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00:00:02:28 तो सभी को जय श्री राम। मैं शिवश नारायण द्विवेदी। आप देख रहे हैं आहान कॉल ऑफ धर्मा पूरी शंकराचार्य जी का शिष्य। और जैसा कि आप जानते हैं हम विभिन्न जो दार्शनिक विचारधाराएं हैं उनको चर्चाओं के माध्यम से आपके समक्ष प्रस्तुत करने का कार्य करते हैं। तो इसी क्रम में आज हम पहुंचे हैं एक आर्य समाज का यहां पर केंद्र है और हमारे स हमारे साथ में आचार्य जी हैं। तो सबसे पहले आपको प्रणाम आचार्य जी। अह एक दर्शकों को अपना एक संक्षिप्त परिचय थोड़ा सा आप बता दें थोड़ा सा। मैं आर्य विजय पाल सिंह बीएचएल हरिद्वार से रिटायर हुआ हूं और शिवालिक नगर में रिटायरमेंट के बाद रह रहा हूं। हम लोग धर्म अपनी संस्कृति के बारे में युवकों को बताते हैं। आज हमारे युवा अपनी धर्म संस्कृति के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं। इसलिए उनको बताना बहुत जरूरी है और उनके लिए हम दो-द दिन की कक्षाएं लगाते हैं। फिर उनके आगे सात-सा दिन की कक्षाएं भी लगाते हैं। उनका संरक्षण

00:01:18:00 करते हैं कि वास्तव में हमारा धर्म क्या है? अपने धर्म की ओर लौटो। और इस चीज से सभी प्रभावित हैं। उसके कारण ही केरला द केरला स्टोरी और द केरला स्टोरी टू बनानी पड़ी। क्योंकि हमारे धर्म के बारे में बच्चों को हमारी बिल्कुल भी पता नहीं है। दो बार यह पिक्चर बन गई। आज भी हम बार-बार यही कह रहे हैं। बच्चों को अपनी संस्कृति के बारे में बताते हैं। भाई अपने धर्म के बारे में जानो। तभी हम इन जो आतताई है, आतंकी है, जिहादी हैं, इनसे बच सकते हैं। अपने बच्चों को सुरक्षित कर सकते हैं। जी तो हम यही कार्य कर रहे हैं बस। जी बहुत ही सुंदर परिचय दिया आपने। अ महाराज जी थोड़ा सा ये जो ईश्वर के संबंध में थोड़ी सी चीजें बताएं कि ईश्वर को किस प्रकार से समझना चाहिए। हमें। देखो ईश्वर तो ऐसा सब्जेक्ट है जो आजकल समाज ने भ्रमित कर दिया हो। लेकिन ईश्वर ऐसा सब्जेक्ट है जो साइंस से सिद्ध होता है। जी जी साइंस से ही बिल्कुल सिद्ध होगा कि कोई भी वस्तु बिना बनाए नहीं बन सकती है। उदाहरण के लिए मेज है। तो ये कैसे बनी है?

00:02:33:01 किसने बनाई है? बिना बनाए तो बन नहीं सकती है। जी। तो इस संसार में जितने भी प्रकृति के नियम चल रहे हैं ये प्रकृति चल रही है। पृथ्वी घूम रही है, सूर्य घूम रहा है और जो लाइट भी देखो प्रकाश कितना 3 लाख किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से चल रहा है। पृथ्वी सूर्य के चारों तरफ 30 किलोमीटर प्रति सेकंड गति से चल रही है। तो यह कौन चला रहा है? ईश्वर कोई ना कोई तो है जो शक्ति आप उसे जब हम यह प्रश्न उत्तर के रूप में जब चलते हैं या दर्शन के रूप में जब खोजते हैं तो लास्ट में यही आता है कि इसके पीछे कोई है जिसे हम ईश्वर कहते हैं। जी जी तो इसमें आचार्य जी एक प्रश्न बहुत प्रासंगिक हो रहा है आजकल कि जैसे जिसे आप आर्य समाज को मानते हैं तो एक प्रश्न है मूर्ति पूजा अवतार जी तो इस विषय में क्या धारणा है अवतार को लेकर के मूर्ति पूजा को लेकर के देखो मूर्ति पूजा आर्य समाज का ये वो करते हैं कि आर्य समाज ही जो है मूर्ति पूजा नहीं करते जी जी जी ज्यादातर ये धारणा है जी जी जी लेकिन आर्य समाज ऐसा कुछ नहीं कहता कि मूर्ति पूजा नहीं करनी

00:03:48:07 चाहिए। पूजा का जब शब्द अर्थ करते हैं हम जी जो संस्कृत में पूज्य धातु से बनाया पूजा और उसका जो शब्दार्थ निकल के आता है वो ये है कि सेवा सत्कार और उपयोग एक ही शब्द के नाम वो है अच्छा तो जब पूजा हम करेंगे किसी की भी पूजा सेवा सत्कार या उपयोग अच्छा तब हम उसकी पूजा करते हैं। अब मूर्ति पूजा मूर्ति में ईश्वर है। यह आर्य समाज भी मानता है और भी लोग मानते हैं। लेकिन मूर्ति जो है ईश्वर नहीं है। जी क्योंकि वो जड़ है। वो हमारी भावनाओं को नहीं समझ सकती। ना सुन सकती है ना खाना हम खिलाते जरूर हैं लोग बाग। लेकिन क्या वो खाना खाती है? जी। लोग कहते हैं कि उसमें प्राण प्रतिष्ठा डाल दी तो वह जीवित हो गई। तो जीवित हो गई तो जीवित के लक्षण होने चाहिए। उसमें गुण होने चाहिए। नहीं तो उस तरीके से जैसे ईश्वर यदि अवतार ले ले तो उनकी मूर्ति देखो ईश्वर अभी मैंने बताया कि सृष्टि का निर्माण कर रखा और पूरे सृष्टि को चला रहा है। जी जी। आज से अब अगर मैं छोटी-छोटी बात ये ग्रह नक्षत्रों की बात करूं कि लेटेस्ट एक

00:05:03:08 तारा खोजा गया है। उसका नाम मुझे याद नहीं आ रहा। उसका यहां से पृथ्वी से 29 अरब प्रकाश वर्ष दूर है। जी तो ईश्वर तो वहां भी है। जी क्योंकि वो सर्व्यापक है। जी। तो वो आप छोटे रूप में कैसे ले सकते हैं? उसको ईश्वर को अवतार का मतलब है उसको छोटा करना। उसकी शक्तिमानता को कम करना। तो ईश्वर अवतार नहीं ले सकता है। क्योंकि वो तो इतना बड़ा है। जी। इसमें ऐसा प्रश्न मतलब रेज होता है कि जैसे हम कहते हैं कि अवतार तो ईश्वर अपने जो वास्तव जो उसका सर्वव्यापी रूप है उसको उस स्वरूप की हानि ना करते हुए वो अवतरित होता है। मतलब ऐसा नहीं है कि उसने अवतार लिया तो उसका वो जो सर्वव्यापी रूप है वो कन्वर्ट हो गया। ये कहा जाता है। ये धारणा बना रखी है। जी जी लेकिन कोई नियम तो होगा। सर्व्यापक नियम नियम के विषय नियम के विषय में यह है कि जैसे जो सर्वव्यापक है वो जब क्रिया कर रहा है क्रिया तो करता है ना ईश्वर ईश्वर जैसे सृष्टि बनाना जैसे आपने कहा वो क्या कहते हैं तारा बनाना या इस तरह की

00:06:18:09 बाह्य क्रिया कुछ नहीं करता है। अच्छा जिस प्रकार से उसकी इक्षण शक्ति है जिससे सब कुछ हो जाता है। लेकिन वह जैसे आप और हम हाथों से काम कर रहे हैं। या बाहर से कुछ वो कर रहा है। ऐसा वह ईश्वर नहीं करता है। नहीं तो कोई विशेष प्रकार जिस प्रकार से जी मैग्नेट है। हम चुंबक है। चुंबक के पास आप अगर लोहा आ जाए तो वो चिपक जाएगा उसके पास। लेकिन चुंबक ने तो कोई कार्य नहीं किया। कहीं से भी कोई उसका गुण में कोई परिवर्तन नहीं आया। तो परमात्मा के गुण में कोई परिवर्तन नहीं आता। निर्विकार है। उसमें कोई भी कभी कोई परिवर्तन होता ही नहीं है। ना वह हंसता है, प्रसन्न होता है, ना दुखी होता है। वह आनंद स्वरूप है और एक ही स्वरूप में रहता है। नहीं तो जैसे अभी आपने मैगनेट का उदाहरण दिया महाराज जी जी तो उसमें ये होता है कि जैसे जो सर्वव्यापी मैग्नेट है वो जब किसी को घसीटेगी अपनी ओर तो तो दुनिया की सारी लौह धातुएं खींच या जो भी धातु होगी खींच जाएगी। हम और पर्टिकुलर हमें अगर यही करना है कि हमें इसको ही खींचना है क्योंकि क्रिया जो होती है विशेष होती है। क्रिया अपने आप में एक विशेष कार्य होता है ना कि यहां पर है यहां पर नहीं है तो विशेष हो गया। तो

00:07:33:10 सर्वव्यापी होते हुए अगर विशेष कार्य वो होना फिर संभव नहीं हो पाएगा। विशेष कार्य के लिए विशेष जो कारण है वो कारण को भी विशेष होना पड़ेगा। वो चीज समझ रहे हैं आप? नहीं देखो मैं मैं मैं मैं समझ जैसे कि मान लीजिए मैं अपनी मेरी शक्ति है और यहां इस पे बहुत सारी चीजें रखी हुई है अगर ग्लासेस वगैरह और मेरे पास यह चुनाव नहीं है कि मेरी शक्ति किसी पर्टिकुलर एक ही गिलास में काम करे अन्यों में ना करे है ना तो क्योंकि मैं सर्वव्यापी हूं तो जैसे ही मेरी शक्ति ने काम किया तो सारे गिलास वो सारे गिलासों पे ही वो प्रभाव होगा किसी एक गिलास पर नहीं होगा। अगर ऐसा होगा यदि मैं ऐसा कर सकता हूं कि मैं अपनी शक्ति का चुनाव कर सकूं कि किसी एक गिलास पे तो काम करे मगर अन्यों पे ना करे। तो ये विशेष हो गया। ठीक है? तो जैसे आपने चुंबक का उदाहरण दिया ना चुंबक एक देश है। तो जिस जिस लोहे को हमें खींचना है चुंबक से उसके सामने रखा खींच गया। मगर जो सर्वव्यापी चुंबक होगी तो उससे तो दुनिया के सारे लोहे खींच जाएंगे। सारी धातुएं तो फिर तो वो विशेष क्रिया होगी ही नहीं। नहीं देखो ईश्वर ने इस सृष्टि को बनाया उसके साथसाथ नियम बनाए जी

00:08:48:14 और उन नियमों के अनुसार ईश्वर काम कर रहा है। अपने नियमों को ईश्वर भी नहीं बदल सकता। अगर वो बदलता है तो वो ईश्वर नहीं है। एक तो ये बात है। जी। और आप जहां तक मैं समझ रहा हूं आप ये चाह रहे हैं कि मैं यह कहूं कि भाई ईश्वर जो भी अगर कहीं समाज में गलत होता है या दुराचार बढ़ जाता है तो ईश्वर अवतार लेकर के दुराचार को खत्म करने के लिए आता है। नहीं नहीं वो तो एक अलग चीज हो गई कि वो ईश्वर क्यों अवतरित होगा? वह आवश्यकता है। मैं अभी जो तात्विक एक दार्शनिक बात है ना थोड़ा सा उस पर प्रकाश डाल रहा हूं। यह प्रश्न प्रासंगिक है आजकल। तो जैसे हम यह कहते हैं कि वह सर्वव्यापी होते हुए एक जगह कैसे आ सकता है? तो उसने सर्वव्यापी होते हुए कहीं पर पृथ्वी बनाई है, कहीं पे जुपिटर बनाया है, कहीं पे कुछ बनाया है। तो अगर वह सर्वव्यापी होते हुए भी विशेष क्रियाएं कर रहा है। मतलब विशेष विशेष हो रहा है ना वो कि क्रिया विशेष कहीं पृथ्वी बनाना, क्रिया विशेष कहीं अलग-अलग कर रहा है। अब उसमें अलग-अलग कार्यों में यह भी हो रहा है कि जैसे पृथ्वी जो प्रकृति है वह भी हमारी क्या कहते हैं अदृश्य थी किसी समय है ना तो वो प्रकट होती है उसके बाद पृथ्वी के जो परमाणु

00:10:03:18 हैं सृष्टि के परमाणु इकट्ठा होते हैं प्रकृति के परमाणु सृष्टि बननी शुरू फिर सृष्टि बननी शुरू होती है तो कहीं ना कहीं ईश्वर जो है वो शक्ति के रूप में इन प्राकृतिक अणु परमाणुओं पर कार्य करता है और विशेष कार्य करता है तभी विशेष क्रिया संभव होती है यानी कि ईश्वर यह चुनाव कर लेता है कि मैं किन अणु परमाणुओं पर प्रभाव डालू और कितनों को अभी ना डालू, कितनों में कम डालू, कितनों में ज्यादा डालूं। वो सृष्टि का नियम उसने बना रखा है। पहले से ही बना रखा है नियम कि किस-किस समय में क्या-क्या कार्य होंगे। तो इसमें इसी में एक ये आ जाता है कि जैसे वो यह चुनाव कर रहा है कि मैंने इतने गुच्छे पर प्रभाव डाला। उसके बाद बाकी जगह पर प्रभाव नहीं डाला। तो यह जैसे आया तो इसी प्रकार से जब वह प्रकाश पर प्रभाव डालने वाला बन जाएगा जैसे किसी भी चीज को मूव कराना है अगर ईश्वर को तो वो मूव कराने के लिए उसको प्रेशर डालेगा अंदर से बाहर से पीछे से कहीं से भी शक्ति के रूप में बल लगाएगा ना बल वो सब उसका अंदर से ही होता है बाहर से कुछ नहीं होता बल है बल का अस्तित्व है बल का अस्तित्व है वो सर्वशक्तिमान है तो सर्वव्यापक है उसका बल भी सर्वव्यापक है तो विशेष बल लगता है किसी में कि नहीं लगता

00:11:18:19 है? नहीं बिल्कुल लगता है वो नियमों के अनुसार उसका सृष्टि के नियम के अनुसार यानी जैसे ही हमने कार्य हो रहे हैं। जैसे ही हमने विशेष कहा हां तो फिर वो हो गया देश काल परिस्थिति से सीमित है ना बल विशेष कह दिया तो बल विशेष या जहां भी आप कार्य देखोगे अलग-अलग उस परमात्मा के अलग-अलग कार्य हो रहे हैं। अब उसमें एक देश नहीं है। वो सर्व देश में काम उसका बल तो एक देश हो रहा है ना। बल तो अगर बल भी सब जगह लगेगा सब जगह एक ही क्रिया होगी। नहीं सब जगह एक क्रिया नहीं होगी। जितना जहांजहां आवश्यकता है परमात्मा को वहां वहां उसकी आवश्यकता के अनुसार बल लग रहा है। वही वही तो बल बल विशेष रूप धारण कर रहा है। सर्वव्यापी होते हुए भी बल विशेष रूप धारण कर रहा है। बल क्या सभी चीज उसके विशेष हो रही है। सब कर्म कर रहा है। हां। तो फिर ये वाली बात है ना जो कि जब वो बल विशेष के रूप में जड़ पदार्थों के व्यवहार का विषय बन रहा है तो उसी प्रकार जब वो प्रकाश के व्यवहार का विषय बन जाएगा तो वो क्या कहते हैं हमारे वो एक देश हो जाएगा मतलब अवतार अवतार अवतार दिखने लगेगा अवतार अवतार तो देखो शब्द में ही अवतरित है मतलब निम्न कोटि में आ जाना गंगा

00:12:34:28 नीचे स्वर्ग से अवतरित हुई। यानी स्वर्ग में थी वह नीचे आ गई। इसी तरह से आप परमात्मा को अवतरित करना चाह रहे हैं। यानी उसके सम्मान को उसकी प्रतिष्ठा को उसकी शक्ति को घटाना चाह रहे हैं। तो इसलिए वो अवतार नहीं लेता। उसकी शक्ति के सारे रूप हैं। तो शक्ति के रूप में वही है ना। शक्ति तो उसे अवतार नहीं कहेंगे। वह तो सृष्टि के नियम के अनुसार काम कर रहा है। यानी कि वह अपनी शक्ति के रूप में विशेष क्रिया कार्य यह सब करता है ना। हां सारी क्रियाएं उसकी चल रही है। तो कहने का मतलब है जब वह जड़ पदार्थों को के लिए क्षेपक बन सकता है विशेष शक्ति के रूप में उनका निर्माण करने के लिए जड़ पदार्थों के लिए क्षेपक बनता है। उसी प्रकार से वो जब प्रकाश के मार्ग में छेपक बनेगा निश्चित अनुपात में निश्चित स्ट्रक्चर तो वो हमारी आंखों का विषय हो जाएगा क्योंकि हम किसी भी चीज को देखते तब है जब उस पर रोशनी पड़ के वापस आती है। जी बिल्कुल बिल्कुल तो मतलब वो बात अलग है कि हम जो वैदिक विचारधारा है वो यह कहती है कि ऐसा होता नहीं है। बट अगर हम तर्क की दृष्टि से देखें तो संभव है कि वो अवतार ले सकता है। सर्वव्यापी होते हुए तर्क से ही तो यह सिद्ध

00:13:50:00 होता है कि उसे अवतार की जरूरत ही नहीं है। ना अवतार लेता है। यह तर्क से ही सिद्ध होता है। न्याय दर्शन हम पढ़ेंगे, साख्य दर्शन हम पढ़ेंगे तो इनसे सिद्ध होगा कि ईश्वर कभी भी अवतार नहीं ले सकता क्योंकि वो सर्व्यापक है। वह सीमित एक सीमा में नहीं आ सकता। कभी सीमित ही तो हो रहा है कि उसको पृथ्वी बनानी तो केवल पृथ्वी में ही धक्का लग रहा है। दूसरे में नहीं लग रहा है। अरे दूसरे भी तो काम ग्रह सारे चल रहे हैं। एक ही थोड़ी ही चल रहा है। एक अनेक देखो सब एक समान नहीं चल रहे ना। एक वेद में मंत्र भी है। यतो यत सम हसे ततो नो अभयं कुरु समनो कुर प्रजाभ्यो अभयं न पशु वो कहते हैं यतो यतो हे परमात्मा जहांहां भी तेरा कार्य हो रहा है ये यही पृथ्वी तो नहीं है। पता नहीं कितनी पृथ्वीयां कितनी आकाशगंगा है। एक एक आकाशगंगा में कितने सूर्य मंडल है। उन सूर्य मंडल में कितनी पृथ्वीयां है? इसका कोई पता नहीं है। मैं ये नहीं कह रहा हूं। तो वहां कार्य हो रहा है ना? कार्य हो रहा है। मगर सब कार्य अपने आप में विशेष हैं। एक जैसा कार्य नहीं हो रहा है। सब्जेक्ट कार्य ईश्वर के नियम के अनुसार सब जगह अलग-अलग कार्य हो रहे हैं। हां अलग-अलग। पृथ्वी भी कहीं पृथ्वी बन रही है। पृथ्वी के अंदर भी कहीं कुछ और बन रहे हैं। कहीं बर्फ बन रहा है। कहीं उसमें अंडर ग्राउंड क्या-क्या

00:15:05:03 हो रहा है। सबके अलग-अलग कार्य हो रहे हैं। तो ईश्वर वहां पे आप कहना चाह रहे हैं कि वो अवतार लेगा। अवतार की उसकी एक शक्तियां है जो ये काम कर रही है। नियम है। वो उनके अनुसार काम कर रहा है उसका। नहीं। आप उसे अवतार क्यों कह रहे हैं? मान लीजिए मैं अवतार नहीं कह रहा। मगर यह तो हो रहा है ना कि विशेष रूप में उसकी शक्ति प्रकट हो रही है। अलग-अलग बिलकुल है ना? आप तो इसी विशेष रूप विशेष रूप को मतलब कि सर्वव्यापी होते हुए भी एक देशीय जैसी विशेष प्रतीति होने वाली उसकी मैं आपको उदाहरण देता हूं। भोजन आप करते हैं। जी एक भोजन किया। इस भोजन से ही आपके हड्डियां बन रही है। मजबूत आंख की पलकें बन रही है। आंख बन रही है। उसी से तो एक ही भोजन से बन रही है सब। तो जल अलग-अलग परिस्थिति में परमात्मा नियम के अनुसार अलग-अलग काम कर रहा है। वो तो उसमें आप यह नहीं कह सकते कि वो अवतरित होगा या विशेष उसका कार्य होगा। ये सारे कार्य हो रहे हैं। उसके मैं इसको टॉपिक को छोड़ आगे बढ़ते हैं। बस एक अंत में बात करूंगा कि बल जब कोई क्रिया विशेष हो रही है तो वहां बल भी विशेष ही लगेगा। अगर हम एक रस बल लगा देंगे वहां पर सर्वव्यापी बल लगाएंगे हर जगह अनंत बल लगाएंगे हर जगह तो

00:16:20:04 कोई क्रिया होना संभव नहीं है। नहीं वो नहीं कह रहा बल बल विशेष होना पड़ेगा उसी बल विशेष होने को जबकि ईश्वर तो सर्वव्यापक है मगर वो विशेष बल लगा रहा है। विशेष रूप धारण कर रहा है। विशेष रूप धारण करने को ही अवतार कह दिया जाता है। वस्तु देखो मैं फिर वही कह रहा हूं। हम आंख में अलग शक्ति मिल रही है। आंख देखने का काम कर रही है। कान सुनने का काम कर रहा है। लेकिन भोजन एक ही कर रहे हैं। आप सब कान और अच्छा उदाहरण हो गया। कान सुन रहे हैं। जी जीभ चख रही है। सबके अलग-अलग काम है। लेकिन ये नहीं कि वो विशेष वो हो रहा है। वो तो देश काल परिस्थिति के अनुसार जो भी है वो परमात्मा की व्यवस्था के अनुसार ये सब कार्य हो रहे हैं। अच्छा थोड़ा सा आगे चलते हैं। ये एक समस्या आती है जैसे आर्य समाज में विवाह होते हैं। है ना? तो हम लोग ये जो वैदिक मान्यता है कि विवाह इस तरह से होना चाहिए। क्या कहते हैं? वेद मंत्रों के द्वारा होना चाहिए। तो क्या हम यह मानते हैं कि वेद मंत्रों में कोई शक्ति होती है? इस कारण से वेद मंत्रों के द्वारा ही विवाह को संपन्न माना जाता है। कोर्ट मैरिज इत्यादि को हम

00:17:35:18 नहीं मानते कि यह धार्मिक संपन्न है। इसमें क्या कहेंगे आप? नहीं ऐसा नहीं है। वेद मंत्रों में कोई शक्ति होती है। शक्ति मंत्र क्या है? मंत्र है विचार। मंत्र है उसमें विद्या जो है। कि जो मंत्र हमने पढ़ा उस मंत्र में क्या करना चाह रहा है? परमात्मा हमें क्या आज्ञा दे रहा है? क्या करना चाहिए? व्हाट टू डू, व्हाट नॉट टू डू। वेद ये कहता है वेद के मंत्रों में आपके जीवन में क्या-क्या चाहिए वो सब लिखा हुआ है। तो वेद मंत्रों के उच्चारण से कि विवाह करना चाहिए। ये आप कह रहे हैं मतलब एक प्रण प्रण प्रतिज्ञा होती है वेद मंत्र प्रतिज्ञा होती है जैसे एक एक गुड ड्राफ्ट ड्राफ्ट्समैन है बहुत अच्छी ड्राफ्टिंग करता है तो उसकी ड्राफ्टिंग को लोग दूसरे भी पसंद करते हैं मान ले उसने एप्लीकेशन लिखी एप्लीकेशन लिख के अगर वो जज के पास गया या डीएम के पास गया तो वो देख के बड़ा प्रभावित होता है तो परमात्मा का जो ज्ञान है सर्वज्य ज्ञान है तो उसकी जो ड्राफ्टिंग है जी बहुत गजब की है आप उसमें उसमें कोई भी कमी नहीं निकाल सकते। तो ये वो वेद के मंत्र है। उन वेद के मंत्रों को उसका अर्थ भी बताया जाता है। हम वेद मंत्र जब विवाह में बोलते हैं तो उसका अर्थ भी बताते हैं। भाई तुम्हें पत्नी के लिए ये कर्तव्य है।

00:18:50:19 पति के लिए ये कर्तव्य है। कभी ऐसी परिस्थिति आई तो उसमें ये कर्तव्य उसमें व्हाट टू डू, व्हाट नॉट टू डू। क्या करना चाहिए? क्या नहीं करना चाहिए? वेद मंत्रों में यह दिया हुआ है। इसको थोड़ा सा मैं समझना चाहूंगा महाराज जी कि जैसे विवाह हम करा रहे हैं। वेद के मंत्र ही आवश्यक है। क्या हम यह मानते हैं कि वेद के मंत्र में जो बात कही गई है वही बात हम इंग्लिश में बोल दें तो चल जाएगा। अब वेद में जो बात कही गई मतलब उसको फिर हम धार्मिक उससे मानेंगे कि विवाह संपन्न हुआ। हां इंग्लिश में कर लो या हिंदी में कर लो। अगर उसका भावार्थ वही आप बता रहे हैं जो वेद में कहा गया जो वेद में कहा गया तो हमें कोई उसको वैदिक विवाह माना जाएगा। हमें उसमें कोई आपत्ति नहीं है। अच्छा यानी कि गुड ड्राफ्टिंग जो है वो वेद की है। नहीं एज इट इज जो वेद का मंत्र का जो अर्थ है वही एज इट इज़ हम एज इट इज़ अगर कोई कर दे। अंग्रेजी में अंग्रेजी में बोल दें तो वो भी वैदिक विवाह माना जाएगा। बिल्कुल हमें कोई आपत्ति नहीं है उसमें। लेकिन एज इट इज़ होना चाहिए। नहीं जैसे मान लीजिए जैसे मैक्स बुलर ने कर दिया। मान लीजिए कि आप वेद का कोई एक मंत्र बता दीजिए जो बोला हो बोल बोला जाता हो तो फिर उस पर फिर हम उदाहरण के फिर आगे बात करें। देखो वेद के अंदर विवाह के लिए जो बोला जाता हो विवाह

00:20:06:00 के लिए मुझे मंत्र तो अभी उपस्थित नहीं हो रहा। कोई अर्थ हो जिसका अर्थ याद हो। उसका यह है कि पत्नी पत्नी जो है पति के हृदय पे हाथ रखती है और पति जो है पत्नी के हृदय पे हाथ रख के बोलते हैं प्रतिज्ञा करते हैं दोनों कि भाई आज से मेरा मन तुम्हारा मन हुआ और तुम्हारा मन मेरा मन हुआ। हम एक दूसरे को कोई भी बात छुपाएंगे नहीं जो मेरे मन में है वो आपके मन में होगी। अच्छा ये एक पहली प्रतिज्ञा होती है। ये प्रतिज्ञा तो इसी बात को अगर उर्दू में वो लोग कह देंगे तब भी हम वैदिक विमा मानेंगे। बिल्कुल उर्दू में कह लो वो भाषा अपनी अलग-अलग हो सकती है लेकिन वही चीज होनी चाहिए। मतलब जो आपने कहा वही उर्दू में हो जाए। तो वैदिक विभवा माना जाए। उसमें कोई ऐसी आवश्यकता नहीं है कि नहीं वो जो है संस्कृत में वो जो वेद मंत्र है वही उच्चारित किया जाए। ऐसा जो विधान तो वही कहा है कि वेद के अनुसार वेद मंत्रों का उच्चारण एक्चुअली क्या था ऋषियों के समय में जब वेद के मंत्र थे एज इट इज उनकी समझ में आते थे। यह भाषा तो बाद में बनी कभी हिंदी में तो इसका मतलब हम जैसे जो गायत्री मंत्र कहते हैं पूर्व स्वाहा तो फिर हम उसकी बजाय भी उसका जो ट्रांसलेशन है

00:21:21:01 वो पढ़ सकते हैं। मतलब जरूरी नहीं है कि हम वही पढ़ें। ट्रांसलेशन आप पढ़ सकते हैं। लेकिन वह बात नहीं आएगी ना जो आप संस्कृत में जो समझ रहे हैं कोई भी संस्कृत का हो या अंग्रेजी के लैंग्वेज का कोई शब्द है आप उसको ट्रांसलेट करेंगे ना तो एज इट इज जो वो बताना चाह रहा है संस्कृत में वो आपके भाव से बन ही नहीं सकता आएगा। कभी भी नहीं आ सकता। जैसे गायत्री मंत्र का अर्थ क्या है? गायत्री मंत्र के बहुत सारे अर्थ कर रखे हैं लोगों ने। मुख्य अर्थ जो प्रामाणिक हो आपके अनुसार। प्रमाणिक यह है कि उसमें परमात्मा के पहले स्तुति की गई है। ओम भूर भुव स्वः कि हे परमात्मा तू प्राण स्वरूप है। जी दुख विनाशक है। सुखकारी है। तत वही परमात्मा सवितुर सारी सृष्टि का बनाने वाला है। वरेण्यम वरण करने योग्य है। सर्वश्रेष्ठ है। भर्गो पाप नाशक है। कामना करने योग्य है। हम आपका ध्यान करते हैं। धियो भर्गो देवस्य धीमहि हम आपका ध्यान करते हैं। यहां तक तो उन्होंने स्तुति की। अब उससे प्रार्थना करें। धियो यो प्रचोदयात वो जो हम ध्यान किया है हे परमात्मा हमें ऐसी शक्ति दे ऐसी कृपा कर कि वो

00:22:36:02 हमारी बुद्धियां उस सत्य मार्ग पे चले। वेद मार्ग पर चले। यह इसका अर्थ है। यह एज इट इज़ अर्थ है कि यह एज इट इज़ नहीं है यह। यह वेद के अनुसार जो हमारे ऋषियों ने अर्थ किया है, वह यह अर्थ किया है। तो, एज इट इज है ना? हां। तो, फिर हम गायत्री मंत्र की जगह अर्थ जप सकते हैं जो आपने कहा। जैसे आपने कहा ना एज इट इज़ नहीं हो पाएगा। तो, एज इट इज़ हुआ कि नहीं हुआ। मैं एज इट इज अगर जब वेद के विद्वानों से जब पूछेंगे तो उसमें पता नहीं कितने आप है ना वेद विद्वान? नहीं मैं विद्वान नहीं हूं जी मैं इतना। अच्छा एक वेद के एक-एक मंत्र पे एक-ए पुस्तक लिखी हुई है लोगों ने। आप आप तो गौतम खट्टर जी के गुरु भी है ना? गौतम खट्टर को भी सिखाया है। बहुत से लोगों को सिखाया है। तो आप वैदिक विद्वान वैदिक विद्वान नहीं है। देखो वेद बहुत बड़ी चीज है। ये चार वेद है। जी जी चार वेद है और इसमें लगभग 20,000 मंत्र हैं। जी जी मैं तो बीएचएल में नौकरी की है। इसके लिए पढ़ने के लिए 48 साल चाहिए। वेद को पढ़ने के लिए समझने के लिए। चारों वेदों से पहले चार उनके उपवेद उससे पहले छह अंग षडांग षडांग वो पढ़ने पड़ते हैं। तब जाकर के वेद विद्या आती है। अब ये कुछ ऋषियों ने इसका वो किया है।

00:23:51:13 तो किसी ने तो एज इट इज अर्थ बताया होगा कि नहीं बताया। बहुत बताया। देखो अभी दयानंद जी ने तो बताया ही होगा। ऋषि दयानंद ने एक यजुर्वेद का भाष्य किया पूरे पूरे का। अच्छा और ऋग्वेद के कुछ मंडल का किया। जी सबका तो वो भी नहीं कर पाए। वो जीवन लीला समाप्त हो गई थी। जी जी तो उन्होंने तो एज इट इज किया है ना। हां तो वो जो उन्होंने एज इट इज किया उसको पढ़ सकते हैं गायत्री मंत्र की बजाय? नहीं आप क्यों पढ़ना चाह रहे हैं अलग शब्दों के लिए? मैं इसलिए पूछ रहा हूं कि हम यह जानना चाह रहे हैं कि जो हमारे रीति-रिवाज हैं जैसे आपने कहा ना कि विवाह जो है अगर इंग्लिश में भी वहां पढ़ दिया जाएगा उसका वेद का अर्थ तो मान्य होगा। तो इस पर क्वेश्चनिंग रेज हो रही है कि क्या ऐसा कर सकते हैं। फिर हम गायत्री मंत्र की जगह प्रणव की जगह भी कुछ और बोल सकते हैं या चलिए प्रणव छोड़ दीजिए। गायत्री मंत्र की जगह कुछ और बोल सकते हैं। फिर जो और सारे मंत्र हैं। फिर मतलब सबको हम कर सकते हैं। और फिर उससे भी हमारा वो अभीष्ट फल प्राप्त होने की बात है कि नहीं? फल वो आपको प्राप्त हो जाएगा। उसमें कोई दिक्कत नहीं है। आपने जो पढ़ा है गायत्री मंत्र के साथ उसका गायत्री मंत्र नहीं पढ़ा। उसका अर्थ पढ़ लिया। उर्दू में अर्थ

00:25:06:14 उर्दू में पढ़ लिया। उर्दू में पढ़ के उसको आचरण में लिया आए। तो वही लाभ होगा। अब जब उर्दू की बात आई तो मैं आपको बता दूं। आज की डेट में जो आप शायद जानते भी होंगे मधुधामन नाम की एक पत्रकार है जो दुबई से आई थी उसका नाम था मुस्लिम लड़की है वो नाम याद नहीं आ रहा मुझे और उसने तेजपाल सिंह धामा से शादी की वो भी पत्रकार है हैदराबाद के रहने वाले वो कहती है कि मैंने ने कुरान पूरी पढ़ी है। कुरान में लगभग 60 वेद मंत्रों का अनुवाद है। और वो उसमें आज्ञा दी हुई है। तो वो मुसलमान उस वेद की आज्ञा का पालन कर रहा है तो वो बढ़ रहा है। हम हिंदू होते हुए भी वेद की आज्ञाओं का पालन ही नहीं कर रहे। जानते ही नहीं है। तो हम जब नहीं जानेंगे या गलत करेंगे तो हमारा नुकसान होगा। वेद की आज्ञाओं का उल्लंघन करना अधर्म है। वेद की आज्ञाओं का पालन करना धर्म है। यह मनुस्मृति में लिखा हुआ है। जी तो जो भी अनजाने में करो, मुसलमान करो,

00:26:21:15 ईसाई करो, सिख करो, कोई भी करो जो उसकी आज्ञा का पालन करेगा वो सुख भोगेगा। जो नहीं करेगा वो दुख भोग रहा है। संगच ध्व सब मदद धोम। क्या अर्थ है इसका? कि साथ साथ चले साथसा बोले एक सी भाषा बोले सब एक साथ मिलकर दव मंडल में है लास्ट सूत्र है जी इसमें उन्होंने परमात्मा ने लास्ट उपंगार दिया है कि आप इन चार सूत्र है वो चार ही मंत्र है उसमें एक सूत्र में कि साथसा बोलो साथसा चलो भाई सब मिलकर के काम करो लेकिन हिंदू क्या मिल रहा है नहीं मिलता लोग अभी यहां मीटिंग हुई थी खट्टर के उसमें भी हम गए थे उसमें एक क्या नाम थे बजरंग दल का एक व्यक्ति कहने लगा मैंने कहा इतने ही लोग इकट्ठे हुए कहने लगे जी हिंदू इकट्ठा ज होता है जब उसके सिर पर एक मुर्दा होता है नहीं तो इकट्ठे होते ही नहीं है एक दिशा में चलते ही नहीं है अच्छा वहां एकदम हो जाते हैं इकट्ठे हो जाते हैं तो वो बढ़ेंगे एक वेद मंत्र में कहा है कि अधिक से अधिक 10 संतान पैदा करनी चाहिए मनुष्य को लेकिन हम नहीं कर रहे जो कर रहा है तो वो लाभ होगा उसे मैं सारी बातें समझ में आ बस ये थोड़ी सी गले से नहीं उतर रही कि उर्दू में भी हमारा जो है विवाह हो जाएगा। अगर ये करने

00:27:36:21 लगेंगे तो क्या होगा कि हमारे जहां विवाह स्थली होगी वहां को उर्दू पढ़ी जा रही होगी या इंग्लिश पढ़ी जा रही होगी या दूसरी जेनुइन भाषाएं पढ़ी जा रही होंगी। ये थोड़ा सा गले से नहीं उतर रहा है। नहीं गले से मैं कहा नहीं इसको मान लेना चाहिए। मतलब उर्दू में भी वहां पे वेद मंत्र के बजाय उर्दू में बोला जाए तो चलेगा मतलब हमारी हिंदू सनातन व्यवस्था में ऐसा चल जाएगा। मतलब ऐसा होगा ना फिर कालनेमी इसका दुरुपयोग करेंगे इस वाक्य का दुरुपयोग करेंगे वो कालनेमी जो होंगे धीरे-धीरे हमें मुसलमान बनाने के लिए या क्रिश्चियन बनाने के लिए वो इंग्लिश के ही विवाह करवाएंगे तो वो समस्या ये है हम तो गौरव मानते हैं कि हमारे यहां पर जो है वहां पर उच्चारण हो वेद मंत्र का मगर वेद मंत्र की महत्ता ऐसे खत्म हो जाएगी अगर हम इस चीज का प्रचार कर देंगे वही कह रहे हैं इसीलिए महर्षि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश में ये बात कही है लिखी है कि जो भी वेद वेद मंत्रों का हमें उच्चारण करना या वेद मंत्रों को पढ़ना संस्कृत में पढ़ना अनिवार्य क्यों है? तो उन पर आरोप लगाते हैं कि परमात्मा ने संस्कृत में क्यों वेद भेजे? दूसरी भाषाओं में क्यों नहीं दिए? यानी संस्कृत वालों को फायदा होगा। तो महर्षि दयानंद वहां लिखते हैं कि संस्कृत को पढ़ने में जितना काम संस्कृत वाले को करना

00:28:51:22 पड़ेगा, उतना ही काम अंग्रेजी करने पढ़ने वाले को या उर्दू पढ़ने वाले को समान करना पड़ेगा। इसलिए परमात्मा ने कोई पक्षपात नहीं किया क्योंकि जो वैदिक संस्कृत है वो सामान्य संस्कृत है उससे अलग है वो नहीं तो फिर क्या माने कि उसमें विशेषता है ना हां विशेषता है तो इसका मतलब ये अनिवार्यता है कि वहां पर वही मंत्र पढ़े जाएंगे इसीलिए मैं आपको बार-बार ये कह रहा हूं कि वेद मंत्रों का जो उसमें आप करोगे विवाह तो हो जाएगा ठीक है कोई बात नहीं उसका आचरण करेंगे पालन करें ठीक मान्य होगा वो विवाह विवाह तो मान्य होगा विवाह तो कोर्ट में भी मान्य है कोर्ट में कुछ वो थोड़ी होता धार्मिक दृष्टि से थोड़ी ना मान्य है ना ऐसा नहीं होगा विवाह वो भी मान्य है जो संविधान के कोर्ट में कर लिया वो भी मान्य में कर लिया आर्य समाज वाले भी कोर्ट में वहां पहले विवाह वहां कोर्ट में करवा देते हैं फिर हम करवा देते हैं नहीं तो वो कोर्ट का दोबारा विवाह कराने का मतलब ही है कि हमने वो नहीं माना जैसे अगर वो तो देखो संविधान की बात हो गई हां वो संविधान अलग हो गया वहां धर्म थोड़ी ना है वहां पर आप विवाह करना चाह रहे हैं तो कोर्ट में भी हो सकता है और वैसे सात विवाह महर्षि दयानंद ने सत्यापन में लिखा है। देखिए वो बात सही है कि आज कानून ने यह कह दिया कि हम करा देंगे और वहां हो गया। लोग रह रहे हैं। मगर अगर धार्मिक दृष्टिकोण से देखा

00:30:06:24 जाए तो विवाह नहीं हुआ है ना। ये तो मानना पड़ेगा ना। कोर्ट के विवाह को मान्य मानता है आर्य समाज। मतलब हम लोग मानते हैं हमारे समाज तो देखो माने या ना माने लोग तो मान रहे हैं और संविधान है तो लोग तो जाने क्या-क्या मान रहे हैं सब मान रहे हैं उसे जब संविधान ने लिखा है संविधान ने तो समलैंगिक विभा ही कर दिया है अलऊ उसको माना जाएगा क्या हमारे उसके लिए तो देखो मैंने भी बहुत आर्य समाजों के कार्यक्रमों में ये प्रचार कर रहा हूं बता रहा हूं कि एक तो समलैंगिकता और एक लिव इन रिलेशनशिप ये दो कानून हमें लड़ाई लड़नी पड़ेगी खड़ा होना पड़ेगा। इनके विरुद्ध यह खत्म करवाने पड़ेंगे। नहीं तो हमारी संस्कृति बचने की नहीं। तो वही वही तो मैं कह रहा हूं कि कानून के कह देने से कि पतिप्नी हो गए। हमें थोड़ी ना मानना चाहिए कि मानना चाहिए। वो तो जब तक यज्ञ नहीं होगा वहां पर अग्नि प्रज्वलित नहीं होगी और जब तक वहां पर वेद मंत्रों का उच्चारण नहीं होगा और जो अधिकृत व्यक्ति है वक्ता है जो वेद मंत्रों का वो जब तक उसका उच्चारण नहीं करेगा तब तक। देखो हम मतलब मैं इसलिए पूछ रहा हूं क्या हमें इस संदेश का प्रचार करना है कि नहीं करना है प्रचार नहीं करना है आप ये देश वो जो आपतकाले क्या कहते हैं आपतकाले मर्यादा

00:31:21:25 नास्ते भाई चलो वेद मंत्रों का पढ़ने वाला आपको प्रचारक नहीं मिला है अगर वेद मंत्र के अर्थ ही तो आपको पता है तो उससे विवाह कर सकते हैं लेकिन शुद्ध विवाह तो वही है कि वेद मंत्रों में यज भी हो सब कुछ हो और पद वा सप्तप पद वगैरह सारा होता है उसमें तो तो महाराज जी अभी जो जैसे हम यह कह रहे हैं ना आपतकाल में कर सकते हैं यह भी तो हो जाएगा आज ऐसी कौन सी विपदा आ गई है नहीं आज तो कोई विपदा नहीं है तो फिर इस चीज का प्रचार वो तो वो वाली बात है आज से मुझे लग रहा है चार 5000 साल और लग जाएंगे ऐसी स्थिति आने में कि वेद मंत्रों का पाठ करने वाला कोई ना मिले नहीं वो तो वो भगवान ना करे कभी ऐसा हो नहीं मगर बढ़ रहा है अब जो है प्रचार बढ़ रहा है ऐसी बात नहीं है और आएगा फिर आप धर्म के नाम पे लोग ऐसे ही करने लगे समुद्र के वो है आज देखो समुद्र के किनारे जाएंगे कहेंगे वेद मंत्र का मैं अर्थ बोल रहा हूं मैंने धारण कर लिया प्रतिज्ञा कर ली प्रतिबत्नी हो नहीं अब तो यू आपके वो मुरारी बापू है वो चिता की अग्नि में विवाह संस्कार करवाया उस व्यक्ति ने तो बताओ क्या करेंगे वो तो बहुत गलत किया तो उसका तो विरोध है क्या करें उसका तो विरोध है लेकिन ये बात आप सही कह रहे हैं देखो आचार्य चाणक्य ने भी लिखा है न पादो उदक करदमानी न वेद वेद शास्त्र ध्वनि

00:32:36:28 गर्जितानी स्वाहा स्वाहाकार विवर्जितानी शमशान तुल्यानी घणितानी ये आचार्य चाणक्य लिखते हैं कि जिस घर में अतिथियों के पैर धुलवाने से कीचड़ ना हो जाए यानी अतिथियों का सत्कार ना हो स्वाहा स्वाहाकार स्वाहा ना गूंजता यानी यज ना होता हो स्वाहाकार यानी बड़ों का सत्कार ना होता हो स्वाहा सुहाकार विवर्जितानी यह वर्जित हो तो शमशान तुल्यानी वो घर शमशान के समान है। घणी तानी बहुत अच्छी बात है। ये वेद मंत्रों का तो ये सिद्धांत है। अब आप बार-बार उस चीज को वो करें कि भाई ऐसा अगर हो जाए तो कैसा रहेगा? तो भाई मेरे जैसा आदमी भी कहता है कि भाई अगर सही सही उच्चारण कर रहा है। वो उसका अनुवाद ठीक ठीक कर रहा है तो आप विवाह कर लो। लेकिन उसका आचरण करो। मेन तो आचरण है विवाह में कि जो वेद मंत्रों में जो बोला है उसका आप पति पत्नी आचरण करें तब तो विवाह मान्य है नहीं तो ऐसे कोई भी चौपाइयों में वो करते हैं विवाह संस्कार कर रहे हैं चौपाई पढ़ देते हैं उन्हें पता ही नहीं आएगा भाई क्या पढ़ना क्या तो हम तो उसे गलत कहेंगे ना गलत कहते हैं हम टोकते हैं अच्छा

00:33:53:08 पूरा करें हमारा एक छोटा सा टॉपिक और था बस वो कर ले ये वर्ण व्यवस्था को लेकर के अह क्या माना जाता है वह कि जन्म से मानना चाहिए ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र या फिर कर्म से देखो ये तो गीता में भी लिखा है जी गीता का अध्याय 18वें अध्याय में ही है आप देखोगे उसमें गुण कर्म स्वभाव के अनुसार व्यवस्था पूरी दी है श्री कृष्ण महाराज कहते हैं कि ये व्यवस्था जो चौथे में चौथे में चार 13 चार में गुण कर्म विवाद 18व में 18व अध्याय में नहीं नहीं चौथे में चार 13 भगवत गीता जी आप बताइए आप बताइए उसमें गुण कर्म स्वभाव के अनुसार ब्राह्मण वैसे क्षत्रिय विभाग मैंने बताए हैं गुण के अनुसार और ये गुण कहां से निश्चित होते हैं गुरुकुलों में होते थे जहां गुरुकुलों की शिक्षा होती थी या आज गुरुकुल है नहीं नहीं तो हम हम कैसे डिसाइड करें मान लीजिए ब्राह्मण का कार्य है पढ़ाना और मुझे पढ़ना है तो मैं कैसे डिसाइड करूं कि यह ब्राह्मण है वह डिसाइड आचार्य करता था मतलब कोई भी नहीं कर सकता और कोई नहीं कर सकता आचार्य आचार्य डिसाइड करता है कि इसकी योग्यता क्या है आज

00:35:08:16 भी है तो इसका मतलब कोई व्यक्ति अगर अपने मन से कहने लगे कि मैं ब्राह्मण हूं तो उसको नहीं मानना चाहिए अपने मन से नहीं आचार्य ने कहा हो आचार्य ने उसकी योग्यता देखी है अच्छा आचार्य ने जो 15 साल 16 साल पढ़ाया है उसने उसका आचरण देखा उसका स्वभाव देखा ऐसा कोई सर्टिफिकेट दिया जाता है गुरुकुलों से कि यह हम ब्राह्मण निकल रहा है। यह क्षत्रिय नहीं दिया जाता क्या? आईएएस अधिकारी कौन होता है? नहीं आईएएस अधिकारी कौन होता है? जी उसको कितना पढ़ना पड़ता है? तब जाकर के वो सर्टिफिकेट देता है कि ये आईएएस बन गया। नहीं तो वही एक ब्राह्मण का सर्टिफिकेट। हां ब्राह्मण का भी जो आईएएस का ये सर्टिफिकेट है। आज भी वही व्यवस्था है। आईएएस कौन हो गया? टॉप अधिकारी। जो वर्ण जिसका जिसको चला रहा है व्यवस्था को वो तो वो तो प्रशासन में हो गया। प्रशासन में हो गया। प्रशासन में हो गया और जो इसको व्यवस्था बनाता है वो ब्राह्मण का वो करता है कि भाई इस तरह से योजनाएं बनाने वाला कौन आएगा? वही तो ब्राह्मण आएगा। नहीं देखिए ऐसा है ना जैसे हमें वेद का वैदिक अध्ययन करना है। का अध्ययन करना है तो वो तो एक ब्राह्मण से ही करेंगे। अब वो ब्राह्मण जो है आचार्य ने घोषित किया होगा। वही होगा। आचार्य ने घोषित किया है कि भाई इसके ये गुण है। इसको पढ़ने

00:36:23:25 पढ़ाने का यज करने कराने का काम तो मैं मैं वही कह रहा हूं कि ऐसा सिस्टम है अपने यहां अप्लाइड कि आचार्य ऐसा कुछ करके भेज रहे हैं बाहर कि ये हमारे यहां से ब्राह्मण जा रहा है। ये हमारे यहां से क्षत्रिय जा रहा है। ये वैश्य जा रहा है। ये शूद्र जा रहा है। जिन गुरुकुलों में इस तरह की आर्ट्स विद्या की शिक्षा चल रही है। वो सर्टिफिकेट देते हैं क्या? शूद्र का भी देते हैं। शूद्र तो शूद्र है। शूद्र का सर्टिफिकेट नहीं है। उसकी जरूरत नहीं मतलब वहां से पढ़ के ऐसा कोई निकलता है जिसको ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य नहीं बनाया गया हो। हां। देखो पहले ये समझो शूद्र किसको कहते हो? जो व्यक्ति पढ़ाए से भी ना पढ़ पाए जी। उसको शूद्र कहते हैं। अछूत नहीं है वो। हां। गुरुकुल में गया। जी जी। लेकिन वो पढ़ाने से भी पढ़ नहीं पाया। तो क्या करेगा वो? घर आ जाएगा, बैठ जाएगा। जी जी। यानी शूद्र जो है वह है जो एक तरीके से मूर्ख मान लिया जाए। मूढ़मती मूढ़मती है जो पढ़ाई से भी नहीं पढ़ पाया। वो विद्या को नहीं जान पाया तो उसका जन्म नहीं हुआ। दूसरा जन्म नहीं हुआ। विद्या का जन्म नहीं हुआ। जो तीन है क्षत्रिय वैश्य क्षत्रिय और ब्राह्मण इस इनको द्विज बोलते हैं दोनों को। तीनों को जी। द्विज क्या जो पढ़ गया जिसने वैश्य की शिक्षा ग्रहण की मतलब ये यार हिसाब किताब में बहुत चतुर

00:37:38:28 रहेगा। तो इसको वैसे बनाया जाए। वैसी के काम में लगाया जाए। एक भुजाओं में बल भी है और क्रांतिकारी है। बड़े अच्छे उससे सोचता है, चिंतन करता है, न्यायपालक है, न्याय करना चाहता है, जानता है। तो उसको क्षत्रिय का नाम दे दिया। और एक यह है कि जो उसने सारे विद्या बड़े अच्छे ढंग से ग्रहण किए हैं। उसका आचरण भी बड़ा सॉफ्ट है, कॉमन वो है, सामान्य है। और बड़ा अच्छा व्यवहार करता है। तो वही ये वेद विद्या अगर पढ़ाएगा, प्रचार होगा तो इसका अच्छा काम हो जाएगा। इसको ब्राह्मण का पद दिया जाता है। ठीक है? इसमें एक चीज निकल के आई कि जिसके आचरण जैसे देखते हैं आचार्य वो उसको घोषित कर देते हैं कि ये ब्राह्मण है। ये वैश्य है, शूद्र है, क्षत्रिय है। तो जैसे यहां पे कोई ऐसा है जिसको बनाया गया हो कि तुम ब्राह्मण नहीं तुम वैश्य हो। ऐसे करके एक तो यह वाली बात है। नहीं ये तो देखो गुरुकुल की परिपाटी ही खत्म हो गई। अभी गुरुकुलों में ऐसा नहीं चल रहा है। लॉर्ड मैकाले ने एक मिनट अभी गुरुकुलों में ऐसा नहीं चल रहा है कि किसी को ब्राह्मण बनाया जा रहा हो। किसी को शूद्र वो किसी को जो है वैश्य कहा जा रहा हो, किसी को क्षत्रिय कहा जा रहा हो। क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि गुरुकुलों में अभी ये चल रहा है कि सबको ब्राह्मण बनाया जा रहा है। नहीं नहीं

00:38:54:04 ऐसा नहीं है। तो सर्टिफिकेट दिया जा रहा है वैश्य का, क्षत्रिय का। देखो जितनी जिसकी योग्यता होती है उसके हिसाब से उसको सर्टिफिकेट दिया जाता है। मतलब मैंने अभी तक ऐसा सर्टिफिकेट देखा नहीं है। आप ब्राह्मण वैश्य इसको इस समय क्यों ऐसा मान रहे हैं कि ये ब्राह्मण वैश्य ही अच्छा एक एक उदाहरण मैं देता हूं। छोटा सा उदाहरण है। आप समझे समझ लेंगे। अवश्य अवश्य एक नॉर्थ ईस्ट में एक विद्यालय है। इंजीनियरिंग कॉलेज है। नॉर्थ ईस्ट यानी असम की साइड। असम की साइड में और वो है अरुणाचल में। अच्छा अरुणाचल अरुणाचल में नॉर्थ ईस्ट इंजीनियरिंग कॉलेज है इस नाम से है उसमें बच्चा हाई स्कूल का पढ़ने जाता है दो साल बाद उसकी परीक्षा होती है एक साल हर साल परीक्षा होती है लेकिन 2 साल बाद उसका विशेष परीक्षा होती है उस परीक्षा में जितने उसके मार्क्स आए मान लिया इस लेवल तक 50% तक मार्क्स आए तो उसको वहीं पर आईटीआई का सर्टिफिकेट दे के उसको विदा कर दिया जाता है। भाई आप टर्नर वेल्डर या यह आप यह काम करो। जी। उसके बाद जो 50% से ऊपर है उनको दूसरी क्लास में दो साल तक फिर पढ़ाया जाता।

00:40:09:13 तो मैं ये पूछ रहा था कि यहां गुरुकुल में जैसे आर्य समाज के गुरुकुलों में यह हो रहा है कि वो किसी को यह कहे तुम ब्राह्मण नहीं हो। तुम क्षत्रिय हो। या किसी को यह कहे तुम क्षत्रिय भी नहीं हो। तुम जो है वैश्य हो। या किसी को यह कहें कि तुम वैश्य भी नहीं हो। तुम शूद्र ही हो। मतलब ऐसा मैंने अभी तक मेरी जानकारी में नहीं हुआ कि ऐसा किसी के साथ हुआ हो। इसलिए पूछ रहा हूं। ब्राह्मण वैसे शूद्र यह पुरानी आपकी वो थी डिग्रियां थी। पुरानी डिग्री थी। आज की डिग्री तो आजकल वेद पढ़ने के लिए ब्राह्मण देखना जरूरी नहीं है कि ब्राह्मण है कि नहीं। वेद पढ़ने पढ़ाने के लिए। वेद पढ़ेगा तभी तो ब्राह्मण बनेगा। ठीक है। तो ब्राह्मण है ना आज भी। ब्राह्मण है। वेद पढ़ेगा तभी ब्राह्मण बनेगा। जाति से तो बहुत ब्राह्मण आए हैं। लेकिन वो वेद नहीं पढ़े हुए। उन्हें ब्राह्मण कह दें क्या? ठीक है। लेकिन लोग कह रहे हैं फिर नहीं नहीं मैं ये नहीं कह रहा। जैसे मुझे पढ़ना है। अब जैसे मनुस्मृति ने कहा गया कि ब्राह्मण ही ब्राह्मण से ही पढ़ना है वेद। वेद किससे पढ़ना है? ब्राह्मण से। अब वो बात है कि आप मान रहे हैं कि कर्म से होना चाहिए। तो ठीक है कर्म उसके आचरण में वैदिक शिक्षा होनी चाहिए। पढ़ाने वाला तो ब्राह्मण ही होगा। जो आपको पढ़ाएगा वेद पढ़ाएगा वो भी ब्राह्मण होगा। हम्म। तभी तो आपको पढ़ा पाएगा। तो वो ब्राह्मण है कि नहीं है? ये कैसे पता लगा? नहीं है। हमारे आचार्य बहुत है आप देखो कौन गुरुकुल में आचार्य

00:41:24:24 हैं पढ़ाने वाले। नहीं नहीं आप समझे नहीं मेरी बात कि जैसे हमने माना कि गुरुकुल में आचार्य घोषित करता है कि कौन ब्राह्मण है कौन नहीं। तो आज आर्य समाज ये घोषित कर रहा है कि नहीं कर रहा है। ये बस चीज है। अच्छा इसमें एक चीज और है कि वो मेरा उदाहरण अधूरा रह गया वो। जी जी जी उससे आप अच्छी तरह से समझ नहीं तो वह आधुनिक शिक्षा में आप कह रहे हैं ना आधुनिक शिक्षा में गुरुकुल की बात वही गुरुकुल की सेम चीज़ थी पहले दो साल उन्होंने सर्टिफिकेट आईटीआई का यही पूछ रहा हूं दूसरे साल डिप्लोमा दे दिया तीन मतलब दो चार साल बाद डिप्लोमा का दे दिया और उसके बाद जो उसके परसेंटेज आए उन्हें पढ़ने के लिए आगे भेजा कि आप डिग्री करो और डिग्री का सर्टिफिकेट वहां छ साल बाद तो मैं वही पूछ रहा हूं तो अभी आर्य समाज में ऐसा हो रहा है आर्य समाज के किसी को रोक दिया जा रहा हो किसी किसी को आगे इतना बढ़ाया जाए, किसी को बहुत आगे भेजा जा रहा हो। ऐसा हो रहा है। मैं बस ये पूछ रहा हूं। अच्छा इसमें एक चीज इसमें से भी आईएएस बन रहे हैं ना गुरुकुल की शिक्षा लेकर आईएएस की परीक्षा देते हैं तो वो देखिए आईएएस हो जाता है। देखिए जहां पे धर्म अलग चीज है और आईएएस अलग चीज है। सवाल यह है कि जो वेद का पठनपाठन कराना है, यज्ञ कराना है। यज्ञ करता

00:42:39:25 होता है, होता है, यज्ञ में ऋत्विक चार ऋत्विक होते हैं ना? हां। है ना? तो फिर वो वो हम उसमें जो है कॉन्स्टिट्यूशनल भाषा ला के आईएस वाली चीज को ला के यहां पे हमारी चीज थोड़ी सी फिर रह जाएगी। अच्छा आप केवल यही जानना चाह रहे हैं कि भाई जो केवल यज करने कराने वाला है वो ब्राह्मण है उसको सर्टिफिकेट देता है या नहीं? हां वो दे के भेज रहा है। मिलते हैं। हां। तो मिलते हैं। तो किसी को यह कर रहा है कि आप ब्राह्मण नहीं आप क्षत्रिय बन के जाओ यहां से। यह करता है कि नहीं? यह तो करता है कि ब्राह्मण बना के भेज रहा है। यह करता है कि नहीं कि आप जो है वैश्य बन के जाओ यहां से या आप कुछ भी नहीं बन पाए। आप शूद्र रह जाओ। ऐसा करता है क्या? हां तो गुरुकुल छोड़ के भी आ जाते हैं। बीच में भी वो तो अपने मन से जैसे अपने मन से जब पढ़ नहीं पाया उसे भाई निकाल देते हैं कि भाई तुम इस लायक नहीं हो। चलिए ठीक है। किसी को क्षत्रिय या वैश्य का देता है। क्षत्रिय के प्रशासनिक अधिकारी बनते तो हैं बहुत। क्षत्रिय उसमें गुरुकुल में यहां वंदना वो आई थी। वंदना चौहान हद्वानी की डीएम रही है। प्रयागराज की भी डीएम रही है वो। तो चोटीपुर चोटीपुरा गुरुकुल से पढ़ के आई है वो। मतलब जो आचार्य नहीं बन पाया वो अपने आप क्षत्रिय है। क्षत्रिय जो क्षत्रिय नहीं बन पाया वो अपने आप जो है किसी ने अपने मन से परचन की दुकान खोल ली। वो वैश्य है। तो इसमें घोषित कहां किया आचार्य? अभी वो

00:43:54:28 गुरुकुल है ही नहीं है। आश पद्धति वाले गुरुकुल अभी चल नहीं रहे। यही मैं यही मैं जानना चाह रहा हूं। मतलब यह चीज नहीं हो रही है घोषित तो अभी फिर ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र अपने मन से घोषित कर रहा है व्यक्ति अपने मन से नहीं है आचार्य देता है भाई इतना काबिल हो गया मना कर रहे हो ना कि अभी काबिल हो गया कि ये यज करा सकता है नहीं नहीं आप मना कर रहे हो ना कि अभी वो वाले गुरुकुल है नहीं इतने गुरुकुल इतने वो सर्टिफाइड गुरुकुल अभी नहीं हुए हैं तो लेकिन जो वो आचार्य कह तो रहा है तुम यज करा सकते हो कराओ यज यज्ञ कराने को तो कह रहा है मगर तुम ब्राह्मण नहीं हो तुम क्षत्रिय हो ये कह रहा है कि नहीं यह दिक्कत है ब्राह्मण सब बनना चाहते हैं। ये है। अच्छा इसमें एक छोटी सी बात दो एक छोटी सी बात रह गई। बस बस हो गया हो गया। छोटी सी बात रह गई कि जैसे हमने कहा कि जो विद्या ग्रहण कर लेगा वो ब्राह्मण और वो बताएगा कौन? आचार्य। वो बात अलग है कि अभी आचार्य वो है नहीं जो घोषित कर रहे हो। अभी तो सब अव्यवस्थित चल रहा है। व्यक्ति अपने हिसाब से अपने को कोई मान ले रहा है कि मैं ब्राह्मण हूं। कोई मान ले रहा है मैं क्षत्रिय हूं। कोई मान ले रहा है मैं वैश्य हूं। अपने मन से। अब इसमें यह बात आती है कि मनुस्मृति के अनुसार ब्राह्मण का जनेऊ कब होना है?

00:45:10:16 शिक्षा चालू तब होती है किसी की शिष्य की जब वह गुरुकुल जाता है। गुरुकुल जाता है तब जब उपनीत होता है। सबसे पहले तो यज्ञपति होता है। तो ब्राह्मण का जनेऊ किस अवधि किस काल में होना है और किस विधि से होना है यह डिसाइडेड है। मनुस्मृति में बताया गया है। संस्कार वो विधि है उसमें भी बताया गया है। तो जब आचार्य ने अभी ना तो उसको पढ़ाया है 10 साल 15 साल तो आचार्य वहां पर कैसे घोषित करेगा कि ये ब्राह्मण है क्योंकि वहीं पर तय करना है ये ब्राह्मण है या नहीं ये जो पवित्र है घर में भी हो अब ब्राह्मण को जब कोई खुद ब्राह्मण है तो वो चाहता है मेरा बेटा भी ब्राह्मण बने समझ रहे हैं ना हम यानी कि विधि इस तरह से बताई गई कि वो किसका लड़का है हां वो उसमें ये बताया गया वो ब्राह्मण है तो ब्राह्मण का लड़का लड़का है। ब्राह्मण जो है यह चाहता है कि मेरा बेटा भी ब्राह्मण बने तो उसको यजपी तो उसके हिसाब से वो तिथि और वो दिया हुआ मतलब उसके जन्म के हिसाब से दिया हुआ है। हां तो इसका मतलब इसका मतलब उपनीत होते समय वो ब्राह्मण है कि नहीं यह तय होता है उसके जन्म से। वो जो मां-बाप चाह रहे हैं उसको भाई देखो

00:46:25:18 तो जन्म से ही हुआ ना वो मां-बाप है तो जन्म रहे हैं ना बना तो नहीं चाह रहे हैं कि ये ब्राह्मण बने नहीं बन पाता वो नहीं वहां पे जो हां ये जो पवित्र उसने अपने हिसाब से करवाया देखो एक मेरा बेटा डॉक्टर बनना मैं डॉक्टर हूं मेरा बेटा डॉक्टर बनना चाहता है जी मैं चाहता हूं मेरा बेटा डॉक्टर बने मैंने बायोलॉजी दिलवा दी उसे जी लेकिन बायोलॉजी में नहीं चला जी क्या करूंगा आगे आगे जाके परिवर्तित हो जाएगा। तो मैं वही कह रहा हूं यज्ञ पवीत यज्ञपवीत जो होता है जैसे आपने कहा कि मेरा बेटा जो है मैं डॉक्टर बनवाना चाहता हूं तो मैंने उसको बायोलॉजी दिलवा दी। वो नहीं चल पाया आगे जाकर के उसको सर्टिफिकेट नहीं मिला डॉक्टर का। वो बात बाद की है। मगर आपने एडमिशन दिलवाते टाइम तो यही मान के चले कि ये डॉक्टर है। डॉक्टर बन जाएगा। तो उसी हिसाब से उसका यज्ञपवित इस आधार पे होता है कि वो किसका लड़का है। हां। उसी हिसाब से कराया। हां। उसी हिसाब से कराया। कराया। यज्ञ अगर कोई ब्राह्मण है तो ब्राह्मण के लड़के का जनेऊ इस हिसाब से होगा। व मतलब वहां पे ब्राह्मण और क्षत्रिय वैश्य शूद्र उसके जन्म से तय हो जाता है। वह किस कुल परिवार का है? वो कुल परिवार वो चाहता है ना जैसा भाई तो शूद्र आईटीआई शूद्र का जो पिता होता है मैंने आईटीआई करवाई शूद्र का जो पिता होता है वो तो नहीं चाहेगा कि मेरा बेटा शूद्र हो। हां

00:47:40:21 तो फिर उसका क्या उसका उसका यजोपवित होता है कई बार उसमें मनुस्मृति में बताते हैं कौन से उसमें महर्षि दयानंद भी लिखा है कि उसका यजोपवित ना करें ना करें चार प्रकाश में ऐसा भी लिखा है ना करें वो एक कोई कोट किया है महर्षि दयानंद ने नहीं कहने का मतलब है कि आचार्य के बिना घोषित किए हुए मां-बाप की इच्छा से मां-बाप की उस समय घोषित हो जाता है कि ये ब्राह्मण है। वो उसे है नहीं है। ब्राह्मण बनाने के लिए मैं एडमिशन दे रहा हूं। मगर वहां तो यह बात आ रही ना कि ब्राह्मण का जनेऊ ऐसे करें। यह बात नहीं आ रही कि जिसको ब्राह्मण बनना हो वह ऐसा करे। वहां सेंस यही है भाई वो ब्राह्मण कैसे बन गया? अभी तो उसकी शिक्षा शुरू भी नहीं हुई है। जी तो वो ब्राह्मण कैसे बन गया? तो वहां पे तो ये माता-पिता ने वो क्रिया है। प्रयत्न किया है कि मेरा बेटा ब्राह्मण ही बने लेकिन नहीं बन पाता। यानी कि ब्राह्मण वो है जिसके पास जो है विद्या आ जाए। है वो ब्राह्मण है। तो अब यजुर्वेद 26 लोक में जैसे सत्यार्थ प्रकाश में बताते हैं कि जो वेद वाणी है वो ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र सबके लिए है। यथे वाचम कल्याण हां जी हां जी तो अब ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र सबके लिए है। जबकि शूद्र तो वो है जिसका उपनयन होना ही नहीं है या जो मूर्ख है जिसके लिए वेद है ही नहीं। तो

00:48:55:27 फिर वहां पे वेद क्यों दे रहे हैं शूद्र को? वेद उसके लिए क्यों नहीं है? वेद में जो दिया हुआ है ना वो महर्षि दयानंद वहां अर्थ यही करते हैं कि ये जो वेद वाणी है सबके लिए है स्त्री हो पुरुष हो तो शूद्र तो वो है ना जो उपनीत नहीं है उसके लिए तो वेद वाणी नहीं तो वेद तो उसे भी वेद के अनुसार तो उसे भी चलाना है नहीं तो वेद पढ़ना है शूद्र को कि नहीं पढ़ना है वेद वो समझता नहीं है पढ़ नहीं पाता है लेकिन उसको चलाना तो वेद के अनुसार चलाना है मतलब वेद पढ़ना नहीं है पढ़ नहीं पाता वो नहीं समझ पा रहा तो वहां मतलब ये नहीं है कि वहां पे ये कहा जा रहा हो कि वेद मंत्र एज इट इज सबके लिए चलाने के लिए है। चलाना तो सब कोई वेद से है। उसमें जब उनके सामने वह आई ना एक प्रश्न आया कि भाई स्त्री को और शद्र को वेद नहीं पढ़ना चाहिए। वेद नहीं पढ़ना समझ गया। तो इसीलिए तो उन्होंने कहा कि ये वेद नहीं पढ़ना चाहिए। कोई बात नहीं। लेकिन ये तो परमात्मा की वाणी है। सबके लिए है। सबके उसका जो लाभ है सब उठाएंगे। वो बात अलग है कि शूद्र जो है प्रवचन के माध्यम से उठा ले। बस वो शूद्र जरूरी नहीं है सीधे शूद्र पढ़े। क्योंकि शद्र क्योंकि अगर शद्र पढ़ेगा तो उसको उपनीत होना होगा। उपनीत होगा तो दुज हो जाएगा। उसका अर्थ नहीं समझ पाएगा वो। तो इसलिए हमें उसका अर्थ उसे भी बताना है कि भाई तू इस रास्ते पे तो यानी वहां पे डायरेक्ट

00:50:11:06 वेद पढ़ने की बात नहीं है। वहां पे ये है कि वेद का अर्थ या वेद का धर्म सबके लिए है। वेद का ज्ञान सबके लिए वेद का धर्म सबके लिए है। वेद का पठनपाठन सबके लिए है। क्योंकि पठनपाठन तो उपनीत के लिए है। और उपनीत होते ही शूद्र शूद्र नहीं रहेगा। वो तो द्विज हो जाएगा। है ना? नहीं शूद्र का भी है जो पवित्र तो शद्र का भी करवा सकते हैं कि वो वो नहीं अगर उसे शद्र किस आधार पे शद्र है जी वो शूद्र है मान ले पढ़ नहीं पा रहा है जी अगर उसे प्रयत्न करे स्पेशल लिखा है अगर उससे प्रयत्न करे और वो भी जिज्ञासु है तो वो भी ब्राह्मण बन सकता है तो वो वेद का मंत्र जब उसको आ जाएगा पढ़ना पढ़ाना तभी तो बनेगा तभी बनेगा उससे पहले तो यज्ञ चाहिए होगा उसे ये जो यज्ञ तो पहले चाहिए होगा ना ये जो पवित्र के टाइम पेज हो जाएगा। शद्र नहीं रह जाएगा। वो कैसे रह जाएगा? वेद विद्या के बगैर वो शद्र ब्राह्मण वैश्य क्षत्रिय नहीं बन सकता है। वो तो एक मैंने अभी आपको बताया है कि जो भी ब्राह्मण का बेटा ब्राह्मण जो है अपने बेटे को ब्राह्मण ही बनाना चाहेगा। इसलिए उसने यजोपवीत उस रीति से करवाया। क्षत्रिय का बेटा अब चाहे शूद्र का वो है ही नहीं है। तो शूद्र का यजोपवित ना भी करो। अगर वो चाहता

00:51:26:09 है के पढ़ा बिना यजपवीत के भी अगर वो चाहता है कि भाई मैं मुझे यह विद्या अध्ययन करूं वो उसकी जिज्ञासा है और गुरुकुल भी आचार्य भी ये चाहता है तो उसको वो करा करके आगे विद्या करा के यजपवित करा करके पवित किस आधार पे होगा उसका किस आधार पे भाई वो ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शद्र उसके माता पिता तो चाहते वो तो है नहीं तो आधार क्या होगा यज्ञ पवित होने का या तो बिना बिना मतलब जो वेद की नियमावली है मर्यादा उसको तोड़ के वेद का पठन पाठन करे वेद की कोई मर्यादा नहीं टूटती। वेद बिना यज्ञ पवित बिना यजपवीत के भी उसको पढ़ाया जाएगा। उसके बाद जब उसका गुण कर्म स्वभाव आप देखेंगे तो उस बिना यज्ञ पवित के क्यों नहीं पढ़ सकते? अच्छा मुझे अभी तक यह मालूम था कि यज्ञ वेद के पठनपाठन के लिए पहले यज्ञ प्रवीत आवश्यक है। उसके बाद उसकी पठनपाठन चालू होता है। ऐसा मुझे संज्ञान में नहीं ऐसा नहीं है। कितने लोग हैं जो यज्ञ पवित्र बिना उसके बिना मंत्र के वो तो गलत करते हैं ना। पढ़ रहे हैं। और ये तो क्या-क्या गलत कह रहे हैं लोग कि स्त्री को गायत्री मंत्र नहीं पढ़ना चाहिए। और खुद के गले में है नहीं। यह तो एक अलग विषय हो जाएगा। समाप्त करते हैं। चलिए चलिए सभी को चर्चा

00:52:41:22 कैसी लगी? आप बताएं सभी को बहुत-बहुत आभार समय देने के लिए। कैसा लगा गौतम खट्टर जी के स्वयं गुरुदेव यहां पर बैठे हुए हैं। तो ये चर्चा कैसी लगी? गौतम खट्टर जी के गुरुदेव के साथ हमें अवश्य बताएं। जय श्री राम। इसमें बहुत कुछ अभी बाकी है। हम नहीं समझा पा रहे। देखो कर्म प्रधान है कर्म प्रधान है सबके अभी तक सर्टिफिकेट शायद वहां से गुस्सा एक बच्चा और वो पढ़ना चाह रहा था पढ़ाया जा रहा था वो

00:53:20:12 सर क्यों नहीं पा रहा है नहीं पढ़ पा रहा कोई फिर तो ये हो जाएगा ना कोई अपने मन से कुछ भी अपने आप को बनाने ही नहीं कैसे मैं नहीं आप सुनिए नहीं मैं एक ब्राह्मण विद्या करेगा अपना स्वयंपा हम देखिए ब्राह्मण को हम कैसे पहचाने ब्राह्मण चाहिए विद्या से कि उसके पास विद्या है कि नहीं उसमें दिक्कत ये आ जाएगी शिक्षा विद्या मंत्र सुनिए तो इसमें दिक्कत ये आ जाएगी इसमें दिक्कत नहीं आ जाएगी

00:54:11:13 विद्या ग्रहण नहीं कर पा रहे अब वो बाहर गए ब्रह है ही नहीं हमें कैसे पता लगे ब्राह्मण हम विद्या देख के करेंगे ना विद्या ब्राह्मण की बात नहीं है ब्राह्मण है ही नहीं तो बात तो सुन ली मैं यही कह रहा हूं कि विद्या उसके पास नहीं है। नहीं है तो हमें कैसे पता उसके पास विद्या है कि नहीं? व्यवहार में नहीं जाएगा। व्यवहार में नहीं जाएगा। सही हम कैसे चेक करेंगे? देखिए मैं एक बात पढ़ने से मेरी बात सुनिए। सुनिए सुनिए। मुझे यदि ए बी सी डी आती है तो मैं चेक कर सकता हूं इसको आती है कि नहीं? मुझे कोई ए बी सी डी नहीं आती तो मैं कैसे चेक करूंगा उसको ए बी सी डी याद रख तो यानी कि हम सामान्य लोग अगर पढ़ने जा रहे हैं तो हम ये तय नहीं कर सकते कौन ब्राह्मण है

00:55:08:04 यानी कि उससे ऊपर का ही कोई तय करेगा वही तो मैं कह रहा हूं

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