1
00:00:02,080 --> 00:00:06,160
सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं कि

2
00:00:06,160 --> 00:00:09,320
आप सभी कुशल पूर्वक

3
00:00:09,320 --> 00:00:11,640
होंगे।

4
00:00:11,640 --> 00:00:16,080
अ आज की लाइव स्ट्रीम रोचक रहेगी

5
00:00:16,080 --> 00:00:20,320
थोड़ी। मतलब जो लॉजिकल क्वेश्चन

6
00:00:20,320 --> 00:00:24,320
आंसर्स होते हैं वह भी है इसमें और बाकी कुछ

7
00:00:24,320 --> 00:00:29,840
समीक्षा भी है।

8
00:00:29,840 --> 00:00:34,000
पहले हम लोग एक कुछ लॉजिकल क्वेश्चंस ले लेते हैं जो उठाए

9
00:00:34,000 --> 00:00:38,920
जा रहे हैं सर्वशक्तिमान ईश्वर के विरोध

10
00:00:38,920 --> 00:00:42,840
में।

11
00:00:42,840 --> 00:00:47,760
तो एक क्वेश्चन हमारे सामने आया था जिसके बारे में हमने अपनी एक अन्य

12
00:00:47,760 --> 00:00:51,920
स्ट्रीम में बात की थी मगर पूरी तरीके से नहीं की थी क्योंकि वह स्ट्रीम

13
00:00:51,920 --> 00:00:56,240
उस इन चीजों के लिए नहीं थी। किसी और मतलब कोई और विषय था उस स्ट्रीम

14
00:00:56,240 --> 00:01:00,400
का। तो क्वेश्चन उठाने वाले का

15
00:01:00,400 --> 00:01:04,480
कहना है कि तुमने हमारे प्रश्न

16
00:01:04,480 --> 00:01:09,040
के उत्तर में प्रश्न कर दिया ऐसा कुछ और हमारे सभी प्रश्नों का जवाब नहीं दिया।

17
00:01:09,040 --> 00:01:13,240
तो भाई वो जो स्ट्रीम थी वो आपके लिए नहीं थी

18
00:01:13,240 --> 00:01:17,520
केवल आपके प्रश्नों के लिए नहीं थी। आपके प्रश्नों का जो

19
00:01:17,520 --> 00:01:21,680
आपने जो संशय फैलाए हैं अपने लॉजिक दे दे

20
00:01:21,680 --> 00:01:26,160
के उनके लिए वो स्ट्रीम नहीं थी। हालांकि अभी भी बहुत

21
00:01:26,160 --> 00:01:31,120
आपने जो क्वेश्चन उठाए वह अभी मुझे जितना

22
00:01:31,120 --> 00:01:35,200
उससे याद है स्मरण शक्ति से जितना याद रहेगा उतना ही मैं बताऊंगा

23
00:01:35,200 --> 00:01:39,360
और बाकी तो सबसे अच्छी बात है कि हमारा आमनासामना हो प्रत्यक्ष वार्ता

24
00:01:39,360 --> 00:01:43,440
हो और उसके लिए आप जो अपना अभद्र आचरण है

25
00:01:43,440 --> 00:01:48,200
उसको त्याग त्यागे उसके लिए क्षमा मांगे जो आपने किया

26
00:01:48,200 --> 00:01:52,400
है तो यह भी आपका कहना ठीक नहीं है कि आपने हमारे

27
00:01:52,400 --> 00:01:57,360
प्रश्न का उत्तर नहीं दिया उसमें में आपके फोटो या आपके प्रश्न से संबंधित

28
00:01:57,360 --> 00:01:57,860
वो

29
00:01:57,840 --> 00:02:02,160
प्रश्न को उद्भाषित नहीं किया गया है। वो एक अन्य जो कुलदीप विद्यार्थी

30
00:02:02,160 --> 00:02:06,160
जी आने वाले थे उनके बारे में आज बात करेंगे। उनके बारे में वो

31
00:02:06,160 --> 00:02:12,160
चर्चा है। एक मिनट बस

32
00:02:30,240 --> 00:02:34,320
तो प्रश्नकर्ता ने जो प्रश्न उठाए हैं वो जो मुझे मोटे-मोटे तौर पर जो याद

33
00:02:34,320 --> 00:02:38,160
है उनको मैं देख लेता हूं।

34
00:02:38,160 --> 00:02:42,800
सर्वशक्तिमान ईश्वर के लिए उन्होंने प्रश्न उठाया है

35
00:02:42,800 --> 00:02:46,960
इस व्यक्ति ने कि जिस सामर्थ्य

36
00:02:46,960 --> 00:02:50,120
का अस्तित्व

37
00:02:50,120 --> 00:02:54,160
है वो सारे सामर्थ्यों की बात हो रही है जब सर्वशक्तिमान कहा

38
00:02:54,160 --> 00:02:59,880
जाता है तो सर्वशक्तिमान

39
00:02:59,880 --> 00:03:03,920
में जो सामर्थ्य है जैसे बल है या देखना

40
00:03:03,920 --> 00:03:08,080
है ये सब सामर्थ्य है इनका का कहना है।

41
00:03:08,080 --> 00:03:12,160
तो जब हम सर्वशक्तिमान की बात कर रहे हैं तो वहां पर सामर्थ्यों

42
00:03:12,160 --> 00:03:16,200
की सामर्थ्यों की बात नहीं हो रही है। क्रियाओं की बात हो रही है।

43
00:03:16,200 --> 00:03:20,240
शक्ति अह जो जो क्रिया पूछी जा रही

44
00:03:20,240 --> 00:03:24,840
है यह क्रिया हो सकती है। ये क्रिया को करने में सामर्थ्य है कि नहीं? तो

45
00:03:24,840 --> 00:03:29,280
सर्वशक्ति सभी जो भी क्रिया है जो क्रिया है

46
00:03:29,280 --> 00:03:34,120
उस क्रिया को करने का सामर्थ। अच्छा दूसरी बात एक ये है कि जिसका

47
00:03:34,120 --> 00:03:38,320
अस्तित्व अ है जिसका अस्तित्व नहीं है। आपने कहा

48
00:03:38,320 --> 00:03:42,640
जिसका अस्तित्व नहीं है उसको ईश्वर नहीं कर सकता। इनका कहना है कि जिस

49
00:03:42,640 --> 00:03:47,120
क्रिया का अथवा सामर्थ्य का कह ले उसका उसको करने में सामर्थ्यवान

50
00:03:47,120 --> 00:03:51,840
ईश्वर है। इसलिए उसे सर्वशक्तिमान कहा जाता है। तो

51
00:03:51,840 --> 00:03:55,920
हमने तो नहीं कहा कि हम कोई ऐसे सामर्थ्य की बात कर रहे हैं जिसका अस्तित्व ही ना

52
00:03:55,920 --> 00:03:59,920
हो। है ना? हमने तो ऐसा नहीं कहा। ये आपका

53
00:03:59,920 --> 00:04:04,640
कहना है कि जिस अस्तित्व के साम जिस सामर्थ्य की हम बात कर रहे हैं

54
00:04:04,640 --> 00:04:05,520
उसका अस्तित्व

55
00:04:05,520 --> 00:04:09,600
नहीं है शायद आपके मेंटालिटी से आपके दृष्टिकोण

56
00:04:09,600 --> 00:04:12,120
से नहीं है।

57
00:04:12,120 --> 00:04:16,320
जबकि जब हम कहते हैं कि क्या ईश्वर ये

58
00:04:16,320 --> 00:04:21,200
जाहिर सी बात है ये आर्य समाझी के द्वारा पूछा जा रहा प्रश्न है कि सर्वशक्तिमान

59
00:04:21,200 --> 00:04:25,360
का अर्थ यह नहीं है कि जिन सामर्थ्यों

60
00:04:25,360 --> 00:04:29,520
का अस्तित्व भी नहीं है वो सामर्थ्य भी

61
00:04:29,520 --> 00:04:33,600
ईश्वर में है। है ना? ठीक है? तो

62
00:04:33,600 --> 00:04:37,680
यह इनका कहना है। जबकि जो प्रश्न जो

63
00:04:37,680 --> 00:04:42,560
सर्वशक्तिमान जो शब्द है वह सभी प्रकार की क्रियाओं के लिए है। एक्शंस

64
00:04:42,560 --> 00:04:46,880
क्या यह एक्शन करने की शक्ति है ईश्वर में? क्या फलाना

65
00:04:46,880 --> 00:04:51,080
एक्शन करने की शक्ति है ईश्वर में? तो एक्शंस के लिए वो

66
00:04:51,080 --> 00:04:55,800
सर्वशक्तिमान शब्द आया है। ये तो एक बात रही। दूसरी बात ये

67
00:04:55,800 --> 00:04:59,920
रही कि जब कोई क्रिया होती है तो उसमें से कोई एक सामर्थ्य ही लगता है।

68
00:04:59,920 --> 00:05:03,920
जैसे बल या देखने वाला सामर्थ्य हो

69
00:05:03,920 --> 00:05:08,000
या छूने वाला सामर्थ्य हो या क्या कहते हैं? उठाने वाला सामर्थ्य

70
00:05:08,000 --> 00:05:12,000
हो इत्यादि इत्यादि कोई एक सामर्थ्य ही उसमें यूज़ होता है। मगर बात क्रियाओं

71
00:05:12,000 --> 00:05:17,240
की हो रही है कि क्या ये क्रिया कर सकता है? क्या वो क्रिया कर सकता है? दूसरी

72
00:05:17,240 --> 00:05:22,120
बात कि अगर हम

73
00:05:22,120 --> 00:05:26,160
ये जब ये तो एक बात रही। दूसरी बात यह भी

74
00:05:26,160 --> 00:05:30,640
है कि हम ऐसे सामर्थ्य की डिमांड कर रहे हैं ईश्वर से जिस सामर्थ्य

75
00:05:30,640 --> 00:05:34,960
के अस्तित्व को आपने माना है। जैसे कि

76
00:05:34,960 --> 00:05:38,960
आपने माना कि जीव जो है वो

77
00:05:38,960 --> 00:05:43,200
एक व्यवहारिक स्वरूप ले सकता है जो किसी का माता जो किसी की

78
00:05:43,200 --> 00:05:47,360
जो किसी का माता-पिता इत्यादि इत्यादि कहला सके पुत्र कहला सके

79
00:05:47,360 --> 00:05:52,400
पुत्री कहला सके। जीव ऐसे अ

80
00:05:52,400 --> 00:05:57,120
रूप ले सकता है। ऐसा शरीर धारण कर सकता है। जब हमने प्रश्न ये किया था कि शरीर

81
00:05:57,120 --> 00:06:01,200
धारण करने का अस्तित्व है तो ये जो अलंकारी है इसने ये

82
00:06:01,200 --> 00:06:06,040
भी एक दोबारा से उसमें प्रति उत्तर दिया कि भाई

83
00:06:06,040 --> 00:06:10,720
अ क्या कहते हैं कि ये

84
00:06:10,720 --> 00:06:15,120
जीव जो शरीर धारण कर रहा है उसमें सिर्फ जीव ही नहीं है। उसमें ईश्वर भी है।

85
00:06:15,120 --> 00:06:19,280
है ना? तो ईश्वर भी शरीर धारण कर रहा है। ईश्वर ने तो पूरे संसार को ही धारण

86
00:06:19,280 --> 00:06:23,520
कर। मतलब मैंने जब शरीर धारण करने की सामर्थ के बारे में पूछा तो इनका

87
00:06:23,520 --> 00:06:27,520
एक उत्तर प्राप्त हुआ कि शरीर तो ईश्वर धारण कर ही

88
00:06:27,520 --> 00:06:31,600
रहा है। हमने कहा मना किया। बस जिस शरीर की तुम बात कर रहे हो वो शरीर धारण

89
00:06:31,600 --> 00:06:35,600
नहीं कर रहा है। तो ठीक है हम अपने प्रश्न को और बढ़ा देते हैं आगे कि

90
00:06:35,600 --> 00:06:37,360
क्या ईश्वर ऐसा शरीर

91
00:06:37,360 --> 00:06:41,360
धारण कर सकता है जो किसी का पुत्र किसी का पिता जिसके साथ व्यवहार किया जा

92
00:06:41,360 --> 00:06:45,360
सके जिसके साथ बातें की जा सके जो किसी के व्यवहार की

93
00:06:45,360 --> 00:06:49,640
सीमा में आ जाए हम जो किसी के प्रेम का विषय बन

94
00:06:49,640 --> 00:06:53,800
जाए है ना ऐसा शरीर धारण कर सकता

95
00:06:53,800 --> 00:06:57,920
है हम तो पहली बात तो यहां से तो

96
00:06:57,920 --> 00:07:02,160
आपकी ये बात खत्म हो गई कि जिस अ सामर्थ्य

97
00:07:02,160 --> 00:07:06,360
का अस्तित्व होगा

98
00:07:06,360 --> 00:07:11,520
केवल। अच्छा मेरा वीडियो अटक रहा है।

99
00:07:11,520 --> 00:07:15,080
वीडियो अटक रहा है

100
00:07:15,080 --> 00:07:21,080
तो क्या ये

101
00:07:28,040 --> 00:07:32,400
क्या अभी वीडियो मेरे ख्याल से नहीं अटक रहा होगा।

102
00:07:32,400 --> 00:07:36,480
दे दो यहां पर। तो दोबारा से

103
00:07:36,480 --> 00:07:40,480
मैं क्लियर कर दूं कि आक्षेप लगाया गया कि सर्वशक्तिमान का

104
00:07:40,480 --> 00:07:45,360
अर्थ यह नहीं है कि उसमें नंबर ऑफ सामर्थ्य

105
00:07:45,360 --> 00:07:50,160
है ना जैसे बल का सामर्थ्य या देखने का सामर्थ्य या एग्जांपल दिया गया।

106
00:07:50,160 --> 00:07:54,480
बल है, फोर्स है। इन सब का जो सामर्थ्य है वह नंबर ऑफ

107
00:07:54,480 --> 00:07:58,480
सामर्थ अनंत है। अनंत सामर्थ्य का अर्थ है

108
00:07:58,480 --> 00:08:02,840
कि जो भी बल का अस्तित्व है वो उसमें अनंत है। यह कहा गया

109
00:08:02,840 --> 00:08:07,120
है। तो सबसे पहली बात तो हम अपनी बात बता दें। यहां पर ही खत्म

110
00:08:07,120 --> 00:08:12,360
हो जाता है कि हम उस सामर्थ्य की बात कर रहे हैं जिस सामर्थ्य का अस्तित्व

111
00:08:12,360 --> 00:08:17,040
है कि कोई अव्यवहारिक है जीव अव्यवहारिक

112
00:08:17,040 --> 00:08:21,040
है वो ऐसा रूप धारण कर रहा है जो किसी दूसरे जीव

113
00:08:21,040 --> 00:08:25,520
के लिए जो किसी के लिए व्यवहारिक हो सके

114
00:08:25,520 --> 00:08:30,240
जो किसी का माता पिता पुत्री पुत्र कहला सके वह ऐसा

115
00:08:30,240 --> 00:08:35,280
शरीर धारण कर रहा है यानी कि इस सामर्थ्य का अस्तित्व है

116
00:08:35,280 --> 00:08:39,440
ठीक ठीक है? तो सबसे पहली बात यहां पर हमारी बात यहीं पर आपकी वो जो

117
00:08:39,440 --> 00:08:43,040
चीज है जो आपने कही है कि सामर्थ्य का जिस सामर्थ का अस्तित्व

118
00:08:43,040 --> 00:08:47,360
होगा उसी को वो करवाने में असक्षम होना चाहिए। तो यहीं पे आपका वो ईश्वर जो है बाधित

119
00:08:47,360 --> 00:08:51,680
हो रहा है। क्योंकि कोई एंटिटी है जो कि शरीर

120
00:08:51,680 --> 00:08:55,760
धारण कर रही है। वो शरीर वाली नहीं है। मगर वो शरीर धारण कर रही है और शरीर

121
00:08:55,760 --> 00:08:59,840
धारण करने के बाद वो ऐसा शरीर धारण कर रही है जो किसी के लिए

122
00:08:59,840 --> 00:09:03,920
व्यवहारिक हो सके बातें कर सके। जो किसी का संबंध में आ सके

123
00:09:03,920 --> 00:09:08,240
ऐसा शरीर धारण कर रही है तो क्या अलंकार समाज

124
00:09:08,240 --> 00:09:12,720
के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर ऐसा शरीर धारण कर सकता है जैसे कि आपने वहां पे

125
00:09:12,720 --> 00:09:18,720
थोड़ा सा शब्दों का हेरफेर कर लिया मेरा वीडियो अभी भी अटक रहा है

126
00:09:18,920 --> 00:09:21,720
क्या

127
00:09:21,720 --> 00:09:25,760
87 मैं एक बार एग्जिट होकर

128
00:09:25,760 --> 00:09:31,760
दोबारा आ जाता हूं

129
00:09:48,080 --> 00:09:54,080
तो अभी मेरा वीडियो ठीक चल रहा है।

130
00:10:31,640 --> 00:10:35,760
जी तो वीडियो अब ठीक चल रहा है ऐसा बताया जा रहा है।

131
00:10:35,760 --> 00:10:36,880
अ एक

132
00:10:36,880 --> 00:10:40,880
काम और कर लूं मैं जरा। है आज का जो

133
00:10:40,880 --> 00:10:44,880
लाइव है इसमें आने से पहले तक मैं कुछ

134
00:10:44,880 --> 00:10:48,880
और कार्य कर रहा था। तो इसलिए बहुत ज्यादा व्यवस्थित रूप से नहीं आ

135
00:10:48,880 --> 00:10:54,880
पाया हूं।

136
00:11:01,640 --> 00:11:05,920
हम तो पहली बात तो यह है कि अलंकार समाज

137
00:11:05,920 --> 00:11:10,080
की ओर से एक प्रश्न उठाया गया कि जिस सामर्थ्य का अस्तित्व

138
00:11:10,080 --> 00:11:14,160
होगा वही कार्य करने में ईश्वर सामर्थ्यवान होना चाहिए।

139
00:11:14,160 --> 00:11:18,400
तो उसका उत्तर यही है कि ऐसा शरीर धारण करने का सामर्थ्य

140
00:11:18,400 --> 00:11:22,480
का अस्तित्व है जो शरीर किसी का पुत्र

141
00:11:22,480 --> 00:11:26,880
पिता इत्यादि कहला सके जो शरीर

142
00:11:26,880 --> 00:11:31,720
किसी के साथ जिसके साथ मनुष्य अपना

143
00:11:31,720 --> 00:11:36,240
जो क्या कहते हैं विचारों का आदान प्रदान कर सके व्यवहारिक

144
00:11:36,240 --> 00:11:40,320
हो सके कुल मिलाकर के वो ऐसा शरीर क्या धारण कर सकता है नहीं

145
00:11:40,320 --> 00:11:44,480
धारण कर सकता तो फिर उसको सर्वशक्तिमान नहीं कहना चाहिए जैसा कि इन्होंने ने कहा कि जिस

146
00:11:44,480 --> 00:11:49,160
सामर्थ्य का अस्तित्व होगा उस सामर्थ्य

147
00:11:49,160 --> 00:11:52,000
को क्या कहते हैं? उस सामर्थ्य

148
00:11:52,000 --> 00:11:56,080
को धारण करने वाला ईश्वर होना चाहिए। तो आपका ईश्वर नहीं है तो आप सर्वशक्तिमान कहना

149
00:11:56,080 --> 00:12:00,080
बंद कर दीजिए। ठीक है? और एक चीज हमने ये भी बताई

150
00:12:00,080 --> 00:12:04,320
कि जब सर्वशक्ति कह रहे हैं तो वहां पर नंबर ऑफ

151
00:12:04,320 --> 00:12:08,480
फोर्सेस की बात नहीं हो रही है। नंबर ऑफ स्ट्रेंथ की बात नहीं हो रही है कि कितनी प्रकार

152
00:12:08,480 --> 00:12:12,760
की स्ट्रेंथ उसमें होनी चाहिए। वहां पर बात हो रही है कि

153
00:12:12,760 --> 00:12:17,120
क्रियाएं किस किस क्रिया को करने की शक्ति है उसमें तो जो भी क्रिया

154
00:12:17,120 --> 00:12:21,360
वह उसको कर पा रहा है कि नहीं ठीक है तो सर्वशक्ति

155
00:12:21,360 --> 00:12:25,360
की बात जब हम करते हैं सर्व सामर्थ्यवान की बात करेंगे तो ठीक है वहां

156
00:12:25,360 --> 00:12:29,440
पर चल जाएगा कि सभी प्रकार के सामर्थ्य जिनका अस्तित्व है वो उसमें होना

157
00:12:29,440 --> 00:12:33,680
चाहिए देखने का सामर्थ्य सुनने का सामर्थ्य वो उसमें होना चाहिए

158
00:12:33,680 --> 00:12:39,680
मगर जब सर्वशक्ति की बात कर रहे हैं तो शक्ति का रिलेशन उससे है

159
00:12:40,320 --> 00:12:44,880
किससे? क्रियाओं से। और क्रियाएं अनंत है।

160
00:12:44,880 --> 00:12:49,240
कुछ भी क्रियाएं हो सकती है वो अनंत है। ठीक

161
00:12:49,240 --> 00:12:53,520
है? अब दूसरी एक बात आती है और अगर

162
00:12:53,520 --> 00:12:57,520
अनंत ना भी हो तब भी आपको ऐसी क्रिया पूछी जा रही है जो

163
00:12:57,520 --> 00:13:01,760
अस्तित्व जिसका है। ठीक है? वो उसमें सीमा में है। मगर

164
00:13:01,760 --> 00:13:05,840
अब यहां पर आपके प्रश्न का उत्तर देने के बाद। अच्छा एक प्रश्न और है आपने वो मूल

165
00:13:05,840 --> 00:13:09,920
में पूछा है कि वो निराकार इन्होंने एक प्रश्न और

166
00:13:09,920 --> 00:13:14,000
है जो इन्होंने पूछा है कि निराकार जो उसका मूल स्वरूप है वो निराकार

167
00:13:14,000 --> 00:13:18,160
से साकार में हो सकता है कि नहीं हालांकि इस प्रकार के जवाब मैं दे चुका हूं

168
00:13:18,160 --> 00:13:22,320
सैकड़ों बार जैसे एक हाइपर क्वेस्ट के में भी पूछा गया कि अगर

169
00:13:22,320 --> 00:13:26,400
वो ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो वो क्या ऐसी मौत मर सकता है जिसके बाद वो पुनः

170
00:13:26,400 --> 00:13:30,400
जीवित ना हो सके तो इन सबका

171
00:13:30,400 --> 00:13:36,200
उत्तर हमने दिया है जो चैनल को ठीक से फॉलो कर रहे हैं उनके पास सबके पास इसका का जवाब

172
00:13:36,200 --> 00:13:40,240
होगा। फिर भी आज उसको भी दिल दे देंगे। मगर

173
00:13:40,240 --> 00:13:44,640
अभी हमने जो यह उत्तर दिया है इसके बाद विचार करने वाली बात है

174
00:13:44,640 --> 00:13:49,960
कि इन भाई साहब का कहना है कि जिस जिसज सामर्थ्य

175
00:13:49,960 --> 00:13:54,320
का अस्तित्व है उस उस

176
00:13:54,320 --> 00:13:55,600
सामर्थ्य का

177
00:13:55,600 --> 00:14:00,160
ईश्वर में होना आवश्यक है। मतलब उस सामर्थ के होने के कारण हम ईश्वर को सर्वशक्तिमान

178
00:14:00,160 --> 00:14:04,480
कहते हैं। और यदि किसी सामर्थ्य का अस्तित्व ही नहीं है यानी कोई तार्किक

179
00:14:04,480 --> 00:14:08,880
रूप से कोई सामर्थ्य है जो सिद्ध ही नहीं हो रहा कि इसका अस्तित्व है तो उसका

180
00:14:08,880 --> 00:14:13,600
जरूर उसका उसमें होना आवश्यक नहीं है ईश्वर में होना

181
00:14:13,600 --> 00:14:19,240
तो अब पहली बात विचार करने की ये आती है कि जब हम कहते हैं कि अनंत

182
00:14:19,240 --> 00:14:23,520
सामर्थ्यवान तो अनंत सामर्थ्यवान हमें ईश्वर को सिद्ध

183
00:14:23,520 --> 00:14:28,000
करने के लिए हमें एक उदाहरण चाहिए होगा। आपका कहने का मतलब यही है कि जिस जिस सामर्थ्य

184
00:14:28,000 --> 00:14:32,080
का उदाहरण है वो सामर्थ्य असीमित रूप से ईश्वर

185
00:14:32,080 --> 00:14:36,840
में व्याप्त है। ठीक है? अब अनंत रूप से सामर्थ्यवान होना भी एक सामर्थ्य

186
00:14:36,840 --> 00:14:41,360
है। तो क्या इस सृष्टि में

187
00:14:41,360 --> 00:14:46,640
अनंत सामर्थ्य का कोई उदाहरण है?

188
00:14:46,640 --> 00:14:50,960
अनंत सामर्थ्य का कोई उदाहरण है? यहां पर आपने अनंत सामर्थवान उसको बिना उदाहरण

189
00:14:50,960 --> 00:14:54,960
के ही माना है। नहीं उदाहरण क्योंकि जब भी आप किसी चीज

190
00:14:54,960 --> 00:14:59,360
को उठा मान लीजिए एक पृथ्वी है या कोई ग्रह है

191
00:14:59,360 --> 00:15:03,600
उसको अगर उसने उठा दिया तो यह सिद्ध होगा कि उसमें उस ग्रह

192
00:15:03,600 --> 00:15:07,920
में जितना वजन है उसको उठाने की सामर्थ है। मगर

193
00:15:07,920 --> 00:15:12,360
जब हम कह रहे हैं अनंत तो यानी कि वह अनंत चीज को उठाने वाला होना

194
00:15:12,360 --> 00:15:16,480
चाहिए। और अनंत चीज यह

195
00:15:16,480 --> 00:15:20,480
जो पैरामीटर है यह आपको कभी मिलेगा ही नहीं उठाने के लिए।

196
00:15:20,480 --> 00:15:24,480
है ना? तो यह तर्क तार्किक

197
00:15:24,480 --> 00:15:28,640
रूप से यह है ही नहीं कि भैया अनंत

198
00:15:28,640 --> 00:15:33,040
का कोई उदाहरण हो। क्योंकि अनंत आपको सिद्ध करने के लिए मिलेगा ही नहीं।

199
00:15:33,040 --> 00:15:37,280
जो मिल गया वो अनंत नहीं है। भाई कहीं से उठाओगे ना हाथ लगाओगे

200
00:15:37,280 --> 00:15:41,360
ना नीचे तो अनंत नहीं है। तो अनंत चीज को उठाने पर ही अनंत

201
00:15:41,360 --> 00:15:45,520
सामर्थ सिद्ध हो सकता है। अगर तर्क की दृष्टि से देखें

202
00:15:45,520 --> 00:15:49,680
मगर आपने यहां तो मान लिया कि उसमें अनंत सामर्थ अनंत सामर्थ्य है।

203
00:15:49,680 --> 00:15:53,920
जबकि उसका उदाहरण इस दुनिया में अस्तित्व

204
00:15:53,920 --> 00:15:57,920
में नहीं है। उसका उदाहरण नहीं है। तो आपने शब्द प्रमाण से ही

205
00:15:57,920 --> 00:16:01,680
माना। अच्छा दूसरी बात यह इन्होंने एक बात और

206
00:16:01,680 --> 00:16:05,320
कही है अपने प्रश्नों में कि

207
00:16:05,320 --> 00:16:09,360
हमने केवल मतलब क्योंकि शास्त्र कहते हैं

208
00:16:09,360 --> 00:16:13,680
इसलिए हमने माना है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है। है ना?

209
00:16:13,680 --> 00:16:17,760
तो केवल शास्त्र नहीं ये जो वो है ना ये जो

210
00:16:17,760 --> 00:16:21,920
ईश्वर के अंदर की जो जीव के अंदर की जो डिजायर है असतो सदम तमस

211
00:16:21,920 --> 00:16:25,920
ज्योति गमया मृत्य गम इससे भी

212
00:16:25,920 --> 00:16:30,000
ईश्वर के सर्वशक्तिमान होने का वह सिद्ध

213
00:16:30,000 --> 00:16:34,000
होता है। वह अभी हम आगे बात कर लेंगे बढ़ते क्रम में। पर पहले क्या है कि

214
00:16:34,000 --> 00:16:38,720
हमने आपको यह बता दिया। आपका कहना यह था कि भैया

215
00:16:38,720 --> 00:16:42,880
जिसज सामर्थ्य का अस्तित्व वही सामर्थ होना चाहिए। तो सबसे पहली बात यही खत्म

216
00:16:42,880 --> 00:16:47,440
हो जाती है कि हमने ऐसा ही सामर्थ्य पूछा है। जीव अव्यवहारिक है।

217
00:16:47,440 --> 00:16:51,600
वो व्यवहार में आ रहा है। वो लोगों के साथ बातें कर रहा है। लोग उसको बातें बता रहे हैं।

218
00:16:51,600 --> 00:16:56,600
वो व्यवहार कर रहा है। तो इस सामर्थ्य का अस्तित्व

219
00:16:56,600 --> 00:17:00,800
है। अब अलंकार समाज का ईश्वर इस सामर्थ्य

220
00:17:00,800 --> 00:17:04,960
से ओतप्रोत है कि नहीं है? यह आपको बताना है। फिर

221
00:17:04,960 --> 00:17:09,780
से वीडियो अटक रहा है। अभी क्या करूं?

222
00:17:09,780 --> 00:17:15,780
[संगीत]

223
00:17:28,400 --> 00:17:32,840
थोड़ा समझने वाली चीजें हैं आज

224
00:17:32,840 --> 00:17:36,880
तो अ आप लोग समझ सकते हैं। अटक रहा

225
00:17:36,880 --> 00:17:40,960
है। अटक रहा है क्या कोई बता दे नहीं अटक रहा

226
00:17:40,960 --> 00:17:46,640
है क्यों कहा जा रहा है फिर अटक रहा है

227
00:17:46,640 --> 00:17:51,280
ठीक है अब नहीं अटक रहा है पे ही चलते हैं तो पहली बात ये हो गई

228
00:17:51,280 --> 00:17:55,360
कि सामर्थ्य का अस्तित्व है वही हमने पूछा है क्या ईश्वर ऐसा व्यवहारिक स्वरूप धारण

229
00:17:55,360 --> 00:17:59,960
कर सकता है दूसरी बात क्या हो गई

230
00:17:59,960 --> 00:18:04,080
कि अ जब हम आगे विचार करते हैं तो हमने ऐसी

231
00:18:04,080 --> 00:18:08,560
कई चीजें मानी है जिसको हमने उदाहरण नहीं लिया है। जैसे कि सबसे पहली बात

232
00:18:08,560 --> 00:18:12,560
हमने बिना उदाहरण के यह माना हुआ है ना ईश्वर सृष्टि बनाता है। क्या किसी

233
00:18:12,560 --> 00:18:16,560
ने उदाहरण दिखाया है क्या हमको सृष्टि बना के? सृष्टि

234
00:18:16,560 --> 00:18:20,960
है मगर किसी ने बनाई है इसका तर्क थोड़ी ना है। उदाहरण थोड़ी ना है। फिर भी हमने दूसरे

235
00:18:20,960 --> 00:18:25,120
कारणों से माना कि ईश्वर सृष्टि बनाता है। ठीक है?

236
00:18:25,120 --> 00:18:29,120
वह बातें अलग है कि वह क्यों बनाता है वह एक अलग चीजें

237
00:18:29,120 --> 00:18:33,120
हैं। मगर कई चीजें ईश्वर में हमने मानी है

238
00:18:33,120 --> 00:18:37,120
जिनका हमारे पास उदाहरण नहीं है। दूसरी बात एक यह

239
00:18:37,120 --> 00:18:41,200
भी है कि

240
00:18:41,200 --> 00:18:45,360
जब आप कहते हैं कि सर्वशक्तिमान का अर्थ यह नहीं है, वह नहीं है

241
00:18:45,360 --> 00:18:49,640
तो इसमें बात आ जाती है प्रमाण की अर्थ

242
00:18:49,640 --> 00:18:53,760
की कि आपके द्वारा जो परिभाषित किया जा रहा है वो अर्थ

243
00:18:53,760 --> 00:18:57,840
क्यों माना जाए? सर्वशक्तिमान का। आपकी परंपरा तो है नहीं

244
00:18:57,840 --> 00:19:01,920
कोई। एक यह भी विचार करने वाली बात है कि आप अगर

245
00:19:01,920 --> 00:19:06,000
किसी किसी चीज को कोट कर रहे हैं तो उसका जो अर्थ हमने माना

246
00:19:06,000 --> 00:19:10,720
है तो हमने वही अर्थ माना है जो हमारी परंपरा से हमें मिला है।

247
00:19:10,720 --> 00:19:14,880
आपके पास कोई परंपरा नहीं है। आप कहते

248
00:19:14,880 --> 00:19:18,960
हो हमारी परंपरा ऋषियों से चलती है। गायब हो जाती है बीच में। आप

249
00:19:18,960 --> 00:19:22,960
अपनी पीछे की पांच पीढ़ियां नहीं बताते हैं। ठीक है?

250
00:19:22,960 --> 00:19:27,040
अब यह बात है कि आप हमारी वो परंपरा पर झूठा होने का आक्षेप लगा

251
00:19:27,040 --> 00:19:31,040
सकते हैं। वो सब एक अलग बात है। मगर पहले आपको अपनी परंपरा बतानी चाहिए। ये

252
00:19:31,040 --> 00:19:35,400
हमारी परंपरा

253
00:19:35,400 --> 00:19:39,840
है। तो एक ये बात हो गई कि जब आप प्रमाण

254
00:19:39,840 --> 00:19:44,000
को लेकर के आते हैं ना कि सर्वशक्तिमान का अर्थ ये नहीं ये है। हमारे अनुरूप मानो

255
00:19:44,000 --> 00:19:48,160
तो उसमें आपको फिर अपने आप को प्रमाणिक सिद्ध करना पड़ेगा। तो प्रमाणिक सिद्ध

256
00:19:48,160 --> 00:19:52,240
आप नहीं होते हैं। तो इसलिए इस तरह के कुतर्क करने से बचा करें। फिर

257
00:19:52,240 --> 00:19:56,680
भी आप जो कुतर्क करेंगे तो हम आपको उसका आंसर देंगे।

258
00:19:56,680 --> 00:20:01,160
और इसके बाद

259
00:20:01,160 --> 00:20:05,920
फिर अब देखिए बात यह है कि

260
00:20:05,920 --> 00:20:10,000
देखिए हमने वो तो बता ही दिया कि ईश्वर जो है

261
00:20:10,000 --> 00:20:14,080
क्या जिसज सामर्थ्य का अस्तित्व है वो सारे सामर्थ उन

262
00:20:14,080 --> 00:20:18,080
सारे कार्यों को करने का सामर्थ्य ईश्वर में है कि नहीं? तो हमने बता

263
00:20:18,080 --> 00:20:22,160
दिया कि हमने ऐसा ही सामर्थ्य दिया है। ऐसा ही क्वेश्चन पूछा है जिस

264
00:20:22,160 --> 00:20:26,480
सामर्थ्य का अस्तित्व है। मगर यदि कोई व्यक्ति ऐसा

265
00:20:26,480 --> 00:20:30,560
कोई कार्य करने की सोच रहा है जो कार्य अब तक हुआ नहीं जिसका तर्क मतलब

266
00:20:30,560 --> 00:20:34,640
जो अभी तक है नहीं जिस किसी ने नहीं किया ऐसा कार्य। पहली बात

267
00:20:34,640 --> 00:20:39,040
तो यह है भाई कि ईश्वर उसी का नाम है कि जो दुनिया

268
00:20:39,040 --> 00:20:43,200
में कोई ना कर सके वही करने वाला ईश्वर है। तो ये जो आप ये बात रख

269
00:20:43,200 --> 00:20:47,280
रहे हो ना कि उसका उदाहरण होना चाहिए। उसका अस्तित्व होना चाहिए। उसका तर्क होना चाहिए। तो

270
00:20:47,280 --> 00:20:50,640
ये अपने आप में एक ऐसी बात है क्योंकि जब आप अस्तित्व

271
00:20:50,640 --> 00:20:55,040
है कि नहीं इसकी इसकी बात करोगे तो प्रमाण की बात आ जाएगी कि कौन-कौन

272
00:20:55,040 --> 00:20:59,120
से सामर्थ्य का अस्तित्व है तो प्रमाण की बात आ जाएगी। तो फिर बात

273
00:20:59,120 --> 00:21:03,200
ये होगी कि हम कह रहे हैं ये है। इसका प्रमाण है। हम

274
00:21:03,200 --> 00:21:07,440
किसी चीज को कोई नाम दे रहे हैं। मगर आप कहोगे कि नहीं ये ऐसे नहीं। आप उस नाम

275
00:21:07,440 --> 00:21:11,520
को स्वीकार नहीं करोगे तो प्रमाणिक प्रमाण की बात हो जाएगी। फिर परंपरा पूछनी पड़ेगी कि

276
00:21:11,520 --> 00:21:15,880
इस शब्द का अर्थ आपने यह कैसे लिया। तो यह तो एक अलग मैटर हो गया।

277
00:21:15,880 --> 00:21:20,200
मगर फिर भी यदि अच्छा एक चीज और

278
00:21:20,200 --> 00:21:24,400
है कि आपने कहा कि जिस सामर्थ्य

279
00:21:24,400 --> 00:21:28,560
का अस्तित्व है वो वो सामर्थ्य ईश्वर में होने चाहिए। अगर

280
00:21:28,560 --> 00:21:32,560
कोई व्यक्ति कल्पना कर रहा है तो कल्पना में किया जाने वाला मतलब उसका अस्तित्व अभी

281
00:21:32,560 --> 00:21:36,800
तक फाउंड नहीं है। मगर वो व्यक्ति कल्पना कर रहा है। ठीक है? कोई

282
00:21:36,800 --> 00:21:40,800
व्यक्ति कल्पना कर रहा है कि ऐसा ऐसासा हो सकता है क्या? क्या ईश्वर ऐसा कर सकता है?

283
00:21:40,800 --> 00:21:44,880
तो वो जो कल्पना कर पा रहा है उसका सामर्थ ईश्वर में नहीं है।

284
00:21:44,880 --> 00:21:49,040
तो यहां पर एक यह भी विचारणीय पॉइंट है। मैं अभी इनको सिद्धांतों

285
00:21:49,040 --> 00:21:53,120
के रूप में नहीं रख रहा हूं। मैंने आपको सिद्धांत तो पहले ही बता दिया मगर अभी मैं विचार

286
00:21:53,120 --> 00:21:57,280
करने योग्य स्थितियां बता रहा हूं कि एक व्यक्ति है जो अपने मन में कुछ कल्पना

287
00:21:57,280 --> 00:22:01,440
कर रहा है। ऐसी क्रिया जो सामान्यतया नहीं देखी गई। अभी

288
00:22:01,440 --> 00:22:06,000
तक प्राप्त नहीं है। उसने वो केवल अभी कल्पना में है।

289
00:22:06,000 --> 00:22:10,760
तो पहली बात तो यह आती है कि जब आपने सर्वज्ञ का अर्थ

290
00:22:10,760 --> 00:22:15,120
लिया तो क्या आपने यह अर्थ लिया कि जिसज तथ्य

291
00:22:15,120 --> 00:22:18,680
का अस्तित्व है

292
00:22:18,680 --> 00:22:23,200
केवल अ उसी को जानने वाला ईश्वर है।

293
00:22:23,200 --> 00:22:27,320
क्या आपने ये अर्थ लिया सर्वज्ञ का?

294
00:22:27,320 --> 00:22:31,520
आपने जब सर्वज्ञ का अर्थ अगर आप यह ले लेंगे तो इसका मतलब

295
00:22:31,520 --> 00:22:35,680
ईश्वर जो है वह जो मनुष्य कल्पना क्या कर रहा है उसको नहीं जानता क्योंकि वो कल्पना

296
00:22:35,680 --> 00:22:39,760
का अस्तित्व तो है नहीं कल्पना में सोची जा रही चीजों का वो कल्पना कर रहा है ये तो ईश्वर

297
00:22:39,760 --> 00:22:43,760
जानेगा मगर कल्पना में वो क्या सोच रहा है क्योंकि उसका अस्तित्व नहीं है वो ईश्वर नहीं

298
00:22:43,760 --> 00:22:47,840
जानेगा मगर वहां पर आप ईश्वर को वो कल्पना वाली चीज को

299
00:22:47,840 --> 00:22:52,640
भी जानने वाला मान लेते हो क्यों भाई नहीं होना चाहिए

300
00:22:52,640 --> 00:22:56,960
मनुष्य अपने मन में जो विचार कर रहा है कल्पना कर रहा है जीव मनुष्य

301
00:22:56,960 --> 00:23:01,040
के रूप में तो उसको जानने वाला ईश्वर नहीं होना चाहिए।

302
00:23:01,040 --> 00:23:05,680
आपकी इस परिभाषा के अनुसार यह सब विचार करने योग्य बिंदु है।

303
00:23:05,680 --> 00:23:09,680
मगर यहां पर आप कहोगे कि नहीं वह जानता है कि वो मन

304
00:23:09,680 --> 00:23:14,480
में क्या सोच रहा है। अंतर्यामी है ना

305
00:23:14,480 --> 00:23:19,200
तो आप यहां पे आपने वो सर्व का अर्थ वो नहीं लिया कि जिस जिसज

306
00:23:19,200 --> 00:23:21,040
तथ्य का अस्तित्व है केवल

307
00:23:21,040 --> 00:23:25,200
उसको जानने वाला ईश्वर है। अगर कोई नया तथ्य अगर कोई व्यक्ति अपने मन में सोच

308
00:23:25,200 --> 00:23:29,360
रहा है तो उसको ईश्वर नहीं जानेगा। ऐसा कहोगे क्या? कह देना यह भी

309
00:23:29,360 --> 00:23:34,800
पता चल जाएगा।

310
00:23:34,800 --> 00:23:39,120
अच्छा फिर अब दूसरी बात यह आती है कि चलो

311
00:23:39,120 --> 00:23:43,600
जब आप यह कहोगे कि कल्पना में सोची जा रही क्रिया

312
00:23:43,600 --> 00:23:47,760
को जानने वाला भी ईश्वर है। ठीक है? सर्वज्ञ तो कल्पना

313
00:23:47,760 --> 00:23:51,920
में ही सही कल्पना में उस क्रिया का अस्तित्व सिद्ध

314
00:23:51,920 --> 00:23:56,240
हो गया ना। कल्पना के अंदर यहां तक तो मानोगे

315
00:23:56,240 --> 00:24:00,240
कि कल्पना के अंदर उस क्रिया का अस्तित्व सिद्ध हो गया। तो

316
00:24:00,240 --> 00:24:04,320
अब सवाल यह आएगा ईश्वर उस कल्पना को जानता भी है क्योंकि वह सर्वज्ञ भी

317
00:24:04,320 --> 00:24:08,320
है। तो क्या ईश्वर उस कल्पना में

318
00:24:08,320 --> 00:24:12,480
उस क्रिया को करने का सामर्थ रखता है? कल्पना में इधर

319
00:24:12,480 --> 00:24:16,480
नहीं रियलिटी में नहीं हमारी रियलिटी उसमें नहीं। वो जो व्यक्ति कल्पना

320
00:24:16,480 --> 00:24:21,040
कर रहा है उसमें क्या वो उस कार्य को करने का सामर्थ रखता है?

321
00:24:21,040 --> 00:24:25,200
तो यदि कल्पना के अंदर करने का सामर्थ रखता है या तो वह जानने वाला हो

322
00:24:25,200 --> 00:24:29,280
ना उस कल्पना को सर्वज्ञ ना हो।

323
00:24:29,280 --> 00:24:33,480
तो

324
00:24:33,480 --> 00:24:38,000
क्या फिर अटक रहा है? हां। तो कल्पना

325
00:24:38,000 --> 00:24:42,400
में क्या वो ईश्वर उसको करने वाला हो सकता है? तो अगर आप कहोगे हां कल्पना

326
00:24:42,400 --> 00:24:46,480
में कर सकता है। रियलिटी में नहीं कर सकता। तो मेरे भाई अविद्या को तो

327
00:24:46,480 --> 00:24:51,200
आपने भी माना है ना। कोई किसी का माता-पिता नहीं है।

328
00:24:51,200 --> 00:24:55,280
कोई किसी का बहन नहीं है। भाई नहीं है। यही रियलिटी है

329
00:24:55,280 --> 00:24:59,280
ना। तो क्या है कि बाकी सब इस ये जो

330
00:24:59,280 --> 00:25:03,680
अविद्या रूपी संसार है इसको जो भी आप जिस तरीके से भी देखते हो

331
00:25:03,680 --> 00:25:07,680
जो अविद्या से बनी हुई चीजें जो हमें मैसेजेस प्राप्त हो रहे हैं इसमें

332
00:25:07,680 --> 00:25:12,000
क्या है कि ईश्वर सारे चमत्कार दिखा रहा है जो नहीं है वही दिखा रहा है

333
00:25:12,000 --> 00:25:16,080
कोई किसी का वो नहीं है इसका अस्तित्व नहीं है ना इस रिश्ते का नहीं है

334
00:25:16,080 --> 00:25:20,080
अस्तित्व अविद्या में है ये सब जो चीज जैसी है वैसी

335
00:25:20,080 --> 00:25:24,240
नहीं दिख रही है मगर हम उसको वैसा समझ रहे हैं जैसा वो नहीं

336
00:25:24,240 --> 00:25:28,480
है अविद्या के कारण ये सब है ना इतना तो सत्य प्रकाश

337
00:25:28,480 --> 00:25:32,560
भी मानती है तो फिर क्या हुआ कि जब

338
00:25:32,560 --> 00:25:36,800
ईश्वर उसको कल्पना में करने वाला सिद्ध हो रहा है तो भाई ये भी अविद्या रूपी संसार ही

339
00:25:36,800 --> 00:25:40,960
है इसमें आप सारे चमत्कार दिखा रहे हो बाकी के मगर एक ईश्वर का अवतार

340
00:25:40,960 --> 00:25:45,040
ही दिखाने में आपको प्रॉब्लम है सारे चमत्कार दिखा

341
00:25:45,040 --> 00:25:48,560
रहे हो कि ईश्वर ने सृष्टि बनाई वो सब कुछ उठा देगा

342
00:25:48,560 --> 00:25:52,560
अविद्या रूपी संसार में अविद्या रूपी संसार के पर्सपेक्टिव से जब

343
00:25:52,560 --> 00:25:56,560
आप देखोगे तो ईश्वर सब कुछ कर रहा है बाकी सब कर रहा है। बस उसको अवतार लेने में

344
00:25:56,560 --> 00:26:01,200
ही दिक्कत हो रही है। आप वो सारी चीजें आप स्वीकार कर रहे हो जिनका अस्तित्व

345
00:26:01,200 --> 00:26:05,360
नहीं है। वो हो रही है। अविद्या रूपी संसार में हो रही है। तो हम भी तो यही कह रहे हैं

346
00:26:05,360 --> 00:26:09,440
जिसमें आप बाकी सब ऐसी चीजों का अस्तित्व मान रहे हो

347
00:26:09,440 --> 00:26:13,600
दिखा रहे हो जिनका अस्तित्व नहीं है या जो जैसा है वैसा नहीं दिख रहा आपकी भाषा में।

348
00:26:13,600 --> 00:26:17,600
तो आप फिर ईश्वर के अवतार को क्यों नहीं मानते हो इस अविद्या रूपी

349
00:26:17,600 --> 00:26:23,600
संसार में? ठीक है?

350
00:26:24,480 --> 00:26:28,640
तो यह हो गई एक बात कि आप

351
00:26:28,640 --> 00:26:32,640
बाकी सब चमत्कार तो मानते हो जीव का कोई भाई बहन नहीं है। कोई

352
00:26:32,640 --> 00:26:37,200
रिश्ता नहीं है। मगर यहां पर उसके रिश्ते नाते आप भौतिक दृष्टि से मानते हो। आध्यात्मिक

353
00:26:37,200 --> 00:26:41,360
दृष्टि से नहीं मानते हो। तो सबसे बड़ी प्रॉब्लम पता है क्या है

354
00:26:41,360 --> 00:26:45,360
कि ऐसा नहीं है कि आर्य समाज और

355
00:26:45,360 --> 00:26:49,480
जो हमारा सिद्धांत है सनातन सिद्धांत

356
00:26:49,480 --> 00:26:53,840
है उसमें बहुत बहुत अंतर है। मतलब बिल्कुल उलटी

357
00:26:53,840 --> 00:26:58,800
ही बोल रहा है। आर्य समाज क्या करता है या जो भी

358
00:26:58,800 --> 00:27:02,800
कई जितने भी तंत्र है जितने भी ऐसे तंत्र है जो धर्माभास

359
00:27:02,800 --> 00:27:06,880
है या सनातनाभास है वो यही करते हैं कि वो कुछ चीजें

360
00:27:06,880 --> 00:27:11,120
तो बोलते हैं जिसमें दोनों पर्सपेक्टिव लेंगे जैसे जीव की जब बात करेंगे तो दोनों पर्पस्पेक्टिव

361
00:27:11,120 --> 00:27:16,080
लेंगे जैसे जीव ने यहां कर्म किया पापी हो गया तो ये भौतिक पर्सपेक्टिव हो गया

362
00:27:16,080 --> 00:27:20,240
ठीक है और एक एक उसका पर्सपेक्टिव वो भी है कि वो वहां जाके ये भोगता

363
00:27:20,240 --> 00:27:24,720
है ये मुक्त होता है ऐसा तो दोनों पर्सपेक्टिव से जीव की बात करेंगे

364
00:27:24,720 --> 00:27:28,720
और ईश्वर की भी बात दोनों पर्सपेक्टिव से करेंगे। जैसे ईश्वर सुनता है, ईश्वर

365
00:27:28,720 --> 00:27:33,040
देख रहा है। ये भौतिक पर्सेक्टिव है। ठीक है?

366
00:27:33,040 --> 00:27:37,120
और वो सर्वव्यापी है, वो एक रस है।

367
00:27:37,120 --> 00:27:40,080
यह उसका आध्यात्मिक पर्सेक्टिव है। मगर

368
00:27:40,080 --> 00:27:44,320
यह क्या करते हैं कि जहां पर इनको सनातन सिद्धांतों को काटना

369
00:27:44,320 --> 00:27:48,800
होता है या परंपरा प्राप्त आचार्यों द्वारा प्राप्त सिद्धांतों को काटना

370
00:27:48,800 --> 00:27:52,800
होता है। वहां पर ईश्वर के विषय में केवल पारमार्थिक

371
00:27:52,800 --> 00:27:57,120
वो ले आते हैं। वहां पर दूसरा वाला पर्सपेक्टिव

372
00:27:57,120 --> 00:28:01,120
छोड़ दिया जाता है। ये मैं अभी समझाऊंगा। थोड़ी जानने वाली बातें हैं

373
00:28:01,120 --> 00:28:06,440
यह सब। आप लोगों को आशा करता हूं कि रुचि आ रही

374
00:28:06,440 --> 00:28:10,960
हो। तो इसको समझना है

375
00:28:10,960 --> 00:28:14,960
कि आप जब सब जब सब जगह आप पर्सेक्टिव दोनों लेकर के चल रहे हो तो

376
00:28:14,960 --> 00:28:20,520
आप कुछ जगह आकर के पर्सेक्टिव छोड़ देते हो। जैसे फॉर एग्जांपल एक उदाहरण

377
00:28:20,520 --> 00:28:24,640
दूं कि शास्त्रों जैसे हमने जो शास्त्र स्वीकार किए आर्य

378
00:28:24,640 --> 00:28:28,880
समाज ने नहीं किए पूरे पूरे तो परंपरा प्राप्त आचार्यों का कहना

379
00:28:28,880 --> 00:28:33,040
है कि ईश्वर पाप क्षमा करता है। अगर

380
00:28:33,040 --> 00:28:37,840
उसकी भक्ति करते तो पाप क्षमा करता है। अलंकार समाज का कहना है

381
00:28:37,840 --> 00:28:41,840
कि ईश्वर पाप क्षमा नहीं करता है। ठीक

382
00:28:41,840 --> 00:28:45,840
है? क्योंकि अगर करेगा तो अन्यायकारी हो जाएगा। अब

383
00:28:45,840 --> 00:28:49,840
इसमें रियलिटी क्या है? किसी ने यह भी बात

384
00:28:49,840 --> 00:28:53,920
सही है कि वह अगर करेगा तो और शास्त्रों में यह भी वचन आया कि भुगतना तो पड़ता ही है।

385
00:28:53,920 --> 00:28:55,200
फिर शास्त्रों में ये भी वचन

386
00:28:55,200 --> 00:28:59,200
आया हमारे शास्त्रों में जिनको हम मानते हैं भैया तो उनमें ये भी वचन आया कि पाप

387
00:28:59,200 --> 00:29:03,200
क्षमा करता है। तो ये क्या है? यह दो पर्सेक्टिव है

388
00:29:03,200 --> 00:29:07,280
जो ईश्वर की भक्ति करने लगता है। जैसे किसी ने एक चींटी मारी

389
00:29:07,280 --> 00:29:11,440
उसको इस चींटी को मारने का कोई फल मिलना है कि उसको एक खरोच आनी है।

390
00:29:11,440 --> 00:29:15,680
ये उसका फल है। चींटी को मारने का फल कि उसको एक खरोच आनी है।

391
00:29:15,680 --> 00:29:19,920
तो यह बात भी सत्य है कि उसको खरोच आएगी ही। उस खरोच

392
00:29:19,920 --> 00:29:23,920
से उसको कोई बचा नहीं सकता है। तो फिर ईश्वर की भक्ति करने से मिलने वाला जो फल

393
00:29:23,920 --> 00:29:27,920
है यह पाप क्षमा हो जाते हैं। उसका क्या? तो उसका यह है कि ईश्वर

394
00:29:27,920 --> 00:29:31,920
की भक्ति करने से यह जो खरोच आएगी ना इससे व्यक्ति को दर्द

395
00:29:31,920 --> 00:29:36,320
नहीं होगा। एहसास नहीं होगा। उसका जो कनेक्शन

396
00:29:36,320 --> 00:29:40,480
है इस भौतिक जगत से इतना ज्यादा डिटच होता जाएगा भक्ति करने के कारण

397
00:29:40,480 --> 00:29:44,640
कि उसको इससे मिलने वाला जो दुख है वो नहीं होगा। तो दुख

398
00:29:44,640 --> 00:29:48,800
नहीं मिला तो इसलिए अपराध क्षमा पाप क्षमा

399
00:29:48,800 --> 00:29:52,800
और क्योंकि वो भौतिक रूप से वो क्रिया तो हुई जो फल स्वरूप होनी थी। तो

400
00:29:52,800 --> 00:29:56,800
भैया दंड तो मिलके रहा। भुगतना तो पड़ा ही उसको।

401
00:29:56,800 --> 00:30:01,120
जैसे कि कई लोगों ने देखा होगा मुझे नहीं पता है अगर कोई नाम जप कर रहा होगा बहुत

402
00:30:01,120 --> 00:30:05,200
टाइम से तो उसके जीवन से कई चीजें विरक्त विरक्ति सी आ

403
00:30:05,200 --> 00:30:09,280
रही होगी। जैसे उसका फिल्में देखना कम हो गया होगा। अगर पहले ज्यादा देखता होगा उसका

404
00:30:09,280 --> 00:30:10,240
कपड़े खरीदना

405
00:30:10,240 --> 00:30:14,240
कम हो गया होगा। अगर पहले ज्यादा खरीदता होगा उसका ध्यान जो भौतिकवाद

406
00:30:14,240 --> 00:30:18,320
से उसका हट रहा होगा। अब जैसे मान लीजिए काफी समय पहले

407
00:30:18,320 --> 00:30:23,000
उसने ऐसा किया था कि

408
00:30:23,000 --> 00:30:27,200
उसने किसी के कपड़े चुराए तो उसका कपड़े चुराने

409
00:30:27,200 --> 00:30:31,440
का उसका फल था ईश्वर का विधान था कि एक दिन ऐसा आएगा

410
00:30:31,440 --> 00:30:35,520
जब उसके पास कपड़ों की कमी हो जाएगी या उसके भी कपड़े कोई चुरा लेगा या

411
00:30:35,520 --> 00:30:40,000
उसको इस कपड़ों का अभाव जो है वो देखना पड़ेगा ठीक है

412
00:30:40,000 --> 00:30:44,080
मेरी बात ले लीजिए मैं आज ये सब कपड़े पहन रहा हूं जो कोशिश कर रहा हूं

413
00:30:44,080 --> 00:30:48,160
अपने पारंपरिक बेशभूषा में अधिक से अधिक रहूं। मेरा भी था

414
00:30:48,160 --> 00:30:52,240
भैया मुझे जींस लेनी है। वो फलानी फलानी इंपोर्टेड

415
00:30:52,240 --> 00:30:56,400
कंपनियों की जींस खरीदनी है। लेस लिविस की खरीदनी है और वो रेंगलर

416
00:30:56,400 --> 00:31:00,400
की खरीदनी है। ये सब था और सब मान लीजिए कि मैंने

417
00:31:00,400 --> 00:31:04,480
भी ऐसा किया कि मैंने किसी का

418
00:31:04,480 --> 00:31:08,640
कपड़ा लेकर के चुरा लिया या कुछ उसके साथ अन्याय कर दिया। जिसका फल ये था

419
00:31:08,640 --> 00:31:12,640
कि मेरे जीवन से वो जो खर्चीले कपड़े

420
00:31:12,640 --> 00:31:16,400
थे वो जाने थे।

421
00:31:16,400 --> 00:31:20,640
ठीक है। अभी क्या हुआ कि मैं भक्ति में आया।

422
00:31:20,640 --> 00:31:24,720
चार पांच साल हुए श्री राम की धुन लग गई।

423
00:31:24,720 --> 00:31:28,720
आज मेरे पास उन कपड़ों की कमी है। जिन कपड़ों के लिए मारा

424
00:31:28,720 --> 00:31:32,800
मारा फिरता था। मगर वो जो कमी है मुझे खल नहीं

425
00:31:32,800 --> 00:31:36,880
रही। तो मुझे पापों से क्षमा किया भगवान ने और

426
00:31:36,880 --> 00:31:40,880
मुझे भोगना तो पड़ा। तो दोनों दृष्टि है। अब बात ये है कि भोगना कैसे

427
00:31:40,880 --> 00:31:44,880
पड़ा और क्षमा कैसे किया? तो इसमें दोनों पर्सपेक्टिव

428
00:31:44,880 --> 00:31:48,880
है। अगर इस तरफ से देख कि हमने भगवान की भक्ति की और मुझे कोई

429
00:31:48,880 --> 00:31:53,360
कष्ट नहीं हुआ तो मैं तो यही कहूंगा मुझे भगवान ने अपनी शरण में ले लिया। मुझे जो है

430
00:31:53,360 --> 00:31:57,440
वो नहीं मिला। तो एक ये पर्सपेक्टिव है।

431
00:31:57,440 --> 00:32:01,520
मुझे दंड नहीं मिला। तो क्या होता है कि अच्छा ईश्वर ने दंड दिया

432
00:32:01,520 --> 00:32:05,680
मुझे। ये कौन सा पर्सपेक्टिव है? ये पारमार्थिक पर्सेक्टिव है।

433
00:32:05,680 --> 00:32:10,400
उसने दंड तो दिया ही है मुझे। तो अब क्या हुआ कि

434
00:32:10,400 --> 00:32:14,480
इन्होंने क्या किया? केवल पारमार्थिक पर्सपेक्टिव को पकड़ा और इसको नकार दिया।

435
00:32:14,480 --> 00:32:18,560
आप अगर इतना भी करोगे केवल पारमार्थिक पर्सेक्टिव को ही रखो और बाकी

436
00:32:18,560 --> 00:32:22,880
कुछ मत बोलो तो भी ठीक है। मगर आप क्या करते हो कि इस व्यवहारिक पर्सपेक्टिव को

437
00:32:22,880 --> 00:32:26,880
मना कर देते हो। ऐसा करने से ईश्वर आपका

438
00:32:26,880 --> 00:32:31,680
जो ईश्वर होगा वो अंतिम रूप से सिद्ध ही नहीं होगा।

439
00:32:31,680 --> 00:32:36,720
जो मनुष्य है उसकी चाह का विषय है। ठीक है?

440
00:32:36,720 --> 00:32:41,200
अगर कोई सच्चिदानंद है इस दुनिया में और यदि वह सच्चिदानंद

441
00:32:41,200 --> 00:32:45,600
हमें प्राप्त नहीं हो सकता तो हमें उससे क्या मतलब? कोई एलन मस्क है

442
00:32:45,600 --> 00:32:49,760
और उससे वो हमें प्राप्त नहीं हो सकता तो हमें उससे क्या मतलब? हमें हमारे अंदर उसके

443
00:32:49,760 --> 00:32:55,320
प्रति आकर्षण क्यों आएगा? कोई आकर्षण नहीं

444
00:32:55,320 --> 00:32:59,360
आएगा। तो ये बात हो गई एक कि

445
00:32:59,360 --> 00:33:03,600
आप क्या करते हैं कि कई जगहों पर दोनों पर्सपेक्टिव

446
00:33:03,600 --> 00:33:07,680
रखते चलेंगे। रखते चलेंगे। फिर कहीं-कहीं पर अपनी बात को बड़ा रखने के लिए केवल

447
00:33:07,680 --> 00:33:12,080
एक पर्सपेक्टिव रखेंगे कि नहीं भाई ईश्वर तो दंड देके रहता है। वो अन्यायकारी

448
00:33:12,080 --> 00:33:16,160
हो जाएगा। फिर ये भक्ति वाला पर्सेक्टिव छूट जाएगा व्यवहारिक वाला। इसको मना कर देंगे।

449
00:33:16,160 --> 00:33:20,920
नहीं पाप क्षमा नहीं करता। ये दिक्कत है। इसकी वजह से दूरियां

450
00:33:20,920 --> 00:33:24,960
है। जैसे हां सही बात है। ईश्वर अपने

451
00:33:24,960 --> 00:33:29,000
मूल जो स्वरूप है जो उसका व्यवहार में ना आ सकने वाला स्वरूप है वो

452
00:33:29,000 --> 00:33:33,200
उसको बदल नहीं सकता। मगर यह पारमार्थिक पर्सपेक्टिव

453
00:33:33,200 --> 00:33:37,440
है। व्यवहारिक पर्सपेक्टिव नहीं है। व्यवहारिक

454
00:33:37,440 --> 00:33:41,520
पर्सपेक्टिव है कि वह अपना रूप बदल सकता है। वो निराकार होते हुए

455
00:33:41,520 --> 00:33:45,680
साकार हो सकता है। वो अवतार ले सकता है। यह व्यवहारिक पर्सपेक्टिव है।

456
00:33:45,680 --> 00:33:46,800
मगर आप ईश्वर को

457
00:33:46,800 --> 00:33:50,800
देखने वाला, सुनने वाला, शक्ति प्रकट करने वाला ये सब

458
00:33:50,800 --> 00:33:54,800
तो मानोगे। वही ईश्वर सर्व्यापक है ना तो किसी एक देश काल परिस्थिति में

459
00:33:54,800 --> 00:33:58,800
शक्ति क्यों प्रकट हो रही है? वही

460
00:33:58,800 --> 00:34:02,800
ईश्वर सर्वव्यापक है। तो विचरण कहां कर रहा है? ईश्वर विचरण करता है गर्भ के मध्य

461
00:34:02,800 --> 00:34:06,960
में। ये सब क्यों आ रहे हैं? तो ये किस ईश्वर ने ईश्वर

462
00:34:06,960 --> 00:34:10,960
के पर्सपेक्टिव है। एक व्यवहार में ना आ

463
00:34:10,960 --> 00:34:15,440
सकने वाला पर्सपेक्टिव है। परमार्थ फिर व्यवहार में आ सकने वाले पर्सपेक्टिव

464
00:34:15,440 --> 00:34:20,400
शुरू होते हैं। व्यवहार। ठीक है?

465
00:34:20,400 --> 00:34:24,400
अन्यथा ईश्वर कुछ भी करने वाला वो सिद्ध ही नहीं होगा। ईश्वर विचरण

466
00:34:24,400 --> 00:34:28,560
कहां कर रहा है? जब वो सर्व्यापक है। कहां विचरता है ईश्वर? हां।

467
00:34:28,560 --> 00:34:32,640
तो यहां पर सगुण ईश्वर माना जाएगा ना। एक जगह से दूसरी जगह कौन

468
00:34:32,640 --> 00:34:37,520
जाएगा? जब उससे रिक्त स्थान दुनिया में होगा तभी तो चलेगा।

469
00:34:37,520 --> 00:34:41,520
तो सर्व्यापकता का दोष सर्व्यापक व्यापकता के कारण तो उसको

470
00:34:41,520 --> 00:34:47,520
विचरने वाला भी सिद्ध नहीं कर सकते।

471
00:34:48,680 --> 00:34:54,680
तो यही दिक्कत है कि

472
00:34:55,600 --> 00:34:59,600
यही दिक्कत है कि ईश्वर कुछ भी करने वाला सिद्ध ही तब

473
00:34:59,600 --> 00:35:04,000
होगा जब आप उसके पर्सेक्टिव से अलग-अलग पर्सपेक्टिव से देखेंगे।

474
00:35:04,000 --> 00:35:08,680
तभी सिद्ध होगा। नहीं तो एक रस ईश्वर है। कहीं भी हिलेगा। सब जगह

475
00:35:08,680 --> 00:35:12,720
हिलेगा। यानी वो निर्गुण से सगुण होगा। अब निर्गुण

476
00:35:12,720 --> 00:35:17,520
से सगुण होगा तो क्या वो निर्गुण में बदल जाएगा? बदलाव हो जाएगा निर्गुण में नहीं।

477
00:35:17,520 --> 00:35:21,840
वो एक और रूप लेगा। दूसरा रूप लेगा। उसका निर्गुण

478
00:35:21,840 --> 00:35:26,000
रूप वैसा का वैसा ही रहेगा। वो एक रस रहेगा। ऐसा

479
00:35:26,000 --> 00:35:30,160
नहीं है कि उसी में उसने चेंजेस कर दिए। सगुण रूप लेगा

480
00:35:30,160 --> 00:35:35,560
तब वो क्रियात्मक

481
00:35:35,560 --> 00:35:41,560
होगा। और चलते हैं। अब इनका एक

482
00:35:42,280 --> 00:35:46,320
आया कि ईश्वर हां ईश्वर

483
00:35:46,320 --> 00:35:50,560
का उदाहरण होना चाहिए। तो मैंने बता दिया कि भैया ईश्वर उसी का नाम है एट द एंड जिसका

484
00:35:50,560 --> 00:35:55,840
उदाहरण नहीं है वही ईश्वर है। ये समझ लो आप।

485
00:35:55,840 --> 00:35:59,840
ठीक है? अब बात एक आती है ईश्वर पापी भी

486
00:35:59,840 --> 00:36:03,840
हो सकता है। मूर्ख दिख सकता है। अच्छा पहली

487
00:36:03,840 --> 00:36:07,920
बात तो यह है कि आपने कहा था सामर्थ तो पापी दिखने का

488
00:36:07,920 --> 00:36:12,000
सामर्थ है ना इस दुनिया में कि कोई पापी दिख रहा है किसी को देखिए

489
00:36:12,000 --> 00:36:16,000
पहले पहले एक बात समझ लीजिए ईश्वर का जो अवतार

490
00:36:16,000 --> 00:36:20,160
है वो उतना ही सत्य है जितना कि कोई जीव

491
00:36:20,160 --> 00:36:24,160
मनुष्य के रूप में सत्य है मनुष्य है किसी का बेटा है किसी

492
00:36:24,160 --> 00:36:28,160
का पुत्र है व्यवहारिक जगत इस पर्सपेक्टिव से ईश्वर

493
00:36:28,160 --> 00:36:32,160
का अवतार है और अगर जीव किसी का पिता नहीं है

494
00:36:32,160 --> 00:36:36,760
किसी का पुत्र नहीं है वहां के लिए आप कह सकते हो कि नहीं वहां पे अवतार नहीं

495
00:36:36,760 --> 00:36:40,880
ईश्वर पहले इस बात को समझिए अगर जीव व्यवहारिक

496
00:36:40,880 --> 00:36:45,120
हो रहा है तो ईश्वर भी व्यवहारिक हो रहा है उसी अविद्या रूपी जगत बस

497
00:36:45,120 --> 00:36:49,200
जीव बंधा हुआ है वो अपनी आइडेंटिटी नहीं जान पा रहा है और ईश्वर

498
00:36:49,200 --> 00:36:51,920
वो है जो जानता है

499
00:36:51,920 --> 00:36:57,160
ठीक है

500
00:36:57,160 --> 00:37:01,680
और अब बात ये आती है कि इन्होंने मैंने

501
00:37:01,680 --> 00:37:05,840
ये कहा है अपने वीडियोस में कि भाई ईश्वर क्या उसमें नहीं है उसमें नहीं है अवतार अवतार

502
00:37:05,840 --> 00:37:09,840
लेने के पहले ईश्वर में क्या कमी रहती है? वह अवतार लेके उसमें

503
00:37:09,840 --> 00:37:13,840
शक्ति का संचार होता है। नहीं देखिए यह बहुत ही

504
00:37:13,840 --> 00:37:18,000
लो लेवल की बातें हैं। आप देखिए मैं अभी बता दूंगा तो

505
00:37:18,000 --> 00:37:22,000
आपका अगला प्रश्न आएगा। इसलिए इन सब बातों को आप सामने से

506
00:37:22,000 --> 00:37:26,320
किया करिए। ईश्वर को सृष्टि बनाने से पहले क्या कमी रहती है?

507
00:37:26,320 --> 00:37:30,320
अच्छा ईश्वर ने कुछ ऐसे कीड़े बनाए हैं जिसका कोई उपयोग नहीं हो

508
00:37:30,320 --> 00:37:35,680
रहा है। दुनिया में ऐसे कीड़े होंगे ना जिसका कोई उपयोग नहीं हो रहा है। क्यों बनाए वह कीड़े?

509
00:37:35,680 --> 00:37:39,760
क्यों बनाए वो कीड़े? धरती में कुछ ऐसा जगह होगी जिसका

510
00:37:39,760 --> 00:37:43,920
कोई कोई तो ऐसा कण होगा दुनिया का जिसका कोई उपयोग नहीं हो रहा है। क्यों क्यों बनाया?

511
00:37:43,920 --> 00:37:48,000
उसकी मर्जी उसको ऐसा ही बनाना था। बना दिया उसने।

512
00:37:48,000 --> 00:37:52,000
ईश्वर बिना किसी प्रयोजन के सृष्टि का निर्माण करते हैं। उनका कोई हेतु नहीं होता

513
00:37:52,000 --> 00:37:56,640
है। अगर हेतु है तो बौद्धों को मान लो।

514
00:37:56,640 --> 00:38:00,640
सच्चिदानंद नहीं कहलाएंगे ईश्वर। कुछ कमी

515
00:38:00,640 --> 00:38:04,640
थी जो उन्हें सृष्टि बनानी पड़ी। वो बिना किसी प्रयोजन

516
00:38:04,640 --> 00:38:07,200
के बनाते हैं। यह उनके सामर्थ्य का स्वरूप

517
00:38:07,200 --> 00:38:11,440
भूत ये उनका स्वरूप भूत लक्षण है।

518
00:38:11,440 --> 00:38:15,600
सामर्थ मात्र है। आंख है तो वो देखती है। सिंपल कोई

519
00:38:15,600 --> 00:38:19,600
हेतु नहीं है। तो ऐसे ही

520
00:38:19,600 --> 00:38:23,600
भगवान ये सब भगवान के सामर्थ्य ही है कि वो कभी कोई कार्य

521
00:38:23,600 --> 00:38:27,920
अवतार लेकर के कर रहे हैं और कोई कार्य बिना अवतार के भी कर रहे हैं।

522
00:38:27,920 --> 00:38:32,160
और अवतार लेने से जैसे फिर व्यवहारिकता में देखें

523
00:38:32,160 --> 00:38:36,240
कि वह चाहे तो अपने मन में संकल्प करें और सबके मन में उनका ज्ञान आ

524
00:38:36,240 --> 00:38:40,240
जाए और सब लोग उस ज्ञान का पालन करने लग जाए जो वेद के मंत्र हैं सबके मन में

525
00:38:40,240 --> 00:38:44,400
प्रकाशित हो जाए मगर उनको एक ये जो लीलात्मक रूप से

526
00:38:44,400 --> 00:38:48,400
सृष्टि का वो करना है लीलात्मक रूप से जैसे हम

527
00:38:48,400 --> 00:38:52,480
जबरदस्ती स्वयं को वो दे रहे हैं कई बार हम लोग

528
00:38:52,480 --> 00:38:57,840
जबरदस्ती स्वयं को टास्क देते हैं ऐसे ही

529
00:38:57,840 --> 00:39:01,840
इस संसार के रूप में चलने के लिए उन्होंने डायरेक्ट यह सब नहीं किया कि सबको

530
00:39:01,840 --> 00:39:06,240
बस केवल मन में संकल्प लिया और सबको सब हो गया। वह तो सबके अंदर थे।

531
00:39:06,240 --> 00:39:11,240
उन्होंने संकल्प मात्र सबको वैदिक मंत्र दे

532
00:39:11,240 --> 00:39:17,240
देते।

533
00:39:17,400 --> 00:39:21,440
तो उन्होंने वैदिक मंत्र के रूप में मंत्र के रूप में

534
00:39:21,440 --> 00:39:25,680
व्यवहारिक चीज के रूप में वो आपको दिया जिसका व्यवहार हो सके। जगत

535
00:39:25,680 --> 00:39:29,840
का नाम ही है व्यवहार। तो जिस ऐसे रूप में उन्होंने अपना ज्ञान

536
00:39:29,840 --> 00:39:34,080
दिया जिसका जिसके साथ व्यवहार किया जा सके। इसी

537
00:39:34,080 --> 00:39:38,160
तरीके से वो अपना एक रूप ऐसा लेते हैं जिसके साथ व्यवहार किया जा सके।

538
00:39:38,160 --> 00:39:42,480
बाकी सब जगह आप मानेंगे। मगर एक इस जगह क्योंकि

539
00:39:42,480 --> 00:39:46,640
विरोध करना है। ईश्वर को बाधित सिद्ध करना है इसलिए

540
00:39:46,640 --> 00:39:50,640
नहीं मानेंगे। बाकी सब जगह आप मानेंगे कि ईश्वर

541
00:39:50,640 --> 00:39:54,880
ने ये बिना किसी वजह के ही किया। अहंकार क्यों लगा दिए भाई? समझ

542
00:39:54,880 --> 00:39:59,040
में नहीं आ रहे व्यक्ति के अलंकार

543
00:39:59,040 --> 00:40:03,600
आपके हिसाब से वेद के मंत्रों में अलंकार लगा दिए क्यों लगाए

544
00:40:03,600 --> 00:40:07,680
अच्छा कहो कि उनकी आवश्यकता थी तो हर एक मंत्र में क्यों नहीं लगाया ये दिक्कत आ

545
00:40:07,680 --> 00:40:11,760
जाएगी तो फिर आपको कहना पड़ेगा कि भाई उसने यूं ही लगाए उसका

546
00:40:11,760 --> 00:40:16,000
मन था तो उसने जो सृष्टि बनाई है उसने बिना किसी प्रयोजन

547
00:40:16,000 --> 00:40:20,160
के बनाई है उसमें जो जो सारी चीजें जो भी वो कर रहा है बिना

548
00:40:20,160 --> 00:40:24,760
किसी प्रयोजन के किया उसने श्वेता शत्रु निश में लिखा भी

549
00:40:24,760 --> 00:40:26,240
है और

550
00:40:26,240 --> 00:40:30,320
अगर आप यह आरोप लगा देंगे उसके ऊपर कि नहीं उसका कोई प्रयोजन था

551
00:40:30,320 --> 00:40:36,320
तो वह सच्चिदानंद नहीं रह जाएगा आवश्यकता थी

552
00:40:37,720 --> 00:40:41,720
उसको हम अब आगे चलते

553
00:40:41,720 --> 00:40:45,920
हैं कि ईश्वर पापी

554
00:40:45,920 --> 00:40:50,080
तो पहली बात तो इन्होंने कुतर्क किया जब मैंने एक तर्क दिया था कि भाई

555
00:40:50,080 --> 00:40:54,160
क्या ईश्वर पापी हो सकता है तो इन्होंने बताया आया कि

556
00:40:54,160 --> 00:40:58,240
ईश्वर पापी हो सकता है मैंने उसमें तर्क दिया कि भाई रावण

557
00:40:58,240 --> 00:41:02,240
के अंदर ईश्वर नहीं है तो रावण रावण के अंदर भी जब ईश्वर है तो रावण ये कर रहा है

558
00:41:02,240 --> 00:41:06,280
तो फिर वो वो चीज उसमें उसको पापी भी कहा जा सकता

559
00:41:06,280 --> 00:41:11,600
है तो पहली बात यह है कि जैसे

560
00:41:11,600 --> 00:41:15,680
इन्होंने फिर वहां पर एक तर्क दिया है कि भाई यह तो ऐसे है जैसे कार में अगर

561
00:41:15,680 --> 00:41:19,840
आदमी व्यक्ति कोई बैठा है तो वह कार क्योंकि जड़ है तो व्यक्ति

562
00:41:19,840 --> 00:41:23,840
भी जड़ है मेरे भाई मैंने जो स्वरूप भूत

563
00:41:23,840 --> 00:41:28,400
लक्षण है ना उनसे तुलना नहीं की है।

564
00:41:28,400 --> 00:41:32,640
स्वरूप भूत लक्षणों से तुलना नहीं की है। मैंने क्रिया से तुलना की है। क्रिया से

565
00:41:32,640 --> 00:41:36,720
बताता हूं कैसी क्रिया। अगर कार में कोई ड्राइवर है

566
00:41:36,720 --> 00:41:40,840
और कार कहीं पहुंच रही है तो क्या वो व्यक्ति नहीं पहुंच रहा

567
00:41:40,840 --> 00:41:41,840
है?

568
00:41:41,840 --> 00:41:45,920
क्या वो कार उस व्यक्ति के बिना चल रही है? है

569
00:41:45,920 --> 00:41:49,920
ना? तो उस कार के कहीं पहुंचने का कारण उस व्यक्ति को जो उसमें

570
00:41:49,920 --> 00:41:54,000
बैठा है माना जाएगा ना? मैंने इस चीज की तुलना की तो ठीक उसी प्रकार

571
00:41:54,000 --> 00:41:58,080
से यदि ईश्वर कहीं पर है और उसका तुमने माना कि उसके अंदर

572
00:41:58,080 --> 00:42:02,240
बल है सर्व सामर्थ्य है और

573
00:42:02,240 --> 00:42:06,400
वहां पर कोई कत्ल हो रहा है या कोई ऐसा

574
00:42:06,400 --> 00:42:10,560
दुराचार हो रहा है तो उस दुराचार का भी

575
00:42:10,560 --> 00:42:14,560
मूल कारण उसको माना जाएगा क्योंकि ईश्वर वहां पर है

576
00:42:14,560 --> 00:42:19,560
उसके अंदर सामर्थ्य है उसको रोकने का तो ये आरोप आपके ईश्वर पर

577
00:42:19,560 --> 00:42:23,680
लगेगा और तो और वो हटा दो। कोई नवजात शिशु

578
00:42:23,680 --> 00:42:27,760
अभी अभी जन्मा है। कुछ नहीं किया उसने। प्रलय

579
00:42:27,760 --> 00:42:32,160
आ गई। मृत्यु को प्राप्त हो गया वो।

580
00:42:32,160 --> 00:42:37,480
तो फिर उसका दोष किसको दोगे?

581
00:42:37,480 --> 00:42:41,520
हम तो अब ये बात आएगी यहां पर ये लोग अब यहां पर ये

582
00:42:41,520 --> 00:42:45,640
वो बात भूल जाएंगे कि

583
00:42:45,640 --> 00:42:49,920
भाई जिसज चीज का सामर्थ्य है वो जो है ईश्वर में होना चाहिए। अब ये वाला सामर्थ

584
00:42:49,920 --> 00:42:54,560
पाप पापी के रूप में दिखने का सामर्थ है कि नहीं है?

585
00:42:54,560 --> 00:42:56,880
अस्तित्व है ना तो इससे जी चुराएंगे। अब

586
00:42:56,880 --> 00:43:00,960
बात क्या है? फैक्ट ये है कि यहां पर अब ये वेदों का प्रमाण ले आएंगे या

587
00:43:00,960 --> 00:43:04,960
शास्त्रों का प्रमाण ले आएंगे कि जो वो है जीव है वो बद्ध होता है। वो कर्मों

588
00:43:04,960 --> 00:43:08,960
से बद्ध होता है। इसलिए उस पर दोष लगता है और ईश्वर जो है मुक्त होता है।

589
00:43:08,960 --> 00:43:13,360
उस पर दोष नहीं लगता। ये तो हम भी कह रहे हैं। मगर ये पर्सपेक्टिव कौन सा है? ये परमार्थ

590
00:43:13,360 --> 00:43:17,360
का यहां पे तुरंत ये लोग क्या करते हैं? विरोध करने के

591
00:43:17,360 --> 00:43:21,440
लिए सर्वशक्तिमान ईश्वर का अनेकानेक जगह सब जगह दो

592
00:43:21,440 --> 00:43:25,600
परेक्ट दोनों पर्सेक्टिव ले चलेंगे व्यवहार और परमार्थ व्यवहार परमार्थ

593
00:43:25,600 --> 00:43:29,680
कहीं कहीं पर ये विरोध करने के लिए सनातन ईश्वर का सर्वशक्तिमान ईश्वर

594
00:43:29,680 --> 00:43:33,920
का वहां पर व्यवहारिक वो जो पर्सेक्टिव है छोड़ के सिर्फ पारमार्थिक

595
00:43:33,920 --> 00:43:38,440
पर्सेक्टिव की बात करेंगे जैसे यहां पर

596
00:43:38,440 --> 00:43:42,480
अब इन्होंने कहा कि भाई वो ईश्वर के

597
00:43:42,480 --> 00:43:46,480
साथ ऐसा है वैसा है या उसने कर्म किए होते हैं इसलिए ईश्वर उनके के साथ जैसे

598
00:43:46,480 --> 00:43:52,320
की फॉर एग्जांपल एक बात करें

599
00:43:52,320 --> 00:43:56,640
ईश्वर ने चार ऋषियों के अंतःकरण में वेदों की प्रेरणा

600
00:43:56,640 --> 00:44:00,880
वेदों का ज्ञान दिया प्रकट किया क्यों

601
00:44:00,880 --> 00:44:04,880
क्यों किया और अब क्यों नहीं कर रहा है भाई इनका कहना है ना

602
00:44:04,880 --> 00:44:09,240
कि निर्भया को बचाने क्यों नहीं आया जब द्रोपदी को बचाने आया

603
00:44:09,240 --> 00:44:13,920
ठीक तो जिनको उन्होंने ज्ञान दिया

604
00:44:13,920 --> 00:44:17,920
क्यों दिया उन्होंने कौन से कर्म कर दिए

605
00:44:17,920 --> 00:44:22,160
थे? भाई कर्म तो तभी करेंगे ना जब उन्हें पता चले। तो वेदों का ज्ञान उनको

606
00:44:22,160 --> 00:44:26,400
कैसे हुआ? तो यह मानना पड़ेगा, कहना पड़ेगा कि उन्होंने पूर्व जन्म में पिछली

607
00:44:26,400 --> 00:44:30,560
जो कल्प था उसमें कुछ ऐसा हुआ कि जिसके कारण उनको

608
00:44:30,560 --> 00:44:34,640
ये रूप मिला और उन्हीं को उन्होंने प्रेरित किया। उन्होंने उस जन्म में आकर के ऐसा

609
00:44:34,640 --> 00:44:38,640
कुछ नहीं कर दिया था। उन्होंने वेदों पर नहीं चल दिए। इवन जनेऊ तक नहीं हुआ

610
00:44:38,640 --> 00:44:42,960
था। यज्ञ पवित नहीं हुआ था ना। इस पर फिर

611
00:44:42,960 --> 00:44:47,360
आगे बात आएगी। तो क्यों किया और फिर अब क्यों नहीं कर रहा है?

612
00:44:47,360 --> 00:44:51,600
अब अंतकरण में प्रेरणा तो इसमें क्या होगा? हमें

613
00:44:51,600 --> 00:44:55,760
यह मानना पड़ेगा कि कुछ पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण उनको

614
00:44:55,760 --> 00:44:59,840
ये इस कल्प में ये चार ऋषियों का रूप मिला और उसके उनके

615
00:44:59,840 --> 00:45:04,240
अंदर उन्होंने अपनी विधि के अनुसार अंतःकरण में

616
00:45:04,240 --> 00:45:07,520
प्रेरणा से भाषित किया। तो क्या हुआ यहां पे?

617
00:45:07,520 --> 00:45:12,080
यह जो कारण है ना यह आध्यात्मिक कारण है। पारमार्थिक कारण है

618
00:45:12,080 --> 00:45:16,160
कि हम ईश्वर पर दोष नहीं दे रहे। मगर यह तब है

619
00:45:16,160 --> 00:45:20,440
जब हम ईश्वर को ईश्वर मान चुके हो। कि जैसे कहीं

620
00:45:20,440 --> 00:45:24,960
पर कहीं पर वो हुआ कोई दुराचार

621
00:45:24,960 --> 00:45:29,240
हुआ, किसी का किसी की हत्या हुई या किसी का कुछ भी हुआ।

622
00:45:29,240 --> 00:45:33,520
तो इसका जो कारण है हमने ईश्वर

623
00:45:33,520 --> 00:45:37,760
को नहीं माना। इस हत्या का कारण हमने इस हत्या का दोष

624
00:45:37,760 --> 00:45:42,080
इस हत्या के अनुसार ईश्वर को हमने पापी नहीं कहा। क्यों नहीं कहा? क्योंकि हम उसे आध्यात्मिक

625
00:45:42,080 --> 00:45:46,400
रूप से जान रहे हैं। आध्यात्मिक रूप से। मगर आध्यात्मिक

626
00:45:46,400 --> 00:45:50,400
रूप से जानेंगे कब? जब हम व्यवहारिक रूप से उसको ईश्वर मानेंगे। तभी

627
00:45:50,400 --> 00:45:54,640
तो जानेंगे उसे आध्यात्मिक रूप से। तो ईश्वर

628
00:45:54,640 --> 00:45:58,720
जब यह यह पारमार्थिक पर्सेक्टिव है कि ईश्वर ने अमुक

629
00:45:58,720 --> 00:46:02,720
अमुक कारणों की वजह से वहां पर निर्भया को नहीं बचाया या अमुक अमुक

630
00:46:02,720 --> 00:46:06,960
कारणों की वजह से उस पर ये दोष नहीं लगता। वो सब कुछ करने वाला क्योंकि

631
00:46:06,960 --> 00:46:11,440
उसकी किसी भी कर्म के फल में आसक्ति नहीं है। इसलिए वो अकर्ता

632
00:46:11,440 --> 00:46:15,760
है। ठीक है? सब कुछ करने वाला होते हुए भी भगवान

633
00:46:15,760 --> 00:46:20,240
अकर्ता है। तो ये कौन सा पर्सपेक्टिव है? ये परमार्थिक पर्सेक्टिव है।

634
00:46:20,240 --> 00:46:22,720
मगर व्यवहारिक पर्सपेक्टिव से क्या ईश्वर

635
00:46:22,720 --> 00:46:26,800
ऐसा कर्म करने वाला दिख सकता है? हां, दिख रहा है। तो जब ये

636
00:46:26,800 --> 00:46:30,880
क्वेश्चन पूछा जाता है तो व्यवहारिक पर्सेक्टिव से पूछा जाता है कि क्या

637
00:46:30,880 --> 00:46:35,200
ईश्वर ऐसा कर सकता है? क्या ईश्वर ऐसा कर सकता है? क्या ईश्वर ऐसा कर सकता है? जो उसका आध्यात्मिक

638
00:46:35,200 --> 00:46:39,200
पर्सेक्टिव है तो सभी का एक जैसा है। वो ब्रह्म स्वरूप

639
00:46:39,200 --> 00:46:43,360
में अलग थोड़ा सा अंतर है। मगर व्यवहारिक पर्सपेक्टिव में ही आप उसको बाधित कर रहे हो।

640
00:46:43,360 --> 00:46:47,520
दिक्कत ये है नास्तिकता का खंडन नहीं कर पाओगे।

641
00:46:47,520 --> 00:46:51,920
नास्तिकता का खंडन नहीं कर पाओगे तो अधर्म दुनिया

642
00:46:51,920 --> 00:46:56,000
यही तो सिद्ध करने में लगी है। ईश्वर नहीं है। तो ईश्वर को जब आप

643
00:46:56,000 --> 00:47:00,000
व्यवहार में बाधित कर देते हैं तो ये दिक्कत आती है।

644
00:47:00,000 --> 00:47:04,000
तो आपने यहां क्या किया कि उसका फिर से केवल पारमार्थिक पर्सपेक्टिव

645
00:47:04,000 --> 00:47:08,160
पकड़ लिया और जो व्यवहारिक पर्सपेक्टिव था उसको छोड़ दिया। इधर

646
00:47:08,160 --> 00:47:12,600
से क्या दिख रहा है? अगर कोई नवजात शिशु जा रहा

647
00:47:12,600 --> 00:47:17,360
है किसी के बिना मारे तो उसमें हमें ईश्वर की

648
00:47:17,360 --> 00:47:21,520
जो वो है आज्ञा ईश्वर की सहमति को स्वीकार करना

649
00:47:21,520 --> 00:47:25,600
पड़ेगा। तो इस रूप में उसके हत्या करने वाले के रूप में व्यवहारिक

650
00:47:25,600 --> 00:47:29,840
रूप से ईश्वर सिद्ध हो गया। हां फिर हम लोग उसको बताएंगे

651
00:47:29,840 --> 00:47:33,840
कि नहीं यह हमें इस तरफ से दिख रहा है। इसकी वास्तविकता पीछे

652
00:47:33,840 --> 00:47:37,920
की यह है कि उस बच्चे उस जो शिशु रूप में आपको दिख रहा है वो उसका

653
00:47:37,920 --> 00:47:42,000
पुनर्जन्म का पिछले जन्म का ऐसा कर्म था जिसके कारण उसको ऐसा दंड दिया

654
00:47:42,000 --> 00:47:46,080
जा सकता है। अमुक अमुक बहुत सारी चीज है। तो व्यवहारिक पर्सेक्टिव में ईश्वर सब

655
00:47:46,080 --> 00:47:50,320
कुछ करने वाला सिद्ध है। आपका भी मगर आप उसको

656
00:47:50,320 --> 00:47:54,760
स्वीकार नहीं करते। जैसे एक आरोप लगाया जाता है कि श्री कृष्ण ने

657
00:47:54,760 --> 00:47:58,960
निर्वस्त्र लड़कियों को देखा।

658
00:47:58,960 --> 00:48:03,120
श्री कृष्ण ने निर्वस्त्र लड़कियों को देखा। अरे भैया

659
00:48:03,120 --> 00:48:07,200
तुम्हारा ईश्वर नहीं देखता है क्या? वो तो सब जगह देख रहा है।

660
00:48:07,200 --> 00:48:11,200
सर्वज्ञ है। देख रहा है। तो उस पर अब कह दोगे

661
00:48:11,200 --> 00:48:15,360
दोष नहीं लगता। तो फिर श्री कृष्ण पे दोष क्यों लगा रहे हो? केवल

662
00:48:15,360 --> 00:48:19,360
इतना ही तो है कि उन्होंने एक रूप लेकर के देखा और वो बिना रूप के देख रहा है। मगर देख तो रही

663
00:48:19,360 --> 00:48:23,480
है ना। देखने की देखना दोष है ना

664
00:48:23,480 --> 00:48:25,800
ऐसे

665
00:48:25,800 --> 00:48:30,000
अच्छा यह सब भी विचार करने वाली बातें हैं। मुझे अच्छे लगे

666
00:48:30,000 --> 00:48:36,000
थे टॉपिक्स के इन पर बात की जाए और बहुत दिनों से सर्वशक्तिमान पर लॉजिकल बातें की नहीं

667
00:48:36,200 --> 00:48:40,880
थी। तो ये भी एक बात हो गई

668
00:48:40,880 --> 00:48:44,880
कि ईश्वर ईश्वर पापी कैसे दिख

669
00:48:44,880 --> 00:48:49,120
सकता है और ईश्वर पापी क्यों नहीं है? ईश्वर पापी नहीं है पारमार्थिक पर्सेक्टिव

670
00:48:49,120 --> 00:48:53,040
से। मगर ईश्वर पापी दिख सकता है। व्यवहारिक पर्सपेक्टिव से। व्यवहारिक पर

671
00:48:53,040 --> 00:48:57,400
पर्सपेक्टिव से ईश्वर पर कोई भी बाधा नहीं लग

672
00:48:57,400 --> 00:49:01,760
सकती। और अगर लगेगी तो वो जिसके बारे में बात हो रही है वो बाधित

673
00:49:01,760 --> 00:49:06,240
है। और जब बाधित है तो वो ईश्वर नहीं है।

674
00:49:06,240 --> 00:49:12,240
यही खेल है बस।

675
00:49:21,440 --> 00:49:25,520
कोई नास्तिक है जो आपसे बातें कर रहा है। ईश्वर ने इसको बचाया

676
00:49:25,520 --> 00:49:29,680
क्यों नहीं? तो आप उसको आप जो

677
00:49:29,680 --> 00:49:33,680
है ईश्वर को दोषी नहीं हो सकता क्योंकि वो पूर्व जन्म का फल है तो वो क्यों माने

678
00:49:33,680 --> 00:49:39,680
आपकी बातें? उसकी शास्त्र में निष्ठा तब होगी ना जब उसकी ईश्वर में निष्ठा

679
00:49:40,200 --> 00:49:44,640
होगी। यह सब बातें हैं।

680
00:49:44,640 --> 00:49:49,040
अब ऐसे ही वो हाइपरस्ट के उसमें भी उठाया गया प्रश्न कि ऐसा

681
00:49:49,040 --> 00:49:53,120
ले सकता है। इन्होंने भी उठा दिया। क्या वह अपने मूल स्वरूप को परिवर्तित कर सकता है? मेरे भाई

682
00:49:53,120 --> 00:49:58,720
मूल स्वरूप को परिवर्तित करने की आवश्यकता नहीं है। पहली बात

683
00:49:58,720 --> 00:50:02,800
ईश्वर व्यवहार में सब कुछ कर सकने वाला होना चाहिए। जिसको जिसका जिसको भज

684
00:50:02,800 --> 00:50:06,880
के जिसको जिसकी भक्ति करके मुक्त हो सके। मुक्त मुक्त होने के बाद भी

685
00:50:06,880 --> 00:50:08,720
हम ईश्वर को चेक क्यों करेंगे?

686
00:50:08,720 --> 00:50:13,680
क्यों किया जाएगा भाई? उसको चेक कि तुम ये कर सकते हो कि नहीं? क्या क्या आवश्यकता है?

687
00:50:13,680 --> 00:50:17,680
मगर तुम्हारा ईश्वर तो व्यवहार में ही बाधित है ना। तुम वहां की बात कर

688
00:50:17,680 --> 00:50:22,240
रहे हो परमार्थ की बात जहां पर क्रिया है ही नहीं।

689
00:50:22,240 --> 00:50:26,320
प्राप्तव्य है वो केवल। अब इसमें भी अगर तुम ये कहोगे तो इसका वो

690
00:50:26,320 --> 00:50:30,400
देख लेना जाकर के बनाया है। क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बन सकता है जिसको वो स्वयं ना उठा

691
00:50:30,400 --> 00:50:34,400
सके। बनाया है। देख लेना उसमें भी उसके आधार परमार्थ में

692
00:50:34,400 --> 00:50:38,480
उसकी चीजें सुनिश्चित होने के बाद भी आप उसको नकार

693
00:50:38,480 --> 00:50:42,960
नहीं सकते। क्योंकि उसकी वो जो सुनिश्चितता है

694
00:50:42,960 --> 00:50:47,200
वह आपको उसको ईश्वर कर मानने के कारण

695
00:50:47,200 --> 00:50:51,280
जानने को मिल रही है। और जब आप उसको ईश्वर नहीं मानते

696
00:50:51,280 --> 00:50:55,440
हो तो उसकी वो जो सुनिश्चितता है उसका कोई आधार नहीं रह जाता

697
00:50:55,440 --> 00:50:59,520
आपके पास। समझना इससे इसको जैसे एक सोता हुआ

698
00:50:59,520 --> 00:51:03,520
व्यक्ति ये नहीं कह सकता कि मैं किसी के जागा हुआ व्यक्ति ये नहीं कह

699
00:51:03,520 --> 00:51:07,680
सकता कि मैं किसी आवाज देने से जाग गया। क्योंकि

700
00:51:07,680 --> 00:51:11,840
अगर वह सो रहा था तो सुनना सिद्ध नहीं होता और सुन रहा है तो जागना

701
00:51:11,840 --> 00:51:16,000
सिद्ध नहीं होता है। तो उसी ठीक प्रकार से अगर वो ईश्वर

702
00:51:16,000 --> 00:51:20,240
को मानता है तो परमार्थ के आधार पर ईश्वर के द्वारा

703
00:51:20,240 --> 00:51:23,920
बताई गई स्थितियों के आधार पर आपका ईश्वर को नकारना

704
00:51:23,920 --> 00:51:28,000
सिद्ध नहीं होता है। और यदि आप ईश्वर को नकार रहे हो तो आपका परमार्थ

705
00:51:28,000 --> 00:51:34,000
को जानना सिद्ध नहीं होता है। इसको समझना। ठीक है?

706
00:51:36,880 --> 00:51:41,040
और भी बहुत सी चीजें हैं। वह मुझे टाइम नहीं मिला। नहीं मैं अच्छे से इसको

707
00:51:41,040 --> 00:51:46,200
बताता

708
00:51:46,200 --> 00:51:50,320
आपको। हां एक बात और थी उसकी भी बात कर लेते हैं। पापी दिख

709
00:51:50,320 --> 00:51:54,320
रहा है हमारे अंदर। हां एक बात और कही इनबिल्ट। अब देखिए यहां पर भी

710
00:51:54,320 --> 00:51:58,800
वही वाली बात है। एक पर्सपेक्टिव को पकड़ लेते हैं। बाकी सब जगह दो-दो पर्सेक्टिव

711
00:51:58,800 --> 00:52:02,880
को लेकर के चलेंगे। हम बाकी सब जगह

712
00:52:02,880 --> 00:52:07,040
दो दो पर्सेक्टिव को ले चलेंगे। जैसे

713
00:52:07,040 --> 00:52:11,040
ईश्वर एक रस वाला होते हुए भी कहीं पर जुपिटर घुमा

714
00:52:11,040 --> 00:52:15,120
रहा है और कहीं पर पृथ्वी को घुमा रहा है तो यहां पर वह कम ज्यादा हो रहा है तो यानी निर्गुण

715
00:52:15,120 --> 00:52:19,200
से सगुण का रूप उसने धारण किया हुआ है तो ये जो सगुण रूप आपने धारण

716
00:52:19,200 --> 00:52:23,200
किया ना यहां पर व्यवहारिक हो गया ईश्वर क्योंकि वो अब किसी थोड़ा बहुत

717
00:52:23,200 --> 00:52:27,240
ही सही पर व्यवहार की उसमें आ रहा है वो सुन रहा है व्यवहार वो देख रहा है आपको

718
00:52:27,240 --> 00:52:31,520
व्यवहार इतना इतने में तो व्यवहारिक हो गया ना पहले वो अव्यवहारिक था

719
00:52:31,520 --> 00:52:35,600
निर्गुण था सगुण हुआ व्यवहार तो आपने ने अपनी बातों

720
00:52:35,600 --> 00:52:39,280
को मानने के लिए दोनों पर्सेक्टिव मान लिए। फिर क्या किया?

721
00:52:39,280 --> 00:52:43,680
ये भी जो जो अगला पॉइंट है इसमें भी आपने एक पर्सेक्टिव जहां पर खंडन

722
00:52:43,680 --> 00:52:47,920
करना है सन जो सनातन परंपरा प्राप्त आचार्यों का तो वहां पे आप अपनी

723
00:52:47,920 --> 00:52:52,160
बात को आगे रखने के लिए एक ही पर्सेक्टिव पकड़ लेते हो। बताता

724
00:52:52,160 --> 00:52:55,480
हूं आगे

725
00:52:55,480 --> 00:52:59,920
कैसे कि जैसे मैंने कहा कि हमारे अंदर इनबिल्ट इच्छा

726
00:52:59,920 --> 00:53:03,920
है सब कुछ कर सकने वाला बनने की। तो आपने कहा कि

727
00:53:03,920 --> 00:53:08,320
नहीं सब कुछ कर सकने वाला बनने की इच्छा नहीं है। सर्वशक्तिमान की इच्छा नहीं है।

728
00:53:08,320 --> 00:53:13,120
दुख से मुक्त होने की इच्छा है। ठीक है? यहां पे आप एक एक

729
00:53:13,120 --> 00:53:18,240
वर्ड लिख के फंसे भी हैं। उस पर मैं आगे बात करूंगा।

730
00:53:18,240 --> 00:53:22,840
पर पहले अपने उसको क्लियर कर दूंगा। आप फंसे कैसे हैं? वो बताता

731
00:53:22,840 --> 00:53:25,960
हूं।

732
00:53:25,960 --> 00:53:30,000
कि हमारे अंदर इनबिल्ट इच्छा है। दुखों से मुक्त होने की।

733
00:53:30,000 --> 00:53:34,000
यह पारमार्थिक पर्सेक्टिव है भाई। मगर जब हम इधर से

734
00:53:34,000 --> 00:53:38,080
देखेंगे तो क्योंकि हम दुखों से मुक्त होना चाह रहे हैं तो उसका बाय प्रोडक्ट क्या

735
00:53:38,080 --> 00:53:42,080
है? प्रकृति के सारे बंधनों से मुक्त हो जाना। तो

736
00:53:42,080 --> 00:53:46,120
उन बंधनों से मुक्त हो जाने में सभी बंधनों से मुक्त हो जाना यानी कूदू तो चोट ना

737
00:53:46,120 --> 00:53:50,160
लगे। अदृश्य हो जाऊं। सारी चीजें प्रकृति के सारे

738
00:53:50,160 --> 00:53:54,640
नियमों से मुक्त हो जाना। ये भी उसमें छुपा है। जैसे कि इसको

739
00:53:54,640 --> 00:53:58,800
थोड़ा समझ लो। जैसे कि दुखों से मुक्त कौन

740
00:53:58,800 --> 00:54:02,880
है? ईश्वर। दुखों से सदा के

741
00:54:02,880 --> 00:54:06,960
लिए मुक्त कौन है? आपने माना ना कि उसके अंदर चाह है हमेशा के

742
00:54:06,960 --> 00:54:11,360
लिए दुखों से मुक्त हो जाने की। तो दुखों से मुक्त कौन है? ईश्वर।

743
00:54:11,360 --> 00:54:15,360
क्या ईश्वर को सर्वशक्तिमान कहा गया है कि नहीं? ईश्वर में तो

744
00:54:15,360 --> 00:54:19,800
भेद नहीं है ना। वही सब एक ही बात है। सच्चिदानंद स्वरूप

745
00:54:19,800 --> 00:54:24,320
सर्वशक्तिमान अनंत सामर्थ्यवान तो वह उसका दूसरा पर्सपेक्टिव

746
00:54:24,320 --> 00:54:28,320
है। उसका सर्वशक्तिमान अविद्या रूपी संसार के पर्सपेक्टिव

747
00:54:28,320 --> 00:54:32,400
से उसे सर्वशक्तिमान कहा जा रहा है। अन्यथा जो

748
00:54:32,400 --> 00:54:38,120
पारमार्थिक दुनिया है उसमें शक्तिमान की आवश्यकता ही नहीं

749
00:54:38,120 --> 00:54:42,320
है। है ना? तो आपका जो दुख से मुक्त

750
00:54:42,320 --> 00:54:46,320
होने वाली भावना है वह पारमार्थिक दृष्टिकोण से है कि आप मुक्त होना

751
00:54:46,320 --> 00:54:50,560
चाहते हो मगर उसी भावना को जब व्यवहारिक पर्सेक्टिव से देखोगे तो उस भावना

752
00:54:50,560 --> 00:54:54,640
का ये निकलेगा बाय प्रोडक्ट कि वो सब कुछ कर सकने वाला प्रकृति के

753
00:54:54,640 --> 00:54:58,720
सभी बंधनों से मुक्त हो बनना चाहता है क्योंकि जो मुक्त है उसको

754
00:54:58,720 --> 00:55:02,880
तुमने भी माना वो सर्वशक्तिमान है और जिस जिस सामर्थ्य का अस्तित्व

755
00:55:02,880 --> 00:55:06,960
है वो वो सामर्थ है हालांकि ये वो टॉपिक नहीं है मगर आपने क्योंकि इसमें

756
00:55:06,960 --> 00:55:12,440
भी हमको बोला है अपने लेख में तो हम उसको भी लेते देते हैं। ठीक

757
00:55:12,440 --> 00:55:16,480
है? और आगे बात है कि

758
00:55:16,480 --> 00:55:20,480
अब यहां पर आप एक चीज कह के फंस गए। आपने मान लिया कि

759
00:55:20,480 --> 00:55:25,080
मनुष्य के अंदर हमेशा आनंदित रहने की चाह विद्यमान

760
00:55:25,080 --> 00:55:30,000
है। तो क्या आप उसको ऐसा मोक्ष दे रहे हो?

761
00:55:30,000 --> 00:55:34,080
क्या विद्यमान से आपने माना कि ऐसी कोई चीज है। मगर

762
00:55:34,080 --> 00:55:38,120
आपने तो अपने यहां पर जीव और ब्रह्म की एकता मानी नहीं

763
00:55:38,120 --> 00:55:42,520
है। तो जब जीव और ब्रह्म की एकता नहीं मानी है तो

764
00:55:42,520 --> 00:55:46,640
और तो फिर इस चाह से ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध

765
00:55:46,640 --> 00:55:50,880
नहीं होता है। कनेक्शन कैसे लाओगे?

766
00:55:50,880 --> 00:55:53,200
मैं एलन मस्क को इसलिए जानता हूं क्योंकि मुझे

767
00:55:53,200 --> 00:55:57,280
किसी ने बताया एलन मस्क वरना मैं एलन मस्क को नहीं जानता।

768
00:55:57,280 --> 00:56:01,360
ठीक है? तो आपको कनेक्शन लाना होगा। कनेक्शन कैसे

769
00:56:01,360 --> 00:56:05,440
लाओगे? हमारे पास तो कनेक्शन है। जीव और ब्रह्म एक होगा। आप तो नहीं मानते जीव

770
00:56:05,440 --> 00:56:10,240
और ब्रह्म एक होगा। ब्रह्म स्वरूप हो जाएगा। हम तो

771
00:56:10,240 --> 00:56:14,400
तो जीव की चाह से इस ये जो आपकी जो

772
00:56:14,400 --> 00:56:18,480
चीजें हैं उससे जीव के अंदर ये चाह आपने मान ली। वो सदा आनंदित होने

773
00:56:18,480 --> 00:56:22,640
वाला बनना चाहता है। सदा आनंदित रहने वाला बनना चाहता है। तो उससे आपका वो

774
00:56:22,640 --> 00:56:27,840
सच्चिदानंद स्वरूप सिद्ध नहीं हो रहा। उसकी चाह से क्योंकि उसमें कनेक्शन नहीं है कोई।

775
00:56:27,840 --> 00:56:31,920
मगर आपने लिख दिया वो मेरा नहीं है विषय विषय यह

776
00:56:31,920 --> 00:56:36,040
है कि आपने यह मान लिया कि जीव सदा के लिए मुक्त रहना चाहता है दुखों

777
00:56:36,040 --> 00:56:40,160
से क्या आपने ऐसा मोक्ष दिया है उसको क्या आर्य

778
00:56:40,160 --> 00:56:45,040
समाज के द्वारा मिलने वाला मोक्ष सदा आनंदित रहने वाला है नहीं

779
00:56:45,040 --> 00:56:49,200
वो कुछ समय के लिए ही मुक्त होता है आपके अनुसार वो मुक्त भी नहीं है उतनी

780
00:56:49,200 --> 00:56:53,200
देर तक भी वो भी मैं बताऊंगा अभी कैसे नहीं है मुक्त ठीक है वो

781
00:56:53,200 --> 00:56:57,200
मुक्त भी नहीं है उतनी देर के लिए वो जितनी देर आपने मुक्त किया उतनी देर के लिए भी

782
00:56:57,200 --> 00:57:01,240
मुक्त नहीं। बताऊंगा कैसे? मगर पहली बात तो यह है कि आपके ही

783
00:57:01,240 --> 00:57:05,440
अनुसार जीव जो है सदा के लिए मुक्त नहीं होता है। तो जिस चीज का अस्तित्व

784
00:57:05,440 --> 00:57:08,480
नहीं है वो उसके अंदर क्यों आ रहा है?

785
00:57:08,480 --> 00:57:12,480
ऐसे मोक्ष का अस्तित्व नहीं है जो सदा आनंदित रहे व्यक्ति उसको वापस आना

786
00:57:12,480 --> 00:57:16,480
होता है। तो आपका मोक्ष

787
00:57:16,480 --> 00:57:20,560
बाधित ईश्वर को आपने कचरा कर दिया। अपने मन

788
00:57:20,560 --> 00:57:24,560
मन चाहा जहां पर आपने दोनों पर्सपेक्टिव लिए। मन चाहा जहां पर आपने केवल

789
00:57:24,560 --> 00:57:29,000
एक पारमार्थिक पर्सेक्टिव को लेकर के व्यवहारिक पर्सपेक्टिव वाली बातों का खंडन कर

790
00:57:29,000 --> 00:57:33,120
दिया। ये है ठीक है। दिक्कत

791
00:57:33,120 --> 00:57:37,120
ये अंतर ये है। बहुत सूक्ष्मता से

792
00:57:37,120 --> 00:57:41,280
समझने वाला वीडियो होगा ये। सबका मन में नहीं लगेगा इतनी ऐसी बातों

793
00:57:41,280 --> 00:57:46,240
में। मगर ठीक है। कभी-कभी बनाना चाहिए ऐसा भी। तो

794
00:57:46,240 --> 00:57:51,120
क्या है कि जीव के अंदर आपने माना सदा

795
00:57:51,120 --> 00:57:55,280
दुखों से सदा मुक्त हो जाने की चाह है। सदा सदा के लिए तो

796
00:57:55,280 --> 00:57:59,360
आपके पास ना तो मोक्ष है जीव को देने वाला मनुष्य के लिए

797
00:57:59,360 --> 00:58:03,600
मोक्ष है आपके पास और ना ही आपके पास उसकी चाह का कोई विषय

798
00:58:03,600 --> 00:58:07,840
विषय के रूप में वो ईश्वर सिद्ध होता है। क्योंकि उससे कोई रिलेशन

799
00:58:07,840 --> 00:58:12,000
ही नहीं है। क्यों नहीं रिलेशन है? ना तो वह भक्ति

800
00:58:12,000 --> 00:58:16,480
करने पर आपको फल दे रहा है क्योंकि आपने उसका व्यवहारिक स्वरूप है वह काट दिया केवल पारमार्थिक

801
00:58:16,480 --> 00:58:20,480
स्वरूप पकड़ लिया कि नहीं फल तो मिलेगा वो तो पकड़ लिया मगर जो व्यवहारिक

802
00:58:20,480 --> 00:58:23,840
स्वरूप है भाई कि हमने

803
00:58:23,840 --> 00:58:28,320
भक्ति की ईश्वर की और फल स्वरूप क्या हुआ हमारी जो

804
00:58:28,320 --> 00:58:32,480
अटैचमेंट था भौतिक जगत के साथ वो कम हुआ अब

805
00:58:32,480 --> 00:58:36,640
उस अटैचमेंट के कम होने की वजह से जो हमारे को दंड मिलना था प्रारब्ध

806
00:58:36,640 --> 00:58:40,720
के कारण या हमारे कर्मों का जो हमें फल मिलना था वो मिला वो वह नहीं

807
00:58:40,720 --> 00:58:44,960
कटा मगर हमको उसका कष्ट नहीं हुआ। हम रमे हुए थे अपने राम

808
00:58:44,960 --> 00:58:49,120
नाम के भजन में। अब यह क्या हुआ? आध्यात्मिक पर्सपेक्टिव

809
00:58:49,120 --> 00:58:53,280
यह है कि हमें दंड मिलके ही रहा और क्या

810
00:58:53,280 --> 00:58:58,160
है कि हमें कष्ट नहीं हो रहा। ये परमार्थ की दृष्टि से देखी जाने वाली सच्चाई है।

811
00:58:58,160 --> 00:59:02,640
मगर व्यवहार में हमें क्या हुआ? नहीं नहीं। भगवान ने हमें अपनी शरण में ले लिया।

812
00:59:02,640 --> 00:59:07,440
भगवान ने हमारे दंड माफ कर दिए, क्षमा कर दिया। यह व्यवहार की सत्यता है।

813
00:59:07,440 --> 00:59:11,800
तो आपने व्यवहारिक सत्यता को छोड़ दिया। यहां पर कई जगह पकड़ते

814
00:59:11,800 --> 00:59:15,840
हो। ऐसा नहीं पकड़ते। व्यवहारिक सत्यता को आप पकड़ते हो।

815
00:59:15,840 --> 00:59:20,720
मगर जब चाहो तब छोड़ देते हो। प्रॉब्लम ये है।

816
00:59:20,720 --> 00:59:24,760
आप विचार करिए अपने ऊपर।

817
00:59:24,760 --> 00:59:28,040
और

818
00:59:28,040 --> 00:59:32,720
तो हमारे अंदर इनबिल्ट चाह दुखों से छूट जाने की ही है।

819
00:59:32,720 --> 00:59:36,720
मगर जब व्यवहारिक परिपेक्ष से देखेंगे तो उस दुखों से छूट जाने के वाले के

820
00:59:36,720 --> 00:59:40,920
रूप में वो सर्वशक्तिमत्ता की ही चाह है। ठीक

821
00:59:40,920 --> 00:59:45,360
है? सारे प्राकृतिक बंधनों से मुक्त हो जाने की चाह।

822
00:59:45,360 --> 00:59:49,520
हम और आपने भी माना है कि उस चाह का विषय जो है वो भगवान

823
00:59:49,520 --> 00:59:54,160
है। भगवान कौन है? सच्चिदानंद है। सच्चिदानंद की चाह है। सच्चिदानंद सर्वशक्तिमान

824
00:59:54,160 --> 00:59:58,160
है। ठीक है? सर्वशक्तिमान जब ये दुनिया है तब

825
00:59:58,160 --> 01:00:02,880
है ईश्वर। दुनिया के पर्सपेक्टिव से वो यहां पे कुछ भी कर सकता है। पर्सपेक्टिव

826
01:00:02,880 --> 01:00:07,280
को समझिए। हां और आगे सुनिए।

827
01:00:07,280 --> 01:00:11,440
अच्छा अब दूसरी बात एक है कि

828
01:00:11,440 --> 01:00:15,560
यह जो अपनी इच्छा अनुसार जैसे आप लोग बात

829
01:00:15,560 --> 01:00:20,000
करें कि अपनी इच्छा अनुसार जन्म

830
01:00:20,000 --> 01:00:24,080
लेने का पर्सपेक्टिव नहीं है। वो सामर्थ्य नहीं है इस दुनिया में। मतलब इसका

831
01:00:24,080 --> 01:00:28,160
कोई उदाहरण नहीं। मगर भगवान श्री कृष्ण तो आपकी सत्यार्थ प्रकाश के अनुसार

832
01:00:28,160 --> 01:00:32,240
आप उन्होंने जो अंदाजा बताया है वो अपनी इच्छा अनुसार जन्म लेने की

833
01:00:32,240 --> 01:00:36,320
बात कर रहे हैं। आप तो पुरुष हैं या तो उनकी वो

834
01:00:36,320 --> 01:00:40,320
इच्छा जो है गलत है। बोल दो श्री कृष्ण गलत थे। आप तो पुरुष नहीं

835
01:00:40,320 --> 01:00:43,280
थे। आप तो पुरुष है तो मानो कि हां जो उन्होंने इच्छा

836
01:00:43,280 --> 01:00:47,280
की वह पॉसिबल थी। अपनी इच्छा अनुसार जन्म लिया जा सकता है। तो जब

837
01:00:47,280 --> 01:00:51,360
अपनी इच्छा अनुसार एक जीव जन्म ले लेने की बात कर रहा है आपके अनुसार तो ईश्वर

838
01:00:51,360 --> 01:00:56,080
क्यों नहीं? सामर्थ्य का अस्तित्व सिद्ध हो गया। ठीक है?

839
01:00:56,080 --> 01:01:00,480
तो ये सब बातें हो गई। कुल मिला के

840
01:01:00,480 --> 01:01:04,560
अगर हम आर्य समाज के ईश्वर को पकड़ेंगे तो

841
01:01:04,560 --> 01:01:08,560
वह मनुष्य की चाह का अंतिम विषय सिद्ध नहीं होगा। आप केवल यह कहते

842
01:01:08,560 --> 01:01:12,640
रह जाएंगे कि वो जो है ईश्वर का निर्माता है। इसलिए वो ईश्वर है। और अगर

843
01:01:12,640 --> 01:01:17,200
हम उसको यह ना कहें कि वो ईश्वर है। बल्कि ये कह दे कि भाई ये जो प्रकृति

844
01:01:17,200 --> 01:01:21,360
है वो ऐसे ही काम करती है कि आप जो करोगे उसका आपको मिलेगा। आप

845
01:01:21,360 --> 01:01:25,360
जो करोगे उसका आपको मिलेगा और कोई आपके साथ

846
01:01:25,360 --> 01:01:29,440
इधरउधर कोई बिहेव नहीं हो सकता है। अगर हम ये कह दे तो बौद्धों

847
01:01:29,440 --> 01:01:33,600
में आप में अंतर क्या बचा और ये कहा जा सकता है ईश्वर ऐसा

848
01:01:33,600 --> 01:01:37,600
ही मशीनों जैसा तो है क्योंकि आपने व्यवहारिक स्वरूप उसका स्वीकार

849
01:01:37,600 --> 01:01:41,840
ही नहीं कई जगहों पर काट दिया भक्ति का फल नहीं देता पापों से नष्ट नहीं करता

850
01:01:41,840 --> 01:01:47,400
व्यवहार में सब कुछ कर सकता है करता

851
01:01:47,400 --> 01:01:52,240
है अच्छा जब वो अंतिम विकल्प नहीं है

852
01:01:52,240 --> 01:01:56,400
तो उसको फॉलो करने की उसको सुनने की उसके पीछे चलने की कोई आवश्यकता

853
01:01:56,400 --> 01:02:00,400
नहीं है आवश्यकता क्या रही ईश्वर की बौद्ध बन जाओ ईश्वर

854
01:02:00,400 --> 01:02:05,040
रहित बस कर्म करते जाओ फल प्राप्त करते जाओ कोई आवश्यकता नहीं है ईश्वर की

855
01:02:05,040 --> 01:02:09,120
तो अगर उस ईश्वर को ईश्वर ना कहकर एक प्राकृतिक सिस्टम भी मान लिया

856
01:02:09,120 --> 01:02:13,360
जाए तो भी कोई दिक्कत नहीं प्राकृतिक प्रकृति है वही तो बौद्ध भी तो यही कहते हैं बस

857
01:02:13,360 --> 01:02:17,360
आपने उसमें ईश्वर का नाम दे दिया है ना

858
01:02:17,360 --> 01:02:23,360
बौद्ध भी यही कहते हैं अब क्या है

859
01:02:24,600 --> 01:02:28,640
यार कुल मिलाकर आपने खुद माना है

860
01:02:28,640 --> 01:02:32,640
जो जीव की जो मूल चाह है उस चाह का निवारण आपके

861
01:02:32,640 --> 01:02:37,040
पास नहीं है। आपने माना कि वो सदा दुखों से मुक्त होना चाहता है मगर

862
01:02:37,040 --> 01:02:41,280
आप मोक्ष दे रहे हो कुछ सालों के बाद वापस आएगा।

863
01:02:41,280 --> 01:02:45,440
बहुत सालों के बाद वापस आएगा। कुछ नहीं बहुत दयानंद जी ने भी ये उत्तर

864
01:02:45,440 --> 01:02:49,440
दिया है। अब दिक्कत क्या है? अब दिक्कत

865
01:02:49,440 --> 01:02:53,600
ये है कि आपने कहा कि वो इतने इतने लाख वर्ष

866
01:02:53,600 --> 01:02:57,600
तक मुक्त रहेगा। ठीक है? मगर आपने उसको एक सच्चाई बताई

867
01:02:57,600 --> 01:03:01,680
है मेरे भाई। वो क्या सच्चाई है कि तुम्हें इतने इतने लाख वर्ष बाद पुनः

868
01:03:01,680 --> 01:03:05,840
यहां आना है। पुनः यहां पर लिपटना है दुखों से। तो ये दुख

869
01:03:05,840 --> 01:03:09,920
तो उसके साथ रहा। और जो कहो सत्यार्थ प्रकाश की स्टाइल में सत्यार्थ

870
01:03:09,920 --> 01:03:14,960
प्रकाश ऐसी ही बात करती है। जो कहो कि

871
01:03:14,960 --> 01:03:20,360
उसको हम भुला देंगे कि तुम्हें वापस आना है। वो जो 36 लाख वर्ष है जो भी वर्ष

872
01:03:20,360 --> 01:03:25,280
है उतने समय के लिए भूल जाता है कि उसको यहां वापस आना है।

873
01:03:25,280 --> 01:03:29,600
तो अविद्या यह है कि वो है अविद्या

874
01:03:29,600 --> 01:03:33,680
यह हुई यह संसार अविद्या है कि फिर वो संसार अविद्या है। अगर हम

875
01:03:33,680 --> 01:03:37,680
उसको कोई इंजेक्शन लगा दे मुक्ति के टाइम पे कि भैया तू 36 लाख वर्ष

876
01:03:37,680 --> 01:03:39,600
तक जो है दुखों से मुक्त है। अब

877
01:03:39,600 --> 01:03:43,600
तू घूम विचरण कर। हमने इंजेक्शन लगा दिया। तेरी मेमोरी

878
01:03:43,600 --> 01:03:47,680
खत्म हो गई वो वाली। यह तुझे नहीं ध्यान रहेगा कि वो तुझे

879
01:03:47,680 --> 01:03:51,680
वापस उस संसार में जाना है दुख भोगने के लिए दोबारा। ठीक है? तो

880
01:03:51,680 --> 01:03:56,560
फिर क्या होगा? अविद्या रूपी संसार तो वो हो जाएगा। बना मूर्ख टहल रहा है जीव।

881
01:03:56,560 --> 01:04:01,120
उस उसको वापस आना है। मगर वो सोच रहा है वाह मैं तो मुक्त हूं

882
01:04:01,120 --> 01:04:05,360
जबकि वो मुक्त नहीं है। तो आप उसको भुला भी नहीं सकते।

883
01:04:05,360 --> 01:04:09,360
तो सच्चाई क्या है कि वो उस 36 लाख

884
01:04:09,360 --> 01:04:13,360
जो भी वो मैंने देखा नहीं है वो कितना बड़ा है टाइमिंग है। मगर जो

885
01:04:13,360 --> 01:04:17,520
आर्य समाज के अनुसार जो मुक्ति है वो कुछ समय के लिए है। कुल

886
01:04:17,520 --> 01:04:21,600
मिलाकर के परांत काल कहते हैं उसे। तो जो मुक्ति है परांत

887
01:04:21,600 --> 01:04:26,240
काल का जो समय है वह भी मुक्त नहीं है क्योंकि उस समय भी उसको एक दुख है

888
01:04:26,240 --> 01:04:30,320
कि मुझे वापस जाना है वो है उसके अंदर भाव

889
01:04:30,320 --> 01:04:34,480
तो मुक्त कहां हुआ नहीं हुआ ना

890
01:04:34,480 --> 01:04:38,560
ठीक है इसीलिए कहता हूं क्यों पड़े हो चक्कर

891
01:04:38,560 --> 01:04:43,560
में कोई है नहीं टक्कर

892
01:04:43,560 --> 01:04:48,240
में देखना विचार करके भाई सकारात्मक दृष्टि से देखना

893
01:04:48,240 --> 01:04:52,400
चिढ़ना मत हम और हो सकता है हमारी

894
01:04:52,400 --> 01:04:56,480
एक अच्छी वार्ता हो जाती अगर तुम वो दुराचरण ना करते जो तुम्हें वहां से

895
01:04:56,480 --> 01:05:00,640
भरे गए हैं। हमने आज तक कभी व्यक्तिगत प्रहार किया किया

896
01:05:00,640 --> 01:05:06,640
व्यक्तिगत प्रहार

897
01:05:06,800 --> 01:05:09,000
[संगीत]

898
01:05:09,000 --> 01:05:13,360
हम आपने किया जोकर इत्यादि ये सब वर्ड

899
01:05:13,360 --> 01:05:17,840
इन्होंने कहे हैं जो जिनके प्रश्न है

900
01:05:17,840 --> 01:05:22,240
बस यही है कि भौतिक व्याख्या को जो व्यवहारिक पर्सपेक्टिव

901
01:05:22,240 --> 01:05:26,320
है उसको कई जगह पर यह सारी संस्थाएं जो ईश्वर को बाधित करती हैं

902
01:05:26,320 --> 01:05:30,480
ये कई जगह जगह पर जो व्यवहारिक पर्सपेक्टिव से होने वाली व्याख्या है

903
01:05:30,480 --> 01:05:34,560
उसको कैंसिल कर देती है। बस यहीं पर उसके कारण वो ईश्वर बाधित हो

904
01:05:34,560 --> 01:05:38,640
जाता है। फिर वो मनुष्य की चाह का विषय नहीं रह जाता। फिर हम उस ईश्वर को सिद्ध नहीं कर

905
01:05:38,640 --> 01:05:42,640
सकते कि जीव की चाह का अंतिम विषय हो। नहीं कर पाओगे। हां ना कभी

906
01:05:42,640 --> 01:05:46,640
नास्तिक बन के बात करूंगा। ठीक है? तो वो

907
01:05:46,640 --> 01:05:50,640
सिद्ध नहीं हो पाएगा जीव की चाह का। तो फिर वो वो नहीं बन पाएगा जिसके पीछे हम चले

908
01:05:50,640 --> 01:05:56,400
ही चले। नहीं पीछे चलो ही चलो। उसको मानो ही मानो।

909
01:05:56,400 --> 01:06:00,400
तो हमें जब हम जब दोनों पर्सपेक्टिव स्वीकार करेंगे तो जो

910
01:06:00,400 --> 01:06:05,120
व्यवहारिक पर्सेक्टिव होगा उसमें ईश्वर सब कुछ कर सकता है।

911
01:06:05,120 --> 01:06:09,520
ईश्वर किसी भी प्रकार के व्यवधान से रहित है। किसी

912
01:06:09,520 --> 01:06:13,520
ईश्वर किसी भी प्रकार के नियम के नीचे नहीं बल्कि सभी नियमों को बनाने वाला सर्व

913
01:06:13,520 --> 01:06:17,840
नियामक है। ये हमेशा ध्यान रखिए। ये व्यवहारिक

914
01:06:17,840 --> 01:06:21,840
पर्सपेक्टिव है। सच्चाई और हमें वो ईश्वर चाहिए जो व्यवहार में सब

915
01:06:21,840 --> 01:06:25,840
कुछ कर सके। मुक्त हो गया व्यक्ति वहां जाकर पूछ

916
01:06:25,840 --> 01:06:29,920
रहा है तुम यह कर सकते हो क्या भाई वहां का वह विषय नहीं है और

917
01:06:29,920 --> 01:06:34,160
उसके आधार पर भी आप नकार नहीं सकते ईश्वर को हम नहीं नकारने देंगे ले आओ नास्तिक

918
01:06:34,160 --> 01:06:38,160
को भेज दो आपका ईश्वर नकार दिया जाएगा आप लोग कहते हो ना कि जो

919
01:06:38,160 --> 01:06:42,720
आहार समाज को नहीं मानता वो नास्तिक है अभी मैं एक धर्मामीटर

920
01:06:42,720 --> 01:06:46,960
करके एक वो बना रहा हूं कुछ लाऊंगा तब आपको बता पता

921
01:06:46,960 --> 01:06:51,600
चलेगा वास्तविकता यह है कि जिसका ईश्वर बाधित है

922
01:06:51,600 --> 01:06:57,000
वह ईश्वर उस ऐसे ईश्वर को मानने वाले भी नास्तिकी

923
01:06:57,000 --> 01:07:03,000
है। आस्तिकता भास है वहां बस ये

924
01:07:03,960 --> 01:07:08,080
है। अब आगे आपने एक पॉइंट रख दिया कि ईश्वर अकाया है।

925
01:07:08,080 --> 01:07:12,160
अकाय है। तो भाई ईश्वर जो है जन्म भी तो लेने

926
01:07:12,160 --> 01:07:16,320
वाला कहा गया है। 31 19 में उसको क्यों

927
01:07:16,320 --> 01:07:20,400
भूल जा रहे हो? 31 18 31 19 इत्यादि में यजुर्वेद वो क्यों भूल

928
01:07:20,400 --> 01:07:24,480
जा रहे हो? मैंने कहा ना कि ईश्वर के तीनों पर्सपेक्टिव मानने पड़ेंगे

929
01:07:24,480 --> 01:07:28,640
आपको। एक पर्सपेक्टिव वो है निर्गुण निराकार।

930
01:07:28,640 --> 01:07:32,720
एक रस। फिर जब वो क्रियात्मक

931
01:07:32,720 --> 01:07:36,600
होगा तो सगुण

932
01:07:36,600 --> 01:07:40,640
निराकार। और फिर जब वो लीलात्मक होगा, व्यवहारिक होगा तो

933
01:07:40,640 --> 01:07:42,920
सगुण

934
01:07:42,920 --> 01:07:48,920
साकार। सगुण निराकार में भी व्यवहारिक मान लिया आपने उसको।

935
01:07:49,440 --> 01:07:53,520
फिर आपने अंत में एक प्रश्न पूछा है मूल निराकार को बदल सकता है कि नहीं

936
01:07:53,520 --> 01:07:58,000
मैंने बता दिया दोनों पर्सपेक्टिव है जो उसका वास्तविक पर्सपेक्टिव

937
01:07:58,000 --> 01:08:02,240
है परमार्थ उसमें नहीं व्यवहारिक पर्सपेक्टिव में हां अविद्या

938
01:08:02,240 --> 01:08:06,320
रूपी संसार में हां ये अगर अविद्या है तो इसमें जब तुम

939
01:08:06,320 --> 01:08:10,480
सारे चमत्कार दिखा सकते हो तो एक यही चमत्कार क्यों नहीं दिखा पा रहे हो कि वो अवतार

940
01:08:10,480 --> 01:08:14,640
ले सकता है क्योंकि तुम्हें नफरत है

941
01:08:14,640 --> 01:08:18,640
परंपरा प्राप्त आचार्यों से धर्म से तना सनातन से

942
01:08:18,640 --> 01:08:24,640
और अपना ब्रामिक आईडियोलॉजी ठूसनी है

943
01:08:31,720 --> 01:08:35,760
इसमें हम ये चीजें पूरी हो गई। अब

944
01:08:35,760 --> 01:08:39,560
हम दूसरा टॉपिक खोल लेते

945
01:08:39,560 --> 01:08:44,800
हैं। हम समीक्षा करनी थी। एक

946
01:08:44,800 --> 01:08:48,880
लाइव हुआ था हमारे बीच। आर्य समाज के एक

947
01:08:48,880 --> 01:08:53,120
आर्य समाज को फॉलो करने वाले एक भाई साहब आए थे जिनका

948
01:08:53,120 --> 01:08:56,200
नाम था कुलदीप

949
01:08:56,200 --> 01:09:00,320
विद्यार्थी। है ना? तो उनके बारे में कुछ

950
01:09:00,320 --> 01:09:06,320
चीजें थी और

951
01:09:08,750 --> 01:09:12,880
[संगीत] चलिए ठीक है तो आज ये सर्वशक्तिमान

952
01:09:12,880 --> 01:09:17,440
वाली बातें हो गई क्लियर और कुछ और भी प्रश्न सर्वशक्तिमान

953
01:09:17,440 --> 01:09:21,520
से रिलेटेड पूछे गए हैं अलग से वर्बली ध्यान

954
01:09:21,520 --> 01:09:25,680
नहीं है और पूरी व्यवस्थित रूप से था नहीं कुछ किसी के क्वेश्चंस

955
01:09:25,680 --> 01:09:29,920
हो तो वो आ सकता है सर्वशक्तिमान से रिलेटेड बात

956
01:09:29,920 --> 01:09:34,080
कर सकता है और अगर वो जिसके के प्रश्न थे अगर वो

957
01:09:34,080 --> 01:09:38,240
देख रहा है लाइव को तो उससे मैं कहूंगा कि अपने जो अभद्र आचरण आपने किया

958
01:09:38,240 --> 01:09:42,720
है जो आपको सिखाया नहीं गया आपके अलंकारी भवनों में

959
01:09:42,720 --> 01:09:47,560
वो सीख लो आ करके कहीं मंदिर मंदिर में या हमसे संपर्क कर लो हम ही सिखा

960
01:09:47,560 --> 01:09:52,680
देंगे तो वो जो

961
01:09:52,680 --> 01:09:56,880
है जो वो चर्चा है कुलदीप विद्यार्थी जी वाली जो

962
01:09:56,880 --> 01:10:01,120
अ लाइव चर्चा हुई है उनके साथ वो चर्चाएं

963
01:10:01,120 --> 01:10:05,280
हम कर लेंगे किसी और अ एक जैसे कुछ

964
01:10:05,280 --> 01:10:09,360
क्वेश्चंस आते हैं मैं उनका जवाब दे दूं। वैसे मैंने दिया है पर फिर भी मैं देता चलता हूं। जैसे कुछ

965
01:10:09,360 --> 01:10:13,840
क्वेश्चन आते हैं कि क्या ईश्वर इलॉजिकल

966
01:10:13,840 --> 01:10:18,400
चीजें कर सकता है क्या? कोई चीज इलॉजिकल है। यह एक इंफॉर्मेशन

967
01:10:18,400 --> 01:10:20,560
है।

968
01:10:20,560 --> 01:10:24,000
ईश्वर को इस प्रपंच रूपी संसार में आपकी इंफॉर्मेशन

969
01:10:24,000 --> 01:10:28,080
ही तो बदलनी है। भाई ये इंफॉर्मेशन ही तो बदली है उसने कि कोई आपकी मां

970
01:10:28,080 --> 01:10:32,200
है, कोई आपकी बहन है, कोई आपकी पत्नी है, कोई आपका पिता है, कोई आपका भाई

971
01:10:32,200 --> 01:10:38,200
है। इंफॉर्मेशन ही तो दी है आपको

972
01:10:39,640 --> 01:10:44,080
एक। तो इंफॉर्मेशन चेंज करने में क्या होता है? जैसे मैं फॉर एग्जांपल

973
01:10:44,080 --> 01:10:48,160
बता दूं कि दो और दो पांच हो सकता है क्या? इसको बता देता हूं। तो आपने

974
01:10:48,160 --> 01:10:52,480
कहा क्या ईश्वर दो और दो पांच कर सकता है क्या? ये इनफेटिव क्वेश्चन है। क्रिया

975
01:10:52,480 --> 01:10:56,640
नहीं है कोई। आपके मन में ठुसा हुआ है कि दो और दो

976
01:10:56,640 --> 01:11:00,880
चार होता है। पांच नहीं होता है। तो

977
01:11:00,880 --> 01:11:04,880
आपको ये सिद्ध आपके मन को एहसास कराना है कि नहीं दो और दो चार ही होता है।

978
01:11:04,880 --> 01:11:08,960
यही तो गोल है एट द एंड तो क्या है? कैसे करेगा? सबसे

979
01:11:08,960 --> 01:11:13,200
पहली बात कि आपके मन में क्यों इसका वो क्या है? सोर्स

980
01:11:13,200 --> 01:11:17,360
क्या है? जो जो आपके लिए प्रमाणिक सोर्सेस होंगे वो उनसे कहलवाएगा

981
01:11:17,360 --> 01:11:21,360
आपको कि दो और दो पांच होते हैं। मान लो जिन जिनके कहने से आपने कहा

982
01:11:21,360 --> 01:11:25,440
कि दो और दो को चार कहा जाता है। उन्हीं को वो मजबूर करेगा

983
01:11:25,440 --> 01:11:29,600
कि आप कहो जाकर के। मान लो और किसी को मजबूर

984
01:11:29,600 --> 01:11:33,840
नहीं करेगा। आपको मजबूर कर देगा। आपको ही ऐसा दिखाने

985
01:11:33,840 --> 01:11:38,720
आपको ऐसा फील कराने लगेगा कि दो और दो वो होते हैं

986
01:11:38,720 --> 01:11:39,220
पांच

987
01:11:39,040 --> 01:11:43,120
होते हैं। आप बोलने लगोगे पांच होते हैं पांच होते हैं। तो क्या हुआ? आपके अंदर

988
01:11:43,120 --> 01:11:47,200
की इंफॉर्मेशन उन्होंने उसने चेंज कर दी। वो चेंज करने का तरीका बहुत सारा

989
01:11:47,200 --> 01:11:51,440
है। अच्छा अब क्वेश्चन वही आ जाएगा दोबारा से कि उसने वास्तव

990
01:11:51,440 --> 01:11:56,000
में थोड़ी ना किया। यह तो वैसे किया गया है जादू

991
01:11:56,000 --> 01:12:00,080
के तरीके से या फिर हिप्नोटाइज करके किया गया है। तो भाई यह जो

992
01:12:00,080 --> 01:12:04,080
संसार आप देख रहे हो ना जगत जिसको आप ये सब

993
01:12:04,080 --> 01:12:08,160
मान रहे हो ये भी तो वही है अविद्या जो जैसा

994
01:12:08,160 --> 01:12:12,240
है वैसा आपको नहीं दिख रहा है।

995
01:12:12,240 --> 01:12:16,840
ये भी तो अविद्या है।

996
01:12:16,840 --> 01:12:20,960
तो जब अविद्या में आप बाकी सब चीजें देख रहे हो तो ईश्वर का

997
01:12:20,960 --> 01:12:24,960
अवतार क्यों नहीं देख सकते हो? ईश्वर क्यों नहीं आ सकता

998
01:12:24,960 --> 01:12:28,960
है? बाकी सब चीजें आपको बांधने वाली है।

999
01:12:28,960 --> 01:12:33,040
मगर कुछ ऐसे रूप भगवान इस अविद्या के ही यह भी क्वेश्चन

1000
01:12:33,040 --> 01:12:37,320
आता है। अविद्या है तो इसको इसको फॉलो क्यों करें? वेद भी तो अविद्या हो

1001
01:12:37,320 --> 01:12:41,440
गया। वेद वो अविद्या है जो आपको छुड़ाएगी। ईश्वर का

1002
01:12:41,440 --> 01:12:45,760
अवतार वो अविद्या का वो रूप है जो आपको छुड़ाएगा।

1003
01:12:45,760 --> 01:12:49,760
जो आपको मुक्त कराएगा मुक्ति का हेतु भगवान भगवान का

1004
01:12:49,760 --> 01:12:52,240
स्वरूप

1005
01:12:52,240 --> 01:12:57,320
ठीक है

1006
01:12:57,320 --> 01:13:01,360
तो जैसे धरती पर गिरा हुआ व्यक्ति धरती का ही सहारा लेकर के

1007
01:13:01,360 --> 01:13:05,520
उठता है अब उसने धरती का यूज़ इस तरीके से किया

1008
01:13:05,520 --> 01:13:09,600
कि वो उठ गया। एरोप्लेन जिसको हवा में उड़ना है, धरती

1009
01:13:09,600 --> 01:13:14,000
से अलग हटना है, उसने धरती का यूज़ इस तरह से किया कि वह

1010
01:13:14,000 --> 01:13:18,680
उड़ने लगा। इसी तरीके

1011
01:13:18,680 --> 01:13:22,880
से यह अविद्या का वो रूप है जिसका ऐसा

1012
01:13:22,880 --> 01:13:26,880
यूज़ करके आप जो है बाहर निकल सकते हैं अविद्या रूपी संसार से। तो यह ईश्वर

1013
01:13:26,880 --> 01:13:31,120
का अवतार। यह ईश्वर का ज्ञान वेद।

1014
01:13:31,120 --> 01:13:37,120
ठीक है?

1015
01:13:37,400 --> 01:13:41,440
मुझे तो यह हो गई इॉजिकल लॉजिकल वाला क्वेश्चन संभव को

1016
01:13:41,440 --> 01:13:46,520
असंभव कर सकता है कि नहीं। ठीक है? और क्या

1017
01:13:46,520 --> 01:13:50,920
था? उसने असंभव को ही संभव किया हुआ है। पहले ये समझ

1018
01:13:50,920 --> 01:13:54,960
लीजिए। वास्तविकता क्या है? तीन

1019
01:13:54,960 --> 01:13:59,040
तत्व माने ना आर्य समाज ने। क्या है वास्तविक? आर्य समाज की बात कर

1020
01:13:59,040 --> 01:14:03,120
लो। तीन तत्व है केवल। अभी तुमको दिख रहा है क्या केवल

1021
01:14:03,120 --> 01:14:07,320
तीन तत्व है ऐसा फील हो रहा है क्या आपको

1022
01:14:07,320 --> 01:14:11,480
नहीं तो इसका अर्थ क्या

1023
01:14:11,480 --> 01:14:15,760
है इसका अर्थ क्या है कि आपको वो दिखाया जा रहा है जो है नहीं

1024
01:14:15,760 --> 01:14:20,480
या आपको वैसा दिखाया जा रहा है जैसा है नहीं अविद्या

1025
01:14:20,480 --> 01:14:24,560
ठीक है ये सारी चीजें लड़ने वाली बात

1026
01:14:24,560 --> 01:14:28,880
नहीं है विचार करिए बाकी आपने प्रश्न किया था कि वो जिसज

1027
01:14:28,880 --> 01:14:32,960
सामर्थ्य का अस्तित्व है तो वो तो हमने आपको सामर्थ्य का अस्तित्व बता दिया है कई

1028
01:14:32,960 --> 01:14:37,440
तरीकों से और अन्य कई सारे टॉपिक दे दिए विचार करने के लिए। मगर

1029
01:14:37,440 --> 01:14:41,600
इसके बाद अब आप यह अपेक्षा ना करें कि आपका इसी तरीके से वीडियो

1030
01:14:41,600 --> 01:14:45,440
के थ्रू जो है जवाब दिया जाए।

1031
01:14:45,440 --> 01:14:49,600
आप अपने दो आपके पास ऑप्शन है या तो

1032
01:14:49,600 --> 01:14:52,720
आप अपने आर्य समाजियों को ऐसा बनाएं कि वह आपके

1033
01:14:52,720 --> 01:14:57,800
आपके अनुसार जो आपको लगता है कि आप बहुत तर्कवान

1034
01:14:57,800 --> 01:15:02,080
है वो जो है आकर के उस पक्ष को वैसा ही एज इट इज रख पाएं

1035
01:15:02,080 --> 01:15:06,240
जैसे आप रख रहे हो या फिर आप अपने डायरेक्ट

1036
01:15:06,240 --> 01:15:10,240
कुछ नए फॉलोअर्स तैयार करें और उनको

1037
01:15:10,240 --> 01:15:14,920
ऐसा बनाएं जैसा आप स्वयं को समझते हो और और या

1038
01:15:14,920 --> 01:15:19,200
फिर आप स्वयं आना चाहते हो तो आप स्वयं आ जाओ। आपका स्वागत है

1039
01:15:19,200 --> 01:15:23,280
क्योंकि तब जरा फटाफट रिजल्ट पे आए। रिजल्ट आएगा। हमें इंतजार

1040
01:15:23,280 --> 01:15:27,680
नहीं करना पड़ता है। तो आप अगर स्वयं आना चाहते हो तो आप अपने दुराचरण

1041
01:15:27,680 --> 01:15:31,920
के लिए अभद्र व्यवहार के लिए हमारे यहां तो ऐसे ही होता है। है ना?

1042
01:15:31,920 --> 01:15:36,240
उन सब चीजों के लिए आप क्षमा याचना करें। हां। ऐसे

1043
01:15:36,240 --> 01:15:40,960
थोड़ी ना होता है कि मतलब आप हमारे बारे में कुछ भी व्यक्तिगत टिप्पणियां करते रहे।

1044
01:15:40,960 --> 01:15:45,040
हमने कभी आपके लोगों के लिए हमने अपनी तरफ से कोई

1045
01:15:45,040 --> 01:15:49,040
इमोजी बनाया हो या कोई हास्यात्मक चेहरा दिया

1046
01:15:49,040 --> 01:15:53,200
हो ये हमारे सिद्धांत है। हम नहीं करते ऐसा दयानंद जी के लिए अगर कोई अभद्र

1047
01:15:53,200 --> 01:15:57,280
टिप्पणी करता है तो हम उसको प्रतिकार करते हैं। और

1048
01:15:57,280 --> 01:16:01,360
आप लोग क्या क्या नहीं बोलते रहते हो। खैर तो अगर आपको आना

1049
01:16:01,360 --> 01:16:07,360
हो तो आप क्षमा मांग लीजिएगा।

1050
01:16:18,160 --> 01:16:22,160
व्याख्यान देख सकते हैं आप कोई दिक्कत नहीं है। आराम से

1051
01:16:22,160 --> 01:16:28,160
देखिए। सार्वजनिक है सभी के

1052
01:16:31,160 --> 01:16:37,160
लिए। किसी का कोई प्रश्न हो तो वह कर ले या फिर वह

1053
01:16:40,400 --> 01:16:44,400
रॉकली जी आप किसी और दिन आ जाइएगा। अभी कल

1054
01:16:44,400 --> 01:16:48,560
भी है शायद हमारा एक लाइव होगा सेशन तो आप कल आ जाइएगा। लगभग

1055
01:16:48,560 --> 01:16:53,800
लगभग वैसे ही सवाल हैं आपके भी आप कल आ

1056
01:16:53,800 --> 01:16:58,400
जाइएगा। विशाल भाटिया जी

1057
01:16:58,400 --> 01:17:02,800
हां जी जय श्री राम। विशाल जी जय श्री राम। पहचाना मेरे को

1058
01:17:02,800 --> 01:17:06,800
क्यों नहीं पहचानेंगे भाई? अच्छा काफी टाइम बाद मुलाकात हो रही है

1059
01:17:06,800 --> 01:17:11,720
और बताइए क्या चल रहा है

1060
01:17:11,720 --> 01:17:15,840
बस कृपा है राम की अच्छा मैं थोड़ा पूछ रहा था कि

1061
01:17:15,840 --> 01:17:20,160
मैंने अभी जो एक घंटे से सब बोला है एक्चुअली बहुत ज्यादा मैं व्यवस्थित

1062
01:17:20,160 --> 01:17:24,320
रूप से नहीं भागा दौड़ी में 10 दिन भर तो मैं आया और ये क्योंकि लगा

1063
01:17:24,320 --> 01:17:28,320
हुआ था आज शाम का तो हमने किया है तो ये समझ में आया कि नहीं जो मैंने

1064
01:17:28,320 --> 01:17:32,400
समझाने का प्रयास किया ये चीजें बिल्कुल बिल्कुल आया

1065
01:17:32,400 --> 01:17:33,440
ना

1066
01:17:33,440 --> 01:17:35,880
तो ठीक

1067
01:17:35,880 --> 01:17:40,000
थोड़ा वो वो हो जाता है। कठिन हो

1068
01:17:40,000 --> 01:17:44,160
जाता है। यह वाला टॉपिक ऐसा है। हां आप

1069
01:17:44,160 --> 01:17:48,240
आप देख सकते हैं उनके व्याख्यान अ

1070
01:17:48,240 --> 01:17:52,240
YouTube पर जो पड़े हुए हैं। है ना? अधिकार की सीमा में

1071
01:17:52,240 --> 01:17:55,200
आपकी।

1072
01:17:55,200 --> 01:17:59,280
मैं दो-तीन दिन से आपको लिखने का कोशिश कर रहा था कि आप लाइव आ जाइए। तो इस बार मुझको

1073
01:17:59,280 --> 01:18:03,520
भी कुछ अलंकार समाज से रिलेटेड चर्चा करनी होगी। तो आज उस पे है तो

1074
01:18:03,520 --> 01:18:07,600
हम आ गए हैं। नास्तिकों को

1075
01:18:07,600 --> 01:18:13,600
वेद की प्रमाणिकता कैसे सिद्ध करें?

1076
01:18:13,680 --> 01:18:17,760
भाई देखिए प्रमाणिकता तो

1077
01:18:17,760 --> 01:18:20,280
यही है

1078
01:18:20,280 --> 01:18:22,840
कि

1079
01:18:22,840 --> 01:18:27,240
वो परिभाषित कर पाते हैं आपकी चाह के विषय

1080
01:18:27,240 --> 01:18:31,360
को। और आगे भाई केवल प्रामाणिकता से ही नहीं केवल तर्क से

1081
01:18:31,360 --> 01:18:35,520
नहीं आस्था भी है वहां पर। वेद है ना आस्था है

1082
01:18:35,520 --> 01:18:39,600
मगर उसमें तर्क की पराकाष्ठा है कि वो वो शास्त्र है जो यह

1083
01:18:39,600 --> 01:18:44,160
नहीं कहते कि हमको ईश्वर ने लिखा वो अनादि शास्त्र है सदैव

1084
01:18:44,160 --> 01:18:48,240
थे इसलिए हम उन पर आस्था भी है और विश्वास

1085
01:18:48,240 --> 01:18:52,880
भी दोनों ही चीजें हो जाती है ठीक है

1086
01:18:52,880 --> 01:18:57,440
मैंने कल आपकी वो काशी वाली वीडियो देखी थी

1087
01:18:57,440 --> 01:19:03,440
जी हर हर महादेव हर हर महादेव

1088
01:19:06,720 --> 01:19:10,880
मैंने कमेंट्स तो बहुत सारे उसमें लिखे थे लेकिन अब काशी में ये लोग इतना

1089
01:19:10,880 --> 01:19:15,040
मूर्ति पूजा से इतनी चिढ़ है। काशी के तो कोनेकोने में मंदिर है। काशी में मंदिर

1090
01:19:15,040 --> 01:19:19,120
ऐसा है आर्य समाज की वास्तविक स्थिति पता है आपको क्या

1091
01:19:19,120 --> 01:19:23,520
है कि पहली बात तो ग्राउंड पे इनके बहुत कम फॉलोअर्स

1092
01:19:23,520 --> 01:19:28,320
मिलेंगे। हालांकि वह कोई बात नहीं है। संख्या बल कितना है क्या है। मगर

1093
01:19:28,320 --> 01:19:32,320
आर्य समाज की वास्तविक स्थिति यह है कि जितने आर्य समाज हैं आज के टाइम में उसमें

1094
01:19:32,320 --> 01:19:36,320
से भी 80 90% कहीं ना कहीं आर्य समाज के विरोधी है।

1095
01:19:36,320 --> 01:19:40,560
उनको वो स्वीकार नहीं करेंगे मगर वो कर रहे होंगे।

1096
01:19:40,560 --> 01:19:45,440
कई लोग आपको मूर्ति पूजक मिलेंगे। आर्य समाज

1097
01:19:45,440 --> 01:19:49,520
कई लोग ऐसे ऐसे कार्य करने वाले कि नहीं हम वर्ण व्यवस्था को उससे जन्म से मानते

1098
01:19:49,520 --> 01:19:53,520
हैं। हमारे यहां की जो विवाह है वो तो उसी में होंगे। हम अगर क्षत्रिय है तो क्षत्रिय में

1099
01:19:53,520 --> 01:19:57,760
ही होंगे। ये सब कर रहे हैं। मगर बस

1100
01:19:57,760 --> 01:20:01,920
जब करने चर्चा करनी होगी तो बोलने में आएंगे कि नहीं वो गलत वो जो है

1101
01:20:01,920 --> 01:20:06,800
उस चीज को छुपा लेंगे जो खुद फॉलो कर रहे हैं। सच्चाई

1102
01:20:06,800 --> 01:20:11,840
गई अफवाह उड़ाई गई। बात कुछ और थी बताई कुछ और गई।

1103
01:20:11,840 --> 01:20:16,080
है ना? हम हां वो अफवाह उड़ाई गई है वो

1104
01:20:16,080 --> 01:20:20,320
देख लो ना वहां पे क्या स्थिति है। उसी काशी शास्त्रार्थ

1105
01:20:20,320 --> 01:20:21,760
स्मृति स्थल को संभालने

1106
01:20:21,760 --> 01:20:26,760
वाले जो लोग हैं वो तो कम से अच्छा ये जो सज्जन आए

1107
01:20:26,760 --> 01:20:31,040
थे ये जो सज्जन आए थे हां रॉकली

1108
01:20:31,040 --> 01:20:35,240
जी आप कल आ जाइएगा आपका फेस की आवश्यकता नहीं है। हम आपको व्यक्तिगत रूप से जानते हैं

1109
01:20:35,240 --> 01:20:39,440
और देख लिया जाएगा। हम लोग बात कर लेंगे एक बार

1110
01:20:39,440 --> 01:20:45,440
आपस में जो हमारी ऑपरेटर महोदय उनके साथ और टीम के

1111
01:20:46,520 --> 01:20:50,640
साथ कहिए कहिए हां जी बोलिए

1112
01:20:50,640 --> 01:20:54,840
मैं आपको आप पहले अपनी बात कहिए फिर मैं कहता हूं हां मैं ये कह रहा था

1113
01:20:54,840 --> 01:20:58,880
कि जो अ ये

1114
01:20:58,880 --> 01:21:03,160
जो भाई साहब आए थे काशी में तो हमने ये कहा

1115
01:21:03,160 --> 01:21:07,200
था उनसे कि आर्य समाज के सिद्ध

1116
01:21:07,200 --> 01:21:11,200
सिद्धांतों को जो अच्छे से जानता हो उसे भेजिएगा किसी विद्वान

1117
01:21:11,200 --> 01:21:15,520
को और क्या कहे भाई क्या कहे और

1118
01:21:15,520 --> 01:21:19,680
अब जब ये आए तो अब लोग कहने लगे विद्वान नहीं है आर्य समाज नहीं तो कैसे

1119
01:21:19,680 --> 01:21:23,680
करें हां वो एक आया था वो बोला था कि विद्वान लिख

1120
01:21:23,680 --> 01:21:27,760
आएंगे वो जो कुछ गंदा उल्टा सीधा लिखता रहता है वो आपको एक आर्य समाजी वो नहीं

1121
01:21:27,760 --> 01:21:31,840
था वो जो निरंतर आर्य समाज है जो उनको आज गाली दे रहा था कि भाई

1122
01:21:31,840 --> 01:21:36,320
ये आदमी वो है ही नहीं विद्वान नहीं है कोई ऐसे है शर्म आनी चाहिए

1123
01:21:36,320 --> 01:21:36,960
ऐसे कर रहा

1124
01:21:36,960 --> 01:21:41,400
वैसे कर रहा है। बताओ यह कह रहा था उनके बारे

1125
01:21:41,400 --> 01:21:45,600
में। यह क्या सवाल है? मैं समझ नहीं पा रहा हूं। इसका मतलब

1126
01:21:45,600 --> 01:21:50,400
क्या है? अनसस्क सब्सक्राइब दिस चैनल। बोलने वाला मस्त है।

1127
01:21:50,400 --> 01:21:54,560
कल से कौन आएगा? यही है घमंड। ये किसका घमंड है?

1128
01:21:54,560 --> 01:21:58,560
अनसस्क सब्सक्राइब करके खुद जा रहे हो। तुम्हारा खुद का घमंड है। किसका

1129
01:21:58,560 --> 01:22:02,640
घमंड है?

1130
01:22:02,640 --> 01:22:06,640
सिद्धांतिक चर्चा करनी है। अच्छा भैया

1131
01:22:06,640 --> 01:22:10,720
मेरा एक प्रश्न है क्या वेदों में क्या सच में बलि प्रथा होती है? क्या जानवरों की बलि

1132
01:22:10,720 --> 01:22:14,880
वगैरह अमुक अमुक अमुक अमुक

1133
01:22:14,880 --> 01:22:19,120
चीजों में वहां उसका जो पर्यावसान है वो

1134
01:22:19,120 --> 01:22:23,920
एक तरीके से मांसाहार को रोकने के लिए है

1135
01:22:23,920 --> 01:22:27,920
बलि का जो प्रावधान है बलि का प्रावधान है ऐसा नहीं

1136
01:22:27,920 --> 01:22:32,560
है कि नहीं मगर उसके उसका जो पर्यावसान है वो

1137
01:22:32,560 --> 01:22:36,560
मांसाहार की न्यूनता में न्यूनता मतलब

1138
01:22:36,560 --> 01:22:42,560
कमी आती जाए व्यक्ति उस उस आदत से मुक्ति पाए उसमें

1139
01:22:44,360 --> 01:22:48,480
है। चलिए फिर अब फिर किसी आप अपनी बात बोल लीजिए। फिर हम

1140
01:22:48,480 --> 01:22:52,560
लोग फिर आज की चर्चा वो करते हैं। तो

1141
01:22:52,560 --> 01:22:56,560
मैं ये कह रहा था कि अभी मैं शंकर भाष्य गीता का पढ़

1142
01:22:56,560 --> 01:23:00,640
रहा हूं। आपको एक बार दिखाया भी था लखनऊ से लिए थे कथा में। तो उसमें अभी

1143
01:23:00,640 --> 01:23:04,960
पहले उसके शुरू में जब आप पढ़ेंगे ना आदि शंकराचार्य जो भगवान

1144
01:23:04,960 --> 01:23:09,040
आदि शंकराचार्य जी हैं उन्होंने उसके स्टार्टिंग में दूसरे पेज

1145
01:23:09,040 --> 01:23:13,120
में आप देखिएगा भगवान श्री कृष्ण को यह बताया कि वो विष्णु जी के अवतार हैं और यह भी उन्होंने बताया कि

1146
01:23:13,120 --> 01:23:17,280
ईश्वर अजन्मा अविनाशी होते हुए भी अपनी वैष्णवी माया को अधीन

1147
01:23:17,280 --> 01:23:21,360
करके वो जन्म लेता हुआ सा प्रतीत होता है संसार में और वो लोगों

1148
01:23:21,360 --> 01:23:26,480
के सामने प्रकट हुआ सा दिखता है जबकि वो वैसा है नहीं और आगे आगे

1149
01:23:26,480 --> 01:23:30,640
मैं भी उतनी देर से यही समझा रहा हूं कि जब ये अविद्या है जब

1150
01:23:30,640 --> 01:23:34,880
जो जैसा है वैसा दिख नहीं रहा है तो यहां पर ईश्वर को वैसा दिखने

1151
01:23:34,880 --> 01:23:39,200
में क्या दिक्कत है बस ईश्वर से ही दिक्कत आ जाती है इन्हें

1152
01:23:39,200 --> 01:23:43,600
ईश्वर को बाधित जो करना है भ्रामितिक बनाना है उसको इसलिए

1153
01:23:43,600 --> 01:23:47,760
आगे की आगे की व्याख्या में बहुत सारे महाभारत के श्लोक उपनिषद के श्लोकों

1154
01:23:47,760 --> 01:23:53,760
को भी वो कोट करते हैं उन्होंने बिल्कुल

1155
01:23:59,840 --> 01:24:05,840
चलिए फिर सभी को जय श्री राम। समय देने के लिए धन्यवाद।

1156
01:24:07,160 --> 01:24:11,360
और वो जो सर्वशक्तिमान वाला था विषय वो तो सारे टॉपिक्स

1157
01:24:11,360 --> 01:24:17,360
हमने कवर कर लिए हैं।

1158
01:24:18,120 --> 01:24:22,160
अ मूल निराकार। ठीक है? तो हम

1159
01:24:22,160 --> 01:24:26,240
लोग कल फिर आते हैं। वह जो चर्चाएं हुई है जो लाइव उनके बारे में समीक्षा

1160
01:24:26,240 --> 01:24:30,240
करेंगे और कुछ एक दो चीजें अगर रह गई होंगी तो कल हम लोग बात

1161
01:24:30,240 --> 01:24:35,400
करेंगे। आशा करते हैं आज का ये जो आपके

1162
01:24:35,400 --> 01:24:39,560
लिए जो ये लाइव है इस ये आपके लिए लाभदायक

1163
01:24:39,560 --> 01:24:43,680
रहे। एक बात समझ लीजिए कि पर्सपेक्टिव दो है।

1164
01:24:43,680 --> 01:24:48,080
एक पर्सपेक्टिव है स्पिरिचुअल पर्सपेक्टिव एक पर्सपेक्टिव है जो बिहेविरियल

1165
01:24:48,080 --> 01:24:52,160
है। ठीक है? बिहेवियल जो है वो अविद्या रूपी है। सबने

1166
01:24:52,160 --> 01:24:56,640
माना है किसी ना किसी तरीके से। उसको वैसा नहीं है जैसा है।

1167
01:24:56,640 --> 01:25:00,960
शब्दों का हेरफेर करके वो शंकराचार्य की बात को मान ही लिया है अलग-अलग

1168
01:25:00,960 --> 01:25:04,960
तरीकों से और बहुत सारी चीजें हैं। मगर

1169
01:25:04,960 --> 01:25:08,960
कुल मिलाकर के आज जो हम टॉपिक पे पहुंचे कि ये जो भी लोग ईश्वर

1170
01:25:08,960 --> 01:25:13,680
को बाधित कर रहे हैं वो वो लोग हैं जो

1171
01:25:13,680 --> 01:25:17,680
जहां पे अपना मन चाहता है वहां पर दोनों पर्सपेक्टिव से ईश्वर की व्याख्या करते हैं,

1172
01:25:17,680 --> 01:25:22,400
स्वीकार करते हैं। और जहां अपना मन चाहता है वहां सिर्फ ईश्वर का एक पर्सेक्टिव

1173
01:25:22,400 --> 01:25:27,120
लगा करके उसका जो व्यवहारिक पर्सेक्टिव से कही जा सकने वाली बातें हैं

1174
01:25:27,120 --> 01:25:31,280
उसको नकार देते हैं जिससे कि ईश्वर बाधित हो जाए परंपरा प्राप्त आचार्यों से प्राप्त

1175
01:25:31,280 --> 01:25:35,360
होने वाले ईश्वर से इतर चला जाए तो हम अपने नए सिद्धांत दे पाए

1176
01:25:35,360 --> 01:25:39,920
अपना नया धर्म दे पाए नए ईश्वर के नाम पर ठीक है

1177
01:25:39,920 --> 01:25:44,240
और जो मूल प्रश्न था कि जिस जिसज सामर्थ का अस्तित्व है

1178
01:25:44,240 --> 01:25:49,840
वह होना चाहिए ईश्वर में तब वो सर्वशक्तिमान कहलाएगा तो इस व्याख्या के अनुसार

1179
01:25:49,840 --> 01:25:50,720
जिस सामर्थ्य

1180
01:25:50,720 --> 01:25:54,720
का अस्तित्व है कि जीव ऐसा शरीर धारण

1181
01:25:54,720 --> 01:25:58,880
कर रहा है जो किसी का पिता कहला सके, किसी का पुत्र कहला सके जिसके

1182
01:25:58,880 --> 01:26:03,280
साथ विचारों का आदान प्रदान प्रत्यक्ष रूप से किया जा सके।

1183
01:26:03,280 --> 01:26:07,760
तो आपका ईश्वर वैसा शरीर धारण नहीं कर पा रहा है। उसका सामर्थ्य

1184
01:26:07,760 --> 01:26:13,760
है। अस्तित्व है उस सामर्थ्य का। ठीक है?

1185
01:26:15,160 --> 01:26:20,200
और इसके बाद फिर एक चीज आपने खुद स्वीकार कर

1186
01:26:20,200 --> 01:26:23,080
ली

1187
01:26:23,080 --> 01:26:27,280
कि वास्तविकता यही है कि ईश्वर

1188
01:26:27,280 --> 01:26:33,080
में कोई दोष नहीं है। वो दोषी नहीं हो

1189
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सकता। आज करेंगे

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क्या? पंडित जी आज प्रश्न करने वाले हैं।

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ठीक है? तो उसमें कोई दोष नहीं है। मगर व्यवहार

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01:26:52,400 --> 01:26:56,480
की दृष्टि से विद्या रूपी संसार की दृष्टि से हम ये सब बातें भी कह सकते

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हैं। तो मैंने आपको कई चीजें बताई। इसके

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बाद और इस तरह से उसकी व्यवकार

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नकार करके जो ईश्वर प्राप्त होता है आर्य समाज का और जो मोक्ष प्राप्त

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होता है आर्य समाज का वो जीव की चाह का विषय

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ही नहीं है तो ना उसकी सिद्धि है और ना ही जीव के पास कोई कारण बच

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पाएगा कि वो उसको फॉलो करे। ये ठीक इस प्रकार से है कि शंकराचार्य ने

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नास्तिकता का खंडन कर दिया। ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध कर दिया। ईश्वर

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का प्रचार हो गया सब जगह। अब क्या है कि जब ईश्वर के बारे में

1201
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सवाल ना करने की भावना है ही नहीं। ऐसे लोग ऐसे लोगों को पकड़

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के आप ब्रह्मा कुमारी वाला बना लो, आर्य समाजी बना लो, इस वाला

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बना लो। मगर जब शुरुआत से किसी को ईश्वर की तरफ लाना होगा तो

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01:27:44,720 --> 01:27:48,960
आपको वहां शंकराचार्य की जरूरत पड़ेगी। शंकराचार्य

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के सिद्धांतों के कारण ईश्वर का इतना प्रभाव है कि

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आप अब कोई नास्तिक है ही नहीं। सब पहले से ईश्वर को ही ढूंढ रहे हैं। ईश्वर के विषय

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में बातें कर रहे हैं। तो ऐसे लोगों को आप कन्वर्ट कर सकते हो। आओ भैया चलो चलो हमारे

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साथ आर समाजी बन जाओ। ऐसे लोगों को आप कन्वर्ट कर सकते हो कि चलो चलो।

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01:28:05,520 --> 01:28:08,200
मगर जब

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01:28:08,200 --> 01:28:12,240
आपको मूल में जब क्योंकि वो लोग ये भूल गए कि ईश्वर है या सिद्ध कैसे

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01:28:12,240 --> 01:28:16,240
हो होता है। ईश्वर मानते ही है तब आप उसको

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आर्य समाज ले जाओ ले जा सकते हो।

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मगर जब सिद्ध करने से लेकर और वहां ले जाने तक बारी आएगी तब आपको

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01:28:22,480 --> 01:28:28,480
शंकर की जरूरत पड़ेगी। तब आपको शंकराचार्य की जरूरत पड़ेगी।

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समझे? हम तो एक और दोबारा से कर लेते हैं

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रिवाइज क्या-क्या किया? जिस सामर्थ्य का अस्तित्व है

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01:28:41,280 --> 01:28:45,280
वो सामर्थ्य आपके ईश्वर में नहीं है। और जीव की चाह का

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वो विषय नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि उसमें उसके बीच में

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कोई कनेक्शन है नहीं। और जीव अंत में वह सच्चिदानंद नहीं बन पा रहा है क्योंकि

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उसका जो मोक्ष है वो वो भी आपका बाधित है और वो जिसको आपने मोक्ष कहा

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है वह भी सुखदायक नहीं है उसमें भी एक कंटक है कि मुझे वापस

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जाना है ये दुख है ठीक है और

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और क्या था और हमने यह जाना कि जितनी भी ऐसी विरोधाभासी

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संस्थाएं हैं वो कैसे काम करती हैं धर्माभास कैसे काम करता है वो क्या

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करता है जहां मन चाहे दोनों पर्सपेक्टिव जहां मन चाहे सिर्फ एक पर्सपेक्टिव और

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वो अपनी बातें रचता चला जाता और हमने क्या

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जाना कि जीव की चाह वास्तविक है दुखों

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से मुक्त हो जाना मगर यह सिर्फ वो वाला पर्सपेक्टिव है

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गढ़

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मगर सतह स्तर पर यह भी कहा जा सकता है कि वो प्रकृति के सभी बंधनों से मुक्त हो जाना

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चाहता है और जब सभी बंधनों से मुक्त होने कहेंगे तो फिर वो नियंत्रक

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हो जाना चाहता है ये भी कहेंगे जैसे ईश्वर सच्चिदानंद है

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तो ईश्वर सर्वशक्तिमान भी है ठीक है सभी जय श्री

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राम

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[संगीत]
