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00:00:01:28 [घंटी की आवाज़] तो सभी को जय श्री राम। मैं शिवश नारायण द्विवेदी आप देख रहे हैं आवाान कॉल ऑफ Dharma YouTube चैनल। हम इस समय हैं बिहार की राजधानी पटना में और यहां पर जो ब्रह्मा कुमारीज का मुख्य केंद्र है वहां पर है। आपको जानकारी के लिए बता दूं कि अ पटना वो जगह है जहां पर ब्रह्मा कुमारीज का सबसे पहला कार्यालय बनाया गया था और हमारे साथ यह जो ब्रह्मा कुमारीज का सेंटर है उसको संचालित करने वाली जो विदुषी हैं बैठी हुई हैं। थोड़ा सा आप अपने बारे में दीदी कुछ बता दीजिए हमारे दर्शकों को। ओम शांति। मैं ब्रह्मा कुमारी संगीता मुख्य सेवा केंद्र संचालिका पटना कंकड़बाग ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय एक आध्यात्मिक संस्थान है और इसमें मैं राजयोगा टीचर हूं। मनुष्यों के जीवन में आध्यात्मिक जागृति लाना हमारा उद्देश्य है और इसके लिए हम लोग आध्यात्मिक ज्ञान और सहज राजयोग की शिक्षा देते हैं।
00:01:17:20 ठीक बहुत ही सुंदर दीदी। अच्छा दीदी थोड़ा सा हमारे दर्शकों को ये बता दें कि ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार धर्म क्या है? वास्तव में संसार में धर्म बहुत सारे हैं। अलग-अलग धर्मों की स्थापना हुई और हर धर्म का उद्देश्य जो था मनुष्य के जीवन में गुणों को जागृत करना। सद्गुणों को विकसित करना। लेकिन देखा गया है कि जितने धर्म बढ़ते गए, भिन्नता बढ़ती गई। तो आध्यात्म हमें यह सिखाता है कि धर्म भेद से भी हमें ऊपर उठना है। और अपने आध्यात्मिक अस्तित्व को समझना है। हमारा आध्यात्मिक अस्तित्व जो है हम सभी वास्तव में एक अचर अमर अविनाशी आत्मा है। और आत्मा का कोई धर्म नहीं होता है। सभी आत्माएं एक समान है। सभी का घर एक ही जगह है। जिस ब्रह्मलोक से ब्रह्मांड से आत्माएं इस सृष्टि पर आई हैं और आकर अपना अपना शरीर धारण करके कोई स्त्री का कोई पुरुष का शरीर धारण कर अपना पार्ट प्ले करते हैं। तो अगर आध्यात्मिक दृष्टिकोण
00:02:32:21 से देखा जाए तो स्वधर्म की बात बताते हैं। स्वधर्म माना आत्मा का धर्म और आत्मा का धर्म सभी का एक जैसा है। किसी भी देश का रहने वाला हो, किसी भी प्रांत का रहने वाला हो, किसी भी सभ्यता संस्कृति का हो। लेकिन सभी आत्माओं का धर्म एक ही है। अच्छा दीदी जैसे आपने कहा ना कि आध्यात्मिक दृष्टिकोण से मगर एक जो हमारा जो भौतिक दृष्टिकोण है क्योंकि धर्म का जो मुख्य उपयोग है वो तो भौतिक में ही है क्योंकि भौतिक यात्रा तय करके हमें अध्यात्म तक पहुंचना होता है। तो भौतिक दृष्टिकोण से धर्म क्या है? भौतिक जिसको हम समझ जिसको हम समझ सके जिसमें हमारी गति हो सके क्योंकि अगर आत्मा के दृष्टिकोण से ही देखेंगे तो अभी हम मतलब अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हैं नहीं हमें होना है और जब हम वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाते हैं तो वहां पर आत्मा का जो अ वो आ जाता है कि उसका धर्म शांति है और उसका गुण है। पर अभी हमारी यात्रा है कि हमें आत्मा तक पहुंचना है। अपने जो मूल स्वरूप है उसमें स्थित होना है तो वो भौतिक दृष्टि से धर्म क्या
00:03:47:22 है मतलब जिसको हम समझ सके जिसके बारे में लोगों बता सके जी आध्यात्मिक दृष्टि से जब हम स्वधर्म की बात करते हैं और स्वधर्म का जब मनुष्य को ज्ञान होता है और मनुष्य जब अपने स्वधर्म का पालन करना शुरू करता है अपने स्वधर्म को जब अपने जीवन में जागृत करने लगता है तो वह अपनी वास्तविकता की तरफ आता है। जो मनुष्य जीवन की सर्वश्रेष्ठ स्थिति है वो स्थिति है देवत्व की ओर। और जब देवत्व की ओर आते हैं तो हमारा जो मूल धर्म है जो आदि काल से चला आया है वो है आदि सनातन देवी देवता धर्म। जी तो हम अपने आदि स्वरूप को और अपने आदि काल को जब हम समझने लगते हैं और उस अनुरूप अपने जीवन को ढालते हैं तो वास्तविक धर्म हमारा हमारे सामने आता है। हम सभी जानते हैं कि आदि काल से जो धर्म चला आया है वह धर्म जो सबसे पुराना
00:05:03:01 है वह है सनातन। सनातन धर्म देवी देवताई धर्म देवताई कर्म ही धर्म था वास्तव में धर्म का नाम कब आया हर मनुष्य देवताओं की तरह था और जब यह सृष्टि स्वर्ग के समान थी तो हर मनुष्य का कर्म जो था देवत्व जीवन में जागृत था तो देवता ही कर्म था तो देवताई कर्म ही वास्तव में धर्म था लेकिन लेकिन जब उसके बाद धीरे-धीरे अन्य धर्म इस धरा पर आए तब कहने में आया कि इस धर्म से पहले कौन सा धर्म था आदिकाल से कौन सा धर्म था और आज के समय की जो स्थिति है वह हम सब जानते हैं। इस समय कितने सारे धर्म हैं, कितनी मान्यताएं हैं और उसके स्वरूप को अगर देखा जाए तो धर्म का विकृत रूप आज समाज में दिखाई दे रहा है। क्योंकि धर्म के नाम पर ही आज देखा जाए अनेक प्रकार की हिंसाएं हो रही है। अनेक प्रकार के जी संसार
00:06:18:19 में विरोधाभास देखने में आ रहे हैं। तो दीदी कहने का मतलब है कि देवत्व को प्राप्त करने के जो प्रयास है वही धर्म है। मतलब जो हमें देवत्व की ओर ले जा रहे हैं जो चीजें ये सिर्फ प्रयास नहीं है। यह वास्तविकता है। मतलब जो जो मनुष्य आज संसार में जो जीवन जी रहा है ना मनुष्य के जीवन को अगर देखा जाए तो मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप में कैसा था और मनुष्य का वास्तविक जीवन जो था आप देखेंगे आज भी संसार में अगर कोई बहुत अच्छे से व्यवहार करता है तो क्या कहते हैं ये तो एकदम देवता है आज भी वो गुण मनुष्य को आकर्षित करता है हम तो वो गुण आत्मा के अंदर थे और आत्मा के मूल गुणों को ही जागृत करना जिसे हमने कहा ना स्वधर्म वो देवत्व अपने आप सामने आता है। जैसे आप कल्पना कीजिए कोई व्यक्ति है जिस व्यक्ति के जीवन में शांति भी है, शक्ति भी है, पवित्रता भी है, आनंद भी है, सुख भी है,
00:07:33:25 प्रेम भी है। यह सारे गुण उसके जीवन में जागृत अवस्था में है। तो उसे आप क्या नाम देंगे? उस व्यक्ति को आप क्या कहेंगे? तो निश्चित आप कहेंगे ना यह तो बिल्कुल देवता है। यह है वास्तविकता। आत्मा के मूल गुणों को जीवन में उतारना, मूल गुणों के अनुरूप जीवन में चलना, व्यवहार करना और वो संस्कार जो कर्म से दिखाई देता है यही वास्तव में धर्म है। तो अभी मैं एक चीज समझ रहा हूं कि जैसे जो मूल गुण है आत्मा के और जो हमारी आध्यात्मिक स्टेज है कि हमें देवत्व को प्राप्त करना है। उसके लिए किए जाने वाले जो कार्य हैं जिन्हें हम कहते हैं अच्छे कार्य। है ना? अह जैसे कि शांति, प्रेम और दूसरे के प्रति सद्भावना, परोपकार ये सब अच्छे कार्य हैं। श्रेष्ठ कर्म है। तो यह सारे कर्म जो हैं जो जो भी कर्म हमें देवत्व की ओर ले जाए आत्मा के मूल गुण जिससे कि उद्भाषित हो आपके अंदर तो वो कर्म करना धर्म है। तो अब इसमें यह बात आती है जब ऐसी बात है तो फिर हम ऐसी विचारधाराओं को धर्म
00:08:49:15 भी क्यों कहते हैं जिनमें कि आत्मा के जो मूल गुण है उनके विपरीत कार्य किए जा रहे हैं। मतलब जैसे इस्लाम है उसको भी हम धर्म कह देते हैं। क्योंकि जितने भी धर्म धर्म पिताओं ने स्थापन किया ना हम जिस समाज में जिस समय जो धर्म पिता आए हम और उस समाज की व्यवस्था अनुसार जो आवश्यकता थी हम तो आप देखेंगे धर्म पिताओं ने किसी ना किसी विशेष गुण के बारे में बताया है। गुण पे जोर दिया है। जैसे इस्लाम धर्म ही हम लेते हैं। हां मैं वही मैं भाईचारे की शिक्षा दी गई है। अच्छा बौद्ध धर्म है। बौद्ध धर्म में दया और सहष्णुता का पाठ पढ़ाया गया है। मगर दीदी जो क्रिश्चियन धर्म में क्रिश्चियन धर्म में प्रेम और एकता का पाठ पढ़ाया गया है। जी धीरे-धीरे उस धर्म को मानने वाले जो लोग थे हम धर्म पिताओं ने जो मान्यताएं बताई जो विशेषताएं बताई और धर्म को मानने वाले लोगों के जीवन में परिवर्तन आया और धीरे-धीरे यह अचानक से नहीं हुआ धीरे-धीरे परिवर्तन होते
00:10:06:09 धर्म का जो मूल रूप है वो परिवर्तित होके उन गुणों के विपरीत अवगुण मनुष्यों के जीवन में दिखाई दे रहे हैं। और वो मान्यताएं धर्म ग्रंथ तक रह गई। जो सिद्धांत थे जिन गुणों पे उन्होंने विशेष रूप से सिद्धांत बनाया वो सिर्फ धर्म ग्रंथ तक रह गया और उसके विपरीत स्थिति में जब मनुष्य जीवन जीने लगता है जी तभी उसको कहते हैं अधर्म इस समय दीदी अधर्म अनेक है जी इसमें एक चीज आती है जैसे अ जो जैसे हमने कहा कि धर्म धर्म पिताओं ने जो सिस्टम दिया था वो तो अच्छा दिया था। उसके बाद जो है विकृति आ गई। जो उसको मानने वालों में गिरावट आती गई उस विकृति आ गई। मगर जो धर्म पिता जैसे कि इस्लाम को यदि हम धर्म कह रहे हैं तो आपने कहा कि वो भाईचारा सिखाता है। मगर इस्लाम में लिखा हुआ है कि जो भी कुरान को ना मानने वाले लोग हैं जैसे 95 में लिखा है कि वो काफिर हैं। और रमजान का पवित्र महीना खत्म होते ही उनको मारो। जहां मिले उनको मारो। और एक जगह
00:11:21:13 लिखा हुआ है कि जो आखिरी युद्ध होगा वह मूर्ति पूजकों से होगा। जो भी मूर्ति पूजा करता है उनसे हमें युद्ध करना है। तो इस तरीके की बहुत सी चीजें उसमें मिलती हैं। और जैसे एक बात ये आती है कि अ बहन के साथ मतलब आपने किसी को अगर मुंह मुंह से बहन कह दिया तो जरूरी नहीं है कि वो आपकी बहन हो गई। आप उसके विपरीत उनसे संबंध मतलब स्थापित कर सकते हैं। देखिए तो ये ये में पढ़ते हैं ना मैं पूरा कर लूं। तो यह गिरावट लोगों के द्वारा तो नहीं यह तो डायरेक्टली कुरान जो उनका मूल ग्रंथ है जो कहा जाता है कि उसको प्रवर्तक जो हैं उसके इस्लाम के प्रवर्तक उन्होंने जो बुक दी है उसमें ही यह सब लिखा हुआ है। तो ऐसा कैसे कह सकते हैं कि फिर वो गिरावट आ गई। अच्छा इससे पहले मैं एक चीज क्लियर कर लूं। इसका मतलब आज जो इस्लाम का स्वरूप है वह तो धर्म नहीं है। आज आज जो इस्लाम जिसको हम जानते हैं और धर्म की बातें जो पुस्तकों में लिखी गई है और धर्म पिताओं ने जो उपदेश दिया जी दोनों में बहुत अंतर है। मतलब आज बैठ के बातचीत कर रहे हैं। आज के जमाने में रिकॉर्डिंग करने का साधन है। जी जी उस जमाने में दूसरे
00:12:37:03 तीसरे व्यक्ति ने जो सुना हम और सुनने के बाद उसे लिखा तो निश्चित है कि एक व्यक्ति से दूसरा सुनता है दूसरे से तीसरा सुनता है तो उसमें विकृति उसके विचारों में फिर जो व्यक्ति लिख रहा है उसके विचारों की भी मिलावट होती है। तो तो वास्तविकता से इसलिए मनुष्य बहुत दूर हो गया। इसका मतलब यह तो क्लियर माने कि अब जो हमें मिल रहा है इस्लाम के नाम पर वो तो कम से कम धर्म नहीं है। इस समय तो हमने कहा ना कि हर धर्म का जो स्वरूप है बिल्कुल बदल चुका है। नहीं नहीं एक तो होता है एक मिनट जी क्योंकि गुणों के बिल्कुल विपरीत नहीं नहीं वो व्यावहारिक अवगुण है। एक्चुअली बात ये है कि एक तो होता है कि बुक के द्वारा कहा क्या जा रहा है और एक होता है कि बुक के द्वारा कहा तो गया पर हम कुछ और कर रहे हैं। एक विकृति तो यह है कि हम बुक वाली चीजों को कर ही नहीं रहे और एक विकृति यह है कि बुक में ही ऐसी चीजें लिखी हुई हैं जो ना करने योग्य हैं। तो अभी जो हमको मिल रहा है इस्लाम में कुरान के अनुसार उसको तो धर्म नहीं कह सकते हम जो कुरान अभी अवेलेबल है। हम लोग किसी भी धर्म ग्रंथ का विरोध नहीं करते हैं। लेकिन समाज की जो स्थिति है
00:13:52:14 और समाज के अंदर जो विकृतियां हैं उसका सुधार कैसे हो हमारा सारा ध्यान उस तरफ जाना चाहिए। किस धर्म ग्रंथ में क्या लिखा गया है? अगर अलग-अलग धर्म के धर्म ग्रंथ के बारे में बैठ के हम वाद विवाद करना शुरू करें जी तो कई प्रकार की बातें सामने आती है। इसलिए हमें वास्तविकता में जीना है और वास्तविकता को समझना है। वर्तमान समय समाज में आवश्यकता किस बात की है? जी। जीवन में किस तरह की विकृतियां दिखाई दे रही है और उससे मनुष्यों को कैसे उबारा जाए? नहीं ये इसलिए प्रश्न आता है कि जैसे हमने कह दिया कि कुरान भी धर्म है मान लीजिए या इस्लाम भी धर्म है। अब इस्लाम के नाम से जानी जाती है कुरान। अब कुरान में जो बातें हैं वो हम हम जो लोग मानते हैं जैसे कि आपने बताया सद्गुण उन बातों के विपरीत बातें उसमें कुछ लिखी हुई हैं। तो अगर हम ही कह रहे हैं कि वो भी धर्म है तो फिर व्यक्ति भटकने का वो रहेगा ना चांस कि वो कुरान को भी समझेगा। धर्म तो है ही ना। इस्लाम धर्म है, बौद्ध धर्म जो क्रिश्चियन धर्म है, सिख धर्म है, सनातन धर्म है। ये सारे धर्म तो है ही ना समाज में। नहीं मगर आपने
00:15:07:18 कहा ना कि अभी जो अवेलेबल है, विकृत हो गया। इस धर्म पर टिप्पणी नहीं करेंगे। टिप्पणी अच्छा इसमें चलिए दूसरी बात विशेष के बारे में जरूर बता सकते हैं कि आज समाज में जो मनुष्य के जीवन की स्थिति है उसमें क्या बदलाव चाहिए। अच्छा दीदी ये तो ठीक है तो हर मनुष्य उससे त्रस्त है और उससे उभना चाहता है और हर मनुष्य के अंदर जो एक श्रेष्ठता है वो उस तरफ उसको आकृष्ट करता है जी वो मनुष्य कहता है कि बेहतर समाज में जीना चाहता हूं। अच्छे व्यवहार से रहना चाहता हूं। अच्छा व्यवहार पाना चाहता हूं। अब यहां पर दिक्कत यह है कि अच्छा व्यवहार करना नहीं जानता हूं। किसी किसी के अनुसार व्यवहार हमें जीवन में करने के लिए कौन सी शक्ति की आवश्यकता है? जी। उस तरफ हमारा सारा ध्यान जाना चाहिए कि आपस में जब हम व्यवहार को सुधारते हैं इसका मतलब आपस में एक दूसरे के साथ सद्भावना के साथ जीते हैं हम और सामंजस्य बना के चलते हैं। समाज का वातावरण सुखद
00:16:22:24 बना के रखते हैं। यह भी तो धर्म है। इसमें दीदी प्रॉब्लम क्या आती है? मैं यह क्वेश्चन शो कर रहा हूं इसलिए कि जैसे हम ये कह रहे हैं कि अच्छा और सद व्यवहार कर रहा है। मगर किसी किसी के लिए किसी विचारधारा के अनुसार जो सद व्यवहार नहीं है वही सदव्यवहार है। जैसे कि मान लीजिए मांस खाना। अब किसीकिसी विचारधारा ने कह दिया कि भाई आप मांस खाइए। यही अच्छा कर्म है। वो एक मिनट पूरा कर लूं। तो वह यह मान के चलते कि हम तो अच्छा कार्य कर रहे हैं। जबकि वह अच्छा कार्य नहीं है हमारे अकॉर्डिंगली। तो यदि वह विचारधारा अच्छा कार्य नहीं बता रही तो हम उसको धर्म कह रहे हैं तो उसमें फिर भटकाव के चांसेस बढ़ जाते हैं कि व्यक्ति भटक सकता है कि वह उस चीज को भी धर्म मान ले जो चीज धर्म नहीं है। वो उस व्यवहार को भी सदव्यवहार मान ले जो सदव्यवहार नहीं है। अब एक चीज इसमें आती है जैसे हमने कहा कि जैसे इस्लाम जैसे इस्लाम के प्रवर्तक जो थे या इस तरह के और जी
00:17:22:09 आप बार-बार उस्लाम की बात बोल दीजिए और हम लोग इस तरह का कोई भी मैसेज नहीं दे सकते हैं। अच्छा अच्छा मैं आध्यात्मिक लोग हैं। मैं इसको छोड़ के किसी भी धर्म के लिए कोई टिका टिप्पणी नहीं करने वाले। मैं इसको छोड़ के एंडिंग ही कर रहा हूं। हम यथार्थ में जीते हैं। जी जी ठीक है। जी। हम वास्तविकता आपको समझाएंगे। वास्तविकता समझ सके। जी जी समाज में क्या परिवर्तन लाना है सामाजिक स्थिति नहीं तो दीदी फिर इसमें ये आता है ना क्या है क्रिश्चियन धर्म में क्या है नहीं एक्चुअली आप मत मतलब वो कोई बात नहीं है जैसे होता ये है कि जैसे आपको किसी का नाम लेके बात नहीं करनी है कोई दिक्कत नहीं एक मैसेज आप बाहर देने वाले हैं दुनिया को देने वाले हैं जी जी दुनिया को देने वाले हैं और हम लोग इस तरह की कोई बात नहीं नहीं वो नहीं कह रहा मैं हम आपको क्या बता रहे हैं कि ये आध्यात्मिक संस्था है। अच्छा हम सारी आध्यात्मिक बातें और सकारात्मक बातें करते हैं जिसमें लोगों को अपने आप समझ में आ जाएगा। इसमें प्रॉब्लम बस ये है जीवन में करना क्या है? इसमें बस प्रॉब्लम ये है वो सही आप बिल्कुल सही कह रही है। इसमें बस एक छोटा सा कैच है कि जैसे हमें उसके बारे में नकारात्मक बातें नहीं करनी है। दूर रहना है। किसी के बारे में नहीं करनी। तो फिर
00:18:37:13 हम ये क्लेम करते हैं ना कि वो भी धर्म है। तो उसका नाम लेकर के उसको धर्म कहने की आवश्यकता क्या फिर तो उसके बारे में बात ही ना करें ना केवल अपने अध्ययन कहां कहते हैं सारी दुनिया जानती है कि इब्राहिम ने आकर के इस्लाम धर्म स्थापन किया तो ये हमारे आपके कहने से थोड़ी हो रहा है नहीं तो उसको हम एडमिट करते हैं ना इब्राहिम आए मोहम्मद आए बुद्ध आए क्राइस्ट आए इसको नकारा नहीं जा सकता है आप यहां आए वो आए मगर उन्होंने वो जो बातें कही है सही कही है ये हम कह रहे हैं ना अच्छा चलिए छोड़िए सही और गलत देखिए कि जिस समय जो बात शुरू हो ना हम लोग इन बातों को इस तरह से नहीं लेते अच्छा ठीक है छोड़िए चालू करो है ना ठीक ठीक है ठीक चालू करो अच्छा हां चालू करो देखिए जिस आपको बता रहे हैं
00:19:28:16 जिस सभ्यता संस्कृति में जो मनुष्य पल रहा है जी उसको पता ही नहीं है पता ही नहीं है कि वास्तविकता क्या है चले जाइए चाइना में जैसे यहां फल सब्जी का मार्केट लगा रहता है। वैसे ऐसेसे सांप लटके रहते हैं। लोग पसंद कर के सांपों को खरीद के जाते हैं और उसी को पका के खाते हैं। उनकी सभ्यता संस्कृति में फिर हम उसे धर्म थोड़ी ना कहेंगे दीदी। उनकी सभ्यता संस्कृति में उनको वो नहीं बताया गया है। वो वही जानते हैं। उसे यानी कि क्योंकि वो उसको मानते हैं इसलिए हम उसे कह देते हैं। जो जैसा मानता है उसको कह देते हैं। जानते नहीं ना। हम सीधी सी बात हम लोग [नाक से की जाने वाली आवाज़] आध्यात्मिक है ना। हम आध्यात्मिक संस्था वाले सीधी सी बात लोगों को समझाते हैं कि हम जिन बातों से अनभिज्ञ हैं हमें जानकारी नहीं है तो हम कैसे समझेंगे कि यही सही है जब तक कि सही क्या है वो मालूम नहीं होगा तब तक गलत समझ में नहीं आया होगा। ठीक है हम अगला टॉपिक स्टार्ट करते हैं। चालू करो। अच्छा दीदी थोड़ा सा ईश्वर के बारे में हम जानना चाहते थे ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार कि क्या ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार जो प्रतिपादित होने वाला ईश्वर है वो
00:20:43:20 सर्वशक्तिमान है जिसे कहते हैं अनंत आबाद सर्वशक्तिमान सर्व सामर्थ्यवान वास्तव में देखा जाए जिनको हम आदि देव कहते हैं आदि शक्ति कहते हैं जी ये वास्तव में हमारी आत्मा का जो पिता है जैसे शरीर का पिता है। तो हम जानते हैं ना शारीरिक आकृति वाला ही शरीर का पिता है। मनुष्य का पिता मनुष्य की तरह शारीरिक आकृति वाला है। ठीक इसी तरह से आत्मा का पिता परमात्मा आत्मा की तरह ही है। आत्मा प्रकाश पुंज है। ज्योति स्वरूप है। बिंदु रूप है। परमात्मा का स्वरूप भी ऐसा ही है। प्रकाश और शक्ति का पुंज है। वो परमपिता परमात्मा है। जो हम सभी आत्माओं के पिता हैं। अब आत्मा के लिए कोई धर्म नहीं है। विश्व की जितनी भी आत्माएं हैं सभी आत्माएं उस परमपिता परमात्मा की संतान है। आत्माओं को जन्म दिया है परमात्मा ने। आत्माओं है आत्मा अविनाशी है। आत्मा की रचना नहीं होती है। जैसे आपने उदाहरण दिया ना कि हम हमारे जो पिता है जन्म देने वाले वो हमारे मनुष्य जैसे ही हैं। शरीर के पिता शारीरिक
00:21:58:21 आकृति वाले हैं। आत्मा के पिता आत्मा अजर अमर अविनाशी शक्ति तो शरीर के पिता तो इसलिए ना वो जन्म देते हैं। नहीं होती है। आत्मा को किसी ने रचा नहीं। जी ठीक इसी प्रकार से आत्मा के जो पिता परमात्मा है परमात्मा को भी रचा नहीं गया है वो स्वयंभू कहलाते हैं स्वरचित है तो हम पिता क्यों कह रहे हैं उसे मतलब यहां तो जन्म देता है इसलिए पिता है तो वहां तो जन्म है नहीं आत्माओं में श्रेष्ठ है परम है सर्वशक्तिवान है और उनकी मदद से जी उनके द्वारा प्राप्त ज्ञान से और उनके द्वारा प्राप्त शक्ति के आधार से जी आत्मा का सशक्तिकरण होता है। अच्छा आत्मा का पुनरुत्थान होता है। अच्छा अच्छा अच्छा तो पुनरुत्थान करना रिजनेट करना इसलिए देना इसलिए पिता की उपाधि है। अविनाशी आत्मा का विनाश ही नहीं होता है जो उसकी रचना हो। लेकिन आत्मा का जब पतन होता है तो उसका पुनरुत्थान परमात्मा शक्ति के आधार से होता है और परमात्म शक्तियां भी परमात्म ज्ञान के आधार से प्राप्त होती है और इसलिए परमात्मा पिता कहलाते हैं।
00:23:14:07 अच्छा दीदी आपने कहा जैसे वो सर्वशक्तिमान है तो क्या ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार जिसे ईश्वर माना जाता है वह अवतार ले सकते हैं परमात्मा का अवतरण होता है परमात्मा धर्म ग्लानि के समय अंत के समय में साधारण मनुष्य तन में सृष्टि पर अवतरित होते हैं और अवतरित होकर वह स्वयं अपनी पहचान देते हैं और जिस तन का आधार लेते हैं उस मुख द्वारा वो आध्यात्मिक ज्ञान देते हैं। मतलब खुद का तन नहीं बनाते। वो किसी तन में प्रवेश करता है। अजन्मा है, अशरीरी है। परमात्मा का अपना शरीर नहीं है। वो पर काया प्रवेश करके ही सृष्टि पर अवतरित है। मगर दीदी जो सर्वशक्तिमान है वो तो अजन्मा होते हुए भी अपना शरीर बना सकता है ना। जो सर्वशक्तिमान कहा ना अनंत अबाध्य है इसलिए वह परकाया प्रवेश कर सकते हैं तो उन्हें शरीर की रचना करने की आवश्यकता नहीं है। हम लोगों ने कहानियों में जो सुना है और जो जीवन के वास्तविकता है उसकोने की आवश्यकता नहीं है। कहानियों में सुना है कि मिट्टी का पुतला बना
00:24:29:08 दिया गया। उसमें प्राण फूंक दिया गया। कहानियों में सुना है यथार्थ तो ऐसा मनुष्य की रचना नहीं होती है। मनुष्य की रचना मनुष्य के द्वारा होती है और ईश्वर मनुष्य की तरह सृष्टि पर जन्म नहीं लेते हैं। कोई ऐसा माता-पिता नहीं होगा जो परमात्मा को सृष्टि पर जन्म दे सके। फिर तो वह परमात्मा से बड़ा हो जाएगा। इसलिए परमात्मा पर काया प्रवेश करके इस सृष्टि पर अवतरित होते हैं और वह सर्वशक्तिवान है। इसलिए जब चाहे उस तन में आ सकते हैं। जब चाहे उस तन से जा सकते हैं। जा सकते हैं। तो दीदी यहां पे मनुष्य आत्मा और परमात्मा में यही फर्क होता है। जी इसमें दीदी एक क्वेरी आती है कि जैसे हमने कहा कि उसको आवश्यकता क्या है? तो फिर तो जब वह सर्वशक्तिमान है तो सीधे कान में ऐसे विचार करेगा और कान में व्यक्ति को ज्ञान मिल सकता है जो वो परकाया में प्रवेश करके बोल रहा है और जैसे हमने जैसे हमने कहा कि अगर वो किसी मनुष्य के गर्भ से जन्म लेगा तो मनुष्य उससे बड़ा हो जाएगा। मगर यह भी तो है कि यदि वो किसी की काया में प्रवेश करेगा तो वो काया जिसमें वो प्रवेश कर रहा है वो तो उससे बड़ी हो गई। तभी तो प्रवेश कर रहा है। काया बड़ी
00:25:44:16 नहीं हो सकती है। काया एक माध्यम बनता है। आधार होता है। ऐसे वो माध्यम बन जाएगी। मनुष्य के मुख द्वारा मनुष्य के भाषा में जब ज्ञान दिया जा रहा है तब तो मनुष्यों को समझने में बहुत समय लगता है। मनुष्य विचार करता है माने ना माने और मनुष्य को अगर प्रेरणा दिया जाता कोई आकाशवाणी होती तब तो मुश्किल होता सम्मुख मनुष्य तन के द्वारा जब सारी बातें ईश्वर स्वयं समझाते हैं तब भी समझने के लिए मनुष्य दोनों जगह आ सकता है दीदी बहुत ज्यादा अपने विवेक का उपयोग कर जी एक आध्यात्म को समझने के लिए जी जी अपनी दिव्य बुद्धि को जागृत करना होता है और जब आपकी दिव्य बुद्धि जागृत होगी तो आध्यात्मिक बातें नहीं दीदी जैसे कहा गया ना सर्वशक्तिमान अनंत सामर्थवान तो फिर हम ये चलिए मान लीजिए उसको आवश्यकता नहीं है मगर उसमें क्षमता तो है ना शरीर धारण करने की सर्वशक्तिवान है परमात्मा सर्व समर्थ है परमात्मा लेकिन ये सृष्टि का जो खेल है सृष्टि की जो रचना
00:27:00:00 हुई है और सृष्टि पर जो मनुष्य जीवन है जी अगर सब कुछ में परमात्मा ही हस्तक्षेप करने लगे तो फिर मनुष्यों के जीवन का जो अस्तित्व है और सृष्टि की जो लीला है इसमें बहुत फर्क पड़ जाएगा। मैं सब कुछ हस्तक्षेप की बात नहीं भाषा में इस बात को यह बताया गया है कि प्रकृति का नियम अलग है परमात्मा का कर्तव्य अलग है और सृष्टि का ड्रामा इसकी गुहता को समझने की आवश्यकता है और इन सभी बातों को पांच 10 15 मिनट में नहीं समझा जा सकता है ना इसलिए ब्रह्मा कुमारीज में हम बेसिक नॉलेज देते हैं बेसिक कोर्स एक घंटे घंटे का प्रतिदिन सात दिन करना होता है। एक एक विषय को अलग-अलग स्पष्ट करके समझाते हैं तभी जाकर के आप उन सभी बातों को समझ सकेंगे और अगर एक साथ सारी बातें मिक्स करके बताते हैं तो सामने वाले व्यक्ति के लिए भी बहुत मुश्किल होता है समझना। तो दीदी इस प्रश्न का उत्तर तो होगा ना उस कोर्स में कि जैसे जब यदि हम कह रहे हैं कि परमात्मा के सामर्थ्य का कोई अंत नहीं है। जैसे आपने कहा कि सब में हस्त
00:28:15:08 एक एक मिनट पूरा कर लो। जैसे आपने कहा ना कि वो हर जगह हस्तक्षेप करने लगेगा तो तो वो अवस्था हो जाएगी। मगर मैं हर जगह हस्तक्षेप की बात नहीं पूछ रहा। जो कार्य करने के लिए परमात्मा पर काया प्रवेश कर रहा है। मतलब वो कार्य तो उसका है तो वो कार्य क्या वो शरीर धारण करके नहीं कर सकता। मतलब यहां उसकी सामर्थ्य पे अंकुश लग रहा है ना। सृष्टि का कुछ अनादि नियम है। नहीं तो तो ईश्वर तो वही है ना जो सब कुछ कर सकता है। यही फर्क तो समझना है। जी प्रकृति का नियम है। यानी ईश्वर भी सर्वशक्ति सर्व वाली बात में बाधा आ जाएगी ना दीदी? ईश्वर सर्व समर्थ है। लेकिन सृष्टि का जो अनादि नियम है। अब जैसे दिन और रात का क्रम चल रहा है। जी। तो मनुष्यों की समझ अनुसार मनुष्य यह सोचता है कि परमात्मा सर्वशक्तिवान है तो दिन को दिन ही रहने दे, रात होने में ना दे। ये प्रकृति का नियम है। ठीक इसी प्रकार से ऋतु चक्र में जो परिवर्तन हो रहा है वो अपने समय अनुसार होना। इसका मतलब वो भी नियमों में बंधा है। ईश्वर भी जरूर। सृष्टि चक्र का जो नियम है सृष्टि चक्र के नियमान अनुसार सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलयुग ये चार युगों का चक्र
00:29:30:14 है। तो उसमें परमात्मा उस नियमों को अगर तोड़ करके अपनी सामर्थ्य दिखाने लगे तो सृष्टि का अस्तित्व बिल्कुल समाप्त हो। तो दीदी फिर वो अनंत क्यों कहेंगे? फिर हम कहेंगे कि हां सामर्थवान है। मनुष्यों से ज्यादा है। की आवश्यकता है। नहीं नहीं मतलब जैसे अनंत इसलिए है कि उनका अंत समझने की आवश्यकता है। सर्वशक्तिवान इसलिए कहा गया है कि जो कार्य मनुष्य के बस की बात नहीं वो भी वो कर सकता है। जो कोई धर्म पिताएं नहीं कर सके वो कार्य स्वयं परमात्मा करते हैं। जैसे आपको एक उदाहरण के रूप में बताएं। धर्म पिताएं इस सृष्टि पर आए और उन्होंने धर्म की स्थापना किया हम तो एक से दो से तीन तीन से चार ऐसे धर्म बढ़ते गए लेकिन सभी धर्मों का विनाश करा के एक सत्य धर्म की स्थापना करना यह कर्तव्य किसी धर्म पिता का नहीं है। लिए परमपिता परमात्मा का है जो इसलिए परमात्मा को सर्वशक्तिमान कहा जाता है। यानी कि नियमों के अनुसार ईश्वर के जो कार्य हैं वो अपने कार्य कर पाता है इसलिए वो
00:30:45:15 सर्वशक्तिमान है। जी तो ऐसे तो मनुष्य भी मनुष्य के जो कार्य है वो कर पाता है। इसलिए वो भी सर्वशक्तिमान हो जाएगा। मनुष्य के मनुष्य परमात्मा से शक्तियां लेकर समर्थ बन सकता है। लेकिन परमात्मा जैसी सामर्थ मनुष्य के अंदर नहीं आती है। तो मनुष्य जैसी सामर्थ भी तो नहीं है परमात्मा के अंदर। इसलिए मनुष्य और देवता में अंतर है। देवता और परमात्मा में अंतर है। अब यह सब जो गहन विषय है इसको बहुत गहराई से समझने की आवश्यकता इसमें कई सवाल एक साथ मिक्स करते हैं। तो उसकीता हमें नहीं मिलती। इसमें एक चीज आ जाती है दीदी। जैसे यदा धर्मस भवती भारत धर्मस्मान सजाम भगवान श्री कृष्ण ने कहा तो फिर इसमें तो वह कह रहे हैं ना कि मैं अपने शरीर का सृजन करता हूं। आप पूरी बात को स्पष्टता से पहले समझ ले जो भगवान के महावाक्य है और जो परमात्मा का कर्तव्य है दोनों ही बातों को बहुत स्पष्टता से समझने की आवश्यकता है। जैसे आपका एक सवाल बार-बार है कि मनुष्य भी सर्वशक्तिमान हो सकता है। मनुष्य अपने अनुसार कर सकता है। मनुष्य
00:32:00:24 की सामर्थ उसी हद तक है तो उससे ज्यादा करना उसका कार्य नहीं है ना। मनुष्य ईश्वर से सारी शक्तियां प्राप्त कर सकता है। लेकिन वो ईश्वर नहीं बन सकता है। क्यों नहीं बन सकता है? क्योंकि मनुष्य आत्माएं जो है अल्पज्ञ है और मनुष्य आत्माएं जन्म पुनर्जन्म में आती है। पुनर्जन्म में आने के कारण ही आत्मा को अल्पज्ञ कहा गया है और परमात्मा कभी जन्म नहीं लेते हैं। इसलिए वो सर्वज्ञ है। उनमें जो ज्ञान है, गुण है, शक्तियां है वो सदा है। उसमें कभी कोई फर्क नहीं पड़ सकता है। कभी अंतर नहीं आ सकता है। लेकिन मनुष्य आत्माएं उन्हीं परमात्मा से ज्ञान गुण शक्तियों को धारण करके अपने आप को कितने भी समर्थ बना ले लेकिन जब वो शरीर त्याग करेगी जन्म और मरण के साथ स्मृति और विस्मृति का चक्र है। मृत्यु होती है, विस्मृति हो जाती है, जन्म होता है, नई स्मृतियां उसके साथ होती है। तो अपने पास्ट लाइफ में जितनी भी शक्तियां जितने भी गुण उसने अपनाए जितना भी ज्ञान
00:33:16:02 अर्जित किया तो वो संस्कार के रूप में गुण और शक्तियां उसमें रहेंगी जो दूसरे जन्म में दिखाई देंगी लेकिन वो नॉलेज उसके अंदर नहीं होंगी। आप देखते हैं ना पुनर्जन्म की जितनी भी घटनाएं सुनते हैं कोई अपवाद के रूप में दो चार ऐसे बच्चे होंगे किसी को याद हो जाएगा किसी को पूर्व जन्म की स्मृति रहती है तो ये स्मृति और स्मृति का जो चक्र है यह आत्मा के साथ है यह परमात्मा के साथ नहीं है और इसलिए [गला साफ़ करने की आवाज़] परमात्मा को सर्वज्ञ और आत्मा को अल्पज्ञ कहा गया है। परमात्मा को सर्व समर्थ कहा गया है। आत्माएं समर्थवान बनती है। लेकिन परमात्मा की तरह सर्व समर्थ नहीं भी बन सकते। ओम शांति जी जी जी इसमें दीदी बस एक लास्ट थोड़ा सा रह गया पांच मिनट का। इसमें जैसे एक बस क्वेरी आ रही है जैसे कि परमात्मा के जो कार्य हैं नियम के मुताबिक वो अपने कार्य कर सकता है। इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। तो ऐसे ही जैसे आपने कहा कि जो आत्मा है वह सर्वज्ञ नहीं हो सकती या वह फला फला ईश्वर जैसा कार्य नहीं कर सकती। मगर बात यह है कि प्रकृति के हिसाब से आत्मा का वह कार्य है ही नहीं। आत्मा के जो कार्य वह तो वह कर रही है कि ईश्वर से शक्ति लेकर के अपने कार्य करना तो वह तो वह कर रही है। कार्य
00:34:31:03 कोई नहीं कर सकता है। उस कार्य को परमात्मा कर सकते हैं। इसलिए आत्माओं में उन्हें परम कहा गया। नहीं कुछ कार्य ऐसे हैं जो आत्मा कर सकती है। परमात्मा नहीं कर पा रही है। जैसे आत्मा जन्म ले रही है गर्भ से परमात्मा नहीं ले सकता है। तो कुछ कार्य ऐसे हैं जो परमात्मा कर सकता है। आत्मा नहीं कर सकती। है ना? आत्मा और परमात्मा में यही अंतर है। तो फिर सर्वशक्तिमान क्यों आ रहे ने आत्मा और परमात्मा को मिला दिया कि आत्मा ही परमात्मा है। आत्मा परमात्मा बन सकती है। लेकिन यह अपने आप में बिल्कुल स्पष्ट है। परमात्मा उनको क्यों कहा गया है? नहीं परमात्मा कहा गया है माना वो आत्माओं से भिन्न है। परम है। नहीं दीदी सर्वशक्तिमान की जो बात आ रही है ना उसमें दिक्कत आ रही है कि हम जब नियमों के मुताबिक परमात्मा चल रहा है तो उसको तो हम कह रहे हैं सर्वशक्तिमान उसी उनहीं उसी तरह से नियमों के मुताबिक आत्मा चल रही है। आत्मा का काम ही नहीं है। सर्वज्ञता आत्मा का तो अल्पज्ञता ही काम है। तो जब उसका काम है और वो कर रही है तो फिर हम उसको अल्पशक्तिमान क्यों कह रहे या तो दोनों शक्तिमान है। फर्क बताया जा रहा है। फर्क है। मगर सर्वशक्तिमान फिर कोई नहीं है। यह मानना पड़ेगा। पावर हाउस से जो लाइट आ रही है हां वही करंट जब ट्रांसफर होता है जीरो
00:35:46:12 पावर का बल हम अपनी क्षमता अनुसार लाइट देता है हम 1000 वाट000 वाट का बल मतलब क्योंकि आत्मा आत्मा भगवान से पावर लेती है इसलिए वो सर्वशक्तिमान नहीं है भगवान से पावर लेके काम करती है आत्मा शक्तिशाली बन सकती है नहीं नहीं बन नहीं सकती मैं कह रहा हूं देवता बन सकती है यही तो आपको समझाया जा रहा देवता बन सकती है लेकिन वो परमात्मा पिता पिता होता है परत्मा नहीं इसमें इसमें दिक्कत ये आ रही है कि आत्मा क्योंकि डिपेंड है ईश्वर के ऊपर इसलिए हम कह रहे हैं कि ईश्वर तो सर्वशक्तिमान है आत्मा नहीं है बस साधारण सा सवाल है उसको समझने की आवश्यकता है पिता और पुत्र में क्या अंतर होता है अगर इतनी सी बात पुत्र डिपेंड है पुत्र डिपेंड है पुत्र को जन्म उसी ने दिया बात अगर हम समझ ले और इसको स्वीकार कर ले तो कोई विवाद नहीं रहेगा। मैं और प्रश्नों के विवाद में जाने से सबसे ज्यादा जरूरी है वास्तविकता को समझना। नहीं एक चीज है कि मैं अंतर दोनों में मान रहा हूं। मगर सर्वशक्तिमान फिर यह है कि कोई नहीं है। अगर पिता है परम है। परम है। परम शक्तिमान है। ये कह सकते हैं वो श्रेष्ठ है। मगर सर्वशक्तिमान नहीं है। क्योंकि वो बहुत
00:37:01:15 से ऐसे कार्य जो आत्मा कर रही है वो नहीं कर पा रहे। जैसे गर्भ से जन्म लेना सकते हैं। मतलब गर्भ से जन्म ले सकते हैं। वो सब कुछ कर सकते हैं लेकिन प्रकृति के नियम में हस्तक्षेप नहीं करते हैं। नहीं तो सृष्टि का सारा खेल अस्त-व्यस्त हो जाएगा। तो बस इसी गहनता को समझने की आवश्यकता है। प्रकृति के नियम में हस्तक्षेप तो यह भी हो जाएगा ना कि आत्मा सर्वज्ञ हो रही है तो प्रकृति के नियम में हस्तक्षेप हो जाएगा। तो अगर प्रकृति के नियम में रहते हुए अपने कार्य करने हैं तो उस हिसाब से अपने कार्य करके पर आत्मा भी सर्वशक्तिमान कहला सकती है। ये मैं कह रहा हूं। मतलब हम प्रकृति के नियमों एक पूरे कर लो। हम प्रकृति के नियमों में रहकर काम करने वाले को सर्वशक्तिमान कह रहे हैं। ईश्वर को तो उसी तरीके से आत्मा भी तो अपने नियमों के अंदर रहकर के काम कर रही है। फिर उसको भी सर्वशक्तिमान कहें। ये पहले ही हमने बताया है जी। कि आत्माएं गुणों और शक्तियों को धारण करके देवत्व को प्राप्त करती है। तो यही उनका काम है प्रकृति के हिसाब से देवता और परमात्मा में अंतर इसलिए मनुष्यों को आज तक स्पष्ट नहीं हुआ कि देवताओं के जीवन में वो सारे गुण सारी शक्तियां दिखाई देती है। सारी विशेषताएं दिखाई देती है। फर्क सिर्फ इतना ही है कि देवताएं जन्म लेते हैं
00:38:16:19 और परमात्मा जन्म ले लेते हैं। तो दीदी मैं अंतर मान रहा हूं। मैं अंतर मान रहा हूं। वो शक्तिवान है देवताएं और परमात्मा सर्वशक्तिवान दीदी शांति इस हिसाब से अच्छा दीदी दीदी बस लास्ट एक चीज है छोटी सी यदा यदा ही धर्मस्य वाला क्लियर कर दीजिए थोड़ा सा गीता वाला ओम शांति इसका इस श्लोक का मतलब क्या समझे बंद कर दो स्टॉप कर रहा हूं मेरा टाइम हो गया बस बस गीता वाला थोड़ा सा अभी हम तो जा नहीं बस नहीं पांच मिनट बस गीता वाला क्लियर कर दीजिए वो देखिए ये आप डिबेट करके आप इसको पब्लिक को दिखाना चाहते हैं। हम आपको वास्तविक नहीं समझाना चाहते। आप एक सप्ताह आके हमारे पास कोर्स कर लीजिए। हर बात आप समझ जाएंगे। समझ में ये बस गीता वाला दो लाइन चार लाइन में इसका उत्तर नहीं है। तो इसका क्या समझे जो सजा में हम धर्म ग्लानी के समय परमात्मा आते हैं। सृजन करते हैं। सृजन करते नहीं। जी परमात्मा इस सृष्टि पर अवतरित होते हैं और आपको उसमें सजन पहले हम बता देंगे कि सृष्टि पर जो चीजें अनादि है अविनाशी है उसके रचना का सवाल ही नहीं उठता उसकी
00:39:31:27 दीदी मैं कह रहा हूं वो कह रहे हैं सजन करते हैं वो कह रहे हैं ना सजन शब्दों में अटकते हैं तो उसको क्या माने वो ठीक वो गलत शब्द है शब्दों में नहीं अटकना तो वो झूठ है क्या माने उसको फिर झूठ और सच नहीं अब पुस्तक में जैसे आपने इस्लाम के बारे में कई बातें बोला पुस्तक में लिखा हुआ है हां तो भगवान कृष्ण ने बोला है ना वो नहीं नहीं इसी तरह से हमारे भी धर्म ग्रंथ में कई बातें ऐसी लिखी हुई है तो वास्तविकता को समझने की आवश्यकता नहीं हमने आपको एक लाइन में कहा कि जो धर्म पिताओं ने उपदेश दिया उस उपदेश को जिसने सुना उस उद्देश्य को जिसने लिखा फर्क पड़ गया नहीं तो ये ये क्या मतलब किसी ने मिलावट कर दी है ये ऐसा क्या कहना है आपका? धर्म पिता ने नहीं लिखा। तो ये किसी ने मिलावट कर। जी धर्म पिता ने नहीं लिखा। धर्म पिता ने जो उपदेश दिया किसी और ने लिखा। सुनने वाला अपनी बुद्धि अनुसार अपनी सामर्थ्य अनुसार उसको एक रूप देता है। अच्छा। पुस्तक में लिख के देता है। इसलिए आप शब्दों में जाएंगे तो आप यथार्थ से बहुत दूर रहेंगे। शब्दों में जाना ही नहीं है। यथार्थ को समझना है। दीदी ऐसे
00:40:47:01 तो मुरली भी जब हमारी आती है ना बताते हैं धर्म ग्रंथ में क्या भी लिखा हुआ है। चाहे इस्लाम धर्म में लिखा है या सनातन धर्म में लिखा हो इस समय समाज में किस बात की आवश्यकता है ये समझना जरूरी है। वास्तविक धर्म को जाने उसके अनुसार काम करेंगे। समाज की जो इस समय जो स्थिति बनी हुई बहुत अच्छा बोल रही है थोड़ा चालू करवा लूं। नहीं नहीं वो भी बता रहे हैं समाज की जो स्थिति बनी हुई है समाज की स्थिति को बदलने की आवश्यकता तो वो बदलेगी धर्म को जान के जब व्यक्ति भटकेगा धर्म कोई नहीं जानता होगा धर्म के नाम पे बहुत सी चीजें होगी जानते ही आपको हमने कहा ना हम शुरू से आपको यही बात बार-बार समझा रहे ठीक है अभी अगर एकदम मतलब अभी और थोड़ा सा देंगी टाइम पास मेरे पास टाइम नहीं है तो आ जाओ तो दीदी इसमें ऐसे चलिए ठीक ठीक है। आपको चर्चा कैसी लगी आप बताइएगा। बंद कर दो भाई।
00:42:04:12 [संगीत]
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क्या छुपा रही है ब्रह्माकुमारी
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