1
00:00:02,640 --> 00:00:07,840
तो जय श्री राम सभी को और

2
00:00:07,840 --> 00:00:12,160
इससे पहले कि आप लोग बहुत ज्यादा आशाएं अपनी

3
00:00:12,160 --> 00:00:17,520
लगाएं। पहले ही मैं एक चीज बता दूं आपको कि अभी जो हमारे

4
00:00:17,520 --> 00:00:21,760
बंधु हैं जो पिछली बार लाइव में आए थे और अपनी बहुत

5
00:00:21,760 --> 00:00:26,080
ज्यादा तरह-तरह की नवीन बातें बता के गए थे।

6
00:00:26,080 --> 00:00:30,160
जिन्हें सुनकर किसी व्यक्ति को चक्कर आने लगे। वह

7
00:00:30,160 --> 00:00:35,040
अभी आ नहीं रहे हैं। उन्होंने एक नया बहाना ढूंढ लिया है

8
00:00:35,040 --> 00:00:39,680
लाइव ना आने का कि हम वैष्णव निंदा करते हैं।

9
00:00:39,680 --> 00:00:44,000
इसलिए वो नहीं आ रहे हैं। अब वैष्णव निंदा करते

10
00:00:44,000 --> 00:00:48,000
हैं तो सबसे पहली बात तो यह है कि जिसको वो वैष्णव कह

11
00:00:48,000 --> 00:00:52,160
रहे हैं वो वैष्णव है कि नहीं यही तो तय हो रहा था लाइव में। अभी तो वह विषय

12
00:00:52,160 --> 00:00:56,880
आए नहीं थे। हालांकि मैं इसमें आपको

13
00:00:56,880 --> 00:01:00,880
कुछ जो उस दिन जो चर्चा

14
00:01:00,880 --> 00:01:05,200
हुई है उस चर्चा की कुछ मुख्य बातों पर प्रकाश डालूंगा। इंपॉर्टेंट

15
00:01:05,200 --> 00:01:09,280
वीडियो है ऐसा नहीं है। हां बट वो प्रतिपक्ष ही नहीं आ रहा है। इतना है

16
00:01:09,280 --> 00:01:15,280
वो आपको देखने को मिलता है। तो अ

17
00:01:17,760 --> 00:01:21,920
वो नहीं आ रहे हैं। तो अब उनका कहना है कि वैष्णव निंदा करते हैं।

18
00:01:21,920 --> 00:01:25,920
अब निंदा मैंने क्या की? पहली बात तो यह है कि निंदा तो वह लोग भी करते हैं। भाई अब

19
00:01:25,920 --> 00:01:30,000
हमारे हिसाब से वो वैष्णव नहीं है। उनके हिसाब से हम वैष्णव नहीं है।

20
00:01:30,000 --> 00:01:34,400
है ना? हमारे हिसाब से वो सनातनी नहीं है। सनातना भाष है। वैष्णव

21
00:01:34,400 --> 00:01:38,400
की तो बात दूर है। और उनके हिसाब से हम वैष्णव नहीं है।

22
00:01:38,400 --> 00:01:42,640
तो अब बात ये है कि यदि

23
00:01:42,640 --> 00:01:46,800
क्योंकि हम वैष्णवों की निंदा करते हैं उनके हिसाब से तो इसलिए

24
00:01:46,800 --> 00:01:51,440
उससे बात नहीं की जाएगी तो इस हिसाब से तो दुनिया में कभी कोई बात होगी ही नहीं।

25
00:01:51,440 --> 00:01:55,440
होगी क्या? नहीं होगी। दूसरी बात यह है

26
00:01:55,440 --> 00:01:59,440
कि जो व्यक्ति ईश्वर अल्लाह को एक करता है वह वैष्णव है। भगवान

27
00:01:59,440 --> 00:02:03,600
ने कहा है शास्त्रों में श्रुति स्मृति मेरी आज्ञा है और जो मेरी

28
00:02:03,600 --> 00:02:06,720
आज्ञा को

29
00:02:06,720 --> 00:02:11,280
जो मेरी आज्ञा को फॉलो करता है मन मुखी मनमुखी

30
00:02:11,280 --> 00:02:15,600
आचरण नहीं करता है वो वैष्णव

31
00:02:15,600 --> 00:02:19,600
है। वही मेरा सच्चा भक्त है। तो ये लोग कितना

32
00:02:19,600 --> 00:02:24,560
मनमुखी आचरण कर रहे हैं। स्वयं ये व्यक्ति स्वीकार किया ना इसने मन की आचरण

33
00:02:24,560 --> 00:02:29,280
कि बिना यज्ञ पवित के मैं कह रहा हूं कर्म से ही होता है

34
00:02:29,280 --> 00:02:32,960
दुर्जन तोष न्याय से मान लिया जाए कर्म से ही होता

35
00:02:32,960 --> 00:02:37,040
है तब भी इस व्यक्ति ने उसको भी फॉलो नहीं किया जो ये

36
00:02:37,040 --> 00:02:41,040
मान जो ये गलत अर्थ निकाल रहे हैं शास्त्रों का कि कर्मणा वर्ण अवस्था

37
00:02:41,040 --> 00:02:45,200
उसके अनुसार भी इसने उसको फॉलो नहीं किया कि मैं अपना जने

38
00:02:45,200 --> 00:02:49,680
कराऊ और फिर जो है शतापनिषद की बात करूं फिर ईशा उपनिषद की बात करूं

39
00:02:49,680 --> 00:02:53,840
नहीं किया जी एन के जी जय श्री राम आपका

40
00:02:53,840 --> 00:02:59,040
कैमरा ऑफ क्यों है?

41
00:02:59,040 --> 00:03:03,440
तो जब आप मनमुखी आचरण कर रहे हो जो अर्थ शास्त्रों

42
00:03:03,440 --> 00:03:08,320
का आपने स्वीकार किया उनके प्रति भी आप वो नहीं हो

43
00:03:08,320 --> 00:03:10,720
ईमानदार

44
00:03:10,720 --> 00:03:14,720
तब आप कह रहे हो कि जो है हम हम वैष्णवों की निंदा करते हैं ऐसे लोगों

45
00:03:14,720 --> 00:03:18,720
की निंदा करना आप जिसके अनुगत हो अमोग लीला के

46
00:03:18,720 --> 00:03:22,720
शिष्य है अमोग लीला जी ने आपको सिखा नहीं पाया कि श्रुति शास्त्र

47
00:03:22,720 --> 00:03:26,720
मत पढ़ो बिना जनेऊ के बिना यज्ञ पवीत के पूरा

48
00:03:26,720 --> 00:03:31,040
स्कन आपको नहीं बता पाया। तो जब आप भगवान

49
00:03:31,040 --> 00:03:35,360
आपने जो आज्ञा मानी है कि यह आज्ञा है भगवान की आपके अनुसार

50
00:03:35,360 --> 00:03:39,440
उसको भी आप फॉलो नहीं कर रहे हो और अपने आप फॉलो करने का मतलब भी बता

51
00:03:39,440 --> 00:03:43,600
दूं। विधि और निषेध में अंतर होता है। विधि का पालन एक बार को

52
00:03:43,600 --> 00:03:47,600
कर नहीं पाए कोई बात नहीं। मगर निषेध का उल्लंघन तो प्रयत्न पूर्वक कर रहे हैं ना

53
00:03:47,600 --> 00:03:49,040
आप।

54
00:03:49,040 --> 00:03:53,200
जब वहां पर निषेध बताया गया है कि बिना जनेऊ के मत पढ़िए श्रुति शास्त्र।

55
00:03:53,200 --> 00:03:57,360
तो क्या आवश्यकता है भाई? श्रुति शास्त्र पढ़ने के बिना मगर सब

56
00:03:57,360 --> 00:04:01,520
पढ़ रहे हैं। क्या लगता है भव्य राधा कृष्ण दास ये सब है जो ये दिन

57
00:04:01,520 --> 00:04:03,920
भर जो

58
00:04:03,920 --> 00:04:08,080
मच्छर की तरह किया करते हैं इधर उधर अपने क्रियाकलाप ये सब विधिवत चलते होंगे

59
00:04:08,080 --> 00:04:12,160
जो इस की विधियां उन्हीं के अनुसार और विधियों का मैं ये

60
00:04:12,160 --> 00:04:16,160
नहीं कह रहा कि विधियों का पूर्ण आलंबन कर लो पूर्ण विधियों का

61
00:04:16,160 --> 00:04:20,400
एक बार को कि सामर्थ्य की कमी है नहीं हो पाया कोई बात नहीं मगर विधि

62
00:04:20,400 --> 00:04:24,720
निषेध का उल्लंघन क्यों कर रहे हो वहां तो सामर्थ की आवश्यकता ही नहीं है

63
00:04:24,720 --> 00:04:28,800
वहां तो आप कुछ ना करो वो चाहिए कुछ करना चाहिए ही नहीं

64
00:04:28,800 --> 00:04:32,960
वहां पर फिर भी आप वहां पर कुछ करके निषेध का उल्लंघन कर रहे हो तो

65
00:04:32,960 --> 00:04:36,960
पहली बात वैष्णव ईश्वर अल्लाह को एक करने वाले सिद्ध नहीं

66
00:04:36,960 --> 00:04:41,280
होते भगवान को अपूर्ण कहने वाले सिद्ध नहीं होते जो

67
00:04:41,280 --> 00:04:45,280
व्यक्ति भगवान को अपूर्ण मान रहा है जो व्यक्ति भगवान

68
00:04:45,280 --> 00:04:49,520
को विरोधाभासी मान रहा है वो व्यक्ति भगवान

69
00:04:49,520 --> 00:04:53,680
को भगवान ही नहीं मान रहा है तो भगवान को जो भगवान ही नहीं मान रहा

70
00:04:53,680 --> 00:04:57,680
उस उस भगवान को मानने वाले का दिखावा करने वाले को वैष्णव कैसे मान लिया

71
00:04:57,680 --> 00:05:02,320
जाए अपने आप। तो ये वैष्णव निंदा है। अच्छा दूसरी बात

72
00:05:02,320 --> 00:05:04,080
कि अगर स्वतंत्र रूप से देखा

73
00:05:04,080 --> 00:05:09,120
जाए तो हमने इतनी वैष्णव निंदा इनके वाले वैष्णवों की निंदा नहीं की होगी जितनी इन्होंने

74
00:05:09,120 --> 00:05:13,200
हम लोगों की की है। जो इस कौन को नहीं मानते? तरह-तरह से मजाक उड़ा-उड़ा

75
00:05:13,200 --> 00:05:17,520
करके आदि शंकराचार्य जी की मरती हुई मां का मजाक उड़ाया।

76
00:05:17,520 --> 00:05:21,680
वो निंदा इनको निंदा नहीं लगी। अच्छा अगर ये कहे कि भैया उन्होंने तो

77
00:05:21,680 --> 00:05:25,840
उनके पास तर्क था। उनके पास रीजनिंग थी। तो रीजनिंग हमारे पास भी है। सुन लो

78
00:05:25,840 --> 00:05:30,400
आ के। अच्छा महाभारत का सिद्धांत है कि अपने साथ

79
00:05:30,400 --> 00:05:34,640
जो व्यवहार आप स्वीकार करते हैं वही व्यवहार अन्यों के साथ करें।

80
00:05:34,640 --> 00:05:38,800
तो आप ये चाहते हैं कि आपकी रीजनिंग तो दुनिया जाने मगर

81
00:05:38,800 --> 00:05:42,800
दूसरे की रीजनिंग आप नहीं जानना चाहते तो ये क्या हो गया? धर्म का विरोध। फिर भी

82
00:05:42,800 --> 00:05:46,800
आप वैष्णव हो। तो पहली बात तो वैष्णव हो कि नहीं यही सिद्ध

83
00:05:46,800 --> 00:05:50,880
नहीं होता। राघवाचार्य जी आप सन्यासी हैं। उन्होंने कह

84
00:05:50,880 --> 00:05:55,200
दिया ना वैष्णव है ही नहीं इस वाले। वो तो श्री संप्रदाय

85
00:05:55,200 --> 00:06:00,560
के हैं। वो तो आपके अनुसार जिसे आप मायावादी कहते हो वो भी नहीं है।

86
00:06:00,560 --> 00:06:04,560
ठीक है? अब आगे बात बात करते हैं कि

87
00:06:04,560 --> 00:06:08,560
जब उस दिन वो लाइव चर्चा हो गई थी इनके साथ उस दिन रात को बड़े

88
00:06:08,560 --> 00:06:13,200
परेशान हुए और अगले दिन हमने इनका एक संक्षिप्त वीडियो ये

89
00:06:13,200 --> 00:06:17,600
बताने के लिए अपने मेन चैनल पर डाला कि

90
00:06:17,600 --> 00:06:19,280
इन्होंने क्लेम ये किया है कि

91
00:06:19,280 --> 00:06:23,520
ईश्वर में अभाव है। वो है कि नहीं है वो इन्होंने जो कहा था कि

92
00:06:23,520 --> 00:06:27,520
दुनिया में कोई ऐसी चीज नहीं जिसका ईश्वर के यहां अभाव ना हो तो यह ईश्वर में

93
00:06:27,520 --> 00:06:32,800
कमी है। ठीक है? यह सब इन्होंने कहा था। तो खैर

94
00:06:32,800 --> 00:06:36,880
यह बताने के लिए कि भाई इस वाले यह बोल रहे हैं

95
00:06:36,880 --> 00:06:41,040
कि ईश्वर में अभाव है। यह बताने के लिए संक्षिप्तीकरण करके वीडियो हमने मेन

96
00:06:41,040 --> 00:06:45,120
चैनल पर डाला। अब इनका मेरे पास मैसेज आ गया, कॉल आ गया कि

97
00:06:45,120 --> 00:06:49,120
भाई आपने जो है हमारे पक्ष को सही से प्रस्तुत

98
00:06:49,120 --> 00:06:53,120
नहीं किया है। उसमें जो आपने संक्षिप्त किया है। तो पहली

99
00:06:53,120 --> 00:06:57,200
बात तो यह है कि हमारा वहां

100
00:06:57,200 --> 00:07:01,440
पर ध ये दिखाना है ही नहीं कि उस चर्चा में परास्त कौन

101
00:07:01,440 --> 00:07:05,680
हुआ? असफल कौन हुआ? क्योंकि हमारी चर्चा समाप्त कहां पर हो रही है?

102
00:07:05,680 --> 00:07:10,800
हमारी चर्चा समाप्त यहां हो रही है कि आप जो है प्रमाण लेकर के आइए।

103
00:07:10,800 --> 00:07:14,960
यहां हमारी चर्चा समाप्त हुई है। वो वाली फिर ये बोल

104
00:07:14,960 --> 00:07:18,960
रहे हैं कि आपने जो है हमारा पक्ष सही से

105
00:07:18,960 --> 00:07:23,040
प्रस्तुत नहीं किया। तो उसमें पक्ष क्या है? हमने तो वहां से क्लेम दिखाया ना कि भाई आप

106
00:07:23,040 --> 00:07:27,600
यह कह रहे हैं कि ईश्वर में अभाव होगा तभी ईश्वर पूर्ण माना जाएगा। अभाव

107
00:07:27,600 --> 00:07:31,680
युक्त ईश्वर ही पूर्ण है। तो फिर अभाव रहित ईश्वर को क्या कहा

108
00:07:31,680 --> 00:07:34,880
जाएगा? जो अभाव रहित तत्व होगा उसको क्या कहा जाएगा?

109
00:07:34,880 --> 00:07:39,120
जो अभाव सहित तत्व है वो पूर्ण है तो अभाव

110
00:07:39,120 --> 00:07:43,200
रहित तत्व है उसको क्या कहा जाएगा? पहली बात तो ये आ जाती

111
00:07:43,200 --> 00:07:47,200
है। ये अभी आएगी अभाव वाली बात में। तो हमारा अच्छा हमने

112
00:07:47,200 --> 00:07:51,840
वीडियो का टाइटल क्या दिया है वहां पर? वीडियो का टाइटल हमने ये दिया है

113
00:07:51,840 --> 00:07:56,080
कि क्या ईश्वर में भी अभाव है? हमने तो वहां निर्णायक नहीं बना कि

114
00:07:56,080 --> 00:08:00,080
स्कन वाला लड़का हार गया परास्त हो गया जवाब नहीं दे पाया ना

115
00:08:00,080 --> 00:08:04,240
हमने वीडियो का टाइटल दिया क्या ईश्वर में भी अभाव है हां क्योंकि ये बातें

116
00:08:04,240 --> 00:08:08,320
अपने आप में बड़ी वो है क्या कहते हैं

117
00:08:08,320 --> 00:08:12,320
एक जलेबी जैसी तो हमने वहां ये जरूर कहा कि और मेरे को वास्तविकता में सुनकर

118
00:08:12,320 --> 00:08:16,400
के हंसी भी आई बहुत कंफ्यूजिंग बातें हैं कि परम

119
00:08:16,400 --> 00:08:20,480
सत्य भी परम संशय है जो परम सत्य है वो परम संशय है परम सत्य नहीं

120
00:08:20,480 --> 00:08:24,480
है ये बात है ये ईश्वर में अभाव और वो दोनों एक साथ

121
00:08:24,480 --> 00:08:28,480
होना चाहिए। इस पर बात करेंगे होगा कि नहीं होगा? तो मैंने वहां घुमावदार

122
00:08:28,480 --> 00:08:32,640
बातें लिखा। मगर यह कहीं पर नहीं दिखाया कि हमारी इस चर्चा में निर्णय कुछ आया

123
00:08:32,640 --> 00:08:36,640
है। ऐसा कुछ नहीं है। तो

124
00:08:36,640 --> 00:08:40,640
फिर इनका कहना था वहां पर वो प्राइवेसी की वजह से

125
00:08:40,640 --> 00:08:44,880
अभी हम रिकॉर्डिंग दिखा नहीं रहे हैं। ठीक है? तो इनका

126
00:08:44,880 --> 00:08:49,120
फिर वहां पर एक वो आया कि भाई मैंने अपने

127
00:08:49,120 --> 00:08:50,080
पक्ष को रखते

128
00:08:50,080 --> 00:08:54,160
हुए कि ईश्वर में भाव है। अपने पक्ष को रखते हुए मैंने

129
00:08:54,160 --> 00:08:58,160
वहां पर प्रमाण भी दिए थे शास्त्रों के। तो

130
00:08:58,160 --> 00:09:02,240
पहली बात तो यह है कि शास्त्रों के प्रमाण की बात तो अब कट चुकी है। क्यों?

131
00:09:02,240 --> 00:09:06,720
क्योंकि हम पीछे से चर्चा कहां से चली आ रही थी? कि शास्त्र की व्याख्या

132
00:09:06,720 --> 00:09:10,720
में प्रमाणिकता उसकी मानी जाएगी जिसकी व्याख्या अकाट होगी।

133
00:09:10,720 --> 00:09:14,960
अब तो शास्त्र प्रमाण की आवश्यकता ही नहीं है। दूसरी बात कि वहां

134
00:09:14,960 --> 00:09:19,920
पर जो प्रमाण मांगे गए थे कि आपने

135
00:09:19,920 --> 00:09:24,080
अपने सिद्धांत के पक्ष में प्रमाण देने हैं तो

136
00:09:24,080 --> 00:09:28,160
शास्त्रीय प्रमाण तो मांगे ही नहीं गए आपसे अभी। आपसे तो अभी केवल ये पूछा

137
00:09:28,160 --> 00:09:32,640
गया था क्या कौन ये मानता है कि नहीं ये सिद्ध कर सकने वाले प्रमाण दे दो।

138
00:09:32,640 --> 00:09:36,720
तो इन्होंने जो प्रमाण दिए थे वो अस्पष्ट

139
00:09:36,720 --> 00:09:41,280
थे। चर्चा में आप देखेंगे इन्होंने एक प्रमाण दिया है ईशा

140
00:09:41,280 --> 00:09:45,360
उपनिषद में प्रभुपाद जी का जो भाष्य है तो उस प्रमाण में क्या

141
00:09:45,360 --> 00:09:47,680
हुआ था

142
00:09:47,680 --> 00:09:52,000
कि उसमें एक जगह उन्होंने ये लिखा है कि भाई ईश्वर में कोई कमी

143
00:09:52,000 --> 00:09:56,080
नहीं है तो इससे पता चलता है कि ईश्वर में अभाव भी नहीं

144
00:09:56,080 --> 00:10:00,320
है हम ईश्वर में यदि कोई कमी नहीं

145
00:10:00,320 --> 00:10:02,880
है

146
00:10:02,880 --> 00:10:05,360
तो ईश्वर में कोई अभाव

147
00:10:05,360 --> 00:10:09,520
भी नहीं है ये पता चलता है उन्होंने मान लिया कि ईश्वर

148
00:10:09,520 --> 00:10:13,680
में अभाव है। उनकी इस पंक्ति से मान लिया। ईश्वर में कोई कमी नहीं है।

149
00:10:13,680 --> 00:10:18,160
ईश्वर में कोई अभाव नहीं है। इससे पता लग रहा है कि ईश्वर में अभाव का भी अभाव नहीं है। वाह!

150
00:10:18,160 --> 00:10:22,240
अच्छी बात है ना? ये इन्होंने मान लिया। तो ये इनका प्रमाण था।

151
00:10:22,240 --> 00:10:26,400
और दूसरा प्रमाण इन्होंने वहां दिया था चर्चा में ये

152
00:10:26,400 --> 00:10:30,480
बताने के लिए कि इस कौन ये मानता है? क्या दिया था कि चैतन चरितामृत में कहीं

153
00:10:30,480 --> 00:10:34,800
पर लिखा हुआ है कि ईश्वर के अंदर

154
00:10:34,800 --> 00:10:38,800
जो राधा रानी है उनसे उनसे जो प्रेम संबंध

155
00:10:38,800 --> 00:10:43,840
का जो रस है वो प्राप्त करने की इच्छा है। ठीक है?

156
00:10:43,840 --> 00:10:48,000
तो अब यहां पर ये मानना पड़ेगा

157
00:10:48,000 --> 00:10:52,720
कि भगवान से पूछा जाता है आप जो है

158
00:10:52,720 --> 00:10:56,720
आप जो है कितने क्यों अवतार लेते हो? तो भगवान कहते साधु भक्तों के

159
00:10:56,720 --> 00:11:00,960
उद्धार के लिए तो इसका मतलब साधु भक्तों का उद्धार करने का भी अभाव है भगवान

160
00:11:00,960 --> 00:11:04,960
में भगवान ने बहुत सारी रीजनिंग जगह जगह दी है शास्त्रों में मैं

161
00:11:04,960 --> 00:11:09,200
ऐसा इसलिए करता हूं मैं ऐसा इसलिए करता हूं हां मगर

162
00:11:09,200 --> 00:11:13,440
भगवान ने क्या कहा है गीता में कि मुझे

163
00:11:13,440 --> 00:11:17,680
मैं किसी भी कर्म में लिप्त नहीं होता हूं क्योंकि मुझे उनके जो परिणाम है उनमें

164
00:11:17,680 --> 00:11:20,560
कोई सरोकार नहीं उनके प्रति कोई आसक्ति नहीं है।

165
00:11:20,560 --> 00:11:24,560
कहा ना इसलिए समस्त कर्मों को करते हुए भी तू मुझे

166
00:11:24,560 --> 00:11:30,320
करता जान क्योंकि उनके फल में कोई

167
00:11:30,320 --> 00:11:34,560
निष्ठा है ही नहीं उनकी आसक्ति है ही नहीं किसी भी कर्म के फल

168
00:11:34,560 --> 00:11:38,560
तो खैर

169
00:11:38,560 --> 00:11:42,560
तो ये अब बात ये आती है कि यहां ये जो दोनों इन्होंने प्रमाण दिए थे इन

170
00:11:42,560 --> 00:11:46,640
दोनों से स्पष्ट नहीं हो रहा था कि इस कौन ये मानता है कि भगवान में अभाव है। क्यों? कि

171
00:11:46,640 --> 00:11:51,040
जैसे कि मान लीजिए वहां प्रभुपाद जी ने लिखा है कि

172
00:11:51,040 --> 00:11:55,360
ईश्वर में कोई कमी नहीं है। हम

173
00:11:55,360 --> 00:11:59,280
तो अभी

174
00:11:59,280 --> 00:12:03,360
ये उसका अर्थ निकाल रहे हैं कि इसका मतलब है कि ईश्वर में कमी की भी कमी नहीं

175
00:12:03,360 --> 00:12:07,360
है। ठीक है? अच्छा इसका मतलब जब प्रभुपाद जी

176
00:12:07,360 --> 00:12:12,000
ये लिख रहे हैं कि ईश्वर में कमी नहीं है। उसका मतलब है

177
00:12:12,000 --> 00:12:16,960
कि ईश्वर जो है अभाव युक्त है। ठीक है?

178
00:12:16,960 --> 00:12:20,960
तो जब प्रभुपाद जी यह लिखेंगे कि ईश्वर अभाव रहित है तब क्या

179
00:12:20,960 --> 00:12:25,920
पंक्ति होगी? पंक्ति तो यही होगी। ईश्वर में कोई कमी नहीं है।

180
00:12:25,920 --> 00:12:28,720
यही होगी ना?

181
00:12:28,720 --> 00:12:34,720
क्या होगी?

182
00:12:36,320 --> 00:12:40,720
तो यह प्रमाण स्पष्ट नहीं करता कि क्या इस कौन ये मानता

183
00:12:40,720 --> 00:12:44,800
है? क्योंकि उसके दोनों अर्थ निकल रहे हैं। दुर्जन तो उसने ऐसे मान रहा हूं। हालांकि

184
00:12:44,800 --> 00:12:49,680
अर्थ तो यही निकल रहा है कि ईश्वर में कोई कमी नहीं है। परंतु

185
00:12:49,680 --> 00:12:53,760
अगर दुर्जन तोष न्याय से आपकी बात को रख भी लिया जाए तब भी यह अर्थ

186
00:12:53,760 --> 00:12:58,160
भी तो उस पंक्ति से निकलेगा कि ईश्वर में कोई कमी नहीं है। अभाव की कमी भी नहीं है।

187
00:12:58,160 --> 00:13:02,480
यह अर्थ तो निकलेगा ना कि अभाव नहीं है ईश्वर में। मतलब अभाव

188
00:13:02,480 --> 00:13:07,760
युक्त ईश्वर के लिए अगर आप ये पंक्ति मान रहे हो कि कमी नहीं है तो अभाव

189
00:13:07,760 --> 00:13:12,080
रहित ईश्वर के लिए कौन सी पंक्ति होगी? हम

190
00:13:12,080 --> 00:13:16,080
तो पंक्ति यही होगी। तो अगर एक ही पंक्ति के दो अर्थ निकल रहे हैं तो उसमें

191
00:13:16,080 --> 00:13:20,080
फिर निर्णय कैसे लिया जाए कि तुम्हारा वाला पक्ष सही है उसका कहीं से तो आपको

192
00:13:20,080 --> 00:13:24,240
दिखाना पड़ेगा तो यह मैंने और इसी प्रकार से राधा रानी

193
00:13:24,240 --> 00:13:28,240
के विषय में भी था कि अगर उनको रस की आवश्यकता उन्होंने कह दिया अगर उन्होंने साधु

194
00:13:28,240 --> 00:13:32,400
भक्तों का उद्धार करने के लिए कह दिया तो इसका मतलब साधु भक्तों का उद्धार करने का अभाव

195
00:13:32,400 --> 00:13:37,200
हो गया ईश्वर में व्यवहारिक जगत की बातें है ये सब

196
00:13:37,200 --> 00:13:41,280
तात्विक बातें नहीं है कोई आवश्यकता नहीं है भगवान को भगवान देख

197
00:13:41,280 --> 00:13:45,360
लो न्याय करने के लिए सदव स्वयं आते हैं क्या न्याय होता है फिर

198
00:13:45,360 --> 00:13:49,520
भी दुनिया में ठीक है अब यह

199
00:13:49,520 --> 00:13:51,520
बातें इन्होंने वहां रखी तो मैंने जब इन्होंने

200
00:13:51,520 --> 00:13:55,600
मुझसे कहा कि भाई मैंने जो वहां पर प्रमाण दिए थे आपने वो प्रस्तुत नहीं

201
00:13:55,600 --> 00:13:59,760
किए वो जो वीडियो बनाया था ट्रिम करके तो मैंने कहा आपने वहां

202
00:13:59,760 --> 00:14:04,080
पर प्रमाण दिए ही कहा था थे प्रमाण देने की बात पर ही तो हमारी चर्चा स्थगित हुई थी पुनः

203
00:14:04,080 --> 00:14:08,160
होने के लिए सुनिश्चित हुई थी तो इन्होंने

204
00:14:08,160 --> 00:14:12,720
कहा वीडियो में उन्होंने वहां कॉल रिकॉर्डिंग में कहा कि नहीं नहीं

205
00:14:12,720 --> 00:14:16,720
मैंने मैंने जो है वहां पे लाइव स्ट्रीम में

206
00:14:16,720 --> 00:14:20,720
बोला था कि वहां चैतन चरितामृत में अभाव शब्द का उपयोग हुआ

207
00:14:20,720 --> 00:14:24,800
है। वो रिकॉर्डेड है हमारे पास। तो मैंने कहा अगर आपने

208
00:14:24,800 --> 00:14:29,120
ऐसा बोला है तो मैं तुरंत अपना वीडियो डिलीट कर दूंगा। आप जल्दी मुझे टाइम स्लॉट

209
00:14:29,120 --> 00:14:34,640
दीजिए। है ना? तो

210
00:14:34,640 --> 00:14:38,640
इन्होंने काफी देर बाद मैं बोलता रहा, बोलता रहा। फिर उन्होंने मुझे टाइम स्लॉट दिया।

211
00:14:38,640 --> 00:14:42,640
मैंने उस टाइम स्लॉट को चेक किया जाके मुझसे गलती कैसे हो गई भाई? इनका पक्ष मैं

212
00:14:42,640 --> 00:14:46,800
देख नहीं पाया। तो टाइम्स लॉ को जाकर जब मैंने चेक किया तो उसमें वही बात

213
00:14:46,800 --> 00:14:50,800
बोल रहे हैं कि क्योंकि भगवान को राधा रानी का जो प्रेम संबंध है और

214
00:14:50,800 --> 00:14:54,880
जो उस रस की आवश्यकता है तो इससे सिद्ध होता है कि भगवान में भी अभाव

215
00:14:54,880 --> 00:14:58,880
है। मैंने कहा फिर वही बात हो गई। भगवान यदि लीला में बोल रहे होंगे

216
00:14:58,880 --> 00:15:02,880
तो इसलिए हमको यहां पर स्वतंत्र रूप से स्पष्ट वो

217
00:15:02,880 --> 00:15:06,960
चाहिए कि इस अभाव मानता है यद्यपि ये शास्त्रोक्त

218
00:15:06,960 --> 00:15:10,960
शास्त्रीय प्रमाण ये भी नहीं है अगर होगा भी तो भी नहीं है फिर भी इस

219
00:15:10,960 --> 00:15:15,520
की ओर से वो शास्त्रीय प्रमाण नहीं दे पाए अच्छा

220
00:15:15,520 --> 00:15:19,520
तो ये बात तो हुई टेलीफोनिक अब इसके बाद

221
00:15:19,520 --> 00:15:25,520
क्या होता है कि

222
00:15:32,560 --> 00:15:38,080
इसके बाद क्या होता है कि अ

223
00:15:38,080 --> 00:15:42,480
हमारी चर्चा सेट हो गई आज के दिन 4:00 बजे होनी है और

224
00:15:42,480 --> 00:15:46,560
इन्होंने वहां पर मुझे नहीं दे पाए ये प्रमाण कि इन्होंने वीडियो

225
00:15:46,560 --> 00:15:50,720
में चैतन चरितामृत के रेफरेंस को देते हुए कहा था कि नहीं कहा था कि

226
00:15:50,720 --> 00:15:54,800
भैया ईश्वर में अभाव माना है कौन है? ये

227
00:15:54,800 --> 00:15:58,960
मुझे इस बात का प्रमाण वहां नहीं दे पाए। WhatsApp में चैट हो रही है वहां

228
00:15:58,960 --> 00:16:03,360
नहीं दे पाए। उसके बाद चर्चा हमारी सुनिश्चित हो गई। अब आज जब चर्चा

229
00:16:03,360 --> 00:16:07,440
का एग्जैक्ट टाइम आ गया भाई साहब कोई रामपाल ही है जो जुड़ने की

230
00:16:07,440 --> 00:16:11,440
कोशिश कर रहा है। अभी विषय आपका नहीं चल रहा है। ठीक है? तो

231
00:16:11,440 --> 00:16:15,600
आप बार-बार परेशान ना हो ना करें। हर्ष

232
00:16:15,600 --> 00:16:19,600
जी अगर आप शास्त्रवाद जी यदि आप हैं आना

233
00:16:19,600 --> 00:16:22,000
चाहते हैं तो आप आ सकते हैं ऑनलाइन

234
00:16:22,000 --> 00:16:25,440
अगर आप उपलब्ध है तो

235
00:16:25,440 --> 00:16:29,600
तो ये सारी बातें हुई जब आप आज 4:00

236
00:16:29,600 --> 00:16:33,600
बजे तक हो गया तो इनके पास बहुत सारे टास्क रहे होंगे मैं

237
00:16:33,600 --> 00:16:37,760
ऐसा समझ सकता हूं कि इनको प्रमाण

238
00:16:37,760 --> 00:16:41,760
ढूंढने होंगे कि इस कौन ने ऐसा कहां कहां पर माना है उसके बाद हम पूछते हैं

239
00:16:41,760 --> 00:16:46,640
कि जो है ड गोस्वामियों ऐसा कहां काम आना है

240
00:16:46,640 --> 00:16:50,720
और इसके बाद हम पूछते हैं भैया आप जो है आरसी ग्रंथों

241
00:16:50,720 --> 00:16:54,800
के आप प्रमाण दे दीजिए है ना

242
00:16:54,800 --> 00:16:58,960
तो इनको ये सब कलेक्ट करने में टास्क रहा होगा तो कलेक्ट कर रहे होंगे

243
00:16:58,960 --> 00:17:03,360
कर करते करते करते इनको अपने पक्ष में पक्ष की पुष्टि

244
00:17:03,360 --> 00:17:07,520
करने में असामर्थता जब

245
00:17:07,520 --> 00:17:11,600
प्राप्त हुई होगी ऐसा हम समझ सकते हैं तब इन्होंने आखरी

246
00:17:11,600 --> 00:17:15,680
टाइम पे अभी 10 मिनट पहले 4 बजने से 10 मिनट पहले ही यह कहा कि

247
00:17:15,680 --> 00:17:19,680
आप जो है वैष्णव निंदा करते हैं। अब वैष्णव निंदा के संबंध में एक

248
00:17:19,680 --> 00:17:23,760
पक्ष तो मैंने यह रख दिया कि भाई वैष्णव है कौन? पहले तो ये

249
00:17:23,760 --> 00:17:27,920
दूसरी बात ये आती है कि क्या हमने इनके समक्ष वैष्णव

250
00:17:27,920 --> 00:17:31,920
निंदा की? तत रूप से वीडियो बना करके हम बात करें तो बात

251
00:17:31,920 --> 00:17:35,920
अलग है। मगर इनके समक्ष जो है जब ये सामने इनसे बात हो रही है तब

252
00:17:35,920 --> 00:17:40,640
हमने वैष्णव निंदा की है। क्या जो इनके वैष्णव है तथाकथित वैष्णव सो कॉल्ड वैष्णव

253
00:17:40,640 --> 00:17:44,720
नहीं की। तो इन्होंने क्या कहा कि आपने कहा कि वो

254
00:17:44,720 --> 00:17:49,040
जो ईस्ट ऑफ कैलाश वाले हैं उन्होंने अमोग लीला जी को मूर्ख कहा।

255
00:17:49,040 --> 00:17:53,200
अरे तो भैया ये तो तुम्हारे ईस्ट ऑफ कैलाश वाले से पूछ लो। उसने कहा ऐसा

256
00:17:53,200 --> 00:17:57,680
उनसे आप पूछिए फोन करके और वो यदि मना करेंगे तो मैं आपको प्रमाण दूंगा।

257
00:17:57,680 --> 00:18:01,760
मैंने कहा कर दी वैष्णव निंदा। मैंने कहा कि वो ऐसा कहते

258
00:18:01,760 --> 00:18:06,240
हैं। आपको बताया है मैंने। ठीक है।

259
00:18:06,240 --> 00:18:10,400
अच्छा यदि आपने अभी मुझको यह बताया कि मैंने आपको

260
00:18:10,400 --> 00:18:14,720
यह बताया कि उसने यह बताया कि वो मूर्ख है अमोग लीला जी। यदि

261
00:18:14,720 --> 00:18:18,880
आपने मुझे यह बताया कि मैंने आपको यह बताया कि

262
00:18:18,880 --> 00:18:22,560
वो दिल्ली वालों ने मुझे बताया कि अमोग लीला जी मूर्ख है

263
00:18:22,560 --> 00:18:26,640
तो ये तो आपने भी कर दी वैष्णव निंदा। अगर किसी के कथन को कहीं पर

264
00:18:26,640 --> 00:18:30,640
बताना वैष्णव निंदा है तो आप भी तो मेरे कथन को मुझे बता रहे हो

265
00:18:30,640 --> 00:18:34,720
वो भी तो वैष्णव निंदा हो गई। इसीलिए कहते हैं मत पड़ो चक्कर में

266
00:18:34,720 --> 00:18:39,120
कोई नए टक्कर में कहां तक भागोगे है ना तो

267
00:18:39,120 --> 00:18:43,200
अब वैष्णव निंदा नहीं हुई तो ये व्यक्ति

268
00:18:43,200 --> 00:18:47,440
अभी फोन कॉल पर हमारी बात चल रही थी कोई एक मध्यस्थ भी थे बीच में

269
00:18:47,440 --> 00:18:51,440
जिन्होंने इनसे जो इनको लेके आए थे कि आप इनसे ये आपसे बात करना चाहते

270
00:18:51,440 --> 00:18:55,600
हैं और बड़े ताव में थे हां एक चीज और हुई थी कल कल

271
00:18:55,600 --> 00:18:59,760
मेरे पास एक चुनौती इन्होंने भिजवाई थी कि

272
00:18:59,760 --> 00:19:04,080
भाई अगर मैंने अपने पक्ष को सिद्ध कर दिया अद्वैत का भंजन

273
00:19:04,080 --> 00:19:08,080
कर दिया तो तुम प्रभुपाद की शरण में आओगे कि नहीं आओगे ये इन्होंने

274
00:19:08,080 --> 00:19:12,560
मुझको कहा कहलवाया तो मुझे बड़ी तेज

275
00:19:12,560 --> 00:19:16,880
क्रोध आया मैंने पलट के फोन किया मैंने

276
00:19:16,880 --> 00:19:19,680
कहा ये बताओ

277
00:19:19,680 --> 00:19:23,840
जिस समय तुमने ये कहा कि यदि अद्वैत का भंजन कर देंगे तो

278
00:19:23,840 --> 00:19:27,920
प्रभुपाद जी की शरण में आ जाओगे उसी समय तुमने ये क्यों नहीं कहा कि यदि तुमने

279
00:19:27,920 --> 00:19:32,000
मेरे प्रभुपाद जी का या इस की मत का भंजन

280
00:19:32,000 --> 00:19:36,000
कर दिया तो मैं भी तुम्हारे गुरुओं की शरण में आ जाऊंगा। यह

281
00:19:36,000 --> 00:19:37,600
अन्याय पूर्ण व्यवहार क्यों नहीं किया

282
00:19:37,600 --> 00:19:41,760
तुमने? बताओ। जब तुम सामने वाले से अपेक्षा कर सकते

283
00:19:41,760 --> 00:19:45,840
हो कर रहे हो कि वो अपने मत का भंजन हो जाने की

284
00:19:45,840 --> 00:19:49,840
संभावना को स्वीकार करे। हम तो

285
00:19:49,840 --> 00:19:53,920
फिर तुम ये स्वीकार क्यों नहीं कर रहे हो कि सामने

286
00:19:53,920 --> 00:19:58,080
वाला भी तुमसे अपेक्षा कर सके कि तुम भी अपने मत को मत

287
00:19:58,080 --> 00:20:03,520
का भंजन हो जाने की संभावना को स्वीकार करोगे। यह न्याय है।

288
00:20:03,520 --> 00:20:07,520
यह न्याय है। जब तुम बराबरी की बात कर रहे हो

289
00:20:07,520 --> 00:20:11,520
कि मत का भंजन हो जाएगा तो आप यह कहो

290
00:20:11,520 --> 00:20:16,160
कि अगर मेरा भजन हुआ तो मैं आऊंगा। तुम्हारा भंजन हुआ तो तुम आओगे। मगर

291
00:20:16,160 --> 00:20:20,240
यह बराबरी नहीं है। तानाशाह है। जन्मजात तानाशाह। तो उन्होंने क्या

292
00:20:20,240 --> 00:20:24,640
कहा? कि अगर अद्वैत का मैंने भंजन

293
00:20:24,640 --> 00:20:28,720
कर दिया तो तुम प्रभुपाद जी की शरण में आओगे। अरे भाई उसी समय यह बात रखो

294
00:20:28,720 --> 00:20:32,800
ना कि यदि तुमने प्रभुपाद जी के मत का भंजन कर दिया इस

295
00:20:32,800 --> 00:20:38,080
के मत का भंजन कर दिया मैं आ जाऊंगा शंकराचार्यों की शरण में

296
00:20:38,080 --> 00:20:43,600
तो ये न्याय प्रिय नहीं है जहां पे ईश्वर बाधित होता है

297
00:20:43,600 --> 00:20:47,840
वहां पे आपको धर्म प्राप्त नहीं होता है वो लोग मीठे

298
00:20:47,840 --> 00:20:52,000
बहुत लगेंगे आपको मगर मर्यादा के प्रति प्रतिबद्ध

299
00:20:52,000 --> 00:20:52,880
नहीं मिलेंगे

300
00:20:52,880 --> 00:20:58,000
बहुत बढ़िया बोलेंगे मीठा मीठा हरे कृष्णा हरे कृष्णा प्रभु

301
00:20:58,000 --> 00:21:03,280
ईश्वर में अभाव होना ही उसकी पूर्णता है। ठीक है?

302
00:21:03,280 --> 00:21:07,360
ये करेंगे वो। ईश्वर में यदि किसी

303
00:21:07,360 --> 00:21:11,680
चीज की जरूरत नहीं है तो ये उसकी कंप्लीटनेस

304
00:21:11,680 --> 00:21:15,920
में बाधा आती है। लो भाई किसी चीज को वही मामा

305
00:21:15,920 --> 00:21:20,720
आ गए वाली बात। किसी चीज को बढ़ा चढ़ा करके बोल दो

306
00:21:20,720 --> 00:21:25,840
तो वो झूठ भी सत्य लगने लगे। और व्यक्ति ये सोचना भूल ही जाए।

307
00:21:25,840 --> 00:21:29,920
अरे यह तो पूरा का पूरा झूठ है भाई। हम जब ढूंढने निकले हैं परम

308
00:21:29,920 --> 00:21:35,360
सत्य को तो तुम हमें दे रहे हो परम संशय।

309
00:21:35,360 --> 00:21:39,360
हम ढूंढने निकले परम सत्य को और तुम हमें दे रहे हो परम संशय।

310
00:21:39,360 --> 00:21:43,680
अच्छा तो ये वाली बात भी हो गई। तो मैंने ये कहा

311
00:21:43,680 --> 00:21:47,840
अब आफ्टर ऑल एक बात रघुकुल रीत सदा चली आई। प्राण जाई पर

312
00:21:47,840 --> 00:21:51,920
वचन ना जाए। राम दो प्रकार की बातें नहीं

313
00:21:51,920 --> 00:21:56,080
करता। यह राम जी का वचन है। ये मैं नहीं बोल रहा हूं कर्ता।

314
00:21:56,080 --> 00:22:01,440
वो खुद अपने लिए बोल रहे हैं। किससे? कैकई माता से।

315
00:22:01,440 --> 00:22:05,600
क्या बोल रहे हैं? राम दो प्रकार की बातें नहीं करता। जो भी

316
00:22:05,600 --> 00:22:09,840
करता हूं सोच समझ के करता हूं। यानी राम जी सिखा रहे हैं। वचन

317
00:22:09,840 --> 00:22:13,840
बोलने से पहले सोचो समझो। तो जब आपने यहां पर आने

318
00:22:13,840 --> 00:22:18,160
का रुख किया। जब आपने चर्चा सुनिश्चित की उससे

319
00:22:18,160 --> 00:22:22,320
पहले आपने सुनिश्चित नहीं किया कि मैं वैष्णव वैष्णव

320
00:22:22,320 --> 00:22:26,800
अपराधी हूं ये हूं वो हूं जो अब आप आरोप लगा करके

321
00:22:26,800 --> 00:22:28,960
और

322
00:22:28,960 --> 00:22:33,200
छाता पकड़ के पतली गली से निकलने का प्रयास कर रहे हो क्योंकि

323
00:22:33,200 --> 00:22:37,280
अपने मत की पुष्टि नहीं हो सकती है हम तो ये

324
00:22:37,280 --> 00:22:42,000
सारी बातें हो गई वचन भंगता अन्याय

325
00:22:42,000 --> 00:22:44,800
सहष्णुता

326
00:22:44,800 --> 00:22:50,800
और मिथ्याप

327
00:22:51,440 --> 00:22:55,760
बहाने यह सब करते हुए इन्होंने कहा कि अब मैं

328
00:22:55,760 --> 00:22:59,760
जो है चर्चा करने नहीं आऊंगा। अब हम कुछ

329
00:22:59,760 --> 00:23:04,160
जो पिछली अब क्योंकि लाइव लगा ही रखी थी।

330
00:23:04,160 --> 00:23:08,160
है ना अनंकेत जी लाइव हम लोगों ने पहले कर रखी

331
00:23:08,160 --> 00:23:12,240
थी। तो मैंने कहा कि चलो ठीक है। लाइव लगा रखी

332
00:23:12,240 --> 00:23:16,320
है। तो अह कुछ

333
00:23:16,320 --> 00:23:20,320
बातें हो जाए। तो पहले अब इतना

334
00:23:20,320 --> 00:23:24,640
समझ लिया कि अभी क्यों नहीं आ रहे इनसे मेरी क्या-क्या बातें हुई है

335
00:23:24,640 --> 00:23:28,800
कौन फोन कॉल्स पर ये हमने समझ लिया है अब जरा उस दिन की

336
00:23:28,800 --> 00:23:32,880
समीक्षा कर लेते हैं जो जो इन्होंने चीजें कही थी उसके बारे में

337
00:23:32,880 --> 00:23:37,440
जब प्रमाणिकता का विषय चल रहा है पहले उसकी बात करते हैं

338
00:23:37,440 --> 00:23:41,440
जो इनका तर्क ये था कि भाई मैं प्रमाणिक

339
00:23:41,440 --> 00:23:45,760
किसी को इसलिए मानता हूं क्योंकि वो अकाट है अकाट बातें बोलते

340
00:23:45,760 --> 00:23:49,920
ठीक है तो जो अकाट बातें

341
00:23:49,920 --> 00:23:54,640
बोलता है वो सत्यवादी भी होता है। यह कहां लिखा है?

342
00:23:54,640 --> 00:23:58,640
कैसे माना जाए? कोई बहुत इंटेलेक्चुअल पर्सन है, कोई

343
00:23:58,640 --> 00:24:00,160
बहुत अच्छा पर्सन है,

344
00:24:00,160 --> 00:24:04,320
बहुत बुद्धिमान है। परंतु वो सत्य भी बोल रहा है।

345
00:24:04,320 --> 00:24:08,320
ये कैसे आप विश्वास करेंगे? जिस विषय में शब्द ही

346
00:24:08,320 --> 00:24:12,400
प्रमाण है, उस विषय में किसी की योग्यता, किसी की तार्किकता कुछ नहीं

347
00:24:12,400 --> 00:24:16,480
करेगी। जिस विषय में हमें मोक्ष मिलेगा गायत्री मंत्र से

348
00:24:16,480 --> 00:24:20,480
हरे कृष्णा मंत्र से तो इस विषय में हमने शब्द

349
00:24:20,480 --> 00:24:24,960
प्रमाण माना गया है हमने माना है शास्त्रों को वेदों को तो शास्त्रों

350
00:24:24,960 --> 00:24:29,040
से जो अपना प्रामाणिक संबंध सिद्ध करेगा

351
00:24:29,040 --> 00:24:33,040
वो उस विषय में हमारे लिए प्रमाणिक होगा ना कि कोई तार्किक तार्किक

352
00:24:33,040 --> 00:24:37,120
तो बुद्ध भी थे पर झूठ बोला वेद

353
00:24:37,120 --> 00:24:41,120
गलत है बोला ना अच्छा भगवान से बड़ा तार्किक है

354
00:24:41,120 --> 00:24:45,120
क्या कोई दुनिया में नहीं है। क्या कृष्ण

355
00:24:45,120 --> 00:24:49,840
के रूप में झूठ नहीं बोला? क्या मोहिनी के रूप में झूठ नहीं बोला?

356
00:24:49,840 --> 00:24:54,000
बुद्ध के रूप में झूठ नहीं बोला। इसका मतलब तार्किक व्यक्ति

357
00:24:54,000 --> 00:24:58,080
भी झूठ बोल सकता है। तो प्रामाणिकता तो आपको

358
00:24:58,080 --> 00:25:02,400
यह सिद्ध करनी पड़ेगी कि हमने वही बोल रहे हैं जो हमारे गुरुओं

359
00:25:02,400 --> 00:25:06,960
ने बोला है। अच्छा अगर मैं अगर मैं अकाट्य

360
00:25:06,960 --> 00:25:11,040
बातें बोल रहा हूं। तार्किक बातें बोल रहा हूं। इसका मतलब यह है कि मैं दुनिया

361
00:25:11,040 --> 00:25:15,120
की किसी भी किताब पर क्लेम कर सकता हूं। इस किताब का अर्थ मैं बताऊंगा

362
00:25:15,120 --> 00:25:15,620
और

363
00:25:15,360 --> 00:25:19,360
मान लो चाहे मैं आपको फिजिक्स का अर्थ बता रहा हूं और उसमें बता रहा

364
00:25:19,360 --> 00:25:22,080
हूं

365
00:25:22,080 --> 00:25:26,080
तो इत्यादि का अर्थ यदा धर्मस

366
00:25:26,080 --> 00:25:30,480
ये लिखा है केमिस्ट्री का अर्थ बताने के नाम पे और मैं ये बोलने लगूं

367
00:25:30,480 --> 00:25:34,480
ऐसे नहीं चलेगा ना मुझे केमिस्ट्री की उस फलाने से अपनी

368
00:25:34,480 --> 00:25:38,560
जो प्रत्यक्ष प्रमाणिकता है वो बतानी पड़ेगी तो ये

369
00:25:38,560 --> 00:25:43,120
आपका पक्ष गलत था यदि मान ले कि तार्किक

370
00:25:43,120 --> 00:25:47,120
ता और काटता ही किसी को किसी विषय में प्रमाणिक सिद्ध कर

371
00:25:47,120 --> 00:25:51,360
देती है। तो फिर परंपरा क्यों छाप रहा है इस कौन?

372
00:25:51,360 --> 00:25:55,520
क्यों बता रहा है हमारे गुरु ये हमारे गुरु ये और जब उन गुरुओं में संबंध

373
00:25:55,520 --> 00:25:59,520
के बारे में प्रमाणिकता हम पूछ रहे हैं तो तुम कह रहे हो अकाटता है जब

374
00:25:59,520 --> 00:26:03,600
अकाटता ही आधार है तो सब छोड़ो आचार प्रस जैसे को पकड़ पकड़ सकता

375
00:26:03,600 --> 00:26:07,920
है फिर तो व्यक्ति क्यों पूछते हो परंपरा किसने तुम्हें बनाया आचार्य

376
00:26:07,920 --> 00:26:12,000
पूछते हो ना वहां ये थोड़ी ना कि उसकी बातों को काटो वो तो बाद की

377
00:26:12,000 --> 00:26:18,000
बात है काटेंगे मगर किसने तुम्हें बनाया आचार्य पूछते हैं ना

378
00:26:18,320 --> 00:26:22,480
जिसकी वेदों में निष्ठा है उसको यदि तुम यह सिद्ध

379
00:26:22,480 --> 00:26:26,720
करना चाहते हो कि हम तुम्हें वेदों का अर्थ बता रहे हैं तो वेदों के साथ अपने

380
00:26:26,720 --> 00:26:30,640
कनेक्शन को तुम्हें प्रत्यक्ष प्रमाणों से सिद्ध करना पड़ेगा।

381
00:26:30,640 --> 00:26:34,960
उन प्रमाणों से सिद्ध करना पड़ेगा जिन प्रमाणों से जिन प्रमाणों

382
00:26:34,960 --> 00:26:40,400
पर सामने वाला भी प्रमाण्य बुद्धि रखता हो। दूसरी बात

383
00:26:40,400 --> 00:26:45,040
यदि आप कहो कि भाई मैंने अपनी तार्किकता से सूझबूझ से विवेक से बुद्धिमता

384
00:26:45,040 --> 00:26:49,440
से यह सब पता कर लिया कि यही व्यक्ति प्रमाणिक है तो

385
00:26:49,440 --> 00:26:53,440
आप समाज के लिए प्रमाणिक नहीं हो। समाज के लिए शास्त्र

386
00:26:53,440 --> 00:26:57,520
प्रमाणिक है। महापुरुष जिन जिन में उनका विश्वास है वह प्रमाणिक है। आप

387
00:26:57,520 --> 00:27:01,600
नहीं हो। तो आपकी अपनी आस्था हो गई, निष्ठा हो गई किसी के लिए कि भाई वो

388
00:27:01,600 --> 00:27:05,600
मेरे मैंने देखा वो अकाट है और मैंने अपनी सूझबूझ से कर लिया। तो

389
00:27:05,600 --> 00:27:09,680
आप उसे प्रमाणिक मत कहो। कहो मेरा विश्वास। प्रामाणिक तो

390
00:27:09,680 --> 00:27:13,760
तभी सिद्ध होंगे जब आप उस प्रमाण से उसकी प्रमाणिकता

391
00:27:13,760 --> 00:27:17,840
सिद्ध करोगे जिस प्रमाण के प्रति समाज की भी प्रमाण्य बुद्धि

392
00:27:17,840 --> 00:27:22,320
होगी। और समाज की प्रमाण बुद्धि शास्त्रों पे है,

393
00:27:22,320 --> 00:27:26,400
प्रत्यक्ष प्रमाणों पे है, वेदों पे है।

394
00:27:26,400 --> 00:27:31,200
ठीक है? आगे चलते हैं।

395
00:27:31,200 --> 00:27:35,200
तो अपनी बुद्धि से चयनित चयनित व्यक्ति में श्रद्धा को

396
00:27:35,200 --> 00:27:39,520
प्रमाणिक नहीं कह सकते। अपनी बुद्धि से चयनित व्यक्ति के प्रति

397
00:27:39,520 --> 00:27:45,360
आप विश्वास होने की बात को कह सकते हैं। ठीक है?

398
00:27:45,360 --> 00:27:49,680
अब प्रमाणिकता के विषय में कुछ बात बता दूं कि नित्यानंद परिवार

399
00:27:49,680 --> 00:27:53,840
के जो आचार्य हैं रघुनाथ दास शास्त्री वृंदावन में उनका

400
00:27:53,840 --> 00:27:57,840
आश्रम है। उनसे जब मैं मिला था तो उन्होंने बताया था कि इनके

401
00:27:57,840 --> 00:28:01,840
यहां पर जो पूजा पद्धति होती है उसमें होता यह है कि भगवान का स्मरण

402
00:28:01,840 --> 00:28:05,840
करते समय गडिया संप्रदाय में भगवान का स्मरण करते

403
00:28:05,840 --> 00:28:09,920
समय अपना चित्रण सोचा जाता है कि मैं किस रूप

404
00:28:09,920 --> 00:28:14,160
में भगवान की सेवा कर रहा हूं। मंजरी के रूप में या

405
00:28:14,160 --> 00:28:18,240
सखा या सखा के अनुगत के रूप में तो वह जो मंजरी

406
00:28:18,240 --> 00:28:22,320
के रूप में भी अगर मैं कर रहा हूं तो हर परिवार के पास वो जो मंजरी का विवरण

407
00:28:22,320 --> 00:28:26,320
है कि उसकी आयु कितनी होगी उसके पास कौन-कौन से आभूषण होंगे

408
00:28:26,320 --> 00:28:30,560
उसका वस्त्र किस कैसा होगा ये सारा जो परंपरा

409
00:28:30,560 --> 00:28:34,720
प्राप्त जो इनके आगे प्रामाणिक गड़िया वैष्णव आचार्य उनके पास ये अभी

410
00:28:34,720 --> 00:28:39,200
भी पोथी पत्रे रखे हुए हैं।

411
00:28:39,200 --> 00:28:43,280
ठीक है? तो गिया वैष्णव से इनकी प्रमाणिकता सिद्ध इसलिए नहीं होती

412
00:28:43,280 --> 00:28:49,200
क्योंकि इनके पास वो मंजरी का विवरण है ही नहीं।

413
00:28:49,200 --> 00:28:53,520
जो मंजरी के भाव में अपने आप को सोचना है ना कि हम वहां पर इस तरह से सेवा

414
00:28:53,520 --> 00:28:57,600
करेंगे। सेवा का विवरण होता है। आयु का विवरण होता है। वस्त्र

415
00:28:57,600 --> 00:29:02,560
का विवरण होता है। हम नाम होता है।

416
00:29:02,560 --> 00:29:06,560
कि कौन सा नाम मिलेगा भक्त को। तो किस भक्त को कौन सा नाम मिलना है? ये सब

417
00:29:06,560 --> 00:29:10,720
विवरण इनके जितने भी परिवार हैं उन परिवारों के पास परंपरा

418
00:29:10,720 --> 00:29:14,960
से सुरक्षित है। जो इस के पास नहीं आए क्योंकि इस ने विरुद्ध

419
00:29:14,960 --> 00:29:18,960
जाकर के एक वो मठ नाम से कोई संस्था गिया मठ नाम से वो चालू करके मिलती

420
00:29:18,960 --> 00:29:23,200
जुलती संस्था और ऐसा करते हुए अपने को चालू कर लिया। ठीक है?

421
00:29:23,200 --> 00:29:28,240
जिसको 64

422
00:29:28,240 --> 00:29:32,800
कोई भी कोई भी प्रामाणिक व्यक्ति उसको प्रमाणिक नहीं मानता।

423
00:29:32,800 --> 00:29:38,800
अच्छा यह तो हो गई प्रामाणिकता की बात। इसके बाद क्या है?

424
00:29:39,840 --> 00:29:44,000
इन्होंने कहा कि कलयुग में सभी शूद्र हैं।

425
00:29:44,000 --> 00:29:48,080
यह बात भागवत में लिखी है। मगर यह

426
00:29:48,080 --> 00:29:52,400
बात भागवत में हमें तो नहीं मिली और हमने इनसे मांगा भी उसी समय WhatsApp

427
00:29:52,400 --> 00:29:56,640
इत्यादि के माध्यम से तो नहीं मिली। स्कंद पुराण में कहीं विवरण मिलता

428
00:29:56,640 --> 00:30:00,640
है। पहली बात तो यह है कि इसको भी उसी बात उसी रूप में

429
00:30:00,640 --> 00:30:04,880
लेना पड़ेगा इस बात को कि कलयुग में सभी ऐसा

430
00:30:04,880 --> 00:30:09,440
ऐसा हो जाएगा तो जब यह मान लिया है भविष्यवाणी कर दी है

431
00:30:09,440 --> 00:30:13,440
कि कलयुग में पतित हो जाएंगे लोग तो जब वो भविष्यवाणी कर दी

432
00:30:13,440 --> 00:30:17,520
है तब उस भविष्यवाणी के आधार पर ये बोला जा रहा है कि जब कलयुग में सभी

433
00:30:17,520 --> 00:30:21,520
शूद्र है पतित हो जाएंगे वो उस स्थिति को लागू करते

434
00:30:21,520 --> 00:30:25,680
हुए ये बात मानी जा रही है कि शद्र है शूद्र है ही यह

435
00:30:25,680 --> 00:30:29,760
घोषित नहीं किया है। नहीं तो भागवत पुराण में ही

436
00:30:29,760 --> 00:30:34,720
12 स्कंध के दूसरे अध्याय में

437
00:30:34,720 --> 00:30:38,720
जो है कलयुग का विवरण चल रहा है। वहां पर पतित होने की भविष्यवाणी की जा

438
00:30:38,720 --> 00:30:42,800
रही है। तो जब है तो भविष्यवाणी व्यर्थ है। वो जो श्लोक

439
00:30:42,800 --> 00:30:43,520
है वो सब व्यर्थ

440
00:30:43,520 --> 00:30:47,760
है। वहां पर भी है होना चाहिए। हो जाएंगे

441
00:30:47,760 --> 00:30:51,760
कलयुग में है। होने वाले

442
00:30:51,760 --> 00:30:55,840
हैं या है? तो इस तरीके से कंट्राडिक्शन आ जाएगा शास्त्रों में तो

443
00:30:55,840 --> 00:31:00,560
हमें यही मानना पड़ेगा और दूसरी एक संगति और नहीं बैठती

444
00:31:00,560 --> 00:31:04,640
कि व्यवहारिक रूप से शास्त्रों की रचना महाभारत काल में जो

445
00:31:04,640 --> 00:31:08,640
लिपिबद्ध कर रहे हैं व्यास जी कर रहे हैं। भविष्य पुराण में भी भविष्य

446
00:31:08,640 --> 00:31:12,720
की संभावना व्यक्त की गई है। तो ऐसे में ये जो है वाली बात

447
00:31:12,720 --> 00:31:16,880
है इससे तो ये होगा कि वो अभी लिखा जा रहा है। कलयुग में सभी शूद्र

448
00:31:16,880 --> 00:31:19,200
है।

449
00:31:19,200 --> 00:31:23,520
भाई उस समय कलयुग नहीं था ना जिस समय लिपिबद्ध हो रहा था। कलयुग तो आज है

450
00:31:23,520 --> 00:31:27,520
तो उस समय है वाली बात कैसे लिखेंगे तो यह दिक्कत है तो

451
00:31:27,520 --> 00:31:32,080
कई रीज्स है कि कलयुग में सभी शूद्र नहीं है। अच्छा और आगे चलते हैं।

452
00:31:32,080 --> 00:31:36,080
यदि सभी शूद्र है तो शूद्र का तुम जनेऊ कैसे करा

453
00:31:36,080 --> 00:31:42,080
रहे हो? शूद्र के जनेऊ की विधि क्या है? यहां पे भी वही आ जाएगा मनमाना आचरण।

454
00:31:42,400 --> 00:31:46,720
शूद्र के जनेऊ की विधि क्या है? भाई ब्राह्मण का जनेऊ होगा

455
00:31:46,720 --> 00:31:50,800
आठ से 11 वर्ष की आयु में। आठ से 12 वर्ष की आयु में और इसी क्रम

456
00:31:50,800 --> 00:31:54,800
में आगे क्षत्रिय और वैश्य का होगा। शद्र का है ही नहीं। किस आयु में

457
00:31:54,800 --> 00:31:58,560
होगा। इसी प्रकार से ब्राह्मण कौन सा

458
00:31:58,560 --> 00:32:02,640
क्या धारण करेगा और कुछ और भी विधियां होती है

459
00:32:02,640 --> 00:32:06,640
जो ब्राह्मण से ब्राह्मण की अलग वैश्य की

460
00:32:06,640 --> 00:32:10,640
अलग शूद्र की अलग होती है तो यदि आप ये कह रहे हो

461
00:32:10,640 --> 00:32:15,200
कि कलयुग में सभी शूद्र है तो वहां

462
00:32:15,200 --> 00:32:19,360
पे संस्कार होने से पूर्व ही ये सुनिश्चित करना है कि कौन ब्राह्मण

463
00:32:19,360 --> 00:32:23,600
है कौन शूद्र है कौन वैश्य है कौन क्षत्रिय है संस्कार

464
00:32:23,600 --> 00:32:27,680
है जो यज्ञ पवीत उससे पहले ही यह सुनिश्चित करना है कि कौन ब्राह्मण

465
00:32:27,680 --> 00:32:31,760
क्षत्रिय वैश्य शद्र है तो कैसे करोगे फिर जब सभी शूद्र है

466
00:32:31,760 --> 00:32:35,840
तो तो किसी का उपनयन होगा ही नहीं तो तुम्हारे यहां उपनयन क्यों हो रहा है

467
00:32:35,840 --> 00:32:39,920
तो मनमुखी हो रहा है हो रहा है ना मनमुखी

468
00:32:39,920 --> 00:32:44,080
तो फिर जब मनमुखी है तो फिर आ गया वैष्णव कैसे क्योंकि श्रुति स्मृति मम

469
00:32:44,080 --> 00:32:49,680
आज्ञा फिर वैष्णव का आ गया

470
00:32:49,680 --> 00:32:54,160
दूसरी बात इस बारे में ऐसा

471
00:32:54,160 --> 00:32:59,040
है कि हमें यह मानना होता है कि प्रायः ऐसा हो जाएगा। प्रायः

472
00:32:59,040 --> 00:33:03,200
लुप्त हो गया है। ठीक है? ऐसा नहीं है कि उस जमाने में किसी को ज्ञान

473
00:33:03,200 --> 00:33:07,360
था ही नहीं। जैसे भगवान ने कहा कि कर्म योग जो है 4.1

474
00:33:07,360 --> 00:33:11,440
दो में ये ज्ञान जो है सूर्य को मैंने दिया था और उसके बाद ये

475
00:33:11,440 --> 00:33:13,920
लुप्त हो गया। तो वहां प्राय वाली भावना लगानी

476
00:33:13,920 --> 00:33:18,400
पड़ेगी। ऐसा नहीं है वो ज्ञान है ही नहीं। लुप्त हो ही गया संसार।

477
00:33:18,400 --> 00:33:22,400
किसी भी आचार्य को नहीं है। किसी भी आचार्य को नहीं

478
00:33:22,400 --> 00:33:26,560
है। किसी भी किसी को भी कर्म योग का ज्ञान नहीं है। तो उसी

479
00:33:26,560 --> 00:33:30,640
महाभारत काल में ही लगभग लगभग मिलता जुलता ज्ञान अन्यों ने

480
00:33:30,640 --> 00:33:34,880
भी कहा है। उनको तो भगवान कृष्ण ने नहीं कहा वो ज्ञान। यानी

481
00:33:34,880 --> 00:33:38,880
वो ज्ञान था। समाज में था। प्रायः लुप्त जैसा हो गया

482
00:33:38,880 --> 00:33:42,960
है। जैसे प्रायः धर्म नष्ट हो रहा है। मगर धर्म

483
00:33:42,960 --> 00:33:47,200
नष्ट नहीं हो गया है। माता को माता कहा जा रहा है। बहन को बहन

484
00:33:47,200 --> 00:33:51,360
कहा जा रहा है। नष्ट नहीं हो गया है। मगर प्रायः

485
00:33:51,360 --> 00:33:56,960
लगभग लगभग खत्म हो रहा है। धीरे-धीरे ऐसे। ठीक है?

486
00:33:56,960 --> 00:34:02,960
तो यहां प्रायः वाली बात है। दूसरी बात

487
00:34:03,520 --> 00:34:09,040
तो ये सारी चीजें हो गई। अब जरा इनके वो जो अ

488
00:34:09,040 --> 00:34:14,000
कुतर्क थे। भगवान में अभाव होना चाहिए। उन पर जरा बात कर लेते हैं।

489
00:34:14,000 --> 00:34:18,160
हां भगवान में अभाव होना चाहिए। सबसे पहली बात तो यह है कि

490
00:34:18,160 --> 00:34:22,560
शास्त्र का प्रमाण कहां है कि जो

491
00:34:22,560 --> 00:34:26,640
थोड़ा सा अपूर्ण होगा वही पूर्ण होगा। ये कहां से लिया जाए

492
00:34:26,640 --> 00:34:30,720
शास्त्र से? भगवान में अपूर्णता है। यह

493
00:34:30,720 --> 00:34:34,720
बात शास्त्र में कहां कही गई है? यह बात इन्होंने नहीं बताई। दूसरी बात

494
00:34:34,720 --> 00:34:38,880
यह है कि जब अभाव युक्त को हम

495
00:34:38,880 --> 00:34:43,120
पूर्ण कहेंगे पूर्ण तो वही है जो अभाव युक्त है

496
00:34:43,120 --> 00:34:47,200
तो फिर अभाव रहित को हम क्या कहेंगे उसके लिए कोई और शब्द

497
00:34:47,200 --> 00:34:51,920
वही वाली बात कि भैया जो है

498
00:34:51,920 --> 00:34:56,480
सर्वशक्तिमान का मतलब यह नहीं है कि वो सब कुछ कर सके

499
00:34:56,480 --> 00:35:00,480
सर्वशक्तिमान का मतलब तो यह है कि वो अपना कार्य खुद कर सके ठीक है भैया ले लो

500
00:35:00,480 --> 00:35:04,800
अब तुम हमें यह बता दो जो सब कुछ कर सके उसको क्या कहोगे यह भी तो बताते

501
00:35:04,800 --> 00:35:10,800
जाओ उसको क्या कहोगे? सर्वशक्तिमान

502
00:35:11,090 --> 00:35:14,480
[हंसी]

503
00:35:14,480 --> 00:35:18,480
हम तो जहां व्यक्ति खत्म हो रहा होता है वहां से शुरू करते हैं

504
00:35:18,480 --> 00:35:22,480
ना। इधर उधर होने ही नहीं देंगे। अब सामने

505
00:35:22,480 --> 00:35:26,560
वाला कहता है कि सन शक्तिमान का मतलब ये नहीं है। वो सब कुछ कर

506
00:35:26,560 --> 00:35:30,640
सकता है। उसका मतलब वो अपने काम कुदरत ठीक है। मान लिया प्रभु। अब

507
00:35:30,640 --> 00:35:34,960
ये बता दो कि जो सब कुछ कर सकता है उसको क्या कहेंगे?

508
00:35:34,960 --> 00:35:39,600
उसको कम शक्तिमान कहेंगे। कम [हंसी] जो

509
00:35:39,600 --> 00:35:44,000
सिर्फ अपना काम कर सके वह सर्वशक्तिमान है

510
00:35:44,000 --> 00:35:48,480
और जो सब कुछ कर सके वो कम शक्तिमान है। तो इनकी

511
00:35:48,480 --> 00:35:52,720
चीजें बाहर आएंगी। इसी प्रकार से जिसमें अभाव है

512
00:35:52,720 --> 00:35:56,720
यदि वो पूर्ण है तो जिसमें अभाव नहीं है उसको क्या कहेंगे? अब

513
00:35:56,720 --> 00:36:00,800
तुम बदल दोगे। तुम कहोगे कि वह अपूर्ण है। जिसमें अभाव

514
00:36:00,800 --> 00:36:04,880
नहीं है और जिसमें अभाव है वह पूर्ण है। तो तुम्हारी जनता तुम्हारा नाटक देखेगी।

515
00:36:04,880 --> 00:36:09,360
खैर उस नाटक पर भी प्रहार होगा। आप थोड़ा सा इंतजार

516
00:36:09,360 --> 00:36:14,960
करें। अच्छा

517
00:36:14,960 --> 00:36:19,280
अब आगे एक बात आती है कि जिस जो स्वरूप

518
00:36:19,280 --> 00:36:23,440
से ही यदि अभाव अभाव अपने आप

519
00:36:23,440 --> 00:36:27,520
में एक ऐसे ऐसा शब्द है जिसकी सत्ता है ही

520
00:36:27,520 --> 00:36:31,600
नहीं। दो6 में भगवान ने क्या कहा? असत की

521
00:36:31,600 --> 00:36:35,920
कभी सत्ता नहीं होती। भगवत गीता

522
00:36:35,920 --> 00:36:38,880
तो

523
00:36:38,880 --> 00:36:42,880
अभाव शब्द का मतलब है जिसका भाव है ही नहीं। ठीक

524
00:36:42,880 --> 00:36:46,880
है? अब आपने कहा कि भगवान में उसका अभाव होना चाहिए। ठीक

525
00:36:46,880 --> 00:36:51,040
है मान लिया है थोड़ी देर के लिए मान लिया है। मगर उस अभाव की पूर्ति कैसे

526
00:36:51,040 --> 00:36:53,200
होगी?

527
00:36:53,200 --> 00:36:58,240
भाई जिसका भाव ही नहीं है। जिसका अस्तित्व ही नहीं है। जिसकी सत्ता है ही नहीं।

528
00:36:58,240 --> 00:37:02,320
उसको आपने मान लिया। ठीक है? कि भगवान में होना चाहिए। पूर्ति कैसे

529
00:37:02,320 --> 00:37:06,880
करोगे? जिसकी सत्ता है ही नहीं। यदि वो आयातित आ भी जाएगा

530
00:37:06,880 --> 00:37:10,960
तो उसका आना सिद्ध कैसे होगा? कैसे माना जाएगा? अभाव की पूर्ति

531
00:37:10,960 --> 00:37:16,000
हो गई। हम अच्छा दूसरी बात

532
00:37:16,000 --> 00:37:20,480
अगर यह मानते हो कि किसी क्रिया, स्थिति, परिस्थिति,

533
00:37:20,480 --> 00:37:24,480
सामग्री का अभाव है। ठीक है। यहां तो अभाव का

534
00:37:24,480 --> 00:37:29,520
अभाव की बात हो रही थी अभी तक कि अभाव का अभाव भगवान में

535
00:37:29,520 --> 00:37:30,020
मानना

536
00:37:30,000 --> 00:37:34,240
पड़ेगा कि अभाव का अभाव तो है। है ना? तो अभाव

537
00:37:34,240 --> 00:37:38,560
का अभाव अगर भगवान में मान लेंगे तो स्वतंत्र रूप से अभाव कोई

538
00:37:38,560 --> 00:37:42,720
चीज है ही नहीं। वो एक्सिस्ट ही नहीं करती। भाव जिसका भाव ना हो

539
00:37:42,720 --> 00:37:46,720
तो जिसका भाव नहीं है उसका अभाव अगर मान लिया मान भी लिया कि वो अभाव

540
00:37:46,720 --> 00:37:50,800
है तो उस अभाव की पूर्ति तो हो ही नहीं सकती। उसका वहां पर अभाव होना

541
00:37:50,800 --> 00:37:54,800
भी सिद्ध नहीं होगा। अभाव के अभाव का अभाव के अभाव

542
00:37:54,800 --> 00:37:58,800
का भाव होना यानी अभाव का अभाव होना भी सिद्ध नहीं होगा। क्योंकि

543
00:37:58,800 --> 00:38:02,880
उसका तो अस्तित्व है ही नहीं। जिसका भाव ही नहीं है जो अपने आप

544
00:38:02,880 --> 00:38:08,320
में शून्य है कुछ नहीं है नथिंगनेस ठीक है

545
00:38:08,320 --> 00:38:13,040
हां अब कहते हैं कि फलानी चीज का अभाव है जैसे उस लड़के ने कहा

546
00:38:13,040 --> 00:38:17,040
कि दुनिया में ये सब काउंटर तो उस दिन हम

547
00:38:17,040 --> 00:38:21,200
लोग कर ही नहीं पाए थे क्योंकि बात तो यहां अटक गई थी कि तुम पहले इस से तो दिखा दो हम तब मकजमारी

548
00:38:21,200 --> 00:38:25,280
करें मगर बाद में हमें पता लगा कि अमोग लीला ये भी कर रहे हैं तो

549
00:38:25,280 --> 00:38:31,280
मैंने देखा भाई कैसे साइको बनाए जा रहे हैं इस में हां

550
00:38:31,920 --> 00:38:36,400
मतलब साइको तैयार किए जा रहे हैं। भगवान में अभाव होगा। ठीक। चलो

551
00:38:36,400 --> 00:38:41,280
अब उनकी ही दुनिया में उतर करके उनको जवाब देते हैं। तो

552
00:38:41,280 --> 00:38:45,440
अब अभाव का अभाव तो हो नहीं सकता। ना तो अभाव का अभाव हो सकता है ना भाव हो

553
00:38:45,440 --> 00:38:49,440
सकता है। मतलब भगवान में ये नहीं माना सकता अभाव का अभाव और ना ये माना जा सकता है

554
00:38:49,440 --> 00:38:53,520
कि अभाव के अभाव की पूर्ति हो गई। यह भी नहीं माना सकता। अच्छा दूसरी बात

555
00:38:53,520 --> 00:38:56,240
यह है

556
00:38:56,240 --> 00:39:00,320
कि अगर किसी सामग्री का

557
00:39:00,320 --> 00:39:04,560
तत्व का परिस्थिति का क्रिया का अभाव मानेंगे भगवान

558
00:39:04,560 --> 00:39:08,800
तो यह मानना पड़ेगा कि भगवान में वो सामग्री नहीं

559
00:39:08,800 --> 00:39:12,880
है। भगवान में वो क्रिया नहीं है। वो परिस्थिति नहीं है। ठीक?

560
00:39:12,880 --> 00:39:17,120
नहीं है। तो अब वो परिस्थिति एकिस्ट करती है कि नहीं?

561
00:39:17,120 --> 00:39:21,360
सनातन रूप से तभी तो भगवान को उसकी आवश्यकता है। अगर एक्सिस्ट

562
00:39:21,360 --> 00:39:25,520
करती तो कहां करती उसका अधिष्ठान क्या है? अंतरिक्ष में लटकी हुई है या कोई

563
00:39:25,520 --> 00:39:30,240
और भगवान से भी परम भगवान है जिसके दिमाग में वो है जैसे मान लिया

564
00:39:30,240 --> 00:39:34,560
कि भगवान में रस का अभाव है जिसने कहा था रस का अभाव तो वो रस

565
00:39:34,560 --> 00:39:38,560
एक्सिस्ट कहां कर रहा था? भगवान से इतर क्योंकि भगवान से इतर तो कुछ

566
00:39:38,560 --> 00:39:44,560
है ही नहीं। है क्या? अनिकेत जी

567
00:39:45,200 --> 00:39:49,920
भगवान बाहर भगवान से स्वतंत्र रूप से

568
00:39:49,920 --> 00:39:53,920
रस को एक्सिस्ट करना पड़ेगा ना तब तो उसका अभाव मानेंगे भगवान में

569
00:39:53,920 --> 00:39:58,640
और अगर हमने भगवान से स्वतंत्र हो के रस का एक्सिस्टेंस मान लिया

570
00:39:58,640 --> 00:40:03,280
तो उसका अधिष्ठान जो होगा वो भगवान से बड़ा ईश्वर हो गया

571
00:40:03,280 --> 00:40:07,520
क्योंकि भगवान का भी वो चाहिए उसे अगर स्वतंत्र रूप से रस

572
00:40:07,520 --> 00:40:11,760
को ही मान लिया वो एक्सिस्ट करता है वो अपने आप में तो

573
00:40:11,760 --> 00:40:16,320
भी वो स्वतंत्र रूप से होने के कारण भगवान का भी भगवान हो गया।

574
00:40:16,320 --> 00:40:20,320
अच्छा या तो ये कहे ये रस से प्राप्त होने वाला

575
00:40:20,320 --> 00:40:24,480
जो सुख है जो इस क्रिया से वो प्राप्त होना है। इस क्रिया

576
00:40:24,480 --> 00:40:28,720
की जानकारी और इस क्रिया से प्राप्त होने वाला जो सुख है वो भगवान में पहले

577
00:40:28,720 --> 00:40:33,040
से था। अगर नहीं था अगर आपका वो नहीं था

578
00:40:33,040 --> 00:40:37,520
तो उसका होना कैसे सिद्ध करोगे? फिर अधिष्ठान चाहिए होगा बाहर कि किस में है? अंतरिक्ष

579
00:40:37,520 --> 00:40:41,600
में किसी के मन में है वो जो सुख है कहां पे है वो एक्सिस्ट करता

580
00:40:41,600 --> 00:40:45,760
है कि नहीं करता अगर एक्सिस्ट नहीं करता है तो यानी कि वो सनातन

581
00:40:45,760 --> 00:40:49,920
नहीं है और यदि उसको आप भगवान का स्वरूप भूत अंग

582
00:40:49,920 --> 00:40:55,040
बना दोगे जो सनातन नहीं है तो भगवान सनातन नहीं है

583
00:40:55,040 --> 00:40:59,120
भगवान की नित्यता कट जाएगी जो सदा के लिए रहने

584
00:40:59,120 --> 00:41:00,400
वाली चीज नहीं है जिसको तुम

585
00:41:00,400 --> 00:41:04,400
उत्पन्न कर रहे हो जो है ही नहीं है ना वो सनातन

586
00:41:04,400 --> 00:41:08,720
तो है नहीं वो उत्पन्न हो रही है क्योंकि पहले वैसे तो थी नहीं क्योंकि सत

587
00:41:08,720 --> 00:41:12,800
का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी भाव नहीं

588
00:41:12,800 --> 00:41:16,800
होता तो यदि रथ वाला जो सुख है वो उत्पन्न हो रहा है

589
00:41:16,800 --> 00:41:20,880
वो था नहीं ठीक है अगर था तो फिर कहां

590
00:41:20,880 --> 00:41:24,880
था अधष्ठान क्या है उसका और अगर नहीं था तो उसको यदि आप

591
00:41:24,880 --> 00:41:28,960
भगवान से जोड़ रहे हैं तो भगवान फिर वहां पर भगवान की जो नित्यता है

592
00:41:28,960 --> 00:41:32,960
वो भंग हो रही है भगवान के सनातन सिद्ध नहीं

593
00:41:32,960 --> 00:41:38,000
होंगे अच्छा

594
00:41:38,000 --> 00:41:43,040
इसमें एक बात और माननी पड़ेगी प्रतीक की

595
00:41:43,040 --> 00:41:47,760
कि ईश्वर भी मुक्ति ढूंढ रहा है ईश्वर में अभाव है रस का

596
00:41:47,760 --> 00:41:51,760
और ईश्वर रस प्राप्त कर रहा है सृष्टि बना करके तो सृष्टि

597
00:41:51,760 --> 00:41:55,840
बना के ईश्वर मुक्त हो रहा है भाई हम लोग मुक्त थोड़ी ना होने

598
00:41:55,840 --> 00:41:59,920
ईश्वर मुक्ति पा रहा है भाई हम लोग अपने अभाव से मुक्ति पाते वो

599
00:41:59,920 --> 00:42:04,240
अपने अभाव से मोक्ष तो उसको भी चाहिए ईश्वर को जबकि

600
00:42:04,240 --> 00:42:08,560
मोक्ष क्या है जिसे प्राप्त करने के बाद कुछ और प्राप्त करना

601
00:42:08,560 --> 00:42:12,560
शेष नहीं रहता। तो हम तो भगवान को प्राप्त कर रहे हैं। भगवान मोक्ष को और प्राप्त

602
00:42:12,560 --> 00:42:17,040
कर रहे हैं। दूसरे खिचड़ी देखिए आप। अच्छा

603
00:42:17,040 --> 00:42:23,040
एक चीज और है कि

604
00:42:23,440 --> 00:42:27,600
भगवान को रस के सुख का ज्ञान था कि नहीं था?

605
00:42:27,600 --> 00:42:31,520
अगर नहीं था तो सर्वज्ञ नहीं है।

606
00:42:31,520 --> 00:42:35,520
नहीं है ना? और यदि जो रस

607
00:42:35,520 --> 00:42:39,600
का सुख है वो आ रहा है जा रहा है आ रहा है जा रहा है तो एक बार आ

608
00:42:39,600 --> 00:42:43,680
गया चलो एक बार बना लिया फिर दोबारा सृष्टि नहीं बनेगी दोबारा कल्प

609
00:42:43,680 --> 00:42:47,840
कल्पांतर चालू नहीं होंगे क्योंकि उसको तो सुख मिल गया या तो फिर मानना पड़ेगा

610
00:42:47,840 --> 00:42:52,080
वो सुख भूल जाता है बार-बार भगवान वो सुख

611
00:42:52,080 --> 00:42:56,640
जो है भगवान के अंदर से समाप्त होता है हमारी तरह तो है ना भगवान क्योंकि

612
00:42:56,640 --> 00:43:01,680
हम फिर आखिर में बात आ जाती है भगवान में कंट्राडिक्शन मानना पड़ेगा

613
00:43:01,680 --> 00:43:06,160
ये कहना है इनका इनको WhatsApp किया है। भगवान को कंट्राडिक्शन

614
00:43:06,160 --> 00:43:09,200
मानना पड़ेगा।

615
00:43:09,200 --> 00:43:13,200
तो फिर आप भगवान को परम सत्य क्यों कहते हो? परम

616
00:43:13,200 --> 00:43:17,280
संशय कहा करो। और जीव की

617
00:43:17,280 --> 00:43:21,360
चाह का वास्तविक विषय सिद्ध कैसे होगा? वो ऐसे ईश्वर

618
00:43:21,360 --> 00:43:25,360
की सिद्धि ही नहीं होगी जो परम संशय है। परम सत्य नहीं है। दूसरी

619
00:43:25,360 --> 00:43:29,680
बात ऐसे ईश्वर की सिद्धि नहीं होगी।

620
00:43:29,680 --> 00:43:33,760
ना तो वो आप ईश्वर की सिद्धि कर पाएंगे ऐसे और ना ही धर्म

621
00:43:33,760 --> 00:43:38,480
की सिद्धि कर पाएंगे बना देंगे नास्तिक वो दिव्य कीर्ति वाली बात है ना

622
00:43:38,480 --> 00:43:42,480
दिव्य कीर्ति से एक लड़का पूछ रहा है दुनिया में कोई शाश्वत सत्य है क्या तो

623
00:43:42,480 --> 00:43:46,560
दिव्य कीर्ति कह रहा है कि कोई आंसर नहीं है इसी को आंसर क्यों नहीं मान

624
00:43:46,560 --> 00:43:50,880
लेते हो दिव्य कीर्ति नास्तिक कोई आंसर नहीं

625
00:43:50,880 --> 00:43:54,880
है इसी को आंसर क्यों नहीं मान लेते हो तो यही बात है

626
00:43:54,880 --> 00:43:58,880
ना कि भगवान क्या है परम संशय परम कन्फ्यूजन इस कौन

627
00:43:58,880 --> 00:44:02,960
का भगवान है। ये अभी तक प्रतीक की बातों से पता चला। यद्यपि अभी

628
00:44:02,960 --> 00:44:06,960
वो प्रमाण नहीं आए सामने कि कौन ऐसा मानता है कि नहीं मानता। ठीक

629
00:44:06,960 --> 00:44:11,200
है? सर गोस्वामी के सर गोस्वामियों के मानने

630
00:44:11,200 --> 00:44:15,440
की तो बात बहुत दूर की है। मधवाचार्य जी के मानने की बात तो बहुत दूर की और फिर सनातन

631
00:44:15,440 --> 00:44:20,960
शास्त्रों के द्वारा मानने की बात तो बहुत दूर की है। है ना?

632
00:44:20,960 --> 00:44:26,000
अच्छा एक बात और है कि यह लड़का बोलता है कि

633
00:44:26,000 --> 00:44:30,240
अभाव होना आवश्यक है तो भैया एक ही अभाव के होना आवश्यक है। जैसे ही वो अभाव

634
00:44:30,240 --> 00:44:34,240
की पूर्ति हो गई फिर से वो अभाव होना आवश्यक हो जाएगा। दिक्कत तो ये है ना कि

635
00:44:34,240 --> 00:44:38,240
अभाव की अगर पूर्ति भी कर दोगे जैसे हमारे पास अभाव है। अब

636
00:44:38,240 --> 00:44:42,240
हमने अभाव मान लिया पूर्ति हो गई। अब फिर कंप्लीट हो गया ईश्वर। अब अभाव कहां

637
00:44:42,240 --> 00:44:46,400
है? अब ईश्वर में अभाव क्यों नहीं है? तो ईश्वर में अभाव क्यों नहीं है?

638
00:44:46,400 --> 00:44:50,400
ईश्वर में अभाव होने से यदि ईश्वर की पूर्णता सिद्ध होगी तो ईश्वर में

639
00:44:50,400 --> 00:44:53,520
जैसे ही आप अभाव को मान लोगे फिर से वो पूर्ण हो

640
00:44:53,520 --> 00:44:57,520
जाएगा। फिर से उसके लिए अभाव दूसरा चाहिए होगा। तो ऐसे कर करके दुनिया

641
00:44:57,520 --> 00:45:01,760
के सभी अभाव उसमें फिट हो जाएंगे। फिर एक ही क्यों?

642
00:45:01,760 --> 00:45:07,760
फिर एक ही क्यों?

643
00:45:07,760 --> 00:45:12,080
तो कितने अभाव? अच्छा अगर उसने कहा रस का अभाव मानना पड़ेगा। अरे

644
00:45:12,080 --> 00:45:16,240
भाई क्यों साधु भक्तों का उद्धार करने का अभाव भी मान लो। गिल्ली डंडा खेलने

645
00:45:16,240 --> 00:45:20,480
का अभाव भी मान लो। टन टना टन टन टन टारा मूवी

646
00:45:20,480 --> 00:45:24,640
देखने का अभाव भी मान लो भगवान में सारे अभाव मानने पड़ेंगे एक भी अभाव

647
00:45:24,640 --> 00:45:28,720
नहीं अनंत अभाव और जैसे ही वो मान लिए उसके बाद फिर अभाव

648
00:45:28,720 --> 00:45:32,720
फिर नया भाव लाओ अभाव की तो कोई सीमा ही नहीं

649
00:45:32,720 --> 00:45:36,960
है ना जैसे ही आपने स्वीकार किया कि भगवान में अभाव है भगवान अब पूर्ण

650
00:45:36,960 --> 00:45:41,840
हो गया पूर्ण हो गया तो अब उसमें अभाव क्यों नहीं है फिर से अभाव लाओ

651
00:45:41,840 --> 00:45:45,840
ये है इस का सिद्धांत यही हम दिखा रहे थे वहां संक्षिप्त

652
00:45:45,840 --> 00:45:49,920
करके ये है पागल पागल बनाया जा रहा है भाई इस कौन पागल

653
00:45:49,920 --> 00:45:54,400
फैक्ट्री देख रहे हो कितने कॉन्फिडेंटली व्यक्ति बोल रहा है अपने पागलपन

654
00:45:54,400 --> 00:45:58,400
को कॉन्फिडेंटली ईश्वर में अभाव

655
00:45:58,400 --> 00:46:02,480
नहीं है ये भी तो एक अभाव है ईश्वर में अभाव नहीं

656
00:46:02,480 --> 00:46:06,640
है ये भी तो एक अभाव है देख रहे हो दोबारा बोलता हूं

657
00:46:06,640 --> 00:46:08,560
ईश्वर में अभाव नहीं है ये

658
00:46:08,560 --> 00:46:12,800
भी तो एक अभाव है बस मामा आ गए मामा

659
00:46:12,800 --> 00:46:17,520
आ गए [हंसी]

660
00:46:17,520 --> 00:46:21,520
तो ये सारी बातें हैं। जी शास्त्रवादी

661
00:46:21,520 --> 00:46:24,240
जी

662
00:46:24,240 --> 00:46:28,880
जी जय श्री राम भैया जय श्री राम बहुत जबरदस्त

663
00:46:28,880 --> 00:46:34,400
बहुत जबरदस्त था वो वीडियो मैंने जब उसे देखा ना पूरा

664
00:46:34,400 --> 00:46:38,400
बहुत ही मजेदार था बहुत मजेदार वो जो भाग था

665
00:46:38,400 --> 00:46:42,780
जिसमें आपने उसे मंत्र के मंत्र के लिए बोल दिया कोई मंत्र

666
00:46:42,780 --> 00:46:46,240
[हंसी]

667
00:46:46,240 --> 00:46:51,290
हां सुनाइए तो सुनाना शुरू किया तो हमने कहा था आपने जनों पहना है

668
00:46:51,290 --> 00:46:54,640
[हंसी] तो नहीं

669
00:46:54,640 --> 00:46:57,190
बहुत जबरदस्त

670
00:46:57,190 --> 00:47:01,200
[हंसी] हमारे मैंने देखा है कि अपना एक चैनल ऐसा

671
00:47:01,200 --> 00:47:05,280
है YouTube पर जिसमें लाइव एक्शन देखने को मिलता है बिल्कुल वही

672
00:47:05,280 --> 00:47:09,360
ऑन द स्पॉट वो नहीं होता क्या कहते

673
00:47:09,360 --> 00:47:13,680
नहीं होता कुछ भी

674
00:47:13,680 --> 00:47:17,680
बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल भैया। अरे जब आप रामपालियो से जब आप

675
00:47:17,680 --> 00:47:21,680
जूझ रहे थे उस समय एक व्यक्ति आए थे ना आपसे चर्चा करने के लिए

676
00:47:21,680 --> 00:47:27,600
जो कि दोद मिनट से अपनी ही बात को भूल जा रहे थे। याद है?

677
00:47:27,600 --> 00:47:31,760
ठीक है। ऐसे ही ऐसेसे लोग आते रहते हैं। अच्छा मैं

678
00:47:31,760 --> 00:47:36,000
तो ये बोलूंगा मैं तो ये बोलूंगा कि

679
00:47:36,000 --> 00:47:40,160
तकरीबन इतने ही वीडियो शिवाश भैया का हो गया होगा

680
00:47:40,160 --> 00:47:44,240
इस वालों के साथ। जब आए थे तो वो सब रेफरेंस भी

681
00:47:44,240 --> 00:47:48,480
अगर देख लेते तो भी शास्त्रों के तैयारी के साथ आते तो भी शायद जो जीत

682
00:47:48,480 --> 00:47:52,480
गए हरा दिए जीत गए हरा दिए बता दिया था वो कर सकते थे

683
00:47:52,480 --> 00:47:56,640
लेकिन कुछ है ही नहीं अगर तो फिर आदमी को हराया कैसे जाएगा

684
00:47:56,640 --> 00:48:00,800
या फिर जैसे वो लोग कहते हैं हराना जिसको वो

685
00:48:00,800 --> 00:48:01,360
लोग हराना कहते

686
00:48:01,360 --> 00:48:05,760
हैं हम तो हराना भी नहीं कहते भाई हरा दिया हरा दिया

687
00:48:05,760 --> 00:48:10,160
उसको कहते हैं कंफ्यूज कर दिया

688
00:48:10,160 --> 00:48:14,880
हम लोग परम शक्ति ढूंढ रहे हैं हम लोग। परम संशय ढूंढ रहे हैं। परम कंट्राडिक्शन

689
00:48:14,880 --> 00:48:18,960
क्या है? भगवान परम परम भगवान भगवान

690
00:48:18,960 --> 00:48:23,200
परम सत्य नहीं है। शाश्वत सत्य नहीं है। परम कंट्राडिक्शन है वो

691
00:48:23,200 --> 00:48:28,080
ये है इनकी। अच्छा इन्होंने देखो एक चीज मेरे ऊपर आई है।

692
00:48:28,080 --> 00:48:32,560
जो है थोड़ा सा अग्रेशन में आ जाता हूं।

693
00:48:32,560 --> 00:48:36,960
तो अग्रेशन की बात यह है कि सामने वाला

694
00:48:36,960 --> 00:48:40,960
एक झूठी मुस्कान दिखा के बार-बार

695
00:48:40,960 --> 00:48:44,960
झूठ बोल रहा है। अपनी बातों से पलट रहा है और उलझा

696
00:48:44,960 --> 00:48:49,040
रहा है। किसी बात का स्पष्ट जवाब नहीं देना चाहता है। आप

697
00:48:49,040 --> 00:48:53,040
लोग कभी भी मेरे इसको देखना मेरे मेरी बातें देखना। मैं बहुत जल्दी अगर मेरा

698
00:48:53,040 --> 00:48:57,120
पक्ष पूछा जाएगा बहुत स्पष्ट बोलता हूं। साफ सुथरा क्योंकि उसमें मुझे मेरा

699
00:48:57,120 --> 00:49:01,440
यह नहीं ना मुझे झूठी जीत प्राप्त करनी जो है वही तो दूंगा

700
00:49:01,440 --> 00:49:05,440
मगर वो क्या करते हैं उलझाने वाली बात करते हैं जैसे कि अभी

701
00:49:05,440 --> 00:49:11,120
मैं वो एक ट्रिम करके और बनाया है तीन चार मिनट का वीडियो है

702
00:49:11,120 --> 00:49:15,360
उसमें तीन चार पार्ट है सबसे पहले इस लड़के ने कहा मैंने

703
00:49:15,360 --> 00:49:16,640
अब उसको बहुत

704
00:49:16,640 --> 00:49:20,800
उसमें बहुत मेहनत लगी है मगर वो बहुत मतलब

705
00:49:20,800 --> 00:49:26,000
कोई भी इंटेलेक्चुअल पर्सन होगा तो उसके लिए बहुत बढ़िया वीडियो है

706
00:49:26,000 --> 00:49:30,000
तो उसमें मैंने देखा कि जब मैंने

707
00:49:30,000 --> 00:49:34,160
कहा ईश्वर को सृष्टि बनाने की आवश्यकता क्या है? तो इस व्यक्ति

708
00:49:34,160 --> 00:49:38,480
ने पांच से छह बार अपनी बातों को बदला है।

709
00:49:38,480 --> 00:49:42,640
पहली बार इसने बताया कि वो जो है वो अपने से बना

710
00:49:42,640 --> 00:49:46,720
लेता है। इसलिए उस पर दोष नहीं आएगा कि उसके अंदर कोई कमी है। मतलब पहले

711
00:49:46,720 --> 00:49:51,040
खुद कमी का विरोध कर रहा है। ठीक है? कि

712
00:49:51,040 --> 00:49:55,040
मेरे पास जैसे पेन पेन की मुझे आवश्यकता है और ये मेरे पेन

713
00:49:55,040 --> 00:49:59,200
अंदर से ही निकला है तो इसको यह नहीं माना जाएगा कि ये पेन

714
00:49:59,200 --> 00:50:03,440
जो है इसका मेरे अंदर अभाव था। तो यानी कि सबसे पहले

715
00:50:03,440 --> 00:50:07,680
खुद अभाव का विरोध कर रहा है। पहली बात। फिर

716
00:50:07,680 --> 00:50:11,840
दूसरी बात मैंने कहा क्रिया का अभाव तो है। तो फिर

717
00:50:11,840 --> 00:50:16,160
वो किस पे आया? कि भगवान का

718
00:50:16,160 --> 00:50:21,280
दोनों साथ साथ होना चाहिए। अब दोनों साथ साथ वाला आ गया।

719
00:50:21,280 --> 00:50:26,000
फिर मैंने उस पर काउंटर किया कि भगवान है भी और नहीं भी।

720
00:50:26,000 --> 00:50:30,080
दोनों साथ साथ का क्या मतलब है? भगवान है भी और नहीं भी। ये परम

721
00:50:30,080 --> 00:50:31,680
संशय दे रहे हैं दुनिया को।

722
00:50:31,680 --> 00:50:35,920
दुनिया में जो लोग हरे कृष्णा का जाप कर रहे हैं वो लोग किसका

723
00:50:35,920 --> 00:50:39,920
जाप कर रहे हैं? परम संशय का। इसके अनुसार। हम तो भगवान

724
00:50:39,920 --> 00:50:44,720
कृष्ण का कर रहे हैं इस के अनुसार

725
00:50:44,720 --> 00:50:46,880
तो

726
00:50:46,880 --> 00:50:51,680
क्या कर रहे हैं वो अगर कोई इस के मंदिर में जाएगा

727
00:50:51,680 --> 00:50:56,000
तो वहां जाकर के भाई कहां है कहां है कृष्ण भगवान की मूर्ति

728
00:50:56,000 --> 00:51:00,400
कहां है तो वो कहेंगे यहां

729
00:51:00,400 --> 00:51:04,960
हो भी सकती है यहां नहीं भी हो सकती है ये जो स्थिति है

730
00:51:04,960 --> 00:51:10,080
यही भगवान कृष्ण है इसी पूजा [हंसी]

731
00:51:10,080 --> 00:51:14,640
इसी को अचिंत भी कहते हैं। इसी को अच कहते हैं।

732
00:51:14,640 --> 00:51:19,280
यहां खड़े भी हो सकते हैं। यहां अरे भाई कुछ तो बता दो। नहीं

733
00:51:19,280 --> 00:51:23,840
बस यही ऐसी पूजा करनी है। अच्छा और सुनो। अच्छा जब

734
00:51:23,840 --> 00:51:28,000
एक बात बताओ जब परम संशय है ही वो तो फिर तुम क्यों एक तरफ को

735
00:51:28,000 --> 00:51:32,240
चिपके पड़े हो? फिर क्यों लोगों का विरोध कर रहे हो? मतलब वो संशय ही है। विरोधाभास

736
00:51:32,240 --> 00:51:36,240
को ही तुमने स्वीकार कर लिया है। कंट्राडिक्शन को ही स्वीकार

737
00:51:36,240 --> 00:51:40,320
किया है। तो तुम फिर भगवान के फिर एक स्वरूप के पीछे क्यों पड़े हो? भाई भगवान कृष्ण

738
00:51:40,320 --> 00:51:44,320
भी हो सकते हैं। भगवान शिव भी हो सकते हैं। अगर भगवान शिव नहीं हो सकते तो फिर

739
00:51:44,320 --> 00:51:47,360
अभाव है शिव ना होने का। लो

740
00:51:47,360 --> 00:51:51,440
फिर क्यों पकड़े पड़े हो? मतलब हम तो दुनिया को अभाव अभाव कह के उनकी

741
00:51:51,440 --> 00:51:55,680
सारी चीजें छुड़वा दें और फिर अपनी चीजें चिपका दे कि नहीं ये तो जड़वत

742
00:51:55,680 --> 00:51:59,680
है। अब ये नहीं बदलेगा। यह जड़वा था जो हम कह रहे हैं। इसको तभी

743
00:51:59,680 --> 00:52:03,840
बदल सकते हैं जब हम बदले तुम नहीं बदल सकते। है ना? अच्छा

744
00:52:03,840 --> 00:52:08,320
एक बात और है। इससे मुझे याद आया

745
00:52:08,320 --> 00:52:13,200
कोई एक कौन सी क्या देखा था मैंने एक फिल्म का दृश्य था।

746
00:52:13,200 --> 00:52:17,200
वो पूछता है के कहां पे है? तो वो ऐसे करता

747
00:52:17,200 --> 00:52:21,420
है। मोटरसाइकिल चला के कुछ बताता

748
00:52:21,420 --> 00:52:25,760
[हंसी] है। क्या कोई चीज है ना? तो

749
00:52:25,760 --> 00:52:30,240
मैंने कहा देखा है मैंने भी हां वो

750
00:52:30,240 --> 00:52:34,640
कुछ कॉमेडी सीन है वो तो इनके बारे में क्या है

751
00:52:34,640 --> 00:52:39,280
इस से पूछो कि भैया ये बताइए

752
00:52:39,280 --> 00:52:43,440
ए की स्पेलिंग क्या है जैसे कहते है ना दिस शी इज ए कैट तो इसमें

753
00:52:43,440 --> 00:52:47,760
जो ए शब्द आया है हां ये थ्री इडियट्स में है हां थ्री इडियट्स

754
00:52:47,760 --> 00:52:52,320
में वो वो होता है ना शरमन जोशी उससे वो पूछता है

755
00:52:52,320 --> 00:52:56,400
प्रिंसिपल कि एक मोटर कैसे स्टार्ट होती है तो कहता है

756
00:52:56,400 --> 00:53:00,000
अच्छा

757
00:53:00,000 --> 00:53:02,800
है [हंसी] ना

758
00:53:02,800 --> 00:53:07,360
तो ऐसे ही वालों से अगर पूछो

759
00:53:07,360 --> 00:53:12,160
कि एप्पल की स्पेलिंग में सबसे पहला अक्षर क्या है?

760
00:53:12,160 --> 00:53:16,160
तो इस वाले कहते हैं रुको ए बी सी डी एफ जी एच

761
00:53:16,160 --> 00:53:20,160
के पी क्यू आर एस [हंसी] अच्छा

762
00:53:20,160 --> 00:53:24,560
भाई उत्तर तो दिया ही नहीं आपने अरे क्या होता है अच्छा तुम बताओ

763
00:53:24,560 --> 00:53:28,720
ए से होता है ना पहला अक्षर तो ए है ना बोला तो है ए बी सी डी सुनाई

764
00:53:28,720 --> 00:53:33,680
उसमें पहला अक्षर ए था कि नहीं था बोला ना मैंने आंसर दिया

765
00:53:33,680 --> 00:53:37,760
मंकी की पहली पहला अक्षर क्या है ए बी सी डी एफ जी एच

766
00:53:37,760 --> 00:53:42,080
आई जे के एल एन ओ पी क्यू आर एस टी यू वी डब्लू एक्स वाई जेड सब

767
00:53:42,080 --> 00:53:47,280
बोल दो। कुछ ना कुछ तो हो ही जाएगा।

768
00:53:47,280 --> 00:53:51,280
सब कुछ बोल दो।

769
00:53:51,280 --> 00:53:56,080
सारे आंसर दे दो। तो पहले बोलता है

770
00:53:56,080 --> 00:54:00,240
कि क्योंकि वो अभाव अंदर से ही दूर हो रहा है इसलिए अभाव नहीं है।

771
00:54:00,240 --> 00:54:04,240
फिर बोलता है ईश्वर होना और ना होना दोनों एक साथ होना

772
00:54:04,240 --> 00:54:08,560
चाहिए। फिर मैं उस काउंटर करता हूं। तो तीसरे में आता है

773
00:54:08,560 --> 00:54:12,720
अंदर वाला ईश्वर सृष्टि करता है। बाहर वाला नहीं करता। टाइम के अंदर वाला करता है। बाहर

774
00:54:12,720 --> 00:54:16,720
क्रियाएं नहीं होती। उसके बाद में उस पर भी काउंटर करता हूं। इसका मतलब परम

775
00:54:16,720 --> 00:54:21,840
सत्य जो रूप है उसको आवश्यकता नहीं है। तो फिर आ जाता है

776
00:54:21,840 --> 00:54:25,920
कि नहीं नहीं उस पर भी आवश्यकता होगी। आवश्यकता होगी तो सच्चिदानंद नहीं है।

777
00:54:25,920 --> 00:54:30,000
फिर आ जाता है कि भैया अभाव नहीं है तो फिर ईश्वर कहता। शुरू

778
00:54:30,000 --> 00:54:34,080
में भाव का खुद ही विरोध कर रहा है। अच्छा क्रिया ना होने की बात कही

779
00:54:34,080 --> 00:54:38,240
पहले कि टाइम के बाहर कोई क्रिया नहीं है। फिर

780
00:54:38,240 --> 00:54:42,240
थोड़ी देर बाद कह रहा है कि टाइम के बाहर एक्सटेंशन होता है भगवान का।

781
00:54:42,240 --> 00:54:46,240
क्रिया आ गई। आ गई क्रिया। ऐसे

782
00:54:46,240 --> 00:54:50,240
करके व्यक्ति अपनी बातों से बार-बार पलट रहा है। अच्छा पहले कह

783
00:54:50,240 --> 00:54:54,560
रहा है 500 जीबीसी मेंबर्स वो मेरे अंतिम निर्णायक हैं।

784
00:54:54,560 --> 00:54:58,560
एक घंटे जूझने के बाद दो घंटे जूझने के बाद लगभग दो ढाई घंटे

785
00:54:58,560 --> 00:55:02,480
जूझने के बाद कह रहा है 12 मेंबर्स। भाई कैसे सिद्धांत है तुम्हारे?

786
00:55:02,480 --> 00:55:08,320
तुम आए हो इस का पक्ष रखने के लिए। हां जाओ

787
00:55:08,320 --> 00:55:14,160
थोड़ा सा पूछ लो अपने हो बाण से।

788
00:55:14,160 --> 00:55:18,240
तो छह बार छह बातें कर रहा है। उलझा रहा है। कोई भी स्पष्ट जवाब दे

789
00:55:18,240 --> 00:55:24,240
ही नहीं रहा है। यह जवाब है। भगवान में अभाव नहीं होगा तो भगवान कैसा?

790
00:55:24,640 --> 00:55:28,800
अभी आने वाला था। आता तो पूछता बता का अभाव का अधिष्ठाता

791
00:55:28,800 --> 00:55:33,040
कौन है? भगवान में अभाव का अभाव है। यानी अभाव बाहर तो एक्सिस्ट कर रहा है।

792
00:55:33,040 --> 00:55:37,040
तो अधिष्ठाता कौन है? फिर उसका अभाव को तुम तत्व मान रहे हो।

793
00:55:37,040 --> 00:55:41,200
जबकि अभाव तो जो है ही नहीं। सामग्री का अभाव है तो सामग्री

794
00:55:41,200 --> 00:55:45,360
का अधष्ठाता कौन है? उस सुख का अधिष्ठान कौन है? जो सुख

795
00:55:45,360 --> 00:55:51,360
प्राप्त होगा रस से सो ढेर हो जाते।

796
00:55:54,560 --> 00:55:59,120
आपका आपका वीडियो देखने के बाद ना मैंने भी

797
00:55:59,120 --> 00:56:03,280
आपका वीडियो देखने के बाद मैंने भी कुछ प्रश्न जाकर के इस से किए थे

798
00:56:03,280 --> 00:56:07,440
कि देखिए ये शिव निंदा जो छापा जा रहा है बहुत सी चीजें

799
00:56:07,440 --> 00:56:11,520
इसका उत्तर दीजिएगा मुझे कि क्यों छापा जा रहा है तो बीच लेक्चर

800
00:56:11,520 --> 00:56:15,520
में मैंने पूछा था दो तीन जगह तो एक जगह एक ने उत्तर दिया कि

801
00:56:15,520 --> 00:56:19,600
जो छाप रहा है उससे जाकर आप बात कीजिए मुझे नहीं पता हम तो खाली पढ़ा आ रहे

802
00:56:19,600 --> 00:56:23,680
हैं। [हंसी]

803
00:56:23,680 --> 00:56:28,000
दूसरे दूसरे ने कहा कि आज जो लेक्चर

804
00:56:28,000 --> 00:56:32,080
था जिसके ऊपर उसके ऊपर बात कीजिए। आप ये सब बात मत

805
00:56:32,080 --> 00:56:36,080
कीजिए। तो मतलब कि आंसर है ही नहीं। अगर देखा

806
00:56:36,080 --> 00:56:40,160
जाए मतलब कि एक खाली किताब पढ़ाई जा रही है। उसको हम यह नहीं कह

807
00:56:40,160 --> 00:56:44,160
सकते कि हम सनातन सिद्धांत पढ़ा रहे हैं। हम केवल एक किताब ले लिए

808
00:56:44,160 --> 00:56:47,200
उसको पढ़ा रहे हैं।

809
00:56:47,200 --> 00:56:51,200
खैर वो जो ट्रिम किया हुआ वीडियो है जो इसने अलग-अलग बातें कही है अपने

810
00:56:51,200 --> 00:56:55,200
पक्ष के उसमें। अभी वो तो ट्रिम करना बाकी है। वो

811
00:56:55,200 --> 00:56:59,680
जो प्रामाणिकता के ऊपर बना है। अभी वो अलग से लगा देंगे। रहने दीजिए।

812
00:56:59,680 --> 00:57:04,000
अलग से वीडियो एक डाल दिया जाएगा। ठीक है शास्तवा

813
00:57:04,000 --> 00:57:08,000
जी आप बोले कुछ बोल रहे थे हां एक बहुत जरूरी बात आपको दिखानी

814
00:57:08,000 --> 00:57:09,600
थी ये

815
00:57:09,600 --> 00:57:13,680
देख लो ये देख लो कि क्या है समझ

816
00:57:13,680 --> 00:57:19,280
में आ रहा है क्या श्रीमद् भागवतम

817
00:57:19,280 --> 00:57:24,400
जी भैया श्रीमद् भागवतम ये देखो

818
00:57:24,400 --> 00:57:28,400
परमेश्वर अब ये तो मैं नहीं लिख रहा हूं ये तो इनहीं की वो

819
00:57:28,400 --> 00:57:33,520
है बड़ा कर दो भैया मेरा वाला

820
00:57:33,520 --> 00:57:36,320
कॉलम

821
00:57:36,320 --> 00:57:40,320
क्या लिखा है? परमेश्वर पढ़ सकते हैं आप? एक

822
00:57:40,320 --> 00:57:46,320
मिनट मैं बड़ा कर दूं अपना वाला पूरा।

823
00:57:47,200 --> 00:57:53,200
हां ये बोल दिया मैंने।

824
00:57:54,240 --> 00:58:00,240
मेरा वाला लेआउट बड़ा कर दीजिए।

825
00:58:01,120 --> 00:58:05,040
हो गया।

826
00:58:05,040 --> 00:58:08,160
हां। कहां हुआ?

827
00:58:08,160 --> 00:58:14,160
नहीं। अभी हुआ था पहले।

828
00:58:29,520 --> 00:58:35,520
मेरा वाला कॉलम बड़ा कर देंगे ऑपरेटर जी

829
00:58:39,520 --> 00:58:44,000
हो गया हो गया हां

830
00:58:44,000 --> 00:58:48,000
ये देखिए पहली लाइन क्या आ रही है पढ़

831
00:58:48,000 --> 00:58:52,160
सकते परमेश्वर अर्थात पूर्ण पुरुषोत्तम

832
00:58:52,160 --> 00:58:58,000
भगवान सदैव आत्मष्ट रहने वाला है।

833
00:58:58,000 --> 00:59:00,400
सदैव

834
00:59:00,400 --> 00:59:05,520
सदैव अब यहां सदैव का मतलब सदैव माने कि ना माने

835
00:59:05,520 --> 00:59:11,520
हां मानो भी और मत भी मानो। है भी और नहीं भी। [हंसी]

836
00:59:12,880 --> 00:59:16,960
अचिंत का मतलब ही यही है ना। आप समझो अचिंत मतलब कि

837
00:59:16,960 --> 00:59:21,040
जहां अटक गए वहां है भी और नहीं भी। [हंसी] मैं ये नहीं जानता कि

838
00:59:21,040 --> 00:59:25,120
जीवन का परमेश्वर को प्रसन्न करना करुण पूर्ण

839
00:59:25,120 --> 00:59:30,320
पुरुषोत्तम भगवान जो इस मूर्ख अज्ञानी व्यक्ति पर इतने दयालु हैं।

840
00:59:30,320 --> 00:59:34,400
भगवते पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान बार-बार पूर्ण कर रहे हैं।

841
00:59:34,400 --> 00:59:39,120
और यहां पे ये भी कह दिया कि सदैव आत्म संतुष्ट रहने

842
00:59:39,120 --> 00:59:43,120
वाले हैं। कहां पर लिखा है? स्कंद सात

843
00:59:43,120 --> 00:59:47,120
अध्याय नौ और ये किसकी व्याख्या चल रही है? 11व श्लोक

844
00:59:47,120 --> 00:59:49,680
की व्याख्या।

845
00:59:49,680 --> 00:59:53,920
उसमें क्या लिख रहे हैं? परमेश्वर अर्थात पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान

846
00:59:53,920 --> 00:59:58,400
कौन लिख रहे हैं? शीला प्रभुपाद जी का श्रीमद् भागवतम

847
00:59:58,400 --> 01:00:02,000
में परमेश्वर अर्थात

848
01:00:02,000 --> 01:00:06,160
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान सदैव आत्म संतुष्ट रहने वाले हैं। अतः

849
01:00:06,160 --> 01:00:08,880
जब उन्हें कोई भेंट अर्पित की जाती है

850
01:00:08,880 --> 01:00:13,600
तो भगवत कृपा से ये भेंट भक्त के लाभ के लिए ही होती है।

851
01:00:13,600 --> 01:00:18,320
क्योंकि भगवान को किसी की सेवा की आवश्यकता

852
01:00:18,320 --> 01:00:22,320
नहीं है। तो सृष्टि बनाना तो व्यर्थ

853
01:00:22,320 --> 01:00:28,320
हो गया। आवश्यकता तो सिद्ध नहीं हुई ना।

854
01:00:28,480 --> 01:00:32,480
उदाहरणार्थ यदि किसी मुख सुसज्जित होता हो तो

855
01:00:32,480 --> 01:00:36,480
दर्पण में उसके मुख का प्रतिबिंब भी सुसज्जित दिखता

856
01:00:36,480 --> 01:00:38,720
है।

857
01:00:38,720 --> 01:00:43,760
तो

858
01:00:43,760 --> 01:00:47,920
अच्छा इसने एक बात और कही थी वहां पे इसने

859
01:00:47,920 --> 01:00:52,080
जो है जो बदलता गया है ना उसमें आप देखिए लास्ट में फिर ये बोलने लगा वृद्धि होती

860
01:00:52,080 --> 01:00:56,080
है। कितनी बार इसने अपने स्टेटमेंट को बदला

861
01:00:56,080 --> 01:01:00,080
है। अब ये बताइए जब भगवान

862
01:01:00,080 --> 01:01:04,320
अनंत आनंदित है, अनंत सुखी है तो वृद्धि कहां होगी?

863
01:01:04,320 --> 01:01:10,320
वृद्धि तो वहां होगी ना। जहां कोई सीमा होगी उसके बाहर जाके वृद्धि होगी।

864
01:01:12,480 --> 01:01:16,720
जब अनंत वो ऑलरेडी है कहां से होगी?

865
01:01:16,720 --> 01:01:21,360
बोला सुख की वृद्धि होती रहती है। रस की वृद्धि होती रहती है।

866
01:01:21,360 --> 01:01:25,440
वृद्धि कहां होगी? जब वो अनंत अनंतता वृद्धि कैसे हो जाएगी? अंदर ही

867
01:01:25,440 --> 01:01:30,080
होगी अनंतता के। उसको वृद्धि कैसे कहूं? बिल्कुल भैया। यही तो

868
01:01:30,080 --> 01:01:34,080
यही तो प्रश्न था भैया कि आखिर कैसे कह रहे हैं ये लोग? पहले तो

869
01:01:34,080 --> 01:01:38,400
अनंत भगवान है। फिर उनका वो अनंत है। उनमें अनंत आनंद

870
01:01:38,400 --> 01:01:42,400
है। फिर में अभाव होना ये भी उसके लिए

871
01:01:42,400 --> 01:01:46,480
ये भी उसकी इनकंप्लीटनेस है। अगर हम अगर हम ये कहे ईश्वर में

872
01:01:46,480 --> 01:01:50,640
दुनिया में कोई ऐसी चीज नहीं है जो ईश्वर को जिसकी जरूरत

873
01:01:50,640 --> 01:01:55,680
नहीं है तो ये ईश्वर को इनकंप्लीट बनाता है। ईश्वर मैं दोबारा

874
01:01:55,680 --> 01:01:59,130
यदि अभाव नहीं है ठीक है।

875
01:01:59,130 --> 01:02:03,200
[हंसी] ये बात एकदम क्लियरनेस के साथ ऐसे एकदम क्लियरनेस

876
01:02:03,200 --> 01:02:07,200
के साथ बोल दिया। आप उसको हटा भी नहीं सकते। उसको

877
01:02:07,200 --> 01:02:11,200
अचिंत भी नहीं कर सकते कि नहीं भी बोला था [हंसी] उसी कारण है

878
01:02:11,200 --> 01:02:15,280
ऐसे ही वो आचार्य प्रशांत जो है तथाकथित वो क्या करते

879
01:02:15,280 --> 01:02:19,280
हैं कोई सवाल आ जाए और जवाब नहीं

880
01:02:19,280 --> 01:02:24,020
आता है मान लो तो चिड़चिड़ा के बात करेंगे

881
01:02:24,020 --> 01:02:28,320
[हंसी] हां तुमने ऐसा क्या किया है मैं

882
01:02:28,320 --> 01:02:32,560
तुम्हें यहां पर मुक्ति देने की बात नहीं कर रहा हूं किसी ने पूछा

883
01:02:32,560 --> 01:02:36,800
कि भाई भगवान है कि नहीं वो नासिकता वाला अभी चला था

884
01:02:36,800 --> 01:02:40,800
पूरा आधे घंटे का वीडियो बोल दिया। उस व्यक्ति ने ये नहीं बताया भगवान है कि

885
01:02:40,800 --> 01:02:43,520
नहीं है।

886
01:02:43,520 --> 01:02:47,760
किसी ने पूछा वो जाके धक्कर वाली बहस हुई थी

887
01:02:47,760 --> 01:02:51,920
उस बहस में किसी ने पूछ लिया इनसे सभा में

888
01:02:51,920 --> 01:02:55,920
कि भाई वो भगवान है कि नहीं? आधा एक घंटा हो

889
01:02:55,920 --> 01:03:00,320
गया। इसने क्लियर कट ये नहीं बताया भगवान है। भाई घूमते

890
01:03:00,320 --> 01:03:06,320
रह जाओगे। ढूंढते रह जाओगे। [हंसी]

891
01:03:07,440 --> 01:03:12,880
बहुत जबरदस्त भैया। आप तो पूरा मिमिक्री कर दे रहे हो।

892
01:03:12,880 --> 01:03:16,960
अब कमेंट आएगा आपको कि बहुत से लोगों का कि बच्चों

893
01:03:16,960 --> 01:03:21,360
का मजाक उड़ाते हो आपको शोभा नहीं देता है। मायावादी ऐसे ही होते हैं।

894
01:03:21,360 --> 01:03:25,920
वगैरह वगैरह। मैं वो बात कह दूं कि भाई हां मुझे क्रोध आता है।

895
01:03:25,920 --> 01:03:30,320
मेरे धर्म को कोई क्षति पहुंचाने का प्रयास कर रहा होता है। बेवकूफ

896
01:03:30,320 --> 01:03:34,320
बनाने का प्रयास कर रहा होता है। मुझे क्रोध आता है। और

897
01:03:34,320 --> 01:03:38,320
बिल्कुल क्रोध आना चाहिए। वैसे भी ये

898
01:03:38,320 --> 01:03:43,520
जो दोष है पौरुष के दोष इनसे व्यक्ति

899
01:03:43,520 --> 01:03:47,760
मुड़ नहीं सकता है। हां इनका विषय यदि बदल दे धर्म को विषय

900
01:03:47,760 --> 01:03:52,160
बना दिया। ईश्वर को विषय बना दिया वही आपकी जीत है।

901
01:03:52,160 --> 01:03:56,160
तो भाई क्रोध तो आता है जब

902
01:03:56,160 --> 01:04:00,400
भैया आज तो आज नहीं कल मैंने महाभारत में ही जब भगवान

903
01:04:00,400 --> 01:04:04,400
श्री कृष्ण और युधिष्ठिर जी का संवाद मैं पढ़ रहा था ठीक

904
01:04:04,400 --> 01:04:08,640
है वैष्णव वैष्णव धर्म का जब वो बताते हैं भगवान

905
01:04:08,640 --> 01:04:12,880
तो उसमें स्पष्ट बताएं कि ब्राह्मणों का जो होता है ना उनका क्रोध

906
01:04:12,880 --> 01:04:16,880
ही उनका अस्त्र है। मतलब वो केवल बोल सकते हैं, डांट सकते हैं या अपना गुस्सा व्यक्त कर

907
01:04:16,880 --> 01:04:21,040
सकते हैं। बस वो शस्त्र हाथ में नहीं लेते। इस तरह का भगवान श्री कृष्ण

908
01:04:21,040 --> 01:04:23,120
का वचन है। तो फिर

909
01:04:23,120 --> 01:04:27,200
जब भगवान मानते हैं कि क्रोध गलत नहीं है तो

910
01:04:27,200 --> 01:04:31,280
फिर कोई ये कैसे टिप्पणी कर सकता है कि क्रोध करना गलत

911
01:04:31,280 --> 01:04:35,360
है। क्रोध ये देखा जाए क्रोध किस विषय पे हो रहा

912
01:04:35,360 --> 01:04:40,240
है। धर्म पे हमला हो रहा है। क्रोध कर रहे हैं।

913
01:04:40,240 --> 01:04:44,720
और उसमें भी एक मर्यादा है। ऐसा थोड़ी ना है कि मैंने क्रोध में

914
01:04:44,720 --> 01:04:49,440
उसको गाली दे दी। नहीं इसका उत्तर इसका उत्तर है ना

915
01:04:49,440 --> 01:04:53,760
एक मिनट इसका उत्तर है ना मैं बताता हूं भगवत गीता में क्रोधा समोह

916
01:04:53,760 --> 01:04:58,160
समोहा विहम वो वाला जो श्लोक है उसमें प्रभुपाद जी लिख रहे हैं

917
01:04:58,160 --> 01:05:02,160
कि क्रोध क्यों करना चाहिए तो अभी आपने जो बताया ना लगभग उससे सिमिलर है

918
01:05:02,160 --> 01:05:06,320
तो किसी को ये लगे तो जाकर वो पढ़ सकता है कि क्रोध करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए

919
01:05:06,320 --> 01:05:10,480
एक बार ऐसे ही कोई व्यक्ति आया था बंगाली टाइप था शायद आपने उसको भी डांटा था जब उसने

920
01:05:10,480 --> 01:05:14,560
बोला कि इस ठीक है ना थोड़ा बहुत है कि हेरफेर कर

921
01:05:14,560 --> 01:05:18,640
रहा है शास्त्रों में तो चलेगा ना तो आपने डांटा था उसको कि बहन

922
01:05:18,640 --> 01:05:23,200
तो बहन ही उसमें थोड़ा बहुत हीन भावना नहीं बहन है तो बहन ही

923
01:05:23,200 --> 01:05:25,360
हम

924
01:05:25,360 --> 01:05:29,440
तो वहां पर बताना पड़ता है ताकि लोग समझ सके उस चीज को

925
01:05:29,440 --> 01:05:34,320
अगर क्योंकि प्यार से समझ नहीं रहे तो थोड़ा डांटेंगे तो

926
01:05:34,320 --> 01:05:38,400
एक व्यक्ति कह रहा है कि शिवा में तला जाएगा।

927
01:05:38,400 --> 01:05:42,480
मैं हजारों बार नर्क में तलने को तैयार

928
01:05:42,480 --> 01:05:46,640
हूं अपने धर्म की रक्षा करने के लिए। बार-बार मैं धन की रक्षा

929
01:05:46,640 --> 01:05:51,840
करूंगा। बार-बार जन्म लूंगा और बार-बार मुझको तुम तलवा देना।

930
01:05:51,840 --> 01:05:56,400
ठीक है? हजारों बार क्या बात है। मैं भी

931
01:05:56,400 --> 01:06:00,400
मेरा जीवन यही है। बस कुछ नहीं चाहिए मेरे जीवन से।

932
01:06:00,400 --> 01:06:04,560
मुझे यही चाहिए। मुझे धर्म की रक्षा करनी है और इसके

933
01:06:04,560 --> 01:06:08,640
लिए यदि मुझे तला जा रहा है तो मुझे सहस स्वीकार है।

934
01:06:08,640 --> 01:06:12,720
मैं नहीं होने दूंगा अपनी आंखों के सामने ये सब। जय

935
01:06:12,720 --> 01:06:16,000
हो।

936
01:06:16,000 --> 01:06:20,000
किस किस तरह से ये लोग कहते हैं कि नर्क में चले जाओगे। सारे नर्क

937
01:06:20,000 --> 01:06:24,400
में स्पष्ट लिखा अभी मैंने आपको कहा ना जो धर्म के लिए

938
01:06:24,400 --> 01:06:28,560
अभी है जो धर्म के लिए कुछ नहीं बचेगा ना

939
01:06:28,560 --> 01:06:32,640
यही सब बोलने लगेंगे अब ये सब बोलने लगेंगे कुछ नहीं

940
01:06:32,640 --> 01:06:34,880
मिलेगा

941
01:06:34,880 --> 01:06:39,600
बस नर्क में तले जाओगे इस तरह की बात बताइए

942
01:06:39,600 --> 01:06:43,600
वहां पे भाई वो लोग कर क्या रहे हैं बोल क्या रहे हैं उस पे भी विचार करो क्या

943
01:06:43,600 --> 01:06:47,600
भगवान के विषय में इस तरह की बातें बोलना और भ्रम फैलाना उससे वो

944
01:06:47,600 --> 01:06:53,520
बच जाएंगे नर्क ये बताओ

945
01:06:53,520 --> 01:06:58,240
जी

946
01:06:58,240 --> 01:07:04,160
ऑपरेटर जी कुछ कह रहे हैं स्पष्ट नहीं हो रहा है।

947
01:07:04,160 --> 01:07:07,840
ठीक है।

948
01:07:07,840 --> 01:07:12,080
सभी को जय श्री राम। और वो जो ट्रिम किया हुआ वीडियो है वो आपको जल्दी ही मिल जाएगा।

949
01:07:12,080 --> 01:07:16,480
मेन चैनल पर ही डालेंगे उसको भी जिसमें कि

950
01:07:16,480 --> 01:07:22,480
वो देखिएगा आप कितने पैतरे बदले उस व्यक्ति ने।

951
01:07:24,880 --> 01:07:29,920
बिल्कुल भैया बिल्कुल लोग इस तरह के

952
01:07:29,920 --> 01:07:34,640
वाली बात भगवान के विषय में उसने जो बातें की है भगवान

953
01:07:34,640 --> 01:07:38,800
के विषय में जो उसने बातें की है वो डेढ़ घंटे की बातें

954
01:07:38,800 --> 01:07:42,880
हैं मगर वो सिर्फ तीन मिनट में पूरा सारांश है उसमें पूरा सारांश

955
01:07:42,880 --> 01:07:47,040
सिर्फ तीन मिनट में घूम फिर के घुमा घुमा

956
01:07:47,040 --> 01:07:51,120
के घुमा घुमा के 3 मिनट की बातें हैं मूल तत्व जो उसने कही है वो मैं

957
01:07:51,120 --> 01:07:55,440
आपको दिखा दूंगा मेन चैनल पे डालना तो देखिएगा

958
01:07:55,440 --> 01:08:00,400
है ना चलिए बिल्कुल बिल्कुल भैया

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01:08:00,400 --> 01:08:03,040
जी भैया

960
01:08:03,040 --> 01:08:08,400
जय श्री राम मैंने एक वो देखी थी लाइव इनके

961
01:08:08,400 --> 01:08:08,960
सनातन

962
01:08:08,960 --> 01:08:12,960
शंकर जी के चैनल पर तो वहां देखो कितनी अभद्रता कर रहे हैं

963
01:08:12,960 --> 01:08:17,280
वो आर्य समा के उल्टा सीधा गलत उनको

964
01:08:17,280 --> 01:08:22,240
सामान्य जो बेसिक शिष्टाचार होता है उसकी भी उसका भी ज्ञान नहीं

965
01:08:22,240 --> 01:08:26,720
संस्कार है ही नहीं। मैं कह तो रहा हूं जितना भगवान बाधित

966
01:08:26,720 --> 01:08:32,240
होता जाएगा वहां से धर्म का लोप होता चला जाएगा।

967
01:08:32,240 --> 01:08:36,240
क्योंकि जब सर्व सामर्थ्यवान नहीं है तो व्यक्ति के

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01:08:36,240 --> 01:08:40,720
धर्म के प्रति निष्ठा नहीं होती है। यू ही अपनी बबत्ती

969
01:08:40,720 --> 01:08:44,720
में ही कुछ चीजें मान सकता है। कुछ चीजें नहीं मान सकता है। और

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01:08:44,720 --> 01:08:48,800
ये कटिंग होते होते पहले सनातना वासी में आते हैं। फिर

971
01:08:48,800 --> 01:08:53,040
सनातना वासी से चले जाते हैं। धर्मी धर्मासी में धर्मासी

972
01:08:53,040 --> 01:08:57,360
से चले जाते हैं मानवतावासी। यही कटिंग होते होते जब आपकी भगवान

973
01:08:57,360 --> 01:09:01,360
के प्रति निष्ठा ही नहीं होती है तो आप उसको प्राप्त

974
01:09:01,360 --> 01:09:05,920
करने के निमित्त बताई जाने वाली नियमावली के प्रति

975
01:09:05,920 --> 01:09:11,200
निष्ठा नहीं रख पाते। आज मेरे को बहुत से जो

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01:09:11,200 --> 01:09:15,280
कर्मकांड विषय हैं उनमें बहुत ज्यादा बहुत सारे ऐसे विषय

977
01:09:15,280 --> 01:09:19,440
है जिसमें मेरी कोई गति नहीं है। मगर मैं करता हूं। क्यों? भगवान ने

978
01:09:19,440 --> 01:09:24,160
कहा है। क्यों होती है निष्ठा? क्योंकि

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01:09:24,160 --> 01:09:28,560
यदा यदा धर्मस भवती भारत अभस

980
01:09:28,560 --> 01:09:32,640
तदात्म सजा तब होती है निष्ठा जब

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01:09:32,640 --> 01:09:36,720
ईश्वर सर्वशक्तिमान होता है तब व्यक्ति के अंदर धर्म स्थापित होता

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01:09:36,720 --> 01:09:40,880
है

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01:09:40,880 --> 01:09:45,040
चलिए ठीक है आने के लिए आप

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01:09:45,040 --> 01:09:49,040
लोगों का भी धन्यवाद जय श्री राम धन्यवाद जय

985
01:09:49,040 --> 01:09:53,040
श्री राम जय श्री राम
