1
00:00:02,320 --> 00:00:06,080
तो जय श्री राम सभी को। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक

2
00:00:06,080 --> 00:00:10,160
होंगे और आज की लाइव का

3
00:00:10,160 --> 00:00:15,040
जो टॉपिक है वो आपने देखा ही होगा। तो

4
00:00:15,040 --> 00:00:19,200
अ सबसे पहले जो महानुभाव है जो हमारे समक्ष

5
00:00:19,200 --> 00:00:24,480
बैठे हुए हैं। इनका परिचय बता दें कि

6
00:00:24,480 --> 00:00:29,120
आप स्वयं से थोड़ा सा बता दीजिए अपने बारे में दर्शकों को। जी

7
00:00:29,120 --> 00:00:33,840
मेरा नाम नीरज है और मैं आर्य समाज का सदस्य हूं

8
00:00:33,840 --> 00:00:38,720
और मैं 2018 में आर्य समाज से जुड़ा था।

9
00:00:38,720 --> 00:00:42,880
अच्छा जी कहां से नीरज जी आर्य समाज से? जी

10
00:00:42,880 --> 00:00:48,240
हां जी मैं उत्तराखंड कोद से हूं। जी जिला पौड़ीगढ़

11
00:00:48,240 --> 00:00:52,240
तो वही वही उस वहीं पे आर्य समाज से जुड़े हैं। कैसे जुड़े हैं? हां मैं

12
00:00:52,240 --> 00:00:55,360
यहीं से जुड़ा था।

13
00:00:55,360 --> 00:01:00,080
अच्छा हमारे नजदीक में आर्य समाज है

14
00:01:00,080 --> 00:01:04,480
तो वहां से वहां आपका कोई पद भी है या फिर आप मतलब सिर्फ एक अनुयाई

15
00:01:04,480 --> 00:01:08,640
है एक फॉलोअ नहीं पद मिला है मेरे को

16
00:01:08,640 --> 00:01:11,760
क्या पद है आपका

17
00:01:11,760 --> 00:01:16,960
मैं वहां पर हमारा आर्यवीर जो चल रहा है ना

18
00:01:16,960 --> 00:01:20,960
आर्यवीर तो मैं आर्य हां हां

19
00:01:20,960 --> 00:01:21,600
जी

20
00:01:21,600 --> 00:01:25,680
हां जी तो मैं उसका उसकी व्यवस्था संभालता हूं अच्छा

21
00:01:25,680 --> 00:01:30,080
तो वो जो कुछ शारीरिक उसको तैयार उसको

22
00:01:30,080 --> 00:01:35,920
लेकर के अच्छा वही वही ठीक है

23
00:01:35,920 --> 00:01:40,640
अच्छा थोड़ा सा जब ईश्वर पे हम लोग बात कर रहे हैं तो थोड़ा सा

24
00:01:40,640 --> 00:01:44,480
क्या कहते हैं ये हम समझ ले कि

25
00:01:44,480 --> 00:01:47,520
अ

26
00:01:47,520 --> 00:01:51,120
ये क्या कहते हैं ये

27
00:01:51,120 --> 00:01:55,280
ईश्वर के जो ग्रंथ है वो आप वैदिक कि वेदों को ही मानते हैं आप पूरा

28
00:01:55,280 --> 00:01:59,360
प्रॉपर वेद और वेद वेद को मानते हैं। जी जी

29
00:01:59,360 --> 00:02:03,520
ठीक जी तो अगर हम स्टार्ट करें

30
00:02:03,520 --> 00:02:07,920
क्योंकि आज का टॉपिक एकदम स्पष्ट है। सर्वशक्तिमान साकार निराकार

31
00:02:07,920 --> 00:02:13,360
ये सब बस यही है। तो

32
00:02:13,360 --> 00:02:17,360
तो आप मुझे बताएं कि आप मानते हैं कि जो आर्य

33
00:02:17,360 --> 00:02:21,520
समाज का जो ईश्वर है जिस ईश्वर की वो पूजा करते हैं करवाते हैं तो

34
00:02:21,520 --> 00:02:26,320
वह जो है सर्वशक्तिमान है।

35
00:02:26,320 --> 00:02:30,160
हां बिल्कुल सर्वशक्तिमान है।

36
00:02:30,160 --> 00:02:34,880
जैसे सर्वज्ञ है तो सर्वज्ञ का अर्थ क्या लेते हैं आप?

37
00:02:34,880 --> 00:02:38,880
सर्वज्ञ नहीं सर्वज। नहीं ठीक है। आप आप

38
00:02:38,880 --> 00:02:42,960
सर्वज बोल लीजिए और मैं सर्वज्ञ बोल लूंगा। आप ये बताइए उसका

39
00:02:42,960 --> 00:02:47,200
अर्थ क्या लेते हैं? जो आप शब्द बोल रहे हैं ना वो ज उसका सही उच्चारण

40
00:02:47,200 --> 00:02:51,200
ज है। देखिए अभी हमारा जो टॉपिक है ना कि कौन सही है

41
00:02:51,200 --> 00:02:55,280
कौन गलत है वो इस विषय में है कि सर्वशक्तिमान है कि नहीं ये टॉपिक

42
00:02:55,280 --> 00:02:59,440
नहीं है कि वो ज और ज का टॉपिक होगा वो किसी दिन और बैठ लेंगे तो

43
00:02:59,440 --> 00:03:03,600
ठीक है वो लेकिन जो मैं जो है वो बता रहा हूं आपको मैं

44
00:03:03,600 --> 00:03:07,760
आप अपनी वो सर्वज्ञ का अर्थ बताइए आप मुझे करेक्ट मत करिए

45
00:03:07,760 --> 00:03:12,000
कि मेरा प्रोनाउंसिएशन उच्चारण सही है या गलत करिएगा

46
00:03:12,000 --> 00:03:16,080
जब हम उसके लिए बैठे जब हम उसके लिए बैठे ठीक है जी जी

47
00:03:16,080 --> 00:03:21,120
बिल्कुल सर्वज का अर्थ यही है जो सब कुछ जानता है।

48
00:03:21,120 --> 00:03:25,680
मतलब यहां पे जो सर्वशेण लग रहा है उसका मतलब है सब कुछ।

49
00:03:25,680 --> 00:03:29,040
हां। क्या कोई भी ऐसी चीज है?

50
00:03:29,040 --> 00:03:33,040
कोई भी ऐसी चीज जो वो ना जानता हो। कुछ भी नहीं है ऐसा

51
00:03:33,040 --> 00:03:37,040
जो वो ना जानता हो। हां। मतलब जिसकी सीमा से बाहर

52
00:03:37,040 --> 00:03:41,040
कुछ है ही नहीं। कुछ भी नहीं है। कुछ भी का मतलब कुछ भी सब कुछ जानता

53
00:03:41,040 --> 00:03:45,040
है। बिल्कुल बिल्कुल। ठीक है। ठीक। तो अब

54
00:03:45,040 --> 00:03:49,280
जब हम आते हैं कि क्या आर्य समाज का ईश्वर

55
00:03:49,280 --> 00:03:53,360
सर्वव्यापक है? तो यहां पे सर्वव्यापक का

56
00:03:53,360 --> 00:03:57,360
अर्थ क्या होता है? सर्वव्यापक का अर्थ होता है कि वो

57
00:03:57,360 --> 00:04:02,480
सभी जगह है। सभी व्यापक

58
00:04:02,480 --> 00:04:06,960
में व्यापक तो यहां पे भी सर्व का मतलब सब कुछ है।

59
00:04:06,960 --> 00:04:11,200
बिल्कुल। है ना? उसकी सीमा से बाहर कुछ है ही नहीं।

60
00:04:11,200 --> 00:04:15,280
हां है ना यह हो गया सर्वव्यापक यानी कि

61
00:04:15,280 --> 00:04:19,360
जो सर्व शब्द लग रहा है वह सब कुछ के लिए है जिसकी

62
00:04:19,360 --> 00:04:23,600
सीमा से बाहर कुछ ना हो बिल्कुल है ना तो

63
00:04:23,600 --> 00:04:28,320
जब हम कहते हैं कि क्या आर्य समाज का ईश्वर सर्वशक्तिमान है

64
00:04:28,320 --> 00:04:32,800
हम आप मानते हैं कि नहीं हां बिल्कुल मानते हैं

65
00:04:32,800 --> 00:04:38,000
हम तो क्या वो अवतार ले सकता है

66
00:04:38,000 --> 00:04:42,080
ये अवतार ले सकता वाली कहानी यानी जो प्रश्न है आपका शिक्षित

67
00:04:42,080 --> 00:04:44,080
वैसे ही है। जैसे हम

68
00:04:44,080 --> 00:04:50,080
कहे कि क्या मोदी कोई पार्षद बन सकता है?

69
00:04:50,160 --> 00:04:54,320
क्योंकि जो ईश्वर सर्वशक्तिमान है जो अनंत ब्रह्मांड

70
00:04:54,320 --> 00:04:58,400
को चला रहा है जो अनंत ब्रह्मांड की व्यवस्था देख रहा है। वो

71
00:04:58,400 --> 00:05:03,120
एक छोटी सी पृथ्वी पर एक छोटी सी गैलेक्सी में छोटी सी पृथ्वी पर आकर के

72
00:05:03,120 --> 00:05:07,280
अवतार क्यों लेगा? और अवतार अवतार वो लेगा

73
00:05:07,280 --> 00:05:11,440
जो वहां पर नहीं होगा। जब ईश्वर पहले से वहां पर मौजूद है।

74
00:05:11,440 --> 00:05:15,600
हर जगह है। जैसा कि मैंने हमारे अभी बात हुई थी के ईश्वर सर्वज

75
00:05:15,600 --> 00:05:19,920
है। सर्वव्यापक है। वो हर जगह पहले से मौजूद है तो उसको अवतार

76
00:05:19,920 --> 00:05:24,000
लेने की आवश्यकता क्यों है?

77
00:05:24,000 --> 00:05:28,240
ठीक है। आपने दो बातें बताई है। एक वह क्योंकि पहले से है

78
00:05:28,240 --> 00:05:32,240
इसलिए उसका आना जाने का कोई अपराय अभिप्राय नहीं

79
00:05:32,240 --> 00:05:37,760
है। बिल्कुल बिल्कुल। और एक आपने बताया है कि

80
00:05:37,760 --> 00:05:41,840
वो क्या कहते हैं? ये

81
00:05:41,840 --> 00:05:46,720
उसको आवश्यकता नहीं है। हां उसको आवश्यकता नहीं है।

82
00:05:46,720 --> 00:05:51,440
अच्छा। तो अगर मैं आपसे यह कहूं कि

83
00:05:51,440 --> 00:05:55,600
उदाहरण के लिए छोटा सा आपको बता दूं। नहीं नहीं मैं समझ गया। मैं समझ मैं समझ

84
00:05:55,600 --> 00:05:59,600
गया। थोड़ा सा मैं और समझा देता हूं। थोड़ा सा समझा दूं। नहीं मैं समझ गया हूं ना फिर

85
00:05:59,600 --> 00:06:03,680
क्या दिक्कत है समझाने की? एक्स्ट्रा टाइम टेकिंग

86
00:06:03,680 --> 00:06:08,080
होगा। समझिए जिस हां

87
00:06:08,080 --> 00:06:12,400
तो आवश्यकता वाले मामले में मेरा जो पहला मामला है वो ये है।

88
00:06:12,400 --> 00:06:16,640
जैसे आपने बताया कि मोदी पार्षद नहीं बन सकता।

89
00:06:16,640 --> 00:06:20,640
है ना? नहीं हां मोदी जी को अगर कोई कहे कि भाई तुम पार्षद बनके

90
00:06:20,640 --> 00:06:25,600
दिखाओ तब हम तुम्हारी सशक्त तुम्हारे मानेंगे तुम्हारे अंदर शक्ति है।

91
00:06:25,600 --> 00:06:29,760
अच्छा ठीक है। अब ये बताइए अभी आपने कुछ दिन पहले एक फोटो

92
00:06:29,760 --> 00:06:33,840
वायरल हुई थी मोदी जी की जिसमें मोदी जी शायद झाड़ू लगा रहे थे।

93
00:06:33,840 --> 00:06:37,840
हुई थी क्या? हां हुई थी। हां हुई

94
00:06:37,840 --> 00:06:39,040
थी। तो

95
00:06:39,040 --> 00:06:43,120
उन्होंने झाड़ू लगाई। हां बिल्कुल। पार्षद

96
00:06:43,120 --> 00:06:47,520
से भी थोड़ा नीचे का कार्य किया ना झाड़ू लगा के। पद

97
00:06:47,520 --> 00:06:51,840
तो वही था ना पद कोई भी हो वो अच्छा पद

98
00:06:51,840 --> 00:06:56,480
अच्छा जिस समय जिस समय तो हमने पद कहां बदला है

99
00:06:56,480 --> 00:07:00,720
हमने पद बदला क्या कि वो जब अवतार लेगा तब वो ईश्वर नहीं रहेगा उन्होंने

100
00:07:00,720 --> 00:07:04,720
वो कार्य किया कि नहीं जिस कार्य के बारे में आपने आपत्ति

101
00:07:04,720 --> 00:07:08,800
जताई थी उन्होंने पार्षद वाला कार्य पार्षद से भी निम्न स्तर का कार्य

102
00:07:08,800 --> 00:07:12,880
किया ना झाड़ू लगाने का नहीं क्या उन्होंने सुनो मेरी बात

103
00:07:12,880 --> 00:07:17,120
क्या उन्होंने वाल्मीकि की नौकरी ली जो वाल्मी समाज झड़ों को

104
00:07:17,120 --> 00:07:22,160
मैं कहां कह रहा हूं कि वो नौकरी करे नहीं मैं कहां कह रहा हूं ईश्वर नौकरी करे

105
00:07:22,160 --> 00:07:26,720
आपने जो यह कहा है पार्षद का उदाहरण देकर के कि पार्षद बन सकता है क्या

106
00:07:26,720 --> 00:07:31,360
तो उसमें अर्थ यह है कि वो पार्षदों वाला काम क्यों करेगा

107
00:07:31,360 --> 00:07:36,240
यही तो बात है हां तो उसने तो स्वीपर का काम कर दिया

108
00:07:36,240 --> 00:07:40,240
चलो ये तो उदाहरण की बात है हम लोग थोड़ा सा और आगे

109
00:07:40,240 --> 00:07:44,800
आ जाते हैं ठीक है कि अ

110
00:07:44,800 --> 00:07:48,880
आवश्यकता और आना जाना आवश्यकता पे वैसे कई बार हम लोग बोल चुके हैं।

111
00:07:48,880 --> 00:07:54,560
अच्छा यह बताइए

112
00:07:54,560 --> 00:07:58,800
ईश्वर को वेद प्रदान करने की आवश्यकता

113
00:07:58,800 --> 00:08:03,120
क्या है? वैदिक मंत्र ईश्वर को वैदिक मंत्र प्रदान

114
00:08:03,120 --> 00:08:07,840
करने की क्या आवश्यकता है? जैसे

115
00:08:07,840 --> 00:08:12,640
एक कंपनी ने मोबाइल ल्च किया। ठीक है?

116
00:08:12,640 --> 00:08:15,280
अब उसको

117
00:08:15,280 --> 00:08:19,520
उसके अंदर मोबाइल को चलाने के जो उसके अंदर उसके सॉफ्टवेयर

118
00:08:19,520 --> 00:08:23,920
है किस तरह से इस मोबाइल को संचालित किया जाएगा किस तरह इसको चलाया जाएगा

119
00:08:23,920 --> 00:08:27,920
वो चीज उस किताब के अंदर पहली बात पहली बात तो पहली बात तो यह है कि यह

120
00:08:27,920 --> 00:08:32,160
आवश्यकता हमारी है कि हम उस मोबाइल को करेंगे कैसे और क्योंकि

121
00:08:32,160 --> 00:08:36,320
मोबाइल कंपनी वालों को हमें बेचना है हमें बेचना है हमसे पैसे कमाने

122
00:08:36,320 --> 00:08:40,640
इसलिए उसकी आवश्यकता है कि वो बताए हमें कि मोबाइल कैसे यूज़ होगा मगर

123
00:08:40,640 --> 00:08:44,800
क्या यह पर्सनली यह आवश्यकता आप मानते हैं कि

124
00:08:44,800 --> 00:08:48,800
उनकी भी है कि वो हमें बताएं। पहली बात यह तो एक अलग ये एक अलग बात

125
00:08:48,800 --> 00:08:52,960
होगी। दूसरी बात यह है कि जो वेद

126
00:08:52,960 --> 00:08:57,120
का ज्ञान है जो वेद का ज्ञान है वो ज्ञान

127
00:08:57,120 --> 00:09:01,440
सीधे अपनी शब्द शक्ति से हमारे माइंड

128
00:09:01,440 --> 00:09:05,120
में भी डाला जा सकता था।

129
00:09:05,120 --> 00:09:09,280
डाला जा सकता है ना शब्द शक्ति से। फिर उसको मंत्रों के

130
00:09:09,280 --> 00:09:09,920
रूप में क्यों?

131
00:09:09,920 --> 00:09:14,560
मैं कह रहा हूं उस रूप में क्यों दिया है? वह इसलिए दिया ताकि

132
00:09:14,560 --> 00:09:19,760
उसको उसको आसानी से कोई भी जैसे

133
00:09:19,760 --> 00:09:23,760
जो ये दस लोग होते हैं राक्षस प्रवृत्ति के लोग होते

134
00:09:23,760 --> 00:09:28,160
हैं उसको समझने के लिए एक मतलब जैसे

135
00:09:28,160 --> 00:09:32,320
हम कहें कि उसको मेहनत करनी पड़े ताकि वो पहले व्याकरण सीखे

136
00:09:32,320 --> 00:09:36,480
और उसके लिए हर उसको मतलब पढ़े लिखे मतलब कि लोगों

137
00:09:36,480 --> 00:09:40,480
के काम को सरल बनाने के लिए लोगों के व्यवहार में आ

138
00:09:40,480 --> 00:09:44,640
सकने के और यह जो एक तरीके

139
00:09:44,640 --> 00:09:48,880
से सृष्टि है इसमें व्यवहार हो सके प्रपंच हो सके इसके

140
00:09:48,880 --> 00:09:53,040
लिए उन्होंने वैदिक मंत्र ऐसे रूप में दिए जिसका लेनदेन

141
00:09:53,040 --> 00:09:57,200
हो सके अन्यथा जब वो सीधे माइंड में

142
00:09:57,200 --> 00:10:01,440
डाल देते अगर वो अगर वो सीधेसीधे माइंड में माइंड में ही डाल देते

143
00:10:01,440 --> 00:10:05,760
तो कैसा व्यवहार होता कौन वेद की वेद के ग्रंथ को खरीदने जाता

144
00:10:05,760 --> 00:10:09,760
वेद को जानने के लिए कोई भागदौड़ नहीं बस सीधे हो गया तो वो जो संसार

145
00:10:09,760 --> 00:10:13,840
है जिसमें लीलाएं होनी है प्रपंच होना है वो होता ही नहीं

146
00:10:13,840 --> 00:10:19,280
सीधे माइंड में ही डाल दो मुक्ति हो गई किसकी मुक्ति वैदिक

147
00:10:19,280 --> 00:10:23,360
ईश्वर का ज्ञान सीधे माइंड में डाल दो मुक्ति हो जाएगी व्यक्ति की तुरंत

148
00:10:23,360 --> 00:10:25,360
ज्ञानी हो जाएगा वो

149
00:10:25,360 --> 00:10:29,440
जो उसको पाना चाहेगा हां तो वो पाना चाहे के लिए उसको

150
00:10:29,440 --> 00:10:33,440
ऐसे उसमें आना चाहिए उसको ऐसे उसमें दिया

151
00:10:33,440 --> 00:10:38,000
कि जिससे कि उसके साथ व्यवहार हो सके व्यवहार में आने के लिए

152
00:10:38,000 --> 00:10:42,240
जो एक मिनट भाई साहब एक मिनट भाई व्यवहार

153
00:10:42,240 --> 00:10:46,240
में आ सकने के लिए ईश्वर ने जो ज्ञान मेंटल के रूप से भी दिया

154
00:10:46,240 --> 00:10:50,640
जा सकता था माइंड के रूप से भी दिया जा सकता था सीधेसीधे

155
00:10:50,640 --> 00:10:55,040
वो ज्ञान मनुष्यों के लिए हमारे लिए व्यवहारिक हो सके इसलिए

156
00:10:55,040 --> 00:10:59,280
उन्होंने वो ज्ञान मंत्रों के रूप में दिया ठीक है

157
00:10:59,280 --> 00:11:03,280
हां जी तो क्या यह नहीं माना जा सकता कि ईश्वर का जो

158
00:11:03,280 --> 00:11:07,520
स्वरूप है वो हमारे व्यवहार का विषय बन सके जो

159
00:11:07,520 --> 00:11:11,520
आपने बताया कि ऐसे लोग जो ईश्वर को समझ नहीं पाते ज्यादातर ऐसे ही लोग

160
00:11:11,520 --> 00:11:17,520
होते हैं उनके व्यवहार का विषय बन सके उसके लिए ईश्वर अवतार ले

161
00:11:18,480 --> 00:11:22,560
जब वो कहने का मतलब है कि एक तरीके से वैदिक ज्ञान का

162
00:11:22,560 --> 00:11:27,040
अवतार मंत्र है प्रणव है ना

163
00:11:27,040 --> 00:11:31,040
तो जब वो वैदिक ज्ञान को प्रणव के रूप में दे सकता है अवतार

164
00:11:31,040 --> 00:11:35,520
के रूप में व्यवहार में आ सकने के लिए तो वो

165
00:11:35,520 --> 00:11:39,680
अपने स्वरूप को जो सर्व्या उसका ज्ञान भी सर्वव्यापक है उसका उसका

166
00:11:39,680 --> 00:11:43,680
ज्ञान भी सर्वव्यापक है। हम तो वो

167
00:11:43,680 --> 00:11:48,640
क्या कहते हैं ये जब वो

168
00:11:48,640 --> 00:11:53,440
वेद के ज्ञान को ईश्वर को प्राप्त करवाने वाले ज्ञान को

169
00:11:53,440 --> 00:11:57,680
ऐसे रूप में दे सकता है जिस रूप में देने के कारण वो

170
00:11:57,680 --> 00:12:02,080
मनुष्यों के व्यवहार का विषय बन सके। तो सर्वत्र

171
00:12:02,080 --> 00:12:06,400
जो सर्वव्यापक ईश्वर है वह अपने स्वरूप का बोध कराने

172
00:12:06,400 --> 00:12:10,800
के लिए अपनी शिक्षा दीक्षा या जो भी है मनुष्यों के

173
00:12:10,800 --> 00:12:14,960
व्यवहार में आ सकने के लिए ऐसा रूप अपना बना सकता है

174
00:12:14,960 --> 00:12:19,120
जो मनुष्यों के व्यवहार का विषय बन सके।

175
00:12:19,120 --> 00:12:23,440
पहली बात तो यह तो आवश्यकता के लिए मैंने आपको एक वो दिया। दूसरा

176
00:12:23,440 --> 00:12:27,920
आपने बताया है आना जाना। ठीक है?

177
00:12:27,920 --> 00:12:32,400
यह बताइए कि हमको जब

178
00:12:32,400 --> 00:12:33,760
जैसे ईश्वर सर्वत्र

179
00:12:33,760 --> 00:12:38,000
व्याप्त है ऐसे ही ईश्वर का ज्ञान भी सर्वत्र व्याप्त

180
00:12:38,000 --> 00:12:42,560
है ना ईश्वर के साथसाथ बिल्कुल बिल्कुल है ना

181
00:12:42,560 --> 00:12:46,560
तो फिर ये देने लेने की आवश्यकता

182
00:12:46,560 --> 00:12:50,400
क्यों पड़ रही है

183
00:12:50,400 --> 00:12:54,480
देना लेना क्या है भाई मेरे मेरे अंदर कोई जगह ऐसी

184
00:12:54,480 --> 00:12:59,120
है मेरे अंदर मेरा मस्तिष्क ईश्वर से खाली तो है नहीं

185
00:12:59,120 --> 00:13:03,200
मेरा मस्तिष्क ईश्वर से खाली तो है नहीं अगर ईश्वर है तो ईश्वर का ज्ञान भी

186
00:13:03,200 --> 00:13:07,200
है मेरे मस्तिष्क में भी तो फिर ये मुझे वेद मंत्र लेने देने ये क्यों पड़

187
00:13:07,200 --> 00:13:11,600
रहे हैं ज्ञान ऐसे नहीं मिलता ना ज्ञान के लिए

188
00:13:11,600 --> 00:13:15,840
ईश्वर अगर दो हमें ज्ञान जो है तीन तरीके

189
00:13:15,840 --> 00:13:20,400
से मिल सकता है या तो हम वेद का स्वाध्याय करें

190
00:13:20,400 --> 00:13:24,880
ठीक है और जो उससे अह जो मिलते है उसके जो

191
00:13:24,880 --> 00:13:29,120
वेद से जो रिलेटिव ग्रंथ आर्ट्स ग्रंथ हम उनका स्वाध्याय

192
00:13:29,120 --> 00:13:33,120
करें तब हम वैदिक सिद्धांतों को जान पाएंगे या फिर जो

193
00:13:33,120 --> 00:13:37,120
वैदिक सिद्धांतों को जानते हैं हम उनके शरण में जाए या

194
00:13:37,120 --> 00:13:41,280
फिर हम अष्टांग योग या फिर हम ध्यान में जाकर के मेरी बात

195
00:13:41,280 --> 00:13:45,760
समझे नहीं मेरी बात समझे नहीं आप

196
00:13:45,760 --> 00:13:48,800
मैंने ये मैंने ये नहीं कहा वेद के मंत्र प्राप्त कैसे होते हैं

197
00:13:48,800 --> 00:13:52,800
वो मैं भी जानता हूं कैसे प्राप्त होते हैं वेद का ज्ञान प्राप्त वो अलग विषय

198
00:13:52,800 --> 00:13:56,880
विषय ये है कि जो चीज सर्वत्र व्याप्त है जो पहले से ही

199
00:13:56,880 --> 00:14:00,960
है। उसका भी व्यवहारिक जगत में आना जाना हो सकता है कि

200
00:14:00,960 --> 00:14:05,360
नहीं? यह विषय है। तो आपने कहा आपने

201
00:14:05,360 --> 00:14:09,440
कहा कि ज्ञान पहले से है फिर भी उसको लेने के लिए जाना पड़ता

202
00:14:09,440 --> 00:14:13,440
है। यानी जो चीज ज्ञान जो ज्ञान पहले से है फिर भी उसका आना

203
00:14:13,440 --> 00:14:16,880
जाना सिद्ध हो रहा है। हम

204
00:14:16,880 --> 00:14:21,120
ग्रहण करने के लिए उसे जानना पड़ेगा ना। ज्ञान को जानना पड़ेगा कि ज्ञान

205
00:14:21,120 --> 00:14:25,360
अरे भाई साहब तो वो तो पहले से ही है ना मेरे अंदर। मेरे

206
00:14:25,360 --> 00:14:29,600
अंदर कैसे हो गया यार? मेरे अंदर नहीं है। यानी

207
00:14:29,600 --> 00:14:33,680
यहां पर ईश्वर नहीं है। ईश्वर है यहां पर। हां।

208
00:14:33,680 --> 00:14:37,760
लेकिन उसका उसके ज्ञान को जानने के लिए मुझे मेहनत करनी पड़ती। मैं

209
00:14:37,760 --> 00:14:41,840
कह रहा हूं ईश्वर है। यहां पे ईश्वर है। मेरे खोपड़ी में

210
00:14:41,840 --> 00:14:45,840
हां। ईश्वर के साथ उसका ज्ञान है। ईश्वर के साथ उसका

211
00:14:45,840 --> 00:14:51,120
ज्ञान है। तो फिर मुझे क्यों लेने जाना पड़ रहा है किसी से?

212
00:14:51,120 --> 00:14:55,200
मैं ये पूछ रहा हूं। जब यहां पर वह है तो

213
00:14:55,200 --> 00:14:59,360
मुझे लेने क्यों जाना पड़ रहा है? कोई भी चीज बिना पुरुषार्थ के

214
00:14:59,360 --> 00:15:03,440
नहीं मिलती। अरे तो यहां पे है कि नहीं है? क्या

215
00:15:03,440 --> 00:15:04,000
है?

216
00:15:04,000 --> 00:15:08,480
मिलना मिलने का क्या मतलब है? जब वो यहीं पे है तो मिलने का क्या मतलब है?

217
00:15:08,480 --> 00:15:12,720
ईश्वर है। ईश्वर का ज्ञान भी है लेकिन वो मुझ तक मेरे अंदर

218
00:15:12,720 --> 00:15:16,960
वो मुझ तक नहीं पहुंच पा रहा है। क्यों? क्योंकि इसका मतलब अब मैं बताऊं।

219
00:15:16,960 --> 00:15:20,960
अब मैं बताऊं? हां जी। मैं आपकी चीज को करेक्ट कर देता हूं। तो

220
00:15:20,960 --> 00:15:25,440
अगर आप कहना चाह रहे हो नहीं एक मिनट एक मिनट अब आपने कही वाली बात तो

221
00:15:25,440 --> 00:15:29,600
क्योंकि हम सनातन धर्म को मानते हैं तो फिर मुसलमानों के अंदर भी फिर

222
00:15:29,600 --> 00:15:33,760
वो होना चाहिए फिर वो जो अन्य धर्म के लोग हैं मेरा यही तो

223
00:15:33,760 --> 00:15:37,840
प्रश्न है मेरा यही प्रश्न है कि अगर ज्ञान सर्वत्र व्याप्त है

224
00:15:37,840 --> 00:15:42,080
तो फिर उसको लेना देना क्यों पड़ रहा है आपने ये क्वेश्चन उठाया है क्वेश्चन

225
00:15:42,080 --> 00:15:46,240
आपने उठाया है कि जो चीज सर्वत्र व्याप्त है जो चीज पहले से है उसका

226
00:15:46,240 --> 00:15:50,560
वो आएगी जाएगी कहां पे क्वेश्चन आपने उठाया है मैंने नहीं उठाया

227
00:15:50,560 --> 00:15:54,640
मैं तो यह बात मानता हूं कि जो चीज सर्वत्र व्याप्त है यह

228
00:15:54,640 --> 00:15:58,720
एक पारमार्थिक धरातल का विषय है। मगर परमार्थ के परमार्थ

229
00:15:58,720 --> 00:16:02,720
के धरातल पर जो चीज सर्वत्र व्याप्त है उसका भी आना

230
00:16:02,720 --> 00:16:06,800
जाना व्यवहार में सिद्ध होता है। मैं अभी बताता हूं कैसे मैं अभी बताता हूं

231
00:16:06,800 --> 00:16:10,960
कैसे हमारे पास वो ज्ञान है। मगर

232
00:16:10,960 --> 00:16:15,440
वो इस रूप में है कि हमारी इंद्रियों का विषय नहीं है।

233
00:16:15,440 --> 00:16:19,040
समझ रहे हैं मेरी बात? वह ऐसे रूप में

234
00:16:19,040 --> 00:16:23,200
है कि वह हमारी इंद्रियों का विषय नहीं है। तो जब वह ऐसे रूप में

235
00:16:23,200 --> 00:16:27,200
आता है जब वह हमारी इंद्रियों का विषय बन जाता है तो

236
00:16:27,200 --> 00:16:31,200
उसका आना जाना कहते हैं। जैसे कि भगवान का ज्ञान है। लगता

237
00:16:31,200 --> 00:16:35,200
है मन में कुछ तो है कुछ तो वो सोचते भी नहीं है। नास्तिक के मन में भी होता है।

238
00:16:35,200 --> 00:16:39,360
सबके मन में होता है। असुतो मा सद्गमया तमसो मा ज्योतिर्गमया मृत्युमा

239
00:16:39,360 --> 00:16:43,440
मृतम गमया ये भावना जीव मात्र में है। प्राणी

240
00:16:43,440 --> 00:16:47,760
मात्र में है। कीड़े में भी है। है ना? मगर

241
00:16:47,760 --> 00:16:51,920
यह इस पर कोई ध्यान नहीं देता है तो क्या है वह ज्ञान तो है मगर

242
00:16:51,920 --> 00:16:57,440
वह ऐसे रूप में है कि अभी हमारी इंद्रियों का विषय नहीं है।

243
00:16:57,440 --> 00:17:01,600
ठीक है? फिर वह एक दिन जब हम परिश्रम करते हैं, पुरुषार्थ करते

244
00:17:01,600 --> 00:17:05,920
हैं, काम करते हैं, मेहनत करते हैं, वह ऐसे रूप में हमें मिलता

245
00:17:05,920 --> 00:17:10,160
है जो हमारी इंद्रियों का मन बुद्धि का विषय बन जाता है। तो

246
00:17:10,160 --> 00:17:14,160
मंत्र के रूप में, वेद के रूप में, वेदार्थ के रूप में,

247
00:17:14,160 --> 00:17:18,640
गुरुजनों से, ग्रंथों से हमको वो मिल जाता है पुरुषार्थ करने पर।

248
00:17:18,640 --> 00:17:22,640
है ना? तो इसका मतलब यह है कि जो चीज

249
00:17:22,640 --> 00:17:26,640
पहले से है सर्वव्यापक है उसका भी किसी

250
00:17:26,640 --> 00:17:30,720
देश काल परिस्थिति में आना जाना सिद्ध होता है। इसका अर्थ

251
00:17:30,720 --> 00:17:34,400
यह है कि अगर ईश्वर पहले से है तो यह इस बात के लिए बाधा

252
00:17:34,400 --> 00:17:38,480
नहीं है कि वो आएगा जाएगा क्यों? क्योंकि वो अभी हमारे

253
00:17:38,480 --> 00:17:42,880
व्यवहार का विषय नहीं है। एक मिनट भाई साहब एक मिनट वो अभी हमारे व्यवहार

254
00:17:42,880 --> 00:17:47,040
का विषय नहीं है। इंद्रियों का विषय नहीं है। फिर एक दिन वो ऐसा

255
00:17:47,040 --> 00:17:51,040
रूप बनाता है जैसे जैसे वेद का ज्ञान ने रूप बनाया ना वैदिक

256
00:17:51,040 --> 00:17:55,200
मंत्र ऐसे ही जब वो ऐसा रूप बनाता है जो हमारे व्यवहार

257
00:17:55,200 --> 00:18:01,200
का हमारी इंद्रियों का विषय बन सके तो वो बन जाता है। वो कहलाता है अवतार।

258
00:18:01,280 --> 00:18:05,840
ये मेरा आपको वो हो गया। अब

259
00:18:05,840 --> 00:18:10,480
उस वाले मामले में आपको कुछ कहना है क्या जो मैंने आवश्यकता बताई थी

260
00:18:10,480 --> 00:18:14,560
कि आपने कहा था कि जिससे कि लोगों के लिए व्यवहार का

261
00:18:14,560 --> 00:18:18,560
विषय बन सके इसलिए मंत्र दिए ठीक है ज्ञान

262
00:18:18,560 --> 00:18:23,040
नहीं दे दिया सीधे मंत्र दिए मंत्रों के रूप में ज्ञान दिया तो मैंने कहा

263
00:18:23,040 --> 00:18:27,120
कि ईश्वर भी किसी के व्यवहार का विषय बन सके भक्ति का विषय

264
00:18:27,120 --> 00:18:31,440
बन सके प्रेम का विषय बन सके इसलिए वह अवतार लेता है तो ये आवश्यकता

265
00:18:31,440 --> 00:18:35,760
मैंने बताई थी यह दो पॉइंट हो गए। आवश्यकता का मैंने बता दिया

266
00:18:35,760 --> 00:18:40,000
और जो सब सर्वत्र व्याप्त है, सदा से व्याप्त है, उसका आना

267
00:18:40,000 --> 00:18:44,000
जाना भी मैंने बता दिया कैसे आता जाता है। अब तीसरी

268
00:18:44,000 --> 00:18:48,160
चीज मैं यह कह रहा हूं। एट द एंड एक बात फंस जाती है। जब

269
00:18:48,160 --> 00:18:49,920
हम कह रहे हैं कि सर्वज्ञ

270
00:18:49,920 --> 00:18:54,880
जिसकी सीमा से बाहर कुछ ना हो। जब हम कह रहे हैं सर्वव्यापक

271
00:18:54,880 --> 00:18:58,880
जिसकी सीमा से बाहर कुछ भी ऐसा ना हो जो वो जानता ना हो। तो वहां पे ये वाली बात नहीं है

272
00:18:58,880 --> 00:19:02,960
कि वो नाली को जानता है कि नहीं कि भैया प्रधानमंत्री है तो नाली

273
00:19:02,960 --> 00:19:07,280
क्यों जानेगा? नाली क्यों देखेगा? नहीं। सर्वज्ञ का मतलब सर्वज्ञ। नाली

274
00:19:07,280 --> 00:19:12,080
भी देखेगा, मल भी देखेगा, मूत्र भी देखेगा, सब कुछ देखेगा।

275
00:19:12,080 --> 00:19:16,880
ठीक? सर्वव्यापक ऐसा नहीं है। प्रधानमंत्री नाली में क्या करेगा? नहीं।

276
00:19:16,880 --> 00:19:21,040
मल में भी है, मूत्र में भी है, वो हर जगह है। वो सर्वशक्तिमान

277
00:19:21,040 --> 00:19:25,120
जो ईश्वर है, सर्वव्यापक है। वो ऐसी कोई जगह नहीं है जिससे वो

278
00:19:25,120 --> 00:19:29,200
रहित हो। हम तो फिर हम यह कैसे कह

279
00:19:29,200 --> 00:19:33,360
देंगे कि भैया जैसे प्रधानमंत्री अपने से निम्न स्तर का पद नहीं

280
00:19:33,360 --> 00:19:37,600
धारण कर सकता वो नहीं बन सकता तो वहां पर सर्व का सर्व

281
00:19:37,600 --> 00:19:41,600
विशेषण का जो अर्थ है वो बदल रहा है। वहां आप

282
00:19:41,600 --> 00:19:46,160
सीमा लगा रहे हैं। तो जब आप सर्वव्यापक का अर्थ बिना किसी भेदभाव के सर्व्यापक

283
00:19:46,160 --> 00:19:50,240
का अर्थ सर्वव्यापक मानते हो। जब आप सर्वज्ञ का अर्थ बिना किसी भेदभाव

284
00:19:50,240 --> 00:19:54,320
के सर्वज्ञ मानते हो तो सर्वशक्तिमान का अर्थ बिना किसी भेदभाव के

285
00:19:54,320 --> 00:19:58,480
सर्वशक्तिमान क्यों नहीं मान रहे? या फिर आप सर्व विशेषण में बाधा तो

286
00:19:58,480 --> 00:20:02,480
तीन चीजें हो गई। आवश्यकता बता दी। एक मिनट तीन चीजें हो गई। आवश्यकता

287
00:20:02,480 --> 00:20:05,040
बता दी और आना जाना

288
00:20:05,040 --> 00:20:09,120
बता दिया देश काल परिस्थिति में और सर्व विशेषण में बाधा

289
00:20:09,120 --> 00:20:13,200
है। वह करेगा क्यों? यह बाद की बात है। कर सकता है कि नहीं? क्षमता

290
00:20:13,200 --> 00:20:18,080
है कि नहीं? यह पूछा जा रहा है। अब बताएं।

291
00:20:18,080 --> 00:20:22,080
आपने कहा सर्वशक्तिमान का अर्थ क्या समझते हैं आप?

292
00:20:22,080 --> 00:20:26,320
जो सब कुछ कर सकता है जो जैसे आपने सर्वज्ञ का जो अर्थ बताया जैसे

293
00:20:26,320 --> 00:20:30,960
आपने जो अर्थ सर्व्यापक का बताया उसी के अनुसार सर्वशक्तिमान का अर्थ सर्वशक्तिमान

294
00:20:30,960 --> 00:20:34,960
का अर्थ यह नहीं होता। सर्वशक्तिमान का अर्थ यह होता है कि

295
00:20:34,960 --> 00:20:38,960
वह अपने कार्य करने में किसी अन्य की सहायता ना

296
00:20:38,960 --> 00:20:42,960
लेता हो। ठीक है? तो सर्वज्ञ का अर्थ यह होगा कि वो

297
00:20:42,960 --> 00:20:46,960
अपने कार्यों को जानता हो। अपनी चीजों को जानता हो।

298
00:20:46,960 --> 00:20:51,040
सर्वज्ञ का अर्थ ही होगा ना। अपने कार्य करने में ना

299
00:20:51,040 --> 00:20:55,040
लेता हो। किसी भी अपने कार्य करने में

300
00:20:55,040 --> 00:20:59,360
किसी अन्य की सहायता ना लेता हो। दूसरा किसी

301
00:20:59,360 --> 00:21:05,360
भी साधन संसाधन की सहायता ना लेता हो। वह सर्वशक्तिमान है।

302
00:21:06,320 --> 00:21:10,560
यानी कि सर्व का अर्थ यह नहीं है कि वह सब कुछ कर सकता है।

303
00:21:10,560 --> 00:21:14,560
हां ये नहीं है। यानी सर्व विशेषण का अर्थ ये नहीं है कि वो

304
00:21:14,560 --> 00:21:18,560
सब कुछ कर सकता है। हां ये नहीं है इसका अर्थ। इसका अर्थ ये

305
00:21:18,560 --> 00:21:22,640
है यानी कि सब में नहीं वह सब में वह हम

306
00:21:22,640 --> 00:21:26,720
सब में शक्तिमान है। हम सबसे ज्यादा शक्तिमान है। नहीं नहीं ये ये

307
00:21:26,720 --> 00:21:30,720
मैं नहीं कह रहा। मैं कह रहा हूं वो हम सबसे ज्यादा शक्तिमान है। ठीक है?

308
00:21:30,720 --> 00:21:35,520
हां। यानी सर्व का मतलब है कि हम सबसे ज्यादा मगर असीमित

309
00:21:35,520 --> 00:21:39,520
नहीं है। शक्तिमान शक्तिमान होना यहां पर शक्ति जो जो मैंने

310
00:21:39,520 --> 00:21:43,600
क्या कहा भाई मैं ये कह रहा हूं अभी आप मेरी बात सुन लीजिए आप बहुत देर

311
00:21:43,600 --> 00:21:47,840
तक बोले ना अब मेरी बात सुन लीजिए दो मिनट जैसे मुझे

312
00:21:47,840 --> 00:21:52,000
खाना बनाने के लिए मुझे पत्नी की जरूरत पड़ती है मेरी वाइफ है घर में खाना बनाती

313
00:21:52,000 --> 00:21:56,320
है तो क्योंकि मैं अगर मैं बाहर काम करूं तो मुझे घर में खाना बनाने

314
00:21:56,320 --> 00:22:00,320
के लिए कोई चाहिए मेरे बच्चों को संभालने के लिए चाहिए फिर मैं

315
00:22:00,320 --> 00:22:04,320
मैं कपड़े नहीं सिल सकता अपने कपड़े मैं ये बातें जानता हूं आज आप

316
00:22:04,320 --> 00:22:08,400
पहली बार नहीं आए मैं जानता हूं जो आप बोल रहे हैं। ये मैं जानता हूं।

317
00:22:08,400 --> 00:22:13,040
एक एक उदाहरण भी जरूर उससे काम चल जाएगा। ईश्वर को

318
00:22:13,040 --> 00:22:17,200
अपने किसी भी कार्य करने के लिए किसी साधन संसाधन की

319
00:22:17,200 --> 00:22:21,200
या किसी व्यक्ति विशेष की आवश्यकता नहीं पड़ती। यमराज की आवश्यकता

320
00:22:21,200 --> 00:22:21,700
नहीं

321
00:22:21,360 --> 00:22:25,360
पड़ती। चित्रगुप्त की आवश्यकता नहीं पड़ती। भाई साहब मेरा

322
00:22:25,360 --> 00:22:29,360
ट्रैक बदल रहा है। आपका आपका ट्रैक बदल रहा है। देखिए मैं ये

323
00:22:29,360 --> 00:22:33,680
मैं ये पूछ रहा हूं। मैं यह पूछ रहा हूं कि आपने

324
00:22:33,680 --> 00:22:37,680
सर्व का मतलब बताया कि वह अपने सारे काम कर सके।

325
00:22:37,680 --> 00:22:41,680
सर्व का मतलब बताया कि जो सब सर्व का अर्थ है

326
00:22:41,680 --> 00:22:46,400
कि वो हम सभी में सर्वशक्तिमान है। हम सबसे ज्यादा सर्वशक्तिमान

327
00:22:46,400 --> 00:22:50,400
है। हमसे ज्यादा दुनिया में ऐसा कोई नहीं है जो

328
00:22:50,400 --> 00:22:54,480
उसके बराबर हो। वो सबसे ज्यादा है। ये वाला ना

329
00:22:54,480 --> 00:22:58,880
यही अर्थ है ना? हेलो हां जी बोलिए।

330
00:22:58,880 --> 00:23:04,240
मैं यह कह रहा हूं हम सबसे ज्यादा है इसलिए वह सर्वशक्तिमान है।

331
00:23:04,240 --> 00:23:08,240
हम सब हम उसकी हमसे तुलना किसी की

332
00:23:08,240 --> 00:23:12,320
उसकी किसी मैं कह रहा हूं हम सबसे ज्यादा इसलिए है। एक क्लियर

333
00:23:12,320 --> 00:23:16,480
लाइन तो बोलिए। ठीक है। ठीक है। हम सबसे ज्यादा इसलिए

334
00:23:16,480 --> 00:23:20,480
मगर असीमित नहीं है। असीमित नहीं है। कुछ ऐसी चीजें हैं जो वो भी

335
00:23:20,480 --> 00:23:24,480
नहीं कर सकता। हां बिल्कुल। वो अवतार नहीं ले

336
00:23:24,480 --> 00:23:28,640
सकता। नहीं नहीं असीमित नहीं है। हम सबसे ज्यादा है पर असीमित

337
00:23:28,640 --> 00:23:31,920
नहीं है। ठीक है?

338
00:23:31,920 --> 00:23:36,160
तो जब हम कहते हैं कि जो जो नियम उसने

339
00:23:36,160 --> 00:23:36,720
बनाए

340
00:23:36,720 --> 00:23:40,720
हैं ईश्वर ने मैंने ये कहा भाई साहब असीमित नहीं है

341
00:23:40,720 --> 00:23:45,680
ना। क्यों खींच रहे हो बात को? ठीक है। बोलिए। हां।

342
00:23:45,680 --> 00:23:49,760
तो सर्व का अर्थ सर्वशक्तिमान का अर्थ है यह कि वह

343
00:23:49,760 --> 00:23:55,040
हम सबसे ज्यादा है। मगर असीमित नहीं है। ठीक है।

344
00:23:55,040 --> 00:23:59,200
इसका मतलब सर्व का अर्थ ये हुआ कि हम सबसे

345
00:23:59,200 --> 00:24:01,360
ज्यादा

346
00:24:01,360 --> 00:24:05,840
मगर असीमित नहीं। सर्व का अर्थ यही तो हुआ

347
00:24:05,840 --> 00:24:10,400
तो सर्वज्ञ का अर्थ यह है कि वो हम सबसे ज्यादा ज्ञानी है मगर

348
00:24:10,400 --> 00:24:14,720
अनंत ज्ञानी नहीं है। नहीं क्यों नहीं अनंत ज्ञानी? अनंत

349
00:24:14,720 --> 00:24:20,000
अनंत जहां तक उसकी सर्व का अर्थ क्या ले रहे हैं? हम सबसे ज्यादा या अनंत?

350
00:24:20,000 --> 00:24:24,000
किसका? सर्व का अर्थ क्या लेना है? सर्व

351
00:24:24,000 --> 00:24:28,960
सर्वव्यापक तो सर्व का अर्थ क्या लेना है? सर्व

352
00:24:28,960 --> 00:24:33,040
यहां पर शक्तिमान सर्वशक्तिमान का अर्थ है कि वो हम सबसे मैं

353
00:24:33,040 --> 00:24:38,000
कह रहा हूं भाई साहब सर्व विशेषण का अर्थ क्या होता है? सब

354
00:24:38,000 --> 00:24:42,160
सभी में सबसे सारा सब कुछ जितना भी है। आपने अभी बताया है

355
00:24:42,160 --> 00:24:46,160
कि हम सबसे अधिक इसका मतलब है सर्व सर्वशक्तिमान का

356
00:24:46,160 --> 00:24:50,240
यहां पर बात कर रहे हैं तो वह सभी जीवों से सर्वशक्तिमान है। मैं

357
00:24:50,240 --> 00:24:51,760
कह रहा हूं भाई साहब मैं कह

358
00:24:51,760 --> 00:24:56,160
रहा हूं मैं कह रहा हूं। सर्व सर्व विशेषण का अर्थ क्या है? मैं आपसे सर्वशक्तिमान

359
00:24:56,160 --> 00:25:00,480
का अर्थ नहीं पूछ रहा हूं। मैं कह रहा हूं सर्व मैं कह रहा हूं सर्व विशेषण

360
00:25:00,480 --> 00:25:04,880
का अर्थ क्या है? सर्व विशेषण का अर्थ क्या है? सर्व का अलग-अलग

361
00:25:04,880 --> 00:25:08,960
हेतु दोनों जगह पर मैं कह रहा हूं अगर हम किसी शब्द को

362
00:25:08,960 --> 00:25:13,040
अभी सर्व के साथ लगा नहीं रहे हैं। अभी मैं आपसे ये पूछ रहा हूं। सर्व

363
00:25:13,040 --> 00:25:17,040
का अर्थ क्या है? वहां पर अनंत ब्रह्मांड की बात

364
00:25:17,040 --> 00:25:21,920
हो रही है व्यापक में। सर्वव्यापक में यहां पर

365
00:25:21,920 --> 00:25:26,560
भाई साहब आप मुझे सर्व का अर्थ तो बताइए सर्व का अर्थ क्या है वहां पर

366
00:25:26,560 --> 00:25:30,640
दोनों जगह पर सर्व का अलग-अलग अर्थ है ना जहां पर जीवों की

367
00:25:30,640 --> 00:25:34,800
बात हो रही है सर्वशक्तिमान में अरे भाई साहब भाई साहब सर्व

368
00:25:34,800 --> 00:25:38,880
का एक कोई अर्थ तो होगा सर्व के कई अर्थ है क्या सर्व के कई

369
00:25:38,880 --> 00:25:42,880
अर्थ है मैं सर्व का कह तो रहा हूं सर्व

370
00:25:42,880 --> 00:25:46,960
में यहां पर सभी जीव हो गए वहां पर सभी में अनंत

371
00:25:46,960 --> 00:25:51,200
ब्रह्मांड हो ये अर्थ है। अब आप पकड़

372
00:25:51,200 --> 00:25:55,280
रहे हो उसको खींचने में मतलब सर्व का अर्थ मानते हैं कि सभी

373
00:25:55,280 --> 00:26:01,200
जीव सर्वशक्तिमान सभी जीवों में शक्तिमान और

374
00:26:01,200 --> 00:26:05,920
जब वहां सर्व क्या कहते हैं? सर्वज्ञ कहते हैं तो क्या कहते

375
00:26:05,920 --> 00:26:06,960
सर्वव्यापक

376
00:26:06,960 --> 00:26:11,200
और सर्व तो वह सभी पदार्थ वहां पर सभी पदार्थों

377
00:26:11,200 --> 00:26:15,280
को उसे ज्ञान है। जितना कुछ भी अनंत सृष्टि के अंदर है

378
00:26:15,280 --> 00:26:19,600
उन जो भी पदार्थ है उन सबका ज्ञान है। सभी

379
00:26:19,600 --> 00:26:23,920
सभी पदार्थ अच्छा ठीक है। सभी पदार्थ सभी

380
00:26:23,920 --> 00:26:28,080
जीव जो हम जीव तो ये बताइए ये बताइए जीव

381
00:26:28,080 --> 00:26:32,080
जो कार्य कर सकता है वो ईश्वर भी कर सकता है कि नहीं? भाई जब आप

382
00:26:32,080 --> 00:26:36,160
कह रहे हैं हम सबसे ज्यादा सर्वशक्तिमान है तो वह सब कर कर सकता है।

383
00:26:36,160 --> 00:26:40,640
क्षमता तो होगी। कार्य अलग है। मनुष्य जीव के कार्य अलग है।

384
00:26:40,640 --> 00:26:45,520
तो फिर वो सर तो फिर हमसे कंपैरिजन क्यों हो रहा है उसका?

385
00:26:45,520 --> 00:26:49,680
जब हमारे कार्य ही अलग है। दोनों का डिपार्टमेंट अलग है। जैसे मैं पूछ रहा हूं।

386
00:26:49,680 --> 00:26:53,680
जैसे मैं बॉलर हूं और कोई बैट्समैन है। तो बैट्समैन का

387
00:26:53,680 --> 00:26:57,840
आकलन होगा रन के आधार पे। और मेरा आंकलन होगा

388
00:26:57,840 --> 00:27:02,000
विकेट के आधार पर। बॉलिंग में मैंने कितने रन दिए? तो सर तुलना नहीं

389
00:27:02,000 --> 00:27:06,160
करेंगे शक्तिमान कैसे पता लगेगा तुलना हो कैसे रही है जब उसके कार्य

390
00:27:06,160 --> 00:27:10,400
हमारे कार्य अलग है या तो या तो यह तुलना हो कि मैं अगर मैं अगर

391
00:27:10,400 --> 00:27:14,480
10 किलो वजन उठा सकता हूं तो वो 50 किलो उठा सकता है इसलिए उसको हमसे ज्यादा

392
00:27:14,480 --> 00:27:18,480
कहा जा रहा है हमसे ज्यादा कैसे हो रहा है वो कौन सी चीज में ज्यादा हो रहा है

393
00:27:18,480 --> 00:27:23,920
ये बताइए हमसे ज्यादा किस चीज में हो रहा है

394
00:27:23,920 --> 00:27:28,000
किस में हो रहा है किस कार्य में हमसे ज्यादा हो रहा

395
00:27:28,000 --> 00:27:32,080
है वह सभी प्राणियों को

396
00:27:32,080 --> 00:27:36,400
सभी प्राणियों को जानता है कि उनके मन में भाई साहब आप देखिए

397
00:27:36,400 --> 00:27:40,560
देखिए मेरी बात सुनिए भाई साहब नीरज जी थोड़ा सा टू द पॉइंट रहिए

398
00:27:40,560 --> 00:27:45,280
टू द पॉइंट रहिए मैंने पूछा है कि जो

399
00:27:45,280 --> 00:27:50,240
ईश्वर है उसका एक उदाहरण दीजिए वो किस कार्य में हमसे ज्यादा है

400
00:27:50,240 --> 00:27:54,320
आपने कहा कि क्योंकि वो सभी जीवो में सबसे ज्यादा है इसलिए उसके सामने सर्व

401
00:27:54,320 --> 00:27:58,400
लगा है तो हमारे हमारे कौन सी

402
00:27:58,400 --> 00:28:02,800
क्षमता अरे समझ गया मैं प्रश्न तो पूरा कर दूं

403
00:28:02,800 --> 00:28:06,800
प्रश्न तो पूरा कर नहीं ठीक है मुझे अरे मैं समझ गया

404
00:28:06,800 --> 00:28:11,040
भाई साहब आपका प्रश्न नहीं वो प्रश्न ये है

405
00:28:11,040 --> 00:28:15,120
एक मिनट भाई साहब भाई साहब एक मिनट प्रश्न ये है कि कौन सा

406
00:28:15,120 --> 00:28:18,000
कार्य है

407
00:28:18,000 --> 00:28:22,240
आप कह रहे हो मैं समझ गया हूं इसलिए कह रहा हूं मैं

408
00:28:22,240 --> 00:28:26,560
वह सृष्टि की रचना करता है सृष्टि का बिगाड़ता है

409
00:28:26,560 --> 00:28:30,720
ठीक है मनुष्यों को बनाता मनुष्य और उनके

410
00:28:30,720 --> 00:28:35,440
उनके कर्म फल को ठीक ठीक देख के उनका उनको फल देते

411
00:28:35,440 --> 00:28:39,440
मैं कह रहा था टू द पॉइंट बात करिए मैंने पूछा है कि आपसे वो क्या करता है

412
00:28:39,440 --> 00:28:43,440
मैंने पूछा है कि कौन सी चीज में वो हमसे ज्यादा है मनुष्य नहीं कर

413
00:28:43,440 --> 00:28:46,000
सकता है

414
00:28:46,000 --> 00:28:50,000
ये कार्य नहीं कर सकता है मनुष्य

415
00:28:50,000 --> 00:28:54,560
ये कार्य मनुष्य नहीं कर पाएगा इसीलिए सृष्टि

416
00:28:54,560 --> 00:28:58,080
के

417
00:28:58,080 --> 00:29:02,240
सर्वशक्तिमान नहीं है। नहीं वो इसलिए सर्वशक्तिमान है क्योंकि वो

418
00:29:02,240 --> 00:29:06,320
वो कार्य कर सकता है जो हम नहीं कर सकते। उसमें हमसे ज्यादा क्षमता नहीं

419
00:29:06,320 --> 00:29:10,480
है। अरे भाई साहब आप समझ नहीं पा रहे हो।

420
00:29:10,480 --> 00:29:15,120
हां मैं समझ नहीं बैठा हूं। मैं समझ नहीं बैठा हूं। मैं

421
00:29:15,120 --> 00:29:19,200
पहले तो ये समझिए कि मैंने क्या कहा कि

422
00:29:19,200 --> 00:29:23,360
ईश्वर को अपने कार्य करने में किसी अन्य साधन संसाधन

423
00:29:23,360 --> 00:29:27,600
की या किसी देखिए अभी पॉइंट ये चल रहा है कि

424
00:29:27,600 --> 00:29:32,000
हम जो कार्य नहीं कर सकते वो वो कर सकता है इसलिए वो सर्वशक्तिमान

425
00:29:32,000 --> 00:29:36,240
है या फिर ये बात है कि हमसे वो ज्यादा कर सकता है इसलिए वो सर्वशक्तिमान

426
00:29:36,240 --> 00:29:40,240
है तो आप पहले इसको क्लियर करिए दूसरी बातें मत करिए मैं दूसरी बात नहीं कर

427
00:29:40,240 --> 00:29:45,520
रहा मैं वही बात कर रहा हूं जो मैंने पहले ही कही थी तो प्रश्न का उत्तर

428
00:29:45,520 --> 00:29:50,080
मैं मैं प्रश्न क्या पूछ रहा हूं भाई साहब मैं पूछ रहा हूं

429
00:29:50,080 --> 00:29:54,080
मैं पूछ रहा हूं मैं पूछ रहा हूं कि बता रहा हूं के

430
00:29:54,080 --> 00:29:54,880
सर्वशक्तिमान

431
00:29:54,880 --> 00:29:59,440
का अर्थ यह होता है कि वह अपने कार्य कर तो भाई साहब आप

432
00:29:59,440 --> 00:30:04,400
बता रहे हैं वो मुझे पूछना पड़ेगा ना समझने के लिए मेरे भाई हां तो

433
00:30:04,400 --> 00:30:08,480
तो मैं समझ रहा हूं तो आप समझाना नहीं चाहते हो आप प्रश्न

434
00:30:08,480 --> 00:30:13,440
अलग कर रहे हो ना आप तो प्रश्न कर रहा हूं उत्तर दो उसका आप

435
00:30:13,440 --> 00:30:17,440
सुनो सुनो मैं मोटाम मोटा को समझा दूं अगर आप समझना चाहते मोटा

436
00:30:17,440 --> 00:30:21,520
मोटा नहीं अभी जहां मैं आ चुका हूं वहां पे बात करो मैं यहां पे आ चुका हूं

437
00:30:21,520 --> 00:30:25,520
कि वो इसलिए सर्वशक्तिमान है कि वो वो काम कर सकता है जो

438
00:30:25,520 --> 00:30:29,680
मैं नहीं कर सकता इसलिए नहीं है कि मेरे अंदर जो पावर है वो उसके अंदर मुझसे

439
00:30:29,680 --> 00:30:33,680
ज्यादा है अरे भाई सृष्टि की उत्पत्ति कर

440
00:30:33,680 --> 00:30:37,920
सकता है ईश्वर भाई साहब मैंने क्या पूछा है आपसे मैंने

441
00:30:37,920 --> 00:30:42,080
पूछा है कि वो वो काम कर सकता है जो मैं नहीं

442
00:30:42,080 --> 00:30:46,080
कर सकता। इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। इसलिए नहीं कि

443
00:30:46,080 --> 00:30:50,080
अगर मैं 10 किलो वजन उठा सकता हूं तो वो जो है 50 किलो वजन उठा सकता है। ये वाली बात

444
00:30:50,080 --> 00:30:56,080
नहीं है वहां पे।

445
00:30:56,240 --> 00:31:00,240
इनमें से कौन सी बात है? दोबारा बोलिए

446
00:31:00,240 --> 00:31:05,040
अपना प्रश्न दोबारा। प्रश्न यह है कि

447
00:31:05,040 --> 00:31:09,280
कि जो काम हम नहीं कर सकते वह कार्य

448
00:31:09,280 --> 00:31:14,000
वह कर सकता है इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। ठीक है?

449
00:31:14,000 --> 00:31:18,720
और क्या कहते हैं? ऐसा नहीं है कि

450
00:31:18,720 --> 00:31:22,720
हम जो कार्य जितनी क्षमता है हमारे अंदर कोई भी कार्य करने की वह

451
00:31:22,720 --> 00:31:27,360
क्षमता उसमें हमसे बहुत ज्यादा है।

452
00:31:27,360 --> 00:31:31,680
जो ईश्वर का कार्य है वह हम नहीं कर सकते।

453
00:31:31,680 --> 00:31:36,480
यानी कि सर्वशक्तिमान का मतलब यह है कि

454
00:31:36,480 --> 00:31:42,480
वह कार्य करने वाला जो जीव नहीं कर सकते।

455
00:31:43,440 --> 00:31:47,920
यार घुमा के भाई मैंने कहा आपको

456
00:31:47,920 --> 00:31:52,080
सर्वशक्तिमान का अर्थ यह है अपने खुद के

457
00:31:52,080 --> 00:31:56,160
कार्य करने में। उसका भाई साहब आपने अभी सर्व का अर्थ बताया था ना

458
00:31:56,160 --> 00:32:00,240
मुझे। अभी मुझे सर्व का अर्थ बताया था ना आपने?

459
00:32:00,240 --> 00:32:04,320
आपने सर्व का अर्थ बताया था कि नहीं? सर्व का बताया था। जब आप

460
00:32:04,320 --> 00:32:08,560
सर्वशक्तिमान कहते हैं तो सर्वशक्तिमान का मतलब है सभी जीवों

461
00:32:08,560 --> 00:32:12,640
में जो सबसे आप या तो कहिए कि मैं इस पर रहूंगा वो सभी जीवो वाली

462
00:32:12,640 --> 00:32:16,880
डेफिनेशन कट तो हम इसप बात करेंगे। हां तो उस है तो अभी

463
00:32:16,880 --> 00:32:20,960
मैं पूछ रहा हूं। अभी मैं पूछ रहा हूं। अब अब आप बदल रहे हो। अब आप ये

464
00:32:20,960 --> 00:32:24,960
कह रहे हो कि जो जो कार्य जीव जो कार्य मनुष्य

465
00:32:24,960 --> 00:32:29,280
नहीं कर सकते। सुन लीजिए जो कार्य मनुष्य नहीं कर सकते वो कार्य क्योंकि

466
00:32:29,280 --> 00:32:34,480
ईश्वर कर रहा है इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। जबकि आपने कहा था कि वो

467
00:32:34,480 --> 00:32:38,480
जो जीव जो जीव है उनसे ज्यादा वो क्षमतावान

468
00:32:38,480 --> 00:32:42,800
है इसलिए यानी कि जो भी कार्य करने की जीव में शक्ति है मनुष्य में शक्ति

469
00:32:42,800 --> 00:32:47,360
है उससे ज्यादा क्षमता वही कार्य करने की ईश्वर में है।

470
00:32:47,360 --> 00:32:51,360
वही कार्य करने की नहीं। मैंने क्या कहा ना मुझे अपने कार्य

471
00:32:51,360 --> 00:32:55,360
करने के लिए मुझे अपने भाई साहब यह तो फिर यह वाली

472
00:32:55,360 --> 00:32:58,480
डेफिनेशन कट कर दो ना कि वो मनुष्य जो जीवो से

473
00:32:58,480 --> 00:33:02,640
ज्यादा शक्तिशाली है आप ये कहो कि जिसको कार्य करने के लिए सहायता

474
00:33:02,640 --> 00:33:06,640
ना लेनी पड़े वो सर्वशक्तिमान है हां

475
00:33:06,640 --> 00:33:10,640
हमसे ज्यादा शक्तिमान तो है ना वो हमसे तुलना करनी पड़ेगी ना उसकी

476
00:33:10,640 --> 00:33:14,640
क्यों नहीं करनी पड़ेगी हमसे तुलना तो वो आप तुलना बता दीजिए किस वो आप तुलना

477
00:33:14,640 --> 00:33:18,800
बता दीजिए किस आधार पर है किस आधार पे

478
00:33:18,800 --> 00:33:22,880
वो इसी आधार पर है ना मुझे अपने कार्य करने में जो मैं रोजमर्रा

479
00:33:22,880 --> 00:33:27,440
के कार्य करता हूं मैं मुझे सहायता लेनी पड़ती है प्रकृति की ऑक्सीजन

480
00:33:27,440 --> 00:33:31,840
की अपने इसका मतलब इसका मतलब ये है इसका मतलब

481
00:33:31,840 --> 00:33:36,000
इसका मतलब ये है समझ गया भाई साहब उसको लंबा क्यों

482
00:33:36,000 --> 00:33:40,160
खींचना है प्रवचन सुनने थोड़ी ना बैठे हैं मैं समझ गया आपकी बात

483
00:33:40,160 --> 00:33:44,240
है मैं कहा प्रवचन दे रहा हूं प्रवचन तो दे रहे हो आप बताओ

484
00:33:44,240 --> 00:33:48,320
कहां दे रहा हूं मैं समझ गया ना आपकी बात कि ईश्वर किसी से सहायता नहीं लेता हम लोग रोज

485
00:33:48,320 --> 00:33:52,480
सहायता लेते हैं। बस बस बस बस तो फिर उसमें

486
00:33:52,480 --> 00:33:57,280
नाम गिनाने की ऑब्जेक्ट्स गिनाने की क्या जरूरत है? तो

487
00:33:57,280 --> 00:34:01,440
यही कह रहा हूं। अब तुम घुमा फिरा के तो भाई उसको मैं समझना

488
00:34:01,440 --> 00:34:05,520
चाह रहा हूं। मैं आपने जो क्लेम किया है मैं उसको समझना चाह रहा हूं। आप समझने का प्रयास

489
00:34:05,520 --> 00:34:09,760
करिए। मैं समझना चाह रहा हूं। आपने जो समझाने का प्रयास किया है। ठीक है?

490
00:34:09,760 --> 00:34:13,520
अब उसका उत्तर दीजिए जो मैं पूछ रहा हूं। आपने जो ये वाली बात कही थी अभी इसको

491
00:34:13,520 --> 00:34:17,680
मैं छोड़ रहा हूं कि सर्व का अर्थ है कि जीवो

492
00:34:17,680 --> 00:34:21,760
से ज्यादा। अब सर्व का अर्थ आ गया है मेन कि जो किसी

493
00:34:21,760 --> 00:34:26,400
से सहायता नहीं लेता है। ज्यादा और कम वाली बात नहीं है।

494
00:34:26,400 --> 00:34:30,560
चलो ठीक है। है ना? हां। हम अब

495
00:34:30,560 --> 00:34:34,720
सहायता वाली बात है तो यह बताइए कि आपने कहा

496
00:34:34,720 --> 00:34:38,800
हम प्रकृति की सहायता लेते हैं। ऑक्सीजन वगैरह की सहायता लेते हैं। अच्छा एक आपके यहां से

497
00:34:38,800 --> 00:34:43,040
बात धर्म धर्म स्थापना करने के लिए आपके यहां क्या माना जाता है कि

498
00:34:43,040 --> 00:34:48,240
ईश्वर स्वयं आता है या किसी को भेजता है? क्या है? पुण्य आत्मा महात्मा

499
00:34:48,240 --> 00:34:52,400
पवित्र आत्माओं को भेजता है। तो यह सहायता

500
00:34:52,400 --> 00:34:56,480
नहीं है। किसकी सहायता? भाई धर्म स्थापना

501
00:34:56,480 --> 00:35:00,400
करनी है उसे। वो किसी को भेज रहा है।

502
00:35:00,400 --> 00:35:04,480
क्या किसकी ले रहा है? किसकी सहायता ले रहा है? पवित्र आत्मा

503
00:35:04,480 --> 00:35:08,560
की। क्यों लेता है? पवित्र आत्मा की सहायता वो आप ही तो कह

504
00:35:08,560 --> 00:35:12,800
रहे हो भेजता है। अरे तो भेज रहा है ना तो उसका कर्म

505
00:35:12,800 --> 00:35:16,800
है वो तो वो तो वही तो कार्य कर रहा है ना वो। भेजने में किसी की सहायता ली क्या

506
00:35:16,800 --> 00:35:20,880
उसने? अरे क्यों धर्म धर्म संस्थापना

507
00:35:20,880 --> 00:35:26,080
जो उसको धर्म संस्थापना उसको करनी है ना ईश्वर को। किसको करनी है?

508
00:35:26,080 --> 00:35:28,560
किसको करनी है? अरे यही

509
00:35:28,560 --> 00:35:32,560
तो कार्य है उसका प्रभु। धर्म संस्थापना करना उसका कार्य है

510
00:35:32,560 --> 00:35:36,560
ना? एक मिनट भाई साहब धर्म धर्म संस्थापना

511
00:35:36,560 --> 00:35:40,640
उसका कार्य है कि नहीं है? मैं पूछ रहा हूं। मैं क्या पूछ रहा हूं भाई साहब? क्लियर

512
00:35:40,640 --> 00:35:44,800
करिए। है ना? तो उसमें वो खुद नहीं कर रहा है। वो किसी पवित्र

513
00:35:44,800 --> 00:35:50,400
आत्मा को भेज रहा है। ये क्या है? अभी आपने

514
00:35:50,400 --> 00:35:54,160
जो आपने कहा ना अभी के

515
00:35:54,160 --> 00:35:58,240
वो किसी को भेज रहा है तो वही उसका कार्य है।

516
00:35:58,240 --> 00:36:02,240
उसे किसी किसी की पैगंबर की जरूरत नहीं पड़ रही बीच में कि मैं

517
00:36:02,240 --> 00:36:08,240
उसके पास मैसेज दूंगा तब वो किसी के पास मैसेज देगा।

518
00:36:08,880 --> 00:36:13,600
भाई साहब आपने कहा था वह किसी की सहायता नहीं लेता है। ठीक है?

519
00:36:13,600 --> 00:36:17,920
अब आप कह रहे हैं कि वो किसी को भेजता है धर्म संस्थापना करने के लिए क्योंकि धर्म संस्थापना

520
00:36:17,920 --> 00:36:21,920
उसका कार्य है फिर भी वो भेजता है। यानी किसी का

521
00:36:21,920 --> 00:36:26,800
आलंबन लेता है वो अपना कार्य करने का।

522
00:36:26,800 --> 00:36:30,880
या तो यह कह दो धर्म संस्थापना उसका कार्य नहीं है या तो यह

523
00:36:30,880 --> 00:36:34,880
कह दो और वह किसी को भेजता नहीं है। वो अपने

524
00:36:34,880 --> 00:36:38,880
से आते हैं अपना धर्म संस्थापना करते हैं। वो नहीं भेजता। नहीं

525
00:36:38,880 --> 00:36:42,880
देखिए मेरी बात मैं बताऊं आपको सृष्टि

526
00:36:42,880 --> 00:36:47,200
जो सृष्टि वो रचता है ईश्वर। तो वहां

527
00:36:47,200 --> 00:36:51,280
पर जो वेद का जो जो ज्ञान है जो वहां

528
00:36:51,280 --> 00:36:55,360
के अनुकूल उसको देना है तो उसको किस जीव को कहां

529
00:36:55,360 --> 00:36:59,360
पर व्यवस्थित करना है किस आत्मा को कहां भेजना है ये कार्य

530
00:36:59,360 --> 00:37:03,520
उसी का है तो ये कार्य वो करेगा और ये कार्य भाई साहब

531
00:37:03,520 --> 00:37:07,520
मैं मैं क्या कह रहा हूं भाई साहब मैं क्या कह रहा हूं भाई साहब मैं क्या कह

532
00:37:07,520 --> 00:37:11,840
रहा हूं आप ये बताइए उसका धर्म संस्थापना कार्य है कि नहीं

533
00:37:11,840 --> 00:37:16,240
अरे भाई साहब एक राजा है ना उसको को किस मंत्री

534
00:37:16,240 --> 00:37:20,400
को कहां पर व्यवस्थित करना है? कौन से उसमें उसको

535
00:37:20,400 --> 00:37:24,080
मैंने क्या पूछा भाई साहब? धर्म स्थापना उसका कार्य है कि नहीं?

536
00:37:24,080 --> 00:37:28,080
सरल सा क्वेश्चन है। आप उसका जवाब दीजिए। पता नहीं आप क्या बता रहे हैं कि वो

537
00:37:28,080 --> 00:37:32,560
मंत्री है ये क्यों बता रहे हैं? आप मुझे सरल साब मेरे मैंने सरल एक क्वेश्चन

538
00:37:32,560 --> 00:37:38,000
क्या ईश्वर का कार्य है धर्म संस्थापना करना या नहीं है।

539
00:37:38,000 --> 00:37:42,000
है तो उसके लिए पवित्र आत्मा को भेजता है

540
00:37:42,000 --> 00:37:46,080
ना। खुद नहीं कर रहा है ना? अरे खुद ही तो कर रहा

541
00:37:46,080 --> 00:37:50,480
है। यह कार्य उसके द्वारा तो करवाया ना उसने।

542
00:37:50,480 --> 00:37:54,560
तो यानी कि जो भी हम किसी से मदद ले रहे हैं तो हम कह सकते हैं

543
00:37:54,560 --> 00:37:59,040
उसके द्वारा हम ही ने तो किया

544
00:37:59,040 --> 00:38:03,040
जो उसने उसका काम क्या है? धर्म संस्था

545
00:38:03,040 --> 00:38:07,200
धर्म का प्रचार धर्म को मनुष्य तक जीव तक पहुंचाना उसका

546
00:38:07,200 --> 00:38:11,760
कार्य है। ठीक है? और वही वो कर रहा है

547
00:38:11,760 --> 00:38:16,080
जीवों तक कर रहा है। उसको जिस जो पवित्र आत्मा

548
00:38:16,080 --> 00:38:20,080
है नहीं वो देखिए जीव कर रहा है या वो कर रहा है कौन कर रहा

549
00:38:20,080 --> 00:38:24,080
है? यहां पर आकर के काम कर रहा है ना कोई उसका ईश्वर ही कर रहा

550
00:38:24,080 --> 00:38:28,240
है। निमित्त ईश्वर ही है। निमित्त ईश्वर

551
00:38:28,240 --> 00:38:32,640
ही है। ऐसे तो जीव भी कोई काम कर रहा है। यहां पे हम जो

552
00:38:32,640 --> 00:38:36,720
सहायता ले रहे हैं किसी से उन सब में ईश्वर ही है। फिर ईश्वर ही सारे काम कर रहा है। ऐसे

553
00:38:36,720 --> 00:38:41,840
तो जीव कुछ कर ही नहीं रहा है। फिर कुछ करता भी है जीव कि नहीं?

554
00:38:41,840 --> 00:38:46,960
जीव करता है ना? क्यों नहीं करता? क्या करता है?

555
00:38:46,960 --> 00:38:51,040
भाई हमारी हम जो कार्य कर रहे हैं जब वह पवित्र आत्मा के

556
00:38:51,040 --> 00:38:55,040
रूप में आकर धर्म संस्थापना कर रहा है तो हम कह रहे हैं वो निमित्त क्योंकि ईश्वर है

557
00:38:55,040 --> 00:38:59,360
तो ईश्वर का ही माना जाएगा तो ऐसे तो फिर मैंने बोतल उठाई तो ये ईश्वर नहीं उठाई

558
00:38:59,360 --> 00:39:03,760
सब कुछ ईश्वर ही कर रहा है फिर तो कोई काम कर ही नहीं रहे हम लोग

559
00:39:03,760 --> 00:39:08,080
तो फिर ये वाली बात खत्म हो गई कि वो किसी की सहायता नहीं लेता भैया सबका निमित्त

560
00:39:08,080 --> 00:39:12,160
ईश्वर है तो सब कुछ ईश्वर ही से हो रहा है इसमें सहायता लेने की कोई बात ही नहीं है कर

561
00:39:12,160 --> 00:39:18,160
ही ईश्वर रहा है हर काम

562
00:39:19,440 --> 00:39:23,440
अच्छा दूसरी बात एक आप वो जो ईश्वर के चार

563
00:39:23,440 --> 00:39:28,720
कार्य हैं वो क्या बताए थे आपने?

564
00:39:28,720 --> 00:39:33,520
सृष्टि की उत्पत्ति करना। सृष्टि का पालन करना

565
00:39:33,520 --> 00:39:38,400
और फिर उसका नष्ट कर देना। अच्छा।

566
00:39:38,400 --> 00:39:42,400
तो जैसे अभी हमने थोड़ी देर पहले आपने कहा था कि मैं प्रकृति की सहायता लेता

567
00:39:42,400 --> 00:39:46,960
हूं तो सृष्टि की उत्पत्ति करने में प्रकृति की सहायता लेता है क्या

568
00:39:46,960 --> 00:39:52,160
ईश्वर या नहीं या अपने से ही करता है

569
00:39:52,160 --> 00:39:56,160
मैंने कहा साधन संसाधन की आवश्यकता जैसे हमें

570
00:39:56,160 --> 00:40:00,400
हथौड़े हथोड़े की जरूरत पड़ती है ना कुछ कार्य करने के लिए पेचकस

571
00:40:00,400 --> 00:40:04,960
जरूरत पड़ती है ना वो किसी पेचकस की या किसी

572
00:40:04,960 --> 00:40:09,120
औजार की आवश्यकता भाई साहब वहां पे ये पेचकस वगैरह होता क्या जब वो सृष्टि रचना

573
00:40:09,120 --> 00:40:13,200
वाली बात आ रही है वहां पेचकस होता है क्या अरे भाई साहब हम वहां

574
00:40:13,200 --> 00:40:19,200
पे क्या होता है वहां पे ईश्वर के अलावा क्या होता है

575
00:40:19,280 --> 00:40:24,640
ईश्वर के अलावा वो जो दुनिया है उसमें क्या है पेचकस भी है वहां पेचकस

576
00:40:24,640 --> 00:40:28,800
वगैरह है मूल प्रकृति है वो प्रकृति है

577
00:40:28,800 --> 00:40:32,880
मतलब है ही एक तत्व अब यह बताइए उसका आलंबन लिए

578
00:40:32,880 --> 00:40:36,960
बिना वो सृष्टि रच देता है या वह जो तत्व है उसका आलंबन लेता

579
00:40:36,960 --> 00:40:41,600
है

580
00:40:41,600 --> 00:40:45,840
मैंने यह कहा कि वह किसी की साधन संसाधन

581
00:40:45,840 --> 00:40:50,640
की आवश्यकता नहीं लेता। अब वो प्रकृति से ही तो बनाएगा ना।

582
00:40:50,640 --> 00:40:54,640
भाई साहब मैंने क्या पूछा है कि वहां पर साधन संसाधन होते हैं

583
00:40:54,640 --> 00:40:58,800
क्या? नहीं होते। तो इसका मतलब

584
00:40:58,800 --> 00:41:03,120
साधन जो चीजें वहां है ही नहीं उसकी वो सहायता कहां लेगा? वहां तो प्रकृति

585
00:41:03,120 --> 00:41:07,440
है और आप कह रहे हो वो किसी की सहायता नहीं लेगा। मगर प्रकृति है उसकी सहायता ले रहा है। संसार

586
00:41:07,440 --> 00:41:10,800
बनाने के लिए

587
00:41:10,800 --> 00:41:16,800
जीव को उसमें भेज रहा है। जीव को धर्म संस्थापना के लिए भेज रहा है।

588
00:41:19,440 --> 00:41:21,680
हम

589
00:41:21,680 --> 00:41:26,560
चलिए हो गया ये इतना देख लिया। अच्छा मुझे एक बात बताइए

590
00:41:26,560 --> 00:41:30,720
कि ये अच्छा चलो आपने इतने

591
00:41:30,720 --> 00:41:34,800
प्रश्न लिए थोड़ा प्रश्न मैं कर लूं आपसे। अब भाई अब

592
00:41:34,800 --> 00:41:39,200
अब जो मेरे उसमें आ गया वो मैं कर लेता हूं फिर कर लेना आप अब आ गया

593
00:41:39,200 --> 00:41:43,280
और बहुत रिलेटेबल है ये बताइए ये

594
00:41:43,280 --> 00:41:47,360
जो ईश्वर है वो

595
00:41:47,360 --> 00:41:51,520
एक रस है कि नहीं एक रस एक रस है

596
00:41:51,520 --> 00:41:56,080
एक रस मतलब सब जगह बिल्कुल बराबर समान

597
00:41:56,080 --> 00:42:02,000
बराबर समान कोई कम ज्यादा बिल्कुल नहीं ना है ना हम

598
00:42:02,000 --> 00:42:06,000
तो जरा थोड़ा सा बताइए सृष्टि कैसे बनाता है वो थोड़ा सा

599
00:42:06,000 --> 00:42:10,480
बताएंगे इस बारे में सृष्टि कैसे बनाता है मतलब पहले

600
00:42:10,480 --> 00:42:14,560
सब जगह खाली स्पेस है प्रकृति निराकार रूप में होती है

601
00:42:14,560 --> 00:42:18,800
फिर निराकार से वो साकार होती है मिट्टी के कण वगैरह इत्यादि

602
00:42:18,800 --> 00:42:22,960
के रूप में वो जो पांच तत्व है उनके रूप में कैसे साकार सृष्टि

603
00:42:22,960 --> 00:42:25,840
कैसे बनती है पहले निराकार होती है प्रकृति भी

604
00:42:25,840 --> 00:42:30,000
निराकार होती है या वो यह मिट्टी वगैरह पहले

605
00:42:30,000 --> 00:42:33,040
से ही होती है हमेशा।

606
00:42:33,040 --> 00:42:37,440
तीन चीजें अलग-अलग है। मूल प्रकृति, जीवात्मा

607
00:42:37,440 --> 00:42:43,040
और ईश्वर। ये तीनों चीजें अलग-अलग है। ठीक?

608
00:42:43,040 --> 00:42:47,520
मूल प्रकृति जैसे भाप होती है। इस तरह समझ लीजिए।

609
00:42:47,520 --> 00:42:51,840
फिर उसमें कंपन करके उसके अणुओं को जोड़ के

610
00:42:51,840 --> 00:42:55,920
तब वो मतलब जो जो प्रकृति है वह

611
00:42:55,920 --> 00:43:00,480
ये जो कण वगैरह तैर रहे होते हैं ना उसमें आकाश इसमें वायुमंडल

612
00:43:00,480 --> 00:43:04,560
में हां क्या हां हां मतलब जो

613
00:43:04,560 --> 00:43:08,800
प्रकृति मिलती है वो

614
00:43:08,800 --> 00:43:12,800
इसमें ना तो अग्नि है ना वायु है ना आकाश है तो

615
00:43:12,800 --> 00:43:17,760
मिट्टी भी नहीं है मिट्टी भी नहीं केवल स्पेस

616
00:43:17,760 --> 00:43:21,840
हां स्पेस है। है ना? हां बिल्कुल यही

617
00:43:21,840 --> 00:43:24,640
प्रकृति है ना?

618
00:43:24,640 --> 00:43:28,720
अच्छा तो फिर ईश्वर भी

619
00:43:28,720 --> 00:43:32,800
प्रकृति के साथसाथ है वही वहीं पर जहांजहां स्पेस

620
00:43:32,800 --> 00:43:37,200
है जो पूरा ईश्वर भी है। तो फिर क्या होता है? फिर कैसे निकलता है? पहला अणु

621
00:43:37,200 --> 00:43:41,920
क्या होता है? जो प्रकट होता है।

622
00:43:41,920 --> 00:43:46,080
प्रकट नहीं होता है। उन को जोड़ के प्रकृति का नहीं नहीं

623
00:43:46,080 --> 00:43:50,160
अभी तो स्पेस है ना अणु है ही नहीं ना कोई भी है

624
00:43:50,160 --> 00:43:54,560
ना अु है जो हमें दिखाई नहीं देते अपनी आंखों से

625
00:43:54,560 --> 00:43:58,560
बहुत मतलब प्रकृति निराकार रूप में नहीं है मतलब प्रकृति स्पेस

626
00:43:58,560 --> 00:44:02,560
जो है वो तो निराकार है मगर उसमें अणु भी तैर रहे हैं जो साकार है इतना

627
00:44:02,560 --> 00:44:06,800
ईश्वर निराकार है प्रकृति साकार है अच्छा

628
00:44:06,800 --> 00:44:10,960
ये जो मटेरियल है ये होता है पहले से अवेलेबल हां ये पहले से

629
00:44:10,960 --> 00:44:14,960
होता है ये मिट्टी के कण बहुत बहुत माइक्रो लेवल हां

630
00:44:14,960 --> 00:44:19,680
इसका मटेरियल होता है। इसी से वो प्रकृति की रचना करता है।

631
00:44:19,680 --> 00:44:23,760
अच्छा पंच तत्वों की सूक्ष्म शरीर की मतलब

632
00:44:23,760 --> 00:44:24,260
ये

633
00:44:24,000 --> 00:44:28,720
मटेरियल जो होता है मटेरियल जो होता है वो

634
00:44:28,720 --> 00:44:32,880
क्या कहते हैं ये

635
00:44:32,880 --> 00:44:36,880
जो मटेरियल होता है वो ऐसे तैर रहा होता है। इतने माइक्रो लेवल पे होता है

636
00:44:36,880 --> 00:44:41,120
कि हमें दिखता नहीं मगर वो होता है। हां है ना?

637
00:44:41,120 --> 00:44:45,360
अच्छा और बाकी स्पेस तो है ही है स्पेस में वो स्पेस

638
00:44:45,360 --> 00:44:49,440
के साथ साथ जो है ईश्वर भी है और वह जो मटेरियल है उसमें भी ईश्वर है।

639
00:44:49,440 --> 00:44:53,760
वो जो मटेरियल छोटे-छोटे कण है जो ईश्वर उसमें भी व्याप्त है। हां

640
00:44:53,760 --> 00:44:59,040
ठीक है। अब एक चीज मैं ये कह रहा था कि

641
00:44:59,040 --> 00:45:01,280
जैसे

642
00:45:01,280 --> 00:45:04,480
अ

643
00:45:04,480 --> 00:45:08,720
जब ईश्वर जैसे सूर्य बना रहा है। जैसे

644
00:45:08,720 --> 00:45:12,880
कि मैं इस टेबल पे कई सारी बड़ी-छोटी चीजें रखी

645
00:45:12,880 --> 00:45:17,040
हुई हैं। तो क्योंकि मेरे पास कहीं पे मैं ज्यादा हूं और कहीं

646
00:45:17,040 --> 00:45:22,640
पे कम हूं। तो इसलिए मैं चाहूंगा तो

647
00:45:22,640 --> 00:45:26,640
बड़े डब्बे को नीचे गिरा दूं। मैं चाहूंगा तो छोटे डब्बे को। क्योंकि

648
00:45:26,640 --> 00:45:30,640
मैं तय कर सकता हूं कि कहां पे मेरी कितनी पावर लगे और मैं चाहूंगा

649
00:45:30,640 --> 00:45:34,720
तो गिराऊं भी नहीं। है ना? सही

650
00:45:34,720 --> 00:45:38,720
कह रहा हूं ना। कम ज्यादा कम ज्यादा क्योंकि मैं एक रस नहीं

651
00:45:38,720 --> 00:45:42,720
हूं। मेरा कहीं पे सर है और कहीं पे हाथ

652
00:45:42,720 --> 00:45:46,960
है। मैं एक रस नहीं हूं। है ना? अच्छा शरीर की बात कर रहे हो क्या?

653
00:45:46,960 --> 00:45:51,120
हां। अपनी शरीर मनुष्य शरीर मनुष्य

654
00:45:51,120 --> 00:45:55,200
शरीर की बात कर रहे हो। हां जी। हां जी। तो मैं एक

655
00:45:55,200 --> 00:45:59,200
रस नहीं हूं। इसलिए मैं इस टेबल पे ये तय कर सकता हूं कि

656
00:45:59,200 --> 00:46:03,360
कहां पर मेरी फोर्स कितनी

657
00:46:03,360 --> 00:46:08,400
लगे और कितनी ना लगे। ठीक है?

658
00:46:08,400 --> 00:46:12,400
अच्छा अब ईश्वर तो एक रस है।

659
00:46:12,400 --> 00:46:16,400
ठीक है? ईश्वर तो एक रस है। तो वो जब

660
00:46:16,400 --> 00:46:19,920
भी कहीं पर फोर्स लगाएगा तो एक समान फोर्स लगेगी।

661
00:46:19,920 --> 00:46:24,080
क्योंकि फोर्स के रूप में भी ईश्वर ही है। तो फोर्स तो कम

662
00:46:24,080 --> 00:46:28,080
ज्यादा हो नहीं सकती। तो फिर कहीं पर सूर्य कहीं पर चंद्रमा ये सब कैसे

663
00:46:28,080 --> 00:46:31,040
बनेगा फिर

664
00:46:31,040 --> 00:46:35,200
इच्छा से बनेगा ना नहीं इच्छा से नहीं वो उसमें काम करता

665
00:46:35,200 --> 00:46:40,080
है ना शक्ति के रूप में काम करता है केवल सोचता है और हो जाता है

666
00:46:40,080 --> 00:46:44,240
जहां उसको कार्य सोचता नहीं है जहां उसको जैसा

667
00:46:44,240 --> 00:46:48,320
उसको व्यवस्थित करना होगा वो वहां उसको व्यवस्थित करेगा नहीं नहीं

668
00:46:48,320 --> 00:46:53,440
ये नहीं पूछ रहा भाई जैसे एक

669
00:46:53,440 --> 00:46:57,520
एक बोतल है ठीक है तो क्या इसको ईश्वर

670
00:46:57,520 --> 00:47:01,600
का जैसे मट्टी का कण है उसको इकट्ठा करता है ईश्वर मट्टी कण को इकट्ठा कर

671
00:47:01,600 --> 00:47:06,320
रहा है और पृथ्वी बना रहा है तो मट्टी कण जब उसने इकट्ठा किए

672
00:47:06,320 --> 00:47:12,320
तो उसने ताकत वहां पर मट्टी कण को धक्का दिया

673
00:47:12,640 --> 00:47:16,640
ना धक्का जिस कारण से कई सारे मिट्टी के कण एक

674
00:47:16,640 --> 00:47:20,880
साथ होकर के एक दिन पृथ्वी जैसा कुछ बना

675
00:47:20,880 --> 00:47:25,200
धक्का दिया ना ईश्वर ने ठीक है तो ये ये जो धक्का

676
00:47:25,200 --> 00:47:29,200
ईश्वर ने दिया जहां पर पृथ्वी बनाई वहां पे कम है जहां सूर्य

677
00:47:29,200 --> 00:47:35,040
बनाया वहां ज्यादा है और कहीं पर नहीं भी दिया

678
00:47:35,040 --> 00:47:37,600
है ना

679
00:47:37,600 --> 00:47:41,760
तो ईश्वर जब एक रस है तो ये कम ज्यादा कैसे हो

680
00:47:41,760 --> 00:47:45,760
रहा है एक रस के होने का मतलब ये थोड़ी ना है कि वो कहीं

681
00:47:45,760 --> 00:47:49,920
पर भी कुछ भी कर देगा या सबको एक साथ इकट्ठा कर देगा अनंत अनंत

682
00:47:49,920 --> 00:47:54,080
ब्रह्मांड है अनंत गैलेक्सियां है अनंत पृथ्वीयां है उसको उस हिसाब

683
00:47:54,080 --> 00:47:58,160
व्यवस्थित करना होता है ना उसको कि उसको कहां पर क्या मैं ये

684
00:47:58,160 --> 00:48:02,400
पूछ रहा हूं भाई साहब मैं ये नहीं कह रहा एक रस तो वो करे ही करे रस का मतलब

685
00:48:02,400 --> 00:48:06,800
ये है कि वहां हर जगह बराबर है तो बराबर

686
00:48:06,800 --> 00:48:10,880
है ना तो फिर ये शक्ति कम ज्यादा कैसे हो रही है कहीं पे पहाड़

687
00:48:10,880 --> 00:48:16,880
बन रहा है सुनिए कहीं पे पहाड़ बन रहा है कहीं पे नहीं बन रहा

688
00:48:17,200 --> 00:48:21,200
वो उसकी व्यवस्था है वो वो अपनी वो व्यवस्था मैं समझना

689
00:48:21,200 --> 00:48:25,280
चाह रहा हूं ना भाई साहब इसको इसको जो धक्का धक्का लग रहा है। सुनिए

690
00:48:25,280 --> 00:48:27,920
इसको जो धक्का लग रहा है वह ज्यादा

691
00:48:27,920 --> 00:48:32,000
लग रहा है। इसको जो धक्का लग रहा है वह कम लगेगा। और अगर

692
00:48:32,000 --> 00:48:36,160
वो एक समान धक्का लगाएगा तो ये अपनीप जो उसकी सुनिश्चितता होगी

693
00:48:36,160 --> 00:48:40,240
वो बदल जाएगी। तो वो जो फोर्स है वो फोर्स

694
00:48:40,240 --> 00:48:44,640
के रूप में कोई अलग से तो फोर्स है नहीं। फोर्स के रूप में तो ईश्वर स्वयं

695
00:48:44,640 --> 00:48:48,640
है। तो यहां पर ईश्वर कम ज्यादा हो रहा है। जबकि हम

696
00:48:48,640 --> 00:48:52,560
कह रहे हैं कि ईश्वर एक समान है। ये कैसे?

697
00:48:52,560 --> 00:48:55,680
एक समान का

698
00:48:55,680 --> 00:48:59,760
उस जो आप कह रहे हो ना वह अपने आप में एक समान है।

699
00:48:59,760 --> 00:49:03,840
ठीक है? लेकिन वो जो जो वो कर रहा है ना वो

700
00:49:03,840 --> 00:49:08,160
अपने हिसाब से व्यवस्थित कर रहा है उसको। अरे मेरे बच्चे मैंने

701
00:49:08,160 --> 00:49:12,960
क्या पूछा है कि ईश्वर कुछ भी करेगा दुनिया में। जैसे मैं हूं।

702
00:49:12,960 --> 00:49:16,960
मैं अगर एक समान हूं। अगर मैं अपने पर कंट्रोल नहीं कर

703
00:49:16,960 --> 00:49:21,200
सकता कि मुझे कहां ज्यादा कहां कम होना है तो जब मैं हिलूंगा

704
00:49:21,200 --> 00:49:25,360
जब मैं इस टेबल पर धक्का लगाऊंगा अपना सारी बोतलें गिर जाएंगी

705
00:49:25,360 --> 00:49:30,640
क्योंकि मैं अपने आप को रेगुलेट नहीं कर सकता हूं।

706
00:49:30,640 --> 00:49:34,640
मैं अपने आप को रेगुलेट नहीं कर सकता हूं कि मैं कहां पे ज्यादा काम

707
00:49:34,640 --> 00:49:39,280
करूं, कहां पे कम काम करूं और कहां पे ना करूं।

708
00:49:39,280 --> 00:49:43,920
तो मैं जब भी हरकत करूंगा वो एक साथ पूरी हरकत होगी।

709
00:49:43,920 --> 00:49:48,000
जबकि ईश्वर कहीं पर बड़ा ग्रह बना रहा है, कहीं पर छोटा ग्रह

710
00:49:48,000 --> 00:49:52,080
बना रहा है, कहीं पर नहीं भी बना रहा है। तो इसका

711
00:49:52,080 --> 00:49:56,160
मतलब इसका मतलब वो अपने आप को रेगुलेट कर पा रहा

712
00:49:56,160 --> 00:50:00,240
है। यानी कि वो अपने आप को कम ज्यादा कर पा रहा है। अन्यथा क्या

713
00:50:00,240 --> 00:50:05,600
होगा? जब भी वो हिलेगा जब भी वो हिलेगा तो दुनिया में हर जगह हिलेगा।

714
00:50:05,600 --> 00:50:09,840
जब भी उसकी फोर्स लगेगी एक मिनट। जब भी उसकी फोर्स लगेगी तो

715
00:50:09,840 --> 00:50:14,320
दुनिया में हर जगह उसकी फोर्स लगेगी। और

716
00:50:14,320 --> 00:50:18,400
जब उसकी फोर्स हर जगह लगेगी तो कोई क्रिएशन कैसे होगी? क्योंकि क्रिएशन

717
00:50:18,400 --> 00:50:22,560
तो वही होगी ना कोई ज्यादा कोई कम, कोई ऊंचा, कोई नीचा। हां।

718
00:50:22,560 --> 00:50:26,800
मैं आपकी बात समझ गया। देखिए ईश्वर क्या है?

719
00:50:26,800 --> 00:50:31,040
कणों जो कण होता है ना जो परमाणु होता है वो उसके

720
00:50:31,040 --> 00:50:35,280
अंदर से फोर्स लगाता है। ठीक है? और जो जो जीव

721
00:50:35,280 --> 00:50:39,280
है वो बाहरी फोर्स लगाता है। तो जो आप कह रहे हो ना हिलने के लिए

722
00:50:39,280 --> 00:50:43,280
वो जो है वो आकार वाली वस्तु क्योंकि हम साकार है हम

723
00:50:43,280 --> 00:50:47,440
हिलेंगे उसके हिलने का कोई वो नहीं है क्योंकि वो तो हर जगह है उसका

724
00:50:47,440 --> 00:50:51,520
हिलने का मैं अंदर से नहीं कह रहा मैं कह रहा हूं फोर्स तो कम ज्यादा

725
00:50:51,520 --> 00:50:56,400
हो रही है ना मैं परमाणु के अंदर से फोर्स कह रहा हूं

726
00:50:56,400 --> 00:50:59,040
तो अंदर ज्यादा होगी ना वो जिस परमाणु

727
00:50:59,040 --> 00:51:03,120
को इकट्ठा करना चाहे जहां पर मैं यह कह रहा हूं भाई साहब

728
00:51:03,120 --> 00:51:07,200
अच्छा वो अच्छा ठीक है ठीक है वो जिस परमाणु को इकटठा करना चाहेगा

729
00:51:07,200 --> 00:51:11,600
वो होगा जिसको नहीं चाहेगा वो नहीं होगा ठीक यानी कि कई

730
00:51:11,600 --> 00:51:15,760
कुछ परमाणुओं में वो एक्टिव हो सकता है और कुछ परमाणुओं में वो नहीं हो

731
00:51:15,760 --> 00:51:19,920
सकता है फोर्स के रूप में आवश्यकता नहीं है वो क्यों लेगा उसे

732
00:51:19,920 --> 00:51:24,160
हां हां तो इसका मतलब इसका मतलब अगर वो एक परमाणु में

733
00:51:24,160 --> 00:51:28,320
अगर वो एक परमाणु में उसकी शक्ति सक्रिय हो रही है

734
00:51:28,320 --> 00:51:34,320
उसको इकट्ठा करने वाली तो दूसरे परमाणु में नहीं भी हो

735
00:51:34,320 --> 00:51:38,560
शक्ति उसकी सभी जगह है। ठीक है? अरे मेरे भाई

736
00:51:38,560 --> 00:51:42,960
जहां पर उसको व्यवस्थित करना है। वो किसको व्यवस्थित करना है? किसको नहीं करना है।

737
00:51:42,960 --> 00:51:47,120
ये तो आप दावा कर रहे हो। मैं उस दावे पे क्वेश्चन कर रहा हूं।

738
00:51:47,120 --> 00:51:51,680
खोल के पूछ रहा हूं उसको। जब वो परमाणु के अंदर है। ठीक?

739
00:51:51,680 --> 00:51:55,680
और दूसरे परमाणु के अंदर भी है। अब जब वो परमाणु के

740
00:51:55,680 --> 00:51:59,760
अंदर से धक्का देना स्टार्ट कर रहा है तो यहां पे तो दे रहा है और देने देने

741
00:51:59,760 --> 00:52:03,840
के रूप में जो धक्का है। आप जो ले रहे हो ना वो साकार

742
00:52:03,840 --> 00:52:08,080
उसमें ले रहे हो लेकिन ईश्वर निराकार है वो हर उससे

743
00:52:08,080 --> 00:52:12,240
क्या मतलब भाई साहब मैं धक्के को साकार कह रहा हूं क्या हां

744
00:52:12,240 --> 00:52:14,320
धक्के को साकार कह रहा हूं धक्का साकार

745
00:52:14,320 --> 00:52:18,560
ही लगाएगा ना धक्का धक्का साकार लगता है

746
00:52:18,560 --> 00:52:22,640
और क्या धक्का साकार होता है ईश्वर का ईश्वर

747
00:52:22,640 --> 00:52:26,960
का धक्का साकार होता है चलिए आप

748
00:52:26,960 --> 00:52:31,280
मेरी बात सुनिए आप क्या साबित करना चाह रहे हैं कि ईश्वर साकार है नहीं

749
00:52:31,280 --> 00:52:35,360
अभी मैं यह साबित करना चाह रहा हूं कि ईश्वर जब निर्गुण

750
00:52:35,360 --> 00:52:39,440
निराकार एक रस वाला है तो फिर वह सगुण निराकार

751
00:52:39,440 --> 00:52:43,440
कैसे हो रहा है? वो ऐसे हो रहा है कि ईश्वर

752
00:52:43,440 --> 00:52:47,440
अवतार लेता है। ईश्वर निर्गुण निराकार होते हुए

753
00:52:47,440 --> 00:52:51,520
भी ईश्वर सगुण निराकार का अवतार लेता है। तब यह पॉसिबल

754
00:52:51,520 --> 00:52:55,680
हो सकता है कि दुनिया बन सकेगी। मुझे बताइए तो सनातन

755
00:52:55,680 --> 00:52:59,680
का अर्थ समझते हैं ना आप हम है नहीं

756
00:52:59,680 --> 00:53:03,840
अगर ईश्वर यहां पर ईश्वर यहां पर आएगा एक छोटी

757
00:53:03,840 --> 00:53:07,840
सी पृथ्वी पर आएगा तो वो एक देसी हो जाएगा बाकी

758
00:53:07,840 --> 00:53:12,000
की जो व्यवस्था अनंत ब्रह्मांड की व्यवस्था है वो कौन संभालेगा उस वक्त

759
00:53:12,000 --> 00:53:16,320
भाई साहब अभी जो हमारा टॉपिक है ना वो पहले मैं एक बार क्लियर कर दूं फिर

760
00:53:16,320 --> 00:53:20,400
नहीं इसका उत्तर दे रहा हूं जो बात चल रही थी उसको एंड कर दूं जैसे पिछली सारी

761
00:53:20,400 --> 00:53:24,560
बातों का एंड किया है वैसे कर दूं वो कर रहा हूं ठीक है। तो ईश्वर जब

762
00:53:24,560 --> 00:53:28,960
निर्गुण निराकार है तो निर्गुण निराकार स्वरूप से सृष्टि

763
00:53:28,960 --> 00:53:29,460
की रचना

764
00:53:29,360 --> 00:53:33,360
पॉसिबल हो ही नहीं सकती। वो अवतार लेता है। सगुण निराकार के

765
00:53:33,360 --> 00:53:37,360
रूप में अवतार लेता है। और अब सगुण निराकार होने के रूप में वो ये कंट्रोल

766
00:53:37,360 --> 00:53:41,440
करने वाला है कि वो कहां पर कम हो, कहां ज्यादा हो, कहां नहीं

767
00:53:41,440 --> 00:53:45,440
हो। कहां नहीं हो का मतलब है मगर एक्टिव नहीं है। फोर्स

768
00:53:45,440 --> 00:53:49,440
के रूप में एक्टिव नहीं है। है तो निर्गुण निराकार के रूप में सब जगह। मगर फोर्स के

769
00:53:49,440 --> 00:53:53,760
रूप में एक्टिव नहीं है। क्योंकि अगर निर्गुण ही अपने आप को रेगुलेट

770
00:53:53,760 --> 00:53:57,760
एक मिनट भाई साहब मैं खत्म कर रहा हूं। अगर निर्गुण ही अपने आप को रेगुलेट

771
00:53:57,760 --> 00:54:01,840
करेगा तो भगवान में शाश्वतता भंग का दोष आ

772
00:54:01,840 --> 00:54:05,920
जाएगा। वो नित्य नहीं रह गया। बदल रहा है परिवर्तनशील हो गया। है

773
00:54:05,920 --> 00:54:10,320
ना? तो भगवान निर्गुण निराकार एक रस नित्य वो तो हैं।

774
00:54:10,320 --> 00:54:14,400
अब उन्होंने एक और अवतार लिया। अब वो सगुण निराकार हो गए और अब वो किसी

775
00:54:14,400 --> 00:54:18,400
के धक्के का विषय बन रहे हैं या आपके अनुसार परमाणु के अंदर से

776
00:54:18,400 --> 00:54:22,480
ही धक्का लग रहा है नहीं लग रहा है वो उनके ऊपर है कहां पे वो एक्टिव हो कहां पे ना

777
00:54:22,480 --> 00:54:26,560
हो ये है सगुण निराकार ठीक है

778
00:54:26,560 --> 00:54:30,640
ये हो गया सगुण निराकार अब जो है अच्छा

779
00:54:30,640 --> 00:54:35,680
ये भी एक बात है सगुण निराकार से ही एक देश वाली बात कट जाएगी

780
00:54:35,680 --> 00:54:39,760
कि जब ईश्वर सब जगह है तो ऐसा

781
00:54:39,760 --> 00:54:43,920
कैसे कर पा रहा है कि वह किसी के लिए धक्के का विषय बने और

782
00:54:43,920 --> 00:54:44,420
किसी के

783
00:54:44,400 --> 00:54:48,720
लिए ना बने। ये धक्का एक देसी है ना कि सर्व्यापक

784
00:54:48,720 --> 00:54:52,880
धक्का है। धक्का तो एक ही देसी है।

785
00:54:52,880 --> 00:54:57,120
एक देश है। यानी कि कहीं पर वो वो है सब जगह।

786
00:54:57,120 --> 00:55:01,280
फिर भी वो ऐसा कर सकता है कि कहीं पर धक्के का विषय बने और कहीं

787
00:55:01,280 --> 00:55:05,520
पे ना बने। कार्य तो कर रहा है ना प्रकृति में। अरे

788
00:55:05,520 --> 00:55:10,080
भाई साहब मैंने मैंने क्या पूछा भाई साहब? मैंने यह पूछा है कि वह सर्वव्यापक

789
00:55:10,080 --> 00:55:14,160
है, फिर भी वह किसी अणु के धक्के का विषय है और किसी

790
00:55:14,160 --> 00:55:18,320
अणु के धक्के का विषय नहीं है। सर्व्यापक होते हुए भी

791
00:55:18,320 --> 00:55:22,960
वो इस बात को रेगुलेट कर सकता है कि कहां पर मुझे

792
00:55:22,960 --> 00:55:27,120
धक्के का विषय बनना है और कहां नहीं बनना है। ठीक? अब जो

793
00:55:27,120 --> 00:55:31,520
धक्के की बात होती है तो सीधी सी बात है कि जो भौतिक

794
00:55:31,520 --> 00:55:35,760
तत्व है प्रकृति तत्व है आंशिक रूप से

795
00:55:35,760 --> 00:55:39,760
वो यह चयन कर रहा है कि मैं इसकी बाधा बन जाऊं अगर इधर

796
00:55:39,760 --> 00:55:43,920
तैर रहा है तो ये मेरी मेरी जो

797
00:55:43,920 --> 00:55:48,480
इच्छा है उसके विपरीत तैरे नहीं मेरे उद्देश्य के विपरीत तैरे नहीं

798
00:55:48,480 --> 00:55:52,480
जैसे अगर यह पृथ्वी का गण है तो यह इधर नहीं जा सकता क्योंकि यहां

799
00:55:52,480 --> 00:55:56,560
पर ईश्वर अपना धक्का लगा रहा है धक्के को पार नहीं कर सकता कि पार करके चला चला जाए।

800
00:55:56,560 --> 00:55:59,520
ईश्वर के पीछे पीछे पीछे पीछे ईश्वर के धक्के के पीछे

801
00:55:59,520 --> 00:56:03,680
पीछे इसको जाना पड़ेगा। और अगर ईश्वर यह चाहता है कि इसको इधर ले जाना है

802
00:56:03,680 --> 00:56:08,000
तो यह इधर ले जाएगा। यह जो कण है वो इसको पार नहीं कर सकता।

803
00:56:08,000 --> 00:56:12,160
यानी कि उसको जो धक्का लग रहा है कण को पृथ्वी

804
00:56:12,160 --> 00:56:16,480
को वो ठोस धक्का है। उसको पार नहीं कर सकती पृथ्वी।

805
00:56:16,480 --> 00:56:19,520
कर सकती है क्या?

806
00:56:19,520 --> 00:56:23,600
उसके विपरीत गमन कर सकती है। ईश्वर

807
00:56:23,600 --> 00:56:27,840
की ईश्वर के बल के विपरीत गमन नहीं कर सकती। ठीक? अब

808
00:56:27,840 --> 00:56:32,000
जो आपने कहा कि एक देश कैसे हो सकता है? तो मैंने आपको बता दिया

809
00:56:32,000 --> 00:56:36,160
ईश्वर अपने आप को रेगुलेट कर सकता है कि वो कहां पर धक्के का विषय बने,

810
00:56:36,160 --> 00:56:40,640
कहां पे ना बने। कहां पे वो किसी भौतिक पदार्थ के

811
00:56:40,640 --> 00:56:44,880
आवागमन की बाधा बने और कहां पर ना बने। ठीक?

812
00:56:44,880 --> 00:56:48,880
इसी प्रकार से जो ईश्वर है वह प्रकाश

813
00:56:48,880 --> 00:56:52,960
के आवागमन में जब बाधा बनता है हम हमारी आंखें

814
00:56:52,960 --> 00:56:57,040
कब देखती है कुछ जब उस पर प्रकाश पड़ता है और आकर के

815
00:56:57,040 --> 00:57:01,120
प्रकाश हमारी आंखों से टकराता है तो मान लीजिए कि

816
00:57:01,120 --> 00:57:05,200
मेरे प्रकाश जा रहा है पेड़ की ओर मेरे सामने एक पेड़ है

817
00:57:05,200 --> 00:57:09,600
उस उस तक प्रकाश जा रहा है और मैं पेड़ को देख रहा हूं मगर

818
00:57:09,600 --> 00:57:13,840
प्रकाश के गमन की जो प्रकाश की जो यात्रा है प्रकाश

819
00:57:13,840 --> 00:57:14,720
का जो

820
00:57:14,720 --> 00:57:18,800
मार्ग है प्रकाश की गति में ईश्वर बाधा बन

821
00:57:18,800 --> 00:57:22,960
सकता है कि नहीं कि उससे टकरा के उसके दूसरी तरफ प्रकाश ना पहुंच

822
00:57:22,960 --> 00:57:27,040
पाए। जब ईश्वर ऐसा करता है एक देश में तो वो ईश्वर

823
00:57:27,040 --> 00:57:31,200
का अवतार कहलाता है। अब वो पेड़ तक नहीं जा रहा प्रकाश। मेरी आंखों

824
00:57:31,200 --> 00:57:35,600
और पेड़ के बीच में ईश्वर का एक ईश्वर ने

825
00:57:35,600 --> 00:57:39,680
सर्वव्यापक होते हुए भी एक जगह पर उसने ऐसी बाधा

826
00:57:39,680 --> 00:57:44,240
उत्पन्न की कि वो जो प्रकाश था वो पेड़ तक ना पहुंच के

827
00:57:44,240 --> 00:57:48,320
ईश्वर के उस वो जो उसने बाधा उत्पन्न की उस बाधा से टकरा के मेरी आंखों तक

828
00:57:48,320 --> 00:57:52,560
आ रहा है। अब जो सर्वव्यापक ईश्वर है मेरी नेत्रों का विषय भी बन गया।

829
00:57:52,560 --> 00:57:56,640
जैसे वो पहले किसी कण के व्यवहार का विषय बना।

830
00:57:56,640 --> 00:58:00,720
किसी कण के व्यवहार का विषय नहीं बना। एक मिनट

831
00:58:00,720 --> 00:58:05,520
हां एक मिनट एक मिनट ठीक है जो तर्क है वो थोड़ा ठीक है

832
00:58:05,520 --> 00:58:10,160
लेकिन ये फिर भी ये सिद्ध नहीं करते कि ईश्वर अवतार

833
00:58:10,160 --> 00:58:14,560
लेता है क्यों कैसे क्योंकि ईश्वर सच्चिदानंद

834
00:58:14,560 --> 00:58:18,960
भी है सत्य चित्त आनंद सत्य वह जो कभी परिवर्तित

835
00:58:18,960 --> 00:58:23,520
ना होता हो ठीक है और अगर वो परिवर्तित

836
00:58:23,520 --> 00:58:27,600
भाई साहब आप तो परिवर्तित कर दिए ना सगुण निराकार बना के कहां

837
00:58:27,600 --> 00:58:30,080
परिवर्तित कर दिए तो बताओ सृष्टि

838
00:58:30,080 --> 00:58:34,320
कैसे बनाई क्योंकि वहां निराकार था निराकार

839
00:58:34,320 --> 00:58:38,560
और रहेगा अगर अरे भाई वो वो परिवर्तित नहीं होता ना

840
00:58:38,560 --> 00:58:43,200
एक मिनट वो परिवर्तित नहीं अभी बहुत अच्छे से

841
00:58:43,200 --> 00:58:47,200
मैंने क्या पूछा है मैंने मैंने सिद्ध कर दिया कि उसका जो

842
00:58:47,200 --> 00:58:51,280
वो वाला रूप है वो होते हुए भी वो दूसरे रूप

843
00:58:51,280 --> 00:58:55,360
में अवतरित होता है। इसी को अवतार कहते हैं। अब अगर आप यह वाला नहीं मान रहे

844
00:58:55,360 --> 00:58:59,440
मैं मैं यह कह रहा हूं अगर आप यह वाला नहीं मान रहे आप ये कह रहे हो कि वो

845
00:58:59,440 --> 00:59:04,080
सब जगह होते हुवे भी एक जगह पर शरीर शरीर ले लेता है

846
00:59:04,080 --> 00:59:08,160
हां बिल्कुल आप ले लेते हो

847
00:59:08,160 --> 00:59:12,240
क्यों वो उसे क्या कार्य कर ऐसा क्या कार्य अरे भाई बात क्या

848
00:59:12,240 --> 00:59:16,480
चल रही है पहले देखो आपने क्लेम किया है ईश्वर ईश्वर नित्य

849
00:59:16,480 --> 00:59:20,560
है आपने क्लेम किया मगर नित्य होते हुए भी जब वो सगुण

850
00:59:20,560 --> 00:59:24,560
हुआ तो वो नित्य नहीं है वहां जब वो ईश्वर ईश्वर जब

851
00:59:24,560 --> 00:59:28,640
सगुण हुआ है ईश्वर जब सगुण हुआ है तो वो नित्य नहीं है करने

852
00:59:28,640 --> 00:59:32,640
के लिए वो अवतार लेगा ये बताइए मुझे कौन करने के लिए

853
00:59:32,640 --> 00:59:37,200
अच्छा अच्छा अब मुझे बताओ ना कि मंत्र क्यों देगा वो?

854
00:59:37,200 --> 00:59:41,200
वेद के मंत्र क्यों देगा? कौन सा कार्य करने के लिए तो वेद

855
00:59:41,200 --> 00:59:45,120
के मंत्र क्यों देगा वो? अरे पहले मुझ मेरा सब उत्तर है तो उत्तर दीजिए

856
00:59:45,120 --> 00:59:49,280
ना। तो मैं मेरे जवाब में आपका उत्तर है। मेरे जवाब में वो

857
00:59:49,280 --> 00:59:53,360
जो है सृष्टि में प्रपंच रूपी संसार में अपने मन

858
00:59:53,360 --> 00:59:57,600
के अनुसार यूं ही उसका कोई कार्य नहीं है। वो जो कार्य

859
00:59:57,600 --> 01:00:01,920
शरीर का देह धारण करके कर सकता है वो बिना देह धारण करके भी कर सकता है।

860
01:00:01,920 --> 01:00:06,240
मगर वो यूं ही करता है। प्रपंच रूपी संसार को आगे बढ़ाने

861
01:00:06,240 --> 01:00:10,480
के लिए। और अगर आप यह कह रहे हैं कि वह मंत्र कहता है वैसे मंत्र भी

862
01:00:10,480 --> 01:00:14,720
मंत्र भी उसकी जो व्यवहारिक दुनिया का लक्षण है मगर जिस प्रकार

863
01:00:14,720 --> 01:00:18,720
वो व्यवहार में आने के लिए मंत्र देता है मंत्र के रूप में ज्ञान को देता

864
01:00:18,720 --> 01:00:22,720
है जबकि उसका ज्ञान सर्व व्यापक है फिर भी वो उसको एक देश बना के देता

865
01:00:22,720 --> 01:00:26,720
है एक देश काल परिस्थिति में चार विषयों के अंतःकरण में उसको प्रकट करता है

866
01:00:26,720 --> 01:00:30,960
कुत्ता बिल्ली के अंतकरण में वो नहीं आता है किसी जिसको वो

867
01:00:30,960 --> 01:00:35,040
चाहता है उसके अंतःकरण में आता है कुत्ता बिल्ली को तो वैसे भी नहीं कर सकता

868
01:00:35,040 --> 01:00:39,040
ना क्योंकि मोक्ष को प्राप्त करने के लिए मनुष्य ही वो वो

869
01:00:39,040 --> 01:00:43,280
भाई साहब मान्यता है। अभी हम यह बात कर रहे हैं कि हां तो ठीक है। मोक्ष

870
01:00:43,280 --> 01:00:47,680
प्राप्त करने के लिए यही मानव देह आवश्यक है। तो इसका मतलब वो सर्व्यापक

871
01:00:47,680 --> 01:00:51,680
होते हुए भी तय करता है कि वो जो है कहां पर अपने ज्ञान को

872
01:00:51,680 --> 01:00:56,560
प्रकाशित करे। वो चुनता है। तो उसी प्रकार से

873
01:00:56,560 --> 01:01:00,560
जब वो मनुष्य के व्यवहार में आ सकने लायक मंत्र

874
01:01:00,560 --> 01:01:04,640
दे सकता है। जिससे कि मनुष्य उसके साथ सरलता से व्यवहार कर सके।

875
01:01:04,640 --> 01:01:08,800
इसी प्रकार से वो मनुष्य के व्यवहार में आ सकने लायक ऐसा रूप धारण

876
01:01:08,800 --> 01:01:12,880
कर सकता है जिसके साथ लोग व्यवहार कर सके जिन जो कि

877
01:01:12,880 --> 01:01:18,560
उनकी भक्ति का विषय बन सके उनके प्रेम का उनकी आस्था का विषय बन सके सिंपल

878
01:01:18,560 --> 01:01:22,640
और मजबूरी नहीं है उसकी ये बात बहुत गलत है कि भैया उसको क्या जरूरत

879
01:01:22,640 --> 01:01:26,800
पड़ी मजबूरी नहीं है वो बिना मजबूरी के भी धर्म संस्थापना कर सकता है

880
01:01:26,800 --> 01:01:31,040
उसका मन है वो यहां पे ऐसे करना चाहता है वो वहां पे वैसे करना चाहता है उसके

881
01:01:31,040 --> 01:01:35,760
पास कोई मजबूरी नहीं है मजबूरी हो जाएगी तो सच्चिदानंद आपने

882
01:01:35,760 --> 01:01:40,080
आपने कहा कि ऐसे ही ले लेता है वो अवतार। मैंने क्या कहा?

883
01:01:40,080 --> 01:01:45,360
जैसे आपने कहा कि मैंने बताया आपको कि जैसे वो

884
01:01:45,360 --> 01:01:50,960
सर्वव्यापक मंत्र सर्व्यापक ज्ञान को मंत्र के रूप में देता है।

885
01:01:50,960 --> 01:01:55,360
देता है कि नहीं देता है? हां देता है। देता है। हां। तो

886
01:01:55,360 --> 01:01:59,360
क्यों देता है? सीधे अपने मन में शब्द शक्ति सोचे। अज्ञान हो जाए आदमी

887
01:01:59,360 --> 01:02:03,440
को। क्यों मंत्र? क्यों प्रणव? जिससे कि यहां पर

888
01:02:03,440 --> 01:02:07,440
उसका लेन देन, उसका प्रपंच, उसका व्यवहार हो सके। जो

889
01:02:07,440 --> 01:02:11,520
ले रहा है वह ले सके, नहीं लेना नहीं ले सके। यह सब ड्रामा ये जो चल रहा है ना

890
01:02:11,520 --> 01:02:15,520
प्रपंच रूपी संसार का ये हो सके, व्यवहार हो सके। तो

891
01:02:15,520 --> 01:02:16,020
ऐसे

892
01:02:15,920 --> 01:02:20,800
ही भगवान के साथ हमारा व्यवहार हो सके इसलिए वो

893
01:02:20,800 --> 01:02:26,800
जो है अवतार के रूप में आता है। सिंपल।

894
01:02:29,600 --> 01:02:33,680
अच्छा थोड़ा सा लाइट आगे करते हैं। मैं यह कह रहा हूं

895
01:02:33,680 --> 01:02:37,760
ईश्वर को आपका कोई प्रश्न था या यही प्रश्न थे जो मैंने जिनका

896
01:02:37,760 --> 01:02:41,920
जवाब दे दिया। कोई और प्रश्न है अवतार के विषय में? आपने कहा

897
01:02:41,920 --> 01:02:45,920
था ना कि मेरा प्रश्न भी ले लो। एक हां मेरा अवतार के

898
01:02:45,920 --> 01:02:49,920
विषय में प्रश्न है हां कि आप

899
01:02:49,920 --> 01:02:54,720
जो कह रहे हैं कि

900
01:02:54,720 --> 01:02:58,800
मैं प्रश्न भूल गया यार।

901
01:02:58,800 --> 01:03:02,800
मुझे लगता है हो गया आपका प्रश्न। दूसरा आगे के विषय पे

902
01:03:02,800 --> 01:03:08,800
चलते हैं। बोलिए बोलिए हम

903
01:03:09,680 --> 01:03:15,680
अब ये वाली बात आती है कि मुझे ये बताइए कि

904
01:03:16,240 --> 01:03:20,400
ईश्वर की हमें आवश्यकता क्या है? आर्य समाज

905
01:03:20,400 --> 01:03:24,160
के ईश्वर की क्या आवश्यकता है?

906
01:03:24,160 --> 01:03:28,960
मतलब हम उसे माने या ना माने? आवश्यकता क्या है?

907
01:03:28,960 --> 01:03:33,120
ईश्वर को तो मानना पड़ेगा। मतलब हम उसकी भक्ति करें या

908
01:03:33,120 --> 01:03:37,120
ना करें उसके द्वारा जो उसको

909
01:03:37,120 --> 01:03:41,120
उसके निमित्त जो कर्म करने को कहे गए हैं कि भूभ स्वा मंत्र पढ़ो ये वो

910
01:03:41,120 --> 01:03:46,640
तो ये हमें आवश्यकता क्या है ये सब करने की?

911
01:03:46,640 --> 01:03:50,720
तभी तो हमें तभी तो हम सत्य को जान पाएंगे। तभी तो हम वेद ज्ञान को

912
01:03:50,720 --> 01:03:54,800
जान पाएंगे। सिद्धांतों को जान पाएंगे। वरना मूर्खों की तरह वही फिर

913
01:03:54,800 --> 01:03:58,800
भूत प्रेत में और उल्टी सीधी बात ज्ञान को

914
01:03:58,800 --> 01:04:02,960
जान पाएंगे क्योंकि हम क्या करेंगे

915
01:04:02,960 --> 01:04:06,960
हमें मोक्ष की प्राप्ति है ना मैं मनुष्य मोक्ष मोक्ष मिल पाएगा अगर

916
01:04:06,960 --> 01:04:11,760
हम ईश्वर को मानेंगे और उसको पूजेंगे तो मोक्ष मिल पाएगा

917
01:04:11,760 --> 01:04:16,400
हां मतलब कि

918
01:04:16,400 --> 01:04:20,480
अगर हमने क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि कर्म कहा

919
01:04:20,480 --> 01:04:24,640
जाता है कर्म करने पड़ेंगे ईश्वर की पूजा करने से आपको कल्याण नहीं होगा। कर्म

920
01:04:24,640 --> 01:04:28,800
करना पड़ेगा। नहीं जो कर्म तो कर्म

921
01:04:28,800 --> 01:04:32,880
कर वही तो कर्म है। कर्म यानी कि

922
01:04:32,880 --> 01:04:37,120
यानी कि जैसे मान लीजिए मैंने कर्म नहीं किया और ईश्वर की भक्ति

923
01:04:37,120 --> 01:04:42,880
कर ली। यह भी एक कर्म है। तो इससे मेरा कल्याण हो जाएगा। मोक्ष हो जाएगा।

924
01:04:42,880 --> 01:04:47,040
नहीं। तीन उसमें बहुत सारी चीजें हैं। धर्म का पालन करना पड़ेगा।

925
01:04:47,040 --> 01:04:51,440
यज्ञ नित्य यज्ञ करना पड़ेगा। लेकिन इसका अगर मैं ईश्वर

926
01:04:51,440 --> 01:04:55,600
मैं ईश्वर की ईश्वर की पूजा ना करूं ईश्वर का नित्य

927
01:04:55,600 --> 01:05:00,160
यज्ञ ना करूं मगर अपने कर्म और धर्म का पालन करता रहूं तो वो नहीं होगा मोक्ष

928
01:05:00,160 --> 01:05:02,320
तब मोक्ष नहीं मिलेगा

929
01:05:02,320 --> 01:05:06,960
तब नहीं मिलेगा तो यानी कि ईश्वर की जो भक्ति है कर्म

930
01:05:06,960 --> 01:05:10,960
कर्म हमारे कर्म हमारे तय करते हैं कि हमें

931
01:05:10,960 --> 01:05:14,960
कौन सी योनि मिलेगी ठीक है हमें जन्म कहां

932
01:05:14,960 --> 01:05:19,280
मिलेगा कर्म ये तय करते हैं भक्ति

933
01:05:19,280 --> 01:05:23,360
हमें ईश्वर के नजदीक ले जाएगी। हमें और क्योंकि आत्मा को

934
01:05:23,360 --> 01:05:27,360
ज्ञान ज्ञान की आवश्यकता मतलब मेरा कहने का मतलब यह है कि जैसे मैंने कई

935
01:05:27,360 --> 01:05:32,000
बुरे कार्य कर रखे हैं तो क्या भक्ति भक्ति के कारण भक्ति करने से

936
01:05:32,000 --> 01:05:36,080
वो जो पाप है वो नष्ट हो सकते हैं कि नहीं हो सकते? क्या है

937
01:05:36,080 --> 01:05:40,240
मामला? नहीं पाप कभी नष्ट नहीं होते। ईश्वर भक्ति करने से कुछ

938
01:05:40,240 --> 01:05:44,240
देता है कि नहीं देता है? देता है ना ज्ञान देता

939
01:05:44,240 --> 01:05:48,480
है मनोबल देता है ज्ञान देता

940
01:05:48,480 --> 01:05:52,640
है और मनोबल देता है हम बिल्कुल सुनने से भक्ति

941
01:05:52,640 --> 01:05:56,880
करने से पक्का करना हां बिल्कुल

942
01:05:56,880 --> 01:06:01,840
उसके उसके गुणगान करना उसको जानना मतलब

943
01:06:01,840 --> 01:06:07,840
ईश्वर की भक्ति करने से वो ईश्वर हमको ज्ञान देता है ऐसा है

944
01:06:10,400 --> 01:06:14,800
मैंने क्योंकि आपके यहां पढ़ा कि ईश्वर देता नहीं है। आपके

945
01:06:14,800 --> 01:06:18,960
कर्मों कर्मों से जो होगा वो आपको मिलेगा। ईश्वर कुछ देगा

946
01:06:18,960 --> 01:06:22,960
नहीं आपको। नहीं हमें हमें पढ़ना

947
01:06:22,960 --> 01:06:27,120
पड़ेगा। उसके बारे में जानना पड़ेगा। उसका ध्यान लगाना पड़ेगा। भाई साहब ईश्वर

948
01:06:27,120 --> 01:06:31,200
कुछ देगा हमको कि नहीं देगा? या वो कर्मों का

949
01:06:31,200 --> 01:06:35,360
फल देगा। ईश्वर तो हमें हमारे कर्मों का ही फल देगा

950
01:06:35,360 --> 01:06:39,440
ना। यानी यानी उसकी भक्ति करने की कोई आवश्यकता नहीं है। उसके बताए

951
01:06:39,440 --> 01:06:43,520
हुए कर्म करते रह। जो हमारे कर्म अच्छे हैं वो करते रहे। धर्म

952
01:06:43,520 --> 01:06:47,760
पर चलते रहे। कर्म भक्ति कर्म में तो आती है। आप कर्म को यानी भक्ति

953
01:06:47,760 --> 01:06:51,840
करने से भी मिलेगा ना। हां जो बाकी के कर्म

954
01:06:51,840 --> 01:06:55,920
करने से मिल रहा है। भक्ति करने से भी मिलेगा। यहां पे आप आर्य समाज के विरोध

955
01:06:55,920 --> 01:07:00,080
में जा रहे हैं। भक्ति करने से भगवान कुछ नहीं देंगे। ये लिखा

956
01:07:00,080 --> 01:07:04,160
है आपकी सत्यार्थ प्रकाश में। देख लीजिए खोल के। मैं मैं भक्ति का

957
01:07:04,160 --> 01:07:08,160
अर्थ ध्यान से ले रहा हूं। अरे चाहे जो कर लो मिलना

958
01:07:08,160 --> 01:07:12,720
कुछ नहीं है। भगवान कुछ नहीं देगा।

959
01:07:12,720 --> 01:07:16,880
चाहे ध्यान कर लो, योग कर लो कुछ भी उल्टे खड़े हो जाओ। कुछ नहीं देगा। ईश्वर

960
01:07:16,880 --> 01:07:21,040
का आनंद मिलेगा। क्यों नहीं मिलेगा? ईश्वर का आनंद मिलेगा। हमारे भाई साहब

961
01:07:21,040 --> 01:07:25,040
भगवान देगा कि नहीं? मैं पूछ रहा हूं भगवान देगा कि

962
01:07:25,040 --> 01:07:27,920
नहीं?

963
01:07:27,920 --> 01:07:32,240
ईश्वर का नियम ही यही है। जो कार्य करेगा उसको उसका फल देना है। उसका कार्य

964
01:07:32,240 --> 01:07:36,400
यही है। तो ये भक्ति करना एक जो

965
01:07:36,400 --> 01:07:40,400
जैसे यज्ञ कर रहे हैं या उसका नाम कर रहे हैं। आपके यहां कुछ भजन वजन भी

966
01:07:40,400 --> 01:07:44,560
होता है क्या ईश्वर का? यज्ञ नहीं यज्ञ अलग होता है और

967
01:07:44,560 --> 01:07:50,160
ध्यान अलग होता है हम और भक्ति

968
01:07:50,160 --> 01:07:54,240
अब भक्ति को आप ध्यान से जोड़ जोड़ रहे हो तो मैं भक्ति को नहीं

969
01:07:54,240 --> 01:07:59,680
भक्ति है आपके यहां कि नहीं है कैसी भक्ति

970
01:07:59,680 --> 01:08:04,560
आपके यहां भक्ति है कि नहीं भक्ति करते हैं ईश्वर की कि नहीं

971
01:08:04,560 --> 01:08:08,800
हम ध्यान करते हैं भक्ति ईश्वर का ध्यान करते

972
01:08:08,800 --> 01:08:12,960
हैं तो ध्यान करने जैसे हम ईश्वर का ध्यान करते हैं तो

973
01:08:12,960 --> 01:08:15,520
ईश्वर हमको

974
01:08:15,520 --> 01:08:19,920
हमारे कल्याणकारक चीजें दे देता है। हां

975
01:08:19,920 --> 01:08:24,640
दे नहीं दे वो नहीं देता हमें

976
01:08:24,640 --> 01:08:28,880
हमें उसके लिए प्रेरित हमें उसके लिए प्रेरित प्रेरित करता

977
01:08:28,880 --> 01:08:33,040
है जैसे मुझे कुछ चाहिए तो यानी कि वो बुद्धि देता

978
01:08:33,040 --> 01:08:37,040
है ज्ञान देता है यानी वो ज्ञान देता है आनंद ईश्वर का

979
01:08:37,040 --> 01:08:40,800
आनंद प्राप्त होता है

980
01:08:40,800 --> 01:08:44,880
भक्ति करने से ईश्वर का आनंद प्राप्त होता है। ध्यान

981
01:08:44,880 --> 01:08:49,120
करने से ध्यान करने से ईश्वर का आनंद प्राप्त होता है।

982
01:08:49,120 --> 01:08:53,520
हां जी। ये कहां लिखा है आपके यहां?

983
01:08:53,520 --> 01:08:59,520
सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है। कहां बताइए?

984
01:09:06,400 --> 01:09:11,440
सरकार प्रकाश निकाल रहा हूं मैं। आप बताइए तब तक पेज पेज क्रमांक

985
01:09:11,440 --> 01:09:17,440
अरे क्या हुआ चले गए क्या हेलो

986
01:09:18,480 --> 01:09:24,480
अरे बिना बताए चले गए

987
01:09:24,480 --> 01:09:28,560
चलिए ठीक है आज के लिए इतना काफी है आपको काफी कुछ समझ में आया होगा

988
01:09:28,560 --> 01:09:32,640
चीजें भाई साहब चले गए हैं पता नहीं क्या

989
01:09:32,640 --> 01:09:38,080
हुआ जाने से पहले उन्होंने अलविदा भी नहीं कहा

990
01:09:38,080 --> 01:09:40,720
ठीक है

991
01:09:40,720 --> 01:09:45,280
नीरज जी इससे बहुत रोचक बातें हुई आप लोगों को समझ में आई होंगी काफी सारी चीजें

992
01:09:45,280 --> 01:09:49,680
और मेरा गला थक गया काफी देर से बात कर रहे हैं सभी

993
01:09:49,680 --> 01:09:54,160
को जय श्री राम

994
01:09:54,160 --> 01:10:00,160
अच्छा रुकते हैं दो मिनट तो

995
01:10:00,400 --> 01:10:04,800
आप लोगों ने सर्वशक्तिमान धर्म पर हमारा जो मेन चैनल है

996
01:10:04,800 --> 01:10:10,160
उस पर

997
01:10:10,160 --> 01:10:14,160
देखा होगा आपने निर्भय के साथ हमारी काफी

998
01:10:14,160 --> 01:10:18,320
लंबी चर्चा हुई। बहुत इनेटिव चर्चा है और उस पर प्रकाश डालते

999
01:10:18,320 --> 01:10:22,560
हुए हमने एक लाइव और किया आज का वो आप देख लेंगे बहुत अच्छे कांसेप्ट

1000
01:10:22,560 --> 01:10:28,560
आपके काफी सारे क्लियर हो जाएंगे और

1001
01:10:28,800 --> 01:10:33,120
आज भी आपको काफी कुछ चीजें समझ में आई होंगी। देखिए ऐसा है

1002
01:10:33,120 --> 01:10:37,280
कि कम ज्यादा कार्य तभी हो पाएगा जब कम ज्यादा हो

1003
01:10:37,280 --> 01:10:41,360
शक्ति और शक्ति कम ज्यादा है मतलब ईश्वर कम ज्यादा है। इसका

1004
01:10:41,360 --> 01:10:45,520
मतलब ईश्वर ने ऐसा रूप लिया है कि चाहे जहां वो कम ज्यादा

1005
01:10:45,520 --> 01:10:49,760
हो सके। इसका मतलब ईश्वर ने ऐसा रूप लिया है कि वो अपने

1006
01:10:49,760 --> 01:10:53,840
आप को परिवर्तित कर सके। तो जो उसका नित्य वाला रूप है

1007
01:10:53,840 --> 01:10:58,160
ना जो प्राप्तव्य का विषय उसके बाद भी दूसरी स्टेज है जो सगुण निराकार

1008
01:10:58,160 --> 01:11:02,400
है जिसके बिना सृष्टि रचना नहीं हो सकती तो सगुण निराकार

1009
01:11:02,400 --> 01:11:06,400
भी एक अवतार ही है सनातन

1010
01:11:06,400 --> 01:11:10,720
शंकर जी ने एक वीडियो बनाया उसमें गुरुदेव का एक ग्रंथ दिखाया

1011
01:11:10,720 --> 01:11:16,720
है आपको वो मैं भी दिखा रहा हूं

1012
01:11:18,000 --> 01:11:22,000
ये ग्रंथ है अवतार मीमांसा ठीक है

1013
01:11:22,000 --> 01:11:26,240
और यह ग्रंथ है अवतार रहस्य इनको आप पढ़ेंगे ना

1014
01:11:26,240 --> 01:11:30,320
तो सगुण निराकार भी एक अवतार ही है जो मैंने

1015
01:11:30,320 --> 01:11:34,400
कहा ना कि कहीं पे वो कोर्स का विषय बन रहा है कहीं पे नहीं

1016
01:11:34,400 --> 01:11:38,400
कहीं पे वो इतना ठोस बन रहा है जिसके विरुद्ध वो कण

1017
01:11:38,400 --> 01:11:42,720
पृथ्वी इत्यादि नहीं जा सके वो इतना ठोस बन रहा है विरुद्ध नहीं जा सकता

1018
01:11:42,720 --> 01:11:48,480
तो ऐसा ठोस भी बन सकता है ना जहां पर वो प्रकाश उसके विरुद्ध ना जा सके

1019
01:11:48,480 --> 01:11:52,800
बस वही पर वो आंखों का विषय बन जाता है फिर जो उसकी विद्या शक्ति

1020
01:11:52,800 --> 01:11:57,120
है अविद्या शक्ति से संसार बनता है। मगर अविद्या

1021
01:11:57,120 --> 01:12:01,840
के साथ साथ विद्या भी तो है। जो विद्या है

1022
01:12:01,840 --> 01:12:05,840
उसको भी माया का एक विशुद्ध स्वरूप कहेंगे। जो यह जानती

1023
01:12:05,840 --> 01:12:09,840
है कि बाकी का प्रपंच माया है। जो विद्या है भगवान

1024
01:12:09,840 --> 01:12:14,080
के शरीर के जो अवयव हमें दिखते हैं तो वो उस

1025
01:12:14,080 --> 01:12:18,160
पराशक्ति से बना होता है। जो भगवान की विशुद्ध शक्ति

1026
01:12:18,160 --> 01:12:22,160
है उससे बना होता है। इसलिए

1027
01:12:22,160 --> 01:12:26,160
वह मोक्ष कारक है क्योंकि भगवान क्या ज्ञान स्वरूपी है तो विद्या शक्ति जिससे हमें

1028
01:12:26,160 --> 01:12:32,160
मोक्ष मिलेगा जिससे हमें ज्ञान होगा

1029
01:12:34,240 --> 01:12:37,760
और

1030
01:12:37,760 --> 01:12:40,320
नास्तिकों

1031
01:12:40,320 --> 01:12:45,120
को बुलाए बुला के लाइए ये जो सनातन सिद्धांत है उनसे टकराएं

1032
01:12:45,120 --> 01:12:49,840
हम लोग कोशिश कर रहे हैं कि जो वो है ना

1033
01:12:49,840 --> 01:12:53,840
समाल नवी क्या क्या नाम है मुफ्ती है वो हमारे

1034
01:12:53,840 --> 01:12:58,800
चैनल पर आए और हम उनसे एक विस्तृत चर्चा करें।

1035
01:12:58,800 --> 01:12:59,300
ठीक

1036
01:12:58,880 --> 01:13:04,880
है तो ठीक है

1037
01:13:16,880 --> 01:13:20,320
सभी को जय श्री राम।

1038
01:13:20,320 --> 01:13:24,320
जय श्री राम सभी को।
