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00:00:01:28 [घंटी की आवाज़] जय श्री राम सभी को। हम इस समय काशी में हैं। आप जानते हैं अभी-अभी श्रीमद जगुरु शंकराचार्य पुरी पीठाधीश्वर जी का यहां पर प्रवास था। राष्ट्र अच्छा शिविर था और वह पूर्ण हुआ और गुरुदेव ने अभी होशियारपुर के लिए प्रस्थान किया है और हम इस समय सानिध्य में हैं काशी रत्न वाचस्पति डॉक्टर दिव्य स्वरूप ब्रह्मचारी गुरु जी जिन्हें हम जटा गुरु जी के नाम से भी जानते हैं और काशी के बहुत प्रतिष्ठित विद्वान कहलाए जाते हैं हमारे गुरु जी तो गुरु जी आपके चरणों में प्रणाम आज हम गुरु जी से थोड़ा सा कुछ धर्म और अध्यात्म विषयक मार्गदर्शन प्राप्त करने वाले हैं। गुरु जी थोड़ा सा यह जो हमारा संस्थान है इससे थोड़ा सा हमारे दर्शकों को आप परिचय करवा दें तो ये करपात्रिधान संस्थान जो आपका संपूर्णानंद विश्वविद्यालय जी जी जी संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय जिसको पूर्व में वाराणसी संस्कृत विश्वविद्यालय उसके पूर्व मेंस कॉलेज
00:01:17:13 का एक विभाग होता है ये 1800 से पूर्व इस विश्वविद्यालय महाविद्यालय की संस्थापना हुई। फिर क्रमेन यहां जब कांग्रेस की सरकार थी संपूर्णानंद जी कुलपति यहां [गला साफ़ करने की आवाज़] मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने वाराणसी संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना की। उनके शरीर ना रहने पर उनके नाम से फिर बाद में नाम रख दिया गया संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय। जिस विश्वविद्यालय में प्राच्य विद्याओं का संरक्षण और संवर्धन के लिए यह विश्वविद्यालय समर्पित है। इसमें अनेक विभाग हैं। अनेक शंकाएं हैं। तो वेद वेदांग संकाएं के अंतर्गत व्याकरण विभाग है। उस व्याकरण विभाग में दो विषय हैं। नव्य व्याकरण और प्राचीन व्याकरण। दोनों का मूल 14 सूत्र ही है। दोनों का व्याख्या अठाध्याय ही है। फिर भी एक का नाम है नव्य और एक का नाम है प्राचीन। यह प्रतिपाद्य विषय के भेद से भेद नहीं है। प्रतिपादन शैली के भेद से भेद है। ढंग बताने के जो ढंग बदल गए। पहले
00:02:32:16 अष्टाध्यायी क्रम के याद करके पूरा करने के बाद पढ़ पाते थे बच्चे। तो भट्टो ऋतु को लगा कुछ कष्ट होगा इनको पढ़ने में। इसलिए उन्होंने क्या किया? जितना प्रयोग था उस प्रयोग के अनुसार उन्होंने सूत्रों को अध्याय में एक जगह रख दिया। इसी को व्याकरण में बोलते हैं लक्ष्य, लक्षणम व्याकरण। व्याकरण का जो स्वरूप है लक्ष्य और लक्षण व्याकरण भाष्यकार ने कहा। लक्ष्य माने होता है प्रयोग। लक्षण माने होते हैं सूत्र। इन प्रयोग और सूत्रों का जो समवेत स्वरूप है, एकत्रीकरण जो स्वरूप है, वही हमारा क्या है? व्याकरण है तो जो प्राचीन व्याकरण है वह लक्षण क्रम से बना हुआ है। जो नव व्याकरण है वह प्रयोग क्रम से बना है। जैसे जैसे छात्रों की मंदता को देखते हुए उन्होंने क्या किया कि जब फल प्रयोजन मनदेश मंदो न प्रवते बिना प्रयोजन के मंद व्यक्ति भी नहीं प्रवृत्त होता तो तुरंत अब आठ अध्याय याद करना 4000 सूत्र और यदि पांच सूत्र याद करके प्रयोग बन जाए तो क्या होता है कर्लीकरण इसको बोलते हैं आज उसके कारण क्या है प्रवृत्ति होगी इसी प्रवृत्ति को बुद्धि में रखते हुए
00:03:48:04 यह नव्य व्याकरण का आविष्कार हुआ। उस नव व्याकरण के फिर अनेक उनकी जो पद्धतियां है, उनकी जो शैली और नव्य में उनके परिष्कार हैं। इसलिए भी उसका नाम क्या पड़ा गया? नव्य व्याकरण। तो व्याकरण का नव व्याकरण और प्राचीन व्याकरण ये दो भेद हैं। जी बहुत सुंदर गुरु जी ने बताया अपने बारे में। गुरु जी एक कि ये हमारी जो षष्ठी निर्माण के विषय में एक प्रश्न आता है। जी उसमें कई बार ऐसा होता है कि विराट पुरुष से ही ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य की उत्पत्ति हुई है। जी फिर कहीं पर आता है कि पहले मनु हुए या कहीं पर आ रहा है कि ऋषियों से विस्तार हुआ है सृष्टि का। कहीं पर ऋषभदेव जी से भी या तो क्या ऐसा है कि मनु का ही जो पात्र है वह कहीं पर ऋषभदेव जैसे कहला रहा है या ब्रह्मा जी कहला रहा है या इसमें थोड़ा संशय बना हुआ है क्या क्रम है सृष्टि का देखिए जो हम लोग दार्शनिक जो धरातल है जी हमारे उपनिषदों में सृष्टि क्रम अनेक प्रकार सुने जाते हैं। कहीं लिखा था इदम सर्वम असजत एक काल में ही भगवान ने सब कुछ बना दिया। कोई क्रम नहीं इदम सर्वम असजत कहीं है तस्मात तस्मात आत्मना आकाश
00:05:03:22 संभता आकाशात वायु वायु अग्नि यह क्रम तैतरी में आता है कहीं आता है कि पहले सर्वप्रथम क्या है सदोग में आरंभ करके उन्होंने कहा इमास देवता पृथ्वी जल और तेल जी यह इसी को बोलते हैं त्रिविध यद्यपि उपनिषदों में पंचीकरण का उल्लेख नहीं उपलब्ध होता है। त्रिवधकरण का छंदोगों में उपलब्ध होता है। वह त्रिविध
00:05:39:25 के तृतीय ब्राह्मण में प्रथम अध्याय के चतुर्थ ब्राह्मण में वहां एक सृष्टि क्रम आया। जब प्रजापति को लेकर के उसमें प्रजापति ने सर्वप्रथम अपने को दो रूपों में विभक्त कर दिया। मन और सत्य रूपा के रूप अच्छा हां तो वह जो सृष्टि क्रम है फिर भगवत पाद दृष्टांत देते हैं भागवत के ग्रंथों के तक जो टीकाकार है आचार्य हैं वही जो भागवत वर्णन सत मनो सतूपा यह हमारे क्या है वेद मूलक है ये प्रसंग यह केवल वेदव्यास जी ने स्वतः नहीं कल्पित किया है। इसका मूल बृहदारणिक उपनिषद के प्रथम अध्याय के चतुर ब्राह्मण में उपलब्ध है। अब वहां पर जब दो रूपों में विभक्त किया तो वहां बड़ा प्रसंग हुआ कि एक शरीर से जन है जैसे भाई बहन की तरह उसमें बहुत बड़ा वहां शास्त्र आरंभ हुआ। उसके बाद जब उन्होंने कहा ऐसा होगा तो दोष लगेगा तुरंत वो वो बन गई और वो क्या बन गया? वृषभ बन गया। ऐसे क्रम से पूरी सृष्टि का क्रम वहां दिया गया। जैसेजैसे होता गया फिर वो अस्व बन गए, घोड़ी बन गए। ऐसे वहां क्रम से सृष्टि क्रम जीव क्योंकि वह जो मनुष्य योनि में तो यह नियम
00:06:55:03 है बाकी योनि के लिए नियम नहीं है। तो ऐसे बहुत विलक्षण वहां पर सुंदर प्रसंग द सृष्टि में परंतु जितना भी जो दार्शनिक धरातल है वो सात प्रकार का अर्थवाद है। यह सृष्टि भी एक अर्थवाद है। प्रलय भी एक अर्थवाद है। और क्या नाम? स्थिति भी अर्थवाद है। अंतर प्रवेश करना ये भी अर्थवाद है। ये सब के सब किसके अंतर्गत आते हैं? नियमन करना ये भी अर्थवाद है। क्योंकि एक से तो है ही नहीं तो क्या करना है? उसकी अर्थवाद का मतलब होता है अर्थवाद की दो प्रक्रिया है। एक अर्थवाद का मतलब होता है कि किसी व्यक्ति को प्रशंसा करा करके उसमें प्रवृत्ति करा देना। कहीं से निंदा करके निवृत्ति कराना। जैसे आजकाल कोई मान लीजिए काशी के विद्वान हो या मान लीजिए आप किसी बड़े महापुरुष के पास गए हो और जाने पर स्वाभाविक है जिसके पास जाते हैं उसके लिए दो शब्द बोले ही जाते हैं। प्रक्रिया है जी कोई भी आता है तो बोलना ही चाहिए। अब क्या होता है कि अधिक बोल देते हैं लोग। जब अधिक बोलते हैं तो लोग क्या सोचते हैं कि ये भाट गिरी कर रहे हैं। ऐसा शब्द का प्रयोग करते हैं। ये अत्यंत निंदनीय शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए। क्योंकि यहां जो विद्वान है या कोई
00:08:10:09 व्यक्ति उसकी यदि हम कहेंगे कि यह इतना बड़ा दानदाता है तो उसको यह होगा कि कम से कम लाख ना करके कम से कम 1000 तो दान करेगा ही विद्यार्थी के लिए जी तो इसमें त्रुटि का तात्पर्य जो अर्थवाद उनके स्वार्थ में तात्पर्य नहीं होता उसका तात्पर्य ये होता है कि प्रवृत्ति कराना बस जी उसमें जो हम कह रहे हैं इतनी बड़ी प्रशंसा की जा रही है इसमें तात्पर्य ही नहीं है इसमें तात्पर्य उसका केवल किस में तात्पर्य है कि यह व्यक्ति किसी प्रकार इस मार्ग में प्रवत्त हो जाए। जी एक साधक है कोई ब्राह्मण संध्या कर रहा है। मान लीजिए हम लोग कहेंगे नहीं कुछ कार्य जो नहीं संध्या कर्म करे 28 बार ही गाती जप कर लो तो उत्तराकरण के लिए बोल दिया इतने मात्र से ही उसके अन्य जगह से प्रवृत्त इतने ही तुम्हारा कल्याण हो जाएगा। जबकि यह तो कल्याण का एक छोटा सा एक प्रवेश है। परंतु कहा जाता है इसी से कल्याण हो जाएगा। परंतु ये और आगे इसको चलना है। तो ये जितनी बातें होती है तो उनको बहुत इसीलिए कहते हैं शास्त्र जरूर पढ़ना चाहिए व्यक्ति को। शास्त्र पढ़ने से दृष्टि प्राप्त होती है कि किस जगह पर बोली गई प्रशंसा हमारे लिए अच्छी है और किस जगह पर बोली गई प्रशंसा गलत है। उसी प्रकार कुछ ऐसी चीजें होती है। कोई गलत
00:09:25:20 विधान है। ऐसा करोगे तुम्हारा नरक में चले जाओगे। ऐसा कह दिया तो उसके तात्पर्य नरक में जाने का तात्पर्य नहीं। उसकी इतना आंदा कि उसे व्यक्ति निवृत्त हो जाए। उसी प्रकार जो सृष्टि का तात्पर्य स्वार्थ में नहीं है। सृष्टि का तात्पर्य है लक्षार्थ जो ये संपूर्ण सृष्टि का आधार स्तंभ आत्म तत्व है। उसकी प्राप्ति में आनंद की प्राप्ति में है। इसलिए सृष्टि में अलग-अलग हमारे उपनिषदों में अलग-अलग वाक्य प्राप्त होते हैं। उनमें आपस में उनका स्वार्थ में तात्पर्य हो तब झगड़ा होगा। जब अपने में झगड़ा जब स्वार्थ हो तब झगड़ा होगा। इनका तात्पर्य कि परार्थ आत्म तत्व को विज्ञान कराने के लिए इसलिए कहीं पर यदि ब्रह्मा जी से सृष्टि हो जाए या विष्णु जी से भी हो जाए महेश्वर जी पुराणों में आती संकु सृष्टि आती है तो इसका तात्पर्य कि वहां पर नई निंदतम प्रवर्तते अपित विधेय अर्थात निंदा का तात्पर्य किस में नहीं है किसी की स्तुति की जाए तो निंदा में तात्पर्य नहीं है उस व्यक्ति की प्रवृत्ति में तात्पर्य तो इसलिए हमारे जो पुराणों में, स्मृतियों में, मनुस्मृति में कहीं पर जो सृष्टि क्रम है वह कोई क्रम गलत नहीं है। अपने अपने
00:10:40:28 उद्देश्य से बनाए गए हैं। उनका केवल स्वार्थ में ना तात्पर्य हो के जो हमारे प्राप्त वस्तु है उसमें तात्पर्य है। इसलिए वचनों में कोई विरोध नहीं है। यदि कोई ऐसा कहता है कि वचन विरुद्ध है। वो गलत है। उसने शास्त्र का तात्पर्य नहीं समझा है। क्योंकि शास्त्र के तात्पर्य के निकालने के लिए कुछ हमारे आचार्यों ने नियम बनाए। जी जैसे मान लीजिए किसी ने गंगायाम घूसा प्रयोग कर दिया। गंगा में घर है तो अब आजकल कोई सोशल मीडिया का जमाना है वो तुरंत कहेगा संस्कृत में गलत लिखा है। परंतु यही समय है कि आप कह दे किसी को पता बताते कि हमारा घर चौराहे में तो आप मान लेते हैं। हम आपका घर कहां है? चौराहे में है तो आप गलत नहीं कहेंगे। और किसी ने कह दिया गंगा गोसा मिल गया वाक्य तो आज की स्थिति बड़ी समस्या है कह गलत हो गया उसका तात्पर्य क्या है वक्ता कि अत्यंत गंगा के तट में घूस है जैसे चौराहा है तो घर नहीं हो सकता है घर है चौराहे नहीं हो सकता तो वक्ता का तात्पर्य क्या है इसी प्रकार किस प्रसंग में कोई बात कही गई है इसका महत्व रखा जाता है अब उसी से बीच में थोड़ी सी रील काट दी उसका महत्व बना दिया गलत इसको दुरुपयोग किसी के वस्त्र को गलत करना तो यह वक्ता का जो तात्पर्य है हमारे सुत उपक्रम
00:11:56:16 संारा अभ्यासा पूर्वता फलम ये वेदांत में स लिंग तात्पर्य जो श्रुति होती है और प्रमाण होती है अन्यत चलिंग संयोग प्रयोग साचर विरोधिता व्याकरण में जाएंगे परित परित्त उपादान उत्तरोत्तर बलिया मीमांसा में चलेंगे श्रुत लिंग समाज अर्ज ये अनेक वचन है उन सब वचनों को समझ करके तब अर्थ के निर्णय के लिए प्रवृत्त होना चाहिए। आज का समय यह है कि थोड़ा व्यक्ति पढ़ लिया अन्य लोग पढ़े नहीं है तो वो अपनी बातों में कहने लग गए। उनका क्या लिखा सही है? वो जो कहेगा सही लिखा तो उसी प्रकार मिलेगा पर वो लिखने का तात्पर्य क्या ये नहीं समझ पा रहे। जी इसीलिए आद गुरु शंकराचार्य भगवत पाद कहते हैं गुरु मेंवा विग में प्रयोग करते सर्व शास्त्र विद सर्व शास्त्र विद न स्वतंत्रम ब्रह्म चिंत गुरु मेंवा भी गच्छे इतनी बड़ी बात कह कि पूरा शास्त्र विज्ञ है फिर भी स्वतंत्र सा चिंतन नहीं करना आत्म चिंतन गुरु के पास ही जाना है इसीलिए आगे श्रुति ने क्या कहा आचार्यवान पुरु वेद आचार्य
00:13:11:18 आचार्य असति आचार्यवान इसको गांव में सामान्य भाषा में कहते हैं कि बिना गुरु के कल्याण नहीं गुरु बनाना चाहिए ये श्रुति मूलक है। गांव की भाषा में कहते हैं गुरु जरूर होना चाहिए। श्रुति कहती है कि आचार्य वाल ही आत्मज्ञान हो सकता है। इसलिए हर व्यक्ति को सनातन धर्म में जो पल्लवित पोचित है उसको गुरु बनाना ही चाहिए। किसी भी जिसका जैसे संप्रदाय हो या जिसकी रुचि हो हम इस पर आग्रह नहीं करेंगे परंतु गुरु जरूर ही होना चाहिए। किसी भी मार्ग में चलने के लिए आचार्य होगा तो इन जो सुटियों का परस्पर जो लग रहा है सृष्टि है कि क्रम सृष्टि है कहीं प्राण से सृष्टि आती है ये जो सृष्टियों का इसमें तात्पर्य नहीं है केवल भगवत तत्व की प्राप्ति में तात्पर्य जी जी बहुत सुंदर आचार्य जी आचार्य जी ये प्रश्न इसलिए आता है क्योंकि जो ऐसे तंत्र हैं जो कि जो जो वर्ण को कर्म से मानते हैं वो ये कोशिश करते हैं यहां पर प्रयास करने का कि जैसे इधर तो ऋषियों की संतान है तो आप सब ब्राह्मण हो गए या फिर उधर मनु की संतान है तो सब क्षत्रिय हो गए उसमें जो जो हमारे शास्त्रों में पहले तो
00:14:27:08 जो मनु और शत्रुपा मैंने बताया ना प्रजापति उत्पन्न है जी प्रजापति तो कोई जाति थी नहीं जी क्या नहीं थी जाति नहीं है अब जाति के विषय में अलग-अलग मतमतांतर जाति का तात्पर्य होना चाहिए वर्ण से और जो ऋषि होते हैं, जो सर्वज्ञ होते हैं, वो जाति धर्म से परे हो जाते हैं। क्यों परे हो जाते हैं? आप भगवत पाद का उपक्रम भाग देखेंगे जो अध्यास भाग जिसको बोलते हैं ब्रह्म सूत्र के तो कहते हैं जितना भी यह कुछ बना है वह अवित विषयाण शास्त्र यह जितना कुछ है जब ज्ञान दृष्टि में तो कोई है ही नहीं। ब्राह्मण क्षत्रिय शूद्र कोई है ही नहीं। इसीलिए भगवत पाद अपने अपूद्रा में भगवत पाद लिखते हैं विदुराना माने विदुर प्रतया शब्द का प्रयोग करते हैं। उन्होंने तो विदुर जी का दृष्टांत दिया कि वो भी आत्मज्ञानी है। इसका मतलब है कि आत्मज्ञान हर प्राणी को प्राप्त हो सकता है। क्या होना चाहिए? उसे साधन चतुष्टय संपन्न होना चाहिए। साधन संपत्ति संपन्न होना चाहिए। और जो साधन संपन्न नहीं है, आत्मज्ञानी नहीं है, उसे जन्म से अपनी वर्ण व्यवस्था
00:15:42:16 के अनुसार जीना चाहिए। क्योंकि महाभाष्यकार ने ब्राह्मण के तीन कारण बताए हैं। श्रुति श्रुत और तप और जाति जन्म दोनों ने कहा जो दो से रहित है। किससे दो से म श्रुत और तप से रहित है स जाति रे ब्राह्मण मतलब वो केवल जिसके माता ब्राह्मणी हो पिता ब्राह्मण उससे जन्म लिया वो जाति ब्राह्मण है। और इन तीनों से विशिष्ट है वो अत्यंत पवित्र ब्राह्मण है। परंतु वो यदि तप और स्वाध्याय उसे नहीं कहा ब्राह्मण नहीं शब्द का प्रयोग नहीं कर सकते। ये तो हो गया शास्त्र। वर्तमान में संविधान भी ये कहता है कि जन्म से ही जाति जी। वर्तमान का जो संविधान है वो कहता है जन्म से ही जाति है। तो इस अंश में तो शास्त्र मूलक ही संविधान है। जन्म से जाति माना। तो जन्म से जाति में क्या प्रमाण है? जी। संविधान ने क्यों जन्म से जाति माना? क्या प्रमाण है? तो ये कहना पड़ा शायद प्रमाण है जी। क्या मानेंगे उसमें? तो जो लोग कर्मवादी है उनको विचार करना चाहिए कि क्योंकि संविधान विरुद्ध बात कर रहे हैं साहस विरुद्ध बात कर रहे हैं। कर्मणा कहेंगे तो संविधान का विरोध होगा तो जो यह व्यवस्था उन्होंने संविधान
00:16:57:25 में की है तत लोगों के लिए उस व्यवस्था दुर्व्यवस्था बदल जाएगी। नहीं आजकल तो लोग तैयार है तमाम लोग आप कर्म के अनुसार दीजिए हमको आरक्षण तभी तैयार हो जाएंगे। कोई बचपन नहीं करेगा। जी तो यह जो शास्त्र मूलक है इसलिए शास्त्र मूलक होने से संविधान मूलक होने से व्यवस्था सुरक्षित रहनी चाहिए। इस व्यवस्था के साथ कर्म प्रधान व्यवस्था नहीं माननी चाहिए। ये हमारे संविधान विरुद्ध बात है। शास्त्र विरुद्ध बात हुई है। तो आचार्य श्री इसको क्या ऐसे माने कि जिन ऋषियों से आगे सृष्टि का विस्तार हुआ है या फिर प्रजापति से हुआ है या मनु सत ये अमैथुनी सृष्टि थी। हां इसलिए वहां पे वर्ण नहीं निश्चित किया जा सकता। वर्ण वो जो प्रथम है जब उसका कोई जाति नहीं व्यवस्था होती नहीं अनादि है जी कि कहां से क्रम चले अनादि का तात्पर्य जैसे गंगा जी का प्रवाह है हम लोगों ने भगीरथ जी लाए साथ में नहीं खाए परंतु आप अभी काशी आए गंगा जी में स्नान किए कोई पूछेगा कौन गंगा में स्नान किए तो आप वही कहेंगे जो भगीरथ जी लाए थे वो गंगा में स्नान किए आप प्रतिदिन जल बह रहा है पर दूसरे जगह कहे कल जिस गंगा में स्नान किए थे आज उसी गंगा में कर रहे जबकि वो क्षण क्षण में जल जल बहता जा रहा है। नूतन नूतन आ रहा है। फिर भी क्या कहते हैं? वही गंगा है जो भगीरथ जी लाए थे। वही में हमने स्नान
00:18:13:03 किया है जो दो दिन पहले हमने स्नान किया था। परंतु वाक्य ऐसा व्यवहार होता है क्योंकि वो सतत चला रहा है प्रवाह। उसी प्रकार सृष्टि का प्रवाह चलता ही रहता है। क्या चलता रहता है? सृष्टि का प्रवाह चलता रहता है। इसलिए उसका आदि नहीं मिलता। ये तो मिलता है कि जन्म हुआ। श्रुति कहे तस्मात तस्मात आत्मना आकाश समभूत भगवान स्वयं श्रुति सर्व असत सब मैंने बनाया है बना तो है पर बनाने का काल का ये किसी का निश्चय नहीं है जी और जहां काल का निश्चय नहीं होता है उसी को बोलते हैं अनाग ये कालक क्रम निश्चय नहीं क्या नहीं है कालक क्रम का निर्णय कोई नहीं कर सकता है कि प्रथम क्या बना है यह निश्चित नहीं ये तो बना प्रथम कब बना ये निश्चय नहीं हो पा रहा है इसलिए इसको बोलते बोलते हैं। साथ ही होते हुए भी अनादि सृष्टि तो आचार्य जी एक प्रश्न आता है कि ईश्वर यदि अपने स्वरूप के विरुद्ध कार्य नहीं करता है तो बाधित नहीं कहलाता है। जैसे कहते हैं ना सर्वशक्तिमान करपात्री जी महाराज ने भी लिखा अबाध्य तो हमारा ईश्वर अबाध्य है। हम उसी ईश्वर की पूजा करते हैं। तो इसमें एक प्रश्न आता है कि जो जैसे जो लोग ईश्वर का अवतार नहीं मानते हैं वो कहते हैं क्योंकि अवतार उसके स्वरूप
00:19:28:04 के विरुद्ध कार्य है। इसलिए अवतार ना लेने की स्थिति में उसकी सर्वशक्तिमत्ता बाधित नहीं होती। तो क्या अवतार लेना स्वरूप के विरुद्ध कार्य है? नहीं अवतार जैसे जिनका कहना कि अवतार हम लेंगे तो स्वरूप के विरुद्ध स्वरूप के विरुद्ध इसलिए नहीं है कि यदि स्वरूप में परिवर्तन हो जी तब विरुद्ध है। ये थोड़ा सा ऊपर यदि स्वरूप विरुद्ध उसे कहते हैं जिसे दधी दधी रूप में बदल गया तो विरुद्ध हो गया। जी क्योंकि उसके गुण और धर्म बदल गए। जी जो दूध के थे वो दधी में हो गए। तो उसी रज्जु का जी सर्प रूप में अभिव्यक्ति होने पर भी हम उस सर्प का धर्म ना रज्जु में आते हैं ना रज्जु का धर्म सर्प में आते जी तो भगवान जो इस रूप में अवतरित हो रहे अपने स्वरूप का बिना परित्याग करे जी सतचित आनंद रूप होते हुए जैसे रज्जु है रज्जु अपने स्वरूप को न बदलते हुए दृष्टा के अज्ञान के कारण रज्जु का अज्ञान के कारण क्या प्रतीत हो रहा है? सर प्रतीत हो रहा है। देखो उसमें कोई भी परिवर्तन नहीं है। उसी प्रकार जो भगवत का भगवान का जो
00:20:43:06 अवतार का तात्पर्य है उनमें विकृति नहीं आएगी। जैसे रज्जु में विकृति आती तो फिर रज्जु सर्प बन जाना चाहिए। सबको भ्रम होता है। रज्जु में सर्प जी। इसका मतलब है कि यहां जो सृष्टि क्रम में हमारे यहां जो वर्णन किया जा रहा है कि भगवान से सृष्टि हुई भगवान ने अवतार लिया उसका तात्पर्य विवर्त से किससे तात्पर्य है विवर्त से विवर्त का तात्पर्य होता है कि अत तत्व अन्यथा प्रथा बिना परिवर्तन किए हुए विपरीत दिख जाना जी उसी प्रकार यहां भगवान सतचित आनंद है बिना परिवर्तन हुए जगत के रूप में दिख गए इसलिए उनका विवर विवरत होने से उनके स्वरूप में कोई विकृति नहीं है। जी यह अपने हम उन पर आरोप ना करें कि वो विकृति जैसे रज्जू में सर्प की भांति हुई फिर भी रज्जू में कोई विकृति नहीं हुआ। सर्प आप आया भय हुआ सब कुछ हुआ और लोग चिल्लाने लगे। तार चाचा आई भगा जी। परंतु विकृति तब तक थी दृष्टा को श्रोता को जब तक देख नहीं पा रहा था। लिखने पर सब कुछ हट जाता है। तो हम लोगों का जो अवतारवाद है वह तात्पर्य विवर है। जी भगवान उस शरीर में भगवत तो अपने गीता
00:21:58:07 में लिखते ही हैं। वसुदेवा देवक्याम गर्भ शब्द का प्रयोग भगवत जी किल संभव वह उत्पन्न हुए साक्षात लिख रहे हैं। कौन भगवान नारायण लिख रहे हैं। आज नारायण शब्द का प्रयोग करते हैं। तो भगवान की वहां अभिव्यक्ति हुई। इसीलिए वहां जो प्रसंग है भगवान का देवकी और वासुदेव के प्रसंग में दोनों व्यक्ति मन से ही धारण किए परमात्मा का मनस शब्द का प्रयोग किए हैं व्यास जी गर्भ शब्द का प्रयोग नहीं किए हैं तो इसको सरल भाषा में ऐसे कह सकते हैं आचार्य जी कि ब्रह्म दृष्टि से वो प्रतीति मात्र है ईश्वर की मतलब जो लोगों को लग रहा है कि जो विकृति हो विकृति है नहीं है ये भ्रांति है मा बिना क्यों जिन लोगों का आक्षेप है कि इस सृष्टि में आएंगे भगवान तो क्या होगा? उन्हें विकृति आ जाएगी। ये असंभव है। जैसे रज्जु में क्या है? सर्प का विवर्त हुआ फिर भी रज्जु में कोई विकृति उत्पन्न नहीं हुई। उसी प्रकार पूरे सृष्टि को भगवान ने रचना की। कोई उनमें विकृति नहीं हुई। जी मैं वही कह रहा हूं कि हम लोग जो देख रहे हैं कि रज्जू में सर्प की हमें भ्रांति हो रही है। तो हमारी दृष्टि में है। हमारी दृष्टि में वो व्यवहारिक हमारा सत्य हो गया। तो वो अवतार हमारे लिए सत्य हो गया और उनकी ओर से ब्रह्म
00:23:13:15 दृष्टि से तो वो केवल एक प्रतीति है तब जगत प्रतीति है और जो व्यक्ति उसको अधिष्ठान तत्व साक्षात्कार कर लेता है वो भी सोचता कोई विकार नहीं जी जी अधिष्ठान तत्व साक्षात्कार कर लेने पर हमको पता रज्जु है फिर भी हमको सर्प दिख रहा था ये व्यवहार होता है रज्जु के बाद जब बहुत डर लग जाता है तो लगता है अभी हमको सफेद दिख रहा है इतना ज्यादा भय कम हो जाता है तो महाराज जी पूरी पूरी के शंक आचार्य जी जो गुरुदेव भगवान है वो भी अपने ग्रंथ में बताते हैं कि अगर हमने ईश्वर को एक रस माना हुआ है और निर्विकार माना हुआ है कहीं भी कुछ घटना बढ़ना ऐसा नहीं है और वो शाश्वत स्वरूप है ईश्वर का तो सृष्टि की रचना तो तभी संभव है जब वो सबसे पहले सर्वप्रथम सगुण निराकार के रूप में अवतार ले क्योंकि तब तक वो सगुण नहीं होगा निराकार सगुण निराकार के रूप में ही वो कार्य हमारे यहां ये सृष्टि क्रम में सबसे पहले संकल्प होना चाहिए सा इच्छत बहुस्याम प्रजा जी हम लोग वेद से चले तो वेद मूलक में सर्वप्रथम क्या है? त अक्षत जी अक्षत का तात्पर्य है इक्षण कृतवान इक्षण का तात्पर्य इच्छा से नहीं इसमें इक्षण माने इक्ष दर्शनीय धातु है इक्षण माने दर्शन संकल्प वो संकल्प कहां से आया है
00:24:28:21 उसकी आराधनी जो शक्ति है माया जो ना होते हुए भी है हम सबसे बड़ी ना होते हुए भी है इसी का नाम माया हम माया का मतलब नहीं हो के होना ना हो के भी हो जाना ये उसका नाम माने ना या माने जो जो नहीं है उसी का नाम तो माया है। तो ऐसी जो विलक्षण शक्ति ना होते हुए भी कार्य कर दे तो वह जो सूक्ष्म संकल्प है उसका नाम है इक्षण सर्वप्रथम परमात्मा इक्षण करता है और इक्षण करने के बाद प्राणियों के तत कर्मों का अन्वेषण करता है तद सृष्टि का आरंभ करता है तो उसमें सगुण निराकार अवतार उसका माना पड़ेगा जी बिल्कुल काशी में बैठे हैं महाराज जी तो एक काशी से संबंधित प्रश्न बहुत आता है कि काशी में जब किसी का देह त्याग होगा यदि तो उसको जो है कैवल्य मोक्ष की भी प्राप्ति होगी। ऐसा शास्त्रों में वर्णन है। तो एक तरफ हम जानते हैं कि जब तक व्यक्ति को तत्व ज्ञान नहीं हो जाएगा तब तक उसको मोक्ष नहीं मिलता। तो देह त्याग के समय उस वो काशी मेहता इतना पर्याप्त है उसके तत्व ज्ञान को मानने के लिए तो उसमें भगवान या काशी मरणान मुक्ति ज्ञान ऐसे वाक्य आते हैं। हम काशी शब्द का ही अर्थ है ज्ञान।
00:25:44:19 अच्छा बहुत बड़ी हम लोग व्याख्या नहीं कह का दीप्त दीप्ति प्रकाश प्रकाश ज्ञानम तो कास्याम क्या कास्या मरणान मुक्ति तो [गला साफ़ करने की आवाज़] कास्या माने ज्ञान में मर रहा है जी तो क्या होगा ज्ञान मरने पर अच्छा शब्द का अर्थ क्या है काशी माने ज्ञान और ज्ञान मुक्ति माने ज्ञान हुआ गया तो मुक्त हो गया यहां जब काशी में मर रहा है तो काशी माने ज्ञान तो उसका शाब्दिक व्याकरण की दृष्टि से कास दीप्त तो काशी में मरेगा तो मुक्त होना निश्चित है क्योंकि काशी मतलब ज्ञान जी जी अब उस कहेंगे तो ज्ञान तो कहीं हो सकता है परंतु यहां पर अभिव्यक्त ज्ञान है अभिव्यक्त इसे सब जगह पर है परंतु जब हमारे पास दर्पण है तो हमारा मुख दिख सकता है यहां नहीं दिख रहा है जी जब ये भी मिट्टी का है दर्पण भी मिट्टी का ही विकार है प्रत्येक जगह दिख रहा है जगह नहीं दिख रहा है कहीं ग्राहकता शक्ति है कहीं ग्राहकता शक्ति नहीं है तो इसी को क्या वो लीला रूप में बताया गया कि वो जो माता है माता पार्वती उनको अपनी गोद में ले है वो तो गोद में लेके आ रही है तो उसका शाब्दिक अर्थ ज्ञान में ही सब कुछ हो रहा है जी तो माता है हम लोग उनको तो कोई बात ही नहीं परंतु यदि कोई कहे कि
00:26:59:27 दोनों में अंतर नहीं ये हमारा इतने तात्पर्य यहां का कि जो ज्ञान है वही काशी है जो काशी है वही ज्ञान उसी का लीलापूर्वक वर्णन है वो जो ज्ञान प्रदान करते हैं और जो उनके जो कर्म बाकी होते हैं भैरव देखे हैं तो भैरव आदि एक बार देखते हैं यात्रा उसमें भी हम जिस खंड में बैठे हैं केदार खंड में यहां भैरवी यात्रा नहीं है। अच्छा हां ये केदार खंड में नहीं है। यहां पास चिंतामणि गणेश जी हैं। काशी खंड में आते हैं स्कंद पुराण काशी खंड में भगवान कहे कि सबको मुक्त कर देंगे जो काल भैरव जी कहे कि ऐसा नहीं होगा। पापी आत्माएं उनको दंड देना होगा। जी तो चिंतामणि गणेश जी बोले कि नहीं नहीं ऐसा नहीं होगा। आप जब ये दे रहे हैं मुक्ति तो आपको क्या दिक्कत है? जैसे आजकल लोग बोलते हैं। रोचक कथा है उसमें जी जी तो उन्होंने कहा जब दोनों लोग विवाद हो गया तो भगवान ने माता जी ने निर्णय किया कि भाई दोनों को संतुष्ट करना है आपके खंड में यातना से जाएगा इनके खंड में सीधे जाएगा जी जी इसलिए हमारे पूज्य परम गुरु जी धर्म सम्राट कर पाते जी इसलिए केदार खंड में उन्होंने शरीर त्यागा तो पुराण शास्त्रों में प्रमाण मान जी केदार खंड का महत्व बहुत बढ़िया आचार्य श्री एक चीज और आती है सामान्य दृष्टि से हम देखें तो हमारे हमारे जो मंदिर हुए हैं आजकल उसमें शास्त्र रीति से
00:28:15:01 विधिविधान से पूजा अर्चन नहीं हो पा रहा है। तो उसमें जैसे शिवलिंग का स्पर्श कर लेना सभी का महिलाओं का भी देखिए अब आज लिखा कलो स्थानान पूजंते न देवा जी कलयुग में स्थान की पूजा होती है। जी देवता का जो मतलब प्रतिष्ठा कर दी हम आज का ऐसा परिवेश हो चुका है हम कि चाहे गांव हो चाहे तीर्थ में हो मंदिर हो जी वही पूजा व्यवस्था नहीं हो पा रही है गांव वाली कौन है जी प्राय देखा जाता है मंदिर है और मंदिरों के नाम पर लोग सब कुछ व्यवस्था भी करते हैं परंतु जितना मंदिर का धन है वो सरकार ले जाती है जी जो बड़े मंदिर है उनका सरकार ले जाएगी छोटे मंदिरों के पास धन नहीं है। धन ना होने से कोई भी ब्राह्मण है वो करता कभी-कभी समय जब मिलता है करता है। इसके आधार पर क्या हो जाता है? दुर्व्यवस्था हो जाती है। तो कई मंदिरों में पुजारी ही नहीं होते। जी और यहां तक है कि अलग-अलग परंपराएं हैं। केवल ब्राह्मण ही पुजारी नहीं होते। जी कहीं गोसाई पुजारी होते हैं। बहुत जगह अन्य परंपराएं हैं। ये तो केवल एक ब्राह्मण प्रधान
00:29:30:02 होने के लिए लोगों ने प्रयोग कर दिया है। परंतु अन्य अनेक मंदिर ऐसे हैं जहां पर ब्राह्मणों का पुजारी नहीं है। अन्य लोग पुजारी हैं। जी। तो यह जो हमारी जो पद्धति है तो हम लोगों को अब इस समय तो यही मान के चलना चाहिए कि कल स्थाना पूजते न देवा। क्योंकि अब स्थिति यह है कि देव तो चले जाते हैं। जब स्पर्श स्पर्श हो जाता है तो उसके स्थान पूजन से वही फल मिलता है। इसलिए स्थान को प्रणाम करना चाहिए। तो इसका मतलब ये माना जाए कि ऐसे जो देवालय हैं, मंदिर है इत्यादि हैं इनकी उपेक्षा नहीं करना चाहिए। उपेक्षा नहीं कर सकते। श्रद्धा रखनी चाहिए। श्रद्धा रखनी चाहिए। वहां स्थान में जाना चाहिए। उनको प्रणाम करना चाहिए। जी जैसे कोई अपने से पूर्व श्रेष्ठ है जन है हम लोग देखते हैं उनके जाने पर हम लोग प्रणाम करते हैं तो अब दुर्व्यवस्था कारण देवता नहीं है पर देव स्थान तो है तो उनका वो सूचक है इसलिए साकार ने इसे विधा बना दी कल स्थान पूजते ना देवा बहुत बढ़िया कलयुग में स्थान की ही प्रधानता होती है जी जी इसलिए दर्शन करने से दूर से विधान दूर से दर्शन कर लो पुण्य मिल जाएगा जी कोई पास में जाने की आवश्यकता नहीं है बहुत बढ़िया बढ़िया आचार्य जी बहुत सुंदर मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। ये करपात्री जी के द्वारा आप तक पहुंचा हो ऐसा कुछ हमारे
00:30:45:06 दर्शकों को युवाओं को कोई संदेश जो आप दे देना चाहे कुछ भी मार्गदर्शन हम तो ये कहेंगे कि धर्म सम्राट करपात्री स्वामी जी उन्होंने जो ग्रंथों की अनेक रचना की है अपने समय पर जी उनका युवा विद्वान जो बालक है उनको पढ़ना चाहिए आदि गुरु शंकराचार्य जी के ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। हमारी जो परंपरा है दक्षिण में विशेषता कि हर एक आज भी जो वहां के विद्वान है भाष परायण करते इधर कम देखा जाता है तो हम लोगों को कभी भी यदि सनातन धर्म का पूर्ण संरक्षण संवर्धन करना है तो भगवत पाद के द्वारा बनाई गई जो पद्धति है पंच देवोपासना इसमें संपूर्ण संप्रदायों का समावेश है उसका आधार लेकर के और अपनी उपासना करेंगे तो हम और हमारा सनातन धर्म हमारे सम सभी संप्रदाय सुरक्षित और संवर्धित रहेंगे। इसलिए धर्म सम्राट कृपा स्वामी जी महाराज पंच देवों की उपासना करते थे। जी ये इसीलिए कई आप लोग देखेंगे वैष्णव संत कहते हैं स्वामी
00:32:00:12 जी जब उपासना करते थे तो अपने पाव में उध पुण्य लगाते थे। तो अलग-अलग उसकी विधा है। तो पंच देव उपासना के माध्यम से सब हमारे सनातन धर्मी जितने संप्रदाय है उनको जुड़ के अपना आत्म कल्याण करना चाहिए। तो जी बहुत-बहुत आभार आचार्य जी। तो ये थे हमारे काशी के जटा गुरु जी और इनकी दिव्य वाणी आज हमें प्राप्त हुई। हम सब जो है सौभाग्यशाली हैं जो ऐसी वाणी आज भी हमें प्राप्त है और आपके चरणों में प्रणाम निवेदित करते हुए मैं चर्चा को विराम देता हूं।
00:32:59:12 [संगीत]
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क्या ईश्वर का अवतार स्वरूप विरुद्ध कार्य है? काशी के जटा गुरु जी की दिव्य वाणी
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