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00:00:01:28 [घंटी की आवाज़] सभी को जय श्री राम। आजकल आर्य समाजियों के द्वारा शंकर परंपरा की प्रामाणिकता को लेकर के प्रश्न उठाए गए हैं। दो उनमें से एक प्रश्न तो अग्निव्रत जी के द्वारा उठाया गया था। जो हमारी चर्चा हुई थी अवतारवाद के निमित्त उसके मध्य में उन्होंने प्रश्न उठाया था। उनका प्रश्न था कि व्यास जी से लेकर और जो गॉड पादाचार्य हैं उनके बीच में कई पीढ़ियां होनी चाहिए क्योंकि समय बहुत लंबा है परंतु आपने गुरुओं के नाम बताए हैं केवल एक या दो तो ऐसा क्यों शंकराचार्य को व्यास जी तक जोड़िए व्यास हां जोड़ रहा हूं जोड़ रहा हूं जोड़ रहा हूं अगर पीछे चलते हुए चले तो उनसे पहले वाले हैं गोविंद योगेंद्र मत्स्य उनसे पहले गडपाद उससे पहले सुखदेव जी उससे पहले व्यासदेव जी उससे पहले पाराशर जी उससे पहले शक्ति उससे पहले वशिष्ठ एक मिनट उससे पहले पद भवम उससे पहले नारायण जी कितने कितने कितने खा गए बीच में आप व्यास जी और शंकराचार्य जी की चार पीढ़ी बताई आपने यह प्रश्न उन्होंने उठा उन्होंने उठाया था चर्चा के बीच में और एक दूसरा प्रश्न है जो मुझे तार्किक लगता है और मुझे लगता है कि जनसामान्य को इसका निराकरण प्राप्त होना चाहिए वो तार्किक है कि जब सुखदेव जी को द्वापर
00:01:17:10 में ही मोक्ष की प्राप्ति हो गई थी तो फिर वह कलयुग में गॉड पादाचार्य जी को उपदेश करने कैसे आ सकते हैं जब उन्हें मोक्ष मिल गया था द्वापर तो यह प्रश्न तार्किक है जिसमें कि कोई भी सामान्य व्यक्ति उलझ सकता है तो उसको इसका निराकरण प्राप्त होना चाहिए। तो इसका मैं आज यहां पर समाधान प्रस्तुत कर रहा हूं। हालांकि यह प्रश्न जो अलंकार समाज का वह जो गुंडा है ऋषि उवाच उसके द्वारा पहले उठाया जा चुका है और हम इसका समाधान भी प्रस्तुत कर चुके हैं। परंतु बहुत पुरानी बात हो चुकी है और कुछ नए तथ्यों के साथ कुछ और नई समीक्षात्मक टिप्पणियों के साथ आज मैं उसका समाधान प्रस्तुत कर रहा हूं। तो सबसे पहले बात करें अग्निव्रत जी के द्वारा उठाए गए प्रश्न की कि इतने कम गुरुओं के नाम क्यों व्यास जी से लेकर के और गॉड पादाचार्य जी के बीच में तो यहां पर क्या है अग्निव्रत जी का यह जो प्रश्न है अपने आप में ही स्वयं का ही खंडन करने वाला क्यों है क्योंकि अगर कम गुरुओं की बात है तो फिर यह प्रश्न चिन्ह तो व्यास जी पर भी लग जाता है। अगर कम गुरुओं की ही बात है तो व्यास जी से लेकर के और नारायण तक के जो गुरुओं के नाम बताए जा रहे हैं वो भी बहुत कम है। सात
00:02:32:19 से आठ नाम है गुरुओं के। तो वहां पर उन्होंने प्रश्न क्यों नहीं किया? क्योंकि व्यास जी पर आश्रित तो वो भी हैं। व्यास जी की प्रमाणिकता पर कैसे चिन्ह लगा लें? क्योंकि व्यास जी को लेकर के तो वह यह भी नहीं कह सकते कि हम व्यास जी से भी मतभेद रखते हैं। हां व्यास जी के द्वारा जो लिखित ग्रंथ हैं व्यास जी के नाम से उनमें से कई ग्रंथों को हम जो है ऐसा मानते हैं कि वो सभी ग्रंथ जो है व्यास जी के नाम से भ्रामक लिखे गए हैं। परंतु व्यास जी पर आश्रित तो वो भी है। तो इसलिए व्यास जी की प्रमाणिकता पर उंगली कैसे उठा सकते हैं? वरना जो यह वाली बात है कि इस काल से इस काल के बीच में इतनी लंबी अवधि है वहां पर कुछ गुरुओं के नाम ही क्यों आ रहे हैं? तो यह प्रश्न तो तब भी उठ सकता है जब हम अपनी परंपरा व्यास जी के पीछे से बताते हैं और सृष्टि के प्रारंभ में नारायण से उपदेश मिला ब्रह्मा जी को, ब्रह्मा जी से वशिष्ठ जी को, वशिष्ठ जी से शक्ति को, शक्ति से पारासर को, पारासर से व्यास जी को, व्यास जी से सुखदेव जी को। तो व्यास जी की प्रामाणिकता उन्होंने क्यों नहीं पूछी? कहां सतयुग से लेकर के और कहां द्वापर तक चले आए केवल पांच छह नाम तब वहां पर इन्होंने प्रामाणिकता क्यों नहीं पूछी इसलिए नहीं पूछी क्योंकि उस उनको अप्रामाणिक कह देंगे तब तो हमारा खेल ही खत्म हो
00:03:47:22 जाएगा तब तो उनके द्वारा लिखे हुए जो प्राप्त हमारे वो आर्ष ग्रंथ है उन सब की प्रमाणिकता पर चिन्ह उड़ जाएगा ना तो इसलिए उन्होंने व्यास जी के पीछे की बात नहीं पूछी अच्छा दूसरा इन्होंने आत्म विरोध कैसे किया हमारे शास्त्रों में कई जगह ये वर्णन है कि जब कोई व्यक्ति परमहंस हो जाता है, सिद्ध हो जाता है, योगी हो जाता है, तब उसका जो पंच भौतिक शरीर है, वह दिव्य गुण संपन्न हो जाता है। लोकर में वो ट्रैवल कर सकता है। वो परकाया प्रवेश कर सकता है। वह जब तक चाहे अपनी जो अपना जो शरीर है उसको किशोर अवस्था में रख सकता है। सारे गुण उसमें आ जाते हैं। एक योगी के पास जो सिद्ध हो जाता है। तो ये हमारे शास्त्रों में वर्णन है। अब जो साधारण आर्य समाजी हैं वो इस प्रकार के चमत्कारिक शरीर को प्राप्त करना मानते हैं कि नहीं मानते इस बारे में मैं कंफर्म नहीं हूं। परंतु जो ये वैदिक रश्मि थ्योरी वाले जो अग्निव्रत जी हैं वह जरूर मानते हैं कि ऐसे दैय गुण संपन्न शरीर हो सकते हैं। जहां तक मेरी जानकारी है हनुमान जी के विषय में जो सामान्य आर्य समाज है उसको लेकर के वैचारिक मतभेद है अग्निव्रत जी और सामान्य आर्य समाज में इन्हीं
00:05:03:01 बातों को लेकर के कि हनुमान जी ने अपना शरीर कैसे बढ़ाया है? वो उड़ के गए थे कि नहीं गए थे। तो यह सब बातें तो अग्निज जी भी स्वीकार करते हैं कि ऐसे चमत्कारिक दैय परिवर्तन आ सकते हैं एक मनुष्य के शरीर में। तो फिर उनका यह प्रश्न जो है अपने ही विरोध में हो जाता है कि भाई इतने कम गुरु कैसे? जब उसके अंदर दैय गुण आ सकते हैं तो कोई ऐसा मनुष्य हो सकता है जो दीर्घकाल तक जीवित रहे। अह सतयुग से लेकर के और त्रेता में ज्ञान देने वाले वशिष्ठ जी हो। या फिर त्रेता से लेकर के और क्या कहते हैं? द्वापर में ज्ञान देने वाले आगे के गुरु हो। तो यह आत्म विरोध में ही होता है। तो इसलिए मुझे प्रश्न बहुत इंपॉर्टेंट नहीं लगा। हालांकि आप देख सकते हैं कि जब मैं वहां पर निराकरण प्रस्तुत करने वाला था तो उन्होंने खुद ही इस भय के कारण कि अच्छा खासा कहीं पर मैंने कोई एक प्रश्न उठा दिया है और ऐसा ना हो कि यह इसका उत्तर देकर के अपनी प्रामाणिकता पुनः सिद्ध कर दे और फिर दोबारा से वही प्रश्न करने लग जाए। तो उस बात से बचने के लिए उन्होंने सीधे तौर पर फिर से विषयंतर किया। पहले पूछा कि भाई इतने कम गुरु क्यों? इतनी सारी पीढ़ी खा गए आप और जब मैं बताने जा
00:06:18:04 रहा हूं अरे आप वो छोड़ो इस मंत्र का अर्थ बताओ कितने कितने खा गए बीच में आप व्यास जी और शंकराचार्य जी की चार पीढ़ी बताई आपने देखिए यहां पे दो बातें होती है मैं बताता हूं दो बीच में टूट गई परंपरा दो दो आंसर है ना टूटेगी नहीं टूटेगी चार पीढ़ी है चार पीढ़ी पहले एक होता है मतानुज्ञा निग्रह स्थान कि अगर मैंने कहा कि आप अंधे हो तो आपने कह दिया तू भी तो गूंगा है। मेरे गूंगे होने से आपका अंधा ना होना सिद्ध नहीं होता। पहली बात आप मेरे को अप्रामाणिक कह रहे हैं मगर आप अपनी प्रामाणिकता के लिए भी मेरी अप्रामाणिकता को ही आधार बता रहे हैं। अगर मैं अप्रामाणिक हूं इसका मतलब बिना क्वेश्चन किए आपको मान लेना चाहिए। तो एक पहली बात अभी अभी आंसर नहीं पूछना चाहिए। आंसर आंसर आंसर पूरा नहीं हुआ है। आंसर पूरा नहीं हुआ है। आंसर पूरा आंसर पूरा नहीं हुआ है। आंसर पूरा नहीं हुआ है। बातें बंद कर अर्थ की बात करिए। पूरी बात बता रहा हूं। यह बातें बंद क्यों करें? जहांजहां पे उनके फंसने की बात थी वहां वहां पे वो छोड़ने की बात करने लगे कि छोड़ो छोड़ो छोड़ो। अरे भाई आप ही तो प्रश्न कर रहे हो। फिर आप ही छोड़ने की बात कर रहे हो। ऐसा नहीं करना चाहिए। खैर इसके अलावा एक चीज और है जो साधारण जो लोग दिव्य गुण संपन्न होना शरीर का नहीं मानते
00:07:33:06 हैं आर्य समाजी उनके लिए मैं एक फैक्ट बताता चलूं। तर्क है ना जो लोग ये मानते हैं कि इतनी लंबी आयु कैसे हो सकती है? तो उनसे मेरा प्रश्न है कि जब ईश्वर मनुष्य की रचना करता है चार मनुष्यों की तो ईश्वर जड़ को एकत्रित करके पंच तत्वों से शरीर बनाता है तो उस समय तो उन उन तत्वों में प्राण होते नहीं है पर वो बनाता है शरीर बनाता है उसमें प्राण डाल देता है तो क्या ऐसा संभव नहीं है कि आपके हिसाब से जो आयु मान्य है किसी शरीर की मान लीजिए आपके हिसाब से मैक्सिमम आयु मान्य है 200 वर्ष या 100 वर्ष तो जब ईश्वर यहां वहां पड़े हुए जो प्रकृति के कण हैं उनको बटोर कर उनमें प्राण डालकर चेतना डाल सकता है। जीव जीव को उसमें डाल सकता है। तो क्या जो शरीर पहले से बना हुआ है उन्हीं पंच तत्वों से जो आपके अनुसार अभी मृत्यु को प्राप्त होने के कगार पर पहुंच चुका है। उसी शरीर की आयु को कंटिन्यू नहीं रख सकता है। उसी में व्यवस्था आगे नहीं कर सकता है। भाई जब ईश्वर के पास ये शक्ति है कि जो शरीर अभी मृत्यु को प्राप्त होने वाला है, मिट्टी में मिल जाने वाला है। वहीं से उसी मिट्टी को उठा करके वो पुनः शरीर निर्माण करके उसमें चेतना डाल दे। तो जो पहले
00:08:48:07 से बना हुआ है शरीर और क्या कहते हैं? अभी वह मृत्यु को प्राप्त होने वाला है। उसमें मिलने वाला है। तो उसमें जो पहले से प्राण और चेतना उसने डाल रखी है। जीव को उससे जोड़ रखा है। तो क्या वो उसी को उसी शरीर की व्यवस्था ऐसी नहीं कर सकता कि वो आगे और कंटिन्यू जीता रहे। और हर 100 वर्ष बाद वह ऐसी व्यवस्था करता रहे कि भाई जीता रहे तो यह आपका तार्किक उत्तर हो गया आर्य समाजियों का। ठीक है? अब जो मुख्य प्रश्न है कि जब सुखदेव जी का मोक्ष द्वापर में ही हो गया है तो वह कलयुग में गॉड पादाचार्य जी को उपदेश करने कैसे आ सकते हैं? मोक्ष से वापस आना इसका मतलब मोक्ष नहीं हुआ। तो इसके निराकरण में मैं सबसे पहले आप लोगों को यह बताना चाहूंगा कि ये जो प्रश्न है ये प्रश्न आर्य समाज के द्वारा और वो भी इस रूप में कि गॉड पादाचार्य जी को उपदेश कैसे मिला? इस रूप में नहीं यह प्रश्न आर्य समाज के द्वारा दूसरे विषय वस्तु को लेकर के पहले भी उठाया जा चुका है। उसमें परंपरा की प्रमाणिकता पर निशाना नहीं था। उसमें निशाना था भागवत की प्रमाणिकता पर क्योंकि भागवत में भी सुखदेव जी ने परीक्षित जी को उपदेश किया है। जबकि
00:10:03:25 सुखदेव जी की जो सुखदेव जी का जो मोक्ष है वह परीक्षित जी के जन्म से पहले महाभारत के युद्ध से कई वर्ष पहले 96 वर्ष पहले हो चुका था। तो आर्य समाजियों द्वारा यह प्रश्न उठाया गया कि भाई जब सुखदेव जी का मोक्ष 96 वर्ष पूर्व महाभारत के युद्ध से हो चुका है और परीक्षित जी के जन्म से पूर्व हो चुका है तो फिर वह कैसे परीक्षित जी को आकर के उपदेश दे रहे हैं। तो यह भागवत की प्रामाणिकता को लेकर के भी यह प्रश्न पहले ही उठाया जा चुका है। जिसका निराकरण हमारे जो पारंपरिक आचार्य गण हैं समय-समय पर देते रहे हैं। वही आज मैं दे रहा हूं। पहली बात तो यह है कि जहां पर सुखदेव जी के मोक्ष का वर्णन आया है, वहां पर लिखा हुआ है कि वह सदैव ब्रह्म भूत हुए थे। सदैव ब्रह्मलीन हुए थे। और हमारे शास्त्रों में ही नहीं आर्य समाधियों के शास्त्रों में भी ऐसा वर्णन कई जगह मिलता है जहां पर वही वाली बात है कि जो योगी हो जाता है परमहंस को प्राप्त कर लेता है परमहंस पद को प्राप्त कर लेता है अलग-अलग दूसरे शब्दों में इस बात को स्वीकार किया गया है कि ऐसा शरीर वो प्राप्त कर सकता है कोई मनुष्य कोई जीव जिससे कि वो लोकर में ट्रैवल कर सके और सुखदेव जी का जो मोक्ष
00:11:19:01 हुआ था ब्रह्म ब्रह्म भूत वाला लिखा हुआ है वहां पर मोक्ष और वह सदैव मोक्ष में गए थे। तो यदि उनका अह जो हमारे शास्त्रों में वर्णन आता है सारूप्य सायोज्य, सालोक्य, सामीप्य इत्यादि यदि मोक्ष माना जाए द्वैत भाव के अनुसार यदि मोक्ष माना जाए तब भी जो मोक्ष को प्राप्त होने वाला, जो परमहंस को प्राप्त परमहंस पद को प्राप्त करने वाला जो जीव है वह लोक लोकांतर में ट्रैवल करने की सामर्थ रखता है। परकाया प्रवेश करने की सामर्थ रखता है। और जब तक चाहे अपनी देह को जिस रूप में रखना चाहता है उस रूप में रखने की सामर्थ रखता है। और यह सारी बातें हमारे शास्त्रों सहित आर्य समाजी के शास्त्रों में भी लिखी हुई है। कहां लिखी हुई है? सबसे पहले आर्य समाजियों के शास्त्रों में देखते हैं। यजुर्वेद भाष्य दयानंद जी का जो यजुर्वेद भाष्य है उसमें है 1767 उसमें भावार्थ में लिखा है जब मनुष्य अपनी आत्मा के साथ परमात्मा के योग को प्राप्त कर लेता है तब वह सिद्धि उत्पन्न होती है उसके पीछे कहीं से ना रुकने वाली गति से अभीष्ट स्थानों को जा सकता है अन्यथा नहीं ठीक है आगे
00:12:34:14 यजुर्वेद भाष्य 1768 इसमें लिखा है जो अच्छे पंडित योगी जन योगाभ्यास के पूर्ण नियम करते हुए करते हुए के समान अत्यंत सुख की अपेक्षा करते हैं। वह आकाश और पृथ्वी को चढ़ जाते हैं। अर्थात लोकांतरों में इच्छा पूर्वक चले जाते हैं। 17 71 का यजुर्वेद भाष्य 1771 का भावार्थ पढ़ रहा हूं। जो योगी पुरुष तप स्वाध्याय और ईश्वर आदि ईश्वर के साथ योग के साधनों से योग धारणा ध्यान समाधि रूप संयम के बल को प्राप्त हो और अनेक प्राणियों के शरीरों में प्रवेश करके अनेक सिर नेत्र आदि अंगों से देखने आदि कार्यों को कर सकता है। अनेक पदार्थों व धनों का स्वामी हो सकता है। उसका हम लोगों को अवश्य सेवन करना चाहिए। यह यजुर्वेद भाष्य में दयानंद जी लिख रहे हैं। 17 71 भावार्थ में यह तो रहा अगर आर्य समाज की बात की जाए कि क्या अह ऐसा शरीर धारण किया जा सकता है योगी जब वो दिव्य गुण गुणों से संपन्न हो जाए तो यह तो आर्य समाज के द्वारा हो गया। अब जो है जो परंपरा प्राप्त आचार्यों के द्वारा स्वीकार है। उनसे पहले एक एक
00:13:50:04 भाष्य और बता दूं। दयानंद जी के शिष्य हैं पंडित भीमसेन शर्मा जी। उनका भाष्य है श्वेता शत्रोपनिषद पर। उसमें दो 12 में वह लिख रहे हैं अपने शरीरस्थ पृथ्वी तेज वायु और आकाश रूप पंच तत्वों के निकृष्ट मलिनांश का नाश होने पर शुद्धांश की प्रबलता व उन्नति होने से इस प्रकार दिव्य गंधादि विषयों में प्रकृष्ट साक्षात प्रवृत्ति होने पर अर्थात ज्ञानेंद्रियों के द्वारा सूक्ष्म व्यवहित और अति दूर के शब्दों शब्दादि विषयों का साक्षात बोध होने की शक्ति प्रकट होने पर पंच तत्व की शुद्धि द्वारा योगाग्नि रूप शरीर को प्राप्त हुए योगी पुरुष को ना रोग ना निर्बलता ना मृत्यु सताती है। भावार्थ क्या लिखा है? योगी का शरीर सहस्त्र वर्ष ठहरने वाला अविनाशी हो जाता है। तो वो जो सहस्त्रों वर्षों वाली बात थी ना कि इतने साल तक एक ही गुरु कैसे इसमें आपका जवाब मिल गया। यद्यपि आप और मैं इस मामले में सहमत हैं। मुझे जहां तक जानकारी है कि ऐसा दिव्य गुण संपन्न शरीर हो सकता है। अब पता नहीं वो इन बातों का विरोध क्यों कर रहा है आर्य समाज वो एक अलग विषय हो जाएगा। हालांकि यह उनके ग्रंथ में लिखा हुआ है।
00:15:05:10 अब परंपरा प्राप्त आचार्यों द्वारा स्वीकार जो प्रमाण है वह भी दे देता हूं कि सुखदेव जी के पास वह दिव्य गुण आ गए थे कि नहीं आ गए थे। तो सुखदेव जी की आयु महाभारत शांति पर्व 233 सुखदेव जी का जो मोक्ष लिखा हुआ है कैसे लिखा है देखिए सुखदेव जी वायु से ऊंची अंतरिक्ष में चले चल सकने वाली गति को बनाकर अपना प्रभाव दिखाते हुए ब्रह्म भाव को प्राप्त हो गए। ठीक है? भागवत में लिखा हुआ है इसी अवसर में निष्काम विचरते हुए अलक्षित शरीर वाले आत्म संतुष्ट अवधूत वेशधारी व्यास पुत्र सुखदेव जी आए जो 16 वर्ष के बालक विदित होते थे। उनके चरण कर उर्व भुजा सुकोमल कपोल एवं सब अंग परम मनोहर थे। सुखदेव जी को देखकर सब ऋषि मुनि अपने दो आसनों से उठे तथा राजा ने सुखदेव जी का पूजन करके कहा मालूम होता है कि श्री कृष्ण भगवान की भगवान ही मुझ पर प्रसन्न हो गए हैं। भागवत में लिखा है कहां लिखा है? 1 1936 में तो यदि ऐसा ना होता तो
00:16:20:19 जिनकी गति चलना फिरना अव्यक्त प्रत्यक्ष नहीं उन आप जैसे मुक्त पुरुष का दर्शन हम मनुष्यों को क्यों कर हो सकता था? यह भागवत में लिखा है एक 1936 में। उपयुक्त श्लोकों में अलक्ष लिंग और अव्यक्त गति आदि विशेषणों से सुखदेव जी को पांच भौतिक शरीर धारी मनुष्यों से विलक्षण दिव्य देह संपन्न कहा है। योगी लोग स्वेच्छा से मुमुक्षु जनों के हितार्थ दर्शन दिया करते हैं। वह संकल्प मात्र से जिस लोक में जिस रूप में जब चाहे जा सकते हैं। ठीक है? अब अगर यह तो रही बात आर्य समाज की कि आर्य समाज के अनुसार क्या इस प्रकार का शरीर प्राप्त हो सकता है कि नहीं धारण हो सकता है कि नहीं और मोक्ष में जाने वाला व्यक्ति किस प्रकार से वो दिव्य गुणों से संपन्न हो के और यदि जो द्वैत भाव के आधार पर मोक्ष माना जाए तो वह किस प्रकार से उपदेश के लिए आ सकता है वो पता चल गया। इसके बाद यदि आर्य समाज के भी मोक्ष को मान लिया जाए तब भी जो है सुखदेव जी द्वारा परीक्षित जी को उपदेश दिया जाना अथवा गॉड पादाचार्य जी को उपदेश दिए जाने का निषेध प्राप्त नहीं होगा कैसे नहीं होगा आर्य
00:17:36:00 समाज के मोक्ष के अनुसार भी जो जीव होता है वह परांत काल के बाद वापस आता है दोबारा पुनः प्रकट होता है तो जब वह वापस आता है तो अब इसमें एक ही दिक्कत आती है कि भाई इतने कम समय में कैसे वापस आ गया इतने कम समय में वापस कैसे आ सकता है कि उसकी अभी कुछ ही वर्षों पहले तो उसका परलोक गमन हुआ है और अभी आ गया परीक्षित जी को देने के लिए आ गया 3000 वर्षों के अंतराल में जो है वो गॉड पादाचार्य जी को उपदेश देने के लिए कैसे आ सकता है परांत काल तो बहुत लंबा है तो इसमें मुझे एक वीडियो प्राप्त था योगेश भारद्वाज जी का उन्होंने अपने वीडियो में बताया था कि स्वर्ग और नरक की वो व्याख्या कर रहे थे तो बता रहे थे कि स्वर्ग क्या होता है आर्य समाज के अनुसार कि जो व्यक्ति आज कलयुग में है उसको यदि किसी और ब्रह्मांड में जहां पर इस समय सतयुग चल रहा होगा वहां पहुंचा दिया जाएगा तो उसके लिए स्वर्ग होगा। इसी प्रकार से वहां पर जो सतयुग में है और उसने पाप किया और उसको जो है नरक में भेजना है तो उसको उस ब्रह्मांड से जिस ब्रह्मांड में कलयुग चल रहा होगा वहां पर पहुंचा दिया जाएगा। तो वो उसके लिए हो जाएगा नरक। सतयुग वाला अगर कलयुग में आ जाएगा। ऐसी व्याख्या वो कर रहे थे। इसका अर्थ यह है कि जहां परांत काल
00:18:51:08 समाप्त होने वाला है वहां पर जो सुखदेव है वह अगर इस ब्रह्मांड में आएंगे है ना वो इस ब्रह्मांड में आकर के जो जिनका परांत काल समाप्त हो गया है वो इस ब्रह्मांड में आकर के सुखदेव परीक्षित जी को और गॉड पादाचार्य जी को ज्ञान दे सकते हैं। ठीक है? यह भी एक हो गया। तो आर्य समाज के मोक्ष से भी उपदेश का निषेध प्राप्त नहीं होता। अब जो आया सबसे सॉलिड प्रश्न वह आएगा कि भाई आप तो मोक्ष मानते हो वाला कैवल्य को। तो अगर कैवल्य के अनुसार मोक्ष हो गया तब तो वो बिल्कुल नहीं आ सकता। चलो द्वैत द्वैत के अनुसार तो बैकुंठ से आवागमन कर भी रहा है। तो ये भी एक जिज्ञासा हो सकती है। तो इसमें क्या है कि सबसे पहले तो आप अद्वैत के सिद्धांत को जानिए। अद्वैत का सिद्धांत क्या है? एक ही परम तत्व जीव जगत और जगदीश्वर बन करके प्रकट हो रहा है। तो आपके अनुसार यदि सुखदेव जी को मोक्ष प्राप्त हो गया तो वो ब्रह्मीभूत हो गया स्वरूप अपने स्वरूप को उसने प्राप्त कर लिया। तो क्या अब वह पुनः सुखदेव जी के रूप में प्रकट नहीं हो सकता है। अगर आप कहें नहीं नहीं ये सुखदेव जी थोड़ी ना है। ये तो ब्रह्म आए हैं। तो पहले कौन आया था जिसको आपने
00:20:06:12 सुखदेव मान लिया था। तो पुनः जिसमें वह ब्रह्मीभूत हुआ है। क्या वह तत्व दोबारा से जिस रूप में पहले आया था वह पुनः उसी रूप में नहीं आ सकता है? भाई हमारे पास सुखदेव जी को सुखदेव मानने के पैरामीटर्स क्या है? वह शारीरिक प्रतीक चिन्ह जिनके कारण हमने सुखदेव जी को सुखदेव माना। और वह शब्द प्रमाण जिनके कारण हमने सुखदेव जी को सुखदेव माना। तो क्या ईश्वर जब पहले सुखदेव जी के रूप में प्रकट हुआ था और उसने जो जो चिन्ह धारण किए थे ब्रह्म तो वह जब पुनः ऐसा रूप धारण नहीं कर सकता है जिसमें वही सारे चिन्ह हो वही व्यवहार हो वही उसके लक्षण हो और यदि कर लेगा तो व्यवहारिक सत्य हमारा क्या हो जाएगा कि हां जो सुखदेव जी वहां थे वही सुखदेव जी प्रकट हुए हैं। यही तो बात है। परमार्थ के आधार पे व्यवहार का खंडन नहीं होता है। मोक्ष का प्राप्त होना यह पारमार्थिक सत्य है कि मोक्ष प्राप्त हो गया। हमारे व्यवहार का विषय क्या है कि हम किसी व्यक्ति की पहचान उसके रेटिना से उसके फिंगरप्रिंट से इत्यादि चीजों से करते हैं। उसके संबंध में जो हमारे विश्वसनीय शब्द प्रमाण है उनसे करते हैं। नहीं तो
00:21:22:07 यूं तो ब्रह्म ही सब जगह है। जीव जगत तो जगदीश्वर के रूप में प्रकट हुआ है। फिर हमने लोगों में भेद कैसे कर लिया? इसी आधार पर व्यवहारिक सत्य के आधार पर तो इस प्रकार से ना तो आर्य समाज के मोक्ष द्वारा गडपादाचार्य जी को उपदेश देने का निषेध प्राप्त प्राप्त होता है ना ही जो सालोक्य सामि सायुज और सारूप्य मुक्ति है उनके द्वारा सुखदेव जी का गॉड पादाचार्य जी को उपदेश देने का निषेध प्राप्त होता है और ना ही केवल मोक्ष के द्वारा निषेध प्राप्त होता है। यह हो गया निराकरण। अब 100 बात की एक बात यदि आपको हमारी इन बातों पर भरोसा नहीं हो रहा है कि ठीक है आ तो सकते हैं सुखदेव जी मगर आए थे कि नहीं आए थे इस बात को लेकर के हम आपका विश्वास क्यों करें आपने तर्क से युक्ति से प्रमाण से तो सिद्ध कर दिया कि वो आ सकते हैं पर आए थे कि नहीं आए थे इसमें हम आपका आप आप पर विश्वास क्यों करें तो हम कब कह रहे हैं भाई विश्वास करो आप ही तो कह रहे हो कि आप हमसे प्राप्त होने वाले वेदों पर विश्वास करते हो जब हम ये कह रहे हैं कि हमको वेद भगवान से आने वाली परंपरा से मिले हैं तो आप विश्वास कर ले रहे हो क्यों कर रहे हो? विश्वास नहीं है तो बिल्कुल मत करो ना। वेद को प्राप्त होने प्राप्त करने के विषय में स्वतंत्र प्रमाण लाओ। स्वतंत्र स्त्रोत लाओ। आप ही तो कह रहे हो कि हम आपके विश्वसनीय
00:22:37:08 हैं। सवाल ये तब आता है। प्रमाण का सवाल तब आता है। परंपरा का सवाल तब आता है जब आप हमसे ही प्राप्त होने वाले शब्दों के आधार पर हमको ही दबाने का प्रयास करते हो। नहीं तो हम तो सैद्धांतिक चर्चा के लिए तैयार हैं। बताओ ईश्वर कैसे अवतार नहीं ले सकता है? धज्जियां उड़ गई आपकी। आप ला रहे हो ना प्रमाण बीच में कि भाई प्रमाण देखो। अब आपके हिसाब से प्रमाण क्या है? आपके हिसाब से वेद प्रमाण नहीं है। आपके हिसाब से वेद का वो अर्थ प्रमाण है जो आर्य समाज ने स्वीकार किया है। तो हम आर्य समाज से निकाल के आपको प्रमाण कैसे दें? सीधी सी बात है। यदि आपको हमारी बातों पर विश्वास नहीं है, कथाओं पर विश्वास नहीं है, स्मृतियों पर विश्वास नहीं है, तो हमारी किसी भी चीज पर विश्वास मत करो ना। इसे अर्ध कुकुट न्याय कहते हैं। एक ही स्त्रोत की किसी एक बात को मान रहे हो और दूसरी बात को नहीं मान रहे हो। एक बात हम कह रहे हैं कि भैया हमको वेद जो है व्यास जी से मिले हैं वो मान रहे हो। और दूसरी तरफ हम हम कह रहे हैं कि भैया हमको वेद का अर्थ व्यास जी से मिला है तो वो नहीं मान रहे हो। यहां पे आपकी जो कार्यशैली है गतिविधि है वो संदिग्ध हो जाती है। अच्छा अब आप पूछोगे हमारी प्रमाणिकता क्या है? तो आपसे बात करते समय सब हमारी सर्वप्रथम प्रमाणिकता तो यही है कि आप हमारे द्वारा प्राप्त होने वाले वेदों को ईश्वरीय वैदिक क्यों
00:23:52:14 मानते हो अपने आप को आपके द्वारा वेदों को प्रमाण मानना ही हमारी प्रामाणिकता को सिद्ध करता है और आप उसमें बार-बार चर्चा में कह रहे हैं कि नहीं हमें वेदों के अर्थ के लिए तो परंपरा पर विश्वास है तो जो अज्ञानता कर सकता है वो वेद मंत्र नहीं बदल सकता नहीं बदल बताइए क्यों नहीं बदल सकता? इसको तो उनको परंपरा को हमने माना। इसको तो उनको परंपरा को हमने माना। इसको तो उनको परंपरा को हमने माना। अब इसमें मत जाइए। पहले तो जिस परंपरा को आप वेद के मंत्र के लेते समय प्रमाणिक कह रहे हैं। उसी परंपरा के प्रश्न उसी परंपरा की प्रमाणिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा देंगे। जब अर्थ लेने की बात आएगी। यह कैसा दोगलापन है? तो हमारा हमारी प्रामाणिकता का समर्थन आपका वेदों को प्रमाणिक मानना और आपके स्वयं के कथन है। आप उस चर्चा में स्वयं सुनिए। जब हमने आपसे परंपरा पूछी आपकी प्रमाणिकता के लिए तब आपने हमारी परंपरा पर आक्षेप लगाना शुरू कर दिया कि आप अपनी बताओ, अपनी प्रमाणिकता बताओ। और फिर आपका कहना यह है कि यदि तुम हमारी प्रमाणिकता पूछोगे तो हम भी तुम्हारी पूछेंगे। अरे भाई हम थोड़ी ना कह रहे हैं कि हमें वेद
00:25:07:20 तुमसे मिले। हम तो स्वतंत्र रूप से वेदों का प्राप्त होना बता रहे हैं। आप कह रहे हो कि हमसे आपने लिए हैं और फिर आप जब हमसे और फिर जब आप हमसे ली हुई सामग्री के आधार पर हमको दबाने का प्रयास कर रहे हो तब हम जो है आपको यह कह रहे हैं कि भैया ठीक है अपनी प्रमाणिकता बताओ। तो ये आपके लॉजिक है कि यदि हम आपसे आपकी प्रमाणिकता पूछेंगे तो हम प्रामाणिक हो जाएंगे। नहीं पूछेंगे तो हम प्रामाणिक हो जाएंगे। क्या लॉजिक है भाई? अच्छा एक लॉजिक और दिया आपने। आप पहले ये तय करोगे कि दुनिया में अच्छा क्या है? बुरा क्या है? धर्म क्या है? अधर्म क्या है? जब यह आप तय कर लोगे तो इस तय किए हुए को आप वेद से जोड़ दोगे। इसका अर्थ क्या हुआ? जैसे आपका कहना है ना मेरे भाष्य इतने अच्छे हैं। है ना? यानी भाष्य भाष्य की अच्छाई और बुराई से तय होगा कि वो वेद से है कि नहीं। वेद से तय नहीं होगा कि क्या अच्छाई और बुराई है। समझिए मेरी बात को। आप पहले अच्छाई बुराई तय करेंगे और तब यह तय होगा कि वह वेद से है कि नहीं। इसका अर्थ क्या हुआ कि आपको अच्छाई और बुराई का बोध आपको धर्म और अधर्म का बोध बिना वेद के प्राप्त हो रहा है। क्योंकि आप वेद और उसके अर्थ की प्रामाणिकता जांच रहे हो। अपनी जो अपने नेत्रों से या अपनी
00:26:22:24 इंद्रियों से जो आप ज्ञान विज्ञान प्राप्त कर रहे हो उसके आधार पर। जबकि सत्यार्थ प्रकाश खुद कह रही है कि नहीं किसी के दिए बिना ज्ञान मनुष्यों को ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। वहां पर गुरु की आवश्यकता पड़ेगी। इसीलिए चार ऋषियों को भगवान को देने के लिए आना ही पड़ा। आपके अनुसार तो यहां पर तो आप ये मान रहे हो किसी के बिना दिए आपको बोध नहीं होगा धर्म और अधर्म का। पर खुद पहले धर्म और अधर्म का निर्णय कर रहे हो। उसके बाद जो आपको ठीक लग रहा है उसको आप वेद के अर्थ से चिपका रहे हो। भाई किसी प्रामाणिक स्त्रोत से सही अर्थ का पता चलता है कि सही अर्थ से किसी स्त्रोत की प्रामाणिकता सिद्ध होती है। हम वो सही अर्थ जो हमें सही लग रहा है उसमें भी ये है कि जो आपको सही लग रहा है। धर्म और धर्म शास्त्र हमें मिले क्यों हैं? क्योंकि जिन विषयों में हमारी गति नहीं है। हमारी इंद्रियों की गति नहीं है। उन विषयों में हम क्या निर्णय करें? उसके लिए धर्म है। इंद्रियों से जो हमारा शरीर से हमारे शरीर से हमें प्राप्त है उससे तो हमें हम ज्ञात ही नहीं कर सकते ना कि भूर भुवा स्वाहा से हमको मोक्ष मिलेगा कि नहीं मिलेगा। चलिए ठीक है
00:27:37:25 अभी साइंस ने कुछ तरक्की कर ली है। बहन बहन भाई के विवाह से विवाह अधर्म कहा गया हमारे यहां। तो साइंस अभी बताने लगी सिबलिंग्स में अगर विवाह होगा तो भैया दिक्कत है यह है वह है दिक्कत ना होती तो हम विवाह करते या फिर पहले चेक करते कि दिक्कत होगी कि नहीं होगी क्यों मानते हैं क्योंकि हमारी गति नहीं है इन इन विषयों में हमारी गति इसमें है कि हम छत से कूदेंगे तो हमें चोट लगेगी उड़ने का प्रयास करेंगे चोट लगेगी गुरुत्वाकर्षण खींच लेगा इसमें हमारी गति है ट्रेन आ रही है टक्कर मारेगी मृत्यु को प्राप्त हो जाएंगे इसमें हमारी गति है इंद्रियों की इन चीजों को हम देख समझ सकते हैं। मगर जिन विषयों में हमारी गति नहीं होती उन्हीं के लिए तो हमारे हमको धर्म मिला है। शास्त्र मिले हैं। कि जहां पे इंद्रिय सीमा के कारण आप नहीं जान सकते उनमें आप धर्म धर्म और धर्म शास्त्रों का सहारा लो। मगर आप तो अपनी इंद्रियों के द्वारा लिए जाने वाले निर्णय को धर्म शास्त्रों के अर्थ पर थोप रहे हो। तो यह आपका लॉजिक है कि वेद से हमें धर्म नहीं मिला है। हमारे धर्म से सिद्ध होगा कि वेद क्या है। और वेद क्या है? तो बात है ही नहीं। वेद का अर्थ क्या है? हमारे वेद के अर्थ से हमें धर्म नहीं मिलेगा। हम जिसे धर्म समझेंगे वही वेद का अर्थ होगा। यह लॉजिक है
00:28:52:26 आपका। इसीलिए जिस बात को लेकर के विवाद है यद्यपि उसमें भी हमारा पक्ष पर्याप्त है। हमारा पक्ष उसमें अकाट है। फिर भी जिस पक्ष को लेकर के विवाद हो सकता है और घंटों लग सकते हैं और एक अनिश्चितकालीन स्थिति में हम लोग जा सकते हैं। उस विषय को हम बीच में लाने के बजाय पहले सैद्धांतिक आधार पर यह जानने का प्रयास करते हैं कि भाई अगर ईश्वर अवतार नहीं ले सकता है तो क्यों नहीं ले सकता है? आपने किस स्तर के सिद्धांतों को वेदों से चिपकाने का प्रयास कर रहे हो? क्या वह तर्क और तर्क और सिद्धांत की कसौटी पर खरे उतरते हैं? इसीलिए यह चर्चा हम बाद के लिए रखते हैं। क्योंकि प्रमाण आएगा तो प्रमाण में प्रमाण नहीं है। प्रमाण में प्रमाण नहीं है। प्रमाण का अर्थ प्रमाण है। आर्य समाज के अनुसार वेद प्रमाण नहीं है। वेद का वो अर्थ प्रमाण है जो आर्य समाज ने स्वीकार किया है। प्रॉब्लम ये है ना। तो इसीलिए हम तो उस सामग्री को बीच में लाते ही नहीं है। आप बीच में ला रहे हो कि नहीं नहीं वेद में दिखाओ। वेद में लिखा है देखो जब आपके पास सैद्धांतिक तथ्य नहीं बचे तर्क नहीं बचा तब आप वेद को लाए। अब वेद का जो अर्थ आप बता रहे हो जिस मंत्र का उसको हम मान ले।
00:30:08:02 तो जब आपकी ही आपकी ही बात को मानना है तो चर्चा होनी क्यों है? आपने जो लिख रखा है उसको अनाउंस कर दो। भैया हमने ये लिखा है यही मान ले। चर्चा की कोई आवश्यकता ही नहीं है। क्योंकि जब वेद का अर्थ करने की बात आएगी तो आपका अर्थ माना जाएगा। अरे भाई जब स्पष्ट लिखा आ रहा है कि ईश्वर प्रकट होता है तो आप उसमें कह रहे हो इसमें जो है यह अलंकारिक व्याख्या है इसके अर्थ योगगिक है और जो मैं जो इसमें बताऊंगा कि वहां पर ईश्वर नहीं ईश्वर के कार्य के कार्यों के रूप में ईश्वर के प्रकट होने की बात हो रही है तो ये जो चीज है इसका एक निश्चित पैरामीटर तो है नहीं कि किसका जो अलंकार है वो वहां फिट होगा या जो उसका भावार्थ है वो किसका फिट होगा उस अर्थ में तो उस बात को तो लेकर के लड़ाई होती रहेगी क्योंकि क्योंकि आप अपना मनमुखी भावार्थ डाल सकते हो और दूसरा हम भी डाल सकते हैं। अपना मनमुखी भावार्थ ये सब चीजें जो सच्चे हृदय से सत्य का अनुसंधान करने का प्रयास करेगा वो सोचेगा वो नहीं जो पहले ये निर्णय बना लेगा कि भाई मैंने इसको माना है दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज है वो वाली बात आंखों पर पट्टी बांध लो अपने कि भाई मुझे तो देखना ही नहीं है सच्चाई को आगे चलते हैं। तो
00:31:23:18 कहने का तात्पर्य यह है कि यह जो शब्द प्रमाण आप ले आ रहे हो ईश्वर के अवतार को निषेध करने के लिए वो हम नहीं लाए हैं जो हमें अपनी प्रमाणिकता आपको पहले बतानी पड़े जबकि हमारी प्रमाणिकता सिद्ध है। इन वचनों में ही सिद्ध है कि आपकी आपकी परंपरा पर हमें भरोसा है क्योंकि आपसे हमें वेद मंत्र मिले हैं। आपके इनहीं वचनों से प्रमाणिकता सिद्ध है। नहीं तो आप स्वतंत्र रूप से वेदों को प्राप्त होने की आपकी आपका स्त्रोत बता दो। और नहीं तो कह दो कि हम अवैदिक हैं। हम तब भी आपको फिर पहले वैदिक बनाएंगे। यह भी ध्यान रखना। छोड़ेंगे तब भी नहीं। पर पहले घोषणा तो करो कि हम अवैदिक हैं। क्योंकि शंकर परंपरा से हमें वेद प्राप्त होते हैं। परंपरा से हमें वेद प्राप्त होते हैं। परंपरा पे हमें भरोसा नहीं है। इसलिए उससे प्राप्त होने वाली सामग्री पर भरोसा नहीं है। इसलिए हम वेद को नहीं मानते। अब जो ईश्वर के विषय में हम धर्म बता रहे हैं, हमें नहीं पता वो जो आज जो वेदों के रूप में प्रचलित जो ग्रंथ हैं, उनसे मैच खाता है कि नहीं खाता है? मगर हां ईश्वर को प्राप्त कराने की विधा यही है जो हम बता रहे हैं। और ईश्वर का जो स्वरूप है उसका वर्णन यही है जो हम बता रहे हैं। कैसे प्राप्त किया कि हमने अपनी सिद्धि से प्राप्त किया। हमें प्राप्त हो गया। ईश्वर ने स्वयं हमें दे दिया। हम मंत्र दृष्टा बन गए। अपने रूप में जो भी है। यह आप कर सकते हो। मगर जब उसको
00:32:38:24 हमसे प्राप्त होने वाली सामग्री से चिपकाओगे तब आपको प्रामाणिकता बतानी पड़ेगी और नहीं बताओगे और हमारा विरोध भी करना है तो घोषित कर दो पहले कि हमारे से प्राप्त होने वाली जो सामग्री है वो उसके आधार पे आप वैदिक नहीं हो। आपका वेद कोई दूसरा वेद है और फिर वो वैदिक वांगमय दिखाना भी पड़ेगा आपको कहां है? कितना दिया है आपको स्वप्न में आके दिया है या कैसे दिया है वह सब आपको फिर बताना पड़ेगा आपका वैदिक मांग में मगर नहीं यह सब बातें आपको समझ में नहीं आएंगी आप तो ये कहोगे आप तो ये डंका पीटोगे कि मैं आपको वो बता रहा हूं जो ऋषियों ने कहा है और ऋषियों ने क्या कहा है इस संबंध में केवल मैं प्रामाणिक हूं ये क्या बात हुई भाई ये तो कोई भी व्यक्ति कह सकता है रिक्शा रिक्शा चोर कह सकता है साइकिल चोर कह सकता है तोता चोर कह सकता है ये बात मैं आपको वही वही बात बता रहा हूं जो दयानंद जी ने कहा है और दयानंद जी ने जो कहा है वो केवल मैं बताऊंगा तुम ले जाओ सत्य प्रकाश प्रक्षिप्त है हट ले जाओ संस्कार विधि प्रक्षिप्त है हट तोता चोर भी अपनी मनमुखी बातों को धर्म बता देगा मैं तो वही बता रहा हूं जो उन्होंने कहा है लो ओशो भी कह देगा जो ऋषियों ने कहा है वो बता रहा हूं
00:33:53:25 किससे जोड़ना है बातों को जो जो व्यक्ति गवाही देने के प्रस्तुत ना हो उससे जोड़ दो बात को दयानंद जी नहीं है दयानंद जी से जोड़ दो अग्निवत जी ने वैदिक रश्मि थ्योरी इत्यादि दी है मान लो अग्निवत जी थोड़ा इधर-उधर हो जाए पहुंच से बाहर हो जाए ठीक है उनसे जोड़ दो बात को किसी से भी जोड़ दो भाई यही तो तरीका है किसी की प्रमाणिकता को बताने का तरीका क्या है जिसने ये कह दिया कि मैं उससे जुड़ा हूं ब्रह्मा कुमारी वाले कह रहे हैं मैं ईश्वर से जुड़ा हूं इसी तरीके से आप ये दावा कर रहे हो कि भाई मैं ऋषियों की बात बता रहा हूं ऋषियों ने क्या बताया यह मैं बताऊंगा और जो व्यक्ति आपकी बात को नहीं मानता वो ऋषियों को नहीं मानता और ऋषियों के जानने के विषय में प्रामाणिक कौन है? आप हो। जबकि आप ऋषियों की बातों को लेने के लिए ऋषियों से अपने संबंध को स्थापित करने के लिए हम पर आश्रित हो। ये सब लॉजिकल चीजें हैं। थोड़ा सोच के देखो और ये ढिंढोरा पीटना भी बंद करो। ये जो ढोंग करते हो ना कि जो आर्य समाज को नहीं मानता उसको अवैदिक दिखाने का प्रयास करते हो। जो आर्य समाज को नहीं मानता, वो ऋषियों को नहीं मानता है। वो वेदों को ना मानने वाला है। अवैदिक है। ये जो तुम लोग प्रयास करते हो ये ये ढोंगी बंद करो। वास्तविकता में तुम आर्य समाज को ना मानने वाले को वेदों
00:35:09:01 को ना मानने वाला सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हो। मतलब वास्तविकता में तुम आर्य समाज के जो मनमुखी अर्थ हैं जो उसने अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए अपने मंतव्यों की सिद्धि के लिए जो सिद्धांत रचे हैं उनको ना मानने वाले को आप वेदों को ना मानने वाला सिद्ध का सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हो क्योंकि वेदों के अर्थ के विषय में आप प्रामाणिक नहीं हो। आप स्वयं वेद के मंत्र लेने के लिए किसी और के पास जा रहे हो। हम नहीं जा रहे। आप जा रहे हो। आपका कोई इतिहास नहीं है। आपका इतिहास हम है।
00:35:48:21 आपका कोई इतिहास नहीं है। आप खुद कह रहे हो कि भैया 100 150 साल पहले जब ये सब हुआ था तब आर्य समाज था ही कहां? तो आर्य समाज से तुम क्यों पूछ सकते हो? 200 साल पहले 500 साल पहले आर्य समाज था ही नहीं। भाई आपकी जब परंपरा है तो आप क्यों कह रहे हो? उस समय आर्य समाज नहीं था। आपके परंपरा कोई ना कोई आचार्य होंगे ना उस समय और बौद्धों के समय में कहां चले गए थे क्या कर रहे थे नियोग यात्रा पे थे क्या और अंत में एक बात बता दूं ये जो ताल आप ठोकते हो कि जो व्यक्ति आर्य समाज को नहीं मानता वो ऋषियों को नहीं मानता वो वेदों को नहीं मानता ये आपके पास ठोकने का ताल कोई आधार नहीं है जिस दिन जिस दिन तरीके से बराबरी के मंच पर बैठकर के और प्रबुद्ध जनों के बीच में न्यायकारी लोगों के समक्ष जिस दिन चर्चा केवल हो जाएगी ना उस दिन बिल्कुल यह दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा कि होता क्या है कि वो जो मंच है वो स्थापित नहीं हो पाता है आपके वहां दरवाजे पर बैठे हैं अवतार पर चर्चा होनी है पशु बलि ले आओ बीच में पशु बबल से भटक जाओ तो भैया और कोई अश्लील अर्थ निकाल लो मंत्र का अपने हिसाब से महधर के भाष्य का अर्थ कर दो महधर ने भाष्य में ये महध ने महधर भाष्य में गणा नाम
00:37:03:27 वाला जो मंत्र है उसमें उन्होंने यह बताने का प्रयास किया है कि गणपति भगवान के तेज को प्राप्त करती हैं महिला तो वहां पर इन्होंने अपने मन से एक मैदर भाष्य की हिंदी कर ली संस्कृत में मैदर भाष्य है हिंदी अपने आप कर ली मतलब भगवान तो भगवान ऋषि तो ऋषि मैदर को भी नहीं छोड़ा कि उसका भी अर्थ हम ही बताएंगे आजकल परा पूजा के नाम से वो ग्रंथ को प्रचलित कर रहे हो कि शंकराचार्य जी ने मूर्ति पूजा का खंडन किया है शंकराचार्य जी जब निर्गुण निराकार की बात करेंगे तब वहां पर साकार की बात नहीं होगी और जब साकार की बात करेंगे तो निर्गुण निराकार की बात नहीं होगी। शंकराचार्य जी व्यवहार में भगवान का सगुण साकार स्वरूप स्वीकार करते हैं। पढ़ो यदा धर्मस भवती भारत शंकर भाष्य किया है ना पढ़ो उसमें क्या लिखा है? भगवान अपना स्वरूप रचते हैं। मगर नहीं ऋषियों का अर्थ कौन बताएगा? आर्य समाज। ईश्वर का अर्थ कौन बताएगा? आर्य समाज। मधर का अर्थ कौन बताएगा? आर्य समाज। सायण का अर्थ कौन बताएगा? आर्य समाज। शंकराचार्य का अर्थ कौन बताएगा? आर्य समाज।
00:38:10:19 कल को थोड़े दिनों बाद जो वर्तमान पूरी पीठाधीश्वर है उनका भी अर्थ कौन बताएगा? आर्य समाज। और थोड़े दिनों बाद शिवश नारायण द्विवेदी का अर्थ कौन बताएगा? आर्य समाज। क्यों? क्योंकि आर्य समाज स्वयंभू है। कोई लॉजिक नहीं है इसके अलावा। स्वयंभू है। बस बात खत्म। और एक बात और बताता चलूं कि आप लोग तो नहीं कर सकते पर मैं ताल ठोक करके अवश्य कह सकता हूं कि जो शंकराचार्य को नहीं मानता वो वैदिक है। मैं सिद्ध करूंगा कोई भी व्यक्ति आ जाए और कह दे मैं शंकराचार्य को नहीं मानता। मैं बिना वेदों के नीचे दबाए बिना शंकराचार्य से प्राप्त होने वाले शब्द प्रमाणों के नीचे दबाए उसको सिद्ध करूंगा
00:38:56:19 कि तुम्हारा शंकराचार्य को ना मानना अतार्किक है तर्कहीन है तर्क विहीन है अनुचित है और फिर उसको शंकराचार्य को मानने वाला बनाऊंगा फिर उसको अगर और फिर यदि वो वो नास्तिक बना होगा शंकराचार्य को ना मान ना मानने वाला होते हुए तो उसको पहले आस्तिक बनाऊंगा और यदि वह विधर्मी बना होगा शंकराचार्य को ना मानने वाला होते हुए अपना ईश्वर अपने ग्रंथ तो उसको पहले वैदिक बनाऊंगा पहले वेद पकड़ाऊंगा फिर उसको ईश्वर का सगुण साकार स्वरूप पकड़ाऊंगा और इस प्रकार से उसको शंकराचार्य का सिद्धांत पकड़ाऊंगा समझे तुम्हारी तरह नहीं कि बस ईश्वर अवतार इसलिए नहीं ले सकता क्योंकि ऋषियों ने कहा है और ऋषियों ने क्या कहा है यह केवल हम जानते हैं हम बताएंगे वाह वाह वाह वाह वाह वाह ठोको ताली यह सब नहीं है सिद्ध करेंगे कि कैसे कुतर्क है तुम्हारा यह कहना कि शंकराचार्य को मैं नहीं मानता ठीक है तो इसीलिए कहते हैं मत पड़ो चक्कर में कोई है नहीं टक्कर में जय श्री राम
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मोक्ष के बाद शुकदेव जी ने गौडपादाचार्य जी को उपदेश कैसे दिया?
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