1
00:00:03,840 --> 00:00:08,240
अच्छा एक चीज इसमें यह आ रही है कि जैसे हमने कहा ऑलमाइट ऑलमाइटी

2
00:00:08,240 --> 00:00:12,400
है ना ऑलमाइटी अथॉरिटी तो क्या मतलब ऑलमाइटी का मतलब

3
00:00:12,400 --> 00:00:16,560
अनंत सामर्थ्यवान सर्वशक्तिमान अनंत ऑलमाइटी माने हां या

4
00:00:16,560 --> 00:00:20,560
सर्वशक्तिमान पावरफुल अनंत सामर्थ्यवान हां सामर्थ्यवान

5
00:00:20,560 --> 00:00:24,800
समर्थ है सदा अनंत शक्ति है उसकी अनंत

6
00:00:24,800 --> 00:00:28,960
उसका कोई मना ऐसे माफ लिमिटेड नहीं अनलिमिटेड है मतलब

7
00:00:28,960 --> 00:00:33,200
कुछ भी उसके के उसमें आ सकता है। वो कुछ भी कर सकता है। कुछ भी कर सकता है। अच्छा

8
00:00:33,200 --> 00:00:37,360
पॉजिटिव अच्छा नेगेटिव कुछ नहीं करेगा। पॉजिटिव वो उसके

9
00:00:37,360 --> 00:00:41,600
लिए एवरीथिंग पॉसिबल है। हमारे लिए भी एवरीथिंग पॉसिबल है। पॉजिटिव

10
00:00:41,600 --> 00:00:45,680
मगर नेगेटिव तो ये दुनिया है। नेगेटिविटी तो

11
00:00:45,680 --> 00:00:49,760
खत्म करता है। मतलब ये जो नेगेटिविटी है वो ईश्वर की सत्ता

12
00:00:49,760 --> 00:00:54,400
से बाहर है। मतलब उसके दायरे के बाहर है। ये बिल्कुल।

13
00:00:54,400 --> 00:00:58,400
इसका पूरा कोर्स है अगर आप करेंगे क्योंकि एक सेकंड

14
00:00:58,400 --> 00:01:03,440
में मैं नहीं समझा पाऊंगा। हां क्योंकि जो परमात्मा

15
00:01:03,440 --> 00:01:07,840
प्योर सत्ता है वो इस दुनिया की जो नेगेटिविटी

16
00:01:07,840 --> 00:01:11,920
है, नेगेटिविटी क्या है? काम है, क्रोध है, लोभ है, मोह

17
00:01:11,920 --> 00:01:15,920
है, अहकार है, ईर्ष्या है, द्वेष है, बदले की

18
00:01:15,920 --> 00:01:20,080
भावना है, नफरत है। यह नेगेटिविटी है।

19
00:01:20,080 --> 00:01:24,080
समझो एक पिता है, एक माता है, बच्चा गुस्सा करता है,

20
00:01:24,080 --> 00:01:28,400
किसी को गलत दृष्टि से देखता है, कुछ करता है तो वो भी उसको समझाएगा।

21
00:01:28,400 --> 00:01:32,480
बेटे ये ठीक नहीं है। ऐसा नहीं करना चाहिए आपको। तो उसको

22
00:01:32,480 --> 00:01:36,960
भी अच्छा नहीं लगेगा क्योंकि उसको पता है यह नेगेटिविटी है। यह गलत है।

23
00:01:36,960 --> 00:01:41,520
परमात्मा तो सर्वोच्च है। ऑलमाइटी अथरिटी पोरिटी

24
00:01:41,520 --> 00:01:45,760
उसके अंदर सदा ही है तो वह परमात्मा यह काम

25
00:01:45,760 --> 00:01:49,760
क्रोध लोभ मोह अहंकार ईर्ष्या द्वेष नफ तो नहीं

26
00:01:49,760 --> 00:01:53,840
आता ये नहीं आ सकता तो मुक्त है ना सदा के लिए सदा के लिए बच्चों को भी मुक्त

27
00:01:53,840 --> 00:01:57,920
बनाकर चाहता है हम कह रहे हैं कि जैसे मान लीजिए वो सर्वशक्तिमान है बुरे कार्य नहीं

28
00:01:57,920 --> 00:02:02,000
करता नहीं करता है क्योंकि वास्तविकता में तो उसकी नजरों में तो ये नाटक मात्र

29
00:02:02,000 --> 00:02:07,040
है कुछ भी बुरा कार्य है ही नहीं कुछ है ही नहीं नाटक मात्र माया मात्र है प्रपंच

30
00:02:07,040 --> 00:02:11,520
तो जैसे जैसे उसने जैसे हमने कहा सर्वशक्तिमान

31
00:02:11,520 --> 00:02:15,520
तो फिर हम ये क्यों कहते हैं कि वो अवतार नहीं ले सकता कि योग नहीं लेता

32
00:02:15,520 --> 00:02:19,520
है अवतार मां के गर्भ से जन्म नहीं लेता नहीं पर काया प्रवेश करता है

33
00:02:19,520 --> 00:02:23,680
हां वो माना स्वयं नहीं है स्वयं से प्रकट नहीं नहीं अगर मैंने आपको

34
00:02:23,680 --> 00:02:27,760
एग्जांपल दिया ना कि जैसे आप है मैं हूं हम आ गए एक बार गर्भ में

35
00:02:27,760 --> 00:02:31,840
फिर हम बच्चा बन गए अब हम अगर आत्मा निकल जाएगी तो कहेंगे मर

36
00:02:31,840 --> 00:02:35,440
गया लेकिन परमात्मा का जो अवतरण

37
00:02:35,440 --> 00:02:39,520
ऋण कार्नेशन होता है वह आता और जाता है आता और जाता बंधन में नहीं बंधा

38
00:02:39,520 --> 00:02:43,600
हुआ है। बंधन में कहां आया? नहीं आया। नहीं बंधन में आ सकता। कर्म से भी प्रकट

39
00:02:43,600 --> 00:02:47,760
हुआ तो बंधन में कहां आया? मेरा शरीर का बंधन ही हो गया ना। मैं किसी की मां

40
00:02:47,760 --> 00:02:51,840
हूं, किसी की बहन हूं, किसी की पत्नी हूं। किसी की क्या किसी

41
00:02:51,840 --> 00:02:55,840
की क्या तो मैं इस शरीर को अगर छोड़ दूं, मैं आत्मा हूं। मैं बोल रही

42
00:02:55,840 --> 00:03:00,160
हूं आत्मा। नहीं जैसे ईश्वर ने केवल एक लीला की

43
00:03:00,160 --> 00:03:04,400
कि वो प्रकट हुए हम और भाई बहन बने सबके भी बनना

44
00:03:04,400 --> 00:03:08,560
है। और उसके बाद वो अप्रकट हो गए। हम तो उन्होंने तो वास्तविकता

45
00:03:08,560 --> 00:03:12,720
में लीला की है। मगर देखने में यह भी लग रहा है कि जो है

46
00:03:12,720 --> 00:03:17,040
देह त्याग कर दिया। हां लेकिन लीला में हम सभी इनवॉल्व है ना।

47
00:03:17,040 --> 00:03:21,040
लीला में आप भी मैं भी ये भी हम सब लीला में है ना तो हम उसने जो

48
00:03:21,040 --> 00:03:25,040
लीला की या जो रचना रची तो वो रचना रची कि

49
00:03:25,040 --> 00:03:29,200
हम 100 साल 150 साल 50 साल 60 साल इस

50
00:03:29,200 --> 00:03:33,840
शरीर को छोड़ नहीं सकते। छोड़ना माना क्या होगा?

51
00:03:33,840 --> 00:03:37,920
जैसे शास्त्रों में कहा गया ना दीदी नृत्य अवतार नहीं भगवान का

52
00:03:37,920 --> 00:03:42,320
अभी यह भी बहुत गहरी पॉइंट है समझने की जी एक्चुअली

53
00:03:42,320 --> 00:03:46,560
उसका अवतार इस तरह के सब होते ही नहीं एक ही अवतार होता है हां

54
00:03:46,560 --> 00:03:50,720
वो तो आप आपने बताया परमेश्वर वो वाला वो तो एक बात

55
00:03:50,720 --> 00:03:54,800
है मगर एक पूछने वाली जब वो ऑलमाइटी है वो सब कुछ

56
00:03:54,800 --> 00:03:58,880
कर सकता है तो फिर वो अवतार धारण करने में दिक्कत क्या है और जो हम अवतार भी उसको

57
00:03:58,880 --> 00:04:03,280
इसलिए लेना पड़ता है अगर यह कहें कि जैसे वो बंधनों से बंध जाता

58
00:04:03,280 --> 00:04:07,440
तो जैसे फॉर एग्जांपल एक वीडियो गेम खेलने वाले के लिए वीडियो

59
00:04:07,440 --> 00:04:11,520
गेम में होते हुए भी वीडियो गेम से वो मुक्त रहता है। मुक्त रहता है ना? तो तो

60
00:04:11,520 --> 00:04:15,520
ईश्वर तो क्योंकि उसने वीडियो गेम बनाया तो वो कभी भी वीडियो गेम से फंसता ही नहीं है। वो नहीं

61
00:04:15,520 --> 00:04:19,600
फंसेगा। मतलब फिर भले ही वो अवतार धारण करे या ना करे उससे क्या फर्क पड़ता है? वो तो

62
00:04:19,600 --> 00:04:23,680
कभी बंधन में आए ही। नहीं अगर वीडियो गेम में कोई वो फंस गया कुछ हो गया तो उसको

63
00:04:23,680 --> 00:04:27,760
निकालना तो पड़ेगा ना। तो उसको निकालने के लिए तो कोई दूसरा अगर

64
00:04:27,760 --> 00:04:31,760
मैं नहीं इस वीडियो गेम को ठीक कर पा रही हूं। कुछ ऐसा गड़बड़ हो गया

65
00:04:31,760 --> 00:04:35,920
जिसको आता है वह तो फिर ठीक करेगा ना तो परमात्मा तो वो है ना जो जिसने

66
00:04:35,920 --> 00:04:40,960
उसको बनाना ठीक करना चालू करना बंद करना सब कुछ मालूम है

67
00:04:40,960 --> 00:04:44,960
नहीं वो वो ठीक है आपकी बात लेकिन परमात्मा ने जो

68
00:04:44,960 --> 00:04:49,280
सी सृष्टि रची वो जो परमात्मा आता है वो हम मनुष्य

69
00:04:49,280 --> 00:04:53,360
आत्माओं के सदस्य संसार में नहीं आता और दीदी जो ये वाला वाक्य है गीता

70
00:04:53,360 --> 00:04:57,600
का यदा यदा धर्मसानी सजाम में हम मैं अपना

71
00:04:57,600 --> 00:05:01,840
सृजन करता हूं हां तो वो सजन करता है नहीं सृष्टि का नहीं सजाम

72
00:05:01,840 --> 00:05:05,840
में हम मैं अपना सजन करता हूं अपना सृजन मींस स्वयं

73
00:05:05,840 --> 00:05:09,920
के रूप का सृजन करता हूं हां तो आता है ना

74
00:05:09,920 --> 00:05:14,080
लेकिन परकाया परकाया देखो आपने परकाया नहीं कहा हम तो ये कहते

75
00:05:14,080 --> 00:05:18,560
हैं नहीं गीता में लिखा है परकाया प्रवेश करता हूं ये जो श्लोक है परकाया

76
00:05:18,560 --> 00:05:23,120
प्रवेश भी ईश्वर कर सकता है इसमें कोई दिक्कत नहीं है बहुत बार बहुत सारी चीजें

77
00:05:23,120 --> 00:05:27,280
जो शिव अवतार शंकराचार्य जी हैं उनके ही बारे में आता है कि उन्होंने एक राजा के शरीर

78
00:05:27,280 --> 00:05:31,280
में परकाया प्रवेश करके और वो जो उनसे एक शास्त्रार्थ

79
00:05:31,280 --> 00:05:35,280
के बीच में एक कुछ प्रश्न पूछ लिया गया था। जी तो उन्होंने वो वो जो

80
00:05:35,280 --> 00:05:39,280
अनुभव था उनको अनुभव नहीं था तो उन्होंने वो अनुभव लिया था राजा के शरीर में प्रवेश करने

81
00:05:39,280 --> 00:05:43,920
का तो ये तो बहुत छोटी सी बात हो गई मगर उन्होंने वहां पर कहा

82
00:05:43,920 --> 00:05:48,320
परकाया प्रवेश से कोई दिक्कत नहीं है मगर जब वो ये कह रहे हैं ना यदा यदा धर्मस

83
00:05:48,320 --> 00:05:52,320
ग्लन भवती भारत अभस तदात्म शजाम में

84
00:05:52,320 --> 00:05:56,480
हम मैं अपना सृजन करता हूं अपने रूप का सृजन करता हूं

85
00:05:56,480 --> 00:06:00,480
ना वो फिर प्रलोप हो जाते हैं मींस कि वो जब आते हैं सृष्टि

86
00:06:00,480 --> 00:06:04,640
रूपी रंगमंच पर सृष्टि की स्थापना करते नई सृष्टि की फिर अपने

87
00:06:04,640 --> 00:06:08,640
आप को परमधाम में जैसे आते हैं फिर वो चले जाते हैं। नहीं नहीं जो उन्होंने

88
00:06:08,640 --> 00:06:12,640
कहा ना मैं अपना सृजन करता हूं। ये सृजन कर रहे हैं ना अपना

89
00:06:12,640 --> 00:06:16,960
स्वयं के रूप का सृजन कर रहे हैं। ऐसा है गीता जो है ना बहुत सारी गीताएं

90
00:06:16,960 --> 00:06:21,280
हैं। ये श्लोक तो सब में है ना? हां। तमिल गीता, टैगोर

91
00:06:21,280 --> 00:06:25,360
गीता, गांधी गीता। अब हम उस गीता की

92
00:06:25,360 --> 00:06:29,520
बात को सत्य कैसे मान ले? तो गीता को हम सत्य नहीं मान रहे।

93
00:06:29,520 --> 00:06:33,760
नहीं माना। कोई उसमें श्लोक किसी ने अपने भी मिक्स किए होंगे या कुछ ऐसा

94
00:06:33,760 --> 00:06:37,920
किया होगा तो उस बात को हम कैसे सत्य मान ले तो फिर गीता है ये हमें कैसे

95
00:06:37,920 --> 00:06:42,320
पता नहीं ये देखो कोई भी घटना घटती है

96
00:06:42,320 --> 00:06:46,400
पहले घटना घटित होती है फिर वो पेपर में आता है या टीवी

97
00:06:46,400 --> 00:06:50,480
पर आता है बाद में जो गीता है महाभारत का अंश है हां है

98
00:06:50,480 --> 00:06:54,480
ना अच्छा महाभारत से प्रथम बार शंकराचार्य जी ने गीता निकाली

99
00:06:54,480 --> 00:06:58,560
थी आदि शंकराचार्य जी जिनको शिव अवतार भी माना गया तो उन्होंने

100
00:06:58,560 --> 00:07:02,800
क्या किया था कि महाभारत का वह पार्ट है गीता उसको निकाल के उन्होंने

101
00:07:02,800 --> 00:07:07,040
जो है उसका ट्रांसलेशन किया था कमेंट्री की थी फर्स्ट टाइम गीता ऐसे बनी थी

102
00:07:07,040 --> 00:07:11,200
वरना पहले महाभारत ही था महाभारत से गीता इस तरह से अलग की थी तो आदि

103
00:07:11,200 --> 00:07:15,280
शंकराचार्य जी ने जो गीता के श्लोक स्वीकार किए महाभारत में भी वो श्लोक

104
00:07:15,280 --> 00:07:19,520
मिलते हैं तो अगर हम ये कह रहे हैं कि जैसे उसमें मिलावट हो गई तो फिर

105
00:07:19,520 --> 00:07:23,600
अगर जिससे हम गीता को ले रहे हैं हम कह रहे हैं कि मिलावट हो गई तो फिर हम

106
00:07:23,600 --> 00:07:27,760
ये कैसे कह रहे हैं कि कृष्ण थे एक्सिस्ट करते थे देखो आप शंकराचार्य जी कह

107
00:07:27,760 --> 00:07:31,840
रहे हैं हम शिवाचार्य जी कह रहे हैं जी हमें शिवाचार्य जी

108
00:07:31,840 --> 00:07:36,000
ने यह बताया कि मेरा रीइकारनेशन होता है सिर्फ बच्चों

109
00:07:36,000 --> 00:07:36,880
को परिवर्तन

110
00:07:36,880 --> 00:07:40,960
करने के लिए प्रवेश हां और इस सृष्टि का परिवर्तन करने

111
00:07:40,960 --> 00:07:44,960
के लिए तो मेरा ऐसा सर्जन ये नहीं वो तो समझो शंकराचार्य

112
00:07:44,960 --> 00:07:49,200
जी तो मनुष्य हुए है ना नहीं वो शास्त्रों में उनको शास्त्रों

113
00:07:49,200 --> 00:07:53,200
में हां वो तो शंकर भगवान अब यहां ये भी पॉइंट एकदम अलग

114
00:07:53,200 --> 00:07:57,280
हो जाती है शिव और शंकर दोनों में महान अंतर है ये भी एक

115
00:07:57,280 --> 00:08:01,360
पूरा लेसन शिव पुराण में यही कहा गया है कि वो मैं ही शिव हूं। हां

116
00:08:01,360 --> 00:08:05,360
आपके पुराण में ये कहा गया पर स्वयं शिव परमात्मा ने हमें

117
00:08:05,360 --> 00:08:09,440
जो बताया जो हमने सीखा जो हमने समझा शिव और

118
00:08:09,440 --> 00:08:14,080
शंकर दोनों में अंतर है तो एक तरीके से ये भी पूरा एक हमारा

119
00:08:14,080 --> 00:08:18,240
मना वो लेसन है जो हम इसको समझते हैं और लोगों को समझाते

120
00:08:18,240 --> 00:08:22,320
हैं तो दीदी ये जो मतलब एक तरीके से जो एक तरीके से पूरी तरीके

121
00:08:22,320 --> 00:08:26,400
से शास्त्रों पर डिपेंड नहीं है जो जितनी चीजें सभी

122
00:08:26,400 --> 00:08:30,560
शास्त्रों का सार आकर के मैं बतलाता हूं हम

123
00:08:30,560 --> 00:08:34,800
साधु संत महात्माओं का भी आकर के मैं उद्धार करता हूं।

124
00:08:34,800 --> 00:08:39,120
मतलब सीधे भगवान आके बता रहे हैं। जी तो इसलिए हम उसको प्रायोरिटी

125
00:08:39,120 --> 00:08:43,200
देते हैं और गीता और बाकी शास्त्र उतने मान्य है जितने की

126
00:08:43,200 --> 00:08:47,280
लोग मानते हैं उनका भी सार परमात्मा आकर के बतलाते हैं। जैसे कोई बात

127
00:08:47,280 --> 00:08:52,240
है आपको कोई बताई जा रही है मुझे बताइए। में एक चीज आती है कि जैसे

128
00:08:52,240 --> 00:08:56,720
मान लीजिए हमारे पास तो भगवान स्वयं आ रहे हैं तो हमने उनकी बात मान

129
00:08:56,720 --> 00:09:01,040
मगर जैसे कोई व्यक्ति ये कहता है कि मेरे पास भी आ रहे हैं वो आपके ठीक उलट

130
00:09:01,040 --> 00:09:05,040
बात करता है और वो भी कहता है मेरे पास आके भगवान ने कहा है तो फिर

131
00:09:05,040 --> 00:09:09,120
ये कैसे पता किसकी बात सही है किसकी बात गलत है एक चीज बिल्कुल

132
00:09:09,120 --> 00:09:13,200
राइट तो ये बात हो गई दूसरी बात एक ये आती है कि परमात्मा

133
00:09:13,200 --> 00:09:17,360
ने सब कुछ बनाया है खैर आपने ये कहा कि

134
00:09:17,360 --> 00:09:21,680
नई सृष्टि बनाई नई सृष्टि बनाई हम मगर आपने कहा कि वो सर्वशक्तिमान

135
00:09:21,680 --> 00:09:25,680
है। जी वो सिर्फ अच्छे कार्य करता है। जी

136
00:09:25,680 --> 00:09:29,760
मगर जब हम देखते हैं वो सर्वशक्तिमान है और अच्छे कार्य करता है।

137
00:09:29,760 --> 00:09:34,080
तो सृष्टि जब बिगड़ रही है हम तो परमात्मा उसको रोक सकता है बिगड़ने से

138
00:09:34,080 --> 00:09:38,400
मगर किनहीं कारणों से नहीं रोक रहा है। वो होने दे रहा है। है ना? हम

139
00:09:38,400 --> 00:09:42,640
तो इसमें क्या आ गया कि ये जो बिगड़ा परमात्मा की सत्ता

140
00:09:42,640 --> 00:09:46,800
में ही बिगड़ा। हम परमात्मा अगर वह सर्वशक्तिमान है तो रोक

141
00:09:46,800 --> 00:09:50,800
सकता है और रोकना तो अच्छा कार्य है। रोकना तो पॉजिटिव है ना

142
00:09:50,800 --> 00:09:55,680
हम तो वह रोक सकता है मगर उसने नहीं रोका तो परमात्मा की सत्ता में बिगड़ा

143
00:09:55,680 --> 00:09:59,680
हम तो इसका मतलब कि अगर कोई आकर के हमसे गलत बात कहेगा परमात्मा

144
00:09:59,680 --> 00:10:03,760
के नाम से तो वो भी परमात्मा की सत्ता में ही आ गया ना यह नहीं है

145
00:10:03,760 --> 00:10:07,440
राजे हम क्योंकि परमात्मा जो यह

146
00:10:07,440 --> 00:10:11,440
सृष्टि है क्योंकि ये नाटक है दुख और सुख हार और जीत

147
00:10:11,440 --> 00:10:15,680
का अभी इस दुनिया में जो कलयुगी दुनिया चल रही है इसमें सब

148
00:10:15,680 --> 00:10:19,680
कुछ नेगेटिव नेगेटिव माना गलत गलत गलत हो रहा है

149
00:10:19,680 --> 00:10:24,480
लेकिन वह गुप्त वेश में अपना कार्य कर रहा है। संदेशवाहक

150
00:10:24,480 --> 00:10:28,720
हैं हम सभी को संदेश दे रहे हैं कि सृष्टि पुरानी हो चुकी

151
00:10:28,720 --> 00:10:32,880
है। अब इस सृष्टि को नया बनाने के लिए परमपिता परमात्मा

152
00:10:32,880 --> 00:10:36,880
आ चुका है। तो जो आप यह बात कह रहे थे कैसे माने कि यहां

153
00:10:36,880 --> 00:10:41,040
परमात्मा है। देखो हम उनको आप आप भी हो गए

154
00:10:41,040 --> 00:10:45,280
मैं भी हो गई। मैं आपको सुना रही हूं बता रही हूं। अपने अनुभव के आधार पर

155
00:10:45,280 --> 00:10:49,360
जो मैंने यह ज्ञान सुना है और सुनकर के अपने जीवन में धारण करना

156
00:10:49,360 --> 00:10:53,360
किया है वो मैं आपको बता रही हूं। कंपलसरी नहीं

157
00:10:53,360 --> 00:10:57,600
है कि आप मेरी बातों को मानो। जजमेंट आपकी है

158
00:10:57,600 --> 00:11:02,080
कि वो भी आपने सुना यह भी आप आप सुन रहे हैं तो उसकी जजमेंट

159
00:11:02,080 --> 00:11:06,080
आपने करनी है। हम लोगों को यही बताते हैं। ये भी आप सुन रहे हैं।

160
00:11:06,080 --> 00:11:10,320
वो भी हम आपको ये नहीं कहते कि आपको ये बात माननी ही है। बिल्कुल तो

161
00:11:10,320 --> 00:11:14,400
इसलिए आपकी अपनी जजमेंट है। हम कहें शास्त्र गलत है, महात्माएं

162
00:11:14,400 --> 00:11:19,360
गलत है, वो गलत है। नेवर हम ये नहीं कहते हैं। आपने अपनी बात बता दी और

163
00:11:19,360 --> 00:11:22,560
जितना उसको सुनना है और सुनकर के उसको जजमेंट उसने

164
00:11:22,560 --> 00:11:26,640
करनी है। मतलब कहने का यह है कि अगर कोई आकर के यह कहता है मुझे भी परमात्मा ने कुछ

165
00:11:26,640 --> 00:11:31,040
बताया तो हम ठीक है भैया तुम्हें अगर परमात्मा बता रहे हैं तो ठीक है फिर चाहिए

166
00:11:31,040 --> 00:11:36,160
वैसे देखो मुझे एक बात याद आती है कि रावण था

167
00:11:36,160 --> 00:11:41,280
बहुत उसने वेद शास्त्र क्या है ना कि जब हम

168
00:11:41,280 --> 00:11:45,280
कहीं आज के युवाओं के बीच में खड़े हैं तो ये लूप होल्स वो लोग

169
00:11:45,280 --> 00:11:49,360
पकड़ते हैं जैसे आपको आ के भगवान बता रहे हैं डायरेक्ट ठीक है

170
00:11:49,360 --> 00:11:53,520
हमको वो वाला कह रहा है वो मेरे पास आ रहे हैं तो फिर चूस कैसे और अनुभव

171
00:11:53,520 --> 00:11:57,600
करके ही चूज़ होगा। तो हमें वहां अगर उसने कहा कि आप हमारे यहां 7

172
00:11:57,600 --> 00:12:01,680
दिन नहीं 50 दिन आओ वो 50 दिन का अनुभव उसको देना पड़ेगा और

173
00:12:01,680 --> 00:12:05,840
फिर अगर हमें अनुभव नहीं हुआ उसके बाद तो कोई तीसरा कहेगा 100 दिन आओ

174
00:12:05,840 --> 00:12:10,480
तो हमें उसको अनुभव देना तो हमें कुछ ना कुछ एक शुरुआती का

175
00:12:10,480 --> 00:12:14,640
जैसे कुछ भी कहने का पैरामीटर एक रखना पड़ेगा और उसमें ये वाली

176
00:12:14,640 --> 00:12:18,640
बात आती है कि जैसे हमने कहा कि ईश्वर सब कुछ अच्छा कर सकता

177
00:12:18,640 --> 00:12:22,880
है। अच्छा तो मतलब है कि वो रक्षा कर सकता है। जी तो जैसे

178
00:12:22,880 --> 00:12:27,040
कोई झूठ बोलने आ रहा है ईश्वर उसका मुंह बंद कर सकता है। ये तो अच्छा

179
00:12:27,040 --> 00:12:31,120
कार्य है। सत्य की स्थापना मगर उसने नहीं किया। जबकि वो कर

180
00:12:31,120 --> 00:12:35,200
सकता है। तो इसका मतलब जो झूठ बोला गया ईश्वर के नाम से वो

181
00:12:35,200 --> 00:12:37,600
उसकी सत्ता में आ गया। मतलब उसके अंडर में

182
00:12:37,600 --> 00:12:41,760
आ गया। अब उसने क्यों नहीं बोला? वो उसकी एक रीजनिंग अलग है कि वो पकड़ता

183
00:12:41,760 --> 00:12:45,760
क्यों नहीं है उसका मुंह। है ना? मगर उसकी सत्ता में हुआ। उसकी सत्ता

184
00:12:45,760 --> 00:12:49,760
में यदि हुआ तो फिर हम यह पता कैसे लगाएं कि कौन सी गलत चीज उसकी सत्ता में

185
00:12:49,760 --> 00:12:53,840
हो रही है? कौन सी चीज उसकी सत्ता में नहीं हो रही है? यह वाली चीज से ये

186
00:12:53,840 --> 00:12:57,840
तो साफ मालूम पड़ता है एक चोर है, चोरी कर रहा है, झूठ बोल रहा है। ये

187
00:12:57,840 --> 00:13:02,000
भी कर रहा है। ये एक कर्म फिलॉसफी है। हां। तो उसके

188
00:13:02,000 --> 00:13:06,080
पास एक सवाल एक्सजेक्टली ये है कि उसके पास एक रीजनिंग है उसका मुंह

189
00:13:06,080 --> 00:13:10,160
बंद ना करने के ठीक। तो इसका मतलब है कि जो किसी कारण

190
00:13:10,160 --> 00:13:14,400
से ही सही यदि कोई झूठा ज्ञान दे रहा है भगवान के नाम से

191
00:13:14,400 --> 00:13:18,400
वो उसी की सत्ता में हो रहा है। वो होने दे रहा है। हां हो रहा है। चल

192
00:13:18,400 --> 00:13:22,720
रहा है उसको क्या कहूं? न्यारा प्यारा है। तो फिर जो एक्टर एक्टिंग कर रहा है ये भी एक्टिंग

193
00:13:22,720 --> 00:13:26,880
ही है। कि किसी कारण से धर्म के नाम से गलत ज्ञान देना

194
00:13:26,880 --> 00:13:31,040
भी ईश्वर की उसमें आ गया सत्ता में। तो फिर इसमें एक दिक्कत ये आती है कि

195
00:13:31,040 --> 00:13:35,520
ईश्वर जब स्वयं आकर के हमसे कुछ कह रहे हैं तो हो सकता है कि वो भी एक कर्म फिलॉसफी

196
00:13:35,520 --> 00:13:39,600
के अनुसार हो। जैसे उसने कहीं पर जैसे उसने फॉर एग्जांपल जैसे उसने

197
00:13:39,600 --> 00:13:44,240
कहीं पर किसी को धर्म के नाम से झूठ बोलने दिया। उसका मुंह नहीं पकड़ा।

198
00:13:44,240 --> 00:13:48,320
ठीक है? तो क्योंकि किसी का कर्म ऐसा रहा होगा कि उसको धर्म के नाम से झूठ

199
00:13:48,320 --> 00:13:52,400
मिले और किसी का कर्म ऐसा रहा होगा कि वो धर्म के नाम से झूठ बोले। इसलिए

200
00:13:52,400 --> 00:13:52,900
उसने

201
00:13:52,640 --> 00:13:57,200
ऐसा होने दिया। तो उसने नहीं होने दिया राज

202
00:13:57,200 --> 00:14:01,200
क्योंकि यह कर्म फिलॉसफी ऐसी है कि कर्म के बंधन में मनुष्य

203
00:14:01,200 --> 00:14:05,280
ऐसा बन जाता है कई बार उसको यह मालूम होता है यह गलत है क्योंकि

204
00:14:05,280 --> 00:14:09,520
कॉन्शियस माइंड सबकॉन्शियस माइंड दो चीजें होती है जो मनुष्य

205
00:14:09,520 --> 00:14:13,520
जैसे चोरी करता है झूठ बोलता है उसकी कॉन्शियस ये अलऊ ही

206
00:14:13,520 --> 00:14:17,760
नहीं करती है कि यह मैं गलत कर रहा हूं पहले उसकी

207
00:14:17,760 --> 00:14:21,840
कॉन्शस ये हां सॉरी यह एहसास उसको एहसास होता

208
00:14:21,840 --> 00:14:26,240
है कि जो मैं यह काम कर रहा हूं। यह गलत है। लेकिन ऐसे कुछ

209
00:14:26,240 --> 00:14:30,480
अपने संस्कारों के वशीभूत आत्मा हो जाती है जो ना चाहने के बावजूद

210
00:14:30,480 --> 00:14:34,720
भी झूठ भी बोल रहा है तो आप चोरी भी कर रहे हैं। वो कर लेता है। ये बात तो

211
00:14:34,720 --> 00:14:38,880
बाकी कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है। अंदर से एक आवाज आती है गलत आवाज आती है। मगर प्रॉब्लम

212
00:14:38,880 --> 00:14:43,200
ये है ना कि जैसे कोई किसी की बहन के प्रति कुदृष्टि हो रही है।

213
00:14:43,200 --> 00:14:47,360
है ना? मगर उसके अंदर से आवाज आई। उसने अंदर की आवाज को दबा दिया। दबा दिया।

214
00:14:47,360 --> 00:14:51,360
तो हम उससे ये नहीं कह सकते अगर हमने एक निश्चित

215
00:14:51,360 --> 00:14:55,680
पैरामीटर नहीं बनाया ना धर्म तो हम उससे ये नहीं कह सकते कि तू इसकी ओर कुदृष्टि

216
00:14:55,680 --> 00:14:59,920
मत डाल क्योंकि वो ये कहेगा कि क्यों ना डालूं तो हम कहेंगे धर्म ने कहा है

217
00:14:59,920 --> 00:15:04,080
या ईश्वर ने कहा है मैं क्यों मानू तो तो वो ये कहेगा वो ये कहेगा कि मेरे

218
00:15:04,080 --> 00:15:07,760
पास जो ईश्वर आ रहा है वो वो ये कह रहा है और इसमें हम सिद्ध नहीं कर सकते

219
00:15:07,760 --> 00:15:12,160
हां इसमें नहीं लॉजिकली कुछ नहीं कर सकते इस चीज बिल्कुल ये चीज है अच्छा

220
00:15:12,160 --> 00:15:16,240
दीदी एक बात और है थोड़ा सा एक टॉपिक और है छोटा सा कि

221
00:15:16,240 --> 00:15:20,480
जैसे हम हम ये कहते हैं कि ईश्वर सर्वदृष्टा तो है।

222
00:15:20,480 --> 00:15:23,040
हम

223
00:15:23,040 --> 00:15:27,040
हां दृष्टि रखता है। साक्षी होकर देखता है। पूरे विश्व को

224
00:15:27,040 --> 00:15:31,920
जानता है कि कौन क्या कर रहा है क्या नहीं कर रहा। चीज वो देख रहा है। लेकिन वो

225
00:15:31,920 --> 00:15:35,920
क्योंकि यही बात आ जाती है। वो आत्मा कर्म के बंधन में है जो करती

226
00:15:35,920 --> 00:15:40,080
ही है और करेगी। क्योंकि उस परमात्मा से जैसे अभी मैं

227
00:15:40,080 --> 00:15:44,160
कह सकती हूं मेरा डायरेक्ट संबंध है क्योंकि राजयोग के

228
00:15:44,160 --> 00:15:48,240
द्वारा कंट्रोलिंग पावर आती है। अगर मैं गलत संकल्प भी कर रही

229
00:15:48,240 --> 00:15:52,480
हूं ना तो मैं उस संकल्प को भी खत्म करूंगी। मैं पॉजिटिव

230
00:15:52,480 --> 00:15:56,720
संकल्प करूंगी। बोल भी पॉजिटिव बोलूंगी। कर्म भी पॉजिटिव करूंगी। क्योंकि

231
00:15:56,720 --> 00:16:01,440
डायरेक्ट उससे कनेक्शन होने से मुझे वो सर्वशक्तिमान

232
00:16:01,440 --> 00:16:05,440
परमात्मा से शक्ति प्राप्त होती है कि मैं गलत ना करूं। मैं

233
00:16:05,440 --> 00:16:09,520
वही कह रहा हूं। वो अगर सर्वद है हां तो यानी कि उसकी

234
00:16:09,520 --> 00:16:13,600
दृष्टि सब जगह है। हम वो सब देख रहा है। देख सकता है। तो कई ऐसी

235
00:16:13,600 --> 00:16:17,600
चीजें होती हैं इस संसार में जिन्हें देखना हमारे लिए पाप होता है।

236
00:16:17,600 --> 00:16:21,680
है ना? हम मगर वो उनको देख रहा है। हम इसका अर्थ ये माना जाए कि

237
00:16:21,680 --> 00:16:22,800
जो हमारे लिए पाप है

238
00:16:22,800 --> 00:16:26,960
उसके लिए पाप नहीं है। या फिर ये माना जाए वो इतने अंश में वो भी पाप कर रहा है।

239
00:16:26,960 --> 00:16:31,200
नहीं नहीं वो न्यूट्रल है। न्यूट्रल है क्योंकि उसको

240
00:16:31,200 --> 00:16:35,360
वो देखते हुए भी उसको कोई मतलब ही नहीं है। न्यूट्रल है। देखते हुए भी नहीं देखता वो। वही

241
00:16:35,360 --> 00:16:39,440
मैं कह रहा हूं कि बुरी चीजों से हम लोग ये सोच जैसे अभी हम होते हैं ना कहीं जा रहे हैं हमें पता है

242
00:16:39,440 --> 00:16:43,680
कचरा पड़ा है कहीं नॉनवेज है ये है तो एकदम ऐसे

243
00:16:43,680 --> 00:16:47,760
कर लेंगे पता है ये ऐसे है पर देखते हुए भी हम जैसे इग्नोर अवॉयड

244
00:16:47,760 --> 00:16:51,840
कर जैसे डॉक्टर का उदाहरण हां डॉक्टर कई अंशों में ऐसी चीजें कर रहा होता है

245
00:16:51,840 --> 00:16:55,840
जो दूसरे सामान्य व्यक्ति के द्वारा देखा जाना पाप है मगर डॉक्टर देखता

246
00:16:55,840 --> 00:17:00,160
है तो हम देखने देते हैं क्योंकि वो डेफिनेटली क्योंकि वो पाप है

247
00:17:00,160 --> 00:17:04,240
तो क्योंकि वो उसको ठीक कर रहा है क्योंकि उसका उसका उद्देश्य वहां पर वो

248
00:17:04,240 --> 00:17:08,240
गलत नहीं गलत जिस हिसाब से जिन कर्मों से मनुष्य को दोषी

249
00:17:08,240 --> 00:17:12,480
माना जाता है उन्हीं कर्मों से ईश्वर को दोषी नहीं माना जाएगा क्योंकि उसका जो

250
00:17:12,480 --> 00:17:15,360
वो किसी भी

251
00:17:15,360 --> 00:17:19,440
के लिए विषय के लिए आसक्त नहीं है अच्छा है ना भूख के लिए आसक्त

252
00:17:19,440 --> 00:17:23,520
नहीं है इसीलिए वो किसी भी उससे माना नहीं जाएगा तो फिर किसी सभी कर्मों

253
00:17:23,520 --> 00:17:27,520
से को करने में क्या दिक्कत है क्योंकि नहीं दिक्कत क्यों नहीं

254
00:17:27,520 --> 00:17:31,840
कर्म प्रधान है ना जो मनुष्य कर्म कर लेता है उसका फल चाहे वो समुद्र

255
00:17:31,840 --> 00:17:36,160
की गहराई में चला जाए कहीं नहीं चला जाए वो वो फल तो उसको मिलेगा ही मिलेगा।

256
00:17:36,160 --> 00:17:37,840
ये मनुष्य आत्माओं के कर्म

257
00:17:37,840 --> 00:17:42,320
अकर्म विकर्म की गति है। परमात्मा इन सब से भी न्यारा है।

258
00:17:42,320 --> 00:17:46,320
जी नहीं उनको उसको कुछ सही है। मैं ये कह

259
00:17:46,320 --> 00:17:50,560
रहा था जैसे हमने कहा ना वो बुरे कर्म नहीं करता। तो परमात्मा के लिए जो हमारे

260
00:17:50,560 --> 00:17:54,640
लिए बुराई है वो तो बुराई है ही। नहीं देखो ऐसा है। ऐसा नहीं है। वो इस दृष्टिकोण

261
00:17:54,640 --> 00:17:58,640
से नहीं देखता है। क्योंकि उसके लिए किसी जैसे उन्होंने कहा ना मैं किसी समस्त कर्मों

262
00:17:58,640 --> 00:18:02,720
को करते हुए मैं करता हूं। तो मैं क्योंकि मैं किसी भी कर्म के

263
00:18:02,720 --> 00:18:06,880
फल में लिप्त नहीं हूं। लिफ्ट नहीं होता क्योंकि उनको जैसे मान लीजिए वो कहीं पर है और वो उसको

264
00:18:06,880 --> 00:18:10,960
कुछ दिख रहा है जो पाप है जिसको देखना हमारे लिए क्योंकि हमारे अंदर उसके

265
00:18:10,960 --> 00:18:14,960
लिए वासना है जिसको देख के पाप आ रहा है पाप का दोष लग रहा है मगर

266
00:18:14,960 --> 00:18:18,960
ईश्वर तो मुक्त है न्यारा प्यारा चाहिए ही नहीं जब चाहिए नहीं तो

267
00:18:18,960 --> 00:18:23,040
उसको देखने से उसे पाप नहीं लग रहा क्योंकि वो आसक्त नहीं है तो फिर हम फिर एक्चुअली

268
00:18:23,040 --> 00:18:27,040
हम इन चरम चक्षु से देख रहे हैं ना इसलिए उसमें बंध गए हम

269
00:18:27,040 --> 00:18:31,120
तो फिर क्योंकि देखना भी पाप है ना जो कहा और ये डेफिनेटली

270
00:18:31,120 --> 00:18:35,120
है किसी को हम देख रहे हैं उसको कुछ नहीं कर पा रहे हैं। ये भी पाप हो जाता है।

271
00:18:35,120 --> 00:18:39,440
लेकिन परमात्मा इन नेत्रों से नहीं देखता है। हम वो जानता

272
00:18:39,440 --> 00:18:43,600
है, पहचानता है सब कुछ कि संसार ऐसा हो रहा है। इसलिए

273
00:18:43,600 --> 00:18:47,760
इसमें रचक मात्र भी इनवॉल्व नहीं होता है।

274
00:18:47,760 --> 00:18:51,760
तो फिर दीदी वो तो अच्छाई और बुराई से परे हो गया ना। परे हो गया। तो जब परे हो

275
00:18:51,760 --> 00:18:52,960
गया तो हम ये क्यों कह रहे हैं कि

276
00:18:52,960 --> 00:18:56,960
मतलब वो सिर्फ अच्छे काम करता है और बुरे काम नहीं करता। करता नहीं है वो

277
00:18:56,960 --> 00:19:01,520
सिखलाता है सिर्फ। देखो अभी समझो। नहीं नहीं नहीं किसी ने नहीं।

278
00:19:01,520 --> 00:19:05,600
किसी ने रास्ता पूछा मेरे से तो मैंने उसको रास्ता बता दिया। रास्ता उधर

279
00:19:05,600 --> 00:19:09,760
जा रहा है। यह रास्ता उधर जा रहा है। अगर एक दुख का रास्ता मैं उधर जा रही तो मैं दुखी

280
00:19:09,760 --> 00:19:13,760
होगी। डेफिनेटली अगर सुख के रास्ते पे जाऊंगी सुखी होंगी। लेकिन

281
00:19:13,760 --> 00:19:17,760
आपने तो बता दिया और बता के आप चले गए। मगर यदि

282
00:19:17,760 --> 00:19:22,080
कर्म किया होगा कि उसको दंड मिलना है कि उसको जो है

283
00:19:22,080 --> 00:19:26,240
इधर भेजा जाए। भटकाया ही जाए। तो वो उसको भटकाएगा

284
00:19:26,240 --> 00:19:30,640
नहीं। भगवान नहीं भटका सकता ना। मनुष्य

285
00:19:30,640 --> 00:19:34,800
भी जो सही मनुष्य होगा वह भी उसको भटकाएगा नहीं। बाकी मनुष्य

286
00:19:34,800 --> 00:19:38,960
कर्म का भगवान के लिए तो कुछ भी अच्छा और बुरा है ही नहीं ना जैसा हमने अभी पता

287
00:19:38,960 --> 00:19:43,040
किया। हां नहीं अच्छा बुरा नहीं है। अगर देखिए जैसे दुख हर्ता सुख्ता

288
00:19:43,040 --> 00:19:47,040
तो है ना। मैं बस एक चीज बता जैसे कि हमारे लिए अच्छाई और बुराई

289
00:19:47,040 --> 00:19:51,360
इस बात पर डिपेंड है कि हमें देवत्व को प्राप्त करना है। मगर ईश्वर तो पहले से ही देवत्व

290
00:19:51,360 --> 00:19:55,440
को प्राप्त किए हुए हैं। उसको देवत्व को नहीं है। वो तो परम परम पद को प्राप्त किए

291
00:19:55,440 --> 00:19:59,440
हुए हैं। है ना? सदा ही है। सदा ही है। सदा ही है। तो फिर उसको ये अच्छाई

292
00:19:59,440 --> 00:20:03,600
बुराई में कैसे फर्क इंटरेस्ट वगैरह उसको तो ये इंटरेस्ट नहीं है। ज्ञाता

293
00:20:03,600 --> 00:20:07,600
तो सारी सृष्टि का है ना। ज्ञान का सागर है वो। हां। तो फिर

294
00:20:07,600 --> 00:20:08,160
हम उससे

295
00:20:08,160 --> 00:20:12,240
उससे धर्म का पल तो हर ज्ञान हमें देता है। वो समझ

296
00:20:12,240 --> 00:20:16,240
देता है। ये समझ दे रहा है। अब उस पर चलना ना चलना और चलते

297
00:20:16,240 --> 00:20:20,320
हैं नहीं चलते हैं। वैसा ही फल हम पाते हैं। जो करेगा सो पाएगा।

298
00:20:20,320 --> 00:20:24,320
जैसा करेगा वैसा पाएगा। जितना करेगा उतना पाएगा। तो वह सिर्फ

299
00:20:24,320 --> 00:20:28,560
हमें एक कर्म फिलॉसफी बताता है। उस पर चलना ना चलना

300
00:20:28,560 --> 00:20:32,560
यह हमारे ऊपर है। नहीं उसने बता दी वह ठीक है। मगर ये जो गलत

301
00:20:32,560 --> 00:20:36,640
विचार आ रहे हैं मन में क्योंकि संसार ऐसा है ना तो ये

302
00:20:36,640 --> 00:20:40,640
ऑटोमेटिकली आते हैं। हां ये कोई भगवान नहीं देता है। तो दूसरी चेतन

303
00:20:40,640 --> 00:20:44,800
आत्मा के नहीं आत्मा चेतन शक्ति है ना। हां। आत्मा

304
00:20:44,800 --> 00:20:48,960
चेतन शक्ति है। आत्मा के अंदर मन बुद्धि संस्कार है।

305
00:20:48,960 --> 00:20:53,200
जी जी जी नहीं मैं समझ गया। इसमें ऐसे करते हैं। जैसे

306
00:20:53,200 --> 00:20:57,200
आत्मा है वो खाली है। मतलब जब मुक्ति है तो खाली है।

307
00:20:57,200 --> 00:21:01,280
उस टाइम में खाली कहेंगे लेकिन क्योंकि उसमें वो संस्कार उस तरह

308
00:21:01,280 --> 00:21:05,520
के है तो सही जैसे फोन है डेड है। हमने चार्ज नहीं किया।

309
00:21:05,520 --> 00:21:09,600
मतलब आत्मा के अंदर ये पहले से ही है बुरे कर्म पूरे आत्मा

310
00:21:09,600 --> 00:21:13,600
के अंदर जैसे फोन के अंदर सभी चिप के अंदर सब होता है

311
00:21:13,600 --> 00:21:17,840
लेकिन समय अनुसार वो उसकी रिकॉर्डिंग जैसे भरी गई उसको आप कहां

312
00:21:17,840 --> 00:21:21,840
प्रेस करते हैं वो चलती रहती है यानी कि आत्मा का ये स्वभाव है बुरे कर्म

313
00:21:21,840 --> 00:21:23,600
करना ये आत्मा

314
00:21:23,600 --> 00:21:27,680
के अंदर रिकॉर्डिंग भरी हुई है लेकिन मर्ज इमर्ज होती

315
00:21:27,680 --> 00:21:31,840
है तो फिर यह तो फिर वो हो गया ना कि भाई जैसे हमने कहा था आत्मा

316
00:21:31,840 --> 00:21:35,920
का धर्म में शांति अब आत्मा का धर्म बुरे कर्म हो गया नहीं क्योंकि

317
00:21:35,920 --> 00:21:40,080
दोनों पार्ट है ना उसमें तो संसार ही संसार ही दुख सुख

318
00:21:40,080 --> 00:21:44,080
का नहीं आत्मा का धर्म शांति है। नेचुरल इनबिल्ट है

319
00:21:44,080 --> 00:21:48,160
ना उसमें हां नेचुरल नेचर तो शांति ही है लेकिन जब बॉडी

320
00:21:48,160 --> 00:21:52,240
कॉन्शियसनेस में आते हैं तो मन अशांत होता है। आप यह अनुभव

321
00:21:52,240 --> 00:21:56,400
करके देखो कि जब मैं सोल कॉन्शियसनेस में हूं जी

322
00:21:56,400 --> 00:22:00,560
मैं आत्मा शांत स्वरूप हूं। प्रेम स्वरूप हूं। सुख स्वरूप हूं।

323
00:22:00,560 --> 00:22:04,560
ज्ञान स्वरूप हूं। पवित्र स्वरूप हूं। शक्ति स्वरूप हूं। जी यह

324
00:22:04,560 --> 00:22:09,120
आत्मा की नेचुरल नेचर है। लेकिन जब मैं बॉडी कॉन्शसनेस

325
00:22:09,120 --> 00:22:13,120
में आती हूं तो मेरी वृत्तियां भी खराब होती है, गुस्सा भी आता

326
00:22:13,120 --> 00:22:17,120
है, लालच भी आता है, मोह भी पैदा होता है, ईगो

327
00:22:17,120 --> 00:22:21,280
अहंकार भी आता है। दिक्कत यही पे यहीं पे कंफ्यूजन है दीदी कि पहले जब

328
00:22:21,280 --> 00:22:25,440
शरीर से पहले आत्मा में वो चीजें थी कि नहीं थी? थी थी। तो फिर उसका

329
00:22:25,440 --> 00:22:29,520
उसके मूल में जैसे शांति है आत्मा के अंदर तो जैसे ही वो शरीर

330
00:22:29,520 --> 00:22:33,760
में आती है तो शांति भी ढूंढती है। तो ऐसे ही जब वो मूल में उसके शांति के साथसाथ

331
00:22:33,760 --> 00:22:38,000
बुराई भी है। तो जब वो शरीर से जुड़ती है तो बुराई भी ढूंढती है। फिर बुराई

332
00:22:38,000 --> 00:22:38,720
ऑटोमेटिकली आ

333
00:22:38,720 --> 00:22:42,960
जाती है। यानी कि आत्मा का धर्म सिर्फ शांति नहीं है। बुराई भी है। आत्मा का धर्म।

334
00:22:42,960 --> 00:22:47,040
आत्मा का धर्म नहीं कहेंगे। जब बॉडी में आती है तो अधर्म करना

335
00:22:47,040 --> 00:22:51,040
शुरू कर देती है। तो अनंत पहले से था ना उसके अंदर नहीं आत्मा में

336
00:22:51,040 --> 00:22:55,680
है या नहीं है लेकिन बॉडी कॉन्शियसनेस नहीं आत्मा में था ना शुरू से

337
00:22:55,680 --> 00:22:59,680
में तो भरा हुआ है सारा 84 जन्मों का आत्मा में पार्ट भरा

338
00:22:59,680 --> 00:23:03,680
हुआ है मतलब उसके अंदर बुराई इनबिल्ट है तो अगर वो शांति में

339
00:23:03,680 --> 00:23:07,680
जाएगी तो उसको एक ना एक दिन बुराई करनी ही करनी है और अगर वो बुराई में जाएगी तो

340
00:23:07,680 --> 00:23:11,840
एक ना एक दिन शांति पानी ही पानी आएगी क्योंकि 50-50 है वो होती रहती है जब

341
00:23:11,840 --> 00:23:16,000
द्वापर से आत्मा आती है कि आत्मा के दोनों धर्म हो गए शांति भी हो गई बुराई भी हो गई

342
00:23:16,000 --> 00:23:20,320
जब वो शांति को पकड़ेगी तो बुराई नहीं आएगी। जब बुराई को पकड़ेगी तो शांति आएगी।

343
00:23:20,320 --> 00:23:24,880
यही कह सकते हैं जब सोल कॉन्शसनेस है तो शांति है। बॉडी कॉन्शियसनेस

344
00:23:24,880 --> 00:23:29,280
है तो अशांति है। और अशांति से माना बॉडी से सारे विकार

345
00:23:29,280 --> 00:23:33,360
जितने भी संसार में आत्मा में शरीर में आ जाते हैं। जैसे देवत्व प्राप्त

346
00:23:33,360 --> 00:23:37,520
हो गए। फिर नहीं होगा। फिर नहीं तो वहीं से तो गिरता है ना दोबारा आता है। हां पहले

347
00:23:37,520 --> 00:23:41,600
तो 16 कला संपूर्ण संपूर्ण निर्विकारी मर्यादा पुरुषोत्तम अहिंसा परमो

348
00:23:41,600 --> 00:23:45,680
धर्म है। हो गए। फिर धीरे-धीरे उतरता जाता उतरता जाता फिर वो

349
00:23:45,680 --> 00:23:49,680
शांति से अधर्म की ओर अधर्म से शांति शांति तो दोनों धर्म हो

350
00:23:49,680 --> 00:23:53,760
गए खेल हो गया ये आत्मा के दोनों धर्म हो गए दुख सुख का जीत

351
00:23:53,760 --> 00:23:57,920
का खेल कहेंगे इसको बहुत बहुत धन्यवाद दीदी आपका ये ईश्वरीय

352
00:23:57,920 --> 00:24:03,200
विश्वविद्यालय कोरा कागज है कोई कुछ भी पूछे किसी भी

353
00:24:03,200 --> 00:24:07,200
स्टेज पर पूछे कहां भी पूछे जो हम हैं वो हम पूछ सकते तो

354
00:24:07,200 --> 00:24:11,280
जैसे ज्यों का त्यों ही बताया जाता है कोई बात नहीं ठीक है दीदी बहुत-बहुत आपका

355
00:24:11,280 --> 00:24:15,360
आभार आपने इतना समय दिया और मेरा अनुभव बहुत अच्छा रहा आपके साथ। बहुत सारी

356
00:24:15,360 --> 00:24:19,440
चीजें जानने को मिली। इसके लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। तो आप लोगों को ये

357
00:24:19,440 --> 00:24:23,440
चर्चा कैसी लगी? आप लोग अवश्य बताएं और दीदी से यदि आपको मिलना है तो

358
00:24:23,440 --> 00:24:27,600
राजौरी गार्डन में है। बहुत ही वरिष्ठ विद्वान है ब्रह्मा कुमारीज की।

359
00:24:27,600 --> 00:24:31,840
तो आप लोग बताएं कैसा लगा और यहां जब भी आए दिल्ली में तो जरूर

360
00:24:31,840 --> 00:24:36,080
एक बार राजरी गार्डन दिल्ली से आकर जय श्री राम।

361
00:24:36,080 --> 00:24:40,080
ओम शांति।
