1
00:00:01,960 --> 00:00:07,440
[घंटी की आवाज़] ठीक है। तो अब आपने एक बात कही कि ईश्वर

2
00:00:07,440 --> 00:00:12,000
अपने सारे कार्य करता कर सकता है बिना किसी की सहायता के

3
00:00:12,000 --> 00:00:17,440
तो वो सर्वशक्तिमान कहा जाता है। है ना?

4
00:00:17,440 --> 00:00:21,520
हां। तो जब ईश्वर ईश्वर का कार्य

5
00:00:21,520 --> 00:00:25,920
क्या है?

6
00:00:25,920 --> 00:00:30,000
पूछ रहे हो मेरे से। हां। तो ईश्वर का ईश्वर

7
00:00:30,000 --> 00:00:34,000
का कार्य यही है सृष्टि रचना करना धारण करना फिर प्रलय करके फिर पूरा

8
00:00:34,000 --> 00:00:38,400
सृष्टि चक्र चलाना और जितने भी चीजें बीच में आती कर्म सिद्धांत

9
00:00:38,400 --> 00:00:42,400
मनुष्यों की अनुष कह रहा हूं सभी जीवों के लिए रचनाएं करना

10
00:00:42,400 --> 00:00:47,200
और सस्टेन करना हर चीज को बेसिक यानी उत्पत्ति उत्पत्ति स्थिति

11
00:00:47,200 --> 00:00:51,200
संहार और कर्म फल देना ये चार चीजें मैंने पढ़ी थी उसमें

12
00:00:51,200 --> 00:00:55,280
शायद है ना यही है ना हां

13
00:00:55,280 --> 00:00:59,280
यही है तो ये बताइए कि ईश्वर के अलावा अलावा और

14
00:00:59,280 --> 00:01:03,440
कौन-कौन से तत्व हैं जो एक्सिस्ट करते हैं सृष्टि रचना

15
00:01:03,440 --> 00:01:06,400
से पहले

16
00:01:06,400 --> 00:01:10,800
वो प्रकृति अब क्योंकि आप मैं सोचा था कि सर्वशक्तिमान

17
00:01:10,800 --> 00:01:15,520
वाले पे आएंगे तो आप दिशा अलग ही ले जा रहे हैं।

18
00:01:15,520 --> 00:01:19,680
इससे क्या होगा? मतलब इसमें इससे फर्क क्या पड़ेगा? तो इससे

19
00:01:19,680 --> 00:01:24,000
सर्वशक्तिमान फर्क पड़ेगा ना फर्क

20
00:01:24,000 --> 00:01:28,000
ये पड़ेगा कि जो ईश्वर है वो

21
00:01:28,000 --> 00:01:32,640
प्रकृति की और जीव की सहायता ले रहा है

22
00:01:32,640 --> 00:01:37,200
उत्पत्ति स्थिति संहार और ये सब करने में सहायता ले रहा है वो

23
00:01:37,200 --> 00:01:41,360
फिर आप ये क्यों कह रहे हैं कि वो अपने से कर लेता है कौन

24
00:01:41,360 --> 00:01:45,920
से माना जाए कि हां हां

25
00:01:45,920 --> 00:01:49,920
निमित्त है तो निमित रूप से सहायता नहीं ले रहा। उपादान

26
00:01:49,920 --> 00:01:54,080
तो चाहिए ना ईश्वर को। मूल प्रकृति आप आज में समझ गया। आप ये कहना चाह रहे हैं कि मूल प्रकृति

27
00:01:54,080 --> 00:01:58,560
एक्सिस्ट कर रही है। तो मूल प्रकृति के अस्तित्व के बिना ईश्वर नहीं बना सकता।

28
00:01:58,560 --> 00:02:02,640
तो इससे आप वो दिखाना चाह रहे समझ रहे। दो ही चीजें वहां पे दो

29
00:02:02,640 --> 00:02:06,640
ही चीजें ईश्वर के अलावा है। उन दोनों चीजों का वो उपयोग कर रहा है। ये

30
00:02:06,640 --> 00:02:10,800
वाली बात जो कही जाती है कि ईश्वर बिना किसी की सहायता के नहीं करता। तो इसमें ये

31
00:02:10,800 --> 00:02:14,960
मानना पड़ेगा या तो कोई एक और ईश्वर था जिसकी सहायता उसने नहीं ली। क्योंकि

32
00:02:14,960 --> 00:02:19,040
जिसकी जो उपलब्ध है उसको उसको तो यूज़ कर रहा है। अगर बात करें

33
00:02:19,040 --> 00:02:21,600
कि जड़ जड़ यही सही सही सही पकड़ा

34
00:02:21,600 --> 00:02:26,000
पॉइंट पहला वाला सही पकड़ा। एक मिनट एक मिनट जड़ का वो यूज़ कर रहा है।

35
00:02:26,000 --> 00:02:30,160
अगर कहे चेतन का नहीं कर रहा है तो वो अपने धर्म का जो धार्मिक

36
00:02:30,160 --> 00:02:34,160
ज्ञान है उसका विस्तार करने के लिए भी चेतन का यूज़ कर रहा है। पहले वो ऋषियों को देता

37
00:02:34,160 --> 00:02:38,240
है। ऋषियों से प्रवाह आगे बढ़ता है। चेतन का यूज़ भी हो गया। जो

38
00:02:38,240 --> 00:02:42,240
वो है ना उत्पत्ति स्थिति स्थिति में आ गया धर्म

39
00:02:42,240 --> 00:02:46,240
और धर्म के प्रवाह के लिए वो ऋषियों की ऋषियों की सहायता ले रहा है। चेतन की

40
00:02:46,240 --> 00:02:50,240
सहायता ले रहा है। वो खुद तो हर एक को जाकर के वेद नहीं दे रहा है। वो

41
00:02:50,240 --> 00:02:54,320
चार ऋषियों को दे रहा है। फिर चार ऋषि आगे काम कर रहे हैं। ठीक है। ठीक है। मैं इसका जवाब दे देता

42
00:02:54,320 --> 00:02:58,400
हूं। पॉइंट समझ गया मैं। तो ईश्वर जो है

43
00:02:58,400 --> 00:03:02,560
उपादान तो ईश्वर को चाहिए ही चाहिए। जो आप बोल रहे हो मूल प्रकृति ईश्वर उपादान चाहिए ही चाहिए।

44
00:03:02,560 --> 00:03:07,520
और सहायता ना लेने का क्या है? वो बताइए। सहायता

45
00:03:07,520 --> 00:03:11,760
ना लेने का अर्थ यानी किसी और की सहायता ना लेकर के खुद से कर रहा है वो चीजें

46
00:03:11,760 --> 00:03:16,240
और खुद से करने का मतलब जो है निमित्त रूप से सहायता

47
00:03:16,240 --> 00:03:20,320
सृष्टि बिना जीव के भाई किस चीज की सहायता नहीं लेनी जड़ की या ची की

48
00:03:20,320 --> 00:03:24,320
या दोनों की नहीं लेनी सहायता लेने का अर्थ गलत समझ रहे हैं क्योंकि ये तो

49
00:03:24,320 --> 00:03:28,320
फिर आप ये तो शुरू से ही गलत समझ रहे हैं आप ये तो आर्य समाज में कोई भी नहीं

50
00:03:28,320 --> 00:03:32,480
बोलता है कि ईश्वर जो है बिना मूल प्रकृति के बिना जीवात्माओं

51
00:03:32,480 --> 00:03:36,640
के एक्सिस्टेंस बना देता है मैं ये नहीं कह रहा मैं ये नहीं कह रहा कि आर्य समाज जी यह बोलता है कि वह बिना

52
00:03:36,640 --> 00:03:40,800
प्रकृति की स बिना प्रकृति का उपयोग किए बना देता है। मुझे इस बात का अर्थ

53
00:03:40,800 --> 00:03:44,880
समझाइए। वह यह जो यह जो तर्क दिया जा रहा है आर्य समाज की ओर से कि

54
00:03:44,880 --> 00:03:48,960
वह अपने सारे कार्य बिना किसी की सहायता के अन्य आपने जो

55
00:03:48,960 --> 00:03:52,960
पहले वाली बात बोली थी ना वही बात है कि अन्य किसी और चेतन सत्ता और को एक्सिस्ट नहीं कर रही

56
00:03:52,960 --> 00:03:57,680
जिसकी सहायता लेके वो कुछ बना रहा है। जैसे उदाहरण के लिए

57
00:03:57,680 --> 00:04:01,920
बोतल है ईश्वर का ईश्वर का कार्य ईश्वर का कार्य स्थिति

58
00:04:01,920 --> 00:04:06,080
है ना स्थिति पालन स्थिति

59
00:04:06,080 --> 00:04:10,320
रखना मेंटेन रखना पालन उसमें धर्म की स्थापना आ गया ना

60
00:04:10,320 --> 00:04:14,640
ईश्वर का कार्य कि नहीं आया हम धर्म

61
00:04:14,640 --> 00:04:19,520
की स्थापना अब वो उसप बात चली जाएगी वो फिर

62
00:04:19,520 --> 00:04:23,920
दूसरा विषय हो जाएगा नहीं होगा धर्म की स्थापना

63
00:04:23,920 --> 00:04:28,000
का मतलब यही नहीं है कि जब जब कंस आए रावण आए तब स्थापना करनी है।

64
00:04:28,000 --> 00:04:32,320
कोई व्यक्ति धर्म को जानने वाला नहीं है। तब चार ऋषियों के अंतःकरण

65
00:04:32,320 --> 00:04:36,320
में वेद का ज्ञान देना ये भी धर्म की स्थापना मैं इसका हां

66
00:04:36,320 --> 00:04:40,320
मैं इसका जवाब इसे देता हूं। ईश्वर जो है समस्त आत्माओं

67
00:04:40,320 --> 00:04:46,000
का कल्याण चाहता है और कल्याण चाहने के लिए व्यवस्था जो बनाई

68
00:04:46,000 --> 00:04:50,000
कल्याण करने के लिए चाहने के लिए नहीं नहीं मैं कह रहा हूं वो

69
00:04:50,000 --> 00:04:52,240
सहायता ले रहा है ना चेतन की

70
00:04:52,240 --> 00:04:56,240
आपने कहा चेतन की सहायता नहीं लेता है वो तो ले रहा है चेतन से

71
00:04:56,240 --> 00:05:00,400
अपना काम करवा रहा है ना अपना काम वही

72
00:05:00,400 --> 00:05:05,120
अपना काम कुछ उसका थोड़ी है धर्म की धर्म की स्थापना करना या जो भी करना

73
00:05:05,120 --> 00:05:11,120
वो ईश्वर का काम नहीं है वो चेतन मतलब हमारा काम बेसिकली

74
00:05:11,120 --> 00:05:15,360
तो वो क्या चीज है जिसके कारण ये कहा जा रहा है ये जो है ये हमारा

75
00:05:15,360 --> 00:05:19,440
काम है ये धर्म की स्थापना करना ईश्वर का नहीं है हम

76
00:05:19,440 --> 00:05:23,680
ईश्वर का नहीं है ना ईश्वर ने हमें हमारे हमें स्वतंत्र छोड़ रखा है

77
00:05:23,680 --> 00:05:28,560
यदि ईश्वर हस्तक्षेप करके स्थापना कर देगा तो फिर वो तो ईश्वर का काम हो जाएगा वो

78
00:05:28,560 --> 00:05:33,040
आपको क्या कहा है मयंक जी असल में क्या है कि आप मुझे लगता है कि मेरी

79
00:05:33,040 --> 00:05:37,200
कुछ चर्चाओं को देख के एक लिमिटेड क्राइटेरिया को लेकर के यहां उपस्थ उपस्थित हुए

80
00:05:37,200 --> 00:05:41,280
और शायद मैं वो विषय ला नहीं पाया जिसके लिए आप प्रिपेयर हो के आए हैं। मुझे

81
00:05:41,280 --> 00:05:45,280
ऐसा लग रहा है क्योंकि बात नहीं मैं तो चाह रहा था कि पहले से

82
00:05:45,280 --> 00:05:49,920
हम थोड़ा डिसाइड कर ले किस पर बात होनी है। एक एक मिनट मैं जरा पूरा बात तो सर्वशक्तिमान

83
00:05:49,920 --> 00:05:53,920
पे ही चल रही है ना। सर्वशक्तिमान पे ही बात चल रही है। जो सर्वशक्तिमान के [गला साफ़ करने की आवाज़]

84
00:05:53,920 --> 00:05:58,080
लिए तर्क दिया जा रहा है। ईश्वर अपने सारे कार्य कर सकता है।

85
00:05:58,080 --> 00:06:02,160
वो तर्क मुझे वहां से संतुष्टि नहीं मिल रही है।

86
00:06:02,160 --> 00:06:06,160
क्योंकि ईश्वर अपने सारे कार्य कर सकता है। इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। उसका कार्य

87
00:06:06,160 --> 00:06:07,920
उत्पत्ति स्थिति

88
00:06:07,920 --> 00:06:11,920
अब उसी उत्पत्ति में वो जीव का भी उपयोग कर रहा है। संसार

89
00:06:11,920 --> 00:06:16,160
बनाने के लिए जीव का उपयोग हो रहा है। चेतन का उपयोग हो रहा है। उसके बाद स्थिति

90
00:06:16,160 --> 00:06:20,320
में धर्म के [गला साफ़ करने की आवाज़] लिए वो जीव का उपयोग कर रहा है। उसको बता रहा है कि ये ले भाई वेद

91
00:06:20,320 --> 00:06:24,320
और इसको जाकर के आगे आप बढ़ाइए। तो ये उपयोग हो गया। तो

92
00:06:24,320 --> 00:06:28,400
वो कौन सा फिर अंतर क्या रहा? जब वो दूसरी चीजों का जो जो भी चीज

93
00:06:28,400 --> 00:06:32,400
एक्सिस्ट कर रही है वो उसका उपयोग कर रहा है। उसकी सहायता ले रहा है। तो अंतर क्या

94
00:06:32,400 --> 00:06:34,800
रहा?

95
00:06:34,800 --> 00:06:38,880
तो वही है ना आप सहायता का अर्थ गलत समझ रहे हैं। वही है तौर पे सहायता का

96
00:06:38,880 --> 00:06:42,960
अर्थ आप यह समझ रहे कि क्या ईश्वर स्वयं से बिना मूल

97
00:06:42,960 --> 00:06:46,960
प्रकृति के एक्सिस्टेंस के उसके बना दे रहा है या फिर स्वयं से आत्मा मैं

98
00:06:46,960 --> 00:06:51,440
नहीं कह रहा कि मैं ये नहीं कह रहा कि मैं सहायता का अर्थ मुझे आप इस वाक्य का अर्थ बताइए

99
00:06:51,440 --> 00:06:55,440
कि वो बिना किसी की सहायता के करता है वो अर्थ बताइए। मैंने सहायता सिद्ध कर

100
00:06:55,440 --> 00:07:01,440
दी वो सब की सहायता ले रहा है। जो भी उपलब्ध है उनकी सहायता ले रहा है वो।

101
00:07:01,760 --> 00:07:06,000
वही है ना सहायता तो लेता ही है ना आप समझ ही नहीं रहे सहायता

102
00:07:06,000 --> 00:07:10,080
लेने का अर्थ अगर आप यह करें कि भाई कुछ एक्सिस्ट ना करे मैं मैं

103
00:07:10,080 --> 00:07:14,160
ये नहीं कह रहा कि मैं आप ये मत बताइए कि क्या नहीं है

104
00:07:14,160 --> 00:07:18,320
अच्छा मैं मैं बताता हूं चलो मैं एग्जांपल दिखा एक मिनट थोड़ा टाइम क्यों

105
00:07:18,320 --> 00:07:22,560
लग रहा है आप यह मत बताइए कि क्या नहीं है आप ये बताइए क्या है अपनी

106
00:07:22,560 --> 00:07:27,440
बात बताइए आप ठीक है

107
00:07:27,440 --> 00:07:32,240
तो मूल प्रकृति है जीवात्माएं

108
00:07:32,240 --> 00:07:36,240
जीवात्माओं के लिए जो है संसार बनाना ये है ईश्वर का

109
00:07:36,240 --> 00:07:40,320
एक कार्य ठीक है अब इस कार्य को करने के लिए

110
00:07:40,320 --> 00:07:44,400
जीवात्माओं की जरूरत तो पड़ेगी शरीर में जीवात्मा को डालेगा और किसको डालेगा मूल

111
00:07:44,400 --> 00:07:48,640
प्रकृति से ही वह संसार बनाएगा ठीक है ये कार्य मैंने डिफाइन कर दिया

112
00:07:48,640 --> 00:07:52,880
ठीक है अब इस कार्य को करने के लिए ईश्वर को और किसी की सहायता की जरूरत नहीं है ईश्वर स्वयं

113
00:07:52,880 --> 00:07:57,120
सामर्थ्य रखता है ये कार्य करने का ठीक है मैंने पूरा एक एग्जांपल किसी

114
00:07:57,120 --> 00:08:01,440
और और और कौन है? जीव की सहायता ले ही ली, जड़ की सहायता

115
00:08:01,440 --> 00:08:05,440
ले ही ली। अच्छा यह भी हो कि चलो मेरा कंट्रोल है। अगर मैं कहूं कि

116
00:08:05,440 --> 00:08:09,760
मेरा कंट्रोल है सहायता करना ना करने के ऊपर। ठीक है? कि

117
00:08:09,760 --> 00:08:14,720
भाई मैं जीव की इच्छा के बिना भी उसका उपयोग कर सकता हूं।

118
00:08:14,720 --> 00:08:16,800
है ना? आप वो बात नहीं कह

119
00:08:16,800 --> 00:08:21,280
पा रहे हैं। मैं आपके पक्ष की ओर से। नहीं नहीं नहीं कर। नहीं नहीं

120
00:08:21,280 --> 00:08:25,360
ईश्वर फिर वही बात आ जाएगी ना। ईश्वर क्यों करेगा पे ही आना पड़ेगा कि ईश्वर

121
00:08:25,360 --> 00:08:29,360
की अगर आत्मा है मान लीजिए जीवात्मा एक्सिस्ट नहीं कर रही है ईश्वर मूर्त प्रकृति से

122
00:08:29,360 --> 00:08:33,360
अपना कुछ कर रहा है नहीं सुन रहे मैं क्या कह रहा हूं आपने मेरी बात समझी नहीं आप

123
00:08:33,360 --> 00:08:37,760
नहीं बोलने लगे पहले ही मैंने कहा कि

124
00:08:37,760 --> 00:08:42,000
प्रकृति निर्णय नहीं ले सकती कि मुझे उपयोग में आना है कि नहीं आना है

125
00:08:42,000 --> 00:08:46,320
जीव निर्णय नहीं ले सकता है कि मुझे जन्म लेना है कि नहीं लेना तो उसका क्योंकि कंट्रोल

126
00:08:46,320 --> 00:08:50,320
होता है इस कारण से जीव का उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं

127
00:08:50,320 --> 00:08:54,400
हो सकता नहीं मैं संसार नहीं बनने दूंगा मैं नहीं आऊंगा। तो इस तरीके से देखा

128
00:08:54,400 --> 00:08:58,480
जाए तो वो स्वतंत्र रूप से ये निर्णय लेता है कि मुझे संसार बनाना है, कैसे बनाना

129
00:08:58,480 --> 00:09:02,560
है, आगे क्या करना है, जीव को कैसे जन्म देना है। इस तरीके से वो बिना

130
00:09:02,560 --> 00:09:06,640
किसी की सहायता के क्योंकि करता है अपना कार्य इसलिए वो सर्वशक्तिमान

131
00:09:06,640 --> 00:09:12,560
है। मैंने आपकी ओर से एक पक्ष रख दिया क्योंकि वो

132
00:09:12,560 --> 00:09:16,720
क्योंकि वहां क्योंकि जीव और प्रकृति दोनों उसके

133
00:09:16,720 --> 00:09:21,520
अधीन होते हैं। हां होते हैं।

134
00:09:21,520 --> 00:09:25,680
है ना? ठीक है। जीव और प्रकृति दोनों उसके अधीन होते हैं। इस

135
00:09:25,680 --> 00:09:29,760
कारण से यह कहा जाता है कि उसने उनकी बिना मर्जी

136
00:09:29,760 --> 00:09:33,920
उनसे कोई इच्छा थोड़ी ना पूछता है वो कि भाई तुझे जाना है कि नहीं जाना है संसार

137
00:09:33,920 --> 00:09:38,160
है ना हम तो वहां पे जो सहायता होती है वो इच्छा पूर्वक नहीं होती। मगर

138
00:09:38,160 --> 00:09:42,400
दिक्कत ये है जब वो पालन करता है ना स्थिति करता है। जब वो धर्म धर्म का ज्ञान

139
00:09:42,400 --> 00:09:46,560
देता है पालन में स्थिति में तो वो धर्म

140
00:09:46,560 --> 00:09:50,640
का जब ज्ञान देता है तो वहां पर उनकी इच्छा है। कि मैं इसको

141
00:09:50,640 --> 00:09:54,960
आगे बढ़ाऊं कि ना बढ़ाऊं। तो यह सहायता हो गई। चेतन की सहायता

142
00:09:54,960 --> 00:09:59,680
यहां हो गई और जड़ की सहायता वो ले ही रहा है।

143
00:09:59,680 --> 00:10:03,840
नहीं आपने क्या बोला लास्ट लाइन कि भाई धर्म का ज्ञान देने

144
00:10:03,840 --> 00:10:07,920
के लिए ईश्वर इच्छा करता है। ये बोलना चाह रहे हैं। मैंने इच्छा

145
00:10:07,920 --> 00:10:12,000
कहा क्या? आप बार-बार इच्छा इच्छा में फसा के दूसरी

146
00:10:12,000 --> 00:10:16,000
ओर क्यों ले जा रहे हैं? मैं कह रहा हूं वो कार्य वो

147
00:10:16,000 --> 00:10:20,240
एक कार्य करता है कि नहीं करता? उनको ज्ञान देने का, ऋषियों को ज्ञान देने का।

148
00:10:20,240 --> 00:10:24,400
हां बिल्कुल। ये कार्य अनावश्यक है या फिर उसके चार कामों

149
00:10:24,400 --> 00:10:28,640
में से एक काम है? हां आवश्यक है।

150
00:10:28,640 --> 00:10:34,240
तो चार में से किसी एक में है ना वो ये अलग से एक्सिस्ट करता है।

151
00:10:34,240 --> 00:10:38,240
नहीं ये ईश्वर ने बनाई ही जो दुनिया वगैरह सब बनाया है जीव कल्याण के

152
00:10:38,240 --> 00:10:42,320
लिए और कल्याण के लिए धर्म को देना ही पड़े। पूछा चार में से मैंने पूछा चार में से किसी

153
00:10:42,320 --> 00:10:46,400
एक काम में आता होगा। धर्म का ज्ञान देना। चार में

154
00:10:46,400 --> 00:10:49,360
से अगर आप यह

155
00:10:49,360 --> 00:10:53,440
चार पांच ये तो फिर आप मैंने ये बोला ही नहीं कि ये चार में ये

156
00:10:53,440 --> 00:10:57,520
चीजें नहीं आती है। ये फिर आप समझने की गलती कर रहे हैं। ये मैंने कभी नहीं बोला। आती

157
00:10:57,520 --> 00:11:01,520
है। बोल दीजिए आती है चार में से। आप ये ये सवाल पहले ही पूछ लीजिए। आप इतना

158
00:11:01,520 --> 00:11:05,520
लंबा लाने की जरूरत नहीं है। आप पूछ लीजिए ना मुझसे पहले से ही। मतलब अब अब आप

159
00:11:05,520 --> 00:11:09,520
ये टॉपिक नहीं आप जो टॉपिक चल रहा है वो नहीं डिसाइड वो ये कहेंगे। आपने पहले क्यों

160
00:11:09,520 --> 00:11:13,520
नहीं पूछा ये है। मतलब मैं ऐसा करके आया हूं कि आपको किस

161
00:11:13,520 --> 00:11:17,520
किस वे में आपसे [गला साफ़ करने की आवाज़] स्ट्रक्चर में आपसे क्वेश्चन अब इस बात

162
00:11:17,520 --> 00:11:22,720
पर हमारी चर्चा होगी कि मैंने पहले क्या नहीं पूछा बाद में क्या नहीं पूछा मैं पूछ रहा हूं

163
00:11:22,720 --> 00:11:27,200
ये जो धर्म का ज्ञान है देना है ये आवश्यक कार्य है ना

164
00:11:27,200 --> 00:11:31,360
हां आवश्यक है हां तो अच्छा मैं एक लाइन एक

165
00:11:31,360 --> 00:11:35,600
लाइन बोल देता हूं एक लाइन बोल देता हूं तो उससे थोड़ा क्लेरिटी आ जाएगी ईश्वर

166
00:11:35,600 --> 00:11:40,880
जितने भी कार्य करता है सारे ही आवश्यक है अनावश्यक कुछ भी नहीं करता

167
00:11:40,880 --> 00:11:43,680
ठीक है तो ये जो धर्म का ज्ञान देना है ये

168
00:11:43,680 --> 00:11:49,520
उसके चार में से एक काम में आ गया हम इसको स्थिति में मान लेते हैं पालन में

169
00:11:49,520 --> 00:11:53,760
किसी में मान सब में आएगा वैसे तो किसी में मान ले सृष्टि सृष्टि रचना

170
00:11:53,760 --> 00:11:58,800
में मान ले क्या हां सब में ही आएगा क्योंकि ईश्वर

171
00:11:58,800 --> 00:12:02,800
रचना के लिए धर्म सृष्टि रचना सृष्टि रचना के लिए ये

172
00:12:02,800 --> 00:12:06,960
ज्ञान देना आवश्यक हो गया हां क्योंकि रचना कर

173
00:12:06,960 --> 00:12:11,200
रचना के लिए ज्ञान देना आवश्यक नहीं रचना कर किसके लिए रहा है जीवात्मा के लिए तो कर रहा है तो

174
00:12:11,200 --> 00:12:16,000
अल्टीमेटली जीवात्मा के कल्याण के फिर तो जीवात्मा के

175
00:12:16,000 --> 00:12:20,080
आप ना आप आप खा उसको खींच रहे

176
00:12:20,080 --> 00:12:24,080
हैं बात को ऐसे अगर ऐसे अगर सृष्टि रचना में

177
00:12:24,080 --> 00:12:28,160
ही सब कुछ आ गया तो आप पालन को भी रचना में डाल दो आप प्रलय

178
00:12:28,160 --> 00:12:32,320
को भी रचना में डाल दो आप कर्म फल नहीं एक मिनट आप मुझे बोलने

179
00:12:32,320 --> 00:12:36,560
दीजिए आप कर्म फल को भी रचना में डाल दो पता नहीं क्यों स्पष्टता से दूर

180
00:12:36,560 --> 00:12:40,720
रहना मैंने क्योंकि मैं मैंने ठीक है मैं मैं

181
00:12:40,720 --> 00:12:44,720
बोल दे रहा हूं स्पष्टता से दूर नहीं मैं इस मतलब ये जो आप बोल रहे है ना

182
00:12:44,720 --> 00:12:48,720
हर चीज को आवश्यक कार्यों के अंदर पूरी एक उसमें डाल के चल रहा

183
00:12:48,720 --> 00:12:52,800
हूं। ऐसे तीन चार पांच ऐसे ये नहीं करके चल रहा हूं। इसमें इसकी

184
00:12:52,800 --> 00:12:57,040
आवश्यकता भी नहीं है करने की। इसलिए मैंने बोल दिया कि आप सब

185
00:12:57,040 --> 00:12:58,960
आवश्यकता है। पालन

186
00:12:58,960 --> 00:13:03,120
सृष्टि के पालन में धर्म का ज्ञान देना एक अंग है और

187
00:13:03,120 --> 00:13:07,120
उसके लिए वो चेतन की सहायता ले रहा है। कि धर्म कैसे स्थापित

188
00:13:07,120 --> 00:13:11,200
हो दुनिया में कि चार ऋषियों को ज्ञान दो। नहीं

189
00:13:11,200 --> 00:13:15,200
तो सारे नास्तिक है, जानवर हैं। धर्म नहीं है, माता कौन है, पत्नी कौन

190
00:13:15,200 --> 00:13:19,840
है, बहन कौन है? नहीं पता। सीधी बात

191
00:13:19,840 --> 00:13:23,920
धर्म का ज्ञान दे रहा है और उसके लिए सहायता ठीक

192
00:13:23,920 --> 00:13:27,920
है। मैंने पहले ही बता दिया सहायता किस दृष्टि से ले रहा है और किस दृष्टि

193
00:13:27,920 --> 00:13:32,000
से नहीं ले रहा है। मैंने एक्सप्लेन कर दिया। आप आप अंतर बता दीजिए कि मनुष्य ऐसा

194
00:13:32,000 --> 00:13:36,080
ऐसा काम करता है। यहां पे देखिए वो बाधित हो रहा है और देखिए ईश्वर ऐसा ऐसा

195
00:13:36,080 --> 00:13:41,840
नहीं करता है इसलिए बाधित नहीं होता है। अंतर बताइए उदाहरण के साथ जी

196
00:13:41,840 --> 00:13:45,840
मतलब समझा नहीं कैसे मनुष्य क्या कर सकता है? ईश्वर क्या कर सकता है?

197
00:13:45,840 --> 00:13:49,840
मैंने आपने कहा ईश्वर बिना किसी की सहायता के अपने सारे कार्य कर सकता

198
00:13:49,840 --> 00:13:53,840
है। ठीक है? अपने सारे कार्य कर सकता है। इसलिए

199
00:13:53,840 --> 00:13:58,000
वो सर्वशक्तिमान है। अब आप मुझे उदाहरणार्थ बताइए कि मनुष्य ने ये

200
00:13:58,000 --> 00:14:02,000
यहां पर देखिए मनुष्य का मनुष्य कोई भी अपना कार्य बिना किसी की सहायता के नहीं

201
00:14:02,000 --> 00:14:06,080
कर सकता। इसलिए मनुष्य जो है बाधित है और ईश्वर सर्वशक्तिमान

202
00:14:06,080 --> 00:14:10,640
है क्योंकि उसने इस इस तरीके से अपना कार्य बिना किसी की सहायता के किया। वो मुझे उदाहरणार्थ

203
00:14:10,640 --> 00:14:14,640
बता दीजिए। उदाहरण देते हुए। हां तो

204
00:14:14,640 --> 00:14:18,640
हां जीवात्मा जैसे सृष्टि रचना ही है। जीवात्मा जो है खुद

205
00:14:18,640 --> 00:14:22,640
से जो है मूल प्रकृति में बल या फिर कुछ मतलब मूल प्रकृति

206
00:14:22,640 --> 00:14:27,040
पर इन्फ्लुएंस नहीं कर सकती। खुद से ईश्वर इन्फ्लुएंस करके जीवात्मा

207
00:14:27,040 --> 00:14:31,120
का ये काम है। नहीं कर सकती है। मैं वही तो बोल रहा हूं नहीं कर

208
00:14:31,120 --> 00:14:35,200
सकती। मनुष्य का यह काम है भाई।

209
00:14:35,200 --> 00:14:39,200
अभी मैं पूछ रहा हूं मनुष्य के जो जो काम

210
00:14:39,200 --> 00:14:43,360
है वो बिना किसी की सहायता के कर नहीं कर सकता। ऐसे

211
00:14:43,360 --> 00:14:47,440
करके मुझे उदाहरणार्थ बताइए। जैसे उसको सांस चाहिए सांस

212
00:14:47,440 --> 00:14:51,600
मनुष्य को सांस लेनी है मान लीजिए तो उसको प्रकृति चाहिए, ऑक्सीजन चाहिए

213
00:14:51,600 --> 00:14:55,680
तो वो सांस ले पाएगा। है कि नहीं? है ना?

214
00:14:55,680 --> 00:14:59,680
या फिर उसको इधर उधर चलना फिरना है रोटी खानी तो उसे

215
00:14:59,680 --> 00:15:04,240
ईश्वर से ईश्वर के द्वारा मिलने वाली शक्ति चाहिए तो वो चल फिर पाएगा

216
00:15:04,240 --> 00:15:08,480
अपने भोजन पान की व्यवस्था कर पाएगा तो इस तरीके से जो मनुष्य

217
00:15:08,480 --> 00:15:12,800
है वो निर्भर हो गया ऐसे उदाहरण उदाहरण देते हुए अंतर करिए ईश्वर

218
00:15:12,800 --> 00:15:16,640
ईश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य में जी और

219
00:15:16,640 --> 00:15:20,640
अभी तक आप सवाल पूछने केवल मुझे अभी तक सवाल पूछने का

220
00:15:20,640 --> 00:15:24,640
मौका दिया नहीं अभी समझ रहे हैं आप उस मेरा क्वेश्चन अभी

221
00:15:24,640 --> 00:15:28,720
तक एक भी नहीं आया अब मेरा भी तो अवसर आना चाहिए क्या मैं पूछूं कुछ सवाल

222
00:15:28,720 --> 00:15:32,960
आप सर्वशक्तिमान पे मैं ही सर्वशक्तिमत्ता का हमारी जो बात है वो तो खत्म

223
00:15:32,960 --> 00:15:38,960
हो गई जो हमारी बात है वो तो रह गई

224
00:15:55,000 --> 00:15:59,000
[संगीत]
