1
00:00:03,040 --> 00:00:07,040
अब जो है मैं थोड़ा सा इनके भाष्य पर बात करने वाला हूं। तो अब

2
00:00:07,040 --> 00:00:11,600
आप सीट की पेटियां बांध लें थोड़ा सा। बहुत रोचक चीजें आपके सामने आने वाली हैं।

3
00:00:11,600 --> 00:00:15,680
मैं बस दो चार उदाहरण दूंगा। बहुत ज्यादा मैं उसमें नहीं

4
00:00:15,680 --> 00:00:19,840
जाना चाहता हूं। और मुझे थोड़ा सा पढ़ने में असहज भी है कहीं-कहीं

5
00:00:19,840 --> 00:00:24,560
पर पर क्षमा करिए। भाई वो उदारता

6
00:00:24,560 --> 00:00:28,720
जो आपके अस्तित्व और आदर्श को नष्ट करने के लिए बाध्य करे।

7
00:00:28,720 --> 00:00:33,040
वह उदारता उदारता नहीं कायरता कहलाती है। इसलिए मैं पहले से ही क्षमा प्रार्थी

8
00:00:33,040 --> 00:00:37,600
हूं। पर अब मुझे पढ़ना पड़ रहा है। जिस तरीके से इन्होंने पढ़ करके वो एक

9
00:00:37,600 --> 00:00:41,600
नफरत का गेम खेला कि अवतार इसलिए नहीं हो सकता कि देखिए इन्होंने कितना गंदा

10
00:00:41,600 --> 00:00:45,680
गंदा लिखा है। तो अब मैं थोड़ा सा इनकी ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाह

11
00:00:45,680 --> 00:00:50,240
रहा हूं। ठीक है? तो [गला साफ़ करने की आवाज़] दयानंद

12
00:00:50,240 --> 00:00:54,480
जी अपने यजुर्वेद के भाष्य में लिखते हैं अध्याय 25

13
00:00:54,480 --> 00:00:59,360
मंत्र सात। उसमें लिखते हैं हे मनुष्यों

14
00:00:59,360 --> 00:01:04,160
तुम मांगने से पुष्टि करने वालों को स्थूल गुद्द्रियों

15
00:01:04,160 --> 00:01:08,320
के साथ वर्तमान अंधे सर्पों

16
00:01:08,320 --> 00:01:12,320
को गुद्द्रियों के साथ वर्तमान विशेष कुटिल सर्पों

17
00:01:12,320 --> 00:01:16,960
को आंतों से जलों को नाभि से नीचे के भाग से

18
00:01:16,960 --> 00:01:18,080
जलों को नाभि के

19
00:01:18,080 --> 00:01:22,880
नीचे के भाग से अंडकोष को आंडों से

20
00:01:22,880 --> 00:01:25,520
ठीक है

21
00:01:25,520 --> 00:01:29,520
घोड़े के गुप्तांग की बात भी हो रही है। वीर से संतान को यह सब बात

22
00:01:29,520 --> 00:01:33,840
हो रही है। ठीक है? थोड़ा पढ़ने में असहजता है। आप लोग स्वयं पढ़ें।

23
00:01:33,840 --> 00:01:38,000
दयानंद जी के द्वारा जो भाष्य किया गया है यजुर्वेद अध्याय

24
00:01:38,000 --> 00:01:43,120
25 मंत्र सात। अच्छा इसमें कई बातें की गई हैं।

25
00:01:43,120 --> 00:01:47,360
एक मैं प्रश्न बता देता हूं। समीक्षा कर रहा है जो उन्होंने समीक्षा में एक प्रश्न उठाया

26
00:01:47,360 --> 00:01:51,360
है कि अब दयानंद जी हमें बताएं कि अंधे सर्पों को

27
00:01:51,360 --> 00:01:55,520
अंधे सर्पों को गुदा द्वार में घुसाने और कुटिल सर्पों

28
00:01:55,520 --> 00:02:00,560
को आंतों से लेने की आज्ञा क्या ईश्वर देता है?

29
00:02:00,560 --> 00:02:04,560
इसमें एक प्रश्न और उठाया गया है। थोड़ा पढ़ने में असहजता है और आगे भी जो

30
00:02:04,560 --> 00:02:08,640
आने वाले हैं उनको भी पढ़ने में असहजता है। फिर भी मैं प्रयास करूंगा आपको बताने

31
00:02:08,640 --> 00:02:12,880
का। अच्छा अब दयानंद कृत जो यजुर्वेद भाष्य

32
00:02:12,880 --> 00:02:17,280
है अध्याय 25 और मंत्र एक उसमें क्या लिखा है

33
00:02:17,280 --> 00:02:23,280
हे अच्छे ज्ञान की चाहना करते हुए ज्ञानी जन

34
00:02:23,520 --> 00:02:28,160
वीर्य को अच्छे प्रकार धारण करने हारे

35
00:02:28,160 --> 00:02:32,160
बोलना मुश्किल है थोड़ा पता नहीं दयानंद जी ने कैसे लिख दिया वीर

36
00:02:32,160 --> 00:02:35,680
बरसाने वाली अंग

37
00:02:35,680 --> 00:02:39,840
वीर बरसाने वाला जो अंग है अब समझ लीजिए गुप्ता ंग की बात हो रही है।

38
00:02:39,840 --> 00:02:43,840
उसके मुख से चारों ओर जो केश

39
00:02:43,840 --> 00:02:47,920
है मुख के चारों ओर जो केश है वीर वर्षाने वाला जो अंग है

40
00:02:47,920 --> 00:02:52,400
गुप्तांग उसको मुख के चारों ओर जो केश है अर्थात दाढ़ी

41
00:02:52,400 --> 00:02:56,400
उससे वह पदार्थ अच्छे प्रकार से ग्रहण करने चाहिए। अब ये यहां क्या

42
00:02:56,400 --> 00:03:00,400
कहने चाह रहे हैं? दाढ़ी के आसपास जो है जो केश है और

43
00:03:00,400 --> 00:03:06,400
वीर से आने वाला जो वीर वाला जो पदार्थ है

44
00:03:06,880 --> 00:03:11,040
दयानंदी बताएं कि दयानंद अपने दयानंद जी अपने भाष्य के

45
00:03:11,040 --> 00:03:15,440
द्वारा वीर्य वर्षाने वाला जो अंग है गुप्तांग है

46
00:03:15,440 --> 00:03:19,440
और दाढ़ी से ऐसा कौन सा ईश्वरीय ज्ञान बांट रहे हैं ठीक

47
00:03:19,440 --> 00:03:23,440
है यह प्रश्न उठता है यह मैं पीडीएफ डाल दूंगा

48
00:03:23,440 --> 00:03:29,440
जो लिखी हुई है आगे चलते हैं और क्या लिखा है

49
00:03:29,600 --> 00:03:33,760
[गला साफ़ करने की आवाज़] जैसे पुरुष का गुप्तांग मैं यहां पर दूसरे शब्दों का उपयोग

50
00:03:33,760 --> 00:03:38,080
कर रहा हूं क्योंकि मुझे पढ़ने में असहजता हो रही है। जैसे पुरुष का गुप्तांग

51
00:03:38,080 --> 00:03:42,080
स्त्री के गुप्तांग में प्रवेश करता हुआ वीर्य को छोड़ता है। यह

52
00:03:42,080 --> 00:03:46,160
है यजुर्वेद 19 76 यजुर्वेद

53
00:03:46,160 --> 00:03:50,320
1976 जैसे पुरुष का गुप्तांग स्त्री के गुप्तांग

54
00:03:50,320 --> 00:03:54,320
में प्रवेश करता हुआ वीर्य को छोड़ता है और इससे अलग मूत्र

55
00:03:54,320 --> 00:03:58,640
को छोड़ता है। इससे जाना जाता है कि शरीर में मूत्र के स्थान से पृथक

56
00:03:58,640 --> 00:04:02,880
स्थान में वीर्य रहता है। यह वैज्ञानिक भाष्य है दयानंद जी का। तालियां बजाइए।

57
00:04:02,880 --> 00:04:07,040
प्रामाणिकता दयानंद जी की। यजुर्वेद

58
00:04:07,040 --> 00:04:11,200
1988 क्या लिखा है? इसमें

59
00:04:11,200 --> 00:04:15,200
ये कर रहे हैं। हे मनुष्यों जैसे जिससे रस ग्रहण किया जाता

60
00:04:15,200 --> 00:04:19,280
है। वह वाणी के समान स्त्री इस पति के सुंदर अवयवों से विभक्त

61
00:04:19,280 --> 00:04:22,160
सिर के साथ सिर करे तथा मुख के समीप

62
00:04:22,160 --> 00:04:26,240
पवित्र मुख करे। इसी प्रकार गृह आश्रम में के व्यवहार

63
00:04:26,240 --> 00:04:30,560
में व्याप्त स्त्री पुरुष दोनों ही वर्तें तथा जो इस रोग से रक्षक

64
00:04:30,560 --> 00:04:34,880
वैद्य और बालक के समान वास करने का हेतु पुरुष

65
00:04:34,880 --> 00:04:39,040
उपस्थेंद्रिय यहां पर गुप्तांग को बल से करने

66
00:04:39,040 --> 00:04:43,120
हारा होता है। वह शांति करने के समान वर्तमान में

67
00:04:43,120 --> 00:04:47,440
संतान उत्पत्ति का हेतु होवे। यहां मतलब बता रहे हैं

68
00:04:47,440 --> 00:04:51,920
कि किस प्रकार से पति को पत्नी के साथ रमण करना है। वैज्ञानिकीकरण

69
00:04:51,920 --> 00:04:56,000
भाष्य दयानंद जी बता रहे हैं वेदों में। ठीक है? अच्छा

70
00:04:56,000 --> 00:05:00,160
आगे चलते हैं। आगे है यजुर्वेद 28 32। इसमें

71
00:05:00,160 --> 00:05:04,480
क्या लिखा हुआ है? दयानंद जी के भाष्य में हे मनुष्यों

72
00:05:04,480 --> 00:05:08,720
जैसे बैल गायों को गाभिन करके पशुओं

73
00:05:08,720 --> 00:05:12,960
को बढ़ता बढ़ाता है वैसे गृहस्थ लोग स्त्रियों को गर्भवती कर प्रजा

74
00:05:12,960 --> 00:05:17,120
बढ़ावे। यजुर्वेद 216

75
00:05:17,120 --> 00:05:21,120
इसमें लिखा है हे मनुष्यों प्राण और अपान

76
00:05:21,120 --> 00:05:25,120
के लिए दुख विनाश करने वाले छेरी आदि पशु से वाणी

77
00:05:25,120 --> 00:05:29,200
के लिए मेढा से और परम ऐश्वर्य के लिए बैल से भोग

78
00:05:29,200 --> 00:05:33,520
करें। वाणी के लिए मेंढक से भोग करिए।

79
00:05:33,520 --> 00:05:38,800
परम ऐश्वर्य के लिए बैल से भोग करिए। और

80
00:05:38,800 --> 00:05:42,960
दुख का विनाश करने के लिए छेरी आदि पशु से भोग करिए। यह

81
00:05:42,960 --> 00:05:48,480
लिखा है दयानंद जी के भाष्य में है ना भोग करिए भोग

82
00:05:48,480 --> 00:05:52,480
बैल के साथ भोग करिए आर्य समाजियों के यहां पर ये चीजें लागू

83
00:05:52,480 --> 00:05:57,520
होती है मैं पूछना चाह रहा हूं आगे चलते हैं

84
00:05:57,520 --> 00:06:01,600
यजुर्वेद 148 स्वामी

85
00:06:01,600 --> 00:06:05,920
जी लिखते हैं स्त्री पति से और पति अपनी स्त्री से कहे

86
00:06:05,920 --> 00:06:10,080
कि हे स्त्री तू मेरे नाभि के नीचे गुेंद्रिय

87
00:06:10,080 --> 00:06:14,240
मार्ग से निकलने वाली अपान वायु की रक्षा कर।

88
00:06:14,240 --> 00:06:19,120
अपान वायु समझते हैं फार्ट कहते हैं ना इंग्लिश में।

89
00:06:19,120 --> 00:06:23,280
और हिंदी में क्या कहते हैं? आप लोग समझ रहे होंगे। अपान वायु जो वायु

90
00:06:23,280 --> 00:06:26,080
निकलती है

91
00:06:26,080 --> 00:06:30,160
निचले द्वार से उसकी रक्षा करेगी कौन? पत्नी। यह

92
00:06:30,160 --> 00:06:34,480
कहा जा रहा है। हे स्त्री तू मेरे गु्दिय

93
00:06:34,480 --> 00:06:38,560
से निकलने वाली अपान वायु की रक्षा कर। आगे

94
00:06:38,560 --> 00:06:42,720
चलते हैं। यजुर्वेद छ 14 क्या

95
00:06:42,720 --> 00:06:46,720
लिखते हैं स्वामी जी? हे शिष्य मैं तेरी वाणी नेत्र नाभि जिसे

96
00:06:46,720 --> 00:06:51,040
मूत्रोत्सर्ग आदि किए जाते हैं। उस गुप्तांग

97
00:06:51,040 --> 00:06:54,400
यहां पर दूसरा शब्द लिखा हुआ है। मैं बचा के चल रहा हूं थोड़ा।

98
00:06:54,400 --> 00:06:58,400
को तेरे गुद्दिय के लिए शुद्ध करता हूं।

99
00:06:58,400 --> 00:07:03,040
यहां पर गुरु जो है शुद्ध कर रहे हैं। गुेंद्रदिय

100
00:07:03,040 --> 00:07:07,120
को गुप्तांग को ये हो क्या रहा है? और वहां भाष्य में दयानंद जी यह

101
00:07:07,120 --> 00:07:11,680
भी लिख रहे हैं गुरु और गुरु पत्नी दोनों कर रहे हैं। शिष्य की

102
00:07:11,680 --> 00:07:15,760
गुप्तांग को गुेंद्रियों को शुद्ध कर रहे

103
00:07:15,760 --> 00:07:20,000
हैं। सफाई कर रहे हैं वहां की। यह सब शुद्ध करता हूं।

104
00:07:20,000 --> 00:07:24,960
ठीक है? चलिए आगे चलते हैं। [नाक से की जाने वाली आवाज़]

105
00:07:24,960 --> 00:07:30,400
यजुर्वेद 3021 इसमें लिखा हुआ है

106
00:07:30,400 --> 00:07:34,480
बंदर किसी छोटी आंखों वाले शीत प्राय देसी मनुष्यों

107
00:07:34,480 --> 00:07:39,760
को पीली आंखों वालों को उत्पन्न कीजिए। को

108
00:07:39,760 --> 00:07:45,360
गंजे को काले रंग वाले पीले नेत्रों से युक्त पुरुष को दूर कीजिए।

109
00:07:45,360 --> 00:07:51,120
ठीक है? यहां क्या हो रहा है? को दूर करो।

110
00:07:51,120 --> 00:07:57,120
और आप एक और कहते हैं कि हमने अत्याचार किया है।

111
00:07:59,920 --> 00:08:04,480
उनको तो कुछ

112
00:08:04,480 --> 00:08:08,480
नीच कुल की की गंध इत्यादि ये सब कहा है उन्होंने कि की गंध

113
00:08:08,480 --> 00:08:13,360
आती है उसको दूर रखो मुझसे। यह सब स्वीकार किया है।

114
00:08:13,360 --> 00:08:17,600
और स्त्री पुरुष में भेद क्या दयानंद जी ने नहीं किया। वो

115
00:08:17,600 --> 00:08:22,480
कह रहे हैं कि जब अगर नियोग की बात करूं

116
00:08:22,480 --> 00:08:26,560
तो नियोग के बारे में आपको कुछ बढ़िया चीजें आपको बता

117
00:08:26,560 --> 00:08:30,560
दूं। सबसे पहली बात है कि नियोग का आदेश कहां पर

118
00:08:30,560 --> 00:08:34,960
भी दिया जा रहा है? हे विध्व नारी तू इस मरे

119
00:08:34,960 --> 00:08:39,520
हुए पति जो है मरा हुआ पड़ा है सामने वो विलाप कर रही है। वहां की बात है।

120
00:08:39,520 --> 00:08:43,680
इस मरे हुए पति की आशा छोड़ दे। छोड़ के

121
00:08:43,680 --> 00:08:47,760
बाकी पुरुषों में से जीते हुए दूसरे पति को प्राप्त हो।

122
00:08:47,760 --> 00:08:52,000
इस बात का विचार कर और निश्चय रख कि जो तुम विधवा के पुनः

123
00:08:52,000 --> 00:08:56,160
मतलब पति वहां सामने लेटा हुआ है मृत्यु शैया पर उसको छोड़

124
00:08:56,160 --> 00:09:00,320
और आसपास जो जीवित लोग हैं उनमें से किसी को पति बना मतलब

125
00:09:00,320 --> 00:09:04,560
नियुक्त कर नियोग के लिए पति तो ना बना और फिर जो है उसके साथ

126
00:09:04,560 --> 00:09:06,240
अपना वो जो आगे की प्रक्रिया

127
00:09:06,240 --> 00:09:10,320
है उसमें आप लिप्त हो जाइए यह इनका कहना है। देवर उसको कहते हैं जो विधवा

128
00:09:10,320 --> 00:09:14,480
का दूसरा पति होता है। इन सब चीजों का खंडन करते हैं हम और यह

129
00:09:14,480 --> 00:09:18,560
कह रहे कि आपके यहां पाप लिखा है। देवर उसको कहते हैं जो

130
00:09:18,560 --> 00:09:22,560
विधवा का दूसरा पति होता है। चाहे वह छोटा भाई हो या बड़ा भाई हो अथवा

131
00:09:22,560 --> 00:09:27,760
अपने वर्ण का वह अपने से उत्तम वर्ण वाला हो जिससे नियोग करे उसी का नाम देवर लो

132
00:09:27,760 --> 00:09:33,760
ये है देवर और ये लोग क्या कहते हैं

133
00:09:34,000 --> 00:09:38,320
कि हमने जो है सम्मान दिया है वो जो रानी

134
00:09:38,320 --> 00:09:42,480
थी लक्ष्मीबाई पद्मावती इन सब का नाम लेते हैं। में से कितनी कितनों का आप आप

135
00:09:42,480 --> 00:09:48,080
जो है नियोग स्वीकार करते हैं जितनों का आपने अपनी वीडियो में नाम लिया है

136
00:09:48,080 --> 00:09:52,240
अरे अच्छा हुआ आपकी विचारधारा उस समय नहीं थी नहीं रानी लक्ष्मीबाई और पद्मावती

137
00:09:52,240 --> 00:09:56,320
का आप नियोग करवा देते वहां पर उन्होंने तो जौहर कर लिया था आप कहते

138
00:09:56,320 --> 00:10:00,800
जौहर मत करो संतान प्राप्ति करो नियोग करके ये जो अलाउद्दीन

139
00:10:00,800 --> 00:10:05,120
खिलजी आ रहा है संतान प्राप्त करो भाई आप तो ये करते वहां पर

140
00:10:05,120 --> 00:10:08,800
नियोग करवाते आप वहां पर

141
00:10:08,800 --> 00:10:12,880
जहां से ईरानी लक्ष्मीबाई का नियोग करवा करवाते आप यही

142
00:10:12,880 --> 00:10:17,920
है ना आपके यहां पर स्त्रियों का अधिकार

143
00:10:17,920 --> 00:10:21,120
नियोग करवाना उनका

144
00:10:21,120 --> 00:10:21,620
बात

145
00:10:21,520 --> 00:10:25,680
करते हैं तो कितनी ज्यादा लालसा है नियोग करवाने

146
00:10:25,680 --> 00:10:28,800
की देखिए आप

147
00:10:28,800 --> 00:10:32,880
और क्या है इसमें 11 पतियों तक बताया कि

148
00:10:32,880 --> 00:10:37,120
उसका क्या नाम होगा कहां से कहां तक सत्यार्थ प्रकाश

149
00:10:37,120 --> 00:10:39,600
पढ़ रहा हूं

150
00:10:39,600 --> 00:10:42,960
और देखिए

151
00:10:42,960 --> 00:10:47,120
संतान उत्पत्ति में असमर्थ होवे। अच्छा एक चीज और है

152
00:10:47,120 --> 00:10:51,200
कि अग्निव्रत जी नियोग को आपत धर्म मानते हैं। जबकि

153
00:10:51,200 --> 00:10:55,200
वहां पर जो दयानंद जी वो तर्क दे रहे हैं

154
00:10:55,200 --> 00:10:59,280
कि प्रवृत्ति होती है। प्रवृत्ति होती है व्यक्ति की

155
00:10:59,280 --> 00:11:03,840
जो उसके अंदर स्वाभाविक भी दिए हैं मैथुन के प्रति आकर्षण।

156
00:11:03,840 --> 00:11:08,320
उसकी बात की है दयानंद जी ने। तो जब उन्होंने

157
00:11:08,320 --> 00:11:12,400
यह बात की प्रवृत्ति होती तो यहां पर आपत धर्म तो खत्म हो गया। तो प्रवृत्ति से निवत्ति

158
00:11:12,400 --> 00:11:16,400
का मामला आ गया। दूसरी बात यह है कि क्या केवल संतान प्राप्ति के लिए

159
00:11:16,400 --> 00:11:21,680
जो एक बार रमण होगा उससे काम चल जाएगा प्रवृत्ति का

160
00:11:21,680 --> 00:11:25,680
उससे काम हो जाएगा। प्रवृत्ति से निवृत्ति

161
00:11:25,680 --> 00:11:29,680
के लिए आप जो है नियोग करवाते जा रहे हो। एक छूटा दूसरा गया, दूसरा गया, तीसरा आया, तीसरा

162
00:11:29,680 --> 00:11:33,760
गया, चौथा आया, चौथा गया, पांचवा आया, पांचवा गया, छठवा आया, छठवा गया, सातवा आया, सातवा

163
00:11:33,760 --> 00:11:36,800
गया, आठवां आया। यह धर्म लिखा हुआ है

164
00:11:36,800 --> 00:11:41,280
और कितने आप लोग नियोग करवा रहे हो अपने यहां यह बता एक तरफ मांसाहार

165
00:11:41,280 --> 00:11:45,280
मांसाहार में आपको दिखाई नहीं दे रहा कि प्रवृत्ति से निवृत्ति के लिए हो सकता है।

166
00:11:45,280 --> 00:11:50,240
मगर यहां आप जो है एक से एक के बाद दूसरा दूसरे के बाद तीसरा तीसरे बाद चौथा

167
00:11:50,240 --> 00:11:56,080
व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध बनवा बनवाते जा रहे हो

168
00:11:56,080 --> 00:12:00,080
और फिर बात कर रहे हो कि भैया जो है इतना ऐसा कैसे हो सकता है कोई मांस

169
00:12:00,080 --> 00:12:04,160
खाने की आज्ञा कैसे दे सकता है यहां अनेक स्त्री पुरुषों का आप संबंध बनवाने की आज्ञा

170
00:12:04,160 --> 00:12:08,240
दे दे रहे हो अरे भाई जो सुनने में अच्छा ना लगे क्यों जोड़ रहे हो शास्त्र

171
00:12:08,240 --> 00:12:12,240
से क्योंकि हमें तो पहले से ही पता है ना धर्म क्या है फिर क्यों जोड़ रहे हो फिर यहां पे आप

172
00:12:12,240 --> 00:12:16,240
बाउंड हो जा रहे हो कि नहीं नहीं जो शास्त्र शास्त्र से धर्म धर्म पता चलेगा। एक

173
00:12:16,240 --> 00:12:20,320
जगह कह रहे हो कि मुझे धर्म पता है। मैं जो अच्छी चीज बताऊंगा वो धर्म शास्त्र

174
00:12:20,320 --> 00:12:24,560
का अर्थ होगा। और दूसरी जगह कह रहे हो कि नहीं नहीं हमें धर्म पता नहीं है। शास्त्र

175
00:12:24,560 --> 00:12:28,960
से धर्म पता होगा। ये क्या है? इसे

176
00:12:28,960 --> 00:12:34,080
कहते हैं दोगला पद।

177
00:12:34,080 --> 00:12:38,400
तो भर भर के इनके में प्रमाण है। मैं और दे देता हूं। दयानंद जी के जो बहुत बढ़िया

178
00:12:38,400 --> 00:12:42,400
बढ़िया सुंदर वो हैं और ऐसी भी जीवनी में कई

179
00:12:42,400 --> 00:12:46,400
चीजें हैं। मुर्दे को निकाला मुर्दे को जांच के

180
00:12:46,400 --> 00:12:50,800
लिए निकाला ये किया वो सब किसी और भाग में अगर आवश्यकता पड़ी तो आपके समक्ष प्रस्तुत

181
00:12:50,800 --> 00:12:54,880
करूंगा। ऐसा भी आया है कि वो कोई कुछ

182
00:12:54,880 --> 00:12:59,040
व्यसन था उनको जिसका सेवन करते थे। तो यह सब चीजें भी

183
00:12:59,040 --> 00:13:03,280
अभी अगर आवश्यकता पड़ी तो अगले भाग में लाऊंगा। आज केवल इनके

184
00:13:03,280 --> 00:13:08,320
भाष्य पर ही बात होगी। वो आप देखते जाइए। ऋग्वेद

185
00:13:08,320 --> 00:13:12,720
हे स्त्री ऋग्वेद अह मंडल 10 सूक्त

186
00:13:12,720 --> 00:13:16,800
85 और मंत्र 40 इसमें वो लिखते हैं हे

187
00:13:16,800 --> 00:13:21,360
स्त्री जो तेरा प्रथम पहला विवाहित पति

188
00:13:21,360 --> 00:13:27,200
तुझको प्राप्त होता है उसका नाम सुकुमार

189
00:13:27,200 --> 00:13:31,280
सुकुमारता आदि है। गुण युक्त होने से सोम जो दूसरा नियोग होने

190
00:13:31,280 --> 00:13:35,600
से प्राप्त होता है वह गंधर्व

191
00:13:35,600 --> 00:13:40,640
एक स्त्री से संभोग करने से गंधर्व जो तृतीय

192
00:13:40,640 --> 00:13:44,880
दो के पश्चात तीसरा पति हो होता है वह अग्नि

193
00:13:44,880 --> 00:13:49,040
और इसी तरीके से आगे इनके नाम बताए गए हैं। 11वीं 10 तक पति

194
00:13:49,040 --> 00:13:49,600
हैं

195
00:13:49,600 --> 00:13:54,240
वैसे ही पुरुष भी 11वीं स्त्री तक नियोग कर सकता है। 11

196
00:13:54,240 --> 00:13:58,400
पुरुषों तक नियोग कर सकते हैं। और अगर बाहर जाने की वजह से नियुक्त

197
00:13:58,400 --> 00:14:02,400
कर रहे हैं ना कि वह चला गया कहीं तो उसमें सिस्टम यह है कि अगर आपने किसी

198
00:14:02,400 --> 00:14:06,400
को नियुक्त कर लिया और अगर वह जो बाहर गया वापस आ जाएगा तो जिसके जिसको आपने

199
00:14:06,400 --> 00:14:10,480
नियुक्त किया है उसको आप तब छोड़ दो वो वो हटा

200
00:14:10,480 --> 00:14:14,720
दिया जाएगा नियुक्ति से वापस पुराने वाले पति के साथ पुराने वाला पुराना व्यवहार

201
00:14:14,720 --> 00:14:18,720
शुरू हो जाएगा। क्या बात है मांसाहार को लेकर के

202
00:14:18,720 --> 00:14:22,960
आप लांछन लगाते हो जो पहली सत्यार्थ प्रकाश छपी थी अभी प्रमाणिकता

203
00:14:22,960 --> 00:14:26,960
परंपरा तो है नहीं आपके यहां कौन प्रमाणिक है कौन नहीं तो पहली सत्यार्थ

204
00:14:26,960 --> 00:14:30,960
प्रकाश में मासाहार भरभर किताब किसी दिन अगले भाग में हम लोग मैं आपके समक्ष

205
00:14:30,960 --> 00:14:35,040
प्रस्तुत करूंगा यदि आवश्यकता पड़ी तो अभी केवल थोड़ा सा ट्रेलर दे देते

206
00:14:35,040 --> 00:14:40,400
हैं। है ना

207
00:14:40,400 --> 00:14:44,880
ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त 85

208
00:14:44,880 --> 00:14:48,960
मंत्र 45 इसमें क्या है? वीर

209
00:14:48,960 --> 00:14:53,440
सेचन में समर्थ ऐश्वर्य युक्त पुरुष तू इस विवाहित

210
00:14:53,440 --> 00:14:57,520
स्त्री व विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्य

211
00:14:57,520 --> 00:15:01,680
युक्त कर इस विवाहित स्त्री में 10 पुत्र उत्पन्न कर और 11वीं स्त्री

212
00:15:01,680 --> 00:15:05,760
को मान हे स्त्री तू भी विवाहित पुरुष व नियुक्त पुरुषों से

213
00:15:05,760 --> 00:15:09,840
10 संतान उत्पन्न कर और 11 पति को समझ बार-बार 10

214
00:15:09,840 --> 00:15:13,840
11 10 11 10 11 के बिना तो काम ही नहीं चलेगा ना बताइए

215
00:15:13,840 --> 00:15:18,240
पत्नी को पति कह रहा है गुदा द्वार से जो अपान वायु निकलती है उसकी रक्षा कर

216
00:15:18,240 --> 00:15:22,240
यह भाष्य इनके वैज्ञानिक भाष्य प्रामाणिक भाष्य फिर आगे इसी तरीके

217
00:15:22,240 --> 00:15:26,240
से और भी भाष्य मनुस्मृति इत्यादि की भी बोलिया है तो मैं

218
00:15:26,240 --> 00:15:30,240
इतना पर्याप्त समझता हूं और काफी चीजें बातें

219
00:15:30,240 --> 00:15:34,400
बता दी है और इसके अलावा कहीं पर लिख रहे हैं शूद्र को वेद पढ़ाने

220
00:15:34,400 --> 00:15:38,640
चाहिए कहीं पर लिख रहे हैं नहीं पढ़ाने चाहिए यजुर्वेद 26 दो शूद्र को अनार्य

221
00:15:38,640 --> 00:15:42,640
लिख रहे हैं आर्य है ही नहीं शूद के लिए कोई जगह नहीं है आर्य समाज तो शूद्र का तो

222
00:15:42,640 --> 00:15:46,720
अस्तित्व ही मिटा देना चाहता है जो आर्य समाज है वास्तविकता में

223
00:15:46,720 --> 00:15:50,800
देखा जाए क्योंकि उसके अनुसार जो भी है जाएगा आर्य समाज में गायत्री मंत्र पड़ेगा जो गायत्री मंत्र

224
00:15:50,800 --> 00:15:55,520
पड़ेगा जनेऊ धारण करेगा जने धारण करेगा शद्र है ही नहीं ईश्वर कह रहे हैं

225
00:15:55,520 --> 00:15:59,520
26 दो के अनुसार यजुर्वेद 26 दो का जो भाष्य वो किया है कि ब्राह्मण क्षत्रिय

226
00:15:59,520 --> 00:16:03,600
वैश्य शूद्र सबके लिए जो वेद है वेद का उपदेश है और सब

227
00:16:03,600 --> 00:16:07,680
पढ़ सकते हैं तो सब पढ़ सकते हैं तो शू शद्र भी पढ़ सकता है तो शू शद्र वो है जिसका जन्म नहीं

228
00:16:07,680 --> 00:16:11,680
होता शूद्र वो है या तो ये मान लो कि जन्मना वर्ण व्यवस्था है

229
00:16:11,680 --> 00:16:15,680
तब तो माना जाएगा कि हां भाई आप जन्म से मानते हैं ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र

230
00:16:15,680 --> 00:16:19,680
और तब आप कह रहे हैं कि हां ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सभी के लिए हुआ है। और

231
00:16:19,680 --> 00:16:23,680
अगर कर्मणा मानते हैं तो कर्मणा तो फिर शद्र शद्र जो है उसकी गति

232
00:16:23,680 --> 00:16:27,760
हो ही नहीं सकती। वो तो जैसे ही उसको अधिकार

233
00:16:27,760 --> 00:16:32,320
प्राप्त होगा वेद पढ़ने का वैसे ही वो द्विज हो जाएगा। ठीक है?

234
00:16:32,320 --> 00:16:36,320
यह है इनके वैज्ञानिक भाष्य। पति अपनी पत्नी से कह रहा है कि गुदा द्वार से

235
00:16:36,320 --> 00:16:40,640
निकलने वाली जो अपान वायु है उसकी रक्षा कर। और

236
00:16:40,640 --> 00:16:46,160
वो अंधा सांप पता नहीं क्या है। बैल से भोग।

237
00:16:46,160 --> 00:16:50,160
अब यह सब चीजें हैं जो मेरा कभी भी मंतव्य

238
00:16:50,160 --> 00:16:54,400
नहीं रहा है क्योंकि अगर इस तरह से हम लोग चर्चा करेंगे

239
00:16:54,400 --> 00:16:58,800
इन चीजों पर अंतहीन चर्चाएं चलती रहेंग बात अलग है हमारा ही पक्ष मजबूत

240
00:16:58,800 --> 00:17:02,800
है उसमें भी मगर बहुत लॉन्ग प्रोसेस है इसलिए मैंने कहा था तीन चीजों

241
00:17:02,800 --> 00:17:06,960
पर बात कर लो सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र शाश्वत धर्म जिसके पास है

242
00:17:06,960 --> 00:17:10,560
उसकी बात सारी मान ली जाएगी हिंदू शब्द भी मान लिया जाएगा हिंदू शब्द गलत है मान

243
00:17:10,560 --> 00:17:14,560
लेंगे भाई तुम्हारा भेदभाव सही है मान लेंगे भाई चीजें सिद्ध

244
00:17:14,560 --> 00:17:18,560
तो करो अपनी खैर मुझे लगता है मैंने पर्याप्त चीजें दे दी

245
00:17:18,560 --> 00:17:22,960
है और यह सारी चीजें इनके यहां भरी पड़ी है और यह कहते हैं हमारा प्रामाणिक

246
00:17:22,960 --> 00:17:27,680
है सुंदरता वैज्ञानिक है और इसलिए आप हमारे को मान लो जबकि

247
00:17:27,680 --> 00:17:31,760
अर्थ से प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होती है। प्रामाणिकता से अर्थ प्रामाणिक सिद्ध होता

248
00:17:31,760 --> 00:17:35,840
है। ठीक है? अर्थ सुंदर होने से अर्थ की प्रामाणिकता

249
00:17:35,840 --> 00:17:39,840
सिद्ध नहीं होती है। प्रामाणिक जब उसकी प्रामाणिकता सिद्ध होती

250
00:17:39,840 --> 00:17:43,840
है तब वो अर्थ मान्य होता है। ठीक है ना? चलिए

251
00:17:43,840 --> 00:17:48,240
समय देने के लिए सभी को आभार और किसी को भी अगर वैचारिक

252
00:17:48,240 --> 00:17:52,400
मतभेद के निमित्त चर्चा करनी हो तो वह संपर्क कर सकता है।

253
00:17:52,400 --> 00:17:58,400
जय श्री राम सभी को।

254
00:18:04,690 --> 00:18:08,690
[संगीत]
