1
00:00:01,360 --> 00:00:05,440
सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप सभी

2
00:00:05,440 --> 00:00:11,440
कुशल पूर्वक होंगे और

3
00:00:11,680 --> 00:00:14,080
एक

4
00:00:14,080 --> 00:00:18,400
व्यक्ति हैं जो भावतन को सपोर्ट करते हैं

5
00:00:18,400 --> 00:00:22,560
और भावतन की प्रामाणिकता को लेकर के भी

6
00:00:22,560 --> 00:00:26,720
उन्हें आपत्ति है कि हम क्यों यह बात कहते हैं

7
00:00:26,720 --> 00:00:32,720
तो उनको ले लेते हैं।

8
00:00:33,120 --> 00:00:38,880
जय श्री राम जय श्री राम जी

9
00:00:38,880 --> 00:00:42,880
हां जी मैं कुछ बातें मैं कुछ बातें कहना चाहता हूं क्या

10
00:00:42,880 --> 00:00:47,200
आपत्ति है आपने एक आपत्ति जताई है

11
00:00:47,200 --> 00:00:51,280
जो हमारी फोन पर बात हो चुकी है वो मैं यहां पर रख दूं उससे फिर आगे हम

12
00:00:51,280 --> 00:00:52,640
लोग बात करेंगे

13
00:00:52,640 --> 00:00:56,800
आपने एक आपत्ति जताई है कि भाई हमने भागवतानंद के साथ तू तड़ाक क्यों

14
00:00:56,800 --> 00:01:00,880
की जिस पर कि मैंने कहा कि तू तड़ाक उसी ने प्रारंभ

15
00:01:00,880 --> 00:01:05,120
की थी। हमने तो ऐसा प्रकट करते हुए कि कुछ

16
00:01:05,120 --> 00:01:09,120
चीजों के बारे में उसे पूरी जानकारी नहीं है और उसने वीडियो बना दिए हैं तो

17
00:01:09,120 --> 00:01:13,120
हम वो जानकारियां ठीक कर दे रहे हैं और अब आगे इस मामले में इस

18
00:01:13,120 --> 00:01:17,120
बात को खींचा ना जाए। ऐसा कहते हुए हमने वीडियो बनाया। पर

19
00:01:17,120 --> 00:01:22,160
जब हमने दो-तीन वीडियो ऐसे बनाए जब सम्मान पूर्वक बात करते हुए तो

20
00:01:22,160 --> 00:01:27,360
करपात्री जी का एक कथन था कि

21
00:01:27,360 --> 00:01:31,600
स्ान को यदि वो कहते हैं ना करपात्री

22
00:01:31,600 --> 00:01:35,600
जी ने एक बात कही थी कि स्वान को शंख की आवाज पसंद

23
00:01:35,600 --> 00:01:39,840
नहीं है तो कुछ इस तरह की बात है कि कुत्तों को घी का घी हजम नहीं होता है जिस प्रकार

24
00:01:39,840 --> 00:01:44,080
तो हमने जो सम्मान पूर्वक बहुत बातें कही थी तो उसको समझ में नहीं आई और वो तू तड़ाक

25
00:01:44,080 --> 00:01:48,800
पर पहले उतरा अब बात आती है कि विरोध क्यों किया था

26
00:01:48,800 --> 00:01:52,800
तो विरोध इसीलिए किया था क्योंकि उसने निराधार रूप से कई

27
00:01:52,800 --> 00:01:56,800
लोगों पर कई लोगों पर और

28
00:01:56,800 --> 00:02:01,040
कई सम्मान सम्मानित लोगों पर तूतड़ाक की बात की थी

29
00:02:01,040 --> 00:02:05,040
और कई लोगों पर बहुत गंभीर आरोप भी लगाए थे जिसके बारे में

30
00:02:05,040 --> 00:02:09,120
अभी तक आज तक उसने कोई प्रमाण नहीं दिया है और जब उसने वैसे

31
00:02:09,120 --> 00:02:13,280
प्रमाण नहीं दिया तो कोर्ट के माध्यम से उससे पूछ लिया गया है कि प्रमाण दो यहां आकर के जो जो

32
00:02:13,280 --> 00:02:17,520
तुमने चीजें कही है और अब वो प्रमाण देगा वहां जाकर के तो इसमें तू

33
00:02:17,520 --> 00:02:21,680
तड़ाक की बात कहां से शुरू हुई है कि उसने अपमानजनक तरीके से बात करना शुरू किया

34
00:02:21,680 --> 00:02:26,320
उसको सम्मान वाली भाषा समझ में नहीं आई

35
00:02:26,320 --> 00:02:31,200
जी बताएं। मैं दो कंडीशंस कहना चाहता हूं।

36
00:02:31,200 --> 00:02:35,360
जी आप क्रोधित ना होइए इसके इस डिबेट में या डिस्कशन

37
00:02:35,360 --> 00:02:39,440
किया डिस्कशन में मेरे मैं बात वो डिपेंड

38
00:02:39,440 --> 00:02:43,520
करता है। वो डिपेंड करता है कि सामने वाला किस तरह का व्यवहार कर

39
00:02:43,520 --> 00:02:48,240
रहा है। हां मेरा व्यवहार शांत ही होगा। मैं इसको

40
00:02:48,240 --> 00:02:52,240
गारंटी दे सकता हूं। और मैं मैं जब बोलता

41
00:02:52,240 --> 00:02:56,320
हूं आप मत काटिए। पूरा बात सुनिए। मैं मैं आपकी पूरा

42
00:02:56,320 --> 00:03:00,880
बात सुनता हूं। हम मेरा

43
00:03:00,880 --> 00:03:05,040
मेरा मुख्य आर्गुममेंट ओपिनियन देता

44
00:03:05,040 --> 00:03:09,360
हूं। अब तो आपने बहुत

45
00:03:09,360 --> 00:03:13,600
लोगों से डिबेट किया। वो कितने संप्रदाय

46
00:03:13,600 --> 00:03:17,040
तो कितने संप्रदाय हैं? ब्रह्मकुमारी

47
00:03:17,040 --> 00:03:21,760
संप्रदाय नहीं है वो संप्रदाय नहीं है हां संस्था संस्था

48
00:03:21,760 --> 00:03:25,920
संस्थाएं हैं हां संस्थाएं संप्रदाय प्रामाणिक होते हैं

49
00:03:25,920 --> 00:03:30,160
जी तो तो आपने इस कान से किया

50
00:03:30,160 --> 00:03:35,280
और कई संस्था या संप्रदाय

51
00:03:35,280 --> 00:03:39,280
से किया मेरा पॉइंट मेरा पॉइंट ये है

52
00:03:39,280 --> 00:03:39,840
हां मेरा

53
00:03:39,840 --> 00:03:44,240
पॉइंट ये है आपने उन सभी के

54
00:03:44,240 --> 00:03:48,480
प्रति दुर्भाष नहीं किया। अगर लेटेस्ट डिबेट

55
00:03:48,480 --> 00:03:52,880
आप देखते आप आपके हैं योगदा वाले को

56
00:03:52,880 --> 00:03:57,040
उन्होंने यह बात कह दिया कि आदि शंकराचार्य जी को सिर

57
00:03:57,040 --> 00:04:01,200
का सिर काटा दिया क्योंकि वो बौद्ध को प्रचार करते थे। निरीश्वरवाद

58
00:04:01,200 --> 00:04:05,440
को प्रचार करते थे। आपने आपने बड़ी विनम्रता

59
00:04:05,440 --> 00:04:09,680
पूर्वक उसको नमस्कार किया। कोई प्रतिक्रिया नहीं किया। यह वीडियो

60
00:04:09,680 --> 00:04:13,680
में है। ऐसे निग्रह आचार्य जी ने क्या

61
00:04:13,680 --> 00:04:18,160
कह दिया? आप ग्रहचार्य जी के प्रति इतना

62
00:04:18,160 --> 00:04:22,240
बातें बहुत बातें बोलते हैं। हम

63
00:04:22,240 --> 00:04:27,280
आप कह दीजिए आपने एक नाम अभी लिया है निग्रहचार्य।

64
00:04:27,280 --> 00:04:31,920
कौन है ये? श्री भागवत आनंद गुरु जी।

65
00:04:31,920 --> 00:04:37,200
नहीं वो निग्रहचार्य क्यों कहा उसको?

66
00:04:37,200 --> 00:04:39,600
वो

67
00:04:39,600 --> 00:04:44,880
भाषा तो भाषा तो ठीक नहीं होगा

68
00:04:44,880 --> 00:04:50,320
बिकॉज़ ही सेस ही निग्रहाचार्य सो दैट्स व्हाई आई कॉल् निग्रहचार्य

69
00:04:50,320 --> 00:04:54,720
नहीं निग्रचार्य क्या बताया आपने उसके बारे में सभी

70
00:04:54,720 --> 00:04:59,120
को कहते हैं ना उन्होंने निग्रह आचार्य है उसके स्टेटस

71
00:04:59,120 --> 00:05:03,840
ये निग्रह आचार्य सभी के कहने पे से आप मान लेंगे कि वो वो चीज सही है

72
00:05:03,840 --> 00:05:08,640
मैं आपको मानने से मैं नहीं कह रहा हूं आप

73
00:05:08,640 --> 00:05:13,360
कहना चाहिए था निग्राचार क्यों कहा फिर आपने उसे वो मेरा ओपिनियन है ना

74
00:05:13,360 --> 00:05:18,240
नहीं आपका ओपिनियन है तो आप सही ओपिनियन दीजिए नहीं तो मैं काउंटर करूंगा ना उसे

75
00:05:18,240 --> 00:05:22,960
वो जो आप सिद्ध कर पाए

76
00:05:22,960 --> 00:05:27,040
मेरा ओपिनियन है वो निग्रह आचार्य जी है निग्रह कैसे

77
00:05:27,040 --> 00:05:31,040
हैं निग्रह सुनिए उनको वेद के मंत्र कहां से मिले

78
00:05:31,040 --> 00:05:31,540
उनको

79
00:05:31,440 --> 00:05:35,520
सपने में दीक्षा मिली जो निग्रह संप्रदाय की उस दीक्षा को उन्होंने

80
00:05:35,520 --> 00:05:39,520
प्रमाणित किसी से सत्यापित कराया कि भैया

81
00:05:39,520 --> 00:05:43,280
यह जो मेरे को एक मंत्र मिला है यह वैदिक मंत्र है कि नहीं

82
00:05:43,280 --> 00:05:47,360
कैसे कराया उन्होंने सत्यापित अच्छा ये

83
00:05:47,360 --> 00:05:51,520
बात भी हुई आपकी साक्षात्कार में निग्रह

84
00:05:51,520 --> 00:05:55,680
आचार्य जी के साथ गुरु परंपरा को लेकर ये बात हुई नहीं ये बात

85
00:05:55,680 --> 00:05:59,680
हुई नहीं क्योंकि उसने मना कर दिया कि हम तुम्हें क्यों बताएं हां हां

86
00:05:59,680 --> 00:06:03,840
उस उसी वीडियो में आप जो दो मिनट के पहले या

87
00:06:03,840 --> 00:06:07,920
आप बात कर रहे थे श्री सांप्रदायिकता के बारे बारे में आपने

88
00:06:07,920 --> 00:06:12,160
कहा कि सभी संप्रदाय प्रामाणिक है। आपने यह बात

89
00:06:12,160 --> 00:06:16,560
मैं यह पूछ रहा हूं आपसे कि उसको जो मंत्र मिला है वो वैदिक

90
00:06:16,560 --> 00:06:20,800
है। इस बात की पुष्टि कैसे हुई? भाई आप एक बात बताइए

91
00:06:20,800 --> 00:06:25,120
मैं मैं बता एक मिनट मेरा मेरा प्रश्न समझ लीजिए कि मान

92
00:06:25,120 --> 00:06:29,120
लीजिए कि मेरे सपने में कोई बुरी शक्ति अगर मंत्र दे देगी

93
00:06:29,120 --> 00:06:33,200
मुझे भगवान का रूप धारण करके मुझे कैसे पता कि

94
00:06:33,200 --> 00:06:37,200
वो भगवान ही है या फिर वो मेरे भले के लिए ही कह

95
00:06:37,200 --> 00:06:41,280
रहे हैं। जब वो बुद्ध के रूप में आकर के हमको भटका भटका सकते हैं तो सपने में आकर

96
00:06:41,280 --> 00:06:45,280
के भटका नहीं सकते क्या? तो मेरे जो मेरे जो मंत्र आ

97
00:06:45,280 --> 00:06:49,360
रहा है पूरी के शंकराचार्य जी ने भी कहा है कि आपको यदि सपने में कोई

98
00:06:49,360 --> 00:06:53,360
मंत्र इत्यादि प्राप्त होता है तो उसको किसी प्रामाणिक आचार्य

99
00:06:53,360 --> 00:06:57,440
से सत्यापित करवाइए। तो भागवतानंद ने किस प्रामाणिक आचार्य से उस मंत्र

100
00:06:57,440 --> 00:06:58,880
को सत्यापित करवाया।

101
00:06:58,880 --> 00:07:03,280
प्रश्न ये है मुझे मालूम है किससे करवाया है। यदि आप उसका नाम

102
00:07:03,280 --> 00:07:07,280
लेंगे तो फिर उस पर अगला क्वेश्चन उठेगा। जी अच्छा

103
00:07:07,280 --> 00:07:11,280
इस डिबेट के लिए मैं उन नगरी निग्रह आचार्य जी को

104
00:07:11,280 --> 00:07:16,160
मैं श्री भागवत आनंद गुरु जी ही बोलता हूं तो

105
00:07:16,160 --> 00:07:20,240
आपको नहीं पता है कि वो निग्रचार क्यों है उसकी प्रामाणिकता के विषय में आपको कुछ नहीं

106
00:07:20,240 --> 00:07:26,160
पता है हां मैं मुझे नहीं पता है वो

107
00:07:26,160 --> 00:07:30,240
उन्होंने कहा कि बात बोलने दीजिए शिवस जी उन्होंने

108
00:07:30,240 --> 00:07:34,320
कहा कि एक निग्रह प्रवेशिका नामक एक ग्रंथ वो लिखा है

109
00:07:34,320 --> 00:07:38,560
उसमें का सज्ञापन होगा। अब होगा या ना होगा वो

110
00:07:38,560 --> 00:07:43,360
भविष्य का विषय है। इस डिबेट के लिए मैं यह कहता हूं

111
00:07:43,360 --> 00:07:48,480
निग्रह आचार्य जी को आप नहीं मानते जो ठीक है।

112
00:07:48,480 --> 00:07:51,840
होगा एक मिनट

113
00:07:51,840 --> 00:07:55,840
मैं समझ रहा हूं ना आप कहां जा रहे हो? आप कह रहे हो कि सत्यापित होगा। अभी

114
00:07:55,840 --> 00:07:59,840
तो नहीं है ना? आप अभी उसको निग्राचार कैसे कह रहे हैं? वो उसका आधार

115
00:07:59,840 --> 00:08:04,000
बताइए। प्रामाणिकता बताइए। तेरे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में

116
00:08:04,000 --> 00:08:08,080
शास्त्र प्रमाण है। उसकी शास्त्रीयता बताइए कि अगर उसको

117
00:08:08,080 --> 00:08:12,080
सपने उसको सपने में मंत्र प्राप्त हुआ है तो उस मंत्र

118
00:08:12,080 --> 00:08:16,080
को सत्यापित किसने किया? मेरी जानकारी में अमृतानंद सरस्वती ने उसको

119
00:08:16,080 --> 00:08:20,240
सत्यापित किया। यानी कि अमृतानंद सरस्वती उसका शब्द

120
00:08:20,240 --> 00:08:24,640
प्रमाण हो गया। शब्द प्रमाण होने का मतलब समझते हो कि

121
00:08:24,640 --> 00:08:29,040
अमृतानंद सरस्वती ने बताया कि हां तुम्हारे सपने में जो मंत्र आया है

122
00:08:29,040 --> 00:08:33,120
वो वेदोक्त मंत्र है। वेद की सीमा के अंतर है अंदर है

123
00:08:33,120 --> 00:08:37,120
और तुम्हें देने वाले भगवान ही है भगवती ही है। ये उन्होंने सत्यापित किया। इसका

124
00:08:37,120 --> 00:08:41,760
मतलब कि अमृतानंद सरस्वती धर्म के विषय में झूठ नहीं बोल सकते।

125
00:08:41,760 --> 00:08:45,760
परंतु वह निगमानंद को अपना गुरु बता रहे हैं। निगमानंद

126
00:08:45,760 --> 00:08:50,160
ने ईसा को भगवान कहा है। और यह बात भागवतानंद

127
00:08:50,160 --> 00:08:54,160
ने भी नहीं मानी। यानी कि जो अमृतानंद सरस्वती है उनका

128
00:08:54,160 --> 00:08:58,160
शब्द प्रमाण निगमानंद है और निगमंद किसी ऐसी

129
00:08:58,160 --> 00:09:02,160
एंटिटी को किसी ऐसे तत्व को भगवान बता रहा है जो भगवान नहीं

130
00:09:02,160 --> 00:09:06,400
है। यानी कि अमृतानंद सरस्वती भी किसी ऐसे तत्व

131
00:09:06,400 --> 00:09:06,960
को भगवान

132
00:09:06,960 --> 00:09:11,120
बता सकते हैं जो भगवान नहीं है। किसी ऐसी चीज को वैदिक

133
00:09:11,120 --> 00:09:15,280
बता सकते हैं जो वैदिक नहीं है। और यह बात स्वयं उसने स्वीकार

134
00:09:15,280 --> 00:09:19,360
की है कि उन पर पूर्ण भरोसा नहीं है भागवतानंद का। भागवतानंद

135
00:09:19,360 --> 00:09:23,680
का यह कहना कि वह सभी संप्रदायों में अनुशासनात्मक और

136
00:09:23,680 --> 00:09:28,000
शास्त्र के अर्थ बताए जाने वाले विषयों में वो निग्रह

137
00:09:28,000 --> 00:09:32,160
करेगा। यानी कि उसकी सब में दोष दृष्टि है। प्रमाण्य बुद्धि किसी

138
00:09:32,160 --> 00:09:36,880
में भी नहीं है। जब वो सबका निग्रह कर रहा है। शास्त्रीय

139
00:09:36,880 --> 00:09:40,960
शास्त्रीय भाष्यों में शास्त्रीय अर्थ में कहां क्या लिखा

140
00:09:40,960 --> 00:09:44,960
है? यहां पर इसने ये गलत कहा है। सबका निग्रह एक को भी नहीं छोड़ा है। तो

141
00:09:44,960 --> 00:09:49,040
यदि वह सबका निग्रह कर रहा है जिससे उसने अपने मंत्र को सत्यापित कराया

142
00:09:49,040 --> 00:09:53,440
उसके प्रति भी दोष दृष्टि है। उसकी जो गुरु परंपरा उसके प्रति भी दोष

143
00:09:53,440 --> 00:09:58,000
दृष्टि है। तो फिर उसका जो मंत्र है वो सत्यापित कहां हुआ?

144
00:09:58,000 --> 00:10:02,720
अच्छा मैं बोलता हूं। आप सुन लीजिए। आप रामानुजाचार्य

145
00:10:02,720 --> 00:10:06,720
को वेदांत के आचार्य मानते हैं। आप

146
00:10:06,720 --> 00:10:12,080
अपना पक्ष रख लीजिए। फिर मैं बोलूंगा। मैं मैं मेरा पक्ष रखने के लिए ये बात

147
00:10:12,080 --> 00:10:16,400
समझ लो मेरे मेरा आवश्यक

148
00:10:16,400 --> 00:10:20,400
सुनिए सुनिए मैंने अपनी बात पूरी बोल ली ना ऐसे आप अपनी बात पूरी

149
00:10:20,400 --> 00:10:22,000
बोलिए मेरा बात के

150
00:10:22,000 --> 00:10:24,320
लिए

151
00:10:24,320 --> 00:10:28,400
आपके जवाब आपके जवाब चाहिए इस प्रश्न

152
00:10:28,400 --> 00:10:33,280
के लिए क्या आप रामानुजाचार्य को या मधचार्य को

153
00:10:33,280 --> 00:10:37,520
वेदांत के आचार्य मानते हैं क्या क्या वो अद्वैत मानते

154
00:10:37,520 --> 00:10:41,840
हैं नहीं मानते हैं। यदि वो खंडन करेंगे जितने

155
00:10:41,840 --> 00:10:45,920
जितने अंश में वो खंडन करेंगे तो हम वहां प्रतिकार करेंगे। वो तो नहीं कर रहे। करेंगे

156
00:10:45,920 --> 00:10:50,160
तो हम बोलेंगे और उनको इसलिए मानते

157
00:10:50,160 --> 00:10:54,560
हैं कि जिसको हम मानते हैं उसने उन्हें माना है। सिंपल

158
00:10:54,560 --> 00:10:58,640
जिसको हम मानते हैं जो हमारा शब्द प्रमाण है शंकराचार्य

159
00:10:58,640 --> 00:11:02,800
उन्होंने उनको माना है। इसलिए हम मानते हैं। हमारे

160
00:11:02,800 --> 00:11:08,320
शब्द प्रमाण ने निग्रचार्य को भागवतानंद को निग्रचार नहीं माना है।

161
00:11:08,320 --> 00:11:12,560
एक यह एक अभी आपसे मैंने प्रश्न ये नहीं पूछा है। अभी

162
00:11:12,560 --> 00:11:16,720
आपसे मैंने प्रश्न ये नहीं पूछा है। सुनिए प्रश्न मेरा है। भागवतानंद

163
00:11:16,720 --> 00:11:20,960
को भागवतानंद को यदि सपने में मंत्र मिला

164
00:11:20,960 --> 00:11:25,200
उसको कैसे पता यह मंत्र वेदोक्त मंत्र है। देने

165
00:11:25,200 --> 00:11:29,440
वाली वेदोक्त भगवती है। ये उसको कैसे पता? क्योंकि

166
00:11:29,440 --> 00:11:33,520
सपने में बुरी शक्तियां भी आ सकती है और भगवान भी छल कर सकते

167
00:11:33,520 --> 00:11:37,440
हैं। दोनों चीजें इसीलिए भगवान यदि छल ना कर सकते होते

168
00:11:37,440 --> 00:11:41,600
मोहिनी रूप में छल किया कृष्ण रूप में छल किया बुद्ध के

169
00:11:41,600 --> 00:11:47,600
रूप में छल किया तो भगवान भी भगवान छल भी कर सकते हैं। भगवान

170
00:11:47,680 --> 00:11:51,680
एक मिनट भगवान है तो सीधे तौर पर भगवान की वाणी को

171
00:11:51,680 --> 00:11:55,840
प्रमाण नहीं मानते। एक मिनट भाई साहब सीधे तौर पर भगवान की वाणी

172
00:11:55,840 --> 00:11:59,920
को सीधे तौर पर भगवान की वाणी को हम प्रमाण नहीं मानते हैं। इसीलिए

173
00:11:59,920 --> 00:12:04,480
हमारे जो प्रमाण है वह है वेदो वेद अपौरुषय धर्म ग्रंथ

174
00:12:04,480 --> 00:12:08,560
तो जब भगवान स्वयं आए बुद्ध के रूप में उन्होंने कहा ये धर्म नहीं है यज्ञ

175
00:12:08,560 --> 00:12:12,720
इत्यादि ठीक है जब उन्होंने यज्ञ से दूर किया हमारे वाले जो बुद्ध

176
00:12:12,720 --> 00:12:16,960
आए थे भगवान विष्णु स्वयं आए उनके रूप में और यज्ञों से उन्होंने दूर

177
00:12:16,960 --> 00:12:20,960
किया तो हमने जो जिन लोगों ने उनकी बात नहीं मानी वो

178
00:12:20,960 --> 00:12:25,120
सनातनी है आज भी अच्छा ठीक है

179
00:12:25,120 --> 00:12:29,920
ठीक है तो मैं कहना चाहता हूं क्या

180
00:12:29,920 --> 00:12:33,920
भगवान भी छल कर सकते हैं और भगवान अगर भगवान

181
00:12:33,920 --> 00:12:39,440
भी छल कर सकते हैं गुरु भी छल कर सकते हैं ये तो

182
00:12:39,440 --> 00:12:43,920
ये तो बात है अगर रामानुजाचार्य जी ने रामाचार्य

183
00:12:43,920 --> 00:12:48,160
जी के पास वेद आया वेदांत आया अगर उन्होंने

184
00:12:48,160 --> 00:12:52,320
खंडन किया गुरु परंपरा से जो शब्द प्रमाण है उसको

185
00:12:52,320 --> 00:12:52,820
उन्होंने

186
00:12:52,720 --> 00:12:56,880
खंडन किया उसको प्रमाणित करना चल या चल या

187
00:12:56,880 --> 00:13:00,400
नहीं चल करना या नहीं

188
00:13:00,400 --> 00:13:04,480
यदि यदि रामानुजाचार्य संप्रदाय के कोई भी

189
00:13:04,480 --> 00:13:08,800
आचार्य सामने से आकर के शंकराचार्य जी का विरोध करेंगे

190
00:13:08,800 --> 00:13:12,960
और हमारे सामने हमें उसे अपेक्षित लगेगा तो हम वहां पर उनको उनका प्रतिकार

191
00:13:12,960 --> 00:13:16,960
करेंगे। अगर शंकराचार्य के कोई आचार्य शंकर परंपरा के

192
00:13:16,960 --> 00:13:20,960
कोई भी आचार्य रामानुजाचार्य परंपरा का खंडन करेंगे प्रखर

193
00:13:20,960 --> 00:13:25,120
हो के सामने आकर के बोलेंगे तो वहां तो उसका

194
00:13:25,120 --> 00:13:29,360
भी काउंटर करने का पूरा अधिकार उनको है। रामानुजाचार्य के जो परंपरा

195
00:13:29,360 --> 00:13:33,520
वाले हैं इससे इससे आपका मंत्र प्राप्त होना सिद्ध

196
00:13:33,520 --> 00:13:37,840
कैसे हो रहा है? सुनिए मेरे गलत होने सुनिए बात

197
00:13:37,840 --> 00:13:41,840
भटक रही है बार-बार बात भटक रही है। बात भटक रही

198
00:13:41,840 --> 00:13:46,400
है। प्रश्न ये पूछा जा रहा है क्या भागवतानंद के लिए भागवतानंद

199
00:13:46,400 --> 00:13:50,720
ने अपने चीजों को किसी से सत्यापित कराया है या नहीं?

200
00:13:50,720 --> 00:13:54,800
रामानुजाचार्य को वैदिक हमारे ही आचार्य जिन

201
00:13:54,800 --> 00:13:59,120
जो हमारे शब्द प्रमाण है उन्होंने उसे वैदिक माना है रामानुजाचार्य परंपरा को

202
00:13:59,120 --> 00:14:03,120
ठीक है इसलिए हम मानते हैं और आपने कहा वो छल कर सकते हैं कि

203
00:14:03,120 --> 00:14:07,200
नहीं छल कर सकते हैं कि नहीं बिल्कुल कर सकते हैं मगर हमारे वो

204
00:14:07,200 --> 00:14:08,000
शब्द प्रमाण

205
00:14:08,000 --> 00:14:12,080
है हमारे अनुसार जो हमारा शब्द प्रमाण है वहां से हमारी थ्योरी शुरू होती

206
00:14:12,080 --> 00:14:16,640
है जैसे वेद भगवान वेद के एक मिनट भाई साहब एक मिनट

207
00:14:16,640 --> 00:14:21,360
भगवान वेद के रूप में भी गलत चीजें दे सकते हैं।

208
00:14:21,360 --> 00:14:25,360
मगर जब वह हमारे परंपरा प्राप्त गुरुजनों से प्राप्त वेद के विरुद्ध

209
00:14:25,360 --> 00:14:29,520
चीजें होंगी भले ही उस वेद का ठप्पा लगा होगा हम उससे नकार देंगे। इसको कहते

210
00:14:29,520 --> 00:14:33,920
हैं सनातन धर्म। तो गुरु परंपरा से प्राप्त वेद वेद है। शास्त्र

211
00:14:33,920 --> 00:14:37,920
शास्त्र है मंत्र मंत्र है। धर्म धर्म है। ब्रह्म ब्रह्म है। गुरु

212
00:14:37,920 --> 00:14:41,920
परंपरा से प्राप्त। ठीक है? तो हमारे वो शब्द प्रमाण

213
00:14:41,920 --> 00:14:46,160
है। जो चीज गुरु के द्वारा बताई गई

214
00:14:46,160 --> 00:14:50,160
सीमा के अंदर आएगी वो हमारे समय स्वीकार होगी। नहीं आएगी। नहीं स्वीकार

215
00:14:50,160 --> 00:14:54,240
होगी। अब बात ये आती है कि भागवतानंद का यह कहना

216
00:14:54,240 --> 00:14:58,320
है कि मुझे मंत्र प्राप्त हुआ है सपने में। उसको कैसे

217
00:14:58,320 --> 00:15:02,480
पता चला कि ये वैदिक मंत्र है। सवाल ये है और अगर आप बार-बार

218
00:15:02,480 --> 00:15:06,720
आप विषय करने के लिए रामानुजाचार्य इत्यादि की बातें लाएंगे बीच में

219
00:15:06,720 --> 00:15:10,880
तो मैं आपको ये कहूंगा कि मेरे गलत होने से आपका सही होना

220
00:15:10,880 --> 00:15:14,960
सिद्ध नहीं होता। भाई साहब आपसे सवाल किया गया है।

221
00:15:14,960 --> 00:15:19,040
आपसे सवाल किया गया है। मुझे बोलने दीजिए। जी हां

222
00:15:19,040 --> 00:15:23,200
आपने ये कहा कि गुरु परंपरा होती है और गुरु

223
00:15:23,200 --> 00:15:27,360
परंपरा में गुरु सत्यापन करते हैं। सवाल ये है कि मंत्र को सत्यापित

224
00:15:27,360 --> 00:15:32,000
कैसे किया उसने कि ये वैदिक मंत्र है सवाल ये है यहां से इससे शुरू करिए

225
00:15:32,000 --> 00:15:36,160
बाद की बातें बाद में करिएगा अगर अगर इस इस

226
00:15:36,160 --> 00:15:40,160
दिन कोई शंकराचार्य सत्यापित करते मैंने पूछा सत्यापित करवाया

227
00:15:40,160 --> 00:15:44,160
है कि नहीं उसको कैसे पता है वेद वेद से वेदोक्त मंत्र है मैंने ये पूछा

228
00:15:44,160 --> 00:15:48,960
है सत्यापित कराया है कि नहीं पहले ये बताओ फिर आगे बढ़ते हैं

229
00:15:48,960 --> 00:15:53,360
जो विशिष्ट अद्वय सिद्धांत है उसको कौन कराया

230
00:15:53,360 --> 00:15:57,360
है कि नहीं मैंने कराया कि नहीं ये बताइए पहले

231
00:15:57,360 --> 00:16:01,120
आप एक-एक करके चलिए आगे

232
00:16:01,120 --> 00:16:05,360
सत्यापित मुझे नहीं मालूम मुझे मालूम है नहीं मालूम

233
00:16:05,360 --> 00:16:09,440
तो यानी कि अगर उसके मन में कोई भी उल्टी सीधी चीज आ जाएगी जिसको वो कहेगा कि

234
00:16:09,440 --> 00:16:13,520
वैदिक चीज आई है तो आप मान लो वैदिक है विशिष्ट वैदिक

235
00:16:13,520 --> 00:16:18,320
है वैदिक है अरे भाई मैंने सवाल क्या किया है

236
00:16:18,320 --> 00:16:22,800
मेरे सवाल का जवाब दीजिए। जी आप परंपरा को प्रश्न कर रहे हैं।

237
00:16:22,800 --> 00:16:27,840
आपको निग्रचार्य का निग्रहचार्य सिद्ध करना है।

238
00:16:27,840 --> 00:16:31,920
अगर रामानुजाचार्य जी को रामानुजाचार्य को आप वैदिक नहीं मानते तो आपकी समस्या

239
00:16:31,920 --> 00:16:36,080
उनसे जाकर के पूछो बताएंगे। मुझसे क्यों पूछ रहे हो? आप वैदिक

240
00:16:36,080 --> 00:16:38,240
नहीं मानते। आप वैदिक

241
00:16:38,240 --> 00:16:42,800
नहीं मानते उन्हें। अगर आपनेचार्य और शंकराचार्य

242
00:16:42,800 --> 00:16:46,800
इत्यादि को अवैदिक सिद्ध भी कर दिया तब भी आपका

243
00:16:46,800 --> 00:16:51,440
धर्म सिद्ध थोड़ी ना होगा। अभी मैं आपसे पूछ रहा हूं। निग्र

244
00:16:51,440 --> 00:16:55,440
आपने जो शब्द आपने जो शब्द यूज़ किया है निग्रचार्य ये

245
00:16:55,440 --> 00:16:59,440
शब्द जो है वो उसके मंत्र जो आया उसका आधार वही है ना

246
00:16:59,440 --> 00:17:04,160
निग्राचार्य का आधार उसके पास मंत्र आया देवी का। अब उसने कैसे ये करा

247
00:17:04,160 --> 00:17:08,640
कि यह जो मेरे पास मंत्र आया है वो देने वाली शक्ति वैदिक

248
00:17:08,640 --> 00:17:12,640
है। वो मुझे भटकाना नहीं चाहती है और वो जो मंत्र है वो वैदिक है। अब इसका

249
00:17:12,640 --> 00:17:16,800
एक सरल रास्ता मैं आपको बताता हूं। वो जाएगा एक

250
00:17:16,800 --> 00:17:20,960
मिनट में मैं बता दूं दर्शकों के लिए भी मैं बता दूं। आप समझ रहे मैं

251
00:17:20,960 --> 00:17:25,040
बता रहा हूं ना करते एक मिनट एक मिनट एक

252
00:17:25,040 --> 00:17:29,920
मिनट मेरे को एक एक बात सुनिए। एक बात सुनिए। हां एक बात

253
00:17:29,920 --> 00:17:35,440
आप क्या रहे हैं? मैं भूल गया।

254
00:17:35,440 --> 00:17:39,600
चल अच्छा बोल दीजिए। बोल दीजिए। हां बोल देता हूं आप सोच लो

255
00:17:39,600 --> 00:17:43,680
तब तक सुनिए इसका सरल रास्ता यह है कि

256
00:17:43,680 --> 00:17:47,840
भागवतानंद ने कहीं से वेद भाष्य इत्यादि या ब्रह्म

257
00:17:47,840 --> 00:17:51,840
सूत्र इत्यादि लेकर पढ़ा हो और देखा हो कि भैया मेरे को

258
00:17:51,840 --> 00:17:55,840
जो प्राप्त मंत्र और सिद्धांत है या वो शक्ति है वो इसकी सीमा

259
00:17:55,840 --> 00:18:00,000
के बाहर तो नहीं जा रही है स्वतंत्र रूप से उसने पढ़ा हो

260
00:18:00,000 --> 00:18:04,560
ठीक है अगर वो गुरु के पास नहीं जा रहा है किसी तो उसने स्वतंत्र रूप से

261
00:18:04,560 --> 00:18:08,880
जो ब्रह धर्म ब्रह्म के विषय में जो वैदिक वांगमय हमें प्राप्त

262
00:18:08,880 --> 00:18:12,880
है उसको उसने पढ़ाओ। जिसको वो पढ़ेगा

263
00:18:12,880 --> 00:18:16,880
जिसको वो पढ़ेगा कि इसकी सीमा से बाहर नहीं होना चाहिए मेरा सपने का मंत्र।

264
00:18:16,880 --> 00:18:21,040
जिसको वो पढ़ेगा उसका रचयिता उसका शब्द प्रमाण होगा। जब

265
00:18:21,040 --> 00:18:25,200
वह उसका शब्द प्रमाण होगा तो भागवतानंद यह नहीं कह सकता है कि यह

266
00:18:25,200 --> 00:18:29,200
व्यक्ति अमुक विषय में झूठ बोल रहा है। अमुक विषय में अज्ञानता कर रहा है।

267
00:18:29,200 --> 00:18:33,280
क्योंकि यदि वो अज्ञानी होने के कारण धर्म के विषय में गलत निर्णय दे

268
00:18:33,280 --> 00:18:37,360
सकता है तो जो भाष्य जिसके आधार पर तुम अपने मंत्र को सत्यापित

269
00:18:37,360 --> 00:18:42,880
कर रहे हो वो भाष्य भी वो गलत लिख सकता है।

270
00:18:42,880 --> 00:18:47,200
तो पहली ये बात खारिज हो गई। जो भाष्य गलत लिख रहा है ब्रह्म सूत्र

271
00:18:47,200 --> 00:18:51,200
है या उपनिषद है या वेद है जो भी जिससे भी वह अपने मंत्र को

272
00:18:51,200 --> 00:18:55,200
सत्यापित कर रहा है स्वतंत्र रूप से अगर वो भाष्य नहीं

273
00:18:55,200 --> 00:18:59,360
पढ़ रहा है अगर वेद मंत्र भी लेने जा रहा है तो वेद मंत्रों के लिए भी वो डिपेंड करता

274
00:18:59,360 --> 00:19:03,440
है किसी पब्लिकेशन पर जो पब्लिकेशन उसको उपलब्ध करा

275
00:19:03,440 --> 00:19:07,600
रहा है अगर वो पब्लिकेशन पे डिपेंड करता है या ऑनलाइन किसी

276
00:19:07,600 --> 00:19:11,600
पोर्टल पर डिपेंड करता है तो वो उसका शब्द प्रमाण हो जाएगा वो घोषित कर दे मेरा

277
00:19:11,600 --> 00:19:15,760
शब्द है वो पोर्टल को चलाने वाला कभी झूठ नहीं बोल सकता।

278
00:19:15,760 --> 00:19:20,000
उसको किसी एक के प्रति यह विश्वास दिखाना होगा कि भाई हमें इस पर विश्वास

279
00:19:20,000 --> 00:19:24,000
है झूठ नहीं बोल सकता। तो भागवतानंद ने क्योंकि सबके प्रति निग्रह

280
00:19:24,000 --> 00:19:28,000
करने की दृष्टि ले रखी है। तो इस कारण से वो ये नहीं

281
00:19:28,000 --> 00:19:32,160
कह सकता कि भाई ऐसा कोई है जिसके जो झूठ नहीं बोल सकता जो पीछे

282
00:19:32,160 --> 00:19:36,240
से आ रहा है पूर्वाचार्यों से। इस कारण से उसका मंत्र सत्यापित ही नहीं

283
00:19:36,240 --> 00:19:40,400
हुआ। क्योंकि सब झूठ बोल सकते हैं। सबका वो निग्रह

284
00:19:40,400 --> 00:19:44,880
करेगा। सब झूठ बोल सकते हैं। सब अज्ञानी हो सकते हैं। तो उसके मंत्र को सत्यापित

285
00:19:44,880 --> 00:19:48,960
करने वाला कौन होगा? जब नहीं होगा तो उसकी ना वैदिकता सिद्ध होती है ना

286
00:19:48,960 --> 00:19:52,960
उसका निग्रहचार्य तो सिद्ध होता है। अच्छा एक बात जी

287
00:19:52,960 --> 00:19:57,360
हम उन्होंने जिन महात्माओं के या जिन

288
00:19:57,360 --> 00:19:58,400
शास्त्र विज्ञान

289
00:19:58,400 --> 00:20:02,560
विज्ञानियों के निग्रह किया या खंडन किया वो सब

290
00:20:02,560 --> 00:20:06,560
शास्त्र प्रमाण से ही किया। जो शास्त्र आप सभी के

291
00:20:06,560 --> 00:20:10,560
पास है उसके पहली बात तो खंडन वो खंडन जो है

292
00:20:10,560 --> 00:20:14,640
किया है कि नहीं किया है उस भी निर्णायकता नहीं आई है उसने विरोध किया

293
00:20:14,640 --> 00:20:19,040
है उसने विरोध किया है अभी सामने से उसका उत्तर दिया

294
00:20:19,040 --> 00:20:23,120
गया कि नहीं दिया गया ये सब अलग बातें है ठीक है अब बात ये है कि

295
00:20:23,120 --> 00:20:27,200
शास्त्र से किया अभी बात क्या चल रही है बात ये चल रही है कि

296
00:20:27,200 --> 00:20:31,200
यदि उसकी सभी में दोष दृष्टि है किसी भी गुरु और

297
00:20:31,200 --> 00:20:35,440
गुरु परंपरा में प्रमाण्य बुद्धि नहीं है तो फिर उसने अपना

298
00:20:35,440 --> 00:20:39,520
मंत्र कहां से सत्यापित कराया? उसको कैसे पता

299
00:20:39,520 --> 00:20:43,520
ये वैदिक मंत्र है? यह पूछ रहा हूं मैं। जैसे कि अभी थोड़े दिन पहले

300
00:20:43,520 --> 00:20:48,160
आर्य समाज का एक व्यक्ति आया था। ठीक है? उसने हमसे पूछा

301
00:20:48,160 --> 00:20:52,160
कि कौन भगवान है? कौन नहीं भगवान है? पता कैसे चलेगा? क्योंकि भगवान तो आके

302
00:20:52,160 --> 00:20:56,240
मानव रूप में लीला भी कर रहे हैं। पता कैसे चलेगा? कौन भगवान है? कौन नहीं भगवान? बिल्कुल

303
00:20:56,240 --> 00:21:00,400
सही बात है। वहां पर शब्द प्रमाण बताएगा हमें। हमारा शब्द प्रमाण

304
00:21:00,400 --> 00:21:04,560
बताएगा यह भगवान है। तो हम मानेंगे कि भगवान है। गुरु

305
00:21:04,560 --> 00:21:08,560
गोविंद और ग्रंथ केवल गुरु नहीं केवल गोविंद नहीं केवल ग्रंथ

306
00:21:08,560 --> 00:21:12,720
नहीं तो यदि हम किसी भी शब्द प्रमाण पूरा पूरा

307
00:21:12,720 --> 00:21:13,600
भरोसा ही नहीं

308
00:21:13,600 --> 00:21:17,600
कर रहे हैं तो कल्कि भगवान जब आएंगे तो कैसे तय करोगे कि

309
00:21:17,600 --> 00:21:21,600
कल्कि कोई ना कोई आचार्य तो बोलेगा ना ये कल्कि आचार की

310
00:21:21,600 --> 00:21:25,680
सीमा के बाहर जाके किसी को भी कल्कि मान लोगे किसी बुरी शक्ति ने थोड़ा सा

311
00:21:25,680 --> 00:21:31,360
वैसा लक्षण दिखा दिया भगवान वाला तो तुम मान लोगे उसको

312
00:21:31,360 --> 00:21:35,520
आचार्य का भी ठप्पा वहां पर जरूरी है। जैसे कि गीता है।

313
00:21:35,520 --> 00:21:40,880
यह मेरे पास गीता है। ठीक है? हम

314
00:21:40,880 --> 00:21:44,960
यह मेरे पास भगवत गीता है। ठीक है? उसने खंडन

315
00:21:44,960 --> 00:21:49,280
किया है। उसमें कौन सही है, कौन गलत है, एक अलग विषय है। उसने

316
00:21:49,280 --> 00:21:53,440
विरोध किया है। उस विरोध में कौन सही है, कौन गलत है, अलग विषय है।

317
00:21:53,440 --> 00:21:57,440
मगर अभी बात यह है कि यदि वह अपने आप को निग्रहचार्य कह

318
00:21:57,440 --> 00:22:01,760
रहा है तो उसका निग्रहचार्यत्व सिद्ध कैसे होता है?

319
00:22:01,760 --> 00:22:06,320
उसकी सबसे बड़ी प्रॉब्लम यही है कि उसने यह कह दिया है कि मैं शास्त्रार्थ के द्वारा

320
00:22:06,320 --> 00:22:10,480
सबका निग्रह करूंगा। तो सबके में सब आ गया।

321
00:22:10,480 --> 00:22:14,560
उसकी किसी के प्रति प्रमाण बुद्धि रह नहीं गई। अब जैसे ये ये ग्रंथ है।

322
00:22:14,560 --> 00:22:18,640
ये मेरे लिए ग्रंथ तब है। ये मेरे लिए ग्रंथ तब है जब

323
00:22:18,640 --> 00:22:22,640
किसी प्रामाणिक आचार्य ने कहा कि गीता प्रेस सही ग्रंथ छाप रही भगवत

324
00:22:22,640 --> 00:22:26,880
गीता। तब मेरे लिए ग्रंथ है। वरना भैया गीता प्रेस इसमें ग्रंथ

325
00:22:26,880 --> 00:22:29,440
के नाम पर कुछ भी छाप सकती है।

326
00:22:29,440 --> 00:22:33,440
और अगर मैंने कह दिया कि नहीं नहीं मैंने गुरु के बिना इस ग्रंथ को अपना प्रमाण मान लिया

327
00:22:33,440 --> 00:22:37,680
तो इनडायरेक्ट वे में मैंने अपना प्रमाण किसको माना?

328
00:22:37,680 --> 00:22:41,760
गीता प्रेस वाले को अपना प्रमाण मान लिया। अब मैं ये नहीं कह सकता

329
00:22:41,760 --> 00:22:45,840
कि गीता प्रेस झूठ बोल सकती है। क्योंकि अगर वो झूठ बोल सकती है तो वो इस

330
00:22:45,840 --> 00:22:50,000
ग्रंथ के नाम पे दो श्लोक घटा बढ़ा सकती है। कुछ झूठ लिख

331
00:22:50,000 --> 00:22:54,160
सकती है। ठीक है? तो गीता तो इस तरीके से यदि

332
00:22:54,160 --> 00:22:58,320
मैं गुरु परंपरा को छोड़ दूंगा तो फिर गीता ब्रहस्प मेरी प्रमाण बुद्धि

333
00:22:58,320 --> 00:23:02,400
सिद्ध होगी। फिर मेरा धर्म का निर्णायक कौन होगा? अच्छा मैं मैं

334
00:23:02,400 --> 00:23:06,720
प्रश्न करता हूं। आप आपने कहा कि आपके आचार्य

335
00:23:06,720 --> 00:23:10,880
आपके गुरु जी पूरी शंकराचार्य जी राम आचार्य परंपरा को मानते

336
00:23:10,880 --> 00:23:14,880
हैं। ये शब्द पर शब्द प्रमाण हो गया। शब्द से प्रमाणित

337
00:23:14,880 --> 00:23:19,040
हो गया। विशिष्टद्वैत परंपरा आप ये भी कहते

338
00:23:19,040 --> 00:23:23,280
हैं कि परंपरा प्राप्त अर्थ में पूरा पूरा भरोसा होना चाहिए। स्वतंत्र

339
00:23:23,280 --> 00:23:27,680
रूप से अपनी बात बताइए मुझे। मेरा मेरा गलत होना जरूरी

340
00:23:27,680 --> 00:23:31,840
है क्या निग्रचार के निग्राचार्य सिद्ध करने के लिए? मेरा आधार जरूरी

341
00:23:31,840 --> 00:23:35,840
है क्या? मेरा आधार जरूरी है क्या? आप स्वतंत्र रूप से उसके बारे में

342
00:23:35,840 --> 00:23:39,840
बताइए। वो निग्रचार कैसे है? आप अगर

343
00:23:39,840 --> 00:23:45,840
भटकाएंगे विषय को तो मैं क्या करूंगा? व्यर्थ का टाइम थोड़ी ना है। आप

344
00:23:46,480 --> 00:23:50,720
भाग्य लग रहा है इनकी कहानी शुरू तभी

345
00:23:50,720 --> 00:23:54,800
है। भागवतानंद स्वतंत्र रूप से अपने आप को निग्राचार्य सिद्धि नहीं कर

346
00:23:54,800 --> 00:23:59,920
पाएगा। उसको मेरा गलत होना आवश्यक है। उसमें

347
00:23:59,920 --> 00:24:04,000
अब जाओ जाकर के शंकराचार्य को और रामानुजाचार्य जी को सबको कहो कि तुम

348
00:24:04,000 --> 00:24:08,160
अप्रामाणिक हो। अगर निग्रह ये भागवतानंद भी अप्रामाणिक है। सुन रहे है ना? रामानुज

349
00:24:08,160 --> 00:24:13,360
जी भी सुन रहे होंगे।

350
00:24:13,360 --> 00:24:17,360
अगर भागवतानंद से उसकी प्रामाणिकता पूछी जाएगी तो भागवतानंदी यह

351
00:24:17,360 --> 00:24:21,680
करेंगे कि रामानुजाचार्य क्यों वो हो गए

352
00:24:21,680 --> 00:24:25,360
प्रामाणिक कैसे हो गए

353
00:24:25,360 --> 00:24:29,440
सीधी सी बात है अवतार कौन है कौन नहीं है इस विषय

354
00:24:29,440 --> 00:24:33,440
में हमारे जो शब्द है गुरु परंपरा के वो प्रमाण है

355
00:24:33,440 --> 00:24:37,600
जिनको उस उस वो जो ज्ञानार्थक दर्शन जहां से हो रहा है

356
00:24:37,600 --> 00:24:41,760
और क्या कहते हैं जो विशुद्ध सतोगुणी

357
00:24:41,760 --> 00:24:45,840
माया के साथ क्या कहते हैं आलंबन लेते हो भगवान ने

358
00:24:45,840 --> 00:24:51,840
अपना जो रूप दिखाया है आपको

359
00:24:56,560 --> 00:25:00,880
जो जो उन्होंने रूप दिखाया है आपको उसके

360
00:25:00,880 --> 00:25:04,960
द्वारा वो मनुष्य जैसे कृत करते हुए दिख रहे हैं। शरीर को बड़ा करना

361
00:25:04,960 --> 00:25:09,440
रावण भी कर रहा है। कुंभकरण भी कर रहा है। इससे पहचान होगी क्या भगवान की? नहीं।

362
00:25:09,440 --> 00:25:13,760
जहां पर हमारे जो शब्द प्रमाण है गुरु परंपरा से प्राप्त जो गुरु

363
00:25:13,760 --> 00:25:18,720
गुरुजन है उनको ज्ञानार्थक दर्शन होंगे जिस जिस

364
00:25:18,720 --> 00:25:23,040
व्यक्तित्व को देखकर उस वो अवतार सिद्ध होगा उसको

365
00:25:23,040 --> 00:25:27,200
अवतार कहा गया उस समय पे हमारे शब्द प्रमाण थे वशिष्ठ ब्रह्मा जी

366
00:25:27,200 --> 00:25:31,520
वो सब हमारे शब्द प्रमाण थे उन्होंने कहा राम जी वो है भगवान

367
00:25:31,520 --> 00:25:35,520
व्यास जी ने कहा कृष्ण जी भगवान है कृष्ण भगवान ने तो

368
00:25:35,520 --> 00:25:39,520
कहा ही बाकी हमें वेद देने वाले व्यास जी इत्यादि ने

369
00:25:39,520 --> 00:25:43,600
कहा कि वो भगवान भगवान है। तब हमने माना वो भगवान है। इस

370
00:25:43,600 --> 00:25:47,600
बात को समझने का प्रयास करो और निष्पक्ष

371
00:25:47,600 --> 00:25:51,760
होकर के विचार करना शुरू करो। तो ऐसे ही हमारे

372
00:25:51,760 --> 00:25:56,320
जो शब्द प्रमाण है उन्होंने ज्ञानार्थक दर्शन किए भगवान रामानुजाचार्य

373
00:25:56,320 --> 00:26:01,120
में। हां ये है ज्ञान अवतार भगवान के। तो इसलिए

374
00:26:01,120 --> 00:26:05,120
वैदिक है और उनके द्वारा दी जाने वाली जो ब्रह्म की व्याख्या

375
00:26:05,120 --> 00:26:09,120
है उसको लेकर के संप्रदायों में भेद है। धर्म की व्याख्या में नहीं

376
00:26:09,120 --> 00:26:12,000
है। सभी मूर्ति पूजक है। सभी वर्णाश्रमी

377
00:26:12,000 --> 00:26:16,000
है। इसीलिए किसी को किसी के बारे में कोई कटाक्ष इत्यादि करने की

378
00:26:16,000 --> 00:26:20,400
आवश्यकता नहीं पड़ती। अपने स्व की पुष्टि सब लोग किया करते हैं अपने अपने

379
00:26:20,400 --> 00:26:24,400
मंचों से। मगर ये नहीं है कि एक दूसरे के प्रति अनादर करते

380
00:26:24,400 --> 00:26:28,400
हो या फिर तूतड़ा की भाषा बोलते हो। मगर एक व्यक्ति

381
00:26:28,400 --> 00:26:32,800
आता है कहता है भगवती ने मुझे जो है सपना दिया है तो उस दृष्टि

382
00:26:32,800 --> 00:26:36,960
से भी उसको जब आचार्य के रूप में ऐसे किसी परंपरा वाले आचार्य के

383
00:26:36,960 --> 00:26:40,960
रूप में स्वीकार करना पड़ेगा तो वहां पर पूछा जाएगा ना कि कहां से उसने अपने

384
00:26:40,960 --> 00:26:44,480
मंत्र को सत्यापित कराया है

385
00:26:44,480 --> 00:26:48,560
हमें तो सत्यापित सत्यापन नहीं हुआ स्वतंत्र रूप से कहां से

386
00:26:48,560 --> 00:26:53,760
सत्यापित करा लिया उसने वो गया अच्छा वो सत्यापित कराने कहा जा रहा है

387
00:26:53,760 --> 00:26:57,760
निगमानंद की परंपरा में वहां पर ब्रह्म सूत्र का भाष्य कहां से आया है?

388
00:26:57,760 --> 00:27:00,480
शंकर भाष्य

389
00:27:00,480 --> 00:27:04,640
और यही कार्य कर रहा था भागवत आनंद अपनी उसमें जब उससे पूछा

390
00:27:04,640 --> 00:27:08,640
जाएगा कि तुम्हारी परंपरा कैसे हो रही है? तो वो कहेगा कि

391
00:27:08,640 --> 00:27:13,120
भैया तो वो जो है शबरी ने वो शबरी के बेर खाए थे कि नहीं खाए थे अग्नि पुराण

392
00:27:13,120 --> 00:27:19,120
वो ये नहीं बताएगा स्वतंत्र रूप से कि मैं भागवतानंद निग्राचार्य कैसे

393
00:27:22,320 --> 00:27:26,560
अब कुछ लोग यह भी कह देंगे कि नहीं शंकराचार्य की गुरु परंपरा अगर

394
00:27:26,560 --> 00:27:30,720
तुम ले दे के शंकराचार्य को तुम नहीं मानते हो वैदिक होना सिद्ध कर दो

395
00:27:30,720 --> 00:27:35,200
वेद कैसे आए सबसे पुराना भाषण का प्राप्त है कि नहीं प्राप्त है

396
00:27:35,200 --> 00:27:39,200
ले आओ उससे पुराना भाष कैसे आया वेद मंत्र स्वयं को वैदिक तक नहीं कह

397
00:27:39,200 --> 00:27:43,200
पाओगे

398
00:27:43,200 --> 00:27:46,800
निग्गू के चक्कर में जो अपना

399
00:27:46,800 --> 00:27:51,280
धर्म और ब्रह्म दोनों नष्ट कर रहे हो अगर शंकराचार्य

400
00:27:51,280 --> 00:27:55,280
की परंपरा को भी प्रामाणिक नहीं मानोगे शंकराचार्य स्वयं

401
00:27:55,280 --> 00:27:59,040
में शब्द प्रमाण है। सीधी बात

402
00:27:59,040 --> 00:28:03,200
अगर उन पर भी आप जो है दोष दृष्टि रख रहे हो शंकराचार्य

403
00:28:03,200 --> 00:28:07,200
रामानुजाचार्य इत्यादि पर भी दोष दृष्टि यदि तुम आप रख रहे हो

404
00:28:07,200 --> 00:28:12,240
तो आपका वैदिक होना ही सिद्ध नहीं होगा कहां से आया वेद

405
00:28:12,240 --> 00:28:16,720
बीच में मध्यस्थ है ना वो हमें भागवतानंद

406
00:28:16,720 --> 00:28:21,440
पर निर्भर नहीं है हम अपने वेद के लिए भागवतानंद हम पर निर्भर है शंकराचार्य

407
00:28:21,440 --> 00:28:26,880
पर रामानुजाचार्य पर अपने उसके लिए

408
00:28:26,880 --> 00:28:31,200
क्या कहते हैं यह वेद वेद इत्यादि के लिए शास्त्रों के लिए

409
00:28:31,200 --> 00:28:35,200
अब क्योंकि वह निग्रह कर रहा है सबका मान लो

410
00:28:35,200 --> 00:28:39,200
कि वो विद्या भास्कर जी को कहे कि विद्या भास्कर जी ने तो मुझे प्रमाणिक कहा है

411
00:28:39,200 --> 00:28:43,360
तो वो तो उनका भी निग्रह करने को तैयार बैठा है। यानी कि वो भी उसका शब्द प्रमाण

412
00:28:43,360 --> 00:28:47,360
नहीं है। उसी के इस निग्रह की वजह से ही उसका निग्रचार तो सिद्धि

413
00:28:47,360 --> 00:28:51,520
नहीं होगा। एक को उसको छोड़ना पड़ेगा कि इस परंपरा के

414
00:28:51,520 --> 00:28:55,920
यह आचार्य जो है सन्यासी है इनका मैं निग्रह नहीं कर सकता। शब्द ये बिल्कुल

415
00:28:55,920 --> 00:28:59,920
सच्ची बात बोलते हैं शब्द प्रमाण क्योंकि

416
00:28:59,920 --> 00:29:04,000
अगर विद्या भास्कर जी महाराज का निग्रह वो अमुक अमुक विषय में कर

417
00:29:04,000 --> 00:29:08,320
सकता है और उसके अनुसार अमुक अमुक विषय में विद्या भास्कर जी भी गलत हो सकते हैं।

418
00:29:08,320 --> 00:29:12,320
अज्ञानता कर सकते हैं। आचरण की बात नहीं कर रहा हूं। यदि

419
00:29:12,320 --> 00:29:16,560
शास्त्र के किसी मामले का वह गलत अर्थ दे सकते हैं विद्या भास्कर

420
00:29:16,560 --> 00:29:21,280
जी महाराज तो वह तुम्हारे सपने में आने वाले मंत्र

421
00:29:21,280 --> 00:29:25,520
गलत मंत्र को भी सत्यापित कर सकते हैं। तुमने अपने आप को निगमानंद

422
00:29:25,520 --> 00:29:29,600
की परंपरा से तुमने अपना मंत्र सत्यापित करवाया है। निगमंद ने

423
00:29:29,600 --> 00:29:33,760
खुद ईशा को भगवान कहा है। ठीक। तो

424
00:29:33,760 --> 00:29:37,920
जब वो ईशा को भगवान कह सकते तो तुम्हारे सपने में आने

425
00:29:37,920 --> 00:29:43,120
वाली परी को भगवती नहीं कह सकते।

426
00:29:43,120 --> 00:29:47,200
इसी प्रकार से उसने अपनी क्या कहते हैं? भटकाया था

427
00:29:47,200 --> 00:29:50,640
मामले को।

428
00:29:50,640 --> 00:29:54,640
भागवत आनंद को हम निग्रचार मानते हैं। क्यों? यह

429
00:29:54,640 --> 00:29:58,720
मुझे नहीं पता है। वो आएगा बाद में आएगा। वो क्या कहते

430
00:29:58,720 --> 00:30:03,840
हैं? अभी छपी नहीं है। निग्रह प्रवेशिका।

431
00:30:03,840 --> 00:30:08,080
प्रवेशिका में क्या होगा? यहां निग्रह शब्द आया है। यहां निग्रह शब्द आया है।

432
00:30:08,080 --> 00:30:12,160
जिस ग्रंथ में आया उस ग्रंथ में आया है। उससे ये सवाल थोड़ी ना बदल

433
00:30:12,160 --> 00:30:16,480
जाएगा ये वाला कि भागवतानंद ने अपना मंत्र सत्यापित किससे

434
00:30:16,480 --> 00:30:20,720
कराया? उसको कैसे मालूम वैदिक है। वेद के लिए उसे किसी

435
00:30:20,720 --> 00:30:25,040
परंपरा प्राप्त आचार्य के पास जाना पड़ेगा। और जब जाएगा

436
00:30:25,040 --> 00:30:29,120
तो वो उसका शब्द प्रमाण बनेगा। शब्द प्रमाण बनेगा तो उसका निग्रह नहीं कर

437
00:30:29,120 --> 00:30:33,120
पाएगा। निग्रचार निग्रह संप्रदाय खत्म। और अगर यदि

438
00:30:33,120 --> 00:30:37,120
उसका भी वह निग्रह करेगा जिसके पास वह वेद के लिए जाएगा

439
00:30:37,120 --> 00:30:41,120
तो फिर उसका मंत्र सत्यापित होना सिद्ध नहीं होगा। वैदिक होना सिद्ध

440
00:30:41,120 --> 00:30:46,560
नहीं होगा। अपना बनाओ। सपने में आने वाली चीजें क्या होती है?

441
00:30:46,560 --> 00:30:50,560
जब वो अपने आप को थोड़ा बहुत वैदिक होने का दिखावा कर रहा होता है कि मैं

442
00:30:50,560 --> 00:30:54,800
भी सनातन धर्म का ही अर्थ बता रहा हूं। सपने सपने में आने वाले ज्ञान विज्ञान के आधार

443
00:30:54,800 --> 00:30:58,320
पर तो वो बनता है ब्रह्मा कुमारीज। फिर

444
00:30:58,320 --> 00:31:02,640
बिना किसी दय आधार लिए बिना किसी दिव्य घटना का आधार

445
00:31:02,640 --> 00:31:06,960
लिए केवल यह जो संस्कृत का ज्ञान विज्ञान है इसके आधार पर जब वो अपना स्वतंत्र

446
00:31:06,960 --> 00:31:11,040
रूप से मत मत बताता है बनता है आर्य समाज और

447
00:31:11,040 --> 00:31:15,200
यदि वो ये कहना बंद कर दे कि मैं वैदिक हूं मैं वैदिक हूं कर स्वतंत्र रहा है धर्म

448
00:31:15,200 --> 00:31:19,200
की व्याख्या मर्म ये कहना बंद कर दे वैदिक हूं हालांकि वो पूर्ण

449
00:31:19,200 --> 00:31:23,360
रूप से वैदिक नहीं है मगर यदि वो यह कहना

450
00:31:23,360 --> 00:31:27,440
बंद कर दे कि वो वैदिक है तो वो बन जाता है इस्लाम वो वो बन

451
00:31:27,440 --> 00:31:31,760
जाता है बाइबल करो स्वतंत्र व्याख्या अपनी मगर

452
00:31:31,760 --> 00:31:35,920
वैदिक तुम अपने आप को तब कह पाओगे जब तुम्हारा कोई पीछे से शब्द

453
00:31:35,920 --> 00:31:39,120
प्रमाण हो

454
00:31:39,120 --> 00:31:43,920
जिसने तुमको वहां दो अरब वर्ष पूर्व से लेकर के वेद मंत्र ला के दिए

455
00:31:43,920 --> 00:31:47,920
जिसके मंत्र पर भरोसा है उसके अर्थ पर भरोसा क्यों नहीं जिसके अर्थ पर भरोसा

456
00:31:47,920 --> 00:31:53,920
नहीं है उसके मंत्र पर भरोसा क्यों

457
00:32:00,960 --> 00:32:05,360
जिसको भी बात करनी है सामने आके बात कर ले

458
00:32:05,360 --> 00:32:10,080
इस विषय में करनी हो तो

459
00:32:10,080 --> 00:32:14,400
यही उस दिन उसने किया था उसने तो ये कहा ही नहीं था ना कि अमृतानंद

460
00:32:14,400 --> 00:32:18,480
सरस्वती से लिया नहीं मैं कहता कि भाई अमृतानंद सरस्वती का जो शब्द प्रमाण

461
00:32:18,480 --> 00:32:22,560
है निगमानंद वो तो क्या ईसा को वो बता रहा है अच्छा

462
00:32:22,560 --> 00:32:26,960
अब अमृतानंद ने अगर अमृतानंद सरस्वती का अगर शब्द पुराण निगमंद

463
00:32:26,960 --> 00:32:31,040
नहीं है तो फिर वो आचार्य कैसे हुआ जिससे तुम सिद्ध करा रहे हो? ये

464
00:32:31,040 --> 00:32:35,280
जो प्रमाणिकता है आपको पीछे से लेनी पड़ती है। ऐसे

465
00:32:35,280 --> 00:32:39,440
नहीं बनते हैं परंपरा प्राप्त आचार्य और परंपरा प्राप्त आचार्य की आवश्यकता

466
00:32:39,440 --> 00:32:45,440
क्या है? अभी पाला नहीं पड़ा है ना।

467
00:32:45,520 --> 00:32:49,920
जाकिर नायक जब तुम्हारे श्वेता शत्रुपनिषद का अपने मन मुताबिक अर्थ बताएगा

468
00:32:49,920 --> 00:32:53,920
तब वहां क्या कहोगे? बता सकते हो

469
00:32:53,920 --> 00:32:57,920
कोई आवश्यकता नहीं है परंपरा की तब तो वहां कहोगे ना

470
00:32:57,920 --> 00:33:03,920
नहीं ये हमारे परंपरा प्राप्त आचार्यों ने अर्थ नहीं बताया है

471
00:33:07,200 --> 00:33:13,200
भाग गए चलिए ठीक है जय श्री राम सभी को

472
00:33:14,320 --> 00:33:18,320
दे दीजिए लिंक दे दीजिए कोई आना चाहता हो फेस दिखा के आना भाई चोरों की तरह

473
00:33:18,320 --> 00:33:22,240
मत आना

474
00:33:22,240 --> 00:33:28,240
दे दो लिंक

475
00:33:28,320 --> 00:33:32,560
और रही बात ये कि तुम मुझे गलत सिद्ध कर रहे हो कर दो

476
00:33:32,560 --> 00:33:36,720
दुर्जन तोष आया वो क्या कहा था इसने मतानुज्ञान निग

477
00:33:36,720 --> 00:33:41,280
स्थान इसके लिए तो भागता है वो क्यों नहीं आता लाइव चर्चा में

478
00:33:41,280 --> 00:33:45,360
क्यों नहीं आया क्यों बराबरी का मौका नहीं दिया

479
00:33:45,360 --> 00:33:50,080
विपरीत विपरीत वातावरण में जाकर के उसका मुंह बंद कराया

480
00:33:50,080 --> 00:33:54,080
क्यों नहीं बराबर का मौका दिया बैठ के बाकायदा क्यों नहीं ये लो भाई माइक

481
00:33:54,080 --> 00:33:58,240
लगाओ हम माइक लगा रहे हैं क्यों नहीं उसने बराबरी का

482
00:33:58,240 --> 00:34:00,960
मौका दिया

483
00:34:00,960 --> 00:34:05,200
सब और सबको तो रिपोर्टरों को दे रहा है अपना इंटरव्यू क्योंकि उसको मालूम है फसा

484
00:34:05,200 --> 00:34:09,440
देगा तब भी उसके वहां पर जाकर

485
00:34:09,440 --> 00:34:13,520
उसके घर में जाकर के एक प्रश्न उससे पूछा अंत तक उसको यह

486
00:34:13,520 --> 00:34:17,520
कहना पड़ गया पहले उसने प्रयास किया उसने प्रयास किया था यह जो

487
00:34:17,520 --> 00:34:23,520
बात वो कह रहा है ना

488
00:34:25,600 --> 00:34:29,760
यह जो बात वो कह रहा है कि भाई जो

489
00:34:29,760 --> 00:34:34,080
है हम जो है नहीं बताएंगे। हां

490
00:34:34,080 --> 00:34:38,400
नहीं बताएंगे। हमें स्तुति का आधार प्राप्त है। पहली बात तो मैंने उस

491
00:34:38,400 --> 00:34:42,480
जो वो जो उसने बात कही थी उसप तो काउंटर किया ही नहीं क्योंकि मेरे मतलब की चीजें

492
00:34:42,480 --> 00:34:46,480
मुझे काफी मिल गई थी। और बाद में मुझे मालूम था कि

493
00:34:46,480 --> 00:34:51,920
ऐसी स्थिति हो सकती है कि यहां पर एक लड़ाई का हाथापाई का वातावरण बन जाए।

494
00:34:51,920 --> 00:34:57,920
भाई बैग बैग देना मेरा जल्दी बैग दो।

495
00:35:02,960 --> 00:35:07,200
ठीक है। तो बाद में ऐसा वातावरण बनने का

496
00:35:07,200 --> 00:35:11,520
वो था। इसलिए हमने कहा कि अब ठीक है। मतलब की चीजें हो गई है।

497
00:35:11,520 --> 00:35:15,680
अब चलते हैं यहां से। नहीं तो स्थितियां बिगाड़ करके आराम से

498
00:35:15,680 --> 00:35:19,760
और क्या कहते हैं उसका फायदा उठा के हो सकता है भाई हमारे साथ कोई

499
00:35:19,760 --> 00:35:24,480
भी वहां पर घटना घटित हमें थोड़ी ना मालूम है कौन हमारा कौन नहीं है

500
00:35:24,480 --> 00:35:30,480
और वो हुआ भी बदतमीजी की ना उसने लास्ट में

501
00:35:37,600 --> 00:35:41,680
रामानुजाचार्य ने ये किया शंकराचार्य ने ये किया इसलिए मुझे निगराचार्य मान लो अभी कल

502
00:35:41,680 --> 00:35:45,760
को फिर कोई और नया आकर के कहेगा मेरे को भी भगवती ने स्वप्न किया है।

503
00:35:45,760 --> 00:35:50,320
कालिया जिन ने भगवती का रूप बना करके मुझे स्वप्न सपना दिया है।

504
00:35:50,320 --> 00:35:56,320
हम

505
00:35:56,720 --> 00:36:01,040
तो फिर उसको भी मान लेना आचार्य। सबको

506
00:36:01,040 --> 00:36:05,040
आचार्य सबका आचार्य तो ढोते फिरे और वो आचार्य बन करके

507
00:36:05,040 --> 00:36:09,520
सबका निग्रह करेगा।

508
00:36:09,520 --> 00:36:13,760
भाई जब कोई उसका शब्द प्रमाण है ही नहीं तो यह कौन सिद्ध करेगा

509
00:36:13,760 --> 00:36:18,240
कि उसके जो बातें हैं वैदिक है। उसको कैसे पता चला उसको वैदिक मंत्र मिला है?

510
00:36:18,240 --> 00:36:24,240
उसके सपने में जो भगवती आई वैदिक थी।

511
00:36:24,960 --> 00:36:29,120
कौन भगवान है? कौन नहीं है? इसका निर्धारण

512
00:36:29,120 --> 00:36:33,760
शब्द प्रमाण करता है। तो गुरु गोविंद और ग्रंथ

513
00:36:33,760 --> 00:36:37,840
बाकी हम वीडियो बना देंगे। जो चीजें हैं जो ये उसने कहा है

514
00:36:37,840 --> 00:36:41,920
ना माया मोह स्वरूप को उसने कहा है सच्चिदानंद स्वरूप

515
00:36:41,920 --> 00:36:45,920
सभी जितने भी प्रामाणिक आचार्य वैष्णवाचार्य भी भगवत

516
00:36:45,920 --> 00:36:50,320
स्वरूप जो होते हैं अवतार जो होते हैं उनको सच्चिदानंद स्वरूप होता है अग्नि पुराण

517
00:36:50,320 --> 00:36:54,320
में जहां पर शुद्धोधन पुत्र वाला वर्णन आया

518
00:36:54,320 --> 00:36:58,400
है जिसको वो कहता है कि यह भी बुद्ध विष्णु का अवतार था शुद्धोधन

519
00:36:58,400 --> 00:37:02,400
पुत्र क्षत्रिय वाला उसको माया मोह स्वरूप कहा है वही अग्नि

520
00:37:02,400 --> 00:37:06,560
पुराण में अगली पंक्ति में भगवान का स्वरूप

521
00:37:06,560 --> 00:37:10,960
सच्चिदानंद स्वरूप होता है। माया मोह स्वरूप नहीं होता है।

522
00:37:10,960 --> 00:37:12,240
और अगर यह कहो

523
00:37:12,240 --> 00:37:16,320
भगवान तो माया मोह स्वरूप भी धारण कर सकता है। तो ऐसे तो फिर सारे

524
00:37:16,320 --> 00:37:20,320
मनुष्य भी अवतार है भगवान का। मगर

525
00:37:20,320 --> 00:37:24,640
भगवान के अवतार में और माया मोह स्वरूप में अंतर है। भगवान चित स्वरूप

526
00:37:24,640 --> 00:37:28,720
है। सच्चिदानंद स्वरूप। तो भगवान

527
00:37:28,720 --> 00:37:32,960
अगर माया मोह के स्वरूप में आएंगे तो हम उन्हें भगवान नहीं कहेंगे।

528
00:37:32,960 --> 00:37:37,040
कितनी बार आर्यवादियों की बहस में कहा है भगवान अगर अपने जो उनका स्वाभाविक

529
00:37:37,040 --> 00:37:41,040
लक्षण है उसके विपरीत अगर वो आएंगे जैसे रामचंद्र जी के बारे में कहा कि

530
00:37:41,040 --> 00:37:45,040
मर्यादा पुरुषोत्तम है मगर वो कृष्ण भगवान की लीलाएं अगर करने लगेंगे

531
00:37:45,040 --> 00:37:51,040
अपने उसी रूप से तो हम ये कहेंगे कि भगवान की कोई लीला है ये रामचंद्र जी नहीं है

532
00:37:53,760 --> 00:37:59,760
ठीक है

533
00:38:02,480 --> 00:38:06,080
जय श्री राम

534
00:38:06,080 --> 00:38:10,320
जय श्री राम भैया हम आज

535
00:38:10,320 --> 00:38:14,320
चर्चा मैंने देखा परंपरा तो सिद्ध कोई कर

536
00:38:14,320 --> 00:38:18,560
ही नहीं सकता वो लोग उनकी आपने जो पूछा

537
00:38:18,560 --> 00:38:22,880
था ना उनसे परंपरा सिद्ध करने के लिए जो आपका निग्राचार्य

538
00:38:22,880 --> 00:38:26,960
जी जो भगवतानंद जी है उनके साथ आपका चर्चा हुआ उसे मैंने

539
00:38:26,960 --> 00:38:31,040
देखा था एक व्यक्ति कह रहा है गलत तर्क। एक मिनट। एक

540
00:38:31,040 --> 00:38:35,360
व्यक्ति कह रहा है गलत तर्क। भगवान जानबूझकर माया के वशीभूत होते

541
00:38:35,360 --> 00:38:39,440
हैं। होते हैं मगर वो स्वरूप से माया मोह नहीं होते।

542
00:38:39,440 --> 00:38:44,240
स्वरूप से वो होते हैं सच्चिदानंद स्वरूप।

543
00:38:44,240 --> 00:38:48,240
ठीक है? तो जिसने भी जिसकी भी माता जी ने उसको निष्ठा

544
00:38:48,240 --> 00:38:54,240
पूर्वक दूध पिलाया। वो सामने आकर के बातें रखे। कायर ना बने।

545
00:38:55,040 --> 00:39:01,040
हां जी सीतू राम जी बताइए। जय श्री राम

546
00:39:03,200 --> 00:39:09,200
बताइए

547
00:39:16,880 --> 00:39:22,880
जय श्री राम चा हां जी बोलिए

548
00:39:27,920 --> 00:39:33,920
हेलो बोलिए

549
00:39:36,240 --> 00:39:42,240
हेलो जय श्री राम जय श्री राम

550
00:39:48,640 --> 00:39:54,640
एक ही मैसेज बार-बार करने वाले को बैन कर दीजिएगा। बोलिए।

551
00:40:01,040 --> 00:40:06,800
हां बोलिए हर्ष जी बताइए।

552
00:40:06,800 --> 00:40:10,960
ये तो चले गए। हां भैया वही कह रहे थे कि आपका जो मैंने

553
00:40:10,960 --> 00:40:15,520
वीडियो देखा था ना भगवत आनंद जी के साथ जो आपका चर्चा हुआ था तो उसमें

554
00:40:15,520 --> 00:40:19,760
आपने पहला प्रश्न यही पूछा था कि आप अपनी

555
00:40:19,760 --> 00:40:24,000
परंपरा सिद्ध करें। ठीक है? और इस एक प्रश्न को उन्होंने

556
00:40:24,000 --> 00:40:28,640
कितने तरीका से घुमा घुमा के घुमा घुमा के अलग-अलग बात अलग-अलग

557
00:40:28,640 --> 00:40:32,800
वक्तव्य को सामने उन्होंने रखा। जबकि जो

558
00:40:32,800 --> 00:40:36,960
चार बार में चार उत्तर दे चार बार में चार उत्तर

559
00:40:36,960 --> 00:40:40,480
और लास्ट में हम नहीं बताएंगे

560
00:40:40,480 --> 00:40:44,720
जी भैया वही ये आचार्य बनेंगे ये आचार्य

561
00:40:44,720 --> 00:40:49,040
बनेंगे हमको राम के बारे में बताएंगे रामोना भी भाषेत

562
00:40:49,040 --> 00:40:51,520
होता है ये चार बार में अपनी परंपरा

563
00:40:51,520 --> 00:40:55,520
के बारे में चार चीजें बता रहे हैं

564
00:40:55,520 --> 00:40:59,920
और एक बात बताऊं आपको इसने एक प्रश्न डाला

565
00:40:59,920 --> 00:41:04,480
शंगेरी ये कह रहे हैं और आपके ये कह रहे हैं। कौन सही है? मैंने कहा भाई रामानुजाचार्य

566
00:41:04,480 --> 00:41:08,560
ये कह रहे हैं और शंकराचार्य कह रहे कौन सही है? मैंने कहा दोनों की निष्ठा है। दोनों में जिसकी

567
00:41:08,560 --> 00:41:12,640
निष्ठा हो। मैंने कहा कि भाई हमारे हमारे अनुसार भी उसी तरह से सही है।

568
00:41:12,640 --> 00:41:17,040
तो ये व्यक्ति वहां पर ये विषय जो इसने उखाड़ा था हालांकि वो अपने आप में विषयंतर

569
00:41:17,040 --> 00:41:21,280
था। मगर इस व्यक्ति ने फिर एक नया विषय उखाड़ा कि फिर उनको सर्वोच्च

570
00:41:21,280 --> 00:41:25,520
क्यों कहते हो? क्या रामानुजाचार्य वाले रामानुजाचार्य

571
00:41:25,520 --> 00:41:30,480
भगवान को सर्वोच्च नहीं कहते। मैंने तो इसके लोगों को कहा है टपिया

572
00:41:30,480 --> 00:41:34,640
इस तटपुंजिया व्यक्ति को भी लोग परम क्यों

573
00:41:34,640 --> 00:41:39,360
भाई परम क्यों कह रहे हो क्यों कह रहे हो परम जब वो रामानुजाचार्य

574
00:41:39,360 --> 00:41:43,360
पर या भाग शंकराचार्य पर

575
00:41:43,360 --> 00:41:47,440
उनको सर्वोच्च कहे जाने पर आपत्ति प्रकट कर रहा है तो तुम इसको परम कैसे कह

576
00:41:47,440 --> 00:41:50,800
रहे हो परम का अर्थ भी तो वही है

577
00:41:50,800 --> 00:41:53,040
तो

578
00:41:53,040 --> 00:41:57,040
उन्होंने उस व्यक्ति ने केवल अपने उस परंपरा वाले प्रश्न

579
00:41:57,040 --> 00:42:01,040
से बचने के लिए नए-नए विषय खोदता कि तो तुम यह

580
00:42:01,040 --> 00:42:05,120
बता दो भाई उसने खुद ही कहा ना एक वीडियो है उसका कट

581
00:42:05,120 --> 00:42:07,200
करके हमने डाल रखा है

582
00:42:07,200 --> 00:42:11,280
उसमें कहता है कि भाई कोई व्यक्ति अगर अंधा है उसको कहा जाए तुम अंधे हो वो कहे

583
00:42:11,280 --> 00:42:15,280
अरे तू भी तो लंगड़ा है तो उसके लंगड़े होने से उसका

584
00:42:15,280 --> 00:42:19,760
अंधा ना होना सिद्ध नहीं होता ये बात भागवतानंद ने भी कही है

585
00:42:19,760 --> 00:42:24,320
तो भाई मेरे को गलत सिद्ध करके तुम्हारा वो निग्रहचार्य तो कैसे सिद्ध हो रहा है

586
00:42:24,320 --> 00:42:28,640
और तुम कह रहे हो हम खंडन कर रहे है किस चीज से कर रहे हैं कि भैया शास्त्रों

587
00:42:28,640 --> 00:42:32,800
से कर रहे वो तो शास्त्र तुमने माना कैसे? अगर तुम इस शास्त्र से खंडन कर रहे हो किसी

588
00:42:32,800 --> 00:42:37,360
का तुमने कैसे माना कि ये शास्त्र है? कैसे माना?

589
00:42:37,360 --> 00:42:41,680
गीता प्रेस के कहने से मानोगे वो तुम्हारा शब्द प्रमाण हो गई। चौखंबा

590
00:42:41,680 --> 00:42:45,920
के कहने से मानोगे वो तुम्हारा शब्द प्रमाण हो गई। फिर गीता प्रेस झूठ नहीं बोल सकती

591
00:42:45,920 --> 00:42:50,000
अन्य विषयों में कहीं पे। निग्रह नहीं कर पाओगे उसका। तो ये चॉइस

592
00:42:50,000 --> 00:42:54,560
आपकी है कि आप अपने परंपरा प्राप्त किसी सन्यासी आचार्य को अपना शब्द पुराण बताओ

593
00:42:54,560 --> 00:43:00,080
या फिर गीता प्रेस को पब्लिकेशन को बनाओ।

594
00:43:00,080 --> 00:43:04,080
जी भैया उन्होंने तो इस इस विषय में यही ना कहा कि उन्हें जो ग्रंथ मिला

595
00:43:04,080 --> 00:43:08,400
बस उसे पढ़ लिया उन्हें और फिर उसी के हिसाब से हो गए मतलब उनका

596
00:43:08,400 --> 00:43:12,560
प्रमाण उन छपाई वाले जो शास्त्र है शास्त्र

597
00:43:12,560 --> 00:43:16,720
है उनप उनप हो गया मतलब अच्छा भगवती भगवती ने कृपा पूर्वक

598
00:43:16,720 --> 00:43:20,800
दिया मैंने मैंने कहा भगवती ने कृपा से दिया है अगर

599
00:43:20,800 --> 00:43:24,800
भगवती ने दिया है तो तुम्हें सब याद होने चाहिए दो दो चीजों में

600
00:43:24,800 --> 00:43:28,960
दिव्य दिव्य बातें थी एक अती जन्मांतर बोला और एक भगवती से कृपा पूर्वक

601
00:43:28,960 --> 00:43:33,200
बोला दोनों में दिव्यता है तो तुम्हें पूरे शास्त्र तुम्हारे अंदर

602
00:43:33,200 --> 00:43:37,280
पहले से ही है ठीक है तो जब है तो तुम्हें सुनाने में क्या दिक्कत

603
00:43:37,280 --> 00:43:41,440
है सुनाना चालू कर देते 10 20 श्लोक सुनता समझ में आ जाता भाई इसको याद है पूरे सारे

604
00:43:41,440 --> 00:43:45,440
शास्त्र यानी कि तुम छपाई वालों पे और एक सबूत

605
00:43:45,440 --> 00:43:49,520
है सीधा सीधा भगवती से शास्त्र नहीं मिले हैं मोबाइल से मिले हैं देख

606
00:43:49,520 --> 00:43:53,920
देख के बोलता है कि नहीं बोलता है मोबाइल में जब तुम्हें भगवती से शास्त्र

607
00:43:53,920 --> 00:43:57,920
मिले हैं अतीत जन्मांतर से शास्त्र प्राप्त है तो तुम मोबाइल में देख देख

608
00:43:57,920 --> 00:44:02,400
के क्यों बोल रहे हो?

609
00:44:02,400 --> 00:44:06,560
नहीं मिले। ये झूठ था और झूठ

610
00:44:06,560 --> 00:44:12,560
बोलने वाला आचार्य नहीं होता है।

611
00:44:12,800 --> 00:44:16,880
यदि भगवती ने उन्हें सचमुच में इस प्रकार से ज्ञान दिया रहता या

612
00:44:16,880 --> 00:44:20,960
फिर भगवान सामने में आकर के किसी को ज्ञान दे देते तो श्रुति परंपरा वाली

613
00:44:20,960 --> 00:44:25,040
हो जाती है ना। मतलब सुन के याद रखने वाली बात।

614
00:44:25,040 --> 00:44:29,440
ठीक है? तो वो तो उनके उन्होंने किया नहीं। उनके पास तो ऐसा

615
00:44:29,440 --> 00:44:33,600
नहीं है। उन्होंने प्रमाण दिखाते हैं। वो प्रमाण मोबाइल में देख

616
00:44:33,600 --> 00:44:38,560
के या कहीं पर लिखा हुआ बात को वो सामने में कोट करते हैं। खाली

617
00:44:38,560 --> 00:44:42,880
यदि यदि उन्हें भगवान सचमुच में आ के ज्ञान दे देते।

618
00:44:42,880 --> 00:44:47,040
माता भगवती सचमुच में ज्ञान दे देती तो फिर उन्हें इन सभी का आलंबन लेने का आवश्यकता

619
00:44:47,040 --> 00:44:51,040
ही नहीं पड़ता। वो तो एकदम प्रखरता से अपनी बात को रखते

620
00:44:51,040 --> 00:44:55,920
और मतलब बिना मोबाइल और बिना इफ के देखे सीधे

621
00:44:55,920 --> 00:45:00,400
प्रमाण मुंह से ही बता देते सीधे अरे तुम्हारी वैदिकता

622
00:45:00,400 --> 00:45:04,480
जब सिद्धि नहीं हो रही है तो तुम कैसे अपने आप को आचार्य बोल रहे हो सनातन

623
00:45:04,480 --> 00:45:08,640
का हां नया तुम पंथ बना लो मुझे सपना आया है मैं बताऊंगा धर्म ब्रह्म

624
00:45:08,640 --> 00:45:14,000
क्या है नया बना लो यही तो था इस्लाम वहां भी तो आया था जिब्राइल

625
00:45:14,000 --> 00:45:17,440
उसने ये नहीं कहा कि मैं वेदों का अर्थ तुम्हें बता रहा हूं मैं

626
00:45:17,440 --> 00:45:22,080
बताऊंगा कौन सही है कौन गलत शास्त्र का अर्थ करने में उसने कहा सीधेसीधे

627
00:45:22,080 --> 00:45:26,480
वो सब शास्त्रों में मिलावट हो गई है अब मैं बता रहा हूं जो सही बात है भगवान

628
00:45:26,480 --> 00:45:30,800
की सपने में आई हुई तो जब वेद

629
00:45:30,800 --> 00:45:35,120
का आलंबन लेते हुए कोई ऐसा करता है सपने में आई हुई बात

630
00:45:35,120 --> 00:45:39,520
करता है तो बनता है ब्रह्मा कुमारी वहां भी आ रहे

631
00:45:39,520 --> 00:45:43,600
ब्रह्मा जी आकर के बता रहे वो कह तो रहा था

632
00:45:43,600 --> 00:45:47,840
कौन क्या नाम था उसका अरे वो पालम

633
00:45:47,840 --> 00:45:51,920
में आध्यात्मिक विश्वविद्यालय वाला हम वेद को तो मान रहे हैं पर उसके अर्थ को नहीं

634
00:45:51,920 --> 00:45:56,080
मान रहे हैं अर्थ हम अपना देंगे ब्रह्मा जी बता रहे हैं हमें आकर के तो जब

635
00:45:56,080 --> 00:46:00,080
ऐसी किसी दिव्यता के आधार पर हम परंपरा प्राप्त आचार्यों का विरोध तो

636
00:46:00,080 --> 00:46:04,080
कर रहे हैं मगर हम अपने आप को वैदिक जरूर कह रहे हैं तो वो

637
00:46:04,080 --> 00:46:08,240
हो जाता है इस तरह का सनातना भाष और जब

638
00:46:08,240 --> 00:46:12,240
वो यह भी कहने लगता है कि नहीं हम वेद को ही नहीं मानते सीधे सीधे तो वो

639
00:46:12,240 --> 00:46:16,720
हो जाता है ऐसा धर्माभाष

640
00:46:16,720 --> 00:46:20,960
तो तुम स्वतंत्र रूप से अपने आप को कह सकते हो तब हम आएंगे तुम्हारे पास पूछेंगे

641
00:46:20,960 --> 00:46:25,120
क्या पूछेंगे तब जब स्वतंत्र कर दोगे जब वेद का आलंबन नहीं

642
00:46:25,120 --> 00:46:30,000
लोगे वेद का आलंबन लेने के लिए तुम्हें किसी के पास जाना पड़ेगा रामानुजाचार्य

643
00:46:30,000 --> 00:46:32,720
मधवाचार्य शंकराचार्य किसी के पास तुम्हें

644
00:46:32,720 --> 00:46:36,720
जाना पड़ेगा और जब चले जाओगे तो फिर उसका निग्रह नहीं कर

645
00:46:36,720 --> 00:46:40,960
पाओगे समझ में आ रहा है ना ये तुमने तुम्हारा जो सबसे बड़ा ड्रॉबक

646
00:46:40,960 --> 00:46:45,280
है ये तथाकथित जो तुमने अपना ताश के पत्तों का महल बनाया

647
00:46:45,280 --> 00:46:49,680
है। इसका सबसे बड़ा ड्रॉबक है क्या? निग्रह करना।

648
00:46:49,680 --> 00:46:54,640
ये जो ये कहे कि तुम फंस रहे हो कि हम निग्रह करेंगे सबका।

649
00:46:54,640 --> 00:46:59,840
ठीक है? तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी तुम्हारा निग्रह ही है।

650
00:46:59,840 --> 00:47:03,840
अब अब जैसे हम मान ले

651
00:47:03,840 --> 00:47:07,840
हम मान ले। अच्छा पहली बात तो यही हो गई

652
00:47:07,840 --> 00:47:12,080
कि जब सवाल का उत्तर नहीं मिला तो हम क्यों बताएं?

653
00:47:12,080 --> 00:47:16,480
तो अभी तक क्यों बता रहे थे? शुरू में कह दे थे हम आपको नहीं बताएंगे आप अनाधिकारी है

654
00:47:16,480 --> 00:47:20,560
आप वो क्या कहा था कि जो परंपरा में दीक्षित ना हो हालांकि

655
00:47:20,560 --> 00:47:26,400
उस पर तो मैंने वो किया ही नहीं काउंटर मगर ठीक है अभी तक तूने क्यों बताया

656
00:47:26,400 --> 00:47:30,400
जब तुम फंस रहे हो तब बोल रहे हो कि नहीं बताएंगे फिर आगे

657
00:47:30,400 --> 00:47:34,400
वाक स्कलन वो भी बताया जब फंसे

658
00:47:34,400 --> 00:47:40,400
तब नहीं बताया ये क्या साफ दिख रहा है

659
00:47:41,520 --> 00:47:45,680
वहां पे राम जी बताइए भागवतानंद की परंपरा

660
00:47:45,680 --> 00:47:50,480
क्या है? भागवतानंद का जो मंत्र है वो वैदिक है। कैसे सिद्ध हुआ

661
00:47:50,480 --> 00:47:54,720
बताइए? ये मैं उनकी तरफ से नहीं आया हूं। मैं

662
00:47:54,720 --> 00:47:59,120
मतलब अलग एक जिज्ञासा ले आया अपनी छोटी सी। नहीं जिज्ञासा

663
00:47:59,120 --> 00:48:03,120
है तो क्लास में आइए। भागवतानंद के पक्षधर है तो अभी बात करिए।

664
00:48:03,120 --> 00:48:07,520
जिज्ञासा है तो क्लास में आइए। विरोधी विरोधी है तो अभी

665
00:48:07,520 --> 00:48:11,600
इसमें नंबर आएगा लास्ट में इस वीडियो के। उसमें नंबर पर WhatsApp करिए। आपके

666
00:48:11,600 --> 00:48:15,840
साथ चर्चा सुनिश्चित होगी। आपके पक्ष को समझते हुए मैं नहीं जानता वो कौन

667
00:48:15,840 --> 00:48:19,920
है। मैं नहीं जानता भागवत आनंद कौन है। ठीक है? तो आप अभी अभी

668
00:48:19,920 --> 00:48:23,920
रहने दीजिए। इस वीडियो के लास्ट में एक नंबर आएगा। उस नंबर पर

669
00:48:23,920 --> 00:48:28,000
WhatsApp करिए। जिज्ञासु है तो कक्षाओं में आइए। विरोधी है

670
00:48:28,000 --> 00:48:32,160
तो एक दूसरा फॉर्म मिलता है वहां पर। वहां चर्चा में डिस्कशन के लिए फॉर्म मिलता

671
00:48:32,160 --> 00:48:38,000
है उसको काम ठीक है

672
00:48:38,000 --> 00:48:40,160
जी

673
00:48:40,160 --> 00:48:44,320
शास्त्रवा जी जी भैया जी भैया यही है

674
00:48:44,320 --> 00:48:48,560
कि ये लोग अभी कभी भी अपना परंपरा तो सामने में बताएंगे नहीं और

675
00:48:48,560 --> 00:48:53,920
स्वयं को आचार्य पद के योग्य भी बता देंगे कि हम आचार्य हैं।

676
00:48:53,920 --> 00:48:58,000
मतलब परंपरा ही नहीं है। जब बिना परंपरा के ज्ञान ऑथेंटिक कैसे होगा?

677
00:48:58,000 --> 00:49:02,400
फिर कोई भी कोई भी ज्ञान अगर किसी को प्राप्त होता है तो उसके लिए परंपरा तो आवश्यक है ना

678
00:49:02,400 --> 00:49:06,560
अब रही बात ये कि अब रही बात ये कि भैया ऐसे रावण भी विद्वान

679
00:49:06,560 --> 00:49:10,560
था शास्त्रों का तो क्या उसको हम अपने धर्म ब्रह्म का निर्णायक मान

680
00:49:10,560 --> 00:49:14,480
ले हां

681
00:49:14,480 --> 00:49:18,560
तो इसीलिए कहा है कि भाई अपने आप को अगर आपको निग्रचार कहलवाना है तो

682
00:49:18,560 --> 00:49:24,560
कहलवाओ आप उसकी शास्त्रीयता प्रमाणिकता तो सिद्ध करो

683
00:49:26,640 --> 00:49:30,640
जी बिल्कुल उन्हें तो बताना चाहिए मतलब अपनी परंपरा को सामने रख देना

684
00:49:30,640 --> 00:49:34,800
चाहिए कि एक व्यक्ति कह रहा है कि एक व्यक्ति

685
00:49:34,800 --> 00:49:38,960
कह रहा है कि किसी परंपरा का विरोध नहीं करते मूर्ख

686
00:49:38,960 --> 00:49:44,160
तुम हो। ठीक है? परंपरा क्या है?

687
00:49:44,160 --> 00:49:48,320
परंपरा यह है। परंपरा ने क्या कहा है? क्या नहीं कहा है? वो उस

688
00:49:48,320 --> 00:49:53,520
समय जो उसका जो उत्तराधिकारी है वर्तमान का शंकराचार्य

689
00:49:53,520 --> 00:49:57,920
वो जो कह रहा है कि शास्त्र में ये लिखा है शास्त्र में नहीं लिखा है। अगर उसको कोई विरोध

690
00:49:57,920 --> 00:50:02,000
कर रहा है ना तो परंपरा का विरोध है। उस परंपरा के प्रतिनिधि का जो विरोध

691
00:50:02,000 --> 00:50:06,400
है वो परंपरा का विरोध है। और अगर परंपरा

692
00:50:06,400 --> 00:50:10,560
का विरोध नहीं भी है इससे यह कहां से सिद्ध हो गया कि वो निग्राचार्य है।

693
00:50:10,560 --> 00:50:15,120
बात क्या हो रही है? कि तुम सब पर उंगली उठा रहे हो। तुम्हारी प्रमाणिकता

694
00:50:15,120 --> 00:50:21,120
पूछी जा रही है। तुम कैसे बने हो? निग्राचार्य कैसे बने?

695
00:50:21,440 --> 00:50:25,680
तू तड़ाक ये जो व्यक्ति आया था बोल रहा था कि भाई आप जो है तू तड़ाक

696
00:50:25,680 --> 00:50:29,920
क्यों करते हैं? इस व्यक्ति ने हमारे तीन वीडियोस देखे ही नहीं है। बड़े

697
00:50:29,920 --> 00:50:34,000
विनम्रता पूर्वक सम्मान पूर्वक मैंने कहा था भाई आपको कोई गलतफहमी

698
00:50:34,000 --> 00:50:38,080
हो गई जिसके चलते आपने वीडियोस बना दीजिए। बना दिए हैं। आप जो है इस

699
00:50:38,080 --> 00:50:41,840
बात को आगे ना बढ़ाएं। तीन वीडियोस बनाए थे। मगर

700
00:50:41,840 --> 00:50:45,840
उसान को घी नहीं पचता है ना वो वाली बात है ना पचा

701
00:50:45,840 --> 00:50:50,000
नहीं तू तो राग पे आ गया परंपरा फिर हमने

702
00:50:50,000 --> 00:50:54,000
कहा ऐसी बात है तो आ जा भाई सामने हां तब

703
00:50:54,000 --> 00:50:58,080
से भाग रहा है लोग कह रहे थे कि भाई तुम जोधपुर चले गए वहां नहीं

704
00:50:58,080 --> 00:51:04,080
गए उसके गढ़ में गए जहां वो था वहां गए

705
00:51:04,240 --> 00:51:08,240
वहां गए ना जी भैया बिल्कुल बिल्कुल और सवाल

706
00:51:08,240 --> 00:51:12,240
किया फिर उत्तर किया मान लो कि मैं

707
00:51:12,240 --> 00:51:16,720
मैं मान लेता हूं दुर्जन से मैं जवाब नहीं दे पाया। ठीक तुमने

708
00:51:16,720 --> 00:51:20,800
जवाब दे दिया। आज भी उसके लोग क्या मालूम है उसके लोगों

709
00:51:20,800 --> 00:51:25,040
को उसकी परंपरा के विषय में जो डंके की चोट पर बोल सके।

710
00:51:25,040 --> 00:51:29,200
मुझे तो मालूम है भाई अपनी परंपरा के विषय में। रामानुजियों को तो मालूम है भाई अपनी परंपरा

711
00:51:29,200 --> 00:51:33,600
के विषय में। आज भी उसके फॉलोअर्स इस बात में

712
00:51:33,600 --> 00:51:37,760
परेशान है कि उसकी परंपरा क्या है? फिर भी उसकी उस प्रमाणिकता

713
00:51:37,760 --> 00:51:41,760
के लिए लड़ रहे हैं। अरे भाई बोलो कि अभी मैं उसको प्रमाणिक नहीं मानता हूं। ये

714
00:51:41,760 --> 00:51:47,600
बोलना शुरू करो।

715
00:51:47,600 --> 00:51:51,680
जी भैया सबसे पहला प्रश्न का ही उन्होंने उत्तर दिया

716
00:51:51,680 --> 00:51:55,840
ही नहीं। उस चर्चा में जो आपने पहला प्रश्न पूछा उसी का उत्तर उन्होंने दिया

717
00:51:55,840 --> 00:51:59,920
नहीं। और अंत में जाते-जाते उन्होंने ये भी कह दिया कि मैं

718
00:51:59,920 --> 00:52:04,640
मैं क्यों बताऊं? मैं अपनी परंपरा क्यों बताऊं? हम

719
00:52:04,640 --> 00:52:08,640
जो तो फिर हम क्यों बताएं हम क्यों बताएं कि शबरी के शबरी

720
00:52:08,640 --> 00:52:12,800
के विषय में कहां क्या बोला है? गुरुदेव ने

721
00:52:12,800 --> 00:52:17,200
अपने ग्रंथ में लिखा है कि शबरी ब्राहणी क्यों रामायण

722
00:52:17,200 --> 00:52:21,360
में मानसा में उन्होंने बताया है करपात्री जी ने

723
00:52:21,360 --> 00:52:25,680
कि किस किस प्रकार से उनका बेर ना खाना सिद्ध होता है और सीधी

724
00:52:25,680 --> 00:52:29,680
सी बात है ये कैसा राम दे रहे हैं समाज को ये तो इस

725
00:52:29,680 --> 00:52:33,760
व्यक्ति को तो कथा बुलाने का वो नहीं है इसके द्वारा कथा

726
00:52:33,760 --> 00:52:37,920
करवाना भी गलत होगा क्योंकि ये राम जी को आदर्श नहीं मानता है ये

727
00:52:37,920 --> 00:52:43,120
कहता है कि जैसे जो हम लोग लेकर करके चलते हैं ना कि रामो विग्रह धर्म

728
00:52:43,120 --> 00:52:47,200
राम ने जो जो किया वो वो हम कर सकते हैं जितना हम कर सकते हैं। अच्छा

729
00:52:47,200 --> 00:52:51,280
वहां कहता है कि राम जी तो पहाड़ उठाएंगे सेतु बनाएंगे तो तुम भी बनाओगे

730
00:52:51,280 --> 00:52:55,360
तो धर्म का अनुकरण ना कर पाना

731
00:52:55,360 --> 00:52:59,600
आपकी व्यवस्था होनी चाहिए चयन पूर्वक नहीं ठीक

732
00:52:59,600 --> 00:53:02,640
है तो राम जी यदि किसी अभक्ष भक्षण वहां कर

733
00:53:02,640 --> 00:53:06,640
रहे हैं ब्रह्म भाव से अगर वो व्यवहारिक रूप से मान लेंगे तो फिर हम

734
00:53:06,640 --> 00:53:12,480
भी किसी का भी झूठा फिर खाएंगे क्योंकि राम तो धर्म है साक्षात ना

735
00:53:12,480 --> 00:53:16,800
और कोई मुझे नहीं लगता ऐसा संप्रदाय है जिन्होंने व्यवहारिक

736
00:53:16,800 --> 00:53:20,880
रूप से राम जी के बारे में मर्यादा का उल्लंघन स्वीकार किया है। सदियों से और लड़

737
00:53:20,880 --> 00:53:25,040
क्यों रहे हैं? तमाम सारे दुनिया में विचारधारा

738
00:53:25,040 --> 00:53:29,360
है ईश्वर को लेकर के। एकमात्र हमारी हमारे पास राम

739
00:53:29,360 --> 00:53:33,440
है। किसी विचारधारा के पास ऐसा आदर्श नहीं है कि उसने उसी

740
00:53:33,440 --> 00:53:38,400
के द्वारा बताए हुए धर्म को पूरा का पूरा जिया। मोहम्मद

741
00:53:38,400 --> 00:53:42,480
से भी गलती होना स्वीकार किया है। हदीसों में इस

742
00:53:42,480 --> 00:53:47,680
जगह मोहम्मद से गलती हुई थी। यहां वो नहीं फॉलो कर पाए।

743
00:53:47,680 --> 00:53:51,920
हम लोग हजारों साल से लड़ रहे हैं। नहीं राम से कोई गलती नहीं हुई है। हमारे

744
00:53:51,920 --> 00:53:55,920
आदर्श है राम और यह व्यक्ति उनको कह रहा है कि ब्रह्म भाव

745
00:53:55,920 --> 00:54:00,080
से उन्होंने खा लिया। अरे ब्रह्म भाव से अगर हम कह लेंगे और उसको व्यवहारिक मान लेंगे

746
00:54:00,080 --> 00:54:04,240
तो ब्रह्म भाव से सुपनखा को मना क्यों करते? वैष्णो माता को मना क्यों करते? उन

747
00:54:04,240 --> 00:54:08,320
16800 स्त्रियों को मना क्यों करते जिनसे उन्होंने फिर कृष्ण रूप के रूप में आकर

748
00:54:08,320 --> 00:54:12,480
के विवाह किया। ब्रह्म भाव को ब्रह भाव से सबको स्वीकार

749
00:54:12,480 --> 00:54:16,800
कर लेते। कहीं कोई दिक्कत ही नहीं थी। भगवान

750
00:54:16,800 --> 00:54:17,760
राम का स्वरूप

751
00:54:17,760 --> 00:54:22,000
मर्यादा पुरुषोत्तम है। लीला पुरुषोत्तम नहीं है।

752
00:54:22,000 --> 00:54:26,480
और यदि हमें उनके मर्यादा पुरुषोत्तम

753
00:54:26,480 --> 00:54:30,720
को बचा के रखना है ना तो हमें निकालना पड़ेगा कि भैया

754
00:54:30,720 --> 00:54:35,280
आनंद रामायण में कहा जा रहा है कि उन्होंने फल फूल दिए। वहां कहीं भी झूठे

755
00:54:35,280 --> 00:54:39,360
बेर खिलाए। इसकी बात नहीं आ रही है। तो कहीं

756
00:54:39,360 --> 00:54:43,440
पर अगर का कुसुंडी रामायण में आ रहा है तो हमें मानना पड़ेगा कि यहां पर कोई दिव्य

757
00:54:43,440 --> 00:54:47,600
दृष्टि से देखी जा सकने वाली चीज हो रही है। व्यवहारिक रूप से मनुष्य

758
00:54:47,600 --> 00:54:51,600
दृष्टि से नहीं खाया। जैसे मान लीजिए कि वहां राम जी

759
00:54:51,600 --> 00:54:56,400
खड़े हैं। व्यवहारिक रूप से तो यही हो रहा है कि राम जी जो है राम जी को

760
00:54:56,400 --> 00:55:00,640
अर्पित कर रही है फल। मगर वहीं पर उसी समय दिव्य दृष्टि

761
00:55:00,640 --> 00:55:04,960
से राम जी उनके झूठे बेर भी खा रहे हैं। आदि दिक घटना हो गई वो।

762
00:55:04,960 --> 00:55:09,360
ठीक है? इस तरह से तो स्वीकार कर सकते हैं।

763
00:55:09,360 --> 00:55:14,480
मगर ऐसे सीधेसीधे व्यवहारिक रूप से उनका स्वीकार नहीं कर पाएंगे।

764
00:55:14,480 --> 00:55:18,640
जी भैया वाल्मीकि रामायण में और श्री रामचरितमानस में तो ऐसा

765
00:55:18,640 --> 00:55:22,800
कोई वर्णन नहीं है कि उन्होंने झूठे बेर खाए

766
00:55:22,800 --> 00:55:28,800
थे। इस तरह का

767
00:55:30,800 --> 00:55:34,800
वहां पर तो मेर का ही उल्लेख नहीं है वहां पे ये लोग बस

768
00:55:34,800 --> 00:55:38,880
जब भी कोई बात कहो तो कोई ना कोई दूसरी बात ला के सवाल करते हैं। इनके

769
00:55:38,880 --> 00:55:42,880
पास स्वतंत्र रूप से अपने उत्तर नहीं होते। अब एक व्यक्ति कह रहा है कि

770
00:55:42,880 --> 00:55:47,040
रामभद्राचार्य जी की कथा पर भी वो होना चाहिए। अरे भैया राम

771
00:55:47,040 --> 00:55:51,360
भद्राचार्य जी की कथा पर होना अथवा ना होने से उसके द्वारा राम को

772
00:55:51,360 --> 00:55:57,120
अमर्यादित घोषित करना स्वीकार करोगे तुम

773
00:55:57,120 --> 00:56:01,440
इसका जवाब नहीं है कि राम ने ब्रह श्री राम ने ब्रह्म

774
00:56:01,440 --> 00:56:05,760
भाव से खा लिया तो क्यों कह रहे शास्त्र रामो विग्रह धर्मा

775
00:56:05,760 --> 00:56:10,480
ब्रह्म भाव से तो भगवान मोहिनी के रूप के प्रति आकृष्ट हो रहे भगवान

776
00:56:10,480 --> 00:56:14,480
ब्रह्म भाव से तो भगवान श्री कृष्ण सब कुछ कर रहे हैं ब्रह्मा जी सब कुछ

777
00:56:14,480 --> 00:56:17,440
कर रहे हैं

778
00:56:17,440 --> 00:56:22,160
भगवान श्री राम का जो रूप है वह

779
00:56:22,160 --> 00:56:26,640
साक्षात अवतार है भगवान का परंतु उसमें उन्होंने मर्यादा

780
00:56:26,640 --> 00:56:30,560
को स्थापित किया है

781
00:56:30,560 --> 00:56:34,880
ब्रह्म भाव के नाम पर तो फिर तो कृष्ण रूप ही हो गया फिर राम

782
00:56:34,880 --> 00:56:39,040
रूप की विशेषता क्या रह जाएगी अलग से या कृष्ण

783
00:56:39,040 --> 00:56:43,040
रूप की विशेषता क्या रह जाएगी अलग से वो लीला पुरुषोत्तम है वो ब्रह्म भाव से

784
00:56:43,040 --> 00:56:47,120
सब कुछ कर सकते हैं श्री राम ब्रह्म भाव से साध्य कोटि के धर्म

785
00:56:47,120 --> 00:56:51,200
का उल्लंघन नहीं कर सकते। उन्होंने जो भी किया धर्म की सीमा में

786
00:56:51,200 --> 00:56:55,600
रहकर किया। ब्राह्मण का वध करना यह हमारा व्यक्तिगत

787
00:56:55,600 --> 00:56:59,680
धर्म है कि हम नहीं करेंगे नहीं तो पाप लगेगा। मगर समष्टि के हित से क्या

788
00:56:59,680 --> 00:57:03,760
है? अधर्म का नाश करना पड़ेगा। स्त्री को बचाना

789
00:57:03,760 --> 00:57:08,400
पड़ेगा। तो धर्म का निर्णय कर्तव्य का निर्णय एकांकी नहीं होता है।

790
00:57:08,400 --> 00:57:12,400
तो उन्होंने वहां पर समष्टि के भाव से जो है

791
00:57:12,400 --> 00:57:16,400
वध किया ब्राह्मण का। व्यक्तिगत धर्म था भीष्म पितामह का

792
00:57:16,400 --> 00:57:20,640
कि मैं अपनी ली हुई प्रतिज्ञा तोड़ नहीं सकता। ये व्यक्तिगत धर्म था।

793
00:57:20,640 --> 00:57:24,640
समष्टि का धर्म था द्रोपदी को बचाना। द्रोपदी को ना बचाना और

794
00:57:24,640 --> 00:57:28,640
व्यक्तिगत धर्म का आलंबन लेना। समष्टि के धर्म का आलंबन ना लेना। व्यक्तिगत

795
00:57:28,640 --> 00:57:33,520
धर्म को श्रेष्ठ कर देना। इस कारण से वह हमारे आदर्श नहीं है। भीष्म

796
00:57:33,520 --> 00:57:39,520
इतने अंश में

797
00:57:39,840 --> 00:57:43,840
बार-बार प्रश्न ना करें। सेतूराम जी आप जो है फॉर्म भरे

798
00:57:43,840 --> 00:57:47,200
और सामना करें।

799
00:57:47,200 --> 00:57:51,600
जी भैया लिंक तो दिया हुआ है। ऊपर क्यों नहीं आ गए? ऊपर आ के

800
00:57:51,600 --> 00:57:57,600
ऊपर आ के ऊपर आ के दूसरी बातें कर रहे हैं।

801
00:57:58,240 --> 00:58:02,240
जी यही बात है सामने आने का

802
00:58:02,240 --> 00:58:06,400
रहा नहीं ऊपर में

803
00:58:06,400 --> 00:58:10,480
चलिए ठीक है व्यक्ति आया था और उसको जाना पड़ा क्योंकि

804
00:58:10,480 --> 00:58:14,480
उसके पास कुछ था नहीं सिवाय इसके कि रामानुजाचार्य जी को प्रमाणिक क्यों मानते

805
00:58:14,480 --> 00:58:18,640
हो मतलब हम किसी को शब्द प्रमाण के रूप में मानते हैं और उसके

806
00:58:18,640 --> 00:58:22,800
कारण किसी को कुछ मानते हैं तो इसलिए भागवतानंद को भी मान ले

807
00:58:22,800 --> 00:58:27,280
ये बात है सीधी बात

808
00:58:27,280 --> 00:58:31,280
हमारे आपने बहुत अच्छा तर्क आपने बहुत अच्छा तर्क बताया

809
00:58:31,280 --> 00:58:35,760
था कि हमारे शब्द प्रमाण जिनको प्रमाण मान रहे हैं जिनको मतलब

810
00:58:35,760 --> 00:58:40,320
मान रहे हैं कि ये है इनका सिद्धांत सही है तो फिर

811
00:58:40,320 --> 00:58:44,960
हमारे लिए वो भी प्रमाण हो जाते हैं। जैसे कि शंकराचार्य जी ने माना है रामानुजाचार्य

812
00:58:44,960 --> 00:58:48,960
जी को आपने अभी कहा था तो है तो यही

813
00:58:48,960 --> 00:58:53,040
तो बात आता है। अब उन लोगों के पास तो अपना शब्द प्रमाण स्वयं का है नहीं पहला। मतलब

814
00:58:53,040 --> 00:58:57,120
उन्होंने शब्द प्रमाण किसे माना वो तो है ही नहीं पता किसी को। यदि

815
00:58:57,120 --> 00:59:01,360
वो किनको शब्द प्रमाण मान रहे हैं। आपने जैसे बताया कि फिर उनके गुरु जो है

816
00:59:01,360 --> 00:59:05,520
उन्होंने तो शायद ईसा मसीह को भी भगवान बता दिया।

817
00:59:05,520 --> 00:59:10,080
तो हम इनका शब्द प्रमाण ऐसे ही गलत हो जा रहा है।

818
00:59:10,080 --> 00:59:14,160
तो फिर हमारे शब्द प्रमाण जिनको प्रमाण मानते हैं।

819
00:59:14,160 --> 00:59:18,720
हमारे शब्द प्रमाण में तो कोई ऐसी गलती नहीं है। हमारे शब्द प्रमाण तो बिल्कुल परंपरागत

820
00:59:18,720 --> 00:59:22,720
है पहले से ही। तो फिर सच्चाई है। हम ये नहीं

821
00:59:22,720 --> 00:59:26,720
मानते कि जो हमारा शब्द प्रमाण है वो अमुक अमुक विषयों में अज्ञानता

822
00:59:26,720 --> 00:59:32,720
करता है। अमुक अमुक विषयों में झूठ बोलता है।

823
00:59:36,000 --> 00:59:40,080
तो सही बताया। हमारे पास शब्द प्रमाण है। हमारे पास आचार्य

824
00:59:40,080 --> 00:59:44,480
परंपरा है। तो फिर उनकी बात सच है। आप अपनी आचार्य परंपरा

825
00:59:44,480 --> 00:59:48,480
बताएं तो आपकी बात को सच किस कसौटी पे देखा जाएगा

826
00:59:48,480 --> 00:59:53,040
ना कि आपकी बात सच है कि कितनी कितनी नहीं है।

827
00:59:53,040 --> 00:59:57,040
एक व्यक्ति कह रहा है भगवान कृष्ण को भी धर्म कहा गया है। पहली बात तो कहां

828
00:59:57,040 --> 01:00:01,040
कहा गया है। वह बुलाओ। दूसरी बात मर्यादा पुरुषोत्तम भी कहा गया

829
01:00:01,040 --> 01:00:05,040
है। क्या? मर्यादा मर्यादा का निर्वाह

830
01:00:05,040 --> 01:00:09,760
करने वाले पुरुषों में उत्तम

831
01:00:09,760 --> 01:00:13,760
सबसे परम पुरुष मर्यादा का मर्यादा ब्रह्म पर लागू ही नहीं

832
01:00:13,760 --> 01:00:17,840
होती है मर्यादा मानवीय रूप पे ही लागू होगी ब्रह्म

833
01:00:17,840 --> 01:00:21,840
तो अबाध्य है बाध्यता है ही नहीं कोई मर्यादा है ही

834
01:00:21,840 --> 01:00:26,240
नहीं तो जो मर्यादा का शब्द आ रहा है वो मानवीय रूप के लिए आ रहा है

835
01:00:26,240 --> 01:00:30,880
तो मानवीय दृष्टि से वो कोई कार्य ऐसा नहीं कर सकते

836
01:00:30,880 --> 01:00:35,040
जिसमें में साध्य कोटि के धर्म का उल्लंघन हो जो आपको

837
01:00:35,040 --> 01:00:39,200
अती्द्रिय विषयों में धर्म शास्त्रों से बताया गया उन्होंने उसको जो है लांग

838
01:00:39,200 --> 01:00:43,360
दिया हां दिव्य दृष्टि से उन्होंने कर दिया होगा कोई दिक्कत नहीं

839
01:00:43,360 --> 01:00:47,360
वो घटना जैसे मैंने एक वीडियो

840
01:00:47,360 --> 01:00:51,520
में बोला भी है जैसे कि जो स्त्रियां

841
01:00:51,520 --> 01:00:55,680
है जो ये रास लीला हुई थी भगवान की उसमें सभी

842
01:00:55,680 --> 01:00:59,840
स्त्रियां अपनी-अपनी जगह पर सो रही थी तो व्यवहार की दृष्टि से कहीं

843
01:00:59,840 --> 01:01:03,840
पर भी कोई स्त्री अपने घर से गई नहीं थी। दिव्य

844
01:01:03,840 --> 01:01:07,840
लीला थी। दिव्य दृष्टि से देखी जा सकने वाली लीला थी कि सभी स्त्रियां अपने घर से

845
01:01:07,840 --> 01:01:11,920
गई। वहां रास हुआ। व्यवहार की दृष्टि से सभी स्त्रियां

846
01:01:11,920 --> 01:01:16,000
अपने घर में सो रही थी। तो व्यवहारिक रूप से

847
01:01:16,000 --> 01:01:21,040
किसी धर्म का वहां पर वो अधर्म का वो नहीं हुआ। पोषण। और

848
01:01:21,040 --> 01:01:26,800
आदि दैविक दृष्टि से वहां पर धर्म अधर्म है। होता ही नहीं है।

849
01:01:26,800 --> 01:01:30,880
ठीक है? और सीधी बात है हमारे पास प्रमाण

850
01:01:30,880 --> 01:01:35,200
है। आप आए सामने

851
01:01:35,200 --> 01:01:40,000
बात हो रही है वो भागवतानंद निग्रचार कैसे ब्रह्म

852
01:01:40,000 --> 01:01:44,400
अकर्ता है। वास्तविक रूप से पारमार्थिक रूप से ब्रह्म अकर्ता

853
01:01:44,400 --> 01:01:49,040
है। व्यवहार में उसका कुछ करना दिखाई देता है।

854
01:01:49,040 --> 01:01:53,520
समस्त कर्मों को करते हुए भी तू मुझे अकर्ता जान।

855
01:01:53,520 --> 01:01:58,320
कैसे? क्योंकि

856
01:01:58,320 --> 01:02:02,720
पारमार्थिक रूप से तो चार 24 पढ़िए भगवत गीता

857
01:02:02,720 --> 01:02:06,320
भगवत गीता चार 24 पढ़िए

858
01:02:06,320 --> 01:02:10,720
क्रिया भी वही है हवन सामग्री भी वही है

859
01:02:10,720 --> 01:02:14,960
प्राप्त करने वाला भी वही है हवन और प्राप्त होने वाला

860
01:02:14,960 --> 01:02:19,200
जो फल है वो भी वही है ब्रह्म सब कुछ ब्रह्म है तो वहां क्रिया है ही नहीं जब

861
01:02:19,200 --> 01:02:23,280
क्रिया ही नहीं है वहां तो वो अकर्ता हो गए ना क्रिया का भाव

862
01:02:23,280 --> 01:02:27,440
है तो अकर्ता ऐसे हो गए अब कर्ता कैसे

863
01:02:27,440 --> 01:02:31,520
हुए? व्यवहार में माय जगत में

864
01:02:31,520 --> 01:02:35,600
माय जगत में वो करने वाले दिख रहे हैं। ठीक है?

865
01:02:35,600 --> 01:02:40,720
मायिक दृष्टि से प्रपंच रूपी संसार में

866
01:02:40,720 --> 01:02:44,800
क्योंकि वो जानते हैं कि ये जो सब कुछ हो रहा है कि ये माया है। तो

867
01:02:44,800 --> 01:02:48,960
जो भी कर्म करते हुए भगवान हमको दिख रहे हैं। उन कर्मों के फल

868
01:02:48,960 --> 01:02:52,960
में उनकी आसक्ति नहीं है।

869
01:02:52,960 --> 01:02:57,200
ठीक है? क्योंकि वह जानते हैं कि ना कर्म कर्म है ना उससे प्राप्त

870
01:02:57,200 --> 01:03:01,360
होने वाला फल फल है। तो वह वास्तविकता में क्या है?

871
01:03:01,360 --> 01:03:05,520
अकर्ता मगर व्यवहारिक रूप से वो सभी कर्मों को करने

872
01:03:05,520 --> 01:03:09,840
वाले भी दिख रहे हैं।

873
01:03:09,840 --> 01:03:14,800
बता दिया आपका उत्तर दे दिया।

874
01:03:14,800 --> 01:03:18,960
आपका उत्तर दे दिया और कई वीडियोस में दिया है उत्तर। चलिए ठीक है।

875
01:03:18,960 --> 01:03:23,840
सभी को जय श्री राम। आपको कुछ और कहना है शास्त्र जी?

876
01:03:23,840 --> 01:03:28,400
जी नहीं भैया यही कहना था कि उन्होंने अपनी परंपरा तो बताई नहीं

877
01:03:28,400 --> 01:03:32,800
और बात परंपरा नहीं बताई सीधी बात है ये जो बुक

878
01:03:32,800 --> 01:03:36,880
है ये हमारे लिए शास्त्र तब है जब कोई परंपरा

879
01:03:36,880 --> 01:03:40,960
प्राप्त प्रमाणिक आचार्य इसको शास्त्र कहे और एक बात आती है ना कि भाई हमने

880
01:03:40,960 --> 01:03:45,120
हमारे सारे सारे शास्त्र क्या हमने आचार्य से पढ़े नहीं हमने

881
01:03:45,120 --> 01:03:49,200
परंपरा प्राप्त आचार्यों से प्राप्त सिद्धांत के आलोक में

882
01:03:49,200 --> 01:03:53,280
शास्त्र पढ़ते हैं और जहां पर कोई भी शास्त्र विपरीत जाता

883
01:03:53,280 --> 01:03:57,360
हुआ दिख रहा है। वहां जाते हैं अपने उन गुरु जी के पास। गुरु जी एक शास्त्र आया मेरे पास।

884
01:03:57,360 --> 01:04:01,440
उसमें ऐसा ऐसा लिखा है। तो गुरुदेव बता देते हैं भाई ये शास्त्र

885
01:04:01,440 --> 01:04:05,440
शास्त्र ही नहीं है। उसको शास्त्र क्यों समझ रहे हो? या फिर इस शास्त्र

886
01:04:05,440 --> 01:04:08,160
में फलानी जो पंक्ति है वो गलत लिखी हुई है। किसी

887
01:04:08,160 --> 01:04:12,160
ने अपने मन से छाप दी है। लो और या फिर इस पंक्ति का

888
01:04:12,160 --> 01:04:16,320
जो अर्थ तुम ग्रहण कर रहे हो वो अर्थ वो वो नहीं है जो तुम ग्रहण

889
01:04:16,320 --> 01:04:22,320
कर रहे हो। दूसरा अर्थ फिर वो बताते हैं। सीधी बात

890
01:04:23,520 --> 01:04:29,520
भगवत गीता 14 27

891
01:04:49,760 --> 01:04:53,840
यही लोग होते हैं कुछ लोग जो कहते हैं कि गीता जो

892
01:04:53,840 --> 01:04:57,920
है वो भगवान के द्वारा बोली गई है तो फिर हम किसी और की बात क्यों मानेंगे?

893
01:04:57,920 --> 01:05:01,920
भगवान की बात मानेंगे। जबकि उन्हें यह नहीं पता कि जो गीता है वो खुद

894
01:05:01,920 --> 01:05:06,400
ही परंपरा से प्राप्त है। परंपरा के प्राप्त आचार्य जो है स्वयं वेदव्यास

895
01:05:06,400 --> 01:05:10,640
जी ने इसे लिखा है या फिर लिखवाया है गणेश जी के द्वारा गणेश

896
01:05:10,640 --> 01:05:14,640
जी से परंपरा से ना प्राप्त ग्रंथ है जब आचार्य

897
01:05:14,640 --> 01:05:18,720
ने रामानुजाचार्य की रामानुजाचार्य जी ने जो उसका भाष्य

898
01:05:18,720 --> 01:05:23,040
किया है ना पहली बात तो उसमें उन्होंने ये नहीं कहा है धर्म का विग्रह है ठीक है

899
01:05:23,040 --> 01:05:23,760
प्रतिष्ठित

900
01:05:23,760 --> 01:05:27,840
धर्म मैं हूं और

901
01:05:27,840 --> 01:05:31,920
प्राप्तव्य के रूप में कहा है यद्यपि रामानुजाचार्य जी क्या कह रहे हैं शाश्वत

902
01:05:31,920 --> 01:05:35,920
धर्म शब्द प्राय वस्तु के साधन का वाचक है। साधन का वाचक

903
01:05:35,920 --> 01:05:40,080
है। साधन का वाचक है। तथापि यहां उसके पूर्वा

904
01:05:40,080 --> 01:05:44,080
पर के शब्द प्राप्त्य वस्तु के वाचक है। अतः वह भी

905
01:05:44,080 --> 01:05:48,080
उसका सहचारी होने से प्राप्त्य वस्तु को ही लक्ष्य कराने वाला है।

906
01:05:48,080 --> 01:05:52,080
इसी कारण धर्म शब्द का अर्थ ऐश्वर्य किया गया है।

907
01:05:52,080 --> 01:05:56,320
ऐश्वर्य माना है उन्होंने धर्म का अभिप्राय यहां रामानुजाचार्य जी ने।

908
01:05:56,320 --> 01:06:00,320
ठीक है? रामू विग्रहन धर्मा वाला नहीं है। विग्रह नहीं है। यहां विग्रह

909
01:06:00,320 --> 01:06:04,720
कहां आया? साक्षात विग्रह विग्रह का मतलब है पारमार्थिक

910
01:06:04,720 --> 01:06:10,720
रूप से व्यवहारिक रूप हो जाना विग्रह विग्रह नहीं माना उन्होंने

911
01:06:19,040 --> 01:06:23,040
सामने आकर क्यों नहीं बात कर रहे त्रिपाठी जी डर लगता है क्या

912
01:06:23,040 --> 01:06:29,040
बचपन में माता जी ने इष्टा पूर्वक दूध नहीं पिलाया क्या

913
01:06:30,160 --> 01:06:34,320
और यदि यदि मेरे वचन कठोर लग रहे हो तो अपने भागवतानंद के वचन देख

914
01:06:34,320 --> 01:06:37,120
लीजिए।

915
01:06:37,120 --> 01:06:43,120
लिंक दिया हुआ है। ऊपर आ के चर्चा कर ले।

916
01:06:56,320 --> 01:07:00,480
वो 14 27 से उनको विग्रहवान धर्म सिद्ध कर रहे हैं। बताइए अब वो

917
01:07:00,480 --> 01:07:04,480
लीला पुरुषोत्तम नहीं है अगर वो धर्म के साक्षात स्वरूप

918
01:07:04,480 --> 01:07:08,720
होते भगवान तो कई जगह उन्होंने

919
01:07:08,720 --> 01:07:12,800
जो है धर्म के बाहर जाकर के चीजें की है। जो मनुष्यों का

920
01:07:12,800 --> 01:07:16,960
धर्म है। इसीलिए भगवान ने कहा कि लोग मुझे मनुष्य

921
01:07:16,960 --> 01:07:22,960
रूप में देख के मेरे ब्रह्म भाव को जान नहीं पाते। मूर्ख होते हैं।

922
01:07:37,200 --> 01:07:41,280
खुद परीक्षित जी ने भी जब स्वयं सुखदेव जी से पूछा

923
01:07:41,280 --> 01:07:45,360
था कि भगवान इस तरह से अमर्यादित कृत कैसे कर सकते हैं

924
01:07:45,360 --> 01:07:49,440
तो फिर उन्होंने ये देखो लिखा है शंकराचार्य जी का आपने बोला

925
01:07:49,440 --> 01:07:54,000
ना आपने बोला शंकराचार्य जी का भाष्य

926
01:07:54,000 --> 01:07:58,720
उसमें लिखा है जो अमृत अविनाशी अव्यय

927
01:07:58,720 --> 01:08:02,720
निर्विकार शाश्वत नित्य धर्म स्वरूप ज्ञान

928
01:08:02,720 --> 01:08:07,280
योग रूप धर्म द्वारा प्राप्तव्य और एकांतिक

929
01:08:07,280 --> 01:08:11,520
सुख स्वरूप अर्थात व्यभचार रहित आनंदमय

930
01:08:11,520 --> 01:08:15,520
है उस ब्रह्म की प्रतिष्ठा में मैं हूं। कहीं

931
01:08:15,520 --> 01:08:19,520
यहां पर नहीं लिख रहा है कि वह विग्रहवान धर्म है। यानी व्यवहारिक

932
01:08:19,520 --> 01:08:23,680
रूप से वह धर्म है। यह नहीं लिखा है। अगर व्यवहारिक रूप से वह धर्म

933
01:08:23,680 --> 01:08:28,080
हो जाएंगे तो फिर तो भगवान

934
01:08:28,080 --> 01:08:32,080
क्योंकि सब कुछ कर रहा है। सब कुछ कर सकने वाला है और वो धर्म

935
01:08:32,080 --> 01:08:36,080
का पहले स्वरूप का अर्थ समझ लीजिए। स्वरूप किसे कहते हैं? ठीक

936
01:08:36,080 --> 01:08:40,240
है? जैसे माया मोह स्वरूप का जो अर्थ

937
01:08:40,240 --> 01:08:44,560
लिया है। तो यहां पे वो प्रतिष्ठित बताया है। सीधी

938
01:08:44,560 --> 01:08:48,720
सी बात है कुल मिलाकर आप यह कहना चाहते हैं कि कृष्ण और राम में

939
01:08:48,720 --> 01:08:52,240
कोई अंतर नहीं है। राम जी भी लीला कर रहे हैं। सब कुछ कर सकते हैं

940
01:08:52,240 --> 01:08:56,320
और वो किसी भी प्रकार की मर्यादा का उल्लंघन कर सकते हैं। जैसे श्री

941
01:08:56,320 --> 01:09:00,320
कृष्ण ने किया है। ये कहना चाह रहे हो। ये इनका धर्म का बोध है इन

942
01:09:00,320 --> 01:09:04,400
लोगों का। यहां पर कहीं धर्म का विग्रह नहीं माना उन्होंने। उस ब्रह्म की

943
01:09:04,400 --> 01:09:07,680
प्रतिष्ठा में मैं हूं।

944
01:09:07,680 --> 01:09:12,720
ठीक है?

945
01:09:12,720 --> 01:09:17,760
और धर्म स्वरूप ज्ञान ज्ञान योग रूप धर्म द्वारा प्राप्तव्य

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01:09:17,760 --> 01:09:22,160
उन्होंने वहां प्राप्तव्य माना है धर्म का प्राप्तव्य

947
01:09:22,160 --> 01:09:26,240
उस रूप में कहा गया है उनको धर्म क्योंकि धर्म जो है व्यवहार

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01:09:26,240 --> 01:09:31,040
है और ब्रह्म व्यवहारिक दृष्टि से ये नहीं कह सकता कि मैं व्यवहार में मैं धर्म हूं।

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01:09:31,040 --> 01:09:35,600
चलिए जय श्री राम। सभी

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01:09:35,600 --> 01:09:39,600
को ठीक है हर्ष जी। जय श्री राम। जी भैया

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01:09:39,600 --> 01:09:43,600
जय श्री राम भैया
