1
00:00:03,680 --> 00:00:07,840
जो बात करता है ब्रह्मा कुमारी इसमें

2
00:00:07,840 --> 00:00:11,920
जैसे ब्रह्मा कुमारी कहता है कि सभी धर्मों

3
00:00:11,920 --> 00:00:16,000
की बात कहता है ब्रह्मा कुमारी तो धर्म क्या है ब्रह्मा कुमारी

4
00:00:16,000 --> 00:00:18,720
के अनुसार

5
00:00:18,720 --> 00:00:22,880
पहले मैं धर्म कहूं तो मैं कौन

6
00:00:22,880 --> 00:00:27,120
हम दो शब्द सुबह से लेकर के रात्रि

7
00:00:27,120 --> 00:00:31,280
तक संबोधित करते हैं। मैं और मेरा तो मैं कहने

8
00:00:31,280 --> 00:00:35,440
वाली सत्ता अलग है और मेरा अलग है।

9
00:00:35,440 --> 00:00:39,600
जैसे साड़ी अलग है और मैं अलग हूं। ऐसे

10
00:00:39,600 --> 00:00:43,840
ही शरीर को चलाने वाली सत्ता एक अति सूक्ष्म

11
00:00:43,840 --> 00:00:48,080
ज्योति बिंदु आत्मा है। एनर्जी है। जी जो इस शरीर

12
00:00:48,080 --> 00:00:54,080
को चलाती है। तो आत्मा

13
00:00:54,800 --> 00:00:59,120
मेन एक पॉइंट है कि जो हम आज इसको

14
00:00:59,120 --> 00:01:03,920
भूले हुए हैं। आप देखेंगे शरीर के अंदर आत्मा नहीं है।

15
00:01:03,920 --> 00:01:08,000
आंखें हैं देख नहीं सकती। मुख है बोल नहीं सकता। कान है सुन नहीं

16
00:01:08,000 --> 00:01:12,640
सकते तो देखने सुनने बोलने हर कर्म करने वाली

17
00:01:12,640 --> 00:01:16,800
वह अति सूक्ष्म ज्योति बिंदु आत्मा ही है तो

18
00:01:16,800 --> 00:01:21,040
आत्मा की जो नॉलेज है वह यहां पर मैं

19
00:01:21,040 --> 00:01:25,360
जैसा अनुभव करती हूं और जैसे मैं जान पाई हूं 50 55

20
00:01:25,360 --> 00:01:29,520
वर्षों में उस परमपिता परमात्मा ने ही नॉलेज दी

21
00:01:29,520 --> 00:01:33,680
है। आज दिन तक हमने शास्त्रों में सुना है थोड़ा आत्मा

22
00:01:33,680 --> 00:01:37,680
है। आत्मा यह करती है आत्मा। लेकिन एक्चुअली अभ्यास जो

23
00:01:37,680 --> 00:01:41,840
कराया जाता है, उसकी प्रैक्टिस जो कराई जाती है, वह हम

24
00:01:41,840 --> 00:01:45,840
यहां पर ना केवल मैं आने वाले विद्यार्थी जो भी यहां

25
00:01:45,840 --> 00:01:50,080
के रेगुलर विद्यार्थी हैं या जो भी हमारी दीदियां हैं,

26
00:01:50,080 --> 00:01:54,160
दादियां हैं, वरिष्ठ हैं, उन्होंने भी यह अभ्यास किया। इवन साकार

27
00:01:54,160 --> 00:01:58,240
प्रजापिता ब्रह्मा ने भी यह अभ्यास किया कि मैं आत्मा

28
00:01:58,240 --> 00:02:02,400
हूं और मेरा यह शरीर है। अगर इस शरीर के अंदर आत्मा

29
00:02:02,400 --> 00:02:06,480
नहीं तो शरीर जड़ है, डेड बॉडी है और इसको जाकर के जला दिया

30
00:02:06,480 --> 00:02:10,560
जाता है। आत्मा अजर है, अमर है, अविनाशी

31
00:02:10,560 --> 00:02:14,640
है। जी जो कभी भी मरती नहीं है। जी। आत्मा

32
00:02:14,640 --> 00:02:18,640
के लिए कहा जाता है पर प्रैक्टिकल है। आत्मा को

33
00:02:18,640 --> 00:02:24,640
जल डुबो नहीं सकता। अग्नि जला नहीं सकती।

34
00:02:27,120 --> 00:02:31,360
जी ऐसे है ये आत्मा जो चोला चेंज करती रहती है पर

35
00:02:31,360 --> 00:02:35,520
अजर अमर अविनाशी है जी तो

36
00:02:35,520 --> 00:02:39,680
यहां पर यही एक मेन नॉलेज दी जाती है और अभ्यास भी साथ-साथ कराया जाता

37
00:02:39,680 --> 00:02:43,760
है। जी यहां सिर्फ यह नहीं है कि आए और सुना और

38
00:02:43,760 --> 00:02:47,760
चले गए। जी यह एक पाठशाला भी है,

39
00:02:47,760 --> 00:02:51,920
स्कूल है जहां पर हम परमात्मा के एक छोटे बच्चे

40
00:02:51,920 --> 00:02:56,160
हैं। पढ़ाई पढ़ते हैं, सीखते हैं। सीखते हैं, पढ़ाई पढ़ते हैं।

41
00:02:56,160 --> 00:03:00,640
और जैसे वहां एक पढ़ाई का लक्ष्य होता है जो बच्चे लोग पढ़ते हैं। जी। इंजीनियर

42
00:03:00,640 --> 00:03:04,720
बन जाएंगे, जज बन जाएंगे, वकील बन जाएंगे, डॉक्टर बन जाएंगे। वहां पे

43
00:03:04,720 --> 00:03:08,720
अपना आत्मस्वूप का बोध होना लक्ष्य है। बहुत जरूरी है।

44
00:03:08,720 --> 00:03:12,960
और उस आत्मा का लक्ष्य है मनुष्य से देवता बनना। सामने

45
00:03:12,960 --> 00:03:17,360
चित्र देख रहे हैं। कहते हैं ना नर ऐसी करनी करे नारायण बन जाए।

46
00:03:17,360 --> 00:03:21,360
जी नारी ऐसी करनी करे जो लक्ष्मी बन जाए। जी

47
00:03:21,360 --> 00:03:25,440
पर वो लक्ष्मी नारायण कैसे बनते वो लक्ष्य हमारा

48
00:03:25,440 --> 00:03:25,940
कौन

49
00:03:25,760 --> 00:03:30,000
सा है? वो कौन दे सकता है? वो परमपिता परमात्मा ही दे सकता है। दीदी

50
00:03:30,000 --> 00:03:34,160
ये तो ठीक है। मतलब इसमें क्या है? जैसे हमने बात कही कि

51
00:03:34,160 --> 00:03:38,400
हम आत्मा हैं। वास्तविकता में तो ये तो

52
00:03:38,400 --> 00:03:42,400
वो स्थिति है जो हमें धर्म का पालन करने से प्राप्त होता है। धर्म

53
00:03:42,400 --> 00:03:46,400
की बात मैं बताने जा रही थी क्योंकि आत्मा का धर्म

54
00:03:46,400 --> 00:03:50,720
पहले हमें जानना है आत्मा का धर्म जी शांति है क्योंकि

55
00:03:50,720 --> 00:03:55,120
मानव जीवन में शांति चाहता है धर्म शांति है कर्म शांति

56
00:03:55,120 --> 00:03:59,360
है शांति देश से आत्मा आई है शांति दाता आत्मा

57
00:03:59,360 --> 00:04:03,600
का परमपिता परमात्मा है और विश्व में शांति स्थापन करना

58
00:04:03,600 --> 00:04:07,600
यह हमारा एक संदेश है लेकिन जब

59
00:04:07,600 --> 00:04:11,760
आत्मा मनुष्य से देवता बन जाती है तो वो

60
00:04:11,760 --> 00:04:15,920
धर्म है आदि सनातन देवी देवता धर्म। आदि मींस

61
00:04:15,920 --> 00:04:20,160
पुराने ते पुराना। सनातन मींस आदि मींस शुरू

62
00:04:20,160 --> 00:04:24,240
का और सनातन मींस पुराने से पुराना। का

63
00:04:24,240 --> 00:04:28,400
अर्थ तो वो है ना शाश्वत नित्य। शाश्वत ना खत्म होता है। लेकिन ये धर्म

64
00:04:28,400 --> 00:04:32,480
इसमें आदि लगा देंगे तो वो तो शुरू हो रहा है। हां। लेकिन आदि इसलिए हम लगाते

65
00:04:32,480 --> 00:04:36,560
हैं क्योंकि शुरुआत जो होती है वो यहां से होती है। यह जो समय

66
00:04:36,560 --> 00:04:40,640
चल रहा है। नहीं तो सनातन की तो शुरुआत नहीं हुई ना। अभी सनातन भी लगाया ना उसमें।

67
00:04:40,640 --> 00:04:41,440
आदि

68
00:04:41,440 --> 00:04:45,760
सनातन ये मतलब आदि विरोध कर रहा है सनातन शुरू का शुरू से

69
00:04:45,760 --> 00:04:50,000
आदि का मींस शुरू से तो सनातन तो कभी शुरू नहीं हुआ तो नित्य है

70
00:04:50,000 --> 00:04:54,000
हां क्योंकि जब अभी देखो रात दिन का खेल है दुख सुख

71
00:04:54,000 --> 00:04:58,080
का खेल है हारजीत का खेल है वो तो वो तो नित्य समाप्त नहीं

72
00:04:58,080 --> 00:05:02,160
होती है सृष्टि भी तो शुरू फिर शुरू क्यों कह रहे हैं इसको आदि क्यों कह रहे हैं

73
00:05:02,160 --> 00:05:06,240
आदि इसीलिए कह रहे हैं क्योंकि वर्तमान समय जो पुरानी दुनिया है

74
00:05:06,240 --> 00:05:10,240
कलयुग घोर कलयुग है ऐसी दुनिया

75
00:05:10,240 --> 00:05:14,800
जब हो जाती है तब उस परमपिता परमात्मा को सृष्टि पर

76
00:05:14,800 --> 00:05:18,800
यह वाला जो राउंड शुरू हुआ है उसकी वजह से शुरुआत है वो सनातन ही है

77
00:05:18,800 --> 00:05:22,880
वो आदि की वैसे आवश्यकता नहीं मूल रूप से वो सनातन ही है तो कहने में

78
00:05:22,880 --> 00:05:27,120
आ जाता है क्योंकि शुरुआत यहां से होती है इस राउंड की लेकिन वो तो सदा

79
00:05:27,120 --> 00:05:31,280
है ही है हां वो सदा है वही सदा विरोध कर रहा है ना आदि हां

80
00:05:31,280 --> 00:05:35,760
आदि नहीं कह के आप समझ लीजिए कि सनातन कह लीजिए सनातन

81
00:05:35,760 --> 00:05:39,840
देवी देवता धर्म जी जी अच्छा तो दीदी इसमें जैसे

82
00:05:39,840 --> 00:05:43,840
से ये बात आई ना कि शांति उसका धर्म है आत्मा का आत्मा का

83
00:05:43,840 --> 00:05:47,920
तो एक्चुअली है क्या जितनी मेरी थोड़ी सी जानकारी है हम

84
00:05:47,920 --> 00:05:51,920
कि शांति तो हमारा गोल है हम जैसे

85
00:05:51,920 --> 00:05:55,920
नारायण बनकर के क्या प्राप्त होगा शांति गोल हैस लक्ष्मी बन के क्या

86
00:05:55,920 --> 00:05:56,480
प्राप्त होगा

87
00:05:56,480 --> 00:06:00,560
शांति आत्मा अपने आत्म स्वरूप को जान के क्या प्राप्त होगा

88
00:06:00,560 --> 00:06:04,880
शांति शांति हमारा गोल है जी और

89
00:06:04,880 --> 00:06:08,880
क्या कहते हैं जैसे आपने कहा ऐसी करनी करिए जिससे नर नारायण होए हमने

90
00:06:08,880 --> 00:06:12,880
कहा तो यह जो करनी है इसमें मैं मतलब

91
00:06:12,880 --> 00:06:16,960
जो धर्म शब्द है वह ज्यादा लागू होता है कि धर्म क्या है? करना क्या है? करना नहीं क्या

92
00:06:16,960 --> 00:06:21,200
है? तो मतलब धर्म क्या है? ब्रह्मा आपके अनुसार ब्रह्मा कुमारी

93
00:06:21,200 --> 00:06:25,200
के अनुसार क्योंकि शांति तो हमारा लक्ष्य है। हां लक्ष्य मतलब

94
00:06:25,200 --> 00:06:29,280
उनका जब पालन करेंगे तो शांति मिलेगी। वो तो स्थिति है। जैसे देवता

95
00:06:29,280 --> 00:06:33,360
बन गए। जैसे मान लीजिए देवी देवता को देवत्व को प्राप्त कर लिया। देवी

96
00:06:33,360 --> 00:06:37,520
देवी को प्राप्त कर लिया तो ये तो हमें फिर उसके बाद धर्म की आवश्यकता

97
00:06:37,520 --> 00:06:41,520
है ही नहीं। पहुंच गया जहां पहुंचना तो यह जो पहुंचने वाली बात है

98
00:06:41,520 --> 00:06:45,680
इसका कैसे किया है धर्म क्या है नहीं इसका धर्म तो

99
00:06:45,680 --> 00:06:49,760
माना आत्मा का धर्म शांति हुआ और लक्ष्य हुआ देवता

100
00:06:49,760 --> 00:06:53,840
धर्म वही माना देखो अभी कोई धर्म पूछेंगे आप

101
00:06:53,840 --> 00:06:58,320
अनेकानेक धर्म है इस संसार में अनेकानेक धर्म

102
00:06:58,320 --> 00:07:02,400
वही मैं ऐसी किस चीज किसी मेंटालिटी को हम

103
00:07:02,400 --> 00:07:06,720
धर्म कब और किस आधार पर कह रहे वही पूछ रहा हूं धर्म माना जहां एकता

104
00:07:06,720 --> 00:07:10,800
हो एक भाषा, एक कुल, एक राज्य, सत्ता एक के

105
00:07:10,800 --> 00:07:11,680
हाथ में हो।

106
00:07:11,680 --> 00:07:16,000
जहां कोई दुख का नाम निशान ना हो, लड़ाई ना हो, झगड़ा ना हो, घरघर

107
00:07:16,000 --> 00:07:20,000
में कोई मतभेद ना हो, भाषा भेद ना हो, जाति भेद

108
00:07:20,000 --> 00:07:24,000
ना हो, उसको हम धर्म कहते हैं। ये तो दीदी फिर से वही हो

109
00:07:24,000 --> 00:07:28,000
गया ना कि हम लोग जब ऐसा करेंगे तो हमें यह प्राप्त होगा कि

110
00:07:28,000 --> 00:07:32,080
लड़ाई नहीं होगी। हां। तो यही धर्म हो गया ना हमारा। वो फिर बोल हो

111
00:07:32,080 --> 00:07:36,560
गया। बोल हुआ हमारा शांति की प्राप्ति। क्योंकि उस

112
00:07:36,560 --> 00:07:40,560
युग में शांति होगी। क्यों होगी शांति?

113
00:07:40,560 --> 00:07:44,720
क्योंकि एकता होगी। जहां द्वेत है, अनेकता है,

114
00:07:44,720 --> 00:07:48,800
वहां अशांति है। क्योंकि जब अभी हम समझो दो

115
00:07:48,800 --> 00:07:52,960
जने हैं। मतलब जैसे किसी मेंटालिटी को धर्म कहा है।

116
00:07:52,960 --> 00:07:57,120
इसलिए कहा है कि वहां पर मतभेद नहीं है। जी। और जहां

117
00:07:57,120 --> 00:08:01,120
मतभेद है हम उसको धर्म नहीं कहते। अंडरस्टुड? तो फिर हम

118
00:08:01,120 --> 00:08:05,520
जैसे कई स्टेटमेंट जैसे आते हैं कि हिंदू मुस्लिम भी धर्म है

119
00:08:05,520 --> 00:08:09,840
तो जैसे इस्लाम है उसमें भी मतभेद हैं। तो हम फिर ये धर्म क्यों कह रहे हैं इसको?

120
00:08:09,840 --> 00:08:13,840
एक्चुअली हम इसको नहीं कहते। अगर

121
00:08:13,840 --> 00:08:17,840
मैं हूं मैंने मुस्लिम के परिवार में जन्म लिया। मैं

122
00:08:17,840 --> 00:08:22,000
मुस्लिम कहलाई। जी। कहीं मैं गुजरातियों के परिवार

123
00:08:22,000 --> 00:08:28,000
में पैदा हुई तो गुजराती कहलाई। जी और कहीं मैं

124
00:08:28,160 --> 00:08:32,560
और किसी धर्म बुद्धिस्ट के यहां जन्म लिया तो मैं बुद्धिस्ट कहलाई।

125
00:08:32,560 --> 00:08:36,560
लेकिन वास्तव में ये धर्म है ही नहीं। अच्छा हम क्या कहते हैं?

126
00:08:36,560 --> 00:08:41,200
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आपस में सब भाईाई।

127
00:08:41,200 --> 00:08:45,440
जब हम शरीर में प्रवेश करते हैं। धर्म हमने बनाए हैं। मनुष्य

128
00:08:45,440 --> 00:08:49,600
ने बनाए पर परमात्मा ने कोई धर्म नहीं बनाया। उस तरह

129
00:08:49,600 --> 00:08:53,840
का हम सभी आत्माएं एक ही पिता की संतान है। क्या कहते हैं? हे

130
00:08:53,840 --> 00:08:58,000
परमपिता परमात्मा हम सब हैं तेरी आत्मा।

131
00:08:58,000 --> 00:09:02,560
पापों का करो खात्मा हम सब बने धर्मात्मा।

132
00:09:02,560 --> 00:09:06,720
धर्म का अर्थ होता है धारणा। जो हमारे जीवन में धारणाएं हैं

133
00:09:06,720 --> 00:09:11,040
जैसे पोरिटी है, रॉयल्टी है।

134
00:09:11,040 --> 00:09:15,040
इसी तरह से जो हम जो व्यवहार हमें धारण करना है। वो

135
00:09:15,040 --> 00:09:19,280
वो धर्म है हमारा। जो हम अच्छाइयों को धारण करते हैं, दिव्यता

136
00:09:19,280 --> 00:09:23,440
को धारण करते हैं, पावनता को धारण करते हैं, अलौकिकता को धारण करते

137
00:09:23,440 --> 00:09:27,520
हैं। जिससे कि शांति प्राप्त जो गोल है फाइनली ऑटोमेटिकली होगी वो। जी

138
00:09:27,520 --> 00:09:31,520
वो जो गोल है, जो हमारा लक्ष्य है वो हमें ऑटोमेटिकली मिलेगा। तो

139
00:09:31,520 --> 00:09:35,760
कहना चाहिए अगर सनातन धर्म है हम उसे सनातन से जोड़ रहे हैं।

140
00:09:35,760 --> 00:09:39,840
यानी कि वो धारणाएं जिन्हें हम कभी जिन्हें हम लॉन्ग टाइम तक

141
00:09:39,840 --> 00:09:43,200
धारण कर पाए। ऐसी धारणाएं सनातन धर्म कहलाएंगी। वो

142
00:09:43,200 --> 00:09:48,080
वो कहलाती है। वो धारणाएं जिन्हें हम हमेशा के लिए धारण नहीं कर सकते।

143
00:09:48,080 --> 00:09:53,440
जैसे मान लीजिए मनुष्य में मनुष्य रूप में हूं मैं तो मैं जिन धारणाओं को

144
00:09:53,440 --> 00:09:57,440
धारण नहीं कर सकता हूं। जी मान लीजिए कि मेरे अंदर कुछ गलत चीजें

145
00:09:57,440 --> 00:10:01,440
आ रही है। अन्य चीजें जो कि ह्यूमनिटी के विरुद्ध है। जाहिर सी बात है

146
00:10:01,440 --> 00:10:06,000
हम बहुत देर तक उसको धारण नहीं कर पाएंगे। जैसे कि व्यभचार, मांसाहार,

147
00:10:06,000 --> 00:10:10,080
झूठ बोलना, चोरी करना जितने जो पाप कर्म आदि हैं उनको हम धारण

148
00:10:10,080 --> 00:10:14,480
नहीं कर पाएंगे। इसलिए वो सब सनातन धर्म कहला है कि

149
00:10:14,480 --> 00:10:18,560
उसको जो है सस्टेन तरीके से हम धारण कर सकते हैं। जी हां। तो

150
00:10:18,560 --> 00:10:22,560
फिर जो ऐसी मेंटालिटीज हैं जो

151
00:10:22,560 --> 00:10:26,640
कि ऐसी चीजें बोल रही हैं जैसे आपने बौद्ध बुद्ध का नाम लिया हम

152
00:10:26,640 --> 00:10:30,640
तो बुद्ध वाले तो कहते हैं कि वो नास्तिक थे। बुद्ध तो ईश्वर को माना

153
00:10:30,640 --> 00:10:34,720
ही नहीं उन्होंने। हम और इस्लाम का भी कुछ ऐसी चीजें

154
00:10:34,720 --> 00:10:38,960
हैं जिनको हम धारण नहीं कर सकते। जैसे कि जैसे मैंने आपको

155
00:10:38,960 --> 00:10:43,200
दीदी बोला तो हमारे यहां पर क्या है भारतीय परंपरा के अनुसार कि दीदी

156
00:10:43,200 --> 00:10:47,440
अगर बोल दिया है तो आपको दूसरी दृष्टि से नहीं देखा जा सकता ये परंपरा

157
00:10:47,440 --> 00:10:51,760
है। मगर उस वहां पर कुछ ऐसा भी कहा गया है कि यदि आपने

158
00:10:51,760 --> 00:10:55,840
मुंह से कोई रिश्ता बनाया तो उसकी वैल्यू नहीं है। आपकी जब आप माता

159
00:10:55,840 --> 00:10:58,400
के गर्भ से जन्म होगा उसी के अनुसार जो रिश्ते हैं

160
00:10:58,400 --> 00:11:02,400
वही उन्हीं की वैल्यू है और मुंह से कही हुई बातों के उलट आप व्यवहार

161
00:11:02,400 --> 00:11:06,480
कर सकते हो। जी तो जिन धारणाओं को हम लंबे समय तक धारण नहीं

162
00:11:06,480 --> 00:11:10,480
कर पा रहे उनको भी हम धर्म क्यों कह रहे हैं? नहीं तो मनुष्य

163
00:11:10,480 --> 00:11:14,560
जब धर्म भ्रष्ट कर्म भ्रष्ट हो जाता है खुद को भूल जाता

164
00:11:14,560 --> 00:11:18,560
है। परमात्मा को भूल जाता है तो ये सारी धारणाएं भी भूल जाता है

165
00:11:18,560 --> 00:11:22,560
क्योंकि कोई हमें सिखाने वाला नहीं है। ये कलयुगी दुनिया में ये

166
00:11:22,560 --> 00:11:26,720
सब होता है। नहीं मगर वहां तो मोहम्मद जी ने कहा है ना कि वो

167
00:11:26,720 --> 00:11:30,800
हां वो ये धर्म जो है ना राजा ये सारे हमारे आए हैं द्वापर युग

168
00:11:30,800 --> 00:11:34,880
से। नहीं लेकिन इसको फिर धर्म कहना उचित है इस्लाम को

169
00:11:34,880 --> 00:11:38,960
जो कह रहे हैं क्योंकि धर्म स्थापक तो है ना उन आत्माओं

170
00:11:38,960 --> 00:11:43,120
ने परमधाम से आकर के धर्म की स्थापना तो की ना धर्म तो हम उसे

171
00:11:43,120 --> 00:11:47,680
कह रहे हैं ना जिसको हम नहीं उनके हिसाब से तो कहेंगे ना

172
00:11:47,680 --> 00:11:52,000
हम नहीं कहे मान लो लेकिन वो जो आए हैं धर्म स्थापक उन्होंने

173
00:11:52,000 --> 00:11:56,080
अपने-अपने भिन्न भिन्न भिन्न-भिन्न धर्मों की स्थापना तो की नहीं मगर दीदी इससे ऐसा

174
00:11:56,080 --> 00:12:00,160
नहीं लगता कि जैसे कोई भी व्यक्ति जो आएगा और मान लीजिए

175
00:12:00,160 --> 00:12:04,160
उसका एक गुट बन जाए बहुत सारे लोग उसे मानने वाले हो जाए और वो कोई भी धारणा

176
00:12:04,160 --> 00:12:08,160
कहेगा धारणा को फैला रहा होगा उचित अनुचित ना देखते हुए

177
00:12:08,160 --> 00:12:12,240
वो अगर कह रहा है धर्म है तो हम उसको धर्म कह दें ऐसा नहीं हो जाएगा इससे

178
00:12:12,240 --> 00:12:13,520
नहीं हम नहीं भी कहेंगे

179
00:12:13,520 --> 00:12:17,520
लेकिन वो तो कहेंगे ना हमारे ना कहने से तो वो मानेंगे ही नहीं वही मैं

180
00:12:17,520 --> 00:12:21,600
कह रहा हूं कि हमारे ये हो गए माने द्वापर से लेकर

181
00:12:21,600 --> 00:12:25,840
के कलयुग एंड तक अनेक धर्म आए जो सिर्फ धर्म स्थापक

182
00:12:25,840 --> 00:12:29,840
कहलाए तो वो तो धर्म है ही धर्म आत्मा कहलाए परमात्मा वो

183
00:12:29,840 --> 00:12:34,560
नहीं बन सकते हैं। परमात्मा जो आते हैं जब इस सृष्टि रूपी रंगमंच

184
00:12:34,560 --> 00:12:38,720
पर ज्योति बिंदु परमात्मा वो एक धर्म की स्थापना करते हैं। अनेक

185
00:12:38,720 --> 00:12:42,800
को एकता में ले आते हैं। जो सनातन धर्म हम कह रहे

186
00:12:42,800 --> 00:12:47,120
हैं उसकी वो परमा परमात्मा आकर के स्थापना करते हैं।

187
00:12:47,120 --> 00:12:51,280
इंसान भिन्न-भिन्न अपना वो आप आए आपने धर्म स्थापन कर दिया। वो आए

188
00:12:51,280 --> 00:12:55,280
उन्होंने अपना कर लिया। आपने कहा ना कि बुद्ध जो है वो बौद्ध है। उनका

189
00:12:55,280 --> 00:12:59,520
मानना है कि दुनिया में कोई सनातन सत्ता है ही नहीं। हां वो फिर अपनेप

190
00:12:59,520 --> 00:13:03,600
उसका मानते हैं ना उनको हम जब वो ईश्वर को स्वीकार

191
00:13:03,600 --> 00:13:07,760
ही नहीं कर रहे तो हम उसे धर्म कैसे कह रहे हैं हम नहीं कह रहे हैं वो कह रहे हैं

192
00:13:07,760 --> 00:13:11,840
वो कह रहे हैं तो हमारे हिसाब से है या नहीं है वो हम उनको गलत नहीं कह

193
00:13:11,840 --> 00:13:16,080
रहे उनकी बात को उनके ऊपर हां अपमान भी नहीं कर रहे हैं

194
00:13:16,080 --> 00:13:20,480
क्योंकि परमात्मा ने हमें सिखाया किसी का भी निरादर अपमान

195
00:13:20,480 --> 00:13:24,480
किसी की कमी कमजोरी हमें नहीं देखने जो हैं जैसे हैं वो

196
00:13:24,480 --> 00:13:28,560
चल रहे हैं लेकिन हमें अपने जीवन को धारणा युक्त बनाने तो

197
00:13:28,560 --> 00:13:32,560
दीदी धर्म अर्थात धारणा इस तरीके से जैसे नेपोलियन बोनापार्ट

198
00:13:32,560 --> 00:13:36,800
आए हिटलर आए जिन्हें एंटी क्राइस्ट तक कहा गया बहुत ज्यादा नशंसता

199
00:13:36,800 --> 00:13:40,880
की गईंगा बिल्ला आए या फिर आईएस आईएस जैसी जो

200
00:13:40,880 --> 00:13:44,960
खंखार आतंकवादी जो संस्थाएं हैं उनके हिसाब से वो

201
00:13:44,960 --> 00:13:49,040
जो कर रहे हैं वो भी ठीक है और धर्म की परिभाषा यही है जो करने में

202
00:13:49,040 --> 00:13:53,280
ठीक है वही धर्म है तो क्या समय आने पे ऐसा भी हो सकता है कि हमें आईएस

203
00:13:53,280 --> 00:13:57,280
आईएस यदि कहे कि ये धर्म है तो हम कहे कि हां ये धर्म है मतलब हमारा

204
00:13:57,280 --> 00:14:01,760
कोई क्राइटेरिया होना चाहिए ना धर्म को धर्म कहने का ये बात है क्योंकि

205
00:14:01,760 --> 00:14:06,080
जब ये कलयुग आता है ना तो कलयुग में अनेकता आती है

206
00:14:06,080 --> 00:14:10,160
हमारा एक है ये भी एक आप ऐसे खंकार लोग हैं ये सब है वो

207
00:14:10,160 --> 00:14:14,320
सब करके गए हैं तो ये कलयुग में माना एक मैं

208
00:14:14,320 --> 00:14:18,560
क्या कहूंगी कि होना जरूरी है क्योंकि जब रात हो जाती है ना अज्ञानता

209
00:14:18,560 --> 00:14:22,720
की अंधकार छा जाता है संसार में तो ये सब आते हैं

210
00:14:22,720 --> 00:14:26,800
अपना अपना कार्य क्योंकि सृष्टि एक नाटक है नाटक में हम

211
00:14:26,800 --> 00:14:30,880
सभी एक्टर हैं और नाटक में दुख सुख का हार जीत

212
00:14:30,880 --> 00:14:34,960
का रात दिन का नहीं वो आते तो हैं पर वो फिर ये जो खंकार

213
00:14:34,960 --> 00:14:39,120
है ये आए इनको हम धर्म कहें क्या कहें तो वो अपना धर्म मना अपना

214
00:14:39,120 --> 00:14:43,440
ये कार्य तो करते ही हैं ना मतलब एक तरीके से हम बस उस मामले में मौन

215
00:14:43,440 --> 00:14:43,940
है

216
00:14:43,840 --> 00:14:47,840
साक्षी बस हम साक्षी हो के देखें जैसे ड्रामा को हम देखते हैं 3

217
00:14:47,840 --> 00:14:51,840
घंटे का ड्रामा है उसमें कोई मर्डर भी कर रहा है कोई किसी को सुख

218
00:14:51,840 --> 00:14:56,480
भी दे रहा है कोई लड़ाई भी जैसे कि मान लीजिए मर्डर करना अधर्म

219
00:14:56,480 --> 00:15:00,560
अधर्म है। मगर कोई कह रहा है कि यह धर्म है। उसको मानने वाले लोग बहुत

220
00:15:00,560 --> 00:15:04,560
हैं। तो क्या हम उसे धर्म कहेंगे? नहीं, हम उसको धर्म नहीं कह सकते। वही

221
00:15:04,560 --> 00:15:08,560
तो यहां हो रहा है। मुंह बोली बहन से जैसे मुंह बोले स्टोक को हम मानते

222
00:15:08,560 --> 00:15:12,640
हैं कि ये धर्म है और उससे मुकरना अधर्म है। मगर हम फिर भी इस्लाम

223
00:15:12,640 --> 00:15:16,720
को कह रहे हैं कि वो धर्म है। ये एक्चुअली ये है ना क्योंकि वो आत्माएं आई हैं। वो कर रही

224
00:15:16,720 --> 00:15:20,720
हैं। हमको ये धारणा अपने मन में बना करके रखनी है। कि

225
00:15:20,720 --> 00:15:24,880
वो क्या है क्या नहीं। हम मन की धारणा तो रखेंगे मगर कह देंगे कि हां ये भी धर्म

226
00:15:24,880 --> 00:15:28,960
है। वो भी धर्म है। क्या क्या है? दुनिया कह रही है तो हमको कहने में

227
00:15:28,960 --> 00:15:32,960
अच्छा ठीक है। मैं समझती हूं कि क्या कह सकते

228
00:15:32,960 --> 00:15:37,040
हैं उसको हम? कोई नहीं कोई नहीं। बहुत अच्छे। अच्छा दीदी इसमें थोड़ा

229
00:15:37,040 --> 00:15:42,480
सा आगे चलें कि आजकल के युवाओं के द्वारा एक वो आता है।

230
00:15:42,480 --> 00:15:46,480
प्रश्न आता है कि ये ईश्वर है। इसको सिद्ध कैसे किया? मतलब ईश्वर है। इसको

231
00:15:46,480 --> 00:15:50,720
कैसे हम स्वीकार करें? ईश्वर नाम की कोई चीज भी है?

232
00:15:50,720 --> 00:15:54,800
यह तो 100% ईश्वर

233
00:15:54,800 --> 00:15:59,040
क्योंकि देखो जैसे इस संसार में चिड़िया

234
00:15:59,040 --> 00:16:03,120
का बच्चा चिड़िया जैसा घोड़े का बच्चा घोड़े जैसा इंसान

235
00:16:03,120 --> 00:16:08,400
का बच्चा इंसान जैसा जो मैं आत्मा हूं

236
00:16:08,400 --> 00:16:12,480
देखने में नहीं आती कभी भी आत्मा ने गर्भ में प्रवेश

237
00:16:12,480 --> 00:16:16,720
किया किसी ने देखा

238
00:16:16,720 --> 00:16:21,280
जब आत्मा शरीर से निकल जाती है तब देखा आंख

239
00:16:21,280 --> 00:16:25,440
खुली रह गई कहा आंख से निकल गई मुंह खुला रह गया मुख से निकल गई

240
00:16:25,440 --> 00:16:29,440
कैसी है क्या है यह कोई नहीं देख पाता जी क्योंकि आत्मा

241
00:16:29,440 --> 00:16:33,920
अति सूक्ष्म ज्योति बिंदु है तो आत्मा का पिता है परमपिता

242
00:16:33,920 --> 00:16:36,320
परमात्मा

243
00:16:36,320 --> 00:16:40,960
हम आत्माओं का पिता परमपिता परमात्मा है वो परमपिता

244
00:16:40,960 --> 00:16:45,040
परमात्मा की हम संतान है तो आपने क्वेश्चन किया

245
00:16:45,040 --> 00:16:49,120
कि है ईश्वर है या नहीं ये सिद्ध सिद्ध कैसे

246
00:16:49,120 --> 00:16:53,280
होता है? मतलब कैसे मान ले कि ईश्वर है? हां, हम लोग तो यहां पर यह

247
00:16:53,280 --> 00:16:58,640
मानते हैं क्योंकि आत्मा का पिता परमपिता परमात्मा है। देखो जो नहीं मानता

248
00:16:58,640 --> 00:17:02,640
और उसको कुछ ऐसे हम बात करें कुछ भी कह रहे हैं वो

249
00:17:02,640 --> 00:17:06,720
नहीं उसका आंसर दे पा रहा है या नहीं वो कुछ कर पा रहा है तो क्या

250
00:17:06,720 --> 00:17:10,720
कहता है ईश्वर ईश्वर पर छोड़ दो। ऊपर वाला जाने वो मालिक

251
00:17:10,720 --> 00:17:14,080
जाने वो मालिक जाने उसके लिए ही कहते हैं

252
00:17:14,080 --> 00:17:18,080
ना। तो इसलिए उसके बिना तो ये संसार

253
00:17:18,080 --> 00:17:22,480
चल ही नहीं सकता है। परमपिता परमात्मा चलना ही

254
00:17:22,480 --> 00:17:26,640
यह प्रमाण देता है कि इस सृष्टि को चलाने वाला कोई है। उसने ही कोई नई

255
00:17:26,640 --> 00:17:30,800
दुनिया स्थापना यह वाली दुनिया उसने नहीं बनाई जो हम कहे दुख सुख परमात्मा

256
00:17:30,800 --> 00:17:34,960
दे रहा है। कोई मर्डर कर रहा है। परमात्मा कर रहा है। कोई किसी को दुख दे रहा है। परमात्मा दे रहा है।

257
00:17:34,960 --> 00:17:39,200
नहीं परमात्मा ने जब यह सृष्टि बनाई थी

258
00:17:39,200 --> 00:17:43,600
नई सृष्टि बनाई थी। स्वर्ग बनाया था। पैराडाइज बनाया था। और बनाने

259
00:17:43,600 --> 00:17:48,400
वाला भी वही है क्योंकि सृष्टि का डायरेक्टर रचयिता

260
00:17:48,400 --> 00:17:52,560
हम कौन हो सकता है? परमात्मा ही हो सकता है ना। इतना सारा

261
00:17:52,560 --> 00:17:56,640
विश्व है इतनी सारी प्रकृति है। यानी कि क्योंकि

262
00:17:56,640 --> 00:18:00,720
बहुत सुंदर संसार बना इसलिए उसको बनाने वाला कोई एक हो

263
00:18:00,720 --> 00:18:04,720
सकता है। कोई होगा ना जिसकी रचना इसकी सुंदर वो कोई लॉजिकली

264
00:18:04,720 --> 00:18:09,520
आंसर नहीं है कि ईश्वर है ये कैसे ये लॉजिकली है क्योंकि

265
00:18:09,520 --> 00:18:13,600
जब मैं आत्मा हूं तो मेरा बाप भी होगा। क्या कहते हैं? तुम मात पिता

266
00:18:13,600 --> 00:18:17,920
हम बालक तेरे तुमरी कृपा ते सुख घनेरे हम ऐसे थोड़ी कहते हैं। हम तो अनुभव

267
00:18:17,920 --> 00:18:22,160
करते हैं। मतलब कोई चीज एक्सिस्ट कर रही तो इसका मतलब उसका कोई पिता होगा। अंडरस्टुड

268
00:18:22,160 --> 00:18:27,280
ऐसे तो ये ये एक्चुअली ये काउंटर आता है। वो ये कहते हैं कि

269
00:18:27,280 --> 00:18:29,360
अगर ये वाली बात मानेंगे तो फिर परमपिता

270
00:18:29,360 --> 00:18:33,440
का भी कोई परमपिता होगा। नहीं यही है। यही यही बात है।

271
00:18:33,440 --> 00:18:37,520
मैं यही आना चाह रही जी जी देखो हर आत्मा धर्मात्मा हो

272
00:18:37,520 --> 00:18:41,680
सकता है और वो महात्मा हो सकता

273
00:18:41,680 --> 00:18:46,160
है लेकिन परमात्मा आप संसार

274
00:18:46,160 --> 00:18:50,160
में किसी को भी नहीं कह सकते परमात्मा का कोई

275
00:18:50,160 --> 00:18:54,160
पिता नहीं हो सकता है जितने भी देवी देवताएं हुए

276
00:18:54,160 --> 00:18:58,160
कहने का मतलब ये है कि परमात्मा है ही वो जिसका कोई पिता नहीं है हां

277
00:18:58,160 --> 00:19:02,320
जिसके कोई मात-पिता नहीं है सबका मात पिता है वो सर्व

278
00:19:02,320 --> 00:19:06,320
आत्माओं का पिता फिर बात वही आ जाती है ना कि सर्व आत्माओं

279
00:19:06,320 --> 00:19:10,320
का पिता किस रूप में है कि आत्माओं को उसने बनाया है। आत्माओं को

280
00:19:10,320 --> 00:19:14,400
नहीं बनाया। आत्माओं को आकर के परिवर्तन किया। पावन

281
00:19:14,400 --> 00:19:18,960
बनाया। आत्मा तो बनी बनाई है। आत्मा का कहा ना

282
00:19:18,960 --> 00:19:23,040
होना चाहिए। चिंता भी नहीं है। एक तरीके से देखा जाए तो मतलब जो हम कह रहे हैं किता

283
00:19:23,040 --> 00:19:27,120
तो है। नहीं जैसे हमने कहा कि हम है इससे पता लगता है कि हमें बनाने वाला

284
00:19:27,120 --> 00:19:31,120
कोई है। हां तो हम आत्म स्वरूप है। देखो आत्मा

285
00:19:31,120 --> 00:19:35,440
को बनाया नहीं जाता। परमात्मा को भी बनाया नहीं जाता। लेकिन आत्मा

286
00:19:35,440 --> 00:19:39,600
जब पतित बन जाती है, विकारी बन जाती है, दुखी हो जाती है, अशांत

287
00:19:39,600 --> 00:19:43,600
हो जाती है तो परमात्मा आकर के आत्माओं को पतित

288
00:19:43,600 --> 00:19:44,640
से पावन बनाता

289
00:19:44,640 --> 00:19:48,960
है। यानी हमारे एक्सिस्टेंस से उसका सिद्ध नहीं हो रहा है। नहीं वो नहीं होता है।

290
00:19:48,960 --> 00:19:52,960
हम है तो इसलिए वो है। हां हम है तो इसलिए है ऐसा नहीं है। वो आकर के

291
00:19:52,960 --> 00:19:57,040
विश्व परिवर्तन करता है। ये तो हमारा क्लेम है दीदी। फिर हम कहे क्या मतलब

292
00:19:57,040 --> 00:20:01,200
कि कि ईश्वर है वो है वो है वो

293
00:20:01,200 --> 00:20:05,280
कोई कहे कि तुम्हारा बाप है मैं कैसे मानू मेरा पिताजी है ये है

294
00:20:05,280 --> 00:20:09,520
ना क्योंकि मुझे पैदा किया है लेकिन यहां पैदा वाली बात नहीं आती है क्योंकि

295
00:20:09,520 --> 00:20:13,920
परमात्मा पॉइंट ऑफ लाइट ज्योति बिंदु सर्वशक्तिमान ऑलमाइटी

296
00:20:13,920 --> 00:20:17,920
अथॉरिटी है जी तो दीदी ये बनाया नहीं जाता ना वो

297
00:20:17,920 --> 00:20:22,000
बनता जैसे ये वाली चीज है ना कि है तो मतलब कि मेरा बाप है

298
00:20:22,000 --> 00:20:26,000
तुम कहो मेरे पिता है तो है तो उसमें कहेंगे ठीक है तुम्हारे तुम्हारे पिता है। फिर आप

299
00:20:26,000 --> 00:20:30,400
ये क्यों कह रहे हो? वो तुम्हारे भी है। सबके हैं। हां नहीं क्योंकि वो आत्माओं का है। बॉडी

300
00:20:30,400 --> 00:20:34,400
का वो पिता नहीं है। वो हम बॉडी का नहीं है। बॉडी का मैंने

301
00:20:34,400 --> 00:20:38,560
आपको पहले ही बताया चिड़िया का बच्चा चिड़िया जैसा। घोड़े का बच्चा घोड़े

302
00:20:38,560 --> 00:20:42,560
जैसा। मनुष्य का बच्चा मनुष्य जैसा। आपके पिता अलग हैं। उनके अलग

303
00:20:42,560 --> 00:20:47,440
हैं। उनके अलग हैं। मेरे अलग हैं। लेकिन जिसको कहा जाता है

304
00:20:47,440 --> 00:20:51,440
सर्व आत्माओं का, सर्व धर्मात्माओं का, सर्व देवी देवताओं

305
00:20:51,440 --> 00:20:55,680
का वो पिता है। पॉइंट ऑफ लाइट ज्योति बिंदु वो सदा है।

306
00:20:55,680 --> 00:20:59,920
उसको सदा शिव कहते हैं। सदा शिव

307
00:20:59,920 --> 00:21:03,920
है। आजकल बच्चे क्या है? लॉजिक मानते हैं कि हमको भाई हां।

308
00:21:03,920 --> 00:21:08,160
लेकिन यहां पर हमारे शिशु विश्वविद्यालय में जब हम ये एक दिन में तो नहीं समझा

309
00:21:08,160 --> 00:21:12,400
जाता है। सेवन डेज कोर्स होता है और सेवन डेज कोर्स में भी

310
00:21:12,400 --> 00:21:16,560
ये मैं सर्टेन नहीं कह सकती कि वो मान ही ले। कई लोग तो एकद दिन

311
00:21:16,560 --> 00:21:20,560
में मान लेते हैं। कहीं कैसे मानना मानना उसको रियलाइज करते हैं। मान

312
00:21:20,560 --> 00:21:24,720
लो अनुभव कर मानने की बात तो एक अलग है। मगर हमारे पास कुछ होना चाहिए ना थ्योरिकली

313
00:21:24,720 --> 00:21:28,720
कि हम उसको कुछ कहे। वो वो मात-पिता कह रहे हैं जी। वो तो है

314
00:21:28,720 --> 00:21:32,880
ही हमारे मात-पिता। वो परम बाप है, परम टीचर है, परम

315
00:21:32,880 --> 00:21:37,040
सतगुरु है जिसकी पालना में हम पल रहे हैं। 55 साल

316
00:21:37,040 --> 00:21:41,200
हो गए जीवन कन्या का हम लोग वो जी

317
00:21:41,200 --> 00:21:45,280
रहे हैं और उनकी बदौलत हमने तो अनुभव किया है। प्रैक्टिकल

318
00:21:45,280 --> 00:21:49,360
अनुभव किया है कि वो हमारा मात-पिता है। केवल मात-पिता ही नहीं वो परम

319
00:21:49,360 --> 00:21:53,360
टीचर भी है। वो परम सतगुरु भी है। वो हमारा साजन भी है।

320
00:21:53,360 --> 00:21:57,520
हम उसकी आत्मा रूप मैं ये कह रहा था जैसे हम ये कह रहे हैं कि जैसे

321
00:21:57,520 --> 00:22:01,760
प्रश्न किया लड़के ने मुझसे हां कि ईश्वर है ये मैं कैसे

322
00:22:01,760 --> 00:22:06,080
मान लूं तो मैं उससे जैसे उसने कहा कि मोटरसाइकिल है मैं कैसे मान लूं

323
00:22:06,080 --> 00:22:10,400
तो मैंने उसको कहना चालू किया कि मोटरसाइकिल के दो पहिए होते हैं।

324
00:22:10,400 --> 00:22:14,480
मोटरसाइकिल के हैंडल होता है। मोटरसाइकिल में सीट होती है। अभी

325
00:22:14,480 --> 00:22:15,040
उसको लड़के

326
00:22:15,040 --> 00:22:19,280
को कुछ दिख नहीं रहा है। बस मैंने मगर ये उसका जो

327
00:22:19,280 --> 00:22:23,440
डिस्क्रिप्शन मैं दे रहा हूं कि वो ऐसा होता है। उससे उसका होना सिद्ध

328
00:22:23,440 --> 00:22:27,440
नहीं हो रहा है। अभी तो हम उसके और क्लेम्स करते जा रहे हैं कि वो कैसा कैसा है। तो

329
00:22:27,440 --> 00:22:31,680
कुछ इसी तरीके से जैसे यह वाली बात है कि ईश्वर है। मैं कैसे मान लूं तो वो गुरु

330
00:22:31,680 --> 00:22:35,760
है, वो माता-पिता है, वो निराकार है, वो सर्वशक्तिमान

331
00:22:35,760 --> 00:22:39,840
है। तो ये वो डिस्क्रिप्शन है। इस संबंध में इस दिशा

332
00:22:39,840 --> 00:22:44,160
में नहीं है कि ईश्वर है। ये सिद्ध कैसे होता है? नहीं। लेकिन मैं ये तो मानने

333
00:22:44,160 --> 00:22:48,720
वाली बात नहीं है। हम तो अनुभव कर रहे हैं प्रैक्टिकल में

334
00:22:48,720 --> 00:22:52,880
कि अनुभव कराएंगे आप। हां हम अनुभव कराएंगे जब वो आते हैं हम उनको अनुभव

335
00:22:52,880 --> 00:22:56,960
कराते हैं और लोगों को अनुभव होता है लाखों अभी तो

336
00:22:56,960 --> 00:23:01,360
मैं कहूंगी करोड़ों हो गए ऐसी मनुष्य आत्माएं

337
00:23:01,360 --> 00:23:05,440
जो अनुभव करती है और प्रैक्टिकल में वो उस जीवन को जी

338
00:23:05,440 --> 00:23:09,840
रही है परमात्मा एक एनर्जी है एक्चुअली राजे वो

339
00:23:09,840 --> 00:23:14,080
देखने वाली चीज नहीं है अनुभव अनुभव करने की चीज है ऐसा

340
00:23:14,080 --> 00:23:19,040
क्या अनुभव होता है जिससे हम ये मानते हैं कि वो ईश्वर को हम अनुभव कर रहे हैं क्या

341
00:23:19,040 --> 00:23:23,440
प्रत्यक्ष को प्रमाण किया है। मेरा जीवन देख लीजिए आप। नहीं

342
00:23:23,440 --> 00:23:27,520
जैसे पूरे माना हम अपने मित्र संबंधी आदि उन

343
00:23:27,520 --> 00:23:30,320
सबको छोड़ के यहां जो हम एक

344
00:23:30,320 --> 00:23:34,480
जीवन जी रहे हैं और लाखों मनुष्य आत्माओं की सेवा कर रहे

345
00:23:34,480 --> 00:23:38,880
हैं और हमारा जीवन जो चल रहा है जी उसी की

346
00:23:38,880 --> 00:23:42,960
बदौलत आज हम यहां इस तरह से बैठे हम

347
00:23:42,960 --> 00:23:47,120
तो दिन रात अनुभव करते हैं। विरक्तता से ये सिद्ध होता है कि आपको आपने

348
00:23:47,120 --> 00:23:51,200
ईश्वर का अनुभव किया है। हम डेफिनेटली अनुभव मतलब मैं

349
00:23:51,200 --> 00:23:55,200
मैं एक्चुअली ये पूछ रहा था जैसे जैसे रसगुल्ला

350
00:23:55,200 --> 00:23:59,680
है तो रसगुल्ला खाने से हमें सुख का अनुभव हुआ मीठामीठा हुआ बिल्कुल

351
00:23:59,680 --> 00:24:04,000
हमने ये कहा कि मैंने अनुभव किया रसगुल्ले को है ना तो एक अनुभव

352
00:24:04,000 --> 00:24:08,720
था स्वाद के रूप में जी्हा से जो मेरे को आया जी तो ऐसे ही वो

353
00:24:08,720 --> 00:24:13,040
अनुभव होता है जिससे हम सिद्ध करते हैं ये जो है ईश्वर का अनुभव है वो क्या अनुभव

354
00:24:13,040 --> 00:24:17,040
होता है हां वही कहते हैं ना जहां ना पहुंचा रवि वहां पहुंचा कवि जहां ना पहुंचा

355
00:24:17,040 --> 00:24:21,360
अनुभवी अनुभव जीवन की बहुत बड़ी अथॉरिटी होती है। आज के विश्व

356
00:24:21,360 --> 00:24:25,600
में ऐसे संसार में रहते हुए जहां पर मानव

357
00:24:25,600 --> 00:24:29,600
धर्म भ्रष्ट कर्म भ्रष्ट बन चुका है। एकदम नास्तिक बन चुका

358
00:24:29,600 --> 00:24:33,600
है। जी मैं इसीलिए इस चीज को थोड़ा सा एलबोरेट कर रहा हूं। तो ऐसे

359
00:24:33,600 --> 00:24:37,600
संसार में आप रह रहे हैं। पनप रही है और मैं तो कह रहा हूं कि धर्म का

360
00:24:37,600 --> 00:24:41,680
चोला ओढ़ के भी कई लोग नास्तिकता फैला रहे हैं। एक्चुअली एक्चुअली राइट यू आर राइट।

361
00:24:41,680 --> 00:24:45,840
बिल्कुल राइट है। हां आज युवा ही नहीं

362
00:24:45,840 --> 00:24:50,320
और भी मनुष्य बड़े नास्तिक बन गए। जब आप भी कह रहे हैं

363
00:24:50,320 --> 00:24:54,320
मैं बाबा हूं मैं भगवान हूं। मैं भी कह रही हूं मैं भगवान हूं। वो भी कह

364
00:24:54,320 --> 00:24:58,480
रहे हैं भगवान। ये भी कह रहे भगवान वो भी सब कहते हैं मैं भगवान। आइए

365
00:24:58,480 --> 00:25:02,800
मैं रास्ता बताता हूं। आइए मैं रास्ता बताता हूं। जी तो आजकल

366
00:25:02,800 --> 00:25:06,880
की जो युवा पीढ़ी है वो यही समझती है धर्म

367
00:25:06,880 --> 00:25:10,960
नाम की कर्म नाम की या परमात्मा नाम की कोई चीज हां वो इस पे आ

368
00:25:10,960 --> 00:25:15,280
जाती है छोड़ वो नास्तिक हो जाते हैं हम कोई भगवान भगवान नहीं लेकिन

369
00:25:15,280 --> 00:25:19,440
यहां पर सिर्फ कहते नहीं है हम अपने को भगवान नहीं कह रहे हम अपने

370
00:25:19,440 --> 00:25:23,600
को वैसे भी नहीं कह रहे हम धर्म स्थापक के परमात्मा ही आकर के

371
00:25:23,600 --> 00:25:27,840
एक साधारण तन में प्रवेश करके उनके

372
00:25:27,840 --> 00:25:31,840
माध्यम से ही सारा ज्ञान हमें देते हैं। वो स्वयं बताते हैं

373
00:25:31,840 --> 00:25:35,920
कि मैं परमपिता परमात्मा तुम आत्माओं का पिता हूं।

374
00:25:35,920 --> 00:25:40,000
तो जो जैसे आपने कहा अनुभव होता है मैं और थोड़ा सा जैसे

375
00:25:40,000 --> 00:25:44,640
कि मान लीजिए अगर ये सिद्धांत हो लॉ कि अगर

376
00:25:44,640 --> 00:25:48,720
जब यदि ईश्वर होगा तो वो घंटी

377
00:25:48,720 --> 00:25:52,880
बजेगी है ना? अब जब मैंने आपने अनुभव कराया

378
00:25:52,880 --> 00:25:56,880
घंटी बज गई। इससे सिद्ध हो गया कि ईश्वर है। तो फिर इसी तरीके

379
00:25:56,880 --> 00:26:00,880
से क्या ऐसा होता है जिसकी वजह से कोई यह कहता है

380
00:26:00,880 --> 00:26:04,880
कि हां ईश्वर है मैं मान गया। लाखों युवाएं भी यहां पर

381
00:26:04,880 --> 00:26:09,040
कितने मैं समझती हूं 50000 से मतलब कोई एक स्पेसिफिक क्रिया नहीं है। हां

382
00:26:09,040 --> 00:26:13,680
वो हर एक का अपना अपना माना क्योंकि परमात्मा दिव्य दृष्टि

383
00:26:13,680 --> 00:26:17,920
विधाता है। दिव्य बुद्धि विधाता है। तो हर

384
00:26:17,920 --> 00:26:22,000
कोई उस परमात्मा को पहचानेगा भी नहीं। गीता में लिखा है कोटों में

385
00:26:22,000 --> 00:26:26,080
को में भी को मुझे पहचानते हैं। मूढ़ मती लोग तुझ समझ मुझे

386
00:26:26,080 --> 00:26:30,400
गाली देते हैं। वरना भगवान को नहीं हम जो धर्म के

387
00:26:30,400 --> 00:26:34,960
नाम पर ये कार्य करते हैं उनको फिर गाली देते हैं। हर कोई उसको पहचान

388
00:26:34,960 --> 00:26:39,040
ले और फिर अनुभव करें यह भी जरूरी नहीं। मगर हमारे पास थ्योरिकली तो काट होनी चाहिए

389
00:26:39,040 --> 00:26:43,120
ना एथिज्म में भी। नहीं तो काट हां नास्तिकता जैसे हम ज्ञान दे

390
00:26:43,120 --> 00:26:47,200
रहे हैं संसार में राज हम देख रहे हैं कितनी नास्तिकता है

391
00:26:47,200 --> 00:26:51,840
माना आज मनुष्य ये तो ऐसे हो गया ना मानना पहनना

392
00:26:51,840 --> 00:26:56,160
और नहीं नहीं यहां तो अनुभव किया जाता है ना जो आते हैं उनको जब हम कोर्स कराते

393
00:26:56,160 --> 00:27:00,240
हैं मेडिटेशन मेडिटेशन सीखते हैं वो और सेल्फ रियलाइजेशन

394
00:27:00,240 --> 00:27:04,480
करते हैं यहां मेन बात है सेल्फ रियलाइजेशन करना

395
00:27:04,480 --> 00:27:08,640
और जब वो यह करते हैं आत्मा को पहचान जाते हैं अनुभव करते

396
00:27:08,640 --> 00:27:12,880
हैं परमात्मा अनुभूति ना हो यह नहीं हो सकता है। मतलब अनुभव

397
00:27:12,880 --> 00:27:16,880
है थ्योरी नहीं है थ्योरी नहीं अनुभव अच्छा

398
00:27:16,880 --> 00:27:20,960
तो दीदी थोड़ा सा आगे चलते हैं जो ईश्वर के बारे में हम बात कर रहे

399
00:27:20,960 --> 00:27:25,120
थे तो आपने कहा ईश्वर सर्वशक्तिमान है ऑलमाइटी

400
00:27:25,120 --> 00:27:29,200
है सर्वज्ञ है पॉइंट ऑफ लाइट एक

401
00:27:29,200 --> 00:27:33,200
एनर्जी है परम एनर्जी तो वो सनातन सत्ता

402
00:27:33,200 --> 00:27:37,280
है या मतलब वो भी मनुष्य तो नहीं तो सनातन सत्ता से अलग वो

403
00:27:37,280 --> 00:27:41,680
सत्यम शिव सुंदरम है सनातन गॉड इज ट्रुथ ट्रुथ ही गॉड

404
00:27:41,680 --> 00:27:46,000
जी तो वो वो भी नित्य है ना सनातन के हां नित्य है डेफिनेटली नित्य

405
00:27:46,000 --> 00:27:50,240
है परमात्मा सदा है सदा है आत्मा जैसे सदा परमात्मा

406
00:27:50,240 --> 00:27:54,560
भी सदा है वो कभी मरता ही नहीं तो दीदी जैसे

407
00:27:54,560 --> 00:27:58,800
क्या ब्रह्मा कुमारी ईश्वर को सर्वव्यापक भी कहता है सर्वव्यापक

408
00:27:58,800 --> 00:28:02,800
विभु से एक शब्द आया ना गीता में विभु नहीं विभु

409
00:28:02,800 --> 00:28:07,680
नहीं मानता आपने कहा अभी सर्वशक्तिमान सर्वज्ञ ऑलमाइटी अथॉरिटी

410
00:28:07,680 --> 00:28:11,760
सब परमात्मा हो जाए उसे आने की आवश्यकता ही नहीं सब परमात्मा

411
00:28:11,760 --> 00:28:15,760
नहीं हो जाए सर्वव्या सबके अंदर भी हो जाए समझो

412
00:28:15,760 --> 00:28:20,080
आपके अंदर मेरे मेरे अंदर इनके सबके अंदर परमात्मा

413
00:28:20,080 --> 00:28:25,440
है हम तो क्या कहा जाता है ब्रदरहुड

414
00:28:25,440 --> 00:28:29,440
ब्रदरहुड कहा जाता है ना हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में सब भाई भाई

415
00:28:29,440 --> 00:28:31,920
नहीं तो फादरहुड होना चाहिए सब भगवान भगवान

416
00:28:31,920 --> 00:28:36,080
भगवान हम हम सर्वज्ञ मानते हैं सर्वशक्ति मानते नहीं

417
00:28:36,080 --> 00:28:40,240
है ही हम सर्वव्यापी नहीं व्यापक नहीं तो इसमें दीदी

418
00:28:40,240 --> 00:28:44,320
जैसे जैसे हम कहते हैं कि ईश्वर सनातन है। तो सनातन का अर्थ जो निकल

419
00:28:44,320 --> 00:28:48,560
के आता है नित्य स्थाई स्थाई ना जो किसी भी देश

420
00:28:48,560 --> 00:28:53,360
काल परिस्थिति से बाधित ना हो। है ना? जैसे

421
00:28:53,360 --> 00:28:57,760
सनातन के बारे में हम कहते हैं कि जो

422
00:28:57,760 --> 00:29:01,840
मतलब सनातन सत्य वो है जिसके लिए ये उसके बारे में अगर

423
00:29:01,840 --> 00:29:06,000
कोई लाइन कही जाए तो वो बदलेगी नहीं। वही सनातन सत्य है। किसी भी

424
00:29:06,000 --> 00:29:11,360
सिचुएशन में बदल नहीं सकती। जैसे कि मैंने कहा कि मैं

425
00:29:11,360 --> 00:29:16,000
अब वर्तमान का समय चल रहा है। शिवश नारायण द्विवेदी जी

426
00:29:16,000 --> 00:29:20,080
2026 में जीवित थे। जीवित हैं। एक्सिस्ट करते हैं। मगर

427
00:29:20,080 --> 00:29:24,160
यही जो सत्य है 2075 में बदल जाएगा। अब एक्सिस्ट नहीं करते।

428
00:29:24,160 --> 00:29:28,240
शिवांश नारायण द्विवेदी नहीं करते। आत्मिक रूप से होते पर

429
00:29:28,240 --> 00:29:32,480
शिवश नारायण द्विवेदी जो उपाधि प्राप्त है शरीर के माध्यम से वो नहीं है।

430
00:29:32,480 --> 00:29:36,560
एक्सिस्ट नहीं करते। यानी कि ये सनातन सत्य नहीं है। शिवश नारायण द्विवेदी है

431
00:29:36,560 --> 00:29:40,640
ना? क्योंकि यह असत्य है। ये सत्य है। हां। तो इसी तरीके से

432
00:29:40,640 --> 00:29:44,640
दूसरी एक बिंदु आती है कि शिवश नारायण द्विवेदी चेयर पे बैठे हैं।

433
00:29:44,640 --> 00:29:47,120
चेयर पे बैठा है शिवश नारायण द्विवेदी मगर सोफे

434
00:29:47,120 --> 00:29:51,200
पे नहीं बैठा है। इससे भी ये सिद्ध हो रहा है कि मैं सनातन सत्य

435
00:29:51,200 --> 00:29:55,360
नहीं हूं। क्योंकि मैं यहां हूं वहां नहीं हूं। मेरी जो मेरा जो सत्य है

436
00:29:55,360 --> 00:29:59,360
वो बदल रहा है। जी तो जब हम ईश्वर को सनातन कह रहे हैं ईश्वर

437
00:29:59,360 --> 00:30:03,440
सनातन है तो वो तो था और है और रहेगा तो इसमें तो वो सनातन

438
00:30:03,440 --> 00:30:07,440
है मगर उसके लिए हम कहें कि ईश्वर यहां है और वहां नहीं है तो

439
00:30:07,440 --> 00:30:11,440
ये सत्य बदल गया उसका तो ये सनातन का

440
00:30:11,440 --> 00:30:15,600
टकराव हो रहा है ना एक्चुअली ऐसा नहीं है ईश्वर यहां है वो

441
00:30:15,600 --> 00:30:19,680
तो एक माना इतनी परमात्मा की और मेरी

442
00:30:19,680 --> 00:30:24,080
दूरी है सेकंड में मैं चाहूं जो वो परमधाम

443
00:30:24,080 --> 00:30:28,640
निवासी है ब्रह्मांड का निवासी पहुंच हां सेकंड वो

444
00:30:28,640 --> 00:30:32,640
देखो आज पहुंचेगा तो दीदी मगर हमने कहा वो यहां नहीं है

445
00:30:32,640 --> 00:30:36,880
इसका मतलब कहीं पे है कहीं पे नहीं है तो उसका जो सत्य है वो बदल रहा है

446
00:30:36,880 --> 00:30:41,360
नहीं अभी जैसे देखो आप हैं अभी आप कहां

447
00:30:41,360 --> 00:30:45,520
म आप कहीं जा रहे हैं आ रहे हैं यहां नहीं है कहीं कहीं जाएंगे ना सब जगह

448
00:30:45,520 --> 00:30:49,520
तो नहीं जाएंगे ना तो मैं जहां हो सके हां क्योंकि बॉडी है

449
00:30:49,520 --> 00:30:53,520
बॉडी सनातन सत्य नहीं हूं जी मैं आत्मा सनातन सत्य ईश्वर सनातन

450
00:30:53,520 --> 00:30:57,600
सत्य है सनातन सत्य सत्य माने सदा ही है। मतलब उसको

451
00:30:57,600 --> 00:31:01,680
पता से बाधित नहीं मगर देश से बाधित है। कहीं आप उसको बुलाओ उसको

452
00:31:01,680 --> 00:31:02,240
आप याद

453
00:31:02,240 --> 00:31:06,960
करो सेकंड में हाजिर हो जाएगा। हां क्योंकि उसके लिए कोई

454
00:31:06,960 --> 00:31:11,200
बॉडी नहीं है। तो दीदी जो ये वाला अर्थ है ना सनातन निज स्थाई

455
00:31:11,200 --> 00:31:15,200
हर तरह से स्थाई है। मतलब तीन तरह की बाधाएं होती हैं। एक

456
00:31:15,200 --> 00:31:19,920
होती है कालकृत एक होती है देशकृत एक होती है परिस्थिति कृत। परिस्थिति

457
00:31:19,920 --> 00:31:24,000
बाधा कैसी हो गई कि भाई अह परिस्थिति

458
00:31:24,000 --> 00:31:28,640
बाधा ऐसी कि यह मेरी बहन है। मैं विवाह नहीं कर सकता। ये परिस्थिति

459
00:31:28,640 --> 00:31:32,720
बाधा है। है ना? तो इसी तरीके से जो ईश्वर है उसके

460
00:31:32,720 --> 00:31:37,040
लिए हमने जो भी कुछ कहा वो ना तो देश से बदलना चाहिए

461
00:31:37,040 --> 00:31:41,120
ना ही काल से ना ही परिस्थिति से। मगर देश से बदल रहा है।

462
00:31:41,120 --> 00:31:45,120
हमने कहा ईश्वर ईश्वर अपनी कहीं उनका लोक है।

463
00:31:45,120 --> 00:31:49,280
मान लीजिए। हां। लेकिन उसका जो लोक है हां इस

464
00:31:49,280 --> 00:31:53,600
दुनिया से पार, चांद सितारों से पार, सूक्ष्म लोक से भी पार,

465
00:31:53,600 --> 00:31:57,680
ठंड ज्योतिम में तत्व तो वह है वहां वहां वह यहां नहीं तो ये उसका

466
00:31:57,680 --> 00:32:01,680
वहां होना, यहां ना होना ये देशकृत बाधा से बाधित हो रहा है।

467
00:32:01,680 --> 00:32:05,840
तो वो मतलब वो सनातन कैसे कहा जाए फिर उसे? क्योंकि सनातन सनातन

468
00:32:05,840 --> 00:32:09,840
काल नहीं आता। सनातन आप कह रहे हैं। मैं नहीं कह रही हूं। अच्छा वो सनातन ईश्वर नहीं है।

469
00:32:09,840 --> 00:32:14,160
हां। परमात्मा तो सदा शिव सत्यम शिवम सुंदरम गॉड इज ट्रुथ। पृथ्वी

470
00:32:14,160 --> 00:32:17,440
गॉड है। तो सनातन सत्य ही तो कहते हैं उसे परमात्मा को। सनातन सत्य

471
00:32:17,440 --> 00:32:21,680
नहीं है। शाश्वत सत्य शाश्वत सत्य तो वही तो सनातन जो देश माना

472
00:32:21,680 --> 00:32:26,160
आप वो वो सनातन फिर आप शब्द ले लेते हैं इस सृष्टि पर

473
00:32:26,160 --> 00:32:30,640
मुझे ऐसा सृष्टि में नहीं रहता है मुझे ऐसा लगता है कि

474
00:32:30,640 --> 00:32:34,960
ब्रह्मा कुमारी के अनुसार जो ईश्वर है वो काल कृत

475
00:32:34,960 --> 00:32:39,040
बाधा से तो बाधित नहीं है कि है और रहेगा वो नहीं अनादि अनंत है

476
00:32:39,040 --> 00:32:43,200
मगर देश कृत बाधा से बाधित है

477
00:32:43,200 --> 00:32:48,080
वो किसी बंधन में बंधता ही नहीं है कोई बाधा उसके के अंदर है ही नहीं।

478
00:32:48,080 --> 00:32:52,160
वो न्यूट्रल और न्यारा और प्यारा

479
00:32:52,160 --> 00:32:56,480
है। सारे विश्व से न्यारा है। सारे विश्व का वो प्यारा है। नहीं इस

480
00:32:56,480 --> 00:33:00,640
इस बाधा से बाधित है ना कि वो यहां है तो वहां नहीं है। नहीं ये तो हम

481
00:33:00,640 --> 00:33:04,640
हम तो जहां उसको बुलाए वो आ जाएगा। आज मैं अगर कहीं तो अलग बात है हां तो

482
00:33:04,640 --> 00:33:09,200
वो वही है ना ऊपर परमधाम जिसको ज्योति महतत्व

483
00:33:09,200 --> 00:33:13,280
कहते हैं वो ज्योति जो सभी ज्योति आत्माएं

484
00:33:13,280 --> 00:33:17,280
वो भी वहीं से आती है सृष्टि रूपी रंगमंच पर पाठ प्ले करने के लिए और

485
00:33:17,280 --> 00:33:21,520
परमात्मा एक ही बार इस सृष्टि पे आता है इस सृष्टि का परिवर्तन

486
00:33:21,520 --> 00:33:25,920
करने के लिए जो कलयुगी दुनिया है उसको सतयुगी पैराडाइज

487
00:33:25,920 --> 00:33:29,920
बहिस्त बनाने के लिए आता है। उसके लिए वो ज्ञान योग की शिक्षा

488
00:33:29,920 --> 00:33:32,480
देता है। राजयोग मेडिटेशन सिखलाता है।

489
00:33:32,480 --> 00:33:36,480
उसको सीख के जो हमने कहा कि नर नारायण नारी लक्ष्मी बन

490
00:33:36,480 --> 00:33:41,040
जाती है। मतलब वो आता जाता है मगर वो सनातन रूप से

491
00:33:41,040 --> 00:33:45,200
क्योंकि जैसे अभी मैं आत्मा हूं गर्भ में प्रवेश किया मैंने और

492
00:33:45,200 --> 00:33:49,280
फिर मैं बच्चा बच्ची बन गई तो मैं 15 साल 20 साल 100

493
00:33:49,280 --> 00:33:53,280
साल तक भी मैं रहूंगा। इस शरीर में बंधन है। परमात्मा को इस तरह

494
00:33:53,280 --> 00:33:57,520
का बंधन नहीं है। वह सेकंड में आ जा सकता है क्योंकि उसका रीइकार्नेशन होता है।

495
00:33:57,520 --> 00:34:01,600
उसका अवतरण होता है। मगर दीदी इसमें तो ये है ना कि परिस्थिति कृत

496
00:34:01,600 --> 00:34:06,160
बाधा से हम बाधित होते हैं। वो नहीं जैसे वो नहीं होता। जैसे हमने कहा कि हम इस शरीर में आ गए।

497
00:34:06,160 --> 00:34:10,800
तो हम क्योंकि बाधित हैं इसलिए बंधन फील करेंगे। मगर जैसे

498
00:34:10,800 --> 00:34:14,800
ईश्वर है। ईश्वर के लिए मान लीजिए वीडियो गेम हो। हां। वीडियो गेम हम

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00:34:14,800 --> 00:34:19,040
खेल रहे हैं और हम उसके अंदर जो कारें आ रही हैं हमको धक्का लग रहा है तो झटका

500
00:34:19,040 --> 00:34:23,040
भी आ रहा है मगर फिर भी हम यह जानते हैं यह वीडियो गेम मैंने चालू किया मैं इसको बंद कर

501
00:34:23,040 --> 00:34:27,280
सकता हूं तो परमात्मा इस तरीके से उसमें रहते हुए भी मुक्त भी रहता

502
00:34:27,280 --> 00:34:33,280
है है ना

503
00:34:37,030 --> 00:34:41,030
[संगीत]
