1
00:00:01,840 --> 00:00:06,560
तो सभी को जय श्री राम अ

2
00:00:06,560 --> 00:00:11,600
आशा करते हैं सभी कुशल पूर्वक होंगे

3
00:00:11,600 --> 00:00:15,600
और जितने भी छोटे हैं अनुज

4
00:00:15,600 --> 00:00:21,040
है छोटी प्यारी बहने हैं उन सबको यथोचित

5
00:00:21,040 --> 00:00:25,240
उनके ढेर सारा प्यार आशीर्वाद जो

6
00:00:25,240 --> 00:00:29,320
बड़े हैं उनको प्रणाम सभी को यथोचित

7
00:00:29,320 --> 00:00:33,320
अभिवादन और आज की जो चर्चा है वह

8
00:00:33,320 --> 00:00:37,400
भी काफी रोचक होने वाली है क्योंकि हमारे पंडित जी जो हैं उनके पास बहुत

9
00:00:37,400 --> 00:00:41,800
सारे प्रश्न हैं जो आहवान से पूछे जाते

10
00:00:41,800 --> 00:00:46,520
हैं तो उनमें से कुछ ऐसे प्रश्न जिनका हमने

11
00:00:46,520 --> 00:00:50,640
उत्तर नहीं दिया है वह आज हम लेने वाले हैं सारे तो पंडित जी के पास वो सारे प्रश्न है पंडित

12
00:00:50,640 --> 00:00:56,520
जी को हम ले लेते

13
00:00:56,520 --> 00:01:01,400
हैं पंडित जी श्री रामराम हर हर महादेव

14
00:01:01,400 --> 00:01:06,200
हर हर महादेव कैसे हैं आप

15
00:01:06,200 --> 00:01:11,000
बस बढ़िया राम की कृपा है जैसे आपके पास आपकी है

16
00:01:11,000 --> 00:01:15,560
वैसे नहीं नहीं बस उन्हीं की कृपा है

17
00:01:15,560 --> 00:01:20,520
और मैं एक बात याद दिला दूं कल एक बहुत ही रोचक अ

18
00:01:20,520 --> 00:01:24,720
स्ट्रीम हुई थी जिसमें मैं अकेला था हालांकि मुझे लगता

19
00:01:24,720 --> 00:01:28,760
है कि इस चैनल के जो दर्शक है उनमें मैं उनको मैं अकेला जब बोलता हगा तो उतना ज्यादा

20
00:01:28,760 --> 00:01:32,960
इंटरेस्ट नहीं आता होगा क्योंकि उन्होंने ज्यादातर यही देखा है फिर

21
00:01:32,960 --> 00:01:37,000
भी उसमें बहुत रोचक तथ्य आपको जानने को मिलेंगे और

22
00:01:37,000 --> 00:01:41,120
तो वो स्ट्रीम जरूर देखिएगा सर्वशक्तिमान ईश्वर के ऊपर जो कटाक्ष किए

23
00:01:41,120 --> 00:01:45,920
जाते हैं उनका निराकरण प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया

24
00:01:45,920 --> 00:01:49,960
है अभी पंडित जी हमारे लिए बहुत सारे प्रश्न लेकर

25
00:01:49,960 --> 00:01:54,160
के आए हैं विरोधाभासी प्रश्न भी है उसमें से काफी सारे हो सकता है

26
00:01:54,160 --> 00:01:58,280
हम कहीं कहीं पर फस जाए पंडित जी पहले तो सबसे पहले मैं आपको ये बता

27
00:01:58,280 --> 00:02:02,480
दूं कि जितने भी दर्शक है ना वो आप को मिस बहुत करते हैं मतलब कहते

28
00:02:02,480 --> 00:02:06,720
हैं कि पंडित जी कहां गए पंडित जी लाइए थोड़ी काम की विस्ता रहती

29
00:02:06,720 --> 00:02:10,800
है तो उसकी वजह से बाकी जैसा राम रास्ता दिखाया वैसे

30
00:02:10,800 --> 00:02:11,880
ही चलता है

31
00:02:11,880 --> 00:02:16,120
जी तो आज का जो स्ट्रीम है वो मैं हाईजैक कर रहा हूं क्षमा चाहूंगा

32
00:02:16,120 --> 00:02:21,080
ठीक है आज का होस्ट मैं हूं और ये

33
00:02:21,080 --> 00:02:25,480
ये स्ट्रीम आज जो है वो आवाहन के ऊपर प्रश्न होंगे

34
00:02:25,480 --> 00:02:29,480
इस सर्वशक्तिमान धर्म जो जो चैनल है इस

35
00:02:29,480 --> 00:02:33,680
पर आवाहन और वह किस परंपरा से है या

36
00:02:33,680 --> 00:02:38,040
जो भी अन्य प्रश्न है वह पूछे जाएंगे मैं कोशिश करूंगा कि बहुत ही ज्यादा

37
00:02:38,040 --> 00:02:42,160
वस्तु प्रश्न ना लू और वह लूंगा भी नहीं जितने भी सैद्धांतिक प्रश्न

38
00:02:42,160 --> 00:02:47,360
है मैं मैं उसको कलेक्ट किया है मैंने अमुक अमुक जगहों से लेकर

39
00:02:47,360 --> 00:02:51,520
तो शुरू करता हूं एक बार मैं बस भगवान का नाम ले लेता हूं हरि ओम

40
00:02:51,520 --> 00:02:52,040
तसत

41
00:02:52,040 --> 00:02:56,240
श्रीमते रामचंद्राय नमः ओम नमः परमहंसा स्वाद चरण

42
00:02:56,240 --> 00:03:01,000
कमल चन्म करय भक्त जन मानस निवासा श्री रामचंद्राय

43
00:03:01,000 --> 00:03:02,000
श्री राम जय

44
00:03:02,000 --> 00:03:06,720
राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम

45
00:03:06,720 --> 00:03:11,200
श्री राम जय राम जय जय राम शम ठीक है

46
00:03:11,200 --> 00:03:15,240
शुरू करते हैं श्री गणेशाय नम तो सबसे

47
00:03:15,240 --> 00:03:19,760
पहले मैं मेरे पास एक्चुअली प्रश्न की बहुत सारी लिस्ट है झड़ है और

48
00:03:19,760 --> 00:03:24,000
कुछ कुछ प्रश्न जो होंगे वो एक दूसरे से कनेक्टेड भी हो सकते हैं

49
00:03:24,000 --> 00:03:28,360
ठीक है तो अगर आपको लग रहा है कि एक क्योंकि ये प्रश्न मेरे नहीं है ये प्रश्न

50
00:03:28,360 --> 00:03:32,360
जनता के द्वारा दिए गए हैं तो कई लोगों ने बहुत कोशिश की है कि वो एक

51
00:03:32,360 --> 00:03:36,480
ही बार में कई सारे प्रश्न पूछ ले मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूंगा कि आप उसको

52
00:03:36,480 --> 00:03:40,640
हिस्सों में बांट दूं ताकि आपको सुविधा हो बाकी देखते

53
00:03:40,640 --> 00:03:44,680
हैं तो शुरू करने से शुरू करते हैं तो सबसे पहले ना आपका बहुत सारे

54
00:03:44,680 --> 00:03:49,280
लोगों ने परिचय मांगा है कि आप है कौन मतलब ये व्यक्ति है कौन

55
00:03:49,280 --> 00:03:53,480
जो एकदम से जिसने आतंक मचा रखा है समाज में इस

56
00:03:53,480 --> 00:03:57,640
समय के समाज में तो तो कृपया आप अपना परिचय देने

57
00:03:57,640 --> 00:04:01,800
की कृपा करें और वहां से शुरू करें जी मेरा संक्षिप्त परिचय तो मैंने

58
00:04:01,800 --> 00:04:05,960
वैसे अपने कुछ वीडियोस में कई बार दिया है जब मुझसे मेरी पूछी गई कि यात्रा कैसे

59
00:04:05,960 --> 00:04:10,120
चालू हुई आपकी मगर अगर एक संक्षिप्त परिचय कह सकते

60
00:04:10,120 --> 00:04:14,880
कि मैं श्रीमद जगदगुरु शंकराचार्य पुरी पीठाधीश्वर जी का एक अल्पज्ञ

61
00:04:14,880 --> 00:04:17,080
शिष्य और प्रभु श्री राम का

62
00:04:17,080 --> 00:04:21,240
एक साधारण सा भक्त जो कुछ वर्षों पूर्व तक

63
00:04:21,240 --> 00:04:25,480
एक साधारण एक सामान्य जीवन जी रहा था दिशाहीन जीवन जी रहा

64
00:04:25,480 --> 00:04:30,240
था उसको नहीं मालूम था कि जीवन का उद्देश्य क्या है

65
00:04:30,240 --> 00:04:35,000
और वो भी यह जो भोग विलास है

66
00:04:35,000 --> 00:04:39,360
उसी में ही लिप्त था उसी में ही जीवन के सार्थकता

67
00:04:39,360 --> 00:04:43,560
समझता था जैसे कि यह ले लिया वो ले लिया या यह देख लू यह फिल्म

68
00:04:43,560 --> 00:04:47,720
देख लू यहां घूम लू वहां घूम लू ऐसा ही कोई ऐसा कोई बहुत महान

69
00:04:47,720 --> 00:04:52,120
जीवन नहीं रहा कि बचपन से कुछ हां मगर बस एक भगवान

70
00:04:52,120 --> 00:04:56,800
की कृपा रही या प्रारब्ध रहा या माता-पिता के संस्कार रहे

71
00:04:56,800 --> 00:05:00,960
जिसके का बचपन से ही श्री राम के अंदर रुचि रही जी

72
00:05:00,960 --> 00:05:05,440
और श्री राम के प्रति आस्था होने के कारण कुछ दुर्व्स से

73
00:05:05,440 --> 00:05:09,800
या जो गलत चीजें होती है जिनसे की जीवन खराब हो सकता है उन चीजों से शायद

74
00:05:09,800 --> 00:05:14,000
बच गया थोड़ा-थोड़ा अछूता रह गया

75
00:05:14,000 --> 00:05:18,160
और शायद वही कृपा रही कि एक दिन जाकर के मेरे जीवन में वह जगत गुरु

76
00:05:18,160 --> 00:05:22,160
आ गए जो संसार के गुरु थे वह मेरे जीवन में आ गए और जिस दिन वह

77
00:05:22,160 --> 00:05:26,320
मेरे जीवन में आए उस दिन से मेरे जीवन को एक दिशा मिल गई जो दिशाहीन जीवन

78
00:05:26,320 --> 00:05:30,760
था मैं हमेशा सोचता रहता था कि मुझे करना क्या है क्या मेरी लाइफ का गोली

79
00:05:30,760 --> 00:05:32,160
ये ये जो प्रश्न है ना

80
00:05:32,160 --> 00:05:36,840
ये ये था मेरे अंदर ये जो प्रश्न है ना असतो मा सत गम तम सुमात्र

81
00:05:36,840 --> 00:05:40,960
ये था मेरे अंदर और मैं कहूंगा कि इस

82
00:05:40,960 --> 00:05:45,040
प्रश्न को ही कॉपी किया गया है मैट्रिक्स मूवी में आप मैट्रिक्स

83
00:05:45,040 --> 00:05:49,280
मूवी देखो तो उसमें नियो से जो शुरू में उसका फिल्म का नायक

84
00:05:49,280 --> 00:05:53,360
है उससे पूछा जाता है कि वो सवाल है जो तुम खोज रहे

85
00:05:53,360 --> 00:05:57,400
हो वो हमेशा कुछ खोज रहा था उससे पूछा जाता है कि तुम क्या खोज

86
00:05:57,400 --> 00:06:02,120
रहे हो तो वो तुम वो सोचता रहता दुनिया में कुछ तो गड़बड़ है

87
00:06:02,120 --> 00:06:06,360
है ना तो ये एटली ऐसी सिचुएशन है सबके

88
00:06:06,360 --> 00:06:10,920
साथ वो क्योंकि पूरी अपनी ये असतो मा सद गम

89
00:06:10,920 --> 00:06:15,200
जमय उसम यह जो क्या कहते हैं य पंक्तियां

90
00:06:15,200 --> 00:06:19,200
भी उसमें गीत के रूप में बनाई गई है उस मूवी में अत में आई

91
00:06:19,200 --> 00:06:23,200
है जी जो थर्ड पार्ट है उसम आई है तो यही

92
00:06:23,200 --> 00:06:27,720
मेरी स्थिति थी कि मैं भोग में ढूंढ तो रहा था अपने जीवन की सार्थकता

93
00:06:27,720 --> 00:06:31,920
मगर यह प्रश्न मेरे अंदर कोनते रहते थे कि मेरे जीवन में कुछ

94
00:06:31,920 --> 00:06:35,960
तो दिक्कत है कुछ गड़बड़ है और वह गड़बड़ कभी-कभी इस रूप में भी

95
00:06:35,960 --> 00:06:39,960
सामने आती थी कि मैं जब मैं आज मान लीजिए अगर एक अच्छा ड्रेस खरीद रहा

96
00:06:39,960 --> 00:06:43,960
हूं तो क्या मैं जब 80 साल का हो जाऊंगा 70 साल का हो जाऊंगा तब भी यह ड्रेस

97
00:06:43,960 --> 00:06:47,280
में पहन पाऊंगा मैं आज अगर बॉडी बना रहा हूं सिक्स

98
00:06:47,280 --> 00:06:51,600
पैक एप्स बना रहा हूं तो क्या मैं 80 साल में भी ऐसा दिख पाऊंगा ये वो जो चीज

99
00:06:51,600 --> 00:06:55,720
है नातो सद सत की प्यास यह चीज अलग तरीके से सबके जीवन

100
00:06:55,720 --> 00:06:59,720
में आती है वो मेरे अंदर भी आती थ इसके

101
00:06:59,720 --> 00:07:03,880
साथ ही साथ एट द सेम टाइम मुझे इस बात की चिंता हुई मेरे जीवन के

102
00:07:03,880 --> 00:07:07,880
वैसे बचपन से रहती थी कोई हमारे धर्म को जरा सा टच ना कर दे छू

103
00:07:07,880 --> 00:07:12,080
ना ले जरा सा चू तक ना कर दे धर्म को मगर वो उसने

104
00:07:12,080 --> 00:07:16,960
एक स्वरूप ले लिया एक जीवन के उद्देश्य का जब कुछ

105
00:07:16,960 --> 00:07:21,240
बड़े बड़े घटनाक्रम जीवन में हो गए जिसके कारण वह एक जीवन का उद्देश्य

106
00:07:21,240 --> 00:07:25,320
ही बन गया तो व्यक्तिगत उद्देश्य तो सबका वही हैतो सद

107
00:07:25,320 --> 00:07:29,520
तम और अगर समष्टि रूप से देखे तो जीवन का एक

108
00:07:29,520 --> 00:07:33,560
मात उद्देश्य धर्म की स्थापना धर्म की रक्षा ये दोनों

109
00:07:33,560 --> 00:07:37,760
ही चीजें एक सागर ज्ञान का मुझे मिल गया शंकराचार्य

110
00:07:37,760 --> 00:07:42,240
जी भगवान के रूप में जगतगुरु शंकराचार्य के रूप में तो ये दोनों ही चीजें

111
00:07:42,240 --> 00:07:46,560
वहां से मुझे प्राप्त होगी यह मेरा छोटा सा परिचय और इसको अगर शॉर्ट

112
00:07:46,560 --> 00:07:50,600
में अगर कहे तो बस वही कि जगतगुरु शंकराचार्य

113
00:07:50,600 --> 00:07:54,800
जी का अल्पज्ञ शिष्य अल्पज्ञ शिष्य कोई बहुत बड़ा

114
00:07:54,800 --> 00:07:58,800
ज्ञानी शिष्य नहीं और श्री राम का साधारण सा

115
00:07:58,800 --> 00:08:02,280
भक्त तो मैंने अपने जीवन के जो दो उद्देश्य बताए ना इसमें

116
00:08:02,280 --> 00:08:06,920
भी देखिए दोनों का परवन व्यक्तिगत वाला श्री राम जी

117
00:08:06,920 --> 00:08:11,080
और धर्म की रक्षा शंकराचार्य श्री राम जी धर्म

118
00:08:11,080 --> 00:08:15,080
की रक्षा से भी जुड़े हुए हैं और श्री राम जी के लिए शंकराचार्य जी के द्वारा

119
00:08:15,080 --> 00:08:19,320
प्राप्त होने वाला जो मार्गदर्शन तो ऐसे दोनों में सामंजस जी जय श्री राम

120
00:08:19,320 --> 00:08:23,560
तो ये एक्चुअली ये प्रश्न का य बैकग्राउंड ये था क्योंकि हमारे कई

121
00:08:23,560 --> 00:08:27,880
भाई बहनों ने आपके पुराने चित्रों को भी दिखाया है

122
00:08:27,880 --> 00:08:31,920
है ना तो लोग के मन में डाउट आता है कि यह

123
00:08:31,920 --> 00:08:36,320
जो व्यक्ति है यह मतलब क्या यह एक्टिंग कर रहा है

124
00:08:36,320 --> 00:08:40,360
या मतलब अपना इसका कुछ निजी स्वार्थ है क्योंकि य पहले तो

125
00:08:40,360 --> 00:08:44,400
ऐसा नहीं था है ना तो बैकग्राउंड इस जो कि आपने इसका उत्तर दे दिया है क्योंकि आपने स्वयं

126
00:08:44,400 --> 00:08:48,800
ही बताया कि आप पहले कैसे थे और अब कैसे है और उसका कारण क्या है

127
00:08:48,800 --> 00:08:52,880
तो मैंने अप इं आईडी इं आईडी पर हाईलाइट

128
00:08:52,880 --> 00:08:57,120
लगा रखी है जो लोगों ने किया है ना उनका ही चित्र

129
00:08:57,120 --> 00:09:01,160
लगा कर के मैंने अपनी हाईलाइट लगा रखी कोई पुराना जीवन देखना चाहे तो देख सकता

130
00:09:01,160 --> 00:09:05,200
था और मैं कहूंगा कि अगर भौतिकता की दृष्टि से देखा जाए तो पहले का

131
00:09:05,200 --> 00:09:09,640
जीवन बहुत समृद्ध था अगर आज के लोग जो जिनके लिए भौतिकता प्रधानता

132
00:09:09,640 --> 00:09:13,640
है मेरे मेरे लिए आज का जीवन जो हाईएस्ट लेवल हो सकता

133
00:09:13,640 --> 00:09:18,120
है पीक में हो सकता है सबसे ज्यादा सुखी जो मैं हो सकता हूं वो मैं आज हूं

134
00:09:18,120 --> 00:09:22,200
ठीक है मगर लोगों के पर्सपेक्टिव से उन्हे ऐसा दिखाई देगा कि वो वो

135
00:09:22,200 --> 00:09:26,600
जीवन मेरा ज्यादा उन्नत था ऐसा उन्हें दिख सकता है तो वो मेरी हाईलाइट

136
00:09:26,600 --> 00:09:30,800
पर वहां जाकर के चेक कर सकते मैंने वो शॉर्ट इसमें भी डाला है य वीडियो में भी डाला

137
00:09:30,800 --> 00:09:34,840
है जी क्योंकि आपने इस समय

138
00:09:34,840 --> 00:09:39,000
जगतगुरु का कई बार नाम लिया आपने शंकर संप्रदाय यानी जगतगुरु

139
00:09:39,000 --> 00:09:43,000
के बारे में आपने बहुत बार बोला अपने इन शब्दों पर तो मैं जानना

140
00:09:43,000 --> 00:09:47,080
चाहूंगा कि आप शंकर संप्रदाय से ही क्यों जुड़े और यही मेरा

141
00:09:47,080 --> 00:09:51,120
दूसरा प्रश्न होगा जो पूछा गया है समाज के द्वारा आपसे कि आप शंकर

142
00:09:51,120 --> 00:09:55,120
संप्रदाय से ही क्यों जुड़े म क्या आपने कभी दूसरे संप्रदायों

143
00:09:55,120 --> 00:09:59,480
को पढ़ा जाना शंकर संप्रदाय से जुड़ने से पहले

144
00:09:59,480 --> 00:10:03,920
कि बस आपने बस देख लिया कि नहीं यही है और मैंने चुन

145
00:10:03,920 --> 00:10:07,920
लिया देखिए अगर मैं सभी संप्रदाय का अध्ययन

146
00:10:07,920 --> 00:10:11,920
करने अगर निकलूंगा तो ऐसा नहीं है

147
00:10:11,920 --> 00:10:15,920
कि मतलब मैं बहुत बड़ा एक बहुत ब्रेन मास्टर व्यक्ति हूं

148
00:10:15,920 --> 00:10:20,000
जो सारे संप्रदायों को पढ़ लू और जो है एक ही जीवन में उस फिर

149
00:10:20,000 --> 00:10:24,000
धर्म की रक्षा भी कर लू फिर य आपको वीडियोस भी बना लू तो ऐसा नहीं है

150
00:10:24,000 --> 00:10:28,160
मगर जो ऐसा नहीं है कि आपको जैसे मैंने

151
00:10:28,160 --> 00:10:32,200
ये उदाहरण कई बार दिया कि जैसे

152
00:10:32,200 --> 00:10:33,200
हमने किसी को

153
00:10:33,200 --> 00:10:37,200
वेट लॉस करना है मैंने वेट लॉस कई लोगों का किया है वेट गेन किया मसल

154
00:10:37,200 --> 00:10:41,320
बिल्डिंग की है तो मैं इस इस शैली में ज्यादा अच्छे से बता पाता हूं

155
00:10:41,320 --> 00:10:45,600
है ना तो इसमें क्या होता है कि हम

156
00:10:45,600 --> 00:10:50,280
जैसे मान लीजिए कोई व्यक्ति आया और उसको वेट लॉस करना है तो मैंने उसको एक न्यूट्रिशन दिया

157
00:10:50,280 --> 00:10:54,320
अब न्यूट्रिशन में मैंने उसको 15 20 चीजें लिख दी कि तुम्ह येय

158
00:10:54,320 --> 00:10:58,520
इतने इतने बजे ऐसे ऐसे खाना है अब क्या है

159
00:10:58,520 --> 00:11:02,600
कि वो जो है उसके अंदर की सारी चीजें आपके लिए

160
00:11:02,600 --> 00:11:06,840
अच्छी है उस चार्ट के बाहर की अच्छी चीजें भी आपके

161
00:11:06,840 --> 00:11:10,920
लिए बुरी जैसे कि कोई व्यक्ति फोन

162
00:11:10,920 --> 00:11:15,600
करे भाई मैं यहां आया हूं यहां पर दूध मिल रहा है एक गिलास उस चार्ट के बाहर

163
00:11:15,600 --> 00:11:19,880
अब यह दूध भी आपके लिए हानिकारक है आपके गोल में सहायक नहीं है क्योंकि वो दूध

164
00:11:19,880 --> 00:11:24,080
है अच्छी चीज है मगर वह आपकी जो पूर्ति होनी थी वो आपके न्यूट्रिशन

165
00:11:24,080 --> 00:11:28,760
की पूर्ति हो चुकी है वो क्वांटिटी आपकी ज्यादा हो जाएगी वो भी आपके लिए हानिकारक हो जाएगा

166
00:11:28,760 --> 00:11:32,920
आपके उस गोल के लिए जो आपको वेट लॉस करना है तो हमें

167
00:11:32,920 --> 00:11:37,000
अपनी जो एक सही रास्ता पकड़ने के लिए हमें दुनिया के सारे रास्ते

168
00:11:37,000 --> 00:11:41,040
चेक करने की आवश्यकता नहीं होती है हमें एक सही रास्ता

169
00:11:41,040 --> 00:11:45,280
पकड़ना होता है उसके बाहर के सारे रास्ते जितने आपके अनुरूप

170
00:11:45,280 --> 00:11:48,440
है वह सब आपके लिए सहायक सिद्ध हो जाते हैं और जितने

171
00:11:48,440 --> 00:11:52,600
आपके विरुद्ध है वो विरोधी सिद्ध हो जाते हैं तो अब अगर इसको

172
00:11:52,600 --> 00:11:56,720
उल्टा करके देख ले कि वो व्यक्ति छोले भटूरे की ठेल

173
00:11:56,720 --> 00:12:00,840
पर खड़ा हुआ है फिर वो मुझे फोन करेगा सर क्या मैं छोले भटूरे खा सकता हूं नहीं खा

174
00:12:00,840 --> 00:12:04,920
सकते क्या मैं चाय प पाच मिनट बाद क्या मैं चाय पी सकता हूं नहीं क्या मैं

175
00:12:04,920 --> 00:12:08,960
वो घिसा बर्फ खा सकता हूं घिस के जो मिलती है वो चुस्की वाली बर्फ खा

176
00:12:08,960 --> 00:12:12,960
सकता हूं नहीं क्योंकि वो चार्ट में नहीं है है ना तो मैं उसको

177
00:12:12,960 --> 00:12:17,040
पूरे दिन यही बताता रहा नहीं ये नहीं ये नहीं य नहीं नहीं तो इसका तरीका क्या है भाई मैंने

178
00:12:17,040 --> 00:12:21,040
तुम्ह जो चार्ट दिया है वही तुमको खाना है उसके बाहर की सारी चीजें

179
00:12:21,040 --> 00:12:25,040
आपको नहीं खानी है जो उसके बाहर की मतलब जो उसका विरोध कर रही है

180
00:12:25,040 --> 00:12:29,160
इसी प्रकार से जो प्रामाणिक आचार्य क्या

181
00:12:29,160 --> 00:12:33,320
त है हमारे शास्त्रों के द्वारा प्रतिपादित और जो तर्क संगत है

182
00:12:33,320 --> 00:12:37,480
वोह यही है कि सबसे पहले वोह जो लक्षण

183
00:12:37,480 --> 00:12:41,480
क्या होना चाहिए ब्रह्मचारी सन्यासी होना चाहिए विभिन्न शास्त्रों को आप

184
00:12:41,480 --> 00:12:46,080
एक करके देख लो तो यही आंसर आएगा कि तत्वदर्शी वही है जो ब्रह्मचारी

185
00:12:46,080 --> 00:12:50,240
सन्यासी पहला लक्षण दूसरा लक्षण वह

186
00:12:50,240 --> 00:12:54,360
परंपरा प्राप्त होना चाहिए तो जो शंकर परंपरा

187
00:12:54,360 --> 00:12:59,200
है वोह तार्किक रूप से भी हमारी बहुत मजबूत कड़ी सिद्ध होती है

188
00:12:59,200 --> 00:13:03,600
क्योंकि बौद्धों के समय जब धर्म का पतन हो चला जब कोई नहीं है

189
00:13:03,600 --> 00:13:07,760
वहां से लेकर के धर्म को अपने खून से सींच करके परंपरा यहां लेके आ रही है ठीक

190
00:13:07,760 --> 00:13:12,040
है तो एक वो तार्किक प्रमाणिकता भी हो गई उसकी आवश्यकता

191
00:13:12,040 --> 00:13:16,320
भी हो गई उसकी तीसरा क्या है कि

192
00:13:16,320 --> 00:13:20,400
समस्त शति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा देता हो

193
00:13:20,400 --> 00:13:24,600
तो लक्षण भी सन्यासी उसके बाद परंपरा प्रमाणिक और

194
00:13:24,600 --> 00:13:28,800
तार्किक भी साथ ही साथ है ना इसके बाद अ

195
00:13:28,800 --> 00:13:33,240
क्या कहते हैं समस्त शति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा देने वाली अर्कट

196
00:13:33,240 --> 00:13:37,480
ने नहीं किया कि नहीं शिव पुराण नहीं मानेंगे वहां पर क्रेडिबिलिटी व्यास जी की खराब

197
00:13:37,480 --> 00:13:42,080
कर देंगे यह सब नहीं किया और अंततोगत्वा इन

198
00:13:42,080 --> 00:13:46,520
सब चीजों को भी हम लेकर के फिर आखिरी में पूछे कि क्या

199
00:13:46,520 --> 00:13:50,520
ईश्वर सर्वशक्तिमान है क्या तो उनके द्वारा क्योंकि कहा गया कि गुरु

200
00:13:50,520 --> 00:13:54,920
भाई जो संशय दूर कर दे और मेरे मन में संशय आता था मैं

201
00:13:54,920 --> 00:13:59,160
आपको सच बता रहा हूं मैं अपनी बाइक चलाते चलाते सोचता था कि ईश्वर ने सृष्टि

202
00:13:59,160 --> 00:14:03,400
कैसे बनाई होगी अगर पहले से अगर पहले से खाली

203
00:14:03,400 --> 00:14:07,880
स्पेस है और ईश्वर उसमें प्रकट हुए तो हमें मानना पड़ेगा प्रकृति पहले से है

204
00:14:07,880 --> 00:14:11,880
ये सब चीजें चिंतन मनन चला करता था हमें मानना पड़ेगा प्रकृति पहले से

205
00:14:11,880 --> 00:14:16,120
है तो इन सारे संश हों का जो निराकरण मुझे मिला गुरु वही

206
00:14:16,120 --> 00:14:18,600
संशय दूर कर दे मेरे जो थॉट्स है वो क्लियर

207
00:14:18,600 --> 00:14:22,800
किससे हुए वो गुरु से हुए तो उन्होंने मेरा संशय दूर किया तो ये सिद्धांत

208
00:14:22,800 --> 00:14:26,800
जहां पर अप्लाइड हो जाए अप्लाई हो जाए वो आपका गुरु है वो

209
00:14:26,800 --> 00:14:30,960
भले ही रावण संप्रदाय से हो वो भले ही वल्लभाचार्य संप्रदाय से

210
00:14:30,960 --> 00:14:35,280
प्रमाणिक परंपरा होनी चाहिए और आपका संशय दूर होना चाहिए

211
00:14:35,280 --> 00:14:39,440
शास्त्रों का खंडन नहीं होना चाहिए जो जहां पर भी यह सिद्धांत अप्लाइड हो जाएंगे

212
00:14:39,440 --> 00:14:43,800
वो आपका अब यदि वह सिद्धांत यहां शंकर परंपरा में अप्लाइड हो ग

213
00:14:43,800 --> 00:14:47,880
ये बाय प्रोडक्ट है मैंने तो वो सिद्धांत ढूंढे वो

214
00:14:47,880 --> 00:14:52,000
कहां मिलेंगे जहां पर सन्यासी हो जो गुरु हो वो सन्यासी हो वो

215
00:14:52,000 --> 00:14:56,600
परंपरा से हो वो शती वो अर्ध कोट न्याय ना करते हो वो अपने

216
00:14:56,600 --> 00:15:00,920
जो अपना जो शिष्य है उसका संशय दूर कर देते हो मैंने तो इनको लेकर चला मैं शंकर परंपरा

217
00:15:00,920 --> 00:15:04,920
को ढूंढने नहीं चला मैं इन शास्त्र सत सिद्धांतों को लेकर चला यह

218
00:15:04,920 --> 00:15:10,200
शास्त्र समत सिद्धांत मुझे य मिल गए तो मैं इनका हो

219
00:15:10,200 --> 00:15:14,200
गया इसी सेही आपने चक अब दूसरे संप्रदाय के

220
00:15:14,200 --> 00:15:18,240
गुरुओं के बारे में भी बोला इस समय जैसे तो यह प्रश्न भी

221
00:15:18,240 --> 00:15:23,440
उठता है कि फर कितने जगतगुरु क्योंकि शंकर संप्रदाय भी

222
00:15:23,440 --> 00:15:27,640
आदि शंकराचार्य भगवान थे फिर रामाज रामानुजाचार्य

223
00:15:27,640 --> 00:15:32,120
भी जगतगुरु कहे जाते हैं माधवाचार्य भी कहे जाते हैं तो ऐसे

224
00:15:32,120 --> 00:15:34,040
तो इतने सारे जगत गुरु हैं तो

225
00:15:34,040 --> 00:15:38,320
कई सारे जगत गुरु होंगे तो एक ही जगत है और उसमें इतने सारे जगतगुरु

226
00:15:38,320 --> 00:15:42,320
कैसे और उसी का फॉलो अप क्वेश्चन है कि आप शंकर संप्रदाय

227
00:15:42,320 --> 00:15:46,440
में देख ले कई जगतगुरु आ जाते हैं है ना

228
00:15:46,440 --> 00:15:52,120
सबसे पहली बात है सबसे पहली बात है कि

229
00:15:52,120 --> 00:15:56,200
जगतगुरु क्या कहते आपने कहा कि कितने जगतगुरु ठीक है सबसे पहली बात है

230
00:15:56,200 --> 00:16:01,040
कि इस प्रश्न से आपका धर्म और कहां प्रभावित हो रहा

231
00:16:01,040 --> 00:16:05,360
है अगर जगत गुरु एक नहीं है दो है तो इससे आपका धर्म ब्रम

232
00:16:05,360 --> 00:16:09,760
प्रभावित हो रहा है क्या अगर आपको यह पता चल गया कि ये येय

233
00:16:09,760 --> 00:16:13,840
ये मुझे चाहिए मुझे सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष

234
00:16:13,840 --> 00:16:18,800
शाश्वत धर्म चाहिए यह जहां से मिल रहा है वो आपके

235
00:16:18,800 --> 00:16:23,160
जगतगुरु ये जहां से मिल रहा है वो आपके जगतगुरु है ना

236
00:16:23,160 --> 00:16:27,480
तो अब जो भी इसके विरोध में जाएगा जो भी ऐसा ईश्वर

237
00:16:27,480 --> 00:16:31,480
देगा जो क्या कहते हैं जो बाधित है जो ऐसा

238
00:16:31,480 --> 00:16:35,800
मोक्ष देगा जो परम स्वतंत्र नहीं है जो ऐसा धर्म देगा जो शाश्वत

239
00:16:35,800 --> 00:16:39,800
नहीं है तो वो आपका जो गुरु नहीं हो सकता व

240
00:16:39,800 --> 00:16:43,880
अब इसमें अगर यह उपाधि अगर कई जैसे कितने जगत गुरु की बात आती

241
00:16:43,880 --> 00:16:48,040
है तो शंकराचार्य जी ने भी अन्य जो संप्रदाय हैं

242
00:16:48,040 --> 00:16:49,040
उनका कहीं पर भी

243
00:16:49,040 --> 00:16:53,280
अपमान नहीं हुआ है शंकराचार्य के द्वारा भी और अगर देखा जाए तो दूसरी

244
00:16:53,280 --> 00:16:57,280
परंपराओं के द्वारा भी इनका कोई अपमान नहीं हुआ है तात्विक विवेचना करते

245
00:16:57,280 --> 00:17:01,520
समय अपने सिद्धांत की की गई है ठीक है और उसकी

246
00:17:01,520 --> 00:17:05,560
भी आवश्यकता थी कि जो व्यक्ति 100% जैसे

247
00:17:05,560 --> 00:17:09,920
अब मैं सोच रहा हूं बाइक चलाते समय के ईश्वर ने सृष्टि की रचना कैसे की होगी

248
00:17:09,920 --> 00:17:14,040
मैं इतना ज्यादा आगे तक सोच रहा हूं कोई व्यक्ति नहीं सोच रहा है उसको

249
00:17:14,040 --> 00:17:18,520
चाहिए भगवान का एक सौम्य सा स्वरूप जिसकी वो भक्ति करना चालू कर दे

250
00:17:18,520 --> 00:17:22,560
वो सोच ही नहीं रहा है कि भाई भगवान ने सृष्टि बनाई होगी तो कैसे बनाई होगी भगवान यहां

251
00:17:22,560 --> 00:17:26,720
पर अगर य यहां पर रुक गया यहां है वहां नहीं है तो फिर वो

252
00:17:26,720 --> 00:17:31,160
सर्वशक्तिमान कैसे रहा वो सो कोई वति हर व्यक्ति ऐसा सोचने वाला नहीं है

253
00:17:31,160 --> 00:17:35,160
तो उसकी भक्ति उतने में ही पुष्ट हो जाए क्योंकि कई बार ऐसा होता है कि

254
00:17:35,160 --> 00:17:39,240
अगर हम उसको ओवरलोड कर देंगे ऐसा ज्ञान दे देंगे जिसका वो

255
00:17:39,240 --> 00:17:43,720
अधिकारी नहीं है तो वहां पर उसका माथा भी भ्रष्ट हो सकता है तो

256
00:17:43,720 --> 00:17:48,160
अमुक अमुक जो व्यक्ति की निष्ठा है उसको वहीं पर पुष्ट कर देने के लिए जिसकी

257
00:17:48,160 --> 00:17:53,080
जैसी प्रज्ञा शक्ति तो यह इसको कहा जाता है सत्य सलता की क्रमिक

258
00:17:53,080 --> 00:17:57,200
अभिव्यक्ति ठीक है तो अब जो अन्य परंपरा जिनम

259
00:17:57,200 --> 00:18:01,920
की जगतगुरु की उपाधि मिली भी है तो अन्य परंपराएं अगर

260
00:18:01,920 --> 00:18:04,160
पहली बात तो यहां से कहीं उनका ऐसा नहीं है कि

261
00:18:04,160 --> 00:18:08,200
उनका अपमान किया गया है तो अन्य परंपराओं को भी सम्मान दे देना में

262
00:18:08,200 --> 00:18:12,480
कोई हर्ज नहीं क्योंकि उनके द्वारा भी व्यक्ति की निष्ठा पुष्टि निष्ठा की पुष्टि

263
00:18:12,480 --> 00:18:16,760
हो रही है और सबसे बड़ी बात है कि जितनी भी प्रामाणिक परंपराएं है वो वैदिक

264
00:18:16,760 --> 00:18:20,960
है मतलब वेद को वो वेद के वाक्यों का सम्मान है उन सब

265
00:18:20,960 --> 00:18:25,120
में अचरण धर्मा आचरण के मामले में लगभग सब

266
00:18:25,120 --> 00:18:29,120
में मतक है कुछ एक थोड़ा बहुत ऊपर नीचे होगा विधियों में बाकी

267
00:18:29,120 --> 00:18:33,160
जो मोटी मोटी चीजें वर्णाश्रम धर्म है ना मूर्ति

268
00:18:33,160 --> 00:18:37,440
पूजा जो आचरण है वो सब में सेम है खानपान

269
00:18:37,440 --> 00:18:41,800
संबंधी चीजें तो ये सब में सेम है तो इसलिए अगर आपको वहां

270
00:18:41,800 --> 00:18:45,920
जगतगुरु ऐसे मिल रहे हैं रामानुज परंपरा के जो आपके संशय का निवारण

271
00:18:45,920 --> 00:18:50,080
कर रहे हैं सर्वशक्तिमान धर्म व सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत

272
00:18:50,080 --> 00:18:54,240
धर्म दे रहे तो आप आप वो भी जगतगुरु वो भी पूज्य है और

273
00:18:54,240 --> 00:18:58,480
इस तरह से भी जगतगुरु है कि उन्होंने अमुक अमुक स्थितियों में अमुक अमुक लोगों

274
00:18:58,480 --> 00:19:02,800
के जिस प्रकार की प्रज्ञा शक्ति थी उन प्रज्ञा शक्ति वाले लोगों की

275
00:19:02,800 --> 00:19:06,920
निष्ठा को पुष्ट करने के लिए उतने में ही वह सिद्धांत देना

276
00:19:06,920 --> 00:19:11,040
भी आवश्यक था जैसे कि एक

277
00:19:11,040 --> 00:19:15,120
जो क्या कहते हैं मनुष्य जो जन्म लेता

278
00:19:15,120 --> 00:19:19,560
है ठीक है जन्म से देखिए उसके जीवन में

279
00:19:19,560 --> 00:19:23,680
पहली बार जो भक्ति आती है अध्यात्म आता है वो द्वैत

280
00:19:23,680 --> 00:19:27,800
भाव से आता है कि अद्वैत से आता है सोचिए पहली बार जो भाव

281
00:19:27,800 --> 00:19:31,800
आएगा आता व पहली बार मूर्ति की र तब देखता है जब

282
00:19:31,800 --> 00:19:36,080
उसकी मां वहां खड़ी होती है तो उसकी यात्रा चालू होती है द्वैत

283
00:19:36,080 --> 00:19:40,200
से और द्वैत से चालू होकर के उसकी यात्रा पूरी होती जाकर

284
00:19:40,200 --> 00:19:44,240
के अवत क्या व बचपन से अद्वैत के बारे में सोचना शुरू करेगा बच्चा पागल हो

285
00:19:44,240 --> 00:19:48,520
जाएगा व कहेगा मेरा रोज बाल उतारो मे जा य करेगा

286
00:19:48,520 --> 00:19:52,520
तो वो अपना हेयर ट्रीटमेंट कराएगा ब्रेन ट्रीटमेंट कराएगा यही सब करता

287
00:19:52,520 --> 00:19:56,520
घूमेगा बचपन में उसको अत का मालूम पड़ा यात्रा शुरू कहा

288
00:19:56,520 --> 00:20:00,640
से हुई दत से तो द के सिद्धांत भी तो हो ना तब

289
00:20:00,640 --> 00:20:04,880
ना द्वैत के सिद्धांत भी होंगे तभी ना

290
00:20:04,880 --> 00:20:09,160
तो द्वैत से यात्रा शुरू हो कर के अद्वैत तक पहुंचती

291
00:20:09,160 --> 00:20:13,320
है है ना जब फिर द्वैत से चालू होता है फिर व्यक्ति की

292
00:20:13,320 --> 00:20:17,440
रुचि आई अध्यात्म को जानने में क्या कहते हैं

293
00:20:17,440 --> 00:20:21,600
खुद को जानने में ईश्वर को जानने में फिर उसने विवेचना शुरू

294
00:20:21,600 --> 00:20:26,240
करी कि ईश्वर अगर यहां रुक गया तो वहां तक कैसे तो ये और वो सर्वशक्तिमान कैसे

295
00:20:26,240 --> 00:20:30,360
ईश्वर अगर कहीं पर खड़ा है तो उसके अगल बगल क खाली है वहा भी ईश्वर है अगर

296
00:20:30,360 --> 00:20:34,400
वहां भी ईश्वर है तो ये स्ट्रक्चर वो है पूर्ण तत्व ये

297
00:20:34,400 --> 00:20:34,900
बहुत

298
00:20:34,640 --> 00:20:38,680
सारी चीज उसम आती जैसे कबीर वालों से अगर बात करो राम पालियो से तोव

299
00:20:38,680 --> 00:20:42,720
क्यों भागते हैं इन प्रश्नों से कहते तत्वदर्शी तत्वदर्शी तत्व से जानते क्या हो

300
00:20:42,720 --> 00:20:47,000
भाई तुम व तत्वदर्शी इसलिए है क्योंकि काल ने कहा है

301
00:20:47,000 --> 00:20:51,480
इसके अलावा तत्व तो दो कुछ कुछ तात्विक विवेचना

302
00:20:51,480 --> 00:20:55,600
तो करो वो नहीं है वो इन्होंने की है रामानुजाचार्य जी ने शंकराचार्य जी

303
00:20:55,600 --> 00:21:00,040
ने इन लोगों ने की है तात्विक विवेचना

304
00:21:00,040 --> 00:21:04,080
तो ये जो वाली बात है अगर

305
00:21:04,080 --> 00:21:08,120
कुछ स्टेटमेंट दू फाइनल तो फाइनल स्टेटमेंट यही है कि पहली बात

306
00:21:08,120 --> 00:21:12,160
तो हम केवल उस चीज पर वर्क करते हैं जो हमारे धर्म

307
00:21:12,160 --> 00:21:16,440
ब्रह्म से रिलेटेड हो अगर आप शंकर परंपरा

308
00:21:16,440 --> 00:21:20,480
के जगत गुरु जिनको उपाधि प्राप्त है उस उन जगत

309
00:21:20,480 --> 00:21:24,560
गुरु से दीक्षा ना लेकर के उसी परंपरा के जो एक

310
00:21:24,560 --> 00:21:28,720
गुरुकुल चलाने वाले आचार्य है उनसे भी अगर दीक्षा ले लेंगे उनके अनु

311
00:21:28,720 --> 00:21:32,720
हो कर के भी सैद्धांतिक जो नियम है उनका पालन करेंगे तब भी आपको वही

312
00:21:32,720 --> 00:21:36,880
मोक्ष मिलेगा जो जगतगुरु से डायरेक्ट दीक्षा लेने पर मिलेगा यह तो अपना

313
00:21:36,880 --> 00:21:40,920
अपना वो है कि आपकी निष्ठा डायरेक्ट जगतगुरु में ही हो गई तो उनसे दीक्षा ले ली

314
00:21:40,920 --> 00:21:45,360
मगर जगतगुरु की उपाधि कई लोगों के पास होने से

315
00:21:45,360 --> 00:21:49,440
आप आपका धर्म ब्रह्म कहीं प्रभावित नहीं हो रहा है

316
00:21:49,440 --> 00:21:49,940
ठीक

317
00:21:49,640 --> 00:21:53,920
है समझ इसी में एक छोटा सा प्रश्न और आता है कि

318
00:21:53,920 --> 00:21:57,960
ये भी प्रश्न पूछा गया है कि जैसे आपने जैसे बता दिया कि चलिए अलग अलग

319
00:21:57,960 --> 00:22:02,040
संप्रदाय में अलग अलग जगतगुरु हो सकते हैं तो शंकर संप्रदाय में ही

320
00:22:02,040 --> 00:22:06,240
चार चार पांच पाच जगतगुरु है जैसे इसका उदाहरण देता हूं एक व्यक्ति ने पूछा कि

321
00:22:06,240 --> 00:22:10,640
पूरी प एक तो गुरुदेव भगवान स्वयं है और एक अदान

322
00:22:10,640 --> 00:22:14,760
नाम के व्यक्ति है वो भी अपने आप को जगतगुरु बोलते हैं तो फिर ऐसे पूछती

323
00:22:14,760 --> 00:22:19,440
कैसे हो देखिए बोलने को तो

324
00:22:19,440 --> 00:22:23,520
जो जो प्रश्न करता है है ना

325
00:22:23,520 --> 00:22:28,800
उससे भी कोई व्यक्ति यह कह सकता है कि मैं तुम्हारा भाई हूं मैं तुम्हारा पिता हूं

326
00:22:28,800 --> 00:22:33,200
अब किसी का मुंह पर कोई पाबंदी तो है नहीं अगर हिंदू राष्ट्र होता

327
00:22:33,200 --> 00:22:37,840
हिंदू राष्ट्र का अर्थ क्या है कि स्वयं को आचार्य वही कहेगा जो आचार्य

328
00:22:37,840 --> 00:22:41,880
है स्वयं को जगतगुरु वही कहेगा जो जगतगुरु है

329
00:22:41,880 --> 00:22:46,120
स्वयं को धर्माचार्य वही कहेगा जो धर्माचार्य है स्वयं को शंकराचार्य

330
00:22:46,120 --> 00:22:50,280
वही कहेगा जो शंकराचार्य है अब क्या है यह आर समाज

331
00:22:50,280 --> 00:22:54,760
जैसे तंत्रों ने यह अपना एक विकृत सिस्टम

332
00:22:54,760 --> 00:22:58,800
बना तो लिया लोकतंत्र की सहायता से ठीक है अब क्या हु

333
00:22:58,800 --> 00:23:03,080
नकली आर समाज उनका ही कहना नकली आर समाज खुल गए हैं वो लोग भी अपने आप को आर

334
00:23:03,080 --> 00:23:05,520
समाजी धर्माचार्य कह रहे हैं

335
00:23:05,520 --> 00:23:09,760
तो उन्होंने जो किया था कुछ समय पूर्व

336
00:23:09,760 --> 00:23:13,760
नकली धर्माचार्य के रूप में नकली धार्मिक तंत्र के रूप में खुद

337
00:23:13,760 --> 00:23:17,800
को उ भाषित किया था आज वो रो रहे हैं आज नकली आ समाज बन रहे हैं उनका

338
00:23:17,800 --> 00:23:21,840
ही कहना है वो छाती पीट पीट के रो रहे हैं और आ समाज के नाम से मैं

339
00:23:21,840 --> 00:23:25,960
तो यह नहीं जानता हूं कि इसमें सच्चाई कितनी है ठीक है अब कैसे

340
00:23:25,960 --> 00:23:30,000
कैसे निर्णय करेंगे कि जिसने मुस्लिम से विवाह कराया वो आर

341
00:23:30,000 --> 00:23:34,120
समाजी नहीं है भाई तुम्हारे यहां तो ये है ना कि मुस्लिम वो

342
00:23:34,120 --> 00:23:38,200
तुम घर वापसी करा तो रहे हो मुस्लिमों की तो घर वापसी होकर के वो हिंदू बना तो

343
00:23:38,200 --> 00:23:43,040
उन्होंने अगर हिंदू से विवाह करा दिया तो आर समाज ही नहीं रहेगा ये कोई लॉजिक थोड़ी ना है

344
00:23:43,040 --> 00:23:47,400
आपने कहीं सिद्धांत थोड़ी ना बनाया कि जो मुसलमान हिंदू बन जाएगा तो वो

345
00:23:47,400 --> 00:23:51,400
पहले से जो जन्मजात जो हिंदू होंगे उनकी बेटियों से विवाह नहीं करेगा

346
00:23:51,400 --> 00:23:56,080
ऐसा कहीं आपने सिद्धांत नहीं बनाया है जी और

347
00:23:56,080 --> 00:24:00,080
बनाया भी होगा तो आपका उसमें भी सनातन का आधार चाहिए होगा

348
00:24:00,080 --> 00:24:04,120
पीछे से तो ये विकृत करने वाली

349
00:24:04,120 --> 00:24:08,200
चीज है कि कहने को कोई भी व्यक्ति मैं भी कह सकता हूं मैं मोदी हूं मैं

350
00:24:08,200 --> 00:24:12,480
प्राइम मिनिस्टर हूं मैंने कह दिया लो मान लो ऐसा होता है क्या तो

351
00:24:12,480 --> 00:24:16,800
कैसे मानोगे कि मोदी जहां से जहां से प्राइम मिनिस्टर प्रूव

352
00:24:16,800 --> 00:24:20,720
हो सकता है कि ये प्राइम मिनिस्टर है वहां से मानोगे तो पूरी पीठ

353
00:24:20,720 --> 00:24:24,880
के जो वर्तमान के जो शंकराचार्य हैं जिस तरीके

354
00:24:24,880 --> 00:24:29,080
से शंकराचार्य की नियुक्ति होती है उनको पद प्राप्त होता है उन्हें ही

355
00:24:29,080 --> 00:24:33,440
व वैसे ही नियुक्त है वैसे ही उनको पद जो है व प्राप्त है

356
00:24:33,440 --> 00:24:37,640
और जो पूर्वा चार्य महाराज जी थे उनसे वा मतलब

357
00:24:37,640 --> 00:24:41,840
बाकायदा उनको पद प्राप्त हुआ अब कोई स्वयं

358
00:24:41,840 --> 00:24:46,280
को और चार लोग खड़े हो जाए कल को कि मैं भी आवान हूं मैं भी आवान

359
00:24:46,280 --> 00:24:50,680
हालाकि मुझे तो अच्छा लगेगा सब लोग आवान आवान बोलो स्वयं को मगर

360
00:24:50,680 --> 00:24:55,040
अब जैसे उसने कोई चोर है क्या कहते हैं आर

361
00:24:55,040 --> 00:24:59,040
समाज यों के य का कोई अनथ डायरेक्ट कनेक्शन नहीं ने अपने आप को धर्म

362
00:24:59,040 --> 00:25:03,320
सम्राट लिख लिया तो वो धर्म सम्राट हो गया क्या धर्म सम्राट तो वही रहेंगे

363
00:25:03,320 --> 00:25:07,520
सर्व भूत हृदय धर्म सम्राट कृपा जी महाराज वो

364
00:25:07,520 --> 00:25:11,720
थोड़ी धम साट हो गया वो तो लिख ले लिखने को कोई भी लिख सकता है जो प्रश्न

365
00:25:11,720 --> 00:25:16,000
करता है वो भी लिख सकता है कि मैं ऋषि हुच हू जी व ऋषि विवाज

366
00:25:16,000 --> 00:25:20,120
नहीं होगा ऋषि वाज तो वही है जो अलंकार समाज का एक अनऑफिशियल

367
00:25:20,120 --> 00:25:24,720
गुंडा है है ना जी

368
00:25:24,720 --> 00:25:28,920
मैं कुछ कमेंट्स पढ़ रहा था राजेश जी आपसे प्रार्थना करूंगा कि कि आप ये गाली

369
00:25:28,920 --> 00:25:33,080
गलौच ना करें यहां पर चाहे वो दयानंद सरस्वती जी के बारे में हो चाहे स्कन के बारे

370
00:25:33,080 --> 00:25:35,720
में हो कृपया अभद्र भाषा का प्रयोग ना करें

371
00:25:35,720 --> 00:25:39,880
ठीक है ये हमारी संस्कृति बिल्कुल भी नहीं ठीक है आप

372
00:25:39,880 --> 00:25:44,440
स्वतंत्र है इस चैनल से जाने के लिए अगर आपको इस तरह की भाषा का प्रयोग करना क्षमा चाहूंगा लेकिन

373
00:25:44,440 --> 00:25:49,000
कृपया इस बात का ध्यान दे हम ठीक है

374
00:25:49,000 --> 00:25:53,000
चलिए अमित कुमार जी ने कुछ मेल पे मेल किया

375
00:25:53,000 --> 00:25:57,200
था कुछ समय पहले और उन्होंने उनके कुछ दो तीन प्रश्न थे मैं

376
00:25:57,200 --> 00:26:01,200
वो भी ले लेता हूं जैसे उन्होंने आपसे पूछा था कि आप कौन से

377
00:26:01,200 --> 00:26:05,520
दर्शन को मानते हैं जिससे आपको लगता है कि आप इन्होंने एक्चुअली

378
00:26:05,520 --> 00:26:09,640
स् कन को टारगेट किया था या स्कन के संदर्भ में प्रश्न पूछा था ये कि

379
00:26:09,640 --> 00:26:15,640
आप कौन से दर्शन को मानते हैं जो आपको लगता है कि इसकन के विरुद्ध प्रभावशाली

380
00:26:16,000 --> 00:26:20,800
है इसकन के विरुद्ध प्रभावशाली तो

381
00:26:20,800 --> 00:26:25,000
जितने भी परंपरा प्राप्त आचार्यों के दर्शन सब सब प्रभावशाली है

382
00:26:25,000 --> 00:26:29,640
क्योंकि इकन तो वो है ना कहीं की ईट कहीं कर रोड़ा भानुमति का कुनबा जोड़ा

383
00:26:29,640 --> 00:26:33,760
उनका तो ताश के पत्तों का महल है जहां से छू दोगे वहीं से चरमरा के गिर

384
00:26:33,760 --> 00:26:37,960
जाएगा तो उसमें आपको ये सोचने की आवश्यकता नहीं है कौन से दर्शन

385
00:26:37,960 --> 00:26:42,000
को मानते हैं सभी दर्शन उनके लिए पर्याप्त है वो कोई भी दर्शन हो सभी दर्शन अपने

386
00:26:42,000 --> 00:26:46,840
आप में पर्याप्त है स्न जैसी संस्था के लिए और

387
00:26:46,840 --> 00:26:50,840
एक बात मैं कहना चाह रहा था वो जो बात हुई थी इतने सारे जगतगुरु की

388
00:26:50,840 --> 00:26:55,000
उसके लिए कि ऐसा होता है जैसे भगवान

389
00:26:55,000 --> 00:26:59,200
ने कहा ना तू मेरी शरण में आा तेरी प्राप्ति की रक्षा और प्राप्ति की चिंता मैं करूंगा तो

390
00:26:59,200 --> 00:27:03,200
आपके जो मूल मूल प्रश्न है उनका तो जवाब निवारण होना आवश्यक है ठीक

391
00:27:03,200 --> 00:27:07,520
है सर्वशक्तिमान धर्म सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स तंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म

392
00:27:07,520 --> 00:27:11,520
मगर यदि आप इन जो आधुनिक प्रश्न भी आ रहे हैं क्योंकि जैसे जो शंकराचार्य होते

393
00:27:11,520 --> 00:27:16,040
हैं शंकराचार्य की बात ही कर ले तो शंकराचार्य उनका

394
00:27:16,040 --> 00:27:20,040
एक आध्यात्मिक स्वरूप है एक पार मार्थी स्वरूप है दैवीय स्वरूप

395
00:27:20,040 --> 00:27:24,440
है कि वो जो उस गद्दी बैठता है वो शंकर साक्षात शंकर कहा जाता है

396
00:27:24,440 --> 00:27:28,480
ये आदि दैविक स्वरूप हो गया मगर एट द सेम टाइम वो एक

397
00:27:28,480 --> 00:27:31,040
मनुष्य के रूप में भी है तो जहां

398
00:27:31,040 --> 00:27:35,240
पर आदि दैविक स्वरूप होते हुए उनके सिद्धांति मत एक्य

399
00:27:35,240 --> 00:27:39,480
होगा ठीक है वहीं पर मनुष्य होते हुए उन सबके दृष्टिकोण धर्म

400
00:27:39,480 --> 00:27:43,800
रक्षा के धर्म के पथ पर चलने के ये सब अलग अलग हो सकते हैं

401
00:27:43,800 --> 00:27:47,880
जी ठीक है तो उनकी जो धर्म ब्रह्म

402
00:27:47,880 --> 00:27:52,200
की जो वो है परिभाषा वो सब आपको एक ही मिलेगी तो आप इसमें

403
00:27:52,200 --> 00:27:56,400
ना पढ़के कि उनके मतक क्यों नहीं है या वो एक ही जैसा कार्य क्यों

404
00:27:56,400 --> 00:28:01,000
नहीं कर रहे हैं आप उनसे अपना धर्म ब्रह्म लीजिए जिससे भी आपकी निष्ठा

405
00:28:01,000 --> 00:28:05,120
जिसके प्रति भी आपके मन में निष्ठा उत्पन्न हो रही है और यदि सब लोग अपने

406
00:28:05,120 --> 00:28:09,360
धर्म ब्रह्म में धर्म ब्रह्म को प्राप्त करने लगेंगे सही जगह

407
00:28:09,360 --> 00:28:13,720
से प्रामाणिक आचार्यों से तो हमारा जो हमारी स्थिति

408
00:28:13,720 --> 00:28:18,000
सुधरने लगेगी साफ होने लगेगा इतनी भी गंदगी है

409
00:28:18,000 --> 00:28:22,280
तो अपनी जो ये दिमाग जो मस्तिष्क की जीवी है ना मैं खाली रखता हूं

410
00:28:22,280 --> 00:28:27,160
मैं केवल उन प्रश्नों पर जोर देता हूं जिन प्रश्नों से हमारा कोई

411
00:28:27,160 --> 00:28:31,160
तात्पर्य निकलना अब जैसे मैं यज्ञ करने बैठा उसमें

412
00:28:31,160 --> 00:28:35,160
कपूर डालना है यह क्यों लगाना है इन सबके भी जवाब है

413
00:28:35,160 --> 00:28:39,360
ऐसा नहीं है सबके जवाब है सनातन सब बताता है मगर यदि मैं अपनी

414
00:28:39,360 --> 00:28:43,480
जीवी इनसे भरू तो फिर मैं सर्वशक्तिमान ईश्वर के बारे में तर्क कहां

415
00:28:43,480 --> 00:28:46,080
से ढूंढू है ना वह सारी

416
00:28:46,080 --> 00:28:50,600
चीजें कैसे करूंगा राम जी के बारे में अवा उड़ाई जा रही है उस पर वीडियो कैसे बनाऊंगा

417
00:28:50,600 --> 00:28:54,600
तो मैं अपनी जीवी को खाली रखता हूं जिन प्रश्नों से तात्पर्य है

418
00:28:54,600 --> 00:28:58,680
अब जैसे मैं फील्ड में उतरा क्रिकेट के मैदान में

419
00:28:58,680 --> 00:29:02,840
और मेरा कैप्टन मुझे कह रहा है कि जाके ऑफ ऑफ साइड में फील्ड करो फील्डिंग करो अब

420
00:29:02,840 --> 00:29:06,960
मैं मैदान में उससे पूछ रहा हूं यहां यहां क्यों भेज रहे हो कोई तार्किक बात है क्या इसमें कुछ तो

421
00:29:06,960 --> 00:29:11,160
ये क्या उचित रहेगा इन फील्ड मुझे उससे पूछना बार-बार मैं उधर क्यों जाऊं

422
00:29:11,160 --> 00:29:15,240
मैं उधर क्यों जाऊं कप्तान ने बोला चल जाना है तो जाना है जो भी आपको डिसाइड करना

423
00:29:15,240 --> 00:29:19,320
है वो मैच के बाहर करना तो ऐसे ही है कि जिन

424
00:29:19,320 --> 00:29:23,360
चीजों से आपको तात्पर्य है कुछ उन चीजों प अपने जीवी को भरिए

425
00:29:23,360 --> 00:29:28,240
और जो ये वाली चीजें हैं कि वो उनमें मतक क्यों नहीं है ये केवल अ

426
00:29:28,240 --> 00:29:33,120
क्वेश्चन करने के लिए इनसे आपका कोई तात्पर्य हल नहीं होना तात्पर्य हल होगा असतो सद

427
00:29:33,120 --> 00:29:37,200
तमसो जति ये पूछो जाके शंकराचार्य

428
00:29:37,200 --> 00:29:41,560
से पूछो जा कर के जो शंकराचार्य इसका जवाब दे वो जगतगुरु है देंगे

429
00:29:41,560 --> 00:29:45,760
जवाब ये है आपकी वास्तविक प्यास इसके लिए

430
00:29:45,760 --> 00:29:50,000
ढूंढ गुरु जी एक कमेंट में एक व्यक्ति

431
00:29:50,000 --> 00:29:54,200
ने प्रश्न किया था ये आर्य आयुष यादव ने प्रश्न किया इस उत्तर

432
00:29:54,200 --> 00:29:58,440
मैं दे देता हूं उन्होने पूछा है कि आपकी परंपरा ने कभी कभी

433
00:29:58,440 --> 00:30:01,760
एक भी ग्रंथ इस्लाम के विरोध में क्यों नहीं किया देखिए

434
00:30:01,760 --> 00:30:05,760
दार्शनिक जो अगर आप विरोध देखेंगे या उनके अगेंस्ट बात कहनी हो तो

435
00:30:05,760 --> 00:30:10,080
गुरुदेव ने पुरी पीठाधीश्वर ने 1 स से 200 से ऊपर ग्रंथ लिखे हैं

436
00:30:10,080 --> 00:30:14,240
वो सारे ही ग्रंथ अब्राम रिलीजन के अगेंस्ट बोलते हैं

437
00:30:14,240 --> 00:30:18,320
ठीक है करपात्री जी ने बहुत ग्रंथ लिखे क्या आपने सारे ग्रंथों का अध्ययन कर लिया

438
00:30:18,320 --> 00:30:22,360
आप करपात्री जी का कोई भी ग्रंथ उठा के देख लीजिए वो आपको मिलेगा अब्राम रिलीजन के

439
00:30:22,360 --> 00:30:26,400
अगेंस्ट ही कोई भी कोई भी ग्रंथ ठीक है

440
00:30:26,400 --> 00:30:30,920
इसम कुछ कहना चाहूंगा इन भाई साहब की कहानी ऐसी है कि अगर

441
00:30:30,920 --> 00:30:35,200
इन्होंने जापान नहीं देखा तो इस दुनिया में जापान है ही नहीं इन्होंने जितना

442
00:30:35,200 --> 00:30:39,240
देखा है बस इस दुनिया में उतना ही है तो पहले तो आपको देखना

443
00:30:39,240 --> 00:30:43,400
चाहिए परंपरा प्राप्त ज्यादातर जितने भी आचार सबने कहीं ना कहीं खंडन अवश्य

444
00:30:43,400 --> 00:30:47,520
किया है अपनी अपनी शैली में किया है दूसरी बात यह है कि मैंने अभी तक

445
00:30:47,520 --> 00:30:52,120
आर्य समाज पर काफी सारे वीडियोस बनाए हैं ठीक है अब आर्य

446
00:30:52,120 --> 00:30:56,160
समाज ने जब ऐसा नहीं है कि आर समाज का कहीं पर ऐसा कोई वीडियो नहीं

447
00:30:56,160 --> 00:31:00,280
होगा जो कहीं ना कहीं मेरे कोई सिद्धांत वीडियो के खंडन हो रहा

448
00:31:00,280 --> 00:31:04,280
है कि नहीं हो रहा व बात अलग है मगर मेरे द्वारा बताए गए सिद्धांत

449
00:31:04,280 --> 00:31:08,280
के जो जिन सिद्धांतों का हम प्रचार कर रहे हैं आवान के द्वारा उन

450
00:31:08,280 --> 00:31:12,320
सिद्धांतों के विरोध में क्या आर्य समाज का कोई वीडियो नहीं बना होगा बना

451
00:31:12,320 --> 00:31:16,320
होगा मगर मेरा नाम लेकर नहीं बनाया तो मैं यह कहूंगा तो मैं यह

452
00:31:16,320 --> 00:31:16,840
कहूंगा कि

453
00:31:16,840 --> 00:31:21,200
तुम्हारे व आर समाज ने आज तक आवान का खंडन क्यों नहीं किया

454
00:31:21,200 --> 00:31:26,160
तो क्या इस बात को मानोगे तुम नहीं मानोगे ना लॉजिकल

455
00:31:26,160 --> 00:31:32,160
है तो सोचने वाली बात है थोड़ा तक से सोच तक के साथ सोच

456
00:31:32,920 --> 00:31:37,000
जील से हा एक और प्रश्न करते हैं कि उन्होने

457
00:31:37,000 --> 00:31:41,440
पूछा कि हिंदू धर्म में ईश्वर का क्या कांसेप्ट है

458
00:31:41,440 --> 00:31:45,680
और उनका यह डाउट है कि क्या वह साकार है या निराकार बहुत लोगों

459
00:31:45,680 --> 00:31:49,880
का प्रश्न है साकार है या निराकार पहली

460
00:31:49,880 --> 00:31:54,400
बात तो इस पर हम लोग वीडियो बना चुके हैं दत अवत और मायावा

461
00:31:54,400 --> 00:31:58,240
वाप में बता दीजिए

462
00:31:58,240 --> 00:32:02,480
एक परम तत्व है जो किसी के व्यवहार में नहीं आ सकता

463
00:32:02,480 --> 00:32:07,200
जब तक आप आपके व्यवहार में नहीं आ सकता वह सिर्फ प्राप्ति का विषय है

464
00:32:07,200 --> 00:32:11,240
जैसे कि कैलोरी जैसे हमको जब भूख लगती तो हमें वास्तविकता

465
00:32:11,240 --> 00:32:15,600
में क्या चाहिए हमें कैलोरी चाहिए मगर वह प्राप्त कहां से होती

466
00:32:15,600 --> 00:32:19,720
है प्राप्त होती है वह जो कैलोरी का सोर्स ऑफ

467
00:32:19,720 --> 00:32:23,840
फूड फूड्स होते हैं ना उनसे हमें कैलोरी हमें चाहिए कैलोरी मगर हम ढूंढते हैं डबल

468
00:32:23,840 --> 00:32:27,960
रोटी पिज्जा या अपने जो भारतीय

469
00:32:27,960 --> 00:32:32,000
खानपान है उसके अनुसार दाल रोटी चावल हम इसको ढूंढते हैं कैलोरी

470
00:32:32,000 --> 00:32:36,160
के लिए हाथ पैर में हाथ पैर नहीं मारते ना मार सकते हैं हम ऐसे नहीं कर सकते लाओ

471
00:32:36,160 --> 00:32:40,680
कैलोरी ला कैलोरी लाओ व्यवहारिक नहीं है तो उसी प्रकार से

472
00:32:40,680 --> 00:32:44,720
ईश्वर का एक स्वरूप है अव्यावहारिक वो व्यवहार में नहीं आ सकता है फिर

473
00:32:44,720 --> 00:32:49,000
उसके बाद ईश्वर आपकी दुनिया में एक आपके वहार

474
00:32:49,000 --> 00:32:53,000
में आ सकने वाले रूप में आते हैं मैं कह रहा हूं वो

475
00:32:53,000 --> 00:32:57,120
जो दार्शनिक भेद की बात है अभी थोड़ी देर के लिए न्यूट्रल

476
00:32:57,120 --> 00:33:01,160
अगर हो जाए तो ये मान लीजिए कि ईश्वर साकार ही है मगर

477
00:33:01,160 --> 00:33:05,840
वह आपके व्यवहार में नहीं आ सकता है ठीक है वो आपके

478
00:33:05,840 --> 00:33:10,400
व्यवहार में नहीं आ सकता है जब तक आप इस दुनिया में हो

479
00:33:10,400 --> 00:33:14,400
तो वह इस दुनिया में एक ऐसा रूप लेते हैं जो आपके व्यवहार

480
00:33:14,400 --> 00:33:18,440
की सीमा में आ जाए जिसके साथ आप व्यवहार कर सको तो इस प्रकार

481
00:33:18,440 --> 00:33:22,520
से ईश्वर साकार भी हो गया और ईश्वर निराकार भी हो गया

482
00:33:22,520 --> 00:33:26,560
अच्छा एक बात और आती भगवान श्री कृष्ण ने कही कि वो जो निराकार

483
00:33:26,560 --> 00:33:30,680
है वो भी मेरे ऊपर डिपेंड ठीक है तो

484
00:33:30,680 --> 00:33:34,720
यह क्यों कहा उन्होंने इसलिए क्योंकि जो भगवान

485
00:33:34,720 --> 00:33:38,840
का जो अव्यावहारिक रूप है वो अपनी सत्ता को अपने

486
00:33:38,840 --> 00:33:42,880
अस्तित्व को हम मनुष्यों के समक्ष सिद्ध करने

487
00:33:42,880 --> 00:33:46,960
के लिए निर्भर है किस पर भगवान के अपने ही सगुण साकार स्वरूप

488
00:33:46,960 --> 00:33:47,880
पर

489
00:33:47,880 --> 00:33:51,920
जैसे कि एक काट की लकड़ी में दाह क्षमता है मगर वो

490
00:33:51,920 --> 00:33:56,080
दाह क्षमता अपना अस्तित्व नहीं प्रकट कर सकती जब तक

491
00:33:56,080 --> 00:34:00,400
वो जलेगा नहीं लपट बन के जब तक वो लपट बनके कोई एक हिस्सा जलेगा

492
00:34:00,400 --> 00:34:04,840
नहीं तब तक व्यक्ति के मन में यह नहीं आएगा कि इस लकड़ी में दाह क्षमता

493
00:34:04,840 --> 00:34:09,000
है दाह क्षमता किस पर निर्भर है उस

494
00:34:09,000 --> 00:34:13,640
लपट पर तो भगवान ने क्या कहा कि वो जो निराकार है वो भी मेरे ही

495
00:34:13,640 --> 00:34:17,640
अधीन है तो मनुष्य की ओर से इंपॉर्टेंट कौन सा हिस्सा हुआ

496
00:34:17,640 --> 00:34:21,800
भगवान का सगुण साकार स्वरूप ही इंपोर्टेंट हुआ क्यों

497
00:34:21,800 --> 00:34:26,080
क्योंकि वो जो निराकार है उसका अस्तित्व ही इस पर निर्भर करता है

498
00:34:26,080 --> 00:34:31,000
सगुण साकार पर बिल्कुल जैसे आर्य समाजी है

499
00:34:31,000 --> 00:34:35,080
वो भगवान के सगुण साकार को नहीं मानते मगर सगुण निराकार को

500
00:34:35,080 --> 00:34:39,240
तो मानते हैं सगुण निराकार को तो मानते हैं तो वहां

501
00:34:39,240 --> 00:34:44,040
पर भी जो व्यवहार में ना आ सकने वाला ईश्वर है वो निर्भर हो रहा है किस ईश्वर के ऊपर

502
00:34:44,040 --> 00:34:48,120
जो अंतःकरण में प्रेरणा कर रहा है ऋषियों के वह सगुण हो रहा

503
00:34:48,120 --> 00:34:52,320
है सगुण हो रहा है ना ऋषियों के अंतःकरण में प्रेरणा की बगल

504
00:34:52,320 --> 00:34:56,840
में कुत्ता बिल्ली थे उनके तो अंतःकरण में प्रेरणा नहीं की तो उसने आपको

505
00:34:56,840 --> 00:35:01,000
उसने अपने आप कस्टमाइज किया कि मैं कहां पर व्यवहारिक हो जाऊं और

506
00:35:01,000 --> 00:35:03,280
कहां पर व्यवहारिक ना रहू

507
00:35:03,280 --> 00:35:07,400
ठीक है तो बस इसी का अगला चरण होता है कि भगवान अपने आप को और

508
00:35:07,400 --> 00:35:11,480
कस्टमाइज करता है कि मैं वहां मैं किसकी आंखों का विषय बन जाऊं और

509
00:35:11,480 --> 00:35:15,520
किसकी आंखों का विषय ना बनू जब वो ऐसा करते तो उनका स्वरूप बन जाता है अवतार

510
00:35:15,520 --> 00:35:20,200
कहते जिसे माया को चीर के जो धारण करते हैं वो

511
00:35:20,200 --> 00:35:24,280
जैसे भग शंक गुरुदेव कहते कि जो अवतार है

512
00:35:24,280 --> 00:35:28,360
भगवान का भगवान के जो साकार स्वरूप है सगुण साकार स्वरूप है वो निरा वण

513
00:35:28,360 --> 00:35:32,960
ब्रह्म है और ये जो पूरा हमें दिख रहा है ये सावरण ब्रह्म है

514
00:35:32,960 --> 00:35:37,120
जैसे हमारे सामने एक माया रूपी एक अविद्या रूपी एक चादर है तो

515
00:35:37,120 --> 00:35:41,280
उस चादर में एक स्ट्रक्चर के रूप में जो एक

516
00:35:41,280 --> 00:35:45,440
चीरा लगाया जाता है उस चीरे से दिखाई देने वाला जो उस चादर के उधर का जो ब्रह्म

517
00:35:45,440 --> 00:35:49,480
है है ना वो जो बिल्कुल वास्तविक ब्रह्म दिखाई

518
00:35:49,480 --> 00:35:53,560
देता है निरा ब्रह्म तो वो भगवान का अवतार होता है तो कुल

519
00:35:53,560 --> 00:35:58,480
मिलाकर के क्या हुआ कि एक ही परम तत्व अपने आप को

520
00:35:58,480 --> 00:36:02,600
एक अव्यावहारिक व्यवहार में ना आ सकने वाला परम तत्व अपने आप को व्यवहार

521
00:36:02,600 --> 00:36:07,000
में आ सकने वाले रूप में प्रकट करता है साधु

522
00:36:07,000 --> 00:36:11,240
भक्तों के उद्धार के लिए धरती मां की रक्षा के लिए

523
00:36:11,240 --> 00:36:15,240
धर्म के लिए और सृष्टि के संचालन के लिए

524
00:36:15,240 --> 00:36:18,480
ऐसा नहीं है इसके बिना नहीं कर सकता वो मगर ऐसा करने

525
00:36:18,480 --> 00:36:22,680
की वजह से लो जो मनुष्य है उसका जो उसको भक्ति की

526
00:36:22,680 --> 00:36:26,800
भक्ति का सरल रास्ता मिल जाता है भगवान तो ये धर्म की स्थापना

527
00:36:26,800 --> 00:36:30,960
तब भी कर सकता मगर जिनको उन्हें ऐसा फल ही देना है कि तुम्हारा

528
00:36:30,960 --> 00:36:35,200
मुझे रास्ता सरल कर देना है तो उसके लिए वह रूप भी लेते हैं

529
00:36:35,200 --> 00:36:39,240
ले सकते हैं ठीक है

530
00:36:39,240 --> 00:36:43,480
इसमें एक बात और आती है जो लोग यह कहते हैं कि

531
00:36:43,480 --> 00:36:47,720
वो जब द्रौपदी को बचाने आए थे तो निर्भया को बचाने क्यों नहीं आए

532
00:36:47,720 --> 00:36:51,920
तो मैं कह रहा हूं जब चार ऋषियों के अंतःकरण में प्रेरणा की थी तो आज हमारे

533
00:36:51,920 --> 00:36:57,800
और पंडित जी के अंतःकरण में प्रेरणा क्यों नहीं कर रहे

534
00:36:57,800 --> 00:37:01,880
भी कर दो क्यों नहीं कर रहे कहां गया ईश्वर अब नहीं है क्या तो

535
00:37:01,880 --> 00:37:06,760
मानना पड़ेगा कि ईश्वर किसके साथ क्या व्यवहार करेगा ये ईश्वर उसके

536
00:37:06,760 --> 00:37:10,920
उसमें फिर एक ब बताएंगे कि उसने पिछले पिछले कल्प में अच्छा अच्छा कार्य किया

537
00:37:10,920 --> 00:37:14,960
होगा उनके पुण्य का फल होगा वो चार ऋषि बन के प्रकट हुए क्योंकि

538
00:37:14,960 --> 00:37:19,080
उ चार ऋषियों को तो यूं ही दिया ना उन्होने अंतःकरण में प्रेरणा तब तक

539
00:37:19,080 --> 00:37:23,120
तो उनको वेद मालूम ही नहीं है तो धर्म का पालन कहां से करेंगे तो चार ऋषियों

540
00:37:23,120 --> 00:37:27,880
को उन्होंने यूं ही दिया अंतःकरण में प्रेरणा ठीक है बिल्कुल

541
00:37:27,880 --> 00:37:32,280
क्योंकि उनके पास वो तपोबल था क्योंकि उन्होंने उनके पूर्व के जन्म के कारण

542
00:37:32,280 --> 00:37:36,320
तो ईश्वर किसके साथ कैसा व्यवहार करेगा

543
00:37:36,320 --> 00:37:40,320
यह ईश्वर निर्धारित करते हैं क्योंकि उन्हें प्रत्येक जीव का

544
00:37:40,320 --> 00:37:44,640
सब कुछ खाका खाता मालूम है तो उन्होंने किसके किसको बचाने

545
00:37:44,640 --> 00:37:49,360
आना है किसको बचाने नहीं आना है ऐसे भी ईश्वर देख सकते हैं है

546
00:37:49,360 --> 00:37:53,600
ना एक तो य ये बात रही और

547
00:37:53,600 --> 00:37:58,280
जो ईश्वर का कांसेप्ट है और मैं समझा दूं जैसे बिजली आप देखते हो बिजली

548
00:37:58,280 --> 00:38:02,280
यह भागवत पुराण में दिया गया है उसको गुरुदेव ने भी अपने प्रवचन में

549
00:38:02,280 --> 00:38:06,280
बताया था जैसे बिजली आप देखते हो तो बिजली सब जगह ऊर्जा के रूप में विद्यमान

550
00:38:06,280 --> 00:38:10,560
है मगर अभी वो निर्गुण निराकार है छुओ के तो करंट नहीं मार रही है

551
00:38:10,560 --> 00:38:12,920
उसके बाद फिर हम उद्योग करते वही बिजली तारों

552
00:38:12,920 --> 00:38:17,000
में दौड़ने लगती है अब क्या है कि वो बिजली सगुण निराकार हो

553
00:38:17,000 --> 00:38:21,200
गई क्योंकि अभी भी दिख नहीं रही है मगर अब

554
00:38:21,200 --> 00:38:25,240
उसको छुओ ग तो वो करंट मार देगी तो सगुण निराकार पहले निर्गुण निराकार थी अब

555
00:38:25,240 --> 00:38:29,360
सगुण निराकार उसके बाद वही बल्ब के माध्यम से प्रकाशित हो जाती

556
00:38:29,360 --> 00:38:33,480
है ऐसा रूप ले लेती है जो किसी की आंखों का भी विषय

557
00:38:33,480 --> 00:38:37,720
बन जाए अभी तक ये छूने का विषय था है ना

558
00:38:37,720 --> 00:38:42,360
मगर अब वो आंखों का भी नेत्र का भी विषय बन गई तो वो सगुण साकार

559
00:38:42,360 --> 00:38:46,120
इसी तरीके से भगवान का रूप होता है

560
00:38:46,120 --> 00:38:50,280
और तो इस तरह से मनुष्य के पर्सपेक्टिव से यह

561
00:38:50,280 --> 00:38:55,400
कहा जाएगा कि ईश्वर निराकार भी है और ईश्वर साकार भी

562
00:38:55,400 --> 00:38:59,800
है फिर इसी का ही एक कंटिन्यू क्वेश्चन है अ

563
00:38:59,800 --> 00:39:03,880
उससे पहले हनुमान जी ने एक प्रश्न पूछा था कमेंट

564
00:39:03,880 --> 00:39:08,000
में पूछा था कि हिंदू धर्म को समझने के लिए कोई एक ग्रंथ एक बुक बता द

565
00:39:08,000 --> 00:39:12,360
देखिए ऐसा है भाई की मैं इसका जवाब उत्तर दे देता हूं कोई एक ग्रंथ नहीं है

566
00:39:12,360 --> 00:39:16,880
मैं आपको तीन चार बता देता हूं एक मिनट लूंगा इसका एक तो आप रामचरित

567
00:39:16,880 --> 00:39:21,160
मानस का अध्ययन कर सकते हैं आपको हिंदू धर्म समझ में आ जाएगा अ

568
00:39:21,160 --> 00:39:25,240
संत एकनाथ ने भागवत पर एक बहुत ही सुंदर सी टीका लिखी है 11

569
00:39:25,240 --> 00:39:28,000
स्कं पर इसका नाम है एकनाथ ही भागवत उसका

570
00:39:28,000 --> 00:39:32,640
अध्ययन कर सकते हैं आपको हिंदू धर्म समझ में आएगा समर्थ राम सुख दास

571
00:39:32,640 --> 00:39:36,920
जो शिवाजी महाराज के गुरु थे उन्होंने जो शिवाजी महाराज को उपदेश दिए थे

572
00:39:36,920 --> 00:39:41,120
वो एक ग्रंथ में लिखा गया है उसका नाम है दास बोध उसको पढ़ेंगे आपको हिंदू धर्म

573
00:39:41,120 --> 00:39:45,360
समझ में आएगा और पुरी पीठाधीश्वर का

574
00:39:45,360 --> 00:39:49,560
एक ग्रंथ है जिसका नाम है गर्भ सिकम हिंदू है उसका अध्ययन करेंगे

575
00:39:49,560 --> 00:39:53,560
तो आपको हिंदू धर्म समझ में आएगा और आपको गर्व भी होगा ठीक है तो

576
00:39:53,560 --> 00:39:57,920
बस ये तीन चार ग्रंथ है मेरी तर ओके बरल कंटिन्यू

577
00:39:57,920 --> 00:40:02,800
करते हैं तो अमित कुमार जी का अंतिम प्रश्न जो मेल पर उन्होने लिखा था वो यह है कि

578
00:40:02,800 --> 00:40:06,880
आपके द्वारा फिर परम भगवान कौन है हिंदू धर्म में और जो य

579
00:40:06,880 --> 00:40:11,240
देवी देवता है जैसे माता लक्ष्मी क्षमा करिएगा दुर्गा

580
00:40:11,240 --> 00:40:16,680
शिव गणेश कृष्ण इत्यादि यह सब फिर कौन

581
00:40:16,680 --> 00:40:20,880
है यह देवी देवता नहीं है यह भी भगवान के ही

582
00:40:20,880 --> 00:40:25,200
अन्य स्वरूप है देखिए कार्य कारण भेद से और अपना दास भाव दिखाने

583
00:40:25,200 --> 00:40:29,520
के लिए भगवान ऐसी लीला भी कर सकते हैं जिसमें वोह दास

584
00:40:29,520 --> 00:40:33,560
भाव अपना प्रकट कर रहे हो और यदि नहीं करते हैं तो एक बात

585
00:40:33,560 --> 00:40:37,560
सोचने की है कि क्या एक यह सिद्धांत नहीं लागू हो जाएगा कि

586
00:40:37,560 --> 00:40:41,680
नहीं भगवान दास नहीं हो सकता तो भगवान ऐसी लीलाएं भी करते

587
00:40:41,680 --> 00:40:43,320
हैं जिसमें वह अपने ही रूपों

588
00:40:43,320 --> 00:40:47,680
का दासत भी ग्रहण करते हैं और जो भगवत तत्व है

589
00:40:47,680 --> 00:40:51,800
उसको भी ग्रहण करते हैं तो जैसे माता लक्ष्मी एक तरफ अगर कहीं पर किसी

590
00:40:51,800 --> 00:40:55,840
लीला में आपको दिखाई देंगी कि वो जो है दास

591
00:40:55,840 --> 00:41:00,080
भाव में तो कहीं पर वो आपको परम उस भाव में भी दिखाई देंगी तो

592
00:41:00,080 --> 00:41:04,680
एक ही ईश्वर स्वयं को पांच अलग-अलग रूपों में प्रकट करते हैं ब्रह्मा विष्णु महेश

593
00:41:04,680 --> 00:41:08,920
भगवती और गणेश इन्हीं पांच जो रूप है ईश्वर के यही

594
00:41:08,920 --> 00:41:13,320
पांच रूप अलग-अलग अवतारों में जो आते हैं जो हमारे शास्त्रों द्वारा

595
00:41:13,320 --> 00:41:17,400
स्वीकार्य हैं वो सब भगवान के रूप है जो आपको मोक्ष दिला सकते हैं

596
00:41:17,400 --> 00:41:21,720
ऐसे तो भगवान के रूप सभी है दुनिया में सभी भगवान के रूप है मगर मोक्ष

597
00:41:21,720 --> 00:41:25,720
दायक भगवान का रूप जिनका पू जो पूज्य है जिनके

598
00:41:25,720 --> 00:41:29,760
जिनका पूजन हो जिनका अनुकरण हो अनुसरण हो तो वो सारे रूप

599
00:41:29,760 --> 00:41:34,000
भगवान जो हमारे शास्त्रों द्वारा बताए गए जैसे जो पानी होता है वो सर्वत्र

600
00:41:34,000 --> 00:41:38,120
व्याप्त है मगर वो सर्वत्र व्याप्त पानी आपकी प्यास नहीं बुझा सकता

601
00:41:38,120 --> 00:41:42,840
आपकी प्यास पानी का वही रूप बुझा सकता है जो आपके व्यवहार की सीमा में आ जाए

602
00:41:42,840 --> 00:41:47,040
इसी प्रकार से भगवान तो सर्वत्र व्याप्त है सब कुछ भगवान ही

603
00:41:47,040 --> 00:41:51,280
है मगर आपकी मोक्ष की

604
00:41:51,280 --> 00:41:55,360
प्यास वही ईश्वर का वही रूप बुझा सकता है जो शास्त्रों द्वारा

605
00:41:55,360 --> 00:41:58,600
बताए गए व्यवहारिक स्वरूप में आपके व्यवहार में आ

606
00:41:58,600 --> 00:42:03,200
जाए जी एक ही बहुत ही एक

607
00:42:03,200 --> 00:42:07,320
इसका मैं कु आप मैं कहूंगा क्या बहुत ही छोटा उत्तर दे

608
00:42:07,320 --> 00:42:12,120
एक दिन प्रश्न कि आप चर्चा में किसी को बोलने नहीं देते

609
00:42:12,120 --> 00:42:15,040
इसका उत्तर

610
00:42:15,040 --> 00:42:19,280
दे हा ये सा

611
00:42:19,280 --> 00:42:23,440
ऐसा है कि देखि मेरे अंत मतलब अंदर

612
00:42:23,440 --> 00:42:27,680
से जो मेरे यह मेरा ईश्वर साक्षी है कि मैं एक अंदर

613
00:42:27,680 --> 00:42:31,680
से मैं ये सोचता हूं कि मैं न्याय प्रिय ही रहूं और मैं किसी के साथ अन्याय ना

614
00:42:31,680 --> 00:42:35,800
करूं यह मेरी अंतर भावना है अब जो

615
00:42:35,800 --> 00:42:39,960
बो ना बोलने की बात है वह आती क्यों है आती इसलिए जैसे मैंने सामने

616
00:42:39,960 --> 00:42:44,200
वाले से पूछा कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है कि नहीं आपका

617
00:42:44,200 --> 00:42:48,240
उसने बोला हां है तो मेन प्रश्न क्या है सब जानते मेन प्रश्न है कि

618
00:42:48,240 --> 00:42:52,320
क्या वो यह कर सकता है कि नहीं तो अब मैंने पूछा क्या वो कर

619
00:42:52,320 --> 00:42:56,520
सकता है कि नहीं अब व्यक्ति उसका जवाब ना दे कर के पूछ रहा है कि वो उसकी

620
00:42:56,520 --> 00:43:00,520
आवश्यकता क्या है जबकि जब ये पूछा

621
00:43:00,520 --> 00:43:04,760
जा रहा है कर सकता है कि नहीं तो इससे क्या रिलेशन है कि वो आवश्यकता क्या है

622
00:43:04,760 --> 00:43:08,920
पूछा जा रहा है सामर्थ्य है कि नहीं ठीक है तो ये आवश्यकता क्या हैसे

623
00:43:08,920 --> 00:43:12,920
कोई ऐसा रिलेशन नहीं है फिर मैं उसको याद दिलाऊंगा अच्छा जब वो फसने लगता

624
00:43:12,920 --> 00:43:13,720
है तो वह क्या

625
00:43:13,720 --> 00:43:18,440
करता है कि गाजी इतने चले गए इतने

626
00:43:18,440 --> 00:43:22,680
वहां पर हत्या हुई लूट बलात्कार हुआ क्यों नहीं आया तुम्हारा ईश्वर

627
00:43:22,680 --> 00:43:26,800
तो तो इसका मतलब तुम्हारा जो ईश्वर है वो अन्याय कारी है जो तुम्हारे हिसाब से

628
00:43:26,800 --> 00:43:31,480
अन्या हो रहा है जो लोग मारे जा रहे हैं तुम्हारे हिसाब से अन्याय हो रहा है ना

629
00:43:31,480 --> 00:43:35,800
तो तुम्हारा ईश्वर अन्याय कारी हुआ तुमको मानना पड़ेगा अगर उसका

630
00:43:35,800 --> 00:43:39,800
व्यवहारिक स्वरूप तो यही है कि व अन्याय हो रहा है मगर तुमको भी मानना पड़ेगा कि

631
00:43:39,800 --> 00:43:43,880
उसके गुण अर्थ में भी भगवान का कोई हेतु है तुम्हारे भगवान

632
00:43:43,880 --> 00:43:47,920
का भी जो लोग मर रहे हैं ठीक है तुमको भी

633
00:43:47,920 --> 00:43:52,040
उसके गुण अर्थ में स्वीकार करना पड़ेगा व्यवहारिक स्वरूप तो है कि अन्याय हुआ और हम उसके लिए

634
00:43:52,040 --> 00:43:56,200
लड़ेंगे भी मरेंगे भी य नहीं होना चाहिए मगर जब तुम ईश्वर को दोष

635
00:43:56,200 --> 00:44:00,400
देने लगोगे तुम ईश्वर को जिस ईश्वर को तुम

636
00:44:00,400 --> 00:44:04,560
मानते हो उसको जब दोष जाने लगेगा तुम भी कहोगे उसका भी कोई हेतु

637
00:44:04,560 --> 00:44:08,840
है ना आने का नहीं तो अन्याय कारी तुम मान लो तुम्हारे ईश्वर

638
00:44:08,840 --> 00:44:13,080
की सत्ता तो व्याप्त है तो अब क्या होता है कि जब व्यक्ति के पास प्रश्न

639
00:44:13,080 --> 00:44:17,400
का उत्तर नहीं होता है तो व दूसरे टॉपिक्स खोलना चालू करता है अब दूसरे

640
00:44:17,400 --> 00:44:21,760
टॉपिक्स से होगा क्या जब वो टॉपिक्स खुल जाएंगे जैसे उन्होंने गुरुदेव

641
00:44:21,760 --> 00:44:25,800
को कुछ कह दिया अपशब्द कह दिया कि तुम्हारे शंकराचार्य ऐसे वो

642
00:44:25,800 --> 00:44:28,760
बोलते रहते ना तुम पंगे हो तुम पंडे हो अब जब

643
00:44:28,760 --> 00:44:33,120
वो ये सब बोल देगा तो मुझे क्या करना पड़ेगा वहां पर मेरी मजबूरी है कि उसके उस पंगे

644
00:44:33,120 --> 00:44:37,200
का जवाब दूं उस पंडे का जवाब दूं फिर जब मैं उसका जवाब दूंगा तो

645
00:44:37,200 --> 00:44:41,360
फिर एक टॉपिक खोलेगा है ना अगर मैं बोलने दे रहा हूं तो

646
00:44:41,360 --> 00:44:45,360
उस परिपेक्ष की बात है जब मैं उसको बोलने दे रहा हूं व्यर्थ की बात तो वो

647
00:44:45,360 --> 00:44:49,920
क्या करेगा फिर एक टॉपिक खोलेगा तो मुझे उसका जवाब देना देना पड़ेगा तो क्या होगा

648
00:44:49,920 --> 00:44:53,960
कि जब वो ऐसा करने लगता है कि जो विषय है ही नहीं उस

649
00:44:53,960 --> 00:44:58,200
विषय को वो खोल रहा है तो विषय जो चल रहा है उसकी रक्षा करने के लिए

650
00:44:58,200 --> 00:45:02,840
उसको मुझे रोकना पड़ता है और मैं रोकूंगा

651
00:45:02,840 --> 00:45:07,240
ऐसा नहीं है कि मैं उसको जवाब देने से रोक रहा हूं आप देखो वो वाली लाइव जो कुलदीप विद्यार्थी

652
00:45:07,240 --> 00:45:11,240
आया उसने उस बारे में बात नहीं की कि उसके आर्य समाज को पहचाना

653
00:45:11,240 --> 00:45:15,280
कैसे जाएगा अरे तुम मैं जानता हूं तुम क्यों चढ़ रहे हो इसी बात से तो चिढ़ ये वो

654
00:45:15,280 --> 00:45:19,360
उसकी समीक्षा हम लोग करेंगे समय प मगर आप

655
00:45:19,360 --> 00:45:23,680
देखिए ये सारे जो सवाल थे ये भी हम करेंगे भाई करेंगे

656
00:45:23,680 --> 00:45:27,840
तेरे अंदर जितनी चीजें सब लेके आना तू मगर एक चीज

657
00:45:27,840 --> 00:45:31,840
जब तक एक चीज खत्म ना हो जाए तब तक दूसरी चीज क्यों निकाल रहा है इसलिए

658
00:45:31,840 --> 00:45:35,880
क्योंकि तू यहां कच्चा पड़ रहा है इसलिए क्योंकि तू यहां से भागना चाहता है और

659
00:45:35,880 --> 00:45:39,920
तू नई नई चीजें खोलता जाएगा हम उसका जवाब देते फिर तू अगले तीसरे पर जाएगा

660
00:45:39,920 --> 00:45:44,000
इससे क्या मतलब निकलेगा अब यहां प जब वो नया विषय

661
00:45:44,000 --> 00:45:48,240
खोल रहा है तो मैं कोशिश करता हूं वो नया विषय ना खोल पाए अगर उसने

662
00:45:48,240 --> 00:45:52,480
खोल दिया अगर मैंने उसकी आवाज सुन लेने दी मेरे चैनल पर और दर्शक

663
00:45:52,480 --> 00:45:56,520
है वो सुन ले मान लीजिए गुरुदेव के लिए भगवान के लिए को अपशब्द

664
00:45:56,520 --> 00:46:00,840
उसने क दिया अब या तो मैं उसका जवाब दूं अपना विषय छोड़ कर के और

665
00:46:00,840 --> 00:46:04,880
या फिर उसका वो जो उसने वो जो कहा जो अपमान किया वो हो

666
00:46:04,880 --> 00:46:09,040
जाने दूं और अपने विषय को अपने विषय

667
00:46:09,040 --> 00:46:13,040
पर वापस आ जाऊ तो क्या होगा दर्शकों को यह कहेंगे कि आपने उसका जवाब

668
00:46:13,040 --> 00:46:17,440
क्यों नहीं दिया आपने उस बात को जाने क्यों दिया यह बात आएगी ना मन में

669
00:46:17,440 --> 00:46:21,560
तो इसलिए मैं वो बात उसको करने ही नहीं देता हूं मैं जान रहा हूं जब देख रहा

670
00:46:21,560 --> 00:46:25,680
हूं कि विषय से दूसरी बात बोल रहा है जो मामले को भड़काने के लिए तो मैं उसको वो करने

671
00:46:25,680 --> 00:46:29,680
ही नहीं देता हूं ना करने दूंगा वो विषय पर रहेगा कट टू कट अपनी बात

672
00:46:29,680 --> 00:46:32,760
बोलता रहे मैं हमेशा करता

673
00:46:32,760 --> 00:46:36,880
रहूं अब ये तीन चार प्रश्न है मुझे लगता है कि इसका उत्तर एक

674
00:46:36,880 --> 00:46:40,920
ही होगा लेकिन मैं वो एक साथ रख देता हूं एक पूछा

675
00:46:40,920 --> 00:46:45,040
है पूछा गया है कि जो भी हो इसकन के लिए स्कन आर्य समाज के एक साथ

676
00:46:45,040 --> 00:46:49,240
प्रश्न है ये कि जो भी हो इसकन इतने बड़े स्तर पर युवाओं और लोगों

677
00:46:49,240 --> 00:46:53,360
को हिंदू धर्म की तरफ खींच तो रहा है इसमें परेशानी क्या है आपको क्या समस्या

678
00:46:53,360 --> 00:46:57,360
है इससे आवान जी ठीक है दूसरा आर्य

679
00:46:57,360 --> 00:46:59,200
समाज इतने लोगों को कन्वर्ट होने से बचा रहा

680
00:46:59,200 --> 00:47:04,040
है घर वापसी करवा रहा है इसमें बुराई क्या है क्यों पीछे पड़े हो आप हाथ धोके इनके

681
00:47:04,040 --> 00:47:08,040
ठीक है और अंत आप क्या कर रहे हैं आप

682
00:47:08,040 --> 00:47:12,760
अंत में सनातनी भाइयों भाई बहनों को बांट रहे हैं अब इसका उत्तर

683
00:47:12,760 --> 00:47:17,360
द देखिए इसका उत्तर यह है इसमें कई सारे

684
00:47:17,360 --> 00:47:21,840
हमें चीजें देखनी पड़ेंगी पहले तो हमें य जानना पड़ेगा कि हिंदू धर्म है क्या

685
00:47:21,840 --> 00:47:25,920
जो प्रश्न करता है वोय बताए मुझे हिंदू धर्म है क्या ठीक

686
00:47:25,920 --> 00:47:30,440
है जीव की चाह का वास्तविक विषय

687
00:47:30,440 --> 00:47:34,640
सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर को परिभाषित कर सकने वाले वेदा

688
00:47:34,640 --> 00:47:39,280
आदी शास्त्र द्वारा जीव की चाह सच्चिदानंद

689
00:47:39,280 --> 00:47:43,440
स्वरूप परमेश्वर को प्राप्त करने के निमित्त बताई गई विधि का नाम धर्म

690
00:47:43,440 --> 00:47:47,640
है सनातन धर्म है अब दूसरी बात यह आती है क्या

691
00:47:47,640 --> 00:47:52,040
इसकन और आर्य समाज दोनों

692
00:47:52,040 --> 00:47:56,440
क्या वह इस धर्म की ओर ला रहे हैं परांत

693
00:47:56,440 --> 00:48:01,160
काल का तो मोक्ष दे रहे हो तुम कहां से निष्ठा रहेगी अपने लोगों का आचरण

694
00:48:01,160 --> 00:48:05,200
देखो कहां से रहेंगे वो निष्ठावान तुमने मोक्ष कैसा लिखा है

695
00:48:05,200 --> 00:48:10,080
उसम चलो तुम्हारा ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है तुमने मोक्ष भी नहीं दिया उसको

696
00:48:10,080 --> 00:48:14,160
खुद ही कह रहे हो वो सदा लीन रहना चाहता है मोक्ष की दुनिया में और खुद ही कह रहे

697
00:48:14,160 --> 00:48:14,660
हो

698
00:48:14,440 --> 00:48:18,480
वापस आएगा और जब वह वापस आने वाली समय की अवधि जो होगी

699
00:48:18,480 --> 00:48:23,000
उसको काट रहा होगा तब भी उसके मन में एक दुख होगा क्या मुझे वापस जाना

700
00:48:23,000 --> 00:48:27,560
है मुझे वापस जाना है जैसे पेरोल पर आदमी छूटता ना

701
00:48:27,560 --> 00:48:31,640
पेरोल होता है ना जेल चला गया रामपाल ने बहुत पेरोल की एप्लीकेशन

702
00:48:31,640 --> 00:48:35,680
लगवाई है जी हा वो उसको मिलती नहीं है

703
00:48:35,680 --> 00:48:40,080
जमानत ल लगवाता रहता है वो पता नहीं क्या चक्कर है उसका

704
00:48:40,080 --> 00:48:44,080
तो तो जैसे जैसे पेरोल पर आदमी व्यक्ति छूटता है

705
00:48:44,080 --> 00:48:48,720
जेल से ऐसे ही छोड़ रहे हो तुम थोड़ी देर के लिए जाओ भैया बाहर घूम घाम के आ जाना

706
00:48:48,720 --> 00:48:52,960
तो जो पेरोल पर छूटा हुआ व्यक्ति होता है क्या वोह

707
00:48:52,960 --> 00:48:57,080
वैसे ही महसूस करता है जैसे जेल से सर्वदा मुक्त रहने वाला जो होता वो

708
00:48:57,080 --> 00:49:01,240
करता है करता है क्या पेरोल पर छूटा हुआ व्यक्ति य जानता है मुझे

709
00:49:01,240 --> 00:49:05,600
जेल वापस जाना है तो उसके मन में वो दुख है तो वो

710
00:49:05,600 --> 00:49:09,760
जितनी देर आपने प्रांत काल माना उतनी देर भी वो पूर्णतया सुखी नहीं है यह

711
00:49:09,760 --> 00:49:13,840
तो तुम उसको मोक्ष दे रहे हो तो इसमें होता क्या है कि आपकी जो धर्म

712
00:49:13,840 --> 00:49:18,040
के प्रति निष्ठा हमें कोई दिक्कत नहीं कैसा भी मोक्ष दो कैसा भी ईश्वर दो मगर इसमें

713
00:49:18,040 --> 00:49:22,320
दिक्कत य आती है कि आपकी धर्म की जो व्यक्ति की धर्म के प्रति निष्ठा है वो बाधित

714
00:49:22,320 --> 00:49:26,320
हो जाती खंडित हो जाती है वो व्यक्ति कभी भी धर्म के लिए जीने

715
00:49:26,320 --> 00:49:29,640
मरने वाला नहीं बन पाएगा अच्छा दूसरी बात है चलो

716
00:49:29,640 --> 00:49:33,680
बन भी जाएगा फिर तुम खुद ही उसको सिखा रहे हो कि तुम

717
00:49:33,680 --> 00:49:37,840
हिंदू हिंदू हो ही नहीं ये भी तो कह रहे हो आपने कहा

718
00:49:37,840 --> 00:49:42,080
वो हिंदू बना रहे हैं लोगों को कहां बना रहे हैं वो तो कह रहे हैं हिंदू का मतलब है चोर काफिर लुटेरा मुझे हिंदू

719
00:49:42,080 --> 00:49:46,120
हिंदू शब्द मैं इस मैं इसके डिफेंस में बोलता हूं कम से कम वो ये तो बोल रहे हैं कि वो

720
00:49:46,120 --> 00:49:50,400
सनातनी है आप सनातनी है कम से कम एक तो कर रहे हैं वो अच्छा ठीक है कम से कम

721
00:49:50,400 --> 00:49:54,520
कृष् में कृष्ण में क्या बोलते हैं उनका मन लग रहा है भक्ति कर

722
00:49:54,520 --> 00:49:58,560
रहे हैं पूजा पाठ कर रहे हैं आपको ये सोचना होगा कि कृष्ण

723
00:49:58,560 --> 00:50:02,640
कौन है कृष्ण एक नाम है कृष्ण कृष्ण नाम का तो कोई जय

724
00:50:02,640 --> 00:50:06,960
भीम वाला भी आपको मिल जाएगा उस कृष्ण की पूजा करवा कर के आप जो

725
00:50:06,960 --> 00:50:11,320
है ये सोच रहे हैं कि वो आपके धर्म में वापस आ रहा है व सामने वाला नहीं

726
00:50:11,320 --> 00:50:15,560
आपको उसी कृष्ण तक वापस लाना है जो कृष्ण हमारा सनातन धर्म का कृष्ण

727
00:50:15,560 --> 00:50:19,720
है तो जब हम यह बात करते हैं कि वो सनातनी कृष्ण के पास आ रहा है तो वो

728
00:50:19,720 --> 00:50:24,160
नहीं आ रहा है तो सनातनी कृष्ण के पास वापस

729
00:50:24,160 --> 00:50:28,520
नहीं आ रहा है ये क्या आ रहा है लेकिन पेरोल पर

730
00:50:28,520 --> 00:50:32,880
आ जाने वाला जानबूझ के जेल जाता है तो फिक्स

731
00:50:32,880 --> 00:50:37,080
द ऑर्डर बट ही इज फ्री मैं समझ नहीं पाया क्या कह रहे व

732
00:50:37,080 --> 00:50:41,320
यह कह रहे हैं कि पेरोल पर तो आ जाते हैं रामपाल जी लेकिन

733
00:50:41,320 --> 00:50:44,800
लेकिन जो लेकिन आ जाते हैं बाहर तो तो

734
00:50:44,800 --> 00:50:48,880
ठीक है मतलब ी मतलब व स्वतंत्र है व आ जा सकते हैं

735
00:50:48,880 --> 00:50:53,000
भले वरल से क्यों ना आ रहे नहीं उनके मन में

736
00:50:53,000 --> 00:50:57,240
जेल वापस जाने का दुख है मैं यह बता रहा हूं जेल वापस जाने

737
00:50:57,240 --> 00:51:01,360
के दुख से फ्री नहीं है वो व्यक्ति जब वो पेरोल पर बाहर है

738
00:51:01,360 --> 00:51:05,440
तो वो जेल से मुक्त है मगर जेल वापस जाने के दुख से

739
00:51:05,440 --> 00:51:09,480
फ्री नहीं है और मोक्ष क्या बताया जाता है मोक्ष

740
00:51:09,480 --> 00:51:13,720
तो वो है जिसमें सभी प्रकार के दुखों से मुक्त हो जाए तो जितनी देर आप व फ्री

741
00:51:13,720 --> 00:51:17,880
भी हो तो आप इस प्रपंच संसार से तो मुक्त हो मगर इस प्रपंच रूपी संसार

742
00:51:17,880 --> 00:51:22,240
में वापस आने के दुख से तो मुक्त नहीं हो ना वो तो तुम्हारी

743
00:51:22,240 --> 00:51:26,280
उतनी एक फास है ना मन में कि वापस जाना है आज चार दिन हो गए पाच

744
00:51:26,280 --> 00:51:30,400
दिन हो गए छ दिन हो गए अरे दादा रे अब जाना है फिर रोवा रोवाई शुरू करनी है घर

745
00:51:30,400 --> 00:51:34,880
में होना है ना ऐसा तो वो है पेरोल

746
00:51:34,880 --> 00:51:39,000
वाला और अभी जो बात चल रही थी वो क्या थी हा

747
00:51:39,000 --> 00:51:43,360
सनातन वाली देख देखिए वो कृष्ण

748
00:51:43,360 --> 00:51:47,560
जो है अगर जब तक आप उस कृष्ण की बात नहीं करोगे जो सनातन कृष्ण

749
00:51:47,560 --> 00:51:51,920
है जो वेदा दी धर्म का पालन करने वाला कृष्ण है शाश्वत

750
00:51:51,920 --> 00:51:55,920
धर्म का पालन करने वाला कृष्ण है तब तक वो वो कृष्ण नहीं है

751
00:51:55,920 --> 00:52:00,160
जिसके लिए आप समझ रहे हो अब आप देखो

752
00:52:00,160 --> 00:52:04,280
यह सब चीजें जो होती हैं जो

753
00:52:04,280 --> 00:52:08,360
कुछ ऐसी चीजें होती इसमें स्कन कितना इवॉल्व होते हैं स्कन वाले कितना इवॉल्व

754
00:52:08,360 --> 00:52:12,720
हो जाते हैं जो कुछ ऐसी सोशल एक्टिविटीज होती है बिना इकन

755
00:52:12,720 --> 00:52:16,720
के इकन वाले कहां जाकर के मोर्चा निकाल देते कि नुपर शर्मा के

756
00:52:16,720 --> 00:52:20,840
लिए कोई मोर्चा निकाल दिया हो या बांग्लादेशी हिंदुओं के लिए यहां

757
00:52:20,840 --> 00:52:25,040
मोर्चा निकाल दिया ऐसा कितने कहां कहा हुआ बताइए इस कौन की तरफ से

758
00:52:25,040 --> 00:52:29,040
जो हिंदू जाएगा व अपने से जाएगा इस कन के बैनर के द्वारा

759
00:52:29,040 --> 00:52:33,360
ऐसा बहुत ही ना के बराबर है बहुत बड़ी बात है हो जाए तो क्यों इसका मतलब

760
00:52:33,360 --> 00:52:37,520
कन से जुड़ा जुड़ने वाला व्यक्ति वोह धर्म की रक्षा धर्म जो जुड़ने

761
00:52:37,520 --> 00:52:41,880
वाला व्यक्ति जो आप सोच रहे हो वो धर्म से जुड़ रहा है धर्म से नहीं जुड़ रहा है वहां पर आपको यही न्यूट्रल

762
00:52:41,880 --> 00:52:46,160
हिंदू मिलेगा हुंडा हिंदू मिलेगा बजरंग दल वाले मिलेंगे विश्व हिंदू परिषद वाले मिलेंगे

763
00:52:46,160 --> 00:52:50,240
भटके हुए हिंदू मिल जाएंगे आपको जिनके कोई सिद्धांत नहीं होंगे यह

764
00:52:50,240 --> 00:52:54,920
सब लोग मिल जाएंगे या कुछ बहुत कम संख्या में परंपरावादी मिल

765
00:52:54,920 --> 00:52:59,280
जाएंगे मगर आप को ये सब लोग नहीं मिलेंगे जो विदेशी

766
00:52:59,280 --> 00:53:03,840
षड्यंत्र के तहत जो हिंदू बनाए जा रहे हैं और उसमें रहने वाले हिंदू अगर मिलेंगे

767
00:53:03,840 --> 00:53:08,400
तो वो इस कोन के कारण नहीं मिलेंगे वो अपनी उनकी निष्ठा कुछ बाकी रह गई होगी

768
00:53:08,400 --> 00:53:12,440
उसके कारण आपको मिलेंगे यानी कि अगर वो वहां मिल रहे हैं आपको तो इसका मतलब

769
00:53:12,440 --> 00:53:15,520
आप ये समझ लो कि अभी वो पूरी तरीके से कन से लिप्त

770
00:53:15,520 --> 00:53:20,040
नहीं हो पाए जिस दिन हो जाएंगे तो वो भी मिलना बंद हो जाएंगे तो

771
00:53:20,040 --> 00:53:24,080
तो दो चीजें ये हो गई कि पहली बात तो वो हिंदू धर्म या सनातन धर्म में

772
00:53:24,080 --> 00:53:28,120
नहीं ला रहे हैं वो अपने द्वारा सनातन के नाम से नकली सनातन

773
00:53:28,120 --> 00:53:32,520
सनातना भास में लेकर आ रहे हैं तो ऐसा सोचना गलत है

774
00:53:32,520 --> 00:53:36,600
कि वह सनातन धर्म से जोड़ रहे हैं पहली बात दूसरी बात यह है कि आप यह सोच

775
00:53:36,600 --> 00:53:41,280
रहे हैं कि उनसे आपको फायदा मिलने वाला है तो नहीं नुकसान ही मिलेगा

776
00:53:41,280 --> 00:53:45,360
अच्छा कैसे नुकसान क्या मिलता है हम जीत

777
00:53:45,360 --> 00:53:49,560
सकते हैं पूरी दुनिया से तुरंत जितनी आडलज

778
00:53:49,560 --> 00:53:53,640
सनातन के विरोध विरोध में बनाई गई पाच मिनट के अंदर जीत सकते हैं पाच

779
00:53:53,640 --> 00:53:57,840
मिनट वैचारिक जब क्रांति की बात आती है

780
00:53:57,840 --> 00:54:01,880
भाई विचारों से अगर हमने किसी को जीत लिया तो व्यवहार में जीतने की आवश्यकता

781
00:54:01,880 --> 00:54:05,920
ही नहीं रह जाएगी मगर दिक्कत तब आती है जब हमारे ही लोग

782
00:54:05,920 --> 00:54:10,480
हमारे उन सिद्धांतों का खंडन करते हैं पहली बात

783
00:54:10,480 --> 00:54:14,600
जैसे कि मैंने कहा ईश्वर वही है जो सब कुछ कर सकता है मुसलमान

784
00:54:14,600 --> 00:54:18,640
हार जाएगा मगर मुसलमान उससे क तुम्हारे य के आर समाजी

785
00:54:18,640 --> 00:54:22,840
भी तो यही कहते ईश्वर अवतार नहीं ले सकता लो भाई तो हमारे

786
00:54:22,840 --> 00:54:26,840
हमें हराने वाला कौन हुआ वही जो आपके अनुसार सना की रक्षा

787
00:54:26,840 --> 00:54:30,720
कर रहा है वो हमें हरा रहा है ऐसा सिद्धांत दे कर के

788
00:54:30,720 --> 00:54:34,840
वो केवल सिद्धांत अपना दे ही नहीं रहा है वो हमारे सिद्धांत का विरोध

789
00:54:34,840 --> 00:54:39,000
कर रहा है वो निराकार ईश्वर की पूजा करना चाहता है खूब करे कोई दिक्कत नहीं है मगर

790
00:54:39,000 --> 00:54:43,240
वो यह कह के कर रहा है कि ईश्वर अवतार नहीं ले सकता ईश्वर साकार नहीं हो सकता

791
00:54:43,240 --> 00:54:47,760
यह गलत हमारे यहां भी निराकार ईश्वर के

792
00:54:47,760 --> 00:54:52,000
प्रतीक के रूप में शिवलिंग है और साकार ईश्वर के स्वरूप के रूप में उनका विग्रह

793
00:54:52,000 --> 00:54:56,560
है भगवान का चाली ग्राम भगवान है निरा

794
00:54:56,560 --> 00:55:00,800
के रूप में और वैसे उनका विग्रह है सगुण साकार

795
00:55:00,800 --> 00:55:04,800
का ठीक तो ऐसा नहीं

796
00:55:04,800 --> 00:55:08,920
है अगर वोह निराकार की भक्ति करना चाहते हैं उन्होने निराकार स्वरूप को चुना है तो वो

797
00:55:08,920 --> 00:55:13,040
एक बात अलग है मगर वह जब विरोध करते हैं तो हमारा सिद्धांत कमजोर

798
00:55:13,040 --> 00:55:17,240
कहां हमारे जो वैचारिक क्रांति वो कमजोर कहां

799
00:55:17,240 --> 00:55:21,680
पड़ती है जो विरोधी है शत्रु है उनके सामने तो इसका मतलब आपने

800
00:55:21,680 --> 00:55:25,720
ऐसे सिद्धांतों का प्रचार करके आपने रक्षा नहीं की बल्कि आपने

801
00:55:25,720 --> 00:55:29,840
कमजोर की आज हमारे जो ज्यादातर जो यूथ है उसको हमारे मूलभूत

802
00:55:29,840 --> 00:55:34,120
सिद्धांत नहीं पता है ईश्वर भैया कुछ भी कर सकता है यह सब सिद्धांत

803
00:55:34,120 --> 00:55:38,440
नहीं बताया आप लोग आप जैसे लोगों कारण ठीक है दूध

804
00:55:38,440 --> 00:55:42,720
दही की थोरी फैला दी शिवजी बन सकते हैं ये है वो अपने मन गणन चीज फैला दी

805
00:55:42,720 --> 00:55:45,880
नई नई लीलाए बता दी जो है ही नहीं जो परंपरा प्राप्त आचार्य

806
00:55:45,880 --> 00:55:50,120
मान ही नहीं रहे हैं खुद ही कह रहे हैं इसकन धनवाद का आप वीडियो देखिए

807
00:55:50,120 --> 00:55:54,240
खुद ही कह रहे हैं कि भैया हमने नए सिद्धांत बनाए हैं फिर थोड़ी देर बाद खुद

808
00:55:54,240 --> 00:55:58,280
ही कह रहे हैं कि हम वही तो कर रहे जो पूर्वा चार कर खुद ही कह रहे कि

809
00:55:58,280 --> 00:56:02,400
हम जो है विरोध कर रहे हैं पूर्वा चार्य का और फिर खुद ही कह रहे वही तो कर रहे

810
00:56:02,400 --> 00:56:07,360
जो पूर्वा चार्य कर रहे वा हो गया

811
00:56:07,360 --> 00:56:11,400
तो इसी में ही एक आखरी आंसर रह गया दो आंसर तो

812
00:56:11,400 --> 00:56:15,840
ये हो गए पहला कि वह सनातनी नहीं बना रहे और दूसरा

813
00:56:15,840 --> 00:56:20,080
आपको इससे कोई रक्षा नहीं हो रही आपके पास कुछ नहीं हो रहा है कोई रक्षा

814
00:56:20,080 --> 00:56:24,200
नहीं हो रही वो व्यक्ति आपके साथ खड़ा नहीं हो रहा है अरे भैया तुम

815
00:56:24,200 --> 00:56:28,520
मंदिर बचाने जा रहे हो वो भी वही कह रहे मूर्ति तोड़ो मंदिर

816
00:56:28,520 --> 00:56:33,040
बचाने के नाम पर अपनी सत्या प्रकाश दे देंगे धीरे धीरे तुम्हारा वो विग्रह

817
00:56:33,040 --> 00:56:37,120
लुप्त हो जाएगा तुम्हारे साथ उन्होंने मंदिर की रक्षा करने का दिखावा

818
00:56:37,120 --> 00:56:41,160
कर दिया आ समाज यों ने और उसके बाद आप उनके फैन बन गए

819
00:56:41,160 --> 00:56:45,200
वाह तो बहुत अच्छे हैं फैन बनने के बाद उन्होंने आपको दी सत्या प्रकाश उसम लिखा

820
00:56:45,200 --> 00:56:49,240
है कि मूर्ति पूजा धर्म पाप है तो क्या हुआ जिस मंदिर की

821
00:56:49,240 --> 00:56:53,600
रक्षा की उसको लुप्त कराने का इंतजाम उन्होंने ही कर दिया तो

822
00:56:53,600 --> 00:56:57,720
यह रक्षा नहीं हो रही है यह सनातन के नाम सनातना भास फैलाया

823
00:56:57,720 --> 00:57:01,280
जा रहा है आभास है यह सनातन नहीं है तीसरी बात

824
00:57:01,280 --> 00:57:05,920
100 की सीधी एक बात हाथ मु धो के कहां पीछे पड़ गए भैया मर्डर कर दिया

825
00:57:05,920 --> 00:57:10,120
चाकू चला दिया गोली मार दी क्या पीछे पड़ गए अरे

826
00:57:10,120 --> 00:57:14,360
भैया सैद्धांतिक बातें रख रहे हैं कौन सा उनका हमने खंजर मार दिया

827
00:57:14,360 --> 00:57:18,440
गला घोट दिया जाकर के कि फांसी लगा दी या बम बम

828
00:57:18,440 --> 00:57:22,680
मार दिया तो इसका मतलब

829
00:57:22,680 --> 00:57:27,200
य इसका मतलब ये हाथ मुह धोकर पीछे पड़ना नहीं

830
00:57:27,200 --> 00:57:31,240
हाथ र पीछे पढ़ना अलग चीज है जी

831
00:57:31,240 --> 00:57:35,480
इसी में एक प्रश्न आता है कि पूछा गया है कि आप होते कौन है

832
00:57:35,480 --> 00:57:39,480
हिंदू संप्रदाय पर टिप्पणी करने वाले हमारे बीच में करने वाले आपको अधिकार

833
00:57:39,480 --> 00:57:45,440
किसने दिया हिंदू संप्रदायों को सही और गलत बताने का मनुम

834
00:57:45,440 --> 00:57:50,120
मनुम मनुस्मृति कहती है

835
00:57:50,120 --> 00:57:54,320
कि मनुस्मृति कहती है कि मौन रहने से अच्छा

836
00:57:54,320 --> 00:57:58,480
होता है सत्य बोलना ठीक है तो पहली

837
00:57:58,480 --> 00:58:02,560
बात तो मैं सत्य बोल रहा हूं मैं किसी पर टिप्पणी नहीं कर रहा हूं मैं सत्य बोल रहा हूं मैं

838
00:58:02,560 --> 00:58:06,880
मौन नहीं हूं मैं सत्य बोल रहा हूं तो य मैं अपने धर्म का पालन कर रहा हूं दूसरी

839
00:58:06,880 --> 00:58:10,960
बात यदि मुझे अपने धर्म पर आच आती हुई दिख रही है तो मैं उसकी रक्षा के लिए

840
00:58:10,960 --> 00:58:15,240
बोल रहा हूं क्योंकि जो अपने धर्म की रक्षा करता है य भी मनुस्मृति में लिखा है धर्म उसकी रक्षा

841
00:58:15,240 --> 00:58:16,600
करता है और

842
00:58:16,600 --> 00:58:20,600
तीसरी बात यह भी लिखा हुआ है कि

843
00:58:20,600 --> 00:58:24,600
यदि आपको शास्त्र यदि आपको कहीं से आज्ञा ना

844
00:58:24,600 --> 00:58:28,600
भी मिले फिर भी आप सिद्धांतों की रक्षा अगर कर रहे हैं

845
00:58:28,600 --> 00:58:33,200
तो करते रहिए अगर आपको आज्ञा कहीं से प्राप्त नहीं भी हुई है तो भी

846
00:58:33,200 --> 00:58:37,560
अपने धर्म की अपने सिद्धांतों की रक्षा करते रहिए ठीक है

847
00:58:37,560 --> 00:58:41,560
तो हम अपने सिद्धांतों की रक्षा कर रहे हैं और हम सत्य बोल रहे हैं हमने

848
00:58:41,560 --> 00:58:45,640
कोई किसी को गोली थोड़ी मार दी है वही बात है ना

849
00:58:45,640 --> 00:58:49,640
हमने तो अपने सिद्धांतों को यथावत कहा है और जो हमारे सिद्धांतों

850
00:58:49,640 --> 00:58:53,720
का कोई विरोध कर रहा है उसको यथावत हमने उत्तर दिया है

851
00:58:53,720 --> 00:58:58,120
जी सुप्रीम कप जीने से आपको पा डॉलर का

852
00:58:58,120 --> 00:59:02,240
डोनेशन किया और कह रहे हैं कि आर्य समाज एंड कन

853
00:59:02,240 --> 00:59:06,400
मुस्लिम्स के खिलाफ खड़े हैं आप कब खड़े होंगे तब आपकी बात

854
00:59:06,400 --> 00:59:10,480
की वैल्यू होगी तब तक तब तक नहीं मित्र लेकिन आप डर जाते

855
00:59:10,480 --> 00:59:14,560
हो पंडित जी ओके तो यही मेरा अगला प्रश्न था जो

856
00:59:14,560 --> 00:59:18,640
सुप्रीम य सुपरमैन कपटर जी ने पूछ लिया है कि आप किसी अन्य पंथ

857
00:59:18,640 --> 00:59:22,800
वालों से क्यों नहीं भते ठीक है क्यों नहीं हमा हमारे

858
00:59:22,800 --> 00:59:27,160
चैनल पर

859
00:59:27,160 --> 00:59:31,200
जो जो सो कॉल्ड मतलब हिंदू धर्म को फैला रहे हैं

860
00:59:31,200 --> 00:59:35,200
उनके पीछे पड़े हुए हैं आप दूसरे पंथ वालों को पीछे नहीं पड़े हु ऐसा नहीं

861
00:59:35,200 --> 00:59:39,560
है यह कहना गलत होगा अगर हम हिंदू राष्ट्र गोष्ठी कर रहे हैं धरातल

862
00:59:39,560 --> 00:59:43,680
पर हिंदू राष्ट्र गोष्ठी अब तक करीब हिंदू राष्ट्र

863
00:59:43,680 --> 00:59:48,080
गो के बारे में बताइए क्या है यह मतलब क्या करते ू राष्ट्र गोष्ठी का मतलब

864
00:59:48,080 --> 00:59:52,160
है हिंदू जो सनातन सिद्धांतों के

865
00:59:52,160 --> 00:59:56,480
सिद्धांतों पर आधारित राष्ट्र का निर्माण है ना एक तर

866
00:59:56,480 --> 01:00:00,600
जहां पर हमारे जो आदर्शों की जहा रक्षा हो सके और इसको

867
01:00:00,600 --> 01:00:05,080
अगर एक उसमें कहा जाए एक क्रमबद्ध

868
01:00:05,080 --> 01:00:07,000
वाक्य में तो सुशिक्षित

869
01:00:07,000 --> 01:00:09,200
सुसंस्कृत

870
01:00:09,200 --> 01:00:13,400
सुरक्षित स्वस्थ संपन्न सेवा परायण व्यक्ति और समाज

871
01:00:13,400 --> 01:00:17,160
की संरचना और वो भी अन्यों के हित का ध्यान रखते हुए

872
01:00:17,160 --> 01:00:21,240
मगर जब हम हिंदू राष्ट्र की बात कर रहे तो अपने आप में ही क्या क्रिश्चन का विरोध नहीं

873
01:00:21,240 --> 01:00:25,520
है क्या यह मुस्लिम का विरोध नहीं है क्या यह बौद्धों का विरोध

874
01:00:25,520 --> 01:00:29,840
नहीं है तो ये आप कैसे कह सकते कि हमने उनका विरोध नहीं किया है भाई हमारा

875
01:00:29,840 --> 01:00:34,000
हिंदू राष्ट्र कहना ही उनका विरोध हो गया ना कि हम हिंदू राष्ट्र के पीछे पड़े हैं तुम

876
01:00:34,000 --> 01:00:38,680
इसकन से कलवा हिंदू राष्ट्र कहां कह रहा है इसकन

877
01:00:38,680 --> 01:00:42,880
कलवा पता चल जाएगा अभी वो तो कह रहा है ईश्वर अल्लाह

878
01:00:42,880 --> 01:00:47,080
एक है कुरान भी वो उसका व कुरान और उसमें सामंजस्य

879
01:00:47,080 --> 01:00:51,080
दिखाई दे रहा है उसको वेदों में वो तो यह कह रहा है और दूसरी बात आपने पिछले

880
01:00:51,080 --> 01:00:55,400
प्रश्न में एक बात कही थी कि आप होते कौन है हिंदू संप्रदाय पर उंगली उठाने वाले तो नहीं

881
01:00:55,400 --> 01:00:59,680
मैंने ू संप्रदाय सनातन संप्रदाय पर उंगली नहीं उठाई है मैंने सनातना

882
01:00:59,680 --> 01:01:04,560
भाषी तंत्रों पर उंगली उठाई है संप्रदाय हमारे जो जितने भी प्रामाणिक संप्रदाय

883
01:01:04,560 --> 01:01:08,560
सबका हमने सम्मान किया हमने किसी को भी ऐसा नहीं किया कि किसी का तिरस्कार किया

884
01:01:08,560 --> 01:01:12,800
हो और हमने उंगली उठाई है जो सनातन

885
01:01:12,800 --> 01:01:16,800
का चोला ड़ कर के सनातना भासी जो संस्थाए आ गई

886
01:01:16,800 --> 01:01:21,040
है जो एक पैरेलल अपना वो तैयार कर रही जाकर देखिए मायापुर

887
01:01:21,040 --> 01:01:25,200
का जो बहुत बड़ा टेंपल बन रहा है कौन से एंगल से आपको टेंपल लग रहा

888
01:01:25,200 --> 01:01:29,280
है अपने मंदिरों में आपने कम नीला कलर देख लिया

889
01:01:29,280 --> 01:01:32,160
बताइए कौन से अपने आपने अपने मंदिरों में

890
01:01:32,160 --> 01:01:36,320
नीला कलर देखा है वो आपको टेंपल कहां से लग रहा है

891
01:01:36,320 --> 01:01:40,440
भगवान को कपड़े तो पहनाए जाते हैं शायद नीरे नहीं विग्रह

892
01:01:40,440 --> 01:01:44,440
पे विग्रह में भगवान को कपड़े नहीं पहनाए जाते हमारे यहां ज्यादातर नीले कलर को छोड़ा

893
01:01:44,440 --> 01:01:48,760
गया इसके बारे में जो वर्बल मुझे ध्यान नहीं है स्मरण में

894
01:01:48,760 --> 01:01:52,840
हमारे यहां ज्यादातर नीला कलर जो है छोड़ के चला गया हमारे मंदिरों पर कम से

895
01:01:52,840 --> 01:01:57,040
कम मंदिर काला मंदिर हमारे हा कभी भी हमारे

896
01:01:57,040 --> 01:02:01,200
नीले कलर के मंदिर नहीं बने वहां देख के आइए आप जा के वो चर्च मंदिर

897
01:02:01,200 --> 01:02:05,400
तो नहीं बनना चाहिए लगता है लगता है मतलब ये

898
01:02:05,400 --> 01:02:09,520
एक ग्रंथ है बहुत ही अच्छा वास्तु रत्नाकर नाम का ग्रंथ है उसके अंदर निषेध किया

899
01:02:09,520 --> 01:02:13,560
गया है वास्तु में नीले रंग को

900
01:02:13,560 --> 01:02:17,680
बाहर अरे मैं अभी प्रवचन चल रहा था गुरुदेव

901
01:02:17,680 --> 01:02:22,000
का वहां पर कोई व्यक्ति नीले कलर के कपड़े पहन करके आया था तो गुरुदेव

902
01:02:22,000 --> 01:02:26,600
ने तुरंत उसको टोक दिया था है ना तो नीला कलर हमारे

903
01:02:26,600 --> 01:02:30,800
यहां मेरे ख्याल से जहां तक अभी मैंने बकुल सही है नीला

904
01:02:30,800 --> 01:02:36,480
नीला यजली नेटी अट्रैक्ट करता हैय साइंटिफिक प से बता रहा हूं इस वजह से

905
01:02:36,480 --> 01:02:40,640
इसको फिर आप कह रहे हो कि हिंदुत्व की रक्षा हो रही है वहा

906
01:02:40,640 --> 01:02:44,720
वो शांता बना रहे हमारे राम को हमारे कृष्ण को शांता बना रहे हैं आप कह

907
01:02:44,720 --> 01:02:47,240
रहे हो हिंदुत्व की रक्षा हो रही है क्राइस्ट को ऊपर रख

908
01:02:47,240 --> 01:02:51,360
कर के नीचे काली दुर्गा देवी इन सबको रख रहे शिवजी को नीचे रख रहे क्राइस्ट को ऊपर

909
01:02:51,360 --> 01:02:56,080
रख रहे आप क हमारी वो हो रही है और आर

910
01:02:56,080 --> 01:03:00,160
तो खुद ही कह रहा है वो आचार्य श्री आए थे इनके आ समाज आर समाज वालों के वो

911
01:03:00,160 --> 01:03:04,160
कह रहे ऋषियों जो ऋषि गण जो लिख के गए हम समय समय पर अपना वो छोड़

912
01:03:04,160 --> 01:03:09,920
देते हैं बदल देते हैं ये शाश्वत धर्म है क्या जो शाश्वत नहीं वो सनातन

913
01:03:09,920 --> 01:03:14,080
नहीं तो आपने जब यह प्रश्न मैंने आपसे किया था तो आपने मनुस्मृति

914
01:03:14,080 --> 01:03:18,120
का संदर्भ दिया था आपने प्रमाण मनुस्मृति से दिया था कि मौन रहने से

915
01:03:18,120 --> 01:03:22,680
अच्छा है कि प्रश्न करना है ना ऐसे ही कुछ कहा था जी

916
01:03:22,680 --> 01:03:26,280
इसी प ही द्वेष

917
01:03:26,280 --> 01:03:30,600
रखते हुए आपसे प्रश्न किया गया है कि आप मनुवादी है

918
01:03:30,600 --> 01:03:35,040
ठीक है आप मिसज निस्ट है मिनिस्ट

919
01:03:35,040 --> 01:03:39,080
यानी कि नारी द्वेष है आप औरतों को हीन भाव से देखते हैं ऐसा लगता

920
01:03:39,080 --> 01:03:43,560
है क्योंकि आप बोलते हैं कि जैसे एकन

921
01:03:43,560 --> 01:03:47,680
का वो हुआ था उसमें डिस्कशन तो आपने सु था कि आप

922
01:03:47,680 --> 01:03:51,720
अपने औरतों का उपनयन करवाते हो क्या अपने य तो इसका मतलब आप भी

923
01:03:51,720 --> 01:03:55,760
इस बात से सहमत है कि औरतो को अप नहीं करवाते य सब करके तो कुल मिलाकर मतलब

924
01:03:55,760 --> 01:03:59,880
मलू वादी है आप नारी द्वेष है आप सौज निस्ट है

925
01:03:59,880 --> 01:04:03,960
एक चीज मैं यहां पर क्लियर कर दूं पहले इस प्रश्न को लेने से पहले नारी वाला थोड़ा सा मुझे

926
01:04:03,960 --> 01:04:08,000
दोबारा याद दिला दीजिएगा कि जैसे ये लोग ये कह

927
01:04:08,000 --> 01:04:12,200
रहे हैं कि भाई जैसे प्रश्न कर्ता ने ये कहा है कि

928
01:04:12,200 --> 01:04:17,480
आप जो है संप्रदायों का विरोध क्यों करते हैं तो

929
01:04:17,480 --> 01:04:21,640
जैसे आचार्य प्रशांत है वो भी यही कह रहा है कि मैं भैया हिंदू बना रहा हूं लोगों

930
01:04:21,640 --> 01:04:25,760
को और ये आर समाजी भी यही कह रहे हैं कि मैं सनातनी बना रहा हूं वो

931
01:04:25,760 --> 01:04:30,280
कहते हिंदू बना रहा हूं अगर फिर उनसे पूछो तो कहते हिंदू शब्द काफिर चोर है वो बात अलग है

932
01:04:30,280 --> 01:04:34,360
फिर उसके

933
01:04:34,360 --> 01:04:39,000
बाद उसके बाद क्या है कि

934
01:04:39,000 --> 01:04:43,080
इकन वाले भी यही बोलते कि हम हिंदू बना रहे हैं तो जब ये सब ये बोल रहे हैं कि हम

935
01:04:43,080 --> 01:04:47,920
हिंदू बना रहे हैं यह सब एक दूसरे का विरोध क्यों कर रहे हैं आर्य

936
01:04:47,920 --> 01:04:51,960
समाज ने स्कोन का भी विरोध किया आचार्य प्रशांत का भी विरोध किया आचार्य प्रशांत ने

937
01:04:51,960 --> 01:04:56,000
इकोन का भी विरोध किया समाज का भी विरोध किया इकोन ने आचार्य प्रशांत का विरोध

938
01:04:56,000 --> 01:05:00,320
किया और समाज का भी विरोध किया तो अगर हिंदू बना रहा इनके द्वारा

939
01:05:00,320 --> 01:05:04,480
यह कहा जाना सत्य है कि ये हिंदू बना रहे हैं तो फिर ये दोनों ये

940
01:05:04,480 --> 01:05:09,280
आपस में एक दूसरे का विरोध क्यों कर रहे हैं इसका मतलब यह हुआ

941
01:05:09,280 --> 01:05:13,320
कि केवल यह कह देने से कि हम हिंदू बना रहे हैं उससे ये नहीं सिद्ध

942
01:05:13,320 --> 01:05:17,360
होता है कि हम हिंदू बना रहे हैं आपको ये मानना पड़ेगा दूसरी बात एक

943
01:05:17,360 --> 01:05:21,440
चीज और है जैसे अभी कलर की बात चल रही थी तो कई प्रकार

944
01:05:21,440 --> 01:05:26,160
के नीले कलर होते हैं ऐसा नहीं है कि सभी नीले कलरों का निषेध है

945
01:05:26,160 --> 01:05:30,480
और पहनने में तो उतना निषेध है भी नहीं मगर जो मंदिर की गुम्मत

946
01:05:30,480 --> 01:05:34,560
इत्यादि है उसमें अमुक अमुक जो नीले शेड्स होते हैं उनका निषेध

947
01:05:34,560 --> 01:05:38,640
है ऐसा नहीं है कि पूरी तरीके से नीला कलर मतलब वही कर दिया गया

948
01:05:38,640 --> 01:05:42,920
है जी जी उसके शेड्स है वो जो शेड है वो

949
01:05:42,920 --> 01:05:47,280
स्वीकार नहीं है और कहीं पर स्वीकार है भी मगर कहीं पर नहीं भी है

950
01:05:47,280 --> 01:05:49,800
ठीक है जैसे अब आप आप देखो

951
01:05:49,800 --> 01:05:53,960
हमारी गुंबद लाल भी नहीं होती है बिल्कुल जो टमाटर वाला लाल है

952
01:05:53,960 --> 01:05:58,440
वो भी नहीं होती है मगर वहीं पर माता दुर्गा की साड़ी रेड होती है

953
01:05:58,440 --> 01:06:02,560
है ना तो उसका कहां पर किस कौन सा यूज होना

954
01:06:02,560 --> 01:06:06,640
है वो अलग है तो हमने अपने मंदिरों का शिखर कभी भी नीला नहीं देखा है हिंदू मंदिरों

955
01:06:06,640 --> 01:06:10,720
का हां हमने वो जरूर देखे हैं चर्च जरूर

956
01:06:10,720 --> 01:06:14,840
देखे हैं ऐसे मस्जिदें जरूर देखी इस तरह की जैसे वो बना

957
01:06:14,840 --> 01:06:19,000
है ठीक है अच्छा दूसरी बात आपने वो नारी

958
01:06:19,000 --> 01:06:23,360
वाला पूछा है हां हां आप नारी देष

959
01:06:23,360 --> 01:06:27,560
है अब ये क्या कह रहे हैं सुपरमैन क्रिप्टो नाइट

960
01:06:27,560 --> 01:06:31,600
सारे पंथ गलत बस आप इसको

961
01:06:31,600 --> 01:06:35,760
ऐसे कहना देखिए इसको ऐसे कहना गलत है कि सारे पंथ गलत है बस आप स

962
01:06:35,760 --> 01:06:39,800
कक्ष कर रहे कटाक्ष कर रहे हैं ये ये आपके ऊपर कटाक्ष कर रहे हैं

963
01:06:39,800 --> 01:06:44,360
ठीक है मैं मैं उसको सही कर रहा हूं मैं उसको सही कर रहा हूं देखिए ऐसा है

964
01:06:44,360 --> 01:06:48,720
कि जैसे कोई यह कहे कि भगवान ने सारे

965
01:06:48,720 --> 01:06:53,120
जन्म भारत में ही क्यों लिए भगवान ने

966
01:06:53,120 --> 01:06:57,120
सारे जन्म भारत में ही क्यों लिए तो इसको यह जो तरीका

967
01:06:57,120 --> 01:07:01,240
है ना कहने का यही गलत है भगवान ने सारे जन्म भारत में नहीं

968
01:07:01,240 --> 01:07:05,200
लिए भगवान ने सारे जन्म जहां लिए है वो भारत

969
01:07:05,200 --> 01:07:09,360
है ठीक है ऐसे कहिए इसी तरीके से एक वो

970
01:07:09,360 --> 01:07:13,360
आया था कि क्या ग्रेविटेशनल फोर्स के बिना ईश्वर सृष्टि

971
01:07:13,360 --> 01:07:17,520
का संचालन कर सकते हैं तो ग्रेविटेशनल फोर्स से सृष्टि

972
01:07:17,520 --> 01:07:21,640
का संचालन नहीं होता है जिस फोर्स से सृष्टि का संचालन होता है उसे

973
01:07:21,640 --> 01:07:25,840
आप लोग ग्रेविटेशनल फोर्स कह रहे हैं अब ठीक है

974
01:07:25,840 --> 01:07:29,840
आप आप यह कहे ग्रेविटेशनल फोर्स को छोड़ दो तो ईश्वर जिस भी तरीके

975
01:07:29,840 --> 01:07:33,840
से धरती को चलाएगा या वो वाली क्रिया जो ग्रेविटेशनल से संबंधित है

976
01:07:33,840 --> 01:07:38,400
वो जब होंगी तो य तो ग्रेविटी है आपने मान रखा है ना वो ग्रेविटी

977
01:07:38,400 --> 01:07:42,560
है तो ये आपकी इंफॉर्मेशन है तो इसी प्रकार से जो

978
01:07:42,560 --> 01:07:46,640
यह वाली बात है कि जो अभी प्रश्न आया था कि

979
01:07:46,640 --> 01:07:50,880
एक आप ही सही हो भाई मैं नहीं कह रहा हूं मैं ही सही हूं मैं हर उसके

980
01:07:50,880 --> 01:07:55,080
साथ हूं हर उस मत पंत संप्रदाय संस्था

981
01:07:55,080 --> 01:07:59,080
उस के भी साथ में हूं जो मुझे तीन चीजें दे देगी वो तीन

982
01:07:59,080 --> 01:08:03,480
चीजें क्या है सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत

983
01:08:03,480 --> 01:08:07,600
धर्म जो जो दे रहा है मैं उसके साथ हूं चलो कहां आर समाज के नारे लगाने हैं झंडा

984
01:08:07,600 --> 01:08:11,720
उठाना है चलो भैया सर्वशक्तिमान ईश्वर दे दो मैं नहीं खिलाफ

985
01:08:11,720 --> 01:08:15,840
हूं आर समाज के तो मैं मैं ये नहीं कह रहा हूं मेरा ही पंथ सही

986
01:08:15,840 --> 01:08:20,200
है मैं ये नहीं कह रहा हूं मैं ये कह रहा हूं कि मैं किसके साथ खड़ा हूं सर्वशक्तिमान

987
01:08:20,200 --> 01:08:20,700
ईश्वर

988
01:08:20,600 --> 01:08:24,800
परम स्वतंत्र मक्ष शाश्वत धर्म जो जो देता जाएगा वो वो मैं मैं

989
01:08:24,800 --> 01:08:29,240
मैं उसके साथ हमारी टीम उसके साथ खड़ी होती जाएगी अच्छा लॉजिक

990
01:08:29,240 --> 01:08:33,360
य है कि जो जो य देता जाएगा वो खुद परंपरा प्राप्त सिद्धांतों को

991
01:08:33,360 --> 01:08:37,440
स्वीकार करने वाला बनता जाएगा यह एक अलग बाय प्रोडक्ट है

992
01:08:37,440 --> 01:08:41,480
मगर हम इसको ऐसे ना कहे अगर ऐसे कह दे कि आर समाज अगर ईश्वर को

993
01:08:41,480 --> 01:08:45,600
सर्वशक्तिमान कहने लगे कहने मतलब उसकी परिभाषा से सिद्ध हो

994
01:08:45,600 --> 01:08:49,640
है ना कहते तो सभी है और उसका जो य धर्म

995
01:08:49,640 --> 01:08:53,960
को बदलना है कि हम वो जो होता है क्या कहते

996
01:08:53,960 --> 01:08:58,080
हैं क्या कहते देश काल परिस्थिति के अनुसार ऋषि गण जो लिख गए

997
01:08:58,080 --> 01:09:02,240
हैं हम उसको बदल देते हैं तो उसका ऐसा कहना बंद हो जाए और जो

998
01:09:02,240 --> 01:09:06,760
मोक्ष का व परांत काल बनाया हुआ है उसको बदल दो बात खत्म हो गई

999
01:09:06,760 --> 01:09:10,960
बात खत्म हो गई हम और वो एक तो हम सही के साथ है भाई जो

1000
01:09:10,960 --> 01:09:15,000
जो सही है हम उसके साथ है हम ही सही नहीं है हम सही के साथ है यह

1001
01:09:15,000 --> 01:09:19,800
कहना ज्यादा उचित होगा है ना जी

1002
01:09:19,800 --> 01:09:24,360
जीने क्लास्ट लाइन क क्योंकि सबसे ज्यादा पाखंडी भारत में ही हुए हैं इसलिए भगवान

1003
01:09:24,360 --> 01:09:28,400
को यही आना पड़ा ऐसा कोई जरूरी नहीं है ये तर्क भी

1004
01:09:28,400 --> 01:09:32,440
ठीक नहीं है और आपने मुझे नहीं लगता कि आपने ऐसा कौन सा स्टेटस्ट कल एनालिसिस

1005
01:09:32,440 --> 01:09:35,640
कर लिया यहां पर कि आपने सब हर प्रांत में जाके

1006
01:09:35,640 --> 01:09:39,720
पता कर लिया कि कितने पाखंडी हुए हैं उस विश्व भर में तो यह तर्क थोड़ा बेसलेस

1007
01:09:39,720 --> 01:09:43,960
है भगवान ने धरती का एक केंद्र बनाया जहां से मैं अपना

1008
01:09:43,960 --> 01:09:48,000
जो धर्म का धर्म होगा वो स्फुट होगा पूरे संसार में

1009
01:09:48,000 --> 01:09:52,200
जब उसको केंद्र बनाया उसी को भारत कहा गया ऐसे समझिए अब

1010
01:09:52,200 --> 01:09:56,360
ये तो आप क्वेश्चन ये भी कर सकते हो मान लो भगवान ने भारत को नहीं बनाया होता किसी और जगह

1011
01:09:56,360 --> 01:10:00,440
को बनाया होता भगवान ने कुछ भौगोलिक चीजें की कि भा ये धरती

1012
01:10:00,440 --> 01:10:04,720
मुझे पसंद आ रही है इसी को मैं केंद्र बनाऊंगा ठीक है अब यही केंद्र उन्होने

1013
01:10:04,720 --> 01:10:08,880
कहीं और बताया होता तो इसको आप वहां भी क्वेश्चन पुट अप कर सकते कि यही क्यों हुआ यही

1014
01:10:08,880 --> 01:10:13,680
केंद्र क्यों बना अब जैसे कि ईश्वर के लिए हम लोग

1015
01:10:13,680 --> 01:10:17,840
एक क्या कहते जेंडर वाचक शब्द बोलते हैं लिंग वाचक शब्द

1016
01:10:17,840 --> 01:10:22,520
कि ईश्वर ऐसा करता है ठीक है तो दो ही जेंडर है

1017
01:10:22,520 --> 01:10:26,600
बोलने के लिए क्योंकि ईश्वर तो अव्यावहारिक है तो व्यवहार में लाने

1018
01:10:26,600 --> 01:10:30,720
के लिए हमको उसको लिंग वाचक रूप में बोलना पड़ रहा है अब हम अगर स्त्री

1019
01:10:30,720 --> 01:10:34,800
उसम बोलेंगे तो आप कह सकते हो कि स्त्री में क्यों बोल रहे हो पुरुष में क्यों नहीं बोल

1020
01:10:34,800 --> 01:10:38,960
रहे हो जब पुरुष पुरुषवाचक में बोलेंगे तो आप क पुरुषवाचक में क्यों बोल रहे हो स्त्री

1021
01:10:38,960 --> 01:10:43,040
वाचक में क्यों नहीं बोल रहे हो तो यह क्वेश्चन तो हमेशा हो सकता है निरर्थक

1022
01:10:43,040 --> 01:10:46,120
क्वेश्चन

1023
01:10:46,120 --> 01:10:48,920
है

1024
01:10:48,920 --> 01:10:53,440
तो ठीक है यह क्वेश्चन आर समाजी से भी बनता है

1025
01:10:53,440 --> 01:10:57,520
कि जब उनका ईश्वर अवतार नहीं ले सता है और उसका कोई जेंडर

1026
01:10:57,520 --> 01:11:01,640
नहीं है जेंडर नहीं है उसका कोई तो वो उसको करता है करता

1027
01:11:01,640 --> 01:11:05,640
है क्यों बोल रहा है करती करती है क्यों नहीं बोल रहा है

1028
01:11:05,640 --> 01:11:09,720
ईश्वर तो यहां फसगे र समा अवतार तो लेता नहीं

1029
01:11:09,720 --> 01:11:13,920
है उनका ईश्वर तो व्यवहारिक यहां पर व्यवहार की बात आएगी कि वो नहीं है

1030
01:11:13,920 --> 01:11:18,040
मगर व्यवहार में हमने माना कि वह करता है या करती है है

1031
01:11:18,040 --> 01:11:22,280
ना व्यवहारिक व्यवहारिक नहीं था वो ईश्वर मगर व्यवहार एक व्यवहार में हमने उसको

1032
01:11:22,280 --> 01:11:26,320
माना है ना एक व्यवहार में उसको उसके बोलने के लिए हमने एक

1033
01:11:26,320 --> 01:11:30,360
शब्द का उपयोग किया व ऐसा करता है इसी प्रकार से जैसे हमने शब्द का

1034
01:11:30,360 --> 01:11:35,720
उपयोग किया ऐसे ही उसका अवतार होता है

1035
01:11:35,720 --> 01:11:39,840
जी ठीक है एकला

1036
01:11:39,840 --> 01:11:44,320
प्रश्न मैं लेता हूं हा

1037
01:11:44,320 --> 01:11:49,280
की अब कुछ प्रश्न आते हैं मेरे पास हा क्या क्या ईश्वर

1038
01:11:49,280 --> 01:11:54,160
लॉजिकल कार्य कर सकता है जैसे दो और दो को पांच कर सकता है

1039
01:11:54,160 --> 01:11:58,160
वंद स्त्री को तान बंद स्त्री से

1040
01:11:58,160 --> 01:12:02,360
संतान को जन्म दे सकता है शाति शुधा व्यक्ति को कुवारा बना सकता है

1041
01:12:02,360 --> 01:12:08,360
यह प्रश्न क्या ऐसा ईश्वर कर सकता है

1042
01:12:09,040 --> 01:12:13,360
आपता हा मैं बोल रहा सबसे पहली बात तो यह

1043
01:12:13,360 --> 01:12:17,880
है कि इसका इस क्वेश्चन का आंसर मैंने वैसे कल भी दिया है

1044
01:12:17,880 --> 01:12:22,000
अरे क्षमा करिएगा क्षमा करिएगा य मिनी आपने अपना

1045
01:12:22,000 --> 01:12:27,640
पॉइंट नहीं दिया कि आप नारी द्रोही आपको कता

1046
01:12:27,640 --> 01:12:31,640
हा तो सबसे पहले हमें ये चेक करना पड़ेगा कि नारी द्रोही

1047
01:12:31,640 --> 01:12:35,920
कहते किसे हैं नारी द्रोही कहते किसे

1048
01:12:35,920 --> 01:12:39,960
हैं यदि को मना कर रहे हैं ना आप उप मना कर रहे

1049
01:12:39,960 --> 01:12:44,000
हैं आप बोल रहे हैं कि उने नहीं हुआ तो वेद मंत्र नहीं पढ़ेंगे सब करेंगे तो

1050
01:12:44,000 --> 01:12:48,160
जब संस जब हमने जब ईश्वर ने हम में कोई अंतर नहीं रखा तो आप कौन होते हैं अंतर

1051
01:12:48,160 --> 01:12:52,400
रखने वाले ईश्वर ने हम में अंतर नहीं रखा तो आप कौन होते अंतर

1052
01:12:52,400 --> 01:12:57,040
करने वाले पहली बात तो ईश्वर ने हम में अंतर रखा है ऐसा नहीं है

1053
01:12:57,040 --> 01:13:02,600
दूसरी बात दूसरी बात यह है कि

1054
01:13:02,600 --> 01:13:06,720
अगर मेरा जो अगर उनका जो है उपनयन नहीं होता

1055
01:13:06,720 --> 01:13:11,480
तो इसलिए मैं स्त्री द्रोही सिद्ध होता हूं तो

1056
01:13:11,480 --> 01:13:15,480
क्या मैं मांग नहीं भरता हूं इससे वह स्त्रिया जो मुझे कह रही है कि तुम

1057
01:13:15,480 --> 01:13:19,520
मांग मत भरा करो तुम्ह मांग नहीं भरनी चाहिए वह क्या पुरुष द्रोही साबित

1058
01:13:19,520 --> 01:13:23,760
होंगी क्या मेरा जो वो होता गोद भराई नहीं होती है

1059
01:13:23,760 --> 01:13:24,720
है ना

1060
01:13:24,720 --> 01:13:28,840
एक लड़के की वक्षा होती है गोद भराई नहीं होती है गोत भराई एक मातृ

1061
01:13:28,840 --> 01:13:33,160
शक्ति की होती है तो मात्र तो एक लड़के की गोद भराई नहीं होती

1062
01:13:33,160 --> 01:13:37,200
है और उसको जो य स्त्रियां बता रही है बेटा लड़के की गोद बराई नहीं होती लड़के की परीक्षा

1063
01:13:37,200 --> 01:13:41,200
होती है तो उसको जो य बता रही है जो स्त्रियां वह सब क्या पुरुष

1064
01:13:41,200 --> 01:13:45,320
द्रोही है ठीक है तो यह आप मुझे

1065
01:13:45,320 --> 01:13:50,040
पहले सिद्ध करिए कि स्त्री द्रोही होना होता क्या है और

1066
01:13:50,040 --> 01:13:54,480
इन सबके कारण है बहुत सारे कि उपनयन किसका होना चाहिए किसका नहीं होना चाहिए

1067
01:13:54,480 --> 01:13:58,600
किसकी मुक्ति का पथ किस शरीर की किस शरीर में

1068
01:13:58,600 --> 01:14:03,040
विद्यमान जीवात्मा किस शरीर में जीवात्मा किस

1069
01:14:03,040 --> 01:14:07,160
शरीर में विद्यमान जीवात्मा की मुक्ति का पथ क्या है यह अलग अलग

1070
01:14:07,160 --> 01:14:11,280
पथ है कोई भी मंजिल से वंचित नहीं किया गया है भगवान

1071
01:14:11,280 --> 01:14:15,520
ने न 32 में कहा मेरी शरण में वो लोग भी आक के मुक्त हो जाते हैं

1072
01:14:15,520 --> 01:14:20,040
स्त्री इत्यादि भी होते हैं तो उनका पथ अलग है

1073
01:14:20,040 --> 01:14:24,040
कह रहे कि व्यवहारिक रूप से अंतर है लेकिन फल चौरे नहीं

1074
01:14:24,040 --> 01:14:28,240
है नहीं हां व्यवहारिक रूप से अंतर है शारीरिक

1075
01:14:28,240 --> 01:14:32,320
भेद होने के कारण आपके रास्ते अलग किए गए हैं मगर उस रास्ते

1076
01:14:32,320 --> 01:14:36,360
से मिलने वाला जो फल है उससे आपको वंचित नहीं किया गया है अब

1077
01:14:36,360 --> 01:14:39,760
य आप कहते चाहे वो कोई

1078
01:14:39,760 --> 01:14:43,920
भी हो कोई भी हो चाहे शूद्र हो चाहे अंत क्यों ना हो चाहे चांडाल

1079
01:14:43,920 --> 01:14:47,920
योनि में कुल में उत्पन्न होने वाला क्यों हो ऐसा नहीं

1080
01:14:47,920 --> 01:14:51,960
है कि वो मुक्त नहीं हो सकता है तो हा

1081
01:14:51,960 --> 01:14:57,960
तो अब यहां पर क्या है

1082
01:14:58,000 --> 01:15:02,040
कि जो समाज की जो व्यवस्था है ना वो भेद से

1083
01:15:02,040 --> 01:15:06,040
ही है अगर भेद नहीं है तो समाज है कहां इस दुनिया

1084
01:15:06,040 --> 01:15:10,200
में इस संसार का अस्तित्व तभी तक है जब तक भेद है तो आप भेद को नकार

1085
01:15:10,200 --> 01:15:14,200
नहीं सकते बस ये है कि जिसका जैसा शरीर है उसके अनुसार उसकी

1086
01:15:14,200 --> 01:15:18,280
मुक्ति का रास्ता दिया गया है तो हम अच्छा अगर कोई ये कहे

1087
01:15:18,280 --> 01:15:22,320
कि नहीं नहीं मेरे को मुक्ति से कोई मतलब नहीं है

1088
01:15:22,320 --> 01:15:26,320
मुझे तो इन रास्तों से मतलब है कि मुझे जो वो जो वो जिस रास्ते

1089
01:15:26,320 --> 01:15:30,320
पर चल रहा है उस पर मुझे चलना है कोई अगर ये कहे मुझे मुक्ति से मतलब नहीं मुझे तो

1090
01:15:30,320 --> 01:15:35,360
उस रास्ते पर चलना तो उसका क्या किया

1091
01:15:35,360 --> 01:15:39,640
जाएगा इस प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं अभी आपको य यही है यही है इसका उत्तर

1092
01:15:39,640 --> 01:15:43,800
जी बताइए तो उसका क्या किया जाएगा कि मुझे तो भाई मुझे मुक्ति

1093
01:15:43,800 --> 01:15:47,840
युक्ति से मतलब नहीं है मुझे तो जो है इस रास्ते पर चलना

1094
01:15:47,840 --> 01:15:51,920
है तो जब आपने यह कह दिया कि मुझे मुक्ति से मतलब नहीं है तो यहां पर आपने शास्त्रों का

1095
01:15:51,920 --> 01:15:55,920
खंडन कर दिया क्योंकि शास्त्र कह रहे आपका मतलब मुक्ति से

1096
01:15:55,920 --> 01:15:59,920
ही है धर्म का परवन मुक्ति में ही है तो जब आपने ये कह

1097
01:15:59,920 --> 01:16:03,960
दिया मुझे मुक्ति से मतलब नहीं है मुझे तो ब्राह्मण का जीवन जीना मुझे तो जिने कराना है मेरे को तो

1098
01:16:03,960 --> 01:16:08,240
इससे मतलब है यह कहीं भी म जीव की चाह का वास्तविक विषय नहीं लिखा

1099
01:16:08,240 --> 01:16:12,680
है धर्म का परवन नहीं है इसमें ये तो साधन मात्र है अलग-अलग तरीके के

1100
01:16:12,680 --> 01:16:16,680
है ना तो धर्म का परवन किसम है मुक्ति में और आप कह रहे हो कि मुक्ति

1101
01:16:16,680 --> 01:16:20,760
से हमें कोई मतलब नहीं हमें तो इस रास्ते से मतलब है तो आपने धर्म का खंडन कर दिया उस

1102
01:16:20,760 --> 01:16:25,040
तो उस समय भी जब आपने धर्म का खंडन कर दिया तब भी आपका उन

1103
01:16:25,040 --> 01:16:29,120
उस धर्म के द्वारा बताए जाने वाले जो विधि विधान है उनका आलंबन लेने

1104
01:16:29,120 --> 01:16:33,160
का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता जब आप वेद को नहीं मान रहे जब आप शास्त्र को

1105
01:16:33,160 --> 01:16:37,800
नहीं मान रहे तो फिर आप उन शास्त्रों से मिलने वाला जने क्यों चाहिए आपको

1106
01:16:37,800 --> 01:16:43,400
दोनों ही तरीके से आपको जने की आवश्यकता नहीं है

1107
01:16:43,400 --> 01:16:47,400
जी करके और नहीं तो फिर उन स्त्रियों को भी कह दो भैया

1108
01:16:47,400 --> 01:16:51,400
वो स्त्री द्रोही है जो ये बताती है अपने बेटों को कि तुम मांग नहीं भरोगे

1109
01:16:51,400 --> 01:16:55,520
तुम कुंडल नहीं पहनो ग है ना तुम जो है वो

1110
01:16:55,520 --> 01:16:59,600
स्त्रियों स्त्री वाले कोई भी कोई भी ऐसा कार्य जिसने एक स्त्री ने अगर पुरुष

1111
01:16:59,600 --> 01:17:04,360
को बता दिया किय तुम्हारे लिए नहीं है बस व पुरुष द्रोही हो गई

1112
01:17:04,360 --> 01:17:08,400
है ना और वो कौन होती है हमको बताने वाली कि हम मांग भरेंगे कि नहीं मरेंगे

1113
01:17:08,400 --> 01:17:13,000
यही तो दुनिया चाहती है पागल हो जाए सब के

1114
01:17:13,000 --> 01:17:17,240
सब तो इसी पर एक प्रश्न है किक आपने स्त्री

1115
01:17:17,240 --> 01:17:21,440
और वर्ण का एग्जांपल ले लिया यहां पर तो अवती बैटन मैन

1116
01:17:21,440 --> 01:17:26,280
नाम के व्यक्ति है हमारे डिस्ड चैनल पर तो उन्होंने एक प्रश्न किया था की

1117
01:17:26,280 --> 01:17:30,280
एक्चुअली उनका कोई डिस्कशन चल रहा था मैं आपको तो किसी

1118
01:17:30,280 --> 01:17:34,920
एक अवती से ही डिस्ड पर उनकी डिबेट चल रही थी तो उन्होंने वण व्यवस्था पर

1119
01:17:34,920 --> 01:17:39,520
जब उन्होंने यह बोला कि वण व्यवस्था पर उसे जब मैंने मनुस्मृति

1120
01:17:39,520 --> 01:17:43,640
का प्रमाण दिया कि ब्राह्मण का उपनयन आठ से 12 वर्ष की आयु

1121
01:17:43,640 --> 01:17:47,880
में हो जाता है हो जाना चाहिए तो यहां ब्राह्मण कैसे डिसाइड हुआ जबकि

1122
01:17:47,880 --> 01:17:51,880
उपनयन तो हुआ ही नहीं तो उसने यह तर्क दिया

1123
01:17:51,880 --> 01:17:56,080
कित कुतर्क दिया कि वह जन्म वर्ण से नहीं बल्कि

1124
01:17:56,080 --> 01:17:58,440
गुरु ने कुछ समय तक बच्चे

1125
01:17:58,440 --> 01:18:02,480
को गुरुकुल में रखने रखकर नोटिस किया और उसके कर्म और गुण के

1126
01:18:02,480 --> 01:18:07,200
आधार पर फिर डिसाइड किया कि आठ से 12 वर्ष में अब इस ब्राह्मण का

1127
01:18:07,200 --> 01:18:11,240
या वैश्य का वर्ण का या के हिसाब से उपन किया जाना चाहिए तो

1128
01:18:11,240 --> 01:18:15,360
ये अद जवाब नहीं दे पाए

1129
01:18:15,360 --> 01:18:19,840
जी मैं देता हूं सबसे पहली बात ये आएगी

1130
01:18:19,840 --> 01:18:24,360
कि यह जो रखने वाली विधि है ठीक है

1131
01:18:24,360 --> 01:18:28,360
ये इनको प्राप्त वो कहां कौन से शास्त्र में लिखी हुई है वह विधि

1132
01:18:28,360 --> 01:18:32,400
हमें दे दीजिए कि वो कितने दिन रखेगा और कौन-कौन सी चीजों पर ध्यान देगा

1133
01:18:32,400 --> 01:18:36,400
कि जिससे निर्णय किया जा सके कि ब्राह्मण है वो विधि होनी

1134
01:18:36,400 --> 01:18:40,480
चाहिए ना बिल्कुल है ना दो बातें दूसरी बात ये है

1135
01:18:40,480 --> 01:18:44,480
कि जो भाई साहब ये प्रश्न कर रहे हैं क्या उन्होंने वेदों पर भाष्य कर लिया

1136
01:18:44,480 --> 01:18:48,840
है क्या उन्होंने मनुष प्रति पर भाष्य कर लिया है तो मनुष प्रति हमें दिखा दे

1137
01:18:48,840 --> 01:18:53,080
जहां से वो अर्थ ले रहे हैं मैं कह रहा हूं आर्य समाज के भी मनुस्मृति में ये नहीं

1138
01:18:53,080 --> 01:18:57,160
है जी समाज ही तो दतक है इन जैसे लोगों को जन्म देने वाला हर

1139
01:18:57,160 --> 01:19:01,760
समाज है इन सबका पिता हर समाज है जितनी भी ये संस्थाएं आज खड़ी हो गई है

1140
01:19:01,760 --> 01:19:05,960
इन सबका पिता मैं कहूंगा आर समाज को और भी कुछ पहले रहे होंगे मगर मेरी नजर में आर समाज

1141
01:19:05,960 --> 01:19:10,080
ही इन सब का जनक है अब वो ठंडा पड़ गया वो बैठ गया है ये सब लोग बहुत आगे आगे

1142
01:19:10,080 --> 01:19:13,680
बढ़ रहे हैं तेजी से आचार्य प्रशांत स्कोन ब्रह्मा

1143
01:19:13,680 --> 01:19:17,680
कुमारी ये सब उन्नत है आर्थ समाज पिछड़ गया मगर स्त्रोत के

1144
01:19:17,680 --> 01:19:21,760
रूप में ओरिजिन के रूप में वही है इन सबका उसने परंपरा वाद का खंडन

1145
01:19:21,760 --> 01:19:26,080
करना शुरू किया तो सबने परंपरा पाद का खंडन करना शुरू कर दिया

1146
01:19:26,080 --> 01:19:30,160
तो मैं कह रहा हूं कि आर्य समाज ने अपने वेदों के भाष्य तो किए हैं मनुस्मृति

1147
01:19:30,160 --> 01:19:34,400
का भाष्य तो किया है क्या तुम उसकी मनुस्मृति में दिखा दो चलो यह जो प्रमाण

1148
01:19:34,400 --> 01:19:40,400
तुम बोल रहे हो कि ऐसा ऐसा होगा दूसरी बात ये

1149
01:19:40,400 --> 01:19:44,800
है दूसरी बात यह है कि आपको अंततोगत्वा बताना

1150
01:19:44,800 --> 01:19:48,840
पड़ेगा कि वह कौन से सिद्धांत होंगे जिनके आधार पर गुरु

1151
01:19:48,840 --> 01:19:53,040
यह चेक करेगा कि ब्राह्मण होगा कि नहीं होगा ठीक है जी

1152
01:19:53,040 --> 01:19:57,400
और आर्य समाज ने भी यह माना है आर्य

1153
01:19:57,400 --> 01:20:01,840
समाज ने अपनी संस्कार विधि में क्या लिखा है पता है कि जिन माता-पिता

1154
01:20:01,840 --> 01:20:05,920
को अपने बच्चे को ब्राह्मण बनाना है वो उसका जनेऊ आ से 12

1155
01:20:05,920 --> 01:20:10,720
साल की आयु में कराते बताइए अब माता-पिता डिसाइड कर रहे हैं कौन ब्राह्मण बनेगा

1156
01:20:10,720 --> 01:20:14,920
गुरु नहीं डिसाइड कर रहा तो पहले जाकर के आप लोग तय कर लो और या फिर जो जो व्यक्ति

1157
01:20:14,920 --> 01:20:19,160
यह बात बोल रहा है वो अपनी मनुस्मृति छाप ले पहले फिर आए हमारे पास बात करें

1158
01:20:19,160 --> 01:20:23,200
फिर हम उनसे अगले प्रश्न पूछेंगे कि ज्ञान तुम्हें कहां से प्राप्त हुआ परंपरा से हुआ है फिर

1159
01:20:23,200 --> 01:20:27,280
वो नियम कहां पर है जहां पर यह सब लिखा हुआ है वो

1160
01:20:27,280 --> 01:20:28,680
नियम कहां पर है जहां पर यह सब

1161
01:20:28,680 --> 01:20:33,480
लिखा हुआ है ये सब चीजें ठीक है की बातें है

1162
01:20:33,480 --> 01:20:37,560
तो एक इलॉजिकल का ही एक कंटिन्यूअल क्वेश्चन है कई

1163
01:20:37,560 --> 01:20:41,760
लोगों के मन में आता है कि आप जोक आप कहते हैं कि आपका ईश्वर

1164
01:20:41,760 --> 01:20:46,160
सर्वशक्तिमान है कुछ भी कर सकता है तो क्या वह अपने आप को मार सकता है नष्ट कर सकता है

1165
01:20:46,160 --> 01:20:50,440
ऐसे ऐसे प्रश्न आते हैं तो अरे इनका जवाब मैंने कई बार दे दिया है

1166
01:20:50,440 --> 01:20:54,480
ऑपरेटर महोदय सेरी प्रा दो लाइन में दे दीजिए बस मैं दे देता

1167
01:20:54,480 --> 01:20:58,520
हूं देखिए व्यवहारिक रूप से ईश्वर

1168
01:20:58,520 --> 01:21:02,600
अपने आप को नष्ट करके भी दिखा सकता है ऐसी कई लीलाएं हैं जिसमें कि ईश्वर ने अपने

1169
01:21:02,600 --> 01:21:07,000
शरीर को नष्ट किया है है ना परंतु परमार्थिक

1170
01:21:07,000 --> 01:21:11,000
रूप से ईश्वर का अस्तित्व सदैव श शेष रहता है अब यदि आप यह

1171
01:21:11,000 --> 01:21:15,560
कहे कि परमार्थिक रूप से भी वो अपने आप को मार सकता है कि नहीं तो नहीं मार

1172
01:21:15,560 --> 01:21:19,640
सकता मतलब अगर इस प्रपंच रूपी संसार से

1173
01:21:19,640 --> 01:21:23,800
बाहर जो दुनिया है आप ये कहे कि उसमें भी ईश्वर का न अस्तित्व

1174
01:21:23,800 --> 01:21:27,960
जो है खत्म हो जाए तो वो नहीं हो सकता अब आप कहोगे तो हम नहीं मानेंगे पहली बात तो

1175
01:21:27,960 --> 01:21:32,200
बात ये है कि आपको सर्वशक्तिमान ईश्वर की सब कुछ कर सकने वाले ईश्वर

1176
01:21:32,200 --> 01:21:36,440
की आवश्यकता इस प्रपंच रूपी संसार में है इस प्रपंच रूपी संसार

1177
01:21:36,440 --> 01:21:40,440
से मुक्त होने के लिए आप मुक्त हो जाओगे तब कहोगे ईश्वर कहेगा तुम मुक्त हो गए

1178
01:21:40,440 --> 01:21:44,280
हो नहीं अभी अभी तुम सब कुछ कर सकते हो कि नहीं क्या मतलब भाई

1179
01:21:44,280 --> 01:21:48,280
ईश्वर तुम्हे क्या मतलब है तुम तो मुक्त हो गए नहीं पहले सब

1180
01:21:48,280 --> 01:21:52,520
कुछ करके दिखाओ पहली बात तो ये कोई लॉजिकल प्रश्न नहीं है दूसरी

1181
01:21:52,520 --> 01:21:56,600
बात ये है कि पार मर्थक रूप से ईश्वर बाधित हो गया इस

1182
01:21:56,600 --> 01:22:00,800
आधार पर भी तुम ईश्वर को नकार नहीं सकते क्यों क्योंकि

1183
01:22:00,800 --> 01:22:04,880
परमार्थिक रूप से बाधित हुआ ये आपको परमार्थ की दुनिया का जो पता चला

1184
01:22:04,880 --> 01:22:09,080
है वो ईश्वर से पता चला है जब आग की लपट जली तो उसने

1185
01:22:09,080 --> 01:22:13,280
बताया तो तुम्हें पता चला कि इस काठ की लकड़ी में दाह क्षमता है

1186
01:22:13,280 --> 01:22:17,480
अगर वह आग की लपट जलेगी ही नहीं तुम उसको मानोगे नहीं तो उसकी बात क्यों मानोगे

1187
01:22:17,480 --> 01:22:21,640
कि इस काठ की लकड़ी में कुछ है इसी तरीके से जब तुमने किसी को ईश्वर

1188
01:22:21,640 --> 01:22:25,760
माना तब तुम्हारे लिए परमार्थ का अस्तित्व है है अगर तुमने

1189
01:22:25,760 --> 01:22:29,880
किसी को ईश्वर माना ही नहीं है तो तुम्हारे लिए परमार्थ का अस्तित्व नहीं है तो

1190
01:22:29,880 --> 01:22:34,200
क्या हुआ कि जब तुम परमार्थ की किसी घटनाक्रम के कारण ईश्वर को नकार

1191
01:22:34,200 --> 01:22:38,200
दोगे कि मैं नहीं मानता क्योंकि वो बाधित हो गया क्योंकि जो

1192
01:22:38,200 --> 01:22:42,280
नास्तिक है वो कोशिश करेगा ना बाधित बाधित होने के कारण तो जब वो ये कहेगा मैं नहीं

1193
01:22:42,280 --> 01:22:46,400
मानता क्योंकि ईश्वर बाधित है तो जैसे ही वो ये कहेगा मैं नहीं मानता

1194
01:22:46,400 --> 01:22:50,560
तो फिर दोबारा से उसके नॉलेज में परमार्थ का होना एजिस्ट

1195
01:22:50,560 --> 01:22:54,560
ही नहीं करता है यानी कि ईश्वर का बाधित होना एजिस्ट नहीं करता है क्योंकि परमार्थ

1196
01:22:54,560 --> 01:22:58,640
नहीं है तो ईश्वर का बाधित होना एजिस्ट नहीं है तो क्या हुआ दोबारा से

1197
01:22:58,640 --> 01:22:59,360
उससे

1198
01:22:59,360 --> 01:23:03,680
दोबारा से उसके पास ईश्वर को ना मानने का कारण नहीं रह गया

1199
01:23:03,680 --> 01:23:06,800
तो यह ठीक इस प्रकार से है कि एक

1200
01:23:06,800 --> 01:23:11,200
जागा हुआ व्यक्ति यह नहीं कह सकता है कि मैं किसी की आवाज देने के कारण जाग गया क्योंकि

1201
01:23:11,200 --> 01:23:15,360
अगर वह सो रहा है तो उसका सुनना सिद्ध नहीं होता और अगर वह सुन रहा है तो उसका

1202
01:23:15,360 --> 01:23:19,480
क्या कहते सोना सिद्ध नहीं होता बकल सुनने की स्थिति

1203
01:23:19,480 --> 01:23:23,600
को बताने के लिए उसका जागा हुआ होना आवश्यक है इसी तरीके

1204
01:23:23,600 --> 01:23:28,120
से परमार्थ में बाधित होने की स्थिति को बताने के लिए उसको

1205
01:23:28,120 --> 01:23:32,240
ईश्वर को मानने वाला होना आवश्यक है ठीक और जैसे

1206
01:23:32,240 --> 01:23:36,280
ही को जैसे ही वो ईश्वर को ना मानने वाला होगा तो फिर से व परमार्थ की

1207
01:23:36,280 --> 01:23:40,560
स्थिति को ना जानने वाला हो जाएगा ठीक है तो इसका अर्थ क्या हुआ

1208
01:23:40,560 --> 01:23:44,960
परमार्थ के आधार पर आप मेरे ईश्वर को बाधित नहीं कर पाओगे चले आना

1209
01:23:44,960 --> 01:23:49,160
कोई नहीं है क्यों पड़े हो चक्कर में कोई है नहीं चक्कर में

1210
01:23:49,160 --> 01:23:53,240
ठीक है तो परमार्थ के आधार पर ईश्वर को नकारा नहीं जा सकता है

1211
01:23:53,240 --> 01:23:57,280
हां यदि व्यवहार में ईश्वर बाधित हो जाएगा तो उसको नकार सकता

1212
01:23:57,280 --> 01:24:01,640
है तो इसीलिए ईश्वर के सब कुछ कर सकने की आवश्यकता व्यवहार

1213
01:24:01,640 --> 01:24:05,680
में है मोक्ष की दृष्टि से भी और ईश्वर के धर्म

1214
01:24:05,680 --> 01:24:09,680
की स्थापना की दृष्टि से भी यहीं पर है

1215
01:24:09,680 --> 01:24:13,720
आवश्यकता नास्तिकता को आप हरा नहीं पाओगे

1216
01:24:13,720 --> 01:24:17,920
आप एक आप एक और बात बोलते हैं कि आपका धर्म सनातन है

1217
01:24:17,920 --> 01:24:23,000
या सनातन शब्द शाश्वत का आपने प्रयोग कई बार किया

1218
01:24:23,000 --> 01:24:26,200
है तो

1219
01:24:26,200 --> 01:24:26,700
धर्म

1220
01:24:26,520 --> 01:24:30,720
शाश्वत कैसे है जबक यह प्रश्न है कि धर्म शाश्वत कैसे है जबक

1221
01:24:30,720 --> 01:24:34,760
वो तो चेंज हो रहा है हर युग में अलग अलग धर्म है तो शाश्वत

1222
01:24:34,760 --> 01:24:38,960
कैसे शाश्वत ऐसे है कि हर युग का धर्म जो है वह शाश्वत

1223
01:24:38,960 --> 01:24:43,440
रूप से पहले ही व विधान लिख के रख दिया गया है व

1224
01:24:43,440 --> 01:24:47,520
ऐसे वो जो विधान लिखा हुआ बदल नहीं रहा है कि नहीं अब

1225
01:24:47,520 --> 01:24:51,640
जो है वो वो जो लिखा हुआ था मिटा रहे आज हम य तय कर रहे हैं

1226
01:24:51,640 --> 01:24:56,000
नहीं वो जो विधान है सतयुग में यह होना है

1227
01:24:56,000 --> 01:25:00,080
और द्वापर में यह होना है कलयुग में य होना है यह विधान शुरू से ही लिख कर के रखा

1228
01:25:00,080 --> 01:25:04,120
हुआ है उसमें हम कोई बदलाव नहीं कर रहे कि आज जो है कलयुग आ गया

1229
01:25:04,120 --> 01:25:08,200
तो हमने अपना नया आज लिख लिया नहीं वही धर्म चला रहा है ऐसे तो

1230
01:25:08,200 --> 01:25:12,240
धर्म कलयुग और द्वापर छोड़ो जरा जरा देर में बदल रहा है पिता का धर्म अलग

1231
01:25:12,240 --> 01:25:16,360
है पुत्र का धर्म अलग है यह भी तो बदल रहा है मगर यह सारे विधान एक ही

1232
01:25:16,360 --> 01:25:20,360
बार में लिख दिए गए वो शाश्वत रूप से वो नियमावली चलती आ रही है

1233
01:25:20,360 --> 01:25:24,440
इसलिए वो शाश्वत तो जीवन

1234
01:25:24,440 --> 01:25:28,520
बड़ा है कि धर्म इसको मानेंगे जीवन बड़ा है

1235
01:25:28,520 --> 01:25:32,600
या धर्म म है क्या प्रण

1236
01:25:32,600 --> 01:25:36,720
रक्षा के लिए धर्म छोड़ सकते हैं प्राण रक्षा के लिए

1237
01:25:36,720 --> 01:25:40,840
जो अमुक अमुक विधिया बताई गई है शास्त्रों के आधार पर उनकी सीमा में

1238
01:25:40,840 --> 01:25:41,840
रहते

1239
01:25:41,840 --> 01:25:46,280
हुए क्या कहते जो आपका आपातकालीन धर्म होता है उसका आलंबन

1240
01:25:46,280 --> 01:25:50,280
लेना अधर्म नहीं हो जाता है वो आपातकालीन स्थितियों में कहा

1241
01:25:50,280 --> 01:25:54,280
गया कि विश्वामित्र जी ने या किसी हमारे ऋषि ने अगस्त ऋषि ने शायद

1242
01:25:54,280 --> 01:26:00,280
कुत्ते का मास भी खाना पड़ा जीवन की रक्षा के लिए

1243
01:26:22,760 --> 01:26:26,760
मनुस्मृति हों के लिए य भी व्यवस्था है कि आपको अगर पशु की

1244
01:26:26,760 --> 01:26:30,760
भी आवश्यकता पड़े मनुष्य जीवन क्योंकि श्रेष्ठ है बहुत उसके बाद

1245
01:26:30,760 --> 01:26:34,960
मिला है तो मनुष्य जीवन के के सार्थकता

1246
01:26:34,960 --> 01:26:39,040
के लिए उसको बचाने के लिए ऐसी व्यवस्था की गई कि यदि इसके प्राणों

1247
01:26:39,040 --> 01:26:43,240
की रक्षा की बात आ जाए तो अमुक अमुक जो पशु है

1248
01:26:43,240 --> 01:26:47,240
उनका भी उत्थान होगा और उनकी उनका उपयोग करते हुए आप अपने प्राण

1249
01:26:47,240 --> 01:26:51,240
की रक्षा कर सकते हो मगर यदि आप विधि का आलंबन लेंगे तो

1250
01:26:51,240 --> 01:26:55,280
आप तब भी धर्म के अंदर ही कहलाएंगे और जब आप

1251
01:26:55,280 --> 01:26:56,880
विधि का आलंबन नहीं लेंगे

1252
01:26:56,880 --> 01:27:01,000
तो आप अधर्मी कहलाएंगे ठीक है तो जो

1253
01:27:01,000 --> 01:27:05,360
यहां पर जो और एक एक बात में और कह दूं

1254
01:27:05,360 --> 01:27:10,120
कि घटनाओं का घटित होना प्रमाण नहीं होता है

1255
01:27:10,120 --> 01:27:14,120
शास्त्रों द्वारा उसे धर्मो चित रूप में स्वीकार किया जाना प्रमाण

1256
01:27:14,120 --> 01:27:18,280
होता है ठीक है दोनों बातें यदि राजा दर्श

1257
01:27:18,280 --> 01:27:22,400
जी ने तीन विवाह कर लिए तो ऐसा नहीं माना जाएगा

1258
01:27:22,400 --> 01:27:26,520
तीन विवाह करना वो हमारे य न दिया किया गया है अमुक अमुक स्थितियों के कारण

1259
01:27:26,520 --> 01:27:30,640
उन्होंने आपातकालीन अथवा विशेष धर्म का आलंबन लेते हुए तीन विवाह किए

1260
01:27:30,640 --> 01:27:34,840
मगर श्रेष्ठ क्या है आदर्श क्या है स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल क्या है

1261
01:27:34,840 --> 01:27:39,000
रामो विग्रहवां धर्मा राम दर्श विग्रहवां

1262
01:27:39,000 --> 01:27:43,240
धर्मा नहीं है रामो विग्रह मान धरमा तो आइडल क्या है

1263
01:27:43,240 --> 01:27:47,600
राम ठीक है तो स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल राम है फिर आपातकालीन

1264
01:27:47,600 --> 01:27:51,640
विशेष जो धर्म है उनकी अलग-अलग व्याख्या है तो यह

1265
01:27:51,640 --> 01:27:55,840
जो यह जो चीज है ना कि ऋषि ने वो कुत्ता खाया अपने प्राण की रक्षा के लिए धर्म की सीमा

1266
01:27:55,840 --> 01:28:00,280
में ही खाया उन्होंने धर्म के द्वारा अलाव किया गया है कि अमुक अमुक स्थितियों में अमु

1267
01:28:00,280 --> 01:28:04,520
अमुक अमुक विधियों का आलंबन लेकर के आप प्राणों की रक्षा कर सकते हैं अथवा प्रवृत्ति

1268
01:28:04,520 --> 01:28:08,040
से निवृत्ति कह सकते हैं

1269
01:28:08,040 --> 01:28:12,360
इसी इसी बात को वहां पर प्रसंग वश

1270
01:28:12,360 --> 01:28:16,560
किसी ऋषि ने ऐसे कह दिया कि जीवन की रक्षा के लिए धर्म को त्याग सकते

1271
01:28:16,560 --> 01:28:20,640
तो वहां पर धर्म को त्यागने की बात नहीं हो रही है स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल

1272
01:28:20,640 --> 01:28:24,680
को त्याग कर जो आपत्ति आपत्ति विप ति कालीन

1273
01:28:24,680 --> 01:28:29,320
जो धर्म है उसको अपनाने की बात हो रही है जी तो

1274
01:28:29,320 --> 01:28:33,560
मैं ले लेता हूं एक बहुत काफी लोगों ने प्रश्न कर लिया है वैसे मैं कहता हूं कि जो पूरी

1275
01:28:33,560 --> 01:28:37,760
पीठाधीश्वर है ऐसा लोगों के मन में भ्रांतियां

1276
01:28:37,760 --> 01:28:41,840
या बात फैली है कि दूसरी आमना पीठों के आचार्यों के और पूरी

1277
01:28:41,840 --> 01:28:46,240
पीठाधीश्वर के बीच में आपस में मतभेद है कि वो उसको नहीं स्वीकारते

1278
01:28:46,240 --> 01:28:50,720
ऐसा ऐ इसका उत्तर तो मैंने दे दिया ना कि वो उनका एक आदि

1279
01:28:50,720 --> 01:28:54,760
दैविक स्वरूप है कि वो शंकराचार्य है साक्षात शंकर है और

1280
01:28:54,760 --> 01:28:59,200
उनका अपने अपने आप में वह एक मनुष्य भी है तो

1281
01:28:59,200 --> 01:29:04,160
लीला पूर्वक जब हमारे जो क्या कहते अनेक लीलाए ज विष्णु भगवान

1282
01:29:04,160 --> 01:29:08,560
में वो ये कह रहे हैं कि दूसरे आमना पीठ के जो आचार्य हैं

1283
01:29:08,560 --> 01:29:12,560
जैसे ज्योतिष पराध शवर उनको तो उनके बीच में ऐसा प्रश्न है कि

1284
01:29:12,560 --> 01:29:16,720
उनके बीच में और पूरी पका एक ही जवाब दूंगा इससे आपके धर्म

1285
01:29:16,720 --> 01:29:20,800
ब्रह्म पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है आप शंकर संप्रदाय के आचार्य से कहीं भी जाकर दीक्षा

1286
01:29:20,800 --> 01:29:24,960
लीजिए और हमारा जो चैनल है हमारा जो वो

1287
01:29:24,960 --> 01:29:28,080
सैद्धांतिक वैचारिक क्रांति लाना है

1288
01:29:28,080 --> 01:29:32,240
ठीक है और जोय ये जो प्रसंग चल रहे हैं कि उनके आपस

1289
01:29:32,240 --> 01:29:36,360
में मतभेद है यह सब जो क्या सम जो ये क्या कहते

1290
01:29:36,360 --> 01:29:40,440
आज जो आज के युग की जो व्याख्या है कि आज क्या हो रहा है या

1291
01:29:40,440 --> 01:29:44,600
कल हो सकता है उनके बीच में कुछ चल रहा हो कि कोई सिद्धांत का प्रतिपादन

1292
01:29:44,600 --> 01:29:48,640
हो रहा हो कोई धर्म रक्षा के तरीके से कुछ हो रहा हो बहुत सी चीजें

1293
01:29:48,640 --> 01:29:52,840
है तो ये आचार स्तर वाली बात है मगर हमारा जो हमारा जो कार्य है

1294
01:29:52,840 --> 01:29:57,120
धर्म और ब्रह्म के विषय में वैचारिक क्रांति लाना और आप इन चारों

1295
01:29:57,120 --> 01:30:01,360
में से कहीं पर भी जाकर के अपने धर्म ब्रह्म को जानने का प्रयास करिए आपको बिल्कुल सेम

1296
01:30:01,360 --> 01:30:05,400
धर्म ब्रह्म मिलेगा ठीक और मैंने एक

1297
01:30:05,400 --> 01:30:10,120
कारण और बता दिया कि मनुष्य होते हुए

1298
01:30:10,120 --> 01:30:14,400
जैसे वह शंकराचार्य होते हुए मतक मनुष्य होते हुए उनमें अमुक अमुक

1299
01:30:14,400 --> 01:30:18,640
अपना अपना दृष्टिकोण है कि ये नहीं ये रास्ता सही है यह नहीं ये रास्ता

1300
01:30:18,640 --> 01:30:22,680
सही है मगर जब धर्म ब्रह्म की व्याख्या होगी तो एक दूसरे का विरोध नहीं

1301
01:30:22,680 --> 01:30:26,680
होगा और विरोध होगा तो वहां पर कहीं ना कहीं

1302
01:30:26,680 --> 01:30:30,720
कोई ना कोई शंकराचार्य कहलाने के योग्य नहीं होगा अगर विरोध होगा वैसे है नहीं मैं

1303
01:30:30,720 --> 01:30:34,520
एक बात बता रहा हूं

1304
01:30:34,520 --> 01:30:39,360
जी क्या श्री राम ने

1305
01:30:39,360 --> 01:30:43,720
क्वे ले लीजिए बारबार स्क्रीन पर रिफ्लेक्ट हो रहा है यदि कोई जन्म से ब्राह्मण

1306
01:30:43,720 --> 01:30:47,920
है तो फिर कर्म की आव

1307
01:30:47,920 --> 01:30:52,120
यदि कोई जन्म से ही ब्राह्मण है तो फिर कर्म की आवश्यकता क्यों है और यदि

1308
01:30:52,120 --> 01:30:56,160
कर्म आवश्यक है तो जन्म से ब्राह्मण का अर्थ क्या रह जाता है अच्छा

1309
01:30:56,160 --> 01:31:00,360
मैं इसको ऐसे ले लेता हूं यदि कोई ग्रेजुएट

1310
01:31:00,360 --> 01:31:04,800
है तो उसको पुलिस की भर्ती में परीक्षा देने की क्या आवश्यकता

1311
01:31:04,800 --> 01:31:09,280
है और यदि पुलिस की भर्ती में परीक्षा देने की आवश्यकता है

1312
01:31:09,280 --> 01:31:13,040
तो उसके ग्रेजुएट होने का क्या फायदा

1313
01:31:13,040 --> 01:31:17,560
है है ना तो इसका अर्थ है

1314
01:31:17,560 --> 01:31:21,960
कि जब हम कोई भी कार्य करने चलते हैं तो अगर हम

1315
01:31:21,960 --> 01:31:25,960
सीधे कोई भी हम वर्गीकरण ना करें वर्गीकरण है क्यों दुनिया

1316
01:31:25,960 --> 01:31:30,040
में क्लासिफिकेशन क्यों है दुनिया में क्यों विभाग बनाए जाते हैं

1317
01:31:30,040 --> 01:31:34,480
यह विभाग अमुक अमुक फिर उसके नेता बनाए गए क्यों बनाए जाते हैं सब विभाग

1318
01:31:34,480 --> 01:31:38,480
य सब विभाग बनाए जाते हैं व्यवस्था के लिए ठीक है तो

1319
01:31:38,480 --> 01:31:42,680
जब हम कहेंगे कि हमें भैया यज्ञ करवाना है तो

1320
01:31:42,680 --> 01:31:46,720
यज्ञ कौन कर सकता है जिसको मंत्र आते जाओ ढूंढ के ला मंत्र मंत्र जिसको

1321
01:31:46,720 --> 01:31:49,560
आते हो ढूंढ के लाओ तो क्या

1322
01:31:49,560 --> 01:31:54,160
किसी को भी ढूंढने लगोगे साइकिल वाले को पकड़ लोगे

1323
01:31:54,160 --> 01:31:58,320
वाले को पकड़ लोगे या चाय की दुकान पर टपरी पर चले जाओगे तुझे

1324
01:31:58,320 --> 01:32:02,680
मंत्र आते कि नहीं बता बोल मंत्र आते कि नहीं कहीं से शुरुआत करोगे ना

1325
01:32:02,680 --> 01:32:06,840
कि मंत्र आते हैं यह किससे पूछा जाए और किससे ना पूछा जाए

1326
01:32:06,840 --> 01:32:11,280
उस रूप में पहले आपको ब्राह्मण विशेषण यूज करना है

1327
01:32:11,280 --> 01:32:15,280
बिल्कुल जब आपने य तय कर लिया कि भैया हम ब्राह्मण जो जो जन्म

1328
01:32:15,280 --> 01:32:19,480
से ब्राह्मण होगा हम उसके पास जाएंगे ऐसे चाय की टपरी पर नहीं चले जाएंगे सब्जी की ठेल

1329
01:32:19,480 --> 01:32:23,520
पर नहीं चले जाएंगे बता तुझे मंत्र आते हैं कि नहीं हम किसी ब्राह्मण कुल में

1330
01:32:23,520 --> 01:32:27,520
जाए किसी ब्राह्मण के घर में जाएंगे जिसके पिता भी ब्राह्मण

1331
01:32:27,520 --> 01:32:31,880
रहे हो तो वहां ज्यादा आशंका है कि ब्राह्मण मंत्र बोलने वाला मिल जाए वरना ढूंढते

1332
01:32:31,880 --> 01:32:35,880
रहो हर आने जाने अपने घर से बाहर निकलते ही खोज शुरू कर

1333
01:32:35,880 --> 01:32:39,920
दो अगर तुमने कोई भी टैग लगाया कि नहीं हम वहां जाकर के ढूंढेंगे तो

1334
01:32:39,920 --> 01:32:43,920
वही से वर्गीकरण हो गया जन्मजात जन्मजात वर्गीकरण हो गया ना

1335
01:32:43,920 --> 01:32:48,000
फिर वहा से कि हमको ब्राह्मण वही मिलेंगे पार्क के उस कोने में तो

1336
01:32:48,000 --> 01:32:52,040
ये क्या आवश्यक है कि पार्क के को में आपको ब्राह्मण मिल जाए नहीं तो आपको

1337
01:32:52,040 --> 01:32:56,160
अपने गेट के बाहर से ही व्यक्ति को पकड़ना शुरू करना पड़ेगा बता भाई

1338
01:32:56,160 --> 01:33:00,280
तुझे मंत्र आते कि नहीं तो मंत्र किसको आते

1339
01:33:00,280 --> 01:33:04,480
हैं यह ढूंढना कहां से शुरू किया जाए इस रूप में जन्म

1340
01:33:04,480 --> 01:33:04,980
से

1341
01:33:04,640 --> 01:33:08,720
ब्राह्मण और फिर जन्म से ब्राह्मण होने के बाद हम जब वहां गए हमने

1342
01:33:08,720 --> 01:33:13,480
हमने एक फिल्टर लगा लिया गया हम सिर्फ ब्राह्मणों को देखेंगे तो इससे हमारा समय बचा

1343
01:33:13,480 --> 01:33:17,880
हम हमारा समय बचा हमने फिर ब्राह्मणों को देखना शुरू किया उसमें से कोई एक ब्राह्मण

1344
01:33:17,880 --> 01:33:21,920
जो मिल गया जिसको मंत्र आते भी है त्रिकाल संध्या करता भी है उसको ले आए और

1345
01:33:21,920 --> 01:33:26,920
उससे यज्ञ करवाया इसी प्रकार से क्षत्रिय का उपयोग है उसी प्रकार

1346
01:33:26,920 --> 01:33:31,000
से का है इसी प्रकार से का आपने जो

1347
01:33:31,000 --> 01:33:35,160
है वो कई बार मनुस्मृति वेदों या पुराणों का जो भी मतलब अने संदर्भ कई

1348
01:33:35,160 --> 01:33:39,840
सार रेफरेंसेस दिए है अपनी बातो में अपने वक्त में लेकिन

1349
01:33:39,840 --> 01:33:44,040
प्रश्न यह उठता है कि फिर हम इन वेद वेदों को शति स्मृतियों

1350
01:33:44,040 --> 01:33:48,800
को प्रमाण क्यों माने वेद समत तर्क काही उपयोग क्यों करे

1351
01:33:48,800 --> 01:33:54,040
अरे कोई है जो हमारी बातें समझ नहीं पा रहा है एक्चुअली है क्या

1352
01:33:54,040 --> 01:33:58,920
कि यह जो बात है वेद विरुद्ध व्यक्तिगत तर्क अमान्य

1353
01:33:58,920 --> 01:34:03,280
है ना व्यक्तिगत तर्क अमान्य की बात एक तो यह है कि वेद समत

1354
01:34:03,280 --> 01:34:07,400
तर्क भी होना चाहिए वेद समत प्रमाण होना चाहिए यह बात तब कही जाती है जब वेदों को

1355
01:34:07,400 --> 01:34:11,800
मानने का दावा करने वाले लोग आपस में बात कर रहे हो मुसलमानों को थोड़ी

1356
01:34:11,800 --> 01:34:15,880
कहेंगे भैया तुम अपनी बात को सिद्ध करने के लिए वेद से दिखाओ ठीक

1357
01:34:15,880 --> 01:34:19,760
है हा मगर व्यक्तिगत तर्क मानने को तो तब भी मानना

1358
01:34:19,760 --> 01:34:24,600
पड़ेगा कि अगर कोई कोई मनम तर्क दे रहा है तो उसका तर्क क्यों मान लिया जाए

1359
01:34:24,600 --> 01:34:28,640
अगर कोई निराधार तर्क दे रहा है जो लॉजिकली सिद्ध नहीं हो रहा

1360
01:34:28,640 --> 01:34:33,520
तो उसका तर्क कैसे माना जाएगा कोई ना कोई उसकी पुष्टि करने का आधार तो होगा ना

1361
01:34:33,520 --> 01:34:37,760
ठीक है तो उस रूप में व्यक्तिगत तकमान और वेद सम्मत बात

1362
01:34:37,760 --> 01:34:41,760
वहां कही जा रही है जहां पर दोनों पक्ष वेद समत बात ऐसा

1363
01:34:41,760 --> 01:34:45,840
नहीं नास्तिक से भी हम कह रहे तुम वेद को मानो वेद सेही तर्क दो वेद सेही प्रमाण दो ये

1364
01:34:45,840 --> 01:34:50,040
नहीं कह रहे हम ये वाला ये वाली बात वहां कही जाती है जहां

1365
01:34:50,040 --> 01:34:55,200
पर दोनों पक्ष वेद को मानने का दावा करने वाले हो

1366
01:34:55,200 --> 01:34:59,440
तो तो आप वेद मतलब की श्रुति स्मृतियों पुराणों

1367
01:34:59,440 --> 01:35:03,480
को प्रमाण मानते हैं जी जब आप मानते हैं

1368
01:35:03,480 --> 01:35:07,720
तो प्रश्न ये उठता है फिर इसमें इतना कांट्रडिक्शन क्यों है आपस में

1369
01:35:07,720 --> 01:35:12,520
कंट्रक्शन का उदाहरण आपको देना पड़ेगा क्योंकि कई कंट्रक्शन ऐसे है जैसे

1370
01:35:12,520 --> 01:35:16,520
वेद में कहीं पर जैसे वेद में कहीं पर निर्गुण निराकार ईश्वर

1371
01:35:16,520 --> 01:35:20,560
की व्याख्या की जा रही है जी तो कहीं पर सगुण निराकार

1372
01:35:20,560 --> 01:35:24,720
की व्याख्या की जा रही है जैसे मैं बता मैं दे देता हूं जैसे वेद में ही एक जगह

1373
01:35:24,720 --> 01:35:28,800
रुद्र को परब्रह्म बता दिया रुद्र को वेद में एक जगह

1374
01:35:28,800 --> 01:35:32,800
भगवान गणपति को परब्रह्म बता दिया तो या

1375
01:35:32,800 --> 01:35:34,920
भगवती को परब्रह्म बता दिया मैं वेद की

1376
01:35:34,920 --> 01:35:39,080
पुराण भी नहीं ले रहा हूं मैं वेद की बात कर रहा हूं वेद ने भगवती को परब्रह्म बता दिया वेद में कह दिया

1377
01:35:39,080 --> 01:35:43,280
कि निराकार की ब्रह्म है निराकार ही है वेद में बता दिया कि साकार

1378
01:35:43,280 --> 01:35:47,400
भी है उसकी दो पनिया भी है लक्ष्मी भी है और श्री

1379
01:35:47,400 --> 01:35:51,520
भी उसकी पत्नियां है फलाना फलाना तो ये तो ये तो कांट्रडिक्शन हो रही

1380
01:35:51,520 --> 01:35:55,640
है ना मतलब तो इसमें मतलब कांट्रडिक्शन कंट्रक्शन नहीं

1381
01:35:55,640 --> 01:35:59,800
है जैसे मैंने बताया ना कि ईश्वर तीन रूप ईश्वर के तीन एक्सपेक्ट

1382
01:35:59,800 --> 01:36:04,120
होते कि वो निर्गुण निराकार से सगुण निराकार सगुण निराकार से सगुण

1383
01:36:04,120 --> 01:36:08,400
साकार तो तीनों तरीके के रूप की व्याख्या हो रही तो कांट्रडिक्शन नहीं है अच्छा

1384
01:36:08,400 --> 01:36:12,400
ठीक है अब जैसे एक जगह लिखा हुआ है एक जगह लिखा हुआ

1385
01:36:12,400 --> 01:36:16,480
है व्यवहार में नहीं आ सकता ठीक है ये हो गया निर्गुण निराकार फिर एक

1386
01:36:16,480 --> 01:36:20,720
जगह वो अग्नि है वो वायु है वो ये है वो ये सब है तो ये हो गया सगुण निराकार

1387
01:36:20,720 --> 01:36:25,320
फिर एक जगह उसके इतने हाथ है उसके इतने मुख है ये हो गया सगुण साकार

1388
01:36:25,320 --> 01:36:29,440
जी उसी तरह से मैं एक और एग्जांपल ले लेता हूं जैसे नारद जी का एग्जांपल ले लेते

1389
01:36:29,440 --> 01:36:33,680
हैं है ना अ मूर्ता सभी पुराणों में नारद जी का संवाद आपको मिलेगा ही

1390
01:36:33,680 --> 01:36:37,680
मिलेगा तो नारद जी कभी राम को तारक ब्रह्म बता रहे हैं शब्द ब्रह्म

1391
01:36:37,680 --> 01:36:41,840
बता रहे हैं कभी भगवान विष्णु को ही ब्रह्मा बता रहे हैं कभी कृष्ण को ब्रह्मा

1392
01:36:41,840 --> 01:36:46,120
बता रहे हैं वो भी कांट्रडिक्शन पुराणों में भी आ गया तो क्या तो

1393
01:36:46,120 --> 01:36:50,280
तो लिखने वाले ने कुछ मिस्टेक कर दी या फिर ये अलग-अलग

1394
01:36:50,280 --> 01:36:54,520
समय में अलग लोगों ने बस अपनी बातें जोड़ दी हैं नारद जी को

1395
01:36:54,520 --> 01:36:59,280
ढाल बनाकर ऐसा कुछ नहीं है कोई कंट्रक्शन नहीं है

1396
01:36:59,280 --> 01:37:03,320
मैंने बताया कि किसी लीला में वही परम तत्व विष्णु रूप में दास

1397
01:37:03,320 --> 01:37:07,320
भाव को प्रकट करता है और शिव भाव को भगवान के रूप में

1398
01:37:07,320 --> 01:37:11,640
प्रकट करता है फिर किसी लीला में वही परम तत्व

1399
01:37:11,640 --> 01:37:15,640
विष्णु तत्व को भगवान के रूप में प्रकट करता है और शिव तत्व को

1400
01:37:15,640 --> 01:37:19,640
दास भाव में प्रकट करता है तो यह अलग अलग क्योंकि सट की रचना एक बार नहीं

1401
01:37:19,640 --> 01:37:24,080
हुई है कई बार हो चुकी है कल्प भेद तो कल्प भेद

1402
01:37:24,080 --> 01:37:28,360
कद से कभी कभी उसमें शिव जी का दास रहा

1403
01:37:28,360 --> 01:37:32,560
और विष्णु की प्रधानता रही कभी दुर्गा मा का दुर्गा मां की प्रधानता रही इन लोगों

1404
01:37:32,560 --> 01:37:36,840
की इन लोगों का दासत रहा यह कल्प भेद है और यह सब उन्हीं पुराणों

1405
01:37:36,840 --> 01:37:41,120
में लिखा भी हुआ है हम अपने मन से नहीं बोल रहे कल्प भद भी उसमें लिखा हुआ है

1406
01:37:41,120 --> 01:37:45,160
और एंड बारबार व्यास जी ने ये सब पुराणों में कहा

1407
01:37:45,160 --> 01:37:49,760
ये सब एक है सब एक है और जब भी आप कभी

1408
01:37:49,760 --> 01:37:53,840
क्या कहते हैं जो अर्ध कुकुट न्याय है उसको ना लगाने की बजाय

1409
01:37:53,840 --> 01:37:58,040
जब कोशिश करोगे तो उसका व अर्थ निकल आएगा इसमें

1410
01:37:58,040 --> 01:38:02,160
एक फन फैक्ट बता देता हूं जो हमारे कल्प में जो पुराण हुआ था व मत्स पुराण

1411
01:38:02,160 --> 01:38:05,320
है तो किसी को अगर ज्यादा इंटरेस्ट हो हमारे कल्प में हुआ क्या

1412
01:38:05,320 --> 01:38:10,240
था हमारी हिस्ट्री में क्या हुआ इस कल्प की हिस्ट्री में तो आपको मत्स पुराण का जो मिलेगा

1413
01:38:10,240 --> 01:38:14,760
इवेंट्स व वो आप मान सते ठीक है तो

1414
01:38:14,760 --> 01:38:18,920
तो इसमें आता है फिर य एक और प्रश्न इस

1415
01:38:18,920 --> 01:38:23,120
उठता है कि जैसे नारद जी तो राम और कृष्ण दोनों

1416
01:38:23,120 --> 01:38:27,160
को ब्रम बताए जा रहे हैं ठीक है तो क्या ऐसे तो और आप

1417
01:38:27,160 --> 01:38:31,200
एक शब्द का प्रयोग करते हैं अनन्य है ना अनन्य तो क्या

1418
01:38:31,200 --> 01:38:35,240
अन्यता के नाम पर किसी भगवान को नीचा दिखाना सही है जो वैष्णव

1419
01:38:35,240 --> 01:38:39,280
संप्रदाय वाले करते हैं जो शैव संप्रदाय वाले करते हैं या जो शक्त संप्रदाय

1420
01:38:39,280 --> 01:38:43,560
करते हैं भाई बात यह है

1421
01:38:43,560 --> 01:38:47,840
कि अगर मैं यह कह रहा हूं कि मेरी मां जैसा

1422
01:38:47,840 --> 01:38:51,880
इस संसार में कोई मां नहीं है तो क्या इसमें दूसरी मांओं का

1423
01:38:51,880 --> 01:38:54,720
अपमान है

1424
01:38:54,720 --> 01:38:58,920
बिल्कुल नहीं नहीं तो अगर कोई अगर आचार्य ऐसे बोल रहे

1425
01:38:58,920 --> 01:39:03,040
हैं कि मेरी मां जैसा कोई मेरी मां जैसी कोई

1426
01:39:03,040 --> 01:39:07,160
मां नहीं है यानी कि विष्णु भगवान जैसा कोई और भगवान का रूप नहीं है

1427
01:39:07,160 --> 01:39:11,280
तो ये उनकी अपने भगवान के प्रति अनन्य है इसको हम क्यों ले कि वह

1428
01:39:11,280 --> 01:39:15,600
जो है जो है भगवान शिव का अपमान कर रहे हैं

1429
01:39:15,600 --> 01:39:19,920
और जबकि वह भगवान शिव का सम्मान करने वाले आपको कई जगह पर मिल जाएंगे

1430
01:39:19,920 --> 01:39:20,920
जबकि

1431
01:39:20,920 --> 01:39:25,120
मुख्य बात है क्या वो वेदों में प्रमाण बुद्धि रखने वाले

1432
01:39:25,120 --> 01:39:29,120
हैं कि नहीं हैं तो व हमारे अपने हैं वेदों में प्रमाण

1433
01:39:29,120 --> 01:39:33,320
बुद्धि वो यह ना कहते हो देश काल परिस्थिति के अनुसार हम बदल देते हैं

1434
01:39:33,320 --> 01:39:37,320
जो यह बदलने वाला है यह खतरा है जिसके आचरण

1435
01:39:37,320 --> 01:39:41,400
आपसे अलग ना हो देखिए कोई ब्रह्म के स्वरूप को किस रूप

1436
01:39:41,400 --> 01:39:45,400
में स्थापित करके अपने व्यक्तिगत कार्य को अपने व्यक्तिगत जीवन

1437
01:39:45,400 --> 01:39:49,440
का उद्देश्य प्राप्त कर रहा है वो अलग है उससे आपको आपको कोई दिक्कत नहीं आनी है कि

1438
01:39:49,440 --> 01:39:53,600
वह ईश्वर तत्व को किस रूप में देख रहा है किस रूप में भज रहा है ठीक है

1439
01:39:53,600 --> 01:39:57,640
आपको दिक्कत तब आएगी जब वह व्यवहार आपसे भिन्न आपके विरोध

1440
01:39:57,640 --> 01:40:01,880
में करने लगे तो जितने भी परंपरा प्राप्त आचार्य उन सबका व्यवहार एक

1441
01:40:01,880 --> 01:40:05,960
दूसरे के अनुकूल है इसलिए वह सब हमारे अपने हैं

1442
01:40:05,960 --> 01:40:10,600
जितने भी संप्रदाय है प्रामाणिक उनका जो व्यवहार है आचरण धर्म

1443
01:40:10,600 --> 01:40:14,880
जो धर्म विषय है वो सबका एक है ब्रह्म विषय थोड़ा थोड़ा सा अलग है कुछ कुछ

1444
01:40:14,880 --> 01:40:18,920
हिस्से में जाकर के ठीक है तो हमारी जो हमारा उनसे

1445
01:40:18,920 --> 01:40:22,960
जो संबंध है वो क्या है व्यवहार व्यवहार ही तो है ब्रह्म

1446
01:40:22,960 --> 01:40:27,160
थोड़ी हमारा उनसे ब्रह्म तो सबका अपना अपना है अपनी मुक्ति अपने हाथ में भाई अपनी

1447
01:40:27,160 --> 01:40:31,760
मुक्ति लेकर चलो ठीक है

1448
01:40:31,760 --> 01:40:35,840
तो तो वो उस विषय में हमसे वो अलग है

1449
01:40:35,840 --> 01:40:36,340
वो

1450
01:40:36,000 --> 01:40:40,160
उनकी अपनी अपनी अनुकूलता है अपनी अपनी जो उनकी निष्ठा

1451
01:40:40,160 --> 01:40:44,400
है उसकी पुष्टि है उन सिद्धांतों में तो वो अगर अलग-अलग

1452
01:40:44,400 --> 01:40:48,480
रूपों में ब्रह्म ब्रह्म की व्याख्या अलग हो रही है या ब्रह्म को अलग रूप में वो देख रहे

1453
01:40:48,480 --> 01:40:52,720
हैं तो उससे कोई दिक्कत नहीं दिक्कत तब है जब उनके आचरण आपके विरोध

1454
01:40:52,720 --> 01:40:56,880
में आ जाए का धर्म आपके विरोध में हो जाए वो आपको कट करने लगे तब

1455
01:40:56,880 --> 01:41:01,280
दिक्कत है और यह जो संस्थाएं हैं यह जितनी भी संस्थाएं हैं यह सारी

1456
01:41:01,280 --> 01:41:05,360
संस्थाएं जो आपका धर्म आचरण है आचरण उसमें आपका विरोध करती

1457
01:41:05,360 --> 01:41:09,400
है ये जो संस्थाएं जितनी भी परंपरा प्राप्त

1458
01:41:09,400 --> 01:41:13,480
आचार्यों के विरोध में खड़ी हुई आज संस्था है इनका आचरण

1459
01:41:13,480 --> 01:41:17,560
विरोध में आ जाता है तब इनके इनके पीछे जाना पड़ता है ईश्वर अल्लाह

1460
01:41:17,560 --> 01:41:21,720
को ही एक करने लगे कौन सा संप्रदाय ऐसा है जो ईश्वर अल्लाह को एक कर रहा है भाई

1461
01:41:21,720 --> 01:41:25,720
प्रामाणिक संप्रदाय कौन सा ऐसा वो मूर्ति पूजा कोई खराब

1462
01:41:25,720 --> 01:41:29,800
पाप कहने लगे अधर्म कहने लगे कि जो जो राम लीला देख लेगा उसको

1463
01:41:29,800 --> 01:41:34,040
इतना पाप पड़ेगा जितना 100 बार अमे यज्ञ से जो पुण्य मिलता है उतना उसको पाप लगेगा

1464
01:41:34,040 --> 01:41:38,640
राम लीला जो देखेगा ये आर समाज

1465
01:41:38,640 --> 01:41:42,760
बताइए तोय जो धर्म है वो हमारे दिक्कत में आ रहा

1466
01:41:42,760 --> 01:41:46,760
है ना ब्रह्म अपना कोई विष्णु तत्व में देख कर के अगर पूजा कर रहा है कह रहा

1467
01:41:46,760 --> 01:41:50,840
है नहीं विष्णु जैसा कोई नहीं उससे हमें क्या दिक्कत हो रही है वो उसके अपने अपनी

1468
01:41:50,840 --> 01:41:51,340
उसके

1469
01:41:51,080 --> 01:41:55,120
स्नता सुखाए के लिए उसका ऐसा कहना ठीक है हम हम भी तो ऐसे ही

1470
01:41:55,120 --> 01:41:59,720
कहेंगे अपनी मां के लिए हमारी मां जैसी मां दुनिया इस दुनिया में कोई नहीं है

1471
01:41:59,720 --> 01:42:04,600
इसका मतलब य नहीं सारी मा जो है वो है और हम उनके

1472
01:42:04,600 --> 01:42:08,680
वचनों का जो आचार्य गण ऐसा कह रहे हैं हम उनके वचनों

1473
01:42:08,680 --> 01:42:12,760
का अनादर क्यों करें जब तक व वो वेद विरोधी

1474
01:42:12,760 --> 01:42:16,840
वो धर्मा आचरण में हमारे विरोधी नहीं है क्यों करें हम अनादर हम उसमें अच्छाई

1475
01:42:16,840 --> 01:42:20,880
जब तक ढूंढ सकते हैं तब तक हम क्यों बुराई देख ले जब भी

1476
01:42:20,880 --> 01:42:25,000
मेरा मेरा एक सिद्धांत है इसको प्रैक्टिकली मैं बताऊं

1477
01:42:25,000 --> 01:42:29,040
जब भी कोई व्यक्ति मुझे दोषी लगता है तो पहले मैं पता

1478
01:42:29,040 --> 01:42:33,520
है क्या करता हूं पहले मैं उसका अधिवक्ता बन जाता हूं

1479
01:42:33,520 --> 01:42:37,600
वकील और मैं सोचता हूं कि जिसको मैं दोषी समझ रहा हूं वो मेरा

1480
01:42:37,600 --> 01:42:41,760
वो मेरा क्लाइंट है और वो इस समय कटघरे में खड़ा हुआ है अब मैं उसको किस

1481
01:42:41,760 --> 01:42:46,320
किस तरीके से कौन-कौन से तर्क दे सकता हूं प्रमाण दे सकता हूं जो मैं उसको बचा लू

1482
01:42:46,320 --> 01:42:50,400
मैं उसका वकील हूं जो मुझे दोषी लग रहा है मैं उसका वकील अब मैं हर तरह

1483
01:42:50,400 --> 01:42:54,800
के हथकंडे सोचता हूं कि मैं इसको कैसे सही प्रूफ करूं जब एक भी पॉइंट

1484
01:42:54,800 --> 01:42:59,080
नहीं बचता है उसको सही प्रूफ करने का तब मैं मानता हूं कि वह दोषी

1485
01:42:59,080 --> 01:43:03,360
है तो हम दोष ना ढूंढे हम अच्छाई ढूंढे

1486
01:43:03,360 --> 01:43:06,280
और जब अच्छाई मिल ही नहीं सकती तब

1487
01:43:06,280 --> 01:43:11,080
दोषी को वो दोष को देखें तब जो दोष दिखाई दे रहा है उसको दोष

1488
01:43:11,080 --> 01:43:15,760
समझे बस दो तीन प्रश्न और है फटाफट ले लेते

1489
01:43:15,760 --> 01:43:19,840
हैं यह प्रश्न है काफी फेमस क्वेश्चन है और बहुत

1490
01:43:19,840 --> 01:43:24,120
मतलब कई लोगों का है लोग परेशान है इसको लेकर कि अगर ईश्वर

1491
01:43:24,120 --> 01:43:28,360
ने दुनिया बनाई है तो इतना दुख क्यों है

1492
01:43:28,360 --> 01:43:32,360
क्या दुनिया में दुख नहीं है क्या दुनिया का मतलब दुख है नहीं

1493
01:43:32,360 --> 01:43:36,560
नहीं वो कह र है कि अगर ईश्वर ने दुनिया बनाई है तो इतना दुख क्यों है ईश्वर मतलब

1494
01:43:36,560 --> 01:43:40,840
पाप क्यों कर रहा है आई थिंक यह सवाल भव्य राधा कृष्ण

1495
01:43:40,840 --> 01:43:45,000
जी के ने भी किया था ये प्रश्न लेकिन आप उसका उत्तर दोबारा दे सकते हैं

1496
01:43:45,000 --> 01:43:49,080
कि अगर ईश्वर ने इतना दुख मतलब इतना दुख क्यों है क्या

1497
01:43:49,080 --> 01:43:53,200
ईश्वर दुख देने वाला है पापी है जो पाप कर रहा

1498
01:43:53,200 --> 01:43:57,280
इसको इसको ऐसे समझना इना दुख क्यों है अगर ईश्वर ने दुनिया

1499
01:43:57,280 --> 01:44:01,560
बनाई है तो हमें दुख क्यों है इस बात यहां पर भी वही वाला लॉजिक

1500
01:44:01,560 --> 01:44:05,640
आ जाएगा कि सो रहे हो तो सुनना सिद्ध नहीं होता सुन रहे हो तो जागना सिद्ध नहीं होता

1501
01:44:05,640 --> 01:44:09,920
यदि आपने उसको ईश्वर मान लिया तो आप इस आधार पर उसका खंडन

1502
01:44:09,920 --> 01:44:13,960
नहीं कर सकते कि इतना दुख क्यों क्योंकि आपने दुनिया को उससे बना हुआ माना

1503
01:44:13,960 --> 01:44:18,080
और दुनिया दुख से अलग थोड़ी ना है जब आपने दुनिया को

1504
01:44:18,080 --> 01:44:21,400
बनना मान लिया तो आप ये नहीं कह सकते दुख क्यों बनाया दुख कोई

1505
01:44:21,400 --> 01:44:25,440
अलग से वो तत्व थोड़ी ना आया दुनिया का ही एक हिस्सा है तो

1506
01:44:25,440 --> 01:44:29,520
जब आप उससे आपने दुनिया का बनना मान लिया तो आप ये नहीं कह सकते दुख क्योंकि

1507
01:44:29,520 --> 01:44:34,040
दुख दुनिया में उसने दुख दिया इसलिए हम उसे नहीं मानते

1508
01:44:34,040 --> 01:44:38,120
है ना तो यहां पर भी वही सोने जागने वाला कांसेप्ट आएगा कि यदि आप सो रहे

1509
01:44:38,120 --> 01:44:42,320
हो तो जागना सिद्ध नहीं होता व आपका सुनना सिद्ध नहीं होता सुन रहे हो तो सना सिद्ध

1510
01:44:42,320 --> 01:44:46,360
नहीं होता यदि आप मान रहे हो कि उसने दुनिया बनाई है वो ईश्वर है तो दुख

1511
01:44:46,360 --> 01:44:50,360
देने के कारण दुख दुनिया में दुख होने के कारण आपका

1512
01:44:50,360 --> 01:44:55,080
उसको ईश्वर ना मानना या उसके द्वारा सृष्टि का बनना सिद्ध नहीं होता

1513
01:44:55,080 --> 01:45:01,080
ठीक है ठीक और दूसरी बात वास्तविकता में ये जो

1514
01:45:01,160 --> 01:45:05,440
अ क्या कहते हैं ये जो प्रपंच है दुख है सुख

1515
01:45:05,440 --> 01:45:09,520
है इसी का नाम संसार है अगर इसमें से एक भी घटक आप हटाएंगे तो

1516
01:45:09,520 --> 01:45:14,040
संसार का अस्तित्व ही नहीं रह जाता तो आपको प्रश्न ऐसा करना होगा कि

1517
01:45:14,040 --> 01:45:18,280
जो तत्व है संसार उसका अस्तित्व रहे और उसके बाद आप प्रश्न

1518
01:45:18,280 --> 01:45:22,560
करो जब आप दुख को अलग कर दोगे तो संसार का अस्तित्व ही नहीं है यानी

1519
01:45:22,560 --> 01:45:26,760
कि अगर आपने यह कह दिया कि दुख क्यों बनाता है इसका मतलब दुख के बिना

1520
01:45:26,760 --> 01:45:30,800
भी संसार की स्थिति आप मान रहे हो जबकि संसार की स्थिति दुख के बिना है

1521
01:45:30,800 --> 01:45:35,040
ही नहीं संसार का अस्तित्व ही नहीं है दुख के बिना तो दुख संसार

1522
01:45:35,040 --> 01:45:39,680
का एक हिस्सा है उसको आप अलग नहीं कह सकते तो अगर मैं

1523
01:45:39,680 --> 01:45:43,800
मतलब ईश्वर को मानू ही नहीं तो उसम समस्या क्या है मान लीजिए कि मैं बहुत अच्छा कार्य करता

1524
01:45:43,800 --> 01:45:48,480
हूं कर्म करता हूं अपना पर ईश्वर को नहीं मानता हूं तो उसम बुराई क्या है

1525
01:45:48,480 --> 01:45:52,640
हम कहां किसी से कह रहे हैं जब तुम आते हो मना करने की ईश्वर नहीं है तब हम तुम्हें काटते

1526
01:45:52,640 --> 01:45:56,720
हैं ना मानो अच्छा कार करते रहो किसी दिन गलत काम करते हुए मिले तो उठा

1527
01:45:56,720 --> 01:46:00,760
पटक देंगे हम कहा है तुम्हारे

1528
01:46:00,760 --> 01:46:05,080
घर के नहीं ईश्वर को मानते हो कि नहीं मत मानो मगर जिस दिन तुम खंडन

1529
01:46:05,080 --> 01:46:09,840
करने निकलोगे कि नहीं ईश्वर नहीं है नास्तिकता फैलाने निकलोगे तब हम आएंगे

1530
01:46:09,840 --> 01:46:13,880
क्योंकि हो सकता है तुम्हारी प्रज्ञा शक्ति इतनी अच्छी हो कि ईश्वर के अस्तित्व

1531
01:46:13,880 --> 01:46:16,200
को स्वीकार किए बना ही तुम महात्मा बने

1532
01:46:16,200 --> 01:46:20,440
रहो मगर वास्तविकता अधिकांश वही है कि ईश्वर

1533
01:46:20,440 --> 01:46:24,600
है तभी अच्छाई और बुराई में फर्क करने का आधार और यदि

1534
01:46:24,600 --> 01:46:29,040
आप अच्छे कार्य कर रहे हो तो इसका मतलब आपके पास भी आपने भी इनडायरेक्ट

1535
01:46:29,040 --> 01:46:33,200
वे में ईश्वर को माना हुआ है हमें कोई आपत्ति नहीं है अगर आप अच्छे कार्य करने

1536
01:46:33,200 --> 01:46:37,320
वाले हो तो आप आप ये भले ही कहते रहो मैं ईश्वर को नहीं मानता मगर

1537
01:46:37,320 --> 01:46:41,360
वास्तविकता तो यही है कि आप भी ईश्वर को मानने वाले वरना आप बताइए क्या आधार है आपके अच्छे

1538
01:46:41,360 --> 01:46:45,360
और बुरे का चयन करने का ठीक है और यदि आप अच्छे और बुरे

1539
01:46:45,360 --> 01:46:49,640
का चयन नहीं करेंगे आप कह रहे अच्छा कार्य कर रहा हूं जबक आप अच्छा कार्य नहीं कर रहे तो हम रोकेंगे

1540
01:46:49,640 --> 01:46:53,640
आपको और फिर जब हमें पता चलेगा कि आप ईश्वर को नहीं मानते तो ईश्वर को

1541
01:46:53,640 --> 01:46:57,760
हम सिद्ध करेंगे ठीक है तो तो हमने

1542
01:46:57,760 --> 01:47:01,840
तो मतलब ये भी पढ़ा है कि अंत में सब प्रलय की ओर ही जा रहा है मतलब ये तो

1543
01:47:01,840 --> 01:47:06,200
यूनिवर्स का एक बेसिक कांसेप्ट है कि एवरीथिंग इज गोइंग टुवर्ड्स डिस्ट्रक्शन

1544
01:47:06,200 --> 01:47:10,200
ठीक है अंत की तरफ ही जा रहा है मतलब अगर कोई चीज खाना रखा है तो सड़ता

1545
01:47:10,200 --> 01:47:14,320
है आदमी पैदा होता है तो मरता है कोई फल है तो वो सड़ेगा अंत में कुछ भी चीज

1546
01:47:14,320 --> 01:47:18,880
है तो वो खत्म होता ही होता है तो जब अंत में सब खत्म होना ही है

1547
01:47:18,880 --> 01:47:23,120
तो फिर तो तो अच्छा और बुरा भी खत्म हो जाएगा तो क्यों

1548
01:47:23,120 --> 01:47:27,760
और बरा करना चार बाग जीवन ही जिए आदमी यह भौतिक सत्यता है

1549
01:47:27,760 --> 01:47:31,240
कि सब कुछ जो है खत्म होना ही है ईश्वर

1550
01:47:31,240 --> 01:47:35,400
उसका नाम है जो सनातन है जो खत्म नहीं होना है और अगर ईश्वर

1551
01:47:35,400 --> 01:47:39,520
है नहीं तो फिर हमारे मन में उसकी प्यास क्यों है तो

1552
01:47:39,520 --> 01:47:43,840
यहां से सत्यता खत्म हो जाती है कि सब कुछ खत्म होना है ईश्वर का खत्म नहीं होना है

1553
01:47:43,840 --> 01:47:47,920
वो एक ऐसी ऐसा सुख है जो हमें अनंत काल के लिए प्राप्त हो सकता है और हमें हम

1554
01:47:47,920 --> 01:47:53,000
लोग उसको प्राप्त करने के लिए सब माथा मतया कर रहे हैं

1555
01:47:53,000 --> 01:47:57,200
ठीक हैने दो शब्द दो शब्दों का कई बार प्रयोग किया व्यवहार

1556
01:47:57,200 --> 01:48:01,640
परमार्थ तो मतलब ये भी शास्त्र में आता है व्यवहार परमार्थ

1557
01:48:01,640 --> 01:48:06,160
हां बिल्कुल आता है वोह एक जगह लिखे हुए हैं हमने अपना एक वीडियो बनाया था

1558
01:48:06,160 --> 01:48:10,840
जब इन्होंने शंकराचार्य जी को वो कहा था

1559
01:48:10,840 --> 01:48:14,920
क्या कहते हैं शंकराचार्य जी ने अवतार को नहीं माना है आर्य

1560
01:48:14,920 --> 01:48:19,120
समाज यों ने कहा था कि शंकराचार्य अवतार को नहीं मानते तो हमने जवाब दिया था जिनका ईश्वर जगत बनाता

1561
01:48:19,120 --> 01:48:23,280
ही नहीं बनता भी है अद्वैत में ईश्वर अद्वैत में जो परम तत्व वही

1562
01:48:23,280 --> 01:48:27,280
तो जगत बनके उद् भाषित हो रहा है तो वो उससे एक ऐसे कह रहे हैं कि व अवतार

1563
01:48:27,280 --> 01:48:31,440
नहीं लेता उनका ईश्वर जिनका ईश्वर जगत बनाता है बनता भी उन्ही का ईश्वर अवतार लेता

1564
01:48:31,440 --> 01:48:35,480
है तो हमने उस वो वीडियो आप दिखा दीजिए अलंकार समाज को उत्तर दिया

1565
01:48:35,480 --> 01:48:40,000
था एक उस वीडियो में सारे प्रमाण दिए हैं और इस

1566
01:48:40,000 --> 01:48:44,000
इसके उसमें भी दे देंगे लगा के आर समाज के ग्रंथ में भी एक

1567
01:48:44,000 --> 01:48:46,760
जगह ऐसी बात आती है व्यवहार और परमार्थ की

1568
01:48:46,760 --> 01:48:51,240
आर समाज के ग्रंथ में भी आता है व्यवहार परमार्थ आज ही देखा है मैंने

1569
01:48:51,240 --> 01:48:55,480
शायद वो जो नवम लास नवा समुल्लास उसमें आता है व्यवहार

1570
01:48:55,480 --> 01:48:59,480
परमार्थ परमार्थ शब्द आया है और एक एक जगह उन्होंने कहा

1571
01:48:59,480 --> 01:49:04,320
175 नंबर पेज पर दयानंद जी ने कि उस समय

1572
01:49:04,320 --> 01:49:08,720
जो स्थिति होती है वह तर्क में नहीं आ सकती है अव्यावहारिक हो गया

1573
01:49:08,720 --> 01:49:13,000
तर्क में नहीं आ सकता व्यवहारिक हो गया ना तो इस तरह से दूसरे

1574
01:49:13,000 --> 01:49:17,040
शब्दों में व्यवहार परमार्थ उन्होने माना है और हमारे शास्त्रों में दिया गया है

1575
01:49:17,040 --> 01:49:21,720
व्यवहार परमाण दोनों चीजें दी

1576
01:49:21,720 --> 01:49:26,120
गई और व्यवहार और परमार्थ कोई अलग से चीजें नहीं आई है

1577
01:49:26,120 --> 01:49:30,720
धरती को देखने के दो पर्सपेक्टिव है एक सैटेलाइट के द्वारा

1578
01:49:30,720 --> 01:49:34,760
और एक जो आप स्वयं की आंखों से देख रहे हो सैटेलाइट के द्वारा

1579
01:49:34,760 --> 01:49:38,960
विज्ञान के अनुसार धरती गोल है आज का जो विज्ञान है वो यही

1580
01:49:38,960 --> 01:49:43,560
कह रहा है ना धरती गोल है सैटेलाइट के द्वारा और

1581
01:49:43,560 --> 01:49:47,760
हमारी आंखों के द्वारा हमें धरती चपटी दिख रही है

1582
01:49:47,760 --> 01:49:52,160
तो एक पर्सपेक्टिव हो गया ये व्यवहार धरती कैसी दिख रही चपटी

1583
01:49:52,160 --> 01:49:56,240
और एक पर्सपेक्टिव हो गया सेटेलाइट के द्वारा धरती कैसी दिख रही गोल

1584
01:49:56,240 --> 01:50:00,400
अब हमें वास्तव में धरती को गोल फील करना है हमें थ्योर कली मालूम

1585
01:50:00,400 --> 01:50:04,600
पड़ गया हमें थ्योर कली मालूम पड़ गया कि हमारी जो आत्मा

1586
01:50:04,600 --> 01:50:08,760
है वो सनातन है नैनम छिंदंति सण नन दती पाव ये

1587
01:50:08,760 --> 01:50:13,440
कैसे मालूम पड़ा थ्योर कली थ्योर कली मालूम पड़ा

1588
01:50:13,440 --> 01:50:17,960
प्रति भाषिक उससे अनुमान से अनुमान प्रमाण और शब्द प्रमाण से हमें मालूम

1589
01:50:17,960 --> 01:50:22,120
पड़ा मगर अभी हमें फील नहीं हुआ है प्रत्यक्ष प्रमाण से हमें मालूम

1590
01:50:22,120 --> 01:50:26,840
नहीं पड़ा आत्मा को जो है यह सब नहीं हो सकता तो क्या है

1591
01:50:26,840 --> 01:50:30,960
कि जैसे हमें थ्योर कली मालूम पड़ गया कि धरती गोल है मगर अभी हमने उसको

1592
01:50:30,960 --> 01:50:35,000
फील नहीं किया फील कैसे होगा

1593
01:50:35,000 --> 01:50:36,840
फील कैसे होगा जब हम कोई स्पेसशिप

1594
01:50:36,840 --> 01:50:40,880
बनाएंगे फिर हम जाकर के धरती प्रदी से मुक्त होंगे मुक्त हो कर

1595
01:50:40,880 --> 01:50:44,960
के वहां से जब देखे हां पृथ्वी गोल है जब वो वो आंखे हमको

1596
01:50:44,960 --> 01:50:49,400
मिल जाएंगी सेटेलाइट वाली तब हम जो है देखेंगे हां पृथ्वी गोल

1597
01:50:49,400 --> 01:50:53,480
हैवसी होनी चाहिए बना लवें के हो नहीं पाए तो

1598
01:50:53,480 --> 01:50:57,880
अब क्या है कि धरती की पदी से मुक्त होने के लिए हमको एक स्पेसशिप

1599
01:50:57,880 --> 01:51:02,560
तो बनाना होगा ना धरती पर रहकर और जब तक हमें वो स्पेस शप बनाना है

1600
01:51:02,560 --> 01:51:06,760
तब तक हमें जो चपटी धरती है उसके अनुसार व्यवहार करना होगा

1601
01:51:06,760 --> 01:51:11,240
तो ये हो गया व्यवहार और वो हो गया परमार्थ व्यवहार का

1602
01:51:11,240 --> 01:51:15,480
व्यवहार को साधक परमार्थ की प्राप्ति और ये द्वैत और द्वैत

1603
01:51:15,480 --> 01:51:19,760
में अंतर है वो भी यही है धर्म का विषय है द्वैत धर्म

1604
01:51:19,760 --> 01:51:23,760
क्या है व्यवहार तो धर्म का विषय है द्वैत और ब्रह्म का

1605
01:51:23,760 --> 01:51:28,200
विषय अद्वैत यह सिद्धांत है अच्छा

1606
01:51:28,200 --> 01:51:33,080
आप एक लास्ट प्रश्न है मेरा अंतिम प्रश्न है

1607
01:51:33,080 --> 01:51:37,200
जी आप कृष्ण से द्वेष करते

1608
01:51:37,200 --> 01:51:41,360
हैं आप क्योंकि यह प्रश्न भीन

1609
01:51:41,360 --> 01:51:45,560
की तरफ से था कि आप मलत आप कृष्ण से या वैष्णव से दश करते हैं

1610
01:51:45,560 --> 01:51:49,560
और और राम को ही सब कुछ मानते हैं इस

1611
01:51:49,560 --> 01:51:51,880
तरह से करके और बाकी देवताओं को

1612
01:51:51,880 --> 01:51:55,960
देवी देवताओं को उनके राम के स्थान पर राम जैसा

1613
01:51:55,960 --> 01:52:00,000
के स्थान पर सम्मान नहीं देते ठीक है मूलत कृष्ण से द्वेश करते

1614
01:52:00,000 --> 01:52:04,120
हैं और इसलिए उ उसके अगेंस्ट होने जो चल

1615
01:52:04,120 --> 01:52:08,160
रही संस्थाओं के पीछे आप पड़े हुए हैं ऐसा कुछ

1616
01:52:08,160 --> 01:52:12,160
नहीं है हमारे सामने जो आ जाता है वह धर्म का खंडन करने वाला होता है

1617
01:52:12,160 --> 01:52:16,320
रास्ता चलते मिल जाता है तो हम उसको पकड़ लेते हैं ठीक

1618
01:52:16,320 --> 01:52:20,400
है क्या क्या आपके हिसाब से कृष्ण भी परब्रह्म परमेश्वर है

1619
01:52:20,400 --> 01:52:24,480
हां बिल्कुल कृष्ण भगवान परमेश्वर है मैं रोया हूं उनके लिए कितना

1620
01:52:24,480 --> 01:52:28,640
जब मैंने उनके यदा यदाई धर्म से वाले जब मैं मुसलमानों से परेशान

1621
01:52:28,640 --> 01:52:33,120
हो गया था तब मैंने जब ये श्लोक जाना था ये मुसलमानों खंडन है ये

1622
01:52:33,120 --> 01:52:37,760
य खंडन है मुस्लिम धर्म का जिसको आर समाज ने एक कोने कर दिया

1623
01:52:37,760 --> 01:52:41,880
एक आचार्य हैं वो अभी कुछ दिनों पहले आए थे यह देखिए आज

1624
01:52:41,880 --> 01:52:45,960
ही मैंने बनाया ये विष्णु द्रोही या शिव की भक्ति

1625
01:52:45,960 --> 01:52:49,960
ज्यादा करने वाले के रूप में देखते हैं वैसे आपकी जानकारी के

1626
01:52:49,960 --> 01:52:54,000
लिए बता दूं कि भगवान आदि शंकराचार्य जी के

1627
01:52:54,000 --> 01:52:58,520
जो ईस्ट थे वो कृष्ण भगवान ही थे और वर्तमान पूरी पीठाधीश्वर

1628
01:52:58,520 --> 01:53:02,720
जी के जो ईस्ट ईस्ट है वो भी कृष् ही है और मैंने

1629
01:53:02,720 --> 01:53:06,880
उनसे राम जी की भक्ति करने के लिए मंत्र लिया है श्रीमत जगदगुरु शंकराचार्य जी

1630
01:53:06,880 --> 01:53:11,720
से जो भी ज्ञान मैंने प्राप्त किया उसका फल यह है जब मैं

1631
01:53:11,720 --> 01:53:15,760
भगवान के पैर छूता हूं ना तो सदैव मुझे कृष्ण का वही स्वरूप

1632
01:53:15,760 --> 01:53:20,360
याद आता है भगवान ने अर्जुन को दिखाया था विराट

1633
01:53:20,360 --> 01:53:24,400
जब भी मैं किसी के पीछे पीछे चलना चाहता तो मुझे श्री राम

1634
01:53:24,400 --> 01:53:28,640
दिखते हैं जब भी मैं सनातन का कोई सिद्धांत बताना चाहता

1635
01:53:28,640 --> 01:53:32,760
हूं तो मुझे कृष्ण सुनाई देते हैं

1636
01:53:32,760 --> 01:53:36,760
जब भी मुझे एक पिता के प्रोटेक्टिव बस की जरूरत होती

1637
01:53:36,760 --> 01:53:40,760
है तो उस समय मेरे पीछे मुझे शिव जी दिखाई देते

1638
01:53:40,760 --> 01:53:44,760
हैं जब भी मुझे कभी सुकून चाहिए होता

1639
01:53:44,760 --> 01:53:48,760
है थक जाता हूं तो मुझे माता की गोद मिल जाती है

1640
01:53:48,760 --> 01:53:53,480
और जब भी मैं कुछ अच्छा करने जा रहा होता हूं तो ऐसा लगता है

1641
01:53:53,480 --> 01:53:57,760
गणेश जी मुझे आशीर्वाद दे रहे यह सब अलग अलग नहीं है

1642
01:53:57,760 --> 01:54:01,840
दोस्तों एक ही परम तत्व स्वयं

1643
01:54:01,840 --> 01:54:06,400
को अलग अलग रूपों में प्रकट कर रहे ब्रह्मा विष्णु महेश

1644
01:54:06,400 --> 01:54:11,440
भगवती और गणेश जय श्री राम बकुल जय श्री

1645
01:54:11,440 --> 01:54:15,560
राम चलिए बहुत बढ़िया तो मैं इस बात को

1646
01:54:15,560 --> 01:54:19,600
जरा पूरा कर दूं यह श्री कृष्ण वाली बात जो है एक तो

1647
01:54:19,600 --> 01:54:22,000
मैं भगवान श्री कृष्ण के लिए मैं रोया

1648
01:54:22,000 --> 01:54:26,280
हूं एक अपना एक घटनाक्रम है वो मैं अभी बताऊंगा

1649
01:54:26,280 --> 01:54:30,440
मगर बात यह है कि जो मेरा वो है मैं जहां भी

1650
01:54:30,440 --> 01:54:34,920
जाता हूं तो मेरे साथ में कुछ मेरी जरूरी चीज वो सदैव रहती है

1651
01:54:34,920 --> 01:54:39,440
एक तो रोड है जैसे ये वाली चीज बतानी नहीं चाहिए

1652
01:54:39,440 --> 01:54:43,560
एक तो ड है जो अगर किसी से पंगा हो जाए तो वो

1653
01:54:43,560 --> 01:54:48,120
जो है थोड़ा बहुत लड़ सके भाई धर्म की रक्षा में है

1654
01:54:48,120 --> 01:54:52,600
और साथ ही साथ कुछ ऐसे इंस्ट्रूमेंट्स वगैरह है कि अगर कोई गलत कार्य करते हुए मिल जाए तो

1655
01:54:52,600 --> 01:54:56,880
वही उसको जो है हम लोग प्रतिकार कर सके यह सब रहता है अब जैसे

1656
01:54:56,880 --> 01:55:00,920
इन्होंने कहा कि भाई तुम केवल कृष्ण वालों के पीछे लगे

1657
01:55:00,920 --> 01:55:05,240
हुए क्यों हमको वो कलकी खुद को कहते थे हमने उनको नहीं पकड़ा व कुंभ

1658
01:55:05,240 --> 01:55:09,280
के मेले में भाई जो ज्यादा दिखेगा जो ज्यादा

1659
01:55:09,280 --> 01:55:13,560
अपना परचम लहराएगा उसी को पकड़ा जाएगा

1660
01:55:13,560 --> 01:55:17,760
ऐसा नहीं है कि ऐसे ऐसे

1661
01:55:17,760 --> 01:55:22,320
शव नहीं होंगे जो खूब ज्यादा जो है कृष्ण का कृष्ण

1662
01:55:22,320 --> 01:55:26,920
विष्णु तत्व को परहेज करते होंगे ऐसे शब होंगे मगर वो उतना नहीं लाइटेड

1663
01:55:26,920 --> 01:55:30,960
है ना जिस दिन होंगे जिस दिन वो ज्यादा अपना परचम लहराएंगे

1664
01:55:30,960 --> 01:55:35,160
तो हम उनसे भी बात करनी पड़ेगी है ना अगर विष्णु का अपमान

1665
01:55:35,160 --> 01:55:37,280
करते हुए देखेंगे और एट द सेम

1666
01:55:37,280 --> 01:55:41,760
टाइम कृष्ण और अल्लाह को एक करेंगे यह भी बात है नहीं तो फिर अ

1667
01:55:41,760 --> 01:55:45,840
वहां पर उनकी अन्यता मानी जाएगी कृष्ण अल्ला को एक ना करे

1668
01:55:45,840 --> 01:55:49,880
और कृष्ण की भक्ति करे कृष्ण की भक्ति सिखाए और कृष्ण की अन्यता

1669
01:55:49,880 --> 01:55:54,240
का प्रचार करे अन्यों की न का नहीं

1670
01:55:54,240 --> 01:55:58,440
करेंगे तो कहीं ना कहीं हमें बात करनी पड़ेगी फिर तो यह तो एक बात रही

1671
01:55:58,440 --> 01:56:02,560
दूसरी बात ये क्या है कि हम सदैव तैयार रहते कि

1672
01:56:02,560 --> 01:56:06,760
कोई भी धर्म का कुछ भी बाल भी बांका अगर करता हुआ मेरी आंखों के सामने

1673
01:56:06,760 --> 01:56:10,760
अगर करेगा तो मैं उसको रोकूंगा है ना

1674
01:56:10,760 --> 01:56:14,760
फिर वो फर्क नहीं पड़ता मेरे करने से वह पूरी दुनिया पूरी दुनिया में

1675
01:56:14,760 --> 01:56:18,840
वो हो रहा है कि नहीं हो रहा है कर्मन वादी का रस्ते मा फले कदाच तो

1676
01:56:18,840 --> 01:56:22,840
मेरे सामने अगर होगा तो मैं उसको रोकूंगा वो किसी प्रकार से हो

1677
01:56:22,840 --> 01:56:26,840
रहा हो कृष्ण का विरोध हो रहा हो भगवान शिव का विरोध हो रहा हो विष्णु का विरोध हो रहा

1678
01:56:26,840 --> 01:56:30,840
हो राम का विरोध हो रहा हो मां दुर्गा का विरोध हो रहा हो गणपति महाराज का विरोध हो

1679
01:56:30,840 --> 01:56:35,040
रहा हो ब्रह्मा जी का विरोध हो रहा हो किसी का भी विरोध हो रहा होगा इस तरह

1680
01:56:35,040 --> 01:56:39,080
से अनावश्यक रूप से तथाकथित तंत्रों के द्वारा

1681
01:56:39,080 --> 01:56:43,840
हमारे धर्म का खंडन हो रहा होगा तो मैं उनका जरूर प्रतिकार करता हूं और करूंगा

1682
01:56:43,840 --> 01:56:47,840
और इस जीवन का उद्देश्य ही यही है ऐसा ही

1683
01:56:47,840 --> 01:56:52,240
करते रहना जी आपने जो प्रश्न किया

1684
01:56:52,240 --> 01:56:52,740
उत्तर

1685
01:56:52,480 --> 01:56:56,960
दिया जा चुका है पहले भी इनका प्रश्न बोल देता हूं मैं कि अगर प्राप्त व्य ही

1686
01:56:56,960 --> 01:57:00,960
का विषय ही सिर्फ निराकार ब्रह्म है तो हमारे शास्त्रों में

1687
01:57:00,960 --> 01:57:05,240
धर्म का वर्णन क्यों किया गया है तो इसका उत्तर दिया जा चुका है द्वैत से अद्वैत जाने का रास्ता

1688
01:57:05,240 --> 01:57:09,640
समझाया गया है आपको अभी थोड़ी देर पहले ही स्पेस

1689
01:57:09,640 --> 01:57:13,680
सैटेलाइट और स्पेस का और अर्थ का जो एग्जांपल दिया गया है वो

1690
01:57:13,680 --> 01:57:18,280
यही उसका उत्तर यही है जो आपने प्रश्न किया आप दोबारा देख

1691
01:57:18,280 --> 01:57:22,280
लीजिएगा मेरे तो सारे प्रश्न पूरे हो गए आक्षेप जो मैं आप के

1692
01:57:22,280 --> 01:57:26,320
ऊपर लगा रहा था काफी अच्छे काफी अच्छा

1693
01:57:26,320 --> 01:57:30,560
उत्तर अच्छे उत्तर दिए आपने और मैं तो संतुष्ट हूं मैं इसलिए संतुष्ट

1694
01:57:30,560 --> 01:57:34,800
नहीं हूं कि मैं आपको सपोर्ट करता हूं मैं इसलिए संतुष्ट हूं कि आपने संतुष्ट

1695
01:57:34,800 --> 01:57:39,040
किया है ठीक है और आगे भी

1696
01:57:39,040 --> 01:57:43,040
आने वाले समयो में जब हमारे पास कोई प्रश्न आएंगे तो हम जदा कदा

1697
01:57:43,040 --> 01:57:47,080
हम इस तरह की लाइव स्ट्रीम को दोबारा भी करेंगे और जिसमें प्रश्नोत्तरी

1698
01:57:47,080 --> 01:57:51,560
वाला जो सेशन है वो दोबारा भी लेंगे जी जी और कोशिश करूंगा मैं कि

1699
01:57:51,560 --> 01:57:55,560
रिप क् ना हो तो मैं छाट कर जो अब प्रश्न प्रश्नोत्तरी

1700
01:57:55,560 --> 01:57:59,880
श्रंखला में आ गए हैं अब उसको दोबारा नहीं लिया जाएगा है ना

1701
01:57:59,880 --> 01:58:04,560
और बस इतना ही बोलूंगा बाकी तो मेरी तरफ से

1702
01:58:04,560 --> 01:58:07,520
मेरा एक प्रयास मात्र किया है बाकी

1703
01:58:07,520 --> 01:58:11,960
तो अल्पज्ञ है कहीं कोई गलती हो गई होगी कहीं पर कुछ

1704
01:58:11,960 --> 01:58:16,160
शब्दों का इधर उधर हो गया होगा तो उसके लिए क्षमा प्रार्थी रहूंगा

1705
01:58:16,160 --> 01:58:20,240
गुरु गोविंद ग्रंथ की कृपा से जो भी सामर्थ्य पूर्वक

1706
01:58:20,240 --> 01:58:25,000
एक प्रयास मात्र करते हैं तो आप लोग यथोचित सुनने

1707
01:58:25,000 --> 01:58:29,680
और समझने का प्रयास करें यही आपसे अपेक्षा है

1708
01:58:29,680 --> 01:58:33,840
बाकी यही कहूंगा कि भाई आप जो है यह ना सोचे कि यह

1709
01:58:33,840 --> 01:58:37,920
आवान जो है मैं शंकर परंपरा से जोड़ने का प्रयास करता है गुरुदेव

1710
01:58:37,920 --> 01:58:41,920
भी यही कहते कभी भी किसी को स्वयं से मत जोड़ो या स्वयं के वह

1711
01:58:41,920 --> 01:58:46,080
व्यक्ति निष्ठ संस्था निष्ठ इनसे मत जोड़ो भगवान से जोड़ो धर्म

1712
01:58:46,080 --> 01:58:50,120
से जोड़ो तो हमें कोई एक कर

1713
01:58:50,120 --> 01:58:54,400
सकता है तो वो हमारे भगवान कर सकते हैं

1714
01:58:54,400 --> 01:58:58,400
आप सब भूल जाओ कि शंकर संप्रदाय के कौन सा संप्रदाय या कौन

1715
01:58:58,400 --> 01:59:03,040
सी संस्था या कौन सा समाज सब भूल करके

1716
01:59:03,040 --> 01:59:07,320
एक मिनट के लिए आंख बंद करके ईश्वर को सर्वशक्तिमान कहो

1717
01:59:07,320 --> 01:59:11,320
और उसको सर्वशक्तिमान कहने के पीछे पड़ जाओ

1718
01:59:11,320 --> 01:59:15,520
कि हमारा ईश्वर बाधित नहीं होगा पीछे पड़ जाओ उसके

1719
01:59:15,520 --> 01:59:19,680
तो हम और आप एक ही पायदान पर खड़े मिलेंगे यह मेरी सबसे प्रार्थना

1720
01:59:19,680 --> 01:59:22,960
है हम और आप सब लोग एक जगह खड़े हो जाएंगे

1721
01:59:22,960 --> 01:59:27,080
केवल ईश्वर के पीछे पड़ जाइए कि मेरा ईश्वर बाधित नहीं हो सकता

1722
01:59:27,080 --> 01:59:31,680
मेरे मेरा वो ईश्वर है जिसको नास्तिक नकार नहीं सकता मेरा वो ईश्वर

1723
01:59:31,680 --> 01:59:36,440
है ऐसा ईश्वर दे दो हम सब एक जगह हो जाएंगे मेरे भाई

1724
01:59:36,440 --> 01:59:40,480
ऐसा ईश्वर दे दो फिर अपने आप को

1725
01:59:40,480 --> 01:59:46,480
खूब आर्य समाजी कहो खूब स्कन वाला कहो ठीक

1726
01:59:47,360 --> 01:59:51,560
है ठीक है फिर दो घंटे की लाइव स्ट्रीम हो गई है अगर आप लेना चाहते

1727
01:59:51,560 --> 01:59:55,680
हैं किसी को तो आप ले सकते हैं मतलब मेरा तो नहीं नहीं ठीक है दो घंटे

1728
01:59:55,680 --> 02:00:00,240
हो गए ऑलमोस्ट जी जी चलिए तो

1729
02:00:00,240 --> 02:00:04,640
सभी को समय देने के लिए बहुत-बहुत आभार आज के होस्ट हमारे पंडित जी है

1730
02:00:04,640 --> 02:00:08,840
पंडित जी आपका समय देने के लिए बहुत बहुत आभार और आशा करता

1731
02:00:08,840 --> 02:00:12,640
हूं कि आज की लाइव स्ट्रीम भी लाइ लाभप्रद

1732
02:00:12,640 --> 02:00:17,000
रहेगी हमारे दर्शकों के लिए सभी को जय श्री राम

1733
02:00:17,000 --> 02:00:20,960
जय श्री

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राम h
