोना समाए

00:27:36:16 नहीं मतलब जैसे परशुराम जी और भगवान श्री कृष्ण दोनों ही शगुन साकार ईश्वर थे और एक ही समय पर मौजूद थे तो दोनों में जैसे कोई भेद नहीं है तो ठीक उसी तरह एक ब्रह्म ज्ञानी और शगुन साकार ईश्वर में भी तो कोई भेद नहीं है तो आप दोनों की आइडेंटिटी अलग-अलग कर कैसे रहे हो तब तो भेद करोगे जब अस्तित्व दोनों का अलग-अलग बच गया है जब दोनों का अस्तित्व अलग-अलग अलग बच गया है तो ही तो आप वो उसमें ये करोगे कंपैरिजन नहीं मैं नहीं कर रहा मैं शरीर की दृष्टि से कह रहा हूं शरीर की दृष्टि से फिर उसको प्रैक्टिकली बोध नहीं हुआ फिर अगर उसको अपनी जब तक आपको अहंकार है जब तक आपको यह पता है कि मैं समथिंग हूं परमेश्वर से अलग मेरी कुछ आइडेंटिटी है तब तक आप मुक्त कहां

00:28:27:28 हुए और मैंने एक बार और बताई थी यह बात शायद पिछले वाले सेशन में बताई होगी कि इस वाला एक व्यक्तिक उससे एक दिन यही बात करते फोन पर फोन उसने मिलाया और बात करते वो वहां तक पहुंच गया कि भाई जब हम भगवान में भगवत स्वरूप हो जाएंगे या स्वरूप भूत हो जाएंगे भगवान के तो फिर हम हमने जो हमें जो लालसा थी जो हमारा सच्चिदानंद का भोग था वो हमने कहां भोगा फिर तो भगवान ही भोग रहे हैं हम कहां भोग रहे हैं तो हमने कहा यही तो है आपको भगवान से अलग हट के भोग करना है ना आपको आपकी आइडेंटिटी आइडेंटिटी से प्यार है ना हमें नहीं है किसकी भक्ति वो हुई आपको आपके अहम भाव से प्यार है तो जब तक कोई आइडेंटिटी शेष है तब तक उसको कैवल्य मुक्ति कैसे कह देंगे ठीक है भगवान से भिन्न कोई भी आइडेंटिटी जब तक है आइडेंटिटी अहम भाव है किसी का भी कि यह यह है तब तक उसे मुक्त कैसे कह दोगे और मुक्त हो गया तो भगवान से अलग कोई आइडेंटिटी नहीं जहां कंपैरिजन की कोई बात हो जाए हां यानी कि वशिष्ठ जी और राम जी में कोई भेद नहीं है

00:29:44:12 जब वशिष्ठ जी आप नाम ले रहे हैं तो फिर भेद हो गया ना नहीं ऐसे तो हम ये भी तो कहते हैं कि राम और कृष्ण में कोई अंतर नहीं है तो वहां पर मैं लीला के रूप में भेद की बात कर रहा हूं तो तो वहां पर भी तो अलग नाम ले रहे हो राम और कृष्ण में तो भेद नहीं है ना तत्व से तो किसी में भेद नहीं है जो जो सब है वही वो है मगर जब आप लीला के रूप में नाम ले रहे हैं तो वशिष्ठ जी और क्या कहते हैं राम जी में भेद है ना जब वशिष्ठ जी जब मुक्त हो गए तो वो कैवल्य को प्राप्त हो गए भगवान से अलग उनकी आईडेंटिटी उनको वशिष्ठ कहा ही क्यों जा रहा है यह सोचिए ना क्योंकि वो भगवान से अभी भिन्न है इसलिए उन्हें कहा जा रहा है राम और कृष्ण भगवान से भिन्न नहीं भगवान ही है। हम ठीक है। अच्छा हां ठीक है। ठीक है। और एक प्रश्न था कि गुरुदेव अभी मठ में होंगे? अभी नहीं अभी होशियारपुर में है। अच्छा करण जी बताएं। जी भैया यह प्रश्न था जैसे हमारे सनातन सिद्धांत है जैसे कर्म फल सिद्धांत है या फिर वर्ण व्यवस्था का सिद्धांत है और गोत्र प्रवर्तक हमारे ऋषि हैं तो

00:30:59:13 वो सिद्धांत वो सभी सिद्ध किए जा सकते हैं और वैज्ञानिक हैं। परंतु एक सिद्धांत पुनर्जन्म का सिद्धांत है। वो उसको आज के समय में कैसे समझे? हम जैसे यूथ किसको कैसे उसको रिलेट करें? पुनर्जन्म का सिद्धांत बहुत सारे तरीके हैं। देखिए सारी बातें हम अपनी केवल एक बात से ही सिद्ध कर सकते हैं। केवल एक बात से तुम्हारे अंदर सच्चिद आनंद हो जाने की चाह क्यों आ रही है? जब साइंस ने अभी तक प्रूफ नहीं किया है कि सच्चिद आनंद हो सकते हो। बस इसी से सब कुछ सिद्ध हो जाएगा। जब भगवान सच्चिद आनंद है तो किसी को दुख में क्यों प्रकट कर रहा है? जी जब वह सब कुछ जानता है तो क्या लकी ड्र्रा निकालता है क्या किसी को जन्म देते समय मैं लकी ड्रॉ निकाल रहा हूं तुम ये बन जाओ ऐसा तो है नहीं जी वो जानता है कि उसे किसको क्या बनाना है जी हम तो फिर आधार क्या होगा उसका जब हम सच्चिदानंद के कांसेप्ट को पकड़ लेंगे फिर

00:32:14:14 हमारे अंदर चाह है सच्चिदानंद की तो सिद्ध होगा क्या कि ईश्वर है सच्चिदानंद स्वरूप जब सच्चिदानंद स्वरूप है तो भविष्य को जानने वाला भी होगा जी तो क्या वो बिना यूं ही किसी को भी कुछ भी बना देगा किसी को भी दुख रूपी वो दे देगा नहीं जी हम किसी को हीन जीवन और किसी को श्रेष्ठ जीवन दे देगा तो इसका कारण होगा कुछ ना कुछ ना तो भगवान के सर्वशक्तिमत्ता को सिद्ध करने के लिए पूरा धर्म सिद्ध हो जाएगा पूरा सनातन धर्म सिद्ध सिद्ध हो जाएगा भगवान की सर्वशक्तिमत्ता को सिद्ध करने और भगवान की सर्वशक्तिमत्ता सिद्ध कहां से होगी? व्यक्ति के अंदर जो सच्चिदानंद की प्राप्ति की चाह है उससे सिंपल। जी लेकिन ऐसा प्रश्न था ना कि जैसे हम सनातन कुल में जन्म लिए हिंदू धर्म में और सवर्ण जाति में या फिर अन्य जाति में भी अगर जन्म लिए होते तो उसके कारण से चर्चा होने लगी तो हमारा भाव जुड़ता गया। परंतु फिर आगे अपन देखते हैं कि इस तरह के सिद्धांत आते हैं। तो वर्तमान में विज्ञान के परिपेक्ष में कैसे इसको समझे कि इस तरह से मृत्यु होती है। फिर पुनः दूसरे के शरीर में जाते हैं। तो इस प्रकार कैसे इसको समझे?

00:33:29:15 ऐसा था प्रश्न। दृष्टिकोण से अभी तक हमने तो जानकारी की नहीं है। पुनर्जन्म को सिद्ध करने की बात है तो उसको सिद्ध कर लेंगे। मगर अभी यह वाली जानकारी हमने नहीं की है या संभवत मैं आपका प्रश्न नहीं समझ पा रहा हूं। यह भी बात अब पुनर्जन्म की बात तो यहीं से हो गई कि जो मैटर के लिए कहा जाता है क्या कहा जाता है? कोई बताएगा? जी। कहा जाता है जैसे नाइदर वी क्रिएट नर बी डिस्ट्रॉयड। हां। तो जब जो हमारी आत्मा है वह ना मरती मतलब ना क्रिएट होती है ना मारी जाती है ना तो साइंस से आलंबन ले ही सकते हैं ना जी बिल्कुल इसी प्रकार नैनती नैन दति पावक तो फिर हमें ये मानना पड़ेगा कि इससे पहले भी हमारी आत्मा थी इस भाई आज जो इस शरीर में हम व्याप्त है इससे पहले भी थी जी तो थी तो फिर पुनर्जन्म सिद्ध हो गया ना जी इस प्रकार से हो जाता है। मैं बाकी मैं आपका संभवत प्रश्न समझ ना पा रहा हूं। एक्सैक्ट नहीं आप समझ रहे हैं यही था कि इस प्रकार के समझाना

00:34:44:26 हो किसी को तो कैसे समझाएं? हां तो विज्ञान का ये वाला उदाहरण ले सकते हैं कि भाई जो एनर्जी है वो नष्ट नहीं हो रही है ना मैटर। जी रूप बदल रहा है वो। जी तो यही तो हमारे भगवत गीता में कहा गया ना दो 15 17 से लेकर के दो 31 तक भगवान ने यही समझाया है जी कि आत्मा जो है वो ना मरती है ना जन्मती है अजन्मी वो केवल अपने कपू जिस तरह से पुराने वस्त्र बदलकर नए वस्त्र पहन लेता है कोई उसी प्रकार से आत्मा जो है नए वस्त्र पहन लेती है नया शरीर धारण कर लेती है तो फिर ये पुनर्जन्म तो सिद्ध हो गया यहां से बाकी जो पुनर्जन्म को हार्ड कोर तरीके से सिद्ध करना है तो सारे

00:35:35:08 सारे समस्याओं की एक दवा ईश्वर कौन है? सर्वशक्तिमान। इसके पीछे आप पड़ जाओ। सारी चीजें सिद्ध हो जाएंगी। सारे सनातन सिद्धांत जितने भी जिस पर भी कोई उंगली उठा सकता है, जिस पर भी विवाद कर सकता है, वह सब कुछ सिद्ध हो जाएगा। ईश्वर को सर्वशक्तिमान कहने के पीछे आप पड़ जाइए। जैसे हमारे समाज से यह थोड़ी ना कहेंगे कि आप जो है अपना वो बदल दो सिद्धांत। वो आप आर्य समाज को बंद कर दो। नहीं आर्य समाज चलता रहेगा। आर्य समाज मंदिर चलते रहेंगे। ईश्वर की वह व्याख्या आप समाज को दीजिए जिसमें कि ईश्वर सर्वशक्तिमान हो जिसके कारण कोई दिव्य दिव्य कीर्ति द्वारा जन्म ना ले जो कि आपके आर्य समाज से जन्म लेता है नास्तिक हम जी कई ऐसे मित्र भी नजर आ जाते हैं आर्य समाज या फिर इस से जुड़े हुए तो उनसे भी समय-समय पर चर्चा होती है। हां विकास विकास दिव्य कीर्ति जो है नाश्ते के बताते हैं। मैं आर्य समाज फैमिली से आता हूं। आर्य समाज से तो आना निश्चित है ना ऐसे प्रोडक्ट्स का। जी

00:36:46:04 अब किरण जी आप हाथ नीचे कर लें। मेरे ख्याल से एक घंटा हो चुका होगा हम लोगों को। तो हैदर जी आपके कुछ और अन्य प्रश्न है या हमें लगता था बहुत सारे प्रश्न लेके आएंगे आप। बताइए। मुझे यह पूछना था आपने अभी थोड़ी देर पहले एक सवाल का जवाब में यह कहा था कि मरने के बाद सूक्ष्म शरीर की आपने कुछ तो भी बात कही थी तो मेरे को शरीर के बारे में जानना था कि ये जो शरीर है इस शरीर को क्या कहते हैं क्योंकि अगर मान लीजिए मर गया तो फिर स्थूल शरीर स्थूल ठीक है तो मरने के बाद जो शरीर जाता है उसको सूक्ष्म शरीर कहते हैं। देखिए एक स्टेज बदल जाती है आपकी जो एक और लोक इसके अलावा जो लोक है ना जहां पर आपका निर्णय होता है कि आप वहां से आगे सद्गति में जाएंगे या वापस यहां पर आएंगे तो उनका भ्रमण आपका होता है तो एक तरीके से जैसे हमारी डायमेंशंस चेंज हो जाती है। हम तो उस शरीर की व्याख्या जो है वो काफी सारी बताई गई है। परंतु वह ऐसा तो है नहीं कि मुक्ति हो जाती है या अपने सत स्वरूप में आ जाता है

00:38:01:22 जीव तो वह सूक्ष्म शरीर के साथ वहां पर रहता है उसका निर्धारण होता है वहां का भी कि आपके ये होना है वो होना है तो वो सारी जो हमारी जो कथाएं हैं जो हमारे ग्रंथों में है तो उन लोकों की भी कथाएं हैं ना जहां पर जीव इस रूप में रहता है सूक्ष्म शरीर के रूप जी जी जी जी ठीक है अच्छा एक और पूछना था पूछ लूं पूछ लीजिए पूछ लीजिए जी अच्छा जो हम मोक्ष के लिए करते हैं तो वो कौन सा शरीर को मिलता है मोक्ष में मिलता है या वो क्या कहते हैं जैसे कि ये शरीर है यहां कारण शरीर मिलता है कारण अच्छा वो एक और शरीर होता है मतलब देखिए मुझसे वस्तुनिष्ठ गलतियां हो सकती हैं सैद्धांतिक मैं आपको बता दूंगा वर्बबली वो एग्जैक्ट उसका नाम या जो संज्ञाएं जो होती हैं उसमें थोड़ा सा मुझे बिल्कुल वो नहीं रहता है वर्बबली याद नहीं रहता है मगर सिद्धांत मैं आपको बता सकता हूं कारण शरीर होता है और कारण शरीर भी वही होता है जो उसका फिर वो नित्य हो गया और तत स्वरूप सच्चिदानंद

00:39:16:24 स्वरूप प्राप्त होता है मोक्ष में है ना अच्छा हम तो मतलब उस शरीर शरीर को मोक्ष प्राप्त के लिए कि हमें इन दोनों शरीरों की जरूरत पड़ती ही है। नहीं आप यहां डायरेक्ट इतनी भक्ति कर सकते हैं। इतनी भक्ति कर सकते हैं कि यहां से सीधे आपको मोक्ष मिल जाए। अच्छा मतलब भक्ति जो है मतलब मोक्ष का जो एक वो है रास्ता वो भक्ति ही है।

00:39:49:24 देखिए जैसे कोई व्यक्ति बॉडी बिल्डिंग करता है। जी है ना जी बॉडी बिल्डिंग करने वाला व्यक्ति से कहे कि भाई तुम एक्सरसाइज करो अच्छी बॉडी बन जाएगी सामने वाला कहे इसका मतलब क्या बॉडी बिल्डिंग ही एक ही रास्ता है नहीं आपको किचन में भी ध्यान देना पड़ेगा हां जी बिल्कुल आपको आपका जो रात का सोना है सुबह का उठना है उस पर भी ध्यान देना पड़ेगा हम जी बिल्कुल वो क्या कहते हैं ईट ईट वो तो ट्रेन ईट रेस्ट ट्रेन नीट रेस्ट तीनों पे ध्यान देना पड़ेगा ना इसी प्रकार से भक्ति कर्म और ज्ञान तो आप ऐसा नहीं कह सकते कि यही एक रास्ता है। बात ये है कि जब आप भक्ति करते हैं तो आपको कर्म और ज्ञान मिल जाता है। जब आप कर्म करते हैं तो आपको भक्ति ज्ञान मिल जाता है। भक्ति से सब कुछ मिल जाना बिल्कुल सुलभ हो जाता है। इतना आप कह सकते हैं। मगर ऐसा अब जैसे भक्ति कर रहा है व्यक्ति आपको अपने व्यक्तिगत अनुभव बताओ कि जब हम दिन भर में कि हमको इतनी जप करना है इतना वो करना है

00:41:04:28 हम जब इसमें हमारा चिंतन मनन चलने लगता है और एक अच्छा सा अमाउंट में हमें टारगेट है कि हमें इतना करके ही सोना है भगवान के नाम का जप ठीक है तो दिन भर मन में एक सबकॉन्शियसली एक चिंता चलती रहती मन में चिंतन मनन वो पूरा करना है। वो पूरा करना है। वो पूरा करना है। इसके कारण क्या होता है? प्रपंच रूपी संसार की भौतिक जो चीजें हैं उनके प्रति आसक्ति कम आती है। यहां पर गीता के दो सिद्धांत कि एक में भगवान ने कहा कि तू एक क्षण के लिए भी बिना कोई कर्म किए नहीं रह सकता। इसलिए तू लगातार शास्त्र सम्मत कर्म करता रहे। नहीं करेगा खाली होगा तो तुझसे अधर्म होगा। अगर तू शास्त्र सम्मत कर्मों में लिप्त नहीं होगा तो तू कर्म क्योंकि होगा ही तो तू वहां पर क्या होगा? पापी पाप में लिप्त हो जाएगा। शास्त्र विरुद्ध चीज है। पाप हो जाएंगे। तो जब व्यक्ति चिंतन मनन नहीं करेगा तो चिंतन मनन तो करेगा। भगवान का चिंतन मनन नहीं करेगा तो किसी ना किसी की चीज

00:42:20:00 का तो करेगा तो करेगा तो फिर वहां पर क्या होगा जब फिर वहां दूसरी चीज भगवत गीता में कहा गया कि जब हम विषयों का चिंतन करते हैं तो उन उस चिंतन के कारण उसके प्रति आसक्ति आती है जी और आसक्ति के पूर्ति ना होने पर क्रोध आता है क्रोध आने पर व्यक्ति के अंदर मूर्खता आती है। मूर्खता आने पर व्यक्ति के अंदर जो उसकी स्मरण शक्ति होती है, स्मृति भ्रम वो आता है जो अभी हमने शुरू में बात की। है ना? जी बिल्कुल। तो इन दोनों चीजों को आप देखिए कि जब मेरे को यह मालूम है कि मुझे इतनी बार भगवान के नाम का जप करना है टारगेटेड मैं ले चल रहा हूं तो मेरे अंदर पूरे दिन एक सारी सारे विधि विधान जो ऐसे कर्म है जो सुनिश्चित है जिनका करना उनसे इत मेरे मन में एक भाव सदैव चलता रहेगा जब तक वो पूरा नहीं हो जाएगा और अगर पूरा हो भी गया तो वो इतना इतना अमाउंट है कि उसकी गूंज रहेगी मन में राम राम राम राम राम राम हर बात में राम आ जाएंगे। किसी से भी बात कर रहेगे तो राम आ जाएंगे। क्यों? क्योंकि राम का चिंतन

00:43:35:01 चल रहा है। तो इस कारण से आप बचोगे। सड़क पर चलते टाइम समोसे बन रहे हैं या केएफसी का वो है तो ये आपके इनके चिंतन से आप बचोगे। क्यों बचे? क्योंकि आपने राम का चिंतन किया। राम की भक्ति की। तो आप सड़क में चलते समय वह उधर से कन्या जा रही है, कोई स्त्री जा रही है। तो क्या हुआ? भक्ति के कारण आपके कर्म सुधरे कि नहीं सुधरे? बिल्कुल। भक्ति करने से आपका चिंतन सही जगह पर हुआ तो आपने इन चीजों का चिंतन जो आपको गलत रास्तों पर ले जा सकता है। लोग कहते कम्युनिस्ट विचार वाले कहते हैं कि मैं एक घंटे भक्ति करने से बेहतर समझता हूं कि मैं जाकर के वो करूं, गरीबों को खाना खिलाऊं। हो सकता है कि तुम एक दिन खिला भी दो मगर उसमें तुम्हारी सस्टेनेबिलिटी नहीं आएगी। सस्टेंड चीज नहीं होगी वो क्योंकि तुम्हारे अंदर चिंतन

00:44:36:22 चलेगा। भौतिक वादिता का चिंतन तुम्हारे अंदर सदैव चलता रहेगा। जब तक उस चिंतन को तुम फिक्स नहीं करोगे कि मेरे अंदर चिंतन किस चीज का चलना चाहिए। तब तक तुम्हारे अंदर आसक्ति किसी ना किसी रूप से आएगी और वो तुम्हें प्रभावित करेगी। वो तुम्हारे कर्म बिगाड़ेगी। चिंतन किसका चले? जिसका हम नाम खूब चिल्ला रहे हैं, उसी का चिंतन चलने लगेगा। उसी की लीलाएं हम पढ़ने लगेंगे। उसी की बातें हम करने लगेंगे। इसीलिए हमारे यहां कहा गया रामचरितमानस पढ़ो। क्यों? पढ़ने को क्यों कहा जाता है? जब भगवान के बारे में पढ़ोगे तो आपके अंदर क्या आएगा? उस उन्हीं का चिंतन मनन चलता रहेगा। या राम आप देखो आपने कोई उदाहरण के लिए देख लो कि आपने कोई कभी कोई फिल्म देखी हो तो आप बाहर निकलते हैं तो काफी देर तक वो मूवी जो है आपके मस्तिष्क में चलते रहते हैं उसके सीन तो भगवान का जब चरित्र हम पढ़ते हैं तो कहां तो वो तुच्छ सी तुच्छ सा चलचरित्र भगवान का महान चरित्र तो जब हम रामचरित्र पढ़ते हैं भगवान कृष्ण का लीलाएं पढ़ते हैं तो फिर वहां उसका चिंतन चलता है जो सत वो है सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर उसका चिंतन चलता है और उसके चिंतन के कारण यह जो माया रूपी संसार का चिंतन है बंद हो

00:45:51:25 जाता है। हम वही चिंतन करते रहते हैं। तो भक्ति से हमारे कर्म भी सुधरते हैं। और जब हमारे कर्म सुधरते हैं तो देखिए ज्ञान कैसे आता है। भक्ति की तो हमारे कर्म सुधरे। कर्म सुधरे तो हमारे जीवन में छिपाने वाले काम कम होते गए। ठीक है? जैसे एक आपको एग्जांपल मैं बताऊं। कई बार एक सर्किल होता है चौराहे पर तो हम लोग क्या करते हैं? जल्दी के कारण इधर से ही मतलब उससे घूम के जाना होता है तो हम उधर से घूम के ना जाकर के अगर देख रहे हैं कि पुलिस वुलिस वाले नहीं है तो हम इधर से ही चले जाते हैं। राइट साइड से रॉन्ग तरीके से चले जाते हैं। चले जाते हैं ना? तो अब यहां पे क्या हुआ? पहली बात तो वो जो सिद्धांत था छिपाना और ना छिपाना। आपने जब चौराहे के उस तरफ से नहीं गए और इधर से चले गए तो आपके आपके उसको प्रज्ञा शक्ति को एक छोटी सी चोट पहुंची। आपने छिपाया छिपाया ना? दूसरी बात क्या है कि जब आप भगवान के नाम का जप कर रहे होते हैं। उनका चिंतन कर रहे होते हैं तो आपकी आसक्ति नहीं होती कि मैं जो है जो है भौतिक वादिता किसी चीज को जल्दी प्राप्त करने के लिए इधर से ही चला जाऊं। आप बड़े आराम से उधर से जाते हो। आपके अंदर सहनशीलता

00:47:06:26 होती है। आपके अंदर त्याग आ जाता है। यह हम लोग जो जितना भी त्याग देख रहे हैं महापुरुषों के द्वारा ये ऐसे ही नहीं आया है। क्योंकि वो चिंतन कर रहे हैं भगवान का इसलिए वो त्याग उनके अंदर आया। है ना? तो ये हमारे कर्म सुधरते हैं। और जब हमारे कर्म सुधरते हैं तो धीरे-धीरे जब कर्म सुधरे तो क्या हुआ? कि जो हमारी प्रज्ञा शक्ति योग्य नहीं थी चीजों को समझने के लिए चीजों को ग्रहण करने के लिए वह योग्य होने लगी विचार और श्रेष्ठ होने लगा चिंतन और श्रेष्ठ होने लगा मनन और श्रेष्ठ होने लगा तो और ज्यादा सिंपलीफाई करके हमने चीजों को समझना शुरू किया है ना तो इस तरह से भक्ति के कारण आपको सब कुछ स्वतः मिलने लगता है। इसीलिए भगवान ने कहा 9:2 में तू मेरी शरण में आ जा। तेरी प्राप्ति की रक्षा और अप्राप्ति की चिंता मैं करूंगा। ठीक है। चलिए आज का समय हो गया। एक अंतिम प्रश्न ले लेते हैं करण दास जी का। बताइए करण दास जी।

00:48:18:24 जी भैया वही प्रश्न यह था कि जैसे आपने बताया ना आर्य समाज और इस के संस्थान वो ब्राह्मण दीक्षा नामक एक कार्य कराते हैं तो उसमें जैसे हमारा तो पहले से ही जैसे जनेऊ संस्कार हो ही गया है तो वो आए थे एक बार अपने ही दोस्तों के माध्यम से जने संस्कार कराइए तो उनको यज्ञ में बैठा देने के लिए जनेऊ का जो है हालमल लिया जाता है कि आप पहन लीजिए और इसको कभी उतारिएगा नहीं तो ना उनका गोत्र ना कुछ उनकी परंपरा से उनको कुछ प्राप्त नहीं होता तो फिर भी वो जने धारित तो सर्वाधिक वर्जित होना चाहिए परंतु ऐसे कर दे तो क्या इसका कोई उनका विधान है उचित है क्या कैसे उचित है आपको तो मालूम होना चाहिए जब आप यहां तक आ गए हो तो उनकी चीजों का तो विरोध है ही ना उचित कैसे मान लिया जाएगा

00:49:12:08 उसे तो अपने मनमाने तरीके से करते हैं ब्राह्मण दीक्षा क्या है क्यों क्षत्रिय दीक्षा क्यों नहीं देते हो? क्यों नहीं देते क्षत्रिय दीक्षा? जी ब्राह्मण दीक्षा वाले जो हैं इस के जो अंग्रेज हैं कभी-कभी इनको पकड़ लिया करो। इनसे पूछा करो जरा एक वो जनेऊ बदलने वाला मंत्र सुनाओ जरा। जी पता चल जाएगा कितने बड़े वो ब्राह्मण दीक्षा प्राप्त किए हैं। जी। हो सकता है संकल्प का मंत्र ना आता हो। जने बदलने वाले मंत्र की तो बात दूर है। जी हम जी भाई जो जनेऊ धारण कर रहा है कम से कम कुछ एक दो शब्द तो उसे माल चलो मैं कह रहा हूं स्मृति भ्रम हो गया वो ग्रंथ में पढ़ के जो है वो करता है एक दो शब्द तो उसे याद होना चाहिए ब्राह्मण दीक्षा ले चल रहा है तो जी उस मंत्र का यज्ञ पवित्र परम पवित्र है हमारा हां वही नहीं बता पाएगा वो और जितने लोग बहस करने आते हैं इस के नाम पहले तो उनसे ये पूछो कि तुम्हारी ब्राह्मण दीक्षा हो गई कि नहीं जने दिखा आधे तो ऐसे होंगे जो वेद वेद को वहां पर प्रमाण

00:50:27:10 के रूप में उपयोग में ला रहे होंगे उपनिषदों को ला रहे होंगे पढ़ा रहे होंगे हम बहुत बड़े वो हैं तुर्रम खान जी मगर उनसे पूछो कि जनेऊ दिखाओ तो जनेऊ नहीं दिखा पाएंगे ठीक है उनसे यही कहा जाए कि मतलब ये शास्त्री इस प्रकार से नहीं है तो इसको त्यागना ही उचित रहेगा उनके और उनका जो अपने परिवार की परंपरा है उस हिसाब से उनको चलना चाहिए। अरे बहुत कुछ कह सकते हैं वह तो फिर बहुत सारी बातें हैं कहने को तो जो आपको उचित लगे जो सबसे सरल और साधारण तरीके से समझ में आ जाने वाली बात है वो यह है कि भाई जिन सिद्धांतों के द्वारा तुम सोच रहे हो कि तुम धर्म का पालन कर रहे हो वह सिद्धांत जीव की चाह का जो मुख्य विषय है मूल विषय सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर और परम स्वतंत्र मोक्ष वह नहीं देता। देख लो बाधित ईश्वर है, बाधित मोक्ष है और परिवर्तनशील धर्म है। शाश्वत धर्म नहीं है। तो

00:51:43:01 जो भी अपने आप को दुनिया में तीन चीजें देने वाला कहने लगे सिर्फ कहे नहीं। जो जिनकी व्याख्या भी उनके कथनी के अनुसार हो। वह सनातनी हो गया। वो चाहे भले ही अपने आप को सनातन का कोई अमुक अंग कहे। आर्य समाज ही कहते रहो अपने आप। ईश्वर को सर्वशक्तिमान कहो। मोक्ष परम स्वतंत्र दो और धर्म शाश्वत दो। बस जी बिल्कुल। सब कुछ सही हो जाएगा। ठीक है। चलिए फिर चलिए। ठीक है। ठीक है। फिर सभी भैया। जी। भैया आप क्लास से लेंगे भैया। हां पहले क्लास बस एक दो हफ्ते बाद से हम लोग लेने लगे तो ये क्या कहते हैं अगली बार हम लोग जो है अगली बार हम टीम बनाएंगे अगले हफ्ते और साकार और निराकार वाले पे डिबेट होगी। ठीक है? तो अभी ऑप्शन दे दिए जाएंगे उसमें। मतलब डिबेट मतलब क्या? डिबेट मतलब कैसा साकार निराकार एक पक्ष निराकार की ओर से होगा और एक पक्ष साकार

00:52:58:09 की ओर से होगा ठीक है मैं भी रहूंगा मैं भी रहूंगा उसमें हां हां एक पक्ष में आप भी रहेंगे आपको निराकार की तरफ डाल देंगे ठीक है मतलब ईश्वर का प्राप्तव्य वाला स्वरूप तो निराकार ही है ठीक है ठीक है आप उसके लिए करिएगा हां हां आप निराकार की ओर से वो करिएगा। साकार और निराकार पर डिबेट करेंगे। तो आप जो है इसमें ऑप्शन डाल दीजिएगा प्रथम जी ग्रुप में कि साकार की टीम में कौन-कौन होना चाहता है? निराकार की टीम की ओर से कौन रखना चाहता है मेरा अपना पक्ष। ठीक है? जी भैया बिल्कुल। वैसे सब लोग मुझे लगता है साकार की ओर से ही करना चाहेंगे। मगर रुझान देखने के अनुसार आप टीम बांट दीजिएगा या फिर अपने हिसाब से टीम बांट देंगे हम लोग। ठीक है? जी जी भैया लेकिन साकार और निराकार ईश्वर ये दोनों तो एक ही मतलब एक ही ब्रह्म के जो दो रूप है तो फिर इसमें डिबेट मतलब कैसा मतलब इसका डिबेट है क्या होगा डिबेट ये है एक पक्ष होगा जो यह कहेगा कि ईश्वर साकार नहीं है ना ही हो सकता है या फिर साकार

00:54:13:18 ईश्वर की कोई उपयोगिता नहीं है और एक पक्ष होगा जो साकार ईश्वर की साकार ईश्वर उपयोगी है। ईश्वर साकार भी है और क्या कहते हैं? ईश्वर साकार सगुण साकार स्वरूप लेता है। ले सकता है। ये सब एक पक्ष होगा जो यह कहेगा कि वो नहीं हो सकता। साकार और एक पक्ष होगा जो यह कहेगा वो साकार हो सकता है। एक पक्ष होगा जो कहेगा सगुण साकार की कोई आवश्यकता नहीं है। एक पक्ष होगा जो कहेगा आवश्यकता है। यह तो भैया पूरा आर्य समाज वाला जैसा होता है ना हां हां तो वही समझ वही समझ गई पूरे आर्य समाज बन जाइए इस्लामिक बन जाइए खंडन करिए ईश्वर के अवतार का ये बात ठीक है और जो पक्ष हार रहा होगा उसकी तरफ से तर्क मैं करूंगा क्वेश्चन मैं करूंगा उसकी तरफ से ठीक है कोई दिक्कत ठीक है भैया नहीं भैया ये तो बहुत बढ़िया है नहीं शिव जी मतलब मैं अपना पक्ष थोड़ा सा रख सकता हूं। अभी बताइए आप कह दीजिएगा कि मैं साकार से तरफ मतलब साकार वाला हूं या फिर निराकार वाला देखिए मैं साकार ईश्वर

00:55:28:21 का खंडन नहीं करता ना ही अवतार का खंडन करता। अरे भाई नहीं नहीं नहीं नहीं आपने गलत समझ लिया किरण जी मैंने आपको निराकार की ओर इसलिए रखा क्योंकि निराकार का पक्ष कमजोर है जग जाहिर बात है तो मैंने कहा कि उस और एक एक जो है वैसा व्यक्ति होना चाहिए सॉलिड इसलिए मैंने आपको वो दिया भाई जो मैं मैं बस ये कहता हूं कि साकार ईश्वर व्यवहार में है लेकिन सुनिए तो निराकार किरण जी सुनिए मैं आपको निराकार प्रकार का पक्षकार नहीं कह रहा हूं। मैंने आपको क्योंकि आप एक सशक्त व्यक्ति हैं इसलिए आपको कमजोर टीम में डाला कि उसको थोड़ा वो रहे बल रहे आपके कारण। नहीं नहीं आपकी कृपा है। ठीक है ना? मैं तो सत्य नहीं हूं।

00:56:19:18 चलिए ठीक है। श्री राम जय राम जय जय राम। श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम

00:57:12:00 नारायण समारंभाम नारायण शंकराचार्य मध्यमाम शंकराचार्य मध्यमाम अस्मदाचार्य परतामदाचार्य परम वंदे गुरु परंपरा वंदे गुरु परंपरा सभी को जय श्री राम जय श्री राम हर हर माता हर हर महादेव

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B: SARVASHAKTIMAAN DHARMA Video 57:49 · 04 Jun 2025

आह्वान कक्षाएं : प्रश्नोत्तरी सत्र Part-1 भाग 2

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A · Live शैतान ने Rampal Das के अंदर प्रवेश कर गीता का किया गलत अनुवाद #rampal...
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