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00:00:00:09 मैं आचार्य डॉक्टर प्रीति विमर्शिनी पाणिनी कन्या महाविद्यालय महमूरगंज वाराणसी संगतीकरण संगतीकरण हुआ आत्मा का किसके साथ परमात्मा के साथ जी तो फिर परमेश्वर ने उनके ज्ञान गुहा में वेदों का ज्ञान प्रदान किया ईश्वर ने आके जो ज्ञान दिया तो हमने लक्षण क्या देखा ईश्वर का जिससे कि हमने मतलब ऋषियों ने ये जान लिया कि ईश्वर द्वारा प्रदत्त ज्ञान है। क्षेपक का मतलब आप क्या मान रहे हैं? क्या ईश्वर प्रकाश के मार्ग में भी प्रकाश से भी टकरा सकता है? प्रकाश से क्यों टकराएगा? ये कहा जाता है कि ईश्वर जो है नाना प्रकार के रूपों में प्रकट होता है। हम तो जैसे हम कहते हैं कि पृथ्वी के रूप में प्रकट हुआ, चंद्रमा के रूप में प्रकट हुआ। तो क्या पृथ्वी ईश्वर है? नहीं। हमारे मतलब जब आर्य समाज की बात आती है तो आर्य समाज [संगीत] की हर बात हम लोग वेद से लेते हैं। ठीक है? तो वेद में यदि कह दिया गया कि स्त्री ब्रह्मा कि स्त्री ब्रह्मा हो सकती है। यानी चारों वेदों की वो ज्यादा हो सकती है। और वेदों का ज्ञान बिना उपनयन के नहीं हो सकता है। फिर विजानंद जी के पीछे के गुरु स्वामी पूर्णानंद जी उनके पीछे के [घंटी की आवाज़] तो सभी को जय श्री राम। मैं शिवश नारायण द्विवेदी पूरी शंकराचार्य

00:01:15:15 जी का एक अल्पज्ञ शिष्य और प्रभु श्री राम का एक साधारण सा भक्त आप देख रहे हैं आहान कॉल ऑफ ध YouTube चैनल और आज हमारे साथ हैं आर्य समाज से सद्ध और काशी में एक जानीमानी विदुषी हैं हमारे साथ आचार्य हैं विमर्शनी जी और जैसा कि आप जानते हैं हम विभिन्न दार्शनिक चर्चाओं के माध्यम से आपके समक्ष धर्म और ब्रह्म से संबंधित जो तथ्य होते हैं उनको प्रस्तुत करने का कार्य करते हैं। तो आज इसी क्रम में जो आचार्य जी हैं वो जो आर्य समाज का सैद्धांतिक पक्ष है उस पर हमारे साथ प्रकाश डालने के लिए यहां पर उपलब्ध हैं। तो सबसे पहले तो आपको जय श्री राम नमस्कार। नमस्ते जी। जी तो आचार्य जी थोड़ा सा आप अपने बारे में हमारे दर्शकों को एक संक्षिप्त में थोड़ी सी जानकारी दे दीजिए। मैं आचार्य डॉक्टर प्रीति विमर्शिनी पाणिनी कन्या महाविद्यालय महमूरगंज वाराणसी पाणिनी कन्या महाविद्यालय संपूर्ण भारत ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व में एक जानीमानी संस्था है। मैं इस विद्यालय में वर्तमान समय में प्राचार्य पद पर हूं और व्याकरण दर्शन वेद

00:02:30:19 निरुक्त उपनिषद इत्यादि ग्रंथों का अध्ययन अध्यापन का कार्य भी करती हूं। एवं संपूर्ण भारत में अनेकत्र वैदिक प्रवचनों के लिए मैं उपस्थित रहती हूं और मैं सबको अज्ञान अंधकार से दूर करने का प्रयास करती हूं। बहुत ही सुंदर बहुत ही संक्षिप्त में और टू द पॉइंट हमें परिचय प्रदान किया। आपका बहुत-बहुत आभार। बहुत संक्षिप्त सुंदर सा परिचय दिया। तो आचार्य जी एक एक प्रश्न होता है कि जैसे ईश्वर है जी इस संबंध में जो हमारा दार्शनिक पक्ष होता है उसमें हम कार्य कारण के सिद्धांत से ईश्वर की जो अस्तित्व है उसको सिद्ध करते हैं कि कार्य है तो उसका कारण होगा तो एक तरीके से अनुमान प्रमाण से ईश्वर की सिद्धि हो जाती है। अह इसमें फिर इसके बाद एक प्रश्न ये आता है कि अ फिर ईश्वर का अस्तित्व है। ये तो सिद्ध हो गया। फिर वेद को प्रदान करने की आवश्यकता क्या है? मतलब वेदों का ज्ञान हां वेदों का ज्ञान देने की ईश्वर को फिर क्या आवश्यकता है? देखिए वेदों का जो ज्ञान है वो केवल ईश्वर की सिद्धि के लिए है। ऐसा नहीं है। जी जी ईश्वर ने संपूर्ण सृष्टि की रचना

00:03:45:27 की है। जी जी और संपूर्ण सृष्टि के जो पदार्थ हैं उन पदार्थों का हम उपयोग कैसे करें? जी जी इसका ज्ञान वेदों में दिया गया है। जी जी जैसे आप कल्पना करिए कि जैसे आपके पास एक ये मोबाइल है बिल्कुल तो यह मोबाइल ईश्वर ने किसी भी मनुष्य ने बनाया तो उसने मोबाइल बना दिया अब उसके बाद यह पता है कि मोबाइल अपने आप नहीं बनेगा। इसको बनाने वाला कोई है जी जी तो क्या इतने मात्र से हम मोबाइल को चलाना सीख लेंगे? बिल्कुल बिल्कुल नहीं सीख पाएंगे। जी तो जब हमें मोबाइल मिलता है तो उसके साथ अब तो बहुत सारी चीजें YouTube चैनल पर इन सब चीजों पर देखते हुए हमको ज्ञात हो चुका है। किंतु कोई भी इस प्रकार का यदि पदार्थ निर्मित होता है तो उसको जो चलाने की प्रक्रिया है उसके जो फंक्शनंस हैं उनको हम कैसे प्रयोग में करें जी बस उसी के लिए ही वेदों का ज्ञान परमपिता परमेश्वर ने दिया है। तो उसके अनुसार जितने भी यह पदार्थ हैं अग्नि है, जल है, वायु है, आकाश है, पर्वत है, नदियां है, वृक्ष हैं उसके अतिरिक्त जितने भी ये मानवीय संबंध हैं जी। तो मानव जो है वो इन पदार्थों का उपयोग कैसे करें? किस प्रकार से करें? जी जी इस

00:05:01:01 चीज को वेदों में बताया गया है और हम संक्षेप में यह भी कह सकते हैं कि एक पूरा जैसे कोई संस्था का निर्माण होता है तो संस्था कैसे संचालित होगी उसके लिए कुछ एक संविधान बनाए जाते हैं। बाय लॉस बनाया जाता है। इसी प्रकार से संपूर्ण सृष्टि कैसे संचालित हो? सारी व्यवस्थाएं कैसे संचालित हो? इन सब का जो बाय लॉज है, जो संविधान है, वो वेदों में बताया गया। तो वेदों की तो आवश्यकता सिद्ध ही है। तो तो आचार्य जी इसको इस तरह से कह सकते हैं ना कि जैसे कि काठ की लकड़ी में अग्नि है। ये तो हमें चलिए किसी तरह से अनुमान प्रमाण से प्राप्त हो गया। प्राप्त हो गया। परंतु अग्नि को हमारे लिए सुलभ कैसे होना है? हम उसका उपयोग कैसे कर सकते हैं? उसके लिए अग्नि का हमारे संपर्क में आना जरूरी है। जिस तरह से ईश्वर हमारे संपर्क में आकर हमें वेद प्रदान करते हैं। वेद प्रदान करते हैं। है ना? तो अग्नि जो है जब प्रकट होगी हमारे संपर्क में आएगी तभी हमको जो है ये ज्ञान हो पाएगा। हां यह ज्ञान हो पाएगा कि हम जो है कैसे उसका सदुपयोग कर सकते हैं। हां तो क्योंकि यह क्वेश्चन ये उठता है ना कि भ ईश्वर का जो प्रमाण है वो तो केवल सृष्टि होने से ही मिल जाता है। मगर फिर वैदिक ज्ञान की आवश्यकता क्या रह गई? तो ईश्वर हमारे संपर्क में आया और उसने वैदिक ज्ञान दिया कि हम उसका उपयोग कैसे

00:06:16:04 कर सकते हैं। बिल्कुल बिल्कुल। अच्छा आचार्य जी ये अ जो वेद हैं ये हमें किस प्रकार से ईश्वर के द्वारा प्राप्त होते इस पर थोड़ा सा प्रकाश डालते हैं। जी देखिए वेद किस प्रकार से प्राप्त हुए इसके लिए वेदों में ही प्रमाण है। जी जी ठीक है। उसमें एक मंत्र है बृहस्पते प्रथम वाच अग्रम यत प्रेरत नाम धेय दधाना यदेश श्रेष्ठम यदि प्रमाससी प्रेरणा तदेश निहितम गुहावि कि ये जो वेद ज्ञान है मैं पूरे मंत्र का अर्थ अभी ना करते हुए जो अंत में कहा कि प्रेरणा तदेश निहितम गुहावि तो जो सृष्टि के आदि में जो ऋषि थे जो एकदम शुद्ध कलमश जिनके मन में जरा भी कोई भी किसी भी प्रकार का कोई पाप नहीं और दम सृष्टि के आदि में जो ज्ञानवान जो ऋषि हुए उनके ज्ञान गुहा में परमेश्वर ने वो ज्ञान वेदों का ज्ञान प्रदान किया और वो भी ऐसे नहीं कि वो बैठे हुए थे और आकर के ऊपर से ज्ञान दे दिया गया ऐसा नहीं जी एक बहुत प्रसिद्ध मंत्र है यज्ञन यज्ञम अयजंत देवा जी तो जब तक आत्मा का और परमात्मा का उन ऋषियों के आत्मा का परमात्मा के

00:07:31:06 साथ संगतीकरण हुआ संगतिरण संगतिरण हुआ आत्मा का किसके साथ परमात्मा के साथ जब वो संगतीकरण हुआ तो फिर परमेश्वर ने उनके ज्ञान गुहा में वेदों का ज्ञान प्रदान किया अच्छा जैसा कि मंत्र में है ना यस्मिन रिच साम यज निष्ठिता तो ये आत्मा में ये है विद्यमान है अंतकरण में आके अंतःकरण में ये चीजें विद्यमान है और उसको जब हम परमात्मा के साथ जब हम संगतीकरण करते हैं समाधि अवस्था में बैठते हैं धारणा ध्यान समाधि के द्वारा जितना हमारा तादात में ईश्वर के साथ होता चला जाता है तो फिर वो ज्ञान उनके ज्ञान गुहा में वो प्रस्फुटित हुए और उसके बाद फिर वो क्रमशः एक दूसरे से फिर वो जी जी वो पारंपरिक रूप से पारंपरिक रूप से प्राप्त चलते गए तो आचार्य जी इसमें एक ये बात आती है कि जैसे हमारे अंतःकरण में कोई ज्ञान हमें प्राप्त हुआ है जी तो अब क्या है कि सारी इंफॉर्मेशन सारी विचार जो उत्पन्न हो रहे हैं वो अंदर से ही हो रहे हैं। अंदर से हो रहे हैं। तो ऐसे में हमने यह कैसे मतलब जो ईश्वर ने आगे जो ज्ञान दिया तो हमने लक्षण क्या देखा ईश्वर का जिससे कि हमने मतलब ऋषियों ने यह जान लिया कि ईश्वर द्वारा प्रदत्त ज्ञान है। वो इस प्रकार से मतलब उनके अंदर स्वयं तो वो था नहीं पर किसी के माध्यम से जब वो चीज आ हम कि कोई

00:08:46:07 एक आप उसको आजकल के उसमें हम एकदम सामान्य उसमें आपको हम समझाते हैं जैसे हम कि मान लीजिए आप किसी चीज से बहुत आप परेशान हैं। जी और आप को कोई समाधान नहीं समझ में आ रहा है। जी आप थोड़ी देर के लिए आप आंख बंद करके बैठते हैं और आपको अंतरात्मा में आवाज आती है कि यह चीज सही नहीं यह चीज सही जी तो वो जो अंतरात्मा में जो आवाज आती है वो ईश्वर की होती है वो ईश्वर की ही होती है वही ईश्वर की होती है और वही जब हम कई बार अपनी अंतरात्मा की आवाज को हम ठुकरा देते हैं और कहते हैं नहीं मुझे अपने मन की बात सुननी चाहिए थी तो अभी तो बहुत सारी स्थितियां चलती होती है तो कई तरह की बातें होती हैं पर उस समय बहुत सारे संदेह नहीं नहीं थे। किसी और प्रकार की कोई बातें नहीं थी। जी तो फिर उस समय जब ऋषियों को हुआ कि भाई परमेश्वर को भी लगा कि इन चीजों का उपयोग कैसे करेंगे और ऋषियों को भी था कि भाई ये संपूर्ण सृष्टि इसका उपयोग कैसे होगा वो ध्यान अवस्थित में जब वो बैठे तो अब जब उनको एक तरीके से एक तरीके से इसको ये कह सकते हैं क्योंकि देखिए जैसे हम अगर ये कहेंगे कि क्योंकि ऋषियों के पास ज्ञान नहीं था तो क्योंकि ज्ञान कहीं से आ रहा है तो वो ईश्वर ने ही दिया है तो इसमें तो ये दिक्कत आ जाएगी कि जैसे हमारे अंदर से जो बुराइयां आती हैं

00:10:01:08 बाहर बुराइयों का ज्ञान तो वो तो ईश्वर देता नहीं है। बुराइयों का तो अब क्या है कि हमको ये पता कैसे चला कि ये ज्ञान बुराई का नहीं है क्योंकि वो ईश्वर से आ रहा है। तो इसका मतलब ये है कि ईश्वर ने हमको अपनी अनुभूति करा दी। हां अनुभूति कराई। है ना? इसको ऐसे ही मानेंगे ना कि ऋषियों ने पहचाना कैसे? ये ज्ञान जो आ रहा है ये हमारी इंद्रियों का वो नहीं है। जैसे इंद्रियों इंद्रिय जनित जो विषयों के प्रति जो बुराइयां उत्पन्न होती है ये वो नहीं है। ये वास्तव ये मुक्ति का ज्ञान है। तो उसको उन्होंने ऐसे ही पहचाना कि ईश्वर ने अनुभूति कराई अपनी उपस्थिति की ये ज्ञान ईश्वर दे रहा है। ईश्वर दे रहा है। इसके अलावा और कोई भौतिक लक्षण तो ऐसा नहीं हो सकता जिससे हम पहचान सके कि वो ईश्वर का ही ज्ञान है। नहीं और ऐसा ज्ञान नहीं है। वो अंतरात्मा से यानी कि ईश्वर जिस पर कृपा करेंगे तो वो अपनी प्रतीति कराएंगे कि भाई ये मैं दे रहा हूं आपको तो उसकी प्रतीति जिसमें होगी वो ईश्वर मान लिया जाएगा उपनिषद में कहा है ना यम आत्मा प्रवचने लते

00:10:59:15 यमेते ते लभ्य कि आप बहुत ईश्वर के बारे में सुन रहे हैं प्रवचन कर रहे हैं बहुत कुछ पढ़ रहे हैं तो ईश्वर अपनी अनुभूति नहीं कराएगा यम एवणुते जो जब परमपिता परमेश्वर उसका वर्णन कर लेता है कि इसको ऊपर मुझे अपनी कृपा दृष्टि डालनी है। तेवलभ्य उसी को वो चीज प्राप्त हो सकती है। ये उपनिषद में कहा गया है। बहुत सुंदर और ये एक बहुत अच्छी चीज जानने को मिली कि जैसे अगर हम लोग कहें कि हम ईश्वर को पहचानेंगे कैसे तो ईश्वर की जिस पर कृपा होगी ईश्वर जिस पर कृपा करेंगे और वो चाहेंगे कि ये मुझे पहचाने अनुभूति कर ले मेरी तो वो जो है व्यक्ति उनकी अनुभूति कर सकता है। और बाकी अन्य लोग जो होंगे सामान्य जिस पर ईश्वर की कृपा नहीं होगी वो उनके ऊपर डिसाइड है कि वो उस विद विद विद्वान पुरुष वो नहीं या तो विद्वान पुरुष का अनुकरण करें। अनुकरण करें हां कि अगर उसने अनुभूति कर ली ईश्वर की कि ये वेद दे रहे हैं तो अब तुम मेरे वेदों को ले लो। उनका अनुकरण करें। उनके अनुसार अपनी जीवन शैली अपनाएं। तो यह एक आप लोगों को समझ में आ रहा होगा कि ईश्वर अपनी कृपा पूर्वक जिसको अपनी प्रतीति कराते हैं उसी को ईश्वर की अनुभूति होती है और वही ईश्वर को पहचान सकता है। एक सूक्ति है ऋषि मना यह ऋषिक कृत वर्षा जो ऋषियों के अनुकूल चलता है वही

00:12:14:19 ऋषियों के समान बन सकता है और उसके ऊपर ही परमेश्वर की कृपा होती है। बिल्कुल बिल्कुल तो परमेश्वर की कृपा जिस पर होगी परमेश्वर उसको अपनी प्रतीति कराएंगे प्रतीति कराने पर जो जिसके ऊपर कृपा हुई है वो उनको जान सकेगा पहचान सकेगा। अब जो सामान्य लोग हैं वह यह निर्णय करेंगे कि उनको उस तत्वज्ञानी का तत्वदर्शी का अनुकरण करना है कि नहीं। नहीं करना है। बहुत बढ़िया। अच्छा इसमें एक चीज और आती है जैसे हम कहते हैं कि ईश्वर सर्वव्यापक है। हां। तो ईश्वर ने सर्वव्यापक होते हुए भी जो सृष्टि इत्यादि की रचना की है हम और ऋषियों को वेद का ज्ञान भी प्रदान किया है। इसका मतलब सर्वव्यापक होते हुए भी ईश्वर ये तय करता है कि मैं कहां पर कार्य करूं कितना कार्य करूं हम और कितना कहां पर ना करूं और कितनी मात्रा में ना करूं। हां ये तो बिल्कुल ये परमेश्वर स्वयं अपने बनाए हुए नियमों का भी वो उल्लंघन नहीं कर सकता। यानी कि जो निश्चित देश काल परिस्थिति की जो क्रिया है वह ईश्वर स्वयं ही तय करता है। स्वयं उसका तय करता है। तो जैसे करता है और उनके ये जीवात्मा के कर्म फल के अनुसार जी जी तो जैसे हमने कहा कि जैसे सृष्टि बनाई जाती है ईश्वर के द्वारा। हम तो इसमें जैसे ईश्वर सर्वव्यापक

00:13:29:27 है तो वो क्षेपक तो है नहीं। जो व्यापक होता है जो व्यापक वस्तु होती है वो क्षेपक नहीं होती है। तो जब सृष्टि बनेगी हां तो जड़ पदार्थों को मूव कराना है कुछ करना है पुश एंड पुल करना है है ना तो उस समय तो उसको क्षेपक बनना पड़ेगा उन पदार्थों के लिए क्षेपक मतलब प्रेरक हां प्रे जैसे किसी को गति प्रदान करने के लिए जैसे कि मान लीजिए समझ गई मैं उसके लिए ऐसा है क्योंकि परमेश्वर को क्षेपक नहीं बनना पड़ता है परमेश्वर सृष्टि की रचना करके सर्वव्यापक है वो कण-कण में व्याप्त है तो वह उन पदार्थों में भी वह स्वयं व्याप्त हो जाता है। ठीक है? तमेव सृष्ट्वा तमेव अनुप्राविषत सृष्टि की रचना की और उन पदार्थों में भी वो व्याप्त हो गया और जब वो व्याप्त हो गया तो फिर वो उस हिसाब से वो संपूर्ण चीजें गतिशील होती रहती है। नहीं नहीं वही मैं कह रहा हूं। जैसे ईश्वर तो सब जगह है। है ना? अब उसमें अलग-अलग अणु परमाणु प्रकृति के हैं। ठीक है? अब उसमें ईश्वर सर्वव्यापक तो है मगर क्षपक के रूप में नहीं है। हां। मगर क्या है कि अगर जैसे मान लीजिए यह एक अणु है जी प्रकृति का है ना इसको मूव कराना है मान लीजिए पृथ्वी निर्माण करना है ईश्वर को तो मिट्टी के कण पड़े हुए हैं अलग-अलग अब ईश्वर को पृथ्वी

00:14:45:10 रूपी एक ग्रह बनाना है तो ये जो अणु परमाणु है उनको वो पुश करेगा या पुल करेगा या उनके अंदर रहते हुए उनको अंदर रहते हुए उनको गति करेगा गति कराएगा तो जब वो उनको अंदर रहते हुए गति कराएगा तो यहां अंदर वाला तो जो है वो गतिशील हुआ हां फिर मगर उसके बाहर भी ईश्वर है हां तो बाहर उसको अपने आप को निष्क्रिय रखना पड़ेगा वरना ईश्वर मूव कहां करेगा अपने आप में ही मूव करना हो गया ना वो चीज नहीं तो बाहर को निष्क्रिय नहीं करेगा या फिर हम ये सोचेंगे कि वो उसके अंदर है तो वो बाहर नहीं होगा नहीं नहीं है है बाहर भी और अंदर भी है पर जिसको जितना करना है वो उस हिसाब से उतनाउतना वो करता रहता है। नहीं आप मैं शायद प्रश्न को ठीक से प्लेस नहीं कर पा रहा हूं। मैं थोड़ा खोलता हूं इसको। जैसे कि मान लीजिए कि पृथ्वी का एक ये ढेला मान लीजिए। ठीक है? इसके अंदर भी ईश्वर है और बाहर भी ईश्वर है। अब अगर हमने ये किया कि अ ये तीनों ईश्वर के जो बाहर वाला और अंदर वाला तीनों तरफ का जो ईश्वर है वो एक ही समान है। हां। ठीक है? एक समान है। मगर अगर हमने ये माना कि बिल्कुल बराबर मात्रा में वो कहीं निष्क्रिय सक्रिय नहीं है। तो ये अंदर वाला हिलेगा कैसे? क्योंकि वह तो बाहर भी उतनी मात्रा में है ना ईश्वर तो वह हिलेगा कैसे पदार्थ वह परमात्मा

00:16:00:24 है किंतु वह ठोस रूप में नहीं है ना वह आकार रूप में नहीं है वो सूक्ष्म रूप में है तो इसलिए उसके साथ ये वाली बात नहीं यानी यानी हिलने के लिए वो टकराएगा नहीं टकराएगा नहीं मगर जो जिस पदार्थ के अंदर जिसको उसे हिलाना है वो अपने आप वो होगा जिसको उसे हिलाना है तो उसके लिए तो वो ठोस बनेगा ना तभी वो हिलेगा नहीं नहीं ठोस बनने की आवश्यकता ही नहीं है उसको ठोस बनने का मतलब हो गया कि उसको कोई आकार लेना पड़ जाएगा जाएगा। नहीं नहीं आप मैं आकार नहीं जैसे विद्युत होती है ना विद्युत बिना आकार लिए इंजन को प्रेशर मारती है। इंजन चलता है। तो अब जैसे मिट्टी के जो अणु है या ढेला है उसके अंदर ईश्वर है। हम अगर ईश्वर फोर्स नहीं बनेगा हां तो मिट्टी के ढेले को प्रेशर कैसे प्राप्त होगा कि तू गति कर ये कैसे प्राप्त होगा? यदि उसको प्रेशर बनेगा गति करो तब तो क्षेपक हो जाएगा। उसके अंदर वह स्वयं ही उसके अंदर विद्यमान होकर वह गति कर ले रहा है। नहीं तो गति गति एट दी एंड मिट्टी ने की ना मिट्टी के कण ने गति की। मिट्टी के कण ने की मिट्टी के कण ने नहीं की। वो परमेश्वर उसके अंदर है उसने ही गति की जो कि तो फल स्वरूप मिट्टी के कण में गति हो गई। तो जो परमेश्वर के क्योंकि क्षेपक तो है नहीं। हां। तो फिर परमेश्वर के गति करने की वजह से हां। परमेश्वर की गति करने की वजह से।

00:17:16:14 वो मिट्टी का ढेला कैसे हिल गया? यह बात है क्योंकि वह चिपक तो है नहीं वह टकरा तो रहा नहीं मिट्टी के ढेले से हां टकराएगा नहीं तो परमेश्वर गति कर रहा है तो मिट्टी का ढेला कैसे कर गया वो उसी के अंदर ही तो विद्यमान है तो जब वो जैसे आप आत्मा है हमारे अंदर नहीं ऐसा है ना कि जैसे परमेश्वर जब गति कर रहा है उसके अंदर विद्यमान है विद्यमान है ठीक है अब वो क्षेपक नहीं है तो क्षेपक नहीं है तो क्षेपक नहीं है तो जब वो गति करेगा उसके अंदर होते हुए तो वो मतलब पार निकल जाएगा क्योंकि क्षपक है क्षेपक नहीं है वो क्षपक नहीं है तो पार क्यों निकले मिलेगा। जैसे ये उंगली है आपकी। ठीक है? ये उंगली गति कैसे कर रही है? क्योंकि इसके अंदर शक्ति है। किसकी शक्ति है? हमारी आत्मा के द्वारा दी गई। आत्मा के द्वारा दी गई है। तो आत्मा क्या बाहर निकल गया? नहीं बाहर नहीं निकला। नहीं निकला। बिल्कुल ठीक इसी तरह से जैसे आत्मा है हम और आ ये जब इच्छा हुई तो उंगली ने गति कर ली। फिर रुक गई तो आत्मा बाहर नहीं निकला ना। आत्मा जो गति करा रही है हां। उसमें एक बात है कि आत्मा तो एक देश है। हां। और उसकी शक्ति भी एक देसी है। इस उंगली के बाहर आत्मा की शक्ति नहीं है। नहीं है। क्योंकि मैं अगर मन में सोचूं कि यहां कुछ हो जाए तो नहीं होगा। मेरी शक्ति यहीं तक है। इसके अंदर ही अंदर है। एक देसी है। तो ये मूव कर सकती है। तो वही चीज आप परमात्मा के साथ में अगर परमात्मा तो बाहर भी है। बाहर भी है

00:18:31:15 अंदर भी है। किंतु जब उसके अंदर है तो जब उसकी इच्छा हुई तो उसने उतना मूव किया। नहीं हुआ तो नहीं हुआ। उसको बाहर निकलने की आवश्यकता क्यों है? जैसे आप जैसे कि मान लीजिए फोन है। ठीक हम्म। अब मान लीजिए कि इसके अंदर परमेश्वर है। बाहर भी है, बाहर भी है। इधर भी है। तो परमेश्वर अगर मान लीजिए मूव करने की बात है कि मूव कहां कर रहा है? क्योंकि ऐसा तो है नहीं कि उसके बाहर की जगह खाली डली हो। अब आप कह रहे हैं कि छिपक नहीं है। इसलिए जब वो मूव करेगा तो जितने जितना हिस्सा मूव करना चाहेगा उतना हिस्सा मूव कर लेगा। अपने अंदर ही अंदर क्योंकि वोक नहीं है। यानी कि परमेश्वर क्षेपक होते हुए भी क्षेपक होने के कारण अपने जितने हिस्से को चाहे वो गति कराता है। उतना गति कराता है। अपने जितने हिस्से को चाहे गति कराता है। ठीक है? ये चीज हो गई क्लियर। अब बात ये है कि गति कराते समय जिस परमाणु के अंदर वो व्याप्त है और जिसको उसे गति करानी है वो भी गति करता है उसीलिए वो गति करता है। एक तो उसको गति की जरूरत नहीं है। अब जब वो गति करता है तो इसका मतलब यह है कि वो ये चाहता है कि मेरे गति करने के कारण मेरे साथ-साथ ये जो परमाणु जो भौतिक पदार्थ है ये भी गति कर जाए। ठीक है? अब यदि वह क्षेपक नहीं है ईश्वर हम यदि वह क्षेपक नहीं है इसके अंदर तो वह जब गति करेगा तो इस

00:19:46:16 भौतिक पदार्थ को पार निकल जाएगा क्योंकि वो क्षेपक नहीं है और यदि क्षेपक होगा तभी तो यह पदार्थ उसके साथ-साथ गति करेगा ये चीजें क्षेपक का मतलब आप क्या मान रहे हैं मतलब ठोस नहीं है अगर वह प्रेशर नहीं देगा कि भाई मतलब जैसे हम किसी चीज को करते हैं तो हम क्षेपक हुए हम किसी चीज को जैसे यह मोबाइल यदि हम चला रहे हैं हम तो हम क्षेपक हुए। अगर हम मोबाइल को चला रहे हैं तो हां हम अंदर से प्रेशर मार रहे हैं ना। हम अंदर से प्रेशर रहे हैं। बाहर नहीं निकल रहे। हम ठोस हो रहे हैं अंदर। तो परमेश्वर को अलग से किसी भी पदार्थ और दूसरी बात हमारी चीज तो ये है कि हम एक देसी हैं। हम उंगली हिलाई तब पा रहे हैं जब उंगली के बाहर हम नहीं हैं। हां हम हम तो तब हिला पा रहे हैं। तो यहां तो बात ही नहीं है वो वाली। तब हम मिला पा रहे हैं। मगर यहां पे तो जो ईश्वर है बाहर भी है अंदर भी है। तो अगर बाहर अंदर वाला ईश्वर है जो कि क्षेपक नहीं है तो पदार्थ तो उसमें गति कर सकते हैं। कोई दिक्कत नहीं है। मगर जब ईश्वर अंदर गति करेगा और पदार्थों को कराने के लिए गति करेगा तो उसको उस पदार्थ के लिए क्षेपक बनना पड़ेगा ना कि आप जो है मेरे साथ-साथ साथ-साथ गति करो। हम तभी तो नहीं तो अगर जैसे मान लीजिए वो धक्का दे रहा है आगे बढ़ने के लिए। तो क्योंकि वो ठोस नहीं है तो पार निकल जाएगा धक्का देते टाइम। जैसे मान लीजिए ऐसा क्यों माने?

00:21:01:20 कि वो अलग से हो के उसको क्षेपक बन रहा है या उसको नहीं अलग से हो के नहीं जैसे मान लीजिए कि मेरा हाथ जो है मान लीजिए छेपक नहीं है। अब मैं इस मोबाइल को ऐसे अगर मैं इसमें सोचूं कि मैं इसको ऊपर उठाऊं अगर ये हाथ छेपक नहीं होगा तो ये हाथ पार निकल जाएगा इसके ऐसे क्योंकि छेपक नहीं है। जब तक ये इसके लिए एक अह पर्टिकुलर एक ठोस एक क्षेपक नहीं बनेगा तब तक ये उठ नहीं सकता मोबाइल। ये बात है एक जड़ पदार्थ नहीं परमेश्वर क्षेपक है नहीं है ये बात नहीं है मेन बात यहां पर बस इतनी है जी कि परमेश्वर हर पदार्थ के अंदर विद्यमान हो के वो स्वयं ही वो गति कर रहा है चाहे वो क्षेपक रूप में होकर के करे चाहे वो स्वयं तदे जति तय जति कि वो गति करवाता है वो स्वयं तद तो जड़ पदार्थ कैसे हिल जाएंगे जब वो क्षेपक नहीं होगा तो जड़ पदार्थ उसके कारण कैसे हिल रहे हैं क्यों नहीं हिल सकते हैं वही एक समझने वाली बात है। वही वो बस उसी रूप में है क्योंकि वह उसके अंदर स्वयं विद्यमान जैसे मैं स्वयं गति मैं इस मोबाइल को तभी हिला सकता हूं जब इसमें मैं ठोस बनके इसको धक्का दूं तो फिर वहां पर ईश्वर कैसे उसको हिला रहा है? कैसे गति कर रहा है? उस समय आप ईश्वर को अलग मान ले रहे हैं। नहीं उसके अंदर भी है तब जब उसके अंदर

00:22:16:26 है तो उसको फिर क्षेपक बनने की जरूरत ही नहीं है। वो स्वयं भी गति कर रहा है और वो पदार्थ उसके आप समझे नहीं। जैसे मान लीजिए कि पदार्थ की वॉल है। उसको बंद करवाइए। जी जी जी बंद कर दो। बंद कर दो। तो ये चीज तो तब आएगी ना जब कोई ठोस वस्तु वहां पर होगी। तो जब वहां पर कुछ भी नहीं उसके बाहर तो ठीक है वो क्षेपक नहीं है तो वो पदार्थ गति कर सकता है। हां। मगर जो शक्ति है जो अंदर से जो उसके लग रही है कि भाई तू इधर चल तो वो शक्ति अगर छेपक नहीं बनेगी। ऐसी नहीं बनेगी कि वो उस पदार्थ को पार ना करे। अंदर ही रहे हम अगर वो क्षेपक नहीं बनेगी। उसके वो इक्षण शक्ति से होता है वो मतलब टकराने वाला बनता है एक तरीके से हां वो इक्षण शक्ति से होता है इक्षण शक्ति के द्वारा वो पदार्थों के लिए टकराने वाला बनता है वो इक्षण शक्ति से बनता है वो मतलब कि ईश्वर जो है अपनी इच्छा शक्ति के अनुसार जिस देश काल परिस्थिति में सुनिश्चित होकर के चाहे वो उसकी इच्छा शक्ति से वो चाहे तो दुनिया भर में व्याप्त है भले ही फिर भी वो चाहे तो चार ऋषियों को के अंतःकरण का विषय बन सकता है हां और वो चाहे तो पदार्थों के टकराने का विषय भी बन सकता है। उसकी इक्षण शक्ति से है वो इक्षण शक्ति के द्वारा वो पदार्थों के टकराने का विषय बनता है। बनता है। ठीक है? क्योंकि ब्राह्मण ग्रंथों प्रजा फिर

00:23:32:04 उसकी इक्षण शक्ति से होता है। अच्छा तो एक निष्कर्ष हमने निकाला कि ईश्वर सर्वव्यापक होते हुए भी अपनी इक्षण शक्ति से जी जिस देश काल परिस्थिति में चाहे उस देश काल परिस्थिति में चाहे तो वो किसी के अंतःकरण का विषय बन सकता है। वो अपनी अनुभूति करा सकता है। और चाहे तो वो जड़ पदार्थों से टकराने का विषय भी बन सकता है। जिससे कि वो गति होती है जिससे कि सृष्टि का निर्माण सृष्टि का निर्माण होता है। ये सब उसकी इच्छा से ये हमने क्लियर कर लिया। तो इसका अर्थ ये आया कि ईश्वर का ईश्वर अपनी इच्छा अनुसार जड़ पदार्थों से टकरा सकता है। हां ठीक है। तो क्या ईश्वर प्रकाश के मार्ग में भी प्रकाश से भी टकरा सकता है? प्रकाश से क्यों टकराएगा? उसको टकराने की आवश्यकता ही नहीं। जैसे आवश्यकता तो नहीं है। अभी तो एक दार्शनिक विचार चल रहा है। हां। आवश्यकता वो तो एक अलग टॉपिक होगी। मैं पूछ जैसे वो सभी जड़ पदार्थों से टकरा सकता है। तभी तो सृष्टि की रचना होगी। सृष्टि की रचना होगी। तो क्या वो प्रकाश से टकरा सकता है? बिल्कुल हो सकता है। तो एक तरीके से ये देखा जाए अगर वो प्रकाश से टकराएगा तब तो उसका रूप हो मतलब जितने हिस्से में है वो प्रकाश से टकराएगा तो आंखों का विषय भी हो जाएगा। जी। आंखों का मतलब

00:24:47:08 वो टकराते हुए भी वो या किंचित मात्र भी उसका आकार बन ही नहीं सकता है। नहीं जैसे मान लीजिए मेरे सामने जुपिटर और पृथ्वी दोनों दो ग्रह हैं। ठीक है? अब मैंने कहा कि मैं जो है पृथ्वी को तो हिलाऊं। हम ठीक है? हम मगर जुपिटर को अभी नहीं हिलाना। मान लीजिए एक एग्जांपल ले रहे हैं बस। तो अब क्या हुआ? ईश्वर क्योंकि सर्वव्यापी है। अगर वो सोचेगा कि मैं फोर्स लगाऊं तो सब जगह फोर्स लगेगी। तो उसने ये सोचा कि मैं केवल एक क्षण शक्ति से मैं केवल पृथ्वी को ही हिलाऊं। तो उसकी जो शक्ति है उस वो केवल पृथ्वी से ही टकराया। जुपिटर को छोड़ दिया। हम ठीक है? तो अब जैसे कि ईश्वर ने यहां पे तय किया कि मैं कहां किस पदार्थ के टकराने का विषय बन रहा हूं। किसका नहीं बन रहा हूं। तो उसी प्रकार ईश्वर जब यह तय करेगा कि मैं इस इतने निश्चित अनुपात में प्रकाश के मार्ग में टकरा जाऊं हम तो एक आंखों का विषय वाला आकार बन सकता है। फिर नहीं आकार उसका किसी भी रूप में नहीं बन सकता है। चलिए ठीक है। तो मतलब यह वाली जो चीज है ये अ एक अनसुलझा प्रश्न जैसा नहीं है कि मतलब हम केवल कह रहे हैं वो चीज जो है लॉजिकली वो नहीं हो रही प्रूव

00:26:02:16 ये चीज वो इस कारण से जैसे हम ये मान रहे हैं जैसे जैसे हम ये मान रहे हैं कि ईश्वर यदि चाहे तो निश्चित देश काल परिस्थिति में वो प्राकृतिक अणु परमाणुओं से टकराता है। टकराता तभी तभी सृष्टि की रचना हो रही है। टकराने तो मतलब यदि हम टकराना शब्द प्रयोग करते हैं। जी तो ऐसा थोड़ा सा प्रतीत होता है कि जैसे वह थोड़ी भी देर के लिए आकार ग्रहण कर लेता है हम पर वह आकार बिल्कुल भी नहीं ग्रहण करता है तो नहीं नहीं जैसे जैसे मान लीजिए इसका एक उदाहरण है जैसे कि मान लीजिए जैसे इंटरनेट है हां इंटरनेट पे उपलब्ध जो सारी जानकारियां हैं हम वो अभी हमारे आसपास सब जगह है जहांजहां उसकी टॉवर की रेंज है सब जगह है बस ये है कि अ जिस समय जिस यंत्र के द्वारा हम उसका उपयोग हो सकता उस यंत्र में जब हम उसकी जो विधि के अनुसार जब चेक करते हैं तो वह इंटरनेट प्रकट हो जाता है। हम किसी निश्चित देश काल परिस्थिति में। अब जैसे ये फोन है। फोन के अंदर इंटरनेट का प्राकट्य हो रहा है। मगर ऐसा नहीं कि फोन के बाहर वो नॉलेज नहीं है। वो तो रेज के रूप में सब जगह है। अगर ये फोन यहां आकर के चलाएंगे तो यहां भी इंटरनेट का प्राकट्य होगा। यहां भी होगा। अच्छा ये भी नहीं है कि अगर इसके अंदर इंटरनेट ने प्राकट्य ले लिया तो उसका जो वो वाला रूप है सर्वव्यापी रूप

00:27:17:20 उस पे कोई फर्क पड़ा। फर्क पड़ रहा। कोई फर्क नहीं पड़ा। वो यहां पे प्राकट्य भी हो गया। फिर भी वो उतनी ही मात्रा में सब जगह लबालब है। खचाखच है ना? जबकि वो प्राकट्य भी हो गया। तो मैं वही कह रहा हूं। इसी प्रकार से जब जब इंटरनेट जैसी चीज जो मनुष्यों के द्वारा बनाई गई इंटरनेट है जब वो चीज ऐसा हो रहा है तो यहां पे तो ईश्वर है। तो ईश्वर जब हम ये कह रहे हैं कि वो टकराया तो ऐसा नहीं है कि उसका सर्वव्यापक जो वो जो रूप थापक वो उसने खो दिया। उसने नहीं खोया। वो रहते हुए भी उसने एक और डायमेंशन कह लीजिए एक और डायमेंशन में वो टकराने वाला फिर भी जैसा कई बार आता है उपनिषदों में भी आता है क्योंकि उसका हिरण्य निरूप है एकदम मतलब से जो एक बार को हम इस चीज को सोच सकते हैं कि जब वो टकराता है यदि मान लीजिए या अंतः प्रकाश से ही होता है यदि तो भी जो उसका एक वो हिरण्य वर्ण जो हिरण्य रूप प्रकाश का अतिरेक जी जो ऋषियों के ह्रदय में या जो [गला साफ़ करने की आवाज़] ध्यान करते हैं समाधि अवस्था में होते हैं तो रुक्म वर्ण उपनिषदों में जैसा आता है उसका कि वो मतलब कि रुक रुक्माभ रुक्म वर्ण की तरह हिरण्य की तरह एकदम तेजस स्वरूप उसके उसमें प्रकाशित हो जाता है। जी जी तो हो सकता है कि वो उसे ईश्वर का ही वह जो प्रकाश है वो इस रूप में है।

00:28:32:26 जैसे कि देखिए ना जैसे मैंने आर्य समाज का एक भगवत गीता जो होती है उसमें कहीं-कहीं पे किसी किसी के अनुवाद में पढ़ा है जो यदा यदा धर्मस्य वाला जो श्लोक आता है उसके अर्थ में जो आचार्य हैं वो लिखते हैं आर्य समाज के कि देखिए वो ईश्वर अवतार लेता है कि नहीं लेता वो तो एक अलग विषय है। मगर कोई ना कोई शक्ति अपना असर दिखाती है। प्रकट होती है। प्रकट होती है। प्रकट होती है। यानी ये जब ईश्वर तो पहले से ही है तो क्या हो प्रकट कैसे हो रही है तो इसका मतलब है कि वो हमारे व्यवहार का विषय बन रही है। हमारे व्यवहार का विषय बन रही थी पहले भी किसी एक को निमित्त बना करके उस कार्य को करती वो थी पहले भी वो थी पहले भी बस वो अभी व्यवहारिक हो जा रही है। जैसे ईश्वर का ज्ञान सब जगह पहले भी था मगर अभी वो अंतःकरण का व्यवहार का विषय बन गया। जैसे ईश्वर शक्ति के रूप में सर्वत्र व्याप्त था। मगर जहां उसने चाहा सृष्टि रचना करने के लिए वहां वो टकराने का विषय बन गया जड़ पदार्थों के। तो यह चीज है तो वही मैं कह रहा था कि जब हम ईश्वर को ऐसा मान रहे हैं कि ईश्वर अपने स्वरूप को ना खोते हुए सृष्टि की रचना करने के लिए देश काल परिस्थिति में या फिर ज्ञान देने के लिए किसी निश्चित देश काल परिस्थिति में अमुक- अमुक जगह का या अमुक अमुक लोगों के व्यवहार का विषय बनता है। पदार्थों के बाधा का क्षेपक का विषय बनता है। तो क्या इसी प्रकार

00:29:47:27 वो प्रकाश के मार्ग में बाधा मतलब प्रकाश में टकराने का विषय नहीं बन सकता। तो एक दार्शनिक पक्ष पर उस हिसाब से देखा जाए तो वह हो सकता है और जब ऐसा होगा तो ईश्वर का विग्रह दिखाई देगा उतने उतने हिस्से में उतने हिस्से में जैसे मोबाइल में जैसे मोबाइल में इंटरनेट का प्राक विग्रह तो नहीं दिखाई देगा बस उसके वो प्रकाश रूप जो अंतःकरण में होगा नहीं जैसे प्रकाश जैसे ये जो प्रकाश यहां पे ये जब देखिए हम किसी को देखते कब हैं जब रोशनी उससे टकरा के वापस आती है तो जैसे ईश्वर ने ये चाहा था कि मैं जुपिटर से ना टकराऊ और मैं जो है पृथ्वी से टकराऊं हम्म उसी तरीके से जब ईश्वर यह चाहेगा कि मैं ऐसे स्ट्रक्चर में एक मनुष्य रूपी स्ट्रक्चर में प्रकाश से टकराऊं और उस मनुष्य रूपी स्ट्रक्चर के इधर इधर-उधर जरा भी मैं ना टकराऊं प्रकाश से। तो जब ऐसा होगा तो ईश्वर का एक स्वरूप सा दिखाई देने लगेगा। जिसको कहा जा सकता है अवतार। नहीं ऐसा नहीं संभव है। यदि वो टकराएगा भी तो वो इस रूप में नहीं होगा। वो बस केवल एक प्रकाश पुंज की तरह वो अंतःकरण में ही आएगा। वो बाहर उसका प्रकाश नहीं हो सकता। बाहर के रूप में नहीं। जो सूर्य की रोशनी है वो तो बाहर है ना? हां सूर्य की रोशनी के रूप में वो बाहर है। मैं उसी रोशनी से टकराने की बात कर रहा हूं। तो फिर वो एक आकृति के समान कैसे बन जाएगा? किसी की आकृति कैसे बन जाएगी वो? वो सूर्य रूप में ही वो आकृति रह जाएगी। नहीं नहीं

00:31:03:03 जैसे ईश्वर ने ये तय किया ना मैं कि इस हिस्से से टकराऊं इससे ना टकराऊं। हम तो यानी ईश्वर ये तय कर सकता है मैं कहां-कहां पर टकराने का विषय बनूं। तो अगर ईश्वर ने ये तय किया कि मैं मनुष्य रूपी आकार में टकराने का विषय बनूं और बाकी मैं टकराने का विषय ना बनूं। प्रकाश से तो वह आकृति बन जाएगी तो फिर वह उसकी शक्ति सीमित हो जाएगी। इसलिए वह ऐसा विषय वह बन ही नहीं सकता है। इतना छोटा शक्ति सीमित नहीं यहां पे केवल ये हो रहा है कि वो कहां पर टकराने का विषय बन रहा है? कहां पे नहीं बन रहा है? इससे शक्ति सीमित कैसे हो रही है? वो एक आकृति वो कैसे ले सकता है? वो आकृति पाएगा। जैसे उसने निश्चित आकृति में पृथ्वी पर प्रेशर डाला कि आप मूव करो। वो तो उसने वो प्रेशर किया। ठीक है? तो वो यानी वो यह सेलेक्ट करता है ना कि मैं कहां पर टकराऊं, कहां ना टकराऊं। तो जब वो इस रूप में टकराएगा कि भाई मेरे दो पैर की डिजाइन में जैसे मान लीजिए यहां से रोशन इस तरह का नहीं कर सकता है वो क्योंकि उसमें प्रकाश का विषय बनने पर भी वो एक आकृति रूप में उसकी कभी भी हो ही नहीं सकती है क्योंकि स्पष्ट कहा है वही मैं कह रहा हूं कि लॉजिकली जो है वो हो सकता है मगर क्योंकि वेद का मानते हैं कि वेद ने नहीं कहा इसलिए हम नहीं मानेंगे। हां

00:32:18:09 वेद ने नहीं कहा इसलिए भी और वो उसका वो सीमित पना आ जाएगा। नहीं तो क्या पृथ्वी से टकराते समय वो सीमित हो रहा है? पृथ्वी से टकरा रहा है। वह स्वयं क्या टकरा रहा है? वो तो पृथ्वी पृथ्वी में वो गति कर रहा है। नहीं अभी हमने माना ना कि वो निश्चित देश काल परिस्थिति में टकराने का विषय बनता है। तभी तो जड़ पदार्थ मूव करेंगे। टकराना शब्द विशेषप जैसे क्षेपक हो गया। आप यदि इसको टकराना शब्द प्रयोग करेंगे ना। तो वो एक सीमित दायरा हो जाएगा उसका। तो क्योंकि टकराएगी कोई बाहर की भौतिक वस्तु टकराएगी। जी तो पृथ्वी को उस ग्रह से उस ग्रह के उसका वो विषय बनेगा। वह स्वयं नहीं बनेगा। वो उन दोनों का उसका विषय बनेगा। नहीं दो पदार्थों के टकराने का वो विषय बनाएगा। वो स्वयं उसका विषय नहीं बनेगा। मतलब कि वो एक जड़ पदार्थ से दूसरे जड़ पदार्थ को मूव कराएगा। हां उसको वो कराएगा। वो स्वयं नहीं टकराएगा। तो जो जिस जिस जड़ पदार्थ से वो इसको हिला रहा है उसके अंदर उसके अंदर शक्ति कहां से आएगी? उसको वो वही वो परमेश्वर की ही शक्ति है। तो वो अपनी शक्ति को निश्चित कर रहा है ना कि केवल इसी अणु को मेरी शक्ति लगे। इसी अणु को मिले। क्योंकि अगर वो निश्चित नहीं करेगा कि इसी अणु को मिले तो फिर बगल वाले सारे अणु इसको जो जिसको वो उसके हिसाब से है। तो वो निश्चित करता है। वही मैं कह रहा हूं वो निश्चित

00:33:33:10 करता है कि कहां पे मेरी शक्ति क्या कहते हैं? गति प्रदान वो विषय गति का विषय बने। फोर्स का विषय बने। वो बल प्राप्त होने का विषय बने। तो जब ऐसा होता है तो इसका मतलब यह है कि वो यह भी तय कर सकता है कि मैं जो यह प्रकाश रूपी जो जड़ पदार्थ है इसके भी टकराने का विषय बन जाऊं। हां उसके विषय पर वही ईश्वर ही हो यह नहीं कह सकते हैं हम। तो यहां पृथ्वी को जो प्राकृतिक अणुओं को जो है उसका वो विषय बन रहा है। पर वही ईश्वर है। हम ये नहीं कह सकते हैं। वो उसका विषय बन सकता है। पर ये सोचने की कि वही ईश्वर होगा। या वो ईश्वर का ही विग्रह होगा। जी जी ये नहीं कह सकते हैं हम हमारे मन में कोई भी कल्पना है कोई भी अब जैसे अभीभी देख रहे हैं तो एक सामान्य रूप से कभी गोलाकार कभी लंबाकार वो मतलब आकृति बनती है पर अब वो ईश्वर का ही विग्रह होगा ये हम नहीं कह सकते हैं नहीं वो नहीं कह रहा मैं एक अलग चीज हो गई जैसे कि अब ये प्रश्न काफी बार हो गया तो मैं लास्ट बार करके फिर इसको लेट गो करेंगे मैं ये बस कह रहा हूं कि जैसे कि दुनिया में कोई भी संरचना जब होगी तो ईश्वर उसमें जड़ पदार्थों के लिए क्षेपक बनेगा ही तभी वो कुछ क्रिया हो पाएगी तभी हो पाएगी क्रिया तभी होगी यानी

00:34:48:16 कि ईश्वर को अगर मान लीजिए पत्ता पत्ता जो ईश्वर उसका विषय बनेगा उसका निमित्त बनेगा टकराने का ना हां टकराने का वो निमित्त बनेगा पर वो स्वयं टकरा रहा है ये नहीं कह सकते तो क्या टकरा रहा है उससे मतलब गति कैसे मिल रही है उसे फिर गति का वो निमित्त बन रहा है पर वो स्वयं टकरा रहा है हम ये नहीं कह सकते हैं उसमें विद्यमान हो के उसकी गति से वो पदार्थ घूम रहे हैं। तो यानी कि वह दोनों में अंतर हो गया। उसने निश्चित किया ना कि मैं इस पदार्थ के अंदर-अंदर जितनी मात्रा में हूं वो गति करूं। और उसके बाहर वाला मैं गति ना करूं। ना करूं। है ना? उसने निश्चित यानी कि एक उसने निश्चित आकार में तय किया कि निश्चित आकार वाला मेरा जो हिस्सा है वो गति करे। उतना गति करे और उतना गति और क्योंकि मैं उसके अंदर हूं। व्याप्त हूं। तो मैं उसके लिए क्षेपक के समान कार्य करूं जिससे कि मेरे साथ-साथ वह भी गति करे। हां मेरे साथ वो भी गति कर पर वो उसमें निमित्त ही हुआ है ना। आप जैसे मान लीजिए आप चार बालक पढ़ रहे हैं। ठीक है? जी चारों को आपने एक समान से पढ़ाया है। ठीक है? अब उसमें भी जब आप देख लेते हैं कि कि हां भाई ये बालक बहुत अच्छी तरह से किसी चीज को समझा सकता है या बता सकता है। तो हम स्वयं उस चीज को प्रस्फुटित नहीं कर रहे हैं। हम नहीं बोल रहे हैं। किंतु वह यदि कुछ बोल

00:36:03:20 पा रहा है तो हम उसमें निमित्त बने। यानी कि हम चाहते हैं और जड़ पदार्थ अपने आप हिल जाता है। ऐसा ईश्वर चाहता है। ईश्वर ने चाहा ईश्वर की इक्षण शक्ति हुई और वह उसमें वो निमित्त बना। तो अगर ईश्वर की केवल इक्षण शक्ति हुई कोई जाकर के बल नहीं बल नहीं लगा ईश्वर का। नहीं ईश्वर का बल नहीं लगा। ईश्वर नहीं लगा। नहीं ईश्वर बल नहीं लगाएगा। ईश्वर उसमें निमित्त बना। उस चीजों की इस प्रकार से रचना की हुई है कि उसकी इच्छा शक्ति हुई। उसकी प्रेरणा हुई और वह पदार्थ गति किए तो पदार्थ को कैसे प्राप्त होता है कि मुझे गति करनी है मतलब ईश्वर की तो इच्छा शक्ति हुई ईश्वर की इच्छ शक्ति हुई तो उसी से उसका वो हो गया नहीं तो उसमें पदार्थ को क्या प्राप्त हुआ इक्षण शक्ति प्राप्त कैसे हुई जैसे अगर हम कहें कि ईश्वर ईश्वर की एक शक्ति है निराकार शक्ति जो जाकर के फोर्स दे देती है पदार्थों को तब तो वो हिल गया तो ठीक है हां तो हिल गई मगर मैंने केवल सोचा तो वो फोर्स ही तो उसमें निमित्त बना ना तो फोर्स फिर लगी ना फिर आप कह रहे हैं बल नहीं है उसमें ईश्वर में तो बल है पर वो कैसी है स्वाभाविक ज्ञान बल क्रियाच है ना बल उसका जो बल है उसका जो ज्ञान है उसकी जो क्रिया है वो स्वाभाविक है नहीं वो स्वाभाविक है उसमें कोई नहीं उसमें कोई इशू नहीं है नहीं तो बल तो उसका है

00:37:18:26 जी जी बल है बल है बल है वही बल लगता है बल और बल के रूप में वो स्वयं ही है हां वो स्वयं ही उसमें मतलब वो चीज हो रही है तो वही मैं कह रहा हूं कि एक तरीके से निश्चित देश काल परिस्थिति में वो जड़ पदार्थों को गति करवाने का विषय बनता है बनता है जाती तो इसी प्रकार से जैसे वो तमाम अन्य प्राकृतिक जड़ पदार्थों को गति करा रहा है। उसी प्रकार से वो प्रकाश के मार्ग में भी बाधा बन सकता है। वो बात और है कि हम जो है वेद के कारण जो है वेद के का मतलब जो वो बनेगा और उसको आकृति भी दिखेगी पर वो ईश्वर की ही आकृति है। ये जरूरी नहीं है। तो जड़ पदार्थों को जो वो करा रहा है वो ईश्वर ही करा रहा है। ये भी जरूरी नहीं है। फिर तो जो गति करा रहा है। तो फिर कौन करा रहा है? तो वही तो मैं कह रहा हूं जब इनको गति जैसे देखिए जैसे सूर्य में गति करा रहा है ना पर सूर्य ही ईश्वर है हम ये नहीं कहते हैं। सूर्य को गति करा रहा है। सूर्य को गति करा रहा है। ठीक है? तो सूर्य ही ईश्वर नहीं है। ये नहीं कहते हैं। हां। इसी प्रकार से यानी सूर्य की गति का वो निमित्त बन रहा है। पर सूर्य ही ईश्वर नहीं है। हम हम नहीं सूर्य को गति करा रहा है ईश्वर। तो गति कराने वाला तो ईश्वर ही है ना। गति कराने वाला ईश्वर है। पर सूर्य तो ईश्वर नहीं है। हां। सूर्य को ईश्वर नहीं कह रहा। इसी प्रकार से जब प्रकाश में यदि वो बनता है तो आपको अलग-अलग

00:38:34:00 आकृतियां दिख सकती हैं। अपने अपने कल्पना के अनुसार भी दिख सकती हैं और अपने-अपने क्षमता जैसे हम जब ध्यान में बैठते हैं तो किसी को कभी गोलाकार हमें प्रकाश दिखता है। कभी अंगुष्ठाकार प्रकाश दिखता है या अलग-अलग आकार के प्रकाश दिखते हैं। पर हम ये सोच रहे हैं कि कि वो ईश्वर का विग्रह है। वो आप सही कह रही हैं। वो मैं तो आपकी बात लेके ही चल रहा हूं। बस एक ये वाली बात है कि जैसे हम कहें कि ईश्वर ही ईश्वर ही है जो आकृति बन रही है वो ईश्वर की ही आकृति है ये जरूरी नहीं है तो फिर ये मानना पड़ेगा कि जो जड़ पदार्थों को गति करा रहा है वो ईश्वरी है ये निश्चित नहीं है क्योंकि हम ईश्वर जड़ पदार्थों के लिए निश्चित आकार में गति कराने का विषय बना ठीक है निश्चित आकार में तो हमने माना कि जड़ पदार्थ हिले और हिलने के कारण सृष्टि बन गई जब ईश्वर निश्चित हुआ एक निश्चित भू धूप मतलब निश्चित भाग में उसने गति कराने का विषय बना। अब हम ये कह रहे हैं कि वो मिट्टी के लिए, लोहे के लिए या अन्य जितने भी भौतिक पदार्थ हैं इनके लिए गति कराने का विषय बन सकता है। यानी कि क्षेपक बन सकता है। ठीक है? फिर जब वही ईश्वर प्रकाश के मार्ग में क्षेपक बन जाएगा। तो हम ये कह रहे हैं कि नहीं यहां पे वो ईश्वर नहीं कहलाएगा। यानी

00:39:49:18 जड़ पदार्थों को गति कराने वाले रूप में तो वो ईश्वर ही कहलाएगा। मगर प्रकाश के मार्ग में जब वो क्षेपक बनेगा तो वो ईश्वर नहीं कहलाएगा। तो ये मैं तो मना कर रही हूं कि उसमें वो गति करवाएगा पर वो ईश्वर नहीं होगा। यदि मिट्टी में गति कराए गति कौन करा रहा है फिर? गति ईश्वर करवाएगा। हां किससे मतलब उसकी शक्ति कराएगी? उसकी शक्ति ही कराएगी। जी जी पर वो पृथ्वी ही ईश्वर है ये नहीं कहेंगे ना। चलिए, ठीक है। यह हमने यह वाला टॉपिक काफ़ी देर तक डिस्कस हो गया, तो ठीक है। अच्छा, अब एक बात यह आती है कि जैसे अह यह होता है कि क्या आर्य समाज के द्वारा प्रतिपादित होने वाला जो ईश्वर है जिसकी पूजा होती है आर्य समाज में वो सर्वशक्तिमान है कि नहीं? सर्वशक्तिमान है। तो फिर जब वो सर्वशक्तिमान है। जैसे हम कहते हैं कि सर्वज्ञ का अर्थ है कि सब कुछ जानने वाला। जानने वाला है ना? हम और सर्वव्यापक का अर्थ होता है कि जो सभी जगह व्यापक है। ऐसी कोई जगह नहीं जहां वो ना हो। हम तो फिर जब हम कहते हैं कि वो सर्वशक्तिमान है। तो फिर हम क्या जो आर्य समाज के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर है क्या वो अवतार ले सकता है? उसको अवतार लेने की आवश्यकता नहीं है। वो अपनी शक्ति जो है उसको जब जिस प्रकार से कार्य कराना होता है वो उसके माध्यम

00:41:04:19 से वो करवा देता है। जी जी अच्छा तो जैसे हमने देखा है कि वेदों में कई जगह पर अलंकार का उपयोग हुआ है। है ना? हां। कि यहां पे उपमा अलंकार है। यहां पे रूपक अलंकार है। इस तरह से हम तो वेदों में अलंकार की आवश्यकता क्या थी? अलंकार की आवश्यकता इसलिए कि मतलब उन ग्रंथों को समझने में रुचिकर होते हैं। यानी सुलभ बनाने के लिए। सुलभ बनाने के लिए। तो जैसे काव्य होते हैं ना तो हम सीधा-सीधा बोलते हैं तो कभी बोर भी हो सकता है व्यक्ति। यानी कि आकर्षण का विषय बनने आकर्षण का विषय बिल्कुल तो यह कह सकते हैं कि अवतार वो आकर्षण का विषय बनने के लिए लेगा उसको अवतार लेने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी आकर्षण का विषय तो फिर उसकी शक्ति सीमित हो जाएगी मतलब फिर वो सर्वशक्तिमान नहीं रह जाएगा कैसे क्यों यदि उसको अवतार ही लेना पड़ गया नहीं आकर्षण का विषय बनने के लिए कोई काम करने के लिए नहीं जैसे उसको जैसे उसने मंत्र दिए वेद के जैसे उसने प्रणव दिया अब प्रणव में कहने को तो पूरा संसार है पूरा पूरा संसार है ना मगर प्रणव के रूप में उसने अवतार दे दिया अपने ज्ञान का ओम के रूप में ओम के रूप में तो अब हम कहें कि ये सीमित हो गया जबकि इसमें तो पूरा ब्रह्मांड है हम प्रणव में ही है ना तो उसी तरीके से जैसे ओम के रूप में ईश्वर का ज्ञान अवतार

00:42:20:07 ले रहा है उसी तरीके से आकर्षण का विषय बनने के लिए ईश्वर अवतार ले सकता है उसको आवश्यक देखिए ये चीज तो समझ में आ रही है कि भाई ईश्वर का ध्यान वो किस रूप में करेगा जी जी ठीक है ना गोप ब्राह्मण में जैसा आया कि जब उसने सारी सृष्टि की रचना कर दी तो उसके बाद उसने विचार किया यह कि कोई एक ऐसा शब्द हो जो पूरी रिचा भी हो किसी छंद में भी हो और संपूर्ण ब्रह्मांड का उसमें दतक हो जाए तो उसने फिर ये अकार मकार के अंतर्गत उन सारी चीजों को उसने लिया हम ठीक है पर वो जो अकारुकार मकार भी है वो इस रूप में है ये ऋषियों ने कल्पना की कि अकार है उसको जो हम लिख देखते हैं इस रूप में। अच्छा ये ऋषियों की कल्पना है। ये ईश्वर ने नहीं दिया है। अक्षर जो बने वो ऋषियों की कल्पना है। मुख से हमने उच्चारण किया। अच्छा किंतु अ इसी प्रकार का बनेगा। नहीं नहीं वो अ इसी प्रकार का नहीं जो मुख से उच्चारित हो रहा है वो भी तो अवतार है। वो उसमें है। वो भी तो ये है ना कि पूरे ब्रह्मांड का ज्ञान पूरे ब्रह्मांड का ज्ञान एक केवल उसमें उच्चारण में आ रहा है। है ना? प्रणव के अंदर आ गया। पूरे ब्रह्मांड का ज्ञान आ गया। तो मैं वही कह रहा हूं जैसे पूरे ब्रह्मांड का ज्ञान प्रणव के रूप में प्राकट्य हो रहा है। तो उसी तरीके

00:43:35:10 से पूरे ब्रह्मांड का जो सर्वव्यापक ईश्वर है वो अपनी सर्व्यापकता को ना खोते हुए हम एक और जैसे कि वो सर्व्यापकता को ना खोते हुए वो पृथ्वी इत्यादि के लिए गतिमान कराने का विषय बन रहा है। उसी तरीके से सर्व्यापक ना सर्व्यापकता को ना खोते हुए वो जो है प्रकाश के मार्ग में जो है क्षेपक बनने का विषय बनेगा और वो अवतरित हो जाएगा। उससे सीमित कैसे हो गया वो? जैसे अभी हमने देखा था ना कि यदि उसको उसके लिए अवतार लेने की आवश्यकता पड़ जाए हम तो फिर उसकी सर्वशक्तिमत्ता समाप्त हो जाएगी। कैसे होगी सर्वशक्तिमत्ता से? कि मतलब उसको फिर अवतरित होने की आवश्यकता ही क्यों है? वह तो जहां है जैसे है वो वहीं से उस कार्य को कर देगा ना। नहीं तो फिर तो उसको ये ज्ञान देने की आवश्यकता नहीं है ना। मंत्रों के रूप में वो तो बस सोचेगा और जो है आपको ज्ञान मिल गया। वेदों की क्या आवश्यकता है? तो सबकी क्षमताएं तो अलग-अलग होती है ना। यह तो उसको पता है। तो बस क्षमता के अनुसार वो अवतार लेगा। मनुष्यों की क्षमताएं अलग-अलग हैं। इसलिए उसको यह ज्ञान देना पड़ा। तो बस मनुष्यों की क्षमता के लिए ही वो अवतार लेगा कि जिससे कि वो आकर्षण का विषय बन जाए। मतलब जब हम ये कह रहे हैं ना कि आवश्यकता नहीं है तो हम एक जगह पर जो है आकर्षण के विषय के लिए आवश्यकता को मान ले रहे हैं कि ये तो मनुष्यों की क्षमता के लिए चाहिए। तो ऐसे ही किसी एक शब्द ऐसे का उच्चारण

00:44:50:14 ऐसे ही जिन लोगों का ध्यान निराकार में नहीं लग सकता जिन लोग जिन लोगों की प्रज्ञा शक्ति उतनी नहीं है उन लोगों के लिए आकर्षण का विषय बनने के लिए वो जो अवतरित हो नहीं तो उसके लिए तो परमेश्वर ने बता दिया ना कि यदि आपको उस प्रकार से चाहिए तो आप सूर्य पे ध्यान लगा लो आप पृथ्वी में ध्यान लगा लो चंद्रमा में ध्यान लगा लो मंत्र में कह दिया यस भूमि प्रमा अंतरिक्षतोदरम दिव मूर्धानम तस्मै जेष्ठाय ब्राह्मण नमः तो यदि हमें योग दर्शन के सूत्रों में भी भाष्यकारों ने भी इस चीज को बताया है कि यदि प्रारंभिक अवस्था में यदि उस सर्वव्यापक ब्रह्म में ध्यान नहीं लग पाता है तो आपको एक वस्तु चाहिए जिसमें आप ध्यान लगा सकें तो उसके लिए या तो आप सूर्य पे ध्यान लगा सकते हैं जल में ध्यान लगा सकते हैं। मतलब कहने का मतलब यह है कि आकर्षण के लिए आकर्षण का विषय बनने के लिए ईश्वर ऐसे कार्य करता है जो आवश्यक नहीं है। हां नहीं हां जो अनावश्यक है वह कार्य नहीं करेगा जो आवश्यक अलंकार अलंकार कीेंस क्या है वेद में उसके कई सारे हैं एक तो उसको आप आकर्षण के लिए समझिए या फिर जैसे एक शब्द से अनेक अर्थ हो सके एक शब्द के अनेक अर्थ निकलते हैं अलंकारों से तो यदि हमको एक शब्द

00:46:05:22 के अनेक अर्थ कहने हैं तो फिर उतने मंत्र बनते उतना वो ज्यादा विस्तार को प्राप्त होता चला जाता तो इसलिए एक इस प्रकार का मंत्र बनाया कि जिसके अंतर्गत हम कई सारे अर्थ ले सकते हैं। तो फिर हम ये तो फिर हम यह कह सकते हैं कि रोचक हो और बहुत सारी चीजें जैसे सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी इत्यादि पे वो मुख्य शब्द से अनेकार्थ विहित होते हैं। तो फिर हम ये कह सकते हैं कि जैसे सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी इत्यादि पे ध्यान ना लगाए। एक ईश्वर का रूप ऐसा मिल जाए जिसप हमारा ध्यान केंद्रित हो जाए। उसके लिए ईश्वर अवतार ले लेगा। मतलब अगर हम यह देख रहे हैं ना कि मनुष्य की आकर्षण का विषय बने तो अवतार अवतार ले। लेकिन फिर यदि ऐसा होता तो कोई एक ही बस होना चाहिए था। हम है ना? एक बस लेना हो तो शुरू में ही एक ले लेते हैं। आप ही तो कह रहे हैं कि ईश्वर ने कई विकल्प दिए सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी इत्यादि के रूप में। सूर्य, चंद्रमा के रूप में दिए ना पर यदि मानव के रूप में यदि अवतार लेना होगा तो एक अपना रूप रखता है। जैसे ईश्वर ने अपना ज्ञान देना है मुक्ति का तो उसने कोई एक मंत्र तो दिया नहीं। उसने तो बहुत सारे मंत्र दिए और सभी मुक्ति के हेतु है। पूरा वैदिक ज्ञान ही मुक्ति का हेतु है। तो इसी प्रकार से बहुत सारे जो रूप अपने को देगा। अब उसमें क्या है कि जब अलग-अलग रूप हुए तो उसमें परमेश्वर कोई भी ऐसा कार्य नहीं करेगा कि जिसके कारण से आपस में लड़ाईयां हो। मंत्र अलग-अलग दिए पर मंत्र लड़ाई के विषय नहीं बनेंगे। किंतु

00:47:20:28 यदि अलग-अलग अवतार दे देंगे तो कोई किसी को अपना मान लेगा। कोई किसी को मानेगा, कोई किसी को मानेगा तो उससे आपस में वो लड़ाई के विषय बन जाएंगे। नहीं वो तो अज्ञानता के वश होता है ना। जैसे कि तो इसीलिए तो परमेश्वर कोई भी ऐसा कार्य नहीं करवाएगा। नहीं नहीं हां जो यह नहीं जान पाया कि इनमें अलगाव नहीं है या एक ही ईश्वर के अनेक अनेक रूप हैं जैसे वो है ना बहुदा क्या एक आत्मा बहुधा एकम सप्रा बहुधा वदती नहीं एक और है वो कई रूपों में प्रकट होता है नाना प्रकार के रूपों में प्रकट करता है ईश्वर अपने आप को वो अपने रूप जी यजुर्वेद में आया ऋग्वेद में आया कि वो अपनी माया के द्वारा अनेक रूपों में प्रकट होता है इस तरह का तो अनेक रूप में जो होता है आप आप वो पृथ्वी इत्यादि के रूप हां इस रूप में ही होता है वो मानव रूप में यदि होगा तो फिर यदि वो उस रूप में होता अब उसके लिए ठीक है यदि आप एक बार को सोच भी ले कि वो अवतार रूप में होगा ठीक है तो फिर वो ईश्वर के सारे गुण उसमें होने चाहिए फिर उसको जन्म मरण से रहित सुखदख से रहित और जो योग दर्शन में या वेदों में जो उसके लक्षण बताए गए हैं वो सारे उसमें घटने चाहिए तो वो जन्म से रहित है ना वो तो लीला पूर्वक ऐसा करते हैं कि अपने को दिखाते हैं सोच सकते हैं ऐसा पर उसको लीला नहीं होती है वो फिर उनमें सुखदख नहीं होना चाहिए नहीं

00:48:36:02 तो सुखदख कहां है क्यों नहीं तो लीला पूर्वक वो ऐसा कर रहे हैं तो फिर उसका फिर वो विलाप नहीं होना चाहिए ना वो कह तो रहे हैं कि वो जो विलाप था वो मेरी लीला मात्र थी करने की आवश्यकता क्या है जब सीधे-सीधे में कार्य हो सकता है तो सीधे-सीधे कार्य तो ये भी हो सकता है ना आचार्य जी कि बस ईश्वर ने इच्छा की और जो ऋषि हैं या मनुष्य हैं सारे मनुष्य एक बार में उन्हें ज्ञान हो गया वेद का अब उनकी क्षमता के कारण से नहीं हो सकता तो वही क्षमता के कारण उसको आवश्यकता है कि वो जो है ऐसा ऐसा जो लीला करके दिखाए कि मनुष्य की रुचि बढ़े बने उसमें। उससे फिर उसमें क्या हुआ क्योंकि फिर वो मनुष्य वहीं वहीं तक रह जा रहा है। यदि हम इस चीज को ऐसा मान लेंगे तो फिर उससे ऊपर मनुष्य उठता ही नहीं है। फिर वो हमेशा वो पहली कक्षा में ही रह जाएगा। नहीं ऐसा नहीं है। वो तो एक बात अलग की रहे कि किसको मोक्ष मिला, किसको नहीं मिला। वो वाली बात चली जाएगी। अब उसमें तो हम प्रमाण दे नहीं सकते कि मीरा को मिला, कि किसको भक्तमाल को मिला। वो तो एक अलग बात हो जाएगी। तुलसीदास जी को मोक्ष मिला कि नहीं मिला या किसको मिला? एक सामान्य रूप से यह है कि जो परमेश्वर है वो कोई भी ऐसा कार्य नहीं करेगा और बाकी बहुत सारी चीजें ऐसी हैं जो कि वेद के हिसाब से आप देखिए प्रजा प्रतिष्ठरति गर्भ अंतः अजायमान हम उसमें स्पष्ट कह दिया कि वो उत्पन्न हो ही नहीं सकता। नहीं इसलिए उसको वो उत्पन्न नहीं हो रहा है। मैं वही कह रहा हूं। उसका

00:49:51:08 केवल आविर्भाव और तिरोभाव है। जैसे कि अभी हमने माना कि कोई ना कोई शक्ति प्रकट होती है। जैसे कि मान लीजिए अभी ये पृथ्वी का जड़ पदार्थ है। अभी इस पर कोई कार्य नहीं हो रहा है। ये रुका हुआ है। मगर फिर ईश्वर एक शक्ति के रूप में प्रकट हुआ। इसको इसने मूव करा दिया। तो इसको प्राकट्य को हमने माना। उसको कहा गया कि भाई यही अवतार है। जैसे कि जैसे मान लीजिए प्रकृति जो है वो सनातन है। हम आर्य समाज के अनुसार मगर प्रकृति भी प्रकट होती है। उस समय जब वो क्या कहते हैं व्यवहार में ना आ सकने वाली थी सत्यार्थ प्रकाश में जैसा लिखा है पृथ्वी जो है ब्रह्म के अंदर ही थी भीतर व्याप्त थी और फिर वो जब सृष्टि रचना के समय वो प्रकट हो जाती है तो ये जो प्रकट और अप्रकट है इसी को जो उत्पन्न होना और ना और जो है आविर्भाव त्रुभाव कहते हैं इसी को जो है अवतरित होना और जो है फिर एक ही बार में हो जाती है ना वो इतनी बार-बार क्यों जैसे वेदों के जब जब सृष्टि की रचना होती है तब तब वो फिर होती है प्रलय काल के बाद जब जब सृष्टि की रचना पुनः होगी तब तक फिर जो जो प्रकृति अप्रकट थी तो जैसे कि जैसे देखिए प्रकट होने वाली बात है कि वो उत्पन्न नहीं हो सकता अब जैसे जो हमने अभी माना कि जो चार ऋषि हैं उनके मन में वेदों का ज्ञान प्रकट हुआ प्रकट हुआ मगर उससे पहले वो कहां था वो तो सब जगह पहले से ही था क्योंकि

00:51:06:14 ईश्वर है सब जगह मगर फिर भी वो एक ऐसा हुआ कि अब वो जो है अंतःकरण का विषय बन गया इसी को प्रकट होना कहा गया मतलब अभी वो व्यवहार में नहीं था ऋषियों के व्यवहार में नहीं था और अब वो ऋषियों के व्यवहार में आ गया वो चीज ठीक है तो सृष्टि के आदि में ही एक बार वेदों का ज्ञान हो गया। ठीक है? उन ऋषियों को मतलब कहने का मतलब है कि प्रकट हो सकता है मगर एक बार हो, कई बार ना हो। हां तो जैसे वो एक बार हो गया। मतलब अवतार हो तो एक बार हो और एक ही हो। कई रूपों में ना हो अवतार और एक शुरुआत में एक हो जाए उसके बाद ना हो। ऐसा ही है। ऐसा मान सकते हैं। पर ऐसा तो हुआ नहीं। जी। तो वो जो अवतार हुआ चाहे जो प्रकट होना हुआ तो वही रूपात्मक जगत के रूप है। दो जगत हो गए। वेद हो गया नामात्मक जन्म और जो यह जो यह सृष्टि हुई वही परमेश्वर ने उसी को आप बस यह अवतार रूप में लीजिए जो कि यह रूपात्मक सृष्टि है। अच्छा ये वही बस उसके अवतार इसको भी एक इसमें भी एक बहुत जिज्ञासा होती है। जैसे ये कहा जाता है कि ईश्वर जो है नाना प्रकार के रूपों में प्रकट होता है। हम तो जैसे हम कहते हैं कि पृथ्वी के रूप में प्रकट हुआ, चंद्रमा के रूप में प्रकट हुआ। तो क्या पृथ्वी ईश्वर है? नहीं। ईश्वर है नहीं। यानी प्रकट नहीं हुआ ईश्वर। नहीं। तो फिर ये क्यों कह रहे हैं? बनाया तो फिर ये क्यों कह रहे हैं कि पृथ्वी के रूप में प्रकट हुआ है। पृथ्वी के रूप में प्रकट हुआ नहीं।

00:52:21:27 जैसे ये जो वाली जो मंत्र है ना कि वो अनेक रूपों में प्रकट होता है। इसका क्या अर्थ है? मतलब उसको प्रकट देखिए कई जगह क्या होता है कि मतलब कि प्रकट होना यानी दूसरों को ऐसा आभासित होना कि कि वह है जो अंतर्भाव ऋणर्थ होते हैं ना यही सब तो अलंकार होता है अविद्या अविद्या में ऐसा प्रतीत होना कि वो जो है जो प्रकट नहीं है वो प्रकट हो रहा है वो प्रकट हो रहा है पर वस्तुत यह है कि कि उसने इसकी रचना की है मतलब ईश्वर प्रकट नहीं हो रहा है फिर भी वेदों में ऐसे मंत्र आए हैं कि ईश्वर प्रकट होता है हां प्रकट होता है इस रूप में कहते हैं हम तो मतलब पृथ्वी पृथ्वी ईश्वर तो नहीं है ना? पृथ्वी ईश्वर नहीं है। तो ईश्वर प्रकट नहीं हुआ। ईश्वर प्रकट नहीं हुआ। ईश्वर ने सृष्टि के मतलब पृथ्वी बनाया और उसके माध्यम से हमारे हृदय में ये आभास हुआ कि ये ईश्वर है। क्या ईश्वर है? ईश्वर नाम की कोई सत्ता है। ईश्वर नाम की शक्ति है जिसने इसको बनाया। तो वो नाना रूपों में प्रकट कहां हो रहा है? फिर वो। वो तो ये हुआ ना कि एक ही रूप है। फिर वो तो। तो नाना रूपों में वो प्रकट नहीं हो रहा है। नाना रूपों को वो प्रकट करवा रहा है। हां। तो यह मंत्र तो यह कह रहा है ना कि वही में बताया मैंने कि वह अलंकार है। अंतर्भावित अन्यर्थ होते हैं कई इसमें कि मतलब प्रयोग हम ऐसा करते हैं कि वो प्रकट हो रहा है पर वस्तुत वो प्रकट करवा रहा है। जी और हमारे हृदय में भी इस चीज

00:53:37:01 को वो प्रकट करवा रहा है कि ये पृथ्वी है और उसके माध्यम से ईश्वर है। अच्छा इस तरह से जैसे एक मंत्र आपका तदे जति तनय जति इसपनिषद का है। ये जरूरत का अंतिम अध्याय जी तो वहां पर इसी प्रकार से भाष्य किया गया कि वह गति मतलब वह स्वयं गति नहीं करता है। वह गति करवाता है। तो यदि हम कहते हैं कि तद एजति तत न एज यह तो विरोध हो जाएगा कि एक जगह कह दिया कि वो गति करता है और एक जगह कह दिया गति नहीं करता है। तो इसके लिए कहते हैं कि यहां पर अंतर्भावित अर्थ है कि तद एजयति स्वयं न एजति वो गति करवाता है पर वह स्वयं गति नहीं करता है। मगर अभी तो आप कह रही थी ना कि पदार्थ के अंदर होता है तो वह खुद गति करता है। इसलिए पदार्थ पदार्थ गति कर रहे हैं इससे प्रतीत होता है कि वह गति कर रहा है। उसको गति गति कैसे मतलब पदार्थ फिर कैसे गति कर रहा है? फिर वही चलिए छोड़िए वो छोड़िए। ठीक है। तो इतना अभी हम लोगों ने जान लिया। ठीक है? और अभी हम लोग यहां पर आए थे कि हां एक ये वाला रह गया कि जो ये बात जो कही जा रही है कि नाना रूपों में प्रकट होता है वो अलंकार है। वो अलंकार है। ठीक है? वो अलंकार में कही जा रही है। तो अच्छा एक बात अब आती है थोड़ा सा हम व्यवहारिक उसमें आ जाए। ब्रह्म

00:54:52:09 की बात तो काफी सारी हो गई। अब थोड़ा सा धर्म की बात आ जाए। हम तो एक आता है अच्छा आचार्य जी जैसे हमने देखा कि पाणिनी कन्या महाविद्यालय है। है ना? तो कन्याओं की गति तो वेदों में तभी होती है जब उपनयन हो जाता होगा। है ना? तो हमारे यहां उपनयन संस्कार के लिए नियम बताए गए हैं वेदों में या मनुस्मृति में कि अ उपनयन जो है कॉपीिन मेखला धारण पूर्वक होना चाहिए। हम जो कि एक स्त्री के लिए संभव नहीं है और छौर कर्म भी होता है हम वो भी एक स्त्री के लिए थोड़ा सा असहज हो जाता है। हम इसके अलावा यह भी कहा गया है कि तीन रात्रि उपनयन के बाद अपने आचार्य के पास वो बिताए जो बटों को वो भी कि एक स्त्री के होने के अनुसार जो है वो विपरीत स्थिति हो जाती है। तो इसको कैसे हम फिर स्त्रियों के लिए उसको सहजता देखें। जी देखिए [गला साफ़ करने की आवाज़] मेला लेना स्त्रियों के लिए कोई मुश्किल नहीं है क्योंकि हम मेला भी देते हैं। कॉपीन मेला धारण पूर्वक कॉपीन तो कॉपीन तो ठीक है मतलब कि कॉपीन जिस रूप में है जिसके लिए जिस रूप में आवश्यक है वो उस रूप में उसको धारण करेगा। फिर उसकी विधि भी तो होगी ना। कॉपीन तो कॉपीन ही होता है। वो तो बदल रहे हैं ना

00:56:07:13 हम थोड़ा सा। नहीं हम बदलते कहां हैं उसको? हम जैसे जैसे हमने देखा है कि सलवार सूप में भी जनेऊ हो जा रहा है। है ना? हां। यज्ञ पवित्र हो। तो उसका तात्पर्य वहां तो शुद्धता शुद्धता का मतलब है उससे। नहीं तो वो वचन होना चाहिए ना कि शुद्धता ऐसा कुछ प्रमाण क्योंकि प्रमाण से ही होगा। धर्म जो धर्म होता है होगा। देखिए जी जो हम लोग इन सारी चीजों का हम लोगों ने एक वो जो समझा है कि इन सब चीजों के लिए आंतरिक सुचिता और बाह्य सूचिता पवित्रता तो शास्त्रों की वाली जो वचन है कि कॉपी मेथला धारण पूर्वक इसको फिर इग्नोर कर दें हां बिल्कुल इसको वो कर सकते हैं हम शुचिता के रूप में उसको हम ले सकते हैं नहीं इग्नोर कर दें कि वो जब ये कह रहे हैं कि जैसे मान लीजिए शास्त्र ये कह रहा है जैसे गीता में कहा गया तस्मा शास्त्रम प्रमाणम हां है ना शास्त्र यह कह रहा है कि भूर भुवाह स्वाहा से ही मुक्ति मिलेगी या प्रणव से ही मुक्ति मिलेगी। शास्त्र ये कह रहा है यही है आमीन नहीं है। मुक्ति का हेतु आमीन नहीं है। मुक्ति का हेतु तो प्रणव है। है ना? प्रणव है। ठीक है? तो हम वहां पे तो समझौता नहीं है। यहां पर प्रणव है। जी किंतु उस प्रणव के साथ यदि हमारे व्यवहार में वो प्रणव नहीं है तो क्या मुक्ति मिल जाएगी? तो दोनों चीजें ले चले ना। एक दोनों ले चलेंगे ना। जी एक को काटना नहीं चाहिए। मतलब

00:57:22:19 उसका उद्देश्य यह है कि यदि हम प्रणव का जाप करते हैं तो प्रणव का जाप करते हुए हमारी आंतरिक सूचिता, बाह्य सूचिता, मानसिक सूचिता सब कुछ होनी चाहिए। हमारे व्यवहार भी उचित होते। मैं समझ गया। इसका मतलब क्या हम ये माने कि अगर हमारी जो हमारे व्यवहार में प्रणव आ गया तो हम आमीन कह के भी मुक्त हो जाएंगे। आमीन कहेगा ही नहीं वो। तो इसका मतलब यह आ गया कि अगर हम अंदर बाहर से वह शुद्ध हो गए तो फिर हमें उस प्रक्रिया की भी आवश्यकता नहीं है। वो जो यज्ञ पवित्र संस्कार की प्रक्रिया है तो वो सारी चीजें प्रतीक स्वरूप कहेंगे ये मतलब जरूरी नहीं है कि वो हो ही हां जरूरी नहीं है कि मतलब हो ही पर जब तक हम उसको धारण नहीं करते हैं तो हमारे अंदर वो जो एक भावनाएं होती हैं और उसका जो स्पर्श होता है और उसका जो हृदय के साथ स्पर्श होता है जब तक हम उन चीजों को नहीं समझेंगे नहीं करेंगे तो तब तक हम उसकी ओर प्रवृत्त नहीं हो पाते हैं। इस कारण से वो आवश्यक है। किंतु कौपीन धारण जैसे यज्ञ इत्यादि में भी धोती धारण करना है तो धोती क्यों धारण करते हैं? क्योंकि वह धोते हैं। प्रतिदिन धुले हुए वस्त्रों को ही हम धारण करें। इस उद्देश्य से उसका ग्रहण किया जाता है। इसमें कई बार ऐसा होता है ना कई सूक्ष्म विषय होते हैं। जिसमें हमारी गति होती नहीं है। तो उसमें हम लोग शब्द प्रमाण को आलंबन लेते

00:58:37:22 हुए आगे बढ़ जाते हैं। जैसे कि ये सूक्ष्म विषय है कि भाई भूरहा स्वाहा कहने से सूक्ष्मतम हमारे को क्या मिल रहा है? हम उसको बहुत ज्यादा लॉजिकली डिफाइन नहीं कर सकते। नहीं करते हैं तो हम वहां पे शब्द प्रमाण मानते हैं क्योंकि आप मान लीजिए रोज आप भूरभु स्वाहा कर रहे हैं और मांसाहार कर रहे हैं तो क्या आपको मुक्ति मिलेगी नहीं मिलेगी मगर ऐसा भी नहीं है कि अगर हम मांसाहार नहीं कर रहे हैं तो हम भूभ स्वाहा की जगह आमीन करने लगे तो मुक्ति मिल जाएगी हां तो भी नहीं मिलेगी आमीन तो उसका हेतु नहीं हो सकता आमीन उसका हेतु नहीं हो सकता है हमारे चित्त की शुद्धि तो भू स्वाहा से ही होगी हां बिल्कुल कर्मों की शुद्धि तो क्योंकि उसके अर्थ का विचार उसी के हिसाब से होगा तो अब यदि हम मान लीजिए कि हमने कोपिन धारण नहीं किया यदि हमने साड़ी धारण कर ली तो वो शुच्छता पवित्रता तो वही रहेगी ना वस्त्र कोई भी हो सकते हैं तो फिर शब्द भी कोई भी हो सकता है फिर तो भूसवा की जगह अमीन हो सकता है फिर दिक्कत आएगी ना अगर देखिए भाई देखिए आपने जैसे कहा कि भाई आप धोती ये पहन रहे हैं ठीक है हम ये धोती पहन रहे हैं जी तो क्या इसमें अंतर हो जाएगा नहीं अंतर नहीं अगर जहां पे ये बात आएगी कि शास्त्र क्या कह रहा है मैं हम सही जैसे मान लीजिए कि मैं सिगरेट पी रहा हूं कॉपीन शब्द कैसे बनता है एक मिनट मैं मान लीजिए मैं सिगरेट पी रहा हूं। ठीक है? मगर मेरे पिता ने नहीं कहा कि आप सिगरेट पियो और मैं पी रहा हूं। तो मैं अपने सिगरेट पीने को यह

00:59:52:28 थोड़ी ना कहूंगा कि यह जो है सही कर रहा हूं। मैं ये कहूंगा भाई सिगरेट पीना तो गलत है क्योंकि पिताजी ने कहा है गलत है तो गलत है। बाकी मैं नहीं कर पा रहा हूं वो बात एक अलग है। तो जैसे कोई व्यक्ति अपने सामान्य जीवन में पट शर्ट भी पहन रहा है क्योंकि उसकी अब मजबूरी हो गई। वातावरण ही ऐसा हो गया कि वो बहुत सारी चीजें शास्त्र के अनुसार नहीं कर पा रहा है। मगर जो चीजें शास्त्र से ही जुड़ी हुई हैं। हम है ना? उसमें भी वह जो है अपनी आरोपित चीजों को और वह भी यह कहते हुए कि यह सही है या तो वह यह कहते हुए कहे कि भाई यह जो है अशास्त्रीय पर हम कर रहे हैं। या तो यह कहे वह कह रहा है कि यह भी शास्त्र सम्मत है जबकि वह शास्त्रों में कहीं उसका वर्णन नहीं है। तो यह थोड़ा सा अंतर आ जाएगा। जैसे कोई लड़का कहने लगे कि यह जो है पिताजी ने कहा है यही है सिगरेट पीने। मतलब अपने सिगरेट पीने एकदम अलग हो गई। ये चीज बिल्कुल अलग हो गई। वो व्यवहार का विषय हो गया। यहां पर जैसे तीन बातें आई। आपने कहा कि तम रात्रि गर्भ विभती जो आचार्य उपनय मानो तो क्यों नहीं एक आचार्या जो है वो भी तो अपने शिष्याओं को तीन रात्रि तक अपने पास रह के और वो कर सकती है मैंने जोर इस पे दिया कि वो जो कॉपीन मेला अब यदि बालक है तो वो कॉपीन धारण करता है जी यदि नारी है कन्या है तो वो कुछ अन्य वस्त्र धारण करती है उसके लिए शब्द प्रमाण होना चाहिए ना तो शब्द जो भाई उन्होंने एक सामान्य रूप से दिया था

01:01:08:02 तो हर जगह जरूरी नहीं कि दोनों शब्द शब्दों का प्रयोग किया जाए तो फिर तो फिर मनमानी होने लगेगी। ठीक है। ये अब तो मनमानी होने लगी। मनमानी नहीं होगी। अच्छा एक बात जैसे मैं अपनी थोड़ी सी बात जैसे हमने माना कि चलिए उसमें वो स्त्रियों के लिए ठीक नहीं है। हम तो इसलिए हमने अपने मन से जो है शास्त्र के बाहर रह के कुछ ऐसी चीज ले ली जो आसपास है। ठीक है? तो फिर क्या होगा कि ठीक है आपने ये लिया है तो हम ये ले लेते हैं। आपने ये ले लिया है तो हम फिर तो फिर वो फैलने लगेगा। विकृत हो जाएगा। उस जिसको कह सकते हैं कि धुरी के अंतर्गत रहते हुए करेंगे ना तो वो जो धुरी आपने खुद जब वो जो धुरी है ना उसको उसी शास्त्र की धुरी के अंतर्गत हैं आप क्या हुआ जो अच्छा आप एक बात मुझे बताइए वेद में कहा है स्त्री ब्रह्मा बहुवित ठीक है ब्रह्मा का मतलब क्या होता है प्रजापति क्रिएटर ब्रह्मा जी अच्छा तो और ब्रह्मा का जो अर्थ किया गया है कि चारों वेदों का ज्ञाता। ठीक है? वो भी है। ठीक है? तो जब वेद कह रहा है हमारा मतलब जब आर्य समाज की बात आती है तो आर्य समाज की हर बात हम लोग वेद से लेते हैं। ठीक है। तो वेद में यदि कह दिया

01:02:23:06 गया कि स्त्री ही ब्रह्मा भोवित कि स्त्री ब्रह्मा हो सकती है। यानी चारों वेदों की वो ज्ञाता हो सकती है। जी जी और वेदों का ज्ञान बिना उपनयन के नहीं हो सकता है। नहीं हो सकता है ना। चार ऋषियों को हुआ ना तब कहां हुआ था उनका उपनयन? उपनयन उन्होंने किया होगा। चार ऋषियों ने उपनयन नहीं ठीक है। हो सकता है। आपने कहा कि बिना उपनयन के जैसे आपने कहा कि कन्या जो है वह वेदा अध्ययन यदि करेगी तो उसको उपनयन लेना जरूरी होगा। जी मैं वेदा अध्ययन की बात नहीं कर रहा। उपनयन की बात कर रहा हूं। वो कैसे उसमें थोड़े से कुछ विपरीत अर्थकारक अर्थ आते हैं। इसलिए मैं एक आपको बात बता रहा हूं। जैसे ये वाली बात जो आती है कि क्या जो मंत्रों की दृष्टा थी जैसे कई स्त्रियों का भी मंत्रों की दृष्टा में नाम आया। सूर्य सावित्री तो फिर यह कहा जाता है तो फिर जब वहां मंत्रों की दृष्टा स्वयं स्त्री हो सकती है जब जैसे आपने कहा कि स्वयं वो ब्रह्मा हो सकती है तो फिर वो जो स्त्रियां हैं ये क्यों नहीं हो सकती तो वहां पर तो जो जिनका बात हो रही है वो स्वयं दृष्टा है वो पठनपाठन करने वाले नहीं है आगे वो तो स्वयं दृष्टा है जैसे कि चार ऋषि चार ऋषियों ने तो जनेऊ नहीं कराया अगर जनेऊ कराया होता तो फिर ईश्वर फिर ईश्वर के ज्ञान देने से पहले भी उनको ज्ञान है जनेऊ कराने का वो मानना पड़ेगा तो मतलब हमारे सामान्य रूप से बात मतलब जो यह वाले

01:03:38:12 वाक्य हैं स्त्रियों के यहां से तो हमारी शुरुआत हो रही है। हमारे प्रमाण हैं। इनके अनुसार हमें जो है इन्होंने ये देखा ये कहा सामान्य रूप से जैसे उपनयन धारण करना है। ठीक है? जी पूरे उसमें पूरे वेदों में कहीं पर भी उपनयन ग्रहण करने का मंत्र नहीं आता है। यज्ञ यज्ञ पवितम परम पवित्र वो वेद का मंत्र नहीं है। जी वो गृह सूत्रों का मंत्र है। अच्छा ठीक है। और उपनयन का मतलब क्या होता है? सामान्य रूप से समीप में लेना। ठीक है? तो वो एक उसका प्रतीक है। ठीक है। अब वो उसके प्रतीक के लिए शास्त्रों में वचन कराए गए। नहीं तो शास्त्रों में मिला ना हम ग्रह सूत्रों को हम प्रामाणिक मानते हैं ना। सूत्र को हम प्रामाणिक मानते हैं। मगर यह जो कॉपीन के अलावा जो हम ले रहे हैं यह कहीं पर है वही मैं पूछ रहा हूं। तो सामान्य रूप से इस प्रकार का एक शब्द दे दिया क्योंकि उसमें भाई बालकों के लिए उस रूप में प्रयोग कर किया हुआ है इसलिए दे दिया तो उसके उसको समझे ना लक्षणा से हम लेंगे ना बहुत सारी चीजें कृतियां होती है ना अभिधा लक्षणा व्यंजना तो आप उसको लक्षणा से ले लीजिए केवल चलिए इसको जो है आगे अगला टॉपिक एक लाते मुझे आशा है कि आपको जो है रुचि रोचक रहा होगा कोई इसमें बिल्कुल एक मंत्र आता है सत्यार्थ प्रकाश में कहा गया है कि 26 दो यजुर्वेद 26 दो

01:04:53:13 यथे वाच उसमें ये कहा गया है कि भाई ईश्वर ने जो अपनी वाणी दी है वो ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र सबके लिए दी है सबके लिए दी है कोई इसमें वर्णगत विभाजन नहीं किया बिल्कुल अगर हम आर्य समाज की व्यवस्था जो मानते हैं वर्ण व्यवस्था कर्म के अनुसार तो शूद्र वो है जिसका यज्ञपवित नहीं हुआ है शूद्र शूद्र का यज्ञ अगर यज्ञ पवित हो गया तो द्विज हो गया हम्। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र में से एक हो गया। तो फिर यहां पे भगवान मतलब ईश्वर कौन से शूद्र की बात कर रहे हैं? क्योंकि उन्होंने कहा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सबके लिए जो है वेद की वाणी है। और जबकि मतलब हमारे हमने अर्थ निकाला कि सब लोग वेद पढ़ सकते हैं। जबकि शूद्र तो वो है जो वेद नहीं पढ़ सकता। जो वेद नहीं पढ़ सकता। आर्य समाज के अनुसार क्योंकि उसका उपनयन नहीं होता। वही शूद्र है। है ना? जी। नहीं। जो वेद नहीं पढ़ सकता वो शूद्र नहीं है। महर्षि दयानंद जी ने यह भी लिखा कि जिसको अनेक बार समझाने पर भी कोई बात नहीं समझ में आती है वो शूद्र है तो उसका भी उपनयन करा दिया जाएगा। उपनयन तो होगा ही मतलब और वेद में देखिए मतलब उपनयन रहित कोई नहीं रहता है। उपनयन रहित कोई नहीं रहता है। तो यानी उपनयन होने के बाद भी कोई जो है शूद्र कहला सकता है। कहला सकता है। कहलाता है। हां। कैसे होगा? देखिए एक गुरुकुल

01:06:08:26 में प्रवेश तो सबका हो गया। सबको अध्यापन कराया गया। उसके बावजूद कुछ बच्चे ऐसे निकल जाते हैं जिनको कितना भी पढ़ा लो वो कुछ समझ ही नहीं पाते। तो जिसका उपनयन हो गया वो तो द्विज हो गया ना। वो शूद्र कैसे रहा? द्विज तो हो गया। हम दो जन्म तो हो सकता है। नहीं द्विज हो गया। द्विज हो गया। तो वो शूद्र कैसे रहा। और ये जरूरी नहीं है। शूद्र के तुल्य वो शूद्र के तुल्य हो गया। हां शूद्र के तुल्य हो गया। ठीक है। वो शूद्र के तुल्य हो गया। मगर वो रहेगा तो द्विजना। पहला अधिकार तो सबको मिला। हां रहेगा तो द्विजय ही। रहेगा तो द्विज रहेगा द्विज रहेगा पर अब उसको वेदों का ज्ञान नहीं समझ में आ पाएगा मतलब कि कहने का यह है कि जो व्यक्ति द्विज हो गया तो यहां पर ईश्वर ने किस शूद्र की बात की है कि वो जो है उसको जो है मैं वेद दे रहा हूं क्योंकि जो द्विज हो गया हां वही वेदों में अधिकारी है और जो शूद्र रह गया जो द्विज नहीं हो पाया वो वेदों का अधिकारी नहीं है। तो जब प्रारंभ में देखिए जब उपनयन संस्कार मिला तो तुरंत वेदों का अध्ययन का सबसे पहले तो गायत्री मंत्र का ही उपदेश देते हैं। अन्य चीजों का उपदेश तो जो उपनयन जो उपनयन हम कराते हैं वह बिना देखे कराते हैं कि इसकी बुद्धि कैसी है जैसे कर्मों से होता है ना कि ब्राह्मण कौन बनेगा तो क्या हम बिना देखे कराते क्योंकि वो तो शूद्र है नहीं हम लोग बिना देखे नहीं कराते हैं हम जब बच्चियों का प्रवेश लेते हैं तो कम से कम एक वर्ष तक हम पहले उसको देखते हैं तो इसका मतलब प्रारंभ में नहीं

01:07:23:27 मिला प्रारंभ हमें नहीं देते यानी कि जो शूद्र है उसको आप शूद्र ही रहने देते हो शूद्र ही क्या रहने देते बनाने का कोशिश करते हैं बनाने की कोशिश करते हैं उसको उपनयन नहीं देते हैं उपनयन नहीं देते तो जब नहीं देते तो फिर उसको वेद कैसे मिला वो उसके मतलब जब तक हम लोग उसकी संध्या इत्यादि नहीं उसको स्मरण हो जाता है जब तक हम उसके व्यवहारों को नहीं देखते हैं कि वो इन चीजों को ग्रहण करने लायक है तब तक हम उसको यज्ञपवित नहीं देते हैं और उसके बाद वो बच्चे चले भी जाते हैं। तो इसका मतलब यही हुआ ना कि जो शूद्र रह गया उसको यज्ञपवित नहीं मिला। उसको वेदवाणी नहीं मिली। कई बार ऐसा जरूरी नहीं है जी। कि शूद्र का मतलब क्या हुआ कि यदि आप कर्मणा में आ गए तो कर्मणा से आप छोड़ दीजिए किंतु हां यदि सामान्य रूप से यदि वो नहीं कर पाया तो उसका हमने नहीं दिया हम ये नहीं कह सकते हैं उसकी क्षमता ही नहीं रही कि वो ग्रहण कर पाए और वो उसका छूट गया जैसे क्या है भाई परमेश्वर सूर्य का प्रकाश सबको दे रहा है तो वो शूद्र ही रहा ना अंतत तो गतत्वा अंतत गत तक वो शूद्र ही रहेगा तो शूद्र को वेदवाणी नहीं मिली ना परमेश्वर ने अपनी तरफ से सबके लिए दिया तो उसको क्यों नहीं मिली फिर उसको नहीं मिली मिली जो उसके लायक जहां तक थी वो उसको मिली उसके क्योंकि वेदों में हर प्रकार के कर्तव्य यानी कि यानी कि उसको किस रूप में मिली फिर वेदवाणी उसको इस रूप में मिली जो उसके जैसे सत्यार्थ प्रकाश सत्यार्थ

01:08:39:08 प्रकाश जो भाष्य हैं इसके रूप में मिल गई सत्यार्थ प्रकाश के रूप नहीं वेदों में भी कई ऐसे मंत्र हैं जो उनके लिए क्या शिक्षा है हम जैसे शिल्प विद्या हो गई अन्य कार्य हो गए नहीं नहीं जैसे यज्ञपवीत के बाद हम पठनपाठन कर पाते हैं ना वो चीज उसको मिली कि नहीं मिली क्योंकि हमने इस मंत्र का अर्थ ये लिया है कि पठनपाठन कर सकता है हां हमने इस मंत्र का अर्थ यही लिया है कि वो पठनपाठन कर सकता है। मगर हम क्या कर रहे हैं? एक सामान्य ज्ञान होता है। एक विशिष्ट ज्ञान होता है। यदि वो सामान्य ज्ञान को कर गया संध्या इत्यादि तक अनुशासन में वो रह गया तो हम उसको उपनयन संस्कार देते हैं। उतना ही उसको ज्ञान मिला। हमने संध्या का प्रशिक्षण पहले देते हैं। हां पहले संध्या एक साल तक संध्या का प्रशिक्षण चलता है। उसको प्रातः काल उठने का अभ्यास हो। नियमित उसको संध्या के समय उपस्थित होने का अभ्यास हो। जी जब तक वो इस अभ्यास में नहीं हो जाता है तब तक हम उसको पवित्र नहीं देते नहीं देते नहीं देते क्योंकि फिर वो नियमों का पालन वो नहीं करते तो फिर वो शुद्ध रह गया ना पर सामान्य ज्ञान तो उसको मिलता ही रहा संध्या वेद के मंत्र सामान्य ज्ञान मिला वो ठीक मतलब वो पठनपाठन का अधिकारी बना कि नहीं बना अंत अधिकारी तो बना पर जितना उसको जितना उसके भाग्य में था जितनी उसकी क्षमता थी उतना उसने लिया मगर वो ऐसा अधिकार नहीं है कि वेद खोल के पढ़ने लगे और पढ़ाने लगे ऐसा अधिकार उसको नहीं मिला ही नहीं ले पाया वो हमारी तरफ से मना ही नहीं उसने नहीं लिया

01:09:54:19 वो नहीं ले पाए नहीं ले पाया क्योंकि क्योंकि वो उस लायक बन नहीं पाया हां इस कारण वो नहीं बन पाया हमारी तरफ से कुछ ऐसा यानी कि शूद्र प्रॉपर वेद के पठनपाठन से रह गया रह गया मगर भगवान तो कह रहे हैं कि शूद्र के लिए भी वेद वाणी है या तो देखिए इसमें क्या इसमें दिक्कत क्या हो रही है या तो ये मान लें कि जो वेद वाणी है वो अगर डायरेक्ट वेद ना पढ़ के जैसे आपके प्रवचन सुनकर के कोई हां है ना वो अपनी गति कर रहा है धर्म में गति कर रहा है उन चीजों को अगर इस रूप में ले ले तो तो चल जाएगा कि यह जो वेद वाणी है यह सबके लिए है। अब किसको किस रूप में प्राप्त हो किसी को वेद के रूप में किसी को आचार्य के प्रवचन के रूप में किसी को उपदेश के रूप में किसी को भाष्य के रूप में तब तो ठीक है। मगर हमने कह दिया कि वेद वाणी एज इट इज जो है मंत्र और वो चारों के लिए है तो वहां पे दिक्कत ये आएगी कि जो जो है जिसका यज्ञ पवित हो गया वही वेद पढ़ेगा और अगर शूद्र का यज्ञपवित हो गया तो वो द्विज हो गया। जैसे वध्या पुत्र पुत्र हो गया तो वध्या नहीं रह गई और अगर वध्या है तो उसके पुत्र नहीं हो सकता। तो जो शूद्र है उसके लिए तो वेदवाणी है ही नहीं। तो हम इस मंत्र का अर्थ ये नहीं मान सकते कि वेदों का पठनपाठन एज इट इज सबके लिए है। इस इस मंत्र का अर्थ नहीं मान सकते। सुनिए आप चीज ध्यान से देखिए। जैसे सूर्य है। सूर्य का प्रकाश सबके लिए है। जी। परमेश्वर ने कहा कि मैंने सूर्य का प्रकाश सबके लिए दिया है। जी।

01:11:09:20 ठीक है। किंतु यदि कोई व्यक्ति प्रातः काल वो अपना सोया ही पड़ा है। वो सूर्य का प्रकाश नहीं ले रहा है। बंद कमरे भी दिन भर तो एक अलग बात हो गई। हमने कहा कि यह जो मंत्र है यजुर्वेद 26 दो इसका अर्थ कह रहे तो परमेश्वर ने तो अपनी तरफ से कहा कि मैंने सबके लिए नहीं मैं प्रश्न दूसरा कर रहा हूं आचार्य जी कि यजुर्वेद 26 दो का जो अर्थ ये हम कर रहे हैं कि नहीं वेद वाणी एज इट इज सबके लिए है वो ना लेकर के ये कहना चाहिए कि जिस रूप में जिस जिस जो जिसके योग्य है वेद का अर्थ आप जान लीजिए हां उस रूप में वो वेद वाणी सबके लिए तब तो ये हो जाएगा कि शूद्र जाकर के आचार्यों के प्रवचन सुन लेगा और जो द्विज हो जाएंगे वो डायरेक्ट वेद का पठन पठन कर लेंगे और ब्राह्मण पठनपाठन दोनों कर लेंगे। है ना? तब तो ये हो जाएगा। कर सकते हैं। जी जी वेद का ज्ञान सबको में है। वेद का अर्थ है ज्ञान। ज्ञान हमने जो वेदों के माध्यम यह नहीं मानना चाहिए कि नहीं वेद का ज्ञान वेद के ही रूप में सबके लिए है। वेद का ज्ञान किसी के लिए आचार्य की वाणी के रूप में किसी के लिए उपदेश के रूप में के रूप में है। तो ये हमको समझ में आया कि 26 दो का मंत्र का अर्थ जो है हमें ये नहीं लेना चाहिए कि एज इट इज बस वेद के ही रूप में वो वाणी सबके लिए है। किसी के लिए वो वेद के भाष्य के रूप में किस रूप में उसको मतलब जिसके जो जिसके योग्य है वो उसके लिए तब तो ये सेट हो जाएगा कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य कुछ लोग आचार्यों का प्रवचन सुन लेंगे। कुछ लोग जाके पठन

01:12:24:28 आचार्य प्रवचन भी सुन रहा है तो वेदों के ही मंत्रों का प्रवचन सुन बिल्कुल उसी का भाष्य सुन रहा है जी बिल्कुल और फिर जब उसको ग्रहण करके यदि उस योग्य बन जाएगा तो फिर डायरेक्ट वो वेद का अध्ययन कर लेगा तो नहीं करेगा तो ये बात तो क्लियर हो गई अब एक हम शुरू से ये लेकर के चल रहे हैं आचार्य जी बस ये आखिरी विषय है लास्ट होगा मुझे लगता है आप आपका भी थोड़ा मेरे को कोई नहीं हम लोग को अच्छा हां वक्ता हैं आप तो मर्मज्ञ हैं जी जी कोई दिक्कत नहीं तो एक अंतिम विषय ये है कि जैसे हमने कहा कि वेद जो है सृष्टि के प्रारंभ में प्रकट होते हैं अंतःकरण में ऋषियों के और ऋषि उन्हें अनुभूति करके पहचान लेते हैं कि ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है इसलिए ये वेद है है ना हम तो ये जो ऋषियों से और आर्य समाज तक स्वामी दयानंद जी तक ये वेद कैसे आते हैं किस प्रकार से आते हैं श्रुति परंपरा से परंपरा मतलब गुरु ने अपने शिष्य को बताया उन्होंने अपने शिष्यों को पढ़ाया उन्होंने अपने शिष्यों को बताया तो इस तरह से फिर बाद में तो जहां तक आते आने से पहले तक तो लिपिबद्ध भी हो चुके थे वो। नहीं तो लिपिबद्ध में भी एक आवश्यकता है ना गुरु की कि वो जो है सत्यापन करें। सत्यापन करे। बिल्कुल नहीं तो फिर तो कोई भी वेद के नाम से कोई कुरान भी कई लोगों ने कर ही दिया। उसमें तो ये स्वामी दयानंद जी के पीछे की परंपरा क्या है थोड़ी सी कुछ

01:13:40:00 पीछे के आचार्यों की? स्वामी दयानंद जी के पीछे की मतलब स्वामी दयानंद जी स्वयं ही शुक्ल यजुर्वेदीय उसमें हुए थे। कुल में हुए थे। जी जी है ना? महर्षि दयानंद सरस्वती जी जो हुए जी तो वो जिस कुल में जन्म लिया था उन्होंने वो वस्तुतः शुक्ल यजुर्वेद के परिवार में ही वो हुए थे और उसी के ही तो शुक्ल यजुर्वेद उनको उनके परिवार से मिल गया। हां वो उनके परिवार से मिला किंतु जिस समय मिला तो उस समय तक उनको उस रूप में उसका ज्ञान नहीं था। उनको जो ज्ञान प्राप्त हुआ वेदों का वस्तुतः वो नहीं स्वामी गुरुवर जी के माध्यम से ही अभी हम केवल जो है ये मंत्र कैसे आए हां इस बात हां तो तो वहां तक थे ही शुक्ल यजुर्वेद तो घर से प्राप्त हुआ बाकी के जो वेद है जैसे अथर्व दंड स्वामी गुरुवर विजानंद जी उनसे भी हां उनसे उनको प्राप्त हुआ तो फिर उनके पीछे की परंपरा अच्छा ये जो शुक्ल यजुर्वेद की परंपरा है जो इसमें तो बताया जाता है कि जो उनके घर वाले थे हां वो शिवलिंग की पूजा करते थे। हां सर उस समय तक तो यह मूर्ति पूजा यानी कि उनके यहां के जो आचार्य थे वो शिवलिंग की पूजा करते थे

01:14:55:10 और उनसे उन्हीं आचार्य से इनको जो है शुक्ल यजुर्वेद के मंत्र मिले। मंत्र तक तो उनको नहीं मिल पाए। तो कैसे मिले? बस वो उस परंपरा से थे। वेदों का अध्ययन अध्यापन उनके यहां चल नहीं रहा था। नहीं तो फिर मंत्र वहां से नहीं मिले। जी उनसे ही मिले उनको तो फिर बृजानंद जी के पीछे के गुरु स्वामी पूर्णानंद जी थे उनके पीछे के अब उनके पीछे तक का तो हमें उतना नहीं जाना है पर पूर्णानंद जी ये असल में ये क्या है कि ये वाला एक बहुत प्रश्न प्रासंगिक है हां कि जैसे कि हम कहते हैं कि जो हम ऋषियों ने कहा है वो हम बता रहे हैं। हां मगर क्या होता है कि स्वामी दयानंद जी के पीछे विजानंद जी और विजानंद जी के पीछे पूर्णानंद जी इससे पीछे हार्डली शायद एक आध नाम और हम बता पाए बाकी हमारी जो गति है यहां तक कि हजार वर्ष का भी इतिहास हमें प्राप्त नहीं नहीं प्राप्त होता है और उसमें भी अब उसमें दिक्कत ये आती है कि ऋषियों ने जो कहा था वो तो कई बहुत प्राचीन समय में कहा था जो मंत्र दिए थे हम तो फिर वहां पर प्रामाणिकता पे एक संशय उत्पन्न हो जाता है कि जो ऋषियों ने कहा है अगर हमारे पास वो चैन नहीं है ऋषियों से जुड़ने वाली या कम से कम पीछे की कुछ 810 पीढ़ियां वो नहीं है। तो हम यह कैसे माने कि ऋषियों ने जैसे कई जगह हमने अलंकार ले लिया जैसे कि नाना रूपों में प्रकट होता है तो यहां अलंकार है।

01:16:10:12 तो यहां पे क्या है कि जैसे अलंकार में क्या है कि यानी कि हमने अपने गुरु से जो उस मंत्र को लिया साथ में उस भाव को भी समझा। अब ये जो भाव है ये तो लिपिबद्ध है नहीं। ये तो गुरु अपने शिष्य को समझा रहा है। तो ये भाव के उसमें संशय उत्पन्न हो सकता है कि अह जब हम मंत्र हमारे जो क्लियर नहीं है कि किस परंपरा से हमारे पास तक आ रहे हैं तो हम यह कैसे कह सकते हैं कि जहां पे हम भाव दे रहे हैं अपना कि भाई यहां पे पृथ्वी के लिए कहा गया है कि नाना रूपों में प्रकट हो रहा है तो उस पे एक संशय उत्पन्न हो जाता है कि वो पीछे की चैन ऑफ नरेशन क्योंकि हमारे पास नहीं तो हम उसमें भी मतलब उस समय तक भी वेद जो हैं जैसा कि हम लोगों ने जो भी अध्ययन किया और जो जाना है जी तो उस समय मतलब कहते हैं कि मतलब उस समय वेद भारत में उपलब्ध ही नहीं थे और लोगों ने जब प्रश्न प्रश्न किया कि भाई कि वेद है कहां? इतना तो पता पड़ रहा है परंपरा है। वो जान रहे हैं कि भाई वेदों में ये बातें कही गई हैं। तो लोगों ने कहा कि वेदों को तो शंखासुर ले चला गया। तो वो तो फिर उसके बाद बहुत ढूंढने पर फिर पता पड़ा कई राजाओं से संपर्क किया। अन्यों से संपर्क किया। कई वो केवल स्वामी वीरान दंड स्वामी गुरुवर विजानंद जी के पास ही उन्होंने अध्ययन नहीं किया। उन्होंने अनेक जो अन्य परंपरा के जो गुरुजन थे उनके पास भी वो

01:17:25:13 जाते रहे। उनसे वेद वगैरह उनसे भी उन्होंने प्राप्त किया। फिर उनको पता पड़ा कि जर्मन में वेद उपलब्ध हो रहे थे। तो जर्मनी से वेद आए। तो जर्मन से उस समय फिर वेद मंगाए गए। तो इसमें दिक्कत ये आती है ना कि जैसे हम हम जैसे जर्मनी से वेद आए हम तो हमने जर्मनी से उसने क्या ला के दिया? हम हमें तो वेद मालूम नहीं है क्या है। उसके अंदर क्या लिखा है। क्योंकि हम तो वेद खोलने से पहले वेद से अनजान है ना। तो जर्मनी से जब वेद आए तो हमने यह सत्यापन कैसे किया कि यह वेद ही है। हमें किसी पूर्वाचार्य के पास जाना पड़ेगा। कि भाई ये वेदी बिल्कुल तो उस समय कई पूर्वाचार्य थे। अब दिक्कत ये है उसमें समस्या यह है कि जो कई अन्य पूर्वाचार्य हैं जैसे मान लीजिए कि रामानुजाचार्य परंपरा या शंकरा यही सब पूर्वाचार्य हैं। तो हम यदि इनके पास जाके सत्यापित करा रहे हैं कि भाई मैं ये वेद जर्मन से आए हैं। क्या वेद ही हैं? नहीं तो उन लोगों से नहीं। अब उसके बाद जैसे वेद तो जर्मन से आए। ठीक है। फिर विजानंद जी से कराएंगे। जर्मन से वेद आए। किंतु निरुक्त हम ब्राह्मण ग्रंथ इत्यादि जब ग्रंथों का अध्ययन किया और उनके साथ जब उनका मेल किया गया तो वो चीजें उपलब्ध होती चली गई तो उससे वो सत्यापित भी होती चली गई तो महर्षि आस्क निरुक्त जैसे फिर इसमें दिक्कत ये आती है कि यानी कि वेद को पढ़ने से पहले हमें मालूम होना चाहिए कि

01:18:40:16 वेद में क्या है कैसे पता लगेगा हां तो ये सब स्वामी ये इनकी परंपराएं इनसे मालूम हुआ अब यह जो विधि है यह जो विधि है कि इससे मालूम पड़ेगा कि वेद वेद हां है ना? यह वाली विधि भी हमें किसी पूर्वाचार्य से लेनी पड़ेगी ना। हां। तो अब वो तो परंपरा है। उनको मालूम हो परंपरा से। बिलकुल परंपरा वही बात है कि वहां परंपरा में एक प्रासंगिक प्रश्न अटक जाता है कि विजानंद जी के पीछे पूर्ण जी के पीछे कुछ क्लियर नहीं होगा मगर वो ज्ञात नहीं है। जी और फिर तो ये ये थोड़ा सा एक कुछ एक प्रश्न है जो कि बाकी रह जाता है कि पीछे की परंपरा नहीं है ना तो हम ये दावा कैसे कर सकते हैं कि जो उन्होंने कहा था वही हम कह रहे हैं। ये क्यों नहीं कर सकते हैं? क्योंकि जब निरुक्त इत्यादि ग्रंथों में जब हमें चीजें उपलब्ध होने लग गई। मगर वह निरुक्त इत्यादि जिनसे हमें प्राप्त हुए हैं हां उनप हमें 100% भरोसा नहीं है कि यह सत्य बोलते हैं। क्यों? केवल भारत में जो पुस्तकालय थे इतने बड़े-बड़े उन सब में फिर चीजें उपलब्ध हुई। मूल वेद नहीं उपलब्ध हो रहे थे। किंतु अन्य ग्रंथ उपलब्ध हुए। अन्य ग्रंथ जो जैसे अन्य ग्रंथ भी उपलब्ध मान लीजिए निरुक्त उपलब्ध हुआ। हां। अगर उसमें हम किसी पूर्वाचार्य को अपना सत्यापन नहीं करवाएंगे। नहीं देखिए निरुक्त में हमें उपलब्ध हुआ। और जब मूल वेदों का जर्मन में जब वह उपलब्ध हुए हम तो फिर जब उनका मिलान किया गया तब तो फिर पता पड़ गया कि हां भाई वही

01:19:55:18 वेद ही है ये नहीं तो यह निरुक्त को हमने निरुक्त कैसे माना किसी पूर्वाचार्य से तो हमें वो लगता कि वो तो फिर परंपराएं चल रहे हैं। अब यहीं पे परंपरा थोड़ी ना समाप्त हो गई है। कहीं ना कहीं तो लोग एक वो मतलब वो होगी मगर हमें पता नहीं है क्या है। कितने लोग थे अब जब वो शास्त्रार्थ हुए हैं महर्षि दयानंद सरस्वती जी के साथ तो लोगों ने जो वेद ला के रखे तो उसमें कुछ ये तो उस समय जो इतने सारे विद्वान थे तो कहीं ना कहीं से तो चीजें चली आ ही रही थी मगर ऐसे कहीं ना कहीं को हम प्रमाण नहीं मान सकते ना दिक्कत ये है हां ये बात हो सकती है पर फिर भी जब सब चीजों को जब एक साथ मिलान किया गया श्रोत सूत्र हैं निरुक्त हैं ब्राह्मण ग्रंथ हैं उन सब में आने वाली चीजें और फिर जब उसके बाद अब ये जैसे अपने सायन का भाष्य हुआ उवट महधर के भाष्य हुए तो उनमें वही मंत्र मिल रहे हैं जो जर्मन से आए तो वेद मंत्र तो वही हुए नहीं उसमें दिक्कत ये है कि शायन और उबट हमारे प्रमाण नहीं है। आर्य समाज के अनुसार प्रमाण नहीं है। क्यों नहीं है प्रमाण? हम् क्योंकि उनकी चीजों पे हमें विश्वास नहीं है। वह जो अर्थ दे रहे हैं उसप हमें विश्वास नहीं है। नहीं अर्थ पे विश्वास नहीं है। यह नहीं कहते हम लोग किंतु कई स्थलों पर ऐसा हो जाता है जो प्रकरण से भिन्न हो जाता है। तो विश्वास नहीं है ना? उसको हम विश्वास

01:21:10:26 हम ये मान रहे हैं ना कि शायण और उबट जो है या महिर जो हैं ये गलतियां कर रहे हैं। ये जो नहीं है वो बोल रहे हैं। प्रकरण से भिन्न हो जाता है। जैसे आपने कहा शब्द शब्द सुनकर के ही उसका अर्थ होता है। मैं समझ गया। मैं समझ गया। तो अभी बीच में एक बाधा आ गई थी जो मोबाइल जो कैमरे से रिकॉर्ड हो रहा था उसकी मेमोरी कार्ड फुल हो गया था तो अभी ये जो आप देख रहे हैं ये मोबाइल से शूट हो रहा है उसकी मेमोरी फुल हो चुकी है। अह जो विषय हमारा चल रहा था परंपरा तो हां आचार्य जी इतना हम मान सकते हैं। मतलब कुल मिलाकर के हम यह कह सकते हैं कि भाई आया होगा परंपरा से पर अब अभी स्पष्ट नहीं है कि वह परंपरा क्या थी। है ना? नहीं पर वह भी वो एक वैदिक तो थे ही तो वैदिक परंपरा तो विद्यमान ही थी। आर्य समाज तो उसके बाद उद्भाषित शब्द दिया गया तो वेदों में था ही। मगर उसमें यह है ना कि जब हमारे पूर्वाचार्य जो हैं उन पर हमें बिलीव नहीं है। हम और जो जिन पर हमें बिलीव है उनका हमारे पास कोई विवरण नहीं है। नहीं हम ये नहीं कह सकते कि उन पर हमें बिलीव नहीं है। और बाकी ठीक है। निरुक्ति इत्यादि के अनुसार कहीं पर जैसे कुछ चीजें गलत लगती हैं तो जब तक यदि हमें वो

01:22:26:21 तो वो तो अर्ध कुकुट न्याय हो गया ना। जैसे हमारे पूर्वाचार्य ने यदि ये कहा है कि यह वेद है तो वो एक पूर्वाचार्य कोई ना कोई हमारा शब्द प्रमाण हो जाता है। हम अगर उस पे हमें बिलीव है कि धर्म की व्याख्या में तोड़ मरोड़ नहीं कर सकता। तब तो उसकी धर्म की व्याख्या पे हमें बिलीव है। हम अगर वो तोड़ मरोड़ कर सकता है अज्ञानता वश या जानबूझकर लोभवश, मोह वश अगर वो कर सकता है तो वो वेद के मंत्रों में भी तो गलत कर सकता है। ये दिक्कत आएगी। वेद के मंत्रों में गलत नहीं कर सकता है। एक शब्द के अनेक अर्थ होने के कारण से कुछ इस प्रकार की भ्रांतियां हुई। नहीं जैसे उन्होंने अपने गुरु से वेद का मंत्र भी लिया है और अर्थ भी लिया है। फिर वो आपको दे रहे हैं। गुरु परंपरा से दोनों चीजें आ रही हैं। है ना? तो उन्होंने अर्थ भी लिया है तो उसमें अर्थ में वो छेड़छाड़ यदि कर रहे हैं क्योंकि आपके अनुसार कि जो पीछे से अर्थ दिया गया था इन्होंने बदला है। हां अर्थ नहीं बदला है। अर्थ को जो है वह निरुक्त इत्यादि के अनुसार उसको संशोधित किया है। नहीं नहीं जिस जिस पूर्वाचार्य से हमने वेद लेना मान रहे किसी भी पूर्वाचार्य को मान लेते हैं। फॉर एग्जांपल शायण को ही मान लिया कि उनसे ही हमने वेद लिया है। अब हम ये कह रहे हैं कि इनके पूर्वाचार्यों ने जो इनको मंत्र दिए थे ये तो इन्होंने एज इट इज़ दिए हैं। हां। मगर जो वेद का अर्थ दिया था

01:23:42:09 मंत्रों के अर्थ दिए थे वो शणाचार्य ने एज इट इज़ नहीं दिए। उसमें थोड़ा सा। हां। उसमें कुछ हो सकता है। देखिए मूल चीज में वही रह सकती है। जैसे कोई एक श्लोक आपने लिया तो श्लोक तो तद्वत रह गया और हर उसको व्याख्या करने वाला अपने अनुसार उसको अलग-अलग उसमें दिक्कत ये आएगी ना कि शायण आचार्य पे यदि हम प्रमाण बुद्धि नहीं लगा रहे हैं कि कि ये जो दे रहे हैं उसमें मिलावट नहीं कर रहे हैं। हां तो अगर हम प्रमाण बुद्धि से शयनाचार्य को नहीं ले रहे हैं तो फिर ये भी तो सोच सकते हैं कि हो सकता है कि इनसे मंत्र में भी कुछ मिलावट हो गई। मंत्र में मिलावट इसलिए नहीं मान सकते हैं क्योंकि उसके जो अष्ट विकृति पाठ हैं वो हमें तद्वत उपलब्ध हुए। तो मंत्र तो तद्वत है। मतलब क्योंकि हमें अष्टा विकृति की विधि प्राप्त है। इसलिए हम ये मानते हैं और उसके अनुसार वो मंत्र सेट हो जाते हैं। तो इसलिए मंत्रों में कहीं पे गड़बड़ी नहीं है। अब अब दिक्कत ये आ जाएगी कि अष्टा विकृति हमें किससे प्राप्त हुई है? वो परंपरा वो केवल आर्य समाज से नहीं चली आ रही है। वो तो पूर्ण वैदिक परंपरा से चली आ रही है। उस विकृति के लिए भी तो किसी ना किसी पूर्वाचार्य पर हमें निर्भर होना होगा ना। कि ये जो है सच बोलता है। तो किस पे निर्भर किसी एक पर नहीं वो तो तो किस पर निर्भर है? किसी एक को तो हमें मानना पड़ेगा ना कि हमने इससे लिया। अब वो विकृति पाठ तो वही श्रवण परंपरा से

01:24:57:13 चले आ रहे हैं। कई ठीक है वो आ गया। मगर हमें किसी ना किसी के ऊपर बिलीव दिखाना पड़ेगा ना कि मुझे इस पर विश्वास है। ये जो है टस से मस नहीं करता है। इसने जो अष्टाविकृति की बात बताई है वेदों को पहचानने के लिए या निरुक्त इत्यादि व्याकरण इत्यादि के सिद्धांत दिए हैं वेद को पहचानने के लिए या फिर वेद ही दिए हैं। तीनों में से कोई भी चीज मान लीजिए। मगर यह जो है झूठ नहीं बोलता है। इसने जो पूर्वाचार्य से लिया जो वेद प्रकाशित रूप में जो उपलब्ध हुए और उनमें जो अष्टविकृतियां हमें मतलब उपलब्ध हुई और उनके अनुसार जो मिले नहीं अष्टाविकृति की प्रामाणिकता के लिए भी तो हमें पूर्वाचार पे निर्भर रहना होगा। हां वो तो बिल्कुल रहना ही पड़ेगा। फिर वहां पर वही एक परंपरा की बात आ जाएगी। उस समय तो यह वो एक संशय बना जर्मन का जो पुस्तकालय था वहां की जो लाइब्रेरी थी वहां पर वो उपलब्ध थे। नहीं तो हमें कैसे पता कि ये वेदों को जानने के लिए अष्टाविकृति पाठ है? वो शास्त्र गुरु से ही मालूम वो गुरुचरों से ही मालूम वही मैं कह रहा हूं गुरु परंपरा पे हमें निर्भर होना ही पड़ेगा यह तो गुरु परंपरा पे ही निर्भर होना पड़ेगा वो बात अलग है कि अभी आर्य समाज की जो गुरु परंपरा स्पष्ट है उसको लेकर के थोड़ा सा संशय आर्य समाज का तो संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती जी ही उनके पीछे उनके पीछे पर उनके पीछे जहां से जो परंपराएं चलती चली आई तो फिर वो उसमें तो है तो ये था हमारा एक कहेंगे कि

01:26:12:19 एक विस्तृत चर्चा हुई है बहुत सारे विषयों पे धर्म ब्रह्म से संबंधित और आप लोगों को कैसी लगी और मैं एक बार दोबारा से धन्यवाद प्रदान धन्यवाद देता हूं आपको साधुवाद आचार्य जी ने बहुत सारा समय दिया और काफी सारे विषयों पर हमने जो है बात की है जिसमें हमें अनेक प्रकार से स्पष्टता प्राप्त हुई है चीजों को समझने में तथ्यात्मक तरीके से और ये इस विद्यालय का भी अभी हम भ्रमण करेंगे हम कहां पर हैं और यहां पर आसपास अष्टाध्याय के सूत्र भी लिखे हुए हैं। मेरे पीछे एक बालिका के द्वारा लिखा हुआ जो है 55 555 प्रणव हैं जो यहां पर लिखे हुए हैं एक बालिका के द्वारा और यहां पर बहुत सी ऐसी चीजें हैं जिससे यह ज्ञात होता है कि यह जगह कोई साधारण जगह नहीं है। ये कोई साधारण स्थान नहीं है। यहां पे विद्वान रहते हैं और हमारे साथ कोई साधारण मातृशक्ति नहीं है। एक विदुषी मातृशक्ति बैठी हुई है आर्य समाज की ओर से जिनके साथ अभी हमने इतनी देर आप चर्चा की और आपने उस चर्चा का लाभ उठाया तो कैसी लगी? बहुत-ब धन्यवाद जी कि आपने अनेक विषयों को यहां पर पूर्वाग्रह रहित होकर

01:27:27:20 के और इन विषयों के प्रति चर्चा हुई तो इसके लिए मैं आपका भी सदुवाद करना चाहूंगी। तो कैसी लगी आप लोगों को ये चर्चा? आप लोग अवश्य बताएं और आगामी चर्चा किससे किसके साथ आप देखना चाहते हैं वह भी हमें बताएं। जय श्री राम सभी को। [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 1:28:08 · 15 May 2026

अवतार लक्षण पर निर्णायक चर्चा | प्राचार्या महर्षि पाणिनि कन्या महाविद्यालय वाराणसी

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