1
00:00:00,560 --> 00:00:04,800
पृथ्वी को उद्धरण करके पृथ्वी का

2
00:00:04,800 --> 00:00:09,920
उद्धरण हिरण्याक्ष दैत्य को

3
00:00:09,920 --> 00:00:14,400
पा उद्धार करके केवल यही कथा नहीं है

4
00:00:14,400 --> 00:00:18,640
यह कथा तो जब रात्रि हुई हिरण्याक्ष जो है

5
00:00:18,640 --> 00:00:22,920
उनके जो नीचे के लोग हैं अतल वितल सुतल तलात महात

6
00:00:22,920 --> 00:00:27,440
रसातल वगैरह ये ये वहां उनकी राजधानी रहती है वहा पृथ्वी

7
00:00:27,440 --> 00:00:31,720
यह दूसरी घटना है इससे पूर्व अब मान लो पृथ्वी

8
00:00:31,720 --> 00:00:35,840
ले गया हिरण्याक्ष अब व हिरण्याक्ष पृथ्वी को ले गया

9
00:00:35,840 --> 00:00:40,080
तो हिरण्याक्ष आया कहां से वह भी बारा कल्प ही

10
00:00:40,080 --> 00:00:44,200
था तो वहां दिया है एक पुरुष की जब कोई

11
00:00:44,200 --> 00:00:49,000
पूर्वे खाम पंथा मनद से धीरा अनुले रन

12
00:00:49,000 --> 00:00:54,120
रस्मीन है ना अब यह जो चीज चली

13
00:00:54,120 --> 00:00:58,320
कति धाव कल्पन कैसे कल्प की स्थापना

14
00:00:58,320 --> 00:01:02,400
होती है तो कल्प भूमि सनातन भूमि

15
00:01:02,400 --> 00:01:06,960
शूकर क्षेत्र है अब वह शूकर क्षेत्र कैसे है

16
00:01:06,960 --> 00:01:11,240
वारा चैव बाराही सर्व सर्वा

17
00:01:11,240 --> 00:01:15,560
शया सती मूल प्रकृतिम संभूता

18
00:01:15,560 --> 00:01:18,600
पंची करण

19
00:01:18,600 --> 00:01:24,600
मागत जब भगवान बर अपनी इच्छा के

20
00:01:25,960 --> 00:01:30,040
द्वारा जब पृथ्वी का और सृष्टि

21
00:01:30,040 --> 00:01:34,200
का उद्भव करते हैं तो वहां दो रूप

22
00:01:34,200 --> 00:01:38,440
होते हैं वारा और वाराही वाराही

23
00:01:38,440 --> 00:01:42,480
रूप के लिए मूल प्रकृतिम संभूता मूल प्रकृति है

24
00:01:42,480 --> 00:01:46,640
वह पंची करण मागत पंची करण कौन-कौन

25
00:01:46,640 --> 00:01:52,440
से हैं आकाश वायु

26
00:01:52,440 --> 00:01:57,160
अग्नि जल और पृथ्वी ठीक है

27
00:01:57,160 --> 00:02:01,720
और पांच चीज और क्या है ै तथा सवम

28
00:02:01,720 --> 00:02:07,120
सातम सौरम गाण

29
00:02:07,120 --> 00:02:11,320
पम वैष्णव वैष्णव केवल विष्णु

30
00:02:11,320 --> 00:02:15,440
नहीं है विष्णु का वैष्णव का मतलब है जैसे कोई

31
00:02:15,440 --> 00:02:19,480
एक मंत्रालय होता है ना और मंत्रालय में कितनी कितनी चीजें होती

32
00:02:19,480 --> 00:02:23,680
है मान लो शिक्षा मंत्री है हमारे यहां के अब शिक्षा मंत्री

33
00:02:23,680 --> 00:02:27,840
में पूरे अपने सेंटर के शिक्षा मंत्री है तो कितने शिक्षा

34
00:02:27,840 --> 00:02:31,920
विभाग उनके अंडर में आ गए ऐसे ही एक वैश्णवम

35
00:02:31,920 --> 00:02:36,160
वह पीठ की स्थापना किया उन्होंने शैवम

36
00:02:36,160 --> 00:02:40,400
शक्तम कक्त माने शक्ति के उपासक और उनकी पूरी

37
00:02:40,400 --> 00:02:43,680
समूह मात्र

38
00:02:43,680 --> 00:02:48,560
शक्ति सौरम शौर

39
00:02:48,560 --> 00:02:52,560
मंडल गाण ब माने गण इन सभी

40
00:02:52,560 --> 00:02:57,120
की पांचों की यहां स्थापना की और उस स्थापना

41
00:02:57,120 --> 00:03:01,560
करने के बाद में सभी का विवाह भी किया है उन्होंने

42
00:03:01,560 --> 00:03:05,840
यह ब्रह्मा विष्णु महेश की जन्मस्थली सूकर

43
00:03:05,840 --> 00:03:11,600
क्षेत्र

44
00:03:11,600 --> 00:03:15,840
है ब्रह्मा विष्णु सेवाद तद

45
00:03:15,840 --> 00:03:21,400
तदा

46
00:03:21,400 --> 00:03:25,560
गया शिव रंच विष्णु भगवाना उपजे

47
00:03:25,560 --> 00:03:30,480
जाय अंसते नाना यह हमारे तुलसीदास जी महाराज

48
00:03:30,480 --> 00:03:34,480
लिखते हैं तो यहां समस्त पीठों

49
00:03:34,480 --> 00:03:40,480
की जो स्थापना करके फिर शादी करते

50
00:03:41,120 --> 00:03:45,520
हैं वैशेत महालक्ष्मी महाकाली

51
00:03:45,520 --> 00:03:49,720
शिवाय च महा सरस्वती

52
00:03:49,720 --> 00:03:54,040
ब्रह्मण महा सरस्वती ब्रह्मा जी के लिए महाकाली

53
00:03:54,040 --> 00:03:58,120
रुद्र के लिए और महा लक्ष्मी जो है भगवान

54
00:03:58,120 --> 00:04:02,360
विष्णु के लिए प्रदान करते हैं और समस्त देवी देवताओं

55
00:04:02,360 --> 00:04:08,360
को उनको पत्नियां प्रदान करके उसके बाद

56
00:04:11,040 --> 00:04:15,240
में विष्णु के लिए भगवान के लिए स्वर्ग

57
00:04:15,240 --> 00:04:17,800
प्रदान किया

58
00:04:17,800 --> 00:04:22,040
है मेरू रंगे मनोहर मेरू

59
00:04:22,040 --> 00:04:26,080
जो ब्रह्म लोक है वो ब्रह्मा जी को दिया है समस्त

60
00:04:26,080 --> 00:04:30,560
लोक यहीं से प्रदान किए जाते हैं ऐसा हमारा

61
00:04:30,560 --> 00:04:34,720
और उसके बाद में जब गंगा जी को प्रकट किया है ना तो किस

62
00:04:34,720 --> 00:04:38,960
प्रकार से सृष्टि यज्ञ हुआ है देखिए जैसे हमारे

63
00:04:38,960 --> 00:04:43,440
वैदिक व्यक्ति हैं वेदाचार्य हैं वह यज्ञ से ही जजन जजम

64
00:04:43,440 --> 00:04:47,720
जंत देवा स्थान धर्मा प्रथमा आस यज्ञ से सृष्टि को मानते

65
00:04:47,720 --> 00:04:52,040
हैं यज्ञ से ही सृष्टि है और व यज्ञ कौन सा है

66
00:04:52,040 --> 00:04:56,160
यह भी हमें अपनी शंका का समाधान कर लेना चाहिए कि कौन

67
00:04:56,160 --> 00:05:00,160
सी यज्ञ से सृष्टि हुई है क्योंकि

68
00:05:00,160 --> 00:05:04,600
यज्ञ पुरुष ही भगवान वाराहा

69
00:05:04,600 --> 00:05:08,840
है जतम जतम ते जित यज्ञ भावन त्र तनु स्म

70
00:05:08,840 --> 00:05:13,800
परते नमः यद रोम कपेस निल धरा

71
00:05:13,800 --> 00:05:18,440
तस्मै नमः कारण सकरा यते

72
00:05:18,440 --> 00:05:22,800
वह शूकर भगवान ही यज्ञ पुरुष है कोई व्यक्ति

73
00:05:22,800 --> 00:05:26,080
यह सोचता है कि हम

74
00:05:26,080 --> 00:05:32,080
यह जो आहुतियां डालते हैं ना चैत्र चर का

75
00:05:33,880 --> 00:05:38,000
स ओ विष्णवे स्वाहा वह

76
00:05:38,000 --> 00:05:42,280
यज्ञ पुरुष द्रव्य यज्ञ तपो यज्ञ योग

77
00:05:42,280 --> 00:05:46,600
यज्ञास तथा परे स्वाध्याय यज्ञन यज्ञास

78
00:05:46,600 --> 00:05:50,840
तेत कर्म विसूचिका यह भागवत जी में सत कर्म

79
00:05:50,840 --> 00:05:55,000
जो है वो द्रव्य यज्ञ है द्रव्य यज्ञ में

80
00:05:55,000 --> 00:06:00,240
हमें पूजा भी करनी है किनकी प्रतिमाओं की

81
00:06:00,240 --> 00:06:04,360
ऐसा नहीं है कि हम यज्ञ करते हैं तो प्रतिमाओं की पूजा नहीं करेंगे यह

82
00:06:04,360 --> 00:06:08,440
कौन सा कौन सा यज्ञ है द्रव्य यज्ञ और द्रव्य यज्ञ में

83
00:06:08,440 --> 00:06:12,760
तपस्या कौन सी है मालूम है आपको तपस्या कौन सी है

84
00:06:12,760 --> 00:06:17,040
देव दुज गुरु प्राज्ञ पूजन सचम अजम ब्रह्मचर्य

85
00:06:17,040 --> 00:06:21,280
अहिंसा च शारीर तपते यह तप शरीर

86
00:06:21,280 --> 00:06:25,360
का है कि हम भगवान की प्रतिमाओं की सेवा करें अपने

87
00:06:25,360 --> 00:06:29,640
माता-पिता की सेवा करें अपने वृद्ध जनों की सेवा करें

88
00:06:29,640 --> 00:06:34,600
और अपने क्योंकि मातरम पिम वृद्ध

89
00:06:34,600 --> 00:06:39,120
मातरम पिम वृद्ध माता पिता और माता-पिता तुल्य

90
00:06:39,120 --> 00:06:41,200
वृद्ध वो सब माता-पिता की

91
00:06:41,200 --> 00:06:45,920
श्रेणी में आते हैं भारिया

92
00:06:45,920 --> 00:06:50,040
साधवी सतम शिशु भारिया केवल अपनी

93
00:06:50,040 --> 00:06:54,080
है लेकिन अन्य साधु हैं ऐसे रूप में हम उनकी

94
00:06:54,080 --> 00:06:58,080
पूजा करें सतम शिशु हमारा जो बच्चा है

95
00:06:58,080 --> 00:07:02,760
यह सभी चीजें द्रव्य यज्ञ में आती हैं

96
00:07:02,760 --> 00:07:07,680
तप यज्ञ हमारा जो होता

97
00:07:07,680 --> 00:07:11,960
है वाणी का तप मन का तप

98
00:07:11,960 --> 00:07:15,960
यह सभी तप है द्रव्य यज्ञ है तपो यज्ञ

99
00:07:15,960 --> 00:07:20,800
है योग यज्ञ है स्वाध्याय यज्ञ है और सबसे

100
00:07:20,800 --> 00:07:25,200
उच्चतम जो है वह ज्ञान यज्ञ है

101
00:07:25,200 --> 00:07:29,840
ज्ञान यज्ञ क्या करता है जो द्रव्य

102
00:07:29,840 --> 00:07:34,000
हम करते हैं आहुति हम उसमें डालते हैं ठीक है तप

103
00:07:34,000 --> 00:07:38,160
यज्ञ हम करते हैं हमारे शारीरिक तप यज्ञ हो जाता है जो आहुतियां

104
00:07:38,160 --> 00:07:42,160
को देते हैं और एक चीज और मैं बता दूं

105
00:07:42,160 --> 00:07:46,320
बहुत संक्षिप्त में संकेत आ गया दो मिनट लूंगा केवल यह

106
00:07:46,320 --> 00:07:50,360
शकर क्षेत्र मनब से

107
00:07:50,360 --> 00:07:54,960
यहीं से चला शकर क्षेत्र से ही और समस्त मनम

108
00:07:54,960 --> 00:07:56,400
आरंभ होते हैं यहीं

109
00:07:56,400 --> 00:08:00,920
से होते हैं और सौर वंश भी ही से चला

110
00:08:00,920 --> 00:08:05,400
सूर्यवंश जो हुआ सूर्य भगवान ने यहीं तपस्या की उनके

111
00:08:05,400 --> 00:08:09,400
संताने प्राप्त हुई और चंद्र ने भी यहीं से

112
00:08:09,400 --> 00:08:13,760
तपस्या की चंद्रवंश भी यहीं से चला तो इसीलिए यहां

113
00:08:13,760 --> 00:08:17,880
कल्प देश्वर जो है समस्त सृष्टि यहीं से

114
00:08:17,880 --> 00:08:21,960
चली और एक और बात प्रधाना स्वरूपा सा गंगा

115
00:08:21,960 --> 00:08:26,440
भुवन पावनी विष्णु विग्रह संभूता द्रव रूपा सनातनी

116
00:08:26,440 --> 00:08:30,440
सनातनी गंगा जो सरोवर है ना वो गंगा जी यही

117
00:08:30,440 --> 00:08:34,600
विद्यमान है जब भागीरथी नहीं थे तो भागीरथी गंगा नहीं

118
00:08:34,600 --> 00:08:39,320
थी 5 भगवान जब पैर ऊपर नहीं गए थे तो

119
00:08:39,320 --> 00:08:43,320
आकाश गंगा नहीं थी तब गंगा कहां थी इस सूकर क्षेत्र

120
00:08:43,320 --> 00:08:47,520
में ही थी ऐसा परम दिव्य य सुकर क्षेत्र यह बरा

121
00:08:47,520 --> 00:08:51,640
भगवान की निर्माण स्थली है और उनकी प्रतिष्ठा स्थली

122
00:08:51,640 --> 00:08:55,720
है यही सभी के तन जुड़े हुए हैं इसलिए इसको

123
00:08:55,720 --> 00:09:01,480
सनातन तीर्थ कहते हैं सकर क्षेत्र धरा धाम

124
00:09:01,480 --> 00:09:05,720
की बारा भगवान की

125
00:09:05,720 --> 00:09:10,040
गंगा मैया की समस्त विदव जनों

126
00:09:10,040 --> 00:09:11,800
की मैं सभी को प्रणाम

127
00:09:11,800 --> 00:09:16,360
करता हूं मुझे आशीर्वाद दे के उत्तर उत्तर विद्यु

128
00:09:16,360 --> 00:09:20,880
की ऊर्जा बिना आशीर्वाद के कुछ नहीं है विप्र प्रसादा

129
00:09:20,880 --> 00:09:25,320
धरणी धरो विप प्रसादा कमला वहम

130
00:09:25,320 --> 00:09:30,280
य प्रणाम बहुत-बहुत साधुवाद

131
00:09:30,280 --> 00:09:34,600
नरेश बबिया जी ताव जी का अब हम शास्त्रार्थ के कार्यक्रम

132
00:09:34,600 --> 00:09:38,760
को आगे बढ़ाते हुए इसी श्रंखला में हमारे

133
00:09:38,760 --> 00:09:42,960
पास जो शास्त्रार्थ में प्रतिभागी हैं

134
00:09:42,960 --> 00:09:47,120
वह उनके चार समूहों में उनको वितरित किया

135
00:09:47,120 --> 00:09:51,760
गया है उनमें अलग-अलग

136
00:09:51,760 --> 00:09:56,000
राज्यों से अलग-अलग राज्यों से अलग-अलग जिलों

137
00:09:56,000 --> 00:10:00,280
से टीम पधारी है वैसे तो उत्तर भारत

138
00:10:00,280 --> 00:10:04,440
के ही ज्यादा है तो जो जैसे जैसे मैं उनका नाम

139
00:10:04,440 --> 00:10:08,640
लेता जाऊंगा वह अपना अपना स्थान ग्रहण करते जाए जो नोएडा

140
00:10:08,640 --> 00:10:13,120
से टीम आई है डॉक्टर करण सिंह जी

141
00:10:13,120 --> 00:10:17,240
डॉक्टर करण सिंह जी आप आए और अपना स्थान ग्रहण

142
00:10:17,240 --> 00:10:21,920
करें आचार्य शंकर मित्र शंकर मित्र

143
00:10:21,920 --> 00:10:26,000
जी आप भी अपना स्थान ग्रहण

144
00:10:26,000 --> 00:10:26,960
करें

145
00:10:26,960 --> 00:10:31,160
सुकांत आर्य जी जवीर सिंह जी

146
00:10:31,160 --> 00:10:35,440
प्राची ब्रह्मचारिणी भामती ब्रह्मचारिणी

147
00:10:35,440 --> 00:10:39,560
क्योंकि हमारे अतिथि को आने में थोड़ा सा विलंब है तो यह

148
00:10:39,560 --> 00:10:45,560
जो बात की होने वाली प्रक्रिया है उसको हम पूर्ण कर लेते

149
00:10:46,000 --> 00:10:52,000
हैं आप प्रथम टीम में है

150
00:11:01,600 --> 00:11:05,720
और इसी में डॉक्टर आचार्य दिवाकर

151
00:11:05,720 --> 00:11:09,720
जी वह भी स्थान ग्रहण करें प्रथम टीम में

152
00:11:09,720 --> 00:11:13,960
द्वितीय समूह जो है द्वितीय समूह में आचार्य देव स्वरूप जी

153
00:11:13,960 --> 00:11:18,120
आ जाइए सुधीर आर्य जी

154
00:11:18,120 --> 00:11:22,720
कमलेंद्र आर्य जी अनामिका ब्रह्मचारिणी

155
00:11:22,720 --> 00:11:27,200
संचिता ब्रह्मचारिणी साक्षी ब्रह्मचारिणी

156
00:11:27,200 --> 00:11:33,200
और राजेश आर्य जी

157
00:11:33,520 --> 00:11:37,920
हमारी जो तृतीय समूह है वह तृतीय

158
00:11:37,920 --> 00:11:41,960
समूह वैसे हमने उन्हें टब के माध्यम से

159
00:11:41,960 --> 00:11:46,120
फेसबुक के माध्यम से बहुत देखा है और लोग

160
00:11:46,120 --> 00:11:50,760
पसंद भी करते हैं तो आप नरवर से पधारे हैं

161
00:11:50,760 --> 00:11:55,480
और सांग वेद विद्यालय के प्रधान आचार्य हैं

162
00:11:55,480 --> 00:11:59,720
और मैं आचार्य ज्ञानेंद्र जी से अनुरोध

163
00:11:59,720 --> 00:12:05,720
करूंगा वह आकर के अपना स्थान ग्रहण

164
00:12:05,760 --> 00:12:09,960
करें इसी समूह में आचार्य जी के समूह में

165
00:12:09,960 --> 00:12:14,560
प्रेम मूर्ति पंकज मिश्र जी

166
00:12:14,560 --> 00:12:18,920
पंकज मिश्र जी हां जी और तृतीय

167
00:12:18,920 --> 00:12:23,040
प्रभाकर जी प्रभाकर जी भी इसी समूह

168
00:12:23,040 --> 00:12:27,680
में है तो आप भी आकर अपना सु स्थान ग्रहण करें

169
00:12:27,680 --> 00:12:32,320
और आपके यहां एक बहुत विशिष्ट छात्र है

170
00:12:32,320 --> 00:12:36,360
जिससे आपने परिचय भी कराया मैं चाहूंगा वह भी इस शास्त्रार्थ

171
00:12:36,360 --> 00:12:39,440
में सम्मिलित हो उपांशु

172
00:12:39,440 --> 00:12:43,600
और एक और भैया जी आए हैं शिवम

173
00:12:43,600 --> 00:12:49,600
जी तो आचार्य जी के साथ आप स्थान ग्रहण

174
00:12:51,320 --> 00:12:55,600
करें चतुर्थ जो समूह है चतुर्थ समूह

175
00:12:55,600 --> 00:12:59,640
सोरो सुकर क्षेत्र से है तो सकर

176
00:12:59,640 --> 00:13:03,720
क्षेत्र में जैसा हम सभी जानते हैं नरेश जी को

177
00:13:03,720 --> 00:13:07,960
तो मैं आचार्य श्री नरेश बवारिया जी से अनुरोध करूंगा

178
00:13:07,960 --> 00:13:13,000
कि वह भी आप अपना स्थान ग्रहण करें डॉक्टर

179
00:13:13,000 --> 00:13:17,200
अमरीश निर्भय जी आप भी वयोवृद्ध

180
00:13:17,200 --> 00:13:21,280
ज्ञान वृद्ध और आपका आशीर्वाद

181
00:13:21,280 --> 00:13:25,280
बना रहता है तो आप भी समूह में स्थान

182
00:13:25,280 --> 00:13:29,480
ग्रहण करें राहुल वशिष्ठ जी

183
00:13:29,480 --> 00:13:33,560
आचार्य राहुल वशिष्ठ जी आप चतुर्थ समूह में स्थान

184
00:13:33,560 --> 00:13:37,600
ग्रहण करें और हमारे तुलसी

185
00:13:37,600 --> 00:13:41,720
पीठ के पुजारी उपासक श्री मानवेंद्र गिरी जी

186
00:13:41,720 --> 00:13:45,720
महाराज वह भी चतुर्थ दल में अपना

187
00:13:45,720 --> 00:13:49,840
स्थान ग्रहण करें जैसा कि हम जानते

188
00:13:49,840 --> 00:13:54,040
हैं शास्त्रार्थ परंपरा प्राय विलुप्त प्रतीत होती

189
00:13:54,040 --> 00:13:58,480
है किंतु वर्तमान में बनारस इत्यादि

190
00:13:58,480 --> 00:14:03,080
में थोड़े-थोड़े कहीं ना कहीं अपने अपने प्रतिष्ठानों

191
00:14:03,080 --> 00:14:06,640
में चलती रहती है लेकिन इसको लुप्त प्राय

192
00:14:06,640 --> 00:14:10,760
परंपरा को श्री एसएस उपाध्याय

193
00:14:10,760 --> 00:14:15,480
जी ने बड़े प्रयासों के साथ पुनर्जीवित किया है

194
00:14:15,480 --> 00:14:19,920
और इसको आगे बढ़ाने का कार्य आप कर रहे हैं

195
00:14:19,920 --> 00:14:24,080
आपने प्रथम शास्त्रार्थ पहले लखनऊ में कराया था उसके

196
00:14:24,080 --> 00:14:28,160
उपरांत शैल में कार्यक्रम हुआ उसके उपरांत

197
00:14:28,160 --> 00:14:32,760
अयोध्या में कार्यक्रम हुआ और आपके संरक्षण में

198
00:14:32,760 --> 00:14:36,880
आपके दिशा निर्देशन में यह कार्यक्रम यहां सोर

199
00:14:36,880 --> 00:14:41,000
सुकर क्षेत्र में आयोजित हुआ है इसके लिए मैं पुनः पुनः

200
00:14:41,000 --> 00:14:45,440
आपका धन्यवाद और आभार व्यक्त करता हूं

201
00:14:45,440 --> 00:14:49,920
आगे के क्रम में इस शास्त्रार्थ सम्मेलन में जब

202
00:14:49,920 --> 00:14:54,320
जब हम एकत्रित हुए हैं तो इसके कुछ नियम है कानून

203
00:14:54,320 --> 00:14:58,560
है कायदे हैं जिनको हमें ध्यान में रखते हुए ही

204
00:14:58,560 --> 00:15:02,600
शास्त्र थ को करना पड़ेगा ऐसे शास्त्रार्थ

205
00:15:02,600 --> 00:15:06,720
की नियमावली प्रत्येक समूह के पास है लेकिन फिर भी मैं

206
00:15:06,720 --> 00:15:10,800
उसका वाचन करके आपको एक बार सुना देता हूं जिससे सुस्पष्ट

207
00:15:10,800 --> 00:15:14,840
हो जाएगा ठीक शास्त्रार्थ

208
00:15:14,840 --> 00:15:19,200
में कुल चार टीमें प्रतिभाग करेंगी जैसा आप सभी देख ही रहे हैं

209
00:15:19,200 --> 00:15:21,960
शास्त्रार्थ हेतु चयनित किए गए विषयों प्रश्नों

210
00:15:21,960 --> 00:15:26,120
की सूची एवं शास्त्रार्थ की नियमावली की कॉपी प्रतिभाग करने

211
00:15:26,120 --> 00:15:31,000
वाली टीम को उपलब्ध करवा दी जाएगी आपके पास पहुंच गया

212
00:15:31,000 --> 00:15:35,240
होगा शास्त्रार्थ की अवधि तीन घंटे होगी प्रत्येक

213
00:15:35,240 --> 00:15:39,920
टीम में न्यूनतम दो तथा अधिकतम पांच सदस्य

214
00:15:39,920 --> 00:15:44,200
होंगे लॉटरी पर्ची के माध्यम से टीमों के बोलने का क्रम

215
00:15:44,200 --> 00:15:48,200
निर्धारित किया जाएगा यद्यपि आप समूह में बैठ गए हैं एक दो तीन

216
00:15:48,200 --> 00:15:52,280
चार लेकिन लॉटरी के माध्यम से प्रथम कौन बोलेगा

217
00:15:52,280 --> 00:15:57,600
उसका निर्णय लॉटरी के माध्यम से होगा उसके उपरांत

218
00:15:57,600 --> 00:16:01,920
पांचवा नियम निर्धारित आठ प्रश्नों

219
00:16:01,920 --> 00:16:06,040
में से टीम द्वारा अपने लिए किसी एक प्रश्न का चयन करके

220
00:16:06,040 --> 00:16:10,200
शास्त्रार्थ की तिथि से पूर्व उसकी सूचना देनी होगी जैसा

221
00:16:10,200 --> 00:16:14,480
आप सभी ने हमें दे दिया यदि अपने द्वारा

222
00:16:14,480 --> 00:16:18,520
पूर्व में चयन किए गए किसी प्रश्न को कोई टीम अपने लिए असुविधा

223
00:16:18,520 --> 00:16:23,120
जनक पाती है तो उसे यह विकल्प होगा कि वह शास्त्रार्थ स्थल पर परर

224
00:16:23,120 --> 00:16:27,600
शेष अन्य टीमों से किसी एक टीम से प्रश्न को आपस में बदल सकते हैं

225
00:16:27,600 --> 00:16:31,640
है ना या आपके पास अब बैठने से पहले तक तो

226
00:16:31,640 --> 00:16:35,680
छूट थी कि भाई विषय सब्जेक्ट चेंज कर सकते थे लेकिन अब ये आपके

227
00:16:35,680 --> 00:16:37,440
पास से चली

228
00:16:37,440 --> 00:16:41,520
गई प्रत्येक टीम को परिवर्तित विषय प्रश्न पर अपने विचार

229
00:16:41,520 --> 00:16:45,560
रखने के लिए 15 मिनट का समय दिया जाएगा विशेष ध्यान इस बात

230
00:16:45,560 --> 00:16:49,760
का करें सभी समूह सभी समूह इस बात को

231
00:16:49,760 --> 00:16:54,000
ध्यान से सुन ले उनको बोलने का जो समय निर्धारण

232
00:16:54,000 --> 00:16:58,280
है वह 15 मिनट [संगीत] है 13

233
00:16:58,280 --> 00:17:02,360
मिनट पर बीतने पर पहली घंटी बजेगी 14 मिनट

234
00:17:02,360 --> 00:17:06,680
बीतने पर दूसरी घंटी तथा 15 मिनट पूरे होने पर तीसरी घंटी

235
00:17:06,680 --> 00:17:10,760
बजेगी और उसके 30 सेकंड के अंदर वक्ता को अनिवार्य रूप

236
00:17:10,760 --> 00:17:15,000
से अपना वक्तव्य समाप्त करना होगा टीम वक्ता के

237
00:17:15,000 --> 00:17:19,320
बोल लेने के पश्चात 5 मिनट का समय दूसरी टीमों को

238
00:17:19,320 --> 00:17:23,320
तथा श्रोता गण को वक्ता टीम से प्रश्न पूछने और उसको उत्तर

239
00:17:23,320 --> 00:17:27,560
देने के लिए दिया जावेगा आपने 15 मिनट में अपना विषय प्रतिपादन

240
00:17:27,560 --> 00:17:31,560
कर दिया बाकी के बचे जो पा मिनट है वह आपके सामने

241
00:17:31,560 --> 00:17:35,640
बैठे वाले दूसरे जो समूह हैं उन समूहों में से आपके लिए

242
00:17:35,640 --> 00:17:39,720
प्रश्न कर सकते हैं यदि ऊपर जो अतिथि

243
00:17:39,720 --> 00:17:44,640
बैठेंगे जो निर्णायक मंडल होगा अगर निर्णायक मंडल को लगेगा

244
00:17:44,640 --> 00:17:48,640
कि इस प्रश्न को और पूछा जा सकता है या इसमें और विस्तृत

245
00:17:48,640 --> 00:17:53,000
हो सकती है या किसी को जो शास्त्रार्थ

246
00:17:53,000 --> 00:17:57,080
श्रवण करने आए हैं उनको यदि किसी को शंका होती है तो वह

247
00:17:57,080 --> 00:18:01,840
भी उसमें से प्रश्न कर सकेंगे इन् पा मिनट के अंदर

248
00:18:01,840 --> 00:18:06,000
उसके उपरांत वक्ता के बोलने के दौरान उनकी टीम का अन्य

249
00:18:06,000 --> 00:18:10,120
सदस्य भी नियत समय अवधि 15 मिनट में ही अपनी बात रख सकेगा

250
00:18:10,120 --> 00:18:14,840
अर्थात प्रत्येक टीम को बोलने के लिए कुल 15 मिनट का ही समय मिलेगा

251
00:18:14,840 --> 00:18:18,840
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि एक टीम में पांच लोग हैं 15

252
00:18:18,840 --> 00:18:23,120
मिनट समय निर्धारित है अगर आप तीन बोलना चाहो तो पांच पांच मिनट

253
00:18:23,120 --> 00:18:27,240
करके तीन लोग बोल लो एक बोलना चाहो तो 15 मिनट पूरा आप बोल

254
00:18:27,240 --> 00:18:33,240
लो उसको समय को निर्धारण

255
00:18:34,440 --> 00:18:38,520
आप एक वक्ता के बोलने के दौरान दूसरा नहीं बोलेगा

256
00:18:38,520 --> 00:18:42,880
कोई स्पष्टीकरण मांगने के लिए अन्य टीम के सदस्य हाथ उठाकर

257
00:18:42,880 --> 00:18:48,880
संचालक मंडल की अनुमति से

258
00:18:49,040 --> 00:18:53,040
वक्ता शास्त्रार्थ है तो संवाद तो होगा ही तो ऐसा

259
00:18:53,040 --> 00:18:57,040
नहीं होगा कि एक वक्ता बोल रहा है उसी के बीच में अपनी बात शुरू कर दी उनको अपनी

260
00:18:57,040 --> 00:19:01,160
बात समापन करने दीजिए आप अपना हाथ खड़ा कर दीजिए मंच से

261
00:19:01,160 --> 00:19:05,240
निर्देशन होगा जिस समूह को निर्देशन होगा वो समूह का व्यक्ति प्रश्न

262
00:19:05,240 --> 00:19:09,600
पूछ सकता है यह बात स्पष्ट तरीके से जान ले

263
00:19:09,600 --> 00:19:15,600
आगे संचालक मंडल की

264
00:19:18,960 --> 00:19:23,040
अनुमति वक्ता से पुन पुनः प्रश्न अथवा अधि

265
00:19:23,040 --> 00:19:27,120
प्रश्न करने की अनुमति नहीं होगी ऐसा नहीं होगा निर्णायक मंडल में से किसी ने

266
00:19:27,120 --> 00:19:31,190
आपसे प्रश्न कर दिया तो आप आप पुनः प्रश्न निर्णायक मंडल में ही कर रहे

267
00:19:31,190 --> 00:19:37,190
[संगीत]

268
00:19:39,040 --> 00:19:43,040
हैं यह बात भी आप ध्यान में रखें

269
00:19:43,040 --> 00:19:47,080
उसके भी नंबर कटेंगे क्योंकि शास्त्रार्थ कर रहे

270
00:19:47,080 --> 00:19:53,080
हैं तो शास्त्र जैसा आचरण भी होना चाहिए

271
00:20:00,120 --> 00:20:04,320
प्रकार की भाषा का आचरण शैली का आप उपयोग करेंगे उसी तरह आशा

272
00:20:04,320 --> 00:20:08,520
है इसी प्रकार से आगे चलेगा वक्ता

273
00:20:08,520 --> 00:20:12,720
के बोल लेने के पश्चात निर्णायक मंडल अपनी टिप्पणी दे सकेगा और स्पष्टीकरण के

274
00:20:12,720 --> 00:20:18,720
लिए भी प्र

275
00:20:32,280 --> 00:20:36,360
आगे नियम प्रत्येक विषय पर टीम वक्ता के बोल लेने

276
00:20:36,360 --> 00:20:42,360
के पश्चात संबंधित विषय प्रश्न के निष्कर्ष को

277
00:20:42,960 --> 00:20:47,120
रिकॉर्ड मंडल शास्त्रार्थ के अंत में पढ़कर श्रोताओं को सुनाएंगे ताकि

278
00:20:47,120 --> 00:20:51,520
श्रोताओं को गिरात हो सके कि शास्त्रार्थ के लिए रखे गए प्रत्येक विषय प्रश्न पर

279
00:20:51,520 --> 00:20:55,680
विद्वानों द्वारा अपना अपना वक्तव्य रखने के पश्चात उनका अंतिम निष्कर्ष

280
00:20:55,680 --> 00:21:01,680
क्या निकला क्योंकि

281
00:21:03,840 --> 00:21:07,960
नी इत्यादि दही इत्यादि इत्यादि इत्यादि द्रव्य बनते हैं

282
00:21:07,960 --> 00:21:12,000
तो निष्कर्ष जो निकलेगा वह निर्णायक मंडल ही घोषित करेगा जो इस पर शास्त्रार्थ

283
00:21:12,000 --> 00:21:18,000
हुआ है तो इसका निष्कर्ष क्या निकल कर के आया

284
00:21:18,840 --> 00:21:23,360
है कथनों का खंडन करने तथा उनसे वाद विवाद में पढ़ने की अनुमति

285
00:21:23,360 --> 00:21:27,440
नहीं होगी यह बहुत स्पष्ट तरीके से जान ले जैसा मैं इस बात पर पुनः पुनः

286
00:21:27,440 --> 00:21:32,080
जोर दे रहा हूं और ये बात कई बार की है और कई बार हो जाती है

287
00:21:32,080 --> 00:21:36,600
आप जितने भी वक्ता हैं जितने भी टीम के सदस्य हैं पुनः

288
00:21:36,600 --> 00:21:40,600
निर्णायक मंडल से बहस नहीं कर सकते किसी भी प्रकार का

289
00:21:40,600 --> 00:21:44,680
आप बाद प्रकार का आप वाद विवाद निर्णायक मंडल में नहीं

290
00:21:44,680 --> 00:21:48,680
कर सकते अगर आपको बात करनी है तो बाद में आप बैठ

291
00:21:48,680 --> 00:21:53,160
कर के बात करें कोई दिक्कत वाली बात नहीं है शास्त्रार्थ की भाषा हिंदी होगी

292
00:21:53,160 --> 00:21:57,160
में नहीं आते इसीलिए ही शास्त्रार्थ किया जा रहा है वरना कुछ और

293
00:21:57,160 --> 00:22:03,160
होता बाकी सब समझदार है है ना शेरो शायरी कहां हो रहे

294
00:22:06,080 --> 00:22:10,080
हैं कहने की आवश्यकता नहीं है कि शास्त्रार्थ के दौरान

295
00:22:10,080 --> 00:22:14,280
वक्ताओं को शालीनता गंभीरता व गरमा बनाए रखने की हो बनाए रखनी

296
00:22:14,280 --> 00:22:18,600
होगी शास्त्रार्थ के दौरान किसी पंथ गुरु अथवा

297
00:22:18,600 --> 00:22:22,800
वक्ता के प्रति अमर्यादित भाषा अथवा शब्दों का प्रयोग वर्जित है

298
00:22:22,800 --> 00:22:27,200
आप किसी भी पंथ के विषय में समुदाय के विषय में किसी भी अमर्यादित

299
00:22:27,200 --> 00:22:31,720
भाषा का असं वधान भाषा का उपयोग नहीं कर सकते हैं संवैधानिक भाषा

300
00:22:31,720 --> 00:22:35,760
के अंतर्गत रहकर ही आप बात करेंगे किसी

301
00:22:35,760 --> 00:22:40,120
टीम वक्ता को दूसरी टीम वक्ता से विवाद करने आक्षेप अथवा अशोभनीय टीका

302
00:22:40,120 --> 00:22:44,120
टिप्पणी करने की कदापि अनुमति नहीं होगी ऐसा करने पर संचालक मंडल

303
00:22:44,120 --> 00:22:48,840
प्रथम बार चेतावनी दे सकेगा और पुनरावृत्ति होने पर

304
00:22:48,840 --> 00:22:52,840
संबंधित वक्ता अथवा टीम को कार्यक्रम स्थल से चले जाने के

305
00:22:52,840 --> 00:22:56,880
लिए भी कह सकता है आप किसी भी प्रकार का

306
00:22:56,880 --> 00:23:00,920
विवाद यहां नहीं करेंगे यदि आप विवाद करते हैं तो संचालक मंडल आपको

307
00:23:00,920 --> 00:23:05,600
जाने की अनुमति हाथ जोड़ कर के कर सकता है कि भैया कोई दिक्कत नहीं

308
00:23:05,600 --> 00:23:09,680
टीम में वक्ता अपने द्वारा की गई किसी टीका टिप्पणी के लिए स् स्वयं

309
00:23:09,680 --> 00:23:13,960
वैधानिक रूप से उत्तरदाई होंगे ना कि आयोजक अथवा संचालक मंडल

310
00:23:13,960 --> 00:23:18,200
आप जो भी टिप्पणी करेंगे उसके आप उत्तरदाई हैं कोई संचालक मंडल

311
00:23:18,200 --> 00:23:21,160
या कोई निर्णायक मंडल उसका उत्तरदाई नहीं होगा किसी

312
00:23:21,160 --> 00:23:25,160
वक्ता का वक्तव्य अथवा प्रश्न उत्तर अच्छा लगने पर श्रोता तथा

313
00:23:25,160 --> 00:23:29,280
दूसरी टीमों के सदस्यगण वक्ता की प्रशंसा में नांक शब्द

314
00:23:29,280 --> 00:23:33,680
बोलकर वक्ता का उत्साह वर्धन कर सकेंगे शोभन शोभन

315
00:23:33,680 --> 00:23:37,800
सुंदरम सुंदरम साधु साधु अति उत्तम अति

316
00:23:37,800 --> 00:23:42,080
उत्तम क्योंकि यह शास्त्र की शास्त्रार्थ है और विद्वानों की संगोष्ठी

317
00:23:42,080 --> 00:23:46,240
है तो उसी प्रकार के शब्दों का हम उपयोग करेंगे

318
00:23:46,240 --> 00:23:50,280
वक्ताओं की विद्युत व दक्षता का विनिश्चय पांच सदस्य निर्णायक मंडल

319
00:23:50,280 --> 00:23:54,640
द्वारा किया जाएगा जैसा यहां पर निर्णायक मंडल होगा निर्णायक मंडल के वरिष्ठ

320
00:23:54,640 --> 00:23:58,840
दम सदस्य निर्णायक मंडल के अध्यक्ष होंगे शास्त्रार्थ के दौरान

321
00:23:58,840 --> 00:24:02,880
प्रत्येक टीम की विद्युत व दक्षता का म मूल्यांकन 100

322
00:24:02,880 --> 00:24:07,040
पूर्णांकों में किया जावेगा ठीक निर्णायक मंडल के अध्यक्ष

323
00:24:07,040 --> 00:24:11,800
तथा प्रत्येक सदस्य के पास 2020 अंक होंगे जैसा कि

324
00:24:11,800 --> 00:24:16,080
सभी को पता है पांच निर्णायक मंडल बैठेंगे 20-20 अंक सभी के पास होंगे

325
00:24:16,080 --> 00:24:20,800
पंचों द्वारा किए गए अंकों के योग के आधार पर निर्णायक मंडल द्वारा विजेता

326
00:24:20,800 --> 00:24:24,840
उपविजेता एवं सांत्वना विजेता का निर्णय किया जावेगा जिसकी

327
00:24:24,840 --> 00:24:29,080
घोषणा निर्णायक मंडल के अध्यक्ष अथवा उनके कहने पर अन्य सदस्य

328
00:24:29,080 --> 00:24:33,080
द्वारा की जावेगी पांच श्रेष्ठ वक्ताओं

329
00:24:33,080 --> 00:24:36,520
को वरीयता अनुसार प्रशस्ति पत्र तथा शास्त्रार्थ

330
00:24:36,520 --> 00:24:41,680
में प्रतिभाग करने वाले वक्ता गण को भी प्रमाण दिया

331
00:24:41,680 --> 00:24:45,960
जावेगा जो निर्णायक मंडल के अध्यक्ष एवं सदस्यगण द्वारा हस्ताक्षरित

332
00:24:45,960 --> 00:24:50,040
होगा परिणाम की घोषणा अध्यक्ष द्वारा शास्त्रार्थ कार्यक्रम के अंत

333
00:24:50,040 --> 00:24:54,440
में किया जावेगा वक्तव्य के दौरान वक्ता का मोबाइल

334
00:24:54,440 --> 00:24:58,560
दूर रख देना भाई जिस जिसके पास हो देख लेना सारे समूह में किसी के पास

335
00:24:58,560 --> 00:25:02,840
मोबाइल ना हो और अगर मोबाइल हो तो उसको ऑफ कर करके जेब में रख ले क्योंकि उसका उपयोग

336
00:25:02,840 --> 00:25:05,840
ना करें यह बेईमानी

337
00:25:05,840 --> 00:25:11,840
होगी किसी भी प्रकार

338
00:25:12,640 --> 00:25:16,880
का मोबाइल अथवा पुस्तकों आदि का उपयोग करने की अनुमति नहीं होगी

339
00:25:16,880 --> 00:25:20,880
जो भी लिखना है आप लिख लीजिए डायरी में जो याद आ रहा है आप नोट डाउन कर लीजिए आपको

340
00:25:20,880 --> 00:25:24,920
डायरी पहन दी गई है लेकिन किसी भी प्रकार की पुस्तक आप अपने पास नहीं

341
00:25:24,920 --> 00:25:29,080
रखेंगे जिससे आप बोल करके वो करें वक्तव्य के दौरान

342
00:25:29,080 --> 00:25:33,240
वक्ता को अपने मन पंथ मत संप्रदाय गुरु आदि की प्रशंसा अथवा

343
00:25:33,240 --> 00:25:37,280
श्रेष्ठता सिद्ध करने के बजाय परिवर्तित विषय प्रश्न परही अपना

344
00:25:37,280 --> 00:25:41,320
वक्तव्य केंद्रित करते हुए अपना वक्तव्य रखना होगा परंतु वक्ता

345
00:25:41,320 --> 00:25:45,320
अपने संप्रदाय गुरु व उसकी किसी रचना से उदाहरण आदि अपनी

346
00:25:45,320 --> 00:25:49,360
बात के समर्थन में दे सकेगा ठीक है आप किसी गुरु से जुड़े

347
00:25:49,360 --> 00:25:53,480
हैं किसी पंथ से जुड़े हैं किसी संप्रदाय से जुड़े हैं किसी भी पर गुरु परंपरा से जुड़े

348
00:25:53,480 --> 00:25:58,440
हैं तो आप अपनी गुरु परंपरा के विषय में प्रशंसा तो अ

349
00:25:58,440 --> 00:26:02,600
विषय से परिवर्तित होकर के आप अपने गुरु के विषय में प्रशंसा करने लगे उसके

350
00:26:02,600 --> 00:26:06,800
लिए आप यह शास्त्रार्थ आयोजित नहीं हुआ है शास्त्रार्थ विषय के लिए

351
00:26:06,800 --> 00:26:10,920
आयोजित हुआ है तो आप विषय पर ही बोले और उन्होंने जो कहा है

352
00:26:10,920 --> 00:26:15,160
आपके गुरु ने या पंथ में संप्रदाय में आपके ग्रंथ में जो लिखा है उसका आप प्रमाण

353
00:26:15,160 --> 00:26:19,280
दे सकते हैं शास्त्रार्थ कार्यक्रम

354
00:26:19,280 --> 00:26:23,640
में प्रतिभागियों को संचालक मंडल द्वारा किसी प्रकार का पारितोषिक यात्रा

355
00:26:23,640 --> 00:26:27,760
व इत्यादि अथवा धन आदि दे नहीं होगा अपितु शास्त्रार्थ कार्यक्रम

356
00:26:27,760 --> 00:26:32,440
में उनका पूर्णता इच्छिक है अ व धनाप पेक्षा य

357
00:26:32,440 --> 00:26:36,760
जैसा हमें सभी को पता है कार्यक्रम के अंत में श्रोताओं की टिप्पणियां

358
00:26:36,760 --> 00:26:40,880
जानने के लिए दो चार श्रोताओं से संपन्न हुए मतलब यहां

359
00:26:40,880 --> 00:26:44,880
तो काफी है दो चार तो नहीं है तो श्रोताओं से संपन्न हुए शास्त्रार्थ

360
00:26:44,880 --> 00:26:49,000
कार्यक्रम पर दो-तीन मिनट में उनके विचार जानने के लिए निर्णायक मंडल

361
00:26:49,000 --> 00:26:53,440
उनके कुछ बोलने हेतु आग्रह कर सकेगा जैसा विद्वान

362
00:26:53,440 --> 00:26:57,760
तो शास्त्रार्थ करने के लिए बैठे ही हैं लेकिन यदि श्रोताओं में भी कोई प्रश्न होगा

363
00:26:57,760 --> 00:27:01,880
तो निर्णायक मंडल उनसे पूछ सकेगा कि भाई कोई आपको प्रश्न इत्यादि हो कोई

364
00:27:01,880 --> 00:27:06,200
शंका हो तो आप बता दे कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागी गण एवं आमंत्रित

365
00:27:06,200 --> 00:27:10,520
अतिथियों हेतु सूक्ष्म वैदिक जलपान तथा मध्यान भोजन की व्यवस्था

366
00:27:10,520 --> 00:27:15,000
रहेगी जैसा सभी को पता है इसी प्रकार के शास्त्रार्थ

367
00:27:15,000 --> 00:27:17,680
के नियम

368
00:27:17,680 --> 00:27:22,040
थे इसके उपरांत

369
00:27:22,040 --> 00:27:26,640
हम कार्यक्रम [संगीत]

370
00:27:26,640 --> 00:27:32,640
को आगे बढ़ते हुए आगे बढ़ाने की श्रंखला

371
00:27:38,840 --> 00:27:43,200
में मैं मंच पर अतिथियों का आवाहन

372
00:27:43,200 --> 00:27:45,480
करना

373
00:27:45,480 --> 00:27:49,680
चाहूंगा तो इस कार्यक्रम के

374
00:27:49,680 --> 00:27:53,960
शास्त्रार्थ स्पर्धा के अध्यक्ष के रूप

375
00:27:53,960 --> 00:27:58,280
में माननीय श्री न्याया

376
00:27:58,280 --> 00:28:02,320
श्री एसएस उपाध्याय जी को मैं आमंत्रित करूंगा कि वह

377
00:28:02,320 --> 00:28:06,600
आए और मंच पर अपना स्थान ग्रहण करें और मंच की शोभा

378
00:28:06,600 --> 00:28:11,200
को बढ़ाएं हम सब कतल ध्वनि से उनका स्वागत

379
00:28:11,200 --> 00:28:15,280
करें आपने वेदों के प्रति शास्त्र के प्रति

380
00:28:15,280 --> 00:28:19,600
सनातन संस्कृति के प्रति बहुत सारे काम किए हैं आपकी

381
00:28:19,600 --> 00:28:23,960
बुक हिंदुत्व चैलेंजिंग हिंदू चैलेंजिंग हिंदू इत्यादि

382
00:28:23,960 --> 00:28:27,960
और द ग्लोबल राम जिसका विमोचन अयोध्या में हुआ था वह पढ़ने योग

383
00:28:27,960 --> 00:28:32,000
है प्रशंसनीय योग है और अमेरिका में

384
00:28:32,000 --> 00:28:36,120
बेस्ट सेलर है आपकी बुक सनातन संस्कृति के विषय में आपने

385
00:28:36,120 --> 00:28:37,120
बहुत गहन अध्ययन

386
00:28:37,120 --> 00:28:41,600
किया है न्याय के विषय में भी और बहुत सारे लोगों को आपने पढ़ाया है

387
00:28:41,600 --> 00:28:45,680
वर्तमान में पुलिस लाइन में भी

388
00:28:45,680 --> 00:28:50,560
आप पढ़ा करके आ रहे हैं और [संगीत]

389
00:28:50,560 --> 00:28:54,640
बड़े व्यस्ततम समय में से आपने समय निकाल कर के हमें समय

390
00:28:54,640 --> 00:28:58,880
दिया इसी अतिथि की श्रंखला

391
00:28:58,880 --> 00:29:03,480
में मैं निमंत्रित करना चाहूंगा आदरणीय

392
00:29:03,480 --> 00:29:07,560
श्री प्रोफेसर डॉक्टर राम सेवक दुबे जी

393
00:29:07,560 --> 00:29:11,760
कुलपति जगतगुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय

394
00:29:11,760 --> 00:29:16,240
व आए और आप मुख्य अतिथि के रूप पर आसन

395
00:29:16,240 --> 00:29:20,440
हो आपके पास भी बहुत व्यस्ततम समय है

396
00:29:20,440 --> 00:29:25,360
जैसा आप देख पा रहे हैं कि

397
00:29:25,360 --> 00:29:29,360
वयोवृद्ध भी है और जयपुर से चलकर के आना और इस

398
00:29:29,360 --> 00:29:33,680
समय में यात्रा करना आपके लिए कितना वो है लेकिन

399
00:29:33,680 --> 00:29:37,840
अपना बालक जान कर के अपना शिष्य जान करर ने गुरु ने कृपा

400
00:29:37,840 --> 00:29:43,840
की है और आपने कृपा कर आप पधारे हैं आपका बहुत-बहुत

401
00:29:56,600 --> 00:30:01,800
धन्यवाद इसी अतिथि के क्रम में मैं

402
00:30:01,800 --> 00:30:06,040
आगे बुलाना चाहूंगा डॉक्टर

403
00:30:06,040 --> 00:30:10,040
शास्त्री श्री कौश कौशलेंद्र दास जी आप

404
00:30:10,040 --> 00:30:14,160
आए और मंच को सुशोभित करें आप जगतगुरु

405
00:30:14,160 --> 00:30:18,320
रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय में दर्शन और योग

406
00:30:18,320 --> 00:30:22,560
विभाग के अध्यक्ष हैं और आपकी आपका

407
00:30:22,560 --> 00:30:28,240
आशीर्वाद आपकी कृपा दृष्टि बनी हुई है और

408
00:30:28,240 --> 00:30:32,640
ना कि गुरु मेहरवान तो चेला पहलवान तो

409
00:30:32,640 --> 00:30:36,920
आपकी कृपा दृष्टि है जो अतिथि मंडल आपको दिख रहा है

410
00:30:36,920 --> 00:30:40,960
तो आपकी ही कृपा दृष्टि है आपके कहने पर गुरु जी को

411
00:30:40,960 --> 00:30:45,040
बार-बार अनुग्रह आग्रह करने पर आपने कृपा की है ऐसे

412
00:30:45,040 --> 00:30:49,400
ही गुरु की पंक्तियों में मैं आगे अपने गुरु जी

413
00:30:49,400 --> 00:30:53,920
जगतगुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के

414
00:30:53,920 --> 00:30:58,560
वेद विभाग के अध्यक्ष तथा मंत्र यंत्र और तंत्र

415
00:30:58,560 --> 00:31:03,480
प्र मंत्र यंत्र प्रतिष्ठान के निदेशक आदरणीय डॉक्टर श्री

416
00:31:03,480 --> 00:31:08,080
देवेंद्र शर्मा जी को निमंत्रित करूंगा व आए और मंच की शोभा बनाए

417
00:31:08,080 --> 00:31:11,880
राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय में एक नई

418
00:31:11,880 --> 00:31:15,960
परंपरा को चालू किया गया है जहां पर मंत्र यंत्र

419
00:31:15,960 --> 00:31:20,040
और तंत्र तीनों पर प्रयोग होकर के वैज्ञानिक रूप से चिकित्सा

420
00:31:20,040 --> 00:31:24,280
की जा रही है आप उसके निदेशक हैं

421
00:31:24,280 --> 00:31:29,320
तो आप भी आए और मंच की शोभा को बढ़ा

422
00:31:29,320 --> 00:31:33,640
इसी पंक्ति के अतिथि स्वागत के क्रम में आगे बढ़ते

423
00:31:33,640 --> 00:31:38,320
हुए मैं आवाहन करना चाहूंगा डॉक्टर श्री

424
00:31:38,320 --> 00:31:42,600
अशोक रुस्त कीी जी का आप प्राचार्य केपीजी कॉलेज कासगंज

425
00:31:42,600 --> 00:31:46,680
से हैं और आपका भी विशेष आशीर्वाद रहता

426
00:31:46,680 --> 00:31:50,760
है जैसा आप सभी जानते हैं कि तुलसी संगोष्ठी हुई थी उसमें

427
00:31:50,760 --> 00:31:54,880
भी आप पधारे थे और आप

428
00:31:54,880 --> 00:31:58,920
कृपा करते रहते हैं तो मैं पुन पुन आपको आमंत्रित करना

429
00:31:58,920 --> 00:32:04,240
चाहूंगा आप आए और मंच को शोभायमान करें इसी

430
00:32:04,240 --> 00:32:10,240
अगले अतिथियों के क्रम

431
00:32:11,560 --> 00:32:15,560
में मैं निमंत्रित करना चाहूंगा डॉक्टर श्री

432
00:32:15,560 --> 00:32:19,560
सुरेश शास्त्री जी को यह पूर्व प्रधानाचार्य भारतीय इंटर कॉलेज

433
00:32:19,560 --> 00:32:23,600
राई एटा से हैं आप भी

434
00:32:23,600 --> 00:32:27,960
विशिष्ट अतिथि के रूप में पधारे हैं निर्णायक मंडल के रूप में पधारे हैं

435
00:32:27,960 --> 00:32:33,960
आप आए और मंच को शोभायमान करें

436
00:33:15,400 --> 00:33:21,400
हेलो हेलो हेलो

437
00:33:37,600 --> 00:33:41,720
मैं मंच पर आसीन अतिथियों से निवेदन करूंगा कि

438
00:33:41,720 --> 00:33:45,960
आप आए और भगवान वरा और मां गंगा

439
00:33:45,960 --> 00:33:51,960
के समक्ष दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का आरंभ करें

440
00:34:01,280 --> 00:34:04,120
वैदिक

441
00:34:04,120 --> 00:34:10,120
विद्वान मंत्र पाठ

442
00:34:12,880 --> 00:34:16,200
करें हरि

443
00:34:16,200 --> 00:34:20,560
ओम चंद्रमा मनसो

444
00:34:20,560 --> 00:34:26,560
जात चो सरज

445
00:34:26,720 --> 00:34:30,840
अजत

446
00:34:30,840 --> 00:34:36,840
रावा मुगने [संगीत]

447
00:34:37,160 --> 00:34:42,840
रजता रा

448
00:34:42,840 --> 00:34:47,560
काया मा देवा भद

449
00:34:47,560 --> 00:34:53,040
प मा

450
00:34:53,040 --> 00:34:58,280
जातरा [संगीत] रंग

451
00:34:58,280 --> 00:35:03,200
हे रव्या माहे

452
00:35:03,200 --> 00:35:05,520
वाहेता

453
00:35:05,520 --> 00:35:10,680
जादा ता मेनु शरदो

454
00:35:10,680 --> 00:35:15,080
अति देवा जतरास

455
00:35:15,080 --> 00:35:19,520
चकरा र संतन

456
00:35:19,520 --> 00:35:21,640
नाममा

457
00:35:21,640 --> 00:35:27,640
उतरास जतरा पितरो भवंतु

458
00:35:28,200 --> 00:35:33,880
[संगीत] मयारी खाता

459
00:35:33,880 --> 00:35:36,040
गंतो

460
00:35:36,040 --> 00:35:39,240
आद

461
00:35:39,240 --> 00:35:43,640
राध माध माता

462
00:35:43,640 --> 00:35:49,120
सा पिता सा पुत्रा विश्वे

463
00:35:49,120 --> 00:35:51,240
देवा

464
00:35:51,240 --> 00:35:57,240
आ पंच जना अमा

465
00:36:01,910 --> 00:36:07,040
[संगीत] शांतिर तर

466
00:36:07,040 --> 00:36:11,920
शांति पथवी शांति

467
00:36:11,920 --> 00:36:17,920
रा शांति रोख दया

468
00:36:18,040 --> 00:36:20,920
शांति

469
00:36:20,920 --> 00:36:26,920
वनस्पति शत विश्वे देवा

470
00:36:28,040 --> 00:36:33,480
ब्रह्मा शांति सर्व

471
00:36:33,480 --> 00:36:37,960
शांति शांतिरे

472
00:36:37,960 --> 00:36:42,680
वसंति सामा शांति रे

473
00:36:42,680 --> 00:36:47,840
जी यतो यता सम

474
00:36:47,840 --> 00:36:52,640
हसे ततो नो अभय

475
00:36:52,640 --> 00:36:58,640
कुरु सना कुरुप ा

476
00:36:59,840 --> 00:37:05,840
भना

477
00:37:05,880 --> 00:37:10,520
बासिया आचार्य जी का बहुत-बहुत धन्यवाद अतिथि

478
00:37:10,520 --> 00:37:15,080
की श्रंखला में मैं आवाहन करना चाहूंगा माननीय

479
00:37:15,080 --> 00:37:21,080
न्यायाधीश श्री पीएन पाराशर जी का

480
00:37:23,440 --> 00:37:27,560
आप भूल के लिए क्षमा चाहूंगा

481
00:37:27,560 --> 00:37:31,880
आप मंच पर सारस्वत अतिथि का स्थान

482
00:37:31,880 --> 00:37:37,880
ग्रहण

483
00:37:39,240 --> 00:37:45,240
करें सभी लोग कतल ध्वनि से उनका स्वागत

484
00:37:49,560 --> 00:37:53,680
करें हेलो हेलो शास्त्रार्थ श्रंखला को आगे

485
00:37:53,680 --> 00:37:59,680
बढ़ाते हुए बहुत लंबा ना खींचते हुए मैं अनुरोध करूंगा

486
00:37:59,760 --> 00:38:03,920
हेलो हेलो मैं श्रीमती चंद्रपति कन्या महाविद्यालय

487
00:38:03,920 --> 00:38:08,200
की छात्राओं से कि आप वेद पाठ कर कर वेद

488
00:38:08,200 --> 00:38:14,200
पाठ कर मंगलाचरण कर कार्यक्रम का शुभारंभ करें

489
00:38:27,880 --> 00:38:31,560
अथ वैदिक

490
00:38:31,560 --> 00:38:34,640
मंगलाचरण

491
00:38:34,640 --> 00:38:38,520
ओम

492
00:38:38,520 --> 00:38:42,760
काया नश

493
00:38:42,760 --> 00:38:47,090
त्रा [संगीत] अवता

494
00:38:47,090 --> 00:38:50,200
[संगीत]

495
00:38:50,200 --> 00:38:56,060
उती सदा वध सा

496
00:38:56,060 --> 00:39:00,440
[संगीत]

497
00:39:00,440 --> 00:39:05,320
होहाई [संगीत] करा

498
00:39:05,320 --> 00:39:08,680
सचाई सय

499
00:39:08,680 --> 00:39:13,040
हो

500
00:39:13,040 --> 00:39:17,800
हिमा बार तो

501
00:39:17,800 --> 00:39:23,440
हो हाई

502
00:39:23,440 --> 00:39:29,160
कावा सयो मा

503
00:39:29,160 --> 00:39:35,160
ना मा हिमा

504
00:39:35,960 --> 00:39:39,400
साधं

505
00:39:39,400 --> 00:39:42,640
सा

506
00:39:42,640 --> 00:39:45,440
होहाई

507
00:39:45,440 --> 00:39:50,680
दृढ़ चदा रजऊ

508
00:39:50,680 --> 00:39:56,680
हो हिमा

509
00:39:58,560 --> 00:40:01,600
सो

510
00:40:01,600 --> 00:40:05,400
होहाई

511
00:40:05,400 --> 00:40:09,360
आभी सुना

512
00:40:09,360 --> 00:40:12,720
साखी

513
00:40:12,720 --> 00:40:18,560
ना पता जरा

514
00:40:18,560 --> 00:40:22,080
त्र

515
00:40:22,080 --> 00:40:25,080
होहा

516
00:40:25,080 --> 00:40:28,280
शता भवा

517
00:40:28,280 --> 00:40:30,520
सी

518
00:40:30,520 --> 00:40:34,880
हो

519
00:40:34,880 --> 00:40:38,400
हेमा

520
00:40:38,400 --> 00:40:41,640
यो

521
00:40:41,640 --> 00:40:45,950
होहाई इति वैदिक मंगला चरण

522
00:40:45,950 --> 00:40:51,950
[संगीत]

523
00:40:57,600 --> 00:41:02,800
ब्रह्मचारिणी हों का बहुत-बहुत धन्यवाद बहुत-बहुत

524
00:41:02,800 --> 00:41:07,000
आभार जैसा आज

525
00:41:07,000 --> 00:41:11,000
देखने को मिलता है कि आज बातें करते हैं कि भाई महिला सशक्तिकरण

526
00:41:11,000 --> 00:41:15,200
हो समानता का अधिकार हो यह सारी बातें हो और

527
00:41:15,200 --> 00:41:19,320
सनातन धर्म बड़ा पीछे है महिलाओं को अधिकार नहीं देता इस

528
00:41:19,320 --> 00:41:23,480
प्रकार की कई सारी भ्रांतियां इस समाज में फैली हुई है जब

529
00:41:23,480 --> 00:41:27,680
हम अपनी वैदिक सनातन संस्कृति को देखते हैं तो हम याद

530
00:41:27,680 --> 00:41:32,160
करते हैं कि गार्गी और याग वलक जी का जो संवाद है जो शास्त्रार्थ है

531
00:41:32,160 --> 00:41:34,280
व उससे सब सुपरिचित है

532
00:41:34,280 --> 00:41:38,600
और ऐसी कई विदिया हमारे सनातन संस्कृति

533
00:41:38,600 --> 00:41:42,720
में सनातन धर्म में हुई हैं जिन्होंने सनातन संस्कृति

534
00:41:42,720 --> 00:41:47,000
को जाना है पढ़ा है समझा है और अपने बच्चों

535
00:41:47,000 --> 00:41:51,680
में संस्कारित करके उसको आगे बढ़ाया है

536
00:41:51,680 --> 00:41:57,680
मैं अधिक समय नहीं लूंगा इसी

537
00:41:58,280 --> 00:42:03,440
शास्त्रार्थ की श्रंखला को आगे बढ़ाते हुए मैं अनुरोध

538
00:42:03,440 --> 00:42:07,520
करूंगा आदरणीय श्री राहुल वशिष्ठ

539
00:42:07,520 --> 00:42:11,680
जी से कि वह लौकिक मंगलाचरण करके कार्यक्रम का शुभारंभ

540
00:42:11,680 --> 00:42:17,680
करें

541
00:42:53,040 --> 00:42:58,120
हेलो सभी को सादर नमन

542
00:42:58,120 --> 00:43:02,760
मंगलम भगवान विष्णु मंगलम

543
00:43:02,760 --> 00:43:08,320
गरुण धवज मंगलम

544
00:43:08,320 --> 00:43:13,080
पुंडरीकाक्ष मंगलायतन

545
00:43:13,080 --> 00:43:17,880
हरि शांताकारम भुजग शनम

546
00:43:17,880 --> 00:43:22,520
पद्मनाभम सुरेशम विश्वाम

547
00:43:22,520 --> 00:43:28,240
गगन सदृश मेघ वर्णम शुभांग

548
00:43:28,240 --> 00:43:33,240
लक्ष्मीकांतम कमल नयनम योग विर ध्यान

549
00:43:33,240 --> 00:43:37,760
गम्यम वंदे विष्णु भव भय हरम

550
00:43:37,760 --> 00:43:43,760
सर्व लोकक नाथम

551
00:44:45,520 --> 00:44:46,020
बहुत-बहुत

552
00:44:45,880 --> 00:44:50,280
धन्यवाद बहुत-बहुत आभार आपने मंगलाचरण कर

553
00:44:50,280 --> 00:44:54,800
इस कार्यक्रम का शुभारंभ किया आगे

554
00:44:54,800 --> 00:44:59,440
कार्यक्रम की श्रंखला को बढ़ाते हुए हुए

555
00:44:59,440 --> 00:45:05,400
मैं कतल ध्वनि से सभी लोग स्वागत करते

556
00:45:05,400 --> 00:45:09,400
रहे तीनों लोग मिलकर के आदरणीय को

557
00:45:09,400 --> 00:45:15,400
स्मृति चिन्ह भेंट करें

558
00:45:33,240 --> 00:45:37,320
मैं मुख्य अतिथि के स्वागत

559
00:45:37,320 --> 00:45:42,760
सत्कार के लिए आमंत्रित करूंगा डॉक्टर

560
00:45:42,760 --> 00:45:46,800
श्री सुरेंद्र बाबू जी आप आए और हमारे

561
00:45:46,800 --> 00:45:51,240
मुख्य अतिथि को माल्यार्पण

562
00:45:51,240 --> 00:45:55,880
माल्यार्पण कर स्वागत करें एवं श्री

563
00:45:55,880 --> 00:46:00,320
संजय उपाध्याय जी जी और छोटू जी

564
00:46:00,320 --> 00:46:04,600
आप आए मुख्य अतिथि का स्वागत एवं सत्कार करें तथा स्मृति

565
00:46:04,600 --> 00:46:09,400
चिन्ह भेट करें हा हां जी बक

566
00:46:09,400 --> 00:46:13,760
विराज हमारे नगर के यशस्वी

567
00:46:13,760 --> 00:46:18,040
अध्यक्ष महोदय हमारे समक्ष उपस्थित है आप भी स्थान स्वीकार करें

568
00:46:18,040 --> 00:46:24,040
और तथा सभी कतल ध्वनि से आपका स्वागत

569
00:46:24,560 --> 00:46:30,560
करें माला स्मृति चि

570
00:46:52,720 --> 00:46:58,720
हा तीनों लोग सम्मिलित हो करर के स्मृति चिन्ह भेट करें

571
00:46:59,480 --> 00:47:03,840
मैं अतिथि सत्कार की इसी श्रंखला में

572
00:47:03,840 --> 00:47:07,880
निवेदन करना चाहूंगा हमारे सारस्वत अतिथि न्यायाधीश श्री

573
00:47:07,880 --> 00:47:12,120
पीएन पाराशर जी के स्वागत के लिए नगरपालिका

574
00:47:12,120 --> 00:47:16,120
अध्यक्ष श्री रामेश्वर दयाल महेरे जी आप अतिथि

575
00:47:16,120 --> 00:47:20,400
को शॉल उड़ा कर के तथा श्री संतोष मिश्र जी आप

576
00:47:20,400 --> 00:47:23,920
दुपट्टा उड़ा कर के

577
00:47:23,920 --> 00:47:27,960
तथा सुरेंद्र जी आप पहना करके

578
00:47:27,960 --> 00:47:31,520
अतिथि का स्वागत एवं सत्कार

579
00:47:31,520 --> 00:47:35,600
करें एवं रवि पाराशर जी आप स्मृति चिन्ह भेट करें सारस्वत

580
00:47:35,600 --> 00:47:41,600
अतिथि

581
00:48:06,480 --> 00:48:12,480
मा

582
00:48:29,680 --> 00:48:33,840
अतिथि सत्कार की श्रृंखला में मैं

583
00:48:33,840 --> 00:48:38,000
आदरणीय डॉक्टर शास्त्री श्री कौशलेंद्र दास जी के स्वागत सत्कार

584
00:48:38,000 --> 00:48:42,120
के लिए आमंत्रित करना चाहूंगा एडवोकेट शुभम मिश्र जी को

585
00:48:42,120 --> 00:48:46,160
व आए अतिथि गढ को शॉल उड़ा कर

586
00:48:46,160 --> 00:48:50,600
के एवं नरेश बबिया जी माला पहना

587
00:48:50,600 --> 00:48:54,200
करके

588
00:48:54,200 --> 00:48:58,400
तथा भैया जी आप स्मृति चिन्ह भेट करके

589
00:48:58,400 --> 00:49:04,400
स्वागत सत्कार करें हां हां जी हां जी

590
00:49:57,000 --> 00:50:01,600
इसी अतिथि स्वागत की श्रृंखला में मैं

591
00:50:01,600 --> 00:50:03,920
डॉक्टर

592
00:50:03,920 --> 00:50:08,040
श्री देवेंद्र शर्मा जी के स्वागत के लिए आवाहन

593
00:50:08,040 --> 00:50:09,640
करना चाहूंगा सुकांत आरे

594
00:50:09,640 --> 00:50:13,960
जी का तथा करण सिंह जी

595
00:50:13,960 --> 00:50:18,240
का एवं राजवीर जी का कि व आए

596
00:50:18,240 --> 00:50:22,240
शॉल माला दुपट्टा एवं स्मृति चिन्ह भेंट करके अतिथि

597
00:50:22,240 --> 00:50:26,280
का स्वागत एवं सत्कार करें देवेंद्र शर्मा

598
00:50:26,280 --> 00:50:32,280
जी

599
00:51:23,920 --> 00:51:24,880
अतिथि

600
00:51:24,880 --> 00:51:29,160
स्वागत श्रृंखला में हम आगे बढ़ते हुए डॉक्टर श्री

601
00:51:29,160 --> 00:51:34,160
अशोक रुस्त कीी जी के स्वागत सत्कार एवं सम्मान के

602
00:51:34,160 --> 00:51:38,760
लिए आवाहन करना

603
00:51:38,760 --> 00:51:44,520
चाहूंगा श्री किशन एडवोकेट श्री किशन जी आप

604
00:51:44,520 --> 00:51:48,520
और मुकेश अग्रवाल जी तथा आपके

605
00:51:48,520 --> 00:51:52,640
पास में बैठे हुए आप

606
00:51:52,640 --> 00:51:55,520
आए

607
00:51:55,520 --> 00:52:01,520
एवं रुस्त कीी जी का स्वागत एवं सत्कार

608
00:52:32,680 --> 00:52:36,760
सी कतल ध्वनि से स्वागत करेंगे करतल की ध्वनि

609
00:52:36,760 --> 00:52:42,760
थोड़ी थोड़ी कम सी लग रही है

610
00:52:43,720 --> 00:52:47,720
अभी आगे की श्रंखला में डॉक्टर श्री

611
00:52:47,720 --> 00:52:52,240
सुरेश शास्त्री जी के सम्मान सत्कार के लिए मैं निमंत्रित करूंगा

612
00:52:52,240 --> 00:52:54,400
एडवोकेट

613
00:52:54,400 --> 00:52:58,800
श्री उपेंद्र ताऊ जी उपेंद्र मिश्र जी एवं माधव

614
00:52:58,800 --> 00:53:02,800
उपाध्याय जी और कृष्णा कोटवार जी आप आए

615
00:53:02,800 --> 00:53:06,840
और अतिथि को स्वागत माला इत्यादि स्मृति चिन्ह भेंट

616
00:53:06,840 --> 00:53:12,840
करके अतिथि का स्वागत एवं सत्कार

617
00:53:22,800 --> 00:53:26,880
करें जैसा

618
00:53:26,880 --> 00:53:31,280
हम देख पा रहे हैं यह इतना बढ़िया मंच

619
00:53:31,280 --> 00:53:35,520
इतना बढ़िया पांडाल इतनी अच्छी व्यवस्था सब

620
00:53:35,520 --> 00:53:39,600
कुछ हमारे आदरणीय

621
00:53:39,600 --> 00:53:43,960
नगरपालिका अध्यक्ष महोदय के कहने से हुई है और आपके

622
00:53:43,960 --> 00:53:48,280
निर्देशन में हुई है और आपने इतनी अच्छी व्यवस्था

623
00:53:48,280 --> 00:53:52,920
हमें उपलब्ध कराई तो आपको पौना पूर्णन धन्यवाद तो है ही

624
00:53:52,920 --> 00:53:57,280
लेकिन स्वागत सत्कार के लिए पुनः मैं आमंत्र करूंगा

625
00:53:57,280 --> 00:54:01,400
आप आइए नाम

626
00:54:01,400 --> 00:54:05,400
में आपका नाम भैया जी

627
00:54:05,400 --> 00:54:09,400
का आइए आइए आप और हेमंत भैया जी आप

628
00:54:09,400 --> 00:54:13,840
भी पधारिए ग्रीन भैया आप तीनों आइए और

629
00:54:13,840 --> 00:54:18,080
नगर अध्यक्ष जी का माल्यार्पण कर स्वाग स्वागत

630
00:54:18,080 --> 00:54:24,080
एवं सत्कार करें तथा स्मृति चिन्ह भी भेट करें

631
00:54:40,240 --> 00:54:46,240
बात

632
00:55:36,280 --> 00:55:40,840
अब आए हुए अतिथियों

633
00:55:40,840 --> 00:55:44,840
का स्वागत तो हो गया अब यह जो शास्त्रार्थ इस

634
00:55:44,840 --> 00:55:49,520
कार्यक्रम में सम्मिलित हुए बड़ी बड़ी दूर से चल कर के आए हैं उनके

635
00:55:49,520 --> 00:55:53,840
स्वागत सत्कार के लिए मैं समूहावुम जी

636
00:55:53,840 --> 00:55:55,520
आप आ जाइए

637
00:55:55,520 --> 00:55:59,520
महाकाल जी आप आ जाइए भैया जी आप आ जाइए

638
00:55:59,520 --> 00:56:03,800
सभी शास्त्रार्थ यों का माल्यार्पण कर स्वागत और सत्कार

639
00:56:03,800 --> 00:56:07,880
करें तथा दुपट्टा भी उड़ा कर के उनका सत्कार करें छोटू भैया

640
00:56:07,880 --> 00:56:13,880
दीपांशु आप सभी आ जाइए

641
00:57:00,720 --> 00:57:04,920
सभी समूह में सम्मिलित हुए सभी शास्त्रार्थ यों

642
00:57:04,920 --> 00:57:09,560
का कतल ध्वनि से उत्साह वर्धन करेंगे आप आए

643
00:57:09,560 --> 00:57:10,840
पधारे आपका

644
00:57:10,840 --> 00:57:15,120
हृदय से बहुत-बहुत आभार बहुत-बहुत धन्यवाद ऐसे ही

645
00:57:15,120 --> 00:57:19,440
विद्युत चर्चा में परिचर्चा में आप सम्मिलित होते रहे अपनी कृपा बनाए

646
00:57:19,440 --> 00:57:23,800
रखें और यह जो वैदिक सनातन संस्कृति की परंपरा है

647
00:57:23,800 --> 00:57:28,080
उसे जीवित रखें ऐसी मैं प्रार्थना कर ह

648
00:57:28,080 --> 00:57:32,720
पुनः शास्त्रार्थ के कार्यक्रम को अग्रिम पंक्ति में ले जाते हुए मैं निवेदन

649
00:57:32,720 --> 00:57:36,800
करूंगा अध्यक्ष महोदय जी से क्योंकि इस शास्त्रार्थ के

650
00:57:36,800 --> 00:57:41,080
सूत्रधार आप हैं तो आप बहुत अच्छी तरीके से बता सकते हैं कि यह परंपरा

651
00:57:41,080 --> 00:57:45,280
कैसे शुरू हुई और कैसे क्या हुआ और उसके बाद शास्त्रार्थ आरंभ

652
00:57:45,280 --> 00:57:49,440
करने का निर्देशन और त शास्त्रार्थ के जो विषय हैं

653
00:57:49,440 --> 00:57:53,440
उनका वाचन आप कर दीजिएगा और निर्देशन आगे आरंभ करने का वो

654
00:57:53,440 --> 00:57:57,040
कीजिएगा

655
00:57:57,040 --> 00:58:01,120
केव तुम और मैं के अलावा कोई

656
00:58:01,120 --> 00:58:07,120
माला प ठीक

657
00:58:18,240 --> 00:58:22,800
है आज के इस राष्ट्रीय

658
00:58:22,800 --> 00:58:27,840
शास्त्रार्थ प्रतियोगिता के मुख्य अतिथि

659
00:58:27,840 --> 00:58:32,720
राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति

660
00:58:32,720 --> 00:58:37,760
आदरणीय प्रोफेसर राम सेवक दुबे जी

661
00:58:37,760 --> 00:58:42,360
इस कार्यक्रम के प्रधान सूत्रधार

662
00:58:42,360 --> 00:58:46,760
प्रणेता पूर्व न्यायाधीश और

663
00:58:46,760 --> 00:58:51,240
इसी क्षेत्र की महा विभूत

664
00:58:51,240 --> 00:58:56,360
श्री पीएन आरस पी एन पाराशर सर

665
00:58:56,360 --> 00:59:00,440
मंच पर उपस्थित अनेकानेक विद्युत विभूतियां

666
00:59:00,440 --> 00:59:05,680
सभागार में उपस्थित निष्णात

667
00:59:05,680 --> 00:59:10,720
विदत जन श्रोता गण प्रतिभागी

668
00:59:10,720 --> 00:59:12,800
गण

669
00:59:12,800 --> 00:59:17,200
यह बड़े सौभाग्य का विषय है कि

670
00:59:17,200 --> 00:59:22,360
शूकर क्षेत्र में जो एक प्राचीन पौराणिक तीर्थस्थल

671
00:59:22,360 --> 00:59:24,480
है

672
00:59:24,480 --> 00:59:28,960
यहां उस विलुप्त ज्ञान

673
00:59:28,960 --> 00:59:33,120
परंपरा को फिर से पुनर्जीवित करने का कार्यक्रम जिसे

674
00:59:33,120 --> 00:59:37,520
हम शास्त्रार्थ कह रहे हैं आज यहां आयोजित हुआ

675
00:59:37,520 --> 00:59:41,560
है य वैदिक ज्ञान

676
00:59:41,560 --> 00:59:46,960
परंपरा का अंग है शास्त्रार्थ

677
00:59:46,960 --> 00:59:52,520
जितना श्रेष्ठ ज्ञान भारत में सृजित हुआ है

678
00:59:52,520 --> 00:59:56,880
वो वादे वायदे जायते तत्व बोध

679
00:59:56,880 --> 01:00:01,960
के सिद्धांत पर हुआ है भारत की अकादमिक

680
01:00:01,960 --> 01:00:06,600
परंपरा एकांगी नहीं रही है व्यक्ति

681
01:00:06,600 --> 01:00:10,880
विशेष जो चाहा आचार्य विशेष जो चाहा वही

682
01:00:10,880 --> 01:00:15,320
मत प्रतिपादित कर दिया और दूसरों ने स्वीकार कर लिया ऐसा

683
01:00:15,320 --> 01:00:19,600
भारत में नहीं हुआ भारत की जो ज्ञान परंपरा

684
01:00:19,600 --> 01:00:24,040
रही है अकादमिक परंपरा रही है वो प्रश्न और

685
01:00:24,040 --> 01:00:28,040
जिज्ञासा आधारित रही किसी आचार्य

686
01:00:28,040 --> 01:00:32,880
ने किसी विद्वत मनीषी ने

687
01:00:32,880 --> 01:00:37,160
वह चाहे दार्शनिक प्रश्न हो चाहे लोक जीवन

688
01:00:37,160 --> 01:00:41,560
से संबंधित कोई प्रश्न रहा हो जब भी उस पर कोई अपना मत

689
01:00:41,560 --> 01:00:45,560
स्थापित किया है तो उस परे दूसरे

690
01:00:45,560 --> 01:00:49,600
विद्वानों ने हमेशा प्रति प्रश्न खड़ा किया

691
01:00:49,600 --> 01:00:53,800
है इसीलिए हमारे यहां देखिए तो

692
01:00:53,800 --> 01:00:57,840
सट दर्शन सिक्स ब्रांच इंडियन फिलासफी

693
01:00:57,840 --> 01:01:02,720
का उदय हुआ फिर इस सट दर्शन में तमाम

694
01:01:02,720 --> 01:01:06,960
उपशाखा उपशाखा की उपशाखा एं बनती गई

695
01:01:06,960 --> 01:01:11,280
और अनेकानेक मत और संप्रदायों का सृजन

696
01:01:11,280 --> 01:01:15,720
हुआ है लेकिन मूल रूप से जो भारत

697
01:01:15,720 --> 01:01:20,080
की ज्ञान पिपासा है जो भारतीयों

698
01:01:20,080 --> 01:01:24,800
को जोड़ने का जो सनातन तत्व है वैदिक तत्व है

699
01:01:24,800 --> 01:01:29,040
जिसका आख्यान प्रतिपादन भेद करते हैं

700
01:01:29,040 --> 01:01:33,360
वह सब में सामान्य रहा है कॉमन रहा है तोय

701
01:01:33,360 --> 01:01:38,360
हमारी अकादमिक परंपरा शास्त्रार्थ की

702
01:01:38,360 --> 01:01:42,680
परंपरा भारतीयों में वैचारिक अकादमिक विखंडन

703
01:01:42,680 --> 01:01:47,120
के लिए नहीं है बल्कि जहां कहीं कुछ विभेद

704
01:01:47,120 --> 01:01:53,120
है उनमें समन्वय करने की है और उनमें

705
01:01:56,000 --> 01:02:00,360
क्या कहा गया है उस सत्य तक जानने

706
01:02:00,360 --> 01:02:04,400
की जो परंपरा है उसी को हम शास्त्रार्थ

707
01:02:04,400 --> 01:02:08,520
कहते हैं जब हम आचार्य

708
01:02:08,520 --> 01:02:13,280
के रूप में विद्वान के रूप में एक मत व्यक्त करते हैं

709
01:02:13,280 --> 01:02:17,720
तो उस मत में अगर कहीं कोई कमी है कोई न्यूनता है

710
01:02:17,720 --> 01:02:22,040
तो दूसरे विद्वान पूरक के रूप में एक परिमार्जन

711
01:02:22,040 --> 01:02:26,960
पथ प्रदर्शक के रूप में आगे आते हैं यही होता रहा

712
01:02:26,960 --> 01:02:31,400
यही आज भी यहां होना है जिसे हम सारे लोग

713
01:02:31,400 --> 01:02:35,640
देखेंगे ये आप देख रहे हैं चार

714
01:02:35,640 --> 01:02:39,800
टीमें बनी हैं इस पर वह विद्युत

715
01:02:39,800 --> 01:02:44,160
विभूतियां बैठी हैं जो आज

716
01:02:44,160 --> 01:02:49,360
के समय में मैं कहूं तो दुर्लभ है

717
01:02:49,360 --> 01:02:53,720
ऐसे शास्त्रों के विद्वान धर्म दर्शन के

718
01:02:53,720 --> 01:02:58,040
विद्वान य सामान्य रूप से नहीं

719
01:02:58,040 --> 01:03:02,160
मिलने कथावाचक मिलेंगे प्रवचन

720
01:03:02,160 --> 01:03:06,520
कर्ता मिलेंगे व्यास पीठों पर बैठे हुए

721
01:03:06,520 --> 01:03:11,120
विद्वत जन अपनी शैली में कथा कहने वाले मिलेंगे

722
01:03:11,120 --> 01:03:15,680
लेकिन गढ़ कठिन दार्शनिक

723
01:03:15,680 --> 01:03:20,000
और अनुत्तरित प्रश्नों का समाधान देने वाले निर्वचन

724
01:03:20,000 --> 01:03:24,480
करने वाले विद्वत जन आपको ऐसी सभा में ही मिलेंगे

725
01:03:24,480 --> 01:03:28,600
जो शास्त्रार्थ की सभा विद्वानों की सभा है तो हम

726
01:03:28,600 --> 01:03:32,640
जितने लोग भी यहां हैं हम आग्रह करते हैं आपसे

727
01:03:32,640 --> 01:03:36,680
निवेदन करते हैं कि इन विद्युत मंचों पर बैठे

728
01:03:36,680 --> 01:03:40,960
हुए जो शास्त्रार्थ हमारे अप्रतिम विद्वान जन है इनको

729
01:03:40,960 --> 01:03:45,080
हम हाथ जोड़ कर के विनम्र भाव से प्रणाम करें कि

730
01:03:45,080 --> 01:03:49,400
या उनकी कृपा है कि इस सनातन वैदिक परंपरा

731
01:03:49,400 --> 01:03:53,400
को जीवित रखे हुए हैं उन्होंने इन

732
01:03:53,400 --> 01:03:57,520
सबसे भी अधिक विलुप्त परंपरा को प्रोत्साहित करना

733
01:03:57,520 --> 01:04:01,560
है जीवंत बनाए रखना है कुछ वर्षों पहले

734
01:04:01,560 --> 01:04:05,720
मैंने लखनऊ में प्रयोग के स्तर पर डरते डरते इसको शुरू किया

735
01:04:05,720 --> 01:04:09,880
था 2019 में लेकिन मैंने देखा कि विद्वानों ने जो

736
01:04:09,880 --> 01:04:14,000
मुझको सहयोग दिया और उत्साह वर्धन किया उसी के कारण मैं

737
01:04:14,000 --> 01:04:18,080
प्रतिवर्ष इसको कर पाता हूं यहां बैठी कई विभूतियां उसमें

738
01:04:18,080 --> 01:04:22,640
भी प्रतिभाग करते हैं और अब तो ऑल इंडिया हो गया है

739
01:04:22,640 --> 01:04:26,320
और खुशी यह बताते हुई होती है मुझे

740
01:04:26,320 --> 01:04:30,480
कि देश के कई प्रांतों में कई प्राचीन गुरुकु

741
01:04:30,480 --> 01:04:35,080
में संस्कृत महाविद्यालयों में और दूसरे गृहस्थ

742
01:04:35,080 --> 01:04:39,160
के द्वारा यह कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं तो यह देखकर

743
01:04:39,160 --> 01:04:43,680
मुझे बड़ी खुशी होती है कि एक जो प्रयास शुरू किया

744
01:04:43,680 --> 01:04:48,160
उसको इतना प्रोत्साहन शूकर क्षेत्र में मिला जज साहब हमारे

745
01:04:48,160 --> 01:04:52,360
पीएन पाराशर साहब ने इस परंपरा को इस क्षेत्र में आगे बढ़ाया है

746
01:04:52,360 --> 01:04:56,360
जब वह प्रथम बार कर रहे थे तीन साल पहले यहां तो मुझे

747
01:04:56,360 --> 01:05:00,560
यह लगा कि इस क्षेत्र में शास्त्रार्थ करने वाले विद्वान सुलभ

748
01:05:00,560 --> 01:05:05,040
भी होंगे अगर मैं पड़ोस की भी बात करूं वृंदावन

749
01:05:05,040 --> 01:05:09,480
की तो कथाकार और व्यास तो मिलेंगे भागवताचार्य लेकिन

750
01:05:09,480 --> 01:05:13,520
क्या शास्त्रार्थ विद्वान मिलेंगे जब उन्होंने प्रथम बार ही

751
01:05:13,520 --> 01:05:17,880
कराया तो मेरी आंखें खुली की खुली रह गई यह क्षेत्र भी

752
01:05:17,880 --> 01:05:22,080
एक से एक उद भर शास्त्रार्थ से भरा हुआ है बस एक

753
01:05:22,080 --> 01:05:26,240
मंच मिलने की देर थी उसका आप उदाहरण य पंडाल

754
01:05:26,240 --> 01:05:30,400
में देखिए कि कोई भी हमारा यह मंच शास्त्रार्थ

755
01:05:30,400 --> 01:05:34,400
यों का खाली नहीं है उस पर जगह होती तो शायद कुछ विद्वान और आक

756
01:05:34,400 --> 01:05:38,760
उस पर बैठ जाते हैं तो मैं इसके लिए बधाई देता हूं इस विद्युत

757
01:05:38,760 --> 01:05:41,400
क्षेत्र को यही वह विभूतियां सुलभ

758
01:05:41,400 --> 01:05:45,400
है आपको शायद बहुत दूर भी जाने की आवश्यकता नहीं है

759
01:05:45,400 --> 01:05:49,640
यह विद्वानों का क्षेत्र है नरहर स्वामी जी का क्षेत्र है

760
01:05:49,640 --> 01:05:54,080
तुलसीदास जी का संबंध यहां से होना बताया जाता है ये

761
01:05:54,080 --> 01:05:58,200
भगवान शक्र र का जो क्षेत्र है गंगा

762
01:05:58,200 --> 01:06:02,880
जी का पावन तट है गुरुकुल और आश्रम की परंपरा यहां

763
01:06:02,880 --> 01:06:07,120
बहुत पुष्प पल्लवित हुई रही होगी यह तो एक

764
01:06:07,120 --> 01:06:11,720
अकादमिक स्थान है ही है इसको आगे ले जाने का आपने

765
01:06:11,720 --> 01:06:15,800
जो काम किया है आज यहां प्रतिभाग करके मैं आपकी वंदना

766
01:06:15,800 --> 01:06:19,800
करता हूं आपकी सराहना करता हूं शास्त्रार्थ कैसे

767
01:06:19,800 --> 01:06:24,120
होता है वो अभी शुभम मिश्रा ने विस्तार से बताया है

768
01:06:24,120 --> 01:06:28,320
शास्त्रार्थ प्रारंभ करने में पहले ही विलंब हो चुका है

769
01:06:28,320 --> 01:06:32,320
मैं और समय ना लेकर के आचार्य शुभम मिश्रा को अनुरोध करता

770
01:06:32,320 --> 01:06:36,480
हूं कि व आवे और शास्त्रार्थ की इस

771
01:06:36,480 --> 01:06:40,600
प्रक्रिया को आगे बढ़ावे वो प्रश्न कुछ बना है हम लोगों ने

772
01:06:40,600 --> 01:06:44,680
परामर्श करके बनाए हैं विषय बनाए हैं जिन पर

773
01:06:44,680 --> 01:06:48,840
टीमें बोलेंगे कितनी देर बोलेंगे कैसे बोलना है वह सब

774
01:06:48,840 --> 01:06:52,920
व बता चुके हैं तो शुभम मिश्रा जी से अनुरोध है आए और

775
01:06:52,920 --> 01:06:58,920
इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाए

776
01:07:00,880 --> 01:07:05,000
शास्त्रार्थ को आगे बढ़ाने से पूर्व हमारे जो आदरणीय अतिथि

777
01:07:05,000 --> 01:07:09,640
थे वह हमारे मध्य आ चुके हैं तो उनका थोड़ा सा स्वागत सत्कार

778
01:07:09,640 --> 01:07:15,640
करने के उपरांत में शास्त्रार्थ आरंभ

779
01:07:16,520 --> 01:07:20,880
होगा तब तक मैं

780
01:07:20,880 --> 01:07:25,520
शास्त्रार्थ के जो विषय हैं उनका वाचन कर देता हूं या शास्त्रार्थ

781
01:07:25,520 --> 01:07:29,520
के विषय यद्यपि पूर्व सभी के पास आ चुके थे सभी विद्वानों के पास जो

782
01:07:29,520 --> 01:07:33,600
यहां पर सहभागी हुए हैं उन सबके पास थे

783
01:07:33,600 --> 01:07:38,520
हमारे अतिथि हमारे मध्य पधार रहे हैं सभी लोग

784
01:07:38,520 --> 01:07:42,880
करतल ध्वनि से और उनका स्वागत करेंगे सत्कार

785
01:07:42,880 --> 01:07:46,920
करेंगे खड़े

786
01:07:46,920 --> 01:07:51,200
हो आप वर्तमान में हमारे जिला

787
01:07:51,200 --> 01:07:55,800
के न्यायाधीश हैं जिला न्यायाधीश है तो सभी लोग खड़े होकर के तथा करतल

788
01:07:55,800 --> 01:08:01,800
के साथ में आपका स्वागत एवं सम्मान करेंगे

789
01:08:30,360 --> 01:08:36,360
शांत निशांत

790
01:08:59,990 --> 01:09:05,990
[संगीत]

791
01:09:17,280 --> 01:09:22,560
ब्रहमान

792
01:09:22,560 --> 01:09:27,480
सात जोनी मा

793
01:09:27,480 --> 01:09:31,680
मैं आदरणीय पीएन पाराशर जी से अनुरोध करूंगा व सर के विषय

794
01:09:31,680 --> 01:09:36,400
में दो शब्द निवेदित

795
01:09:36,400 --> 01:09:40,840
करें सबसे पहले शुक

796
01:09:40,840 --> 01:09:45,920
क्षेत्र की पावन भूमि को प्रणाम करता हूं यह पौराणिक

797
01:09:45,920 --> 01:09:50,040
तीर्थ जिसने आज के इस प्रोग्राम को जन्म दिया

798
01:09:50,040 --> 01:09:54,120
है बहुत पुराना है और यहां पर

799
01:09:54,120 --> 01:09:58,880
शास्त्रार्थ की और विद्वानों की

800
01:09:58,880 --> 01:10:03,480
चर्चाएं ऐतिहासिक है मैं अधिक नहीं

801
01:10:03,480 --> 01:10:07,640
कहना चाहता हूं इस अवसर पर क्योंकि कार्यक्रम पहले से ही बहुत विलंब

802
01:10:07,640 --> 01:10:11,680
हो चुका है आप सभी प्रतिभागियों को

803
01:10:11,680 --> 01:10:16,040
नमन करता हूं मंच पर आसीन जितने भी विद्वत

804
01:10:16,040 --> 01:10:20,040
जन अतिथि गण सम्मानित अतिथि गण है सभी को

805
01:10:20,040 --> 01:10:24,320
नमन और प्रणाम करता हूं यह सौभाग्य का विषय हम सभी

806
01:10:24,320 --> 01:10:28,680
का शूक क्षेत्र की पावन भूमि में पहली

807
01:10:28,680 --> 01:10:33,440
बार ऐसा विद्युत जनों का मेला

808
01:10:33,440 --> 01:10:37,880
इस मेले में लौकिक मेले में हो रहा है य विद्वानों

809
01:10:37,880 --> 01:10:41,880
का मेला पहली बार है एक ऐतिहासिक ऐतिहासिक क्षण

810
01:10:41,880 --> 01:10:46,080
है महान संगम है विद्वानों का और

811
01:10:46,080 --> 01:10:50,360
विद्वान भी पूरे भारतवर्ष से आए हुए हैं अनेकों

812
01:10:50,360 --> 01:10:51,920
विधाओं के

813
01:10:51,920 --> 01:10:56,320
अनेकों प्रकार की विधियों के वेता है वेद शास्त्रों

814
01:10:56,320 --> 01:11:00,480
के पुराण के सबके वता है हमारे परम आदरणीय श्री

815
01:11:00,480 --> 01:11:04,600
एसएस उपाध्याय जी ने जो कीर्ति माने स्थापित

816
01:11:04,600 --> 01:11:08,600
किया है और इस शास्त्रीय परंपरा को शास्त्रार्थ परंपरा को

817
01:11:08,600 --> 01:11:12,880
जितना उन्होंने और ज्यादा आगे जीवित

818
01:11:12,880 --> 01:11:17,360
करके पुनर्जीवित करके प्रचारित प्रसारित किया है हम सब में

819
01:11:17,360 --> 01:11:21,480
एक भावना उत्पन्न कर द एक विचार उत्पन्न कर दिया है कि हमारे शास्त्र

820
01:11:21,480 --> 01:11:26,360
हमारे पुराण हमारे वेद क्या है और उन वेदों में भक्ति

821
01:11:26,360 --> 01:11:30,440
और योग साधना ज्ञान मार्ग से संबंधित

822
01:11:30,440 --> 01:11:34,440
क्या-क्या पौराणिक इतिहास है उसके परिपेक्ष

823
01:11:34,440 --> 01:11:38,920
में विद्वानों के विभिन्न मत और विभिन्न बाद

824
01:11:38,920 --> 01:11:44,360
यहां

825
01:11:44,360 --> 01:11:48,920
परे जनपद के परम श्रद्धेय जनपद

826
01:11:48,920 --> 01:11:53,560
न्यायाधीश श्री रामेश्वर जी वो यहां हमारे

827
01:11:53,560 --> 01:11:57,920
अनौपचारिक आम पर निवेदन पर आए हैं

828
01:11:57,920 --> 01:12:02,480
आशीर्वाद देने के लिए जनपद न्यायाधीश महोदय

829
01:12:02,480 --> 01:12:07,080
ज साब जनपद न्यायाधीश महोदय

830
01:12:07,080 --> 01:12:11,520
हम सब आभारी हैं आपके इस

831
01:12:11,520 --> 01:12:15,560
हमारे निवेदन को स्वीकार करके आशीर्वाद देने के लिए आपके य पधारने

832
01:12:15,560 --> 01:12:19,680
के लिए क्योंकि आपकी रुचि भी आध्यात्म

833
01:12:19,680 --> 01:12:23,760
में है और आपने अनौपचारिक रूप से हमारे

834
01:12:23,760 --> 01:12:27,840
निवेदन को स्वीकार किया मेरी और उपाध्याय जी की दोनों की हम दोनों

835
01:12:27,840 --> 01:12:32,160
न्याय क्षेत्र से हैं और जस साब के बारे में जानते भी हैं

836
01:12:32,160 --> 01:12:36,320
तो इस करके हमारे कार्यक्रम में आयोजन

837
01:12:36,320 --> 01:12:40,440
में अपने पधार करके आशीर्वाद देने के लिए आए

838
01:12:40,440 --> 01:12:44,600
हैं बहुत-बहुत आभार प्रदर्शित करते हैं हम सभी की ओर से विद्वानों की ओर

839
01:12:44,600 --> 01:12:49,200
से और इस मंच की ओर से आयोजकों की ओर से बहुत-बहुत धन्यवाद

840
01:12:49,200 --> 01:12:53,240
य और खुशी की बात है कि जज साहब अपने पूरे परिवार

841
01:12:53,240 --> 01:12:57,840
के साथ अपने जी पिताजी के साथ अपने

842
01:12:57,840 --> 01:12:59,400
भाभी जी की मां

843
01:12:59,400 --> 01:13:03,440
के साथ सब लोग आप आए हैं आपके पिताजी को मैं नमन करता

844
01:13:03,440 --> 01:13:07,760
हूं प्रणाम करता हूं और मैं आपके जो हमारे

845
01:13:07,760 --> 01:13:11,840
आयोजक है मुख्या आयोजक जी शुभम जी आचार्य

846
01:13:11,840 --> 01:13:16,080
शम जी से निरोध करता हूं कि पिताजी का सम्मान पहले करें

847
01:13:16,080 --> 01:13:20,440
पिताजी का समान बैठे हुए सामने और साथ ही

848
01:13:20,440 --> 01:13:24,640
साथ साथ ही साथ उनकी माता जी सास

849
01:13:24,640 --> 01:13:28,960
जी आई उनके तो दोनों पक्ष हैं भाभी जी का भी सम्मान

850
01:13:28,960 --> 01:13:33,400
व वही बैठे बैठे करते कृपा करके

851
01:13:33,400 --> 01:13:37,520
हमारे उपाध्याय जी के बारे में हम कितना बोलेंगे बहुत कम होगा

852
01:13:37,520 --> 01:13:41,560
आज हमें सुनना है उनको और और विद्वानों को इसलिए दूर दूर से

853
01:13:41,560 --> 01:13:46,480
मेरठ से कहां कहा से लोग आए हुए हैं तो मैं अधिक समय नहीं लेना चाहता

854
01:13:46,480 --> 01:13:50,600
संकट मोचन धाम की पावन भूमि में यह कार्यक्रम हो चुका है

855
01:13:50,600 --> 01:13:55,080
दो वर्ष इस साल फिर होगा और वहीं से यह धारा

856
01:13:55,080 --> 01:13:59,160
प्रवाहित की थी श्री उपाध्याय जी ने पिताजी को प्रणाम हम सब

857
01:13:59,160 --> 01:14:03,280
की ओर से नमन और उनका सम्मान और

858
01:14:03,280 --> 01:14:08,160
साथ ही साथ शल उड़ा कर के

859
01:14:08,160 --> 01:14:14,160
और साथ ही साथ माता जी का परम आदरणीय भाभी जी

860
01:14:20,520 --> 01:14:26,520
का बहुत ही सुंदर

861
01:14:31,440 --> 01:14:35,760
माननीय जनपद न्यायाधीश महोदय की धर्म पत्नी भी

862
01:14:35,760 --> 01:14:39,960
आई है हम बहुत बहुत आभारी है इस कार्यक्रम

863
01:14:39,960 --> 01:14:44,160
में उन्होंने पधार करर बहुत बड़ी कृपा की है

864
01:14:44,160 --> 01:14:49,120
उनका

865
01:14:49,120 --> 01:14:53,160
सम्मान ये हमारे सुकांत आरया जी जो

866
01:14:53,160 --> 01:14:57,200
आर्य समाज के पक्ष को प्रस्तुत करें सुकांत तारिया जी की धर्म

867
01:14:57,200 --> 01:15:03,200
पत्नी है और उनको प्रणाम करता हूं मैं उनकी विदु होता को

868
01:15:07,240 --> 01:15:11,400
भी अच्छा हमारे कुलपति महोदय तो आज के

869
01:15:11,400 --> 01:15:16,120
मुख्य अतिथि है और कुलपति महोदय की धर्म पत्नी भी आई हुई

870
01:15:16,120 --> 01:15:20,840
है उनको देवी जी को प्रणाम करें और

871
01:15:20,840 --> 01:15:25,720
आप सम्मान कर

872
01:15:25,720 --> 01:15:30,200
कुलपति साहब की पत्नी धर्म पत्नी को मैं प्रणाम करता हूं और उनका सम्मान

873
01:15:30,200 --> 01:15:33,360
शुभम जी

874
01:15:33,360 --> 01:15:37,560
करें और सुकांत जी की पत्नी जो स्वयं इस

875
01:15:37,560 --> 01:15:42,320
कार्यक्रम में अग्रणी भूमिका निभा रही

876
01:15:42,320 --> 01:15:46,760
है शुभम जी सुकांत जी की पत्नी को भी

877
01:15:46,760 --> 01:15:51,480
हमारी परम आदरणीय भाभी जी को जो

878
01:15:51,480 --> 01:15:56,600
हमेशा हां हमारे

879
01:15:56,600 --> 01:16:01,120
न्यायपालिका में ही नहीं पूरे समाज में विद्युत समाज में

880
01:16:01,120 --> 01:16:05,200
जो उन्होंने उपाध्याय जी ने पुस्तक लिख कर के कार्य

881
01:16:05,200 --> 01:16:09,200
किया है इतना बड़ा योगदान मैं नहीं समझता न्यायाधीश छोड़िए किसी

882
01:16:09,200 --> 01:16:13,720
भी विद्वान का आज के युग में हुआ हो उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी

883
01:16:13,720 --> 01:16:17,880
वैसे तो उन्होंने पुस्तक गवर्नर गाइड लिखी यूनिवर्सिटी

884
01:16:17,880 --> 01:16:22,000
के लिए लिखी एक पुस्तक अभी थोड़े दिन पहले अयोध्या में

885
01:16:22,000 --> 01:16:23,000
जिसका

886
01:16:23,000 --> 01:16:27,680
वो हुआ था विमोचन ग्लोबल राम तो ग्लोबल राम

887
01:16:27,680 --> 01:16:32,440
पुस्तक बहुत ही महान ग्रंथ है उस ग्रंथ को वो

888
01:16:32,440 --> 01:16:36,480
प्रस्तुत करें उपाध्याय जी बहुत बड़ा आपसे निवेदन

889
01:16:36,480 --> 01:16:41,080
है कि हमारे आज के इस कार्यक्रम का शुभारंभ कराने वाले पधारे

890
01:16:41,080 --> 01:16:45,360
जनपद न्यायाधीश महोदय श्री रामेश्वर जी को आप ग्लोबल राम पुस्तक भेंट

891
01:16:45,360 --> 01:16:48,200
करने का

892
01:16:48,200 --> 01:16:52,440
कृपा मैं संचालक नहीं हूं बीच में ही बोल रहा हूं

893
01:16:52,440 --> 01:16:56,520
उल्टी सीधी बातें बोल जाता हूं क्षमा करें संचालक तो वह

894
01:16:56,520 --> 01:17:00,560
है शुभम जी जो आयोजक भी है तो पुन पुन आप

895
01:17:00,560 --> 01:17:04,600
सभी को नमन करता हूं और

896
01:17:04,600 --> 01:17:08,840
जनपद न्यायाधीश महोदय से यह आकांक्षा है

897
01:17:08,840 --> 01:17:14,840
प्रार्थना है ज साब से प्राथना

898
01:17:21,080 --> 01:17:25,280
है ये उपाध्याय जी अपनी पुस्तक ग्लोबल राम

899
01:17:25,280 --> 01:17:31,280
प्रस्तुत का भेंट कर रहे हैं हमारे जनपद न्यायाधीश महोदय

900
01:17:43,680 --> 01:17:48,800
को अब मैं

901
01:17:48,800 --> 01:17:53,000
श्री ज साब पारा सर जी से कहूंगा कि वो हमारी स

902
01:17:53,000 --> 01:17:57,160
सब की ओर से हमारे जनपद न्यायाधीश का साल उड़ाकर स्वागत

903
01:17:57,160 --> 01:18:01,320
करने का कष्ट करें श्री पीएन पारा सर जी हमारे जिला जज

904
01:18:01,320 --> 01:18:07,320
साहब

905
01:18:18,920 --> 01:18:23,240
का कार्यक्रम में विलंब भी हो रहा है और जनपद न्यायाधीश

906
01:18:23,240 --> 01:18:27,400
महोदय ने अपना आशीर्वाद दे दिया इसलिए अब आप

907
01:18:27,400 --> 01:18:33,400
कार्यक्रम जैसे शुरू कर रहे थे शुभम जी आगे जारी र

908
01:19:05,640 --> 01:19:10,480
शास्त्रार्थ के कार्यक्रम में अवलंबन कोई देर ना करते हुए

909
01:19:10,480 --> 01:19:14,720
मैं शास्त्रार्थ के विषय जो सभी के पास

910
01:19:14,720 --> 01:19:18,800
आ मैं शास्त्रार्थ के विषयों का वाचन कर देता हूं और जो

911
01:19:18,800 --> 01:19:22,800
जो उस उस टीम के पास है पहला विषय है वेदो खिलो धर्म

912
01:19:22,800 --> 01:19:27,040
मूलम यह प्रथम विषय है और यह विषय हमारे

913
01:19:27,040 --> 01:19:31,280
डॉक्टर श्री ज्ञानेंद्र शर्मा जी के पास आपका यह विषय है हमारी तृतीय

914
01:19:31,280 --> 01:19:34,120
टीम के पास आपने सुनिश्चित किया हुआ

915
01:19:34,120 --> 01:19:39,240
है उसके उपरांत में विषय और भी है

916
01:19:39,240 --> 01:19:43,360
लेकिन एक और विषय है पांच नंबर साकार और निराकार

917
01:19:43,360 --> 01:19:47,440
ब्रह्म तथा उनसे संबंधित उपासना पद्धतियों को

918
01:19:47,440 --> 01:19:51,520
शास्त्री परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट कीजिए यह प्रथम टीम के पास है

919
01:19:51,520 --> 01:19:57,520
कि द्वितीय टीम के पास है प्रथम टीम के पास ये है

920
01:19:57,600 --> 01:20:02,000
ठीक उसके उपरांत में

921
01:20:02,000 --> 01:20:06,040
अ सात नंबर जो प्रश्न है सनातन धर्म एवं संस्कृति

922
01:20:06,040 --> 01:20:11,120
के मूल तत्व क्या है इसके हो रहे क्षरण को किस प्रकार

923
01:20:11,120 --> 01:20:13,240
रोक

924
01:20:13,240 --> 01:20:17,240
ठीक और भारतीय ग्रंथों में आए क्षेप कों

925
01:20:17,240 --> 01:20:21,280
का भारतीय धर्म संस्कृति पर दुष्प्रभाव एवं उनके

926
01:20:21,280 --> 01:20:25,720
निवारण के उपाय बताइए यह टीम नंबर दो पर है

927
01:20:25,720 --> 01:20:29,720
ठीक है सभी को अपने अपने विषय

928
01:20:29,720 --> 01:20:33,760
हैं विषय सभी के पास थे सभी को पता है

929
01:20:33,760 --> 01:20:37,840
शास्त्रार्थ आर अनुमति चाहूंगा शास्त्रार्थ आरंभ करने

930
01:20:37,840 --> 01:20:42,120
की उससे पहले लॉटरी के माध्यम से वाचन का निर्णय

931
01:20:42,120 --> 01:20:48,120
होगा तो मैं सभी के सभी सभी एक एक सदस्य आ जाइए आ जा

932
01:21:05,280 --> 01:21:09,280
समूह के एक एक सदस्य आ जाए और एक एक पर्ची उठा ले आपके

933
01:21:09,280 --> 01:21:14,920
समूह से किसी एक को भेज

934
01:21:14,920 --> 01:21:19,520
दीजिए निर्णायक मंडल में हमारे आदरणीय

935
01:21:19,520 --> 01:21:23,720
श्री एसएस उपाध्याय जी आदरणीय कुलपति श्री रामसेवक

936
01:21:23,720 --> 01:21:28,840
दुबे जी आदरणीय कौशलेंद्र कौशलेंद्र जी

937
01:21:28,840 --> 01:21:32,880
आदरणीय देवेंद्र जी आदरणीय अशोक रुस्त कीी जी

938
01:21:32,880 --> 01:21:36,920
और आदरणीय सुरेश शास्त्री जी हैं तो आपके सामने पेन और

939
01:21:36,920 --> 01:21:42,920
डायरी एक रखी रखी रखी हुई है उसे ले

940
01:21:48,080 --> 01:21:54,080
लीजिएगा कौन से समूह का कौन सा नंबर आया है आप एक बार बताएंगे आपका

941
01:21:57,520 --> 01:22:01,840
टीम क्रमांक प्रथम है उसका दूसरा नंबर आया

942
01:22:01,840 --> 01:22:06,360
है टीम क्रमांक तृतीय का पहला नंबर आया है

943
01:22:06,360 --> 01:22:10,960
और टीम क्रमांक द्वितीय

944
01:22:10,960 --> 01:22:14,960
का तीसरा नंबर आया है और टीम क्रमांक चार का

945
01:22:14,960 --> 01:22:19,480
चौथा ही नंबर आया है सबसे अंतिम का तो इसी क्रम में बोलेंगे

946
01:22:19,480 --> 01:22:23,480
आपके पास विषय है आपके विषय जो निर्धारित किए हुए हैं दिए हुए हैं

947
01:22:23,480 --> 01:22:27,760
आपका विषय है टीम क्रमांक तृतीय

948
01:22:27,760 --> 01:22:32,320
का वेदो खिलो धर्म मूलम जो अभी टीम बोलने जा रही है

949
01:22:32,320 --> 01:22:37,480
वो वेदो खिलो धर्म मूलम पर बोलने जा रही है टीम क्रमांक

950
01:22:37,480 --> 01:22:43,480
तीन आरंभ कीजिए

951
01:22:46,160 --> 01:22:52,160
गुरुजी जय जय देवी चराचर

952
01:22:52,360 --> 01:22:57,680
सारे कुछ योग शोभित मुक्ता

953
01:22:57,680 --> 01:23:03,280
हारे वीणा पुस्तक रंजित

954
01:23:03,280 --> 01:23:08,800
हस्ते भगवते भगवती देवी

955
01:23:08,800 --> 01:23:12,640
नमस्ते सरस्वती

956
01:23:12,640 --> 01:23:18,160
महाभागे विद्य कमल लोचने

957
01:23:18,160 --> 01:23:23,040
विश्वरूप [संगीत] विशालाक्षी विद्याम

958
01:23:23,040 --> 01:23:26,760
देहि नमो

959
01:23:26,760 --> 01:23:30,840
वाग देव विद महे

960
01:23:30,840 --> 01:23:35,200
काम राजा धीमहि

961
01:23:35,200 --> 01:23:40,080
तन्न सरस्वती

962
01:23:40,080 --> 01:23:44,600
प्रचोदयात परमा आदरणीय सभापति

963
01:23:44,600 --> 01:23:50,400
यति वंद भक्ति वृंद शोत्र

964
01:23:50,400 --> 01:23:52,800
वंद

965
01:23:52,800 --> 01:23:57,320
हम जो शास्त्रार्थ है

966
01:23:57,320 --> 01:24:01,680
एक व्यक्ति पूर्व पक्ष करता है दूसरा व्यक्ति उत्तर

967
01:24:01,680 --> 01:24:06,760
पक्ष करता है इसका नाम शास्त्रार्थ

968
01:24:06,760 --> 01:24:11,840
है हम इसको शास्त्रार्थ

969
01:24:11,840 --> 01:24:15,960
संज्ञा के साथ साथ ध्यान

970
01:24:15,960 --> 01:24:20,000
से सुने बाद संवाद भी दे

971
01:24:20,000 --> 01:24:24,760
सकते हैं वादे वादे जात तत्व बोधा

972
01:24:24,760 --> 01:24:29,000
दद और संवाद में तत्व का बोध होता है

973
01:24:29,000 --> 01:24:33,400
और अनादि काल से गुरुजी निवेदन करूंगा वेदो

974
01:24:33,400 --> 01:24:37,400
खिलो धर्म ज्ञान यज और कर्म यज्ञ में

975
01:24:37,400 --> 01:24:41,520
जो है आचार्य और यजमान जो

976
01:24:41,520 --> 01:24:42,200
है समान

977
01:24:42,200 --> 01:24:46,320
होते हैं य ज्ञान यज्ञ है और इसमें जो

978
01:24:46,320 --> 01:24:50,520
हमें विषय मिला है वेदो खिलो धर्म भलम

979
01:24:50,520 --> 01:24:54,880
धर्म शीले तम आचार साधु ना

980
01:24:54,880 --> 01:24:59,120
आत्मस तुष्ट रे बच वेद

981
01:24:59,120 --> 01:25:03,560
खलो धर्म बलम देखो जो शास्त्रार्थ

982
01:25:03,560 --> 01:25:07,720
है वह शास्त्र आव

983
01:25:07,720 --> 01:25:12,400
निथम जो शास्त्रार्थ होता है व तत्व के निर्णय के लिए होता है

984
01:25:12,400 --> 01:25:16,440
न कश्या नहीं परा भवार्थ किसी

985
01:25:16,440 --> 01:25:21,080
के पराभव के लिए नहीं होता है शास्त्रम शस्ता करोति

986
01:25:21,080 --> 01:25:25,840
जो शास्त्र है व शासन करता है और शस्त्र ब

987
01:25:25,840 --> 01:25:29,960
जो शास्त्र है वही जो धर्म की रक्षा करता है तो हमारा

988
01:25:29,960 --> 01:25:34,680
शास्त्र कौन है वेद तो वेदो खिलो धर्म मूलम

989
01:25:34,680 --> 01:25:39,080
इस पर थोड़ा ध्यान देना है लोगों को बहुत भ्रांतियां है सनातन

990
01:25:39,080 --> 01:25:43,080
धर्म का जो मूल है वह वेद है इसको

991
01:25:43,080 --> 01:25:47,520
ध्यान रखना है जो सनातन धर्म का जो मूल है वह अखिल

992
01:25:47,520 --> 01:25:52,720
वेद है अखिल शब्द का य तात्पर्य है

993
01:25:52,720 --> 01:25:56,720
विधि मंत्र और अर्थवा

994
01:25:56,720 --> 01:25:57,240
तीनों का

995
01:25:57,240 --> 01:26:01,600
जब एक होगा जब जो वेद के अर्थ की प्रतीति

996
01:26:01,600 --> 01:26:06,280
होगी पुराण सर्व शास्त्रम प्रथम

997
01:26:06,280 --> 01:26:10,280
बस्तम अनंत यो वेदा

998
01:26:10,280 --> 01:26:12,720
तस्य

999
01:26:12,720 --> 01:26:17,280
विनिता पुराण सर्व शास्त्रम पुराण

1000
01:26:17,280 --> 01:26:21,920
और वेद दोनों का सामान

1001
01:26:21,920 --> 01:26:26,200
काल में ही प्रकाशन हुआ प्रथम

1002
01:26:26,200 --> 01:26:30,600
ब्रह्मणा स्तम ब्रह्मा जी ने पहले पुराण का स्मरण

1003
01:26:30,600 --> 01:26:34,920
किया है और इसके बाद वेद का श्रमण किया है

1004
01:26:34,920 --> 01:26:39,400
अब अनंत तयो हमारे वैदिक है

1005
01:26:39,400 --> 01:26:43,400
यह कहेंगे य कैसी बात क दी पुराण के बाद

1006
01:26:43,400 --> 01:26:47,800
वेद जबक वेद ही सबका मूल है तो अनंतर

1007
01:26:47,800 --> 01:26:52,480
की जो व्याख्या है न विद्यते अंतरम यत्र

1008
01:26:52,480 --> 01:26:56,640
अर्थात पुराण वेद में कोई अंतर नहीं है दोनों साथ साथ ही

1009
01:26:56,640 --> 01:27:00,840
प्रकट हुए हैं तो दोनों साथ साथ प्रकट करने की

1010
01:27:00,840 --> 01:27:05,160
आवश्यकता पड़ी कि बिना पुराण के बिना सपद

1011
01:27:05,160 --> 01:27:09,400
ब्राहमण के बिना धर्मशास्त्र के कोई वेद का निर्णय

1012
01:27:09,400 --> 01:27:12,320
नहीं कर सकता वेद के निर्णय में कोई प्रमाण

1013
01:27:12,320 --> 01:27:15,640
है तो पुराण ही

1014
01:27:15,640 --> 01:27:20,680
है वेदो खिलो धर्म मूलम

1015
01:27:20,680 --> 01:27:24,680
प्रत्यक्ष यतु पाय लते न विदं

1016
01:27:24,680 --> 01:27:29,240
वेदन वेदस तस्मा वेदत

1017
01:27:29,240 --> 01:27:33,320
जो प्रत्यक्ष के द्वारा अनुमान के द्वारा जो

1018
01:27:33,320 --> 01:27:37,360
बात सिद्ध ना हो सके वह बात जो है

1019
01:27:37,360 --> 01:27:41,440
वेद के द्वारा सिद्ध होती है त असमाद वेदस

1020
01:27:41,440 --> 01:27:46,160
वेद वेता का मतलब अपूर्व बोता

1021
01:27:46,160 --> 01:27:50,480
जो वेद है उसका नाम है अपूर्व बोध

1022
01:27:50,480 --> 01:27:54,600
अपूर्व बोता का तात्पर्य जो किसी से प्रमाण ना

1023
01:27:54,600 --> 01:27:58,600
हो सके जैसे चक्षु है व

1024
01:27:58,600 --> 01:28:02,680
किसम प्रमाण है देखने में प्रमाण है चक्षु का कार्य

1025
01:28:02,680 --> 01:28:07,320
स्रोत नहीं कर सकती सूत्र का कार्य ग्रहण नहीं कर सकता

1026
01:28:07,320 --> 01:28:12,080
से इंद्रिया अपने अपने में स्वतः प्रमाण है उसी प्रकार

1027
01:28:12,080 --> 01:28:17,360
जो वेद है वह स्वतः प्रमाण है

1028
01:28:17,360 --> 01:28:21,440
परत प्रमाण नहीं है यदि वेद को प्रमाण नहीं है यदि वेद

1029
01:28:21,440 --> 01:28:26,320
को किसी के द्वारा प्रमाणित कर दिया जाएगा तो वेद अपर सेय नहीं रहेगा

1030
01:28:26,320 --> 01:28:27,440
वेद अपश

1031
01:28:27,440 --> 01:28:33,440
है जो लोग वेद को पौष पुरुष के द्वारा सिद्ध

1032
01:28:34,400 --> 01:28:37,080
करना

1033
01:28:37,080 --> 01:28:41,720
यंते प्राप्य लभते इति

1034
01:28:41,720 --> 01:28:47,720
वेद र धर्मार्थ ही

1035
01:28:47,760 --> 01:28:52,160
अर्थात विद्यंत जिसके द्वारा जाना

1036
01:28:52,160 --> 01:28:56,240
जाए जिसके द्वारा प्राप्त किया जाए

1037
01:28:56,240 --> 01:29:00,520
उसका नाम जो है वेद है विगरी ने से बना लो

1038
01:29:00,520 --> 01:29:04,720
विदरी लावे से बना लो विध विचारण से बना लो

1039
01:29:04,720 --> 01:29:09,600
और वि सत्ता सत्ता याम से वेद बना

1040
01:29:09,600 --> 01:29:13,720
लो अंतिम में जो हमारा

1041
01:29:13,720 --> 01:29:18,080
ऋग्वेद उसके सा भाष में जो है व्याख्या

1042
01:29:18,080 --> 01:29:24,080
की टयो हो प्रद

1043
01:29:24,240 --> 01:29:28,240
और अनिष्ट का जो प्रतिपादन करने में सामर्थ्य भान है उसका

1044
01:29:28,240 --> 01:29:32,800
नाम वेद है वेद थ वेद

1045
01:29:32,800 --> 01:29:37,040
इट क्या चीज है क्यों जो वेद है वो प्रवृत्ति

1046
01:29:37,040 --> 01:29:41,120
निवृत्ति दोनों मार्ग में है जो सकाम लोग है

1047
01:29:41,120 --> 01:29:45,120
वो प्रवृत्ति मार के उसम है जो निष्काम लोग

1048
01:29:45,120 --> 01:29:49,160
होते हैं वो इससे केवल मोक्ष की प्राप्ति चाहते हैं

1049
01:29:49,160 --> 01:29:53,360
और जो कामी लोग होते हैं वो इससे अपने धन धान समृद्धि की इच्छा

1050
01:29:53,360 --> 01:29:58,000
चाहते हैं तोय लोक परलोक दोनों सिद्ध करने वाला कौन है

1051
01:29:58,000 --> 01:30:02,320
वेद है देख इष्ट क्या चीज

1052
01:30:02,320 --> 01:30:06,560
है यदि हमें संतान की प्राप्ति

1053
01:30:06,560 --> 01:30:10,720
की इच्छा है तो वेदो के द्वारा

1054
01:30:10,720 --> 01:30:14,800
आप संतान गोपाल मंत्र का जब कराएंगे तो संतान

1055
01:30:14,800 --> 01:30:18,880
होगी ही आपके कन्या

1056
01:30:18,880 --> 01:30:23,480
के विवाह में अर्चन आ रही है कन्या का विवाह नहीं हो रहा

1057
01:30:23,480 --> 01:30:27,560
तो नी महा माय का आप वेदो के द्वारा जप

1058
01:30:27,560 --> 01:30:31,640
कर आचार जी वक्ता आचार्य जी विषय मैं फिर

1059
01:30:31,640 --> 01:30:36,480
आपके ध्यान में ला रहा हूं वेदो अखिलो धर्म

1060
01:30:36,480 --> 01:30:39,320
मूलम धर्म मूलम आपसे

1061
01:30:39,320 --> 01:30:43,680
अनुरोध है विषय पर अपने को केंद्रित करें

1062
01:30:43,680 --> 01:30:48,040
केंद्रित करें धर्म क्या है उसकी परिभाषा क्या है

1063
01:30:48,040 --> 01:30:52,040
उसका विस्तार क्या है वह बताएं और उस धर्म

1064
01:30:52,040 --> 01:30:56,160
का मूल वेद कैसे है यह बताए कृपया

1065
01:30:56,160 --> 01:31:00,360
हा ऋगवेद का जो भाष्य उसकी व्याख्या है व फिर

1066
01:31:00,360 --> 01:31:04,560
भी चलो आपका आदेश तो धर्म

1067
01:31:04,560 --> 01:31:09,000
और मत इसम मैं कहता हूं धर्म सनातन

1068
01:31:09,000 --> 01:31:13,200
धर्म क्या है और मत क्या है देखि

1069
01:31:13,200 --> 01:31:17,560
सनातन जो धर्म है सर्वो भोग सुलभ निगम

1070
01:31:17,560 --> 01:31:23,560
प्रतिष्ठा

1071
01:31:24,000 --> 01:31:30,000
धर्म धर्म धर्मम सनातन मद विदास

1072
01:31:30,000 --> 01:31:34,240
धर्मा सर्वो भोग सुलभ संसार

1073
01:31:34,240 --> 01:31:38,560
में स कामना है उसको देने वाला कौन सनातन

1074
01:31:38,560 --> 01:31:42,680
धर्म है सर्वो उपकार निरत

1075
01:31:42,680 --> 01:31:47,280
और सभी के उपकार की भावना रखने वाला कौन है सनातन

1076
01:31:47,280 --> 01:31:51,320
धर्म है सर्वो का रतो

1077
01:31:51,320 --> 01:31:55,760
मुनि भी प्रत अन मत मजहब जो होंगे

1078
01:31:55,760 --> 01:31:59,960
व मुनियों के द्वारा प्रणित नहीं है सनातन धर्म जो ऋषि

1079
01:31:59,960 --> 01:32:04,120
महर्षि के द्वारा प्रणित है कोयो

1080
01:32:04,120 --> 01:32:08,280
भूम बल इस संसार में भूमंडल में सनातन

1081
01:32:08,280 --> 01:32:13,000
धर्म के अलावा ऐसा कोई धर्म नहीं है जो दूसरे का कल्याण

1082
01:32:13,000 --> 01:32:17,760
कर सके को भूम धर्म सग

1083
01:32:17,760 --> 01:32:23,760
धर्मम सनातन मृते विधा सुधर्म

1084
01:32:24,600 --> 01:32:28,840
अर्थात सनातन ते माने बिना सनातन धर्म के बिना

1085
01:32:28,840 --> 01:32:33,080
संसार में कोई ऐसा धर्म नहीं जो कल्याण कर सके

1086
01:32:33,080 --> 01:32:37,240
और अस्तित्व आत्म विषयम यद लोक मध्य ि

1087
01:32:37,240 --> 01:32:41,280
सनातन धर्म का अस्तित्व रहेगा तो भारत का अस्तित्व रहेगा

1088
01:32:41,280 --> 01:32:45,640
सनातन धर्म का अ भारत का अस्तित्व नहीं र शोन

1089
01:32:45,640 --> 01:32:50,080
शो

1090
01:32:50,080 --> 01:32:54,640
अस् अब सकल सिस्टम

1091
01:32:54,640 --> 01:32:59,000
व संसार में सबका कल्याण करता है अस्तित्व में विना

1092
01:32:59,000 --> 01:33:03,600
तदा की मस्ती यदि हमारा सनातन धर्म नहीं रहा

1093
01:33:03,600 --> 01:33:07,720
तो संसार में किसी का अस्तित्व नहीं रहना और अंतिम में कह रहे कि

1094
01:33:07,720 --> 01:33:12,040
जो है कि सर्वम विनट

1095
01:33:12,040 --> 01:33:16,080
जगत जगत सर्वम विन संसार य सनातन धर्म के

1096
01:33:16,080 --> 01:33:20,440
अनुसार नहीं चलेगा तो इस भूमंडल पर जो है

1097
01:33:20,440 --> 01:33:24,920
पृथ्वी का भी रहना कठिन है तो हम आज लोग सब लोग प्रतिज्ञा

1098
01:33:24,920 --> 01:33:29,200
करते हैं बिल सद भूते भारते धर्म भावा

1099
01:33:29,200 --> 01:33:33,760
इस भारतवर्ष में घर घर में जो सनातन धर्म बले लस

1100
01:33:33,760 --> 01:33:38,680
भू भारते धर्म बाबा प्रजन भूते भारतीय प्रताप

1101
01:33:38,680 --> 01:33:39,880
और घर घर में हमारा

1102
01:33:39,880 --> 01:33:44,600
विश्व भारतीयों का प्रताप भरे और प्र बंदो छित

1103
01:33:44,600 --> 01:33:49,040
धर्म चर्चा भारतीयों के प्रताप के साथ साथ

1104
01:33:49,040 --> 01:33:53,080
में जो भारतीयों का प्रताप है उसके साथ साथ में

1105
01:33:53,080 --> 01:33:57,240
और क्या प्रत बंद धर्म चर्चा

1106
01:33:57,240 --> 01:34:01,400
घर घर में आध्यात्मिक चर्चा भी पड़े और निप

1107
01:34:01,400 --> 01:34:05,400
बाधा पामर सम गतम जो मनुष्य के द्वारा

1108
01:34:05,400 --> 01:34:09,840
मन माने ढंग से जो मत मज संप्रदाय चलाए हैं उन मूर्खों

1109
01:34:09,840 --> 01:34:14,040
का जो मत मजहब है व विट हो नि बाधा

1110
01:34:14,040 --> 01:34:18,360
पामर संतम अब यह मत किसको कहते हैं

1111
01:34:18,360 --> 01:34:22,400
तो मस्त का मत का लक्षण भी सूच धर्म केवल सनातन है

1112
01:34:22,400 --> 01:34:26,480
इसके अलावा कोई धर्म शब्द का प्रयोग करता है उसको मत शब्द

1113
01:34:26,480 --> 01:34:30,920
का प्रयोग करना चाहिए धर्म शब्द का प्रयोग नहीं कर सकता नामाक्षर

1114
01:34:30,920 --> 01:34:36,440
मते यशु लोके मतान किता मतान

1115
01:34:36,440 --> 01:34:40,560
नाम महे शयो धर्म

1116
01:34:40,560 --> 01:34:45,120
सनातन नाम देहा नामरा लसत

1117
01:34:45,120 --> 01:34:49,400
मते जिसके आगे नाम लग जाए

1118
01:34:49,400 --> 01:34:53,960
जिसके आगे नाम लग जाए नामा

1119
01:34:53,960 --> 01:34:55,120
मते यशु मत

1120
01:34:55,120 --> 01:34:59,400
माना जाएगा आप ये समझिए जैन है बौद्ध ईसाई

1121
01:34:59,400 --> 01:35:03,680
है इनके आगे नाम लगा है धर्म जो धर्म

1122
01:35:03,680 --> 01:35:07,720
शब्द ना होकर मत शब्द का प्रयोग करना चाहिए तो बोले धर्म

1123
01:35:07,720 --> 01:35:11,920
कौन है कुम नाम महे जिस पुरुष

1124
01:35:11,920 --> 01:35:16,320
का नाम नहीं लगेगा वो धर्म होगा आप ये कहोगे सनातन

1125
01:35:16,320 --> 01:35:21,360
धर्म 13 मिनट आपके पूरे हो चुके दो मिनट

1126
01:35:21,360 --> 01:35:25,480
विशेष विशेषण भाव जहा होगा वहां मत माना जाएगा

1127
01:35:25,480 --> 01:35:29,560
जैसे जैन धर्म है बौद्ध धर्म है जहा विशेष विशेषण भाव नहीं होगा

1128
01:35:29,560 --> 01:35:33,640
वह धर्म माना जाएगा तो आप ये कह सकते हैं सनातन विशेषण धर्म

1129
01:35:33,640 --> 01:35:37,920
विशेष है तो बोले कि नहीं पर्याय वाचक नित धर्मम

1130
01:35:37,920 --> 01:35:42,000
केच सनातन पदम वृषा सनातन का जो

1131
01:35:42,000 --> 01:35:46,200
पर्याय वाचक है वे धर्म शब्द है सनातन धर्म में कोई अलग

1132
01:35:46,200 --> 01:35:50,440
अलग नहीं है घटो घटा का साद बध नहीं होता सब विद्वान बने हैं

1133
01:35:50,440 --> 01:35:54,920
त्य घटा का साद बध नहीं होता इसलिए जो है पर्याय

1134
01:35:54,920 --> 01:35:59,280
वाचक तया निद धर्मम केच सनातन पदेन बदाम बरिष्ठ

1135
01:35:59,280 --> 01:36:03,360
जो पर्याय वाचक है सनातन धर्म दोनों पर्याय

1136
01:36:03,360 --> 01:36:07,600
वाचक है विशेष विशेषण भाव नहीं है तो धर्म जो केवल सनातन

1137
01:36:07,600 --> 01:36:10,360
के आगे ही लग सकता है और किसी के आगे धर्म

1138
01:36:10,360 --> 01:36:14,520
शब्द नहीं लग सकता शोभन शोभन अब ये कहिए इसमें

1139
01:36:14,520 --> 01:36:18,760
प्रमाण क्या है तो इसमें सनातन बव आरता

1140
01:36:18,760 --> 01:36:22,800
ये अथर वेद का प्रमाण है वेदो खलो धर मूलम सबके

1141
01:36:22,800 --> 01:36:26,920
मूल में कोन वेद है जो वेद प्रमाणित करेगा वो धर्म माना जाएगा

1142
01:36:26,920 --> 01:36:31,080
जिसको वेद प्रमाणित नहीं वो धर्म नहीं माना जाएगा तो सनातन में

1143
01:36:31,080 --> 01:36:35,200
अथर्ववेद में कहा है कि सनातन धर्म को धर्म का पर्यायवाची

1144
01:36:35,200 --> 01:36:39,280
माना है सनातन जो धर्म सबसे विवत है हमारे में अथर

1145
01:36:39,280 --> 01:36:43,680
वेद भी मूल है और मत मजत संप्रदाय में कोई वेद मूल

1146
01:36:43,680 --> 01:36:47,760
नहीं हो सकता समय आपका पूरा हो गया बहुत सुंदर बहुत सुंदर

1147
01:36:47,760 --> 01:36:52,080
शोभन शोभन अब प्रश्न उत्तर

1148
01:36:52,080 --> 01:36:58,080
की श्रंखला है जिस भी समूह जिस भी समूह

1149
01:37:04,240 --> 01:37:08,240
को जिस भी समूह को प्रश्न है वो प्रश्न कर और शास्त्रार्थ का

1150
01:37:08,240 --> 01:37:13,160
आनंद ले संचालक जी प्रश्न था

1151
01:37:13,160 --> 01:37:17,640
वेदो अखिलम धर्म मूलम निर्णायक

1152
01:37:17,640 --> 01:37:21,920
मंडल की अपेक्षा थी कि वक्ता सबसे पहले यह बताएंगे

1153
01:37:21,920 --> 01:37:26,360
कि धर्म क्या है और फिर

1154
01:37:26,360 --> 01:37:30,760
उस धर्म का स्रोत वेद कैसे वक्ता

1155
01:37:30,760 --> 01:37:35,160
ने अपने तरीके से अपनी बात रखी उनको साधुवाद अथर्व

1156
01:37:35,160 --> 01:37:39,240
वेद का एक मंत्र उधत करता हूं कणाद ऋस

1157
01:37:39,240 --> 01:37:43,240
उसके प्रवर्तक है प्रणेता है तो कहते हैं कि

1158
01:37:43,240 --> 01:37:48,840
धर्म क्या है प्रथम परिभाषा मिलती है अथर्व वेद

1159
01:37:48,840 --> 01:37:54,320
से यतो अभुदय निय सिद्धि स धर्म

1160
01:37:54,320 --> 01:37:59,000
धर्म की परिभाषा है कि जिस कार्य व्यवहार

1161
01:37:59,000 --> 01:38:03,880
चिंतन आदि से लोक परलोक दोनों में

1162
01:38:03,880 --> 01:38:08,160
कल्याण हो वेल बीइंग हो उसे ही धर्म

1163
01:38:08,160 --> 01:38:12,200
कहते हैं वह आचरण वह व्यवहार

1164
01:38:12,200 --> 01:38:16,680
वह चिंतन वह सोच वह कृत्य

1165
01:38:16,680 --> 01:38:19,960
जिससे प्राणी का स्वयं का भी

1166
01:38:19,960 --> 01:38:24,080
और इस ब्रह्मांड का भी जगत का भी कल्याण हो

1167
01:38:24,080 --> 01:38:28,240
उस कृत्य उस आचार व्यवहार और विचार को क्या

1168
01:38:28,240 --> 01:38:32,280
कहते हैं धर्म तो जिससे सब प्रकार

1169
01:38:32,280 --> 01:38:36,520
से कल्याण ही कल्याण हो वही धर्म है तो

1170
01:38:36,520 --> 01:38:40,880
य यतो अभद निश सिद्धि स धर्मा

1171
01:38:40,880 --> 01:38:44,960
अथर्व वेद वेद ही स्रोत है इस वाक्य को

1172
01:38:44,960 --> 01:38:48,960
कहने वाला कणाद ऋषि इसको बताते हैं फिर आगे कहते हैं

1173
01:38:48,960 --> 01:38:54,960
धर्मे धार लोक यह जगत ही ब्रह्मा

1174
01:38:55,160 --> 01:38:59,400
धारण किया हुआ है निमित है चल रहा है किसके द्वारा

1175
01:38:59,400 --> 01:39:04,000
धर्म के द्वारा तो धर्म वह नियमन है वह रेगुलेशन

1176
01:39:04,000 --> 01:39:08,240
है जिससे जीवन चलता है जगत चलता है

1177
01:39:08,240 --> 01:39:12,240
य भगवान की बनाई हुई व्यवस्था जो है यही

1178
01:39:12,240 --> 01:39:16,680
धर्म है इसी को सरली कृत तरीके से आगे जाकर के

1179
01:39:16,680 --> 01:39:20,920
महाराज मन ने मनुष मति में बताया और इसको थोड़ा सरल

1180
01:39:20,920 --> 01:39:25,360
किया उन्होंने तिमा सचंद्र

1181
01:39:25,360 --> 01:39:30,040
निग्रह र विद्या सत्य धर्म लक्षण

1182
01:39:30,040 --> 01:39:34,160
धर्म के द लक्षण होते हैं यह चीज जहां दिखे आप जान

1183
01:39:34,160 --> 01:39:35,080
लीजिए वही धर्म

1184
01:39:35,080 --> 01:39:39,120
है क्या क्या चीज ति सद वृत्तियों को

1185
01:39:39,120 --> 01:39:44,200
सद्गुणों को धारण करने की क्षमता अी में आप कहना चाहे

1186
01:39:44,200 --> 01:39:48,600
तो कैलिबर टू रिटेन वर्चू श्रेष्ठतम

1187
01:39:48,600 --> 01:39:52,600
जो आचार विचार है गुण है उनको धारण करने की क्षमता का सतत

1188
01:39:52,600 --> 01:39:57,520
विकास करते रहना धर्म का पालन करना होता है तो ति

1189
01:39:57,520 --> 01:40:02,000
क्षमा बहुत शक्तिमान हो जाइए ज्ञान में संपदा में

1190
01:40:02,000 --> 01:40:06,080
और किसी भी प्रकार के ऐश्वर्य में वैभव में तो क्षमाशील हो जाइए

1191
01:40:06,080 --> 01:40:10,480
विनम्र हो जाइए ति

1192
01:40:10,480 --> 01:40:15,400
क्षमा इसमें कुछ प्रॉब्लम ना हो इसको ये जितने

1193
01:40:15,400 --> 01:40:19,560
दुपति है गलत विचार सोच है जीवन की इसको दमन

1194
01:40:19,560 --> 01:40:23,560
करने की सामर्थ क्षमता का विकास करना धर्म का

1195
01:40:23,560 --> 01:40:27,760
लक्षण दु प्रवृत्तियों को दमित करने की शक्ति को विकसित

1196
01:40:27,760 --> 01:40:31,880
करना यानी धर्म का पालन करना है ति क्षमा दम

1197
01:40:31,880 --> 01:40:36,480
अ परनिंदा चुली इत्यादि यह सब नहीं

1198
01:40:36,480 --> 01:40:40,640
करना चाहिए यह धर्म का लक्षण हैमा मस्ते

1199
01:40:40,640 --> 01:40:44,760
सचम इंद्री निग्रह सच पवित्रता मन वचन

1200
01:40:44,760 --> 01:40:48,800
कर्म से पवित्र रहना और इंद्र निग्रह इंद्रियों के

1201
01:40:48,800 --> 01:40:53,320
जो विषय है पांच कर्म इंद्रिया पांच ज्ञ इंद्रिया

1202
01:40:53,320 --> 01:40:57,600
इन पर एक रीजनेबल रिस्ट्रिक्शन रिस्ट्रेंट एक्सरसाइज करना

1203
01:40:57,600 --> 01:41:01,640
एक संतुलित रूप से इनको इन पर

1204
01:41:01,640 --> 01:41:05,800
नियंत्रण रखना यह भी धर्म का लक्षण है फिर कहते

1205
01:41:05,800 --> 01:41:10,080
हैं धीर विद्या बुद्धि का विकास करना और

1206
01:41:10,080 --> 01:41:14,320
एकिशन ऑफ नॉलेज विद्यार्जन करना बुद्धि का विकास करना

1207
01:41:14,320 --> 01:41:18,440
विद्यार्जन करना ज्ञानार्जन करना तोय हो गया धीर विद्या

1208
01:41:18,440 --> 01:41:22,840
सत्यम अक्रधा सत्य का पालन करना और क्रोध के विपरीत

1209
01:41:22,840 --> 01:41:25,680
यानी सौम्य अवस्था में रहना शांत और

1210
01:41:25,680 --> 01:41:29,880
सौम्य रहना अच्छे स्वभाव का होना यह 10 चीजें

1211
01:41:29,880 --> 01:41:33,920
जो है ये धर्म के लक्षण है इस पर अगर और विद्वानों को

1212
01:41:33,920 --> 01:41:38,160
प्रश्न पूछना हो तो पूछ हा प्रश्न इत्यादि प्रश्न उत्तर आपने व्याख्या दी

1213
01:41:38,160 --> 01:41:42,160
धर्म के विषय में जो वो था बहुत सुंदर व्याख्या आपने दी

1214
01:41:42,160 --> 01:41:48,160
हम कतल ध्वनि से आपका स्वागत करेंगे और प्रश्न जो भी है तो प्रश्न पूछे

1215
01:41:48,280 --> 01:41:52,320
ओम हां जी मैं अध्यक्ष

1216
01:41:52,320 --> 01:41:56,520
जी से अनुमति चाहूंगा प्रश्न पूछ लू आचार्य परवर

1217
01:41:56,520 --> 01:42:00,920
आपसे निवेदन है कि आप वेदो अखिलम धर्म मूल यह

1218
01:42:00,920 --> 01:42:06,120
किस शास्त्र से लिया गया

1219
01:42:06,120 --> 01:42:10,600
है यह मनुस्मृति से ठीक है

1220
01:42:10,600 --> 01:42:15,520
सही है और किसी को कोई प्रश्न किसी टीम

1221
01:42:15,520 --> 01:42:19,680
को और कोई समूह प्रश्न करना चाहेगा आचार्य

1222
01:42:19,680 --> 01:42:23,840
प्रवर अभी आपने दो न्यायाधीश

1223
01:42:23,840 --> 01:42:28,240
पूर्व और वर्तमान में जिला न्यायाधीश और सबसे

1224
01:42:28,240 --> 01:42:32,320
परम सत्ता परम पिता परमात्मा को मानते हुए मैं वाक्य को प्रश्नों

1225
01:42:32,320 --> 01:42:36,520
के रूप में आपको उत्तर देने की कृपा करेंगे आपने

1226
01:42:36,520 --> 01:42:40,760
पुराणों को और वेदों को एक समय उत्पत्ति

1227
01:42:40,760 --> 01:42:44,760
बताई क्या यह सही है और उसका प्रमाण देने

1228
01:42:44,760 --> 01:42:47,080
की कृपा

1229
01:42:47,080 --> 01:42:51,280
करें ये आप दोबारा फिर दोहरा सकता

1230
01:42:51,280 --> 01:42:55,520
हूं प्रणाम स शास्त्र नाम

1231
01:42:55,520 --> 01:43:01,520
वेद [संगीत]

1232
01:43:04,360 --> 01:43:08,400
ब्रह्मणा क्या संदेह आपको ये बताओ आप

1233
01:43:08,400 --> 01:43:12,760
अनंतर की व्याख्या बताइए क्या अन की विग्रह बताओ पहले ये कहां का श्लोक

1234
01:43:12,760 --> 01:43:17,280
है नहीं मैं प्रश्न कर रहा हूं आप मेरे लिए प्रश्न कर रहे हैं अरे

1235
01:43:17,280 --> 01:43:21,600
आप प्रश्न इसलिए कर रहे है कि उत्तर को समझे नहीं नहीं मैं इसलिए समझा

1236
01:43:21,600 --> 01:43:25,680
नहीं हूं इसलिए तो पूछ रहा हूं आपने क्या कहा आप अपनी बात को हिंदी में समझा

1237
01:43:25,680 --> 01:43:30,200
दीजिए क्या मतलब है पुराण सर्व शास्त्रम प्रथमं भ्रम

1238
01:43:30,200 --> 01:43:34,200
स्मत ब्रह्मा जी ने जब सृष्टि की उत्पत्ति की आप ये कहां से उधित है वो

1239
01:43:34,200 --> 01:43:38,400
भी बताइएगा हां ये ये सब स्मृतियों से है

1240
01:43:38,400 --> 01:43:42,600
स्मृतियों में भी है और महाभारत में भी है स्मृतियों

1241
01:43:42,600 --> 01:43:46,640
में भी है महाभारत में भी है भी से काम नहीं

1242
01:43:46,640 --> 01:43:50,960
चलेगा मर्यादित मर्यादित होकर ही बात करें श्रीमान जी

1243
01:43:50,960 --> 01:43:56,160
भी नहीं नहीं नहीं भी नहीं कह रहे एक

1244
01:43:56,160 --> 01:43:57,160
ब

1245
01:43:57,160 --> 01:44:01,560
मैं फिर हस्तक्षेप करूंगा पहले सुनिए शास्त्रार्थ

1246
01:44:01,560 --> 01:44:06,320
की तीन व्यवस्थाएं हैं प्रथम व्यवस्था

1247
01:44:06,320 --> 01:44:11,120
है आदर्श आइडियल डिबेट शास्त्रार्थ माने अकडम

1248
01:44:11,120 --> 01:44:15,520
डिबेट अकादमिक प्रतिस्पर्धा

1249
01:44:15,520 --> 01:44:19,520
वक्ता आइडियल डिबेट करेगा जो उनको पता था व

1250
01:44:19,520 --> 01:44:23,560
उन्होंने बता दिया उसे कोई को प्रश्न पूछना है एक

1251
01:44:23,560 --> 01:44:27,680
बार प्रश्न किया जा सकता है वो बता पाए नहीं बता पाए अब

1252
01:44:27,680 --> 01:44:31,800
दोबारा उनसे प्रश्न उसी विषय पर नहीं होगा आपके प्रश्नों

1253
01:44:31,800 --> 01:44:36,240
का उत्तर नहीं मिला आप शांत हो जाए एक बात कहना चाहते हैं हा

1254
01:44:36,240 --> 01:44:40,280
शास्त्र में एकार और अपकार दो होते हैं

1255
01:44:40,280 --> 01:44:44,480
जिसमें भी और ही का प्रयोग होता है यदि भी है तो इसमें आपत्ति

1256
01:44:44,480 --> 01:44:47,920
क्या है

1257
01:44:47,920 --> 01:44:53,560
है ही निचयामूरा

1258
01:44:53,560 --> 01:44:58,120
है हमें संदेह है तो संदेह दूर करें हमारा य

1259
01:44:58,120 --> 01:45:02,320
निर्णायक बंध निर्णायक मंडल के लोग बताएंगे के

1260
01:45:02,320 --> 01:45:06,480
भी संदेहास्पद होता है क्या यह निर्णय

1261
01:45:06,480 --> 01:45:10,720
मंडल करेगा इस प्रश्न को यही समाप्त करते हैं निर्णय मंडल इसका सुनिश्चित करेगा

1262
01:45:10,720 --> 01:45:14,840
क्या हुआ आगे कोई प्रश्न हो तो पूछ सकते हैं एक वस्तु वेद में

1263
01:45:14,840 --> 01:45:19,000
भी है पुराण में भी है व धर्म शास्त्र में भी है तो भी क्या अनिश्चय

1264
01:45:19,000 --> 01:45:25,000
हो जाएगा कोई मतलब

1265
01:45:25,320 --> 01:45:29,600
फिर सुनिए मुझे इसलिए हस्तक्षेप करना पड़ रहा है कि कुछ विधाएं हमें

1266
01:45:29,600 --> 01:45:33,600
स्पष्ट करनी है कि प्रश्न कैसे हो उत्तर कैसे आवे

1267
01:45:33,600 --> 01:45:37,720
शस्त्राणि बहवा ऋषियो विभिन्न

1268
01:45:37,720 --> 01:45:41,920
न को ऋषि यस्य मतम प्रमाणम यद सार भूतम तद

1269
01:45:41,920 --> 01:45:46,280
उपास नियम बहुत सारे हमारे शास्त्र है बहुत सारे ऋषि

1270
01:45:46,280 --> 01:45:50,480
हैं उसके प्रवर्तक है विचारों के एक का भी मत अंतिम

1271
01:45:50,480 --> 01:45:55,040
नहीं है इसलिए जो विदत सभा स्वीकार कर ले लोकमानस

1272
01:45:55,040 --> 01:45:59,200
स्वीकार कर ले वही अंतिम सत्य है अब य

1273
01:45:59,200 --> 01:46:03,280
मंच भी यह कहने की स्थिति में नहीं है कि यह

1274
01:46:03,280 --> 01:46:07,520
जनमानस जो सुन रहा है इस विमर्श को वह इसको कैसे

1275
01:46:07,520 --> 01:46:11,640
स्वीकार करेगा तो मैंने यह उधत किया कि आचार्यों ने ही यह कहा है

1276
01:46:11,640 --> 01:46:16,120
कि बहुत शास्त्र है तरह तरह की प्रतिकूल

1277
01:46:16,120 --> 01:46:20,160
बातें लिखी है और मत अलग अलग है ऋषियों

1278
01:46:20,160 --> 01:46:24,200
केलिए आप मान ले प्रश्न नंबर दो पर जाइए

1279
01:46:24,200 --> 01:46:28,520
मैं संचालक महोदय से ही प्रश्न करता हूं वो षि

1280
01:46:28,520 --> 01:46:32,560
कर सते आप नहीं कर सकते ियो को प्रमाणिक कैसे कह

1281
01:46:32,560 --> 01:46:36,680
रहे हैं ऋषि का कोई सूत्र भी अपमा

1282
01:46:36,680 --> 01:46:40,480
नहीं है किसी ऋषि का सूत्र प्रमाणिक नहीं

1283
01:46:40,480 --> 01:46:44,720
पुनः यह जो बात है ना मैंने पहले आपको कह दिया है कि आप

1284
01:46:44,720 --> 01:46:49,000
स निर्णायक मंडल में प्रश्न नहीं कर सकते आपको सामने वाली टीम से प्रश्न

1285
01:46:49,000 --> 01:46:53,080
करना है वो कर लीजिए आप स्पष्ट रूप से आ

1286
01:46:53,080 --> 01:46:57,520
कोई प्रश्न नहीं है तो फिर आगे बढ़ते हैं आगे

1287
01:46:57,520 --> 01:47:01,520
क्रम संख्या टीम किसका था दो नंबर पर किसका है टीम

1288
01:47:01,520 --> 01:47:05,720
नंबर तीन का है अच्छा प्रथम का टीम नंबर प्रथम

1289
01:47:05,720 --> 01:47:10,000
प्रश्न संख्या आपकी

1290
01:47:10,000 --> 01:47:14,720
पाच समूह नंबर वन समूह क्रमांक एक

1291
01:47:14,720 --> 01:47:19,120
विषय संख्या पाच साकार और सभी सुनेंगे इसको

1292
01:47:19,120 --> 01:47:23,200
और आगे ध्यान से इसको सुनेंगे क्योंकि विषय ऐसा है बहुत जरूर

1293
01:47:23,200 --> 01:47:27,200
और बहुत विवादास्पद भी है तो इसको सुनने में श्रवण करने में आनंद

1294
01:47:27,200 --> 01:47:31,640
भी आएगा साकार और निराकार ब्रह्म

1295
01:47:31,640 --> 01:47:35,840
तथा उनसे संबंधित उपासना पद्धतियों

1296
01:47:35,840 --> 01:47:40,680
को शास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट कीजिए

1297
01:47:40,680 --> 01:47:45,680
समय हो रहा है करेक्ट दो बजे आरंभ कीजिए

1298
01:47:45,680 --> 01:47:49,920
ओम स परगा चक्रम कायणना शुद्धम

1299
01:47:49,920 --> 01:47:55,440
अधम कबीर मनीष परभू स्वयं यात

1300
01:47:55,440 --> 01:47:57,720
शाश्वती

1301
01:47:57,720 --> 01:48:03,440
समाय ओम शांति शांति

1302
01:48:03,440 --> 01:48:07,680
शांति आदरणीय अध्यक्ष महोदय सभी

1303
01:48:07,680 --> 01:48:12,000
विद्वत मंडल आज के मुख्य अतिथि संचालक महोदय

1304
01:48:12,000 --> 01:48:16,080
और सभी टीम में उपस्थित आचार्य गणों

1305
01:48:16,080 --> 01:48:20,440
और हमारे श्रोता गण जो

1306
01:48:20,440 --> 01:48:24,440
मंच के प्राण होते हैं आप सभी को नमन करता हुआ मैं अपने

1307
01:48:24,440 --> 01:48:28,440
प्रश्न की ओर बढ़ता हूं विषय है साकार और निराकार

1308
01:48:28,440 --> 01:48:32,560
मैंने यजुर्वेद के 4 अध्याय का य मंत्र रि आपके सामने पढी

1309
01:48:32,560 --> 01:48:37,040
है मान्यवर बात मत करिए बात नहीं आप ऐसे

1310
01:48:37,040 --> 01:48:41,200
आप नहीं बोल सकते आप अपने विषय का प्रतिपादन कीजिए चलिए कोई बात करे कुछ

1311
01:48:41,200 --> 01:48:46,320
आपको उ ध्यान रखिए इस बात का हम ध्यान रखेंगे आप अपना विय

1312
01:48:46,320 --> 01:48:50,360
प्र तो यहां विषय आया है कि यजुर्वेद

1313
01:48:50,360 --> 01:48:54,440
के 40 अध्याय का आठवा य मंत्र है इस मंत्र में

1314
01:48:54,440 --> 01:48:58,440
य बताया है स प्रगा यानी के वह

1315
01:48:58,440 --> 01:49:02,480
परमात्मा इस संसार को व्यापत व्यापक भाव से

1316
01:49:02,480 --> 01:49:06,520
घेरे हुए है और बीज शुक्र बीज

1317
01:49:06,520 --> 01:49:10,720
रूप में हर जगह विद्यमान है अकाम

1318
01:49:10,720 --> 01:49:13,160
बिना शरीर वाला है असना

1319
01:49:13,160 --> 01:49:17,200
विरम नस नाड़ियों से रहित है रोगों आदि से रहित

1320
01:49:17,200 --> 01:49:21,880
है और शुद्धम शुद्ध बुद्ध है पवित्र है

1321
01:49:21,880 --> 01:49:26,120
रोग पाप उसे छू नहीं सकता कवि क्रांति

1322
01:49:26,120 --> 01:49:30,680
दर्शी है मनीषी विद्वान है और सब प्रकार से

1323
01:49:30,680 --> 01:49:34,720
ठीक प्रकार से इस संसार को बना करके रच

1324
01:49:34,720 --> 01:49:38,840
करके चला रहा है यह उसकी नियमन में व्यवस्था है कोई

1325
01:49:38,840 --> 01:49:43,080
भी परमात्मा का कार्य बिना नियम के नहीं है अब यहां विषय

1326
01:49:43,080 --> 01:49:47,440
आता है देखिए यह वेद का मंत्र कहता है और वेद

1327
01:49:47,440 --> 01:49:51,480
से सनातन कोई सत विद्या संसार

1328
01:49:51,480 --> 01:49:55,640
में नहीं है अभी पुराणों की चर्चा भी आई सबसे पहले

1329
01:49:55,640 --> 01:49:59,920
आवि भाव वेद का हुआ और वेद सदा रहता है

1330
01:49:59,920 --> 01:50:03,920
वेद का ज्ञान सदा रहता है वह अनित्य है और उसमें

1331
01:50:03,920 --> 01:50:08,120
उस प्रकार से यानी कि यहां साकार का विषय निराकार का चल रहा है उपासना पद्धति

1332
01:50:08,120 --> 01:50:12,320
का विषय है तो मैं यहां कहना चाहता हूं कि परमपिता परमात्मा

1333
01:50:12,320 --> 01:50:16,320
का साकार रूप देखना है तो इस ब्रह्मांड को देखो

1334
01:50:16,320 --> 01:50:20,440
त्रण से लेकर के सूर्य लोक तक और चीटी से लेकर

1335
01:50:20,440 --> 01:50:24,560
के हाथी तक समस्त प्राणियों की रचना को देखो किस प्रकार

1336
01:50:24,560 --> 01:50:28,480
से एक एक रचना को परमपिता परमात्मा ने रचा है

1337
01:50:28,480 --> 01:50:32,600
यह उसकी बहुदा कला है इससे देख कर के और इस प्रकार

1338
01:50:32,600 --> 01:50:37,200
से उसका जो गुण है यह गुण सगुण और निर्गुण

1339
01:50:37,200 --> 01:50:41,280
से साकार का विषय यहां ग्रहण करते हैं लोग देखिए साकार

1340
01:50:41,280 --> 01:50:45,600
का अर्थ होता है आकार वाला और निराकार

1341
01:50:45,600 --> 01:50:49,760
का अर्थ होता है बिना आकार वाला जैसे हम सब आप

1342
01:50:49,760 --> 01:50:53,800
बैठे हैं सूर्य दिखता है चंद्रमा दिखता है पृथ्वी दिखती है

1343
01:50:53,800 --> 01:50:58,280
यह सारी चीजें दिख रही है यह आकार में है इनका आकार है

1344
01:50:58,280 --> 01:51:02,640
और हम सब बैठे हैं तो हम सब आकार वाले हैं हम अल्पज्ञ

1345
01:51:02,640 --> 01:51:06,800
हैं और परमात्मा सर्वज्ञ है वे मैं यहां

1346
01:51:06,800 --> 01:51:10,960
हूं तो यही हूं आप वहां है तो वहां है उस कोने में नहीं है जो जहां

1347
01:51:10,960 --> 01:51:15,840
बैठा है व वही है तो इस प्रकार से परमपिता परमात्मा का

1348
01:51:15,840 --> 01:51:20,000
बीज रूप में विद्यमान होने से अर्थात यह

1349
01:51:20,000 --> 01:51:24,080
गुण उसका सर्व व्यापकता होने से और

1350
01:51:24,080 --> 01:51:28,160
सब जगह विद्यमान होने से यह उसकी सगुण

1351
01:51:28,160 --> 01:51:32,240
उपासना कहा है और इसको ही हम

1352
01:51:32,240 --> 01:51:36,240
जो है जो लोग साकार कह के और परमपिता

1353
01:51:36,240 --> 01:51:40,240
परमात्मा का रूप बना कर के एक मूर्ति आदि

1354
01:51:40,240 --> 01:51:43,600
में प्रतिष्ठित करके जो जगत का रचयिता है

1355
01:51:43,600 --> 01:51:47,840
महर्षि दयानंद सरस्वती ने इसमें एक उदाहरण देते हुए कहा है

1356
01:51:47,840 --> 01:51:51,840
कि जो ब्रह्मांड का स्वामी है जैसे किसी अमेरिका के

1357
01:51:51,840 --> 01:51:56,120
राष्ट्रपति को आप कह कि एक छोटी सी कुटिया का राजा है

1358
01:51:56,120 --> 01:52:01,040
तो वह इससे नाराज होगा इसी प्रकार से परमपिता परमात्मा

1359
01:52:01,040 --> 01:52:05,280
जिसने लोक लोका बनाए हैं और उन सबको रच

1360
01:52:05,280 --> 01:52:09,840
कर के उनमें रम रहा है और उनसे अलग है उस परमपिता

1361
01:52:09,840 --> 01:52:13,960
परमात्मा को अगर किसी छोटी सी मूर्ति में आकित

1362
01:52:13,960 --> 01:52:18,360
करते हैं तो यह उस परमपिता परमात्मा का अपमान

1363
01:52:18,360 --> 01:52:22,680
है ये उसकी उपासना नहीं है क्योंकि परमपिता परमात्मा

1364
01:52:22,680 --> 01:52:26,760
वेद कहता है और वेद से पुराना कोई ज्ञान विज्ञान दुनिया में

1365
01:52:26,760 --> 01:52:31,040
नहीं है ब्रह्मा से लेकर के जमनी पर्यंत मह ऋषि दयानंद

1366
01:52:31,040 --> 01:52:35,080
पर्यंत सभी ऋषियों ने वेदा अनुकूल

1367
01:52:35,080 --> 01:52:39,160
उसी सनातन धर्म की परंपरा को जीवित रखते हुए

1368
01:52:39,160 --> 01:52:43,240
जिसका अभी हमारे उपाध्याय साहब वर्णन कर रहे थे

1369
01:52:43,240 --> 01:52:47,400
उसी क्रम को मैं आगे बढ़ाता हूं उसमें अथर वेद में मंत्र आया है

1370
01:52:47,400 --> 01:52:51,680
सनातनम एनम तार आध पुनर्नवा अहोरात्र

1371
01:52:51,680 --> 01:52:55,840
प्रजाय अन्य अनस रूपयो सनातन का

1372
01:52:55,840 --> 01:52:58,720
अर्थ केवल पुराना नहीं है सनातन का अर्थ

1373
01:52:58,720 --> 01:53:03,000
केवल पुराना ही नहीं है सनातन धर्म का सनातन का मतलब

1374
01:53:03,000 --> 01:53:07,040
है जो पुरातन से पुरातन होते हुए नूतन

1375
01:53:07,040 --> 01:53:11,040
से नूतन है और न्यूतन में भी न्यूतन बना रहता है उसे

1376
01:53:11,040 --> 01:53:15,040
सनातन कहते हैं इसीलिए परमपिता परमात्मा की

1377
01:53:15,040 --> 01:53:19,240
उपासना निराकार ब्रह्म की उपासना और यहां

1378
01:53:19,240 --> 01:53:23,280
मैं एक और उदाहरण देना चाहता हूं गीता से प्रस्तुत कर

1379
01:53:23,280 --> 01:53:27,280
गीता के आठवे अध्याय में योगेश्वर श्री

1380
01:53:27,280 --> 01:53:31,360
कृष्ण कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को समझाते

1381
01:53:31,360 --> 01:53:35,480
हुए जब उसे मोह में पड़ गया वह कह रहे हैं कि

1382
01:53:35,480 --> 01:53:40,280
हे अर्जुन आओ मैं आपको उस अविनाशी

1383
01:53:40,280 --> 01:53:44,520
ब्रह्म का दिग दर्शन कराता हूं और उसके रूप

1384
01:53:44,520 --> 01:53:48,520
को दिखाता हूं और जिसमें हमारे पौराणिक बंधु

1385
01:53:48,520 --> 01:53:52,720
कहते हैं कि श्री कृष्ण जी ने मुंह खोला और सारा बमा

1386
01:53:52,720 --> 01:53:57,080
उसम दिखा दिया तो वो क्या था श्री कृष्ण जी ने जब बताया योगेश्वर

1387
01:53:57,080 --> 01:54:01,520
ने कि हे अर्जुन ओम इति त दक्षम मनु शरण

1388
01:54:01,520 --> 01:54:05,640
व्यवहार ही लोके च परलो के परमम गति

1389
01:54:05,640 --> 01:54:09,800
प्राप्ति यानी के योगेश्वर श्री कृष्ण ने कहा कि यह ओम

1390
01:54:09,800 --> 01:54:14,360
ही वह अविनाशी ब्रह्म है जिसका कभी विनाश

1391
01:54:14,360 --> 01:54:18,360
नहीं होता उन्होंने आकार उकार मकार इन सब की

1392
01:54:18,360 --> 01:54:22,400
व्याख्या करते हुए और सूर्य तिन से लेकर के सूर्य

1393
01:54:22,400 --> 01:54:26,760
लो तक और चीटी से लेकर हाथी तक समस्त ब्रह्मांड का वर्णन

1394
01:54:26,760 --> 01:54:31,040
दिग दर्शन जन चक्षु के द्वारा जब योगेश्वर श्री कृष्ण

1395
01:54:31,040 --> 01:54:35,240
ने अर्जुन के सामने रखा तो उसका जन चक्षु से उसने

1396
01:54:35,240 --> 01:54:39,320
देखा और उसको देख कर के उसका मोह भंग हो गया कि

1397
01:54:39,320 --> 01:54:43,360
वास्तव में योगेश्वर कृष्ण आप धन्य है आपने मेरी आंखें खोल

1398
01:54:43,360 --> 01:54:47,840
दी मैं अब तक अजान में था यह सबसे बड़ा प्रमाण है दूसरा यह है

1399
01:54:47,840 --> 01:54:52,000
कि निराकार ब्रह्म की ही उपासना हम कर सकते हैं और जितने

1400
01:54:52,000 --> 01:54:56,000
भी हमारे मूर्ति पूजक बंधु भाई हैं वह सब भी उसका

1401
01:54:56,000 --> 01:55:00,080
ध्यान करते करते करते करते अंत में निराकार पर ही

1402
01:55:00,080 --> 01:55:04,800
आश्रय लेते हैं और उसकी उपासना पद्धति योग

1403
01:55:04,800 --> 01:55:09,160
साधना के द्वारा अष्टांग योग है यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार

1404
01:55:09,160 --> 01:55:13,280
धारणा ध्यान समाधि यह हमारा उसका क्रम है और

1405
01:55:13,280 --> 01:55:17,320
योग विद्या भी वेद से ही प्रकाशित हुई है तो इस प्रकार से

1406
01:55:17,320 --> 01:55:21,320
यहां कहने का तात्पर्य यह है कि परमपिता परमात्मा

1407
01:55:21,320 --> 01:55:26,040
के नाम पर अगर आज देखा जाए तो सबसे ज्यादा झगड़ा बखेड़ा है

1408
01:55:26,040 --> 01:55:29,600
ईश्वर के नाम पर है और किसी के नाम पर इतना नहीं है आज

1409
01:55:29,600 --> 01:55:33,720
लोग इस प्रकार से मानने लगे जिस सनातन धर्म की

1410
01:55:33,720 --> 01:55:37,760
दुनिया में धाक थी कोई उसको किसी प्रकार से चैलेंज करने

1411
01:55:37,760 --> 01:55:41,960
वाला नहीं था आज जिन मतों की बात आपने की जैन को आपने

1412
01:55:41,960 --> 01:55:46,360
धर्म कहा बौद्ध को धर्म कहा यह धर्म नहीं है यह मत पंथ है

1413
01:55:46,360 --> 01:55:50,480
और एक आचार्य गुरु विशेष के द्वारा चलाए हुए पंथ

1414
01:55:50,480 --> 01:55:54,760
रास्ते हैं धर्म सर्वज्ञ होता है और धर्म

1415
01:55:54,760 --> 01:55:59,000
जो है सबके लिए होता है जिसको समानता से सब धारण

1416
01:55:59,000 --> 01:56:03,200
कर सके तो इस प्रकार से परमपिता परमात्मा का दिया हुआ धर्म सबके

1417
01:56:03,200 --> 01:56:07,200
लिए समानता देता है और वह है वेद वेद से

1418
01:56:07,200 --> 01:56:11,240
बढ़कर के कोई भी हमारे लिए धर्म नहीं हो सकता तो परमपिता

1419
01:56:11,240 --> 01:56:15,360
परमात्मा की उपासना भी हम वेद के द्वारा ही कर सकते हैं

1420
01:56:15,360 --> 01:56:19,520
और वेद के मार्ग से चल सकते हैं और योग के मार्ग से

1421
01:56:19,520 --> 01:56:23,720
यज्ज के मार्ग से परमपिता परमात्मा को उपासना करते

1422
01:56:23,720 --> 01:56:27,720
हुए हम उसके समीप में पहुंच सकते हैं यह परमपिता परमात्मा की विधा

1423
01:56:27,720 --> 01:56:33,720
है जब मत मता इस देश में खड़े हुए वेदों की अविद्या का आविर्भाव

1424
01:56:36,400 --> 01:56:40,440
हुआ इससे बड़ी हानि हुई है और सनातन की

1425
01:56:40,440 --> 01:56:44,640
रक्षा के लिए हमें वेद की शरण में ही जाना पड़ेगा तो

1426
01:56:44,640 --> 01:56:48,760
साकार और निराकार दोनों में यह सगुण और

1427
01:56:48,760 --> 01:56:52,800
निर्गुण की उपासना की बात है तो परमपिता परमात्मा के जो गुण अभी

1428
01:56:52,800 --> 01:56:57,000
हमने गिनाए हैं वो अकाम है शरीर रहित है नस नाड़ी से रहित है

1429
01:56:57,000 --> 01:57:01,040
वर्ण आदि रोगों से रहित है तो यह उसके यानी

1430
01:57:01,040 --> 01:57:05,880
कि इस प्रकार से परमपिता परमात्मा का कोई आकार नहीं हो सकता

1431
01:57:05,880 --> 01:57:10,400
तो उसकी उपासना हमें योग दर्श योग योग के माध्यम से

1432
01:57:10,400 --> 01:57:14,400
और तप के माध्यम से यज के माध्यम से करनी होगी

1433
01:57:14,400 --> 01:57:18,600
जो आचरण का विषय है किसी के कहने से नहीं होगी

1434
01:57:18,600 --> 01:57:22,680
केवल दूर से करने से नहीं होगी ये आचरण का विषय इसी प्रकार

1435
01:57:22,680 --> 01:57:26,880
से इसे इस प्रकार से जानना पड़ेगा परमपिता परमात्मा के विषय में

1436
01:57:26,880 --> 01:57:31,560
गीता में उसमें बाइबल में कहा है कि मनुष्य ने

1437
01:57:31,560 --> 01:57:35,720
परमात्मा ने मनुष्य को अपनी आकृति का बनाया लेकिन बात इसके विपरीत

1438
01:57:35,720 --> 01:57:39,920
है मनुष्य ने ही अपनी आकृति का परमात्मा को बना डाला

1439
01:57:39,920 --> 01:57:44,240
मनुष्य के दो हाथ होते हैं तो वहा चार लगा दिए विशेषता कुछ कर डाली

1440
01:57:44,240 --> 01:57:48,480
उधर किसी ने कहा कि कृष्ण और राम ईश्वर

1441
01:57:48,480 --> 01:57:51,760
का अवतार नहीं ईसा ईश्वर का अवतार है

1442
01:57:51,760 --> 01:57:56,160
ई खुदा का बेटा है और वह राम को नहीं मानते

1443
01:57:56,160 --> 01:58:00,280
राम जिन जो राम को मानते हैं वह ईसा को नहीं मानते

1444
01:58:00,280 --> 01:58:04,880
और किसी ने कहा कि मोहम्मद ही उसका सच्चा पैगंबर है

1445
01:58:04,880 --> 01:58:08,880
उसके अलावा कोई उसका पैगंबर दूसरा जन को देने वाला नहीं

1446
01:58:08,880 --> 01:58:12,960
है तो इस प्रकार से कहने का तात्पर्य यह है कि परमपिता

1447
01:58:12,960 --> 01:58:17,000
परमात्मा तो एक है इसीलिए ऋग्वेद में कहा एकम सद विप्रा

1448
01:58:17,000 --> 01:58:21,040
बहुदा वदंती वह परमात्मा एक है परंतु

1449
01:58:21,040 --> 01:58:25,160
गुणों के आधार पर उसको लोग विद्वान लोग अनेक

1450
01:58:25,160 --> 01:58:29,160
नामों से पुकारते हैं और अनेक नामों से उसकी

1451
01:58:29,160 --> 01:58:33,240
चर्चा करते हैं और इसमें परमपिता परमात्मा ने जो

1452
01:58:33,240 --> 01:58:37,720
वेद का ज्ञान हमें दिया है यह वेद परमात्मा की वाणी है अभी

1453
01:58:37,720 --> 01:58:42,080
परमात्मा परमपिता परमात्मा की वाणी है वेद ऋषियों

1454
01:58:42,080 --> 01:58:46,120
ने जो भी वेदों के आधार पर अपना चिंतन दिया

1455
01:58:46,120 --> 01:58:50,200
है उसे कोई दुनिया में चैलेंज नहीं कर सकता ऋषियों ने जो

1456
01:58:50,200 --> 01:58:54,200
चैलेंज दिया है उसे कोई नहीं कर सकता दुनिया का वैज्ञानिक नहीं काट

1457
01:58:54,200 --> 01:58:58,400
सकता कोई पंडित पुरोहित नहीं काट सकता और ऋषियों के प्रमाण

1458
01:58:58,400 --> 01:59:03,240
अकाट्य हैं वेद स्वतः प्रमाण है और वेदा अनुकूल

1459
01:59:03,240 --> 01:59:06,760
स्मृति आदियोदी वेदा

1460
01:59:06,760 --> 01:59:10,960
अनुकूल होने से स्वीकार्य है इस प्रकार से हमें उन्हें स्वीकार करना

1461
01:59:10,960 --> 01:59:14,960
चाहिए अगर वेदा वेद विरुद्ध है तो कोई भी प्रमाण

1462
01:59:14,960 --> 01:59:19,480
स्वीकार नहीं होना चाहिए यह हमारे ऋषियों ने मान्यता दी है

1463
01:59:19,480 --> 01:59:24,040
और महर्षि दन ने कोई अलग से अपना लेखन नहीं किया मर्ष

1464
01:59:24,040 --> 01:59:28,120
दन ने ब्रह्मा से लेकर के जयमिनी पर्यंत जो वेदा

1465
01:59:28,120 --> 01:59:32,360
अनुकूल था उसी को उन्होंने सनातन धर्म

1466
01:59:32,360 --> 01:59:36,680
की रक्षा के लिए अभीष्ट किया है सनातन धर्म की

1467
01:59:36,680 --> 01:59:40,920
सनातन संस्कृति को बचाने के लिए अभीष्ट किया है तो स्वामी

1468
01:59:40,920 --> 01:59:45,120
दयानंद सरस्वती का सनातन रक्षा में जितना योगदान है

1469
01:59:45,120 --> 01:59:49,280
मह ऋषियों की पंक्ति में उन्हें अग्रण पंक्ति में होना चाहिए क्योंकि

1470
01:59:49,280 --> 01:59:53,520
बहुत सारे परमपिता परमात्मा तो उपास्य है हमारा

1471
01:59:53,520 --> 01:59:57,920
और वह स्तुत है उसके सिवाय कोई स्तुत नहीं है

1472
01:59:57,920 --> 02:00:02,240
कोई भी संसार में कोई भी पदार्थ परमात्मा के सिवाय स्तुत नहीं हो सकता

1473
02:00:02,240 --> 02:00:06,440
केवल स्तुति परमात्मा की की जा सकती है क्योंकि स्तुति स्तुति

1474
02:00:06,440 --> 02:00:11,000
उसी की की जाती है का इस प्रकार से

1475
02:00:11,000 --> 02:00:15,120
परमपिता परमात्मा ही केवल स्तुत है और उससे शुद्ध बुद्ध

1476
02:00:15,120 --> 02:00:19,200
पवित्र और दुनिया में कोई भी नहीं है हम अपने मित्र आदि

1477
02:00:19,200 --> 02:00:21,960
की झूठी प्रशंसा कर सकते हैं अपने आचार्यों की

1478
02:00:21,960 --> 02:00:26,400
टी प्रशंसा कर सकते हैं और जो मत के कारण हो रहा है और मत से मतवाद

1479
02:00:26,400 --> 02:00:30,440
होता है और मत से विवाद होता है इसीलिए परमपिता परमात्मा

1480
02:00:30,440 --> 02:00:34,800
के नाम पर जो आज झगड़े खड़े हुए हैं विवाद खड़े हुए हैं वह इसीलिए

1481
02:00:34,800 --> 02:00:38,800
हैं क्योंकि हम वेद मार्ग को छोड़कर और

1482
02:00:38,800 --> 02:00:43,040
सनातन धर्म को छोड़कर हम उल्टे पथ पर चल चुके

1483
02:00:43,040 --> 02:00:47,880
हैं गोस्वामी तुलसीदास जी की एक पंक्ति य मुझे याद आ रही है

1484
02:00:47,880 --> 02:00:52,280
चल ही कु पंथ वेद मग छाड़

1485
02:00:52,280 --> 02:00:56,360
कुटिल कु चाली कलि मल भांडे जो

1486
02:00:56,360 --> 02:01:00,760
वेद जैसे पवित्र जान को छोड़ कर के उल्टे पथ पर चलता है

1487
02:01:00,760 --> 02:01:04,840
वह कलयुग में झूठी बर्तन के झूठ के समान

1488
02:01:04,840 --> 02:01:09,000
है बस इतना कह कर के मैं अपनी वाणी को विराम करता हूं हम

1489
02:01:09,000 --> 02:01:13,280
एक परमपिता परमात्मा के उपासक बने और वेदा अनुकूल पद्धति को स्वीकार

1490
02:01:13,280 --> 02:01:17,280
करते हुए सनातन धर्म की रक्षा का व्रत ले इतना कह कर के मैं

1491
02:01:17,280 --> 02:01:23,280
सभी को नमन करता हू अपनी वाणी को विराम करता हूं ओम सम

1492
02:01:23,480 --> 02:01:28,200
सोनम सोनम अब आप प्रश्न

1493
02:01:28,200 --> 02:01:32,800
विषय इतना उत्साह पूर्ण था तो प्रश्न भी वैसे ही होंगे हा आगे

1494
02:01:32,800 --> 02:01:36,840
हम जो है आप लोगों सेही जानकारी ले लेंगे आपने विषय का

1495
02:01:36,840 --> 02:01:42,200
प्रतिपादन किया ही है आपने कहा नि

1496
02:01:42,200 --> 02:01:46,440
निराकार सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान है जो

1497
02:01:46,440 --> 02:01:50,600
आपके शब्द को कह रहा हूं मैं निर्ग निराकार सर्वज्ञ

1498
02:01:50,600 --> 02:01:54,800
शक्तिमान है जीव अल्पज्ञ अल्प

1499
02:01:54,800 --> 02:01:59,040
शक्तिमान आपने कहा मैं आपसे पूछना

1500
02:01:59,040 --> 02:02:03,600
चाहूंगा जो परात्पर पूतम परमात्मा सर्वज्ञ

1501
02:02:03,600 --> 02:02:07,880
सर्वशक्तिमान है न निराकार है व साकार

1502
02:02:07,880 --> 02:02:12,080
रूप में नहीं आ सकता यदि परमात्मा साकार रूप में नहीं आएगा तो

1503
02:02:12,080 --> 02:02:16,240
सर्व सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान विशेषण हटा देना चाहिए हटा

1504
02:02:16,240 --> 02:02:20,720
देना चाहिए क्यों वो सर्व

1505
02:02:20,720 --> 02:02:24,880
शक्तिमान परमात्मा जो है वह 12 रूप में भी आ सकता

1506
02:02:24,880 --> 02:02:29,280
है वो भगवान श्री राम के रूप में भी आ सकता है

1507
02:02:29,280 --> 02:02:33,840
कृष्ण के रूप में भी आ सकता है यदि सर्वज्ञ शक्तिमान है

1508
02:02:33,840 --> 02:02:38,440
तो यदि आपने कही मूर्ति की बात

1509
02:02:38,440 --> 02:02:39,040
सर्वम

1510
02:02:39,040 --> 02:02:43,240
खल वेदम ब्रह्म आप जब सब ब्रह्म स्वरूप

1511
02:02:43,240 --> 02:02:48,040
ही है तो जो परमात्मा है वह मूर्ति में भी है

1512
02:02:48,040 --> 02:02:52,280
शोभन शोभन शोभन शोभन आचार जी शोभन खंडन

1513
02:02:52,280 --> 02:02:56,280
की आवश्यकता है अंतिम में ज तत्व साक्षात्कार हो

1514
02:02:56,280 --> 02:03:00,360
जाता आपकी बात को कहता हूं नहीं आप प्रश्न पूछिए

1515
02:03:00,360 --> 02:03:04,640
तत्व साक्षात देखिए भगवान ने स्वयं कहा है हा भगवान

1516
02:03:04,640 --> 02:03:08,720
ने स्वयं कहा है सुनिए आप भगवान ने स्वयं कहा है कि मूर्ति में पूजा

1517
02:03:08,720 --> 02:03:12,720
मेरी कब तक करो जब तक सभी प्राणियों मेरा दर्शन ना हो

1518
02:03:12,720 --> 02:03:16,840
यदि आपका सभी प्राण भगवान का दर्शन हो गया हो और उनका दर्शन

1519
02:03:16,840 --> 02:03:20,840
आप में हो गया हो तो मूर्ति पूजा की आवश्यकता नहीं है प्रश्न हो

1520
02:03:20,840 --> 02:03:25,160
गया आप उत्तर उत्तर उत्तर उत्तर हां उत्तर सुनिए देखिए

1521
02:03:25,160 --> 02:03:29,400
अभी आचार्य श्री ने कहा के वो

1522
02:03:29,400 --> 02:03:33,760
अवतार के रूप में आने में क्या दिक्कत है आप निराकार सब जगह सर्वव्यापक

1523
02:03:33,760 --> 02:03:38,480
स्वीकार कर रहे हैं सर्व स्वीकार कर रहे आपका यही कहना था अब इसमें सुनिए

1524
02:03:38,480 --> 02:03:43,000
अगर परमात्मा एक उसमें आएगा शरीर में आएगा

1525
02:03:43,000 --> 02:03:47,040
जब आएगा तो अल्प हो जाएगा यह दोष परमात्मा

1526
02:03:47,040 --> 02:03:52,840
में आ जाएगा इसीलिए परमात्मा का अवतार कभी नहीं होता है

1527
02:03:52,840 --> 02:03:54,320
नहीं निर्णायक मंडल

1528
02:03:54,320 --> 02:03:58,320
को यदि कोई प्रश्न हो तो पूछ सकते हैं सर्वशक्ति मता आपको भी कोई प्रश्न

1529
02:03:58,320 --> 02:04:02,480
हो तो पूछ सकते हैं सर्वशक्ति मत्ता का अर्थ है उसे अवतार लेने

1530
02:04:02,480 --> 02:04:06,520
की शक्ति से भी संपन्न है अन्यथा सर्व शब्द में बाधा

1531
02:04:06,520 --> 02:04:11,200
उत्पन्न हो जाएगी वो समस्त शक्तियों से और अो रयान महतो

1532
02:04:11,200 --> 02:04:15,400
महिया अगर वो मूर्ति में और जब अणु अणु में है जर्रे

1533
02:04:15,400 --> 02:04:19,440
जर्रे में है तो मूर्ति में क्यों नहीं हो सकता किसी का कंट्रोल तो नहीं है

1534
02:04:19,440 --> 02:04:23,920
उस पर सुनिए सुनिए सुनिए कैसे हो सकता

1535
02:04:23,920 --> 02:04:27,960
है अ जी सुनिए अवनी जी सुनिए

1536
02:04:27,960 --> 02:04:31,960
कण कण में विद्यमान है अभी सुनिए मूर्ति में आने

1537
02:04:31,960 --> 02:04:35,960
से अल्प हो जाएगा तोय सर्वव्यापक है ना सर्वशक्तिमान का अर्थ यह

1538
02:04:35,960 --> 02:04:40,240
नहीं है जो आप कह रहे सर्वशक्तिमान का अर्थ है कि परमात्मा परमात्मा संसार

1539
02:04:40,240 --> 02:04:44,400
के जगत के रचने में अपने कार्यों में किसी की सहायता

1540
02:04:44,400 --> 02:04:48,600
नहीं लेता है सब शक्तियों से संपन्न है इसीलिए परमपिता

1541
02:04:48,600 --> 02:04:52,840
परमात्मा को सर्वशक्तिमान कहते हैं सर्व शक्तिमान नहीं लायक

1542
02:04:52,840 --> 02:04:57,120
मंडल समझ गए एक प्रश्न मैं भी करूंगा आपके आपने

1543
02:04:57,120 --> 02:05:01,360
बोला एक आपका वाक्य था कि आपने बोला कि वेदों की बातों

1544
02:05:01,360 --> 02:05:05,560
का जो खंडन करे वह झूठा खाता है ऐसा आपने

1545
02:05:05,560 --> 02:05:09,760
कहा अरे जिसने भी कहा पर आपने उसका

1546
02:05:09,760 --> 02:05:14,240
उच्चारण किया कि वेदों को जो काटे वो व्यक्ति नहीं हो सकता

1547
02:05:14,240 --> 02:05:18,280
हां चले हीप छड़े अरे

1548
02:05:18,280 --> 02:05:22,360
आप सुनिए आप सुनिए अपने उस पर रहिए आपने बोला वे

1549
02:05:22,360 --> 02:05:26,840
वेदों के विषय में बोला कि वेदों का खंडन नहीं कर सकते है ना वेदों की बातों को मानना

1550
02:05:26,840 --> 02:05:31,000
चाहिए मेरा प्रश्न हो जाने दीजिए कोई नहीं तो महर्षि

1551
02:05:31,000 --> 02:05:35,120
दयानंद ने सायण इत्यादि को क्यों काटा क्या उन्होंने व्याख्या ठीक नहीं की थी

1552
02:05:35,120 --> 02:05:39,160
या महर्षि दयानंद से पहले कोई ऐसा व्याख्या का नहीं हुआ जिसने वेदों को

1553
02:05:39,160 --> 02:05:43,280
समझा हो सायण की बात को आ गया बहुत अच्छा प्रसंग आया अब इसे ध्यान से सुन

1554
02:05:43,280 --> 02:05:47,440
लीजिए सायण की बात को मैं नोट करके लाया मैं सुना दूंगा आपको यही पर

1555
02:05:47,440 --> 02:05:52,400
ध्यान से सुन लीजिएगा अ प्रबु लोग बैठे हैं य सुन लीजिए आप

1556
02:05:52,400 --> 02:05:56,440
बो ओम गणा नामवा गणपति ग ह

1557
02:05:56,440 --> 02:06:00,560
प्रनाम पति हवामहे निधि नामवा निधि

1558
02:06:00,560 --> 02:06:04,680
पति वसमम अहम जानी गम

1559
02:06:04,680 --> 02:06:08,800
जाना गम यजुर्वेद के 2 अध्याय का नवा मंत्र है इसका

1560
02:06:08,800 --> 02:06:14,760
अथ महिदर क्या करता है सुन लीजिए पहले सुन लो सुनले

1561
02:06:14,760 --> 02:06:19,200
सुनले भाष का उपयोग कर मर्यादित भाषा का उपयोग

1562
02:06:19,200 --> 02:06:23,320
करें लीजिए प सुने दीजिए मान्यवर सुन लीजिए

1563
02:06:23,320 --> 02:06:27,440
अब सुन लो पहले सुन लीजिए ये श्रोता गण भी बैठे हैं मैं महिदर

1564
02:06:27,440 --> 02:06:31,800
का अर्थ पढ़ता हूं जो स्वामी जी ने ऋग्वेद आदि भाष भूमिका में उधित किया है

1565
02:06:31,800 --> 02:06:36,000
क्या करते हैं गणपति का अर्थ इस शब्द से घोड़े का ग्रहण किया उन्होंने

1566
02:06:36,000 --> 02:06:40,200
और वह क्या लिखते हैं सब रिजों के सामने यजमान

1567
02:06:40,200 --> 02:06:44,280
की स्त्री घोड़े के पास सोवे और सोती हुई

1568
02:06:44,280 --> 02:06:48,320
घोड़े से कहे कि हे अश्व जिससे गर्भ धारण

1569
02:06:48,320 --> 02:06:52,520
होता है ऐसा जो तेरा उसको मैं खींच

1570
02:06:52,520 --> 02:06:56,520
के अपनी योनि में डालू था तू उस को मुझ में स्थापन

1571
02:06:56,520 --> 02:07:00,720
कर बैठ जा बैठ जा बैठ जा बैठ जाइए

1572
02:07:00,720 --> 02:07:04,840
बैठ जाइए आराम से बैठ जाइए बैठ जाइए बैठिए

1573
02:07:04,840 --> 02:07:09,320
बैठिए बैठिए निर्णायक मंडल सुनिए रु

1574
02:07:09,320 --> 02:07:13,400
स्वामी द का अरे रुको रुको रु स्वामी द का अर्थ भी सुन लीजिए

1575
02:07:13,400 --> 02:07:18,480
अरे रुक जाइए इनका माइक बंद कर दो फिर भैया क्या बा एक मिनट रुक

1576
02:07:18,480 --> 02:07:22,680
जाइए अनुमति से एक बात कहूंगा सिर्फ उपाध्याय

1577
02:07:22,680 --> 02:07:26,800
जी ने अभी बताया इसमें शास्त्रार्थ में एक

1578
02:07:26,800 --> 02:07:29,760
प्रक्रिया बाद वाली तंड होती है मैंने

1579
02:07:29,760 --> 02:07:33,800
बता चुका हूं कि हमारा क्षेत्र बंड वाला है लेकिन बंड

1580
02:07:33,800 --> 02:07:37,800
च बजे होगा च बजे से पंड नहीं होगा आप

1581
02:07:37,800 --> 02:07:42,360
निर्णायक मंडल इस बात पर कोई मत रखना चाहे क्योंकि इन्होने इस तरीके की व्याख्या की है

1582
02:07:42,360 --> 02:07:46,360
निर्णायक मंडल से जरूर चाहूंगा इस कर करना है तो च बजे

1583
02:07:46,360 --> 02:07:51,000
के बाद बजे तक बिल्कुल ऐसे शास्त्री परंपरा से काम चलेगा शास्त्री

1584
02:07:51,000 --> 02:07:55,240
मिनट रहने दीजिए निर्णायक मंडल इसको सुनिश्चित करेगा आर जी

1585
02:07:55,240 --> 02:07:59,760
आचार्य जी एक व्यवस्था बनी रहेगी तो शास्त्रार्थ का आनंद

1586
02:07:59,760 --> 02:08:03,800
भी आएगा हम सहि सारे लोग यहां जो उपस्थित है उसको

1587
02:08:03,800 --> 02:08:08,000
समझ भी पाएंगे तो इसलिए अनुरोध है कि व्यवस्था बनाए

1588
02:08:08,000 --> 02:08:12,160
रखिए निर्णायक मंडल टिप्प हम आप सबका यह दायित्व

1589
02:08:12,160 --> 02:08:16,400
है कि ये बहुत बड़ी हमारी वैदिक अकादमिक परंपरा है

1590
02:08:16,400 --> 02:08:20,440
इसमें हम वाद जल्प वित माने

1591
02:08:20,440 --> 02:08:25,000
अंग्रेजी में कहे तो आइडियल डिबेट बैड डिबेट

1592
02:08:25,000 --> 02:08:29,320
इलेजिटीमेट डिबेट अगर हम एक दूसरे को बोलने

1593
02:08:29,320 --> 02:08:34,000
नहीं देंगे तोय अवैध है अवैधानिक है निंदनीय डिबेट

1594
02:08:34,000 --> 02:08:38,080
है ऐसा हमारी शास्त्रीय परंपरा कहती है एक बोल ले तो

1595
02:08:38,080 --> 02:08:42,480
हम ठीक है इस पर हम कभी एक मत नहीं रहे हैं इतिहास में

1596
02:08:42,480 --> 02:08:45,200
और ना एक मत होने वाले हैं

1597
02:08:45,200 --> 02:08:51,200
इसलिए थोड़े

1598
02:08:55,480 --> 02:08:59,560
मैं कुछ उदाहरण दे रहा हूं सुनिए आचार

1599
02:08:59,560 --> 02:09:04,600
जी ने इधर से तभी कोट किया ईसा वास्य उपनिषद का एक मंत्र

1600
02:09:04,600 --> 02:09:09,480
कि सर्वं खलो मदम ब्रम किंचित जगत

1601
02:09:09,480 --> 02:09:13,680
जगत इस संपूर्ण जगत में ब्रह्मांड में जो कुछ

1602
02:09:13,680 --> 02:09:18,080
भी है वह ईश्वरम है ईश्वर के अतिरिक्त

1603
02:09:18,080 --> 02:09:22,520
यहां कुछ नहीं है एक ग्रंथ और मैं उत करूंगा

1604
02:09:22,520 --> 02:09:26,760
वाल्मीक कृत योग बशिष्ट योग

1605
02:09:26,760 --> 02:09:31,160
बशिष्ट कहता है कि इस जगत में जो कुछ भी उत्पन्न

1606
02:09:31,160 --> 02:09:35,240
हुआ है जो दिख रहा है जो नहीं दिख रहा है

1607
02:09:35,240 --> 02:09:39,400
जो सूक्ष्म अदृश्य रूप में है और जो दृश्य रूप में है ये

1608
02:09:39,400 --> 02:09:43,440
कुछ और नहीं है ये बॉडी एक्सटर्नल मेनिफेस्टेशन ऑफ

1609
02:09:43,440 --> 02:09:47,560
बॉडी ऑफ ऑलमाइटी है ये भगवान का ब्रह्म का ही बाह्य

1610
02:09:47,560 --> 02:09:51,800
स्वरूप है जब उसके सूक्ष्म स्वरूप को देखने आप जाएंगे

1611
02:09:51,800 --> 02:09:56,080
तो निराकार रूप में दिखेगा और जब उसको स्थूल रूप में देखना

1612
02:09:56,080 --> 02:10:00,200
चाहेंगे तो वही साकार सगुण रूप में दिखेगा इसी को

1613
02:10:00,200 --> 02:10:04,320
गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसी को गोस्वामी तुलसीदास जी ने

1614
02:10:04,320 --> 02:10:08,360
और सरल करके कहा है कि सगुण निगुण नहीं कछ

1615
02:10:08,360 --> 02:10:12,520
भदा सगुण और निर्गुण में साकार निराकार में कोई

1616
02:10:12,520 --> 02:10:16,600
भेद है ही नहीं है गाव मुनि पुराण बहु

1617
02:10:16,600 --> 02:10:20,720
वेदा सारे ऋषि मुनि विद्वान लोग सारे पुराण

1618
02:10:20,720 --> 02:10:25,560
सारे शास्त्र जुगो जुग से यही कहते आए हैं

1619
02:10:25,560 --> 02:10:29,760
इसलिए जो सगुण है वही निर्गुण है जो

1620
02:10:29,760 --> 02:10:34,000
निर्गुण है वही सगुण है जैसी आपकी देखने

1621
02:10:34,000 --> 02:10:38,200
की इच्छा हो तो तुलसी ही स्पष्ट करते हैं जा की रही

1622
02:10:38,200 --> 02:10:42,360
भावना जैसी प्रभ मूरत देखे तिन तैसी

1623
02:10:42,360 --> 02:10:46,400
ब्रह्म को भगवान को निराकार रूप में आप साक्षात्कार करना चाहते

1624
02:10:46,400 --> 02:10:50,400
हैं भारतीय ज्ञान परंपरा पूर्ण स्वतंत्रता देती है

1625
02:10:50,400 --> 02:10:55,880
कि आप

1626
02:10:55,880 --> 02:10:59,920
देखना चाहते हैं बिल्कुल आपको स्वतंत्रता देता है आप जिस

1627
02:10:59,920 --> 02:11:04,320
रूप में देखें क्योंकि दोनों ही रूप किसके हैं सगुण और निर्गुण

1628
02:11:04,320 --> 02:11:08,440
दोनों ही रूप किसके हैं उसी परमपिता परमेश्वर के हैं

1629
02:11:08,440 --> 02:11:12,560
हमारी दृष्टि हमारी बुद्धि हमारी कल्पना हमारी सोच

1630
02:11:12,560 --> 02:11:16,960
जैसी हो हमारा सनातन धर्म हमारी ज्ञान परंपरा दोनों की अनुमति

1631
02:11:16,960 --> 02:11:21,280
देती है आगे विषयात और करें अपने विषय आप कहना चाहते हैं

1632
02:11:21,280 --> 02:11:25,880
मुख अतिथि महोदय मुख्य अतिथि महोदय कुछ कहना चाहते

1633
02:11:25,880 --> 02:11:30,320
मैं सिर्फ एक जिज्ञासा करना चाहता हूं कि आप अध्यक्ष जी की बात से सहमत

1634
02:11:30,320 --> 02:11:34,360
है अध्यक्ष जी की बात से पूर्णत सहमत हूं लेकिन स्वामी दयानंद का अर्थ

1635
02:11:34,360 --> 02:11:38,680
सुन लीजिए जो उन्होने किया अपनीत सतब

1636
02:11:38,680 --> 02:11:42,960
मर का सुना जी आचार्य जी नहीं अर्थ नहीं सुना जाएगा

1637
02:11:42,960 --> 02:11:47,920
दूसरी जिज्ञासा है अध्यक्ष जी ने कहा कि जाकी रही भावना जैसी

1638
02:11:47,920 --> 02:11:52,000
आपकी भावना क्या है यह बता सहमति है या नहीं हा या ना नहीं अध्यक्ष

1639
02:11:52,000 --> 02:11:56,000
जी दोनों तरफ बोलेंगे तो असहमति है अ निर्णायक बोलेंगे तो सहमति

1640
02:11:56,000 --> 02:12:00,080
है ठीक है वो स्पष्ट कर दिया उनके भाव उन्होने स्पष्ट कर नहीं

1641
02:12:00,080 --> 02:12:04,200
दे जिज्ञासा बता हा जी हा हेलो आगे मैं आचार

1642
02:12:04,200 --> 02:12:09,520
जी से एक मिनट आपको महाराज जी थोड़ा सा

1643
02:12:09,520 --> 02:12:10,960
धन्यवाद वेद

1644
02:12:10,960 --> 02:12:15,440
के विषय में बहुत सारे

1645
02:12:15,440 --> 02:12:19,880
भाष्य विश्व भर में हुए और बहुत सारे ऐसे भाष

1646
02:12:19,880 --> 02:12:24,840
हुए जिनमें बहुत सारे अश्लील अर्थ भी उनमें किए गए

1647
02:12:24,840 --> 02:12:29,200
जिनके आधार पर यह घोषणा की गई कि वेद गयो

1648
02:12:29,200 --> 02:12:33,200
के गीत है वेद के विषय में बहुत सारी भ्रांति उत्पन्न

1649
02:12:33,200 --> 02:12:37,360
हुई और अवद मत प्रचलित हुए ऋषि

1650
02:12:37,360 --> 02:12:41,600
दयानंद की बात य आई थी तो ऋषि दयानंद ने बहुत ही

1651
02:12:41,600 --> 02:12:45,920
तर्क सम्मत वैज्ञानिक भाष्य किया और उन्होने कहा कि कोई नवीन

1652
02:12:45,920 --> 02:12:50,080
मत मता चलाने का मेरा लेश मात प्रयोजन नहीं है अब

1653
02:12:50,080 --> 02:12:54,360
त जो आद ऋषि ब्रह्मा से जय मुनि मुनि पर्यंत मानते आए हैं

1654
02:12:54,360 --> 02:12:58,560
वही मैं मानता हूं इसके अतिरिक्त एक स्थान पर

1655
02:12:58,560 --> 02:13:02,920
ऋषि नंदने वेद मंत्र की व्याख्या कर रहे थे यजुर्वेद के मंत्र की और उन्होने

1656
02:13:02,920 --> 02:13:07,120
मंत्र की व्याख्या करते करते कहा कि क्या तुम्हारा ईश्वर पक्षपाती

1657
02:13:07,120 --> 02:13:11,280
है जो स्त्रियों को और शूद्रों को वेद के पठन पाठन का निषेध

1658
02:13:11,280 --> 02:13:15,520
करता है ऐसा ईश्वर कलाप ईश्वर नहीं हो सकता आर्य समाज

1659
02:13:15,520 --> 02:13:19,800
के तीसरे नियम में ऋषि दयानंद उद्घोष किया कि वेद सब

1660
02:13:19,800 --> 02:13:23,800
सत्य विद्याओं का पुस्तक और वेद का पढ़ना पढ़ाना

1661
02:13:23,800 --> 02:13:26,000
तथा सुनना सुनाना सबका परम

1662
02:13:26,000 --> 02:13:30,880
धर्म हैय वेद को एक नारा दिया था बक ू

1663
02:13:30,880 --> 02:13:35,200
वास्तव में वेद की बड़ी विषद व्याख्या ने की और ऐसे भाष

1664
02:13:35,200 --> 02:13:39,400
में नाम नहीं लेना चाहता ऐसे ऐसे भाष्य वेद के हुए जिनको

1665
02:13:39,400 --> 02:13:43,520
मेरी गारंटी है कि परिवार में बैठ कर के उनके अर्थों को नहीं पढ़

1666
02:13:43,520 --> 02:13:47,600
जाल भाष तो वेद को समझा ही नहीं तो

1667
02:13:47,600 --> 02:13:51,600
इस प्रकार की बातें आई है बहुत अच्छी चर्चा चल रही है बहुत बहुत

1668
02:13:51,600 --> 02:13:55,680
धन्यवाद यजुर्वेद के अभी मंत्र का आचार्य जी

1669
02:13:55,680 --> 02:14:00,600
अर्थ कर रहे थे सायण महिदर आदि के अनुसार एक मिनट

1670
02:14:00,600 --> 02:14:04,920
आप प्रश्न हुआ क्या अभी प्रश्न हुआ क्या प्रश्न हुआ क्या संचालक महोदय

1671
02:14:04,920 --> 02:14:09,120
जी से समय आप आप समय वैसे ही ख जानना चाहते हैं कि प्रश्न काल कितना

1672
02:14:09,120 --> 02:14:13,240
है हां जी प्रश्न काल जितना था खूब पर्याप्त मिला इस प्रश्न के लिए कितना सु

1673
02:14:13,240 --> 02:14:17,280
निर्धारित नहीं है आप जैसे जिज्ञासा होती रहेंगी आप क्या कहना चाहते हैं बस

1674
02:14:17,280 --> 02:14:21,360
एक अंतिम और अंतिम प्रश्न कर ले और इसका अंतिम उत्तर कहना

1675
02:14:21,360 --> 02:14:25,680
चाह रहा हूं कि आपने ऋग्वेद की एक पंक्ति को उधित करते हुए स्वीकार कर लिया

1676
02:14:25,680 --> 02:14:30,560
कि सद विप्र बहुदा बदन इसलिए कोई विवाद नहीं है उन्होंने स्वीकार कर लिया

1677
02:14:30,560 --> 02:14:34,600
है ठीक है बहुत शोभन सद विप्र बन इस बात

1678
02:14:34,600 --> 02:14:38,760
को गुरुजी लास्ट प्रश्न चाहंगा मैं एक मिनट

1679
02:14:38,760 --> 02:14:41,760
मैं बिल्कुल चाहूंगा इनको भी मैंने रोक दिया अब नहीं गुरुजी

1680
02:14:41,760 --> 02:14:46,200
कुछ बात अवैध हो जाती है सहन नहीं होती है जी नहीं

1681
02:14:46,200 --> 02:14:50,280
आचार्य जी आचार जी बस बस नहीं नहीं नहीं आचार्य जी

1682
02:14:50,280 --> 02:14:52,600
नहीं

1683
02:14:52,600 --> 02:14:56,640
मैं आचार्य जी निवेदन चाहूंगा निवेदन चाहूंगा रख दो एक मिनट बस मैं

1684
02:14:56,640 --> 02:15:01,520
माननीय अध्यक्ष जी की यहां उपस्थिति में और यहां जन समुदाय बैठा है

1685
02:15:01,520 --> 02:15:05,560
मैं आपको यहां टाइम का अनुबंध

1686
02:15:05,560 --> 02:15:09,880
है प्रतिबंध है उसमें नियम में हम व्यवस्था में चल रहे

1687
02:15:09,880 --> 02:15:13,920
हैं उसका हम पालन करेंगे ठीक है अब सुनिए

1688
02:15:13,920 --> 02:15:18,640
आप नंबर मेरा आपके पास में है आप इस पर समय रख लीजिए तीन दिन बैठेंगे

1689
02:15:18,640 --> 02:15:22,640
और खुली चुनौती है हां तो ठीक है कल से रघुनाथ जी वाले मंदिर पर आ

1690
02:15:22,640 --> 02:15:26,880
जाना बात खम सभी सभी सभी के सामने

1691
02:15:26,880 --> 02:15:32,880
कल से आप रुकिए तीन

1692
02:15:34,280 --> 02:15:38,400
दिन महाराज जीजे के बाद दिया रुक

1693
02:15:38,400 --> 02:15:42,720
जा रुक जा क्योंकि य औपचारिक कार्यक्रम है इसका समय सुनिश्चित है रघुनाथ

1694
02:15:42,720 --> 02:15:46,960
जी वा सुनिए रघुनाथ जी वाले घाट पर आपको जब भी शास्त्रार्थ करना

1695
02:15:46,960 --> 02:15:51,000
है विद्वान यही प्राप्त होंगे किसी को कोई संदेह हो तो बता देना

1696
02:15:51,000 --> 02:15:55,160
ठीक है आगे आगे की बात आगे

1697
02:15:55,160 --> 02:15:59,320
की शास्त्रार्थ की श्रंखला को आगे बढ़ाऊ मैं हमारे मध्य

1698
02:15:59,320 --> 02:16:03,600
पधारे हैं आदरणीय श्री सुधाकर राय जी

1699
02:16:03,600 --> 02:16:07,600
अपर जिला जज जी हैं और आपके स्वागत सत्कार और

1700
02:16:07,600 --> 02:16:11,680
सम्मान के लिए मैं निवेदन करना चाहूंगा दिनकर

1701
02:16:11,680 --> 02:16:15,760
राव जी से आप आए और आदरणीय का माला

1702
02:16:15,760 --> 02:16:20,600
पहना करके स्वागत एवं सत्कार करें आप आप भी आ जाइए

1703
02:16:20,600 --> 02:16:25,000
और और रामाश्रय पचौरी जी और क्या कहते हमारे मिश्र

1704
02:16:25,000 --> 02:16:29,040
जी आप भी आ जाइए धाम में रख लीजिए परा

1705
02:16:29,040 --> 02:16:33,520
जी के य हा जी बकुल बिल्कुल माना के य होगा बकुल होगा

1706
02:16:33,520 --> 02:16:37,640
दिन वही रहेंगे बिल्कुल बिल्कुल साब सहमती है सहमती

1707
02:16:37,640 --> 02:16:42,520
है मैं इसम निवेदन करना

1708
02:16:42,520 --> 02:16:48,360
चाहूंगा कर दीजिए ध्यान रहना

1709
02:16:48,360 --> 02:16:52,800
है उपदेश ब करो श होना चाहिए अशुद्ध नहीं

1710
02:16:52,800 --> 02:16:58,800
उनको रोको स्वर से वर्ण से य

1711
02:17:49,440 --> 02:17:52,720
ब

1712
02:17:52,720 --> 02:17:56,880
सभी लोग कतल धवनी से स्वागत करेंगे मैं आदरणीय श्री दिनकर

1713
02:17:56,880 --> 02:18:00,920
राव चतुर्वेदी जी के स्वागत सम्मान के लिए निवेदन करूंगा रवि ताऊ जी से वह

1714
02:18:00,920 --> 02:18:06,920
आपको माला और शॉल पहना करके स्वागत

1715
02:18:17,200 --> 02:18:21,200
करें आगे शास्त्रार्थ की खला

1716
02:18:21,200 --> 02:18:25,480
को आगे बढ़ाएंगे इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए क्योंकि यह औपचारिक कार्यक्रम

1717
02:18:25,480 --> 02:18:29,640
है इसकी समय सीमा निर्धारित है और विद्वान जब भी बैठना चाहे सभी अपना अपना समय

1718
02:18:29,640 --> 02:18:33,880
दे दे हम भाई इस समय पर इस स्थान पर बैठ सकते हैं तो पुनः शास्त्रार्थ का आयोजन

1719
02:18:33,880 --> 02:18:38,440
हो जाएगा कोई दिक्कत वाली बात नहीं है आगे इस श्रंखला को आगे बढ़ाते हुए

1720
02:18:38,440 --> 02:18:42,600
अगली टीम जो है उनका बोलने का क्रमांक है टीम संख्या है दो

1721
02:18:42,600 --> 02:18:46,960
निर्णायक मंडल क्रमांक संख्या है टीम की दो समूह संख्या है दो

1722
02:18:46,960 --> 02:18:52,960
और प्रश्न नंबर है आपका

1723
02:18:54,160 --> 02:18:58,880
आठ यह जो आपने की थी ना बात अभी कि भाई किसी तरीके के

1724
02:18:58,880 --> 02:19:03,240
दुर्विन हुए हैं कई सारे ऐसे लेख लिख दिए गए हैं जिनका

1725
02:19:03,240 --> 02:19:07,760
शास्त्रों का गलत अर्थ हो गया है उसी के परिप्रेक्ष्य में यह प्रश्न है आठवा

1726
02:19:07,760 --> 02:19:11,920
आप सभी ध्यान से सुनिए और आप व्याख्या कीजिएगा और मैं पुनः कहूंगा

1727
02:19:11,920 --> 02:19:16,080
आप विद्वान है आचार्य है आदरणीय है सम्माननीय है और

1728
02:19:16,080 --> 02:19:20,880
विद्वत है आप एक सुसज्जित भाषा का उपयोग कीजिएगा उससे

1729
02:19:20,880 --> 02:19:25,840
इतर मत जाइएगा अपनी मर्यादा को ध्यान में रखते हुए

1730
02:19:25,840 --> 02:19:30,200
प्रश्न है भारतीय ग्रंथों में आए क्षेप कों का भारतीय धर्म

1731
02:19:30,200 --> 02:19:34,240
संस्कृति पर दुष्प्रभाव एवं उनके निवारण के उपाय बताइए समय हो रहा है

1732
02:19:34,240 --> 02:19:38,560
दो 32 आगे प्रारंभ करो बिना मंगलाचरण के कोई मंगलाचरण इत्यादि

1733
02:19:38,560 --> 02:19:44,560
नहीं

1734
02:19:45,640 --> 02:19:49,760
कर ओ न

1735
02:19:49,760 --> 02:19:54,280
पिता त्वम माता सत कतो बभु

1736
02:19:54,280 --> 02:19:58,840
वि अधा सुनमी महे

1737
02:19:58,840 --> 02:20:03,280
नमस्ते सते ते जगत

1738
02:20:03,280 --> 02:20:09,040
काणा नमस्ते चिते सर्व लोका

1739
02:20:09,040 --> 02:20:14,000
आश्रया नमो द्वेत तत्वा मुक्ति

1740
02:20:14,000 --> 02:20:18,680
प्रदाय नमो ब्रह्मण व्याप

1741
02:20:18,680 --> 02:20:23,160
शाश्वता नमो ब्र [संगीत]

1742
02:20:23,160 --> 02:20:29,160
शावता ओम शांति शांति

1743
02:20:29,600 --> 02:20:34,520
शांते आदरणीय इस मंच पर उपस्थित

1744
02:20:34,520 --> 02:20:38,960
निर्णायक मंडल विद्वत जन अध्यक्ष महोदय मुख्य अतिथि

1745
02:20:38,960 --> 02:20:42,960
वृंद सभी वादी प्रतिवादी

1746
02:20:42,960 --> 02:20:48,240
विद्वत जन श्रोता बंधु मातृशक्ति नौजवान साथियों

1747
02:20:48,240 --> 02:20:52,680
बच्चों विषय है भारतीय ग्रंथों में आए क्षेप कों

1748
02:20:52,680 --> 02:20:57,080
का भारतीय धर्म संस्कृति पर दुष्प्रभाव एवं

1749
02:20:57,080 --> 02:21:01,120
उनके निवारण के उपाय बताइए भारतीय

1750
02:21:01,120 --> 02:21:05,160
सभ्यता संस्कृति हमारे जो विशेषकर पौराणिक जो हमारे आक्षण ग्रंथ

1751
02:21:05,160 --> 02:21:09,280
है जिन पर वेदों का नाम लेकर ऋषियों का नाम

1752
02:21:09,280 --> 02:21:13,280
लेकर धर्मशास्त्रों का नाम लेकर ऐसी घिनौनी घिनौनी

1753
02:21:13,280 --> 02:21:17,520
बातें प्रतिपादित की गई है जिनको लेकर के विदेशी

1754
02:21:17,520 --> 02:21:21,680
लोग भी आक्षेप करते हैं और हम सनातन वैदिक

1755
02:21:21,680 --> 02:21:25,960
धर्म सभ्यता संस्कृति पर कुठाराघात करते हैं इनके निराकरण

1756
02:21:25,960 --> 02:21:30,200
का उपाय क्या है महर्षि स्वामी दन जी महाराज कहते हैं जिन्ह हमारा

1757
02:21:30,200 --> 02:21:35,560
बहुत संख्यक वर्ग अपना धर्म ग्रंथ मानता है

1758
02:21:35,560 --> 02:21:39,760
अपने टि ग्रंथ मानते हैं उन पर अपना संचालन करता

1759
02:21:39,760 --> 02:21:43,920
है वेद को छोड़कर अभी हम वेद की बात करते हैं लेकिन वेद

1760
02:21:43,920 --> 02:21:47,920
के अनुसार हम चाल चलन नहीं करते वेद के अनुसार हमारी वेशभूषा नहीं है

1761
02:21:47,920 --> 02:21:51,920
वेद के अनुसार हमारा आचार विचार नहीं है वेद अनुसार हमारा खानपान नहीं है

1762
02:21:51,920 --> 02:21:56,160
वेद के अनुसार हमारे सांस्कृतिक जो कार्यक्रम होते वो नहीं होते

1763
02:21:56,160 --> 02:22:00,280
वो केवल पुराणों के आधार पर होते हैं आक्षेप के आधार पर होते हैं ऋषि

1764
02:22:00,280 --> 02:22:04,480
दयानंद ने हमें कोई बात सत्य है उसके लिए पांच परीक्षाओं का विधान दिया है

1765
02:22:04,480 --> 02:22:08,600
उन पांच परीक्षाओं में कहते हैं इन पांच परीक्षाओं में अगर कोई बात खरी उतरती है

1766
02:22:08,600 --> 02:22:12,600
तो समझ लेना वो बात सत्य है और य गलत है तो वो गलत है कट जाती है उ

1767
02:22:12,600 --> 02:22:16,160
नहीं करना चाहिए सबसे पहली बात कहते हैं ईश्वर के गुण कर्म स्वभाव

1768
02:22:16,160 --> 02:22:20,560
के अनुसार सृष्टि क्रम के अनुसार सृष्टि क्रम क्या है

1769
02:22:20,560 --> 02:22:24,880
और सृष्टि का नियम क्या है यह समझने का प्रयास कीजिएगा सृष्टि

1770
02:22:24,880 --> 02:22:29,360
में कोई भी बीज जहां पर बोया जाता है

1771
02:22:29,360 --> 02:22:33,360
वही अंकुरित होता है यह नियम है कोई बीज कहीं

1772
02:22:33,360 --> 02:22:37,640
पर आप बोंगे जहां बोते हैं वह वही उपज है

1773
02:22:37,640 --> 02:22:41,680
वही उसका पौधे का रूप लेगा और विशाल वृक्ष का रूप धारण करेगा

1774
02:22:41,680 --> 02:22:45,880
ऐसा कभी नहीं होता कि आपने कहा कि मैंने गुठली आम की

1775
02:22:45,880 --> 02:22:50,520
खेत में लेकिन मेरा आम का पेड़ छत पर हुआ

1776
02:22:50,520 --> 02:22:55,400
ऐसा कभी नहीं होता ऐसा ही हमारे ग्रंथों में गड़बड़ कर दिया

1777
02:22:55,400 --> 02:22:59,560
गया जीवधारियों में भी नर और मादा ईश्वर

1778
02:22:59,560 --> 02:23:03,680
की रचना है यह प्राण तो निमि तो महत्व की द्रा जगतो बुवा

1779
02:23:03,680 --> 02:23:07,720
यह वेद मंत्र यजुर्वेद के 32 अध्याय का तीसरा मंत्र है और ऋग्वेद में भी

1780
02:23:07,720 --> 02:23:11,880
दसव मंडल में आता है इस वेद मंत्र में स्पष्ट कहा गया परमपिता परमात्मा

1781
02:23:11,880 --> 02:23:16,200
प्राण वाले और अप प्राणी रूप ये सारे संसार की रचना करता है द्विपद

1782
02:23:16,200 --> 02:23:20,480
चतु पदे का स्वामी ध्यान करते हैं दो पैर वाले अर्थात मनुष्य आदि चतु पदे

1783
02:23:20,480 --> 02:23:24,680
गौ आदी प्राणियों के ई शरीर की रचना कौन करता है ईश्वर करता है

1784
02:23:24,680 --> 02:23:28,920
याद रखिए कोई मनुष्य नहीं करता और उन सबके प्रसव काल निश्चित

1785
02:23:28,920 --> 02:23:31,360
है सबका प्रसव काल निश्चित

1786
02:23:31,360 --> 02:23:35,440
है सृष्टि के आदि से लेकर हमेशा तक रहेगा और वो कभी बदल नहीं

1787
02:23:35,440 --> 02:23:39,840
सकता ईश्वर की व्यवस्था ईश्वर का नियम है लेकिन हमारे धर्म ग्रंथों

1788
02:23:39,840 --> 02:23:44,280
में हमारे पुराणों में हमारी कथाओं में ऐसे ऐसे आक्षेप कर दिए गए

1789
02:23:44,280 --> 02:23:48,400
कि तत्काल ही गर्भधान हुआ और गर्भधान होते ही बालक पैदा हो गया

1790
02:23:48,400 --> 02:23:52,400
और उस उसका मतलब वो नाभी भी नहीं कटी

1791
02:23:52,400 --> 02:23:56,520
बल्कि नाभी को ही कंधे पर डाल कर के और जंगल को चला गया और तपस्वी

1792
02:23:56,520 --> 02:24:00,680
बन गया ये ऐसे आक्षेप डाल कर के लोग आक्षेप करते हैं

1793
02:24:00,680 --> 02:24:04,920
याद रखना ये सृष्ट क्रम के विरुद्ध न्याय के विरुद्ध धर्म के विरुद्ध वेद

1794
02:24:04,920 --> 02:24:09,000
विरुद्ध बात है ये कैसा हो ही नहीं सकता हमेशा प्रसव

1795
02:24:09,000 --> 02:24:13,120
काल मनुष्य का न महीने 10 महीने निश्चित है इससे पहले कोई बच्चा पैदा

1796
02:24:13,120 --> 02:24:17,120
नहीं हो सकता लेकिन ऐसे आक्षेप बहुत सारी कथाएं किसी बालक का जन्म

1797
02:24:17,120 --> 02:24:21,160
गर्दन से पैदा किसी का बाल से पैदा किसी को नाक से पैदा किसी को

1798
02:24:21,160 --> 02:24:25,200
कान से पैदा ये सारे आक्षेप हमारे धर्म ग्रंथों पर जो लगाए गए

1799
02:24:25,200 --> 02:24:29,480
इसे हमारा पूरा इतिहास और हमारे पूरे ऋषि महर्षि दूषित हुए

1800
02:24:29,480 --> 02:24:33,600
इसलिए इन दूषण को दूर करने के लिए ऋषि दयानंद डंके की चोट

1801
02:24:33,600 --> 02:24:37,720
पर बात कहते हैं कि इनका लिखने वाला अगर अपनी मां के गर्भ में ही मर

1802
02:24:37,720 --> 02:24:42,600
जाता तो ये सनातन धर्म की हत्या नहीं होती यह वैदिक धर्म नहीं होता

1803
02:24:42,600 --> 02:24:46,400
आइए हम इन आक्षेप को दूर करें अपनी भ्रांतियों को दूर

1804
02:24:46,400 --> 02:24:50,880
करें और जो सृष्टि का नियम है जो वेद का विधान है जो जकता

1805
02:24:50,880 --> 02:24:55,040
है उसी के आधार पर हम सत्यवादी करें और सत्यवा

1806
02:24:55,040 --> 02:24:59,360
स्वीकार करके अपने जीवन को बदले अपनी पद्धति को बदले अपनी पैथी

1807
02:24:59,360 --> 02:25:03,360
को बदले और अपने महापुरुषों के वास्तविक स्वरूप को जाने हमारे

1808
02:25:03,360 --> 02:25:07,400
किसी भी ऋषि महर्षि ने ऐसा कु कृत नहीं किया यह बिल्कुल गलत

1809
02:25:07,400 --> 02:25:11,560
बात है हम इसे कभी स्वीकार नहीं करते ऋषि ध्यान के अनुयाई किसी भी ऋषि पर

1810
02:25:11,560 --> 02:25:15,560
कोई आक्षेप स्वीकार नहीं करता भगवान के नाम पर कोई अडम स्वीकार नहीं

1811
02:25:15,560 --> 02:25:20,680
करता कोई अधर्म अवैध बात स्वीकार ही नहीं है शोभन शोभन

1812
02:25:20,680 --> 02:25:24,720
सुंदरम सुंदरम सुंदरम लोगों ने केवल हमारी संस्कृति को

1813
02:25:24,720 --> 02:25:29,280
मिटाने के लिए याद रखना ये विदेशियों के दुष्चक्र है दतार

1814
02:25:29,280 --> 02:25:33,480
दुष्चक्र है और ये सृष्टि के आदि में ग्रंथ नहीं लिखे गए

1815
02:25:33,480 --> 02:25:37,640
यह पुराण समय समय पर लिखे गए का सृष्टि के आदि में पुराण लिखे गए

1816
02:25:37,640 --> 02:25:41,680
होते तो याद रखना इनमें बुद्ध का काल का वणन

1817
02:25:41,680 --> 02:25:45,800
नहीं होता अकबर का काल का वणन नहीं होता अन्य लोगों मलयो का वर्णन

1818
02:25:45,800 --> 02:25:49,880
नहीं होता क्योंकि ब्रह्मा तो सतयुग के काल के व्यक्ति है उस समय का ही वर्णन

1819
02:25:49,880 --> 02:25:54,000
होता आज जो ग्रंथ लिखे जा रहे हैं आज का वर्णन किया जा रहा है हमारे गायत्री

1820
02:25:54,000 --> 02:25:58,280
परिवार के आचार्य श्री राम जी ने एक प्रजा पुराण लिखी है उन्होंने अपने काल में लिखा है इसका

1821
02:25:58,280 --> 02:26:04,280
वर्णन है उसमें ब्रह्मा जी का वर्णन

1822
02:27:03,120 --> 02:27:07,160
और मान धाता का जन्म दिया गया पेट फार के निकला गया सृष्टि क्रम के नियम

1823
02:27:07,160 --> 02:27:11,360
के विरुद्ध कभी भी मनुष्य के शरीर में गर्भ सेय नहीं होता आमा से

1824
02:27:11,360 --> 02:27:15,520
होता है महिलाओ के शरीर में आमा गर्भ दोनों होते हैं और

1825
02:27:15,520 --> 02:27:19,560
याद रखना गर्भाशय में जो पदार्थ जाता है जिससे गर्भ स्थापित होता

1826
02:27:19,560 --> 02:27:23,720
है व मार्ग अलग होता है उसी मार्ग से जाएगा तो गर्भ ठहरेगा अन्य

1827
02:27:23,720 --> 02:27:28,280
किसी भी मार्ग से गर्वा सम पदार्थ जाता ही नहीं है

1828
02:27:28,280 --> 02:27:32,320
कोई गर्भाशय में जाने वाले पदार्थ को मुंह से पी जाए तो गर्भाशय में गर्भ ठहरेगा

1829
02:27:32,320 --> 02:27:36,480
क्या नहीं ठहरता सृष्ट क्रम के नियम के विरुद्ध बात है लेकिन हमें कथा के नाम

1830
02:27:36,480 --> 02:27:40,480
पर सुनाया जाता है बड़े-बड़े लोग कथाकार करते हैं इंटरनेशनल पर लोगों का

1831
02:27:40,480 --> 02:27:44,760
बवाला होता है कोई समझता नहीं इस बात को अरे शरीर की रचना देखो भगवान

1832
02:27:44,760 --> 02:27:48,880
ने शरी की रचना की है वे सब सत विद्याओं का पुस्तक है ऋषि दनन कहते हैं

1833
02:27:48,880 --> 02:27:52,880
और हम चैलेंज के साथ आप को कहते हैं ऋषि दन के एक एक मंत्र की व्याख्या

1834
02:27:52,880 --> 02:27:57,000
पढ़िया विजान सम्मत है ऋषि सम्मत है और ऋषि ने

1835
02:27:57,000 --> 02:28:01,160
सायण मराज के भाष को बरी तर द ऋषि दयानंद कहते यास काचार्य के भाष

1836
02:28:01,160 --> 02:28:05,400
को महर्षि स्वामी दयानंद अपने पूर्ववर्ती ऋषियों के महर्षि

1837
02:28:05,400 --> 02:28:09,520
यास काचार्य निरुक्त के भाष्य को स्वामी दन जी प्रमाणित मानते हैं

1838
02:28:09,520 --> 02:28:13,560
यावाल को प्रमाणित मानते हैं पतंजलि को प्रमाणित मानते हैं और

1839
02:28:13,560 --> 02:28:17,600
जितने सांग दर्शन आद छ हमारे जो आशिक दर्शन है उन सबको प्रमाणित मानते

1840
02:28:17,600 --> 02:28:18,280
हैं इसलिए

1841
02:28:18,280 --> 02:28:22,840
हमें ऋषि दयानंद की बात शर्त

1842
02:28:22,840 --> 02:28:26,840
है समत है धर्म सम्मत है और अपने पक्ष की बात

1843
02:28:26,840 --> 02:28:30,920
नहीं है हमारे संचालक अशोक जी कह रहे थे स्वामी जी ने स्पष्ट कहा कि मेरा अपना

1844
02:28:30,920 --> 02:28:34,960
कोई मत मजब चलाना उद्देश्य नहीं है बल्कि ब्रह्मा से लेकर जम ऋषि

1845
02:28:34,960 --> 02:28:39,080
पर्यंत और य आ समाज एक ऐसा आंदोलन है एक ऐसा संगठन है

1846
02:28:39,080 --> 02:28:43,360
जो सत्य सनातन वैदिक धर्म की रक्षा में प्राण पर से समर्पित आदि

1847
02:28:43,360 --> 02:28:47,520
से अब तक रहा है मंदिरों की रक्षा भी हम करते हैं आप सबका साथ बढ चल

1848
02:28:47,520 --> 02:28:52,200
के साथ देते भले आप हमें जर देते रहो भले आप हमें जहर देते रहो याद रखिएगा

1849
02:28:52,200 --> 02:28:56,600
लेकिन हम हमेशा इस वैदिक सनातन धर्म की रक्षा में हमेशा तत्पर

1850
02:28:56,600 --> 02:29:00,800
रहे महोदय आप अपने मत की स्वामी सरस्वती

1851
02:29:00,800 --> 02:29:05,160
185 में आए उनके मत का प्रवर्तन करिए समर्थन करिए ठीक है

1852
02:29:05,160 --> 02:29:10,720
एक प्रश्न है मंच से ब्रह्मा की पूजा सनातन

1853
02:29:10,720 --> 02:29:14,840
धर्मिंदर क्यों नहीं लगाई जाती कहां है यह क्षेपक

1854
02:29:14,840 --> 02:29:19,160
किस कारण से वो बोलेंगे फिर आप प्रश्न करिएगा ब्रह्मा की पूजा

1855
02:29:19,160 --> 02:29:23,240
उनका चित्र घरो में लगाना कब से बंद हुआ कहां

1856
02:29:23,240 --> 02:29:27,240
है यह उल्लेख कहां है य क्षेपक कि कोई चित्र ब्रह्मा का अपने

1857
02:29:27,240 --> 02:29:31,600
घर में नहीं लगाना चाहता है कारण क्या ब्रह्मा की पूजा आदि

1858
02:29:31,600 --> 02:29:33,320
हम सनातनी लोग करते ही नहीं

1859
02:29:33,320 --> 02:29:37,440
है और ब्रह्मा के ब्रह्मा चारों वेदों विद्वान को ब्रह्मा कहा जाता है

1860
02:29:37,440 --> 02:29:41,640
उस चारों वेदों के विद्वान विदव व्यक्ति की हमेशा आदर सत्कार सम्मान

1861
02:29:41,640 --> 02:29:45,840
पूजा और समाज करता है और उसका हम कराना तत् का करते केवल चार

1862
02:29:45,840 --> 02:29:50,040
मुंह वाले व्यक्ति का कोई जन्म कहीं नहीं हुआ ना हम उसे मानते ऐसा

1863
02:29:50,040 --> 02:29:54,200
वेद का ऐसा कोई प्रमाण नहीं कोई वेद मंत्र ऐसा नहीं है जिस मंत्र के आधार पर चार

1864
02:29:54,200 --> 02:29:58,480
मुख वाला कोई व्यक्ति पैदा हो जाए बल्कि चार मुख का मतलब है चार वेदों का विद्वान

1865
02:29:58,480 --> 02:30:02,760
चारों भदों के जाता मनुष्य को ही ब्रह्मा की उपाधि दी जाती है और उसकी पूजा

1866
02:30:02,760 --> 02:30:06,840
हमेशा रहती है पूजा मतलब आदर सत्कार या सम्मान आज भी हमारे यहां

1867
02:30:06,840 --> 02:30:11,040
होता है हमारे जो भी आर विचारधारा के लोग हैं वो सनातन रूप

1868
02:30:11,040 --> 02:30:15,160
से हम ऐसे विद्वान का सम्मान करते हैं मानते हैं लेकिन ये

1869
02:30:15,160 --> 02:30:19,160
पौराणिक जो पद्धति है जैनियों के माध्यम से आई जैन काल से पहले मूर्ति पूजा

1870
02:30:19,160 --> 02:30:23,320
का विधान हम नहीं और जो मिलता है वो उन लोगों के दवारा आक्षेप किया हुआ है

1871
02:30:23,320 --> 02:30:28,080
इस आक्षेप को हमें निकालना है प्रश्न करते

1872
02:30:28,080 --> 02:30:32,760
प्रश्न काल आरंभ हुआ

1873
02:30:32,760 --> 02:30:37,240
क्या शिव पुराण दो मिनट समय है आपके पास बस 43

1874
02:30:37,240 --> 02:30:41,360
हुआ 43 हो गया 32 प शुरू हुआ था मत आपके प्रश्न

1875
02:30:41,360 --> 02:30:45,520
का उत्तर हम देंगे सुनि यह आक्षेप

1876
02:30:45,520 --> 02:30:49,720
मूर्ति पूजा का विषय नहीं है य आक्षेप है कि जो आक्षेप लगाए

1877
02:30:49,720 --> 02:30:54,040
गए उन आक्षेप का निराकरण क्या है उनसे हम कैसे व्यवस्था

1878
02:30:54,040 --> 02:30:58,080
दे यह प्रश्न है तो आक्षेप आपने कहा कि

1879
02:30:58,080 --> 02:31:02,240
ब्रह्मा जी के मूर्ति पूजा आदि प की पूजा क्यों नहीं होती

1880
02:31:02,240 --> 02:31:06,320
यह सवाल मूर्ति पूज कों का है मेरा नहीं मैं यह व्यवस्था नहीं

1881
02:31:06,320 --> 02:31:10,440
करता मैं तो चारों वेदों के विद्वान को ब्रह्मा मानता हूं

1882
02:31:10,440 --> 02:31:14,600
और ऐसा ही अपने गुरुकुल में बच्चों को व्याकरण से लेकर मवास पर्यंत व्याकरण

1883
02:31:14,600 --> 02:31:18,600
पढ़ाने का प्रयत्न करता हूं और ऐसे बच्चों को मतलब वेद के मंत्रों

1884
02:31:18,600 --> 02:31:22,680
को भी तैयार कराता हूं याद कराता हूं और जो बच्चा ऐसे होते हैं उनको चतुर्वेदी

1885
02:31:22,680 --> 02:31:26,880
की संजा देता हूं ये हमारा काम है इसके साथ जो आक्षेप हमने

1886
02:31:26,880 --> 02:31:30,960
दिए रामचरित मानस में जब हम पढ़ते हैं बाली और सुग्रीवा

1887
02:31:30,960 --> 02:31:35,240
आदी की कथा पढ़ाई जाती है वहां क्षेपक लिखा गया है कि बाली

1888
02:31:35,240 --> 02:31:39,440
का जो शरीर है एक स्त्री के बालों से पैदा हुआ है

1889
02:31:39,440 --> 02:31:43,440
इंद्र जी का जो है वीर गिर गया गर्दन पर तो गर्दन से सुग्रीव पैदा हो

1890
02:31:43,440 --> 02:31:47,720
गया ये वहां वर्णन आक्षेप लिए गए हैं और आपके पुराणों में बहुत सारी कथाएं

1891
02:31:47,720 --> 02:31:48,220
मिलती

1892
02:31:48,040 --> 02:31:52,680
है इन आक्षेप का हम लोग निराकरण यह करते हैं कि यह हमारे नहीं है

1893
02:31:52,680 --> 02:31:56,920
यह हमारे विद्वानों के ऋषियों के लेख लेख नहीं है यह आर्स ग्रंथों के लेख

1894
02:31:56,920 --> 02:32:01,160
नहीं है ये ऐसे धर्तो के द्वारा मिलाए हुए हैं जो हमारे ऋषियों को

1895
02:32:01,160 --> 02:32:05,240
कलंकित करते हैं हमारे महापुरुषों को कलंकित करते हैं इसलिए हम

1896
02:32:05,240 --> 02:32:09,440
सबका धर्म मिनट आपके पूरे हो चुके दो मिनट में उपसर कीजिएगा

1897
02:32:09,440 --> 02:32:13,520
अपने विषय का तो मेरा चिंतन यही है आप सब लोगों के लिए कि

1898
02:32:13,520 --> 02:32:17,600
जो सृष्टि क्रम के विरुद्ध बात है वेद विरुद्ध है सृष्टि

1899
02:32:17,600 --> 02:32:21,920
क्रम के साथ आज मनु हमारा जो वि है विज्ञान के भी विरुद्ध है

1900
02:32:21,920 --> 02:32:25,920
और आचरण के भी विरुद्ध है व्यवहार पक्ष के भी विरुद्ध है उन सारे

1901
02:32:25,920 --> 02:32:30,520
आक्षेप को अपनी अपनी कथाओं से हटा दीजिए उन ग्रंथों से निकाल दीजिएगा

1902
02:32:30,520 --> 02:32:34,720
और जो शुद्ध स्वरूप हमारे सारे ऋषियों का जो उल्लेख है बस उसे लाइए

1903
02:32:34,720 --> 02:32:38,880
जैसे आज हम सब पैदा हो रहे हैं वैसे उस जमाने में भी सब बच्चों का जन्म हुआ

1904
02:32:38,880 --> 02:32:42,880
है उसी कारण से तरह हुआ है जैसे आज होता है ऐसे पहले राम का

1905
02:32:42,880 --> 02:32:47,000
भी जन्म वैसे हुआ ऐसा मत कर दीजिए कि कोई खीर से पैदा हो गया कोई फल

1906
02:32:47,000 --> 02:32:51,120
दे दिया तो बस नाक में से निकल गया बच्चा कि कान में से क गया बच्चा यह कभी

1907
02:32:51,120 --> 02:32:57,120
नहीं होता था

1908
02:33:02,360 --> 02:33:06,640
ना प्रश्न काल आरंभ होता है क्रम समूह संख्या

1909
02:33:06,640 --> 02:33:10,800
तीन के पास प्रश्न है अपना प्रश्न शट मैं आपसे प्रश्न पूछने

1910
02:33:10,800 --> 02:33:15,080
का समय दूंगा एक मिनट मैं इनको सब

1911
02:33:15,080 --> 02:33:19,160
आप पहले टीम का हो जाने दीजिए थोड़ा सा टीम प्रश्न उत्तर का

1912
02:33:19,160 --> 02:33:23,280
भी अंक किसने क्या प्रश्न किया क्या प्रश्न नहीं किया क्या उत्तर मिला आप

1913
02:33:23,280 --> 02:33:28,040
तीन नंबर पूछ थोड़ा

1914
02:33:28,040 --> 02:33:32,760
यह विषय गर शर्ट में पूछेगा गुरुजी शट में पूछेगा

1915
02:33:32,760 --> 02:33:37,360
हमारे भगवान भगवान वेदव्यास उत्पत्ति

1916
02:33:37,360 --> 02:33:41,440
जो है उनसे हुई है मस

1917
02:33:41,440 --> 02:33:45,800
से मछली के गर्भ से जैसे आता है जो सत्यवती से हुए

1918
02:33:45,800 --> 02:33:49,880
और भगवान वेदव्यास माने आदरणीय है और

1919
02:33:49,880 --> 02:33:54,040
के विषय में आप ीचा लेदर करेंगे सहन नहीं होगा तो हम दयानंद

1920
02:33:54,040 --> 02:33:58,240
जी की उत्पत्ति बताए तो सहन कर लोगे आप करेंगे आप बताओ दयानंद किसी मछली

1921
02:33:58,240 --> 02:34:02,960
से पैदा हुआ सुनो सुनो दयानंद वैसे पैदा हु हम पैदा हुए हैं थोड़ी सी

1922
02:34:02,960 --> 02:34:07,200
ये ी लेदर नहीं है ये हमारा गलत इतिहास लिखा

1923
02:34:07,200 --> 02:34:11,240
इसलिए श ले सभ्य भाषा सभ्य भाषा समझिए अपनी बात को यार भा

1924
02:34:11,240 --> 02:34:15,320
हम क ये हमारे ऋषियों ने नहीं लिखा ये व्यास का लिखा लेख नहीं है ये किसीसी

1925
02:34:15,320 --> 02:34:17,440
का नहीं है विदेशी लोगों का मिला हुआ है े

1926
02:34:17,440 --> 02:34:21,720
अपना मान रहे हो इसलिए बरा ल भूल गए कि उनके आचरण के भी नंबर

1927
02:34:21,720 --> 02:34:25,760
उनको दि समूह भूल गए हैं समूह भूल गए हैं कि उनके

1928
02:34:25,760 --> 02:34:29,840
आचरण के भी नंबर उनको दिए जा रहे हैं आचरण के भी नंबर है क्योंकि सिर्फ

1929
02:34:29,840 --> 02:34:33,920
वाणी से शास्त्र को याद कर लेना और आचरण में नहीं उतारना कोई बात नहीं

1930
02:34:33,920 --> 02:34:38,040
है चाहे आप किसी भी भेद से पढ़े किसी भी शास्त्र से पढ़े इसलिए

1931
02:34:38,040 --> 02:34:42,160
मर्यादित भाषा का प्रयोग करें आप उनका माइक चालू कर दीजिए कर दीजिए

1932
02:34:42,160 --> 02:34:46,920
हा उत्तर दीजिए आप नहीं नहीं मैं पहले प्रश्न करता हूं हा प्रश्न कीजिए आप उत्तर

1933
02:34:46,920 --> 02:34:51,400
दीजिए हमारे पितामह शास्त्र महारथ कन जी

1934
02:34:51,400 --> 02:34:55,560
हुए आपने कहा वैदिक सत्यार्थ आपका सत्यार्थ प्रकाश

1935
02:34:55,560 --> 02:34:59,760
वैदिक सत्यार्थ प्रकाश अक्षर सा खंडन किया उ के सामने

1936
02:34:59,760 --> 02:35:03,920
उन्होंने एक रमा महर्षि संवाद लिखा है और

1937
02:35:03,920 --> 02:35:08,080
वह दया आपके संस्कृति में रहे दया आप

1938
02:35:08,080 --> 02:35:12,680
उन्होने दयानंद महाकाव्य भी लिखा जब उसने असलियत का पता लगा

1939
02:35:12,680 --> 02:35:16,880
तो उससे अलग हुए रमा महर्षि संवाद का पहला श्लोक

1940
02:35:16,880 --> 02:35:21,040
हैसे भगवान वेदव्यास की जो है व्याख्या कर रहे हैं हमारे

1941
02:35:21,040 --> 02:35:25,200
ऋषि मयो की व्याख्या कर रहे हैं उन्होने लिखा है थोड़ा

1942
02:35:25,200 --> 02:35:29,440
अच्छे ढंग से सुनना उसके लिए अ भूत परा नर तन जीव

1943
02:35:29,440 --> 02:35:32,720
नाम कुले सय दासी तन

1944
02:35:32,720 --> 02:35:37,640
वदंते रमा महर्षि विचार बोधक विरते

1945
02:35:37,640 --> 02:35:42,000
कादम लोकता अ भूत पुरा रतन

1946
02:35:42,000 --> 02:35:46,560
जीव नामले नाचने गाने वाले के वंश में

1947
02:35:46,560 --> 02:35:50,640
दयानंद पैदा हुए सवस

1948
02:35:50,640 --> 02:35:54,720
तत जो दयानंद है व दासी तने है रमा

1949
02:35:54,720 --> 02:35:58,720
महर्षि विचार बोधक रमा नाम की बाई थी उसके

1950
02:35:58,720 --> 02:36:02,840
साथ विचार देखना है तो मेरे से काव्य को पढ़े

1951
02:36:02,840 --> 02:36:07,040
इसके लेकर के हाई कोर्ट में पहुंचे मान हानी और

1952
02:36:07,040 --> 02:36:11,560
हमारे बाबा वकील बने और हाई कोर्ट से प्रेम पत्र थे

1953
02:36:11,560 --> 02:36:15,560
रमा नाम की स्त्री के दयानंद जी लिखे थे व आज भी प्रमाणित हाई

1954
02:36:15,560 --> 02:36:20,320
कोर्ट में ये बात सिद्ध हो गई इस आप ऋषि मह

1955
02:36:20,320 --> 02:36:24,960
उसम 27 लोक आप नंगे हो जाएंगे आचार्य प्रवर

1956
02:36:24,960 --> 02:36:29,200
आचार्य प्रवर इसको क्यों आप मर्यादित भाषा आचार्य

1957
02:36:29,200 --> 02:36:35,200
जी मर्यादित भाषा का उपयोग करें उस अ नहीं आपसे अनुरोध

1958
02:36:35,480 --> 02:36:39,480
हैवान एक दूसरे का आदर करना चाहिए एक दूसरे

1959
02:36:39,480 --> 02:36:43,720
के प्रति सम्मान का भाव रखते हुए हम इसको आगे ले जाए बहुत हमारे मत

1960
02:36:43,720 --> 02:36:48,280
मता है शास्त्रों में य स्वीकार करने में कोई हम लोग को परशा

1961
02:36:48,280 --> 02:36:52,360
जनता से आप प्रश्न पूछना चाह लेकिन संजत भाषा में यही अनुरोध है बारबार हा

1962
02:36:52,360 --> 02:36:56,440
जनता से आप प्रश्न करना चाहते हैं आप प्रश्न कीजिए मेरा सिर्फ एक अनुरोध है

1963
02:36:56,440 --> 02:37:00,440
कि हमारे माननीय अध्यक्ष जी बार-बार एक अनुरोध कर

1964
02:37:00,440 --> 02:37:05,040
रहे हैं यहां पर यह एक आपस में शास्त्रार्थ की

1965
02:37:05,040 --> 02:37:09,160
प्रक्रिया चल रही है और आप सभी लोग एक बहुत बड़े विद्वान

1966
02:37:09,160 --> 02:37:13,600
के रूप में यहां बैठे हुए हैं हम एकदम व्यक्तिगत टिप्पणी करना

1967
02:37:13,600 --> 02:37:17,800
और अपने महापुरुषों के बारे में दोनों तरफ से ऐसे बयान आ रहे

1968
02:37:17,800 --> 02:37:21,840
हैं जो वास्तव में अशोनी हमारे अध्यक्ष जी बारबार कह रहे

1969
02:37:21,840 --> 02:37:26,760
य पंडाल में बैठे सारे लोग यह क्या हम सोचेंगे आप लोग विद्वान

1970
02:37:26,760 --> 02:37:30,920
है देखिए एक बात स्पष्ट कर दूं मंच

1971
02:37:30,920 --> 02:37:35,560
की यह स्पष्ट धारणा है जिसकी हम घोषणा करते हैं

1972
02:37:35,560 --> 02:37:39,720
कि सब महापुरुष हमारे हैं महर्ष दयानंद सरस्वती

1973
02:37:39,720 --> 02:37:44,080
उतने ही हमारे लिए पूज्य है प्रणम है प्रात बंदनी है

1974
02:37:44,080 --> 02:37:48,240
जितने हमारे दूसरे आचार्य हैं उनसे हम मत विभेद रख सकते

1975
02:37:48,240 --> 02:37:50,480
हैं लेकिन का मतलब य नहीं है कि

1976
02:37:50,480 --> 02:37:54,640
व हमारे लिए वंदनीय नहीं है प्रणम नहीं है आदरणीय नहीं है कोई

1977
02:37:54,640 --> 02:37:58,640
भी हमारा स्वामी संत सन्यासी मत प्रवर्तक उतना ही

1978
02:37:58,640 --> 02:38:03,840
आदर नहीं है जितना कोई दूसरा है यही सना

1979
02:38:03,840 --> 02:38:08,000
सभ्यता संस्कृति का मूल संस्कार है चलिए आगे आगे ले च मिनट

1980
02:38:08,000 --> 02:38:10,720
एक मिनट एक

1981
02:38:10,720 --> 02:38:14,880
मिनट आचार्य जी एक मिनट छोड़ो अरे आचार्य

1982
02:38:14,880 --> 02:38:18,920
जी सामने एक मिनट मेरा एक प्रश्न था आपसे मेरा

1983
02:38:18,920 --> 02:38:22,920
एक प्रश्न बोलिए बोलिए काफी समय से मैं उसको

1984
02:38:22,920 --> 02:38:27,160
आपसे पूछना चाह रहा था जैसे अभी आपने

1985
02:38:27,160 --> 02:38:31,160
एक प्रश्न किया अपना उत्तर अभी आप अपना वक्तव्य दे

1986
02:38:31,160 --> 02:38:35,640
रहे थे तो मेरे दिमाग में एक प्रश्न कौदा आपने कहा दयानंद सरस्वती

1987
02:38:35,640 --> 02:38:39,640
भी उसी प्रकार न महीने बाद पैदा हुए गर्भ से उत्पन्न

1988
02:38:39,640 --> 02:38:43,720
हुए ठीक है ना हम भी वैसे ही होते हैं और पूर्व में भी

1989
02:38:43,720 --> 02:38:47,920
ऐसे ही होते थे ठीक है ना लेकिन जो अभी आपने एक वैसे ही

1990
02:38:47,920 --> 02:38:51,960
राम का भी जन्म हुआ यह 100% गलत हम इसको नहीं

1991
02:38:51,960 --> 02:38:56,280
मानेंगे भगवान कभी जन्म नहीं लेते मां के

1992
02:38:56,280 --> 02:39:00,840
जिस प्रकार से मां के गर्भ से प्रस प

1993
02:39:00,840 --> 02:39:05,640
उतर देने दीजिए उतर देने दीजिए मिट सु आप ठीक है

1994
02:39:05,640 --> 02:39:09,680
राम पर विवाद विवाद स्थिति आप खड़ी ना करें बात खत्म हो गई

1995
02:39:09,680 --> 02:39:13,920
उस बात को मत कीजिए मान मान मानने मान एक मिनट सुनिए

1996
02:39:13,920 --> 02:39:19,640
वैदिक नहीं बिल्कुल

1997
02:39:19,640 --> 02:39:24,040
आप कहां से क रहे बात बैठ जाइए भगवान कभी जन्म ही नहीं लेता वो

1998
02:39:24,040 --> 02:39:28,400
अजन्मा है देख अजन्मा सुनो ध्यान

1999
02:39:28,400 --> 02:39:32,560
से बैठ जाइए भगवान श्री कृष्ण बैठ जा बैठ

2000
02:39:32,560 --> 02:39:38,120
जाइए बैठ जाइए मैं इनका उत्तर देना चाहता हूं प्

2001
02:39:38,120 --> 02:39:42,360
मानस रामचरित मानस में कहते बिल्कुल

2002
02:39:42,360 --> 02:39:46,440
आप रामचरित मानस को सुनिए आप रामचरित मानस को बारबार प्रमाण

2003
02:39:46,440 --> 02:39:50,640
बना रहे हैं और भ प्रकट कपा हम पमान चचन

2004
02:39:50,640 --> 02:39:54,880
मना ठीक है ठीक है करले दशरथ

2005
02:39:54,880 --> 02:39:59,080
के जाए हम पमान चचन बनाए और भ प्रकट कृपाला

2006
02:39:59,080 --> 02:40:04,360
का कौन करेगा तीन दिन का सा संकट

2007
02:40:04,360 --> 02:40:08,400
मोचन है ऋषि कहते जाल ग्रंथ है इसको पढ़ने की आवश्यकता

2008
02:40:08,400 --> 02:40:12,520
नहीं है कुछ कुछ

2009
02:40:12,520 --> 02:40:18,520
बात दि हमलोग को

2010
02:40:19,440 --> 02:40:23,600
से निवेदन बंद कर दीजिए प्लीज आपको पूरा मौका मिलेगा

2011
02:40:23,600 --> 02:40:28,400
वित की तरफ मत जाइए उपाध्याय जी से मैं बता चुका हूं य की प्रवृत्ति

2012
02:40:28,400 --> 02:40:32,560
है छोटी छोटी बात प कट चलता है यहां पर

2013
02:40:32,560 --> 02:40:37,400
आप विद्वान लोग है आप विद्वान लोग है अरे ज साहब अगला सवाल

2014
02:40:37,400 --> 02:40:41,520
प्रवर्तित करिए अगला सवाल पूछो भाई टीम संख्या चार क्रमांक संख्या

2015
02:40:41,520 --> 02:40:45,680
सा प्रश्न संख्या सात सनातन

2016
02:40:45,680 --> 02:40:49,760
धर्म छोड़िए उस बात को क्योंकि विवाद धर्म

2017
02:40:49,760 --> 02:40:53,880
एवं संस्कृति के मूल तत्व क्या है इस बहुत स्पष्ट तरीके से सुन

2018
02:40:53,880 --> 02:40:57,880
लीजिए टीम संख्या चार स्पष्ट तरीके से सुन लीजिए विषय

2019
02:40:57,880 --> 02:41:02,000
पर ही रहना है विषय से भटकना नहीं है सनातन धर्म एवं संस्कृति के मूल

2020
02:41:02,000 --> 02:41:06,560
तत्व क्या है इसके हो रहे क्षरण को किस प्रकार रोका जाए आपका

2021
02:41:06,560 --> 02:41:10,720
समय हो रहा है अभी 254 आप आरंभ कीजिए

2022
02:41:10,720 --> 02:41:15,280
बिना मंगलाचरण बिना

2023
02:41:15,280 --> 02:41:21,280
उसके सनातन धर्म की जय

2024
02:41:21,800 --> 02:41:25,880
सनातन देखो कोई भी व्याख्या करने से पहले

2025
02:41:25,880 --> 02:41:29,920
कोई भी शब्द की व्याख्या स्वरूप

2026
02:41:29,920 --> 02:41:34,080
की व्याख्या उसके गुण की व्याख्या उनके

2027
02:41:34,080 --> 02:41:38,600
कर्म की व्याख्या और उसके फिर फल की व्याख्या करने लग जाओगे

2028
02:41:38,600 --> 02:41:43,840
तो समस्त शंकाएं समाप्त हो

2029
02:41:43,840 --> 02:41:48,240
जाएंगी सनातन सन धन

2030
02:41:48,240 --> 02:41:54,240
आ तन सन से

2031
02:41:54,520 --> 02:41:59,880
निकला तन उसको कहते है सनातन

2032
02:41:59,880 --> 02:42:04,680
सनातनम सनातन या न धृत

2033
02:42:04,680 --> 02:42:09,040
ब्रता जो सना से उत्पन्न हुआ

2034
02:42:09,040 --> 02:42:13,280
एक ही उत्पन्न नहीं हुआ है एक ही वस्तु उत्पन्न

2035
02:42:13,280 --> 02:42:18,160
नहीं हुई है सबसे पहले

2036
02:42:18,160 --> 02:42:22,320
एकायन फलस दो स्वरूप हुए

2037
02:42:22,320 --> 02:42:26,320
प्रकृति और पुरुष जैसे कहा है ना

2038
02:42:26,320 --> 02:42:30,680
अभी बात आई थी कि चार मुख वाले नहीं होंगे कि इतने मुख

2039
02:42:30,680 --> 02:42:34,760
वाले नहीं होंगे वेदों में तो यह कहा है च

2040
02:42:34,760 --> 02:42:38,880
अपने अपने ही विषय पर सनातन पर सिर्फ सनातन सनातन स्वरूप

2041
02:42:38,880 --> 02:42:43,320
को समझा रहा हूं मैं संचालक जी पहले सनातन का स्वरूप

2042
02:42:43,320 --> 02:42:47,400
समझ ले कि हम कहां से तना जुड़ा हुआ है और

2043
02:42:47,400 --> 02:42:51,440
कहां से क्या परिवर्तन हु यह सनातन तत्व

2044
02:42:51,440 --> 02:42:55,480
का विश्लेषण कर रहा हूं मैं यह चलो मैं

2045
02:42:55,480 --> 02:42:59,680
बिल्कुल हिंदी में कहूंगा मैं ईश्वर सर्व भूता

2046
02:42:59,680 --> 02:43:03,680
नाम हदय सेन ति भगवान सनातन एक ही

2047
02:43:03,680 --> 02:43:08,840
है है ना उसके

2048
02:43:08,840 --> 02:43:13,600
अलावा बीजम माम सर्व भूता

2049
02:43:13,600 --> 02:43:18,320
नाम समस्त भूतों का ीज एक ही है

2050
02:43:18,320 --> 02:43:22,720
और सनातन का अर्थ क्या है

2051
02:43:22,720 --> 02:43:27,320
आज हमारी आंखें देख रही हैं

2052
02:43:27,320 --> 02:43:31,720
इनमें कौन से व्यक्ति ऐसे हैं कि आंख के अतिरिक्त

2053
02:43:31,720 --> 02:43:36,240
अलग कोई वस्तु देखती

2054
02:43:36,240 --> 02:43:40,480
हो कौन से जीव की ऐसी आंख है

2055
02:43:40,480 --> 02:43:44,560
कि वो आंख की अलावा और किसी को देखती

2056
02:43:44,560 --> 02:43:48,840
हो है कोई चराचर

2057
02:43:48,840 --> 02:43:53,680
में कोई ऐसा हो अपवाद एकाद हो सकता है

2058
02:43:53,680 --> 02:43:57,800
कि आंख के द्वारा नहीं देखता हो और कहीं से

2059
02:43:57,800 --> 02:44:02,160
देख लेता हो करणों से सुनता हो

2060
02:44:02,160 --> 02:44:06,480
है ना मम बांसो जीव लोके जीव भूता सनातन

2061
02:44:06,480 --> 02:44:11,240
मन सट इंद्रियानी प्रकृति स्थान कर सति

2062
02:44:11,240 --> 02:44:13,520
सनातन

2063
02:44:13,520 --> 02:44:17,600
जीव लोक का जीव और सनातन भूत का जीव यहां

2064
02:44:17,600 --> 02:44:21,880
दो जीव विभाजित हो अब उसमें सनातन

2065
02:44:21,880 --> 02:44:24,240
में दो जीव कौन-कौन से हैं

2066
02:44:24,240 --> 02:44:28,600
भूत सनातन जीव कौन है और लोक सनातन जीव कौन

2067
02:44:28,600 --> 02:44:33,240
है यह जो पुरुष है ना पुर माने घर

2068
02:44:33,240 --> 02:44:37,280
और उसमें रहने वाला ईश्वर अगर व्याख्या में जाओगे तो

2069
02:44:37,280 --> 02:44:41,840
पुरुष प्रकृति जीव ईश्वर यह अलग-अलग वैदिक व्याख्या है

2070
02:44:41,840 --> 02:44:47,840
पौराणिक व्याख्या है ले

2071
02:44:50,320 --> 02:44:54,560
जसे मैं बैठा हुआ हूं नरेश शास्त्री मेरे माता भी है पिता भी हैं

2072
02:44:54,560 --> 02:44:58,680
और इसमें से लोक जीव निकल गया लोग माने इस

2073
02:44:58,680 --> 02:45:02,680
शरीर का स्वामी जिसको वो पुत्र मानते थे वोह निकल गया तो

2074
02:45:02,680 --> 02:45:06,720
इसमें कौन सा जीव रह गया भूत जीव

2075
02:45:06,720 --> 02:45:10,720
भूत जीव रह जाने पर यह परिवर्तन होकर

2076
02:45:10,720 --> 02:45:15,080
के नस जाता है तो वह सना

2077
02:45:15,080 --> 02:45:19,440
तनव अब सना तनव क्या है तन माने

2078
02:45:19,440 --> 02:45:23,440
शरीर अब जिसमें कोई

2079
02:45:23,440 --> 02:45:27,440
परिवर्तन नहीं होता हो

2080
02:45:27,440 --> 02:45:31,680
जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता हो और

2081
02:45:31,680 --> 02:45:36,080
जिसको परिवर्तन नहीं किया जा सकता

2082
02:45:36,080 --> 02:45:39,720
हो उसको कहते हैं सनातन

2083
02:45:39,720 --> 02:45:43,760
आप देखिए हम मुख से खाते हैं ऐसा कोई भी

2084
02:45:43,760 --> 02:45:47,840
व्यक्ति अपने को धर्म मानता हो वो कह दे के मुख से नहीं

2085
02:45:47,840 --> 02:45:52,600
खाता मैं तो और किसी भी चीज से खा लेता हूं

2086
02:45:52,600 --> 02:45:56,880
कोई चराचर में ऐसा कोई व्यक्ति हो या कोई चराचर में जीव

2087
02:45:56,880 --> 02:46:01,080
ऐसा हो कि उसको यह कह

2088
02:46:01,080 --> 02:46:05,240
दे कि वह मुख से नहीं खाता है ऐसे तो बिन पद

2089
02:46:05,240 --> 02:46:09,400
चले सुने बिन काने ऐसे तो बहुत है लेकिन चराचर

2090
02:46:09,400 --> 02:46:14,080
की व्याख्या करें सनातन की व्याख्या करें

2091
02:46:14,080 --> 02:46:18,200
अभी उधर में बात आई अब यही नहीं समझते

2092
02:46:18,200 --> 02:46:22,880
कि सृष्टि कितने प्रकार की होती है

2093
02:46:22,880 --> 02:46:27,080
सृष्टि होती है संकल्प सनातन संस्कृति

2094
02:46:27,080 --> 02:46:31,160
के मूल तत्व हां हां सनातन संस्कृति की

2095
02:46:31,160 --> 02:46:35,360
सबसे पहले सृष्टि सृष्टि के बाद में क्या आया

2096
02:46:35,360 --> 02:46:39,520
कि सबसे पहले संकल्प मानसी मै थुनी और

2097
02:46:39,520 --> 02:46:43,880
अथुनी अंडज पिंड स्वेद और उद

2098
02:46:43,880 --> 02:46:48,000
यही हम नहीं जानेंगे उपदेते ज्ञानम ज्ञान न

2099
02:46:48,000 --> 02:46:52,120
तत्व दर्शन अगर जिस व्यक्ति के सनातन तत्व की

2100
02:46:52,120 --> 02:46:55,040
यद जानकारी नहीं है तो कोई तामसी

2101
02:46:55,040 --> 02:46:59,200
है तो तामसी जैसी व्याख्या करेगा जो राजसी है वो राजसी

2102
02:46:59,200 --> 02:47:03,280
जैसी व्याख्या करेगा जो राज सात्विकी है वह सातव

2103
02:47:03,280 --> 02:47:07,480
की जैसी व्याख्या करेगा और जो तत्वदर्शी है वह तत्व का

2104
02:47:07,480 --> 02:47:11,520
दर्शन करेगा सनातन और उसकी जो

2105
02:47:11,520 --> 02:47:15,600
आपने सृष्टि बोली और सनातन में क्या मतलब जुड़ाव है सनातन का जुड़ाव

2106
02:47:15,600 --> 02:47:20,120
यह है कि जो हमारी कुल गोत्र और उत्पत्ति

2107
02:47:20,120 --> 02:47:24,280
जो है जन्मन जन्मन सनि तो जात

2108
02:47:24,280 --> 02:47:28,640
वेदा वेद सूत्र है मैं नहीं कह रहा हूं तो वह

2109
02:47:28,640 --> 02:47:32,920
सन्निहित जैसे सोना आज से करोड़ों वर्ष पहले

2110
02:47:32,920 --> 02:47:37,520
था आज भी वही सोना उसका वही गुण है

2111
02:47:37,520 --> 02:47:41,760
जो पहले था और चांदी का जो पहले जो गुण

2112
02:47:41,760 --> 02:47:45,800
था वो आज भी गुण है और वही जो

2113
02:47:45,800 --> 02:47:49,800
चीज मानव से जो हमारे गर्भाधान संस्कार

2114
02:47:49,800 --> 02:47:54,080
जो हमारे संकल्प य संस्कार दृष्टि से भी संताने

2115
02:47:54,080 --> 02:47:58,120
हुई हैं संकल्प से भी संताने हुई है यह सब

2116
02:47:58,120 --> 02:48:02,200
सनातन पद्धति है और हमारा जो तन है ना

2117
02:48:02,200 --> 02:48:07,120
कुल गोत्र जैसे हमारे वो है ना संकल्प जो दिया है

2118
02:48:07,120 --> 02:48:10,280
जो संकल्प में जो उरण दिए गए हैं

2119
02:48:10,280 --> 02:48:15,000
वह सभी और संस्कृति क्या है

2120
02:48:15,000 --> 02:48:20,120
प्रकट प्रकृति प्रश् ते सृष्ट

2121
02:48:20,120 --> 02:48:24,520
वाचक सृष्टि वाचक जो है वो प्रकृति

2122
02:48:24,520 --> 02:48:28,560
है जिससे स्वरूप बनता है और उसमें

2123
02:48:28,560 --> 02:48:32,840
जो संस्कारित परमात्मा ने सन्निहित किया है

2124
02:48:32,840 --> 02:48:36,880
सन्निहित जो जो पहले सन्निहित किया गया

2125
02:48:36,880 --> 02:48:40,920
वह आज भी सन्निहित है जिसमें किसी भी प्रकार

2126
02:48:40,920 --> 02:48:45,360
का कोई परावर्तन नहीं इसी के लिए

2127
02:48:45,360 --> 02:48:49,680
स्वयं श्री कृष्ण जी गीता जी में कहते हैं एवं प्रवर्तित

2128
02:48:49,680 --> 02:48:53,760
चक्रम नान वर्तीय अगार

2129
02:48:53,760 --> 02:48:57,920
इंद्रिया रामो मोगम पार्थ जीवती

2130
02:48:57,920 --> 02:49:01,960
यह नहीं कह रहे हैं भगवान श्री कृष्ण जी कि मैं कुछ कह रहा

2131
02:49:01,960 --> 02:49:06,400
हूं यह परंपरा से मम विवस्वत योग

2132
02:49:06,400 --> 02:49:10,400
प्रोतन परंपरा से सनातन पद्धति से चली आ रही है

2133
02:49:10,400 --> 02:49:14,760
संस्कृति हमारी वही कर यद हेम न बते

2134
02:49:14,760 --> 02:49:19,160
हम जात कर्मण तंद्र त मन वर्तमान वर्त ते

2135
02:49:19,160 --> 02:49:23,280
मनुष्य पार्थ सर्वस इदयम मले

2136
02:49:23,280 --> 02:49:25,400
का संकर से करता

2137
02:49:25,400 --> 02:49:29,520
हूं मतलब वह वर्ण शकर हो जाते हैं यह वह

2138
02:49:29,520 --> 02:49:33,680
हमारी जैसे ट्रैक पर रेल चलती है ना कितनी भी तेज

2139
02:49:33,680 --> 02:49:38,320
चली जाए लेकिन पटरी से उतर जाए तो वह एक्सीडेंट

2140
02:49:38,320 --> 02:49:42,440
हो जाएगा जैसे हमारे मोबाइल में 10 नंबर होते हैं

2141
02:49:42,440 --> 02:49:46,480
नंबर वही रखो सनातन अगर जो तना है उस

2142
02:49:46,480 --> 02:49:50,760
मर्यादा में रखोगे तो एक एक नंबर

2143
02:49:50,760 --> 02:49:54,760
आगे पीछे कर दोगे पूरे जीवन लगाते रहोगे वह

2144
02:49:54,760 --> 02:49:59,160
सब रंग नंबर हो जाएगा यह सनातन पद्धति

2145
02:49:59,160 --> 02:50:03,360
है उस मर्यादा में हम रहेंगे जभी

2146
02:50:03,360 --> 02:50:07,840
तो कहा है महा पुरुषस्य विष्णु आज्ञा उनकी

2147
02:50:07,840 --> 02:50:12,320
ओम तत्सत निर्देश ब्रह्मण त्र स्मत

2148
02:50:12,320 --> 02:50:16,760
ब्राह्मणन वेदा यज्ञ बहता पुरा

2149
02:50:16,760 --> 02:50:21,760
आज व्यक्ति कहते हैं अलग है पुराण अलग है

2150
02:50:21,760 --> 02:50:26,000
जबक इतिहास पुराणा नाम पंचम वेद

2151
02:50:26,000 --> 02:50:30,000
उते वेद जो परंपरा हमारी पुराण परंपरा जो

2152
02:50:30,000 --> 02:50:32,320
है

2153
02:50:32,320 --> 02:50:36,480
पुराणा पुराणा नित्य नुतन सा पुराणा जो

2154
02:50:36,480 --> 02:50:40,720
पुरानी से पुरानी होने पर भी नित्य नूतन हो

2155
02:50:40,720 --> 02:50:44,760
उसको पुराण कहते हैं यह सनातन पुराण

2156
02:50:44,760 --> 02:50:48,880
सनातन वेद और उनमें क्या है सन्निहित हो

2157
02:50:48,880 --> 02:50:53,280
करके उनकी मर्यादाओं का अनुपालन करके

2158
02:50:53,280 --> 02:50:57,800
क्योंकि यहां तक कहा है इत लंगत मर्याद

2159
02:50:57,800 --> 02:51:02,520
तक्ष का जहां मर्यादाओं का स्त्रियों

2160
02:51:02,520 --> 02:51:06,560
का श्रुति हों का स्मृतियों का जो हमारे

2161
02:51:06,560 --> 02:51:11,520
पुराणा वेद है यह सभी अंग हैं जैसे

2162
02:51:11,520 --> 02:51:15,600
वेदों में भी जाओ तो क्या कहते हैं पूर्वे काम पंथा

2163
02:51:15,600 --> 02:51:19,680
सना से जो आया है नया कुछ नहीं है भगवान

2164
02:51:19,680 --> 02:51:24,280
भी कह रहे हैं एवं प्रवर्तित चक्रम नान

2165
02:51:24,280 --> 02:51:28,400
वर्तीय वह मैं भी कर रहा हूं और इसी

2166
02:51:28,400 --> 02:51:32,480
प्रकार से जितने भी ऋषि महर्षि हुए हैं और बाबा जी तुलसीदास जी क्या

2167
02:51:32,480 --> 02:51:36,600
कहते हैं मुनि प्रथम हर कीरत

2168
02:51:36,600 --> 02:51:40,880
गाई ते मग चलत सुगम मोए भाई

2169
02:51:40,880 --> 02:51:45,440
कौन सा पद चुना उन्होंने सनातन पथ संस्कार

2170
02:51:45,440 --> 02:51:49,720
किए गए जो हमारी संस्कृति है संस्कृति

2171
02:51:49,720 --> 02:51:54,080
किसको कहते हैं जो हमारे धर्म की जो हमारे

2172
02:51:54,080 --> 02:51:55,880
कर्म की जैसे सत्य

2173
02:51:55,880 --> 02:51:59,920
व्रतम सत्य परमत सत्यम सत्य योनि तम च सत्य सत्य

2174
02:51:59,920 --> 02:52:04,530
सत्य मत सत्य नेत्र

2175
02:52:04,530 --> 02:52:07,760
[संगीत]

2176
02:52:07,760 --> 02:52:13,760
सत्यात्मतीर्था

2177
02:52:17,520 --> 02:52:21,760
स्वधर्मे निनम श्रेय पर धर्मो

2178
02:52:21,760 --> 02:52:26,280
भयावह जो हमारी सनातन की आदेश

2179
02:52:26,280 --> 02:52:30,560
भगवान वेद रूप भगवान के आदेश हैं पुराण

2180
02:52:30,560 --> 02:52:34,560
रूप लीला करके आदेश दिए गए हैं अब

2181
02:52:34,560 --> 02:52:38,880
यह आती है निराकार और साकार दो रूप है भगवान के

2182
02:52:38,880 --> 02:52:42,920
तीसरा रूप है उनका कारण साकार है

2183
02:52:42,920 --> 02:52:47,280
हमारे जैसे पुष्प है उसका आकार बद्ध है हमारा शरीर

2184
02:52:47,280 --> 02:52:51,360
है अब निराकार किसको कहते हैं जिसका आकार

2185
02:52:51,360 --> 02:52:55,360
वध नहीं है आकार क्या है जैसे अभी गं आई

2186
02:52:55,360 --> 02:53:00,040
एक फुट दूर गई फिर वह हवा गई तो 10 फुट दूर हो गई

2187
02:53:00,040 --> 02:53:04,880
50 मीटर दूर हो गई और इतनी सी रह गई उसकी आकार

2188
02:53:04,880 --> 02:53:08,960
कोई निहित नहीं है कभी बड़ा हो जाता है

2189
02:53:08,960 --> 02:53:11,640
कभी छोटा हो जाता है

2190
02:53:11,640 --> 02:53:15,720
इसलिए उनको प्रश्न है कि सनातन धर्म के

2191
02:53:15,720 --> 02:53:19,960
मूल तत्व क्या है दूसरा है कि संस्कृत के मूल तत्व

2192
02:53:19,960 --> 02:53:25,800
है उंगलियों पर

2193
02:53:25,800 --> 02:53:30,200
गिनाइज भी हो तो सनातन धर्म किन किन तत्वों से

2194
02:53:30,200 --> 02:53:34,200
निर्मित होता है जरा बताए सनातन तत्व जो

2195
02:53:34,200 --> 02:53:39,880
है समस्त परमात्मा से ही उत्पन्न होता

2196
02:53:39,880 --> 02:53:45,880
है सनातन

2197
02:53:50,240 --> 02:53:54,960
जन्मन जन्म सतो जात वेदा

2198
02:53:54,960 --> 02:53:59,280
हर चीज जो है सनातन हुई और उसमें

2199
02:53:59,280 --> 02:54:03,360
सन्निहित जो किया गया सनातन पुरुष

2200
02:54:03,360 --> 02:54:07,840
कल्पा दीश आद अनाद पुरुष उनमें वह

2201
02:54:07,840 --> 02:54:11,840
तत्व जो है हर समय रहते हैं अब कौन सी

2202
02:54:11,840 --> 02:54:16,160
स्तु 13 मिनट पूरा हो चुका है दो मिनट में अपने विषय का उ संहार कर दीजिए

2203
02:54:16,160 --> 02:54:20,160
आपने उंगलियों पर तत्व गिनने को बोला था आगे उपसर कीजिए तत्व

2204
02:54:20,160 --> 02:54:24,400
तो ऐसा है ना समस्त तत्व जो है परमात्मा ही

2205
02:54:24,400 --> 02:54:28,720
है कि समस्त तत्व परमात्मा का हीमा

2206
02:54:28,720 --> 02:54:33,040
प्रमाण प्रमाण चाहिए हा देखिए ऐसा है

2207
02:54:33,040 --> 02:54:38,080
प्रमाण के लिए तत्व ऐसे है जैसे वात्सल आता है माता

2208
02:54:38,080 --> 02:54:42,160
को तो वात्सल आते ही भले ही वो दूध पिलाने का नहीं है

2209
02:54:42,160 --> 02:54:46,240
तो उनके दूध आने लग जाता है यह तत्व है

2210
02:54:46,240 --> 02:54:50,400
जैसे किसी के बच्चा नहीं हुआ है तो उसके आचल में कभी दूध

2211
02:54:50,400 --> 02:54:54,480
नहीं आएगा यह चलित सनातन बता रहा हूं मैं और जैसे ही बच्चा आने

2212
02:54:54,480 --> 02:54:58,800
को होगा उसके आचल में दूध आ जाएगा यह उसका तत्व है इसी

2213
02:54:58,800 --> 02:55:02,880
प्रकार के गर्भधान संस्कार नारी शक्ति के लिए दिया है

2214
02:55:02,880 --> 02:55:05,320
वह गर्भ केवल उन्हीं में ही लेकिन

2215
02:55:05,320 --> 02:55:09,440
पुरुष जो है सदा पुरुष संगता बिना पुरुष के

2216
02:55:09,440 --> 02:55:13,480
संगत के जहा प्रकृति पुरुष वाली बात आएगी तब तक इनके

2217
02:55:13,480 --> 02:55:17,560
तत्वों को एक दूसरे का बोधक नहीं

2218
02:55:17,560 --> 02:55:21,800
करेंगे तब तक वह चीज उत्पन्न नहीं होगी लेकिन भगवान

2219
02:55:21,800 --> 02:55:26,000
की जो बात है अपने इच्छा के द्वारा समस्त

2220
02:55:26,000 --> 02:55:30,160
जैसे हमारे शब्दों की वेदों की जो ऊर्जा हैं हमारे

2221
02:55:30,160 --> 02:55:34,680
वेदों की शब्द जैसे ज्यादा ज्यादा से करोगे तो वह ऊर्जा

2222
02:55:34,680 --> 02:55:38,840
अपने अंतर से ही तत्व प्रकट होते हैं

2223
02:55:38,840 --> 02:55:42,920
वह सनातन तत्व है और उनके लिए क्रमश

2224
02:55:42,920 --> 02:55:47,120
हमारे लिए मिलता है जैसे हम पिता बाबा

2225
02:55:47,120 --> 02:55:51,160
दादा गोत्र हमारे संकल्प में दिया गया है उसी

2226
02:55:51,160 --> 02:55:55,160
के द्वारा हमें सभी चीजें आप यह चाहो कि एक दूसरे

2227
02:55:55,160 --> 02:56:00,200
की चीज एक दूसरे से पूर्ति कर लोगे वह पूर्ति नहीं होगी

2228
02:56:00,200 --> 02:56:04,440
जैसे हमारे जो तत्व है सोने का

2229
02:56:04,440 --> 02:56:08,440
तो सोने का तत्व सोने में ही मिलेगा लेकिन वह तत्व

2230
02:56:08,440 --> 02:56:12,480
पीतल में नहीं मिलेगा समय आपका समय आपका पूर्ण हुआ

2231
02:56:12,480 --> 02:56:16,720
प्रश्न उत्तर का समय है कोई भी समूह प्रश्न उत्तर करना चाहे सभ्य

2232
02:56:16,720 --> 02:56:20,480
भाषा में मर्यादित भाषा में में किसी भी प्रकार का कोई अग्रेशन नहीं बड़ी

2233
02:56:20,480 --> 02:56:24,720
शांत तरीके से कीजिएगा वही है हां पूछेगा

2234
02:56:24,720 --> 02:56:29,880
आप समूह में है आप समूह में है

2235
02:56:29,880 --> 02:56:35,080
उनको भी रोक दिया बाद में आना समूह से

2236
02:56:35,080 --> 02:56:39,280
अरे बाद में हम अरे सुनिए आचार्य जी आप उनको भी दो तीन

2237
02:56:39,280 --> 02:56:43,320
बार नहीं आने दिया मैंने वो तो लास्ट की बात हो गई अरे तो

2238
02:56:43,320 --> 02:56:47,440
सबको ही रोक रहे हैं हम तो किसी को पक्षपात के आचारी भर आचार्य भर

2239
02:56:47,440 --> 02:56:51,600
आपने मूल तत्वों को उंगलियों पर गिलाने के लिए महाराज

2240
02:56:51,600 --> 02:56:56,480
श्री ने कहा लेकिन वह हमें प्राप्त नहीं हुए लेकिन सनातन

2241
02:56:56,480 --> 02:57:01,960
और संस्कृति के छरण का उपाय क्या है यह और बता दीजिए

2242
02:57:01,960 --> 02:57:06,120
सनातन संस्कृति का क्षरण का कारण क्या है इसके उपाय

2243
02:57:06,120 --> 02:57:11,640
बता दीजिए जो छरण हो रहा है यह संस्कृति समाप्त हो रही है

2244
02:57:11,640 --> 02:57:16,680
उसका देखिए सनातन

2245
02:57:16,680 --> 02:57:20,680
सत्य है जो त्रिकाल में व्याप्त है हम

2246
02:57:20,680 --> 02:57:24,880
नहीं थे उससे पहले भी था हम थे जब भी है हम नहीं रहेंगे

2247
02:57:24,880 --> 02:57:29,400
जब भी रहेगा सनातन उसको कहते हैं जो आज काल

2248
02:57:29,400 --> 02:57:33,600
हमसे पहले भी है हम है जब भी है और हम नहीं रहेंगे

2249
02:57:33,600 --> 02:57:36,280
जब भी

2250
02:57:36,280 --> 02:57:37,280
रहेगा

2251
02:57:37,280 --> 02:57:41,440
हम लोग अपनी वृत्तियों के और

2252
02:57:41,440 --> 02:57:45,800
हमारी लक्षण बताए उनका पालन नहीं कर रहे इसलिए

2253
02:57:45,800 --> 02:57:51,800
चरण हम ही लोग कर रहे हैं

2254
02:57:53,720 --> 02:57:58,240
माते पालन नहीं कर रहे इसलिए हम च कर रहे

2255
02:57:58,240 --> 02:58:02,360
कोई दूसरा नहीं आ रहा है हम आक्षेप लगाते

2256
02:58:02,360 --> 02:58:07,320
अन पर विद लोगों पर सब बा गलत

2257
02:58:07,320 --> 02:58:09,680
है

2258
02:58:09,680 --> 02:58:15,680
कर इसलिए उसका चरण होहा है का पान कर

2259
02:58:18,320 --> 02:58:22,360
पर उपाय क्या है हमें उपाय क्या करना है समाज में संस्कृति का उपाय

2260
02:58:22,360 --> 02:58:27,280
क्या है शांत भाषा में सबसे बड़ा उपाय है

2261
02:58:27,280 --> 02:58:31,640
जो हमारे ग्रंथों ने हमें सन्निहित कर्म दिया है

2262
02:58:31,640 --> 02:58:35,800
स्वे कर्मण भरत सं लते

2263
02:58:35,800 --> 02:58:40,720
नर स्वधर्मा चम सत्या धर्मा

2264
02:58:40,720 --> 02:58:44,920
निवत जो अपने स्वधर्म का संचालन करता

2265
02:58:44,920 --> 02:58:48,960
है तो जैसे पुत्र आता है उससे पहले आंचल

2266
02:58:48,960 --> 02:58:53,240
से दूध आ जाता है पृथ्वी में एक बीज भी

2267
02:58:53,240 --> 02:58:58,640
ठीक है ठीक है ठीक है और कोई

2268
02:58:58,640 --> 02:59:01,920
प्रश्न

2269
02:59:01,920 --> 02:59:06,040
हां अध्यक्ष महोदय अच्छा ओ

2270
02:59:06,040 --> 02:59:11,000
अगर सभी के प्रश्न प्रति प्रश्न हो गए हो

2271
02:59:11,000 --> 02:59:16,240
चलिए आप आप कर लीजिए पूछिए भैया

2272
02:59:16,240 --> 02:59:19,280
ओम ओ

2273
02:59:19,280 --> 02:59:23,440
दर्शको में से दर्शको में अभी पंडित जी जब सनातन

2274
02:59:23,440 --> 02:59:27,880
की परिभाषा कर रहे थे तो उन्होंने कहा था कि सनातन

2275
02:59:27,880 --> 02:59:32,040
वह है जैसे जो सत्य है जैसे चला आ रहा है जैसे

2276
02:59:32,040 --> 02:59:36,040
मुंह से भोजन करते हैं तो मुह से ही किया जाएगा अन्य जगह

2277
02:59:36,040 --> 02:59:40,400
से नहीं कर सकते तो उससे पहले स्वामी जी यहां से बोल रहे थे कि

2278
02:59:40,400 --> 02:59:44,640
भाई इसी चीज को तो मानो कि जो बच्चा

2279
02:59:44,640 --> 02:59:48,640
पैदा करने की बात हो रही थी कि बालों से नाक से कान से तो वो भी तो एक

2280
02:59:48,640 --> 02:59:52,720
ही जगह से होना चाहिए जैसे भोजन एक जगह से कर रहे हैं उसी प्रकार वो

2281
02:59:52,720 --> 02:59:56,800
भी तो एक ही जगह से होना चाहिए वो अलग अलग क्यों जा रहा है यह बात

2282
02:59:56,800 --> 03:00:01,040
आई थी देखिए भैया हमारी

2283
03:00:01,040 --> 03:00:07,040
दृष्टि आप आप उत्तर देना चाहेंगे इनको ये उत्तर दे रहे

2284
03:00:07,720 --> 03:00:11,880
हैं वाह राजनय वेद में लिखा है ब्राह्मणो से

2285
03:00:11,880 --> 03:00:16,440
मुख मासी वेद में लिखा है यह क्या है

2286
03:00:16,440 --> 03:00:20,480
ओ बाहु से क्त्र उत्पन्न हुए मुख मंडल से ब्राह्मण उत्पन्न

2287
03:00:20,480 --> 03:00:25,320
हुए और दूसरी बात आज आप कह रहे हो कि

2288
03:00:25,320 --> 03:00:29,400
श्रद्धेय दयानंद जी महाराज का जो दर्शन है वह वैज्ञानिक है

2289
03:00:29,400 --> 03:00:33,960
तो आज का विज्ञान तो बहुत कुछ उतल फतल कर रहा है तो कुछ चीजें

2290
03:00:33,960 --> 03:00:38,160
समसामयिक होती हैं परिस्थिति जन्य होती है और इसी प्रकार

2291
03:00:38,160 --> 03:00:42,160
से क्षेपक आदि का भी अर्थ लगाना पड़ेगा जिनको हम बहुत गलत

2292
03:00:42,160 --> 03:00:46,160
समझते हैं कई बार समझने के बाद व बहुत अच्छी भी निकलती है चीज जैसे आपने पूछा

2293
03:00:46,160 --> 03:00:51,040
था कि ब्रह्मा जी का ब्रह्मा जी का जो पूछा था

2294
03:00:51,040 --> 03:00:55,480
शिव पुराण की उमा संगीता में लिखा हुआ है ब्रह्मा जी को

2295
03:00:55,480 --> 03:00:59,640
उन्होंने ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु के वाहन

2296
03:00:59,640 --> 03:01:03,720
गरुड़ जी की गरुड़ जी एक हंसिनी पर आकृष्ट थे ब्रह्मा जी ने उनकी

2297
03:01:03,720 --> 03:01:08,120
हसी उड़ाई थी तो यह साप लगा था

2298
03:01:08,120 --> 03:01:12,400
और इसीलिए उनकी पूजा बंद हुई थी लेकिन इसके

2299
03:01:12,400 --> 03:01:16,680
मूल में इस तरह का क्यों हु कोई प्रश्न कोई प्रश्न उत्तर नहीं

2300
03:01:16,680 --> 03:01:20,760
मैं आगे इस काकम की श्रंखला को शास्त्रार्थ की श्रंखला को यही समापन संपन्न करता

2301
03:01:20,760 --> 03:01:23,080
हूं आगे अतिथियों

2302
03:01:23,080 --> 03:01:27,200
हा हा जी हा नहीं तो आधा मिनट

2303
03:01:27,200 --> 03:01:31,240
के अंदर आधा मिनट किसी को नहीं सारे माइक बंद कर दीजिए नीचे के ऊपर का माइक चालू

2304
03:01:31,240 --> 03:01:35,520
रखिएगा है ना और मैं निवेदन करना चाहूंगा

2305
03:01:35,520 --> 03:01:39,840
आदरणीय श्री डॉक्टर सुरेश आप पहले मुख्य अतिथि का

2306
03:01:39,840 --> 03:01:45,040
निर्देशन हुआ है कि वह मुख्य अतिथि जी पहले अपने शब्द

2307
03:01:45,040 --> 03:01:49,360
अच्छा ठीक है मैं डॉक्टर श्री सुरेश शी जी से कहना चाहूंगा

2308
03:01:49,360 --> 03:01:53,640
कि वह मर्यादित समय में अपना सुस्पष्ट संक्षेप में वक्तव्य

2309
03:01:53,640 --> 03:01:57,720
देकर के क्योंकि कार्यक्रम थोड़ा सा लेट चल रहा है और अतिथियों को भी कष्ट हो रहा है क्योंकि

2310
03:01:57,720 --> 03:02:01,800
वह तो समय से ही पधारे थे और समय से पूर्व पधार गए थे इसलिए हम

2311
03:02:01,800 --> 03:02:06,040
क्षमा याचना करते हैं बाकी आप अपना संक्षेप में वक्तव्य वो कीजिए और अपना जो नंबर

2312
03:02:06,040 --> 03:02:12,040
दिए वो हमें दे जाइए आप आ

2313
03:02:13,800 --> 03:02:19,800
जाइए समय आप जितना भी पाच मिनट

2314
03:02:23,880 --> 03:02:28,800
बहुत बहुत

2315
03:02:28,800 --> 03:02:33,040
धन्यवाद आदरणीय अध्यक्ष महोदय

2316
03:02:33,040 --> 03:02:37,080
निर्णायक मंडल समस्त शास्त्रार्थ में

2317
03:02:37,080 --> 03:02:42,680
समाग विद्वान मंडल उपस्थित श्रोताओं माताओं

2318
03:02:42,680 --> 03:02:48,680
बहनों आज जो शास्त्रार्थ चर्चा

2319
03:02:51,440 --> 03:02:55,560
जो विद्वान मंडल एकत्रित हुआ है उपस्थित चर्चा से

2320
03:02:55,560 --> 03:02:59,720
यह लगता है कि शास्त्रार्थ नहीं बल्कि शास्त्र

2321
03:02:59,720 --> 03:03:03,880
चर्चा हो रही है केवल शास्त्र चर्चा

2322
03:03:03,880 --> 03:03:08,120
देखिए शास्त्रार्थ के बहुत से

2323
03:03:08,120 --> 03:03:12,200
प्रकरण मैंने पढ़े हैं उनके पहले

2324
03:03:12,200 --> 03:03:16,200
से ही नियम और सारी चीजें तय होती हैं

2325
03:03:16,200 --> 03:03:20,280
और बादी वादी एक दूसरे के से बात करते हैं नियम

2326
03:03:20,280 --> 03:03:25,120
के अंतर्गत यहां भी नियम का पालन हो रहा है लेकिन

2327
03:03:25,120 --> 03:03:29,240
मुझे यह समझ में नहीं आ रहा है कि आखिरकार बात एक

2328
03:03:29,240 --> 03:03:33,360
व्यक्ति कह रहा है जैसे वो

2329
03:03:33,360 --> 03:03:37,560
प्रश्न था कि भारतीय संस्कृति में जो आक्षेप

2330
03:03:37,560 --> 03:03:42,520
है उन आक्षेप का निराकरण अगर हम

2331
03:03:42,520 --> 03:03:46,560
कर सकते हैं तो हमें क्यों नहीं करना चाहिए

2332
03:03:46,560 --> 03:03:50,680
कल्पना कीजिए हमारे जो बहुत सारे शास्त्र हैं

2333
03:03:50,680 --> 03:03:55,160
उनमें ऐसी ऐसी मिलावट हुई हैं और हमारे ऐसे प्रतिष्ठित

2334
03:03:55,160 --> 03:03:59,440
लब्ध प्रतिष्ठित विद्वानों ने की हैं जिनको अगर आप स्वयं

2335
03:03:59,440 --> 03:04:03,840
भी पढ़ लेंगे तो कहेंगे कि ऐसा नहीं होना चाहिए

2336
03:04:03,840 --> 03:04:06,560
फिर अगर उनको हटाने की बात कही जाती है

2337
03:04:06,560 --> 03:04:10,920
तो हमें विरोध क्यों हमें शास्त्र चर्चा करनी है और शास्त्र

2338
03:04:10,920 --> 03:04:15,200
चर्चा पर ही हमें आधारित होना चाहिए हमें इसमें

2339
03:04:15,200 --> 03:04:19,920
विरोध का प्रदर्शन चाहे यह पक्ष हो चाहे वो पक्ष हो विरोध का प्रदर्शन

2340
03:04:19,920 --> 03:04:24,160
या उग्र भाव प्रदर्शित नहीं करना चाहिए मैं जानता हूं

2341
03:04:24,160 --> 03:04:28,480
ऐसा लगता है कि हम जिन मान्यताओं में बहुत समय से चले आ रहे हैं

2342
03:04:28,480 --> 03:04:32,640
उन मान्यताओं पर कोई व्यक्ति आक्षेप करता है तो हृदय को ठेस लगती है

2343
03:04:32,640 --> 03:04:36,800
क्यों हम उसी मान्यता में चल रहे हैं परंतु अगर उसमें कहीं

2344
03:04:36,800 --> 03:04:41,360
पर हमने जब यह बात कह दी कि प्रकृति के आधार पर

2345
03:04:41,360 --> 03:04:45,560
समय के आधार पर जिन चीजों को समझना चाहिए अगर नहीं

2346
03:04:45,560 --> 03:04:50,120
समझेंगे तो आज हम पछ जाएंगे समाज कहां जा रहा है

2347
03:04:50,120 --> 03:04:54,320
किस रूप में जा रहा है देश की स्थिति क्या है परिस्थिति क्या है उसको

2348
03:04:54,320 --> 03:04:58,360
हमें समझना होगा अगर नहीं समझेंगे तो शास्त्र चर्चाओं को करने

2349
03:04:58,360 --> 03:05:02,640
का भी हमको मौका नहीं मिलेगा परिस्थितियां वो बनती जा रही है इसलिए

2350
03:05:02,640 --> 03:05:06,960
आज समझिए सभी लोगों को समझना चाहिए कि हम शास्त्र चर्चा

2351
03:05:06,960 --> 03:05:11,280
मिलकर करें परस्पर विचार विश करें और ढंग से विचार करके

2352
03:05:11,280 --> 03:05:15,440
उन निर्ण उन पर निर्णय ले और उनके आधार पर समाज को चलने

2353
03:05:15,440 --> 03:05:19,560
का निर्देश करें हम किसी को कुछ सम ते रहेंगे आप किसी को कुछ समझाते

2354
03:05:19,560 --> 03:05:21,840
रहेंगे इससे कभी समाज का भला

2355
03:05:21,840 --> 03:05:25,840
नहीं होगा हम दो विद्वान अगर लड़ते रहते हैं तो फिर वही कहावत

2356
03:05:25,840 --> 03:05:30,440
सिद्ध होगी कि दो विद्वान किसी घर पर गए एक ने कहा यह

2357
03:05:30,440 --> 03:05:34,560
बैल है एक ने कहा ये गधा है यजमान ने दोनों के लिए जो है

2358
03:05:34,560 --> 03:05:38,560
गधा घास और भूसा धर दिया जब उनको असलियत पता लगी

2359
03:05:38,560 --> 03:05:42,600
कि हमारे ही व्यक्ति ने हमको यह गलत कहा तो ये बड़ी हास्यास्पद

2360
03:05:42,600 --> 03:05:47,000
स्थिति होगी उस हास्यास्पद स्थिति से बचने के लिए हमको चाहिए

2361
03:05:47,000 --> 03:05:51,320
कि परस्पर शास्त्रों में आई हुई बातों पर चिंतन करें और उनके

2362
03:05:51,320 --> 03:05:55,400
सही निर्णय करने के लिए उनको वैज्ञानिक तरीके सिद्ध करने के लिए हम प्रयास

2363
03:05:55,400 --> 03:05:59,600
करें ऐसा नहीं है कि हम कर नहीं कर सकते कर सकते हैं इसलिए उसका प्रयास करना

2364
03:05:59,600 --> 03:06:01,960
चाहिए

2365
03:06:01,960 --> 03:06:06,040
धन्यवाद आदरणीय का बहुत-बहुत साधुवाद पुनः इस क्रम

2366
03:06:06,040 --> 03:06:10,400
को ना रोकते हुए आगे पंक्ति में चलते हुए मैं आदरणीय श्री डॉक्टर अशोक रुस्त

2367
03:06:10,400 --> 03:06:14,760
कीी जी से निवेदन करूंगा कि संक्षेप शब्दों में अपने शब्दों में

2368
03:06:14,760 --> 03:06:19,600
जो शास्त्रार्थ हुआ है उसके ऊपर टिप्पणी इत्यादि जो भी करना चा कहना चाहे

2369
03:06:19,600 --> 03:06:25,600
कर

2370
03:06:28,560 --> 03:06:31,800
सकता

2371
03:06:31,800 --> 03:06:36,280
धन्यवाद मैं मंच को नमन करता हूं प्रणाम करता

2372
03:06:36,280 --> 03:06:40,760
हूं यहां उपस्थित सभी विद जनों

2373
03:06:40,760 --> 03:06:44,840
को जो विभिन्न टीम यहां पर आई है

2374
03:06:44,840 --> 03:06:49,480
जिन्होने बहुत ही विता पूर्ण ढंग से अपने

2375
03:06:49,480 --> 03:06:53,680
शास्त्रों के संदर्भों को देते हुए अपना पक्ष रखा

2376
03:06:53,680 --> 03:06:57,840
है सभी का पक्ष बहुत

2377
03:06:57,840 --> 03:07:02,160
ही तर्कपूर्ण ढंग से सबने रखने का प्रयास किया है

2378
03:07:02,160 --> 03:07:06,560
यह परंपरा बड़ी श्रेष्ठ परंपरा है और मैं इस परंपरा

2379
03:07:06,560 --> 03:07:10,560
को नमन करता हूं प्रणाम करता हूं इसी से सत्य

2380
03:07:10,560 --> 03:07:14,640
सत्य का विच्छेदन होगा और तर्क सम्मत ढंग से

2381
03:07:14,640 --> 03:07:18,880
जो सत्य सनातन वैदिक धर्म की परंपरा है जो मान्यताएं

2382
03:07:18,880 --> 03:07:24,880
है वो पुष्ट और सवल होंगी बहुत-बहुत आभार बहुत बहुत

2383
03:07:31,960 --> 03:07:36,040
धन्यवाद आदरणीय प्राचार्य साहब का बहुत-बहुत धन्यवाद बहुत-बहुत आभार

2384
03:07:36,040 --> 03:07:40,680
और इसी श्रंखला में मैं आगे निवेदन करना चाहूंगा डॉक्टर

2385
03:07:40,680 --> 03:07:44,720
श्री देवेंद्र शर्मा जी को आप आए अध्यक्ष वेद विभाग एव

2386
03:07:44,720 --> 03:07:48,880
निदेशक मंत्र प्रतिष्ठान राजस्थान संस्कृत विद्यालय य जो शास्त्रार्थ हुआ

2387
03:07:48,880 --> 03:07:54,880
है उस पर अपना मत टिप्पणी इत्यादि जो भी है उसको प्रस्तुत

2388
03:07:55,240 --> 03:07:59,440
करें ओम विश्वानि देव सवित दुरिता

2389
03:07:59,440 --> 03:08:03,120
परास जरत

2390
03:08:03,120 --> 03:08:06,920
आसव नम सभ

2391
03:08:06,920 --> 03:08:11,960
सभापति यह अत्यंत हर्ष का विषय है

2392
03:08:11,960 --> 03:08:16,240
कि श्री नरहरि ज्योति शोध संस्थान के द्वारा सौरव

2393
03:08:16,240 --> 03:08:20,960
जी के इस पवित्र क्षेत्र में यह शास्त्रार्थ का कार्यक्रम आयोजित किया

2394
03:08:20,960 --> 03:08:25,000
गया दोनों ही पक्षों के विद्वानों ने अपने

2395
03:08:25,000 --> 03:08:29,000
अपने मत के अनुसार बहुत अच्छा प्रस्तुत किया शास्त्र

2396
03:08:29,000 --> 03:08:33,480
प्रमाण सहित यह सभी लोगों को देखने का अवसर प्राप्त हुआ

2397
03:08:33,480 --> 03:08:37,600
और यह हमारी जो प्राचीन परंपरा है यह इस समय में

2398
03:08:37,600 --> 03:08:41,640
भी सौरव क्षेत्र में चल रही है यह बहुत ही गौरव का

2399
03:08:41,640 --> 03:08:46,240
विषय है इस हेतु मैं इस संस्थान

2400
03:08:46,240 --> 03:08:46,960
के समस्त

2401
03:08:46,960 --> 03:08:51,240
अधिकार यों को बहुत धन्यवाद देता हूं कि उन्होंने

2402
03:08:51,240 --> 03:08:55,440
इस परंपरा को बनाए रखा है और आगे भी इस प्रकार के आयोजन करते

2403
03:08:55,440 --> 03:09:01,440
रहे आप सभी को बहुत-बहुत धन्यवाद एवं

2404
03:09:15,520 --> 03:09:19,560
आभार आदरणीय श्री देवेंद्र गुरु जी का बहुत-बहुत

2405
03:09:19,560 --> 03:09:23,600
धन्यवाद अब अगली पंक्ति में जिनको हम सुनना चाहते हैं

2406
03:09:23,600 --> 03:09:28,200
और जिन्ह सुनना चाहिए और जिनको सुनने के लिए

2407
03:09:28,200 --> 03:09:32,520
बहुत बड़ी बात नहीं कहूंगा कि राजस्थान का प्रत्येक व्यक्ति लालायित

2408
03:09:32,520 --> 03:09:36,920
है और बहुत अच्छे वक्ता हैं और गुरु परंपरा

2409
03:09:36,920 --> 03:09:40,920
से आप पढ़े हुए हैं आदर विद्वान श्री आदरणीय

2410
03:09:40,920 --> 03:09:45,640
श्री डॉक्टर शास्त्री कौशलेंद्र दास जी आप आए

2411
03:09:45,640 --> 03:09:49,640
और शास्त्रार्थ के परिपेक्ष में हुए शास्त्रार्थ के परिपेक्ष में

2412
03:09:49,640 --> 03:09:55,640
अपना मंतव्य टिप्पणी इत्यादि संबोधित करें और मार्ग प्रशस्त

2413
03:10:08,680 --> 03:10:13,440
करें सीतानाथ समारंभा रामानंद मध्यमाम

2414
03:10:13,440 --> 03:10:19,440
अस्म चार्य पर्यंत वंदे गुरु परंपराम

2415
03:10:19,880 --> 03:10:23,880
श्री नरहरी ज्योतिष संस्थान की तरफ से इस पवित्र

2416
03:10:23,880 --> 03:10:28,120
पुण्यत भगवान बराह की भूमि में आज विद्वानों

2417
03:10:28,120 --> 03:10:32,280
ने हमारे पुरातन शास्त्रों को लेकर के जिन विचारों को यहां

2418
03:10:32,280 --> 03:10:36,440
व्यक्त किया वह वास्तव में यही वैदिक सनातन

2419
03:10:36,440 --> 03:10:40,640
धर्म की एक प्रशंसा एवं विशिष्टता है कि इस

2420
03:10:40,640 --> 03:10:44,800
शास्त्रार्थ को देख कर के आप लोगों को पता लगा होगा कि हम लोग कुरान और बाइबल

2421
03:10:44,800 --> 03:10:49,000
क्यों नहीं है हम क्यों एक किताब वाले लोग नहीं है एक ही

2422
03:10:49,000 --> 03:10:53,160
किताब से हम क्यों संचालित नहीं होते हमारे यहां तो रुचि नाम वै

2423
03:10:53,160 --> 03:10:57,360
चित्र रिजु कुटिल नाना पथम रणाम एक

2424
03:10:57,360 --> 03:11:01,600
गम्यम पय साम अरवा अनेक

2425
03:11:01,600 --> 03:11:05,640
विद्वानों ने महाभारत में जो धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा

2426
03:11:05,640 --> 03:11:09,800
न को ऋषि यस्य मतम प्रमाणम ऐसा कोई ऋषि नहीं दिखाई पड़ रहा

2427
03:11:09,800 --> 03:11:13,880
है कि उसी का मत प्रमाण है व यह घोषणा कर दे यह चिंतन की

2428
03:11:13,880 --> 03:11:18,200
विचार की हमारे यहां उत्कृष्टता है है

2429
03:11:18,200 --> 03:11:22,240
कि व्यक्ति जिस चीज पर विचार करता है उसको लिखता है

2430
03:11:22,240 --> 03:11:23,720
वैदिक सनातन धर्म के

2431
03:11:23,720 --> 03:11:28,080
आध्यात्मिक गगन में वेदों से प्राप्त ज्ञान राशि का प्रयोग

2432
03:11:28,080 --> 03:11:32,480
करके भगवान वाल्मीकि भगवान व्यास तमाम सूत्र का

2433
03:11:32,480 --> 03:11:37,120
आचार्य भगवान शंकराचार्य भगवान रामानुजाचार्य भगवान

2434
03:11:37,120 --> 03:11:41,600
रामानंदाचार्य भगवान निबार काचार्य भगवान वल्लभाचार्य भगवान

2435
03:11:41,600 --> 03:11:46,000
मधवा चार्य और उसी परंपरा में श्रद्धेय दयानंद

2436
03:11:46,000 --> 03:11:50,200
सरस्वती जी ने जिस प्रकार प्रकार से शास्त्र को उपस्थित किया वह

2437
03:11:50,200 --> 03:11:54,280
अनुपम है अनूठा है लेकिन कई बार क्या होता है कि

2438
03:11:54,280 --> 03:11:58,480
संप्रदायिक सांप्रदायिक निष्ठा के कारण हम लोग

2439
03:11:58,480 --> 03:12:02,560
अपने संप्रदाय के प्रति अत्यंत दृढ़ हो जाते हैं न्याय सूत्र

2440
03:12:02,560 --> 03:12:06,760
के भाष्य का वार्तिक का उद्यो करर ने एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात लिखी है

2441
03:12:06,760 --> 03:12:11,200
संप्रदाय कहते किसे हैं क्या होता है संप्रदाय हम लोग रामानंद संप्रदाय

2442
03:12:11,200 --> 03:12:15,640
दयानंद संप्रदाय शंकर संप्रदाय पुराण संप्रदाय वेद संप्रदाय

2443
03:12:15,640 --> 03:12:19,720
यह संप्रदाय है क्या इसको परिभाषित करते हुए वार्तिक का उद्योग

2444
03:12:19,720 --> 03:12:24,040
करर ने लिखा शिष्या चार्य संबंध अ विच्छेदन शास्त्र

2445
03:12:24,040 --> 03:12:28,720
नाम संप्रदाय शिष्य और आचार्य के जो अविच्छिन्न शास्त्र

2446
03:12:28,720 --> 03:12:32,800
को प्राप्त करने की एक परंपरा है वह संप्रदाय है और जब हम उस

2447
03:12:32,800 --> 03:12:36,920
परंपरा से ज्ञान को प्राप्त करते हैं तो निर्विवाद रूप से हम लोग

2448
03:12:36,920 --> 03:12:38,960
उस संप्रदाय के प्रति आग्रह रखते

2449
03:12:38,960 --> 03:12:43,000
हैं हमारे चिंतन पर हमारे

2450
03:12:43,000 --> 03:12:47,480
प्रकार की बातें होती है लेकिन एक बात जो आपने कही वो मुझे बहुत अच्छी लगी यह

2451
03:12:47,480 --> 03:12:51,480
विविधता ऐसा नहीं है कि वेदों के बाद पुराणों में ही दिखी जा रही

2452
03:12:51,480 --> 03:12:56,120
है ना ना ना वेद खुद कह रहे हैं एकम सद विप्रा

2453
03:12:56,120 --> 03:13:00,400
बहुधा वदंती बहुधा शब्द का प्रयोग कर दिया वह तत्व

2454
03:13:00,400 --> 03:13:04,560
एक है उसको विद्वान अनेक प्रकार से कहते हैं विचार

2455
03:13:04,560 --> 03:13:08,760
हैं लिखते हैं बोलते हैं यही हमारे यहां एक बहुत बड़ा सौंदर्य

2456
03:13:08,760 --> 03:13:12,960
है कि सनातन काल से शास्त्रार्थ की जो परंपरा है उपनिषदों

2457
03:13:12,960 --> 03:13:17,160
में हम लोग पढ़ते हैं महर्षि याज्ञवल्क्य के यहां किस प्रकार से शास्त्रार्थ

2458
03:13:17,160 --> 03:13:21,200
की परंपरा थी भगवान शंकराचार्य का मिथिला का शास्त्रार्थ प्रसिद्ध

2459
03:13:21,200 --> 03:13:25,200
है दक्षिण भारत में शास्त्रार्थ की शास्त्रों में सुदीर घ परंपरा है

2460
03:13:25,200 --> 03:13:29,360
व्याकरण शास्त्र में इतनी भयंकर परंपरा है शास्त्र की कि आदमी उसको

2461
03:13:29,360 --> 03:13:33,480
देख कर के भाग जाए मैदान छोड़ कर के कि मुझे शास्त्रार्थ करना ही नहीं है ऐसी

2462
03:13:33,480 --> 03:13:37,680
स्थिति में आज जो यह पवित्र कृत्य यहां संपादित हुआ इसमें

2463
03:13:37,680 --> 03:13:42,040
जिन प्रतिभागियों ने यहां स्थान ग्रहण किया और इसको

2464
03:13:42,040 --> 03:13:46,280
सुंदरता प्रदान की इसको निष्कर्ष प्रदान किया यह शास्त्रार्थ परंपरा

2465
03:13:46,280 --> 03:13:50,280
भगवान करे यहां तो तीन दिन की बात हो रही थी मैं तो भगवान

2466
03:13:50,280 --> 03:13:54,120
से प्रार्थना करता हूं कि य शास्त्रार्थ 300 दिन चले कम से कम

2467
03:13:54,120 --> 03:13:58,120
तीन दिन नहीं चले जिसमें वेदों पर चर्चा हो पुराणों पर चर्चा हो

2468
03:13:58,120 --> 03:14:02,440
रामायण पर चर्चा हो महाभारत पर चर्चा हो और हमारे यहां तो इतनी

2469
03:14:02,440 --> 03:14:07,240
महत्त्वपूर्ण बात है यह भगवान वराह की भूमि है भगवान वराह

2470
03:14:07,240 --> 03:14:11,240
जिनको वैदिक सनातन धर्म अनाद काल से पूछता आ रहा है

2471
03:14:11,240 --> 03:14:15,240
मैं एक श्लोक लिख कर के लाया हूं वराह अवतार का उल्लेख

2472
03:14:15,240 --> 03:14:19,520
करते हुए एक शूक प्रस्तरा अभिलेख जो पांचवी

2473
03:14:19,520 --> 03:14:23,640
शताब्दी का है उसमें बहुत सुंदर श्लोक हमें प्राप्त होता है जिसमें

2474
03:14:23,640 --> 03:14:28,320
भगवान वराह की महिमा है इस अनुष श्लोक को आप लोग श्रवण कीजिए

2475
03:14:28,320 --> 03:14:32,400
यहां लिखा है जयति धरण धरण घण घणा

2476
03:14:32,400 --> 03:14:36,920
घात ूर्त महिद्र देवो वराह मूर्ति

2477
03:14:36,920 --> 03:14:41,000
त्रैलोक्य महा गृह स्तंभ यह एक शुकर

2478
03:14:41,000 --> 03:14:45,280
प्रस्त अभिलेख में भगवान बराह के ऊपर लिखा हुआ है और हम सब लोग तो

2479
03:14:45,280 --> 03:14:49,360
उस परंपरा के लोग हैं जहां सामने वाले को

2480
03:14:49,360 --> 03:14:53,360
बात कहने का इतनी स्वतंत्रता है और आश्चर्य की

2481
03:14:53,360 --> 03:14:57,560
बात देखिए आप हम सब लोग हिंदू है जो निर्गुण को पूछ रहे हैं वो भी हिंदू

2482
03:14:57,560 --> 03:15:01,600
है जो सगुण को पूछ रहे हैं वो भी हिंदू है और जो दोनों को नहीं पूछ रहा वो

2483
03:15:01,600 --> 03:15:05,680
भी हिंदू है वो कह रहा है मैं निर्गुण सगुण ईश्वर को मानता ही नहीं हूं तुम लोग लड़ते रहो

2484
03:15:05,680 --> 03:15:09,280
आपस में मेरा ईश्वर से कोई लेना देना नहीं है मैं पूछता ही नहीं हूं वह भी हिंदू

2485
03:15:09,280 --> 03:15:13,480
है यहां महात्मा कबीर दास हिंदू है या गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज

2486
03:15:13,480 --> 03:15:17,640
हिंदू हैं यहां सारे विचारों को लेकर के जिस प्रकार एक सुंदर

2487
03:15:17,640 --> 03:15:22,000
पुष्प स्तक तैयार हुआ है यही भारतीय दर्शन की परंपरा

2488
03:15:22,000 --> 03:15:26,000
आप देखिए हमारे अध्यक्ष जी कह रहे थे प्रारंभ में कि धर्म

2489
03:15:26,000 --> 03:15:30,240
की क्या परिभाषा है मैं ईमानदारी से इस बात को कह रहा हूं कि यदि आदमी

2490
03:15:30,240 --> 03:15:34,320
धर्म की परिभाषा इकट्ठी करने लगे तो ही कम से कम 100 200 धर्म की

2491
03:15:34,320 --> 03:15:38,640
परिभाषाएं हमको ग्रंथों में उपलब्ध होने लगेगी रामायण तानी धर्मानी

2492
03:15:38,640 --> 03:15:42,760
प्रथमा नि आसन वेद ने धर्म शब्द का प्रयोग बहुवचन में

2493
03:15:42,760 --> 03:15:47,320
किया है तानी धर्मानी प्रथमा नि आसन एकवचन में नहीं कर रहा

2494
03:15:47,320 --> 03:15:51,360
इसका मतलब अब वे जितने धर्म हैं वे सारे धर्म हनुमान

2495
03:15:51,360 --> 03:15:55,400
जी प्रतिपादित करते हैं राम जी करते हैं कृष्ण करते हैं अर्जुन करते हैं

2496
03:15:55,400 --> 03:15:59,520
युधिष्ठिर करते हैं व्यास करते हैं वाल्मीकि करते हैं हमारे आचार्य करते

2497
03:15:59,520 --> 03:16:03,800
हैं इसी से यह स्पष्ट है कि हम सब लोगों का परस्पर

2498
03:16:03,800 --> 03:16:07,960
सौहार्द बने और हम सब मिलकर के वह काम करें

2499
03:16:07,960 --> 03:16:12,040
जिससे वैदिक सनातन धर्म मजबूत हो हमारे विरोधियों को

2500
03:16:12,040 --> 03:16:16,080
हम सही उत्तर देते रहे इसीलिए हमारे यहां शास्त्र के निहितार्थ को

2501
03:16:16,080 --> 03:16:20,160
प्रकट करने के लिए लिए शास्त्रार्थ की परंपरा थी आप सब लोगों को मैं

2502
03:16:20,160 --> 03:16:24,560
प्रणाम करता हूं और परमपिता परमात्मा श्री वराह भगवान से प्रार्थना

2503
03:16:24,560 --> 03:16:28,800
करता हूं कि आप सबको और ऊर्जा दे और

2504
03:16:28,800 --> 03:16:32,880
शक्ति दे और शास्त्र में हम लोगों की मति लगे और इस प्रकार के शास्त्रार्थ

2505
03:16:32,880 --> 03:16:37,120
कार्यक्रम होते रहे मैं हमारे कुलपति महोदय को निवेदन कर रहा था य पास में गंगा

2506
03:16:37,120 --> 03:16:41,120
जी हैं किसी भक्त ने क्या कहा वो इतना अद्भुत है उसने कहा साहब

2507
03:16:41,120 --> 03:16:45,240
ना तो मैं साकार को मानता हूं ना मैं निराकार को मानता हूं तो पूछा

2508
03:16:45,240 --> 03:16:49,280
भाई फिर तुम किसको मानते हो तो उसने कहा निराकार

2509
03:16:49,280 --> 03:16:53,680
उपासम मैं तो इस निराकार गंगा की पूजा करता हूं

2510
03:16:53,680 --> 03:16:57,680
जो लोगों को जीवन देती है जल देती है तमाम फसले देती है

2511
03:16:57,680 --> 03:17:01,720
अब आप देखिए निराकार साकार निराकार यह गंगा को

2512
03:17:01,720 --> 03:17:05,840
पूजने वाला धर्म है यह गौ माता को पूजने वाला धर्म है यह

2513
03:17:05,840 --> 03:17:09,880
तुलसी को पूजने वाला धर्म है यह मिट्टी को पूजने वाला धर्म है यह

2514
03:17:09,880 --> 03:17:13,880
राम और कृष्ण को पूजने वाला धर्म है यह भीम और अर्जुन

2515
03:17:13,880 --> 03:17:17,920
को पूजने वाला धर्म है यह विवेकानंद रामानंद और दयानंद का

2516
03:17:17,920 --> 03:17:22,040
धर्म है यह धर्म बहुत बढ़े इसकी वृद्धि हो यही मैं

2517
03:17:22,040 --> 03:17:28,040
भगवान से प्रार्थना करता हूं जय जय

2518
03:17:30,440 --> 03:17:35,000
सीताराम आदरणीय श्री कौशल जी का बहुत-बहुत धन्यवाद

2519
03:17:35,000 --> 03:17:39,120
बहुत-बहुत आभार इस अतिथि

2520
03:17:39,120 --> 03:17:43,160
की श्रंखला में जिन्ह हम सुनने बैठे हैं और अपना

2521
03:17:43,160 --> 03:17:47,520
बहुत बेश कीमती समय निकाल कर के हमा हमारे

2522
03:17:47,520 --> 03:17:51,640
बीच में जो मध्य पधारे हैं अपने व्यस्ततम कार्यकाल में

2523
03:17:51,640 --> 03:17:55,800
से और इस अवस्था में भी आपके पास इतनी ऊर्जावान है कि रात तक

2524
03:17:55,800 --> 03:18:00,000
आप पहुंचे उसके बाद भी हमसे संवाद किया उसके बाद समय से पूर्व

2525
03:18:00,000 --> 03:18:04,320
यहां पहुंच गए उसके बाद निरंतर डटे हुए हैं आपकी ऐसी ऊर्जा

2526
03:18:04,320 --> 03:18:08,520
देख कर के हमें उत्साह बनता है हमें

2527
03:18:08,520 --> 03:18:12,520
प्रेरणा मिलती है ऐसे आदरणीय श्री कुलपति महोदय को

2528
03:18:12,520 --> 03:18:16,800
मैं आवा हैतू निवेदन करूंगा कि आप आए और

2529
03:18:16,800 --> 03:18:22,800
अपने शब्दों में आशीर्वचन प्रदान

2530
03:18:35,600 --> 03:18:39,840
करें गंगा तरंग रमणीय

2531
03:18:39,840 --> 03:18:42,640
जटा

2532
03:18:42,640 --> 03:18:47,440
कलाप गौरी निरंतर विभूषित

2533
03:18:47,440 --> 03:18:49,960
म

2534
03:18:49,960 --> 03:18:54,160
भागम नारायण प्रिय मन मदा

2535
03:18:54,160 --> 03:18:58,160
प हारम वाराणसी

2536
03:18:58,160 --> 03:19:02,320
पुर पतिम भज

2537
03:19:02,320 --> 03:19:06,640
विश्वनाथम वंदे बोध मयम नित्यम गुरुम

2538
03:19:06,640 --> 03:19:10,640
शंकर रूपिम यमा सतो हीव

2539
03:19:10,640 --> 03:19:16,640
क्रोप चंद्र सर्वत्र वंते

2540
03:19:22,560 --> 03:19:27,800
श्री नरहरी ज्योतिष शोध संस्थान के द्वारा

2541
03:19:27,800 --> 03:19:30,320
आयोजित

2542
03:19:30,320 --> 03:19:35,000
इस शूकर तीर्थ क्षेत्र

2543
03:19:35,000 --> 03:19:39,160
में आज इतने विद्वानों को देख कर के मन

2544
03:19:39,160 --> 03:19:44,400
में बहुत ही अलाद हो रहा है इस शास्त्रार्थ

2545
03:19:44,400 --> 03:19:47,640
स्पर्धा में

2546
03:19:47,640 --> 03:19:52,320
मंच पर विराजमान इस कार्यक्रम के अध्यक्ष

2547
03:19:52,320 --> 03:19:56,560
परम समा

2548
03:19:56,560 --> 03:20:00,360
आदरणीय पूर्व

2549
03:20:00,360 --> 03:20:05,120
न्यायाधीश माननीय उपाध्याय

2550
03:20:05,120 --> 03:20:09,600
जी इस मंच पर अनेक शास्त्रों

2551
03:20:09,600 --> 03:20:13,640
के निष्णात आचार्य भी विद्यमान

2552
03:20:13,640 --> 03:20:18,000
है शास्त्री कौशलेंद्र दास जो जगतगुरु

2553
03:20:18,000 --> 03:20:22,560
रामानंद आचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के दर्शन संघ का अध्यक्ष हैं

2554
03:20:22,560 --> 03:20:26,680
वेद वेदांत पुराण इत्यादि पर आपके बहुत ही आपकी

2555
03:20:26,680 --> 03:20:31,240
दक्षता

2556
03:20:31,240 --> 03:20:36,360
है मंच पर विराजमान और

2557
03:20:36,360 --> 03:20:40,680
वक्ता जगतगुरु रामानंद आचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के वेद

2558
03:20:40,680 --> 03:20:43,120
विभागाध्यक्ष

2559
03:20:43,120 --> 03:20:47,720
डॉक्टर देवेंद्र शर्मा जी

2560
03:20:47,720 --> 03:20:50,960
इस क्षेत्र के परम

2561
03:20:50,960 --> 03:20:54,960
सम्मान दो वक्ता और बैठे हैं जिनसे मैं आज ही पहली बार

2562
03:20:54,960 --> 03:21:00,960
मिला हूं और शास्त्रार्थ

2563
03:21:01,960 --> 03:21:07,680
में चार संवर्ग में बैठे हुए अलग-अलग

2564
03:21:07,680 --> 03:21:11,720
अपने अपनी अपनी अपनी विधा के शास्त्रों में

2565
03:21:11,720 --> 03:21:15,800
नाथ आचार्य गण

2566
03:21:15,800 --> 03:21:19,880
इस सभा में उपस्थित इस तीर्थ क्षेत्र में

2567
03:21:19,880 --> 03:21:22,320
पधारे

2568
03:21:22,320 --> 03:21:26,920
हुए संस्कृत शास्त्र के अनुरागी गण

2569
03:21:26,920 --> 03:21:32,360
देवियों सज्जनों

2570
03:21:32,360 --> 03:21:36,800
बंधुओ सबसे पहले तो मैं आज बधाई दूंगा इन आचार्यों को

2571
03:21:36,800 --> 03:21:41,720
जिन्होंने अपनी अपनी मान्यता को बड़ी ही मजबूती

2572
03:21:41,720 --> 03:21:47,720
से बहुत ही बलव पूर्ण ढंग से स्थापित किया

2573
03:21:47,840 --> 03:21:51,840
वह चाहे जिस भी सिद्धांत के समर्थक रहे

2574
03:21:51,840 --> 03:21:56,080
हो लेकिन सब लोगों ने अपनी अपनी बात

2575
03:21:56,080 --> 03:22:02,080
को

2576
03:22:02,800 --> 03:22:07,760
रखा एक बार ऐसा

2577
03:22:07,760 --> 03:22:13,000
हुआ कि महासागर से निकल कर के एक

2578
03:22:13,000 --> 03:22:17,320
मेढक बाहर निकल आया और एक कुए में जाकर के गिर

2579
03:22:17,320 --> 03:22:21,400
पड़ा कुएं में बैठे हुए जितने मेढक थे उन्होंने

2580
03:22:21,400 --> 03:22:25,760
पूछा भाई साहब आप कहां से आए उन्होंने कहा कि मैं महासागर

2581
03:22:25,760 --> 03:22:30,520
से आया हूं कहाय क्या होता है

2582
03:22:30,520 --> 03:22:35,920
महासागर कहा रे महासागर आप नहीं समझोगे आप उप मंडूक

2583
03:22:35,920 --> 03:22:39,960
हो बहुत अगाध अनंत है महासागर हम वहां

2584
03:22:39,960 --> 03:22:44,560
से आ रहे हैं तो एक मेढक उस कुए में दौड़ा

2585
03:22:44,560 --> 03:22:48,720
थोड़ी देर ऊपर नीचे नीचे ऊपर इधर उधर गया

2586
03:22:48,720 --> 03:22:52,720
कहा इतना बड़ा होगा तुम्हारा महासागर अरे कहा क्या

2587
03:22:52,720 --> 03:22:57,400
कमाल करते हो बहुत बड़ा है महासागर हमारा

2588
03:22:57,400 --> 03:23:01,400
तो एक दूसरा मठक करीब 10 मिनट उस कुए में ऊपर से नीचे नीचे से

2589
03:23:01,400 --> 03:23:06,520
ऊपर दौड़ता रहा कहा इतना बड़ा होगा

2590
03:23:06,520 --> 03:23:10,680
फिर उसने संतोष नहीं व्यक्त किया तो तीसरे ने कहा तीसरा

2591
03:23:10,680 --> 03:23:15,000
जो कूप मंडूक था वो दौड़ा आधे घंटे तक जब थक गया

2592
03:23:15,000 --> 03:23:19,680
तो उसने कहा कि अब इससे तुम्हारा महासागर नहीं हो

2593
03:23:19,680 --> 03:23:23,600
सकता हम सारे लोग

2594
03:23:23,600 --> 03:23:28,040
कहीं ना कहीं किसी एक शास्त्र में बधे पड़े हुए

2595
03:23:28,040 --> 03:23:33,040
हैं हमारा शास्त्र अनंत है

2596
03:23:33,040 --> 03:23:37,200
हमारे वेद अपुष है अभी वेद की

2597
03:23:37,200 --> 03:23:41,880
चर्चा आचार्यों ने की हम लोग पढ़ते हैं कि यह वेद

2598
03:23:41,880 --> 03:23:46,440
तस निस उस परमात्मा से निस

2599
03:23:46,440 --> 03:23:50,640
ग वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद इत्यादि है जो कि

2600
03:23:50,640 --> 03:23:55,280
सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा को मिलता है और ब्रह्मा त

2601
03:23:55,280 --> 03:23:59,280
स्वरूप सृष्टि करता है ऐसी मान्यता हम लोग

2602
03:23:59,280 --> 03:24:03,560
सुनते

2603
03:24:03,560 --> 03:24:07,720
हैं देखिए शास्त्रों को समझने के लिए हम लोग

2604
03:24:07,720 --> 03:24:11,920
प्रमाणों का आश्रय लेते हैं इसीलिए जो बड़े विद्वान

2605
03:24:11,920 --> 03:24:16,920
होते हैं उनको कहते हैं पद वाक्य प्रमाण

2606
03:24:16,920 --> 03:24:20,960
कोई शब्द से समझता है जब शब्द से समझ नहीं आता

2607
03:24:20,960 --> 03:24:25,280
तो वाक्य का अर्थ संगत करता है

2608
03:24:25,280 --> 03:24:29,840
और तब भी नहीं समझ में आता तो वह प्रमाणों को खोजता है

2609
03:24:29,840 --> 03:24:33,880
और प्रमाणों के विषय में हमारे शास्त्रों में भी कोई

2610
03:24:33,880 --> 03:24:37,960
एक प्रमाण मानता है प्रत्यक्ष कोई दो प्रमाण मानता है

2611
03:24:37,960 --> 03:24:42,400
प्रत्यक्ष अनुमान कोई तीन मानता है जैसे सांख्य

2612
03:24:42,400 --> 03:24:46,400
दर्शन वाले हैं व प्रत्यक्ष अनुमान और उपमान

2613
03:24:46,400 --> 03:24:51,240
नैया को ने कहा कि नहीं प्रत्यक्ष अनुमान उपमान और शब्द

2614
03:24:51,240 --> 03:24:55,440
मी मांस को ने कहा कि नहीं हम दो प्रमाण और मानेंगे अर्था

2615
03:24:55,440 --> 03:25:00,000
पति और आप लोग सुन नहीं रहे हमारी बात

2616
03:25:00,000 --> 03:25:04,200
मैं आप लोगों को अपनी मंतव्य अपना

2617
03:25:04,200 --> 03:25:08,400
मंतव्य जो है व सुना रहा हूं और पौराण

2618
03:25:08,400 --> 03:25:13,000
कों ने कहा कि नहीं हम तो आठ प्रमाण मानेंगे तो

2619
03:25:13,000 --> 03:25:17,080
देखिए पुराणों में क्या लिखा हुआ है इसको सुन कर के

2620
03:25:17,080 --> 03:25:18,720
केवल एक पंक्ति से उसका

2621
03:25:18,720 --> 03:25:24,720
निर्णय कर लेना मुझे ऐसा लगता है कि यह

2622
03:25:24,800 --> 03:25:30,680
हमारी निष्पक्ष निर्णायक भूमिका नहीं नहीं

2623
03:25:30,680 --> 03:25:34,720
होगी ए परा विद्या और अपरा विद्या अपरा

2624
03:25:34,720 --> 03:25:38,800
विद्या के द्वारा हम परा विद्या की प्राप्ति करते हैं यह अपरा

2625
03:25:38,800 --> 03:25:42,880
विद्या से हम सामान्य ज्ञान करते हैं और परा विद्या से हम

2626
03:25:42,880 --> 03:25:47,000
विशेष ज्ञान करते हैं श्रीमद् भगवत गीता का वह श्लोक आप लोगों याद है

2627
03:25:47,000 --> 03:25:51,880
बड़े बड़े विद्वान यहां बैठे हैं उन्होंने कहा कि सगा नामद

2628
03:25:51,880 --> 03:25:56,760
रत मध्यम चव अ

2629
03:25:56,760 --> 03:26:01,200
अर्जुन अध्यात्म विद्या विद्या नाम

2630
03:26:01,200 --> 03:26:03,680
वाद

2631
03:26:03,680 --> 03:26:08,000
प्रवता वाद भगवान कृष्ण ने कहा कि सर्ग

2632
03:26:08,000 --> 03:26:12,960
का मैं सृष्टि का आदि अंत और मध्य में ही हूं

2633
03:26:12,960 --> 03:26:17,320
विद्याओ में मैं अध्यात्म विद्या हूं और शास्त्रार्थ

2634
03:26:17,320 --> 03:26:21,680
की जहां परंपरा चलती हो वहां मैं क्या हूं वाद

2635
03:26:21,680 --> 03:26:25,800
हूं लेकिन जब हम विजय प्राप्त करने की इच्छा

2636
03:26:25,800 --> 03:26:30,040
से शास्त्रार्थ करते हैं तो वहां वाद के साथ साथ हम जल्प

2637
03:26:30,040 --> 03:26:33,920
का भी आश्रय लेते हैं विंडा का भी आश्रय लेते हैं हमें

2638
03:26:33,920 --> 03:26:38,320
शास्त्रों को पढ़ना पड़ेगा गीता में भगवान कृष्ण ने यह भी कहा

2639
03:26:38,320 --> 03:26:42,400
कि बुद्धिमान का य दायित्व है कि सामान्य ज्ञान रखने वाले लोगों को

2640
03:26:42,400 --> 03:26:46,600
दि भ्रमित ना होने दे तो यह शास्त्र

2641
03:26:46,600 --> 03:26:50,800
का परम कर्तव्य है कि सभी शास्त्रों का समन्वय ठीक

2642
03:26:50,800 --> 03:26:54,840
से करें और समन्वय के बाद केवल अपनी बात को मानने के

2643
03:26:54,840 --> 03:26:59,000
लिए अपनी बात को मनवाने के लिए ऐसे तर्क ना करें जो

2644
03:26:59,000 --> 03:27:03,440
कि जनता जनार्दन में मतभेद पैदा करें संदेह

2645
03:27:03,440 --> 03:27:07,640
पैदा करे और शास्त्रों के प्रति

2646
03:27:07,640 --> 03:27:12,120
हमारी आस्था को कमजोर कर दे

2647
03:27:12,120 --> 03:27:16,360
तो मेरा ये निवेदन है आचार्यों से शास्त्रार्थ अपनी

2648
03:27:16,360 --> 03:27:20,480
परंपरा के अनुसार जरूर करें लेकिन जब किसी दूसरे के मतवाद

2649
03:27:20,480 --> 03:27:24,760
को खंडन करना हो तो खंडन करते समय बहुत सारी बातों का ध्यान

2650
03:27:24,760 --> 03:27:29,040
रखा करें श्रोताओं का इस सभागार में अथवा किसी भी सभागार

2651
03:27:29,040 --> 03:27:33,080
में बैठे हुए लोगों का उनकी मान्यताओं क्योंकि यह सारी

2652
03:27:33,080 --> 03:27:37,200
मान्यताएं लोगों के मन में न जाने कब से बध मूल है यह इतनी

2653
03:27:37,200 --> 03:27:41,280
जल्दी किसी एक मतवाद को मानने वाले विद्वान

2654
03:27:41,280 --> 03:27:45,320
के कहने से ये हिलने वाली नहीं तो यह हमारा परम

2655
03:27:45,320 --> 03:27:49,560
दायित्व होना चाहिए हमने शास्त्रार्थ के बहुत सारे उदाहरण

2656
03:27:49,560 --> 03:27:53,760
देखे शास्त्रों में जहां यावल की चर्चा आई

2657
03:27:53,760 --> 03:27:58,240
जहां भगवान शंकराचार्य और मंडन मिश्र की चर्चा आई

2658
03:27:58,240 --> 03:28:02,720
शास्त्रार्थ में तो इस प्रकार के कुछ न कुछ वाक्य कहने ही पड़ते हैं

2659
03:28:02,720 --> 03:28:07,000
कि अपने आपको को हम बलवान दिखाई दिखाए और दूसरों

2660
03:28:07,000 --> 03:28:11,360
को कमजोर दिखाई दिखाए लेकिन शास्त्रार्थ में भी

2661
03:28:11,360 --> 03:28:15,480
जो हमारे श्रुति मूलक तर्क है उन श्रुति मूलक तर्को को हम कभी भी

2662
03:28:15,480 --> 03:28:20,120
लांजल नहीं दे सकते तर्क वही है जो श्रुति हों के अनुकूल

2663
03:28:20,120 --> 03:28:24,440
जो वेदों के अनुकूल हो वो तर्क है हमें शास्त्रार्थ में उन तर्को

2664
03:28:24,440 --> 03:28:28,960
का भी आश्रय लेना पड़ेगा हमेशा हमें उन तर्कों का ध्यान देना पड़ेगा

2665
03:28:28,960 --> 03:28:33,760
तो बहुत ही आनंद आया बड़े बड़े विद्वानों को सुन कर के आज मन में

2666
03:28:33,760 --> 03:28:38,120
बहुत ही संतोष हुआ हमारी यह परंपरा आगे बढ़ती चले

2667
03:28:38,120 --> 03:28:42,200
हम अपनी बात को इसी मजबूती से रखते चले लेकिन इस बात

2668
03:28:42,200 --> 03:28:46,480
का जरूर ध्यान रखें कि हमारी जो सनातन पद्धति है सनान

2669
03:28:46,480 --> 03:28:50,680
क्या है सनातन के बारे में भी लोगों को भ्रमित नहीं होना

2670
03:28:50,680 --> 03:28:55,880
चाहिए भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा

2671
03:28:55,880 --> 03:29:00,040
अव नित्य सर्वय सनातन य

2672
03:29:00,040 --> 03:29:04,120
आत्म तत्व ही सनातन है ये हम इसको

2673
03:29:04,120 --> 03:29:08,280
जीव को आत्मा को सृष्टि को जगत को

2674
03:29:08,280 --> 03:29:12,280
ईश्वर को परमात्मा को इन सब में एक समन्वय की दृष्टि से जब

2675
03:29:12,280 --> 03:29:16,440
चलेंगे तब हम शास्त्र के निश्चितार्थम

2676
03:29:16,440 --> 03:29:20,680
की शास्त्रार्थ का तात्पर्य ही हुआ कि शास्त्र का

2677
03:29:20,680 --> 03:29:23,160
निश्चितार्थम

2678
03:29:23,160 --> 03:29:27,280
को बैठने जानने बैठे हैं दो लोगों की लड़ाई देखने के लिए

2679
03:29:27,280 --> 03:29:32,080
हम नहीं बैठे अभी मैं कहीं पढ़ रहा था एक बार

2680
03:29:32,080 --> 03:29:35,720
महाराज जनक के दरबार

2681
03:29:35,720 --> 03:29:39,800
में एक समस्या आई महाराज जनक ने एक दिन स्वप्न

2682
03:29:39,800 --> 03:29:44,120
देखा उन्होंने स्वप्न देखा कि मेरा राज्य छिन

2683
03:29:44,120 --> 03:29:48,480
गया और मैं भीख मांगने लगा और भीख मांग कर के किसी जगह

2684
03:29:48,480 --> 03:29:52,520
खिचड़ी बनाया खिचड़ी खाने जैसे ही चले हो वैसे ही

2685
03:29:52,520 --> 03:29:56,560
दो सा लड़ते हुए आए और उस खिचड़ी पर चढ़ बैठे

2686
03:29:56,560 --> 03:30:01,360
और महाराज जनक खिचड़ी भी नहीं खा पाए स्वप्न में

2687
03:30:01,360 --> 03:30:05,560
और जैसे ही उन्होंने अपनी तलवार निकाला वैसे

2688
03:30:05,560 --> 03:30:09,560
ही जाग गए जब जाग गए तो देखा कि उण भी नहीं है

2689
03:30:09,560 --> 03:30:10,880
ना खिचड़ी ही है

2690
03:30:10,880 --> 03:30:15,240
वो तो अपने सेना गार में बैठे हुए हैं फिर उन्होंने आकर

2691
03:30:15,240 --> 03:30:19,440
के अपनी राज स में विद्वानों के सामने प्रश्न किया कहा कि सत्य यह

2692
03:30:19,440 --> 03:30:23,640
है कि सत्य वो है और जो बताएगा

2693
03:30:23,640 --> 03:30:27,760
उसको पुरस्कृत किया जाएगा और जो ना बताएगा जो विद्वान उसको

2694
03:30:27,760 --> 03:30:31,960
तब तक य नजर बंद रखा जाएगा जब तक व बता ना दे सारे

2695
03:30:31,960 --> 03:30:35,960
विद्वान आते थे वह बताते थे कि सत्य यह है कि सत्य व

2696
03:30:35,960 --> 03:30:40,080
है अब सत्य यह है कि सत्य व है पता

2697
03:30:40,080 --> 03:30:44,360
नहीं क्या सत्य है जान ही नहीं पाते थे इसी

2698
03:30:44,360 --> 03:30:48,440
बीच अ महाशय वहां पहुंचे उनसे भी उनसे

2699
03:30:48,440 --> 03:30:52,720
पूछा गया कि बताइए सत्य यह है कि सत्य उन्होंने कहा ना सत्य

2700
03:30:52,720 --> 03:30:56,880
यह है ना सत्य व है कहा

2701
03:30:56,880 --> 03:31:01,160
क्यों सत्य कोई नहीं है कहा नहीं जब आप स्वपन

2702
03:31:01,160 --> 03:31:05,520
में थे तो सत्य वह था जो जागते ही खंडित

2703
03:31:05,520 --> 03:31:10,080
हो गया तो न सत्य व था जो आपने स्वपन में देखा

2704
03:31:10,080 --> 03:31:14,240
और ना सत्य ये है जो आप जागरण में देखे तो

2705
03:31:14,240 --> 03:31:18,760
सत्य क्या है इसको जाने के लिए हमें शास्त्रों का अध्ययन करना पड़ेगा

2706
03:31:18,760 --> 03:31:23,400
हम वेदों को जानने के लिए जो सड वेद

2707
03:31:23,400 --> 03:31:25,920
हम कहते हैं हम चतुर्दस शास्त्रों का

2708
03:31:25,920 --> 03:31:30,120
अध्ययन करते हैं क्यों क्योंकि वेदों का हम निहितार्थ वेदों

2709
03:31:30,120 --> 03:31:34,280
का मंत्रा वेदों का अक्षरा अथ वेदों के

2710
03:31:34,280 --> 03:31:38,360
निहितार्थ क्या है और वेदार्थ क्या है हम वेदार्थ को

2711
03:31:38,360 --> 03:31:42,560
समझने के लिए एक एक अक्षर समझे एक एक शब्द समझे एक

2712
03:31:42,560 --> 03:31:46,560
एक मंत्र वाक्य समझे तब जाकर के हम कभी निहितार्थ

2713
03:31:46,560 --> 03:31:50,920
को समझ पाएंगे अथवा हम एकांगी होकर के किसी एक वाक्य

2714
03:31:50,920 --> 03:31:55,040
को पकड़ कर के बैठे रह जाएंगे और हम जनता के साथ न्याय

2715
03:31:55,040 --> 03:31:59,360
नहीं कर पाएंगे कि हमारा शास्त्र वस्तुत कहता क्या है

2716
03:31:59,360 --> 03:32:03,360
तो मेरा यह विचार है मैं आप लोगों से अनुरोध करता

2717
03:32:03,360 --> 03:32:07,440
हूं कि जितने भी विद्वान यहां बैठे हैं बहुत ही निर्लिप्त भाव से एक बार

2718
03:32:07,440 --> 03:32:12,000
पहले सारे शास्त्रों का अध्ययन कर ले चाहे वो जिस भी

2719
03:32:12,000 --> 03:32:16,280
मतवाद का शास्त्र हो चाहे वो अद्वैत का हो चाहे द्वैत का हो चाहे द्वता

2720
03:32:16,280 --> 03:32:21,040
दत का हो विशिष्टा दैत का हो साी सभी मतवाद को एक बार पढ़े

2721
03:32:21,040 --> 03:32:25,600
पढ़ कर के फिर निश्चय पर पहुंचे कि जो उनका मत है वो क्या है

2722
03:32:25,600 --> 03:32:29,760
अगर अन्य मतवाद को बिना पढ़े केवल अपने मतवाद पर रुके

2723
03:32:29,760 --> 03:32:34,080
रहेंगे तो मेरी समझ से वो शास्त्र के साथ न्याय नहीं होगा

2724
03:32:34,080 --> 03:32:38,280
विद्यार्थियों के साथ न्याय नहीं होगा जनता जनार्दन के साथ न्याय नहीं होगा

2725
03:32:38,280 --> 03:32:41,440
और शास्त्रों के साथ बहुत बड़ा अन्याय हो

2726
03:32:41,440 --> 03:32:45,840
विभेद अल्पता वेद वेद डरता है जो अल्प शत है

2727
03:32:45,840 --> 03:32:50,280
जिनको कम आता है उनसे तो वेद ही डरता है कि कहीं यह मुझ पर ही प्रहार ना कर दे

2728
03:32:50,280 --> 03:32:54,600
तो हम पहले वेदों पर पढ़े हम जो देखते हैं वही सत्य नहीं

2729
03:32:54,600 --> 03:32:58,600
ना सत्य ये है ना सत्य वो है कैसे सृष्टि होगी

2730
03:32:58,600 --> 03:33:02,640
इसको कैसे हम जान सकते हैं सृष्टि का यह विष यह

2731
03:33:02,640 --> 03:33:06,800
सृष्टि ही अगर हम जान जाते तो इस बंधन में हम फसे रहते क्या

2732
03:33:06,800 --> 03:33:11,160
सृष्टि से बचने का हमें उपाय मिल जाता तो इस संसार को जानना

2733
03:33:11,160 --> 03:33:15,320
बड़ा रहस्य है हमारे जितने भी मतवाद हुए इसी संसार को जानने के लिए

2734
03:33:15,320 --> 03:33:19,320
ही तो हुए तो लेकिन सब में एक बात जो रही वो बड़ी कॉमन

2735
03:33:19,320 --> 03:33:23,480
रही कि हम अनुशासन में रहते हैं जब हम व्याकरण शास्त्र

2736
03:33:23,480 --> 03:33:27,520
पढ़ते हैं तो कहते हैं अथ शब्दा अनुशासनम जब हम योगशास्त्र पढ़ते हैं

2737
03:33:27,520 --> 03:33:31,640
तो कहते हैं अथ योगा अनुशासनम हम एक अनुशासन में रहे लेकिन

2738
03:33:31,640 --> 03:33:35,680
पहले सारे शास्त्रों का अध्ययन तो कर ले बिना सारे शास्त्रों का अध्ययन

2739
03:33:35,680 --> 03:33:41,240
किए अगर हम इसी तरह से अपनी बातों को करते रहेंगे तो

2740
03:33:41,240 --> 03:33:46,080
निश्चितार्थम अपनी वाणी को विराम दूंगा बड़े बड़े आचार्य यहां आए

2741
03:33:46,080 --> 03:33:50,080
उनकी बात को सुन कर के बहुत आनंद हुआ सब लोगों ने बहुत अच्छी तरह से

2742
03:33:50,080 --> 03:33:54,480
अपना अपना पक्ष रखा और कोई काटने वाला नहीं है

2743
03:33:54,480 --> 03:33:56,680
यह अलग बात है कि किसी की

2744
03:33:56,680 --> 03:34:00,920
शब्दावली में कोई परता रही हो यह अलग बात है कि कोई किसी को खंडन

2745
03:34:00,920 --> 03:34:05,400
करने के लिए शास्त्रार्थ के नियमों को भूल गया हो यह अलग बात है

2746
03:34:05,400 --> 03:34:09,400
कि अपनी बातों को सुनने पर अपने विपक्ष में सुनने पर उसको

2747
03:34:09,400 --> 03:34:13,840
क्रोध आ गया हो यह सारी बातें तो एक मानव स्वभाव के अंतर्गत

2748
03:34:13,840 --> 03:34:17,960
है आप लोगों ने शास्त्र सुना होगा जब शंकराचार्य और

2749
03:34:17,960 --> 03:34:22,200
मंडन के शास्त्रार्थ में निर्णायक की भूमिका में मंडन की पत्नी थी

2750
03:34:22,200 --> 03:34:26,360
उन्होंने दो माला पहना दिया था और अंत में उन्होंने निर्णय इस बात

2751
03:34:26,360 --> 03:34:30,560
पर किया कि क्रोध किसको आ गया जिसको क्रोध आया उसकी माला

2752
03:34:30,560 --> 03:34:34,640
सूख गई तो हम लोग शास्त्रार्थ में क्रोध ना करें हम

2753
03:34:34,640 --> 03:34:38,920
लोग शास्त्रार्थ में किसी एक सिद्धांत के प्रति इतने

2754
03:34:38,920 --> 03:34:43,000
आसक्त भी ना हो जाए अन्य सिद्धांतों को स्वीकार करने की उनको सुनने की

2755
03:34:43,000 --> 03:34:47,440
भी जो मर्यादा है उसको छोड़ दे में आप लोग बड़े निषा

2756
03:34:47,440 --> 03:34:51,480
है लेकिन मुझे क्योंकि बोलने के लिए कहा गया मुझे जो समझ

2757
03:34:51,480 --> 03:34:55,640
में आया मैंने अपनी बात रखी आप लोगों को बहुत बहुत धन्यवाद

2758
03:34:55,640 --> 03:35:00,000
और यह शास्त्रार्थ परंपरा चलती रहे मैं मां गंगा से प्रार्थना करता हूं

2759
03:35:00,000 --> 03:35:04,320
कि इस तरह के आयोजन शुभम जी उपाध्याय जी करते रहे

2760
03:35:04,320 --> 03:35:08,760
और अपने शास्त्रों के सभी पक्षों को विविध पक्षों को सुनते रहे

2761
03:35:08,760 --> 03:35:11,800
क्योंकि जब तक सभी पक्षों को नहीं सुनेंगे तब तक

2762
03:35:11,800 --> 03:35:16,000
हम निर्णय पर नहीं पहुंचेंगे एक बार इसी तरह से एक

2763
03:35:16,000 --> 03:35:20,160
अपने गुरु जी के पास गया उसने कहा गुरु जी एक वेदांत का सिद्धांत

2764
03:35:20,160 --> 03:35:24,480
है समझ में नहीं आया कहा क्यों नहीं समझ में आया कहा एक आचार्य

2765
03:35:24,480 --> 03:35:28,920
के पास गया मैं उन्होंने इस प्रकार समझाया तो उन्होने कहा उन्होंने ठीक

2766
03:35:28,920 --> 03:35:33,080
समझाया कहा लेकिन दूसरे आचार्य के पास गया तो उन्होंने उसका विरुद्ध समझा

2767
03:35:33,080 --> 03:35:37,160
दिया कहा उन्होंने भी ठीक समझाया कहा ये कैसे हो सकता है दोनों

2768
03:35:37,160 --> 03:35:41,400
विरुद्ध बातें कहा तुम भी ठीक कह रहे हो तो

2769
03:35:41,400 --> 03:35:45,400
सब आदमी ठीक ही कह रहे हैं ऐसा नहीं हो सकता कि सब लोग ठीक कह रहे

2770
03:35:45,400 --> 03:35:49,560
हैं ठीक तो कोई एक होगा इसलिए हमें अध्ययन करना पड़ेगा

2771
03:35:49,560 --> 03:35:53,720
अध्ययन करने के बाद ही हम शास्त्रों पर चैलेंज कर सकते हैं अन्यथा नहीं

2772
03:35:53,720 --> 03:35:58,200
अन्यथा तो सारी बातें ठीक है आज यह मंच इसलिए भी बड़ा समर्थ रहा

2773
03:35:58,200 --> 03:36:02,480
यहां बड़े बड़े न्यायाधीश बैठे रहे जो बड़ी उलझी हुई गुयों को समझाते

2774
03:36:02,480 --> 03:36:06,640
रहे सुलझा रहे और उन्होंने शास्त्रों में भी

2775
03:36:06,640 --> 03:36:10,680
आज प्रवेश करके किस प्रकार से आप लोगों के साथ संवाद

2776
03:36:10,680 --> 03:36:14,880
किया आप लोगों ने देखा तो ये शास्त्रार्थ वाद है

2777
03:36:14,880 --> 03:36:18,960
विवाद नहीं यह संवाद है इसमें प्रतिवाद

2778
03:36:18,960 --> 03:36:23,240
नहीं है हमें वादे वादे जाते तत्व बोध का हमेशा ध्यान

2779
03:36:23,240 --> 03:36:27,640
रखना पड़ेगा तभी हम अपने विषय का ठीक से स्थापन कर पाएंगे

2780
03:36:27,640 --> 03:36:33,640
बहुत धन्यवाद नमो

2781
03:36:35,400 --> 03:36:40,560
नम आदरणीय का बहुत-बहुत आभार बहुत-बहुत

2782
03:36:40,560 --> 03:36:44,640
धन्यवाद आपके वक्तव्य से एक

2783
03:36:44,640 --> 03:36:48,920
श्लोक मुझे या है यदा किंचित योह दप वव

2784
03:36:48,920 --> 03:36:52,960
मदान सवम यदा किंचित किंचित बुध जन

2785
03:36:52,960 --> 03:36:57,520
सका दव गतम तदा मूर्खो स्मति

2786
03:36:57,520 --> 03:37:02,080
ये जब हम थोड़ा थोड़ा जानते हैं एक

2787
03:37:02,080 --> 03:37:06,440
सीधी हिंदी में कहावत है कि थोथा चना और बाजे

2788
03:37:06,440 --> 03:37:10,640
घना तो जब आदमी थोड़ा थोड़ा कुछ कुछ कुछ कुछ जानने लगता है

2789
03:37:10,640 --> 03:37:15,000
तो उसको मद आ जाता है कि आहा हम सर्वज्ञ स्मति

2790
03:37:15,000 --> 03:37:19,080
उसको ये मद आ गया कि मैं सब कुछ जानता हूं यदा किंचित किंचित बुध

2791
03:37:19,080 --> 03:37:23,080
जन सका अवगत जब वो धीरे धीरे विद्वानों की शरण

2792
03:37:23,080 --> 03:37:27,640
में आप जैसे गुरुओं की शरण में जाने लगता है समझने लगता है

2793
03:37:27,640 --> 03:37:31,680
तब उसको पता चलता है अरे मैं तो मूर्ख हूं मैं अब तक तो क्या समझ रहा

2794
03:37:31,680 --> 03:37:36,040
था इसी प्रकार

2795
03:37:36,040 --> 03:37:40,120
आप आपके विषय में कहा जाए विद्वानों के विषय में कहा जाए

2796
03:37:40,120 --> 03:37:44,120
संतों के विषय में विद्वान ही संत है क्योंकि वो जो विद्वान वही है जो आचरण में

2797
03:37:44,120 --> 03:37:48,680
भी उतारे गंगा पापम शश

2798
03:37:48,680 --> 03:37:53,880
तापम दैन्यं कल्प तरस तथा

2799
03:37:53,880 --> 03:37:58,120
तापम दैन्यं कल्प तरस तथा पापम तापम

2800
03:37:58,120 --> 03:38:02,560
च दैन्यं च सद्य साधु समागमा

2801
03:38:02,560 --> 03:38:06,600
आपने जिस प्रकार वक्तव्य दिया कहते हैं कि गंगा पापम जो गंगा

2802
03:38:06,600 --> 03:38:11,200
मां है वह सारे पापों का हरण कर लेती है शशि तापम

2803
03:38:11,200 --> 03:38:15,200
चंद्रमा ठंडा होता है तो सारी ठंडक सारी गर्मी को विनट कर

2804
03:38:15,200 --> 03:38:19,760
दे और जो कल्पतरु होता है कल्पतरु के नीचे बैठ कर के जो भी

2805
03:38:19,760 --> 03:38:23,880
स्मरण किया जाए जो भी कामना की जाए वह सत्य हो जाती है ऐसे ही

2806
03:38:23,880 --> 03:38:27,920
आप गुरुओं के चरणा श्रय है आप गुरुओं के चरण

2807
03:38:27,920 --> 03:38:31,960
रज है जहां पर बैठ कर के पाप ताप और दीनता

2808
03:38:31,960 --> 03:38:36,080
सब विनट हो जाती है ऐसे श्री कुलपति महोदय का मैं पुनः पुनः

2809
03:38:36,080 --> 03:38:40,440
पन पुण्य स्वागत और धन्यवाद करता हूं नमन करता हूं वंदन

2810
03:38:40,440 --> 03:38:45,520
करता हूं अब क्योंकि

2811
03:38:45,520 --> 03:38:48,840
शास्त्रार्थ कार्यक्रम

2812
03:38:48,840 --> 03:38:53,400
अपने विश्राम की ओर है विश्राम ही कहेंगे क्योंकि पुनः

2813
03:38:53,400 --> 03:38:57,480
शास्त्रार्थ सत्र कभी ना कभी आरंभ होगा फिर दोबारा ऐसे विद्वानों का आगमन

2814
03:38:57,480 --> 03:39:01,800
होगा फिर वही चर्चाएं चलेंगी वही शास्त्रों का अवलो लोडन

2815
03:39:01,800 --> 03:39:06,720
होगा तो मैं इसी विश्राम की श्रंखला में

2816
03:39:06,720 --> 03:39:10,760
इस कार्यक्रम के सत अध्यक्ष

2817
03:39:10,760 --> 03:39:16,600
न्यायाधीश श्री एसस उपाध्याय जी को

2818
03:39:16,600 --> 03:39:20,880
निवेदन करता हूं कि वह अपने शब्दों में अध्यक्षीय

2819
03:39:20,880 --> 03:39:24,880
उद्बोधन तथा टीमों के प्रथम क्योंकि यह

2820
03:39:24,880 --> 03:39:29,160
बहुत बार आया है मैं दे रहा हूं प्रथम द्वितीय तृतीय

2821
03:39:29,160 --> 03:39:33,560
और चतुर्थ स्थान करें क्योंकि बहुत बार आया क्योंकि दो बार शास्त्रार्थ पहले भी हुआ

2822
03:39:33,560 --> 03:39:38,080
पूर्व में भी कहा कि अरे जब तक स्थान नहीं दिए तब तक तो कुछ वही वाली बात नहीं रही

2823
03:39:38,080 --> 03:39:42,200
तो जैसा आपने निर्णय किया है आपका निर्णय शर्माते

2824
03:39:42,200 --> 03:39:46,520
उसके बाद में क्या है कि जब निर्णय पता चल जाए उसके बाद में विवाद

2825
03:39:46,520 --> 03:39:50,560
उत्पन्न ना करें अपनी विद्युत का सज्जनता का परिचय दे पुनः जब

2826
03:39:50,560 --> 03:39:54,800
आगमन हो पुनः पधारे आप हमें बुलाए हम आपको बुलाए और इसी प्रकार

2827
03:39:54,800 --> 03:39:58,880
से कार्यक्रम चलता रहे यही मैं निवेदन करूंगा आदरणीय श्री अध्यक्ष

2828
03:39:58,880 --> 03:40:03,120
महोदय पहले ही बहुत विलंब हो चुका है हम दो शब्द बोल

2829
03:40:03,120 --> 03:40:04,120
के

2830
03:40:04,120 --> 03:40:08,120
खत्म करेंगे यह जो विद्वान विभूतियां बैठी

2831
03:40:08,120 --> 03:40:13,080
हैं इनका फिर से वंदन करता हूं अभिनंदन करता हूं

2832
03:40:13,080 --> 03:40:17,120
शास्त्रार्थ के लिए विद्वान ढूंढे नहीं मिलते

2833
03:40:17,120 --> 03:40:21,320
इन सबको हम अपने व जिसको कहते हैं साष्टांग

2834
03:40:21,320 --> 03:40:25,360
प्रणाम करूं कि यह विद्वान अपना समय अपना

2835
03:40:25,360 --> 03:40:29,680
संसाधन य करके यहां आए हैं सहमत या सहमत

2836
03:40:29,680 --> 03:40:33,800
का कुछ अर्थ नहीं है यह भारतीय सभ्यता संस्कृत

2837
03:40:33,800 --> 03:40:38,320
सनातन धर्म भारतीय दर्शन अनंत आकाश

2838
03:40:38,320 --> 03:40:42,560
है यह दूसरे मजहब जैसा यह सीमित नहीं है संकुचित

2839
03:40:42,560 --> 03:40:47,040
नहीं है यही ब्यूटी है यही है यही पिकटी

2840
03:40:47,040 --> 03:40:51,160
है सनातन सभ्यता संस्कृत की विमत हम मत

2841
03:40:51,160 --> 03:40:55,320
विमत कुमत सबको सम्मान देते हैं आस्तिक नास्तिक सब

2842
03:40:55,320 --> 03:40:59,840
मिलकर के सनातन व्यवस्था सनातन सभ्यता का निर्माण करते हैं

2843
03:40:59,840 --> 03:41:03,840
चारवा जमीन और यह बताइए आचार्य

2844
03:41:03,840 --> 03:41:08,160
जी दूसरे तीसरे हमारे व जो हा यह सब

2845
03:41:08,160 --> 03:41:12,680
मिलकर के हमारी भारतीय जो वो है संस्कृति

2846
03:41:12,680 --> 03:41:16,800
उसका निर्माण कहते हैं हम नास्तिक मत को भी उतना ही सम्मान देते

2847
03:41:16,800 --> 03:41:19,160
हैं जितना आस्तिक मत को

2848
03:41:19,160 --> 03:41:23,680
तो कणाद ऋषि जैमिनी चारवा

2849
03:41:23,680 --> 03:41:27,800
ये हमारे वैदिक युगीन प्रवर्तक है नास्तिक मत के हमारे लिए

2850
03:41:27,800 --> 03:41:32,320
उतने ही प्रणम में हैं निराकार बाद में विश्वास करने वाले

2851
03:41:32,320 --> 03:41:36,520
हमारे पूज्य प्रात स्मरणीय स्वामी दयानंद सरस्वती उतने

2852
03:41:36,520 --> 03:41:40,800
ही ग्राह हैं जितना हमारे शंकराचार्य है हमें अपनी सोच

2853
03:41:40,800 --> 03:41:45,000
को व्यापक करना होगा नहीं विधर्मी तो हात लगाए बैठे

2854
03:41:45,000 --> 03:41:49,160
ही कि आप लड़ इसी में कि सहकारी है कि

2855
03:41:49,160 --> 03:41:53,360
निराकाल हो जाइए इसको व्यापक सोच बनाना है

2856
03:41:53,360 --> 03:41:57,360
शास्त्रार्थ कराने का तात्पर्य यही है कि हम संकुचित दायरों

2857
03:41:57,360 --> 03:42:01,400
से बाहर निकले मैं प्रणाम करता हूं सारे आचार्यों को विद्वानों

2858
03:42:01,400 --> 03:42:06,240
को कि उन्होंने अपनी भूमिका का आज बहुत बढ़िया निर्वाह किया है

2859
03:42:06,240 --> 03:42:10,240
कुछ कमिया होंगी कुछ उत्तेजना आई होगी इसका मतलब

2860
03:42:10,240 --> 03:42:14,360
है कि उनको कहीं कहीं लगाव है अपनी परंपरा का बिल्कुल

2861
03:42:14,360 --> 03:42:18,440
बेबाक वेचन करना और किसी और श्रेष्ठ सत्य और निष्कर्ष पर

2862
03:42:18,440 --> 03:42:22,560
पहुंचना चाहते हैं जो शास्त्रार्थ का उद्देश्य होता है अंतिम लक्ष्य

2863
03:42:22,560 --> 03:42:26,920
इस अंतिम लक्ष्य की प्राप्त के लिए सबने अपनी अपनी

2864
03:42:26,920 --> 03:42:31,240
भूमिका का निर्वाह किया फिर से प्रणाम करता हूं ये शुभम मिश्रा

2865
03:42:31,240 --> 03:42:34,200
इतना बढ़िया व्यवस्था किए हैं इतना तो मैं लखनऊ में नहीं

2866
03:42:34,200 --> 03:42:38,280
कर पाता लेडी लेडी जो पीछे दिखा रहे थे तो इनसे तो

2867
03:42:38,280 --> 03:42:42,440
देख कर के मैं सीख के जा रहा हूं कि ये सब जितना इन्होंने बढ़िया

2868
03:42:42,440 --> 03:42:46,600
किया एक से एक दर्शन के विद्वान आदरणीय कुलपति महोदय

2869
03:42:46,600 --> 03:42:50,960
जज साहब लोग हमारे सुधाकर जज साहब जी जए

2870
03:42:50,960 --> 03:42:55,240
इन सबको बुला लेना एक मंच पर बड़ा य कठिन कार्य है

2871
03:42:55,240 --> 03:42:59,720
सबके बस का नहीं है इसलिए आचार्य शुभम मिश्रा उनकी पूरी टीम को

2872
03:42:59,720 --> 03:43:04,000
और उनके यहां मार्गदर्शक जज साहब पारा सर जी को सबको

2873
03:43:04,000 --> 03:43:08,120
बहुत-बहुत साधुवाद बहुत-बहुत नमन इन्हीं शब्दों के साथ फिर से

2874
03:43:08,120 --> 03:43:12,320
मिलने की आकांक्षा करता हुआ एक और घोषणा करूं कि दो

2875
03:43:12,320 --> 03:43:17,200
या 9 मार्च को लखनऊ में मैं जैसे प्रतिवर्ष करता हूं शास्त्रार्थ

2876
03:43:17,200 --> 03:43:21,320
आयोजन इस साल करूंगा मैं तो 22 फरवरी को करने वाला था हर

2877
03:43:21,320 --> 03:43:25,480
साल फरवरी में करता हूं शुभम मिश्रा जी के यहां विवाह है

2878
03:43:25,480 --> 03:43:29,560
इनके कारण मैंने शास्त्रार्थ का कार्यक्रम दो तारीख बढ़ाया

2879
03:43:29,560 --> 03:43:33,560
है एक वहां बड़े श्रेष्ठ विद्वान स्वामी है अयोध्या

2880
03:43:33,560 --> 03:43:37,720
मुख क रहे हैं दो को मुझको दिक्कत है एक हफ्ता और आगे बढ़ा दोगे क्या हम

2881
03:43:37,720 --> 03:43:41,800
कहा चलो शायद हम नौ कर देंगे तो इनकी असुविधा और

2882
03:43:41,800 --> 03:43:45,880
उन स्वामी जी की असुविधा देखते हुए हमने इसको दो या नौ

2883
03:43:45,880 --> 03:43:49,360
में अभी देखते हैं कौन सी सबको प्रार्थना करता हूं

2884
03:43:49,360 --> 03:43:53,920
कि जो भी तिथि में तय करूंगा कार्यक्रम की यहां सूचना आएगी शुभम

2885
03:43:53,920 --> 03:43:58,600
जी को और पासर साहब को ज साहब को इनके माध्यम से आप लोगों को पता चलेगा

2886
03:43:58,600 --> 03:44:03,080
सारे इन विदव जनों को हाथ जोड़ कर के जा रहा हूं कि लखनऊ आए

2887
03:44:03,080 --> 03:44:07,360
और ऐसे ही अपने पांडित्य का प्रदर्शन करें शास्त्रों

2888
03:44:07,360 --> 03:44:11,680
में जो तमाम इधर उधर की बातें हैं उसका समन्वय करें और

2889
03:44:11,680 --> 03:44:15,960
सब हिंदू जनमानस को सनातन धर्मी को एक संयुक्त

2890
03:44:15,960 --> 03:44:20,200
रूप से संदेश दें कि सब हमारे आचार्य प्रणम है सब

2891
03:44:20,200 --> 03:44:24,240
मत हमारे अपने हैं यहीं से सनातन धर्म सत संस्कृति से

2892
03:44:24,240 --> 03:44:28,240
निकले हैं कुछ भी हमसे अलग नहीं है हम दो घंटे के लिए आर समाजी

2893
03:44:28,240 --> 03:44:32,400
है तो दो घंटे के लिए वो है मूर्त पूजक

2894
03:44:32,400 --> 03:44:36,560
है दो घंटे हम नास्तिक हैं चार घंटे उपासक हैं हम

2895
03:44:36,560 --> 03:44:40,880
सब हैं जिसको जो करना हो हमारा करें हम सबको मानते हैं हमारे

2896
03:44:40,880 --> 03:44:46,880
उतने ही प्रणम में है सब सबको वंदना करता हूं प्रणाम करता हूं बहुत-बहुत

2897
03:44:54,320 --> 03:44:58,400
साधुवाद अभी हमारी

2898
03:44:58,400 --> 03:45:03,280
जो यह पैनल थी निर्णायक मंडल था

2899
03:45:03,280 --> 03:45:07,360
यह जैसा तय किया है जैसा जैसा

2900
03:45:07,360 --> 03:45:11,400
टीमों ने परफॉर्म किया है प्रदर्शन किया है

2901
03:45:11,400 --> 03:45:15,440
यं तो मैं अध्यक्ष होने के नाते निर्णायक मंडल का यह कह

2902
03:45:15,440 --> 03:45:19,640
रहा हूं यह विभाजन हमारी टीम के सदस्यों

2903
03:45:19,640 --> 03:45:24,040
का है मेरी दृष्टि में सब श्रेष्ठ है हम उत्कृष्ट

2904
03:45:24,040 --> 03:45:28,560
ही मान रहे हैं यह व्यवस्था है कि हमको

2905
03:45:28,560 --> 03:45:32,680
फिर भी प्रथम द्वितीय तृतीय और संतोना की बात करनी है

2906
03:45:32,680 --> 03:45:36,760
सबको श्रेष्ठ मानते हुए सबको चोटी का विद्वान मानते हुए

2907
03:45:36,760 --> 03:45:40,840
सारी टीमों को मैं घोषणा करता हूं कि निर्णायक मंडल ने संयुक्त रूप

2908
03:45:40,840 --> 03:45:45,080
से तय किया है कि यह जो

2909
03:45:45,080 --> 03:45:49,880
टीम क्रमांक य टीम

2910
03:45:49,880 --> 03:45:54,640
क्रमांक चार इसको

2911
03:45:54,640 --> 03:45:59,000
सांना प्रमाण पत्र अथवा पुरस्कार मिला है टीम

2912
03:45:59,000 --> 03:46:04,920
क्रमांक चार को सांना टीम

2913
03:46:04,920 --> 03:46:09,440
क्रमांक दो को तृतीय स्थान

2914
03:46:09,440 --> 03:46:13,920
आज की इस विद्युत विमर्श की प्रतियोगिता में मिला

2915
03:46:13,920 --> 03:46:18,840
है और टीम क्रमांक एक को

2916
03:46:18,840 --> 03:46:23,320
द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ है और टीम क्रमांक

2917
03:46:23,320 --> 03:46:27,600
तीन को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है तो सभी

2918
03:46:27,600 --> 03:46:31,600
को हमारे लिए यह विभाजन कोई मतलब नहीं है यह हम उसके पक्ष

2919
03:46:31,600 --> 03:46:36,360
में भी नहीं थे निर्णायक मंडल क था कि नहीं हमें कर देना चाहिए वर्गीकरण

2920
03:46:36,360 --> 03:46:41,160
हमारे लिए सब उत्कृष्ट एक ही श्रेणी है उत्कृष्ट श्रेणी है आउटस्टैंडिंग

2921
03:46:41,160 --> 03:46:45,520
है एक्सीलेंट है लेकिन इस तरीके से हुआ है तो तो

2922
03:46:45,520 --> 03:46:50,120
ये उद्घोषणा थी बाकी आगे का अपना

2923
03:46:50,120 --> 03:46:54,160
तो पुरस्कार वितरण होना है शांतोना

2924
03:46:54,160 --> 03:46:58,200
की टीम आए पहले और अपना पुरस्कार

2925
03:46:58,200 --> 03:47:04,200
ले जाए

2926
03:47:24,040 --> 03:47:30,040
जी सांत पुरस्कार के आचार्य गण

2927
03:47:31,400 --> 03:47:36,560
पधारे हां संतोना का दीजिए भाई पुरस्कार दीजिए शुभम

2928
03:47:36,560 --> 03:47:40,880
जी हा हाथ लगाइए ऐसे तो टीम

2929
03:47:40,880 --> 03:47:46,880
पूरी आ सकती थी लेकिन चलिए लगा सर आचार

2930
03:47:48,400 --> 03:47:54,400
सामने

2931
03:47:58,360 --> 03:48:02,640
देखें तृतीय स्थान प्राप्त करने वाली हमारी

2932
03:48:02,640 --> 03:48:07,160
आचार्यों की शास्त्रार्थ

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03:48:07,160 --> 03:48:13,160
टीम वह भी ले लीजिए य स्मृत चिन्ह भी जो दे रहे हैं

2934
03:48:19,880 --> 03:48:23,960
अब पहले एक क्रम से चलो ना तृतीय स्थान की टीम में से

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03:48:23,960 --> 03:48:29,960
कौन आचार्य जी

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03:48:37,360 --> 03:48:41,680
आए अरे तृतीय कौन है आइए आचार्य

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03:48:41,680 --> 03:48:46,480
जी बहुत प्रखर वक्ता है उनको सुनकर आनंद तो आ रहा

2938
03:48:46,480 --> 03:48:51,000
आइए

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03:48:51,000 --> 03:48:56,400
आइए आइए आचार जी

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03:48:56,400 --> 03:49:00,960
आइए आचार जी सामने देखिए आपको चित्र आ जाएगा

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03:49:00,960 --> 03:49:06,520
यह भी ये भी पकड़

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03:49:06,520 --> 03:49:10,800
लीजिए बधाई द्वितीय स्थान प्राप्त

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03:49:10,800 --> 03:49:15,520
टीम कृपया आए

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03:49:15,520 --> 03:49:21,520
तृतीय हो गए अब द्वितीय आएंगे

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03:49:23,840 --> 03:49:28,800
[संगीत]

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03:49:28,800 --> 03:49:32,800
ना वेदों का जितना गहन ज्ञान है इनको आचार्य जी

2947
03:49:32,800 --> 03:49:37,360
को बड़ा कठिन हो रहा था कि प्रथम और द्वितीय में विभेद कैसे हो

2948
03:49:37,360 --> 03:49:41,360
इसलिए उनका अलग से मैं अभिनंदन करता हूं

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03:49:41,360 --> 03:49:45,400
वेद मार्गी मुझे बहुत पसंद है

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03:49:45,400 --> 03:49:49,840
वो लेकिन अपना यह अपनी यह पक्ष धरता

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03:49:49,840 --> 03:49:53,960
निर्णय में नहीं रिकॉर्ड कर सकता हूं इसलिए आपको पुनः

2952
03:49:53,960 --> 03:49:59,960
प्रणाम करता हूं

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03:50:01,320 --> 03:50:05,440
बधाई अब कौन और बचे प्रथम स्थान

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03:50:05,440 --> 03:50:09,920
हा अभी तो प्रमुख लोग हमारे उधर ही बैठे हुए हैं

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03:50:09,920 --> 03:50:15,920
आइए

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03:50:18,560 --> 03:50:22,680
चलिए कट्टर साकार बादी सगुण

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03:50:22,680 --> 03:50:26,920
पासकों को अभिनंदन है उनको प्रणाम है प्रथम स्थान

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03:50:26,920 --> 03:50:32,920
पाने की

2959
03:50:33,040 --> 03:50:37,600
बधाई और बचे अन्य सभी प्रतिभागियों के सर्टिफिकेट

2960
03:50:37,600 --> 03:50:41,600
और वो रखा हुआ है वह हम वितरण कर देंगे धन्यवाद ज्ञापन के लिए मैं

2961
03:50:41,600 --> 03:50:47,120
आदरणीय पीन पश जी को

2962
03:50:47,120 --> 03:50:53,120
और भोजन के लिए सब धन्यवाद

2963
03:50:54,440 --> 03:50:59,000
ज्ञापन आज के इस बहुत ही सराहनीय

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03:50:59,000 --> 03:51:03,080
आयोजन में आए हुए इस मंच

2965
03:51:03,080 --> 03:51:07,280
पर और मंच के उधर पूरे पंडाल में जितने भी विद्वान

2966
03:51:07,280 --> 03:51:11,560
श्रोता अतिथि यहां पर मौजूद है मैं सबको नमन

2967
03:51:11,560 --> 03:51:16,040
करता हूं प्रणाम करता हूं श्रोता

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03:51:16,040 --> 03:51:20,440
वक्ता प्रतिभागी अतिथि सभी बहुत

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03:51:20,440 --> 03:51:24,680
ही सराहना के पात्र है और धन्यवाद

2970
03:51:24,680 --> 03:51:28,680
के पात्र हैं क्योंकि आज पहली बार

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03:51:28,680 --> 03:51:33,080
इस सुकट क्षेत्र धाम में मेला में यह बहुत बड़ा आयोजन

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03:51:33,080 --> 03:51:37,080
हुआ है और यह आगे भी धारा प्रवाहित

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03:51:37,080 --> 03:51:41,480
रहेगी माननीय श्री उपाध्याय जी ने हमारे जनपद

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03:51:41,480 --> 03:51:45,760
में दो तीन साल पूर्व शास्त्रीय परंपरा

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03:51:45,760 --> 03:51:50,000
शास्त्रार्थ की परंपरा को जन्म दिया था संकटमोचन धाम

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03:51:50,000 --> 03:51:54,560
शैल में और बहुत ही अच्छे प्रोग्राम व हुए और आज

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03:51:54,560 --> 03:51:59,000
यह प्रोग्राम हमारे शुभम जी ने आचार्य जी ने अपने सभी साथियों

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03:51:59,000 --> 03:52:03,400
से मिलकर के बहुत ही सराहनीय प्रोग्राम किया है

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03:52:03,400 --> 03:52:07,840
मैं पहले इनको सबको आयोजकों को बधाई देता हूं

2980
03:52:07,840 --> 03:52:10,280
मैं प्रणाम के साथ-साथ नमन

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03:52:10,280 --> 03:52:14,920
करते हुए श्री उपाध्याय जी को भी बहुत-बहुत बधाई दे

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03:52:14,920 --> 03:52:18,920
उनकी सराहना करता हूं और उनको धन्यवाद देता हूं कि हम

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03:52:18,920 --> 03:52:23,120
आपके प्रति आभार व्यक्त करने की भाषा हमारे पास नहीं है आप

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03:52:23,120 --> 03:52:27,360
विद्वान है ऋषि है मनीषी है और आपने

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03:52:27,360 --> 03:52:31,400
कुछ विद्वान ऐसे होते हैं पुस्तक लिख देते हैं कुछ अपना भाषण दे देते हैं कुछ

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03:52:31,400 --> 03:52:35,720
कहीं होते हैं आपने अपने विचारों को सब सर्वत्र

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03:52:35,720 --> 03:52:40,040
अपना परिश्रम करके हम सबको अपना समर्थन देकर के हमको

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03:52:40,040 --> 03:52:44,600
प्रोत्साहित करके प्रेरित करके यह शास्त्रीय परंपरा को जो

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03:52:44,600 --> 03:52:49,000
दिया और इसको संबल दे रहे हैं मैं आपकी प्रति

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03:52:49,000 --> 03:52:53,080
सबकी तरफ से बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं आभार प्रदर्शित करता

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03:52:53,080 --> 03:52:57,200
हूं साथ ही हमारे वाइस चांसलर साहब इतनी दूर से आए हैं

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03:52:57,200 --> 03:53:01,440
उन्होंने भी बहुत बड़ा उपकार किया है हमारे मंच पर जितने भी अतिथि

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03:53:01,440 --> 03:53:05,440
हैं हमारे रुगी साहब जो है व
