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00:00:01:28 [घंटी की आवाज़] तो सभी को जय
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→ Used in: A · Video समाजी विद्वान के साथ चर्चा आर्य समाज का गढ़ — गुरुकुल कांगड़ी, हरिद्वार #AryaSam... at 0:04 ↗
00:00:04:02 श्री राम। मैं शिवश नारायण द्विवेदी पूरी के शंकराचार्य जी का एक अल्पज्ञ शिष्य आप देख रहे
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00:00:10:21 हैं आहान कॉल ऑफ धर् YouTube चैनल और हम इस समय हरिद्वार में हैं। हरिद्वार में जो संत ज्ञानेश्वर नाम से जाने जाते हैं सदानानंद जी उनका आश्रम है और हमारे साथ उनकी प्रमुख संचाल संचालिका हैं सत श्री सरोज देवी जी। तो माता जी सर्वप्रथम थोड़ा सा हमारे दर्शकों को आप अपना परिचय दे दीजिए। जी प्रेम सुग्री सदगुरुदेव महाराज की जय। परमपिता परमेश्वर की जय। आनंद कंद प्रभु सदानानंद जी मनमोहन भगवान की जय। संत एक मिनट थोड़ा तेज बोलिए। बोलेंगे तो कुछ नहीं होगा। प्रेम से बोलिए सदगुरुदेव महाराज की जय। वो हो गया। ठीक है। वो ठीक है। अब आप अगला बोलिए। ठीक है। मेरे सदगुरुदेव संत ज्ञानेश्वर स्वामी शरण जी परमहंस के सानिध्य में मैं 87 में आई। जब मुझे बताया गया और सुनाया गया कि संत ज्ञानेश्वर जी भगवान के अवतार हैं। पहले तो मेरी समझ से बाहर था तब भी उनके आश्रम में गई। तो सबसे पहले संसार के मिथ्यात्व का दर्शन
00:01:27:01 सूक्ष्म दृष्टि से जीव का दर्शन दिव्य दृष्टि से आत्मा ब्रह्म का दर्शन अज्ञान दृष्टि से परमात्मा परमेश्वर परम का दर्शन मैंने किया। संत ज्ञानेश्वर जी का मुख्य लक्ष्य है संपूर्ण धरती से असत्य अधर्म अन्याय अनीति को खत्म करना असत्य धर्म न्याय नीति को कायम करना बहुत ही सुंदर परिचय दिया माता जी ने और उन्होंने बताया कि वो किस तरीके से यहां पर आई हैं। तो माता जी जैसे जो सदानंद जी का जो ज्ञान विज्ञान उन्होंने दिया है तो आपके यहां पर ये माना जाता है कि सदानंद जी ही भगवान के पूर्ण अवतार हैं। देखिए मानना अलग है, जानना अलग है। मानना सन्यास है। बाद माना जाता है ना। मानना सन्यास्पद शब्द है। मान लो यह मेरा बेटा आप समझ जाएंगे नहीं है। यहां जानिए, देखिए, परखिए, पहचानिए। सत्य है लेकिन तो स्वीकार करिए नहीं तो आप अपनी जगह हैं। नहीं तो जानने के बाद तो माना गया ना। हां। तो जानने के बाद आपके यहां ये माना गया कि वो जो सदानंद जी हैं। हां। वो भगवान के कल के अवतार हैं। पूर्ण अवतार हैं। अवतार हैं। तो जो सदानानंद जी हैं उनके मतलब जो आपको जो ज्ञान विज्ञान मिला है शास्त्र सम्मत है या शास्त्र शास्त्र सम्मत है। शास्त्र सम्मत
00:02:42:04 शास्त्र सम्मत है। तो अ मतलब एक मैंने बोर्ड लगा हुआ देखा है सदानानंद जी का जगह-जगह पर कि उसमें लिखा होता है कि ईश्वर कण-कण में नहीं है। हम ईश्वर मतलब वो एक अह एक जगह पर है और बाकी ईश्वर कण-कण में नहीं है। क्या ये सही बात है? देखिए ईश्वर कण-कण में नहीं है। अगर कण-कण में ईश्वर होता आप चल भी नहीं पाते। कितने कण आपके पांव के नीचे आते हैं। जी कण-कण में शक्ति है। आकाश में आत्मा है और परमात्मा रहते हैं परमधाम में। ना तद्भाषित सूर्य ना शशांक ना पाव का यद गत्वा नतते त परम अपना परिचय दिया कि मैं कहां रहता हूं। नहीं तो फिर जो ऐसे सर्वव्यापी कहा गया है ईश्वर को कई जगह विष्णु भगवान का तो मतलब ही है विष्णु का अर्थी सर्वव्यापक तो फिर इसका क्या करें इसका ये कार्य करें जी कोई भी ग्रंथ ना तो पूरा सही है और ना पूरा गलत है मतलब ऐसी बातों को ना जो ईश्वर को एक जगह अगर वो सर्वव्यापी होता तो वो क्या है यदा यदाई धर्मस्य ये यदा यदाई क्या है जब जब हुए धर्म की आि बाड़े असुर अधम अभिमानी तब तब धरी प्रभु
00:03:57:10 मनुज शरीरा हर दयानिधि सज्जन पीरा नहीं तो वो सर्वव्यापी होते हुए भी अवतार ले सकता है ना जैसे वो सर्वव्यापी है फिर भी वो किसी के लिए एक पूर्ण अवतार एक पूर्ण अवतार होता है एक अंश अवतार होता है एक निमित्त अवतार होता है तो माता जी जैसे आपने कहा कि ईश्वर कण-कण में नहीं है। कण-कण में नहीं है। सर्वव्यापी नहीं है। सर्वव्यापी नहीं है। वो एक जगह है। तो ईश्वर कंट्रोल कैसे करता है सृष्टि को? सृष्टि को कंट्रोल वो ऐसे करता है। आदि शक्ति महामाया उसकी जो अधानी है प्रकृति प्रकृति के माध्यम से कंट्रोल करता है। यानी कि वो प्रकृति उसे कार्य करती है। यानी कि वो स्वयं कहीं नहीं है। हर जगह नहीं है। उसकी जो शक्ति है वो हर जगह है। हर जगह है। प्रकृति क्रिया मणि गुण कर्मणि सर्वथा अहंकार युत्मा कर्ता अहम इति मनते जी अहंकारी कहते है मैं कर रहा हूं। हां उसका ईश्वर सर्वभूत नाम ईश्वर सब भूत प्राणियों में हम लेकिन मैं परमेश्वर किसी में नहीं हूं। ठीक है। अच्छा इसमें जो मोर से लोकेचा इसमें एक बात ये आती है माता जी जैसे हमने कहा हमारी हर बात शास्त्र सम्मत है। हम तो हम ये कह रहे हैं कि कुछ बातें शास्त्रों की गलत है।
00:05:12:24 हां है ना? तो फिर हमारी बात शास्त्र सम्मत कहां से हुई? ऐसे हुआ जैसे रामचरितमानस को देख लीजिए। एक जगह तुलसीदास ने क्या लिखा है? सियाराम सब जग जानी तुलसीदास जी लिखे एक जगह तुलसीदास जी ने लिखा एक अनी अरूप अनामा अस सजन परधामा ये भी तुलसीदास जी ने लिखा है जगत प्रकाशक प्रकाशक रामू मायाधीश ज्ञान गुण धाम ये भी तुलसीदास जी ने लिखा है आप इसमें क्या सच मानेंगे मनुस्मृति में लिखा हुआ है कि हमारे श्रुति स्मृति शास्त्र जो हैं वो अगर मान लीजिए कहीं दो विपरीत बातें करें तो उन दोनों में सामंजस्य की शिक्षा लेनी चाहिए कभी भी हम कट नहीं कर सकते इसको हां हां और मत्स्य पुराण में भी लिखा हुआ है कि समस्त श्रुति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा ही साधु संत धर्म है। और एक न्याय दर्शन के अनुसार एक होता है अर्ध कुकुट न्याय हम उसका अर्थ होता है कि हम एक ही जगह की एक बात को प्रमाण और दूसरी बात को अप्रमाण नहीं मान सकते। उसके लिए फिर हम इसका मतलब है कि अगर हम इस चीज़ पर संदिग्ध बुद्धि रख रहे हैं इसका मतलब है हमारा प्रमाण और कुछ है। शास्त्र हमारा प्रमाण नहीं है। मतलब जिस शास्त्र में हम ये कटिंग कर रहे हैं ना कि इतना हम मानते हैं उतना नहीं मानते। तो इसका मतलब है कि शास्त्र हमारे लिए प्रमाण नहीं है। हमारे लिए प्रमाण और
00:06:27:27 कुछ है। उसके आधार पर हम ये देख रहे हैं शास्त्र की कौन सी बात हमारे से मैच खाती है। ये बात है। तो आप शंकराचार्य जी को आप मानते हैं? मानते हैं शंकराचार्य का विवेक चुड़ामणि पुस्तक है उसका आप पढ़े जी हम जी उसमें है शब्द जालम महा अरणम चित्त भड़मकारम हम शब्द जो है चित्त को भमकाने भटकाने वाला एक ऐसा वन है जिसमें घुसकर और छोर नहीं दिखाई देता हम अभी अभिज्ञात परे तत्व ये शंकराचार्य बोल रही हूं मैं अभिज्ञात परे पर तत्व सास अस निष्फला अभिज्ञात पर तत्व सा अ निष्फला उस परम तत्व को पा लिया तब भी सास अध्ययन बेकार है और नहीं पाया तब भी बेकार है और इस वजंतु शासण यजंतु देवान कुरंत कर्माण भजंतु देवता आत्मिक के बोधन बिना विभक्ति सिद्धते ब्रह्मा संत 100 ब्रह्माओं की रात भी बीत जाए तब भी आत्मा परमात्मा का मिलन नहीं हो सकता जब तक परम तत्व आपसे से नहीं मिल नहीं वो तो एक बात अलग हो गई माता जी अभी बात ये चल रही है कि हम पूर्णतया शास्त्र को मानते हैं या नहीं मानते मानते हैं तो शास्त्र में ये बात कहीं नहीं लिखी है कि उसकी बातों को कटनी छटनी
00:07:43:06 करके ही लिया जाए और वेद में एक जगह आया है ना पंथ्या वो कहते हैं वेद ये घोषणा कर रहे हैं कि मेरे अलावा और कोई मार्ग नहीं है हम इस जो चक्कर है ना इससे छूटने का मुक्ति का और कोई मार्ग नहीं है मेरे अलावा ये शास्त्र ने घोषणा की है यजुर्वेद में वेद ने भी किया है और श्वेता शत्रुपनिषद में भी किया हम हम तो अगर हम यह कहेंगे कि नहीं शास्त्र कहीं-कहीं पे गलत है। तो इसका मतलब हमारा शास्त्र वो नहीं है। कुछ और है जिसके आधार पे हम वो चेक कर रहे हैं कि भाई यहां पे गलत है। अब ऐसा है कि भगवान के दो तरह के रूप हैं। एक है व्यवहार में ना आ सकने वाला। मांडकनिषद से बोल रहा हूं। एक है व्यवहार में ना आ सकने वाला। वो व्यवहार में आ ही नहीं सकता। फिर वही व्यवहार में ना आ सकने वाला। हम व्यवहार में आ सकने वाला रूप लेता है तो उसे हम अवतार कहते हैं। सगुण साकार भगवान हो जाते हैं। तो ये जो दो तरह की बातें हैं ना शास्त्र में जिसप हम कंफ्यूज हो रहे हैं कि एक जगह तो ऐसा कह दिया एक जगह वैसा कह दिया। भगवान वो कहीं पे वो व्यवहार में ना आ सकने वाली बात हो रही है। सृष्टि निर्माण से भी पहले की बात हो रही है और कहीं पे सृष्टि बन चुकी है उसके उसके बाद किस तरह से व्यवहारिक होते हैं भगवान उसकी बात हो रही है। जैसे कि
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00:08:49:25 भगवान ने कहा मैं अजन्मा अविनाशी होते हुए भी अपनी योग माया को अधीन करके प्रकट
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00:08:57:01 होता हूं। सजाम में हम है ना। वो सृजन कैसे कर रहा है अपना। जबकि उसका वो तो उसका सृजन हो ही नहीं सकता। तो वो तो अनादि है तो फिर भी वो कह रहा है मैं अपना हूं मैं अपना सजन करता हूं वही यदा ही धर्मस वाला है ना वो अपना सजन करते सृजन कैसे कर सकते हैं वो तो पहले वो अपने रूप का सृजन करते हैं उस रूप का जिस रूप को लेकर के वो हमारे लिए व्यवहार का विषय बनते हैं तो ये जो दो तरह की बातें हैं इनमें से कोई भी बात गलत नहीं है मगर आप कह रहे हैं कि एक बात गलत है जी अब एक चीज है भगवान कृष्ण जब अवतार लेकर आए पूरी गीता एक शब्द है भूत प्राणी उसमें एक श्लोक श्लोक है अव जानती मा मुड़ा मानुष तनुमासितम परम भाव मजा जंतु मम भूत महेश्वरम मेरे परम भाव प्रभाव को नहीं जानते मुझे मनुष्य समझते हैं हम जब मैं अवतार लेकर आता हूं तो मुझे मनुष्य समझते हैं। बात ये हो रही है माता जी कि भगवान सर्वव्यापक है। शास्त्रों में भी कहा गया है। तो आप आप जब शास्त्र का कोई श्लोक बता रही हैं तो आप शास्त्र के श्लोक को रख के अपनी बात की पुष्टि कर रही हैं। पर वहीं पर जब आपको दूसरा श्लोक दिया जा रहा है जिसमें कि आपकी बात का विरोध है तो आप कह रहे हैं ये बात नहीं माननी है। तो
00:10:12:04 या तो शास्त्र को लीजिए या बिल्कुल मत लीजिए। नहीं नहीं नहीं शास्त्र को तो लेना ही पड़ेगा। शास्त्र ही हमारी मुख्य मुख्य धारा है। तो फिर शास्त्र शास्त्र से ही हम प्रमाणित करेंगे। तो शास्त्र में जो भगवान को सर्व्यापक कहा गया उसको क्यों नहीं ले रही है? ईश्वर सर्वव्यापक है। परमेश्वर नहीं। परमेश्वर नहीं है। अच्छा चलिए इसको थोड़ा सा लॉजिकली समझने का प्रयास करते हैं। तर्क से जैसे आपने कहा कि ईश्वर सब जगह नहीं है। ईश्वर की शक्ति सब परमेश्वर अलग है। परमेश्वर अलग है। परमेश्वर परमेश्वर परमेश्वर। परमेश्वर सब जगह नहीं है। परमेश्वर की शक्ति सब जगह है। तो परमेश्वर में और उसकी शक्ति में अंतर होगा फिर तो क्योंकि वो तो हर जगह है नहीं। ना उसकी शक्ति हर जगह है। उसकी शक्ति उसमें अंतर होगा। तो थोड़ा बहुत जो उसकी शक्ति है वो थोड़ा बहुत कम मतलब शक्तिशाली है। वो आत्मा ईश्वर ब्रह्म है। नहीं नहीं मैं यही कह रहा हूं। जैसे कि मैं यहां पर हूं मैं सब जगह नहीं हूं। मेरी शक्ति सब जगह है। हम तो मेरी शक्ति में और मुझ में थोड़ा अंतर है। इसीलिए तो मैं सूर्य सूर्य परछाई में अंतर है। हां। तो इसका अर्थ यह है कि जो सारा कार्य मैं कर सकता हूं वह मेरी शक्ति नहीं कर सकती। हम यही माना जाए हम है ना जो सारा कार्य परमेश्वर कर सकते हैं वो उनकी शक्ति नहीं कर सकती है
00:11:27:08 उनकी शक्ति जो परमेश्वर कर सकते हैं हां परमेश्वर के आदेश निर्देश पर वो सब कर सकती है नहीं आदि शक्ति जो होती है अंतर है कि नहीं शक्ति अंतर है अंतर है अंतर है अंतर है तो वो अंतर जब है तो किसी ना किसी मामले में तो शक्ति कम होगी ना परमेश्वर से कम है कम है तो इसका मतलब कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ ऐसा है जो परमेश्वर कर सकता है पर शक्ति हां नहीं कर सकती इसका मतलब यह माना जाएगा कि ईश्वर का पूर्ण कंट्रोल नहीं है पूरी दुनिया पे क्योंकि शक्ति सब जगह है ईश्वर हां सब जगह है उसका कंट्रोल परमधाम से ही होता है जैसे राष्ट्रपति हर जगह नहीं जा सकता तो राष्ट्रपति नहीं जा सकता इसीलिए तो चोरी होती है हां राष्ट्रपति हर जगह नहीं जा सकता और दिल्ली से वो कंट्रोल कर लेते हैं तो ऐसे वो परमधाम से कंट्रोल कर लेते हैं शक्ति के माध्यम से नहीं नहीं वो आपसे ही कह रही है प्रकृति के माध्यम से करते हैं हां ठीक प्रकृति के माध्यम मगर उतना कंट्रोल नहीं जितना खुद जैसे मैं वहां पर नहीं हूं मेरा कोई और उसको तो अलग उनका जैसे मैं वहां पर नहीं हूं। ये कैमरा चल रहा है। कैमरे के पास मेरा कोई सहयोगी है। मैं कैमरे के पास नहीं हूं। यानी वो सहयोगी के रूप में मेरी शक्ति है। परंतु उस सहयोगी और मुझ में अंतर है। अंतर है। अंतर है। तो जो मैं कर सकता
00:12:42:09 हूं हम है ना? वो सहयोगी नहीं कर सकता। कर सकता। ठीक है? हम्म तो इसका मतलब ये है क्योंकि मैं वहां पे नहीं हूं तो वहां पर मेरा पूर्ण कंट्रोल कंट्रोल नहीं है वो सहयोगी के पास है तो यानी मेरा पूर्ण कंट्रोल नहीं है सब जगह पूर्ण देखिए पूर्ण कंट्रोल परमेश्वर का होता है वही तो पूछ लेकिन वो कंट्रोल उसके आदेश निर्देशक प्रकृति करती है नहीं तो प्रकृति थोड़ी सी कम है ना कम है ना जैसे राष्ट्रपति आदेश हो गया हां प्रधानमंत्री का आदेश हो गया जी तुम ऐसा कर सकते हो मिलिट्री शासन लागू हो गया राष्ट्रपति का मिलिट्री शासन लागू करो तो हो गया हम तो उसमें पूर्ण कंट्रोल मिलिट्री का हो जाएगा। तो अब जैसे आपका कहना मतलब है मतलब अगर वो जो मिलिट्री है या जो भी मेरा कंट्रोल वहां करवा रहा है अगर गुणवत्ता के मामले में मैं उससे सुपीरियर हूं तो जो मैं कर सकूंगा वहां पर वो मिलिट्री नहीं कर पाएगी जहां पर वो है मैं नहीं हूं। राष्ट्रपति आ जाएगा तो प्रधानमंत्री पावर सीज हो जाएगी। प्रधानमंत्री आ जाए मुख्यमंत्री पावर सीज हो जाएगी। तो यानी कि अंतर है ना? अंतर बहुत है। इसका मतलब जैसे राष्ट्रपति है वो चाहता नहीं है कि अह हमारे देश में कहीं पर डांका डले है ना वो चाहता नहीं है। परंतु क्योंकि वह स्वयं सब जगह नहीं है। उसकी शक्ति सब जगह है इसलिए
00:13:57:18 उसकी इच्छा के विरुद्ध डांका डल जाता है। डल जाता है। तो इसका मतलब जैसे राष्ट्रपति का पूर्ण कंट्रोल नहीं है देश पर। उसी तरीके से जो सदानंद जी हैं उनका भी पूर्ण कंट्रोल नहीं है इस दुनिया पे। हम्म। लेकिन एक मिनट अब मुझे 64 कला अब मुझे एक बात कहनी पड़ेगी जी पूर्ण कंट्रोल जो वो देखेगा जो तत्व ज्ञान प्राप्त होता है वो अपनी ज्ञान दृष्टि से देखेगा वो देखेगा उसे दिखाई देगा वो देखने के बाद आपका जो उसके जो कंट्रोल होता है प्रकृति उसके अधीन होती है अधीन है भूकंप ले आएगा जी महामारी ले आएगा जी वो जैसे एक मकान मालिक उसके मकान में तो किराएदार तोड़फोड़ मचा देगा, तो उसको हटा देगा। ऐसी प्रकृति इस पूरा उथल-पुथल मचा हुआ है। और वो समय आ रहा है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। माता जी थोड़ा सा थोड़ा दिमाग से बढ़ रहे हैं। एक्चुअली जो दार्शनिक पॉइंट ये है कि अगर ईश्वर की शक्ति है और उसमें अंतर है है ना? मगर ईश्वर की शक्ति जो कि सर्वव्यापक है। और ईश परमेश्वर में अंतर है यदि तो फिर यह हमें मानना पड़ेगा कि परमेश्वर का उतना कंट्रोल पूरे जगत में नहीं
00:15:12:19 है जितना कंट्रोल जहां पर वो स्वयं बैठा हुआ है वहां पर है। तभी तो नहीं तो यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर की शक्ति और परमेश्वर की शक्ति और परमेश्वर में कोई अंतर नहीं है। फिर यह मानना पड़ेगा। यह मान लेंगे तो फिर परमेश्वर सर्वव्यापक हो जाएगा। शक्ति के रूप में परमेश्वर का आदेश हो गया शक्ति के लिए मगर शक्ति वो फुल पावर में आ जाएगी मगर शक्ति उतनी शक्तिशाली नहीं है ना जितना परमेश्वर है हम उतनी नहीं है ना उतनी नहीं परमेश्वर तो कुछ अंतर है इसका मतलब एक रस उसकी सत्ता नहीं है परमेश्वर की एक रस सत्ता नहीं है कि जितनी यहां है उतनी पकड़ वहां भी है। जैसे मैं हूं मैं बाधित हूं। मेरी पकड़ के पास उतनी है जितनी है। जहां तक मेरा हाथ वहां तक तो मेरी पकड़ है। मगर हाथ के बाहर की सीमा में मेरी पकड़ नहीं है। तो परमेश्वर क्योंकि परमेश्वर भी मेरी तरह है। हाथ के बाहर वो नहीं है। उसकी शक्ति है। तो वो भी मेरी तरह बाधित हो जाएगा। फिर ये ऐसी असंख्य धरती है। यहां परमेश्वर आया कार्य करके चला गया। हम प्रकृति के हवाले कर दिया। जी। अब प्रकृति अपने हिसाब से कर रही है। जी अब ऐसी कई धरतियां वहां परमेश्वर चला जा फिर वहां करेंगे जी फिर जो परमेश्वर की जो शक्ति होती है जी
00:16:28:16 जो आदि शक्ति होती है मूल प्रकृति होती है उसके माध्यम से वो करवाता है तो उसमें अंतर होता है अंतर है वही मैं कह रहा हूं अंतर होता है उसके आदेश निर्देश वही करती है इसका मतलब जो उसे स्वतंत्र कर देता है इसका मतलब जो वो है कल्कि जी आपके अनुसार वो सर्वशक्तिमान नहीं है वो सर्वशक्तिमान है हम तो वही वही सर्वशक्तिमान है उन्हीं के आदेश निर्दय प्रकृति समय अपने फुल पावर में नहीं तो वही दिक्कत आ रही है ना बात यही हो रही है कि अगर वो सर्वशक्तिमान है तो वो पूरे दुनिया में पूरे ब्रह्मांड में पूरे ब्रह्मांड में असंख्य ब्रह्मांड आएगा पूरे ब्रह्मांड में उनका कंट्रोल उतना ही होना चाहिए जितना जहां वो बैठे हैं वहां कंट्रोल है जहां जितना जहां वो बैठे हैं वहां पे कंट्रोल है। अब यहां से चले गए 2006 में धरती में थे नहीं नहीं वो थोड़ा सा हां हां विषय बदल जाएगा। जितना कंट्रोल जहां पर परमेश्वर है हम जितना कंट्रोल उनका वहां पे है उतना ही कंट्रोल पूरी दुनिया में होना चाहिए। पर यदि वो स्वयं पूरी दुनिया में नहीं है बल्कि उनकी शक्ति है पूरी दुनिया तो देगा ना नहीं वो देगा जो भी है मगर उतना कंट्रोल उसका नहीं रहेगा जैसे मैं प्रकृति का रहेगा हां नहीं प्रकृति थोड़ी सी कम है
00:17:43:18 ना परमेश्वर से क्योंकि परमेश्वर और प्रकृति में अंतर है अंतर है अंतर है तो प्रकृति में कम गुणवत्ता कम है गुणवत्ता कम है तो मेरी पकड़ पूरी दुनिया पे एक समान नहीं है ये मैं कह रहा हूं अच्छा इसको आपके एक मिनट जैसे यह संसार है एक आकाश के नीचे जितना भी है उसको संसार कहते हैं। एक आकाश के नीचे ये संसार है। आकाश से ऊपर ब्रह्मांड शुरू हो जाता है। अभी जो आप है ये भी तो ब्रह्मांड है। ये ब्रह्मांड ये ब्रह्मांड नहीं है। ब्रह्मांड क्या किसे कहते हैं? यह ब्रह्मांड आकाश से ऊपर के अंतर्गत आने वाली तो है ये ये संसार है आकाश जो भी है संसार है नहीं संसार पिंड और ब्रह्मांड का तालमेल जब तक नहीं होगा पिंड और ब्रह्मांड की तालमेल वाली शिक्षा जब तक नहीं आएगी अच्छा इसको ऐसे ले लेते हैं माता जी आपके हिसाब से वैदिक कौन है वैदिक किसे कहते हैं कल्कि वाले वैदिक है कि नहीं कल्कि वाला सनातनी है वैदिक नहीं है सनातनी किसे कहते हैं जो सदा सर्वदा रहने वाला हो जो सृष्टि से पहले भी था और बाद में भी रहेगा। तो ऐसे तो सनातनी सभी हैं। फिर कल्कि वाले में डिफरेंट क्या है? मतलब जैसे जो आईएस आईएस का वो है
00:18:59:08 आतंकवादी सुनिए आईएस आईएस का जो आतंकवादी है जीव के रूप से देखें तो वो भी सनातनी है। कुत्ता है एक एक मिनट जैसे स्वान है। जीव रूप से देखा जाए तो वो भी सनातन है। पहले सनातन के शब्द का अर्थ जो सदा से था है और रहेगा। ये सनातनी होगा। जब सृष्टि नहीं थी तब भी सनातन था। हां शब्द है धरती शब्द है आकाश शब्द है सद प्रकाश तो फिर सभी सृष्टि शब्द के पास तो फिर वैचारिक अंतर के साथ आपकी वो क्या है पहचान क्योंकि वो अस्तित्व के हिसाब मेरी जो पहचान है अस्तित्व के हिसाब से अस्तित्व के हिसाब से स्वान और आईएस आईएस का आतंकवादी और आप हम सब एक हैं हम हमारी जानकारी क्योंकि हम सब आत्मा के रूप से सनातन है नित्य हैं। ठीक है तो फिर वैचारिक पहचान फिर क्या हुई जो आपको डिफरेंट बनाती है ये हो गई जी जैसे आपने शाम को उसमें ले लिया मनुष्य को भी उसमें ले लिया सब सब एक हो गए नहीं है हां एक हो गए ना उस उस दृष्टिकोण से जो आपने कहा जो सदा से था है और आत्मा वाली दृष्टि ये आत्मा वाले कहते हैं सब एक है नहीं परमात्मा वाला नहीं कहेगा आत्मा वाले कह कुत्ते में भी डिफरेंस आपने सनातनी की जो परिभाषा बताई जो था है और रहेगा तो कुत्ता भी था और रहेगा मतलब जीव
00:20:14:16 रूप से उसके मौलिक स्वरूप से आप भी थी है और रहेंगी मौलिक स्वरूप से मैं भी था है और रहूंगा मौलिक स्वरूप से आतंकवादी था जो आतंकवादी है जो वो भी था है और रहेगा तो क्या हम ये मान ले कि कल्कि वाले आतंकवादी के समान है या कल्कि वाले यातन के समान है ये वाली बात आ गई अब इसमें थोड़ा सा प्रश्न छोटा होता उत्तर बड़ा होता जी जी एक चीज आती है राम जी ने कहा है कि आकर चारी लाख चौरा योनि फिरते जी अविनाशी जो यह स्ान है जो ये पिंडज में आते हैं पिंडज जो योनियां हैं तो ये 84 लाख के इनमें विवेक नहीं होता है आहार निद्रा भय मैथुन दण पशु समाना मैं समझ गया अज्ञानो एको अधिको विशेष ज्ञान हीन पशु मेरा प्रश्न समझ नहीं पाई मैं ये कह रहा हूं कि आप वैदिक हैं कि नहीं वैदिक किसे मानती हैं कल्कि वाले वैदिक है कि नहीं? तो आपने कहा कि हम सनातनी है तो मैंने कहा कि सनातनी तो कुत्ता भी है। सनातनी तो सब है। अगर अस्तित्व के आधार पे देखा जाए तो था है और रहेगा वो सब है। अब इसमें से मेरी जानकारी में सनातनी वो है जो सनातन धर्म ग्रंथों पर आस्था
00:21:30:04 है। सनातनी मान्यताओं पर आस्था है। जो इस मान्यता पर आस्था है कि मैं था है और रहूंगा। हम्म ये वो सनातनी है जिसका हम व्यवहारिक उपयोग करते नहीं तो मुसलमान भी सनातनी है। अस्तित्व के उससे देखा जाए अस्तित्व के पॉइंट ऑफ व्यू से देखा जाए तो हमारी जानकारी में तो मुसलमान भी सनातनी है। परंतु हम किस सनात सुनिए तो हम किस विचारधारा की बात कर रहे हैं। हम उस विचारधारा की जिसमें जो इस सनातन मान्यता को मानता भी हो। आप मुसलमान को सनातन कैसे समझाएंगे? देखिए नहीं आपको मुसलमान भी सनातनी लेकिन मुसलमान से जब आप बात करेंगे वो कहेगा मैं सनातनी नहीं हूं तब आप तब हम समझा देंगे हुफ मुकतात से मैं हम हुफ मुकत्तात से बात करेंगे वो विषय पलट रहा है मैं जो विषय नहीं पलट रहा आपने कहा मुसलमान भी है लेकिन मुसलमान आपकी भाषा को नहीं समझेगा मुसलमान गीता को नहीं समझेगा मुसलमान कुरान से समझेगा मैं समझ रहा हूं मगर अभी क्या है अभी हम वो बात मुसलमान से बात हम लोग कुरान से बात करेंगे सुनिए तो आप कर्मकांड कहते हो मुकम्म कहते हैं आप अध्यात्म कहते हो मुसाबी कहते हैं हम तत्व ज्ञान कहते हो मुकतात कहते हैं ये जो सारा हिंदू किसे कहते हैं हिंदू की परिभाषा क्या है मुसलमान
00:22:45:18 की परिभाषा क्या है जैन की परिभाषा क्या है बौद्ध की परिभाषा क्या है ये परिभाषा है देखिए विषयंतर ये हो रहा है कि मैंने आपसे पूछा है कि आप वैदिक हैं कि नहीं तो आपने कहा हम सनातनी है तो मैंने कहा कि उस हिसाब से सनातनी तो वो हर वस्तु है जो थी है और रहेगी अपने मौलिक स्वरूप से ठीक है तो अब मौलिक स्वरूप से तो पूरी दुनिया ही सनातन हम हमेशा तो एक मिनट आप देखिए जो सदा सर्वदा रहने वाला हो वो होता है परमात्मा अब आप अपनी वैचारिक मान्यता बताइए कि मैं ये हूं वैदिक नहीं हूं मैं जीव हूं वैदिक नहीं है आपका मैं जीव हूं ये आपका अस्तित्व है ये अस्तित्व है आपका मान्यता हम किस विचारधारा को मानते हैं वो क्या है हां मैं सनातनी विचारधारा को मानते सनातनी विचारधारा क्या है? कहां से विस्फोटित होती है? यह भगवान विष्णु भगवान राम भगवान कृष्ण तो आप मना कर रही है कि वेद भगवान विष्णु राम तो कहते हैं कि हम तो शास्त्रों के अधीन है। आप कह रही है हम शास्त्रों के इधर जाएंगे कई बार। ना हां जितने भी वेद हैं हां जितने भी धर्म ग्रंथ हैं हां इसमें जो सर्वोच्च धर्म ग्रंथ हैं हम धर्म ग्रंथों की तो बाढ़ आ रखी है भगवानों की बाढ़ आ रखी है इसमें सही क्या है और गलत क्या है ये जब मंथन होगा ना हम ये जब ये जब मंथन होगा श्रोता
00:24:00:28 वक्ता ज्ञान निधि कथा राम के गुण किम समझो मैं मूढ़ जल कलम मल ग्रसित विमूढ़ तुलसीदास जी कह रहे कली के मल से ग्रसित मैं क्या समझूं इन दोनों की बातों को अपने खुद उनके पकड़ में नहीं आ रही है। कि जब श्रोता और वक्ता दोनों ज्ञान का खजाना हो तब यह तत्व जो है तब यह जो है थोड़ा सार पकड़ में आएगा नहीं तो मेरे बस का नहीं इसको पकड़ अगर आपने कह दिया आपने कह दिया ना कि शास्त्र जो वैदिक धर्म है आपने ये कह दिया शास्त्र की कुछ बातें ना मानने योग्य हैं तब मैं कह रहा हूं तो शास्त्र की कुछ बातें जब ना मानने योग्य है तो आपने शास्त्र का खंडन कर दिया नहीं कण-कण में हम नहीं मानते आपने शास्त्र का खंडन कर दिया तो जब शास्त्र का खंडन कर दिया शास्त्र का खंडन मैंने नहीं किया तो ये क्या है शास्त्र का खंडन नहीं क्या शास्त्र में जो गलत है तो वो अच्छा चली थी उसका खंडन कर जो तत्व ज्ञान के तत्व ज्ञान ही खंडन कर सकता कोई नहीं कर सकता मैंने आपको बताया ना कि अर्थ कुकुट न्याय होता है कि हम अब गीता में वेदो व्यास हुआ संजय हुआ दृष्ट हुआ था कृष्ण हुआ हमें कृष्ण हुआ से मतलब है कितने कितने हुआ कितने वाच वेदव्यास जी भगवान ने वेदव्यास जी ने 500 साल बाद जब आए तब गीता लिखी उससे पहले भगवान कृष्ण मानेंगे सुन लीजिए गुंडा बदमाश ये और वो उनकी परिभाषा ये
00:25:16:00 थी सुन लीजिए सुन लीजिए ऐसा है कि अगर हम शास्त्र की एक बात को मना कर रहे हैं कि यहां पे शास्त्र झूठ बोल रहा है गलत बोल रहा है ठीक है इसका मतलब वो शास्त्र जो है उसको लिखने वाला कहीं-कहीं पर झूठ बोल सकता है हां बोल सकता है ना जब शास्त्र कोई लिखता है ना एक एक तुलसीदास माता जी मेरी मेरी बात पूरी हो जाती जब कोई व्यक्ति शास्त्र लिखने वाला एक जगह पर झूठ बोल सकता है तो वो पता नहीं कहांहां पर झूठ झूठ बोल सकता है। वो झूठ नहीं बोलता। उसको यह नहीं पता चलता मैं झूठ बोल रहा हूं। तो अज्ञानता कर सकता है। अज्ञानता कर सकता है। अज्ञानता कर सकता है। एक अज्ञानता कर सकता है। अज्ञानता तो तो जब वो अज्ञानता कर सकता है तो वो तो दूसरी जगह भी कर सकता है। फिर भगवान जी कल हम पकड़ाए थे ना जैसे इसका मतलब हमारा जो सोर्स ऑफ इंफॉर्मेशन है वो शास्त्र नहीं बल्कि कोई और है। जैसे रहीम दास को जानते हैं। सुना होगा रहीम दास के विषय में। सुना है ना? रहीम दास ने बेटा तुम भी सुनो। रहीम दास ने कहा कि जब यह गांठ की उपाधि
00:26:19:08 जब जब गांठ पड़ जाती है व्यवहार में क्या है उसमें मैं एक यहां पे एक बात कहता हूं कि इस तरह से जैसे कि वेद की ये वाली बात माननी नहीं है। ये वाली माननी है। ठीक है। इस तरह से कुछ नहीं है। इस तरह से कुरान को मानने वाला भी कह देगा। मैं भी वेद का ही अर्थ बता रहा हूं। क्रिश्चियन को मानने वाला भी कह देगा। कुरान मुसलमान होगा वो ना समझेगा उसको। आप थोड़ी समझेंगे। कुरान में जैसे लिखा है नूर अल्लाह ही। इस तरीके से माता जी जो आतंकवादी है वो भी कह देगा कि भैया मैं तो आतंकवाद महात्मा बन जाएगा। सुनेगा तो अभी बहुत से मुसलमान इसमें हैं। देखिए बात ये हो रही है कि हिंदू सनातन वैदिक हिंदू माने दूषित भावना से हीन। एक मिनट सनातन वैदिक आर्य हिंदू यह वो है जिसका वेद में प्रमाण बुद्धि हो। प्रमाण मतलब वेद का एक भी वचन गलत नहीं है। और फिर वे जो वेद वेदांगों को आगे प्रोत्साहित करने वाले जो शास्त्र जो उनका पोषण करते हैं उनमें प्रमाण्य बुद्धि हो। परंपरा से जो हमें प्राप्त होते हैं। मगर जब हमारी बुद्धि प्रमाण नहीं है तो ना हम वैदिक सिद्ध होंगे ना ही सनातन विचारधारा को मानने वाले सिद्ध होंगे ना ही हिंदू सिद्ध होंगे। जी फिर क्या होगा? जब
00:27:34:12 सिद्ध नहीं होगा तो फिर क्या होगा? फिर अधर्मी अवैदिक नास्तिक ये क्या हो रहा है आजकल? नहीं मैं आपसे पूछ रहा हूं। आप क्या मान रही हैं? अपने आप को नास्तिक मान रही हैं। एक मिनट जी मैं नास्तिक थी। हम मैं कब तक नास्तिक थी? हम कब तक थी? जब तक मैंने मार्ग में नहीं आती। तत्व को नहीं देखा। ठीक है। तो तब तक मैं मानती थी। मनुस्मृति में लिखा हुआ है माता जी कि जो वेद की एक बात को भी मना कर देगा कि हम उसको नहीं मानते वो नास्तिक है और मनुस्मृति को मानते हैं हमारे राम जी जब बाली को मारने गए थे तो राम जी ने मनुस्मृति का वहां पर विवरण दिया तो राम जी को मानती है आप कि नहीं मानती पूरा खूब जानते हैं हम लोग पूरा का पूरा ठीक है हां तो जब उन्हें आप उनको प्रमाण मान रही है वो मनुस्मति को प्रमाण मान रहे हैं मनुस्मृति कह रही है वेद का एक भी बात का विरोध करने वाला व्यक्ति नास्तिक है 1 मिनट हां हां जी भगवान राम ने भगवान राम ने जी भगवान कृष्ण ने भगवान विष्णु ने ये बहुत गुण विषय बहुत ही गुण विषय इसमें सामान्यता आप इसको नहीं पकड़ पाएंगे कृपाचार्य
00:28:50:07 द्रोणाचार्य भीष्म पिता पढ़े लिखे विद्वान थे पढ़े लिखे विद्वान थे लेकिन संत शिरोमणि गोपियां हम नहीं जनक जी ने पकड़ा ना उनको मोक्ष मिल गया। सुनिए जनक जी को देखिए ऐसा है ना जी मोक्ष किसको मिला? देवलोक किसको मिला? शिवलोक किसको मिला? परमधाम किसको मिला? मोक्ष मिला ना गीता में उन्होंने कहा है भगवान ने। एक मिनट जी। जनक जी के गुरु कौन थे? आप बताइए। अष्टावक्त। ठीक है। ठीक है। जनक जी ने कब उनको गुरु बनाया? जी। सुखदेव जी को मोक्ष मिला।
00:29:27:10 मोक्ष जो है वह होता है बिना परमात्मा के दूसरा कोई नहीं दे पाता। उसका धाम होता है मोक्ष। तो इसका मतलब नहीं मिला और नहीं मानती मोक्ष मिला। एक मिनट है ना भगवान जिसको चाहे एक अपवाद जिसको चाहे वह मोक्ष दे सकता है और मोक्ष मिलता है सहस्त्रे मनुष्य कश्यप कप कोई एक दूसरे को जानता है जी मोक्ष कहते किसे हैं मुक्ति कहते किसे हैं मुक्ति से पहले जब अपने बंधन आपको सम किससे मुक्ति हम अपने बंधन को जब तक नहीं पकड़ेंगे हमें मुक्ति समझ में आएगी नहीं। मुक्ति से पहले अपने बंधन पकड़िए। किससे मुक्त होना है? जेल में जाएंगे जेल से मुक्त होना है। वही प्रोसेस होगा। इसको इसको समझने का एक तरीका है माता जी। इसको ऐसे समझ सकते हैं कि अ कुल मिलाकर के आपको शास्त्रों पर उतना ही विश्वास है जितना आप जो आपने जो सत सत्य का साक्षात्कार कर लिया है जो उन्होंने बताया है उसके अनुसार ही आपको वेद में वेद की बातें मतलब एक तरीके से आपको यहां से सब कुछ मालूम है अब वेद में कहां पे सही है सही है एक मिनट आपको यहां से सब कुछ मालूम
00:30:42:12 है इसकी सीमा में वेद की जितनी बातें उनका सम्मान है और इनकी सीमा के बाहर वेद में जितनी बातें हैं या शास्त्रों में जितनी बातें हैं उन उनको दूर से राम राम। एक मिनट वेद एक सम्मानीय पूजनीय ग्रंथ है। मैं मैं जो सभी ग्रंथों में बार-बार धारा बदल जाती है। मैंने कहा कि हमने जो सत्य का साक्षात्कार कर लिया है जिसको हम तत्वदर्शी कह रहे हैं। उसमें जो जो बताया है वो हमारा प्रमाण है। उसकी सीमा में जितना वेद वेद वेद की सामग्री है, शास्त्रों की सामग्री है, वो सब हमारे लिए सम्माननीय है। और उसकी सीमा के बाहर ग्रंथों की जितनी सामग्री है, वो हमारे लिए त्याज्य है। उसको हम नहीं मानते। हां हम यहां से मानते हैं अपने अस्तित्व को अपने को तो ये जो सारी जो राम कथाएं वगैरह है जिसका हम बार-बार नाम लेते हैं वो सब यहां से आपको मिली है ये वहां से मिली है नहीं यहीं से मिली है यहीं से सारी मिली है तो वो किस नाम से छपी है वो किताबें मतलब यहां से तो रामायण आई है ये ये तो आपको लिया नहीं आपने तो यहां से लिया तो वो सब वेद भाष्य वेद उपनिषद सब इन्होंने रचे हैं हां रचे मैं दे दूंगी आपको सारे इनके हैं हां कितने कितने वेद लिखे इन्होंने? अभी इनको इनकी 22 पुस्तिकें उसके हैं।
00:31:58:00 वेद वेद वेद मंत्र हैं क्या है? वेद वेद मंत्र भी उसमें है। नहीं रामायण की पूरी की पूरी कथा है। उन्होंने लिखे हैं। पूरी कथा नहीं है। उसका सार है। रामायण में जो जो मोती चुन के रखे हैं। मतलब सार इन्होंने लिया है। बाकी ये जो रामायण इत्यादि है ये सब में मान्य नहीं। संत अब इसमें एक बात आती है क्या जो आपके जो ये हैं जिन्होंने आपको ज्ञान विज्ञान दिया है ये सर्वशक्तिमान है हां मैं कह सकता हूं अभी आप नहीं कह ठीक है सर्वशक्तिमान है तो मतलब एक तरीके से ईश्वर के बारे में ये आता है सर्वशक्तिमान का अगर अर्थ हम खोलें ईश्वर वही है जो किसी भी प्रकार के नियम के नीचे नहीं है। वो सभी नियमों को बनाने वाला सर्व नियामक है। हम है ना? वो किसी भी प्रकार के नियम के नीचे नहीं है। वो सब कुछ कर सकता है। ऐसा कुछ नहीं जो वो ना कर सके। हां ऐसा कुछ नहीं जो परमात्मा ना कर सके। ऐसा कुछ नहीं है। और आपने डायरेक्ट ज्ञान उन्हीं से लिया है। उन्हीं से लिया है। है ना? हम तो पहले और भी गुरु मेरे मैं ब्रह्म कुमारी में मैं रही हूं। ऐसा कोई ऐसा कुछ नहीं है जो परमात्मा ना कर सके। ऐसा कुछ नहीं है। पूरा ब्रह्मांड का नायक है। परमात्मा क्या झूठ बोल सकता है? वो झूठ और सत्य से परे है। नहीं। झूठ सच से परे है। वो उसने आपको सत्य दिया है ज्ञान या असत्य दिया है। परमात्मा की बात आई तो झूठ असत्य से दोनों से परे है। मैंने आपसे क्या पूछा है कि उन्होंने आपको सच बताया।
00:33:13:03 सत्य का ज्ञान दिया है। तो आप तो कह रही है वो तो सत्य से परे है। सत्य असत्य दोनों से परे है। वो परे है ना तो फिर वो ज्ञान नहीं दे सकता। क्यों नहीं ज्ञान दे सकता? ज्ञान तो सच्चा देगा ना। हम कहे सत्य असत्य दोनों से परे होता है परमात्मा। मैंने आपसे दोनों हां देखिए आप एक असत्य लागू नहीं आएगा उसमें। तो फिर वो आपको ज्ञान कैसे दे रहा है? जब लागू नहीं होगा। ऐसा है परमात्मा सत्य असत्य दोनों से परे है। मैंने बता दिया। वास्तविक एक अह अरूप अनामा असजानंद परधामा। वो परे है। वो परे है। ठीक है। तो उसने आपको सच ज्ञान दिया है कि असत्य ज्ञान दिया? सत्य ज्ञान दिया है। तत्व ज्ञान दिया। इसका मतलब परे नहीं है। तत्व ज्ञान दिया है। परे नहीं है। फिर भाई सत्य बोल रहा है ना वो आपको हां तत्व ज्ञान दिया है। तो जैसे वो आपको सत्य बोल बोल रहा है वैसे ही वो असत्य भी बोल सकता है क्या? अगर वो असत्य भी बोलेगा। हां। अगर परमात्मा असत्य भी बोला तब भी वो असत्य नहीं है। असत्य भी बोलेगा। जैसे फॉर एग्जांपल फॉरम ये जैसे अश्वत्थामा मारा गया लेकिन धन दन दन धन दन दन हाथी जबकि अश्वत्थामा नहीं मारा था हाथी मारा था ना ही झूठ था ना सच था हम क्योंकि उसको द्रोणाचार्य को डेमोरलाइज करना था द्रोणाचार्य डेमोरलाइज हो जाएंगे अश्वत्थामा उनके बेटे थे आज छोड़ देंगे हम बस वहां पे जैसे मान
00:34:28:09 लीजिए उन्होंने कहा कि ईश्वर सर्वव्यापक नहीं है। ठीक है? ईश्वर सर्व्यापक है। परमात्मा सर्व्या परमात्मा पर मैं ईश्वर परमात्मा को ही कहता हूं। वो थोड़ा समझिए आप। जैसे उन्होंने कहा कि परमेश्वर जो है गीता से बताएंगे ना। एक मिनट जैसे उन्होंने कहा कि परमेश्वर सर्वव्यापक नहीं है। ठीक है। ये सच है या झूठ है? परमात्मा सर्वव्यापक नहीं है। नहीं है। ये सच है या झूठ है? उन्होंने क्या बताया? ये सच बताया या झूठ बताया है? यह सच है कि सर्वव्यापक नहीं है। सच है। क्या वो आपसे ये कह सकते हैं कि ईश्वर सर्व्यापक है? हां वो कह सकते हैं सच है। कह सकते हैं ईश्वर सर्वव्यापक है। तो इसका मतलब हम ये मान सकते हैं ईश्वर सर्वव्यापक है। परमेश्वर परमेश्वर परमेश्वर सर्वव्यापक नहीं है। तो क्या वो आपसे कह सकते हैं कि परमेश्वर सर्वव्यापक है। हां कह सकते हैं। तो फिर वो भी सच होगा। परमेश्वर सर्वव्यापक नहीं। ईश्वर सर्वव्यापक है। मैं परमेश्वर ही पूछ रहा हूं। परमेश्वर सर्व्यापक नहीं है। मैंने कहा वो एक है अनीय मैंने आपसे पूछा है जैसे ईश्वर सर्वशक्तिमान है। तो क्या जैसे ईश्वर बाहर भीतर भी जैसे वो आपसे ये कह रहे हैं कि परमेश्वर सर्वव्यापक नहीं है। ठीक है? तो क्या वो आपसे ये कह सकते हैं कि परमेश्वर सर्वव्यापक है। ये कह सकते हैं वो। वो नहीं कह सकते। यानी वो बाधित है। सर्वशक्तिमान
00:35:43:13 नहीं है। वो बाधित क्यों है? सर्वशक्तिमान का अर्थ क्या है? सर्वशक्तिमान का मतलब यह है उसकी जो शक्ति है अभी यहां से चलकर आए बिना शक्ति के कहा ना कि सर्व आप जो बोल रहे हो उसी शक्ति के माध्यम से बोल रहे हैं तो यानी सर्वशक्तिमान वो है जो सब ईश्वर है जो सब कुछ कर सकता है आत्मा ईश्वर ब्रह्म है जो सब कुछ कर सकता है सर्वशक्तिमान हां वो सब कुछ कर सकता है यानी वो आपको ये कह सकता है ना कि ईश्वर परमेश्वर सर्वव्यापक है ये कह सकता है ना फिर सर्वव्यापक कह दिया आपने मैं पूछ रहा हूं कि क्या वो आपसे कह सकता है वो हमसे नहीं कहेगा हमको दिखा दिया तत्व ज्ञान के माध्यम से पूछ रहा हूं वो आपसे झूठ बोल सकता है नहीं बोल सकता तो फिर वो उसकी शक्ति सीमित हो गई ना वो झूठ बोलने पे रुक रहा है ना जैसे हम जैसे वो झूठ सच से परे है ना तो आप तो कह रही है वो सच बता रहा है वो झूठ सच से परे है उसे सच कहा कि परमात्मा सर्व्यापक नहीं है वो परे हो भले ही परे हो या परे ना हो उससे मतलब वो आपको जैसे सत्य बता रहा है ऐसे ही वो आपको कुछ असत्य बता सकता है ये पूछ रहा हूं हां असत्य बताया मिथ्या तो दर्शन कराया आपको असत्य बात असत्य क्या है बताया ना आपको गुमराह वो कर सकता है कभी नहीं कर सकता गुमराह मैं थी लाइन पे जैसे वो आपको सत्य के मार्ग पे ला रहा है हां वैसे ही वो आपको असत्य
00:36:58:24 के मार्ग पे ला सकता है कभी नहीं मैं असत्य में थी वो सत्य में लाया इसका मतलब वो सब कुछ नहीं कर सकता तो कर ही दिया उसने हम जैसे अनास्तिक को आस्तिक बना दिया हम जैसे ढीठ को भगवान में ले आया हम जैसे ना मानने को एकदम परमात्मा मैं बना दिया ये तो केवल सत्य पे ला रहा असत्य पे ले जा सकता है। असत्य पे ले जा सकता है। ईश्वर वो असत्य पे कभी नहीं ले आएगा। तो यहां पे असत्य हम विरोध करेंगे। तो यहां सीमा हो गई ना। असत्य संसार असत्य तो है। तो यहां सीमा हो गई ना। क्या सीमा हो गई? कि ईश्वर असत्य पे नहीं ले जा सकता। असत्य पे असत्य का खंडन तो करेगा ना वो। असत्य का खंडन करना अलग है। असत्य पे ले जाना अलग है। हम क्यों जाए असत्य पे? आप मत जाइए। मैं पूछ रहा हूं ईश्वर कर सकता है कि नहीं ऐसा? ऐसा कभी नहीं कर सकता ईश्वर। तो ईश्वर बाधित हो गया। सी ईश्वर भी नहीं कर सकता। ईश्वर भी वही कार्य करेगा। परमेश्वर आदर्श संदेश पे परमेश्वर सीमित हो गया। परमेश्वर सीमित नहीं असीमित है। तो आप कह रही हो ना वो ये नहीं कर सकता। असीमित है। परमेश्वर सब कुछ कर सकता है। आप कह रही हो ना वो ये नहीं कर सकता। हम कब ये नहीं कर सकता। परमात्मा पूरे ब्रह सब कुछ कर सकता है। वो असत्य बोल सकता है। असत्य नहीं बोल सकता। वो झूठ असत्य नहीं बोल सकता। झूठ सत्य से पर है। वो जब सत्य बोल सकता है जिस प्रकार से तो असत्य बोल सकता है। वो झूठ भी बोले वो भी सत्य होगा। तो वो उसका झूठ भी सत्य
00:38:13:25 होगा। तो मैं आपसे यह पूछ रहा हूं कि जैसे उसने आपको यह बताया कितना सर्वशक्तिमान है वो जैसे मैं आपसे पूछ रहा हूं कि जैसे ईश्वर ने परमेश्वर ने यह बताया है कि वो सर्वव्यापक नहीं है। क्या वो ऐसा भी बता सकता है कि वो सर्वव्यापक है? ये पूछ रहा हूं मैं आपसे। आप कह रही हैं कि वो सब एक मिनट समझ लीजिए थोड़ा। आप कह रही है वो सब कुछ कर सकता है। फिर आप कह रही हैं कि वो मुझे झूठ नहीं बता सकता। बस य गाड़ी फंस रही है। अगर वह सब कुछ कर सकता है तो आपको झूठ भी बता सकता है। यह बात है। अगर वो कोई मुझे झूठ बता ही रहा हो हां तो वहां पे मुझे अपने विवेक का प्रयोग करना कहीं मेरी कोई परीक्षा तो नहीं है। हां झूठ में तो हम थे ही थे। वो सत्य में लाया। इसका मतलब ईश्वर की बात नहीं लेनी है। अपने अंदर से जो बात है वह लेनी है। परमेश्वर से बात परमेश्वर की बात नहीं लेनी है। अपने अंदर से हां अंतःकरण की आवाज होती है। परमेश्वर से नहीं सुनना है। धर्म अपने से जानना है। ग्रंथों से धर्म जानना है। ग्रंथ तो ग्रंथ तो साइड हो गए ना माता जी क्योंकि उसकी बात में हम वो कर रहे हैं ना। वो तो साइड हो गए। परमेश्वर अब तो ये आ गए। अब तो ज्ञानेश्वर जी आ गए। तो ज्ञानेश्वर जी आपसे सच भी बोल सकते हैं और झूठ भी बोल सकते हैं। अर्जुन कब
00:39:28:26 माना भगवान? एक मिनट 15 अध्याय तक क्या हो रहा है? जो ज्ञानेश्वर जी हैं 700 श्लोक लगे समझाने में। एक मिनट जो ज्ञानेश्वर जी हैं वो आपसे सच भी बोल सकते हैं और झूठ भी बोल सकते हैं। है ना? दोनों बातें कर सकते हैं क्योंकि वो सर्वशक्तिमान है। तो फिर आप ये फैसला कर रही हैं अपने अपनी अंतरात्मा से कि इसमें से कौन सी बात माननी है, कौन सी नहीं माननी है। इसका मतलब ईश्वर के विषय में जो ज्ञान विज्ञान है वो हमारे अंदर से जो आएगा वो मानना है। भले ही ईश्वर कुछ भी कहता रहे। हां अंत में आवाज आती है। जो हमें हमें अपने से मानना है। यानी जो कुछ ज्ञान विज्ञान है वो हमारा अपना है। ईश्वर से नहीं विवेक दे रखा है ना भगवान ने। यानी ईश्वर से नहीं लेना है। ईश्वर से आत्मा से ये स्वास क्या है? जो सांस ले रहे हैं आप। यह तो शक्ति है। कौन की बात कर रहा हूं? यह कौन सी शक्ति है? यह यही आत्मा सब ब्रह्म है। ईश्वर की शक्ति ईश्वर की शक्ति ईश्वरी शक्ति है। हां ठीक है। आत्मा के माध्यम से आ रही है। शरीर आती है माता-पिता के माध्यम से जीव आता है। ब्रह्म शक्ति से परम शक्ति परम ब्रह्म। डिब्बे में डिब्बे में डिब्बा है। मैं ये पूछ रहा हूं माता जी कि परमेश्वर के विषय में जो धर्म और ब्रह्म की व्याख्या है वो हमें अपने अंदर से लेनी है। किसी परमेश्वर से नहीं लेनी। क्योंकि परमेश्वर तो सच और झूठ परमेश्वर तो बता गया। हमें रास्ता उसने बता दिया। तो झूठ भी तो बता गया। तो झूठ से बचना है ना। तो झूठ को पहचानेंगे कैसे? झूठ
00:40:44:00 से बचना है। कैसे पहचानेंगे? झूठ को पहचानेंगे जैसे हम पहचान रहे हैं। कैसे पहचानेंगे? मतलब निर्णय कहां से होगा कि ये झूठ है। शब्दों से। किसके? जैसे शब्दों से। जैसे हम भाई देखिए परमेश्वर जब बताएगा तो ये तो कहेगा नहीं ये वाला झूठ है। वो तो दोनों बातें। अब पता चल जाएगा ना। तो कैसे पता चलेगा? उसका निर्णय कैसे करेंगे? ऐसे पता चलेगा। हां। जैसे एक है रहीमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाए टूटे तो फिर ना जुड़े टूटे जुड़े तो गांठ पड़ जाए यानी रहीम विश्वास है हमारा एक मिनट फॉर एग्जांपल जी रहीम ने कहा ठीक है हम और रहीम को मानने वालों ने यही पढ़ा हम अरे आपस में संबंध जोड़ देता अरे गांठ पड़ जाती फिर कहां को वो तो गांठ पड़ गई फिर इससे आगे भी जब रहीम ने यह लिखा तो तो जिस रहीम जो है भगवान राम को ही मानते थे, भगवान कृष्ण को ही मानते थे। फिर उनकी कलम को सीधा उस परमेश्वर से वाणी आई। वो परमेश्वर से ही प्रार्थना करके लिखवाते थे। फिर उनकी वाणी ने लिख दिया। थोड़ा सा क्या है ना विषय अंतर इतना हो जाएगा कि हम कि टूटे सजन मनाइए जो को हम लोग भूल जाएंगे। मूल विषय हम नहीं भूले। मूल विषय तत्व ज्ञान। मूल विषय ये है। मूल विषय सत्य। मूल विषय यह है कि परमेश्वर आपसे
00:41:59:03 झूठ भी बोल सकता है तो हमारे लिए अंतिम प्रमाण क्या है क्योंकि परमेश्वर तो झूठ भी बोल सकता है तो हम किस चीज के आधार पर तय करेंगे कि उसकी कौन सी बात सच है और कौन सी बात झूठ है आधार क्या होगा परमेश्वर झूठ बोलेगा ही नहीं आप ही नहीं बोल सकता है अगर वो बोल भी रहा है किसी पर से फॉर एग्जांपल हमने बता दिया नहीं आपने सही उदाहरण नहीं दिया ये सही उदाहरण मैं मैं पूछ रहा हूं मैं ये झूठ है या सच है मैं पूछ अश्वत्थामा मारा गया यह झूठ है कि सच पूछ रहा हूं आपसे झूठ है कि नहीं है मैं बता रहा हूं मैं मैं वो रियल वाला जो झूठ है ना भटकाने वाला वो बोल सकता है कि नहीं ये अश्वत्थामा मरा या नहीं मरा भगवान कृष्ण मैं आपसे ये पूछ रहा हूं कि जो परमेश्वर है वो वास्तविकता में भटकाने वाला झूठ बोल सकते हैं कि नहीं कभी नहीं कभी नहीं तो यहां सीमित हो गए सर्वशक्तिमान नहीं है फिर वो सब कुछ नहीं कर सकते ये आपको पता होगा देखिए आप ये आप मान सकते थे सर्वशक्तिमान नहीं लेकिन हम लोग हम देख रहे हैं आपने कहा ना वो सब कुछ कर सकते हैं। हां तो वह गुमराह कर सकते हैं आपको। कभी नहीं। गुमराह में थी उन्हें सदानी सब कुछ नहीं कर सकते। गुमराह क्यों करेंगे वो? देखिए धर्म में तर्क होता है। कुतर्क नहीं होता है। वो सृष्टि क्यों बनती है? आप तर्क करिए। इसको कुतर्क कहते हैं। अच्छा इसको तर्क कुतर्क की कोई लिस्ट है माता जी?
00:43:14:07 कहीं पर? ये कुतर्क है। परमात्मा सर्वशक्तिमान है। परमात्मा सत्य है। वो तत्व सत्य है। तो वो झूठ बोलेगा ही नहीं। किसी परिस्थिति में बोला उसके कल्याण के लिए बोलेगा झूठ सच से परे जिस तरीके से आपने कहा यह कुतर्क है ऐसे तो मैं आपकी हर बात जो आप मेरे विपरीत कहेंगे मैं कह कुतर्क है कुतर्क है कुतर्क तो आपके कुतर्क कहने से ना कुतर्क कहने से सत्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ऐसा तो मैं भी कह सकता हूं कि प्रभाव पड़ेगा आपके जीवन पर हमने बता दिया हमने तत्व चलिए ठीक है तत्व ज्ञान पाया परमात्मा पाया इसलिए कह रहा था क्यों कि आध्यात्मिक पराकाष्ठा में थे उद्धव जी मैं मैं उनको गोपियों ने ज्ञान दिया एक मिनट 1 मिनट मैं वही समय मैं यह इसलिए कह रहा था क्योंकि हम लोग वेद को छोड़कर के किसी और सत्ता को हम भी वेदों को मानते हैं। पूरा कर लेते हैं। वेदों को सर पे रखते हैं। पूरा पूरा कर लीजिए। पूरा कर लीजिए। हम लोग वेदों को छोड़कर किसी और सत्ता के सत्ता का आश्रय लेकर वेदों में भी प्रमाण्य बुद्धि से दूर जा रहे हैं। ठीक है? अब क्या है कि वेद जो है अपारुषय ग्रंथ है। अपारषय मतलब कि वह ईश्वर ने आपको दिए नहीं है। वह स्वाभाविक रूप से ईश्वर के द्वारा प्राप्त होते हैं। जो वेद है अपारुषय वो ये नहीं है वो ये नहीं है किसी देश काल परिस्थिति में ईश्वर
00:44:29:15 ने रचे हो या कहे हो। हम वो हमें ईश्वर की स्वास रूप है वेद वैक उपनिषद में लिखा है तो अब स्वास रूप में होने से क्या होता है कि हम दो प्रकार के कार्य करते हैं एक होता है जिसमें हमारी बुद्धि लगती है और दूसरा होता है जिसमें हमारी बुद्धि नहीं लगती तो जैसे बुद्धि लगती है तो जैसे सामने दो चीजें रखी हुई है तो मैं चाहता हूं कुछ उठाऊं तो इसमें बुद्धि आ गई बुद्धि आ गई तो मैं सच बता सच सच वाली किताब उठाऊं या फिर झूठ वाली जिसमें बुद्धि लग रही है जिसमें एफर्ट लग रहा प्रयास पूर्वक अगर मैं कोई कार्य कर रहा हूं तो मेरी वहां पर बुद्धि आ जाएगी। मगर कुछ कार्य ऐसे भी हैं जिसमें मेरा कोई एफर्ट नहीं है। बिना एफर्ट के हो रहा है। ऐसा ही एक काम है सांस लेना। बच्चा माता के गर्भ से जन्म ले रहा है तो वो सांस ले रहा है। उसको कोई बुद्धि नहीं लगानी पड़ रही। इसी प्रकार से ईश्वर के परमेश्वर के। स्वरूप भूत है। स्वास भूत है कौन? वेद। इसलिए हमारे परम प्रमाण वेद है जो कि हमें परंपरा प्राप्त आचार्यों से प्राप्त होते हैं। फिर आगे [गला साफ़ करने की आवाज़] जो राम कृष्ण आदि है वो वेदों का ही मार्ग और प्रशस्त करते हैं तो उनके भी हमें मान्य हो जाते हैं। नहीं तो भगवान श्री कृष्ण ने तो झूठ भी बोला है। छलिया छल किया है। ये सब किया उन्होंने तो। फिर
00:45:44:16 भी हम उनकी गीता पर विश्वास क्यों करते हैं? क्योंकि हमारे परंपरा प्राप्त आचार्य वेदव्यास जी ने कहा कि ये हमारा प्रमाण है। क्यों कहा? क्योंकि वो वैदिक है क्योंकि हमें वेदव्यास जी पर विश्वास है और वेदव्यास जी को वेदों पर विश्वास है। मतलब कि अपशय होने के कारण हम वेद के विरुद्ध नहीं जा सकते। भगवान के साथ भी भगवान बुद्ध के रूप में आए। बुद्ध के रूप में उन्होंने नास्तिक यज्ञों से दूर करने के निमित्त उन्होंने वेदों का विरोध किया। हमने बुद्ध को तो प्रणाम किया भगवान होते हुए मगर हमने उनकी बात नहीं मानी। अब बुद्ध को आप भगवान कैसे कह रहे? बुद्ध तो बौद्ध ही सत्य की खोज में थे वो। अब अब फिर भगवान बुद्ध जो है निकले थे विष्णु के अवतार बुद्ध निकल गए थे विष्णु के अवतार थे सुनिए सुनिए विष्णु के अवतार थे विष्णु के अवतार थे माया मोह स्वरूप एक अलग हुआ है जिसकी आप बात कर रहे हैं जिसमें बौद्ध मत का प्रवर्तक है वो एक अलग है और भगवान के विष्णु भगवान के जो अवतार है बुध वो एक अलग है ये तो एक अलग बात हो गई मगर मेन बात ये है कि भगवान के अवतार होते हुए भी हमने उनको प्रणाम तो किया सुनिएं अवतार सुनिए हमने उन्हें प्रणाम तो किया मगर हमने अपने वेदों को नहीं छोड़ा। यह वेदों को नहीं छोड़ा। वेद छोड़े मगर आप कह रही ना कि ज्ञानेश्वर जी
00:47:00:04 वेदा आपने कहा ना ज्ञानेश्वर जी के आधार पे हम जो है वेदों की इस बात को नहीं मानते। ये आपने कहा पूरा वेद देखिए ऐसा ना हम वेद को नहीं मानते। चलिए खैर काफी लंबे वेद में सही भी है गलत भी है। नहीं ये गलत सही आप कह रहे हो। ठीक है। वह आपने मेरा जो सही है जो सही है वह वह सही का निर्णय कौन करेगा? वह भगवान के सिवा दूसरा कोई भगवान तो सब कुछ कर सकते हैं। वो झूठ भी बोल सकते हैं। भगवान के सिवा [गला साफ़ करने की आवाज़] दूसरा उन्होंने किया। भगवान तो झूठ भी बोल सकते हैं। वेद कहां पर मिस्टेक कर दी उन्होंने निकाल। भगवान तो झूठ भी बोल सकते हैं ना। वो सब बोल सकते हैं। झूठ भी बोले सच बोले उससे पर उनकी किसी बात पे हम वेद अपोर्श वेद ग्रंथों को कैसे ठुकराएंगे? ठुकराना नहीं ठुकराना कौन कह रहा है? वेद वेदांग कोर्स में रखना चाहिए। वेद ये कह रहे हैं जो सर्वव्यापी है। उसमें रखना चाहिए। कोर्स होना चाहिए। ये कह रहे हैं कि ईश्वर सर्वव्यापी है। आप कह रहे हो नहीं उसकी बात नहीं माननी। एक मिनट हां वेद कह रहा है ना ईश्वर सर्वव्यापी है। वेद कह रहा हम भी कह रहे ईश्वर सर्वव्यापी है। आप नहीं लेकिन मैं परमेश्वर की बात कर रहा हूं। मैं परमेश्वर की बात कर रहा हूं। आप आप ऋग्वेद अथर्ववेद है आपके पास। परमेश्वर की बात कर रहा हूं। मैं बताती हूं श्लोक। सुनिए सुनिए। वेद ये घोषणा कर रहे हैं। वेदादि शास्त्र ये घोषणा कर रहे हैं। परमेश्वर सर्वव्यापी है। हम आप कह रहे हैं ये वाली बात नहीं माननी है। क्यों नहीं माननी? ईश्वर वाली बात मान
00:48:15:06 क्योंकि ज्ञानेश्वर जी ने कहा है ठीक है इसलिए नहीं माननी तो नहीं इसलिए इसलिए नहीं माननी ऐसा नहीं है उसको वो देखा है वेद बहुत बड़ी चीज है देखिए वेद हमने हमको दिखाया है क्या देखा है बताइए जैसे ये ये कौन सी दृष्टि है हे अर्जुन आपने देखा क्या है वो बताइए हे अर्जुन मैं पूछ रहा हूं माता जी थोड़ा सा संक्षिप्त मैंने ये देखा जी परमात्मा परमेश्वर परम ब्रह्म यहां यहां नहीं देखा तो एक जो सूक्ष्म शरीर है जो सूक्ष्म शरीर तो है क्या ऐसा देखा जिससे तय हुआ कि ईश्वर सर्वव्यापी नहीं है परमेश्वर सर्वव्यापी नहीं है ऐसा ये देखा जी जैसे हम ईश्वर ही परमेश्वर कहा करते थे हम ईश्वर सर्वव्यापी है कहा करते थे नहीं वो छोड़िए मैं कह रहा हूं आपने ऐसा क्या देखा कि परमेश्वर सर्वव्यापी नहीं है ये वो देखा
00:49:08:28 15 अध्याय के 10वें में जाइए थोड़ा सुनिएगा आप आप अध्याय ला रही हैं नहीं नहीं अध्याय को तो छोड़ने उसी में तो लिखा है कि वो सर्व्यापक है उसी गीता में लिखा है सर्वव्यापी है भगवान पर परम ब्रह्म परमेश्वर उसमें लिखा है ना जी और उसी में लिखा है परवेन परमधाम में रहता है हां रहते हैं तो रहते हुए वेद की रिचा वेद की रिचाएं मूर्तिमान होके उनकी पूजा करते व्यापक होते हुए ऋग्वेद अथर्ववेद में है ना आपको मैं वेद की रिचाएं मूर्तिमान होके उनकी पूजा करते हैं उस परमेश्वर की पूजा मैं इसको बता रहा हूं आपको मैं बता रहा हूं। रिचो अक्सर है सब में भी आप अपने फोन में इंटरनेट चलाती हैं कभी-कभी नहीं कुछ नहीं चलाती कुछ कुछ उपयोग करती हैं WhatsApp करती हैं किसी को मैसेज भेजती हैं कभी ये जो WhatsApp है किससे चल रहा है हम इंटरनेट से चल रहा है ना हम यानी कि आपके फोन में इंटरनेट रहता है रहता है रहता है ना हम तो इंटरनेट यहां नहीं है हम है कि नहीं है यहां सब जगह होते हुए भी इंटरनेट आपके फोन में भी रहता है रहता है जब वो वहां पर व्यवहारिक हो जाता है तो हम कहते हैं कि इंटरनेट फोन में WhatsApp फोन में या Google उसमें Google यहां पे भी है। मगर यहां वाला जो Google है ना हमारे को दिखाई दे रहा है ना हमको समझ में आ रहा है। वो जब फोन में होता है तब Google दिखाई देने लगता है। हमारी व्यवहार
00:50:24:04 का विषय हो जाता है। इसी तरीके से भगवान सर्वव्यापी होते हुए भी अपने भक्तों के अनुसार व्यवहार करने के लिए इत्यादि इत्यादि वाली बातें कही गई है। मैं परमधाम में रहता हूं। वो हां जहां जैसा तहां तैसा उसका होता है। ईश्वर शक्ति से वो सब करता है। ईश्वर शक्ति से परमेश्वर सब हां चिदानंद अलग है। सच्चिदानंद अलग है। इसलिए पार्वती भ्रमित हो गई थी। कि आप किसको प्रणाम कर रहे? हे सच्चिदानंद हे जग पावन। कहा ये सच्चिदानंद है मैं चिदानंद हूं। चलिए ठीक है बहुत एक अच्छी चर्चा सदानंद में अंतर है दोनों सदानंद जी का जो संगठन है जो 2006 में उनकी हत्या कर दी गई था कैसे हुआ था गोली मार के हत्या की थी तो ये सदा जी का जो संगठन है संत ज्ञानेश्वर जी का उनकी एक प्रमुख प्रमुख संचालिका जी हैं सत श्री सरोज देवी जी जिनके साथ हमारी अभी एक बहुत गहनता गढ़ बातों पर बातचीत हुई तो काफी मैंने परेशान भी किया उससे पहले वो बता दिए थे जैसे जाने से पहले मेरा समय पूरा हो गया ठीक है ठीक है नहीं ठीक है बहुत अच्छा लगा आपसे बेचकर ये मेरा पहले इंटरव्यू है आइंदा भी इस चीज को आगे बढ़ाना है आप लोग कमेंट करके बताइएगा कैसी लगी ये चर्चा आपको माता जी आपको समय देने के लिए
00:51:39:06 बहुत-बहुत आभार जय श्री राम जय श्री राम जय सर
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फिर मिले स्वयं को कल्कि अवतार बताने वाले सदानंद की संस्था के लोग
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