1
00:00:01,520 --> 00:00:05,120
सभी को जय श्री राम।

2
00:00:05,120 --> 00:00:09,200
आशा करते हैं आप कुशल पूर्वक होंगे और अभी आप

3
00:00:09,200 --> 00:00:13,920
लोगों ने चर्चा का जो थंबनेल है वो देख लिया होगा।

4
00:00:13,920 --> 00:00:18,560
आशीष ध्यानी जी जुड़ने वाले हैं हमारे साथ।

5
00:00:18,560 --> 00:00:22,560
कुछ शास्त्रों को मानने अथवा ना मानने

6
00:00:22,560 --> 00:00:26,560
के विषय में चर्चा है। पहले ही बता दूं आशीष ध्यानी

7
00:00:26,560 --> 00:00:31,040
जी जो है जो हमारे बहुत सारे

8
00:00:31,040 --> 00:00:35,520
धार्मिक मत हैं जैसे मूर्ति पूजा इत्यादि वर्णाश्रम

9
00:00:35,520 --> 00:00:39,520
इत्यादि में वो संभवत मुझे जहां तक आशा है

10
00:00:39,520 --> 00:00:43,520
वो समर्थन ही करते हैं। परंतु बस उनका एक कहीं पर अटक रहा है।

11
00:00:43,520 --> 00:00:47,840
बाकी वो शास्त्र को अंतिम प्रमाण

12
00:00:47,840 --> 00:00:52,320
नहीं मानते हैं रूप से तो

13
00:00:52,320 --> 00:00:57,680
ले लेते हैं उनको

14
00:00:57,680 --> 00:01:03,680
जी जय श्री राम जय श्री राम

15
00:01:07,280 --> 00:01:12,720
तो थोड़ा सा अपने बारे में बताएंगे

16
00:01:12,720 --> 00:01:16,560
जो क्या

17
00:01:16,560 --> 00:01:20,640
कुछ नहीं एक जो उस दिन हमने आपका वीडियो देखा था मेरी आवाज

18
00:01:20,640 --> 00:01:24,960
क्यों आ रही है इको हो रही है इको असल में

19
00:01:24,960 --> 00:01:29,520
हम हेडफोन हेडफोन यूज़ नहीं कर रहे हैं उसको

20
00:01:29,520 --> 00:01:33,840
करने से कुछ नहीं तब भी नहीं तब भी आनी नहीं चाहिए तो खुले

21
00:01:33,840 --> 00:01:37,920
से हो रहा है क्या आ जाती है कोई बात नहीं वो हो सकता है यहां का थोड़ा मौसम वैसा है

22
00:01:37,920 --> 00:01:43,920
ना थोड़ा इको हो रहा होगा हल्का सा

23
00:01:44,400 --> 00:01:48,560
अगर कोई आप लगा वो हटा दो वो लगा ऐसे ऐसे

24
00:01:48,560 --> 00:01:52,560
कोई डिस्टरबेंस नहीं हो रहा ऐसे तो आवाज क्लियर है हां

25
00:01:52,560 --> 00:01:56,640
अब तो क्लियर आ रही है ठीक है अब ठीक

26
00:01:56,640 --> 00:02:02,640
है जी थोड़ा सा आप अपने बारे में बता दीजिए

27
00:02:04,400 --> 00:02:08,480
वैसे तो हमारा जो अध्यात्म में रुझान है

28
00:02:08,480 --> 00:02:14,480
वह बचपन से ही है और

29
00:02:14,800 --> 00:02:18,880
ध्यान वगैरह करने के साथसाथ हमारा यह

30
00:02:18,880 --> 00:02:22,320
ज्ञान का जो

31
00:02:22,320 --> 00:02:25,840
प्रसार है वह

32
00:02:25,840 --> 00:02:31,680
ब्रह्मांड में जो है

33
00:02:31,680 --> 00:02:36,800
अभीचल रूप से दर्ज है जो उसको

34
00:02:36,800 --> 00:02:40,880
प्राप्त होता आया है। जैसे सूर्य का प्रकाश है ना

35
00:02:40,880 --> 00:02:45,040
किसी को पता है कि सूर्य कब से उदय हुआ है ना किसी

36
00:02:45,040 --> 00:02:49,200
को पता है कि सूर्य कब से अस्त हो रहा है।

37
00:02:49,200 --> 00:02:54,560
तो उसी प्रकार ध्यान में जो

38
00:02:54,560 --> 00:02:58,080
हमें लगता है कि

39
00:02:58,080 --> 00:03:02,160
हमें स्वयं जैसे कोई बताता है कि क्या यह

40
00:03:02,160 --> 00:03:06,160
सही है या गलत है और कई बार आभास भी होता

41
00:03:06,160 --> 00:03:10,320
है। तो उसी विषय में आपका हमने एक वीडियो देखा था। उस

42
00:03:10,320 --> 00:03:14,400
पर हमें लगा कि उसमें जो

43
00:03:14,400 --> 00:03:18,720
ब्रह्मकुमारी का शायद था वो चर्चा हो रहा था। तो उसमें

44
00:03:18,720 --> 00:03:24,720
हमें यह लगा कि कुछ चीजें उसमें

45
00:03:24,800 --> 00:03:28,960
सनातन के विरुद्ध हमें लगी तो उस

46
00:03:28,960 --> 00:03:32,960
पर हमें जो है हमने टिप्पणी किया था जिसके बाद आपका कॉल भी

47
00:03:32,960 --> 00:03:37,120
आया वो कमेंट भी आया था कि इस पर चर्चा होनी

48
00:03:37,120 --> 00:03:41,360
चाहिए। मुझे लगता है वो टिप्पणी इस बारे में थी कि धर्म

49
00:03:41,360 --> 00:03:45,520
के लिए प्रमाण स शास्त्र नहीं है बल्कि अंतःकरण से आने वाली

50
00:03:45,520 --> 00:03:49,760
आवाज है।

51
00:03:49,760 --> 00:03:53,920
हां हां उसमें जो हमने टिप्पणी किया था तो यही हमारा कहना

52
00:03:53,920 --> 00:03:58,240
हमने यह लिखा था कि जो ज्ञान

53
00:03:58,240 --> 00:04:03,120
है वो

54
00:04:03,120 --> 00:04:08,800
उसे अगर देखा जाए ज्ञान को वास्तविक रूप में तो

55
00:04:08,800 --> 00:04:12,880
वो प्रत्यक्ष है। जो सनातन का ज्ञान है वो प्रत्यक्ष है।

56
00:04:12,880 --> 00:04:17,200
शास्त्रों की व्यवस्था नहीं। नहीं, हम यह नहीं कहते कि शास्त्र

57
00:04:17,200 --> 00:04:21,200
गलत है। हमारा कहना यह है कि अगर हम

58
00:04:21,200 --> 00:04:25,920
प्रत्यक्ष हो गए, अगर हम स्तर प्राप्त कर गए

59
00:04:25,920 --> 00:04:30,240
तो जो शास्त्रों में दर्ज है वो हमको स्वतः पता चल जाता है। हमारा

60
00:04:30,240 --> 00:04:34,480
कहना ये है। तो ये विरोध नहीं करते। इसको कभी

61
00:04:34,480 --> 00:04:38,480
हमने डिनाई कहां किया? आप अगर प्रत्यक्ष हो गए

62
00:04:38,480 --> 00:04:42,880
तो प्रत्यक्ष होने तक की यात्रा तो आपको शास्त्र से ही करनी होगी और प्रत्यक्ष

63
00:04:42,880 --> 00:04:47,120
हो गए तो फिर तो फिर सिद्ध हो गए। सिद्धि हो गई।

64
00:04:47,120 --> 00:04:51,360
फिर तो कोई बात ही नहीं। अब जैसे कि वही

65
00:04:51,360 --> 00:04:55,440
मैं कह रहा हूं। अब जैसे कि हमने जो है सही बताया आपको। हमने

66
00:04:55,440 --> 00:04:59,600
कभी शास्त्रों का अध्ययन नहीं किया है। लेकिन हम शास्त्र

67
00:04:59,600 --> 00:05:04,320
का विरोध भी नहीं करते हैं। क्योंकि हमारा मानना है कि जिसको

68
00:05:04,320 --> 00:05:09,120
अभी प्रत्यक्ष नहीं हुआ है वह शास्त्रों के अनुसार

69
00:05:09,120 --> 00:05:14,160
बढ़कर उस स्तर तक जा सकता है।

70
00:05:14,160 --> 00:05:18,480
प्रयत्न एक बात ये भी आती है। एक बात उसमें भी आती है।

71
00:05:18,480 --> 00:05:22,480
और अगर हम जैसे हमने बताया एक बात

72
00:05:22,480 --> 00:05:26,560
इसमें ये भी आती है। जैसे हमने बताया कि आपके पीछे हेलीकॉप्टर

73
00:05:26,560 --> 00:05:31,440
निकल रहा है। हां हेलीकॉप्टर निकल रहा है वो निकलते रहता है।

74
00:05:31,440 --> 00:05:35,600
तो जैसा कि हमने बताया कि हम समझ गया आपकी आपकी

75
00:05:35,600 --> 00:05:40,320
बात समझ गया बस मैं उसमें एक एक पॉइंट जोड़ दूं एक बात इसमें ये भी आती है

76
00:05:40,320 --> 00:05:44,320
कि शास्त्र की आवश्यकता इसमें भी होती है तो उसका आलंबन लेकर

77
00:05:44,320 --> 00:05:48,560
के प्रत्यक्ष होने की बिना शास्त्र के व्यक्ति हो गया कोई दिक्कत नहीं हो सकता

78
00:05:48,560 --> 00:05:52,640
है उसके प्रारब्ध ऐसे होते हैं उसके कर्म पूर्व जन्म

79
00:05:52,640 --> 00:05:56,640
के कर्म इत्यादि वंश ऐसा होता है कि बिना शास्त्र के भी उसको

80
00:05:56,640 --> 00:06:01,200
जो है सिद्धि प्राप्त हो सकती है वो जो है ज्ञान मार्ग पर आगे बढ़ सकता

81
00:06:01,200 --> 00:06:05,360
कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है। परंतु इसमें

82
00:06:05,360 --> 00:06:09,520
क्या होता है कि दो बातें एक कि जो जिनका

83
00:06:09,520 --> 00:06:12,640
जिनको प्रारब्ध पूर्वक

84
00:06:12,640 --> 00:06:16,880
नहीं प्राप्त हुआ है ज्ञान उनके लिए तो शास्त्र

85
00:06:16,880 --> 00:06:21,280
ही प्राथमिक है। अब वो उसके बाद अब

86
00:06:21,280 --> 00:06:26,000
दूसरी बात दूसरी बात यह है कि शास्त्र को सत्यापन

87
00:06:26,000 --> 00:06:30,080
के लिए तब भी रखना पड़ेगा क्योंकि ऐसा ना हो कि कोई व्यक्ति बोले

88
00:06:30,080 --> 00:06:33,600
कि मुझे प्रत्यक्ष ज्ञान हो गया है तो अब मैं बहन के साथ

89
00:06:33,600 --> 00:06:37,760
विवाह कर लूं या अब मैं कुछ भी कर लूं तो वहां पर जो है शास्त्र से प्रमाण

90
00:06:37,760 --> 00:06:41,760
दिया जाएगा कि नहीं आप भले ही खुद दो है मगर बहन के

91
00:06:41,760 --> 00:06:46,000
साथ विवाह जो है वो स्वीकार नहीं है क्योंकि वो प्रत्यक्ष

92
00:06:46,000 --> 00:06:50,160
ज्ञान होने की आड़ में वो अधर्म भी फैला जा सकता है। इसलिए

93
00:06:50,160 --> 00:06:54,720
एक मर्यादा के लिए शास्त्र का आलंबन सत्यापन के लिए वो आवश्यक है।

94
00:06:54,720 --> 00:06:58,960
बिल्कुल। अब यह है कि नकली असली का जो खेल है जैसे कि हम देखते

95
00:06:58,960 --> 00:07:03,120
हैं सन्यासियों को धर्म गुरुओं को कि जो कि आजकल अधर्म गुरु से कम

96
00:07:03,120 --> 00:07:07,200
नहीं है कि माथे पर चंदन लगाकर और

97
00:07:07,200 --> 00:07:11,280
रुद्राक्ष की माला धारण करके भगवा वस्त्र पहनकर वो जो है

98
00:07:11,280 --> 00:07:15,360
अधर्म करते हुए भी देखे जा रहे हैं। तो वो बात सही है कि

99
00:07:15,360 --> 00:07:19,440
असली नकली का फर्क तो समझ में आना चाहिए ना। अब सोने को अगर देखना

100
00:07:19,440 --> 00:07:23,520
है कि यह पीतल नहीं है तो उसको घिसना पड़ेगा। तब पता चलेगा कि सोना

101
00:07:23,520 --> 00:07:27,680
सोना ही है। पीतल के ऊपर पॉलिश नहीं किया गया है। तो उसी

102
00:07:27,680 --> 00:07:31,840
अनुरूप हम बस कहने का यही मतलब है कि बाकी व्यक्ति के

103
00:07:31,840 --> 00:07:36,000
सामने वाले के ऊपर है। हां, यह जरूर हो सकता है कि किसी व्यक्ति

104
00:07:36,000 --> 00:07:40,320
का अगर प्रमाण किसी को प्रमाणित करना हो तो कुछ शास्त्र

105
00:07:40,320 --> 00:07:44,720
की शास्त्र की टिप्पणियों को लेकर उससे प्रश्न किया जाए

106
00:07:44,720 --> 00:07:48,720
जिससे कि वह क्या उसका क्या जवाब आता है यह देखने वाली बात

107
00:07:48,720 --> 00:07:52,720
होगी। क्योंकि अगर उसने ज्ञान का स्तर प्राप्त कर लिया है तो

108
00:07:52,720 --> 00:07:57,360
फिर जो शास्त्रों के अनुरूप है अधिकांश रूप से वो वही चीज बोलेगा

109
00:07:57,360 --> 00:08:01,440
और अगर वो उससे विरुद्ध जा रहा है तो या तो कहीं ना

110
00:08:01,440 --> 00:08:05,520
कहीं शास्त्र में या तो त्रुटि होगी या अन्य टिप्पणियों को फिर से

111
00:08:05,520 --> 00:08:09,600
पूछा जाना चाहिए जिससे यह पता चल जाए कि शास्त्र में यह एक ही लाइन

112
00:08:09,600 --> 00:08:13,760
गलत है या यह व्यक्ति सामने वाला गलत है। नहीं तो शास्त्र

113
00:08:13,760 --> 00:08:18,240
में यदि हम टिप्पणी दोष की भावना ले आएंगे मान लीजिए

114
00:08:18,240 --> 00:08:22,320
तो फिर हमारा शब्द प्रमाण क्या रहा कितने शास्त्र पढ़ोगे

115
00:08:22,320 --> 00:08:26,480
नहीं नहीं हमारा देखिए हमारा हमने फिर कहा हो सकता है कि

116
00:08:26,480 --> 00:08:30,640
हम भी अगर 500 पेज की कोई किताब छापते हैं तो उसमें दो चार

117
00:08:30,640 --> 00:08:34,800
लाइनें त्रुटि पूर्वक हो सकती हैं और समाचार बिल्कुल

118
00:08:34,800 --> 00:08:39,040
हो सकती है मगर जब वो किताब हमारा प्रमाण हो

119
00:08:39,040 --> 00:08:43,040
यदि हमारे जीवन का धर्म और ब्रह्म का प्रमाण हो तो फिर

120
00:08:43,040 --> 00:08:47,760
उसमें हम यदि दोष ढूंढेंगे तो इसका मतलब है कि हमारे पास

121
00:08:47,760 --> 00:08:51,920
अच्छा अच्छे और बुरे के लिए निर्णय करने के लिए कोई और आधार है जिसके

122
00:08:51,920 --> 00:08:57,600
आधार पर हम ये देख रहे हैं कि वेद की ये बात गलत है ये बात सही है।

123
00:08:57,600 --> 00:09:02,160
अब इसके लिए तो हम आपसे यही कहेंगे कि आपको कोई शास्त्र का कोई ऐसा

124
00:09:02,160 --> 00:09:03,760
टिप्पणी हमसे पूछना चाहिए

125
00:09:03,760 --> 00:09:08,080
क्योंकि हमने तो पढ़े नहीं है जो साफ बात बता रहे हैं। स्पष्ट बात है। अगर आपको

126
00:09:08,080 --> 00:09:12,160
कोई ऐसी टिप्पणी याद हो या ध्यान में आ रही हो कि

127
00:09:12,160 --> 00:09:16,320
जिससे कि आप अगर ये जानना चाहे कि अगर हम भी खुद देखना चाहे

128
00:09:16,320 --> 00:09:20,400
कि क्या शास्त्र में हर चीज सही लिखी है तो हमें भी पता चलना चाहिए

129
00:09:20,400 --> 00:09:24,400
कि कहीं हम तो गलत नहीं है तो आपको कोई ऐसा वो ठीक

130
00:09:24,400 --> 00:09:28,480
है कि शास्त्र को हम जांचेंगे कि आप गलत है कि शास्त्र गलत है वो

131
00:09:28,480 --> 00:09:32,800
तो बात मगर यदि आप ये कह रहे हैं कि शास्त्र में गलती हो सकती

132
00:09:32,800 --> 00:09:37,440
है यदि शास्त्र में गलती हो सकती है जो शास्त्र

133
00:09:37,440 --> 00:09:41,600
वैदिक हमें प्राप्त हुए हैं। यदि उसमें गलती हो सकती है तो फिर बात आएगी।

134
00:09:41,600 --> 00:09:46,320
आपने अपना धर्म कहा सनातन। ठीक है? सनातन

135
00:09:46,320 --> 00:09:50,640
का सनातन की परिभाषा होती है जो किसी भी देश काल परिस्थिति में ना बदले।

136
00:09:50,640 --> 00:09:54,880
तो आपका धर्म यदि सनातन है तो उसका पैरामीटर

137
00:09:54,880 --> 00:09:58,960
क्या है? कि आप जो सही समझ रहे हो वो सही और जो गलत समझ

138
00:09:58,960 --> 00:10:03,280
रहे हो वो गलत। उसका आधार क्या है? वो ज्ञान कहां से आ रहा है? भी शास्त्र

139
00:10:03,280 --> 00:10:07,440
आपके लिए अंतिम प्रमाण नहीं है। वो गलत भी हो सकते हैं। यानी कि कोई और प्रमाण

140
00:10:07,440 --> 00:10:13,280
है जिसके आधार पर आप शास्त्र में दोष देख सकते हो।

141
00:10:13,280 --> 00:10:17,360
नहीं मैं शास्त्र में देखिए आपको लग सकता है ना कि मैं शास्त्र में दोष देख

142
00:10:17,360 --> 00:10:18,960
रहा हूं। लेकिन मैं तो खुद कह रहा हूं मैंने

143
00:10:18,960 --> 00:10:23,200
शास्त्र पढ़े ही नहीं है तो मैं उनमें दोष क्यों ढूंढूंगा? अगर मैंने उनको पढ़ा

144
00:10:23,200 --> 00:10:27,280
होता तब आपकी जो भावना है ना जो

145
00:10:27,280 --> 00:10:32,080
आपकी भावना है कि शास्त्र में कोई बात गलत हो सकती है

146
00:10:32,080 --> 00:10:38,080
तो यह भावना ही उस पर दोष होने का वो लगा रही है।

147
00:10:38,640 --> 00:10:42,640
इसीलिए मैं कह रहा हूं। मैंने यह नहीं कहा कि शास्त्र में क्या बात गलत है। मैंने यह कहा

148
00:10:42,640 --> 00:10:46,720
कि अगर शास्त्र ही अंतिम प्रमाण है जैसा कि आप कह रहे हो

149
00:10:46,720 --> 00:10:50,800
तो आपको उसकी कोई टिप्पणी हमारे सामने लानी चाहिए जिस पर कभी विवाद

150
00:10:50,800 --> 00:10:55,040
हुआ हो तो उससे कुछ देखने की प्रयत्न किया जा सकता है कि

151
00:10:55,040 --> 00:10:59,360
क्या वास्तव में ऐसा है कि नहीं है। एक बार हम भी अपने प्रत्यक्ष

152
00:10:59,360 --> 00:11:03,440
होकर उसका देख सके। ठीक है। वो हम देखेंगे। फिलहाल

153
00:11:03,440 --> 00:11:08,160
आपका धर्म कहां से स्पित हो रहा है? ये मैं कह रहा हूं। आप अगर आज इस समय

154
00:11:08,160 --> 00:11:12,400
सनातनी है तो वो सनातन आपको मिल कहां से रहा इस समय क्योंकि

155
00:11:12,400 --> 00:11:16,800
शास्त्र शास्त्र पर आधारित तो है नहीं आप तो वो सनातन स्फूट

156
00:11:16,800 --> 00:11:20,800
कहां से हो रहा है आपके पास सनातन ये देखिए सनातन का

157
00:11:20,800 --> 00:11:25,040
जो वैसे भी अर्थ होता है कि जिसका कोई ज्ञात स्रोत नहीं है

158
00:11:25,040 --> 00:11:29,040
सनातन सनातन का अर्थ होता है कि जो किसी भी देश काल परिस्थिति में

159
00:11:29,040 --> 00:11:33,120
ना बदले परिवर्तन हो परिवर्तनशील भी वो

160
00:11:33,120 --> 00:11:34,000
बात ठीक है

161
00:11:34,000 --> 00:11:38,320
जो ना बदलने योग्य है लेकिन लेकिन इसका एक अर्थ और भी होता है कि जिसका

162
00:11:38,320 --> 00:11:42,400
आदि से लेकर अनंत तक कुछ भी ज्ञात नहीं है।

163
00:11:42,400 --> 00:11:46,480
हमें ये नहीं पता कि नहीं पता है कि आप किसी चीज को सही और किसी चीज

164
00:11:46,480 --> 00:11:50,480
को गलत क्यों समझ रहे हैं। आपको नहीं पता है। नहीं

165
00:11:50,480 --> 00:11:54,640
नहीं मैं ये कह रहा हूं कि हम आप प्रमाण मानते हो। है ना?

166
00:11:54,640 --> 00:11:58,720
आप प्रमाण वो नहीं कह रहा। मैं समझ गया। मैं अभी एक टिप्पणी दूंगा।

167
00:11:58,720 --> 00:12:03,440
मैं फिलहाल एक भावना पर वो कर रहा हूं कि

168
00:12:03,440 --> 00:12:07,920
आप किसी भी चीज को सही अथवा गलत किसी भी कार्य को

169
00:12:07,920 --> 00:12:12,160
जो जैसे कि जो अती्द्रिय विषय है जिसमें हमारी गति नहीं हो सकती प्रत्येक प्रमाण

170
00:12:12,160 --> 00:12:16,480
के द्वारा ऐसी खास तौर पर ऐसी चीजों में आपके

171
00:12:16,480 --> 00:12:20,560
लिए क्या सही है और क्या गलत है इसके लिए आपका आधार क्या होता

172
00:12:20,560 --> 00:12:24,640
है क्योंकि टास्क में तो टास्क को लेकर के आप अभी न्यूट्रल हो उसमें

173
00:12:24,640 --> 00:12:28,800
क्या है क्या नहीं है उसको लेकर के अभी आपको कुछ नहीं पता या ऐसा

174
00:12:28,800 --> 00:12:32,880
है कि जिन्होंने शास्त्र पढ़े जिन्होंने जो शास्त्रों को

175
00:12:32,880 --> 00:12:36,960
जितना थोड़ा बहुत जानते थे उन्होंने शास्त्रों से प्राप्त वो जो धर्म

176
00:12:36,960 --> 00:12:40,960
और अधर्म की व्याख्या है थोड़ी बहुत वो आप तक आई और आप उसके

177
00:12:40,960 --> 00:12:45,040
आधार पर जीवन जी रहे हो उसमें से जो जो चीजें आपको तार्किक लग रही है

178
00:12:45,040 --> 00:12:49,040
वो आप फॉलो भी कर रहे हो मतलब एक तरीके से अप्रत्यक्ष रूप से आप शास्त्रों

179
00:12:49,040 --> 00:12:53,040
पर आधारित ही हो अब वही बात है ना

180
00:12:53,040 --> 00:12:57,200
कि अगर हमने कभी उनका अध्ययन किया होता शास्त्रों का तो हम ये कहने

181
00:12:57,200 --> 00:13:01,360
कि हमको को कोई दिक्कत नहीं होती कि हम शास्त्रों को मानते

182
00:13:01,360 --> 00:13:05,440
हैं। लेकिन हमने उनका अध्ययन किया ही नहीं है। तो ना हम यह कह सकते हैं कि हम उन

183
00:13:05,440 --> 00:13:09,440
पर आश्रित है पूर्णतया और ना हम उनका विरोध कर सकते हैं। मैं बता

184
00:13:09,440 --> 00:13:13,600
देता हूं। ऐसा है विरोध तो यही से आ गया ना जब आपने

185
00:13:13,600 --> 00:13:17,680
खुद को सनातनी भी कहा और आपने शास्त्रों पर ये भी कह दिया कि हो

186
00:13:17,680 --> 00:13:22,800
सकता है उसमें कोई बात गलत हो। आपको नहीं पता। यानी कि आपके आपकी

187
00:13:22,800 --> 00:13:27,040
शास्त्रों के प्रति प्रमाण बुद्धि नहीं है। प्रमाण बुद्धि भैया

188
00:13:27,040 --> 00:13:31,040
शास्त्र में जो होगा सही होगा। जैसे श्री कृष्ण भगवान ने कहा ना तस्मात शास्त्र

189
00:13:31,040 --> 00:13:35,040
प्रमाण भगवत गीता तो आपकी उसमें प्रमाण बुद्धि

190
00:13:35,040 --> 00:13:39,600
नहीं है कि तेरे लिए कर्तव्य अकर्तव्य के विषय में शास्त्र अंतिम प्रमाण

191
00:13:39,600 --> 00:13:43,920
और दूसरी बात अभी जो आपने कहा है

192
00:13:43,920 --> 00:13:48,880
कि क्या कहते हैं ये

193
00:13:48,880 --> 00:13:54,320
अभी अभी क्या कहा आपने अभी आंख से हाथ मिलाइए

194
00:13:54,320 --> 00:13:58,800
हमने यही कहा था कि हमने शास्त्रों का अध्ययन नहीं किया है हां

195
00:13:58,800 --> 00:14:03,200
मैं उस बारे में बता रहा हूं। मैं मुझे ध्यान आ गया। दूसरी

196
00:14:03,200 --> 00:14:04,160
बात ये है जो आप

197
00:14:04,160 --> 00:14:08,320
कह रहे हैं मैंने मैंने शास्त्रों का अध्ययन नहीं किया है। ये ठीक इस प्रकार से

198
00:14:08,320 --> 00:14:12,320
है। जैसे कि कोई व्यक्ति कहे कि मैं कभी थॉमस अलवा एडिसन से मिला

199
00:14:12,320 --> 00:14:16,480
नहीं हूं। मैंने उसका नाम नहीं जानता हूं। मैं वो कहां रहता था, कहां

200
00:14:16,480 --> 00:14:20,720
रहता था। मैं कुछ नहीं जानता हूं। परंतु आपके घर में क्योंकि बल्ब जल

201
00:14:20,720 --> 00:14:24,960
रहा है इससे सिद्ध हो रहा है कि आप थॉमस अलवा एडिशन से कनेक्टेड

202
00:14:24,960 --> 00:14:28,960
है। आप थॉमस अलवा एडिशन को जानते भी नहीं है। मगर आपके घर में जो

203
00:14:28,960 --> 00:14:32,960
बल्ब जल रहा है वो थॉमस अलवा एडिशन के कारण ही जल रहा है। वो अप्रत्यक्ष

204
00:14:32,960 --> 00:14:36,960
रूप से आ गया। आपने तो परचन वाले से लिया। आपको

205
00:14:36,960 --> 00:14:41,280
थोड़ी ना मालूम था थॉमस अलवा एडिसन ने आविष्कार किया। फिर वो आविष्कार वो परचन

206
00:14:41,280 --> 00:14:45,440
वाले तक पहुंचा और फिर वो आपके घर में आया। वो ठीक बात

207
00:14:45,440 --> 00:14:49,440
है आपकी। लेकिन उसका जो है उसका जो जो बल्ब आप

208
00:14:49,440 --> 00:14:53,600
बता रहे हो ना उसका एक प्रमाण है कि एडिसन ने उसका आविष्कार किया।

209
00:14:53,600 --> 00:14:57,600
यह तो आप भी मानते हो ना। भले हमने एडिशन को देखा नहीं

210
00:14:57,600 --> 00:15:01,600
है लेकिन बल्ब जो आप बता रहे हो जो दुकानों में बिक रहा है वो

211
00:15:01,600 --> 00:15:06,160
तो उसका आविष्कार तो एडिशन नहीं किया। ये तो सभी को मालूम है। हमको भी पता है।

212
00:15:06,160 --> 00:15:10,240
ऐसे कई आविष्कार होंगे। ऐसे कई आविष्कार होंगे जिसका नाम आपको नहीं

213
00:15:10,240 --> 00:15:14,320
पता होगा। परंतु उसका विस्तार आपके घर में होगा और

214
00:15:14,320 --> 00:15:18,560
आपका इस प्रकार से उसके साथ अप्रत्यक्ष रूप से रिश्ता है।

215
00:15:18,560 --> 00:15:19,200
बिल्कुल

216
00:15:19,200 --> 00:15:23,280
तो इसी प्रकार से जो आपकी बात है ना कि

217
00:15:23,280 --> 00:15:27,360
हमने शास्त्र नहीं देखे डायरेक्ट आपने डायरेक्ट नहीं देखे मगर अप्रत्यक्ष

218
00:15:27,360 --> 00:15:31,520
रूप से क्योंकि आपके जीवन में धर्म है तो किसी और के माध्यम

219
00:15:31,520 --> 00:15:35,760
से माता पिता के माध्यम से गुरुओं से माता पिता ने सुना माता

220
00:15:35,760 --> 00:15:40,720
पिता के माध्यम से आपके जीवन में धर्म आ गया। जैसे कि कोई बच्चा है

221
00:15:40,720 --> 00:15:44,720
ये मुझे मेरी आवाज बार-बार रिपीट सुनाई दे रही है। वो इको का

222
00:15:44,720 --> 00:15:49,440
होगा थोड़ा मौसम का दिक्कत है। बीचबीच हमेशा तो नहीं हो रहा होगा। इधर तो नहीं हो रही इको।

223
00:15:49,440 --> 00:15:53,440
नहीं अभी ये हो रहा है। आप एक

224
00:15:53,440 --> 00:15:57,520
काम करिए आप एक बार लीव करके दोबारा आ जाइए। अच्छा

225
00:15:57,520 --> 00:16:03,520
ठीक है।

226
00:16:13,760 --> 00:16:17,760
मनुष्य का विशेष विश्लेषणात्मक बुद्धि और

227
00:16:17,760 --> 00:16:23,280
तर्क पूर्ण विश्लेषण ही इनके लिए

228
00:16:23,280 --> 00:16:29,280
वही भिन्नता

229
00:16:53,360 --> 00:16:57,440
हां अब आ रही है आपकी सही ठीक आ रही है अगर आप दो चला

230
00:16:57,440 --> 00:17:01,760
रहे है दो दो फोन चला रहे हैं क्या?

231
00:17:01,760 --> 00:17:05,760
हां, बगल में एक लिए था। यह फोन हटा लो यहां से। उससे हो सकता है इको हो रहा

232
00:17:05,760 --> 00:17:09,760
हो। हां उसी से रखा हुआ है। चल तो नहीं रहा है लेकिन रखा हुआ

233
00:17:09,760 --> 00:17:12,720
है।

234
00:17:12,720 --> 00:17:16,880
हां बोले क्या बोल रहे थे आप? तो बस मेरा केवल इतना कहना

235
00:17:16,880 --> 00:17:21,200
था कि अगर हमने शास्त्र नहीं भी पढ़े हैं परंतु हमने अपने माता

236
00:17:21,200 --> 00:17:25,520
पिता से बहन के साथ उस बहन पर दृष्टि

237
00:17:25,520 --> 00:17:29,600
ना डालना सीखा है हमने उनसे शौचाचार सीखा है तो

238
00:17:29,600 --> 00:17:33,680
इस माध्यम से वो धर्म से होने वाला जो ज्ञान है वो हमारे पास आ गया हमारे

239
00:17:33,680 --> 00:17:38,240
जीवन में फिर हमने अपने जीवन को उसी के अनुसार जो है ढाला

240
00:17:38,240 --> 00:17:42,640
इस प्रकार से बिना शास्त्र पढ़े भी हमारे जीवन में धर्म आ सकता है

241
00:17:42,640 --> 00:17:46,720
बिल्कुल धर्म के हमारा जो मतलब मेरा कहने का मतलब

242
00:17:46,720 --> 00:17:51,040
ये है कि जो ये ऐसा मानना कि क्योंकि मैंने शास्त्र नहीं पढ़े हैं

243
00:17:51,040 --> 00:17:55,120
इसलिए मेरा शास्त्रों पर आश्रित होना सिद्ध नहीं होता है। ये

244
00:17:55,120 --> 00:17:59,200
सोचना मतलब गलत है। उसी प्रकार ठीक क्योंकि मैं फलाने आविष्कारक

245
00:17:59,200 --> 00:18:03,200
को नहीं जानता हूं। इस कारण से मेरा और संस्कारक के साथ कोई

246
00:18:03,200 --> 00:18:07,360
संबंध सिद्ध नहीं होता है। तो मैंने उस चीज को आपको कहा वो वो

247
00:18:07,360 --> 00:18:11,440
आपकी बात ठीक है। लेकिन मैं ये कहता हूं क्या कोई शास्त्र में

248
00:18:11,440 --> 00:18:15,520
ये लिखा है कि प्रथम बार सूर्योदय कब हुआ था? आप बता

249
00:18:15,520 --> 00:18:19,600
सकते हैं इस बात को? या प्रथम बार चंद्रमा कब देखा गया था?

250
00:18:19,600 --> 00:18:23,680
जब सृष्टि रचना के बारे में लिखा है कि सृष्टि रचना कब हुई

251
00:18:23,680 --> 00:18:27,920
है? तो उसमें से सूर्य भी आ गया, चंद्रमा भी आ गया। और दूसरी

252
00:18:27,920 --> 00:18:32,800
बात

253
00:18:32,800 --> 00:18:36,880
दूसरी बात एक बात और है। कई लोग कहते हैं कई बार लोग

254
00:18:36,880 --> 00:18:40,880
ये कहते हैं कि भाई भविष्य पुराण में जो है ना आजादी के बारे में क्यों नहीं लिखा

255
00:18:40,880 --> 00:18:44,960
है? आजादी की लड़ाई के बारे में क्यों नहीं लिखा है? भाई जो चीज धर्म के विषय से

256
00:18:44,960 --> 00:18:49,040
धर्म और ब्रह्म और मोक्ष के विषय से आवश्यक लगी वो चीज शास्त्र में बताई

257
00:18:49,040 --> 00:18:53,040
गई। जो शास्त्र है वो कोई हिस्ट्री थोड़ी ना है

258
00:18:53,040 --> 00:18:57,200
कि उसमें हिस्ट्री में जितनी घटनाएं घटित हुई है सबका वो विवरण जो

259
00:18:57,200 --> 00:19:01,360
आपके लिए आवश्यक है धर्म और ब्रह्म के लिए वो उसमें दिया गया है पर्याप्त

260
00:19:01,360 --> 00:19:05,360
है तो उसका सब्जेक्ट है उसका जो सब्जेक्ट है वो भी तो

261
00:19:05,360 --> 00:19:09,520
हमें समझना पड़ेगा ना उसका सब्जेक्ट ये नहीं है कि वो आपको हिस्ट्री जग्राफी सब

262
00:19:09,520 --> 00:19:13,680
चीजें एकदम बता दे वो उसका विषय है कि आपको इतनी इतनी

263
00:19:13,680 --> 00:19:17,840
जानकारी दे कि आपका मोक्ष सिद्ध हो सके लेकिन

264
00:19:17,840 --> 00:19:21,840
हमारा जो कहना हमारा जो मानना है इसीलिए मैंने कहा कि हम

265
00:19:21,840 --> 00:19:26,240
प्रमाण को नहीं मानते और सनातन भी प्रमाणों पर नहीं चलता है। सनातन जो केंद्रित

266
00:19:26,240 --> 00:19:30,320
है वो प्रत्यक्ष पर केंद्रित है। बस बस अब आप अब आप घूम

267
00:19:30,320 --> 00:19:34,400
फिर के आए जो हमारी मुख्य चर्चा का टॉपिक था कि आप प्रमाण को नहीं मानते उतनी

268
00:19:34,400 --> 00:19:39,920
देर से थोड़ा सा हम लोग इधर उधर गिरते चल रहे थे। ठीक अब आप प्रमाण

269
00:19:39,920 --> 00:19:43,280
भी पता होगा एक बहुत लोकप्रिय कहावत है

270
00:19:43,280 --> 00:19:47,520
प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि जो प्रत्यक्ष है उसको प्रमाण

271
00:19:47,520 --> 00:19:51,760
क्यों चाहिए? ठीक है। अब आप मुझे बता दीजिए इसका मतलब

272
00:19:51,760 --> 00:19:55,840
है कि आप अपने प्रत्यक्ष अनुभवों से तय करते हैं कि क्या

273
00:19:55,840 --> 00:20:00,240
सही है और क्या गलत। हां प्रत्यक्ष प्रत्यक्ष

274
00:20:00,240 --> 00:20:04,400
होकर जो ज्ञान प्राप्त होता है उससे विवेक जागृत जागरण होता है

275
00:20:04,400 --> 00:20:08,640
और विवेक से अच्छा कोई भी उपकरण नहीं है जिससे पता

276
00:20:08,640 --> 00:20:12,640
चले कि क्या सही है और क्या गलत है। क्या धर्म है क्या अधर्म है। ठीक ठीक

277
00:20:12,640 --> 00:20:16,720
ठीक। ओके। अब मुझे एक बात बताइए कि

278
00:20:16,720 --> 00:20:20,720
इसका मतलब आप ये मानते हैं कि जो प्रत्यक्ष देखने से जो

279
00:20:20,720 --> 00:20:25,440
अनुभव हो और उसके बाद जो अंदर से आवाज आए

280
00:20:25,440 --> 00:20:29,600
है ना उसको धर्म मानना सही उसको धर्म मानना

281
00:20:29,600 --> 00:20:33,680
चाहिए। ऐसा आप संदेश दे रहे हैं।

282
00:20:33,680 --> 00:20:37,680
नहीं नहीं अंदर की आवाज और जब बाहर की आवाज एक हो जाएगी तो

283
00:20:37,680 --> 00:20:41,760
उसको प्रत्यक्ष बोलते हैं। प्रत्यक्ष का मतलब ये नहीं है दो

284
00:20:41,760 --> 00:20:45,760
डअल वाला नहीं है। द्वैत वाला नहीं है। ये अद्वैत हो जाएगा। जिसमें कि

285
00:20:45,760 --> 00:20:50,800
आपका जो है आपका जो पहचान है वो मिट जाए। मैं मैं आपको

286
00:20:50,800 --> 00:20:55,040
बताता हूं। एक एग्जांपल बता रहा हूं। जैसे कि आप ये कह रहे हैं जैसे

287
00:20:55,040 --> 00:20:58,800
आपने एक किसी व्यक्ति ने एक स्त्री को देखा।

288
00:20:58,800 --> 00:21:03,360
ठीक है? अब उस स्त्री के प्रति उसको देखकर

289
00:21:03,360 --> 00:21:08,320
उसके रूप सौंदर्य इत्यादि को देखकर उसके मन में

290
00:21:08,320 --> 00:21:12,640
अंदर से एक आवाज आई कि क्या करना है क्या नहीं करना है तो इस आधार पर

291
00:21:12,640 --> 00:21:16,880
किसी स्त्री को देखकर अंदर से आने वाली आवाज के आधार पर निर्णय

292
00:21:16,880 --> 00:21:20,960
करना कि क्या करना है क्या नहीं करना है ये आप उचित मानते हैं

293
00:21:20,960 --> 00:21:24,960
नहीं ये इसका ज्ञान से इसका सनातन से मतलब नहीं है क्योंकि जो सनातन

294
00:21:24,960 --> 00:21:29,200
में चेतना पर चलता है उसमें स्त्री पुरुष का भेद नहीं होता है आप जो बता रहे

295
00:21:29,200 --> 00:21:34,480
वो माया के अधीन बात कर रहे हो स्त्री में

296
00:21:34,480 --> 00:21:38,880
शारीरिक शारीरिक धर्म है आपका कुछ भी नहीं है शरीर से नहीं शारीरिक

297
00:21:38,880 --> 00:21:43,840
धर्म है लेकिन वो केवल मायावी रूप में आपके शरीर के धर्म का

298
00:21:43,840 --> 00:21:48,080
मैं वही पूछ रहा हूं मैं चेतना पे आऊंगा मैं अभी आपके शरीर का धर्म पूछ रहा हूं

299
00:21:48,080 --> 00:21:52,800
कि आपके शरीर शरीर के धर्म का निर्धारण कहां से करते हैं आप

300
00:21:52,800 --> 00:21:56,880
शरीर का धर्म जो है तो स्त्री पुरुष उसमें भेद हो जाता है जब

301
00:21:56,880 --> 00:22:01,760
शरीर पे माया धारण कहां से करते हैं आप?

302
00:22:01,760 --> 00:22:05,840
अपने जेंडर से करते हैं। लेकिन अरे भाई अभी आपने कहा कि क्या

303
00:22:05,840 --> 00:22:09,920
करना है और क्या नहीं करना है। मैं प्रत्यक्ष अनुभव करता हूं। उसके बाद जो मेरे

304
00:22:09,920 --> 00:22:14,400
विवेक के अनुसार आवाज आती है मैं उसको सही मानता हूं। तो इसमें जब

305
00:22:14,400 --> 00:22:18,800
जब हम क्रिया ले लेंगे ना क्रिया व्यवहार जब आप व्यवहार

306
00:22:18,800 --> 00:22:22,800
को ले लेंगे क्रिया को ले लेंगे तो शारीरिक धर्म की बात हो गई। क्या करना है क्या

307
00:22:22,800 --> 00:22:26,880
नहीं करना है ये आ गया शारीरिक धर्म और जो

308
00:22:26,880 --> 00:22:31,120
जो ज्ञान है चेतना शक्ति जाग जाना वो तो प्राप्तव्य है

309
00:22:31,120 --> 00:22:35,680
वो शारीरिक धर्म थोड़ी ना है शारीरिक धर्म केवल शारीरिक

310
00:22:35,680 --> 00:22:39,680
धर्म जो आप बता रहे हो वो केवल स्त्री पुरुष का भेद थोड़ी ना है अगर

311
00:22:39,680 --> 00:22:43,680
अगर किसी के मन में नहीं कह रहा मैं ये नहीं कह रहा भाई साहब मैं ये नहीं कह रहा मैं ये कह रहा

312
00:22:43,680 --> 00:22:47,680
हूं कि आपके शरीर का जो धर्म है उसके लिए आप

313
00:22:47,680 --> 00:22:52,080
किस पर डिपेंड करते हो की मुझे ये करना है ये नहीं करना है मैं फिर बता रहा

314
00:22:52,080 --> 00:22:56,480
करना करने की स्थिति आई ना जब हम करेंगे तो शरीर से ही करेंगे

315
00:22:56,480 --> 00:23:00,640
है ना समझ गए नहीं ये आपका भेद है मैं बता रहा हूं मैं बता रहा हूं जो

316
00:23:00,640 --> 00:23:04,800
आप करते हो शरीर से नहीं करते हो आप पहले मन में विचार करते हो

317
00:23:04,800 --> 00:23:09,200
अगर आप चाकू भी फल भी काटते हो ना तो पहले आप विचार करते हो कि हम चाकू

318
00:23:09,200 --> 00:23:13,360
लाए किचन से हम फल उठाएं उसके बाद आप उसको जब व्यवहार रूप में लाते

319
00:23:13,360 --> 00:23:17,760
हो तब आपका शरीर इनवॉल्व होता है पहले आपका विचार इन्वॉल्व आपकी चेतना इन्वॉल्व

320
00:23:17,760 --> 00:23:21,920
होती है पहले तो हम और जो और और जो सनातन है वो

321
00:23:21,920 --> 00:23:25,920
चेतना पर केंद्रित है। वो शरीर शरीर को मामला थोड़ा सा भटक रहा

322
00:23:25,920 --> 00:23:29,520
है। आप समझ नहीं रहे हो। आप मामला थोड़ा भटक रहा है। मैं ये कह रहा हूं

323
00:23:29,520 --> 00:23:33,680
आप अपने शरीर के द्वारा की जाने वाली जो क्रियाए हैं उसमें कौन

324
00:23:33,680 --> 00:23:38,480
सी क्रिया करनी है, कौन सी नहीं करनी इस बात के लिए किस पर डिपेंड हो?

325
00:23:38,480 --> 00:23:42,480
चेतना पर डिपेंड है। अपनी चेतना पर ना? तो अब मैं फिर

326
00:23:42,480 --> 00:23:45,280
से बता रहा हूं।

327
00:23:45,280 --> 00:23:50,240
यानी कि अपनी चेतना पर डिपेंड करना आप सही मानते हो।

328
00:23:50,240 --> 00:23:54,400
अपनी चेतना क्या नहीं करना है? मैंने अपनी चेतना नहीं कहा। मैंने कहा

329
00:23:54,400 --> 00:23:58,960
चेतना के स्तर पर। तो मुझे मैं अब एक एग्जांपल

330
00:23:58,960 --> 00:24:03,200
आपसे पूछ रहा हूं। थोड़ा क्लियर मुझे जवाब दीजिए। मान लीजिए आपके किसी के सामने

331
00:24:03,200 --> 00:24:07,360
कोई स्त्री खड़ी है। उसके साथ कैसा व्यवहार करना है? उसको बहन

332
00:24:07,360 --> 00:24:11,920
के रूप में देखना है या पत्नी के रूप में देखना है। इस बात का निर्णय

333
00:24:11,920 --> 00:24:16,240
इस आधार पर वो व्यक्ति करता है। अगर

334
00:24:16,240 --> 00:24:21,280
आप किसी व्यक्ति को ज्ञान की ज्ञान प्राप्त हो गया है या वो

335
00:24:21,280 --> 00:24:25,760
चेतना के उच्चतम स्तरों की यात्रा कर चुका है।

336
00:24:25,760 --> 00:24:30,160
भाई साहब मैं आपसे के चेतना के स्तरों की उच्चतम जो यात्रा

337
00:24:30,160 --> 00:24:34,160
कर चुका है वो नहीं पूछ रहा हूं। वो निर्णय कैसे होगा? वो निर्णय का आधार क्या है?

338
00:24:34,160 --> 00:24:38,240
वो पूछ रहा हूं। बता तो रहा हूं। मैं बता तो रहा हूं। जब चेतना का उच्च स्तर पर वो

339
00:24:38,240 --> 00:24:42,240
विराजमान हो जाएगा तो उसके बाद वो विचारों द्वारा तय करता है

340
00:24:42,240 --> 00:24:44,800
कि मुझको क्या करना है। उसी से उसी

341
00:24:44,800 --> 00:24:48,800
से उसका विवेक जागृत होता है। और जो जो

342
00:24:48,800 --> 00:24:53,120
मानव जीवन के उच्चतम आदर्श है उनको निरूपित करता है वो।

343
00:24:53,120 --> 00:24:57,600
ठीक ठीक ठीक। अब इसमें दो बातें आ गई। पहली बात तो ये है कि इसमें

344
00:24:57,600 --> 00:25:03,360
भाई साहब आप अपने आसपास कोई मोबाइल है ना उसको बंद करिए। मोबाइल

345
00:25:03,360 --> 00:25:08,640
नहीं मोबाइल तो नहीं है बंद है

346
00:25:08,640 --> 00:25:12,720
ना दिक्कत आ रही है ना अच्छा हो

347
00:25:12,720 --> 00:25:16,720
सकता है वो टावर है ना यहां पे फोन का उससे तो नहीं हो रहा कोई बात नहीं भाई साहब बात हो नहीं

348
00:25:16,720 --> 00:25:20,800
पाएगी आप जो है इसको बंद करिए आवाज रिपीट आ रही है

349
00:25:20,800 --> 00:25:24,960
हटा के देखो नेट बंद है हटा के देखो बंद है नेट बोल तो रहा हूँ

350
00:25:24,960 --> 00:25:28,640
नेट तो बंद है आपसे ही आ रही

351
00:25:28,640 --> 00:25:32,800
जय श्री राम अब सही आ रही आ रही है वो दूर वो

352
00:25:32,800 --> 00:25:36,800
दूर से आ रही है आ रही है उनको कहिए थोड़ा और दूर चले जाए

353
00:25:36,800 --> 00:25:40,880
ये फोन हटा लो जरा हो सकता है इससे कुछ क्लश कर रहे हो वो वो चला रहे

354
00:25:40,880 --> 00:25:45,760
हैं असल में वो उसमें देख रहे हैं अच्छा

355
00:25:45,760 --> 00:25:49,760
देख रहे हो इधर उधर देख रहे होंगे इधर उधर इधर उधर वाले ये

356
00:25:49,760 --> 00:25:53,840
लो बंद है बंद है फोन बंद कर दिया कोई नहीं वो टायल वगैरह का मशीन

357
00:25:53,840 --> 00:25:57,840
होगा हो सकता है तो जो आपने अभी बात कही है उसमें पहली बात तो ये है

358
00:25:57,840 --> 00:25:59,840
कि जो उच्चतम स्तर तक पहुंच

359
00:25:59,840 --> 00:26:03,920
गए। यानी कि उच्चतम स्तर से पहुंचने के पहले की बात आपने

360
00:26:03,920 --> 00:26:07,920
बताई नहीं है कि धन का निर्णय कहां से होगा। पहली बात। दूसरी बात यह

361
00:26:07,920 --> 00:26:12,160
है कि उच्चतम स्तर पर कोई व्यक्ति पहुंचा है या नहीं पहुंचा

362
00:26:12,160 --> 00:26:16,720
है इस बात का निर्णय कैसे होगा? चेतना के स्तरों द्वारा होगा।

363
00:26:16,720 --> 00:26:21,040
उसके कौन करेगा? वो स्वयं करेगा या कोई और इसको ठप्पा

364
00:26:21,040 --> 00:26:25,280
कौन देगा? कि मैं मैं उच्चतम स्तर पर पहुंच गया।

365
00:26:25,280 --> 00:26:29,440
ये आप वही तो मैं कह रहा हूं। उसका आप आचरण देख सकते हो। उसका आप

366
00:26:29,440 --> 00:26:33,440
मानव जीवन देख सकते हो। उसकी ज्ञान के जो है वो देख

367
00:26:33,440 --> 00:26:37,600
सकते हो। ज्ञान द्वारा यानी कि उसके आचरण जो

368
00:26:37,600 --> 00:26:41,600
है अगर अमुक अमुक आचरण होंगे तो हम मानेंगे कि इसका

369
00:26:41,600 --> 00:26:45,760
चेतना का स्तर उच्च है और तब वो व्यक्ति जो अपनी चेतना के स्तर

370
00:26:45,760 --> 00:26:49,840
के आधार पर लिए गए निर्णय के आधार पर जो धर्म अधर्म निर्णय करेगा

371
00:26:49,840 --> 00:26:54,000
वो जो है मान्य होगा धर्म। ठीक है? अब जो हमने

372
00:26:54,000 --> 00:26:58,160
उसको ये दे दिया है ना कि उसके आचरण देख सकते हो। ये

373
00:26:58,160 --> 00:27:02,000
आचरण कहां से निर्धारित होंगे?

374
00:27:02,000 --> 00:27:06,000
आचरण मैंने बताया ना कि जब आपका स्तर उच्च हो

375
00:27:06,000 --> 00:27:10,000
जाएगा तो फिर आपको कर्म देखने की जरूरत नहीं पड़ती है। नहीं नहीं अभी आपने कहा ना कि

376
00:27:10,000 --> 00:27:14,080
उसके आचरण देख के पता लगेगा कि उसका उच्चतम स्तर हो गया है कि नहीं हो गया है। तो वो

377
00:27:14,080 --> 00:27:15,040
आचरण

378
00:27:15,040 --> 00:27:19,040
वो आचरण हमें कहां से मिलेंगे? वो आप

379
00:27:19,040 --> 00:27:23,120
कोई ज्ञान की बात उससे चर्चा कर सकते हो या ज्ञान

380
00:27:23,120 --> 00:27:27,200
का कोई आपको जो प्रश्न उत्तर हो वो आपको पता हो और उस व्यक्ति को पता ना हो

381
00:27:27,200 --> 00:27:31,200
आप उससे पूछ सकते हो। मतलब कोई व्यक्ति अगर बहुत

382
00:27:31,200 --> 00:27:36,080
इंटेलिजेंट है बहुत ज्ञानवान है तो इसका मतलब वो बहुत चरित्र का भी अच्छा होगा।

383
00:27:36,080 --> 00:27:40,400
ये कह रहे हो आप बिल्कुल सर बिल्कुल प्रमाणित बात है ये।

384
00:27:40,400 --> 00:27:44,480
बहुत है तो चरित्र का भी अच्छा होगा। नहीं नहीं बिना चरित्र

385
00:27:44,480 --> 00:27:49,680
के ज्ञान हो ही नहीं सकता है। यह प्रमाणित बात कैसे है?

386
00:27:49,680 --> 00:27:53,680
बिल्कुल प्रत्यक्ष होगा तभी चरित्र होगा और चरित्र होगा। बात कैसे माना जाए?

387
00:27:53,680 --> 00:27:57,680
मेरा कहना है कि जरूरी नहीं कि जो इंटेलिजेंट हो वो चरित्र का भी अच्छा होगा।

388
00:27:57,680 --> 00:28:02,000
आपका कहना है जो इंटेलिजेंट है वो चरित्र का भी अच्छा होगा। आप इंटेलिजेंट

389
00:28:02,000 --> 00:28:06,080
किस स्तर पर बोल रहे हो? दुनियावी स्तर पर बोल रहे हो। जैसे किसी

390
00:28:06,080 --> 00:28:10,320
पद पर सुशोभित उस पर बोल रहे हो। कई चीजें

391
00:28:10,320 --> 00:28:14,400
आप बताओ। यानी कि आप केवल जो तात्विक ज्ञान में जिसको

392
00:28:14,400 --> 00:28:17,200
हो गई होगी सिद्धि

393
00:28:17,200 --> 00:28:21,360
की बात अब ये बताइए कि जैसे तत्व ज्ञान आपको हुआ मान

394
00:28:21,360 --> 00:28:25,360
लीजिए ठीक है तो तत्व ज्ञान जब आपको हुआ है तो मुझे तो पता

395
00:28:25,360 --> 00:28:29,440
नहीं है तत्व ज्ञान क्या है बिल्कुल तो आप जो तत्व ज्ञान के

396
00:28:29,440 --> 00:28:30,560
रूप में बात बताएंगे

397
00:28:30,560 --> 00:28:34,800
मैं कैसे मान लू कि तत्व ज्ञान वही है बिल्कुल आप नहीं मानोगे

398
00:28:34,800 --> 00:28:38,800
जब तक आप हमारे समकक्ष नहीं आओगे तब तक आपको तर्क आएंगे।

399
00:28:38,800 --> 00:28:42,880
इसका मतलब कोई और तय नहीं कर सकता कि आप उच्चतम स्तर पर गए हो

400
00:28:42,880 --> 00:28:47,040
कि नहीं गए हो। बिल्कुल यह हम स्वयं तय कर सकते हैं। यानी कि

401
00:28:47,040 --> 00:28:51,360
कोई व्यक्ति खुद को ही घोषित करेगा कि मैं उच्चतम स्तर पर हूं और फिर अपनी चेतना

402
00:28:51,360 --> 00:28:55,360
शक्ति के आधार पर अपनी चेतना शक्ति के आधार पर वो धर्म अधर्म का

403
00:28:55,360 --> 00:28:59,360
निर्णय कर सकता है। देखिए मैंने इसीलिए कहा जब चेतना के उच्च

404
00:28:59,360 --> 00:29:03,520
स्तर पर कोई भी शारीरिक क्रिया मायने नहीं रखता है। क्योंकि

405
00:29:03,520 --> 00:29:07,520
जब व्यक्ति प्रत्यक्ष हो जाता है तो वो रुक सा जाता है। जैसे समुद्र होता है ना

406
00:29:07,520 --> 00:29:11,600
वो रुक सा जाता है। सनातन होता है ना आकाश होता है ना। आकाश तत्व होता है ना रुक सा

407
00:29:11,600 --> 00:29:16,000
जाता है आकाश चलता ये भी आपका शब्द प्रमाण है आप समझिए

408
00:29:16,000 --> 00:29:20,160
मेरी बात को अगर हम लोग अगर आप ले रहे हो उसको ना प्रमाण

409
00:29:20,160 --> 00:29:24,320
आप ले रहे हो आप ये बात जो है ना वो रुक जाता है ये बात क्यों मानी

410
00:29:24,320 --> 00:29:28,560
जाए भाई कोई व्यक्ति ये कह रहा है कि मेरा सुनिए मैं बताऊं

411
00:29:28,560 --> 00:29:32,640
जैसे आप कह रहे हो चेतना से स्तर जिसका उच्च हो गया वो रुक जाएगा। कोई

412
00:29:32,640 --> 00:29:37,280
कह रहा है कि इसका मेरा चेतना स्तर ऊंचा हो गया है मैं बच्चे खाऊंगा।

413
00:29:37,280 --> 00:29:41,440
मैं कुकर में डाल के उबाल के बच्चे खाऊंगा। उसने तो घोषित किया

414
00:29:41,440 --> 00:29:46,320
मेरा चेतना स्तर ऊंचा है। तो आपकी बात क्यों मानी जाए?

415
00:29:46,320 --> 00:29:50,400
आपने उसका आचरण देख लिया ना। आचरण देख लिया ना उसका। भाई साहब आचरण तो आप

416
00:29:50,400 --> 00:29:54,560
अभी बता ही नहीं पाए ना कि कहां से उसके आचरण देख आपने कहा वो खुद बता सकता है कि

417
00:29:54,560 --> 00:29:58,640
मेरा चेतना स्तर ऊंचा है कि नहीं। क्यों? आप कह रहे हो वो तो अरे वो

418
00:29:58,640 --> 00:30:02,640
तो उसकी स्तर से पता चल रहा है कि कोई व्यक्ति अगर मांसाहार

419
00:30:02,640 --> 00:30:06,640
हम तो नहीं कहता कि किसी इंसान को उबाल कर खाने की बात। मैं तो एक

420
00:30:06,640 --> 00:30:10,880
नहीं कह रहा हूं। मैं ये कह रहा हूं। मैं ये नहीं कह रहा आपने

421
00:30:10,880 --> 00:30:14,960
जो निर्णय का आधार लिया ना भाई साहब आपने निर्णय का आधार लिया है कि

422
00:30:14,960 --> 00:30:18,960
कोई व्यक्ति खुद ही बता सकता है कि मेरा चेतना स्तर उच्च है कि नहीं।

423
00:30:18,960 --> 00:30:23,520
अब चेतना स्तर को जब खुद ही घोषित आपने

424
00:30:23,520 --> 00:30:27,920
भी कहा थोड़ी देर पहले मैं बता रहा हूं। मैंने दिखाते हैं। ऑपरेटर

425
00:30:27,920 --> 00:30:31,920
एक मिनट मैं रिपीट करके दिखाता हूं। ऑपरेटर पीछे से दिखा

426
00:30:31,920 --> 00:30:35,920
पहले सुन लीजिए ना। नहीं नहीं कोई बात नहीं वो रिकॉर्ड हो रहा होगा हम समझ रहे हैं आप सुन

427
00:30:35,920 --> 00:30:39,920
लीजिए मैंने ये कहा कि जब व्यक्ति का चेतना

428
00:30:39,920 --> 00:30:44,000
के उच्चतम स्तरों पर विचरण हो जाता है उसके बाद उसकी

429
00:30:44,000 --> 00:30:48,240
जो शारीरिक प्रतिक्रियाएं और क्रियाएं होती हैं वो उसी स्तर

430
00:30:48,240 --> 00:30:53,760
द्वारा संचालित होती है उसमें उस व्यक्ति की बात नहीं होती

431
00:30:53,760 --> 00:30:57,840
और मुझ में जरा सा थोड़ा सा कण भर का भेद है आप बिल्कुल सही कह

432
00:30:57,840 --> 00:31:02,160
रहे हैं भेद सिर्फ इतना है यदि हम

433
00:31:02,160 --> 00:31:06,240
जो सत्ता है ना शास्त्र प्रमाण की सत्ता नहीं लेंगे जिसमें लिखा है कि तत्व

434
00:31:06,240 --> 00:31:10,400
ज्ञानी के लक्षण ये होते हैं। ठीक अब जब तत्व ज्ञानी के लक्षण हमने देख

435
00:31:10,400 --> 00:31:14,560
लिए हमने देखा कि भाई साहब जो आशीष धानी जी है उनमें वो सारे लक्षण

436
00:31:14,560 --> 00:31:18,560
घटित हो रहे हैं तो हमने मान लिया कि इनका चेतना का स्तर उच्च है। हमने

437
00:31:18,560 --> 00:31:22,880
जब शब्द प्रमाण लिया तो उसके आधार पे आपके चेतना का स्तर उच्च मान लिया।

438
00:31:22,880 --> 00:31:26,880
क्योंकि तत्व ज्ञान तो आपको है और शब्द प्रमाण मान नहीं रहे। अगर

439
00:31:26,880 --> 00:31:31,120
शब्द प्रमाण है नहीं हमारे पास तो हम ये तय कैसे करेंगे कि आपका

440
00:31:31,120 --> 00:31:35,280
चेतना का स्तर उच्च हुआ कि नहीं हुआ तो उसके बाद फिर आपने कहा कि

441
00:31:35,280 --> 00:31:39,600
भाई दूसरा तय नहीं कर सकता वो स्वयं ही घोषित कर सकता है तो जब स्वयं घोषित

442
00:31:39,600 --> 00:31:43,600
करना है कि मेरा चेतना का स्तर उच्च है तो स्वयं घोषित करके जब

443
00:31:43,600 --> 00:31:47,600
कोई व्यक्ति ये कह सकता है कि भैया वो चेतना का स्तर जिसका उच्च होता है

444
00:31:47,600 --> 00:31:51,600
वो व्यक्ति ठहर जाता है तो दूसरा व्यक्ति चेतना का स्तर का डंका बजा

445
00:31:51,600 --> 00:31:55,680
के अपराध करेगा पाप करेगा और हम उसको हम उसको रोक एक

446
00:31:55,680 --> 00:31:59,840
मिनट हम उसको को रोक नहीं पाएंगे क्योंकि हम ही ने ये कहा है कि भैया चेतना का स्तर

447
00:31:59,840 --> 00:32:03,920
हम ही घोषित कर सकते हैं और आपने घोषित किया अगर चेतना का स्तर तो

448
00:32:03,920 --> 00:32:08,000
आप जो है बच्चे खाओ कुकर में डाल के मैं वही

449
00:32:08,000 --> 00:32:12,160
कह रहा हूं ना कि मैंने घोषित किया नहीं है वो स्वतः घोषित हो जाता है

450
00:32:12,160 --> 00:32:16,240
जैसे आपको कोई शब्द जब आप घर में फिर से दोबारा

451
00:32:16,240 --> 00:32:17,520
से

452
00:32:17,520 --> 00:32:21,840
जब कोई चीज याद करते हो तो दो चीजें होती है। एक बार सुन लो। एक मिनट

453
00:32:21,840 --> 00:32:26,160
जब आप कोई चीज पढ़ते हो तो दो चीजें एक साथ घटित होती है। एक तो आपको याद

454
00:32:26,160 --> 00:32:30,240
करना पड़ता है और एक आपको याद रह जाता है। है ना? अगर

455
00:32:30,240 --> 00:32:34,240
कोई व्यक्ति रटता है तो वो उसको रटना पड़ता है कई बार और

456
00:32:34,240 --> 00:32:38,320
कोई व्यक्ति को किसी चीज को अगर खुद ब खुद याद हो जा रहा है तो वो रह जाता

457
00:32:38,320 --> 00:32:43,360
है। याद रह जाता है। वैसे आपने कहा

458
00:32:43,360 --> 00:32:47,440
है नहीं मैं आपसे क्षमा मांगना चाहूंगा। आपके

459
00:32:47,440 --> 00:32:51,520
यहां से रिपीट आवाज आ रही है। ऐसे मैं बात नहीं कर पाऊंगा। मुझे इसको यही

460
00:32:51,520 --> 00:32:56,080
स्थगित करना होगा। मैं फिर आता हूं। रुक जाओ एक मिनट। हां वो

461
00:32:56,080 --> 00:33:00,160
आपको बंद करना होगा। दूसरा फोन तो बंद है। फोन कोई नहीं है यार। फ़

462
00:33:00,160 --> 00:33:06,160
कहां है?

463
00:33:08,800 --> 00:33:12,800
ऐसी स्थितियों से भी आप लोगों को सामना

464
00:33:12,800 --> 00:33:16,800
करना कि इस तरह के विचारशील लोग जब आए आपके सामने

465
00:33:16,800 --> 00:33:21,040
तो हम किस तरह से बात कर सकते हैं? क्योंकि है हिंदू सनातनी

466
00:33:21,040 --> 00:33:25,360
है और यह दिक्कत आ रही है कि शास्त्रों के प्रति अनास्था है।

467
00:33:25,360 --> 00:33:29,440
शास्त्रों के प्रति प्रमाण्य बुद्धि नहीं और प्रमाण्य

468
00:33:29,440 --> 00:33:33,520
बुद्धि की आवश्यकता है। या तो यह कह दे कि भैया मेरी पूर्ण

469
00:33:33,520 --> 00:33:37,600
श्रद्धा है। उनमें उसमें जो कुछ लिखा होगा वही सही है। हां मैंने

470
00:33:37,600 --> 00:33:41,920
प्रारब्ध पूर्वक ये सब चीजें प्राप्त की है और जिस जिस अंश में अगर मैं

471
00:33:41,920 --> 00:33:46,080
शास्त्र के विपरीत पाया जाऊंगा तो वहां मुझे गलत कहे शास्त्र

472
00:33:46,080 --> 00:33:49,360
को नहीं।

473
00:33:49,360 --> 00:33:55,360
क्या बात हां जी अब सही आ रही है

474
00:33:55,600 --> 00:33:59,600
हेलो जैसे हो सकता है ऊपर कुछ इको हो रहा हो

475
00:33:59,600 --> 00:34:04,080
अब हम नीचे आ गए हैं कमरे में बताएं पता नहीं क्या मामला है

476
00:34:04,080 --> 00:34:07,840
पूछ लेते हैं

477
00:34:07,840 --> 00:34:12,560
नहीं वो कुछ गड़बड़ है अभी इस तरह से बात नहीं हो पाएगी

478
00:34:12,560 --> 00:34:16,800
नेट नहीं चल रहा है आपका क्या नहीं मेरा नेट चल रहा है आपकी ओर से ना रिपीट

479
00:34:16,800 --> 00:34:22,400
आवाज आ रही है वो वीडियो को खराब कर रही है। पूरा कंटेंट खराब हो रहा है।

480
00:34:22,400 --> 00:34:27,360
अब तो सही आ रहा होगा। जय श्री राम।

481
00:34:27,360 --> 00:34:32,160
जय श्री राम। हां जी। जय श्री राम। अब तो आ रहा होगा सही।

482
00:34:32,160 --> 00:34:37,200
नहीं रिपीट आ ही रही है। आपने क्या कोई हेडफोन लगाया? क्या किया है?

483
00:34:37,200 --> 00:34:43,200
ना एक मिनट। मैं इससे करता हूं यार।

484
00:34:53,200 --> 00:34:57,040
अब सही आ जाएगा शायद

485
00:34:57,040 --> 00:35:01,520
हेलो फिर आ रही है

486
00:35:01,520 --> 00:35:06,080
नहीं अब तो सही होगा हमने राउटर भी रिस्ट करा

487
00:35:06,080 --> 00:35:12,080
नहीं नहीं

488
00:35:13,520 --> 00:35:17,520
आप अपना ब्लूटूथ हटा लो। ब्लूटूथ से तो नहीं हो रहा। अरे ब्लूटूथ से बात नहीं

489
00:35:17,520 --> 00:35:22,000
कर रहे हम लोग। ना हम तो एक ही इस समय एक ही है।

490
00:35:22,000 --> 00:35:28,000
नहीं नहीं और कुछ नहीं चल रहा है इसमें। चलिए ठीक है फिर कभी देख लेंगे।

491
00:35:29,360 --> 00:35:33,840
कोई नहीं ऐसे तो या तो टेलीफोन ही कर लेना आप। टेलीफोन

492
00:35:33,840 --> 00:35:38,640
की बात वो आवश्यकता अनुसार देख लेंगे। बहुत बड़ा ऐसा इशू नहीं है। ठीक है।

493
00:35:38,640 --> 00:35:44,640
नहीं ठीक है। ठीक है। ठीक है।

494
00:35:46,800 --> 00:35:50,880
ठीक है भाई तो अभी आप लोगों ने देखा

495
00:35:50,880 --> 00:35:54,880
अब देखिए बात ऐसी है मैं क्रम समझा देता हूं इस उसमें लूप में फंस जाता

496
00:35:54,880 --> 00:35:58,960
है व्यक्ति मैं समझा देता हूं कि इन्होंने कहा

497
00:35:58,960 --> 00:36:03,040
कि धर्म और अधर्म का निर्णय उच्चतम स्तर

498
00:36:03,040 --> 00:36:07,200
वाले व्यक्ति की चेतना करेगी सामान्य व्यक्ति के लिए तो इन्होंने कुछ बताया ही नहीं

499
00:36:07,200 --> 00:36:11,360
अब उच्चतम स्तर वाले व्यक्ति की चेतना करी तो उसका का जैसे मान लीजिए उसने

500
00:36:11,360 --> 00:36:15,440
कुछ ऐसा किया जो समाज को देखने में गड़बड़ लग रहा है। मान लो

501
00:36:15,440 --> 00:36:19,600
तो उच्चतम स्तर वाले ने वो सही किया है कि गलत किया ये कैसे तय होगा?

502
00:36:19,600 --> 00:36:24,960
तो उसके लिए सबसे पहले उसका उच्चतम स्तर वाला होना

503
00:36:24,960 --> 00:36:28,960
मान्य है कि वो है। अब उच्चतम स्तर का कौन है कि ये कह

504
00:36:28,960 --> 00:36:33,600
रहे हैं जिसको तत्व ज्ञान हो। खैर अभी मैंने तत्व ज्ञान वाली बातें की नहीं है।

505
00:36:33,600 --> 00:36:37,840
तो तत्व ज्ञान की बात है तो तत्व ज्ञान तो उसको है जिसको उच्चतम स्तर

506
00:36:37,840 --> 00:36:42,000
है। अगर उसका कोई टेस्ट ले सकता है इसका मतलब उसको भी उच्चतम स्तर

507
00:36:42,000 --> 00:36:44,480
वाला होना चाहिए। जबकि दूसरा जो व्यक्ति

508
00:36:44,480 --> 00:36:48,560
जिसकी चेतना का स्तर उच्च नहीं है जो यह जानने आया कि इसकी चेतना का स्तर

509
00:36:48,560 --> 00:36:52,640
ऊंचा है की नहीं। उसको तो तत्व ज्ञान है नहीं तो वो निर्धारण कैसे करेगा कि

510
00:36:52,640 --> 00:36:56,800
यह जो बाते तत्व ज्ञान के रूप में बोल रहा है वो बातें तत्व ज्ञान ही

511
00:36:56,800 --> 00:37:00,880
है। समझ रहे है? तो अगर उसको इस बात की

512
00:37:00,880 --> 00:37:04,960
नॉलेज नहीं है कि तत्व ज्ञान है क्या तो वह निर्धारित नहीं कर सकता कि उच्चतम स्तर क्या

513
00:37:04,960 --> 00:37:08,960
है इसलिए एक तृतीय सत्ता होती है शास्त्रों की वो बताती है जिसको

514
00:37:08,960 --> 00:37:12,960
तत्व ज्ञान होगा वो ऐसा होगा वो इस तरह का आचरण करता होगा वो इस तरह का

515
00:37:12,960 --> 00:37:17,360
आचरण पर ये शास्त्र को मान नहीं रहे तो जब ये शास्त्र को नहीं मान रहे हैं

516
00:37:17,360 --> 00:37:22,000
तो किसी व्यक्ति का उच्चतम स्तर वाला होना इस प्रकार से सिद्ध होगा

517
00:37:22,000 --> 00:37:26,240
और यदि बिना शास्त्रों के स्वयं को उच्चतम स्तर वाला खुद

518
00:37:26,240 --> 00:37:30,320
से ही घोषित करने की प्रणाली को जायज मान लिया जाए तो आप

519
00:37:30,320 --> 00:37:34,400
जानते हैं क्या होगा निठारी हत्याकांड में क्या हुआ था या और भी बहुत

520
00:37:34,400 --> 00:37:38,480
सारी चीजें हैं दुनिया में घटित हो रही है वो सब कह देंगे हम उच्चतम स्तर वाले

521
00:37:38,480 --> 00:37:42,560
हम उच्चतम स्तर वाले क्योंकि कोई दूसरा उनको आंक नहीं सकता वो

522
00:37:42,560 --> 00:37:46,560
स्वयं ही ये फैसला कर सकते हैं कि हम उच्चतम स्तर वाले हैं तो इस तरीके

523
00:37:46,560 --> 00:37:50,560
अब बात आती है कि भाई उसके अंदर आचरण ऐसे होंगे

524
00:37:50,560 --> 00:37:54,800
वो लूप में फंस जाते हैं उच्चतम स्तर वाला कौन होगा जिसके आचरण अच्छे होंगे आचरण

525
00:37:54,800 --> 00:37:58,960
क्या-क्या होने चाहिए कैसे पता चलेगा तो शास्त्र शास्त्र तो है नहीं तो क्या-क्या

526
00:37:58,960 --> 00:37:59,600
होने चाहिए वो

527
00:37:59,600 --> 00:38:03,840
भी उच्चतम स्तर वाला ही तय करेगा। तो उच्चतम स्तर वाला अपने आचरण तय

528
00:38:03,840 --> 00:38:08,160
क्यों करेगा? जबकि अभी ये डिसाइड नहीं हुआ है कि वो उच्चतम स्तर वाला है कि नहीं।

529
00:38:08,160 --> 00:38:12,160
समझ रहे हैं आप? जैसे कि रामपाल ने कहा कि मैं तत्वदर्शी

530
00:38:12,160 --> 00:38:16,240
हूं कि कहां लिखा है कि भगवत गीता में लिखा है कि भगवत

531
00:38:16,240 --> 00:38:21,600
गीता में तो भगवत गीता तो काल ने बोली है कि उसका अर्थ कौन समझाएगा कि तत्वदर्शी।

532
00:38:21,600 --> 00:38:25,760
भाई जब अगर जो भगवत गीता है वह इस बात के

533
00:38:25,760 --> 00:38:29,760
लिए आधार है कि कौन तत्वदर्शी है तो भगवत गीता का अर्थ

534
00:38:29,760 --> 00:38:34,000
अभी तत्वदर्शी बनके कोई नहीं बता सकता क्यों क्योंकि भगवत

535
00:38:34,000 --> 00:38:38,080
गीता से डिसाइड हो रहा है कौन तत्वदर्शी तो भगवत गीता का सही अर्थ बना करने

536
00:38:38,080 --> 00:38:42,160
वाले के रूप में कोई तृतीय पक्ष होना चाहिए जहां से उसका तत्वदर्शी होना सिद्ध

537
00:38:42,160 --> 00:38:46,160
हो और तब वो आकर के भगवत गीता का अर्थ बताए भगवत गीता का अर्थ

538
00:38:46,160 --> 00:38:50,880
भी स्वयं ही बता रहे हो और फिर उससे स्वयं को तत्वदशी भीित कर ले रहे हो

539
00:38:50,880 --> 00:38:55,120
है ना? इसी प्रकार से आचरण भी स्वयं ही बता रहे हो और फिर उनहीं

540
00:38:55,120 --> 00:38:59,280
आचरणों के आधार पर अपने आप को उच्च स्तरीय साबित कर ले रहे हो। तो

541
00:38:59,280 --> 00:39:04,000
ये लूप है। इनको आपको समझ में समझना चाहिए।

542
00:39:04,000 --> 00:39:09,520
7:00 बजे एक नास्तिक के साथ चर्चा है।

543
00:39:09,520 --> 00:39:14,480
7:00 बजे एक नास्तिक के साथ में चर्चा है आज और

544
00:39:14,480 --> 00:39:18,640
कल शाम को 7:00 बजे एक इस्लाम को फॉलो करने वाले

545
00:39:18,640 --> 00:39:22,880
व्यक्ति हैं। वो आने वाले हैं। तो उनके साथ रिजवान करके

546
00:39:22,880 --> 00:39:28,240
उनका नाम तो कल एक अच्छी चर्चा आपको देखने को मिलेगी। ठीक है?

547
00:39:28,240 --> 00:39:32,000
तब तक के लिए अपडेटेड रहिए।

548
00:39:32,000 --> 00:39:38,000
जय श्री राम।

549
00:39:47,500 --> 00:39:51,500
[संगीत]
