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00:00:01:25 पार करता हूं। राजस्व की चोरी प्रशासन की दृष्टि से जो अपराध है वो सबको मालूम है। मगर धर्म शास्त्र में इसके लिए क्या व्यवस्था है कि जो लोग राजस्व की चोरी करते हैं उनको किस प्रकार का दंड मिल सकता है। अभी बताते हैं बैठिए। बहुत अच्छा राजस्व की चोरी बहुत ऊपर की बात थोड़ा सुनिए ध्यान पूर्व पर श्रीमद् भागवत सातवा स्कंध

00:00:39:15 नारद जी ने क्या कहा जो को कहते हैं ना संस्कृत में अहिंसा सत्य शौर्य नारद जी ने उनसे बहुत ऊंची बात कही। हमारे यहां तो चोर किसको कहा गया या मत ज नाम अधिकम दंड कैसे कब्जे हमारे यहां पड़ सकता था। अगर आध्यात्मिक मनीषियों के उपदेश पर हम चलते होते नारद जी ने कहा हे युधिष्ठित श्रीमद् भागवत सप्तम स्कंध जिससे पेट भर जाए परिवार चल जाए पित अतिथि कार्यों का निर्वाह सामान्य रीति से हो जाए उससे अधिक अपने द्वारा आदित संपत्ति का भी जो स्वामी मानता है उससे सेन है दंडाधिकारी के द्वारा दंड पाने योग्य है। राजन की बात छोड़ दीजिए। बहुत ऊंची चीज है। नारद जी ने क्या कहा? कबीर दास जी को पूछ लीजिए। सच ना दीजिए जाने कुटुंब समाए। मैं भी भूखा ना

00:01:54:16 रहूं। साधना भूखा जाए। नारद जी ने कह दिया या जठना उसमें अपना और रिश्तेदार परिवार के पेट भर जाए इससे अधिक संपत्ति पर भले ही उसने अर्जित किया हो अपना स्वामित्व मानता है वो है दंडाधिकारी का दायित्व उसको दंड दे दंड की विधा क्या होनी चाहिए महाभारत उद्योग पर विदुर जी गटरास को बोलते हैं सॉन्ग सुन रहे हैं ना क्या वो प्रोफेसर विराज जी सुनो दो प्रकार के व्यक्तियों के गले में वजनदार पत्थर मजबूत रस्सी से अच्छी प्रकार बांधकर धंधाधिकारी का कर्तव्य जलाशय में डूबा दे धनवंत मदातारम दरिद्र तपस्वम धनी होकर के अपनी संपत्ति का यथा योग्य विभाग ना करने वाला रिश्तेदार नातेदार सेवक समाज इन सबके लिए और दरिद्र होकर धन चाहता हुआ भी हाथ

00:03:09:22 पर हाथ रखने वाला स्वस्थ भी है धन भी चाहता है कोई दे दे लेकिन हाथ पांव नहीं चलाता उद्योग पर नहीं है उन गरीबों को भी बार-बार समझाने पर भी चेतता नहीं है ऐसे दरिद्र को भी और ऐसे धनी को भी जो अपने लिए 10 प्री के लिए धन जोड़ता है लेकिन 10 व्यक्ति को स्वावलंबी सुबुद्ध बनाने का अभियान नहीं है। दंडाधिकारी का कर्तव्य है कि दोनों के गल गले बदनाम समुद्र में डूबा दे। ये हमारे यहां दंड की विदा है। इसके सामने कौन? आराम सुनिए। यात्रा के समय कायव्य का नाम लीजिए गौतम का अनिष्ट नहीं होगा गौतम महसी और एक डाकू का नाम है काय महाभारत आपको कमरेज में क्या दिखेगा अभी नेपाल में गया था एक ही प्रल चरमराने लग गया वीर गया ने अपना आदमी भेजकर प्रणाम करवाया सुनिए हमारे यहां

00:04:18:16 अर्थशास्त्र की दृष्टि से विचार करें तो यह दोनों दंड के अधिकारी बता दिए गए। धनी होकर भी एक डाकू था कायव्य महाभारत कायव्य नामक डाकू। किसी धना को जो अपने लिए जिस पढ़ के लिए धन धमा करता था वो अपने दूतों के द्वारा संभल जाइए। आपका धन केवल आपको भोग के लिए नहीं है। यथा योग विनियोग होना चाहिए। दो तीन बार सावधान होने पर भी अगर वह नहीं धना चेता था डाका डालता और किसी स्त्री के सिर का पर नहीं करता उसे जान से नहीं मारता था और दानेदाने के लिए मोहताज हो जाए ऐसा भी नहीं उचित धन उसके पास छोड़ के बाकी सब धन बटोर लेता था वो बटोरे हुए धन का एक अंश भी अपने जीवन या परिवार के लिए उपयोग नहीं करता था। जहां जहां कमी समाज में थी क्षतिग्रस्त जो व्यक्ति थे हार को चलाने पर भी भपती जिनको सुलभ नहीं थी उनको बांट देता।

00:05:33:20 उसका नाम कायव्य है। वेदव्यास जी ने लिखा है कायव्य का नाम लेकर कोई यात्रा करे सिंह व्या तस्कर किसी की दाल नहीं गलेगी। मैं तो यात्रा करता हूं तो गौतम और काव्य का नाम लेते और सुनिए उस क्षेत्र के जितने डाकू लोग थे छोटेोटे सब आ गए। सब ने कहा कि आपको अपना सरदार बनाना चाहते हैं। उन्होंने कहा बन सकता हूं। उर्दू में बोले तो बेशक बन तो सकता हूं लेकिन दाता में लाई हुई सामग्री के तुम या तुम्हारे परिवार के व्यक्ति भोगता नहीं होंगे। किसी के स्त्री के शील का वरण नहीं करोगे। किसी को जान से नहीं मारोगे। जिसका धन लूटोगे उसे भी दाने दाने के लिए मोहताज नहीं बनाओगे और सचमुच में जो अपने धन का सदुपयोग ना करता हो दुरुपयोग ही करता हो उसी का धन मेरे नेतृत्व में हरकोगे तो तुम्हारे तुम्हारा हम सरदार बन सकते हैं ऐसे ही हुआ मरने के बाद उसको स्वाद मिला ये है हमारे यहां माने दों से दल छीनो और जहां आवश्यकता है दो आपको मैंने बता दिया

00:06:48:24 फिर राजस्व तो बहुत चीज है। राजस्व तो राजस्व का अर्थ भी मैं शुक्र नीति पढ़ रहा था लिख नहीं रहा। एक मैं लिख रहा हूं राज धर्म राजसत्व पर ही आज मेरा प्रकरण था पहले जो मैं पढ़ रहा था राजा को शासक को शुक्र नीति के अनुसार सेवक और स्वामी दोनों माना गया जनता के द्वारा उचित कर से जनता की सेवा करता है और अपना जीवन यापन करता जनता का वेतन भोगी हो गया। प्रधानमंत्री हो, राष्ट्रपति सुन ले मानद राशि भले ही नाम रख नहीं लिए लेकिन वेतन भोगी हो गए या नहीं? जनता से आपको कर प्राप्त हुआ है। उस कर में भी जनता के हित में उसका उपयोग कीजिए। सविता गोभी रसम भूमते। सूर्य भगवान अपनी रश्मियों के द्वारा जलाशय के जल को कर्षित करते हैं। उसको दिव्य पवित्र पर्याप्त बनाकर वर्ष देते हैं। लेकिन राधा

00:08:04:07 जो अपना जीवन यापन करेगा वो तो परिवार का पोषण करेगा। परिककर का पोषण करेगा। समाज से प्राप्त राजस्व कर के द्वारा ही करेगा ना। तो जितने राजस्व के उपभोक्ता होने का उसको अधिकार प्राप्त है उतने राजस्व का अगर उपयोग उपभोग करता है तो दंड का पात्र क्योंकि उसकी जीता से चल रही अब मान लीजिए हमें नौकरी तो नहीं कर सकता हमको अन्य जगह कौन देगा लौकिक दृष्टि से विचार करते आप लोग देते ही अभी उसमें हमारा अधिकार है या नहीं अगर हम व्यापार करते तो आप फिया लोग तो ठप हो जाते एक एक कहावत ही मालूम है आपको सुनिए बिरला जी का बिरला जी का एक मैनेजर सच्ची घटना है बिरला जी का एक मैनेजर था ब्राह्मण उस मैनेजर को भी शायद मैंने देखा है वो ब्राह्मणों की भर्ती करता जाता था फैक्ट्री पे बिरला जी को शिकायत की ये जातिवादी है सब ब्राह्मणों को भर रहा है बिरला जी ने कहा क्यों पंडित जी आप इसीलिए रखा कि अपनी बिरली को उन्होंने ने कहा आप धन कमाना चाहते हैं या कंगार होना चाहते? अरे

00:09:19:08 भाई क्या बात है सुनिए ब्राह्मण के अलावा किसी को मैं रखूं 500 के स्थान पर 1500 लेगा और शोषण कर लेगा। 1500 के स्थान पर 500 700 पे काम करता है। इससे बढ़िया कौन मिलेगा? आपके धन में वृद्धि हो रही है या नहीं? उन्होंने कहा बिल्कुल ठीक। बिल्कुल ठीक कहते हो। दूसरा सुनेगा हमारे पूज्य गुरुदेव के गुरुदेव ब्रह्मानंद जी महाराज कहते थे सभा में सब मत कहना ऐसा लाओ नर पीर बर्ची भती खा

00:09:58:16 ऐसा लाओ नर पीर बर्ची भती खा ब्राह्मण में सारा लक्षण है पीर के स्थान पर पीर पाव भी कुजवा लेगा बवरची समझ गए भती और भार भी धो लेगा ऐसा लाओ नर इसका मतलब जितनी विद्या जितनी कला उसमें पारलत होते थे या नहीं तो हमने क्या संकेत किया राजत्व पर हमने कहा राजा को समाज से प्राप्त कर का जितने अंश में उपभोग का अधिकार शास्त्रों ने दिया है उतने अंश में अपने लिए उपभोग करता है तो वो दंड का पात्र नहीं है अतिरिक्त उपभोग करता है बल्कि शुक्र नीति पहला अध्याय पढ़िए वार्षिक आमदनी जिसके सामंत से लेकर चक्रवर्ती नरेंद्र तक सम्राट सार्वभौम सम्राट तक का वर्णन है। राजस्व को लेकर आपने राजस्व तक पूछा तो मैं भी उत्तर दे रहा हूं। सबसे नीचे का सामन वार्षिक आय एक दो लाख यहां से होते हुए सार्वभौम सम्राट चक्रवर्ती सम्राट तक और राजस्व जिसको जितना मिलता है राजा ने सामंत से लेकर होते होते मांडलिक ये

00:11:13:20 सब होते होते अंत में क्या होता है सबसे ऊंचा पद कौन होता है चारम सम्राट चक्रवर्ती नरेंद्र वो क्या है समाज टैक्स में अधिक से अधिक धन क्रमश बढ़ता गया तो पद भी बढ़ता गया लेकिन वो राजस्व का सारा भोक्ता नहीं बन सकता। राजस्व का उपयोग फिर जन कल्याण के लिए करता है। इसलिए मैंने यह संकेत किया। तो जितने अंशों में शुक्र नीति जगदीश मिश्र डॉक्टर जगदीश मिश्र जी ने बहुत अच्छा संस्कृत में भी अर्ज किया हिंदी में भी चौखंबा से प्रकाशित को पढ़ लीजिए। राजस्व के लिए बहुत बढ़िया है। राजा को अपने शासन के क्षेत्र से जितना कर मिलता उसका नाम राजस्व है। उस राजस्व का उपयोग उसको फिर समाज के पोषण के लिए शिक्षण रक्षण आदि संस्थानों की दृष्टि से गौरक्ष वाणिज्य इत्यादि की दृष्टि से लेकिन जितने राजस्व का उपभोक्ता उसको शास्त्र के अनुसार बनना चाहिए। उतने राजस्व का उपभोक्ता होने पर दंड का पात्र नहीं तो वही कंगाल हो जाएगा। प्रशासन क्या करेगा? यह हुआ।

00:12:29:20 बहुत समय हो गया तो [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 12:37 · 14 Jul 2026

श्रीमज्जगद्‌गुरु-शङ्कराचार्य महाभाग जी ने बताया — चोरी करने वालों को कैसी सजा मिलनी चाहिए?

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