1
00:00:01,960 --> 00:00:06,080
[घंटी की आवाज़] मनुष्य कोई भी कार्य एक भी कार्य बिना सहायता कर ही

2
00:00:06,080 --> 00:00:10,240
नहीं सकता। इसमें उदाहरण क्या देना आपको? एक उदाहरण दे दीजिए

3
00:00:10,240 --> 00:00:14,400
तो मैं उससे नाप के दिखाऊंगा। ये मैंने बोतल ठीक है। ये ये मैंने बोतल

4
00:00:14,400 --> 00:00:19,440
उठाई है अपने हाथ में। ये मैं ईश्वर की सहायता के उठा बिना ईश्वर की सहायता के उठा ही नहीं सकता।

5
00:00:19,440 --> 00:00:23,440
ये ले लीजिए उदाहरण। अच्छा मतलब

6
00:00:23,440 --> 00:00:27,440
सबसे पहले तो एक चीज फिक्स हो गई कि अगर किसी ने किसी को चाकू मारा तो

7
00:00:27,440 --> 00:00:31,520
बिना ईश्वर की सहायता के नहीं मार सकता। कुछ भी नहीं हो सकता बिना

8
00:00:31,520 --> 00:00:35,520
ईश्वर की सहायता के एक भी कार्य नहीं। बहुत बढ़िया। बहुत बढ़िया। बिना ईश्वर

9
00:00:35,520 --> 00:00:40,640
की सहायता के नहीं हो सकता। इसको रख लेना बात के लिए। अब दूसरी बात आ गई

10
00:00:40,640 --> 00:00:44,880
सहायता निमित्त तो हर कार्य में ईश्वर ही है ना। बीच में इसमें मैंने

11
00:00:44,880 --> 00:00:48,880
बिना ईश्वर के सस्टेन नहीं कर सकते। इसमें मैंने ईश्वर की किस रूप में

12
00:00:48,880 --> 00:00:52,960
सहायता ली है? किस रूप में सहायता ली है? चेतन के रूप में, जड़ के

13
00:00:52,960 --> 00:00:57,040
रूप में? चेतन चेतन चेतन रूप का मतलब क्या समझ रहे हैं आप?

14
00:00:57,040 --> 00:01:01,360
मुझे बता दीजिए पहले। चेतन रूप का मतलब किस प्रकार बता देता हूं। बता देता हूं।

15
00:01:01,360 --> 00:01:05,600
बता देता हूं। जैसे मेरे पास मेरे पास एनर्जी है।

16
00:01:05,600 --> 00:01:09,600
खाना खाया तो इस समय जो मेरी एनर्जी है ना अगर मैं भौतिक दृष्टि से

17
00:01:09,600 --> 00:01:13,680
देखूंगा तो यह एनर्जी मेरे लिए क्या कहते

18
00:01:13,680 --> 00:01:17,280
हैं? ऐसी है कि इसके पास अपना कोई प्रज्ञा

19
00:01:17,280 --> 00:01:21,280
नहीं है या बुद्धि नहीं है या वहां पर कोई भी दिमाग अक्ल इस तरह

20
00:01:21,280 --> 00:01:25,360
की कोई चीज नहीं निर्णायक क्षमता नहीं है। मैं जैसा इसको उपयोग

21
00:01:25,360 --> 00:01:29,360
करना चाहता हूं मैं जैसा इसको उपयोग करना चाहता हूं वो हो रही है

22
00:01:29,360 --> 00:01:33,440
उपयोग। अब अगर आप ये कहेंगे जो शक्ति है जिसका मैं

23
00:01:33,440 --> 00:01:37,600
अपने मन मुताबिक उपयोग कर रहा हूं। यह जड़ रूप से है तो यह मानना

24
00:01:37,600 --> 00:01:41,600
पड़ेगा कि ईश्वर यहां पर चेतन होते हुए भी जड़ के रूप

25
00:01:41,600 --> 00:01:45,680
में उपस्थित हो रहा है तो हम उसके उसकी सहायता ले रहे हैं। ठीक? चेतन होते

26
00:01:45,680 --> 00:01:50,160
हुए भी जड़ रूप में उपस्थित हो रहा है तो हम उसकी सहायता ले रहे हैं और

27
00:01:50,160 --> 00:01:54,160
या फिर यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर ईश्वर जो है बुद्धि

28
00:01:54,160 --> 00:01:58,320
पूर्वक हमारे समस्त कार्यों में उतना ही भागीदार होता है जितना हम

29
00:01:58,320 --> 00:02:00,800
होते हैं

30
00:02:00,800 --> 00:02:04,960
वही ना भागीदारी यानी निर्णय लेने में ईश्वर का कितना भागीदारी है यही बोलना चाह रहा

31
00:02:04,960 --> 00:02:09,120
अल्टीमेटली यही सवाल है आपका यही बोला आपने ये तो मैं मैं इस

32
00:02:09,120 --> 00:02:13,200
पर चर्चा आगे नहीं बढ़ाना चाह रहा हूं ये तो मैं बाद के लिए रख रहा हूं वो मुझे बस इतना बता

33
00:02:13,200 --> 00:02:17,600
दीजिए कि वो जड़ के रूप में उपयोग होता

34
00:02:17,600 --> 00:02:21,680
है ईश्वर शक्ति जड़ के रूप में या चेतन के रूप में होती है यह बता

35
00:02:21,680 --> 00:02:25,680
दीजिए बस फिर बाद में बात कर लेंगे इस बारे में अभी वो सर्वशक्तिमान

36
00:02:25,680 --> 00:02:29,760
वाला चल रहा है वो चलता रहेगा जी देखिए जड़ के

37
00:02:29,760 --> 00:02:32,960
रूप में भी वही बात है ना जड़ के रूप में नहीं चेतन

38
00:02:32,960 --> 00:02:37,520
सत्ता के रूप में अवेलेबल है जड़ के रूप में मूत प्रकृति अवेलेबल है

39
00:02:37,520 --> 00:02:41,520
जड़ के रूप में ईश्वर नहीं ईश्वर से इंटरेक्शन नहीं करते मू प्रकृति से इंटरेक्शन बात

40
00:02:41,520 --> 00:02:46,320
को समझ थोड़ा सा स्ट्रक्चरल वे में चाहिए बात अभी हो रही है कि

41
00:02:46,320 --> 00:02:50,640
मनुष्य जो भी काम करता है उसमें ईश्वर सहायक होता है। ठीक है?

42
00:02:50,640 --> 00:02:55,200
तो क्योंकि ईश्वर तो चेतन है। ईश्वर चेतन है ना?

43
00:02:55,200 --> 00:02:59,360
तो मैं यहां पर आपसे ये पूछ रहा हूं कि

44
00:02:59,360 --> 00:03:03,520
चेतन होते हुए भी वो जड़ जैसा बिहेव करता है क्या?

45
00:03:03,520 --> 00:03:07,920
चेतन होते हुए भी नहीं करता। तो इसका मतलब वहां

46
00:03:07,920 --> 00:03:12,160
पर वो जो ईश्वर की सहायता ली जा रही है

47
00:03:12,160 --> 00:03:16,160
वो ईश्वर की चेतना के साथ ली जा रही है। मतलब चेतना भी वहां इन्वॉल्व है।

48
00:03:16,160 --> 00:03:20,320
ईश्वर एक ईश्वर का निर्णय है वहां पर। ईश्वर की सत्ता

49
00:03:20,320 --> 00:03:24,720
है। निर्णय नहीं है। वही तो आप गलती कर रहे हैं। निर्णय नहीं है। निर्णय

50
00:03:24,720 --> 00:03:28,960
मेरा स्वयं का है। निर्णय में ईश्वर ने कैसे आ सकता है? आप क्या बात कर रहे हो? तो

51
00:03:28,960 --> 00:03:33,200
निर्णय में आएगा नहीं। ईश्वर निर्णय नहीं है तो वो जड़ जड़ केव

52
00:03:33,200 --> 00:03:37,280
कर रहा है। हां नहीं आप शब्दों का चुनाव आप शब्दों का चुनाव

53
00:03:37,280 --> 00:03:41,520
गलत कर रहे हैं। मैं बताता हूं मैं बताता हूं कैसे जड़ को ईश्वर ने धारण किया हुआ

54
00:03:41,520 --> 00:03:45,600
जड़ के रूप में ईश्वर बिहेव नहीं कर रहा है। जड़ को ये ईश्वर ने खुद जो है

55
00:03:45,600 --> 00:03:48,480
जड़ को यानी मूव प्रकृति देखो धारण किया हुआ है इसलिए एक्सिस्टेंस

56
00:03:48,480 --> 00:03:52,480
है सारी ईश्वर खुद नहीं बिहेव कर रहा है उस रूप में या फिर हां रूप

57
00:03:52,480 --> 00:03:56,480
यानी ईश्वर का फॉर्म ट्रांसफॉर्म नहीं हो रहा है जिस प्रकार से आप ले जाना

58
00:03:56,480 --> 00:04:00,560
चाहे बात को वो नहीं हो रहा ईश्वर निर्णायक रूप से बिल्कुल नहीं सहायता

59
00:04:00,560 --> 00:04:06,240
कर रहा है ईश्वर जो है ऐसा कह लीजिए कि

60
00:04:06,240 --> 00:04:10,400
है वो बुद्धि है फिर भी वहां पर अपनी बुद्धि पूर्वक वहां पर हस्तक्षेप

61
00:04:10,400 --> 00:04:14,480
नहीं कर रहा है। इसका मतलब कि मैं डला हुआ हूं। आप मुझे जैसा उपयोग में

62
00:04:14,480 --> 00:04:18,640
लेना चाहते हो ले सकते हो। यही जड़ होता है। इसी को मैं जड़ कह रहा हूं।

63
00:04:18,640 --> 00:04:22,720
ऐसा ही कर रहा है ईश्वर। ईश्वर की स्वतंत्र बुद्धि

64
00:04:22,720 --> 00:04:26,880
लेने की निर्णायक लेने की क्षमता होते हुए भी फुली पूरी

65
00:04:26,880 --> 00:04:30,960
तरीके से वो डिपेंड होता है वहां जीव के ऊपर और जो

66
00:04:30,960 --> 00:04:35,120
है वो वहां बिहेव करता है कि उसका जैसा उपयोग वो करना चाहता

67
00:04:35,120 --> 00:04:39,200
है उसकी सीमा में जो आ सकता है वो कर लेता है

68
00:04:39,200 --> 00:04:43,280
जैसा भी उपयोग वो करना चाहता है अब मैं बोलूं इसका

69
00:04:43,280 --> 00:04:47,840
उत्तर हां बोलिए जी बोलिए इसका जवाब ये है कि जो

70
00:04:47,840 --> 00:04:53,360
संसार बना है ईश्वर का बना है ईश्वर की खुद की

71
00:04:53,360 --> 00:04:57,360
ईश्वर का खुद का गुण है कि उस गुण की वजह से ईश्वर ने संसार बनाया है

72
00:04:57,360 --> 00:05:01,360
और वो संसार ईश्वर ने खुद से ही जानबूझकर ऐसा बनाया है कि

73
00:05:01,360 --> 00:05:04,000
हमारी कर्म करने की स्वतंत्रता बनी रहे।

74
00:05:04,000 --> 00:05:08,160
ठीक है? अब कर्म करने की स्वतंत्रता बनी रहे। ये

75
00:05:08,160 --> 00:05:12,560
क्या बोलना चाहिए? ये जो मर्जी है वो ईश्वर की है।

76
00:05:12,560 --> 00:05:17,040
ईश्वर ही चाहता है कि हमारे पास कर्म करने की स्वतंत्रता बनी रहे। ठीक है? ऐसा मैंने क्या कहा?

77
00:05:17,040 --> 00:05:21,040
देखिए है क्या? कंप्लीट कर सुन लीजिए ना टोकिए मत बीच में ये जरूरी

78
00:05:21,040 --> 00:05:25,040
है कंप्लीट करना अच्छा कर लीजिए इसमें क्या समझ है मुझे कंप्लीट करने दीजिए ना

79
00:05:25,040 --> 00:05:29,200
पूरा पॉइंट अपना कर लीजिए कर लीजिए तो ये जो हम ये जो

80
00:05:29,200 --> 00:05:33,680
संसार में क्या बोल रहा हूं कर्म

81
00:05:33,680 --> 00:05:37,920
करने की स्वतंत्रता जो है ईश्वर की हमारी सॉरी तो ये

82
00:05:37,920 --> 00:05:41,920
ईश्वर अपनी मर्जी से बनाता है और ईश्वर

83
00:05:41,920 --> 00:05:46,080
चाहता है क्या मतलब चाहता है शब्द गलत हो जाएगा ईश्वर खुद से ये चलो

84
00:05:46,080 --> 00:05:50,080
चाहता है ले लो अभी के लिए क्योंकि फिर अभी बेटर ईश्वर खुद ही चाहता है कि

85
00:05:50,080 --> 00:05:54,080
हम जो है कर्म स्वतंत्र स्वतंत्र रूप से करें। इसीलिए ईश्वर ने हमें यह

86
00:05:54,080 --> 00:05:58,080
अवसर प्रदान कर रखा है। और इस अवसर प्रदान करने में

87
00:05:58,080 --> 00:06:02,320
ही ये निहित है कि ईश्वर इंटरफेयर नहीं करेगा। जिस प्रकार से हम इंटरफेरेंस करवाना

88
00:06:02,320 --> 00:06:06,800
चाह रहे हैं कि भाई या फिर आप बोल रहे हैं कि भाई बीच में क्या

89
00:06:06,800 --> 00:06:10,800
अपना चेतन रूप से क्या कोई प्रभाव डाल दे। ठीक है?

90
00:06:10,800 --> 00:06:14,800
एक तो ये बात है। और एक दूसरी बात ये है कि आप जो बोल रहे जड़ रूप में प्रयोग में आता है वो

91
00:06:14,800 --> 00:06:18,800
शब्द गलत है। प्रोसेस मैंने आपको समझा दिया। अब शब्दों की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि मैंने

92
00:06:18,800 --> 00:06:19,300
पूरा एक्सप्लेन

93
00:06:19,280 --> 00:06:23,360
कर दिया। लेकिन आप अगर वो शब्द डालेंगे जो कि मैं मेंशन करना

94
00:06:23,360 --> 00:06:27,360
चाहूंगा वो शब्द नहीं डाल सकते। जड़ रूप में प्रयोग जड़ रूप में प्रयोग मूल प्रकृति

95
00:06:27,360 --> 00:06:31,360
हो रही है। आप उसको किसी और सेंस में समझ रहे हैं तो उसको छोड़

96
00:06:31,360 --> 00:06:35,600
दीजिए अभी। आपने जवाब क्या दिया है? कि ईश्वर ने कर्म

97
00:06:35,600 --> 00:06:39,840
फल करने की स्वतंत्रता दी है। इसलिए वो वहां पर कुछ हस्तक्षेप नहीं करता

98
00:06:39,840 --> 00:06:44,080
है। ठीक है? बोलता नहीं है। बीच में यही कहा ना आपने? हम

99
00:06:44,080 --> 00:06:48,720
पर मैं ये पूछ रहा हूं कि इसका मतलब यह है कर्म फल की स्वतंत्रता

100
00:06:48,720 --> 00:06:52,720
देने के कारण ईश्वर वहां पर जड़ की तरह से व्यवहार करता

101
00:06:52,720 --> 00:06:55,200
है ना

102
00:06:55,200 --> 00:06:59,760
उसका व्यवहार क्या हुआ वहां पर कैसा व्यवहार हुआ

103
00:06:59,760 --> 00:07:03,840
का अगर जड़ का व्यवहार हुआ जैसे कि मान

104
00:07:03,840 --> 00:07:08,080
लीजिए ईश्वर की शक्ति है मैं मैं शब्द दे देता हूं आपको आप थोड़ा

105
00:07:08,080 --> 00:07:12,320
थोड़ा इंटरफेर कर रहा हूं ये कंप्लीट हो जाएगा एक पॉइंट आप जड़ शब्द को हटा दीजिए

106
00:07:12,320 --> 00:07:16,400
आप आप सिंपली ये बोलना चाह रहे हैं कि ईश्वर पैसिवली पैसिवली समझ रहे

107
00:07:16,400 --> 00:07:20,880
एक्टिवली या पैसिवली तो ईश्वर वहां पर है कुछ

108
00:07:20,880 --> 00:07:24,880
कर नहीं रहा है बीच में हस्तक्षेप नहीं कर रहा है निर्णायक रूप से और ईश्वर बस वहां

109
00:07:24,880 --> 00:07:28,880
पर है एक्सिस्ट कर रहा है इसको ये रख दीजिए जड़ जड़ रूप जड़

110
00:07:28,880 --> 00:07:32,880
रूप बोलेंगे तो फिर वो गलत हो जाएगा जड़ रूप

111
00:07:32,880 --> 00:07:34,480
उसमें उसमें बात है एक बात

112
00:07:34,480 --> 00:07:38,640
उठाई जाती है ईश्वर लीला कर सकता है कि नहीं एक बात

113
00:07:38,640 --> 00:07:42,880
उठाई जाती है मैं यहां पर ईश्वर की लीला सिद्ध कर रहा हूं

114
00:07:42,880 --> 00:07:46,880
समझे आप क्या सिद्ध कर ईश्वर की लीला सिद्ध कर रहा हूं ना

115
00:07:46,880 --> 00:07:51,200
मैं यहां पर ईश्वर के पास निर्णय लेने की स्वतंत्र सत्ता

116
00:07:51,200 --> 00:07:55,600
है ईश्वर चेतन है ईश्वर बुद्धिमान

117
00:07:55,600 --> 00:07:59,920
है सर्वशक्तिमान है फिर भी वो अपने

118
00:07:59,920 --> 00:08:04,000
से निकृष्ट जो तत्व है अल्पज

119
00:08:04,000 --> 00:08:08,240
है जीव के द्वारा उपयोग होता है

120
00:08:08,240 --> 00:08:12,240
न्यूट्रल रहता है चाहे भले ही वो उसका उपयोग किसी भी कार्य में कर रहा

121
00:08:12,240 --> 00:08:16,240
हो वो न्यूट्रल रहता है। तो यह जो ईश्वर का बिहेव है

122
00:08:16,240 --> 00:08:20,800
यह बिहेव उसका जो चेतन स्वरूप है, सर्वशक्तिमत्ता का स्वरूप है,

123
00:08:20,800 --> 00:08:24,800
उसके विपरीत लीला है। अब वो करता क्यों है? वो बात एक अलग है।

124
00:08:24,800 --> 00:08:28,800
उसने लीला क्यों की? वो शांत क्यों रहा? वो चुप क्यों

125
00:08:28,800 --> 00:08:33,040
रहा? उसने अपने आप को उपयोग में क्यों आने दिया? इसके पास आपके

126
00:08:33,040 --> 00:08:37,040
अकॉर्डिंगली उसके पास एक लॉजिकल कारण है। क्योंकि वो

127
00:08:37,040 --> 00:08:41,840
कर्म फल के लिए स्वतंत्रता देता है जीव को। स्वतंत्रता

128
00:08:41,840 --> 00:08:46,160
देने के लिए ही ईश्वर वहां पर ऐसा बिहेव करता

129
00:08:46,160 --> 00:08:49,600
है जैसे कि उसके पास कोई बुद्धि है ही

130
00:08:49,600 --> 00:08:53,760
नहीं। पूरी बुद्धि जीभ लगा रहा है। उसकी शक्ति का उपयोग कर रहा है और

131
00:08:53,760 --> 00:08:57,760
मर्डर हो रहा है। चीजें हो रही है। ईश्वर वहां पर शांत रह रहा

132
00:08:57,760 --> 00:09:01,920
है। वो कोई भी हस्तक्षेप नहीं कर रहा। जैसा जीव के द्वारा

133
00:09:01,920 --> 00:09:06,000
उसको उपयोग किया जाना है वैसा होने दे रहा है। कारण आपने दिया

134
00:09:06,000 --> 00:09:10,160
है वह बात एक अलग है कि ऐसा करने का उसके पास एक कारण

135
00:09:10,160 --> 00:09:14,240
है। वो बात एक अलग है। मगर वो कर तो रहा है ना वहां पर

136
00:09:14,240 --> 00:09:18,320
लीला वो चेतन होते हुए भी वहां पर जड़ जैसा

137
00:09:18,320 --> 00:09:22,480
उपयोग में आ रहा है। जैसे मैं इस बोतल है। मैं इसको उठा रहा हूं। अब यह

138
00:09:22,480 --> 00:09:26,800
जो बोतल है प्रकृति तत्व जो इसमें है प्रकृति उसका इसमें

139
00:09:26,800 --> 00:09:31,120
कोई हस्तक्षेप नहीं है। उठाने अथवा ना उठाने में। इसी

140
00:09:31,120 --> 00:09:35,200
प्रकार से इस बोतल को उठाने के लिए जो शक्ति एनर्जी यूज़ हुई जो

141
00:09:35,200 --> 00:09:39,360
कि ईश्वर से मुझे प्राप्त हो रही है उसने भी कोई हस्तक्षेप नहीं किया इसको उठाने

142
00:09:39,360 --> 00:09:43,360
ना उठाने हां वो तो है ही ना हस्तक्षेप तो मैंने

143
00:09:43,360 --> 00:09:47,440
प्लेनली क्लियर कर दिया हस्तक्षेप बिल्कुल नहीं किया तो इसका मतलब

144
00:09:47,440 --> 00:09:53,440
ईश्वर यहां पर जड़ की तरह से बिहेव कर रहा है ना

145
00:09:53,440 --> 00:09:58,080
जिस प्रकार आप चलो मैं इसको और अच्छे से रख देता हूं जिस प्रकार जड़ हस्तक्षेप

146
00:09:58,080 --> 00:10:02,320
नहीं कर रहा है वैसे ही उसी प्रकार ईश्वर पर भी हस्तक्षेप नहीं कर रहा। क्या आप ये बोलना चाह रहे हैं?

147
00:10:02,320 --> 00:10:06,400
हां हां ये बात सही है। लेकिन आप फिर उसको जड़ रूप एक शब्द

148
00:10:06,400 --> 00:10:10,560
दे देंगे ना वो मत दीजिए। मैं खाली उसके लिए छोड़ दीजिए। रुकिए

149
00:10:10,560 --> 00:10:14,560
ईश्वर का जो व्यवहार ईश्वर का जो व्यवहार यहां पर हुआ वो

150
00:10:14,560 --> 00:10:19,200
जड़ के जड़ जड़ पदार्थ के व्यवहार के समान हो गया ना।

151
00:10:19,200 --> 00:10:23,440
ईश्वर का जो व्यवहार हुआ जैसा जड़ जैसा जड़ पदार्थ व्यवहार

152
00:10:23,440 --> 00:10:27,600
कर रहा है वैसा ही व्यवहार ईश्वर कर रहा है ना यहां पर।

153
00:10:27,600 --> 00:10:32,000
ये तो बोल ही रहा हूं। ये तो बोले ही बोला है मैंने लेकिन आप मैंने छोड़ने वाली

154
00:10:32,000 --> 00:10:36,000
रुकिए रुकिए मैं क्लियर करूंगा क्लियर करूंगा छोड़ने वाली बात जो मैंने बोली

155
00:10:36,000 --> 00:10:40,320
वो जड़ रूप जो शब्द इस्तेमाल कर रहा था उसका फिर मतलब कुछ और निकल कर रहा था

156
00:10:40,320 --> 00:10:44,400
छोड़ने वाली बात इसलिए अगर आप हस्तक्ष वो आप समझ

157
00:10:44,400 --> 00:10:48,400
नहीं रहे इसीलिए इसीलिए मैंने बोला मैंने अब मैंने क्लियर कर दिया

158
00:10:48,400 --> 00:10:52,640
मेरा जड़ रूप क्या है कि यहां पर ईश्वर और जड़

159
00:10:52,640 --> 00:10:56,880
के व्यवहार में समानता आ गई बिल्कुल ना वो हस्तक्षेप

160
00:10:56,880 --> 00:11:01,200
कर रहा है जड़ और ना ईश्वर तो है

161
00:11:01,200 --> 00:11:05,280
जड़ तो जड़ है वो तो इसलिए कर ही नहीं सकता मगर ईश्वर चेतन है

162
00:11:05,280 --> 00:11:08,640
फिर भी वो जड़ जैसा व्यवहार कर रहा है इसका मतलब यहां पे

163
00:11:08,640 --> 00:11:12,640
वो लीला कर रहा है जो वो नहीं है उसके जैसा बिहेव कर

164
00:11:12,640 --> 00:11:16,640
रहा है आप ये बोलना चाह रहे हो कि ईश्वर का जो

165
00:11:16,640 --> 00:11:21,040
गुण कर्म स्वभाव है जो आप भी मानते हैं कुछ ना कुछ है उसके विपरीत

166
00:11:21,040 --> 00:11:25,280
जाके कुछ कार्य कर सकने की स्वतंत्रता ईश्वर के पास है या नहीं ये सवाल है ना आपका

167
00:11:25,280 --> 00:11:29,280
मुझसे नहीं ये सवाल है ही नहीं ईश्वर

168
00:11:29,280 --> 00:11:33,680
चेतन है। हां चेतन है। वो

169
00:11:33,680 --> 00:11:39,120
एक जीव के अकॉर्डिंगली कार्यरत हो रहा है ना।

170
00:11:39,120 --> 00:11:43,200
नहीं हो रहा। बोल रहा हूं। ईश्वर हां

171
00:11:43,200 --> 00:11:47,360
मैं बता देता हूं। ईश्वर के अकॉर्डिंग ही कर्म कर्म

172
00:11:47,360 --> 00:11:51,360
फल करने की स्वतंत्रता प्रदान ईश्वर ने की है और उसके अकॉर्डिंग ईश्वर

173
00:11:51,360 --> 00:11:56,000
का में आ रहा है। आप [हंसी] उसको गलत तरीके से ले रहे हैं।

174
00:11:56,000 --> 00:12:00,480
आप अगर ईश्वर के अकॉर्डिंग जीव के निर्णय कर दोगे तो फिर तो सीधेसीधे

175
00:12:00,480 --> 00:12:04,560
मर्डर का निर्णय फिर वही बात है। फिर जो बात मैंने बोली नहीं आप वो बोल रहे

176
00:12:04,560 --> 00:12:08,560
निर्णय की बात मैंने बोली नहीं। तो मैं बोल रहा हूं। मैं

177
00:12:08,560 --> 00:12:12,880
आप देखिए क्या करें? कान को इधर से पकड़ ले। कान को इधर से पकड़ ले। वो जीव के अनुसार

178
00:12:12,880 --> 00:12:17,120
चल रहा है ईश्वर या जीव उसके अनुसार चल रहा है ये बता दीजिए।

179
00:12:17,120 --> 00:12:21,360
कर्म करने वाली बात जो है कर्म करने वाली जो बात चल रही है

180
00:12:21,360 --> 00:12:23,680
उसमें जीव के अनुसार ईश्वर काम कर रहा

181
00:12:23,680 --> 00:12:28,480
है या ईश्वर के अनुसार जीव काम कर रहा है बताइए

182
00:12:28,480 --> 00:12:32,560
जीव के अनुसार काम करना ही ईश्वर के अनुसार है। अब ये दिक्कत

183
00:12:32,560 --> 00:12:36,720
हो जाएगी समझने में। यानी वही मैं समझ गया। आप जो भी

184
00:12:36,720 --> 00:12:40,720
आप आपने क्या किया है? जो जो चीजें आप स्वीकार करते हो

185
00:12:40,720 --> 00:12:45,840
उनको आपने कह दिया यह उसका कार्य इसलिए वो कर रहा है यह बात आ गई

186
00:12:45,840 --> 00:12:49,920
यह उसका कार्य इसलिए वो कर रहा है कुल मिलाकर के सारी कहानियों के

187
00:12:49,920 --> 00:12:53,920
पीछे यही है कि आप पहले ये कर देते हैं कि ये उसका कार्य है

188
00:12:53,920 --> 00:12:58,080
इसलिए उसने किया और जो जो चीजें हमारी है क्योंकि वो उसका कार्य

189
00:12:58,080 --> 00:13:02,080
नहीं है इसलिए वो नहीं कर सकता अब ये जो अब ये जो उसका कार्य

190
00:13:02,080 --> 00:13:06,160
है अब ये जो उसका कार्य है वो उसने किया यह फैसला कहां से होगा यह प्रमाण से होगा

191
00:13:06,160 --> 00:13:10,240
तर्क है नहीं इसमें कोई क्या-क्या क्या उसका कार्य है? क्या उसका कार्य नहीं है? फैसला प्रमाण

192
00:13:10,240 --> 00:13:14,320
से होगा। उसमें तर्क है नहीं। प्रमाण क्या है? वेद है। वेद का वो वो आंसर है

193
00:13:14,320 --> 00:13:18,320
जो हम करेंगे। यही यही बात आ गई। अब मैं बात कर रहा हूं। यानी

194
00:13:18,320 --> 00:13:22,320
कि जो ईश्वर नहीं है

195
00:13:22,320 --> 00:13:26,400
उसके अनुसार बिहेव करना भी ईश्वर ने तय किया है कि मुझे ऐसा

196
00:13:26,400 --> 00:13:29,760
करना पड़ेगा।

197
00:13:29,760 --> 00:13:34,240
वही तो बोल रहा हूं। ईश्वर नहीं किया।

198
00:13:34,240 --> 00:13:38,240
जो ईश्वर है उसके अनुसार ही बिहेव कर रहा है। जो ईश्वर नहीं है उसके अनुसार बिहेव नहीं कर

199
00:13:38,240 --> 00:13:42,400
रहा। यानी कि ईश्वर के ईश्वर के ईश्वर के उसमें

200
00:13:42,400 --> 00:13:46,480
स्वरूप में लीला करना भी आ गया ना। लीला करना क्या है? नहीं

201
00:13:46,480 --> 00:13:50,640
आया। लीला सुनिए आप आपने अभी बोला लीला करना यानी स्वरूप

202
00:13:50,640 --> 00:13:54,800
में के विरुद्ध जाना। अब मैं जब स्वरूप के विरुद्ध जाना मान ही नहीं रहा हूं तो लीला कहां से आई बीच में?

203
00:13:54,800 --> 00:13:58,560
लीला आएगी नहीं ना। तो

204
00:13:58,560 --> 00:14:02,640
पर वो अपने से अपने से निकृष्ट चेतन सत्ता वाले के अनुसार

205
00:14:02,640 --> 00:14:08,560
बिहेव कर रहा है ना

206
00:14:08,560 --> 00:14:13,920
क्या बिहेव कर रहा छोड़िए आपको मैं समझा दिया वो कितनी बार रिपीट कर

207
00:14:13,920 --> 00:14:18,000
भाई वो बिहेव कर तो रहा है जड़ के समान वहां पर जीव के द्वारा

208
00:14:18,000 --> 00:14:22,320
उपयोग में आ रहा है हां आ रहा है पॉइंट

209
00:14:22,320 --> 00:14:26,400
में बता रहा हूं पॉइंट मैं बता रहा हूं कि जड़ जड़ ना होते हुए

210
00:14:26,400 --> 00:14:30,560
भी चेतन होते हुए भी जड़ के जैसा व्यवहार करना ये

211
00:14:30,560 --> 00:14:35,360
ईश्वर के स्वरूप में है शामिल है

212
00:14:35,360 --> 00:14:39,360
इस आप उसे कॉन्टक्स्ट कॉन्टक्स्ट [हंसी] तैयार

213
00:14:39,360 --> 00:14:43,360
करना जरूरी है कॉन्टेक्स्ट अगर आप फिर वही बात है ना आप अगर जड़

214
00:14:43,360 --> 00:14:47,520
जड़ का स्वरूप है जड़ के स्वरूप में अलग-अलग क्वालिटीज भी आती है जड़ की वो क्वालिटीज

215
00:14:47,520 --> 00:14:52,240
वाली बात नहीं आएगी यहां पे केवल और केवल हस्तक्षेप ना करना

216
00:14:52,240 --> 00:14:56,240
जैसे जड़ हस्तक्ष तो कर ही नहीं सकता कौन सी कौन सी क्वालिटी क्वालिटी नहीं आएगी बताइए

217
00:14:56,240 --> 00:15:00,560
जरा देख क्वालिटी वो मेरा पूरा गजब

218
00:15:00,560 --> 00:15:05,280
हो जाना चाहिए फिर बाद में क्वालिटी कौन सी आएगी नहीं आएगी उस पे आ जाएंगे और अभी तक आप

219
00:15:05,280 --> 00:15:09,280
सवाल पूछने केवल मुझे अभी तक सवाल पूछने का मौका दिया नहीं अभी समझ

220
00:15:09,280 --> 00:15:13,280
रहे हैं आप उस मेरा क्वेश्चन अभी तक एक भी नहीं आया अब मेरा

221
00:15:13,280 --> 00:15:17,280
भी तो अवसर आना चाहिए कि मैं पूछूं कुछ सवाल आप सर्वशक्तिमान पे मैं

222
00:15:17,280 --> 00:15:21,360
सर्वशक्तिमत्ता का हमारी जो बात है वो तो हो गई जो

223
00:15:21,360 --> 00:15:23,760
हमारी बात है वो तो रह गई आप आपने

224
00:15:23,760 --> 00:15:28,080
अपना पॉइंट पूरा कर दिया ना कंप्लीट मैंने भी अपनी ओर से बता दिया

225
00:15:28,080 --> 00:15:32,160
आप आप अपना अंत में भारी रख के जाना चाह रहे हैं यहां से फिर नहीं

226
00:15:32,160 --> 00:15:36,240
नहीं नहीं आप मुझसे सवाल में पूछिए इस विषय इस विषय में जितनी बात हुई आपके

227
00:15:36,240 --> 00:15:40,320
हिसाब से जो भी आपको लगा आप कर दीजिए फिर मैं सवाल पूछूंगा तो अलग तरीके

228
00:15:40,320 --> 00:15:44,480
से हो मतलब अलग विषय हो जाएगा एक बात ये है कि ईश्वर

229
00:15:44,480 --> 00:15:48,560
होना उसी का सिद्ध हो सकता है जो लीला कर सकता हो

230
00:15:48,560 --> 00:15:52,560
कहने का मतलब यह था मेरा ईश्वर होना जो व्यक्ति

231
00:15:52,560 --> 00:15:56,560
कहता है ना ईश्वर मिथ्याचारी कैसे हो सकता है? ईश्वर तो ऐसा नहीं कर सकता। फिर

232
00:15:56,560 --> 00:16:00,640
वहां पर वो झूठ वाली वो अगर दूसरा आचरण कर रहा है तो वो तो झूठा आचरण हो

233
00:16:00,640 --> 00:16:04,880
जाएगा। जबकि यहां पर जड़ के साथ जीव

234
00:16:04,880 --> 00:16:08,960
के द्वारा उपयोग होने वाले विषय में वो ऐसा आचरण कर रहा है

235
00:16:08,960 --> 00:16:13,040
जो जड़ का आचरण होता है। न्यूट्रल रहना। मुझे जैसा चाहो वैसा उपयोग

236
00:16:13,040 --> 00:16:17,040
में ले लो। ऐसा ही आचरण वो कर रहा है। जबकि उसके पास अपनी स्वतंत्र

237
00:16:17,040 --> 00:16:21,200
तो ईश्वर हो ही वो सकता है जो ऐसा आचरण कर सके। आप जो यह कहते

238
00:16:21,200 --> 00:16:25,200
हैं कि वह उसका स्वरूप है इसलिए वो नहीं कर रहा है तो वही मैं कह रहा हूं ईश्वर हो

239
00:16:25,200 --> 00:16:29,520
ही वो सकता है जो लीला कर सके क्योंकि ईश्वर

240
00:16:29,520 --> 00:16:33,520
में अगर सर्वशक्तिमत्ता है तो कर्म फल के निमित्त

241
00:16:33,520 --> 00:16:37,760
आपके ही अनुसार ले रहा हूं फिलहाल कर्म फल के निमित्त जीवों

242
00:16:37,760 --> 00:16:39,120
को स्वतंत्र

243
00:16:39,120 --> 00:16:43,200
देने का भी उसका कार्य है तो ये दोनों कार्य जहां साथ में एकिस्ट कर

244
00:16:43,200 --> 00:16:47,200
सके समझ रहे हैं ये दोनों कार्य जहां साथ में एक्सिस्ट करें

245
00:16:47,200 --> 00:16:51,520
वो ईश्वर है अब आ जाती है कुल मिलाकर के एक बात अटक रही है क्योंकि

246
00:16:51,520 --> 00:16:55,680
हमारे और आपके बीच में एक ही डिफरेंस है कि ईश्वर अवतार ले सकता

247
00:16:55,680 --> 00:17:00,400
है कि नहीं और अवतार ले सकने में बाधा है क्योंकि वो सर्व्यापक है वो सर्वशक्तिमान

248
00:17:00,400 --> 00:17:04,400
है तो वो अपने स्वरूप के विरुद्ध नहीं हो सकता इसलिए वो है तो क्या इस

249
00:17:04,400 --> 00:17:08,720
पर आप बात करना चाहते हैं या कुछ और है जी

250
00:17:08,720 --> 00:17:12,880
ठीक है अब वही लीला शब्द का अर्थ कैसे

251
00:17:12,880 --> 00:17:16,960
मतलब हमारी धारणा में फिर मैं एक्सप्लेनेशन दूं या क्योंकि फिर वही बात कम कंटिन्यू

252
00:17:16,960 --> 00:17:20,960
हो जाएगी मैंने पहले बता दिया कि लीला का अर्थ और व्यवहार परमार्थ आप जिस तरीके से

253
00:17:20,960 --> 00:17:25,040
लेते हैं अलग-अलग वैसा हमारे में नहीं हमारे में एक ही है। व्यवहार कोई अलग जगह नहीं

254
00:17:25,040 --> 00:17:29,920
आप अगर आपके में नहीं है मैंने सिद्ध किया अगर आपको चाहते हैं तो उसको काटिए आप

255
00:17:29,920 --> 00:17:33,920
तो फिर व्यवहार परमार तो वो तो वो विषय चला जाएगा ना फिर इसीलिए मैं बोल रहा

256
00:17:33,920 --> 00:17:38,080
था कि आप वही तो आपके कंक्लूजन के बाद मुझे अपना कंक्लूजन देना

257
00:17:38,080 --> 00:17:42,160
पड़ेगा ना। आप ये कह के खत्म मत करिए कि भैया आपके यहां व्यवहार

258
00:17:42,160 --> 00:17:46,240
परमार्थ हमारे यहां नहीं है। ये कौन सी बात है? हम लोग सत्य का अनुसंधान कर रहे हैं। किसके यहां

259
00:17:46,240 --> 00:17:50,240
क्या माना जाता है? उसका अनुसंधान नहीं कर रहे हैं। सत्य का कर रहे हैं।

260
00:17:50,240 --> 00:17:54,320
हमने ये नहीं कहा हमारे यहां चलिए व्यवहार और परमार्थ में भेद

261
00:17:54,320 --> 00:17:59,520
है ना आपके यहां। बिल्कुल है। आपके यहां भी है।

262
00:17:59,520 --> 00:18:03,520
चलिए ठीक है। अब खत्म करते हैं इसको। इतने पे ही रख देते हैं। वरना

263
00:18:03,520 --> 00:18:07,840
फिर मैं बताऊंगा कि कैसे नहीं है, कैसा है। फिर वो अलग विषय चला है। हां।

264
00:18:07,840 --> 00:18:12,720
ठीक है। तो अब इस पे इस पे आते हैं अपना

265
00:18:12,720 --> 00:18:16,800
सर्वशक्तिमान पे। जैसे सर्वशक्तिमान का अर्थ आपके द्वारा

266
00:18:16,800 --> 00:18:20,880
जो बताया जा रहा है वो है कि कुछ भी कर सकता है। यही

267
00:18:20,880 --> 00:18:24,880
अर्थ है। तो इसमें जो जैसे बेसिकली आपने ये सवाल जो इसके बाद

268
00:18:24,880 --> 00:18:28,880
जो सवाल आएगा वो सुना भी होगा पहले कि भाई क्या ईश्वर ऐसी चीजें कर

269
00:18:28,880 --> 00:18:33,360
सकता है विरोधाभास? क्या ऐसा पत्थर बना सकता है जो खुद ही ना उठा पाए?

270
00:18:33,360 --> 00:18:37,360
तो एक तो ये बात है। ठीक है। अब पहले चलो इसका उत्तर दे

271
00:18:37,360 --> 00:18:41,040
दीजिए आप। फिर आगे कंटिन्यू करते हैं।

272
00:18:41,040 --> 00:18:45,200
ठीक है। इसका आज नए तरीके से उत्तर देता हूं। मैंने बहुत बार दे चुका

273
00:18:45,200 --> 00:18:49,200
हूं। आज नए तरीके से देता हूं। आप

274
00:18:49,200 --> 00:18:53,280
मुझे मैंने कहा ईश्वर सर्वशक्तिमान है। यानी सारी क्रियाएं

275
00:18:53,280 --> 00:18:57,280
वो कर सकता है। तो आप मुझे ये बताइए क्रिया क्या करनी

276
00:18:57,280 --> 00:19:02,320
है? उस क्रिया से आपको क्या मानना है? ये एक अलग विषय है।

277
00:19:02,320 --> 00:19:06,480
जैसे कि मैं मुझसे कहा जाए कि इस मोबाइल को यहां से यहां सरकाओ। ये

278
00:19:06,480 --> 00:19:09,520
हो गई क्रिया। हम अब इस मोबाइल को सरकाने

279
00:19:09,520 --> 00:19:13,840
से आप यह मान लो कि मैं फलाना काम नहीं कर सकता

280
00:19:13,840 --> 00:19:17,840
या फिर जैसे मैंने इसमें हाथ लगाया ठीक हाथ लगाने के बाद

281
00:19:17,840 --> 00:19:20,720
मैंने ऐसे किया

282
00:19:20,720 --> 00:19:25,360
ठीक है तो ये हो गई करने की क्रिया हाथ लगाया और

283
00:19:25,360 --> 00:19:29,760
किया ये क्रिया हो गई तो ये क्रिया ईश्वर कर सकता है

284
00:19:29,760 --> 00:19:33,840
अब आप इससे मान लो कि ईश्वर पत्थर नहीं उठा सका वो आपके ऊपर है

285
00:19:33,840 --> 00:19:37,840
अगर केवल मान्यता बदलनी है तो बिना किसी क्रिया कि ईश्वर मान्यता बदल

286
00:19:37,840 --> 00:19:41,840
सकता है आपकी। हां। तो आप भ्रम पे लाना चाह रहे हैं ना कि ईश्वर झूठ बोल रहा है

287
00:19:41,840 --> 00:19:46,000
वहां पे। आप ये बोल रहे ना ईश्वर झूठ बोल रहा है वहां पे। तो जहां पे ईश्वर बिना उसके वो

288
00:19:46,000 --> 00:19:50,560
उपयोग में आ रहा है वहां पर क्या हो रहा है? मैं जब चाह

289
00:19:50,560 --> 00:19:54,720
बोतल उठा ली। यहां पे क्या कर रहा है ईश्वर? जड़ के तह

290
00:19:54,720 --> 00:19:58,720
कर रहा है कि नहीं? विपरीत आचरण कर रहा है कि नहीं? इसका इसका इसका मैं सवाल पूछ

291
00:19:58,720 --> 00:20:03,040
रहा हूं। उससे क्या संबंध है? संबंध यह है कि ईश्वर जो ईश्वर

292
00:20:03,040 --> 00:20:07,200
लीला कर सके जो ईश्वर ऐसी चीजें कर सके वही ईश्वर है। जो

293
00:20:07,200 --> 00:20:11,200
नहीं कर सके वो ईश्वर नहीं है। उसकी सत्ता में ही कुरान का ज्ञान दिया जा

294
00:20:11,200 --> 00:20:15,360
रहा है। वेद विरुद्ध है। दिया जा रहा है। वो वहां पर चुप है। तो

295
00:20:15,360 --> 00:20:20,160
उसी तरीके से वो यहां पर वो यहां पर आपको कह सकता है। मैं नहीं उठा पा रहा। ले

296
00:20:20,160 --> 00:20:24,480
मान लो नहीं उठा पा रहा। यानी यानी झूठ बोल रहा है ना ईश्वर।

297
00:20:24,480 --> 00:20:24,980
तो

298
00:20:24,720 --> 00:20:28,880
वहां पे भी झूठा आचरण कर रहा है ना ईश्वर। झूठा वहां पे मत जाइए। आप

299
00:20:28,880 --> 00:20:33,280
यहां वो वहां पे झूठा आचरण नहीं कर बता दिया नहीं

300
00:20:33,280 --> 00:20:37,280
मेरा कहने का मतलब सिर्फ इतना सा है कि अगर मैं अभुगम सिद्धांत

301
00:20:37,280 --> 00:20:41,440
से या जैसे दुर्जन दोष न्याय बोलते हैं उससे मान भी लूं एक बार के लिए कि भाई मेरी बात गलत

302
00:20:41,440 --> 00:20:45,680
है वहां पे हमारी गलत बात गलत सिद्ध हो रही है तो इससे

303
00:20:45,680 --> 00:20:49,680
आपका सही होना कहीं से भी सिद्ध नहीं हो जाएगा मैं बता रहा हूं ना सिद्ध कैसे

304
00:20:49,680 --> 00:20:53,920
हो रहा है चलिए बोलिए क्योंकि हमने हमने ईश्वर को माना ही वो उसको

305
00:20:53,920 --> 00:20:57,920
है जब वो अपनी चीजों के विपरीत आचरण भी करता हमें दिख सके उसकी

306
00:20:57,920 --> 00:21:02,000
की विपरीत आचरण करने की प्रतीति हो आपने आपने माना मैंने

307
00:21:02,000 --> 00:21:06,080
नहीं माना आपने फिर आप पीछे चलो बता दो बिना उसको माने कैसे

308
00:21:06,080 --> 00:21:10,160
हो जाएगा सिद्ध या तो वो क्या माने [हंसी] बिना

309
00:21:10,160 --> 00:21:14,240
आप सवाल क्या बिना क्या माने ईश्वर

310
00:21:14,240 --> 00:21:18,400
जब स्वतंत्र सत्ताधारी है चेतन है तो दूसरे जो चेतन उससे निकृष्ट

311
00:21:18,400 --> 00:21:22,640
जीव है उसके अंतर्गत जाकर के उसके द्वारा नियंत्रित हो रहा है लो

312
00:21:22,640 --> 00:21:26,640
ये दोनों विपरीतार्थक वो है उसमें हो रहे हैं घटित ईश्वर में नहीं

313
00:21:26,640 --> 00:21:30,720
हो रहा विपरीत तक है नहीं। मैंने पहले ही बता दिया कि भाई ईश्वर जो है

314
00:21:30,720 --> 00:21:34,880
ईश्वर अपनी स्वयं की स्वतंत्रता के वजह स्वतंत्रता का

315
00:21:34,880 --> 00:21:39,120
आप अरे भैया वहां पर ईश्वर का ईश्वर का जीव

316
00:21:39,120 --> 00:21:39,760
की प्रेरणा

317
00:21:39,760 --> 00:21:43,920
से काम करना हो तो रहा है सिद्ध हां हो रहा है लेकिन वो स्वभाव के विरुद्ध

318
00:21:43,920 --> 00:21:47,920
है ही नहीं। मैंने एक्सप्लेन कर दिया था पहले भी। वो वो वो जो वहां पर लीला है उसको

319
00:21:47,920 --> 00:21:52,560
आपने स्वभाव माना है ना। फिर लीला वो जो

320
00:21:52,560 --> 00:21:56,560
विपरीत आचरण है उसको स्वभाव मान लिया है तो विपरीत

321
00:21:56,560 --> 00:22:00,800
आचरण तो कर रहा है ना और वही उसका स्वभाव नहीं है विपरीत मैं वही आप

322
00:22:00,800 --> 00:22:04,960
देखिए वही है ना आप बोल रहे हैं विपरीत आचरण मैं बोल रहा हूं नहीं जबरदस्ती आप क्यों

323
00:22:04,960 --> 00:22:08,960
अपनी बात मनवाना चाह रहे हैं मैं बोल ही नहीं रहा हूं विपरीत आचरण है वही उसका आचरण

324
00:22:08,960 --> 00:22:13,360
है मैं तो पहले से ही मान के चल रहा हूं तो बस यही उसका आचरण है

325
00:22:13,360 --> 00:22:17,600
यही जो आचरण है हां हां हां बताइए अब अब एक्सप्लेन करिए क्या आचरण

326
00:22:17,600 --> 00:22:21,680
है यहां पे ये बताइए तो ठीक ठीक है आप वहां बताइए झूठ आचरण है वहां पे

327
00:22:21,680 --> 00:22:25,760
वही उसका आचरण है झूठा आचरण करना नहीं ऐसे फसाएंगे ना तो

328
00:22:25,760 --> 00:22:30,320
मैं भी फसाऊंगा अरे फसाएंगे फसाएंगे वाली क्या बात है मैंने अपना पूरा अरे भैया

329
00:22:30,320 --> 00:22:34,320
एक एक ऐसा वर्ड नहीं एक्सप्लेन किया जैसे यहां पर वो जो नहीं है वो

330
00:22:34,320 --> 00:22:38,320
बोल रहा है तो आप कह रहे झूठ बोल रहा है इसी प्रकार से वो जो नहीं है वहां वो

331
00:22:38,320 --> 00:22:42,400
उस तरह से बिहेव कर रहा है तो वो मिथ्या लेकिन मैंने तो एक्सप्लेन कर दिया ना वो वही है

332
00:22:42,400 --> 00:22:46,480
आप जबरदस्ती मान रहे हैं उसके वो नहीं है मैं तो बोल ही रहा हूं कि वो वही है तो मैंने

333
00:22:46,480 --> 00:22:50,800
मैंने उसको माना ना मैंने आप अब मैं उसको मान रहा हूं ना कि भैया

334
00:22:50,800 --> 00:22:54,880
ईश्वर वही हो सकता है जिसमें अपने स्वरूप के विरुद्ध कार्य करते

335
00:22:54,880 --> 00:23:00,400
हुए दिखना प्रतीति करवाना भी शामिल हो। वही हो सकता है ईश्वर।

336
00:23:00,400 --> 00:23:04,640
लेकिन मैंने स्वरूप नहीं नहीं मैंने एक्सप्लेन

337
00:23:04,640 --> 00:23:08,720
कर दिया कि वो स्वरूप के विरुद्ध है ही नहीं। आपने आपने हां सुनिए सुनिए।

338
00:23:08,720 --> 00:23:12,960
अब आप सुन अब रुकिए आप रुकिए रुकिए रुकिए रुकिए रुकिए। आपने बोला

339
00:23:12,960 --> 00:23:16,960
था आपने आपने अपने मुंह से ही बोला था कि आपने एक

340
00:23:16,960 --> 00:23:21,120
एक मिनट एक मिनट मैं क्लिटी में पहुंच गया हूं हमारी आपकी मिसअंडरस्टैंडिंग में

341
00:23:21,120 --> 00:23:25,280
आपने उसका जो मिथ्या आचरण है उसको ही उसका

342
00:23:25,280 --> 00:23:29,600
स्वरूप मान लिया है नहीं नहीं फिर गलत शब्द मिथ्या आचरण है ही नहीं वो

343
00:23:29,600 --> 00:23:33,760
नहीं गलत शब्द ये आप जबरदस्ती मान के चल रहे ये गलत बात है

344
00:23:33,760 --> 00:23:38,160
मैंने ये कहीं पर भी ना बोला ना तो मैंने लीला बोला ना तो मैंने मिथ्या आचरण बोला

345
00:23:38,160 --> 00:23:42,320
फिर से अगर बोला तो बता दो ना भाई वहां पे वो जीव के अनुसार बिहेव क्यों

346
00:23:42,320 --> 00:23:46,560
कर रहा है बता दो क्योंकि वही उसका स्वरूप है

347
00:23:46,560 --> 00:23:50,720
तो बस इसका मतलब जीव के अनुसार आश्रित जैसा बिहेव करना भी उसका स्वरूप

348
00:23:50,720 --> 00:23:53,280
है ना

349
00:23:53,280 --> 00:23:57,440
आश्रित फिर चलो मान लो अभी ठीक है दूसरे चेतन

350
00:23:57,440 --> 00:24:01,840
के अनुसार कार्य करना भी उसका स्वरूप है ना हां

351
00:24:01,840 --> 00:24:05,920
कार्य करना ठीक है दूसरे चेतन से निर्देश लेकर के कार्य करना भी

352
00:24:05,920 --> 00:24:09,920
उसका स्वरूप है ना ठीक है हां तो

353
00:24:09,920 --> 00:24:14,080
यही तो मिथ्या आचरण उसका स्वरूप हो गया। क्या मिथ्या आचरण है?

354
00:24:14,080 --> 00:24:18,640
स्वतंत्र मैंने एक्सप्लेन किया था ना सुन लीजिए। एक आपने पहली बात तो

355
00:24:18,640 --> 00:24:22,960
लीला वाली बात एक्सप्लेन किया था मैंने कि

356
00:24:22,960 --> 00:24:27,040
स्वतंत्रता कर्मों की स्वतंत्रता देने के लिए ईश्वर

357
00:24:27,040 --> 00:24:31,200
को ये जो आचरण है जिसको आप मिथ्या आचरण आचरण बुलवाना चाह रहे

358
00:24:31,200 --> 00:24:35,520
स्वरूप के विरुद्ध स्वरूप के विरुद्ध नहीं क्योंकि ईश्वर ने अपने स्वरूप के अनुसार ही जीवो को

359
00:24:35,520 --> 00:24:40,000
कर्म करने की स्वतंत्रता दी है और उसके अंतर्गत ही जितने भी कार्य करवा रहे

360
00:24:40,000 --> 00:24:44,000
उसमें अंतर्गत वो खुद उपयोग में आ रहा है जड़ के जैसा व्यवहार कर रहा

361
00:24:44,000 --> 00:24:48,080
है जड़ के जैसा व्यवहार बाहर अपना इंटरफेरेंस

362
00:24:48,080 --> 00:24:52,320
ना करके कर रहा है। हां ठीक है। यही उसका स्वरूप है। इसमें दिक्कत क्या है? दिक्कत क्या है?

363
00:24:52,320 --> 00:24:56,400
इसका मतलब इसका मतलब जो वो नहीं है उसके जैसा व्यवहार करना ही उसका

364
00:24:56,400 --> 00:25:00,400
स्वरूप है। वो वही है। मैंने ये कहां बोला कि वो वो नहीं है। मैंने

365
00:25:00,400 --> 00:25:04,720
आप मुझे लाइन बताओ मैंने कब बोला? कुल मिलाकर मैं बताऊं। वो हो क्या रहा है? मैं बताऊं।

366
00:25:04,720 --> 00:25:08,800
ईश्वर को केवल यहां पर सीमित नहीं किया जा सकता। वो केवल सत्य ही बोलता

367
00:25:08,800 --> 00:25:12,880
है या वह सत्य आचरण ही करता है। वह अपने स्वरूप

368
00:25:12,880 --> 00:25:16,960
के बाहर जाकर के भी कार्य करता दिख सकता है। क्योंकि उसके स्वरूप के बाहर जाकर

369
00:25:16,960 --> 00:25:21,120
के कार्य करना दिखना ही उसका परम स्वरूप है। वास्तविक स्वरूप

370
00:25:21,120 --> 00:25:24,960
है। ये मानना पड़ेगा। अगर ये नहीं मानेंगे ये नहीं

371
00:25:24,960 --> 00:25:29,040
मानूंगा। ये नहीं मानूंगा। एक मिनट। अगर ये नहीं मानेंगे तो जड़

372
00:25:29,040 --> 00:25:33,040
के जैसा आचरण आप सिद्ध करिए। वो कैसे कर रहा है? वो तो सत्यवादी है केवल।

373
00:25:33,040 --> 00:25:37,280
अगर केवल में सीमित करेंगे ना उसे कि वह केवल वही करेगा रास्ता

374
00:25:37,280 --> 00:25:41,360
है। आप मुझे समस्या आप मुझे समस्या बता दीजिए ना कि जड़ के जैसा

375
00:25:41,360 --> 00:25:45,360
हस्तक्षेप ना करने वाला व्यवहार जड़ जड़ बोल रहे हो गलत है। हस्तक्षेप ना

376
00:25:45,360 --> 00:25:49,920
करके वो अपने स्वरूप के विरुद्ध कैसे जा रहा है। आप ये मुझे एक्सप्लेन कर दीजिए।

377
00:25:49,920 --> 00:25:53,920
हां आप ये बताना चाह रहे हैं कि क्योंकि वो हस्तक्षेप नहीं कर रहा है। यानी वो

378
00:25:53,920 --> 00:25:58,080
चेतन जैसा व्यवहार नहीं कर रहा है वहां पे। आप ये बताना चाह रहे हैं और चेतन

379
00:25:58,080 --> 00:26:02,400
जैसा व्यवहार नहीं कर रहा यानी अपना स्वरूप जो चेतन वाला है उसके विरुद्ध जा चेतन जैसा व्यवहार

380
00:26:02,400 --> 00:26:06,400
कर रहा है वो पैसिव रहना भी चेतन का ही गुण है ठीक है

381
00:26:06,400 --> 00:26:10,560
ठीक है इसका मतलब कि जहां पर पाप आचरण

382
00:26:10,560 --> 00:26:14,640
हो रहा है वहां पर जैसे मनुष्य को दोष लगता है

383
00:26:14,640 --> 00:26:18,960
मनुष्य को दोष लगता है ना हस्तक्षेप ना करने में दोष लगता [गला साफ़ करने की आवाज़] है कि नहीं

384
00:26:18,960 --> 00:26:22,080
हम हम

385
00:26:22,080 --> 00:26:28,080
इस तरीके का कार्य भी ईश्वर कर सकता है

386
00:26:31,680 --> 00:26:35,840
जी जी बोलिए आप हां मैंने हां बोल दिया जी बोल दिया मैंने इस

387
00:26:35,840 --> 00:26:40,400
तरीके का कार्य भी ईश्वर कर सकता है तो [गला साफ़ करने की आवाज़]

388
00:26:40,400 --> 00:26:44,720
अब इसमें ये वाली बात आती है कि आपने कहा कि हस्तक्षेप

389
00:26:44,720 --> 00:26:49,040
ना करना भी चेतन का ही व्यवहार है। शांत रहना भी चेतन का ही व्यवहार

390
00:26:49,040 --> 00:26:53,040
है। इसलिए जो है अह हम यह मानते

391
00:26:53,040 --> 00:26:57,360
हैं कि ईश्वर जो है अपने स्वरूप के निमित्त ही कार्य कर रहा है।

392
00:26:57,360 --> 00:27:01,600
ठीक है? अब पहली बात तो ये आ गया कि शांत रहना शांत रहना

393
00:27:01,600 --> 00:27:05,760
हस्तक्षेप ना करना मनुष्यों में पाप माना जाता है कई जगह

394
00:27:05,760 --> 00:27:09,840
पर। भीष्म जी को भीष्म जी को दोष लगा ना द्रोपदी

395
00:27:09,840 --> 00:27:14,000
का चिरण देखने पर पाप माना जाता है। हस्तक्षेप ना करना।

396
00:27:14,000 --> 00:27:18,000
जो हां उसको एक्सप्लेन कर सकता हूं। ठीक है। ठीक है। वो करेंगे।

397
00:27:18,000 --> 00:27:22,080
अब दूसरी बात यह आती है कि जब हम इसको इधर से उधर कर रहे

398
00:27:22,080 --> 00:27:27,360
होते हैं व्यवहार में तो हम अपने मन में क्या सोच रहे होते हैं?

399
00:27:27,360 --> 00:27:31,360
ईश्वर करवा रहा है या मैं कर रहा हूं। बंधन की ओर से देख रहा हूं। मुक्ति की ओर से

400
00:27:31,360 --> 00:27:36,400
नहीं देख रहा। बंधन संसार में बंधन में जो है क्या आता है?

401
00:27:36,400 --> 00:27:37,600
क्या आता है?

402
00:27:37,600 --> 00:27:41,760
भौतिकवादी विचार क्या आएगा? क्या कि मैं

403
00:27:41,760 --> 00:27:45,840
कर रहा हूं। मतलब अरे भैया कर रहा हूं।

404
00:27:45,840 --> 00:27:49,840
मैं कर रहा हूं। मैं कर रहा हूं। अगर यहां पे ईश्वर की उपस्थिति

405
00:27:49,840 --> 00:27:53,920
मानू तो ईश्वर कैसा उपयोग में आ रहा है? मेरी जानकारी में ईश्वर तो वही कर रहा है जो वो

406
00:27:53,920 --> 00:27:58,240
करता है। मेरी जानकारी में क्या आ रहा है?

407
00:27:58,240 --> 00:28:02,400
यही आ रहा है कि ईश्वर की वजह से मूल प्रकृति है। उसकी वजह से सॉरी मूल प्रकृति

408
00:28:02,400 --> 00:28:06,480
से बनी हुई सारी चीजें हैं। मैं भी हूं मेरा शरीर मतलब मेरा शरीर मैं नहीं मैं मेरा

409
00:28:06,480 --> 00:28:10,480
शरीर भी बना हुआ है और उसकी वजह से मैं व्यवहार कर रहा हूं।

410
00:28:10,480 --> 00:28:14,480
ये जानकारी है। नहीं जानकारी यह

411
00:28:14,480 --> 00:28:18,480
है कि मैं ही कर रहा हूं। जानकारी यही है। हां तो मैं कर

412
00:28:18,480 --> 00:28:22,640
रहा हूं ना। देखिए मैं अभी [गला साफ़ करने की आवाज़] कर रहा हूं। इसका मतलब यह नहीं है।

413
00:28:22,640 --> 00:28:26,960
एक्सप्लेन कर दूंगा। मैं मैं बता रहा हूं। व्यवहार में हमारे

414
00:28:26,960 --> 00:28:31,040
यही है। व्यवहार में हमारे यही है। व्यवहारिक सत्य हमारा यही

415
00:28:31,040 --> 00:28:36,480
है कि हम ये सोचते हैं कि इसको हमने उठाया ना कि ईश्वर ने उठवाया।

416
00:28:36,480 --> 00:28:40,640
ठीक है? और इसीलिए हम बंधन में है। इसीलिए बंधन में है ना?

417
00:28:40,640 --> 00:28:44,880
नहीं तो ये नहीं नहीं नहीं हां। ये तो अज्ञान

418
00:28:44,880 --> 00:28:48,960
और ज्ञान की जैसे मुझे अगर जानकारी नहीं है कि ईश्वर है मूल प्रकृति है

419
00:28:48,960 --> 00:28:52,640
ईश्वर ने संसार को बनाया है तब मैं ये सोच रहा हूं कि ईश्वर

420
00:28:52,640 --> 00:28:57,120
मैंने उठाया जो बंधन में है वही पूरा

421
00:28:57,120 --> 00:29:01,120
पूरा एक्सप्लेन कर दूं मैं लेकिन अभी तो मुझे पता है ना कि ईश्वर के निमित्त के बिना

422
00:29:01,120 --> 00:29:04,960
मैं कर ही नहीं सकता हूं ये काम

423
00:29:04,960 --> 00:29:09,200
इसमें दिक्कत क्या है मुझे पता है ये चीज ठीक है पता तो फिर आपके

424
00:29:09,200 --> 00:29:13,360
जीवन में आपके मुख से दिन भर में एक भी बार ऐसे नहीं निकलता है कि मैंने ये किया

425
00:29:13,360 --> 00:29:17,440
मैंने वो वो किया आप हर बार ऐसे ही बोलते हो कि मैंने ही

426
00:29:17,440 --> 00:29:21,440
नहीं नहीं नहीं मैंने किया ये गलत नहीं है। मैं एक्सप्लेन कर देता हूं। मैंने किया ये बात गलत। मैं

427
00:29:21,440 --> 00:29:25,520
इसको वो नहीं बोल रहा कि मैंने किया ये बात गलत है। आप अगर वह उस पॉइंट

428
00:29:25,520 --> 00:29:29,920
पे लाना चाह रहे समय एक तरीके से जिसने

429
00:29:29,920 --> 00:29:34,080
ईश्वर को मान लिया आर्य समाज के अनुसार जान लिया वो हर

430
00:29:34,080 --> 00:29:38,480
काम करते समय अपने मन में यही सोच रहा होता है कि ये सब ईश्वर ने करवाया

431
00:29:38,480 --> 00:29:42,640
है और वो अपने मुंह से अपनी धारणा ही नहीं होती मैंने कुछ किया मैंने

432
00:29:42,640 --> 00:29:47,200
कुछ पास आउट किया मैंने ये बोला मैंने बोला धारणा नहीं होती है

433
00:29:47,200 --> 00:29:51,440
मैंने किया का तो गलत मैं बोल नहीं रहा हूं मैंने किया मतलब मैंने ही किया यानी मैंने

434
00:29:51,440 --> 00:29:55,520
ही चेष्टा करी है मैंने चेष्टा करी है। चेष्टा के

435
00:29:55,520 --> 00:29:59,680
बाद आपके मन में आपके मन में सिर्फ चेष्टा की भावना होती है।

436
00:29:59,680 --> 00:30:04,640
यह भावना नहीं होती है कि इसमें शक्ति मेरी लगी कि नहीं लगी?

437
00:30:04,640 --> 00:30:07,920
इससे क्या फर्क पड़ता है मेरे मन में होती है या नहीं होती? जो सच है वो सच ही है।

438
00:30:07,920 --> 00:30:12,000
मैं वो बताऊंगा मैं आपसे पूछ रहा हूं। जो सच है वो तात्विक सत्य है। मैं आपसे आपका

439
00:30:12,000 --> 00:30:16,080
व्यवहारिक सत्य पूछ रहा हूं ना। भौतिक सत्य क्या है? आपको ये

440
00:30:16,080 --> 00:30:22,080
फील आता है ना मेरी ताकत लगी कि नहीं लगी कि नहीं आता है?

441
00:30:22,480 --> 00:30:26,720
मेरी मैं अगर मैं अपने आप को शरीर देख के चल रहा हूं। शरीर

442
00:30:26,720 --> 00:30:31,040
यानी मनुष्य देख के चल रहा हूं। मेरे भाई मैंने अभी आपको

443
00:30:31,040 --> 00:30:35,040
एक सामान्य पुरुष जो बंधन में उसी हिसाब से हम लोग बात कर रहे हैं। तो क्यों बात

444
00:30:35,040 --> 00:30:39,120
को ला रहे हैं कि मैं शरीर देख के चल रहा हूं। आप जो सोचते हैं किसी कार्य को

445
00:30:39,120 --> 00:30:45,120
करने में वो क्या सोचते हैं? वो बताइए।

446
00:30:47,360 --> 00:30:52,400
क्या सोचते हैं? हेलो यही सोचता हूं कि मैंने किया।

447
00:30:52,400 --> 00:30:56,960
हां मैंने अपनी शक्ति से किया कि नहीं? नहीं

448
00:30:56,960 --> 00:31:00,320
मैंने अपनी शक्ति से नहीं किया।

449
00:31:00,320 --> 00:31:04,320
ये तो ये तो तात्विक जानकारी है। आप हर कार्य को करते समय यही सोचते हैं

450
00:31:04,320 --> 00:31:09,360
कि मैंने नहीं किया अपनी शक्ति से। यही सोचते हैं।

451
00:31:09,360 --> 00:31:13,360
नहीं उस कार्य को करते समय नहीं सोचते हैं। पर ये बात पता तो है ना कि

452
00:31:13,360 --> 00:31:17,360
मैंने पता है। वही मैं यही होता है व्यवहार और परमार्थ। पता

453
00:31:17,360 --> 00:31:21,440
होते हुए भी हमारे व्यवहार के अनुसार हमारे दिमाग में दूसरी जानकारियां

454
00:31:21,440 --> 00:31:25,440
चल रही होती है। अभी मैं आ रहा हूं। व्यवहार परमार्थ पे आपको अटकाऊंगा नहीं। अब मैं आ रहा हूं।

455
00:31:25,440 --> 00:31:30,000
यानी कि ईश्वर ऐसा कुछ कर सकता है जिससे हमें प्रतीति

456
00:31:30,000 --> 00:31:35,280
ईश्वर के विपरीत हो जाए।

457
00:31:35,280 --> 00:31:39,520
हस्तक्षेप ना करके आप सतही स्तर पर जितनी बार सोच रहे हो इस बोतल

458
00:31:39,520 --> 00:31:43,600
को मैंने उठाया और आपने इसी इसी के अंदर बोला है। चार पांच

459
00:31:43,600 --> 00:31:47,680
बार मैंने ये बोला मैंने ये बोला मैंने बोला। उसमें यही आ रहा है निकल के कि वहां

460
00:31:47,680 --> 00:31:51,760
आप मान रहे हो मैंने ही किया जबकि उसमें आपने केवल चेष्टा की है और कर रहा है

461
00:31:51,760 --> 00:31:56,640
ईश्वर वास्तविकता यह है पर आप मान के चल आप

462
00:31:56,640 --> 00:32:00,800
मैं एक्सप्लेन कर देता हूं करने का मतलब ये है कि जो

463
00:32:00,800 --> 00:32:05,200
कर्म की चेष्टा जो है वो मैंने की है उसके आगे की जो प्रोसेस

464
00:32:05,200 --> 00:32:09,440
प्रोसेससेस है उसमें तो ईश्वर की सहायता ही है

465
00:32:09,440 --> 00:32:13,680
केवल चेष्टा मैंने की है और जब भी हम मैं मैं का उपयोग सुनिए

466
00:32:13,680 --> 00:32:17,680
सुनिए सुनिए मैं का सुनिए मैंने जब काम आप दिन भर आप दिन

467
00:32:17,680 --> 00:32:21,760
भर में जब काम करते हैं आप दिन भर में जब काम करते हैं तो

468
00:32:21,760 --> 00:32:26,000
आप यही पूरी लाइन उसमें ध्यान रखते हैं कि मैंने केवल चेष्टा

469
00:32:26,000 --> 00:32:30,000
की है और ये सारी शक्ति ईश्वर की है। मेरी शक्ति नहीं है। ऐसा सोच

470
00:32:30,000 --> 00:32:34,000
सोच के कार्य कर रहे होते हैं। सोच सोच के नहीं करते। पर ये ध्यान तो होता ही है

471
00:32:34,000 --> 00:32:38,480
ना। तो क्या सोच रहे होते हैं उस समय?

472
00:32:38,480 --> 00:32:42,480
आप जब आप जब पास हो जाते हैं या

473
00:32:42,480 --> 00:32:46,480
कोई दौड़ जीत जाते हैं तो आप वहां पर ऐसा फील करते हैं

474
00:32:46,480 --> 00:32:50,400
कि नहीं मैंने देखो उसको पटक दिया मैंने उसको यह बोला मैंने वो किया मैं जो दौड़

475
00:32:50,400 --> 00:32:55,120
में जीत गया अपनी शक्ति पर आपको गर्व होता है

476
00:32:55,120 --> 00:32:59,120
आप चलिए आप मुझे आपने ये बोला ना कि मिथ्या मतलब

477
00:32:59,120 --> 00:33:03,360
मिथ्या ज्ञान आपको प्रकट हो रहा उसमें मिथ्या मिथ्या मिथ्या मिथ्या

478
00:33:03,360 --> 00:33:07,360
ये है कि आपके पास तो शक्ति है ही नहीं फिर भी आप अपनी शक्ति

479
00:33:07,360 --> 00:33:11,520
पर गर्व करते हो लो नहीं मैं चेष्टा

480
00:33:11,520 --> 00:33:15,840
पे गर्व करता हूं मैं चेष्टा पे गर्व करता हूं कि मैंने जो चेष्टा की यहां

481
00:33:15,840 --> 00:33:19,920
यहां आप यहां जनता देख रही है यहां आपकी बात वो तय करेगी जनता आप

482
00:33:19,920 --> 00:33:24,080
चेष्टा पे गर्व करते हो पूरा आर्य समाज चेष्टा पे गर्व करता

483
00:33:24,080 --> 00:33:29,600
मैं अपने शक्ति को

484
00:33:29,600 --> 00:33:33,600
आप ये बोलना चाह रहे हैं कि अगर कोई अज्ञानी है और अज्ञानी होने की

485
00:33:33,600 --> 00:33:37,600
वजह से जो है अपने नहीं अज्ञानी बंधन में जब तक है तब

486
00:33:37,600 --> 00:33:41,600
तक हम अज्ञानी ही है क्योंकि हमारी

487
00:33:41,600 --> 00:33:45,680
व्यवहारिक जो क्योंकि हमारे हमारे अंदर जो व्यवहारिक इन आ रही

488
00:33:45,680 --> 00:33:49,760
है मैं बता रहा हूं आपको क्योंकि हमारे अंदर जो इंफॉर्मेशन

489
00:33:49,760 --> 00:33:53,760
आ रही है बंधन में जब तक है तब तक हम इंद्रियों से

490
00:33:53,760 --> 00:33:57,840
इंफॉर्मेशन हासिल कर रहे हैं और इंद्रियों से आने एक मिनट भाई साहब

491
00:33:57,840 --> 00:34:02,320
एक मिनट पूरा कर लीजिए इंद्रियों से इंद्रियों के ऊपर हम इंडिपेंड

492
00:34:02,320 --> 00:34:06,320
है ठीक है हमें अनुमान प्रमाण और शब्द प्रमाण गुरु इत्यादि

493
00:34:06,320 --> 00:34:10,480
जब तक नहीं है हम एक जीव मनुष्य होते हुए प्राणी मात्र होते

494
00:34:10,480 --> 00:34:15,200
हुए हम इंद्रियों से जानकारी हासिल करने वाले वाले हैं और उन जानकारियों

495
00:34:15,200 --> 00:34:19,440
के अनुसार बिल्कुल ऐसी प्रतीति होती है कि हां भाई मैंने ही किया। यह

496
00:34:19,440 --> 00:34:23,680
सारी जो जानकारी है कि ईश्वर ने किया, ईश्वर ने करवाया। यह हमारी इंद्रियों

497
00:34:23,680 --> 00:34:27,840
से आने वाली सीधे तौर पर जानकारी नहीं होती है। अनुमान प्रमाण

498
00:34:27,840 --> 00:34:31,920
इनडायरेक्ट वे में या फिर शब्द प्रमाण इन चीजों से आने

499
00:34:31,920 --> 00:34:36,080
वाली जानकारी होती है। तब हम ये लोग ये मानते हैं। तो वो

500
00:34:36,080 --> 00:34:40,160
जो सत्यता है उसको ना जानने के संबंध में जितनी बार हम अपनी इंद्रियों पर

501
00:34:40,160 --> 00:34:44,160
डिपेंड होंगे चीजों को जानने के लिए उतनी बार हम लोग अज्ञानी

502
00:34:44,160 --> 00:34:44,800
ही कहलाएंगे।

503
00:34:44,800 --> 00:34:49,680
उस दृष्टि से भले ही हम यहां पर बहुत बड़े संस्कृतज्ञ हो। तो

504
00:34:49,680 --> 00:34:53,840
ठीक है वो ज्ञानी अज्ञानी पर फिर मैं एक्सप्लेन करने लग जाऊंगा। मुझे बताइए

505
00:34:53,840 --> 00:34:58,560
इस बात का उससे क्या संबंध कि ईश्वर पत्थर उठा सकता है नहीं उठा सकता। क्या संबंध है?

506
00:34:58,560 --> 00:35:02,720
इस बात का इससे संबंध है कि आपने बोला कि ईश्वर झूठ बोल देगा।

507
00:35:02,720 --> 00:35:06,720
तो आप वहां पर आपत्ति जता रहे हैं कि ईश्वर झूठ नहीं बोल सकता। तो

508
00:35:06,720 --> 00:35:10,800
ईश्वर ऐसी प्रतीति करवा सकता है। अपनी विपरीत प्रतीति

509
00:35:10,800 --> 00:35:14,960
वह करवा सकता है। जैसे वह यहां पर करवा रहा है मनुष्य को कि

510
00:35:14,960 --> 00:35:19,040
कर हो रहा है। जबकि मनुष्य को प्रतीति हो रही है कि वो कर रहा है। ईश्वर नहीं कर रहा है। ईश्वर उसके

511
00:35:19,040 --> 00:35:25,040
कंट्रोल में है। ये मानेंगे तो

512
00:35:41,220 --> 00:35:45,220
[संगीत]
