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00:00:02:12 हां जब एक ही परम तत्व पांच अलग रूपों में प्रकट होते हैं। ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती और गणेश तब वो क्या कहते हैं? विष्णु रूप को श्रेष्ठ रखते हुए ब्रह्मा जी को नीचे शिव जी को दासत्व भाव में दिखाते हैं। ठीक है? और किसी कल्प में क्या कहते हैं? दुर्गा माता को शिव जी को या ब्रह्मा जी को श्रेष्ठ रखते हुए और अन्य को दासत्व भाव में दिखाते हैं। दिखाया जाता है। अब इसका कारण क्या है? एक तो एक तो ईश्वर की अपनी मर्जी वो कब किस कल्प में अपने किस रूप को परम दिखाए। दूसरी बात ये है कि अन्यों की भक्ति वहां पर इसलिए गौ की जाती है कि जिसका जिस वहां पर वो जो बात कही जा रही है ना कि जो जो ये वाली भक्ति है वो आपके लिए मोक्ष नहीं दे पाएगी या ऐसा है वैसा है वो इस रूप में दी जा रही है वो बात कि अनन्यता की रक्षा हो सके। अनता की रक्षा क्या होती है? कि जैसे मेरी मां से अच्छी मां दुनिया में कोई नहीं है। कोई व्यक्ति जब ये बात कहता है तो इसका अर्थ ये नहीं होता है कि दुनिया की सारी माएं खराब है। ठीक है? उसका अर्थ अपनी मां में
00:01:17:25 सब कुछ अपनी मां में ही ध्यान देने का उसका भाव होता है। इस भाव को ही प्रकट किया जाता है जब किसी एक तत्व को श्रेष्ठ और अन्य तत्वों को वहां पर पीछे किया जाता है। तो जब भी आप ये बात कहते हैं कि ब्रह्मा जी के लिए ऐसा क्यों कहा गया है? या शिव जी के लिए ऐसा क्यों कहा गया है? उसी ग्रंथ में किसी इन पांचो तत्वों में से किसी एक तत्व को वहां पर परम कहा जा रहा होगा कि नहीं ये आप बताओ। हां उस दिन तुम्हारा प्रमाण सही हो जाएगा जब एक ही ग्रंथ में एक ही उसमें पांचो तत्वों को मना कर दिया जाए कि नहीं उनमें से ही किसी एक को परम और बाकी के चार को ये कहा जा रहा होता है कि नहीं नहीं इनकी भक्ति से कुछ नहीं मिलेगा वही परम है ठीक है पांचो के पांचो तत्वों को पीछे कर दिया जाए एक साथ एक ही ग्रंथ में ऐसा कोई प्रमाण आपके पास नहीं है आपके पास कैसा प्रमाण है सुनो आपके पास कैसा प्रमाण है कि जब दुर्गा जी को श्रेष्ठ दिखाया जा रहा है तो ब्रह्मा विष्णु महेश को दासत्व भाव में दिखाया जा रहा है। तो ब्रह्मा जी विष्णु महेश के दासत्व को निकालने के लिए आप दुर्गा पुराण लाओगे भगवती पुराण लाओगे उसके बाद जब दुर्गा माता को श्रेष्ठ जब दुर्गा माता की परबह्मता की बात आएगी तो
00:02:33:08 दुर्गा माता को विष्णु पुराण में शिव पुराण में दासत्व भाव में दिखाया जाएगा वहां विष्णु और शिव को श्रेष्ठ बताया जाएगा तो दुर्गा माता का जो परम ब्रह्म वाला रूप है उसको नष्ट करने के लिए आप विष्णु पुराण और शिव पुराण को लाओगे तो इसको कहते हैं सेलेक्टिव पॉलिटिक्स कि आप इसका अर्थ हुआ जहां से आपने भगवती पुराण के केवल उस अंश को माना जिसमें ब्रह्मा विष्णु महेश का दासत्व भाव सिद्ध हो रहा है। मगर भगवती पुराण के उस अंश को नहीं माना जिसमें कृष्ण को परमेश्वर जिसमें दुर्गा माता को परमेश्वर परम ब्रह्म कहा जा रहा है। तो उसकी एकाग्रता भंग होगी। मैंने बताया ना कि अनन्यता के भाव की रक्षा के लिए इस तरीके की लीला में विष्णु भगवान के जो कारण वो जो कार्य भेद उपादिक धरातल पर जो देवता के रूप में जो वो लोग होते हैं वहां पर उनको पीछे कर दिया जाता है परम तत्व के रूप में उनहीं पांचो में से किसी एक तत्व को आगे किया जाता है तो गायत्री
00:03:37:16 के वही तो पूछ रहा हूँ जिस भी वो बात सच थी ना ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती और गणेश एक है ब्रह्मा विष्णु महेश भवती और गणेश एक है तो गायत्री के रूप में जो मोक्ष प्राप्त हो रहा है वो विष्णु से भी हो रहा है वो ब्रह्मा से भी हो रहा है आपको कोई ऐसा प्रमाण देना चाहिए जहां पर एक साथ इन पांचो तत्व में से सबकी भक्ति को मना कर दिया जाए और किसी अन्य का चिंतन वहां बता दिया जाए प्रमाण दे सकता हूं इन पांचों की एक साथ भक्ति करी जाती है सुनिए जहां से आप प्रमाण देते हैं वही से हमारे द्वारा बताए गए पांच में से किसी एक तत्व को श्रेष्ठ कहा जा रहा होता है। जहां से भी दुनिया में जब भी आप इसका अर्थात नहीं है। सुनो सारे वैदिक वांग में से जब भी आप किसी की भक्ति को मना करने वाला आप प्रमाण दोगे तो वही पर हमारे द्वारा पूज्य पांच तत्वों में से कोई एक तत्व की वहां पर भक्ति बताई जा रही होगी। अरे भाई तो इसका अर्थ यही हुआ ना कि पांच अवे नहीं है। लीलागत भेद है किसकी जिस लीला के द्वारा
00:04:50:18 जिस क्यों कहे क्योंकि कहती है श्रुति कहती है शास्त्र कहते है तो एक कहेंगे ना लीलागत भेद है और क्या कहते हैं वो रुचिगत भेद है रुचिगत भेद है लीलागत भेद है जैसे किसी को जैसे किसी को महिषासुर को मारने वाली लीला में इंटरेस्ट है तब वो उस तरीके से भगवान को प्राप्त करना चाहता है भगवती के रूप में उसके लिए भगवान कृष्ण की जो लीला होगी उसके द्वारा भगवत प्राप्ति का मार्ग कठिन होगा क्योंकि उसकी रुचि किस में है महिषासुर वाली लीला में तो जब वो महिषसुर वाली लीला में उसकी रुचि है तो वहां पे जो परम तत्व है उसके अनुसार वो भक्ति करेगा तो उसको मोक्ष प्राप्त होगा मगर यदि वो उस समय उसकी रुचि तो महिषासुर वाली उसमें है और वो भक्ति करने का प्रयास करेगा वो क्योंकि भगवान कृष्ण की लीला के द्वारा तो उस रूप से यहां पर ऐसे अनंतता की रक्षा के लिए कहा गया है। अब मैं आपको एक प्रश्न बोल करके और बात को आगे बढ़ा रहा हूं।
00:05:55:06 अरे यहां पर इन्होंने जो प्रमाण बताया है ना क्या कहते जी इन्होंने जो प्रमाण बताया है 820 नंबर पेज खोल के वो प्रमाण इनको दिखा दीजिए कि ये लास्ट पैराग्राफ है जो इसमें देख लीजिए थोड़ा सा तो नीचे जाइए नीचे जाइए इसी में एक मिनट केवल गायत्री उपासना में ही तत्पर रहकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है बीच में लिखा है केवल गायत्री उपासना में ही तत्पर रहकर यही से ये शिव और विष्णु की उपासना को ना मानना मानेंगे वहीं से गायत्री उपासना को मानना नहीं मानेंगे ये दिक्कत होती है इनकी बात इनसे इनसे जब भी इनसे देखिए हमारे लिए पांचो तत्व ईश्वर है तो ये जब भी प्रमाण देंगे ब्रह्मा विष्णु महेश ईश्वर नहीं है तो वहां पर हमारे द्वारा मान्य पांचो तत्व में से कोई ना कोई एक ईश्वर ईश्वर जरूर होगा। ठीक है? तो इनसे यहां पर ये कहिए ऐसा प्रमाण लाइए जहां पर ये तीनों तो नीचे हो मगर हमारे द्वारा पांचों तत्व में से किसी एक को ईश्वर ना कहा जा रहा हो। ऐसा ऐसा प्रमाण इनके पास आजीवन कभी नहीं है। पुराणों से एक दूसरी
00:07:10:08 बात चले गए क्या? चले गए। [संगीत]
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एक ही तत्व पांच अलग-अलग रूप में प्रकट होते है #Rampalexpose #RampaljiMaharaj #satlok
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