⬜ Not used yet · 00:00:01:20 – 00:17:53:18 (17:52)
00:00:01:20 2.6 से ले 2.30 तक हमने पिछले एपिसोड में कवर किया था। उसमें जो कुछ बुलेट पॉइंट्स हैं वो हम आपको यहां बता दे रहे हैं। सबसे पहले इसने ये मान लिया कि आत्मा नित्य नहीं है। अनित्य है। इसने 2.10 के आसपास जो सबसे पहला हिंदी अर्थ लिखा है तो उसमें इसने माना है कि आत्मा की भी उत्पत्ति होती है और परमात्मा से भिन्न कोई भी ऐसा नहीं है जो सत हो जो सदैव मतलब सदैव था है और रहेगा तो क्या है कि आत्मा को कई जगह सनातन कहा गया है देही नित्यम कहा गया है दोती में और बहुत सी जगह आत्मा को सनातन कहा गया है तो यहां पर इसका ये झोल पकड़ में आ जाता है आत्मा सनातन है वो थी है और रहेगी तो इसने कहा कि परमात्मा से भिन्न और कुछ भी नहीं था अब बात यह आती है कि परमात्मा से भिन्न और कुछ भी नहीं था। तो इसको यह मानना पड़े फिर यह जो आत्मा उत्पन्न हुई है परमात्मा से ही हुई है। है ना? तो परमात्मा से उत्पन्न होने के बाद भी इसने आत्मा को जब नित्य नहीं माना है तो परमात्मा से परमात्मा
00:01:16:24 से निकला होने के बाद भी क्योंकि अद्वैत जो दर्शन है उसके उसके भिन्न कोई भी दर्शन जो जीव और परम ब्रह्म में भेद मानता है तो वो कोई भी दर्शन जो है ये नहीं कहता कि आत्मा जो है नित्य नहीं है चाहे द्वैत हो चाहे विशिष्टा हो कोई भी दर्शन ऐसा नहीं ऐसा नहीं कहता मगर ये परमात्मा से आत्मा को भिन्न भी मान रहे हैं और फिर ये भी कह रहे हैं कि जो आत्मा है वो नित्य नहीं है, सनातन नहीं है। तो फिर अब इसमें दिक्कत क्या है कि आत्मा कहां से निकली? परमात्मा से ही निकली। ब्रह्म से ही निकली। तो फिर आत्मा में वो सारी क्वालिटीज कैसे नहीं आई जो ब्रह्म में थी। फिर ये सब चीजें हो जाएंगी। तो आत्मा फिर इसके अलावा जो इनकी जो फेरी टेल्स हैं जो परिकथाएं हैं इनकी। उसमें क्या है कि जैसे सृष्टि की रचना होती है। तो सृष्टि की रचना में इन्होंने बताया कि काल उत्पन्न होता है। काल भी सदैव से नहीं था। पहले से नहीं था। इनके कुछ लोग आकर के कुतर्क करते हैं कि काल पहले से था, सदैव था। तो काल भी पहले से नहीं था। परमात्मा से भिन्न इसने बोला है कि कोई भी नित्य नहीं है। ठीक है? तो अब दिक्कत ये आती है कि जब आत्मा एक बार उत्पन्न हो गई। उत्पन्न होने के बाद काल भी उत्पन्न हुआ और काल ने सृष्टि बनाई।
00:02:34:04 काल की वजह से यह जो आत्माएं उत्पन्न हुई थी यह जाल में फंसी फिर काल मरता भी है तो कभी ना कभी जब काल मरेगा अगर इनको वैसे मोक्ष नहीं मिला अपने कर्मों से तो कभी ना कभी काल मरेगा तो इनको मोक्ष मिलेगा तो इन प्रश्नों का जवाब है ही नहीं पहली बात फिर भी यह मानना तो पड़ेगा ना हमें कि काल मरता है तो मोक्ष उस समय सभी जीवात्माओं को मिल जाता है तो जब सभी जीवात्माओं को मोक्ष मिल जाता है तो उसके बाद काल जब दोबारा दोबारा जन्म लेता है तो उसके जन्म लेते समय यह जो सतलोक गई हुई आत्माएं हैं यहीं से उठाता है वह अपना माल या फिर नया उत्पन्न किया जाता है नया प्रोडक्शन हाउस चालू किया जाता है उसके लिए तो ये सब चीजें सवाल खड़े हो जाते हैं। इसके साथ ही साथ काल से रिलेटेड एक बुलेट पॉइंट और है वो क्या है कि काल जो है वो समय को भी कहा जाता है। तो बात यह है कि काल की गणना माना जा सकता है कि वहां से शुरू होती है जब कल्प चालू होता है। परंतु
00:03:33:19 क्या जब ईश्वर सृष्टि सृष्टि की रचना कर रहा है उस समय क्या समय नहीं है उस समय क्या टाइम नहीं बीत रहा है बीत रहा है तो वो कौन है वो भी तो काल है तो ये भी एक क्योंकि काल का अर्थ समय भी है समय को भी काल कहा गया है और इनका जो काल है वो वही है वो जो राक्षस जैसा है जो लोगों को फंसाता है आत्माओं को खाता है वो वो नहीं है पूर्ण ईश्वर का नाम काल नहीं है जो हर जगह यत्र तत्र सर्वत्र है वो नहीं है। तो फिर प्रश्न ये आ जाता है कि उस समय कौन सा काल था? जब सृष्टि की रचना हो रही थी तो उस समय कौन सा काल था? जब ये काल नहीं था जो इनका तथाकथित काल है। इसके अलावा एक चीज और है कि आत्मा नित्य नहीं है तो उसके अंदर की प्यास नहीं बुझ सकती। यहां से एक एक बुलेट पॉइंट और आता है कि आत्मा जब नित्य नहीं है। आत्मा के अंदर प्यास किस बात की आ रही है? सत स्वरूप हो जाने की। मगर वह सत है ही नहीं। वो नित्य है ही नहीं ना। कभी ना कभी उसका भाव था। तो जो दो 16 में आया ना कि असत वस्तु का कभी वो सत्ता नहीं होती और सत जो सत सत रूपी तत्व होता है उसका कभी अभाव नहीं होता। पर इसका अभाव था यानी कि ये सत्य नहीं है। परंतु इसके अंदर आत्मा के अंदर सत्य
00:04:48:26 की प्यास तो आ रही है। तो पहली बात तो प्यास क्यों आ रही है? जब ये स्वयं सत्य नहीं है। दूसरी बात इसकी प्यास रामपाल के अनुसार मोक्ष की प्यास नहीं बुझ सकती क्योंकि यह सत स्वरूप नहीं हो सकती। पहली इसके अलावा एक चीज और है कि जब जीव की चाह का विषय सिद्ध ही नहीं हो रहा है तो फिर ईश्वर को सिद्ध कहां से करेंगे ये? तो रामपाल का ईश्वर भी सिद्ध नहीं होता। क्योंकि आत्मा जो है सत स्वरूप नहीं हो सकती। सत स्वरूप वही हो सकता है जो सत स्वरूप हो। तो यह आ गया एक तो ना ही ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होगा और ना ही मोक्ष का कोई अस्तित्व सिद्ध होगा। यदि आत्मा को नित्य नहीं माना जाएगा। हालांकि शास्त्रों में भरभर के आत्मा को नित्य कहा गया है। मगर इनका जो ये ढोल की पोल है उस पर हम बात करते जा रहे हैं। अच्छा इसके बाद जो काल है वो नित्य नहीं है। ब्रह्मा विष्णु महेश भी नित्य नहीं है। किसी ना किसी समय पर वो नहीं थे। फिर हैं तो जब हैं तो वो कहां से आए हैं? क्या वह अलग है? क्या वह ईश्वर से ही निकले? अगर ईश्वर से निकले हैं तो फिर वही जब ईश्वर है तो फिर सारी पावर्स होनी चाहिए। ईश्वर ईश्वर के सभी गुण होने चाहिए। क्योंकि ईश्वर पूर्ण है। उससे कुछ भी घटाया बढ़ाया नहीं जा सकता। ईश्वर में कुछ जाएगा तो भी ईश्वर की क्वांटिटी वही रहेगी और ईश्वर से कुछ निकलेगा तो
00:06:03:27 निकले हुए की क्वांटिटी भी वही रहेगी। ठीक है? पूर्ण पूर्ण मददम। अच्छा जब काल एक बार मर गया और हमने देख लिया कि काल ने क्या किया था तो फिर काल को दोबारा क्यों जन्म दिया जाता है? क्यों बनाया जाता है? क्यों बनने दिया जाता है? तो ये भी एक बुलेट पॉइंट आ गया था। पिछले सेशन में जो हमने बातें की थी। इसके अलावा अगला क्या है? इसके अनुसार ईश्वर ईश्वर जो है वह कण-कण में व्याप्त नहीं है। रामपाल के अनुसार सर्वव्यापक ईश्वर नहीं है। उसकी निराकार शक्ति जरूर व्याप्त है। जिस प्रकार से सूर्य की किरणें पूरे संसार को प्रकाशित करती हैं। पर सूर्य हर जगह नहीं होता उसी प्रकार से ईश्वर है। उसकी निराकार शक्ति संसार भर में व्यवस्था करती है। अब इसमें एक बात यह आ जाती है कि
00:06:54:28 यदि ईश्वर यदि ईश्वर जैसे सूर्य है और सूर्य की रोशनी पूरे संसार को प्रकाशित कर रही है। परंतु सूर्य की ऊष्मा जहां पर सूर्य है वहां जितनी गर्म है जहां जितनी उसमें दाहकता है जहां उसका प्रकाश है जितना दूर वो प्रकाश की दूरी होती जा रही है उतना ही उसकी जो दाहकता है कम होती जा रही है। तो क्या इसी तरह का ईश्वर है कि ईश्वर से जो जो जितना दूर है उतना ही क्या कहते हैं? ईश्वर से जो जितना दूर है उतना ही ईश्वर की पावर उसके ऊपर जो नियंत्रण है वह कम होता जाएगा। तो दूसरी बात यह आ गई। इसके अलावा इसने एक षड्यंत्र और किया है कि दूसरे अध्याय के पता नहीं दव अथवा हां 2.10 से 2.30 2.10 से दूसरे अध्याय के 10व श्लोक से और दूसरे अध्याय के 30व श्लोक तक हमने पिछला सेशन किया था। क्योंकि दूसरे अध्याय का 16वा नहीं 10व श्लोक से इसने रामपाल ने अपार्थ करना भगवत गीता का शुरू किया है। तो 2.10 से 2.30 तक पिछला सेशन है। जिसने ना देखा हो वो देख ले। बुलेट पॉइंट्स जो है मुख्य पॉइंट वो हम यहां बता दे रहे हैं। इसने क्या किया है? 2.10 का अर्थ करते समय पंडित और विद्वान
00:08:10:04 को अलग-अलग बताया। जबकि वहां पर दो बार पंडित शब्द आया है। फिर इसने क्या किया? पंडित अलग होते हैं। विद्वान अलग होते हैं। मतलब एक जो जो वो है ना द्वेष ब्राह्मणों के प्रति पंडितों के प्रति तो वह इसमें दिखाई देता है। इसके साथ ही साथ क्या है बिना प्रसंग के हां इसके साथ ही साथ हमने ये देखा कि जब वहां पर अर्जुन अपने नाते रिश्तेदारों को देख के युद्ध भूमि में और हथियार डालने लगता है। शस्त्र छोड़ने लगता है तो भगवान उसको ये बता रहे हैं कि तुम किसी को मारते नहीं हो। ये सभी जीवात्माएं नित्य हैं। आत्मा के गुण बता रहे हैं। विवेचना कर रहे हैं कि आत्मा को तुम मारते नहीं हो। और उसको कारण बता रहे हैं अलग-अलग कि क्यों तेरे मारने से कोई नहीं मरता है। यह नित्य है। और अगर तुम यह सोच के मार रहे हो कि तुम इसके शरीर को बचा रहे हो तो शरीर का नष्ट होना निश्चित है। इसलिए भी तुम्हारा इनको इनके शरीर मात्र को नष्ट करने के लिए दुखी होना वो नहीं है। आवश्यक नहीं है। तो ये जब बोध करा रहे हैं तो उस बीच में परमात्मा की बात क्यों आ रही है? हालांकि वहां पर और भी बातें हैं जिससे कि सिद्ध होता है कि वहां पर परमात्मा की नहीं आत्मा की बात हो रही है। जैसे आत्मा को जब नित्य कहा गया तो राम रामपाल ने कह दिया कि भाई आत्मा
00:09:25:10 जो यहां आत्मा की नहीं परमात्मा की बात हो रही है। परमात्मा के अलावा कोई भी नित्य नहीं है। आत्मा को सर्वव्यापक भी कहा गया है। तो वहां पर भी इसने कह दिया कि नहीं हां परमा के सर्वव्यापक केवल परमात्मा है। तो बात यह आ रही है कि बिना प्रसंग के वहां पर आत्मा की बात होते होते बीच में अचानक से परमात्मा की बात क्यों हुई? उससे क्या निकला? अगर कहोगे भक्ति बताना चाहते तो वहां पर बहुत दूर दूर तक भक्ति की बात भी नहीं की गई है कि तुम भक्ति करो भक्ति करो। ठीक है? दूसरी बात क्या है कि एक बात और इन्होंने स्पष्ट करने की कोशिश की है कि परमात्मा के बिना आत्मा को मारा जा सकता है। तो परमात्मा मतलब परमात्मा साथ में है इसलिए परमात्मा वो जो आत्मा है अविनाशी है। यह भी बहुत जरूरी बुलेट पॉइंट है। आत्मा परमात्मा के सानिध्य में है इसलिए आत्मा अविनाशी है। स्वतंत्र रूप से आत्मा अविनाशी नहीं है। ये कहीं पर नहीं कहा कि वो स्वतंत्र रूप से भी अविनाशी है। यदि कहा जाए कि परमात्मा का भजन करके ध्यान करके दुख दूर हो सकता है तो भजन की वहां पर कोई बात नहीं हुई है। पीछे और आगे के श्लोकों में दूरदूर तक तो फिर क्यों वहां पर अचानक से अह परमात्मा की बात आई जब आत्मा की बातें चल रही है। दूसरी बात क्या
00:10:40:12 है कि यदि आत्मा सदा परमात्मा के साथ होने के कारण अवध्य है तो वह काल के जाल में कैसे फंसी? जब वो परमात्मा के साथ है क्योंकि इनके हिसाब से जहां पे अर्जुन है, काल है वहां परमात्मा नहीं है। है ना? परमात्मा की निराकार शक्ति है। मगर यह क्या है कि यह तो परमात्मा के साथ में है। सदा परमात्मा के सानिध्य में है। साथ में है। तो परमात्मा के साथ में है तो फिर काल के जाल में नहीं फंसना चाहिए था क्योंकि परमात्मा तो वही है। इनकी थ्योरी के हिसाब से जब परमात्मा अलग है वो अद्वैत और द्वैत ये विशिष्टा द्वैत इत्यादि को के पर्सेक्टिव से ना देखें। अभी इनकी जो थ्योरी है वह कहती है काल अलग है और ब्रह ब्रह ब्रह्म काल अलग है परमात्मा अलग है तो इनकी थ्योरी के हिसाब से वहां पर परमात्मा नहीं था नहीं था ना क्योंकि भगवान कृष्ण थे उन्होंने कहा कि उस परमात्मा की शरण में जाओ तो इनकी थ्योरी के हिसाब से वहां पर परमात्मा नहीं था मगर ये मान रहे हैं कि था तो अभी यहां से एक पॉइंट और उत्पन्न होगा बुलेट पॉइंट मगर यदि परमात्मा के साथ इन्होंने माना है कि परमात्मा के साथ है आत्मा नित्य है तो इनको जो है फिर वह काल के जाल में कैसे फंस रही है? क्योंकि परमात्मा तो सदा उसके साथ है। यदि
00:11:55:15 परमात्मा के सानिध्य में है तो उसे किसकी शरण में जाने को कहा? देखो ये बार-बार कहते हैं ना कि अरे वो तो अर्जुन तो पहले से ही भगवान श्री कृष्ण की शरण में था। तो जो ब्रज जो शब्द का उपयोग हुआ है वहां पर। पहली बात तो इसको थोड़ा समझ लेते हैं। ब्रज जो क्रिया होती है धातु उसमें गत्यार्थक अर्थ भी होता है और ज्ञानार्थक अर्थ भी होता है। आप किसी के पास खड़े हैं तो आपको कोई गति नहीं करनी है। शारीरिक है ना आपको चल चलना नहीं है। परंतु आपको मेंटली उनहीं की जिसके पास आप खड़े हैं। उन्हीं की शरण को स्वीकार करना है। तो मेंटली आपको आपकी जो गति है वह मेंटली करनी है तो उस मेंटली गति को ज्ञानार्थक अर्थ हो गया उसका ब्रज शब्द का तो गत्यार्थक अर्थ नहीं है वहां पर ब्रज का ज्ञानार्थक है कि आप उस ज्ञान को स्वीकार कर लो कि ये परमात्मा है ठीक है मगर फिर भी जब ये ये कहते हैं कि अर्जुन तो पहले से ही श्री कृष्ण की शरण में था तो फिर यहां पर इन्होंने यह माना है कि यदि ये यहां पर इन्होंने कई जगह दूसरे अध्याय में कई जगह यह माना है कि
00:13:11:19 अ आत्मा जो है वो सदा परमात्मा के सानिध्य में रहती है इसलिए अवध्य है। तो यानी कि अर्जुन उस समय भी आत्मा उसकी भी उस समय परमात्मा के सानिध्य में थी। तो जब परमात्मा के सानिध्य में थी तो उसके उसको जाने के लिए कहां कहा जा रहा है? यानी कि परमात्मा कोई और है। अकॉर्डिंग टू इनकी थ्योरी के अनुसार भी परमात्मा कोई और है। अच्छा अब एक चीज और कह रहे हैं यह कि एक चीज इन्होंने मान ली क्योंकि ये आगे काम आएगी बुलेट पॉइंट्स में वो क्या है कि अविनाशी का कभी नाश नहीं होता क्योंकि इन्होंने कई जगह कहा है अमर थोड़ी देर के लिए अमर तो उस पर हम बात करेंगे जब इन्होंने खुद लिखा है कि अविनाशी का कभी नाश नहीं होता। परमात्मा के लिए यह शब्द का उपयोग हुआ है। देखिए दो 16 या 17 में 216 या 17 में रामपाल ने गीता का अर्थ करते हुए उस कि शाश्वत तो वो है। है ना? उस परमात्मा को कहते हैं। तो परमात्मा के लिए उसका शब्द उसका उस शब्द का उपयोग हुआ है। दो 16 या 17 में 17 में हुआ शायद। तो उस शब्द का उपयोग यानी कि उस यानी कि हमसे दूर है। हम पास में नहीं है उसके। मगर यहां पर एक जगह पर आप डिटेल
00:14:26:24 में देखना है तो आपको पीछे जाना होगा। वो एपिसोड देखना पड़ेगा। मगर इन्होंने एक जगह पर आत्मा के लिए जो बात कही जा रही है वो परमात्मा और परमात्मा पर फिट करने के लिए इन्होंने क्या किया है? यह शब्द का उपयोग यह है यह यह परमात्मा जैसे यहां खड़ा है कहीं दूर नहीं है उस परमात्मा नहीं यह परमात्मा तो आत्मा की जगह पर परमात्मा को फिट करने के लिए आत्मा के लिए जो यह शब्द का उपयोग हुआ था वो इसने रामपाल ने क्या कहते हैं परमात्मा के लिए यूज़ कर दिया तो अब इसमें दिक्कत क्या है कि जब यह परमात्मा हो गया तो यानी कि परमात्मा वही है दो तरीके से सिद्ध हो रहा है परमात्मा वहां पर है एक यह परमात्मा से सिद्ध हो रहा है और दूसरा कि आत्मा त्मा सदैव परमात्मा के सानिध्य में रहती है। हम तो परमात्मा के सानिध्य में होने की वजह से वो अभद है। उसके साथ बुरा नहीं हो सकता। मगर बुरा हो रहा है। काल के जाल में फंस रही है। तो दो बातों से सिद्ध हो रहा है कि रामपाल के ही वचनों के अनुसार वहां पर परमात्मा है। तो जब वहां पर परमात्मा है तो किस परमात्मा के लिए उस परमात्मा उस परमात्मा की बात हो रही है। किस परमात्मा के सानिध्य में जाने की बात हो रही है? यह एक बुलेट पॉइंट आपको मिल जाता है। इसके बाद अगला क्या है?
00:15:42:02 जब जब आत्मा की बातें हो रही है और उसमें अयम अय करके शब्द आ रहा है जिसको रूपांतरित करके यह कहा जाएगा तो अयम अय करते हुए आत्मा के लिए बात हो रही है। अचानक से बीच में यह कहते हैं कि अब यहां पर आत्मा नहीं परमात्मा की बात हो रही है। तो परमात्मा के लिए वहां पर परमात्मा शब्द आना चाहिए संस्कृत में। है ना? वो तो आया नहीं है भगवत गीता में। अयम से ही बात हो रही है। पिछले श्लोकों में आत्मा की बात हो रही है जिसको रामपाल ने भी माना है। तो अचानक से बात और उसमें जब एक बार बता दिया गया आत्मा की बात हो रही है तो उसमें फिर यह यह करके आगे की बातें हो रही है। अचानक से जब परमा अचानक से जब रामपाल ने परमात्मा को डाला है तो वहां पर यह शब्द से यह शब्द अगर उपयोग करेंगे तो हमें आत्मा को पीछे से लेना पड़ेगा। नहीं तो परमात्मा का अगर हमें अर्थ लेना है तो वहां पर परमात्मा का दतक कोई शब्द होना चाहिए जो कि संस्कृत में वहां पर अवेलेबल नहीं है। तो इससे भी इनका जो अपार्थ है जो ढोल की पोल है वो हमें पता चल जाती है। यदि परमात्मा के लिए माना जाए तो आत्मा की संस्कृत क्या है? जब अयम शब्द से उन्होंने किसी एक को पॉइंट आउट किया है तो इसने एक ही श्लोक में यह
00:16:57:04 परमात्मा आत्मा को अपनी शरण में रखता है। एक ही अयम शब्द से वहां पर परमात्मा आत्मा दोनों की बात कर दी है। तो अगर अयम से मान भी लो कि पिछले श्लोक के अनुसार आत्मा को नहीं लेना है। परमात्मा को ले लेना है अचानक से मान भी लो। तो फिर वहां पर दिक्कत ये आएगी कि फिर आत्मा शब्द की संस्कृत कहां है वहां पर? और इसके साथ ही साथ यह कहा गया है के सानिध्य में रहती है। के साथ रहती है। तो के सानिध्य में रहने की संस्कृत कहां है? के साथ रहने की संस्कृत कहां है? दो 28 में इसने महा घोटाला कर दिया। क्या कर दिया? जो श्लोक है दो 28वा दूसरे अध्याय का 28वा श्लोक है जो उसमें दो बार अव्यक्त शब्द आया है और एक बार व्यक्त शब्द आया है। ठीक है? जब भगवान कह रहे होते हैं कि यह जितने भी तुझे प्राणी दिख रहे हैं ये सब प्राणी जो थे वो प्रकट वो एक उत्पन्न होने से पहले जन्म
✅ This part is already used · 00:17:53:18 – 00:17:58:16 (0:05)
→ Used in: B · Live क्या गीता का ज्ञान देने वाला मोक्ष नहीं देगा at 38:30 ↗
→ Used in: A · Video क्या भगवान श्री कृष्णा से मोक्ष नहीं मिलता at 2:23 ↗
00:17:53:18 से पहले अप्रकट थे और मृत्यु के बाद भी अप्रकट हो जाएंगे केवल बीच में ही प्रकट है
⬜ Not used yet · 00:17:58:16 – 00:26:28:00 (8:29)
00:17:58:16 तो इसने क्या किया है कि तीनों बार अप्रकट की बात ही नहीं की है इसने तीनों बार प्रकट कर दिया है कि जन्म के पहले भी प्रकट थे मृत्यु के बाद भी प्रकट रहेंगे और बीच में भी प्रकट है तो अव्यक्त शब्द का अर्थ ही नहीं हुआ ठीक है तो यह भी ढोल में बड़ी वाली पोल अब जब हम नहीं लेते हैं तीनों बार जब यह मान लेंगे कि तीनों बार प्रकट प्रकट प्रकट कह रहे हैं कि जन्म से पहले भी प्रकट थे बाद में ही प्रकट होंगे और बीच में ही प्रकट है तो दिक्कत क्या आएगी कि क्या समझाया जा रहा है ये कहकर कि जो जिन लोगों को तू देख रहा है जिनका तू शोक कर रहा है वो पहले भी प्रकट थे बीच में भी प्रकट है आगे भी प्रकट रहेंगे इसलिए तू शोक मत कर तो इसको कुछ समझाया नहीं गया है क्योंकि ये ढोल में पोल है। अच्छा इसने क्या किया है? रामपाल ने सर्वगत का जो अर्थ है सर्वगत का अर्थ इसने बदल दिया है। सर्वगत का अर्थ सर्वव्यापक ना लेते हुए वही है कि अ सर्वगत का अर्थ इसने ये लिया है कि वो सर्व्यापक इसलिए क्योंकि उसके कारण संसार विस्तार को प्राप्त हुआ है। है ना? या फिर उसकी निराकार शक्ति पूरे संसार में व्याप्त है। तो इसलिए वह ईश्वर
00:19:13:20 के लिए सर्वगत वो आया है। सर्वगत ईश्वर के लिए आया है। पहली बात तो ये है कि वहां पर निराकार शक्ति के लिए फिर अलग से कोई वो होना चाहिए शब्द। दूसरी बात यह है कि अगर निराकार शक्ति व्याप्त है संपूर्ण संसार में तो फिर ईश्वर के लिए सर्वगत शब्द क्यों आ रहा है? सर्व्यापक शब्द क्यों आ रहा है? और यदि शक्ति के रूप में व्यापक होने वाले को हम सर्वव्यापक कहते हैं तो फिर जो शक्ति स्वयं सर्वव्यापक है जो पूरे संसार में फैली हुई है निराकार शक्ति फिर उसके लिए कौन सा शब्द होगा क्योंकि सर्वव्यापक तो हमने उसको दे दिया जो सर्वव्यापक शब्द हमने उसे दे दिया जिसकी शक्ति पूरे संसार में व्याप्त है वह स्वयं नहीं तो यह भी एक बात आ जाती है। दूसरी बात क्या है कि अगर हम यह कहेंगे कि शक्ति पूरे संसार में व्याप्त है, ईश्वर व्याप्त नहीं है तो हमें मानना पड़ेगा कि ईश्वर का जितना कंट्रोल जहां पर स्वयं ईश्वर है वहां है उतना कंट्रोल जहां पर वो नहीं उसकी शक्ति है वहां नहीं है। तो एक रस नहीं है। है ना? शाश्वत नहीं है। ईश्वर घट बढ़ रहा है। ठीक है? दूसरा क्या है? दो 17 में सत और असत को तत्व से
00:20:28:21 बताने वाले को तत्वदर्शी कहा गया है। सत और असत को। और यह भी कहा गया इस प्रकार से जानने वाले इस प्रकार से बताने वाले तत्वदर्शी हैं। तो जब यह तत्वदर्शी हो गए सत और असत को बताने वाले तो भगवान श्री कृष्ण तत्वदर्शी क्यों नहीं हुए? भगवान श्री कृष्ण ने ही तो बताया है जो पीछे से समरी चली आ रही है सत और असत की तो सत और असत को उन्होंने बताया श्री कृष्ण भगवान ने और बताने वाले को तत्वदर्शी कहते हैं। तो दो 17 में तत्वदर्शी श्री कृष्ण भगवान सिद्ध होते हैं। ठीक है? यह ध्यान रखना यह लोग कभी यहां वाले तत्व दृष्टि के श्लोक की बात नहीं करते। चार 34 की बात करते हैं क्योंकि उल्टे हैं तो उल्टे पेड़ की बात इनको ज्यादा समझना है। अच्छा इन्होंने एक जगह और ये कह दिया है जब ये कहते हैं वेदों में प्रमाण है कबीर भगवान है तो आज के बाद नहीं कहेंगे क्योंकि इसने अपनी भगवत गीता में एक जगह लिखा है परमात्मा प्रमाण रहित है। ठीक है? मतलब जो समझदार लोग हैं वही विश्वास करेंगे बाकी नहीं करेंगे। परमात्मा प्रमाण रहित है। तो जब परमात्मा का प्रमाण है ही नहीं तो क्यों हाथी बैठ के चिल्लाया करते हो? वेदों में प्रमाण है। वेदों में प्रमाण है। जब प्रमाण रहित ही कहना है। अच्छा यह सब परमात्मा का ज्ञान आत्मा ज्ञान यह सब गलत था क्योंकि यह सब काल की चाल थी।
00:21:44:04 230 तक आते-आते ये बोल दिया है रामपाल ने कि यह सब काल इसलिए बोल रहा है कि उसको अपने भोजन का इंतजाम करना है। तो उसमें क्या किया? यह सब उसकी चाल है जिससे कि अर्जुन युद्ध करे। तो जब चाल है तो परमात्मा का ज्ञान भी चाल हो गया। परमात्मा के बारे में जो चीजें बताई सारी चीजें जो बताई जा रही है वो चाल हो गई और अगर नहीं हुई तो स्पेसिफाई करिए कि कौन सी चीज नहीं हुई है कौन सी है। तो स्पेसिफिकेशन ये ढोल की पोल में नहीं किया गया है। और आगे क्या है? जो लोग दुखी होते हैं, वह तत्वदर्शी अथवा मुक्त नहीं होते हैं। तो दुखी होने का मतलब रामपाल ने स्वयं अपने एक उसमें कहा है कि मुझे अफसोस है इंटरव्यू में मीडिया के साथ तो यानी उसे अफसोस है यानी उसे दुख है। जब दुख है तो इसका अर्थ है वह मुक्त नहीं है और वह तत्वदर्शी नहीं है। अच्छा एक और बात कही गई है। इसने एक जगह यह कहा है कि यदि मतलब यह बात कही है कि अर्जुन जो भगवान कह रहे हैं ना कि तू लाभ हानि में समदृष्टि रख जीवन और मृत्यु में समदृष्टि रख है ना सबको समान भाव से देख
00:22:59:10 तो ये वहां पर कटाक्ष कर रहे हैं उनकी एक बात पर भगवान की बात पर इसीलिए आगे चलके ये कहा है कि ये सब काल की चाल है क्या कटाक्ष कर रहे हैं रामपाल वहां पर कि भैया क्या भला अर्जुन है ना? उसमें कटाक्ष ये कर रहा है कि बताओ कि जिसको जिसके चोट लगेगी वही तो जानेगा। ये कैसी बात है? कोई भला किसी को ऐसा कुछ कह रहा है वो। बताता हूं क्या कह रहा है। हां। बिना बिना लाभ हानि क्या युद्ध हो सकता है? क्या क्या आवश्यकता पड़ी है छाती में तीर खाने की? हां। सब लोग किसी ना किसी कारण से ही कुछ करते हैं। तो यहां पर यह जो बात कह रहा है काल रामपाल का काल कि भैया तुम लाभ हानि में समदृष्टि रखो। यह सब गलत बातें हैं और ये उसकी चाल है उसको फंसाने के
00:24:02:20 लिए। यह सब ब्रह्म की चाल थी। है ना? यह लिखा हुआ है। देखिए यह पेज नंबर 22 दिखा दीजिए इनको। पेज नंबर 22 इसकी गीता का। इसमें इसने लिखा है कि द्रोणाचार्य तो विद्वान गुरु थे। वे भी अपने पुत्र अश्वत्थामा के मरने का समाचार सुनकर कलेजा पकड़ कर बैठ गए। युद्ध नहीं कर सके। फिर अर्जुन कौन से खेत की मूली था जो स्वजनों की मौत पर दुखी ना हो। यह सब काल ब्रह्म की चाल है। मतलब यह कहना कि तू मौत किसी की मृत्यु से दुखी मत हो। यह बस हां जो नीचे हेडिंग है ना नकली संत की कथा इससे ठीक ऊपर वाला जो पैराग्राफ है वही है
00:24:44:25 हम तो इसमें इसने स्वीकार कर लिया कि ये सब काल की चाल है। मतलब जो भगवान ये कह रहे हैं कि तुझे सर्दी गर्मी धूप छांव और मृत्यु जीवन इन सब में किसी के प्रति आसक्त भेद नहीं देखना चाहिए। तत्सम दृष्टि रख और प्रभावित मत हो इनमें आने वाली चीजों से। तो यह यहां पर इसने डिक्लेअ किया है कि यह ऐसा नहीं है। यह गलत बात है। व्यक्ति का कोई मरेगा तो वह दुखी उसको होना चाहिए। इसमें कोई दिक्कत नहीं है। ठीक है? तो इसने खंडन किया है समदृष्टि का। ये मैं क्यों बता रहा हूं? क्योंकि आगे इसी ने पक्ष भी लिया है समदृष्टि का। क्योंकि कैसे करेगा भाई? कितना झूठ बोलेंगे? कहीं तो गलती होगी ना। अच्छा इसके आगे क्या है? कुल मिला के इसने यहां पर ये कहा है कि अर्जुन कौन से खेत मूली था जो स्वजनों की मौत पर दुखी ना हो। तो ये सब काल ब्रह्म की चाल यानी इसने खंडन कर दिया। दुखी होने दुखी ना होने वाले जो शिक्षा है भगवत गीता की लाभ हानि में वो नहीं करना चाहिए। अंतर तो इसने वहां खंडन कर दिया। अच्छा सच्चाई क्या है कि अर्जुन के दुखी होने और ना होने में व्यवहार और परमार्थ का अंतर है जो हम आगे चलकर के समझाएंगे। तो ये बुलेट पॉइंट्स हैं जो हमने अ जो सेशन
00:26:00:00 वन है इसका भगवत गीता को ले हम जो चल रहे हैं एक-एक श्लोक इसने क्या-क्या बिगाड़ा है क्या-क्या अपार्थ किया है तो वो हम ले चल रहे हैं और इसने अपार्थ करना शुरू किया 2.10 से ले 2.10 से तो हमने वहां से समराइज किया है कि भाई 2.10 से लेकर के 2.30 तक जो इसने अपार्थ किया था भगवत गीता का उसके बारे में हमने अभी बताया उसको समराइज किया। पहले एपिसोड के बुलेट पॉइंट्स आपको बता दिए। अब हम आगे चलते हैं। [संगीत]
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रामपाल का मनमौजी गीता अर्थ #2 अध्याय 2 भाग-2 gita #gitagyan
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