1
00:00:02,640 --> 00:00:07,280
तो सभी को जय श्री राम और आशा

2
00:00:07,280 --> 00:00:11,280
करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे। काफी दिनों से आपके बीच लाइव नहीं

3
00:00:11,280 --> 00:00:16,000
आए थे और आज हमने आपको सरप्राइज किया है क्योंकि

4
00:00:16,000 --> 00:00:20,240
ज्यादातर ऐसा होता था कि जो हमने समय दिया है उससे हम लेट आते थे। बट

5
00:00:20,240 --> 00:00:24,480
आज हमने आना था कि हम आज समय से पहले पहुंचेंगे। समय

6
00:00:24,480 --> 00:00:28,880
से पहले आ गए। कुछ लोग

7
00:00:28,880 --> 00:00:33,120
परीक्षा कर रहे होंगे कि भाई 9:30 पर स्टार्ट होगा। हमने 9:30

8
00:00:33,120 --> 00:00:37,200
इसीलिए रखा था कि हम 9 मान के चले तो हमने कहा 9:30 रखते हैं जिससे कि

9
00:00:37,200 --> 00:00:41,200
विलंब हमें उतना स्पेस मिल जाएगा। कई बार ऐसा होता है

10
00:00:41,200 --> 00:00:45,200
कि कुछ लोग होते हैं वो बोलते हैं इंटरनेट नहीं आ रहा है मतलब जिसके

11
00:00:45,200 --> 00:00:49,200
साथ चर्चा होनी है। जय श्री राम। जय श्री राम। सभी को जय श्री राम। जिसके

12
00:00:49,200 --> 00:00:53,280
साथ चर्चा होनी है उसका इंटरनेट खराब है या फिर

13
00:00:53,280 --> 00:00:57,280
वह टेक्निकली बिल्कुल कुछ समझ नहीं पा रहा है क्या करना है क्या

14
00:00:57,280 --> 00:01:01,440
नहीं करना है तो कई बार ऐसे कर पिछली बार देखा

15
00:01:01,440 --> 00:01:05,920
था कि हमें अपनी

16
00:01:05,920 --> 00:01:10,320
लाइव को जो है बंद करना पड़ा था उनके पास पता नहीं क्या हुआ था कुछ टेक्निकल

17
00:01:10,320 --> 00:01:15,040
चीजों में दिक्कत आई थी तो हमने कहा कि आज

18
00:01:15,040 --> 00:01:18,000
समय से आज खैर

19
00:01:18,000 --> 00:01:22,880
तो हम अपने जो साथी हैं उनको ले लेते हैं

20
00:01:22,880 --> 00:01:28,880
जिनके साथ आज चर्चा होनी है।

21
00:01:38,560 --> 00:01:44,560
जी विनोद जी जय श्री राम सर साह

22
00:01:48,320 --> 00:01:52,400
जी विनोद जी थोड़ा सा हमारे दर्शकों को अपना परिचय दे दीजिए

23
00:01:52,400 --> 00:01:57,440
आप हम विनोद दास है मुंबई से

24
00:01:57,440 --> 00:02:01,440
और यहीं पे रहते हैं बेसिकली नेटिव प्लेस तो यूपी

25
00:02:01,440 --> 00:02:04,240
है आजमगढ़

26
00:02:04,240 --> 00:02:10,240
और रहना सर मुंबई में ही है जहां आप मुंबई में है।

27
00:02:10,400 --> 00:02:15,120
रामपाल से कब जुड़े आप? हम नवंबर

28
00:02:15,120 --> 00:02:19,040
2018 से जुड़े हुए हैं।

29
00:02:19,040 --> 00:02:23,040
उसके पहले हम अच्छा उसके पहले हम उसके

30
00:02:23,040 --> 00:02:27,200
पहले हम जो है बाकी की सभी भक्ति करते थे। जो अपना व्रत

31
00:02:27,200 --> 00:02:31,200
उपवास नहीं नहीं मैं वो मैं वो नहीं पूछ रहा हूं।

32
00:02:31,200 --> 00:02:35,280
मैं वो नहीं पूछ रहा हूं। मैं ये पूछ रहा हूं कि ये रामपाल से

33
00:02:35,280 --> 00:02:39,280
आपने जो दीक्षा ली है वो डायरेक्ट रामपाल से ली है वो एलईडी वाली दीक्षा

34
00:02:39,280 --> 00:02:44,240
है। नहीं एलईडी की दीक्षा एलईडी

35
00:02:44,240 --> 00:02:50,240
वीडियो से दीक्षा है। वीडियो

36
00:02:52,080 --> 00:02:54,640
तो

37
00:02:54,640 --> 00:02:58,880
आपको तो मैंने मैंने आपके बहुत सारे कमेंट्स वगैरह देखे

38
00:02:58,880 --> 00:03:03,040
हैं। अभी जब आपकी प्रोफाइल देखी जिस प्रोफाइल पे आप जुड़े

39
00:03:03,040 --> 00:03:07,360
हैं तो उसमें मैंने देखा कि आपके जो कमेंट्स मैंने काफी विरोध

40
00:03:07,360 --> 00:03:11,360
में देखे थे बहुत पहले से तो मैं ये जानना चाह रहा था

41
00:03:11,360 --> 00:03:15,600
कि जैसे रामपाल जी जो आपके

42
00:03:15,600 --> 00:03:21,040
अनुसार जो आपके गुरु हैं वो

43
00:03:21,040 --> 00:03:25,760
कहां चले गए?

44
00:03:25,760 --> 00:03:31,040
हेलो

45
00:03:31,040 --> 00:03:36,150
विनोद जी

46
00:03:36,150 --> 00:03:39,200
[हंसी]

47
00:03:39,200 --> 00:03:43,600
एक रामपाल का कोई बहुत अनिष्ट फॉलोअर है

48
00:03:43,600 --> 00:03:49,040
जो सक्षम नाम से जो

49
00:03:49,040 --> 00:03:55,040
रामपाल के द्वारा सिखाई गई शिक्षा का प्रमाण दे रहा है।

50
00:03:56,720 --> 00:04:02,720
हां जी विनोद जी

51
00:04:02,800 --> 00:04:08,720
तो मैं यह जानना चाह रहा था जैसे आप अह

52
00:04:08,720 --> 00:04:12,880
रामपाल के ज्ञान को आप मानते हैं कि वो प्रामाणिक ज्ञान

53
00:04:12,880 --> 00:04:15,520
है।

54
00:04:15,520 --> 00:04:20,480
है ना? आवाज नहीं आ रही आपको।

55
00:04:20,480 --> 00:04:26,480
आवाज नहीं आ रही।

56
00:04:31,200 --> 00:04:35,280
अब बोलिए

57
00:04:35,280 --> 00:04:39,200
आवाज नहीं आ रही।

58
00:04:39,200 --> 00:04:45,120
कुछ परिवर्तन किया है क्या आपने?

59
00:04:45,120 --> 00:04:51,120
आप एक बार रिमूव हो जाइए। फिर दोबारा आइए। है ना?

60
00:05:05,520 --> 00:05:11,200
तो

61
00:05:11,200 --> 00:05:15,440
रामपाल के फॉलोअ स्वयं को रामपाल का फॉलोअ

62
00:05:15,440 --> 00:05:21,440
कहने में भी डरते हैं। क्या बात है?

63
00:05:28,000 --> 00:05:34,000
जेल में रामपाल जी रिपोर्ट

64
00:05:34,050 --> 00:05:38,720
[हंसी]

65
00:05:38,720 --> 00:05:43,280
हां जी

66
00:05:43,280 --> 00:05:47,600
तो रामपाल के द्वारा दिया जाने वाला जो ज्ञान

67
00:05:47,600 --> 00:05:50,080
है

68
00:05:50,080 --> 00:05:52,880
उसको उसको आप

69
00:05:52,880 --> 00:05:57,200
प्रामाणिक समझते हैं, तत्व ज्ञान समझते हैं।

70
00:05:57,200 --> 00:06:01,440
जी सबसे पहले तो हम ये कह गए कि आप भी गुरु को मानते हैं

71
00:06:01,440 --> 00:06:05,440
और हम भी गुरु को मानते हैं तो गुरु के

72
00:06:05,440 --> 00:06:09,680
लिए दो शब्द हो जाए तो अच्छा रहेगा। नहीं गुरु के लिए दो शब्द

73
00:06:09,680 --> 00:06:12,560
क्यों?

74
00:06:12,560 --> 00:06:18,560
क्यों? हम लोग यहां पर हम

75
00:06:18,960 --> 00:06:22,960
नहीं हम लोग यहां पर जो आए हैं वो एक दूसरे के

76
00:06:22,960 --> 00:06:27,120
गुरु के बारे में महिमा मंडन सुनने नहीं आए बल्कि दोनों का ही

77
00:06:27,120 --> 00:06:31,120
आपका भी ये कहना है कि आपके जो गुरु ने ज्ञान दिया है वो प्रामाणिक

78
00:06:31,120 --> 00:06:35,600
है और मेरा कहना है कि वो प्रामाणिक नहीं है है ना

79
00:06:35,600 --> 00:06:39,600
ये वो सौहार्दपूर्ण वाला मंच तो है नहीं हां हो सकता था

80
00:06:39,600 --> 00:06:44,320
शायद अगर कोर्ट तक बात ना गई होती हो सकता था

81
00:06:44,320 --> 00:06:48,720
अगर ऐसी बातें ना कही गई होती जिनके कारण कोर्ट तक जाना पड़ जाए

82
00:06:48,720 --> 00:06:52,960
पुलिस कोर्ट कचहरी सब हो गया तो वो सब बातें नहीं रह गई कि गुरु की वंदना

83
00:06:52,960 --> 00:06:57,120
हो जाए या इस तरह की सामंजस्यता हो जाए सीधे हम लोग मूल विषयों

84
00:06:57,120 --> 00:07:02,080
पे आए तो उचित होगा ठीक है तो चलिए

85
00:07:02,080 --> 00:07:03,120
तो आपका

86
00:07:03,120 --> 00:07:07,200
कहना है कि रामपाल के द्वारा दी जाने वाली जो शिक्षा

87
00:07:07,200 --> 00:07:12,000
है वो बिल्कुल प्रामाणिक है बिल्कुल सही है

88
00:07:12,000 --> 00:07:16,240
है सही बात है। तो

89
00:07:16,240 --> 00:07:20,800
मुझे थोड़ा सा सबसे पहले एक्चुअली रामपाल

90
00:07:20,800 --> 00:07:24,960
मतलब जो जिसको भी आप गुरु मानते हैं उसके द्वारा दी जाने वाली जो शिक्षा

91
00:07:24,960 --> 00:07:29,920
है उसके बारे में बात करने के लिए कुछ पहले

92
00:07:29,920 --> 00:07:34,000
दो एक दो चीजें हैं जिनको जान लेना आवश्यक है।

93
00:07:34,000 --> 00:07:38,320
जिससे कि हम बाद में जब बात करेंगे तो जो हमने

94
00:07:38,320 --> 00:07:42,880
यहां से जाना है चर्चा के प्रारंभ में वो मदद करेगा।

95
00:07:42,880 --> 00:07:47,200
तो इसलिए मैं आपसे जानना चाह रहा हूं कि आपकी जानकारी में

96
00:07:47,200 --> 00:07:51,440
धर्म क्या है? वो किस तरह से उपयोगी है मानव

97
00:07:51,440 --> 00:07:55,840
के लिए? एक जीव के लिए या मनुष्य के लिए धर्म उपयोगी

98
00:07:55,840 --> 00:08:00,640
उपयोगी क्यों है? क्या आवश्यकता है उसे धर्म की?

99
00:08:00,640 --> 00:08:04,960
देखिए मैं ज्यादा कुछ बहुत विशेष तो नहीं जानता हूं लेकिन इतना

100
00:08:04,960 --> 00:08:09,040
जानता हूं कि जो अच्छे कर्म किया जाए और मानव जीवन में जो

101
00:08:09,040 --> 00:08:13,120
उपयोगी है वही और हर व्यक्ति के लिए उसका अपना अपना

102
00:08:13,120 --> 00:08:17,200
अलग-अलग धर्म होता है और नहीं नहीं जो

103
00:08:17,200 --> 00:08:18,240
अच्छे कर्म है

104
00:08:18,240 --> 00:08:22,240
ये तो उसके लक्षण है और फिर अच्छे अच्छे कर्म भी

105
00:08:22,240 --> 00:08:26,480
किसको माना गया किस आधार पर वो भी देखना पड़ेगा वो

106
00:08:26,480 --> 00:08:30,640
एक अलग जैसे मैंने कहा कि मोटरसाइकिल की क्या आवश्यकता

107
00:08:30,640 --> 00:08:34,640
है? तो आपको बताना है कि भाई मोटरसाइकिल से हम

108
00:08:34,640 --> 00:08:38,640
एक जगह से दूसरी जगह यात्रा करते हैं। आपको ये नहीं बताना

109
00:08:38,640 --> 00:08:42,640
है कि मोटरसाइकिल Hero Honda भी होती है, Pulsar भी होती है

110
00:08:42,640 --> 00:08:46,800
या Bajaj का भी होता है, Blet का भी होता है। ये नहीं पूछ रहा हूं। ये लक्षण

111
00:08:46,800 --> 00:08:50,800
है। समझ रहे हैं आप? मैंने पूछा कि वो

112
00:08:50,800 --> 00:08:54,800
काम क्या आती है? मोटरसाइकिल काम क्या आती है? वो बताइए। क्या जरूरत

113
00:08:54,800 --> 00:08:58,800
है धर्म की? आवश्यकता के अनुसार धर्म की परिभाषा

114
00:08:58,800 --> 00:09:02,240
क्या है?

115
00:09:02,240 --> 00:09:06,560
मूल धर्म तो हम यह मानते हैं कि जिसके द्वारा इंसान

116
00:09:06,560 --> 00:09:10,800
का मन क्योंकि मनुष्य जीवन अनमोल है और मोक्ष का रास्ता मिले

117
00:09:10,800 --> 00:09:13,840
सबसे बड़ा धर्म है।

118
00:09:13,840 --> 00:09:18,000
अच्छा हां ठीक है। अब ये आपने सही बात कह दी। जिसके द्वारा

119
00:09:18,000 --> 00:09:22,240
आपको मोक्ष प्राप्त हो जिन कार्यों को करने से जिन नियमों

120
00:09:22,240 --> 00:09:26,560
को मानने से आप मोक्ष की ओर आगे बढ़े वो आपका

121
00:09:26,560 --> 00:09:32,560
धर्म की ठीक है सही बात तो फिर मोक्ष क्या है

122
00:09:33,200 --> 00:09:37,200
इस आत्मा का जन्म मरम से हमेशा के लिए छुटकारा हो जाए

123
00:09:37,200 --> 00:09:41,200
यही मोक्ष है परमात्मा में

124
00:09:41,200 --> 00:09:45,280
चले अच्छा तो आत्मा यहां से

125
00:09:45,280 --> 00:09:49,520
पहले कहां थी जो वो मतलब जो वो आज जो वो जन्म मरणम

126
00:09:49,520 --> 00:09:54,000
के चक्कर में फंसी है आत्मा ये कैसे फंसी है

127
00:09:54,000 --> 00:09:58,560
इससे पहले कहां थी जो ये फंस गई और इसके बाद ये

128
00:09:58,560 --> 00:10:03,280
इसके बाद रामपाल रामपाल जी के अकॉर्डिंग ये कहां जाने वाली है आत्मा

129
00:10:03,280 --> 00:10:07,440
अकॉर्डिंग टू मोक्ष पहले परमात्मा के साथ

130
00:10:07,440 --> 00:10:12,240
में थी नहीं नहीं बाद में के साथ

131
00:10:12,240 --> 00:10:16,880
वो बाद में पूछूंगा मैं ये पूछ रहा हूं कि इसके बाद

132
00:10:16,880 --> 00:10:17,380
इसके

133
00:10:17,280 --> 00:10:21,040
बाद कहां जाएगी आत्मा

134
00:10:21,040 --> 00:10:25,040
देखिए श्रीमद् भागवत गीता में परम परम अक्षर

135
00:10:25,040 --> 00:10:29,040
ब्रह्म बताया गया है। भाई साहब मैं देखिए हम लोग एक सुनिए

136
00:10:29,040 --> 00:10:32,640
तो मैं आपसे प्रमाण पूछूंगा

137
00:10:32,640 --> 00:10:36,640
मगर बिना बात के प्रमाण आप मत दीजिए। आप खाली अपनी विचार बताइए। जहां

138
00:10:36,640 --> 00:10:40,720
प्रमाण की आवश्यकता होगी मैं बोल दूंगा। हां सतलोक सतलोक

139
00:10:40,720 --> 00:10:44,960
सतलोक जाना है। सतलोक जाएगी। तो सतलोक जाकर के जन्म

140
00:10:44,960 --> 00:10:49,440
मरण के चक्कर से छूट जाएगी। जी

141
00:10:49,440 --> 00:10:53,520
बाकी दुख तकलीफ से नहीं छूटेगी।

142
00:10:53,520 --> 00:10:57,600
दुख तकलीफ से तो यहां पर जब तक रहेंगे तब तक छूट ही जाएंगे।

143
00:10:57,600 --> 00:11:01,680
यहां भी छूटेंगे और बाकी वहां जाने के बाद तो जन्म मृत्यु होगी

144
00:11:01,680 --> 00:11:06,000
ही नहीं। सारे दुखों से छूट जाएंगे। अभी आप दुख तकलीफ

145
00:11:06,000 --> 00:11:09,120
से छूटे हुए हैं।

146
00:11:09,120 --> 00:11:13,600
90% यानी पूरी तरीके से नहीं छूटे हुए हैं।

147
00:11:13,600 --> 00:11:17,680
हां समय लगता है। अच्छा 90%

148
00:11:17,680 --> 00:11:23,680
ये कैसे पता चला आपको कि मैं 90% छूटा हुआ हूं? 90%

149
00:11:26,240 --> 00:11:30,800
मैं अपना सवाल क्लियर कर दूं। मैं अपना सवाल क्लियर कर दूं। 90%

150
00:11:30,800 --> 00:11:34,880
छूटे हुए का मतलब है कि आपको ये मालूम है कि मुझे कितने

151
00:11:34,880 --> 00:11:38,880
दुख मिलने वाले हैं और फिर वो नहीं

152
00:11:38,880 --> 00:11:42,960
मिल रहे। यानी कि आपके पास कोई लेखाजोखा है कि मुझे इतने ज्यादा

153
00:11:42,960 --> 00:11:47,040
दुख मिलने वाले हैं पर वो नहीं मिल रहे। इसलिए मैं 90% टूटा

154
00:11:47,040 --> 00:11:51,280
हुआ मान रहा हूं और 10% नहीं छूटा हुआ। तो ये आपके

155
00:11:51,280 --> 00:11:55,280
पास कोई विवरण है क्या? आपके लिए कौन-कौन से दुख है जो बंधे

156
00:11:55,280 --> 00:11:59,920
हुए हैं? हमारे ऊपर मुसीबतों का पहाड़ था सर जी।

157
00:11:59,920 --> 00:12:05,200
वो मैं ये नहीं कह रहा हूं आपके पास क्या था? आप 90%

158
00:12:05,200 --> 00:12:09,360
आपके आप 90%

159
00:12:09,360 --> 00:12:14,000
मेरा सवाल कुछ और भाई साहब भाई साहब देखिए ट्रैक मत बदलिए।

160
00:12:14,000 --> 00:12:18,160
ट्रैक बदलेंगे दिक्कत आएगी। ट्रैक मैं सवाल यह पूछ

161
00:12:18,160 --> 00:12:22,160
रहा हूं कि यदि आप यह कह रहे हैं कि मैं 90% बचा हुआ

162
00:12:22,160 --> 00:12:26,400
हूं। यानी कि आपको 100% की वैल्यू पता है।

163
00:12:26,400 --> 00:12:30,400
वो वैल्यू कैसे पता है? उसका रिकॉर्ड कहां पर मेंटेन है? इस

164
00:12:30,400 --> 00:12:34,480
बारे में कोई प्रमाण है शास्त्र का तो वो मुझे बताइए। आपके पास

165
00:12:34,480 --> 00:12:38,560
नहीं इसका इसका प्रमाण हमारे पास नहीं है। तो ये सिद्ध कैसे होगा कि

166
00:12:38,560 --> 00:12:42,560
90% आप बचे हुए हैं। मान लीजिए

167
00:12:42,560 --> 00:12:46,640
मान लीजिए मैं बता रहा हूं। आप जो कहने जा रहे हैं उसको ले लेता हूं।

168
00:12:46,640 --> 00:12:51,440
मान लीजिए कि आपने कहा कि मैं इतना फंसा हुआ था।

169
00:12:51,440 --> 00:12:55,440
ठीक? और फिर यहां आने के बाद में छूट गया। यह भी

170
00:12:55,440 --> 00:12:59,760
तो हो सकता है कि जितना आप फंसे हुए थे और जिस दिन आप छूटे

171
00:12:59,760 --> 00:13:03,760
हैं वही उसी दिन तक आपको वो तकलीफें मिलनी थी। उसके

172
00:13:03,760 --> 00:13:07,840
बाद वो तकलीफें नहीं मिलनी थी। मतलब कि आपके

173
00:13:07,840 --> 00:13:11,840
हिस्से में जो दुख बांधा गया था वो उतना ही था जितना जिसके

174
00:13:11,840 --> 00:13:15,840
बाद आप छूट गए उससे। और अगर आप यह कहेंगे आज की

175
00:13:15,840 --> 00:13:20,080
डेट में कि 90% मैं बचा हुआ हूं बिल्कुल कांटे की नोक

176
00:13:20,080 --> 00:13:24,080
पर तो फिर आपको निश्चित करना होगा हमें प्राकट

177
00:13:24,080 --> 00:13:24,580
प्रमाण

178
00:13:24,560 --> 00:13:28,640
के साथ कि 90% ये मेरा दुख ये खड़ा है पर मुझे छू नहीं

179
00:13:28,640 --> 00:13:32,640
पा रहा है। इसलिए मैं बचा हुआ हूं। केवल 10% दुख मुझे

180
00:13:32,640 --> 00:13:36,880
छू पा रहा है। नहीं इसका प्रमाण नहीं दिया। इसका प्रमाण

181
00:13:36,880 --> 00:13:40,960
दिया नहीं। ठीक है। अब यह वैसे भी हमारे मेन विषय से अलग है।

182
00:13:40,960 --> 00:13:44,960
आपने 10% तो माना ही है कि 10% वो है दुख

183
00:13:44,960 --> 00:13:48,960
तकलीफ है। जीवन में थोड़े ये मानना ही पड़ेगा कि जो सतलोक

184
00:13:48,960 --> 00:13:53,120
का सुख है वो यहां नहीं है। ये तो सही बात है। ये

185
00:13:53,120 --> 00:13:57,360
सही बात है। यानी कि सतलोक में ऐसा सुख है जो कभी खत्म

186
00:13:57,360 --> 00:14:00,560
नहीं होता।

187
00:14:00,560 --> 00:14:04,560
पूछ रहा हूं आपसे। दुख नाम की चीज ही नहीं है तो खत्म

188
00:14:04,560 --> 00:14:10,560
होने का सवाल ही कहां? दुख नाम की चीज नहीं है। मतलब कि

189
00:14:11,120 --> 00:14:15,120
जो हम पाना चाहते हैं वह पा लेते हैं। क्या मतलब? जैसे कई बार आती

190
00:14:15,120 --> 00:14:19,360
है ना इच्छा कि मुझे वो चाहिए। तो जो हम पाना चाहते हैं वो पा

191
00:14:19,360 --> 00:14:23,360
लेते हैं। इसलिए दुख नहीं है कैसे? थोड़ा सा बताएंगे। ऐसा कुछ है जो

192
00:14:23,360 --> 00:14:27,440
हमें वहां ना मिलता हो। जाने पर वहां जाने के बाद

193
00:14:27,440 --> 00:14:32,160
सारी इच्छाएं मनुष्य की खत्म हो जाती है।

194
00:14:32,160 --> 00:14:36,240
मतलब वो जगह ऐसी है जहां पर कोई इच्छा बाकी नहीं रह

195
00:14:36,240 --> 00:14:40,880
जाती। बाकी नहीं रहती।

196
00:14:40,880 --> 00:14:45,920
वो जगह ऐसी है जहां पर कोई इच्छा बाकी नहीं रह जाती। हां।

197
00:14:45,920 --> 00:14:50,080
और यदि हमें ऐसी जगह भेजा जा रहा है जहां पर इच्छा बाकी

198
00:14:50,080 --> 00:14:54,080
रहे तो वो जगह तो मोक्ष की कहलाएगी।

199
00:14:54,080 --> 00:14:58,080
वो हो ही नहीं सकता मोस्ट की जगह। तो अब मैं

200
00:14:58,080 --> 00:15:02,400
आता हूं तो दोबारा से प्रश्न पे कि जो आत्मा

201
00:15:02,400 --> 00:15:06,640
है जो यहां फंसी हुई है वो यहां से पहले कहां

202
00:15:06,640 --> 00:15:10,320
थी और फिर कैसे फंसी?

203
00:15:10,320 --> 00:15:14,560
ये तो आपने बहुत सारी चर्चाओं में आपने सुन रखा है। और

204
00:15:14,560 --> 00:15:18,800
फिर हमसे जानने का उसका कुछ औचित्य नहीं बनता है।

205
00:15:18,800 --> 00:15:22,800
औचित्य यही है। ठीक है। मैं बता देता हूं। औचित्य क्या है? मैं बता देता

206
00:15:22,800 --> 00:15:26,880
हूं। आपने कहा कि जहां पर कोई इच्छा नहीं बाकी रहती है वो मोक्ष

207
00:15:26,880 --> 00:15:31,280
की जगह है। पर आपके ही अनुसार जो जीव है उसके

208
00:15:31,280 --> 00:15:35,360
अंदर वो काल नाम का जो आपका

209
00:15:35,360 --> 00:15:39,440
राक्षस है क्या है वो उसको फॉलो करने की इच्छा

210
00:15:39,440 --> 00:15:43,840
आई। उसके पीछे पीछे जाने की इच्छा आई।

211
00:15:43,840 --> 00:15:48,000
तब जो है जीव फसा संसार में। वो इच्छा कैसे आ गई? अगर

212
00:15:48,000 --> 00:15:52,000
वो सतलोक में है। अगर वहां कोई इच्छा आएगी नहीं। वहां दुख का नाम ही

213
00:15:52,000 --> 00:15:58,000
नहीं है, अस्तित्व ही नहीं है। तो वो कमी कैसे आ गई उसके अंदर?

214
00:16:01,440 --> 00:16:04,080
बताइए।

215
00:16:04,080 --> 00:16:08,320
ये इसका इसका तो आपने लोगों से सुन रखा है। आपके वीडियो में मैंने

216
00:16:08,320 --> 00:16:12,560
देखा है। लोगों से ये सवाल भी पूछे हैं। उसका उत्तर भी लोगों ने दिया है। उत्तर

217
00:16:12,560 --> 00:16:17,200
दिया तो वही उत्तर आप दीजिए मुझे। दे दीजिए। आपके

218
00:16:17,200 --> 00:16:21,280
अनुसार लोगों ने उत्तर दिया है ना? हां आपने उत्तर

219
00:16:21,280 --> 00:16:25,360
आपने वो चीज तो कई वीडियो मैंने आपका देखा था उसमें

220
00:16:25,360 --> 00:16:30,320
उत्तर दे दीजिए मैं अभी देखता हूं कौन सा उत्तर है भाई तो

221
00:16:30,320 --> 00:16:34,720
क्योंकि काल भी परमात्मा का ही अंश है

222
00:16:34,720 --> 00:16:40,080
और वो वो भी साथ ही रहता था और

223
00:16:40,080 --> 00:16:44,160
उसको मैं ये नहीं पूछ रहा हूं भाई साहब मैं ये नहीं पूछ रहा हूं कि कैसे वो

224
00:16:44,160 --> 00:16:48,400
क्या-क्या हुआ था विवरण नहीं पूछ रहा हूं आपसे मैं पूछ रहा हूं इच्छा कैसे

225
00:16:48,400 --> 00:16:52,400
आ गई आप यह बताइए इच्छा आ सकती है कि नहीं आ सकती है

226
00:16:52,400 --> 00:16:56,480
सतलोक में या तो आ अगर आ सकती है

227
00:16:56,480 --> 00:17:00,560
तो वो मोक्षदायक जगह नहीं है और नहीं आ सकती है तो

228
00:17:00,560 --> 00:17:04,640
वहां आई थी फिर जीव फसना नहीं चाहिए था ये बात मैं विवरण

229
00:17:04,640 --> 00:17:08,800
नहीं पूछ रहा हूं। जैसे मैंने पूछा कि भैया जब आपने कहा कि मोटरसाइकिल

230
00:17:08,800 --> 00:17:12,960
से हम यात्रा करते हैं धरती पर चलते हैं तो ये मोटरसाइकिल

231
00:17:12,960 --> 00:17:16,800
चल क्यों नहीं रही है? तो आपने बताया कि भैया देखो उसमें

232
00:17:16,800 --> 00:17:21,040
पेट्रोल कम है, उसमें यह है, उसमें वह है। इसका मतलब कि वह यात्रा

233
00:17:21,040 --> 00:17:25,680
कराने में सक्षम नहीं है। हमें ये मानना पड़ेगा ना

234
00:17:25,680 --> 00:17:29,840
कुल मिलाकर के कि वो जो है यात्रा कराने में सक्षम

235
00:17:29,840 --> 00:17:34,240
नहीं है। तो आप मुझे ये बताएं कि वहां पर इच्छा

236
00:17:34,240 --> 00:17:38,720
आ सकती है कि नहीं आ सकती है।

237
00:17:38,720 --> 00:17:43,040
देखिए सृष्टि रचना के समय की प्रारंभिक स्टडी है। स्टेज

238
00:17:43,040 --> 00:17:47,120
है हम भाई साहब मुझे मुझे मुझे आप

239
00:17:47,120 --> 00:17:51,280
क्लियर देखिए पहले मुझे हेडलाइन बता दीजिए कि आप मेरे प्रश्न से

240
00:17:51,280 --> 00:17:55,520
संबंधित क्या बताने जा रहे हैं फिर उसके अंदर जाइए डिटेल में पहले मैंने

241
00:17:55,520 --> 00:17:59,680
पूछा है आप इसको क्लियर करिए सतलोक में कोई इच्छा आ

242
00:17:59,680 --> 00:18:03,920
सकती है कि नहीं आ सकती यानी कि सतलोक में हमें किसी

243
00:18:03,920 --> 00:18:07,920
प्रकार का अभाव महसूस हो सकता है या नहीं हो

244
00:18:07,920 --> 00:18:10,720
सकता है

245
00:18:10,720 --> 00:18:14,800
वहां अभाव महसूस नहीं होता लेकिन हर इंसान की

246
00:18:14,800 --> 00:18:18,800
इच्छा तो होती है कुछ और और अगर ज्यादा पाने

247
00:18:18,800 --> 00:18:22,800
की और कुछ बनने की इच्छा हो रही है और वो वहां से भटक रहा

248
00:18:22,800 --> 00:18:27,040
है तो उसको कुछ कोई कुछ नहीं कर सकता। इसका मतलब जब ये सतलोक में जाएंगे

249
00:18:27,040 --> 00:18:31,440
तो इनकी इच्छा हो सकती है और कहीं भटक सकते हैं। भटक

250
00:18:31,440 --> 00:18:31,940
सकते हैं।

251
00:18:31,840 --> 00:18:36,640
जिस तरीके से वो भटक करके आ गए। उसके साथ सभी लोग आ गए तो भटक सकते हैं।

252
00:18:36,640 --> 00:18:40,960
भटक दोबारा से फस सकते हैं जीवन मरण के चक्कर में भटक के।

253
00:18:40,960 --> 00:18:45,120
लेकिन जिस चीज का जिस दुख का पहले से ही एहसास रहेगा

254
00:18:45,120 --> 00:18:49,280
कि भाई यह दुख को हमने झेल करके आए हैं तो वापस आदमी उसी

255
00:18:49,280 --> 00:18:53,280
काटों में उलझेगा नहीं। ये चीज पहले तो

256
00:18:53,280 --> 00:18:58,800
मुझे ये बताइए कि ये सिद्धांत कहां लिखा है?

257
00:18:58,800 --> 00:19:01,440
हम

258
00:19:01,440 --> 00:19:06,800
ये सिद्धांत गीता जी ने भी आपका थोड़ा आपका थोड़ा सर कट रहा है। ये

259
00:19:06,800 --> 00:19:10,960
सिद्धांत कहां लिखा है? यह सिद्धांत गीता जी में भी बताया

260
00:19:10,960 --> 00:19:15,200
गया है। वहां जाने के बाद जिस चीज का दुख जिस

261
00:19:15,200 --> 00:19:19,520
चीज का दुख हम एक बार झेल लेते हैं उसके लिए हम प्रिपेयर रहेंगे

262
00:19:19,520 --> 00:19:23,680
पहले से ही। ये

263
00:19:23,680 --> 00:19:26,800
फिर उसमें हम नहीं फसेंगे।

264
00:19:26,800 --> 00:19:30,880
कबीर सागर के द्वारा है। कबीर सागर के द्वारा

265
00:19:30,880 --> 00:19:36,080
लिखा है। हमारे सनातन शास्त्रों में सिद्धांत नहीं है।

266
00:19:36,080 --> 00:19:40,240
वो तो मैंने पढ़ा नहीं कि उसको बताओ। नहीं तो आप हमें तो

267
00:19:40,240 --> 00:19:44,320
हमें तो हमारे शास्त्रों से मनवाने आए हो ना। हमें इस पर

268
00:19:44,320 --> 00:19:47,120
आपत्ति कभी नहीं है कि आप अपने कबीर सागर के आधार

269
00:19:47,120 --> 00:19:51,280
पर क्या क्लेम करो। यद्यपि उसमें हमारे जो देवी देवता

270
00:19:51,280 --> 00:19:55,440
है सनातन शास्त्रों में वर्णित उनका नाम ना लो। हमें इस पर आपत्ति

271
00:19:55,440 --> 00:19:59,760
नहीं है। हमें आपत्ति इस पर है कि हमारे शास्त्रों के आधार पर आप गलत जानकारी

272
00:19:59,760 --> 00:20:03,760
या उसके विरुद्ध जाकर के जानकारी मत दो। और यहां के देवी देवताओं का

273
00:20:03,760 --> 00:20:08,480
नाम मत खराब करो। अपने आप चाहे जिसकी पूजा करो आप।

274
00:20:08,480 --> 00:20:12,560
हमें आपत्ति इस बात की नहीं। कबीर सागर में क्या लिखा है? हमें आपत्ति इस बात पे है कि

275
00:20:12,560 --> 00:20:16,560
आपने गीता के नाम पर क्या-क्या फैलाया है। उसके लिए हम

276
00:20:16,560 --> 00:20:20,960
आप यहां बैठे हुए हैं। तो ठीक है।

277
00:20:20,960 --> 00:20:25,040
हम ये कहेंगे कि जैसे गीता जी में

278
00:20:25,040 --> 00:20:29,120
गीता जी तो सभी धर्म ग्रंथों का सार है। चारों वेदों का सार

279
00:20:29,120 --> 00:20:33,440
है। भाई साहब सुनिए मेरी बात एक समझिए। पहले आप मुझे क्लियर

280
00:20:33,440 --> 00:20:37,440
करिए कि हम क्या सुनने जा रहे हैं। खामखा एक आप

281
00:20:37,440 --> 00:20:41,680
लंबा सा एक प्रवचन दे दे। उसके बाद में आपसे कहूं मैंने तो ये पूछा ही नहीं था। तो

282
00:20:41,680 --> 00:20:45,760
मैं आपसे पूछ रहा हूं कि क्या आपके पास सनातन शास्त्रों से इस

283
00:20:45,760 --> 00:20:49,920
बात का प्रमाण है कि एक बार जो दुख हो गया उसके

284
00:20:49,920 --> 00:20:54,000
लिए दोबारा हम लोग उसमें नहीं फस सकते। जो

285
00:20:54,000 --> 00:20:58,000
व्यक्ति चोरी करता है, जेल जाता है, क्या वह

286
00:20:58,000 --> 00:21:02,080
दोबारा जेल नहीं जाता? दोबारा चोरी नहीं करता।

287
00:21:02,080 --> 00:21:02,580
चोरी

288
00:21:02,480 --> 00:21:07,200
करेगा तो करता है कि नहीं? करता है कि नहीं?

289
00:21:07,200 --> 00:21:11,360
करता है कि नहीं? करेगा तो जाएगा। करेगा तो जाएगा। मैं मैं पूछ रहा हूं कोई

290
00:21:11,360 --> 00:21:15,360
व्यक्ति एक ही अपराध सजा पा लेने के बाद भी दोबारा करता है कि

291
00:21:15,360 --> 00:21:19,440
नहीं? करता है। तो आपने जो

292
00:21:19,440 --> 00:21:24,720
सिद्धांत दिया वो ना तो तार्किक सिद्ध हुआ और ना आपने प्रमाण दिया।

293
00:21:24,720 --> 00:21:29,040
तो ये सिद्धांत यहां का नहीं है।

294
00:21:29,040 --> 00:21:33,200
ये तो सतलोक की बात कर रहे हैं। ये सतलोक की बात कर रहे। भौतिक

295
00:21:33,200 --> 00:21:37,280
जगत की बात कर रहे। दोनों में डिफरेंस है ना सर? तो भाई सतलोक के बारे में

296
00:21:37,280 --> 00:21:41,360
भौतिक जगत के अंदर उपलब्ध शास्त्रों में लिखा है ना। तभी तो सतलोक को जानते

297
00:21:41,360 --> 00:21:45,440
हो। सतलोक को आपने कहां से जाना? एक मिनट। सतलोक को आपने कहा

298
00:21:45,440 --> 00:21:49,760
सतलोक में जाना कि यहां जाना गीता जी में खुद

299
00:21:49,760 --> 00:21:54,000
बताया गया है ना भाई साहब आप मुझे सज्जन व्यक्ति लग रहे हैं

300
00:21:54,000 --> 00:21:58,240
इसलिए मैं आपसे स्पष्ट बातें चाह रहा हूं स्पष्ट बातों पर रहिए

301
00:21:58,240 --> 00:22:02,400
आपने कहा कि भैया एक बार जिसमें व्यक्ति चक लेगा दुख

302
00:22:02,400 --> 00:22:06,400
का स्वाद तो उसके बाद दोबारा उसमें नहीं फसेगा मैंने आपको तर्क भी दे दिया

303
00:22:06,400 --> 00:22:10,480
प्रमाण आप मुझे दे नहीं रहे आपके पास कोई प्रमाण है सनातन शास्त्रों से तो हम

304
00:22:10,480 --> 00:22:14,000
दूसरी बात करते हैं

305
00:22:14,000 --> 00:22:17,600
अभी इस चीज का प्रमाण तो मैं गीता जी की बात कर रहा हूं तो आप बोल रहे

306
00:22:17,600 --> 00:22:21,600
उसकी बात मत करो अभी गीता जी की बात कहां कर रहे थे आपने कहा कि प्रमाण

307
00:22:21,600 --> 00:22:26,800
कबीर सागर में सनातन शास्त्रों में प्रमाण नहीं है अब आप कह रहे हो है

308
00:22:26,800 --> 00:22:30,960
नहीं गीता जी के 18 भाई साहब मैंने पूछा

309
00:22:30,960 --> 00:22:35,040
ये प्रमाण है क्या एक बार दुख चख लेने के बाद दोबारा नहीं

310
00:22:35,040 --> 00:22:39,600
चखेगा ये प्रमाण है क्या गीता जी में नहीं

311
00:22:39,600 --> 00:22:43,920
चखेगा ये बात अलग है ये पॉइंट अलग है क्योंकि

312
00:22:43,920 --> 00:22:48,000
अगर उस इंसान को इस दुख का आभास रहेगा

313
00:22:48,000 --> 00:22:52,240
तो 100% 99% ये होता है कि वापस उस तरफ

314
00:22:52,240 --> 00:22:56,800
ना जाए। 99 है कि 100 है? नहीं 99

315
00:22:56,800 --> 00:23:01,040
100 एक% तो कुछ भी कर सकता है। यानी कि आपका

316
00:23:01,040 --> 00:23:06,000
जो मोक्ष है वो 99% सही है। एक% की वहां चूक है।

317
00:23:06,000 --> 00:23:10,400
ये आप कह सकते हैं। आप ही ने तो कहा 99% नहीं जाएगा।

318
00:23:10,400 --> 00:23:15,200
नहीं हम हम नहीं मान सकते उस बात को आपके द्वारा हो सकता है।

319
00:23:15,200 --> 00:23:19,360
अरे आप 99% मोक्ष मान रहे हो सतलोक में कि 100% मोक्ष

320
00:23:19,360 --> 00:23:23,440
मान रहे हो? मोक्ष तो 100% होना है। तो आप तो कह

321
00:23:23,440 --> 00:23:28,000
रहे हो 99% आदमी नहीं जाएगा इधर उधर। लेकिन जो भटकाव

322
00:23:28,000 --> 00:23:32,000
वाली बात है 1% भटकाव भटकाव होने का चांस है

323
00:23:32,000 --> 00:23:32,880
ना 1%

324
00:23:32,880 --> 00:23:36,880
आपके अनुसार। हां तो वो बता तो रहा है कि एक% है

325
00:23:36,880 --> 00:23:41,760
वो भटक जा सकता है। एक% का भटकाव का चांस है।

326
00:23:41,760 --> 00:23:45,840
सतलोक में भी एक% की इच्छा आ जाने का भटकाव

327
00:23:45,840 --> 00:23:50,080
आ जाने का अभाव महसूस होने का चांस है।

328
00:23:50,080 --> 00:23:54,720
हम है ना? हां। सही बात है।

329
00:23:54,720 --> 00:23:59,280
तो फिर ये मोक्ष कैसे हुआ? आपने तो कहा मोक्ष तो वो है जहां पर अभाव ना हो।

330
00:23:59,280 --> 00:24:03,440
दुख का नाम ही ना हो।

331
00:24:03,440 --> 00:24:08,000
अब दुख का नाम तो नहीं है। दुख का नाम तो वहां होगा नहीं।

332
00:24:08,000 --> 00:24:12,000
लेकिन आदमी की मनुष्य की अगर इच्छा इस

333
00:24:12,000 --> 00:24:16,000
ढंग से बलवती हो रही है कि भाई वो सबके ऊपर परमात्मा के

334
00:24:16,000 --> 00:24:20,000
भी ऊपर जाने की कोशिश करता है तो वहां पे तो वो भटकाव

335
00:24:20,000 --> 00:24:24,240
तो होना है। निश्चित है। यानी कि जब व्यक्ति के अंदर मान लीजिए

336
00:24:24,240 --> 00:24:28,240
ऐसी कोई इच्छा आ गई कोई कोई ऐसी इच्छा आ सकती है जिसके कारण

337
00:24:28,240 --> 00:24:32,560
पूरा ना होने पर वो दुखी हो। वो खुद सोचने

338
00:24:32,560 --> 00:24:36,640
लगे कि व्यक्ति दुखी तभी व्यक्ति दुखी तभी

339
00:24:36,640 --> 00:24:40,880
होता है ना जब उसकी इच्छा पूर्ति नहीं होती तो वो दुखी होता है।

340
00:24:40,880 --> 00:24:44,960
सही बात है। तो यानी कि वहां पर ऐसा कुछ हो

341
00:24:44,960 --> 00:24:48,960
सकता है जिसके कारण व्यक्ति दुखी हो।

342
00:24:48,960 --> 00:24:54,000
हां वही सर्वे सर्वा बनने की इच्छा तो फिर आप

343
00:24:54,000 --> 00:24:58,080
फिर वहां पर आपका मोक्ष सिद्ध नहीं हो रहा है। ये मानना

344
00:24:58,080 --> 00:25:02,320
पड़ेगा। ठीक। अब मैं एक बात अगली करता हूं।

345
00:25:02,320 --> 00:25:06,560
अब मैं एक बात अगली करता हूं। यह बताइए

346
00:25:06,560 --> 00:25:11,440
कि जब काल मर जाता है, काल मरता है कि नहीं मरता है?

347
00:25:11,440 --> 00:25:15,760
काल खुद कह रहे हैं कि हमारी जन्म मृत्यु होती है। हम तो

348
00:25:15,760 --> 00:25:19,760
काल की वजह से ही फंसते हैं लोग इस दुनिया में। जीव

349
00:25:19,760 --> 00:25:23,840
हां। है ना? काल को देख के अट्रैक्ट होते

350
00:25:23,840 --> 00:25:28,000
हैं और काल की वजह से फंस जाते हैं। तो

351
00:25:28,000 --> 00:25:32,160
काल जब मरता है उसकी जन्म मृत्यु होती है।

352
00:25:32,160 --> 00:25:36,160
तो जब जिसने आपको फसाया है

353
00:25:36,160 --> 00:25:40,160
वो मर गया जिसकी वजह से आप फंसे हो। काल के लोक में फसे हो तो

354
00:25:40,160 --> 00:25:46,160
आप मुक्त माने जाओगे। सारे जीव मुक्त हो गए। फिर तो

355
00:25:46,320 --> 00:25:51,200
काल की मृत्यु वो तो प्रलय होने के बाद हो गया।

356
00:25:51,200 --> 00:25:55,200
अरे कभी भी हो जिस समय काल मरता है उस समय

357
00:25:55,200 --> 00:25:59,280
जिसने काल की पूजा नहीं भी की होगी वो

358
00:25:59,280 --> 00:26:03,200
मुक्त होगा ना

359
00:26:03,200 --> 00:26:07,280
ये तो बहुत ही अंत की बात कर रहे

360
00:26:07,280 --> 00:26:11,280
हैं आप अरे कभी की बात है मैं पूछ रहा हूं जिसने

361
00:26:11,280 --> 00:26:15,840
आपके रामपाल के अनुसार पूजा भक्ति नहीं की होगी

362
00:26:15,840 --> 00:26:20,160
नाम दीक्षा नहीं ली होगी काल जब मरेगा काल जब मरता

363
00:26:20,160 --> 00:26:24,560
है तो उस समय जो आत्माएं होंगी फंसी हुई काल के लोक में वो मुक्त होंगी

364
00:26:24,560 --> 00:26:28,720
ना मुक्त मानना पड़ेगा ना उनको क्योंकि काल की वजह से फंसी

365
00:26:28,720 --> 00:26:32,880
थी वो

366
00:26:32,880 --> 00:26:37,040
अब इसका जवाब मेरे पास नहीं है हां तो हमें

367
00:26:37,040 --> 00:26:41,280
उन्हें मुक्त ही मानना पड़ेगा और दिक्कत ये है कि हमने कहा

368
00:26:41,280 --> 00:26:45,280
कि जैसे ही मुक्त हुए तो कहां गए? जब यह

369
00:26:45,280 --> 00:26:49,440
सब फसने फसाने का चक्कर ही समाप्त हो गया तो हम कहां गए

370
00:26:49,440 --> 00:26:53,520
सीधे वही जहां से आए थे और जब वहां से आए थे उसके बाद आपने

371
00:26:53,520 --> 00:26:57,680
कहा ना नहीं फसेगा वहां गए कहां वो

372
00:26:57,680 --> 00:27:01,840
तो उसी जगह कहां रहे गए गए कहां रह गए

373
00:27:01,840 --> 00:27:05,840
ना उसी जगह क्योंकि उनको रास्ता तो आगे का मिला नहीं वो तो गए

374
00:27:05,840 --> 00:27:09,840
कहां वो तो वही रह गए ना प्रलय हो गया मृत्यु हो गई सबकी मृत्यु हो

375
00:27:09,840 --> 00:27:13,840
गई दुनिया खत्म हो गई दुनिया खत्म हो गई मगर

376
00:27:13,840 --> 00:27:17,920
मनुष्य धरती पर धरती पर जीवित रहा तो वही रह

377
00:27:17,920 --> 00:27:22,080
गए ना फिर मनुष्य नहीं रहा मनुष्य मनुष्य का भी

378
00:27:22,080 --> 00:27:26,480
शरीर खत्म हो गया सब कुछ हो गया वात चक्र तो वही वही घूमेगा

379
00:27:26,480 --> 00:27:30,640
ना फिर आगे कहां गया वो कहां कहां गया

380
00:27:30,640 --> 00:27:34,640
वो धरती पर था मनुष्य एक व्यक्ति है जिंदा ठीक

381
00:27:34,640 --> 00:27:38,720
जो काल की वजह से यहां फंसा हुआ है एक जीव है अब जब

382
00:27:38,720 --> 00:27:42,880
काल मरा तो वो उसकी बॉडी मरी

383
00:27:42,880 --> 00:27:47,040
वो वो मर के कहीं और गया कि नहीं गया? गया तो कहां गया? नहीं

384
00:27:47,040 --> 00:27:48,000
गया तो कहां रहा?

385
00:27:48,000 --> 00:27:52,400
बताइए। भाई अभी हम पृथ्वी पे हैं।

386
00:27:52,400 --> 00:27:56,480
पृथ्वी का प्रलय हो पृथ्वी का प्रलय हो जाएगा। काल

387
00:27:56,480 --> 00:28:00,480
भी खत्म हो जाएगा तो पृथ्वी कहां जाएगी? पृथ्वी तो है

388
00:28:00,480 --> 00:28:04,720
ना। तो पृथ्वी कहां है? जितने लोग

389
00:28:04,720 --> 00:28:08,800
जितने लोग यही रह जाएंगे। ऊपर कहां जाएंगे? क्योंकि उनको रास्ता ही नहीं

390
00:28:08,800 --> 00:28:12,800
मिला। अरे तो पृथ्वी खत्म हो गई। जब प्रलय आ गई काल का

391
00:28:12,800 --> 00:28:16,800
लोक खत्म हो गया तो जो लोग बचेगा उसी में जाएंगे ना हां

392
00:28:16,800 --> 00:28:20,960
तो पानी पानी रहा पानी में आए फिर वापस पृथ्वी उसमें

393
00:28:20,960 --> 00:28:25,200
रहेगी ये आपकी ये आपकी ये आपकी सृष्टि रचना

394
00:28:25,200 --> 00:28:30,640
में कहां लिखा है

395
00:28:30,640 --> 00:28:34,800
मैंने कहा था ना मैंने कहा था ना कि मैं आपसे मांगूंगा प्रमाण

396
00:28:34,800 --> 00:28:39,840
जहां आवश्यकता होगी वहां मांगूंगा जब अपने अंदाजी मुद्दे फेंकोगे मनगढ़ंत

397
00:28:39,840 --> 00:28:43,840
बातें बोलोगे तो फिर मैं पूछूंगा कि तुम्हारे बाबा जी ने कहां पर लिखा है

398
00:28:43,840 --> 00:28:48,480
ये? आपने जिससे दीक्षा ली है उन्होंने कहां लिखा है?

399
00:28:48,480 --> 00:28:52,640
यहां तो हम गीता सुनिए आप जो बात जो आप एक मिनट

400
00:28:52,640 --> 00:28:57,040
जो बात आप इस समय बोल रहे हैं वो बात तो सनातन

401
00:28:57,040 --> 00:29:01,280
सनातन एक मिनट एक मिनट भाई साहब एक मिनट सनातन शास्त्रों

402
00:29:01,280 --> 00:29:05,360
की तो दूर की बात है। जो बात आप इस समय बोल रहे हैं कि पृथ्वी नहीं

403
00:29:05,360 --> 00:29:09,440
रहेगी तो पानी में रहेंगे। यह बात आपके जो रामपाल जी है

404
00:29:09,440 --> 00:29:13,520
उन्होंने भी नहीं रखी होगी। यह तो तर्क की बात

405
00:29:13,520 --> 00:29:16,960
आप कर रहे हैं। सर जी तर्क

406
00:29:16,960 --> 00:29:21,040
क्या करेंगे? आप कुतर्क कर रहे हैं ना। देखिए प्रमाण की जरूरत

407
00:29:21,040 --> 00:29:25,200
कहां होती है? वहां होती है जब आप कुछ ऐसी बात कर रहे हो जिसको

408
00:29:25,200 --> 00:29:29,440
मैं नहीं मान पा रहा हूं या मैं कुछ ऐसी बात कर रहा हूं जिसको आप नहीं मान पा रहे हैं तब हमें

409
00:29:29,440 --> 00:29:33,440
एक हायर अथॉरिटी की आवश्यकता होती है तो कम

410
00:29:33,440 --> 00:29:38,000
से कम मुझे सनातन शास्त्रों से नहीं तो कम से कम इसमें अपने

411
00:29:38,000 --> 00:29:42,080
गुरु की वाणी ही दे दीजिए कि भैया यहां रहेंगे लोग जब

412
00:29:42,080 --> 00:29:45,760
धरती खत्म हो गई तो आपने कहा पानी पानी कहां पर है कहां

413
00:29:45,760 --> 00:29:50,320
भरा हुआ है पानी

414
00:29:50,320 --> 00:29:54,480
मन से कुछ भी बोलते चले चले जाओ। ये गलत बात है। ठीक

415
00:29:54,480 --> 00:29:58,560
नहीं है ये। तो हमें यह मानना पड़ेगा

416
00:29:58,560 --> 00:30:02,560
कि जब काल मरता है तो जिस लोक

417
00:30:02,560 --> 00:30:06,560
से आत्माएं यहां आई हैं जिस कारण से आई है वो कारण

418
00:30:06,560 --> 00:30:10,560
जब खत्म हो गया वो मुक्त हो गए तो मुक्त हो के वही पहुंचे जहां से

419
00:30:10,560 --> 00:30:14,640
आई है और फिर आप ही ने कहा काल फिर जन्म लेता है तो काल

420
00:30:14,640 --> 00:30:19,200
ने फिर जन्म लिया तो फिर अट्रैक्ट होंगी और फिर फसेंग यानी कि

421
00:30:19,200 --> 00:30:23,200
सतलोक में मुक्ति नहीं मिल रही है। इतना अभी तक हमें क्लियर

422
00:30:23,200 --> 00:30:27,440
हो गया। एक तो वो 99% से हो गया और एक इस वाली बात से हो गया।

423
00:30:27,440 --> 00:30:31,760
अब आगे चलते हैं। आपने सतलोक सतलोक इसी

424
00:30:31,760 --> 00:30:35,840
को मान रहे हैं। किसको मान रहे हैं?

425
00:30:35,840 --> 00:30:39,840
इसी इसी इसी लोक को आप सतलोक मान रहे हैं। आपके किस

426
00:30:39,840 --> 00:30:45,840
को किस लोक को? पृथ्वी लोक को

427
00:30:47,760 --> 00:30:52,240
बैठक काल काल

428
00:30:52,240 --> 00:30:56,240
का जो 21 ब्रह्मांड है उसी को आप सतलोक मान रहे काल मरा तो सब मर

429
00:30:56,240 --> 00:31:00,640
गए और वहां से मुक्त हो गए तो काल मरने

430
00:31:00,640 --> 00:31:04,640
पे जो जो काल की वजह से फंसी हुई है काल जिनको फसा

431
00:31:04,640 --> 00:31:08,880
रहा है काल नहीं चाहता कि ये मुक्त हो जब वो मर जाएगा

432
00:31:08,880 --> 00:31:14,880
तो फिर कौन चाहेगा कि ये फंसी कबीर

433
00:31:15,200 --> 00:31:19,360
ठीक है आगे आगे चलो हां इसीलिए

434
00:31:19,360 --> 00:31:23,840
कहते हैं कि मत खींचिए बात को अच्छा

435
00:31:23,840 --> 00:31:28,480
अब एक बात बताइए मुझे कि

436
00:31:28,480 --> 00:31:33,440
आत्मा को आप अविनाशी कहते हैं

437
00:31:33,440 --> 00:31:38,080
नित्य कहते हैं शाश्वत कहते हैं क्या कहते हैं

438
00:31:38,080 --> 00:31:42,480
आत्मा अविनाशी है नित्य है शाश्वत है मतलब

439
00:31:42,480 --> 00:31:48,240
वो ही है और रहेगी हम

440
00:31:48,240 --> 00:31:52,880
क्योंकि परमात्मा का अविनाशी जीव है तो आत्मा तो अविनाशी

441
00:31:52,880 --> 00:31:58,880
है आत्मा को कभी कुछ नहीं हो सकता है

442
00:32:00,640 --> 00:32:04,720
आत्मा को कभी कुछ नहीं आत्मा को कभी कुछ नहीं हो सकता ऐसा कोई

443
00:32:04,720 --> 00:32:10,720
समय था जब आत्मा नहीं थी

444
00:32:10,880 --> 00:32:15,040
ऐसा तो नहीं है। ऐसा नहीं है।

445
00:32:15,040 --> 00:32:21,040
यानी कि आत्मा को आप ईश्वर की तरह नित्य मानते हैं।

446
00:32:22,160 --> 00:32:26,160
सब परमात्मा ने रचा है तो परमात्मा परमात्मा खुद

447
00:32:26,160 --> 00:32:30,960
से सभी आत्माओं को खुद ने बनाया है और अपने

448
00:32:30,960 --> 00:32:36,640
पैदा किया है। यानी कि किसी समय ऐसा था जब आत्मा नहीं थी।

449
00:32:36,640 --> 00:32:40,640
हां ऐसा था। या नहीं होगी

450
00:32:40,640 --> 00:32:44,880
क्योंकि इतना इतनी विस्तृत हमको जानकारी नहीं है क्योंकि

451
00:32:44,880 --> 00:32:49,040
यही कहा गया है कि भाई परमात्मा के साथ ही सब लोग रहते

452
00:32:49,040 --> 00:32:53,600
हैं जब परमात्मा के साथ सब लोग रहते थे और आत्मा अविनाशी

453
00:32:53,600 --> 00:32:57,680
थी परमात्मा की अंश है तो फिर जो है अलग से तो थी

454
00:32:57,680 --> 00:33:03,680
नहीं तो परमात्मा और आत्मा एक ही जैसे थी

455
00:33:06,080 --> 00:33:10,160
आत्मा किसी समय मैं थी या नहीं थी इस बारे में क्लियर आंसर नहीं

456
00:33:10,160 --> 00:33:14,240
है क्या आपके पास नहीं ये क्लियर नहीं है आप

457
00:33:14,240 --> 00:33:18,320
पता नहीं आप टाइम पास करने आए हैं ऐसा लग रहा है बहुत ही हल्के तरीके से आप रख

458
00:33:18,320 --> 00:33:22,800
रहे हैं रामपाल का पक्ष खैर अविनाशी नहीं अविनाशी मानता

459
00:33:22,800 --> 00:33:26,880
है रामपाल ने अविनाशी माना है आत्मा को और

460
00:33:26,880 --> 00:33:31,120
नित्य नहीं माना है ठीक है रामपाल

461
00:33:31,120 --> 00:33:35,120
का कहना है कि आत्मा का अभाव था

462
00:33:35,120 --> 00:33:39,680
एक समय था जब आत्मा नहीं थी। अच्छा

463
00:33:39,680 --> 00:33:45,520
हम यानी कि आत्मा जो है

464
00:33:45,520 --> 00:33:50,000
क्या कहते हैं? अब एक तरीके से देखा जाए तो

465
00:33:50,000 --> 00:33:54,320
जब कोई चीज नहीं थी और है तो फिर वो नष्ट

466
00:33:54,320 --> 00:33:58,480
भी हो सकती है। उसी स्टेज में वापस जा सकती है। मगर उसने कहा

467
00:33:58,480 --> 00:34:02,720
आपकी किताब ने कि आत्मा

468
00:34:02,720 --> 00:34:07,200
का अभाव था उत्पत्ति से पहले। तो अब बात यह आती है

469
00:34:07,200 --> 00:34:13,200
फिर आत्मा का जो तत्व है वह कहां से निकाला?

470
00:34:16,880 --> 00:34:22,880
परमात्मा ने अपने अंश से निकाला। अपने को तोड़ा।

471
00:34:23,280 --> 00:34:27,840
नहीं वचन की शक्ति थी। उससे पैदा किए। वचन

472
00:34:27,840 --> 00:34:30,160
की शक्ति

473
00:34:30,160 --> 00:34:34,240
शब्द से पैदा किए। नहीं शब्द से पैदा

474
00:34:34,240 --> 00:34:38,640
किए ये तो यहां ये जो परमार्थ की दुनिया है जहां

475
00:34:38,640 --> 00:34:42,720
जो पूर्ण है सतलोक पूर्ण है

476
00:34:42,720 --> 00:34:46,880
वहां किसी चीज का अभाव है ही नहीं फिर वहां पर जो

477
00:34:46,880 --> 00:34:51,200
चीज नहीं है वो प्रकट हो रही है तो वो तत्व

478
00:34:51,200 --> 00:34:54,160
कहां से आ रहा है

479
00:34:54,160 --> 00:34:58,160
वो तत्व एकिस्ट करता था पहले या नहीं करता था

480
00:34:58,160 --> 00:35:03,280
रामपाल कह रहे हैं कि नहीं करता था तो फिर वो आत्मा

481
00:35:03,280 --> 00:35:07,920
किस चीज से बनाई? उसका मटेरियल कहां से लिया?

482
00:35:07,920 --> 00:35:13,920
शब्द की शक्ति से बनाई वो अलग है। मटेरियल कहां से लिया? उसका

483
00:35:14,640 --> 00:35:18,960
अरे परमात्मा को पता है। हमें नहीं पता। तो

484
00:35:18,960 --> 00:35:23,840
आपके जो तत्वदर्शी है उनको भी नहीं पता है।

485
00:35:23,840 --> 00:35:28,160
उनको पता होगा। उनको पता होगा। यानी कि उन्होंने

486
00:35:28,160 --> 00:35:32,400
कहीं लिखा होगा। आपको नहीं पता है? मैंने

487
00:35:32,400 --> 00:35:36,400
शायद उस चीज को नहीं पढ़ा। तो यह सब चीजें आपको पूछनी

488
00:35:36,400 --> 00:35:40,560
चाहिए ना। तात्विक बातें तो यही है। तत्व की बातें कहते हैं तत्वदर्शी

489
00:35:40,560 --> 00:35:44,640
है। अत तत्वदर्शी है तो क्या है? ब्रह्मा विष्णु महेश की पूजा नहीं

490
00:35:44,640 --> 00:35:48,720
करनी चाहिए। इनकी पूजा करनी चाहिए। मैं पहले ये था मैं ये हो गया। मैं पहले वो

491
00:35:48,720 --> 00:35:52,800
था वो हो गया। ये हो गया। तत्व की बात कहां है इसमें? अब तत्व का प्रश्न किया तो

492
00:35:52,800 --> 00:35:56,960
मुझे नहीं पता। मुझे नहीं पता। मुझे नहीं पता। यह तत्व

493
00:35:56,960 --> 00:36:01,360
का प्रश्न है जिनके उत्तर चाहिए होते हैं। इसमें फंसता है व्यक्ति

494
00:36:01,360 --> 00:36:05,360
कि आत्मा को तुम कह रहे हो कि वो नहीं है एक समय

495
00:36:05,360 --> 00:36:09,360
पे तो फिर जब आप बना रहे हो तो फिर आपको बताना पड़ेगा वो मटेरियल

496
00:36:09,360 --> 00:36:13,680
कहां से आ रहा है आत्मा का। ये है तत्वदर्शी।

497
00:36:13,680 --> 00:36:18,160
ये है तत्व ज्ञान जो आपको पता नहीं है कि

498
00:36:18,160 --> 00:36:22,320
काल मरा तो क्या हुआ? फिर दोबारा कैसे उत्पन्न हुई? ये

499
00:36:22,320 --> 00:36:26,560
सब तत्व तात्विक बात है। दार्शनिक दार्शनिक बातें कहते हैं। इनको

500
00:36:26,560 --> 00:36:29,680
एक समर्थवान गुरु ही समझा सकता है जो

501
00:36:29,680 --> 00:36:33,760
कि आपके जिसको आप गुरु कह रहे हो उसने आपको नहीं समझाया अभी तक। और कहते

502
00:36:33,760 --> 00:36:38,160
आप लोग तत्वदर्शी हो अगर उसकी शरण में जाने से

503
00:36:38,160 --> 00:36:42,240
आपका कहना है कि पहले मुझ पर बहुत तकलीफें थी और उनकी शरण

504
00:36:42,240 --> 00:36:46,400
में आने से मेरे दुख दूर हो गए। ठीक है?

505
00:36:46,400 --> 00:36:51,200
तो आप उसको यह कहिए कि दुख दूर करने वाला बाबा

506
00:36:51,200 --> 00:36:55,280
या दुख दूर करने वाला संत तत्वदर्शी की संज्ञा हटानी

507
00:36:55,280 --> 00:36:59,520
पड़ेगी ना तो तत्व के दर्शन दिखाना पड़ेगा।

508
00:36:59,520 --> 00:37:04,400
समझ रहे हैं आप मेरी बात? जैसे कि जैसे कि

509
00:37:04,400 --> 00:37:08,640
हमने कहा कि यह मोटरसाइकिल धरती पर दौड़कर

510
00:37:08,640 --> 00:37:12,720
आपकी यात्रा पूरी करवाती है। फिर हमने ये भी कह दिया कि ये

511
00:37:12,720 --> 00:37:16,960
हवा में भी उड़ती है। फिर हमने ये भी कह दिया कि पानी में भी चलती

512
00:37:16,960 --> 00:37:21,040
है। तो धरती पर दौड़ने की बात हमने प्रूफ कर दी।

513
00:37:21,040 --> 00:37:25,600
प्रमाण दिखा दिया। मगर जब आसमान में उड़ने की बात आई,

514
00:37:25,600 --> 00:37:29,920
पानी में चलने की बात आई तो आप वहां फेल हो गए।

515
00:37:29,920 --> 00:37:33,920
तो आपको फिर इन बातों का क्लेम अलग हटाना पड़ेगा।

516
00:37:33,920 --> 00:37:38,160
पहले तो यह संज्ञा दूर करो। जब तत्व का दर्शन आपने नहीं सीखा

517
00:37:38,160 --> 00:37:42,240
तत्व को उससे नहीं जाना तो

518
00:37:42,240 --> 00:37:44,800
आपको कहना

519
00:37:44,800 --> 00:37:50,320
होगा फिर तत्वदर्शी नहीं फिर आप वो कहिए हमारे दुख दूर हो गए।

520
00:37:50,320 --> 00:37:55,120
अच्छा

521
00:37:55,120 --> 00:37:59,200
दूसरी बात ये आती है। दूसरी चीज क्या है कि दुख

522
00:37:59,200 --> 00:38:03,680
दूर करने वाले जो बाबा की बात आप कर रहे हैं। तो अगर

523
00:38:03,680 --> 00:38:07,840
हम उनके पास जाकर के अपना दुख दूर करवाते तो बात अलग

524
00:38:07,840 --> 00:38:12,080
होती। हमने तो एक मंत्र का जाप किया था ना। भाई साहब आपके

525
00:38:12,080 --> 00:38:16,400
बाबा जी ने अपनी किताब में ये लिखा है कि ब्रह्मा विष्णु

526
00:38:16,400 --> 00:38:20,480
महेश जो हैं उनकी पूजा करने से इस लोक

527
00:38:20,480 --> 00:38:24,720
के मिलने वाले दुख नष्ट होते हैं पर मोक्ष नहीं मिलता।

528
00:38:24,720 --> 00:38:30,320
ठीक है? ये आपके बाबा जी ने ही लिखा है।

529
00:38:30,320 --> 00:38:34,400
समझ रहे हो? यानी कि बाबा जी का काम ही वहां से शुरू होता है। बाबा

530
00:38:34,400 --> 00:38:38,480
जी के अनुसार जहां ब्रह्मा विष्णु महेश इस लोक के दुख शांत कर देते हैं। मगर बाबा जी

531
00:38:38,480 --> 00:38:43,120
का काम कहां से शुरू होता है? तत्व, परमार्थ, मोक्ष

532
00:38:43,120 --> 00:38:47,120
और उन सब में बाबा जी फेल हो रहे हैं। और यहां की चीजें तो

533
00:38:47,120 --> 00:38:52,800
बता रहे हैं कि ब्रह्मा विष्णु महेश भक्ति से शांत हो जाती है। दिखाऊं?

534
00:38:52,800 --> 00:38:56,880
उनकी भक्ति तो दिया जाता है ना। उनकी भक्ति तो करते हैं। उनकी भक्ति

535
00:38:56,880 --> 00:39:00,880
करने से यहां के दुख दूर हो जाएंगे। ये कहा है आपके बाबा जी

536
00:39:00,880 --> 00:39:05,120
ने। तो ये सही बात है। आप फिर ये नहीं कह सकते

537
00:39:05,120 --> 00:39:09,360
कि ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति से मेरे दुख दूर नहीं हो रहे थे। यह बात

538
00:39:09,360 --> 00:39:13,520
आपके बाबा जी ने भी कही है कि ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति करने से

539
00:39:13,520 --> 00:39:17,600
यहां के दुख दूर हो जाएंगे। हां मगर आपको मोक्ष एक मिनट भाई

540
00:39:17,600 --> 00:39:21,760
साहब मगर आपको जीवन मरण के चक्कर से मुक्ति नहीं मिलेगी। आपको मोक्ष

541
00:39:21,760 --> 00:39:26,000
नहीं मिलेगा। ये कहा है आपके बाबा जी ने। तो जब बात मोक्ष की आ रही है जिसके

542
00:39:26,000 --> 00:39:30,000
लिए उन्होंने अपने आप को अधिकृत बताया कि मोक्ष मैं दूंगा।

543
00:39:30,000 --> 00:39:34,080
जीवन मरण से आजादी मैं दूंगा। दुख से आजादी मैं दूंगा।

544
00:39:34,080 --> 00:39:38,400
यहां के बाद वाला दुख तो उसमें आप फेल हो गए। ना तो आपका मोक्ष

545
00:39:38,400 --> 00:39:42,720
सिद्ध हुआ ना आपके जीवन और मरण की वो से मुक्ति

546
00:39:42,720 --> 00:39:45,360
होना सिद्ध हुई और

547
00:39:45,360 --> 00:39:49,360
ना ही आपने ये बताया कि वो आत्मा उससे पहले कहां थी ना तो तत्व ज्ञान

548
00:39:49,360 --> 00:39:53,520
सिद्ध हो रहा है ना मोक्ष सिद्ध हो रहा है ठीक है अब आप ये

549
00:39:53,520 --> 00:39:56,240
बताइए

550
00:39:56,240 --> 00:40:00,240
आप कमेंट तो भरभ के करते थे आज आप भरवात में कह रहे हैं कि मुझे

551
00:40:00,240 --> 00:40:04,400
नहीं पता मुझे नहीं पता खैर अब आप ये बताइए मुझे कि

552
00:40:04,400 --> 00:40:10,400
क्या क्या काल तत्वदर्शी है।

553
00:40:11,040 --> 00:40:13,600
क्या

554
00:40:13,600 --> 00:40:18,240
यह क्लेम किया जाता है कि भैया काल ने कहा कि तू तत्वदर्शी

555
00:40:18,240 --> 00:40:22,720
की शरण में जा। ठीक है। और 1866

556
00:40:22,720 --> 00:40:25,840
में भी कहा कि तू जा।

557
00:40:25,840 --> 00:40:29,920
ठीक है। चार 34 में कहा कि तत्वदर्शी की शरण में

558
00:40:29,920 --> 00:40:34,320
जा। 1866 में था कहा कि तू और किसी दूसरे

559
00:40:34,320 --> 00:40:40,320
प्रभु की शरण में जा। आपके अनुसार है ना

560
00:40:40,560 --> 00:40:45,200
इसका मतलब वो जिस चीज के लिए भेज रहा है वह चीज उसके पास नहीं है।

561
00:40:45,200 --> 00:40:51,200
हेलो

562
00:40:59,360 --> 00:41:03,440
कहां चले गए भाई? सीधे व्यक्ति हैं जो

563
00:41:03,440 --> 00:41:07,120
आए हैं।

564
00:41:07,120 --> 00:41:13,120
जो बात है वो स्वीकार तो कर रहे कम से कम

565
00:41:24,080 --> 00:41:30,080
लिंक दे दीजिए क्योंकि बहुत देर की चर्चा दिख नहीं रही है

566
00:41:32,240 --> 00:41:34,560
तो

567
00:41:34,560 --> 00:41:38,880
मैं ये पूछ रहा हूं कि क्या काल तत्वदर्शी

568
00:41:38,880 --> 00:41:43,440
है? क्या काल की शरण में जाने से आपको शुद्ध

569
00:41:43,440 --> 00:41:49,440
भक्ति मिल सकती है? क्या वो तत्वदर्शी है?

570
00:41:53,280 --> 00:41:57,440
आपकी आवाज नहीं आ रही। फिर से आप एक बार जाइए और दोबारा कनेक्ट

571
00:41:57,440 --> 00:42:03,280
हो जाइए।

572
00:42:03,280 --> 00:42:09,280
भाई लिंक दे दीजिए क्योंकि बहुत ज्यादा समय का इनका दिख नहीं रहा है।

573
00:42:24,560 --> 00:42:30,560
लिंक दे दिया गया है।

574
00:42:32,960 --> 00:42:37,760
भाई साहब आए क्यों मुझे समझ में नहीं आ रहा है। ज्यादातर

575
00:42:37,760 --> 00:42:43,760
प्रश्नों के उत्तर में इनका नील बटे सन्नाटा है।

576
00:42:54,560 --> 00:42:57,840
हां जी।

577
00:42:57,840 --> 00:43:01,920
तो क्या आ गया था इसके लिए

578
00:43:01,920 --> 00:43:07,920
काल तत्वदर्शी है क्या आप डीएडी लगा दीजिए उसमें

579
00:43:08,480 --> 00:43:11,680
अच्छा

580
00:43:11,680 --> 00:43:17,120
क्या काल तत्वदर्शी है

581
00:43:17,120 --> 00:43:21,120
नहीं काल तत्वदर्शी नहीं है काल तत्वदर्शी होते तो

582
00:43:21,120 --> 00:43:25,360
दूसरे के शरीर में जाने के लिए क्यों कहते बस गुड

583
00:43:25,360 --> 00:43:29,760
और आपके आपके रामपाल ने भी यही माना है। ठीक है?

584
00:43:29,760 --> 00:43:33,760
तो इसका मतलब 1866 में तत्वदर्शी

585
00:43:33,760 --> 00:43:38,160
की 434 में तत्वदर्शी की शरण में जाने को कहा जा रहा है। तत्वदर्शी

586
00:43:38,160 --> 00:43:44,160
की शरण में जाने पर मोक्ष मिल जाएगा। पक्का

587
00:43:51,600 --> 00:43:57,600
तो आपके पास भगवत गीता है।

588
00:43:58,160 --> 00:44:00,560
है ना

589
00:44:00,560 --> 00:44:06,560
तो दूसरे अध्याय का 16वा श्लोक खोलिए।

590
00:44:21,840 --> 00:44:27,840
हम

591
00:44:30,240 --> 00:44:34,480
खोला खोलना खोला पढ़िए

592
00:44:34,480 --> 00:44:37,440
क्या लिखा है

593
00:44:37,440 --> 00:44:42,480
इसमें लिखा है कि असत भाव विधते

594
00:44:42,480 --> 00:44:46,480
तू सत अभाव अरे हिंदी पढ़ लो भैया

595
00:44:46,480 --> 00:44:50,720
संस्कृत मत पढ़ो हिंदी पढ़ लो आप असत की सत्ता

596
00:44:50,720 --> 00:44:55,120
नहीं है और सत का अभाव नहीं है

597
00:44:55,120 --> 00:44:59,120
इस प्रकार इन दोनों का तत्व तत्व ज्ञानी

598
00:44:59,120 --> 00:45:02,880
पुरुषों द्वारा देखा गया है

599
00:45:02,880 --> 00:45:06,160
यहां पे

600
00:45:06,160 --> 00:45:09,520
असत का

601
00:45:09,520 --> 00:45:14,640
भाव नहीं है और सत का अभाव नहीं ठीक है।

602
00:45:14,640 --> 00:45:19,040
हम ठीक है ना? हम असत असत

603
00:45:19,040 --> 00:45:23,600
का भाव नहीं है और सत का अभाव नहीं है। इस प्रकार

604
00:45:23,600 --> 00:45:27,600
इस बात को जानने वाले को ऊपर संस्कृत में देखिए क्या लिखा

605
00:45:27,600 --> 00:45:30,320
है?

606
00:45:30,320 --> 00:45:35,360
नीचे तो तत्व ज्ञानी लिखा हुआ होगा। ऊपर क्या लिखा है? संस्कृत में क्या शब्द है?

607
00:45:35,360 --> 00:45:39,680
तत्वदर्शी भी। हां। क्या

608
00:45:39,680 --> 00:45:44,400
लिखा है? तत्व दर्श भी मतलब

609
00:45:44,400 --> 00:45:48,480
तत्वदर्शी संतों के द्वारा देखा जाता है। यानी

610
00:45:48,480 --> 00:45:53,360
कि तत्वदर्शी कौन है जो यह बात जानता है कि

611
00:45:53,360 --> 00:45:57,920
सत्य का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी

612
00:45:57,920 --> 00:46:01,440
भाव नहीं होता।

613
00:46:01,440 --> 00:46:06,560
है ना?

614
00:46:06,560 --> 00:46:11,920
तत्वदर्शी कौन है?

615
00:46:11,920 --> 00:46:16,000
सत का कभी

616
00:46:16,000 --> 00:46:20,880
इस श्लोक के हिसाब से कौन है जो ये जानता है

617
00:46:20,880 --> 00:46:24,960
कि सत्य का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी भाव नहीं

618
00:46:24,960 --> 00:46:30,560
होता। ठीक है?

619
00:46:30,560 --> 00:46:34,960
तो

620
00:46:34,960 --> 00:46:38,960
अब बात ये आती है कि जो व्यक्ति यह बता रहा

621
00:46:38,960 --> 00:46:43,120
है कि तत्वदर्शी कौन है? जिसको यह पता है

622
00:46:43,120 --> 00:46:47,200
कि सत्य का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी

623
00:46:47,200 --> 00:46:51,280
भाव नहीं होता। जो व्यक्ति ये बता रहा है उसको

624
00:46:51,280 --> 00:46:55,440
यह बात मालूम है ना कि सत्य का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी सत

625
00:46:55,440 --> 00:46:59,840
का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी भाव नहीं होता।

626
00:46:59,840 --> 00:47:04,720
जो व्यक्ति जो व्यक्ति यह बता रहा है

627
00:47:04,720 --> 00:47:08,800
कि भैया जो भी व्यक्ति यह जानता है कि सत

628
00:47:08,800 --> 00:47:13,520
और असत का ये होता है वो व्यक्ति तत्वदर्शी है। जो व्यक्ति ये बता रहा है

629
00:47:13,520 --> 00:47:19,520
उसको ये मालूम है ना कि सत और असत का क्या मामला है?

630
00:47:19,840 --> 00:47:24,160
इसीलिए तो दिया है ना कि तत्वदर्शी के द्वारा

631
00:47:24,160 --> 00:47:29,520
देखा जाता है। किस प्रकार देखा जाता है?

632
00:47:29,520 --> 00:47:32,160
सत्य और असत

633
00:47:32,160 --> 00:47:36,400
सत्य और असत्य क्या है? तत्वदर्शी ही बताता है।

634
00:47:36,400 --> 00:47:40,640
हां। मगर वो क्या है कि सत्य का कभी

635
00:47:40,640 --> 00:47:44,880
अभाव नहीं होता। वहां लिखा है ना इस प्रकार क्या लिखा

636
00:47:44,880 --> 00:47:47,920
है?

637
00:47:47,920 --> 00:47:53,680
क्या लिखा है? हम इस प्रकार

638
00:47:53,680 --> 00:47:57,680
हम यानी कि मैं एग्जांपल ले

639
00:47:57,680 --> 00:48:01,920
लूं जैसे कि मान लीजिए कि मैं ये बता रहा

640
00:48:01,920 --> 00:48:06,400
हूं कि जो व्यक्ति ये जानता है

641
00:48:06,400 --> 00:48:10,960
कि कुर्सी को इंग्लिश में चेयर कहते हैं। ठीक है?

642
00:48:10,960 --> 00:48:15,200
मैं ये कह रहा हूं कि जो व्यक्ति ये जानता है कि कुर्सी को इंग्लिश में चेयर कहते

643
00:48:15,200 --> 00:48:20,640
हैं उसको इंग्लिश जानने वाला माना जाता है।

644
00:48:20,640 --> 00:48:24,880
ठीक है? तो मेरा मेरे ऐसे बताने से ये सिद्ध

645
00:48:24,880 --> 00:48:30,880
हो गया ना कि मैं जानता हूं कि कुर्सी को इंग्लिश में चेयर कहते हैं।

646
00:48:32,160 --> 00:48:35,840
नहीं समझे?

647
00:48:35,840 --> 00:48:39,840
तो यहां तो आत्मा परमात्मा की बात चल रही है। चेयर कहां से भाई साहब? में

648
00:48:39,840 --> 00:48:43,840
एक-एक करके बात करिए। मैंने अभी ये पूछा है

649
00:48:43,840 --> 00:48:48,240
कि अगर कुर्सी को इंग्लिश में चेयर जानने वाला

650
00:48:48,240 --> 00:48:52,800
मैं कह रहा हूं कि तत्वदर्शी है तो मैं

651
00:48:52,800 --> 00:48:56,800
यह बात जानने के कारण कि कुर्सी को इंग्लिश में चेयर कहते हैं।

652
00:48:56,800 --> 00:49:00,960
मैं भी तत्वदर्शी सिद्ध हो रहा हूं ना। जब

653
00:49:00,960 --> 00:49:05,200
मुझे पता है कि कुर्सी को इंग्लिश में क्या कहना चाहिए तभी

654
00:49:05,200 --> 00:49:11,200
तो मैं यह बता रहा हूं कि जो यह बात जानता है वो तत्वदर्शी है।

655
00:49:12,000 --> 00:49:16,560
तो ये भी जो चीज है कि कुर्सी बनी किस पे है?

656
00:49:16,560 --> 00:49:21,840
कुर्सी बनने की बात वहां आ रही है क्या? खाली कुर्सी पे ही

657
00:49:21,840 --> 00:49:26,400
नहीं भाई श्लोक में क्या लिखा है? श्लोक में

658
00:49:26,400 --> 00:49:30,400
खाली कुर्सी की बात जानने वाले को तत्वदर्शी कहा गया कि

659
00:49:30,400 --> 00:49:34,160
नहीं कहा गया?

660
00:49:34,160 --> 00:49:39,040
हां ये चीज ठीक है लिखा है यहां पे लेकिन ये चीज लिखा है

661
00:49:39,040 --> 00:49:43,520
भाई साहब भाई साहब एक मिनट भाई साहब एक एक करके चलिए

662
00:49:43,520 --> 00:49:47,840
वहां पर केवल सत्य और असत के बारे

663
00:49:47,840 --> 00:49:51,920
में सही से जानकारी रखने वाले को तत्वदर्शी कहा

664
00:49:51,920 --> 00:49:56,160
गया है। कि सत्य का कभी सत्य

665
00:49:56,160 --> 00:50:01,360
का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी भाव नहीं होता।

666
00:50:01,360 --> 00:50:05,520
इसका मतलब जो इस बात को बता रहा है कि जो लोग यह जानते हैं वह

667
00:50:05,520 --> 00:50:10,160
तत्वदर्शी है वह बताने वाला भी तत्वदर्शी सिद्ध हो रहा है।

668
00:50:10,160 --> 00:50:14,720
तो इस श्लोक के अनुसार इस श्लोक के अनुसार

669
00:50:14,720 --> 00:50:19,360
काल भी तत्वदर्शी सिद्ध हुआ। ठीक है?

670
00:50:19,360 --> 00:50:23,760
अब दूसरी एक बात आती है कि आपके अनुसार जो रामपाल

671
00:50:23,760 --> 00:50:27,040
है, वो तत्वदर्शी है। ठीक है?

672
00:50:27,040 --> 00:50:31,120
इसके अनुसार इसके अनुसार काल कैसे तत्वदर्शी संत हुए

673
00:50:31,120 --> 00:50:35,120
सिद्ध हुए इस श्लोक में तो ये खुद कह

674
00:50:35,120 --> 00:50:39,280
रहे हैं कि तत्व ज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया

675
00:50:39,280 --> 00:50:43,280
है। वो अपने आप को थोड़ी बता रहे हैं यहां पे। अरे

676
00:50:43,280 --> 00:50:48,160
भाई क्या देखा गया है?

677
00:50:48,160 --> 00:50:52,320
क्या देखा गया है? इसमें जब श्लोक में खुद

678
00:50:52,320 --> 00:50:57,600
कह रहे हैं कि असत्ञानियों

679
00:50:57,600 --> 00:51:02,640
तत्व ज्ञानियों के द्वारा क्या देखा गया भाई साहब

680
00:51:02,640 --> 00:51:06,960
तो जब ये कह रहे हैं कि सत्य का भाव नहीं और असत का अभाव

681
00:51:06,960 --> 00:51:11,200
नहीं और ये तत्व्ञानियों के द्वारा देखा ये तत्वज्ञानियों

682
00:51:11,200 --> 00:51:15,600
के द्वारा देखा गया तो काल जो काल है जो

683
00:51:15,600 --> 00:51:19,760
जो इस श्लोक को बोल रहा है उसको उसको पता चल गया

684
00:51:19,760 --> 00:51:24,160
ना कि सत का भाव अभाव नहीं होता है

685
00:51:24,160 --> 00:51:30,160
और जिसको पता चल गया उसको तत्वदर्शी माना उन्होंने

686
00:51:31,040 --> 00:51:35,200
तो फिर वो दूसरे के पास जाने के लिए क्यों कहे ये तो

687
00:51:35,200 --> 00:51:39,200
आप बताओगे ना मुझे आपने कहा है ना काल तत्वदर्शी नहीं है मैंने

688
00:51:39,200 --> 00:51:43,360
तो नहीं कहा और आप ये कहते हो कि दूसरे एक मिनट

689
00:51:43,360 --> 00:51:47,360
एक मिनट भाई साहब आप ये कहते हो कि वहां दूसरे के पास जाने

690
00:51:47,360 --> 00:51:51,440
की बात कही गई है हम नहीं कहते हम कहते हैं कि वो आने की बात

691
00:51:51,440 --> 00:51:56,240
आराम आराम आराम से बोलिए कोई कोई

692
00:51:56,240 --> 00:52:00,320
आराम से ये क्लेम हम नहीं करते हैं कि दूसरे के पास जाने को कहा है

693
00:52:00,320 --> 00:52:04,560
ये आप करते हो हम गीता का परंपरा से प्राप्त अर्थ लेते हैं जिसमें

694
00:52:04,560 --> 00:52:08,560
जाने की बात को नहीं कहा गया है हमने वहां कहा है कि आ जाने की बात

695
00:52:08,560 --> 00:52:12,640
को वहां कहा गया है मगर आप कहते हो कि नहीं जाने को कहा गया है तो अगर जाने

696
00:52:12,640 --> 00:52:17,760
को कहा गया है तो यहां तो तत्वदर्शी सिद्ध हो रहे हैं काल

697
00:52:17,760 --> 00:52:21,840
आपके अनुसार अब दूसरी बात अब दूसरी

698
00:52:21,840 --> 00:52:26,080
बात भाई साहब दूसरी बात ये है कि हमने एक बात जान

699
00:52:26,080 --> 00:52:30,720
ली कि सच का कभी अभाव नहीं होता।

700
00:52:30,720 --> 00:52:35,840
सच का कभी कभी अभाव अभाव नहीं होता।

701
00:52:35,840 --> 00:52:39,440
जीवन मरण से

702
00:52:39,440 --> 00:52:42,080
छूट जाना।

703
00:52:42,080 --> 00:52:47,760
क्या उसे सत स्वरूप हो जाना कह सकते हैं?

704
00:52:47,760 --> 00:52:51,920
जीवन मरण से छूट जाना क्या उसे सत स्वरूप हो जाना

705
00:52:51,920 --> 00:52:56,000
कह सकते हैं? सत स्वरूप मतलब सत जो कभी बदलता

706
00:52:56,000 --> 00:53:00,000
नहीं है। इस शरीर का अगर वृत्ति

707
00:53:00,000 --> 00:53:04,080
हो गई, शरीर खत्म हो गया इसका मतलब यह नहीं हुआ

708
00:53:04,080 --> 00:53:09,120
कि हमारी हमारी मुक्ति हो गई। मैं कहां कह रहा हूं?

709
00:53:09,120 --> 00:53:13,360
मैं कह रहा हूं क्या जो आत्मा है वह छूट

710
00:53:13,360 --> 00:53:17,520
के कभी सत स्वरूप हो सकती है सतलोक में पहुंचने के बाद वो

711
00:53:17,520 --> 00:53:21,920
सत स्वरूप हो जाएगी कि नहीं जिसको कभी जो सत

712
00:53:21,920 --> 00:53:26,240
स्वरूप हो जाएगी हां अच्छा

713
00:53:26,240 --> 00:53:31,360
पक्का पक्का हां

714
00:53:31,360 --> 00:53:35,600
तो इसका मतलब आत्मा एक ऐसा तत्व है

715
00:53:35,600 --> 00:53:41,600
जिसका कभी अभाव नहीं हो सकता

716
00:53:42,720 --> 00:53:47,920
क्योंकि वो सत है ना सत हो जाएगी ना सतलोक जा के

717
00:53:47,920 --> 00:53:52,640
तो अभाव तो हो नहीं सकता उसका

718
00:53:52,640 --> 00:53:56,720
तो आपके बाबा जी तो यहां पर लिख रहे हैं कि उसका

719
00:53:56,720 --> 00:54:02,640
अभाव था आत्मा का

720
00:54:02,640 --> 00:54:05,760
पहले

721
00:54:05,760 --> 00:54:09,840
यानी कि तत का भी किसी समय अभाव हो सकता

722
00:54:09,840 --> 00:54:13,760
है।

723
00:54:13,760 --> 00:54:18,000
ये पहले की बात है और पहले या बाद में तत

724
00:54:18,000 --> 00:54:22,240
का अभाव माना जा सकता है कि नहीं?

725
00:54:22,240 --> 00:54:27,520
यानी पहले वो असत थी। चलो ऐसे मान लो।

726
00:54:27,520 --> 00:54:32,000
पहले असत थी। असत तो बाद में हुई। सत्य पहले

727
00:54:32,000 --> 00:54:36,080
थी। पहले सत्य थी तो सत पहले थी तो अभाव

728
00:54:36,080 --> 00:54:40,080
कैसे हो गया? क्योंकि यहां है इसके

729
00:54:40,080 --> 00:54:42,560
लिए

730
00:54:42,560 --> 00:54:47,360
अब आप पहले मान रहे आने से पहले मेरे भाई पहले अपनी पढ़ो

731
00:54:47,360 --> 00:54:51,760
पहले हमारे ग्रंथों को पढ़ने की बजाय अपने बाबा जी के ग्रंथ को पढ़ो

732
00:54:51,760 --> 00:54:57,200
ये देखिए आप दूसरे अध्याय के

733
00:54:57,200 --> 00:55:01,840
16व ही श्लोक का वर्णन करते हुए आपके जो रामपाल जी हैं

734
00:55:01,840 --> 00:55:07,280
कहते हैं कि उत्पत्ति से पहले आत्मा का अभाव था।

735
00:55:07,280 --> 00:55:10,160
दिख रहा है

736
00:55:10,160 --> 00:55:14,240
ठीक है तो यदि आत्मा का अभाव था यानी कि

737
00:55:14,240 --> 00:55:19,440
वो असत हो गई ठीक

738
00:55:19,440 --> 00:55:23,440
परमात्मा के साथ थे ना इसके लिए अरे इधर

739
00:55:23,440 --> 00:55:27,520
उधर देख के झूठ मत बोलो भाई नहीं वो कह रहे हैं

740
00:55:27,520 --> 00:55:33,520
सुनो सुनो आपके बाबा जी क्या लिख रहे हैं सुनिए

741
00:55:33,920 --> 00:55:38,000
परमात्मा से संपूर्ण संपूर्ण संसार व्याप्त है। यानी कि विस्तार को

742
00:55:38,000 --> 00:55:42,080
प्राप्त हुआ है। उस अविनाशी परमात्मा का अभाव किसी भी समय में

743
00:55:42,080 --> 00:55:46,640
नहीं होता है। ठीक है? सही बात है।

744
00:55:46,640 --> 00:55:50,640
परमात्मा के अतिरिक्त कोई भी नित्य नहीं है। यानी

745
00:55:50,640 --> 00:55:56,640
कि आत्मा का अभाव था। परमात्मा से अलग है ना आत्मा?

746
00:55:56,720 --> 00:56:00,880
कोई भी नित्य नहीं है क्योंकि आत्मा की

747
00:56:00,880 --> 00:56:04,880
उत्पत्ति परमात्मा ने अपने वचन से अपने शरीर से

748
00:56:04,880 --> 00:56:10,480
की है। उत्पत्ति से पहले आत्मा का अभाव था।

749
00:56:10,480 --> 00:56:14,480
उत्पत्ति से पहले आत्मा का अभाव था। तो

750
00:56:14,480 --> 00:56:17,920
अभाव किसका होता है?

751
00:56:17,920 --> 00:56:23,200
असत का जो असत है।

752
00:56:23,200 --> 00:56:28,080
तो अगर आत्मा अगर आत्मा असत है सुनिए

753
00:56:28,080 --> 00:56:32,080
अगर आत्मा असत है तो दो 16 के अनुसार उसका कभी

754
00:56:32,080 --> 00:56:36,160
भाव नहीं हो सकता वो कभी सत नहीं हो सकती

755
00:56:36,160 --> 00:56:40,240
यह ज्ञान यहां पे है 21 ब्रह्मांड के लिए ये

756
00:56:40,240 --> 00:56:44,320
कहां लिखा है काल के काल काल के लिए प्रमाण

757
00:56:44,320 --> 00:56:48,400
कहा है कि ये ज्ञान यहां के लिए है क्योंकि काल खुद दे

758
00:56:48,400 --> 00:56:52,880
रहे है ना अब मैं प्रमाण पूछ रहा हूं इस समय आपसे

759
00:56:52,880 --> 00:56:56,960
काल खुद दे रहे ये ज्ञान तो इसके लिए वो कह रहे हैं

760
00:56:56,960 --> 00:57:01,040
भाई साहब ये कहां लिखा है कि ये सत असत का जो बात है ये

761
00:57:01,040 --> 00:57:05,360
किस ब्रह्मांड के लिए है ये बात ये कहां लिखा है

762
00:57:05,360 --> 00:57:09,520
जब वो खुद कहते हैं ना कि हां भाई भाई साहब मैंने कहा अगला

763
00:57:09,520 --> 00:57:14,240
शब्द आप बताएं कि अध्याय नंबर ये श्लोक क्रमांक ये

764
00:57:14,240 --> 00:57:18,240
प्रमाण पूछ रहा हूं प्रमाण आपका पक्ष नहीं दो तीन चीजें हैं

765
00:57:18,240 --> 00:57:22,800
कन्वर्सेशन में पक्ष तर्क प्रमाण

766
00:57:22,800 --> 00:57:26,880
तो पक्ष आपने ने रख दिया कि ये तो 21 ब्रह्मांडों की

767
00:57:26,880 --> 00:57:32,880
बात है। सत असत वाली बात 21 ब्रह्मांडों के लिए है।

768
00:57:33,360 --> 00:57:37,360
ठीक है। तर्क भी मैंने आपसे मांगा नहीं फिलहाल। अब

769
00:57:37,360 --> 00:57:42,640
मैं आपसे प्रमाण मांग रहा हूं। प्रमाण बताइए।

770
00:57:42,640 --> 00:57:46,640
ये जो सतत की व्याख्या की है जिसके कारण तत्वदर्शी कहा

771
00:57:46,640 --> 00:57:51,040
गया। व्याख्या को जानने वाले को। यह व्याख्या

772
00:57:51,040 --> 00:57:55,840
केवल 21 ब्रह्मांडों के लिए है। यह कहां लिखा है?

773
00:57:55,840 --> 00:58:00,240
आपको कोई मतलब नहीं है क्या सच्चाई से? क्यों

774
00:58:00,240 --> 00:58:05,040
नहीं मतलब है? साफ दिखाई दे रहा है कि यहां पे आप अटक रहे हो। कुछ भी बोलते जा रहे हो।

775
00:58:05,040 --> 00:58:09,840
नहीं नहीं ऐसी बात तो नहीं है। आपके बाबा जी ने कहा लिखा है? कहां लिखी है वाली बात?

776
00:58:09,840 --> 00:58:15,840
एक ये सत असत वाली बात 21 ब्रह्मांडों के लिए है। कहां लिखी है?

777
00:58:16,560 --> 00:58:21,760
अरे कुछ तो शर्म कर लो आप लोग

778
00:58:21,760 --> 00:58:25,360
थोड़ी शर्म आती है कि नहीं कुछ भी बोल दो बस मुंह से

779
00:58:25,360 --> 00:58:29,440
अध्याय 15 का श्लोक एक से चार में वहां पे नहीं

780
00:58:29,440 --> 00:58:35,440
कह रहे हैं कि तत्व

781
00:58:59,760 --> 00:59:00,260
तो

782
00:59:00,080 --> 00:59:05,120
ना ही आपके

783
00:59:05,120 --> 00:59:09,200
बाबा जी ने ये लिखा है कि असत औसत की जो बात

784
00:59:09,200 --> 00:59:13,200
है वो केवल उसके लिए है। 21 ब्रह्मांडों के लिए और ना ही

785
00:59:13,200 --> 00:59:17,360
हमारे सनातन शास्त्रों में कहीं लिखा है। और तर्क के अनुसार भी

786
00:59:17,360 --> 00:59:21,520
देखेंगे तो यदि आप आत्मा का अभाव मान लोगे जिसका

787
00:59:21,520 --> 00:59:26,000
आपने जवाब नहीं दे पाए थे कि मटेरियल कहां से आया अभाव

788
00:59:26,000 --> 00:59:30,240
अगर मान लोगे तो जिस चीज का अभाव था उसका

789
00:59:30,240 --> 00:59:36,240
कभी शाश्वत सत स्वरूप नहीं हो सकती। फिर आप उसको मुक्ति नहीं दे सकते।

790
00:59:36,720 --> 00:59:40,880
जो सतलोक वाली अनंत काल की मुक्ति है वह फिर आप क्लेम नहीं कर सकते क्योंकि उसका

791
00:59:40,880 --> 00:59:44,880
अभाव था वो भाव वाली नहीं हो सकती फिर सत स्वरूप हो ही

792
00:59:44,880 --> 00:59:50,240
नहीं सकती क्योंकि वो सत स्वरूप थी ही नहीं सत स्वरूप तो वही हो सकता है जो सत स्वरूप है

793
00:59:50,240 --> 00:59:54,000
समझ रहे हैं कुछ

794
00:59:54,000 --> 00:59:58,000
सब बातें थोड़ा सोचा करिए कुछ भी बोल दो चाहे वो अपने बाबा जी से

795
00:59:58,000 --> 01:00:02,080
मैच कर रही है कि नहीं कर रही आपने 10 बातें अभी तक बोल दी जो आपके बाबा जी से

796
01:00:02,080 --> 01:00:06,160
मैच नहीं कर रही पहले आप आत्मा को नित्य कह कह रहे थे। आपके बाबा जी

797
01:00:06,160 --> 01:00:10,880
ने नित्य नहीं माना आत्मा को।

798
01:00:10,880 --> 01:00:15,840
ठीक है? थोड़ा थोड़ा अपने सेंस ऑफ ह्यूमर का इस्तेमाल करो मेरे भाई।

799
01:00:15,840 --> 01:00:19,840
अच्छा बाबा जी ने बाबा जी ने नित्य नहीं माना है कि

800
01:00:19,840 --> 01:00:23,840
परमात्मा के जीव अविनाशी जीव है। अविनाशी अलग हो

801
01:00:23,840 --> 01:00:28,320
गया। और फिर वो क्लेम बनता है जो कह रहा है कि पहले

802
01:00:28,320 --> 01:00:32,640
जो है ये नित नहीं ये अभाव था और फिर कह रहा है बाद में अविनाशी।

803
01:00:32,640 --> 01:00:37,440
अच्छा अब दूसरी बात अब ये बताओ

804
01:00:37,440 --> 01:00:41,280
कि

805
01:00:41,280 --> 01:00:45,280
आप कहते हो कि जब आत्मा

806
01:00:45,280 --> 01:00:49,360
ये हम अंतिम अंतिम थोड़ी सी बात कर रहे हैं। फिर उसके बाद किसी और से बात करेंगे। आपके

807
01:00:49,360 --> 01:00:53,360
साथ काफी बातें हो चुकी है। अर्जुन जब भगवान श्री

808
01:00:53,360 --> 01:00:57,520
कृष्ण के साथ में खड़ा है शरीर से आपके अनुसार उनके उनके

809
01:00:57,520 --> 01:01:03,360
अंदर काल जाकर के बोल रहा था। ठीक है? तो

810
01:01:03,360 --> 01:01:07,360
यदि अर्जुन श्री कृष्ण की शरण में पहले से ही है

811
01:01:07,360 --> 01:01:11,920
तो फिर कृष्ण क्यों कहेंगे कि वो मेरे पास आए

812
01:01:11,920 --> 01:01:14,960
है ना

813
01:01:14,960 --> 01:01:20,480
अर्जुन श्री कृष्ण की शरण में पहले से ही है।

814
01:01:20,480 --> 01:01:24,560
तो फिर ये तर्क नहीं बनता कि भाई मेरे अपने पास आने को क्यों कहेंगे वो

815
01:01:24,560 --> 01:01:28,720
ये क्लेम किया जाता है ना रामपाल रामपाल वालों की तरफ से

816
01:01:28,720 --> 01:01:32,960
हम तो अब बात यहां पर ये आती है

817
01:01:32,960 --> 01:01:36,000
कि क्या

818
01:01:36,000 --> 01:01:40,000
ये जो जीव है उसको जो अविनाशी कहा गया है वो किस कारण से कहा

819
01:01:40,000 --> 01:01:44,720
गया है क्यों है जीव अविनाशी परमात्मा

820
01:01:44,720 --> 01:01:50,720
तो अंश है इसके लिए अविनाशी कहा गया नहीं

821
01:01:51,440 --> 01:01:57,440
इसलिए कहा गया है कि वह सदैव परमात्मा के साथ रहती है।

822
01:01:58,400 --> 01:02:03,760
ये आपके बाबा जी ने अपनी किताब में कहा है।

823
01:02:03,760 --> 01:02:08,080
कि सदैव परमात्मा के साथ होने से आत्मा अविनाशी

824
01:02:08,080 --> 01:02:11,680
है।

825
01:02:11,680 --> 01:02:14,640
समझ रहे हैं मेरी बात?

826
01:02:14,640 --> 01:02:19,040
परमात्मा ऐसा लिखे हैं कि परमात्मा

827
01:02:19,040 --> 01:02:23,280
के साथ रहती थी। वहां से हम बिछड़ करके आए। इसके लिए नहीं अविनाशी

828
01:02:23,280 --> 01:02:27,360
नहीं अविनाशी तो है। नहीं परमात्मा के

829
01:02:27,360 --> 01:02:31,520
साथ है इसलिए अविनाशी है। साथ में है। जैसे ही वो साथ

830
01:02:31,520 --> 01:02:36,560
कट होगा हटेगा वो अविनाशी नहीं रह जाएगी।

831
01:02:36,560 --> 01:02:42,400
वो साथ में है परमात्मा के। इसलिए अविनाशी है।

832
01:02:42,400 --> 01:02:46,400
अब कुछ बातें थोड़ी सी मैं पूछ लूं आपसे। मैं एक

833
01:02:46,400 --> 01:02:52,400
बात खत्म कर लूं फिर हम लोग करेंगे बात। तो

834
01:02:52,880 --> 01:02:58,880
परमात्मा जो है

835
01:02:58,960 --> 01:03:02,800
क्या कहते हैं?

836
01:03:02,800 --> 01:03:07,040
परमात्मा के साथ रहने के कारण आत्मा अविनाशी बताई गई है।

837
01:03:07,040 --> 01:03:11,520
आपके रामपाल के द्वारा। ठीक है?

838
01:03:11,520 --> 01:03:17,280
तो अब बात ये आती है कि

839
01:03:17,280 --> 01:03:21,520
यदि आत्मा सदैव परमात्मा के साथ होने

840
01:03:21,520 --> 01:03:25,760
के कारण अविनाशी है तो यानी कि जिस

841
01:03:25,760 --> 01:03:29,760
समय जो अर्जुन है वो

842
01:03:29,760 --> 01:03:34,160
काल की शरण में था श्री कृष्ण की शरण में था

843
01:03:34,160 --> 01:03:38,160
उसी समय अर्जुन परमात्मा की

844
01:03:38,160 --> 01:03:41,760
शरण में भी था

845
01:03:41,760 --> 01:03:47,760
तो फिर किस परमात्मा की शरण में जाने को बोला गया?

846
01:03:52,240 --> 01:03:56,320
यही चीज तो हम आपसे पूछना चाहते हैं। अरे हमारे

847
01:03:56,320 --> 01:04:00,560
अनुसार तो जाने को बोला ही नहीं जा रहा ना भाई। हमारे

848
01:04:00,560 --> 01:04:04,880
अनुसार तो ज्ञान दो तरीके

849
01:04:04,880 --> 01:04:08,880
की गति होती है। एक होती है

850
01:04:08,880 --> 01:04:14,000
ज्ञानार्थक और एक होती है गत्यार्थक।

851
01:04:14,000 --> 01:04:18,160
ज्ञानार्थक गति ये होती है कि मैं भले ही आपके पास

852
01:04:18,160 --> 01:04:22,320
भी खड़ा हूं पर फिर भी मैं मन से आपकी शरणागत नहीं हुआ

853
01:04:22,320 --> 01:04:24,800
हूं।

854
01:04:24,800 --> 01:04:30,000
ज्ञानार्थक गति नहीं है। वहां पर गत्यार्थक गति तो है।

855
01:04:30,000 --> 01:04:32,800
समझ रहे हैं? फिर

856
01:04:32,800 --> 01:04:36,960
आपने कहा कि तू मुझको अपना ले तू मेरे पास आजा। मेरा हो

857
01:04:36,960 --> 01:04:40,960
जा मेरी शरण में आ जा। तो ये हो गई ज्ञानार्थक

858
01:04:40,960 --> 01:04:45,280
गति। वहां होते हुए भी आप उसकी शरण आपने उसकी सत्ता को स्वीकार

859
01:04:45,280 --> 01:04:50,960
नहीं किया था। पहले मन से अब जो है मन से

860
01:04:50,960 --> 01:04:55,920
ज्ञानार्थक गति करने को बोला जा रहा है। गत्यार्थक

861
01:04:55,920 --> 01:04:59,920
गति करके तो तुम आ गए हो मगर ज्ञानार्थक गति अभी

862
01:04:59,920 --> 01:05:04,000
नहीं कर पाए हो तो ज्ञानार्थक गति के लिए वहां बोला गया तो हमारे अनुसार जाने

863
01:05:04,000 --> 01:05:08,240
के लिए बोला ही नहीं गया है। आपके अनुसार बोला गया है। तो सवाल

864
01:05:08,240 --> 01:05:12,240
फिर आपसे है कि यदि वहां पर परमात्मा भी था तो फिर किसके

865
01:05:12,240 --> 01:05:16,240
पास जाने को बोला गया? क्योंकि परमात्मा

866
01:05:16,240 --> 01:05:22,240
के साथ रहने के कारण ही आत्मा अविनाशी है।

867
01:05:23,120 --> 01:05:27,360
ठीक है? अब इस सब के बाद एक

868
01:05:27,360 --> 01:05:31,680
बात ये आ गई कुल मिलाकर के तत्वदर्शी हम सिद्ध नहीं कर पाए आपका।

869
01:05:31,680 --> 01:05:35,680
ठीक है? आपने आत्मा के बारे में कुछ बताया नहीं। आपने मोक्ष के बारे में

870
01:05:35,680 --> 01:05:39,840
कुछ बताया नहीं। काल के वो जीवन मरण के बारे में कुछ बताया नहीं।

871
01:05:39,840 --> 01:05:44,080
अब कुल मिलाकर के बात आ जाती है कि

872
01:05:44,080 --> 01:05:48,480
भाई जब आपके द्वारा मिलने वाला मोक्ष

873
01:05:48,480 --> 01:05:53,280
मोक्ष ही नहीं है। ठीक है। अच्छा ये बता दो

874
01:05:53,280 --> 01:05:59,280
ईश्वर है ये सिद्ध कैसे होता है? बस ये बता दो।

875
01:06:08,480 --> 01:06:12,160
ईश्वर है सिद्ध कैसे होता है

876
01:06:12,160 --> 01:06:16,480
ईश्वर की कुछ सत्ता होती है कि नहीं मैं आपसे

877
01:06:16,480 --> 01:06:20,560
पूछ रहा हूं कैसे सिद्ध करोगे ईश्वर है मुझे

878
01:06:20,560 --> 01:06:24,000
बताओ

879
01:06:24,000 --> 01:06:29,600
ईश्वर की सत्ता को सिद्ध करिए

880
01:06:29,600 --> 01:06:33,760
अब इस चीज को हम नहीं सिद्ध कर पाएंगे आप सिद्ध कर सकते हैं।

881
01:06:33,760 --> 01:06:38,480
आपके तत्वदर्शी ने तात्विक चीजें कुछ बताई है कि नहीं बताई है?

882
01:06:38,480 --> 01:06:42,880
सुनो

883
01:06:42,880 --> 01:06:48,000
ईश्वर सिद्ध कैसे होता है? अगर इस चीज को अगर आप समझ लोगे ना

884
01:06:48,000 --> 01:06:52,480
और न्यूट्रल होकर के एक बार को सोचने का प्रयास करोगे

885
01:06:52,480 --> 01:06:56,560
तो मेरे भाई आप चीजों को समझ पाओगे कि सत्य वास्तविकता में है

886
01:06:56,560 --> 01:07:00,800
क्या? केवल इसी बात से नहीं हम आपकी सारी बातें

887
01:07:00,800 --> 01:07:04,960
बहुत ध्यान से सुन रहे हैं। सुनिए और समझने की कोशिश कर रहे हैं।

888
01:07:04,960 --> 01:07:08,320
सुनिए

889
01:07:08,320 --> 01:07:12,400
प्रदारक उपनिषद का एक वचन है।

890
01:07:12,400 --> 01:07:16,400
उसके आधार पर मैं आगे की व्याख्या करूंगा। आप समझ जाएंगे। असतो

891
01:07:16,400 --> 01:07:20,400
मा सद्गमय तमसो मागमय मृत्य

892
01:07:20,400 --> 01:07:24,720
मतम गम संसार के प्रत्येक जीव में

893
01:07:24,720 --> 01:07:29,360
कभी ना मरने की अखंड ज्ञानी बन जाने की

894
01:07:29,360 --> 01:07:33,520
सदा सुखी रहने की चाह विद्यमान है। उसी

895
01:07:33,520 --> 01:07:37,600
चाह को इस वचन में कहा गया है। असतो मा

896
01:07:37,600 --> 01:07:42,640
सद्गमय तमसो मागमया मृत्युमा मतमय

897
01:07:42,640 --> 01:07:46,880
अब क्या है कि

898
01:07:46,880 --> 01:07:52,080
हमारे अंदर की वो चाह जिससे हम चाह करके भी अलग नहीं हो सकते।

899
01:07:52,080 --> 01:07:56,320
उस चाह के विषय का होने का उस चाह

900
01:07:56,320 --> 01:07:59,440
का विषय का अस्तित्व

901
01:07:59,440 --> 01:08:05,040
डंके की चोट पर हमें मानना पड़ेगा। जैसे कि अगर

902
01:08:05,040 --> 01:08:09,040
हमारे अंदर भूख है भोजन की तो उससे सिद्ध हो जाता

903
01:08:09,040 --> 01:08:13,840
है कि इस दुनिया में भोजन है। हमारे अंदर प्यास है

904
01:08:13,840 --> 01:08:17,840
पानी की उससे सिद्ध हो जाता है कि इस दुनिया में कोई पानी

905
01:08:17,840 --> 01:08:23,120
है। इसी प्रकार से जिस प्रकार से

906
01:08:23,120 --> 01:08:27,520
ऊंख मात्र होने के कारण भोजन का अस्तित्व सिद्ध होता है। प्यास मात्र

907
01:08:27,520 --> 01:08:32,880
सिद्ध होने के कारण पानी का अस्तित्व सिद्ध होता है। उसी प्रकार

908
01:08:32,880 --> 01:08:36,880
सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर की प्यास होने के

909
01:08:36,880 --> 01:08:41,680
कारण सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है।

910
01:08:41,680 --> 01:08:46,160
अब इसमें एक फैक्ट आएगा। फैक्ट क्या आएगा? कि

911
01:08:46,160 --> 01:08:50,240
एक बच्चे ने जन्म लिया। ठीक है? उसको कुछ नहीं बताया गया

912
01:08:50,240 --> 01:08:54,560
कि इस दुनिया में कोई भगवान है। कोई सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर

913
01:08:54,560 --> 01:08:58,880
है। या उसको यह नहीं बताया गया कि इस दुनिया में अनंत सुख है।

914
01:08:58,880 --> 01:09:02,880
या फिर उसको यह नहीं बताया गया कि इस दुनिया में अनंत ज्ञान है। या

915
01:09:02,880 --> 01:09:07,360
फिर उसको ये नहीं बताया गया कि इस दुनिया में अमरता है। फिर भी बचपन

916
01:09:07,360 --> 01:09:12,560
से ही वो सच्चित आनंद को ढूंढता है।

917
01:09:12,560 --> 01:09:14,640
हर चीज में वो उसी को ढूंढ रहा है।

918
01:09:14,640 --> 01:09:19,440
तो जब उसको यह बताया ही नहीं गया

919
01:09:19,440 --> 01:09:24,160
कि इस दुनिया में सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर है

920
01:09:24,160 --> 01:09:28,400
तो फिर वो उसको ढूंढ क्यों रहा है? इससे सिद्ध

921
01:09:28,400 --> 01:09:32,480
होता है कि जो जीव है वो

922
01:09:32,480 --> 01:09:35,840
ईश्वर का अंश है।

923
01:09:35,840 --> 01:09:40,880
उसके अंदर भी अपनी क्वालिटीज

924
01:09:40,880 --> 01:09:44,960
वो विद्यमान है। वो जिसकी कारण वो आकर्षित हो रहा है। अंश हमेशा

925
01:09:44,960 --> 01:09:49,760
अपने अंशी की ओर आकर्षित होता है। समझ रहे हैं?

926
01:09:49,760 --> 01:09:54,880
अंश हमेशा अपने अंशी की ओर आकर्षित होता है।

927
01:09:54,880 --> 01:09:59,360
तो जैसे कि जो अग्नि है जब वो लपट

928
01:09:59,360 --> 01:10:03,520
बनती है तो वो दाएं हवा अगर नहीं चलेगी तो वो

929
01:10:03,520 --> 01:10:07,760
सीधे आकाश में स्थित अपना जो उसका अंशी है

930
01:10:07,760 --> 01:10:11,760
अग्नि हो गई अंश और उसका अंशी सिद्ध हुआ ऊपर आकाश

931
01:10:11,760 --> 01:10:16,000
में सूर्य तो वो अपने अंशी की ओर भागने का प्रयास करती है।

932
01:10:16,000 --> 01:10:20,080
कोई भी चीज जहां से निकली है वहीं जाने

933
01:10:20,080 --> 01:10:24,080
का प्रयास उसका होता है। नदियां, झरने, जल प्रपात

934
01:10:24,080 --> 01:10:28,080
इत्यादि सब पेड़ पौधे जहां से

935
01:10:28,080 --> 01:10:29,680
निकलते हैं उसी में

936
01:10:29,680 --> 01:10:34,000
मिल जाने के लिए हर दिन वो गति करते हैं। इसी प्रकार

937
01:10:34,000 --> 01:10:38,160
जो जीव है क्योंकि वो ईश्वर का अंश है। सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर

938
01:10:38,160 --> 01:10:42,160
का अंश है। इसीलिए वो उसी उसी में मिल जाने

939
01:10:42,160 --> 01:10:46,560
के लिए प्रयासरत होता है। बिना बताए ही बिना स्वीकार

940
01:10:46,560 --> 01:10:51,040
किए ही उसके अंदर सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर के लिए आकर्षण

941
01:10:51,040 --> 01:10:55,600
होता है और उस आकर्षण से ही हम सिद्ध कर पाए हैं कि

942
01:10:55,600 --> 01:11:00,240
भगवान है वरना आप सिद्ध नहीं कर सकोगे। ठीक है?

943
01:11:00,240 --> 01:11:04,320
यहां पे इतने लोग इतने लोग नास्तिक है जो कभी भगवान

944
01:11:04,320 --> 01:11:09,120
को मानते ही नहीं तो उनको कैसे सिद्ध करेंगे कि ईश्वर है।

945
01:11:09,120 --> 01:11:14,480
सिद्ध कर तो दिया। नास्तिक भी कभी मरना नहीं चाहता है।

946
01:11:14,480 --> 01:11:18,880
सिद्ध को पता है भाई उसको तो पता है कि मरना है एक दिन

947
01:11:18,880 --> 01:11:23,280
मरेंगे हम भी मरेंगे मगर अल्लाह नहीं चाहता मरना नहीं चाहता

948
01:11:23,280 --> 01:11:27,600
अलग बात है मैं बता रहा हूं ना जब उसको पता है कि मरना है एक दिन फिर भी वो मरना

949
01:11:27,600 --> 01:11:31,920
क्यों नहीं चाहता है क्यों दुख नहीं चाहता मन में

950
01:11:31,920 --> 01:11:36,240
यानी कि वो मुंह से कह रहा है कि इस दुनिया

951
01:11:36,240 --> 01:11:40,240
में कोई अमर नहीं है। मगर खुद कह रहा है

952
01:11:40,240 --> 01:11:44,480
कि मुझे अमर अमर के पास ही जाना है। खुद

953
01:11:44,480 --> 01:11:48,720
कह रहा है इस दुनिया में कोई अखंड ज्ञानी नहीं है। ईश्वर का मतलब क्या है?

954
01:11:48,720 --> 01:11:52,720
सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर। सतित आनंद

955
01:11:52,720 --> 01:11:56,880
स्वरूप परमेश्वर। जो अमर है जो अखंड ज्ञानी है जो

956
01:11:56,880 --> 01:12:01,440
कभी दुखी नहीं होता। ठीक है? ये है भगवान का अर्थ।

957
01:12:01,440 --> 01:12:05,760
तो भगवान शब्द से भगवान को नकार कर

958
01:12:05,760 --> 01:12:10,400
अपनी क्रियाओं में अपनी इच्छाओं में वो

959
01:12:10,400 --> 01:12:14,480
उसी भगवान को ढूंढ रहा है जिस भगवान के होने से वो मना कर रहा

960
01:12:14,480 --> 01:12:19,360
है। जैसे एग्जांपल ले ले वैज्ञानिक वैज्ञानिक

961
01:12:19,360 --> 01:12:23,360
कहते हैं कि इस दुनिया में ऐसा कोई नहीं है जो सब कुछ कर सकता

962
01:12:23,360 --> 01:12:28,240
है। सर्वशक्तिमान है। कहते हैं ना कहते हैं।

963
01:12:28,240 --> 01:12:30,240
मगर उनसे यह पूछा जाए

964
01:12:30,240 --> 01:12:34,480
कि भैया यह बताओ कि वह कौन सा आविष्कार होगा जिसको करने

965
01:12:34,480 --> 01:12:39,280
के बाद तुम शांत बैठ जाओगे?

966
01:12:39,280 --> 01:12:43,760
तो वो क्या जवाब होगा? जिस दिन मैं कुछ ऐसा यंत्र बना लूंगा

967
01:12:43,760 --> 01:12:49,200
कि मैं सब कुछ कर सकूं तब तक वैज्ञानिक शांत नहीं बैठेंगे।

968
01:12:49,200 --> 01:12:53,440
जिस दिन मैं कुछ ऐसा बना लूंगा कि मैं जो चाहूं कर सकूं।

969
01:12:53,440 --> 01:12:57,440
इसका मतलब वो जा उसी तत्व की ओर रहे जिस

970
01:12:57,440 --> 01:13:01,520
तत्व के अस्तित्व को अभी नकार रहे हैं। सिद्ध कर दिया हमने

971
01:13:01,520 --> 01:13:05,520
बहुत से नास्तिकों को आस्तिक बनाया है। बहुत से नास्तिकों का मुंह बंद

972
01:13:05,520 --> 01:13:09,760
किया है। मेरे ख्याल से रामपाल जी ने कभी नहीं किया होगा। आपके गुरु

973
01:13:09,760 --> 01:13:12,800
में इसलिए जी लगा रहा हूं।

974
01:13:12,800 --> 01:13:17,280
अब दूसरी बात ये आती है। मैं अपने मूल विषय पे आ जाता हूं जो चल रहा था।

975
01:13:17,280 --> 01:13:19,600
तो

976
01:13:19,600 --> 01:13:23,840
क्योंकि उसके अंदर भी वही क्वालिटीज है जो परमात्मा

977
01:13:23,840 --> 01:13:28,080
के अंदर है। इसलिए जीव आकर्षित होता है परमात्मा

978
01:13:28,080 --> 01:13:33,280
की ओर। परंतु

979
01:13:33,280 --> 01:13:37,280
जिसके कारण उस अट्रैक्शन के कारण हम ईश्वर को सिद्ध कर

980
01:13:37,280 --> 01:13:41,280
पाते हैं। ईश्वर को सिद्ध करने के कारण हम धर्म को सिद्ध कर पाते

981
01:13:41,280 --> 01:13:45,280
हैं। परंतु आपके जो ये जो बाबा

982
01:13:45,280 --> 01:13:51,280
जी हैं इन्होंने आत्मा के अंदर वो क्वालिटीज मानी ही नहीं है।

983
01:13:52,080 --> 01:13:57,520
तो फिर आत्मा अट्रैक्ट कैसे होगी? ईश्वर की ओर

984
01:13:57,520 --> 01:14:01,680
जब उसके अंदर ईश्वर की क्वालिटी है ही नहीं तो अट्रैक्ट कैसे होगी

985
01:14:01,680 --> 01:14:06,080
ईश्वर की ओर और जब अट्रैक्ट नहीं होगी तो ईश्वर सिद्ध कैसे होगा

986
01:14:06,080 --> 01:14:10,480
और जब सिद्ध नहीं होगा तो धर्म कैसे सिद्ध होगा ये सब सोचने

987
01:14:10,480 --> 01:14:15,920
वाली बात है और इसके साथ ही साथ जब

988
01:14:15,920 --> 01:14:20,080
आत्मा के अंदर सच्चिदानंद की क्वालिटी है ही नहीं

989
01:14:20,080 --> 01:14:24,160
तो उसे तुम सच्चिदानंद स्वरूप मोक्ष कैसे दोगे?

990
01:14:24,160 --> 01:14:30,160
बिलकुल टाइट हो गया 11 बज गए

991
01:14:30,400 --> 01:14:34,560
लाइट बंद हो भाई वो सच्चिदानंद है ही यहां तो मोक्ष

992
01:14:34,560 --> 01:14:38,720
तब दे रहे है ना वो सच्चिदानंद है बस उसको उस तक पहुंचाना है उसका

993
01:14:38,720 --> 01:14:43,360
बोध कराना है तब तो ठीक है आपने मान लिया कि वो वो सच्चिदानंद

994
01:14:43,360 --> 01:14:47,360
है ही नहीं उसका तो अभाव था तो ना तो वो अट्रैक्ट

995
01:14:47,360 --> 01:14:51,520
होगी ना तो वो अट्रैक्ट होगी ईश्वर के लिए और

996
01:14:51,520 --> 01:14:55,680
ना ही उसको आप कभी अनंत वो जीवन वो

997
01:14:55,680 --> 01:14:59,920
अनंत मुक्ति दे पाओगे। क्यों नहीं दे पाओगे? क्योंकि वो स्वरूप

998
01:14:59,920 --> 01:15:02,720
है ही नहीं।

999
01:15:02,720 --> 01:15:06,800
सच्चिदानंद का अभाव कहां है?

1000
01:15:06,800 --> 01:15:09,120
सच्चिदानंद

1001
01:15:09,120 --> 01:15:13,280
अब आप जाइए। जो अब आप जाइए हंसीखुशी जाइए

1002
01:15:13,280 --> 01:15:17,520
आप। मैंने जो आपको समझाया उसको जरा मनन करिए। चिंतन

1003
01:15:17,520 --> 01:15:21,520
करिए। अभी आपको बहुत अध्ययन की आवश्यकता है। ठीक है? आप चिंतन मनन

1004
01:15:21,520 --> 01:15:25,600
करिए और आप एक बात बताइए कि आपको क्या आपके

1005
01:15:25,600 --> 01:15:31,600
गुरु जी ने यह बताया है कि आपकी ये किताबें कहां छपती हैं?

1006
01:15:47,520 --> 01:15:52,300
चले गए क्या?

1007
01:15:52,300 --> 01:15:58,300
[हंसी]

1008
01:16:03,760 --> 01:16:08,000
चलिए और किसी को ले लेते हैं। कोई और है तो आ जाओ भाई दे दो जरा

1009
01:16:08,000 --> 01:16:14,000
लिंक विंक।

1010
01:16:37,520 --> 01:16:41,840
लिंक दिया है भाई एक आध कोई व्यक्ति 101 मिनट के लिए बस मैं हूं

1011
01:16:41,840 --> 01:16:47,840
आना चाहे तो आ जाए

1012
01:16:54,000 --> 01:16:58,160
वैसे इस प्रकार से होती थी कि एक व्यक्ति जो है कह

1013
01:16:58,160 --> 01:17:04,160
रहा है कि

1014
01:17:09,680 --> 01:17:13,760
हां तो भैया उस यह एक व्यक्ति है

1015
01:17:13,760 --> 01:17:17,360
जो कह रहा है।

1016
01:17:17,360 --> 01:17:21,520
अच्छा हां एक बात और है भाई

1017
01:17:21,520 --> 01:17:26,400
स्ट्रीम यारार्ड का हमारा सब्सक्रिप्शन जो है वह खत्म हो गया है

1018
01:17:26,400 --> 01:17:30,400
और आप देख रहे होंगे यहां पर मार्क आ रहा है तो आप लोग थोड़ा-थोड़ा

1019
01:17:30,400 --> 01:17:34,480
सहयोग कर दें जिससे कि स्ट्रीम यारार्ड का हम सब्सक्रिप्शन ले सके

1020
01:17:34,480 --> 01:17:36,960
और

1021
01:17:36,960 --> 01:17:40,960
इस तरह की जो जागरूक करने के निमित्त चर्चाएं वह आपको प्राप्त

1022
01:17:40,960 --> 01:17:46,880
होती रहे क्योंकि इसमें कुछ लिमिटेशंस होती हैं।

1023
01:17:46,880 --> 01:17:50,880
तो आप लोग थोड़ा सा सहयोग करें आर्थिक

1024
01:17:50,880 --> 01:17:56,880
जिससे कि हम यह सब्सक्रिप्शन ले सके। कुछ

1025
01:17:57,200 --> 01:18:01,600
15 ₹16,000 का इसका आता है शायद सब्सक्रिप्शन तो

1026
01:18:01,600 --> 01:18:06,160
आप लोग थोड़ी मदद करें।

1027
01:18:06,160 --> 01:18:12,160
अच्छा इनका कहना है कि

1028
01:18:12,640 --> 01:18:16,960
तुम बस चंदे पर ही पलते रहो पलते हो। अच्छा

1029
01:18:16,960 --> 01:18:21,120
आपका जो जेलधाम निवासी बाबा है

1030
01:18:21,120 --> 01:18:25,440
वो फिलहाल उन लोगों के टुकड़ों पर पल रहा है जो टैक्स

1031
01:18:25,440 --> 01:18:29,520
भरते हैं। है ना? जेल की रोटी तोड़

1032
01:18:29,520 --> 01:18:33,600
रहा है ना? तो उन लोगों का टैक्स जा रहा है। जेल कैसे

1033
01:18:33,600 --> 01:18:37,600
चलती है? जब सरकार जेल का पैसा देती है। सरकार को पैसा कहां

1034
01:18:37,600 --> 01:18:41,600
से मिलता है? जब जनता टैक्स देती है। तो जो व्यक्ति भी टैक्स दे रहा है

1035
01:18:41,600 --> 01:18:45,920
ना उसके टुकड़ों पर पल रहा है आपका बाबा। दूसरी

1036
01:18:45,920 --> 01:18:49,920
बात यह है कि तुम जो ये एनाकोंडा वाले पाइप लगाने की बात करते हो यद्यपि

1037
01:18:49,920 --> 01:18:54,000
उसमें भी बहुत सारी चीजें हैं। पर अगर मान लिया जाए कि अनाकोंडा वाले पाइप

1038
01:18:54,000 --> 01:18:58,480
लगवाए हैं। तो पाइप नकली नोटों से बनवा लगवाए हैं। फर्जरी

1039
01:18:58,480 --> 01:19:02,640
की है पाइप फैक्ट्री वाले के साथ या फिर उसको पैसे

1040
01:19:02,640 --> 01:19:06,880
दिए हैं। पैसे दिए तो पैसे उसका पैसे

1041
01:19:06,880 --> 01:19:10,880
कहां से आए वह अभाव मटेरियल कहां से आया चंदे से आए

1042
01:19:10,880 --> 01:19:13,120
काहे से आए

1043
01:19:13,120 --> 01:19:17,600
बेवकूफ

1044
01:19:17,600 --> 01:19:23,200
एक व्यक्ति है वो जो हमने मेले में पुलिस प्रशासन

1045
01:19:23,200 --> 01:19:27,440
से बातचीत के समय यह लिखा था पुलिस ने जब हमें यह कहा था

1046
01:19:27,440 --> 01:19:31,760
एक बात हमारे सामने आई थी कि मेले में जाकर के जो हमने विरोध प्रदर्शन किया

1047
01:19:31,760 --> 01:19:35,840
तो भाई हमें पुलिस की सहायता लेनी चाहिए थी। विरोध प्रदर्शन अपने से नहीं

1048
01:19:35,840 --> 01:19:39,920
करना चाहिए था। उस बात के लिए हमने लिखा कि भाई जो हमने वो मेले में

1049
01:19:39,920 --> 01:19:44,000
जाकर डायरेक्ट विरोध प्रदर्शन किया पुलिस सहायता लिए बिना उसके लिए हमें

1050
01:19:44,000 --> 01:19:48,000
खेद है। तो क्षमा नहीं मांग रहा हूं। खेद है पर और

1051
01:19:48,000 --> 01:19:52,000
आगे इस तरह के कृत की पुनरावृत्ति नहीं होगी। तो कहां की? खुद

1052
01:19:52,000 --> 01:19:56,000
से कहां गए? अब तो पुलिस ले गए ना। कोर्ट गए,

1053
01:19:56,000 --> 01:20:00,160
पुलिस ले गए। अब थोड़ी ना गए खुद से करने।

1054
01:20:00,160 --> 01:20:04,240
तो जहां भी जाएंगे पुलिस के साथ जाएंगे कोर्ट के साथ जाएंगे। अच्छा

1055
01:20:04,240 --> 01:20:09,520
तुम लोगों ने अच्छा मुझे आईडिया दिया भाई

1056
01:20:09,520 --> 01:20:15,520
भाई फेस दिखाइए मनप्रीत जी

1057
01:20:24,720 --> 01:20:30,720
भाई साहब चले ही गए वो आए ही नहीं दोबारा।

1058
01:20:47,200 --> 01:20:53,200
कोई और है जो फेस के साथ आ सकता है?

1059
01:20:54,480 --> 01:20:58,560
हमने तो कई बार कहा है कि मत पड़ो चक्कर में कोई नहीं है टक्कर

1060
01:20:58,560 --> 01:21:02,640
में। आप लोग याद करते होंगे इन सब बातों का। हां

1061
01:21:02,640 --> 01:21:06,880
कि आजकल इस तरह की लाइव कम हो रही है। वैसे आज की चर्चा

1062
01:21:06,880 --> 01:21:11,360
काफी ठीक रही। सामने वाला व्यक्ति मतलब

1063
01:21:11,360 --> 01:21:17,360
उड़ता नहीं दिखाई उसने।

1064
01:21:25,040 --> 01:21:27,360
महेंद्र

1065
01:21:27,360 --> 01:21:31,440
हां भाई महेंद्र जी जल्दी से फेस दिखाइए वरना हम पूरा करने वाले हैं अपनी

1066
01:21:31,440 --> 01:21:37,440
लाइव को फिर ना कहिएगा कि भाई

1067
01:21:39,360 --> 01:21:43,440
इनका कर तो रहे हैं। इनके चैनल्स बैन हो रहे हैं। इनके लोगों

1068
01:21:43,440 --> 01:21:47,680
को पुलिस ढूंढ रही है। यह लोग लखनऊ में किताबें नहीं बेच पा रहे हैं। आगे

1069
01:21:47,680 --> 01:21:51,760
चलकर के उत्तर प्रदेश में नहीं बेच पाएंगे। फिर यह जो है भारत

1070
01:21:51,760 --> 01:21:55,840
में नहीं बेच पाएंगे। तो हो रहा है। उसी के

1071
01:21:55,840 --> 01:22:01,840
कारण ये लोग बरगला वो हो रहे हैं।

1072
01:22:07,440 --> 01:22:11,840
बताइए मनप्रीत जी। जय श्री राम।

1073
01:22:11,840 --> 01:22:16,080
जय श्री राम जी। इनके कुछ बताइए जी

1074
01:22:16,080 --> 01:22:20,160
अभी कोई हरियाणा में कुछ हुआ है इनका दंगाई जो था कुछ

1075
01:22:20,160 --> 01:22:24,160
उसके बारे में कुछ ये लोग चिल्ला रहे थे भगवान भगवान करके तो

1076
01:22:24,160 --> 01:22:28,400
वहां के युवाओं ने जागरूकता के साथ प्रतिकार किया तो इन

1077
01:22:28,400 --> 01:22:33,120
लोगों ने भैया अपने गुंडा वही पुरानी गुंडाग कर दी

1078
01:22:33,120 --> 01:22:37,200
कि भैया भगवान नहीं कहोगे तो हम मारेंगे मारा तो वहां फंस

1079
01:22:37,200 --> 01:22:41,680
गए ये लोग और दबा दिया को

1080
01:22:41,680 --> 01:22:45,920
ऐसा लग रहा है कि पैसे वैसे दे दिए कहीं खबर आई है वहां से

1081
01:22:45,920 --> 01:22:50,240
चुप करवा दी खाप पंचायत वगैरह ये जो है हम तो अपने भरोसे

1082
01:22:50,240 --> 01:22:54,560
करते हैं हम तो अपने भरोसे करते हैं बिल्कुल

1083
01:22:54,560 --> 01:22:57,280
सही बात है

1084
01:22:57,280 --> 01:23:01,760
लेकिन दबा दिया मामला फिर आया नहीं

1085
01:23:01,760 --> 01:23:05,840
भाई जो भी है हमें तो ये पता है कि हम क्या कर सकते

1086
01:23:05,840 --> 01:23:09,840
हैं है ना नहीं वो तो ठीक है तो लेकिन

1087
01:23:09,840 --> 01:23:14,240
असलियत सामने आ ही रही है धीरे-धीरे आ गई अरे अरे

1088
01:23:14,240 --> 01:23:18,320
तो उसी समय आ गई थी जब असलियत जब पकड़ने जा रहे तो वो कह रहा है भाई हमारे

1089
01:23:18,320 --> 01:23:22,400
उनका इलाज चल रहा है उनकी तबीयत खराब है इनके बाबा जी का इलाज कैसे चल रहा है

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भाई वो तो भगवान है कैसे चल रहा है इलाज

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अच्छा एक बात है सोचने की कि जब ये खुद कबीर का

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अवतार है तो ये क्यों कह रहे हैं कि मैं कुत्ता हूं

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मैं कबीर का कुत्ता हूं परमेश्वर का कुत्ता हूं

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काफी बातें

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अब तो एक वीडियो आई है कि वो प्रमोट कर रहे हैं 25,000 दिए हैं। एक

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को 15,000 वो ऑटो में बैठ के किताबें किताबें बांट रहे हैं। सीधा नहीं आ

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रहे। उसको तो आज पकड़ा गया है। कुछ ऐसा हुआ है।

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कुछ कुछ ऑटो वाला पकड़ा गया है। कोई किस में दावे

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रखे? अरे कोई नहीं अपना केस मजबूती के साथ चल रहा है। आप लोग इंतजार

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करिए बहुत जल्द शुभ परिणाम सामने आएंगे।

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चलिए

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ठीक है। ठीक है। जय श्री राम। जय

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श्री राम। जय श्री राम।

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जो लोग इस प्रकार से किसी लालच या लोभवश शांत शांत

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हो रहे हैं। अपने धर्म के साथ समझौता कर रहे हैं। आगे भुगतेंगे। भाई

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हम तो इस

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संतुष्टि के साथ सोते हैं कि हमने अपने धर्म

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के लिए कुछ किया। प्रश्न यह है कि आपने क्या किया?

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ठीक है? और जिसको भी कोई तकलीफ हो ये हिंदू ये

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ये छुआछूत, सामाजिक भेदभाव, बढ़ावा, मनुस्मृति

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वो लाइव आ जाए भैया लाइव। लाइव के लिए हमारी व्यवस्था

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आपको मालूम ही है भाई वो स्क्रीन पर दिखा दीजिए वो एक बार

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हमारी व्यवस्था क्या है लाइव के लिए लाइव जो

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है जिसको भी आना है वो 740830

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18869 पर हमें WhatsApp करें हमारे

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साथ इसी प्रकार से चर्चा सुनिश्चित होगी और

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आप हमारे समक्ष आ सकते हैं। वह जो भाई साहब थे उनको शायद कुछ प्रश्न

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करने थे पर उससे पहले वह चले गए हैं। हो

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सकता है कि उनको चिंतन मनन करने का मन हो और

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ठीक है फिर सभी को जय श्री राम।
