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00:00:00:02 यह कोर्ट प्रोसेस है। यानी यहां पे धर्म लागू नहीं है। फिर दयानंद जी को वेद जो है परंपरा से प्राप्त हुए। तो क्या यह मानना पड़ेगा कि बिना गुरु के उन्होंने स्वयं से उसका वेद का ज्ञान अर्थ कर दिया। [संगीत] अच्छा जैसे
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→ Used in: A · Video आर्य समाज मंदिर या जिहादी अड्डे #hindumuslimmarriage #lovejihad at 0:19 ↗
00:00:26:12 कोई मुस्लिम आया वो कह रहा है कि भाई मुझे इस कन्या से विवाह करना है।
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00:00:30:09 अगर कोई आर्य समाजी है तो उसके लिए अप्रामाणिक [संगीत] है। व्यर्थ है ये। आचार्य जी और पूजा सामग्री सहित ₹5000 में विवाह संपन्न कराया जाता है। आर्य समाज उनके [संगीत] नाम से नहीं चलता। आर्य समाज क्या है? [संगीत] तो सभी को जय श्री राम। मेरा नाम शिवश नारायण द्विवेदी। पूरी शंकराचार्य जी के कल्पज्ञ शिष्य प्रभु श्री राम के साधारण भक्त। आप देख रहे हैं हमारा आह्वान चैनल और जैसा कि आप जानते हैं कि हमारा एक उद्देश्य है जो विभिन्न धार्मिक विचारधाराएं हैं। ईश्वर को लेकर के, अध्यात्म को लेकर के उनको चर्चा के माध्यम से आपके समक्ष प्रस्तुत करना। तो इसी क्रम में आज हम आए हैं यह आर्य समाज मंदिर है यहां पर और इनका गुरुकुल भी है। हमारे साथ आचार्य जी बैठे हुए हैं। आचार्य जी जय श्री राम आपको। जय श्री राम जी। आचार्य जी थोड़ा सा अपना एक संक्षिप्त परिचय हमारे दर्शकों को आप दे दें। हमारा नाम आचार्य गोविंद शास्त्री जी है।
00:01:46:19 हमारा जो विद्या का अध्ययन हुआ वो अयोध्या जी से जी जैन गुरुकुल संस्कृत उच्चतर माध्यमिक विद्यालय से संपन्न हुआ। हमने राम कथा की तैयारी वृंदावन से की। अच्छा और अब भगवत कार्य से और जैसे भी हो सकता है अपने धर्म का प्रचार सनातन धर्म का झंडा ऊंचा रखने का प्रयास रहता है इसी प्रयास में लगे हुए हैं। जी जी बहुत सुंदर बहुत सुंदर तो आचार्य जी आपने जैसे बताया आपने जो शिक्षा विद्या ग्रहण की है जी तो आपने दर्शन पे भी पढ़ाई की है ना मतलब ईश्वर के विषय में ईश्वर साकार है निराकार है तात्विक विवेचना जो होती है जी जी मोक्ष धर्म का पर्यावसान मोक्ष है जी है ना मतलब ऐसा होता है ना कई बार ऐसा होता है कि हम केवल कर्मकांड जानते हैं विवाह इत्यादि संस्कार कैसे होता है जी जी और कई बार हम उसमें भी हमारी गति होती है कि हम दर्शन इत्यादि के विषय में क्योंकि हमारा जो चर्चा का मुख्य आधार है वो दर्शन इत्यादि है कि ईश्वर साकार निराकार मूर्ति पूजा इत्यादि
00:03:01:27 इत्यादि तो इन सब विषयों में आपका अध्ययन है ना परिपक्व तरीके से जी जी जी तो थोड़ा सा आचार्य जी हमें आर्य समाज के अनुसार जो ईश्वर की सृष्टि रचना है उसमें ईश्वर जैसे कहा जाता है ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो ईश्वर की शक्ति किस तरह कैसे कार्य करती है? थोड़ा सा सृष्टि रचना के संबंध में बता दें। आर्य समाज के अनुसार सर देखिए पहले तो मैं स्पष्ट करना चाहूंगा जी कि कुछ लोगों का मत आर्य समाज को लेकर के है जी कि सनातन धर्म से भिन्न ये मानते हैं हम और कुछ देवी देवताओं को नहीं मानते हैं हम अपितु ऐसा नहीं है जब इस आर्य समाज के जो संस्थापक स्वामी श्री दया दयानंद सरस्वती जी हैं। जी इन्होंने जब 10 अप्रैल 1800 हम 70 में इसकी स्थापना की हम तो इसकी स्थापना करने का सिर्फ और सिर्फ उद्देश्य जो था ये था कि जो आज के समय में बहुत से पाखंड हमारे धर्म में घुस आए। हम जो हमारे धर्म को धीरे-धीरे खोखला करते
00:04:16:28 जा रहे हैं। उन पाखंडों को दूर करने का और जो ईश्वर है ईश्वर हमारे जो आदि शंकराचार्य जी हैं उन्होंने जो अद्वैत वेदांत की रचना की उसमें भी उन्होंने कहा एक ब्रह्म द्वितीय नाश ईश्वर एक ही है। दूसरा कोई नहीं है। जी और हमारे आर्य समाज का भी यही मानना है कि ईश्वर एक ही है हम और वो निराकार है हम और आपने अभी जैसे प्रश्न किया कि सृष्टि की रचना कैसे हुई? जी तो सृष्टि की रचना में जैसे एक क्लियर कर दूं जैसे हम कहते हैं ईश्वर सर्वशक्तिमान है। समस्त कार्यों को करने की शक्ति है। तो जाहिर सी बात है कि ईश्वर ने अपनी शक्ति से यह सृष्टि बनाई। अब सृष्टि बनाई तो सृष्टि कैसे बनाई कि भाई जो प्रकृति का पदार्थ है जो कि सत्यार्थ प्रकाश के अनुसार पहले अव्यक्त था। है ना? फिर वो ब्रह्म से ही व्यक्त हुआ। व्यक्त होने का मतलब है कि जैसे जो पदार्थ हैं जैसे कि पृथ्वी
00:05:32:02 बनी है मान लीजिए मिट्टी के कण हैं तो उनको फिर संगठित किया है ना संगीभूत करके और जो है फिर पृथ्वी का निर्माण किया उन्होंने या इस तरह से अन्य भौतिक पदार्थों के द्वारा उन्होंने सृष्टि रचना की तो इसमें जो ईश्वर की शक्ति है वो थोड़ा सा अब मैंने तो पूरा बोल दिया मगर आर्य समाज के अकॉर्डिंगली वो कैसे काम कर रही है जैसे मान लीजिए प्रकृति के पदार्थ पड़े हुए हैं। अब शक्ति किस तरह से कार्य करती है ईश्वर की आपको एक उदाहरण में समझाना चाहेंगे। जी। जैसे हम सभी लोगों के घर में लाइट आती है। जी जी हम लोग लाइट आने का जो मुख्य स्त्रोत्र है स्रोत है वो है करंट। हम और करंट हम सभी को पता है कि वो कहीं ना कहीं से आता है। जी। और जो करंट का उत्पादन करता है जी जिसे हम बिजली घर कहते हैं जी विद्युत विभाग कहते हैं जी जी जी उसी प्रकार से जो ईश्वर है जी ईश्वर तो एक ही है जी अब वो अपने जिस प्रकार से अनेक कारणों से और अनेक चीजों से होकर
00:06:47:06 के करंट गुजरता है और पूरे संसार को प्रकाशित करता है। जी उसी प्रकार से ईश्वर अपने द्वारा ना करके अपनी शक्ति अपनी शक्ति के माध्यम से जी चीजों को करके इस पूरे संसार को चलाता है। बिल्कुल आचार्य जी जैसे आपने अभी एक विद्युत का उदाहरण दिया उससे विभिन्न उपकरण चलते हैं। तो विभिन्न उपकरण जब चलते हैं तो जैसे पंखा भी चल रहा है। जी फ्रिज भी चल रहा है। वाशिंग मशीन भी चल रही है। हैलोजन भी चल रहा है। बड़े-छोटे कई प्रकार के उपकरण चल रहे हैं। अच्छा सब में जो तार इत्यादि है सबके उपकरणों के लिए वो भी अलग-अलग तरह का है। कोई हैवी वाला है तो उसमें मोटा तार है तांबे का और जो नॉर्मल बल्ब इत्यादि के लिए बहुत महीन सा तार भी चल जाता है। तो अब ये तो जड़ शक्ति जो है ये जड़ है। तो इसमें चेतना का उपयोग कौन होता है? जो कंट्रोलर है यानी कि हम हम रेगुलेट करते हैं कि पंखे में ज्यादा पावर ना जाए। कितनी पावर जाए जितनी उसमें चाहिए। ठीक है? तो क्या इस तरह से ही यह माना जाए कि ईश्वर भी रेगुलेट करते हैं कि जैसे पृथ्वी में ज्यादा शक्ति लगनी है और किसी छोटी-मोटी चीज में कम शक्ति लगनी है। किसी
00:08:02:07 बड़ी चीज में जुपिटर में सूर्य में ज्यादा शक्ति लगनी है तो क्या इस तरह से ईश्वर भी अपनी शक्ति को रेगुलेट करेगा तभी सृष्टि रचना संभव है। और अन्यथा अगर सृष्टि संतुलन से चल भी सकती है। अन्यथा अगर एक समान पावर वाली शक्ति सब जगह लग गई तो सृष्टि रचना कैसे होगी? भाई कोई चीज बड़ी बननी है, कोई छोटी बननी है। तो क्या मैं ठीक समझ रहा हूं इस बात को? जी जी बिल्कुल है ना? बिल्कुल। तो इस प्रकार से अच्छा इसमें एक चीज ये भी है कि जहां पे पृथ्वी का निर्माण हो रहा है वहां तो उसकी शक्ति मतलब लग रही है जितनी चाहिए। मगर जहां पे जैसे पंखा नहीं चल रहा है तो जहां पे पंखा नहीं है जहां पे कोई काम नहीं है वहां विद्युत है भी नहीं। जी अपने प्रकटीकरण के साथ है ना वहां पर वो है ही नहीं सर्वशक्तिमान ईश्वर तो है परंतु उसकी शक्ति वो कार्य करने वाली शक्ति के रूप में वहां पर नहीं है तो हमें दो चीजें यहां पर स्पष्ट हो गई कि जो पदार्थ है जिसका निर्माण किया जा रहा है उसके बड़े अथवा छोटे होने के हिसाब से दीर्घ अथवा लघु होने के हिसाब से जिस प्रकार से पंखे और बल्ब में अलग-अलग स्तर स्तर की बिजली का प्रवाह होता है। उसी प्रकार से बड़े और छोटे पदार्थ के हिसाब से अलग-अलग स्तर की शक्ति
00:09:17:10 का प्रवाह जी होता है। ठीक है? अच्छा शक्ति का प्रवाह का मतलब इसको हम इससे समझ सकते हैं कि जैसे कि जैसे ये मिट्टी का कण है मान लीजिए जी। तो हम ईश्वर की शक्ति जो है इस मिट्टी के कण को जब उसे पृथ्वी बनानी है तो इसमें इस तरीके से इसको गतिमान बनाते हुए शक्ति के प्रभाव को उत्पन्न करके इसको गतिमान बनाते हुए एक निश्चित जगह जहां पर पृथ्वी बननी है वहां ले जाती है मिट्टी की कड़ को है ना और अब इसमें जितना मांस है तो उतनी ताकत यहां लगेगी और जितना मांस किसी का होगा तो कम ताकत लगेगी इसका मतलब यह है कि हम यह मान सकते हैं कि ईश्वर की शक्ति जो है पदार्थों के टकराव दबाव इत्यादि व्यवहार का विषय बनती है। बनती है। तभी सृष्टि रचना संभव है। बिल्कुल ठीक। बहुत अच्छा। तो अब बात ये आती है एक चीज और आ गई कि आर्य समाज के अनुसार कितने तत्व माने गए हैं? तीन तत्व माने गए हैं। जीव, ईश्वर और प्रकृति। है ना? तो प्रकृति तो हो गए जड़ पदार्थ। उसमें शक्ति है नहीं कि वो अपने आप काम करे। जीव भी आश्रित है। जीव में भी अपनी शक्ति नहीं है। तो इसका मतलब शक्ति तो शक्तिमान के ही पास है कार्य करने की। तभी वह शक्तिमान
00:10:32:14 है। है ना? बिल्कुल। तो ये शक्ति और शक्तिमान में कोई अंतर तो है नहीं। है ना? क्योंकि अंतर हो गया तो एक चौथा पदार्थ हो जाएगा। शक्ति अलग हो जाएगी शक्तिमान से। फिर उसमें और सारी थ्योरीज खुलंगी। तो शक्ति शक्ति के रूप में शक्तिमान ही है। देखिए और शक्ति शक्तिमान के ही पास हो सकती है। हां हम जी जैसे अभी कोई भी वस्तु है अगर वो किसी गैर जीव के पास में पहुंच जाए या गैर जीव के हाथ में लग जाए जी तो उसका उपयोग ना हो करके दुरुपयोग होना प्रारंभ तो कहने का मतलब यह है कि जैसे हम लोग पंखा चला रहे हैं जी तो उसमें तो विद्युत अलग है और मैं अलग हूं फिर मैं किसी माध्यम से विद्युत को कंट्रोल करता हूं पंखा चलाता हूं परंतु ईश्वर के केस में जी ईश्वर और शक्ति अलग नहीं है। ईश्वर ही शक्ति के रूप में कार्य कर रहा है। जो जड़ पदार्थ हैं उनके टकराव का विषय बन रहा है। तभी वह एक संगीभूत हो रहे हैं। और उनको गतिमान कर कर सकने में सहायक है। और क्या कहते हैं? कहीं कम कहीं ज्यादा और कहीं ना होते हुए भी शक्ति के रूप में वो क्रियान्वित
00:11:48:00 हो रहा है ईश्वर। ठीक है ना? जी तो अब यहां पर एक बात आती है कि क्या आर्य समाज जैसे आपने कहा कि मूर्ति पूजा को नहीं मानता है ना तो अब बात ये आती है कि क्या आर्य समाज यह मानता है कि ईश्वर अवतरित हो सकता है पर देखिए आर्य समाज भगवान श्री कृष्ण को भी मानता है भगवान महापुरुष के रूप में मानता है ना जी मैं ईश्वर के सीधे तौर पर अवतार के रूप की बात कर रहा हूं। जी जी जी मैं इसी पे आता हूं। जी भगवान श्री कृष्ण को भी मानता है हम और भगवान श्री कृष्ण के द्वारा जो श्रीमद् भगवत गीता है हम उसको आर्य समाज सर्वोपरि मानता है हम और भगवत गीता में भी कहा गया है कि समय-समय पर जब भी धर्म की हानि होती है अधर्म बढ़ता है तब तक भगवान किसी ना किसी रूप में अवतरित अवश्य होते हैं। ये भगवान ने स्वयं भी कहा है। मगर इसको प्रमाण नहीं माना ना दयानंद जी ने सत्यार्थ प्रकाश में उन्होंने लिखा जी कि यह वेद विरुद्ध होने से यह बात प्रमाण नहीं है। हां ये हो
00:13:03:06 सकता है कि वो यह कहना चाहते हो कि जब जब धर्म की हानि हो मुझे ईश्वर भेज दे मगर इसको भगवान के अवतार के रूप में नहीं देख सकते कि भगवान स्वयं आ गया। देखिए वो घूम गया। वह तो जो स्वामी दयानंद सरस्वती सरस्वती जी थे उन्हें उन्होंने जो सत्यार्थ प्रकाश की रचना की अब तो उसमें भी अनेक प्रकार के आज के जो ज्ञानी लोग हैं अपना-अपना मत डालते चले जा रहे हैं। मतलब सत्यार्थ प्रकाश भी बदली जा रही है। सर आज के समय में सारी पुस्तकें बदली जा रही हैं। अपने-अपने मत के अनुसार लोग उसमें एक अध्याय दो अध्याय छंद चीजें आपका कहने का मतलब यह है कि दयानंद जी जो हैं वो क्या कहते हैं मूर्ति मतलब अवतार को मानते थे जी उन्होंने देखिए मूर्ति पूजा जो थी ये तो बिल्कुल [गला साफ़ करने की आवाज़] नई बात मैंने सुनी सुनिए देखिए जी उनके मूर्ति पूजा ना मानने का एक कारण था हां जैसे आज के समय में आप देखें दुर्गा पूजा होती है दुर्गा पूजा होती है गणेश जी का उत्सव को मनाया जाता है। गणपति पूजा होती है। उनका हम 9 दिन 11 दिन पूजन करने के बाद में फिर ले जाकर के नहीं
00:14:18:19 नदी में उनको प्रवाहित करा। ये तो एक अलग बात हो गई आचार्य जी। देखिए बात ऐसी है। जैसे कि मान लीजिए कि कोई व्यवस्था है या कोई सुविधा है। उसका कोई दुरुपयोग कर रहा है। है ना? इसका अर्थ ये थोड़ी ना रहा है कि क्योंकि उसका दुरुपयोग हो सकता है। इसलिए हम जो सच्चाई है उसको अस्वीकार कर दें। जैसे कि मान लीजिए कि हमारे यहां पर बहन भाई चचेरी बहनों से ममेरी बहनों से फुफेरी बहनों से विवाह करना अस्वीकार नहीं है। अब क्योंकि लोगों को अपनी ही बहन में आकृष्ट आसक्ति हो गई या बहन को भाई में हो गई। मान लीजिए कि संस्कार नहीं प्राप्त हुए और हो गई तो अब क्योंकि हिंदू धर्म के अनुसार मना है तो व्यक्ति जो है छोड़ के विधर्म में जाने लगा कि मैं तो मुसलमान बनूंगा जिस जहां चचेरी बहन से विवाह वर्जित नहीं है निषेध नहीं है जी तो क्योंकि वो लोग छोड़ के जा रहे हैं तो इसका मतलब ये थोड़ी ना है कि हम अपने यहां का ये चेंज कर दें कि नहीं नहीं हमारे यहां भी स्वीकार हो गया जो सत्य है वही सत्य रहेगा ना क्योंकि सनातन है धर्म का नाम बिल्कुल तो ये तो एक अलग बात हो गई कि उन्होंने क्यों अस्वीकार किया था मगर उन आपका कहने का मतलब मतलब है कि उन्होंने वर्बली कह दिया था। मगर वो अंदर से जो है मूर्ति पूजा को मानने वाले थे। जैसे देखिए अब हमारा जो ये आर्य समाज है हां
00:15:34:12 ये जुड़ा किससे है? वेदों से। हम सर्वोपरि वेदों को ही मानते हैं। ठीक है। और हमारे वेद भी कहते हैं कि ईश्वर कभी किसी एक रूप में या किसी एक व्यक्ति के अंदर कभी नहीं पाया जा सकता। आप मैं वही तो कह रहा हूं। आप पहले एक निश्चित मुझे वो तो बताइए। आप शुरुआत में ये बोले ना कि यदा यदाई धर्मस ग्लन भवती भारत अभान अधर्मस तर सजाम। आपने पहले उसका कहा उसको कोट किया कि भगवान ने खुद कहा है कि हम आते हैं। और फिर मैंने खुद कहा कि नहीं क्या ऐसा है कि आपके अनुसार तो आप ये कह रहे हो कि दयानंद जी मानते थे। मगर सत्यार्थ प्रकाश में तो उल्टा लिखा हुआ है कि नहीं उन्होंने निराकार होने पर जोर दिया है। उन्होंने कई युक्तियां भी दी हैं कि जो सब जगह है वह एक जगह कैसे हो सकता है? इत्यादि इत्यादि युक्तियां दी हैं। तो अब यह पहले स्पष्ट कर दीजिए कि दयानंद के दयानंद जी के अनुसार आपकी जानकारी में मूर्ति पूजा उन्होंने स्वीकार की थी कि नहीं की थी? वेदों की बात तो हम अलग से करेंगे। मूर्ति पूजा नहीं स्वीकार की थी। अवतार भगवान का देखिए अब आप जो सत्यार्थ प्रकाश की बात कर रहे हैं।
00:16:49:18 उसके मैं आपकी जानकारी पूछ रहा हूं। उसके अनुसार तो उन्होंने नहीं की। नहीं नहीं नहीं मैं आपकी जानकारी पूछ रहा हूं। आपकी जानकारी में दयानंद जी ने अवतार को स्वीकार किया है या नहीं किया है? नहीं किया। अवतार को जी। अवतार को भगवान के अवतार को नहीं। तो फिर तो आज की सत्यार्थ प्रकाश भी तो यही कह रही है। देखिए कह भले ही रही है। हम अब जैसे उनका जो मत था वेदों के प्रति ज्यादा था। उन्होंने शास्त्र और मैं अरे मैं अभी आपसे प्रमाण नहीं मांग रहा हूं। असल में थोड़ा कंफ्यूज हो गए हम लोग। शुरू में आपने ये कह दिया ना कि वो अवतार को मानते थे और आजकल के लोगों ने मिलावट कर ली। जैसे देखिए अवतार को मानते किस प्रकार से थे। उनका ये कहना नहीं था कि राम जी अवतार लेकर के नहीं आए या कृष्ण जी अवतार लेकर के नहीं आए। ईश्वर थे राम जी या नहीं थे? ईश्वर उन्होंने ईश्वर के रूप में नहीं माना। महापुरुष माना है। ठीक है? तो ठीक है। अब हम यहां से चलते हैं कि वह अवतार नहीं मानते थे। तो अब यह बात है कि अवतार ना मानने के विषय में कारण क्या है? क्यों नहीं मानता आर्य समाज या दयानंद? कि ईश्वर अवतार ले सकता है। जैसे
00:18:05:01 उनका जो सबसे पहला नारा था वेदों की ओर चले। लौटो। यानी वेदों में नहीं लिखा है इसलिए नहीं मानते नहीं मानते थे। अच्छा ठीक है। और कोई युक्ति ये तो प्रमाण हो गया। युक्ति भी है इसमें क्योंकि उन्होंने युक्तियां भी दी है। जैसे अभी आपने कहा ना कि जो सर्वत्र व्याप्त है वो एक शरीर में नहीं आ सकता। है ना? तो ऐसे कुछ युक्ति भी बता दीजिए। फिर हम बात करें आगे। जैसे जो भगवान के अवतार के मानने की बात थी हम तो उनका सबसे बड़ा यही था कि जैसे वेदों के आधार पर
00:18:54:12 जो भी अवतार या ईश्वर के बारे में जो बताया गया है वही उनके लिए सर्वोपरि था। युक्ति नहीं दे रहे हैं आप। प्रमाण ही दे रहे हैं। प्रमाण अलग से है। प्रमाण पे भी जाएंगे। युक्ति मतलब तर्क। उन्होंने तर्क दिया है कि जो सब जगह है वह एक जगह नहीं आ सकता। अभी आपने भी कहा वह एक शरीर में नहीं आ सकता। अब यहां तर्क की अगर बात करें तो जैसे अभी हमने देखा था कि ईश्वर अपनी शक्ति के रूप में किसी एक जगह पर जो जड़ पदार्थ हैं उनको गतिमान कराने के लिए बल का रूप धारण करता है। उनसे संपर्क में आता है। आता है ना? जड़ पदार्थों के किसी एक जगह पे ही आ रहा है। आ रहा है ना? निराकार रहते हुए जैसे इस पदार्थ को यहां से वहां ले जाना है तो ईश्वर निराकार रहते हुए पर्टिकुलर किसी एक स्थान देश काल परिस्थिति में उस पदार्थ को वो गतिमान बना रहा है बलपूर्वक ठीक है ना तो इसका मतलब जो सर्वत्र व्याप्त ईश्वर है वो किसी एक जगह पर है ना व्यवहार का विषय बन रहा है जड़ पदार्थ के टकराव का विषय बन रहा है ठीक है उसको गतिमान बनाने का विषय बन रहा है तो इसका मतलब जो सर्वत्र व्याप्त ईश्वर है वह ऐसा
00:20:09:20 कर सकता है कि वह कहां पर किस जड़ पदार्थ के टकराव का विषय बने अथवा ना बने। वह यह तय कर सकता है। कर सकता है ना? बिल्कुल। तो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि ईश्वर प्रकाश के मार्ग में भी टकराव का विषय बन जाए? बिल्कुल। बन सकता है। जी। जब अच्छा हम लोग किसी चीज को देखते कब हैं? जब उस पर प्रकाश पड़ता है, वह टकराता है, उसके उस तरफ नहीं जा पाता है और वापस हमारी आंखों पर आता है। तो जब ईश्वर किसी विशेष संरचना से युक्त होते हुए जो ईश्वर तत्व है जब किसी विशेष संरचना से युक्त होते हुए प्रकाश के मार्ग में बाधा बनेगा तो प्रकाश उससे टकरा के जब वापस आएगा तो उतना हिस्सा ईश्वर का हमारी आंखों का विषय बन जाएगा। जी जैसे कि वो पदार्थों का विषय बन रहा है। जी तो फिर यहां पर ईश्वर का अवतार तर्क से सिद्ध हो जाता है। अब केवल प्रमाण बचा है ना? प्रमाण के विषय में तो आपने स्वयं ही मान लिया कि जो क्या कहते हैं सत्यार्थ प्रकाश है उसमें मिलावट हो रही है। आपने स्वयं मान लिया तो क्या हम यह मान सकते हैं कि दयानंद जी अवतार को मानते थे क्योंकि तर्क तो खंडित हो गया है। सर अब देखिए अगर वह अवतार का हम उनके प्रति
00:21:24:28 नहीं कह सकते हैं। अगर वह अवतार को मानते हम तो फिर वो पुराणों को भी मानते। यानी कि नहीं मानते थे। तो अब इसमें ये बात आ जाती है कि नहीं मानते थे और क्योंकि वेद नहीं वेद नहीं कह रहे हैं। जी तो ऐसे बहुत सारे आचार्य हैं जैसे हमने आपके कार्यालय में एक फोटो लगी देखी जिनके वैष्णव तिलक हैं। जी है ना? शायद रामानुज परंपरा से थे वो। तो ऐसे बहुत सारे आचार्य हैं जिन्होंने यह वेद के भाष्य में माना है कि ईश्वर अवतार लेता है। जैसे कि एक 31 19 में मंत्र आया है यजुर्वेद में कि ईश्वर अपनी माया के द्वारा विभिन्न रूपों में प्रकट होता है। जी गर्भ के मध्य में विचरता है। विभिन्न रूपों में है ना? यह सब मंत्र आए हैं। तो इनके अर्थ में जब दयानंद जी की बात करते तो वह कह देते कि भाई यह तो अलंकार है या फिर यह तो सृष्टि के रूप में अभिव्यक्त होने की बात हो रही है। वो यहां पर इस मंत्र का वो अर्थ नहीं लेते जो उन आचार्यों ने लिया है। मतलब यह नहीं कह सकते स्पष्ट रूप से कि नहीं नहीं वेद में ईश्वर के रूप के बारे में बात हुई नहीं है। हुई है मगर जहांजहां पर हुई है वहां वहां पर दयानंद जी ने उसको अलंकार कह दिया या वो थोड़ा सा बच के निकल गए हैं। अब बात यह आती है कि एक ही वाक्य के यदि कई अर्थ निकल रहे हैं तो फिर किसकी बात को
00:22:40:00 माना जाए कि यह प्रामाणिक है और यह नहीं है। जैसे मान लीजिए कि आपने कहा सेंधव ले आओ। ठीक है? आपका अर्थ था कि सेंधव का मतलब है घोड़ा ले आओ। और मैं ले आया नमक। तो मैं नमक ले आया। सेंधव का अर्थ जो है नमक भी है। जी। तो आपने घोड़ा बोला था या नमक बोला था? ठीक है। अच्छा आपको आप यह कह के चले गए। सेंधव कह के आप चले गए कहीं। अब उसके बाद समय काल बीत गया। काफी बीत गया। तो यह कैसे तय होगा कि आपने क्या बोला था? सेंधव के अर्थ में नमक बोला था या घोड़ा बोला था? तो ये तय कैसे होगा? जब आपकी ओर से किसी को यदि आपने नियुक्त किया हो जो प्रामाणिक रूप से आपसे जुड़ा हुआ हो। वो बताएं कि भाई मैं उनका छोटा भाई हूं। मैं उनके पुत्र का पुत्र का पुत्र हूं या फिर मैं उनके शिष्य का शिष्य का शिष्य हूं। जी तो मैं बता रहा हूं कि भैया सेंधव के रूप में उन्होंने घोड़ा मंगाया था ना कि नमक मंगाया था। तो हमें उसकी बात माननी पड़ेगी। दूसरी बात यह है कि वही आपके द्वारा कही हुए उस वाक्य को हमें पहुंचा रहा है। आपने कहा था सेंधव तो वो शिष्य के शिष्य के शिष्य के रूप में हमको आपकी बात पहुंचा रहा है सेंधव। ठीक है? तो हमें उसी की बात माननी पड़ेगी क्योंकि आपके होने के विषय में भी वही प्रमाण है। तो इसी प्रकार से अगर गुरु
00:23:55:06 परंपरा की बात की जाए तो दयानंद जी की गुरु परंपरा क्या थी? मतलब उनके गुरु के गुरु के गुरु कौन से ऐसी परंपरा हो जो दयानंद सरस्वती जी के गुरु जी थे। ये आप सामने फोटो भी देख सकते हैं। श्रद्धानंद सरस्वती जी ये दयानंद जी के गुरु थे। जी अच्छा मुझे लगा यह तो उनके बाद के हैं श्रद्धानंद जी नहीं नहीं पक्का ओ सॉरी दयानंद श्रद्धानंद जी के गुरु दयानंद जी थे वही मैं कहूंगा कि जी जी जी और दयानंद सरस्वती जी जो थे हम वो पहले जब भारत में थे हम [गला साफ़ करने की आवाज़] तो भारत में रहते हुए उन्होंने मैं यह पूछ रहा हूं दयानंद जी के गुरु कौन थे? जी अभी मुझे जी थोड़ा सा वो क्या होता है विषयंतर हो जाएगा। इधर-उधर चले जाएंगे। जी बोलिए। तो भारत में रहते हुए उन्होंने
00:25:00:26 सनातन धर्म से ही जुड़े चीजों का उन्होंने लेकर के प्रचार किया और जैसे अभी आपने कहा जो गुरु परंपरा से चली आई तो उनके पहले जो गुरु थे उन्होंने ऐसा कोई कदम या ऐसा कोई झंडा नहीं उठाया। कि हां हम अपने धर्म में ही एक और धर्म की स्थापना की जाए जिसमें कोई पाखंड ना हो या पाखंड तो तब पता चलेगा ना जब हम उसका वेरिफिकेशन करेंगे क्या पाखंड है क्या नहीं है तो अभी बात यह हो रही है कि अगर दयानंद जी यह कह रहे हैं कि भाई उन लोगों ने वेदों का गलत अर्थ किया है और मैंने सही किया है। तो इस विषय में प्रामाणिकता के लिए दयानंद जी के गुरु परंपरा क्या है? उनकी गुरु परंपरा क्या है? पीछे के कुछ गुरुओं के नाम भाई वेद अभी तो आए नहीं है। वेद तो बहुत कई बहुत प्राचीन है। तो वो दयानंद जी तक कैसे आए? गुरु शिष्य परंपरा क्या है उनकी?
00:26:05:13 दयानंद जी ने भी पहले गुरुकुल से ही विद्या अध्ययन किया। कौन से गुरुकुल से? वही तो बात है। कौन से गुरुकुल से? शंकराचार्य गुरुकुल, रामानुजाचार्य गुरुकुल क्योंकि इनका इतिहास मिलता है। जी। अन्यों का इतिहास नहीं मिलता है। तो कौन से गुरुकुल से? शंकराचार्य के गुरुकुल से अध्ययन किया उन्होंने। उनके गुरु बृजानंद थे ना व्याकरण के है ना? जी। तो शंकराचार्य के गुरुकुल से अध्ययन किया। यानी शंकराचार्य ने ही उनको एक तरीके से वेद और वेदार्थ दिया। जी। यानी कि ईश्वर ने क्या कहा है? इस विषय में दयानंद जी के लिए शंकराचार्य प्रमाण है। जी। है ना? जी। तो शंकराचार्य तो बोल रहे हैं ईश्वर अवतार लेता है। जी वेद का अर्थ बता रहे हैं। भाई शंकराचार्य के बाद के जो अन्य उनकी परंपरा के आचार्य हैं शयनाचार्य उन्होंने वेद वेद के अर्थ में ये माना है कि ईश्वर अवतार लेता है। 31 19 में ही माना है। तो दयानंद जी ने नहीं माना। तो फिर फिर दयानंद जी की बात को प्रमाणिक माना जा सकता है। फिर क्योंकि उनके गुरु तो कह रहे हैं कि भाई नहीं और दयानंद जी ने जहां तक है शंकराचार्य का विरोध भी किया है सत्यार्थ प्रकाश में। से देखिए सर आपने अभी जो एक बड़ी अच्छी बात की थी कि ये जो गुरु परंपरा और शिष्य
00:27:20:14 परंपरा चलती है हम अब जैसे पहले जो भी रामचरितमानस है जैसे अभी रामचरितमानस पे भी देखिए कितना लेकर के चीजें होती हैं कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने ये चौपाई गलत लिख दी हम या वैसे गलत लिख अच्छा आप एक चीज बताइए कि हम अगर यह मान लें कि जो वेद है जी दयानंद जी को वेद जो है परंपरा से प्राप्त हुए जी तो क्या यह मानना पड़ेगा कि बिना गुरु के उन्होंने स्वयं से उसका वेद का ज्ञान अर्थ कर दिया जी बिल्कुल अब स्वयं से कर दिया जिस गुरु परंपरा से वो जुड़े हैं नहीं तो उसकी तो मानी नहीं ना तो वही चीज तो विरोध कर दिया गुरु परंपरा का जब उन्होंने नहीं माना है तो ऐसे व्यक्ति को फिर प्रमाणिक नहीं मानना चाहिए क्योंकि वो अपने उनको नहीं मान रहा है
00:28:14:07 तो फिर आप उनके नाम से यह आर्य समाज क्यों चला रहे हैं? देखिए आर्य समाज उनके नाम से नहीं चलता। आर्य समाज क्या है? और देखिए आर्य जिसे कहते हैं आर्य एक आधुनिक पहले के समय में जो आप किसके वेद भाष्य को मान रहे हैं? जी आप किसके वेद भाष्य को मान रहे हैं? हम सभी संप्रदाय के लोग भी आते हैं। आप किसके वेद भाष्य को मानते हैं? यहां जो विवाह कराते हैं वो किस पद्धति के आधार पर कराते हैं? शंकराचार्य के हिसाब से कराते हैं या दयानंद जी के हिसाब से? शंकराचार्य के हिसाब से कराते हैं। और देखिए मंत्र तो वही है मंत्र तो दयानंद जी ने अलग लिखे नहीं है। जो चलिए एक बात वेदों के तीन गुण अच्छा एक बात बताइए। यहां पे जो आप विवाह कराते हैं जी। तो अह जैसे कि कहा जाता है कि भाई विवाह यहां पे शूद्रों
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00:29:09:10 का होता है या ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सबका होता है। सबका होता है। तो मलेच्छों का भी हो जाता है। जी। म्लेच्छ जैसे आ जाए जैसे मुस्लिम आ जाए विवाह करने के लिए उनका विवाह नहीं होता। क्यों? अच्छा हो कर्मों से। जैसे देखिए उनका पहले सनातन धर्म में वो आमीन। तो कैसे? जैसे कोई मुस्लिम आया वो कह रहा है कि भाई मुझे इस कन्या से विवाह करना है और मैं जो है आने के लिए तैयार हूं तो फिर क्या करेंगे आप? उनका पहले शुद्धिकरण होता है। कितने दिन का? जी। कितने दिन का? एक दिन। मतलब जिस दिन वो आएगा फॉर्म वगैरह भरेगा। उस दिन उनका शुद्धिकरण शुद्धिकरण हो जाएगा। शुद्धिकरण होने के बाद में उसको नाम दे दिया जाएगा। कुछ उनको नाम दिया जाएगा। उनका पूरा बाकायदा उनको सनातन धर्म का पूरा संकल्प लेना होगा। ठीक है। उसके बाद में हम फिर कुछ दिन पश्चात जैसे 15 दिन 20 दिन हम रुक करके फिर उनका विवाह कराया जाएगा। अच्छा तो उसको जैसे आपने नया नाम दिया है और कुछ दिन पश्चात विवाह कराया जाएगा। तो उसको आपने जो नया नाम दिया है वो ब्राह्मण के अकॉर्डिंगली देंगे। वैश्य के क्षत्रिय के शूद्र के किस अकॉर्डिंग देंगे? नहीं वह तो नाम
00:30:24:14 किसी ब्राह्मण या किसी वर्ण व्यवस्था के हिसाब से नहीं दी जाती है। हम तो कुछ सरनेम नहीं देंगे उसको। जैसे सुनिए सर हम जैसे उसके नाम का जो चयन होता है हम [गला साफ़ करने की आवाज़] वो नक्षत्रों के हिसाब से दिया जाता है उसको। वो तो नाम हो गया। नाम के पीछे उसको कुछ देंगे आप आप ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य या शूद्र इस जिस लड़की के साथ में जा रहा होगा विवाह कर रहा होगा अच्छा उसको उसी वर्ण में दिया जाएगा जैसे ब्राह्मण घर की लड़की है तो ब्राह्मण यानी कि कोई मुस्लिम आया जी तो उसने कहा कि मैं जो है हिंदुत्व को अपनाने के लिए तैयार हूं जी तो जैसे ब्राह्मण घर की कन्या है जी तो आपने जो है उसको ब्राह्मण के रूप में शुद्धिकरण कर दिया उसका और 15 दिन के बाद आकर के उसका उसके साथ विवाह कर दिया जी तो ये 15 दिन की अवधि क्यों लेते हैं आप मतलब इसमें क्या डिसाइड होता है 15 दिन की अवधि में उसका आचार विचार कैसा उसका व्यवहार कैसा है आप उसके साथ रहते हैं नहीं नहीं तो कैसे पता करेंगे वो बराबर 15 दिन उससे मिलनाजुलना रोज मिलेंगे आप उससे ये तो संभव कैसे है जैसे मान लीजिए उसका यहां से 10 किलोमीटर पे घर हो फिर सर जिसको करना है चीजें करनी होती है
00:31:39:27 उसको प्रोसेस दिया जाता है अच्छा कि ये प्रोसेस साहब को करना पड़ेगा। पहले ही सारी चीजें बताई जाती हैं। अच्छा अगर उनको करना है तो नहीं तो आप कहां तक जाओगे? मान लो 20 लोगों ने आज फॉर्म भर दिया आपके उसमें। नहीं नहीं इतना नहीं होता है सर। जैसे और ऐसे केस मैं तो कह रहा हूं एक को भी आप चेक करने कैसे जाओगे? यहां से 15 20 कि.मी. अगर उसका घर होगा कहीं जाती कहीं नहीं। तो फिर कैसे पता करोगे कि उसको वो चाल चलन क्या है? जैसे देखिए हम कोई व्यक्ति हमारे पास में आया है कि हमको हिंदू धर्म में जाना है और फिर इस ब्राह्मण लड़की से वैश्य लड़की से विवाह करना है। विवाह करना है। ठीक है? तो हम लोग उसको एक प्रोसेस बताते हैं हम कि भैया अशुद्धिकरणुद्ध 15 15 दिन आप ट्रायल पे जाओ तो वो ट्रायल में हम क्या देखते हैं? कैसे किस क्या आधार होता है उस ट्रायल? कैसे बस बस उसको छोड़ दिया। 15 दिन के बाद अगर वापस आता है तो उसकी ब्राह्मण के घर में शादी करा देंगे। 15 दिन उसको प्रतिदिन हमसे आकर के मिलना है। एक तरीके से वो जो तड़ी पार होते हैं ना और वो जो अटेंडेंस लगाई जाती है। 15 दिनों के अंदर हम उनसे अपने सनातन धर्म के बारे में हम और अपने संस्कृत भाषा के बारे में हम ये सारी चीजें उनसे बात करते हैं। उनका मंत्रों का
00:32:55:01 अध्ययन करवाते हैं। अच्छा अच्छा अच्छा ठीक है। तो अब जब वो आपने जैसे उसका नामकरण किया है ब्राह्मण के रूप में क्योंकि वह ब्राह्मण लड़की से विवाह करने जा रहा है। जी तो जब वह विवाह करेगा जब आप जैसे आपने कहा 15 दिनों में उसका वेदा अध्ययन वगैरह भी आप करवाते हैं मंत्र तो आप उसका यज्ञपवित विवाह के समय पे करते हैं या फिर उसी दिन जिस दिन शुद्धिकरण करते हैं नहीं नहीं विवाह के ही समय पे होता है। यज्ञपवित अच्छा तो यज्ञपवित से पहले आप मंत्र कैसे पढ़ा रहे हैं उसको? यज्ञ पवित से पहले तो मंत्र नहीं पढ़ना चाहिए ना वेद वेद मंत्र नहीं पढ़ा सकते ना हां तो आपने कहा ना वेद मंत्र पढ़ाते हैं जैसे वेदों का ज्ञान देते हैं हमारे वेद उपदेश उपदेश करते हैं और फिर उसको क्या कहते हैं 15 दिन बाद उसको जो है अगर वो ब्राह्मण लड़की से विवाह करना है उसको तो अगर मतलब त्रिवर्ण में से किसी से भी करना है तो यज्ञपवित करा के और शूद्र से करना है तो फिर जनेऊ नहीं कराते अच्छा ठीक है अच्छा तो ये तो प्रोसेस हो गई तो आपको नहीं लगता जैसे कोई अगर ढोंगी हो मुस्लिम जो हमारे घर की आजकल आप देख रहे हैं लव जिहाद चल रहा है तो जो है वो ढोंग करने के लिए आया हो कि मुझे हिंदू धर्म में अपनाना है क्योंकि हमारे घर की
00:34:10:04 बिटिया को ले जाना है तो वो आराम से आएगा और कहेगा कि मुझे हिंदू बना दो और 15 दिन अपने खर्च करेगा वो और हम उसे अपने घर की बिटिया दे देंगे ब्राह्मण सर बहुत सारे केस होते भी हैं हम और बहुत से ऐसे भी लोग होते हैं जो विवाह ना भी करके हम चीजों को करते हैं। नहीं नहीं मतलब इसमें क्या ये ठीक लग रहा है आपको इस तरह से करना जो ऐसे आपने प्रोसेस बताई सर देखिए अगर हम नहीं भी करेंगे हम तो [गला साफ़ करने की आवाज़] आज के समय में होगा पैसों के लिए होगा कोई और कर देगा तो इसलिए हमारा भी करना ठीक है सर जैसे हमारे यहां विवाह करने को ये तो वैसे हो गया ना कि जैसे मान लीजिए हम मुर्गे को नहीं जैसे मान लीजिए मुर्गा नहीं काटेंगे तो क्योंकि मुर्गे तो कट ही रहे हैं कटने ही है तो हम भी काटे वो वाली बात हो ये चीजें नहीं है। जैसे देखिए इसका जो विभाग का प्रोसेस है ये कोर्ट से संबंधित है। हम हाई कोर्ट इसको लागू करता है। मतलब आपको अधिकार है कराने का इसलिए करा रहे हैं। कानूनी रूप से अधिकार है। उसमें वो न्याय अन्याय वाली कोई बात नहीं है। नहीं है बिल्कुल है। अब अच्छा मैं एक चीज पूछ रहा हूं। जैसे आपने बताया कि जैसे मुस्लिम लड़का है उसको आपने
00:35:25:13 शुद्धिकरण करवा दिया मुस्लिम लड़के को और 15 दिन आपने ट्रायल लिया। तो यह विधि हमारे शास्त्रों में कहीं पर दी गई है कि इस तरह से आप मुस्लिम को ब्राह्मण बना सकते हैं। तो फिर यह विधि कहां से आती है? जैसे देखिए इसका जो शुद्ध मतलब हमारे गीता में भगवत गीता में भगवान ने कहा कि तेरे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में एकमात्र शास्त्र प्रमाण है। तो जब हम कोई चीज कर रहे हैं और वो मतलब थोड़ी असमंजस की स्थितियां भी हैं तो उसमें विधि वाक्य तो होना चाहिए ना कि कम से कम कि भाई अगर मुस्लिम को हमें ब्राह्मण बनाना है, जनेऊ देना है, वेद मंत्र देने हैं और वह ब्राह्मण के रूप में उसको ख्यापित करना है। और यहां तक कि ब्राह्मण लड़की से विवाह भी कर ले। है ना? तो उसमें विधि वाक्य तो होना चाहिए ना कि विधि है यह कि शास्त्र ने कहा है कि 15 दिन ट्रायल लेना है उसको यह करना है तो ऐसी कोई विधि नहीं है प्रॉपर जैसे देखिए अब अगर विधि इसकी यही चली आ रही है कि जैसे किसी ने सनातन धर्म को अपनाया तो सनातन धर्म के हिसाब से जिस प्रकार से विवाह का प्रोसेस होता है हमारे धर्म में नहीं नहीं नहीं उसको ब्राह्मण के रूप में क्षत्रिय के रूप में स्वीकार करने की जो विधि है वो वो विधि कहां है? वो विधि नहीं
00:36:40:16 है। उसका बस धर्म में सनातन धर्म में वो प्रवेश करता है। प्रवेश करता है। मगर यदि उसको हमारे यहां का जनेऊ चाहिए, यज्ञ पवित चाहिए, वेद मंत्र पढ़ने हैं और सबसे बड़ी बात कि हमारे यहां की बिटिया से विवाह करना है। भाई जैसे मान लीजिए कोई मलेच्छ मुसलमान है जो अपना धर्म परिवर्तन करके हिंदू बनना चाहता है। तो वो उसी तरह की कोई कन्या ढूंढे। जी है ना जो परिवर्तित हो के हिंदू उसके साथ जीवन निर्वाह मगर हम जब उसके साथ ब्राह्मण की बिटिया भी ब्याह सकते हैं तो ऐसे में यह देखना आवश्यक है ना कि वो हिंदू बन भी रहा है कि नहीं क्योंकि आजकल तो आप देख ही रहे हैं कि ढोंग करते हैं सबसे ज्यादा जैसे देखिए सर अभी हमने आपसे कहा अगर मान लीजिए कोई [गला साफ़ करने की आवाज़] व्यक्ति है वो हमारे पास आता है कि हां हम इन चीजों को प्रोसेस के रूप में करके हम फिर करना चाहते तो प्रोसेस 15 दिन में आपने मान लिया प्रोसेस में होता क्या है मन क्रम वचन से जैसे 15 लोगों से वो मिला तो कोई भी कार्य करने से पहले वो 15 लोगों के बारे में सोचेगा कि वो 15 लोग हमको ये चीज करते हुए देखे हैं 15 लोग हमारे बारे में ऐसा जानते हैं। अगर वो व्यक्ति अकेले ही उस लड़की को लेकर
00:37:55:18 के चला गया तो उसके उसको किसी ने नहीं देखा। फिर वो कोई बुरा व्यवहार करने से पहले या बुरा बर्ताव करने से पहले एक भी बार किसी के बारे में उसको नहीं सोचना है। ये [गला साफ़ करने की आवाज़] चीजें होती भी हैं। और कुल मिलाकर के मैं एक सारांश मैं अगर ले लूं कि अगर कोई आता है मुस्लिम तो हम उसका शुद्धिकरण करते हैं। 15 दिन का उसको ट्रायल लेते हैं और उस बीच हम उसके संपर्क में रहते हैं। 15 दिन बाद जिस वर्ण की बिटिया से वह विवाह करना चाहता है, उस वर्ण का उसको अधिकार दे देते हैं। जनेऊ इत्यादि से उसको संस्कृत कर देते हैं और फिर जो है उसका विवाह संपन्न कराते हैं। ठीक है? यह तो एक बात रही और इसकी जो विधि है उसको किस वर्ण में डालना है, किस आधार पर डालना है वो विधि नहीं है मगर हम अपने से कर रहे हैं। जैसे वो जिस कन्या को लेकर के आएगा। मैं कह रहा हूं शास्त्र में ये विधि नहीं दी गई ना। ये हमने अपने से इस प्रोसेस को क्रिएट किया है। अच्छा ठीक
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00:38:55:03 है। तो अब दो चार बातें हैं जो मैं आपसे थोड़ा सा करना चाहता हूं। एक कि दयानंद जी का जो वास्तविक पक्ष है वो आपको नहीं ज्ञात है। जो उनका यथार्थ पक्ष है। प्रामाणिकता के विषय में आपने कहीं-कहीं पे उनको अप्रामाणिक भी कह दिया और फिर जो है आप दयानंद जी को ही लेकर के चल रहे हो। यहां पर उन्हीं की प्रोसेस को लेकर के चल रहे हो।
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00:39:18:14 क्योंकि ये सारी बातें जो आपने कही हैं कि उसको जैसे कोई मलेच्छ छाएगा उसको 15 दिन के बाद हम जनेऊ दे देंगे। ये बातें रामानुजाचार्य शंकराचार्य इत्यादि कहीं पर भी स्वीकार्य नहीं है। वहां पे तो जो मिले छाएगा यदि उसकी सनातन में आस्था हो रही है तो वो सनातनी हो गया। जैसे ही आस्था हो रही है हो गया। मगर यह नहीं है कि उसको जो है ब्राह्मण के रूप में स्वीकार करके और जनेऊ दे दिया जाएगा और फिर हमारे यहां की बिटिया से शादी भी हो गई। उसको यदि ऐसा है तो उसको अपने ही जैसे किसी को ढूंढना होगा। जो आना चाहती हो उसके साथ जीवन निर्वाह करना चाहती हो तो अब जब अब जब जो प्रमाणिक जो आपने माना कि शंकराचार्य ही हमारे लिए प्रमाण हैं तो उनसे तो ये आदेश प्राप्त है नहीं तो जाहिर सी बात है कि दयानंद जी की ओर से ही मानना पड़ेगा कि ये आदेश आपको दयानंद जी से ही प्राप्त है अधिकार देखिए ये दयानंद जी से भी नहीं प्राप्त है इसे आप [गला साफ़ करने की आवाज़] उनके ऊपर लेके मत जाइएगा किससे प्राप्त हमने आपसे कहा यह कोर्ट प्रोसेस है यानी यहां पे धर्म लागू नहीं है फिर यहां पे सर ये कानूनी प्रक्रिया है
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00:40:14:26 तो धार्मिक िक विवाह नहीं है। यह कानूनी विवाह है। और देखिए यह पहले डीएम के आदेश से पारित होता है। नहीं नहीं मैं वो नहीं कह रहा। मैं कह रहा हूं ये धर्म का केंद्र है ये या कानून का केंद्र है ये? दोनों हैं। दोनों है। जी। तो उसमें धर्म कहां है? जो आप प्रोसेस जिस प्रोसेस से आप कर रहे हैं विवाह यहां पे ऐसे विवाह कहीं साल में एक हुए चाहे एक विवाह हुआ। मैं कह रहा हूं उसमें धर्म कहां है? फिर सुनिए सर। जी और नित्य प्रतिदिन हम यहां पे ऐसे विवाह होते हैं जिनके पास धन नहीं है देने को हम उनके पास इतनी बड़ी व्यवस्था नहीं है कि वो जाकर के कहीं मैरिज हॉल बुक करें या इतनी सारी बड़ी व्यवस्था करके विवाह करें हम तो यहां पे सर आप विश्वास करिए इतने बड़े हॉल में आचार्य जी और पूजा सामग्री सहित ₹5000 में विवाह संपन्न कराया जाता है। ₹5000 में विवाह संपन्न करा दे। विवाह संपन्न हो जाता है। अच्छा जैसे माता-पिता की इच्छा नहीं है और केवल जो प्रेमीप्रेमिका हैं या युगल है वो आ गए यहां पर व्यस्क हैं। जी तो उस स्थिति में भी कराते हैं। फीस वही रहती होगी 5000 5100 जो भी है। नहीं नहीं यहां पे
00:41:30:04 पारिवारिक विवाह होते हैं। अच्छा ज्यादातर हां नहीं मगर ये शास्त्रों के हिसाब से जो दयानंद जी ने जो स्वीकार किया उसमें तो माता-पिता की इच्छा ना होते हुए भी कर सकते हैं ना। तो वहां पर जो मुस्लिम वाला है वह भी आ सकता है। उसमें तो ठीक है। मगर मैं एक चीज़ यह कह रहा था कि थोड़ा सा अगर आप अगर आर्य समाज को भी लेकर चल रहे हैं। है ना? तो कम से कम उनकी चीजों को तो यथावत रखिए क्योंकि मैंने देखा कि आपने मूर्ति पूजा के विषय में आपको उनका पक्ष एग्जजेक्टली मालूम नहीं है दयानंद जी का तो यह ठीक बात नहीं है। आपको क्या लगता है? जैसे देखिए सर आपने उनको आपने उनको भी आप प्रामाणिक कर कह दिया ना किसी यहां पे चार देखिए मैं बताऊं जैसे पीछे हनुमान जी की फोटो लगी है हनुमान जी की फोटो में वो मानव रूप में है कपि मुख में नहीं है अब यदि आप दयानंद जी को प्रमाणिक ना मानकर शंकराचार्य को प्रमाणिक मानेंगे तो इनका कपि मुख होना चाहिए। जी अब आपने यदि शंकराचार्य जी को प्रामाणिक माना है और तब आप अपने आप को सनातनी हिंदू मंदिर होने वाला कह रहे हो और ये आर्य समाज का दयानंद जी से कोई ऐसा खास मतलब नहीं है मान लीजिए तो आपको इनका कभी मुख रखना चाहिए था मगर आपने इनका दयानंद जी के अनुसार मुख रखा है मगर जब आपने दयानंद जी के अनुसार रखा है तब आप कह रहे हो कि नहीं दयानंद जी प्रामाणिक नहीं
00:42:45:08 है ऐसा कुछ खास संबंध नहीं है जैसे देखिए सर आपको नहीं लगता मतलब ये दयानंद जी के साथ और शंकराचार्य के साथ दोनों के साथ ही एक जैसे देखिए असमंजस की स्थिति आपने दयानंद दयानंद सरस्वती जी ने शंकराचार्य जी से विलग हो के हम एक नया रास्ता बनाया तो अब आप उनसे विलग हो के नया रास्ता बना रहे हैं नहीं हमने ऐसा नहीं कहा था [हंसी] जी जैसे देखिए दया मैं उनका जानता हूं उन्होंने क्या किया है अभी आप क्या कर रहे हैं जैसे आपने कहा आपने ये मान लिया से जुड़े थे आपने ये मान लिया ना कि दयानंद जी प्रमाणिक नहीं है तो प्रमाणिक नहीं है तो फिर उनका वेद भाष्य प्रमाणिक नहीं है। उनके द्वारा बताए गए जो धर्म शास्त्र है, धर्म शास्त्रों का अर्थ है वह प्रमाणिक नहीं है। तो यह तो दयानंद जी की अवमानना कर दी आपने। नहीं ऐसा नहीं। देखिए हम लोग किसी व्यक्ति विशेष की चीजों को नहीं मानते। उनके आदर्शों का मानते हैं। तो आपको नहीं लगता कि मतलब ना तो शंकराचार्य के ही सिद्धांत का पालन कर रहे हैं ना ही दयानंद जी के सिद्धांत का पालन कर रहे हैं। दयानंद जी को हमने अप्रामाणिक भी कह दिया और शंकराचार्य की चीजें भी यहां पर नहीं है। तो हम पालन किसका कर रहे हैं? वेद भाष हमने खुद से किए नहीं है। जैसे देखिए सर जी
00:44:02:04 हम लोग राम जी को मानते हैं। किस रूप में? ईश्वर के रूप में या महापुरुष के रूप में? महापुरुष के रूप में। ठीक है। ज्ञानी दयानंद जी का सिद्धांत हो गया। जी। ठीक है। तो राम जी को हम महापुरुष के रूप में इसलिए मानते हैं हम उन्होंने जो कार्य किए या जो ज्ञान हमको दिया या उनके जो आदर्श हैं वह हम सभी को कहीं ना कहीं एक जीवन जीने का यानी कि आप कहने का मतलब यह है कि दयानंद जी को आप इसलिए मानते हैं क्योंकि दयानंद जी ने कुछ अच्छे कार्य किए। जी अच्छा उनकी धर्म की शिक्षा को नहीं मानते आप। भाई देखिए दयानंद जी के जो अच्छे कार्य हैं आपके हिसाब से उसमें जो एक मेन जो चीज है ना वह है मुख्य कार्य उनका कि उन्होंने धर्म के सिद्धांत दिए जी धर्म का प्रचार किया उन्होंने। ठीक है? अभी थोड़ा सा मैं दयानंद जी की तरफ से बोल रहा हूं। ठीक है? तो अब आप ये कह रहे हो कि दयानंद जी को तो मैं मानता हूं। मगर उनके धर्म के कार्य तो उनका मुख्य जो एक तरीके से मान लीजिए कि उनका जो ऐसी चीज जा जिसके बिना उनका अस्तित्व सिद्ध नहीं होता है वो चीज है उनकी धर्म की शिक्षा अब आपने कहा मैं उनकी धर्म की शिक्षा को नहीं मानता
00:45:17:06 मैं उनको मानता हूं तो अर्थ कहां हुआ इसका और यहां चारों तरफ मैं देख रहा हूं कि उन्हीं की धर्म की उन्हीं की शिक्षा यहां पर लगी हुई है। मतलब एक तरीके से हम किसी का किसी ब्रांड का नेम लेकर के चल रहे हैं। मगर चीजें जो कर रहे हैं वो उसमें ब्रांड की चीजें हैं ही नहीं। जैसे देखिए मैंने आपको कहा तो कि जैसे वो मूर्ति पूजा को नहीं मानते थे। आप भी नहीं मानते। हम भी नहीं मानते। ठीक है। तो आपने तो शुरू में कहा ना नहीं ईश्वर अवतार लेता है। यही तो मैं कह रहा हूं कि आपको दयानंद जी का पक्ष एक्जेक्टली पता नहीं है। मैंने आपको बताया तो हां। कि वेदों के अनुसार भगवान का जन्म नहीं होता है। तो [गला साफ़ करने की आवाज़] आपने हम वेदों के अनुसार जब मैंने बात की शंकराचार्य इत्यादि का नाम लिया तो आपने मान लिया कि दयानंद जी गलत है वहां पे। जैसे आपने जो गुरु परंपरा की बात की थी तो आप प्रामाणिक हो गए ना आपके गुरु परंपरा के अनुसार से तो फिर दयानंद जी के सिद्धांत के अनुसार ये और देखिए दयानंद जी के गुरुकुल व्यवस्था हो या हमारी गुरुकुल व्यवस्था हो या आपकी गुरुकुल व्यवस्था हो या किसी भी ब्राह्मण की गुरुकुल व्यवस्था हो गुरुकुल व्यवस्था तो प्राचीन काल से एक ही चल रही है नहीं है वहां पर जो ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र का निर्धारण होता है वो जन्म से होता है और यहां पर जैसे आपने बताया कि
00:46:32:07 कोई मच्छ भी आ गया तो 15 दिन बाद आप उसको ब्राह्मण बना देंगे
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00:46:35:13 वो नहीं होता वहां वो हमारे बनाने से नहीं होता है सर आप ही ने कहा आपसे कहा ये कानूनी प्रक्रिया है नहीं ब्राह्मण बनाना कानूनी प्रक्रिया नहीं है विवाह कराना कानूनी प्रक्रिया जैसे मैंने आपको कहा तो आपने कहा यज्ञपवित करा देंगे वो जिस वर्ण की कन्या से विवाह कर यज्ञ पवीत कराएंगे ना पूरा उसी प्रकार के वर्ण व्यवस्था में वो ढलेगा तो यह व्यवस्था वहां नहीं है ना जहां आप पढ़ रहे हो वैष्णवों के यहां कहां पढ़े थे आप ये कानूनी व्यवस्था कह तो रहे हैं सर यज्ञपवित कानून में कहां है भाई यज्ञपवित की मैं बात नहीं करता सर अब उसे अगर उस वर्ण में जाना है उस वर्ण व्यवस्था से चलना है तो उसको जो उस वर्ण व्यवस्था के मैं कह रहा हूं कानून ने ये अधिकार दिया है कि आप किसकी किससे विवाह करा सकते हो मगर कानून ने ये नहीं बताया है ना कि क्या कहते हैं यज्ञपवित किसका कब किस आधार पे होगा किसका नहीं होगा इस विषय में तो शास्त्र ने बताया है जी तो आप जब कर रहे आप जो ये कर रहे हैं ये व्यवस्था वहां पर नहीं है जहां आप पढ़ रहे हैं जहां पढ़ के आए हैं वैष्णवों के यहां ये व्यवस्था दयानंद जी के यहां पर है हम दयानंद जी के यहां भी नहीं है
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00:47:37:20 है दयानंद जी ने तो कर्म के आधार पे माना है ना हां कर्म के आधार पे भले माना है तो कर्म के आधार पे किसी को भी कह सकते हैं कि भाई ये हो गया हमने देख लिया नहीं सर ऐसा होता नहीं है हां और दूसरी चीज ये है मैं चलिए इस चर्चा को थोड़ा सा समाप्त करते हैं मैं एक बात कहूंगा कि आप सबसे पहली बात कि अगर दयानंद जी के नाम से आपने आर्य समाज का ये केंद्र संचालित यहां पे हो रहा है। मैं उनको भी बताऊंगा जो प्रेमवत शास्त्री जी हैं। तो वो इस विषय पर ध्यान दें कि दयानंद जी की चीजों को यहां धारण किया जा रहा है कि नहीं। कम से कम दयानंद जी के सिद्धांतों को तो धारण करें तो हम उसी को लेकर के यदि फिक्स नहीं है, लचर नहीं है तो हम आर्य समाज का बोर्ड ना लगाएं। यह ना कहें कि हम आर्य समाजी हैं। क्योंकि आर्य समाज के जो मूल सिद्धांत है ना उसी में से एक दो सिद्धांत है जहां पर आप जो है उसके इत चले जा रहे हैं। पहली बात। दूसरी बात यह है कि यदि उनके सिद्धांत माने भी जा रहे हैं तब भी यह चीज़ विचारणीय है कि क्या हम मुस्लिमों का इस तरह से हमारे यहां पर आना और हमसे कहना कि मैं हिंदू होना चाहता हूं और फिर जो है उसका हमारे ब्राह्मण वर्ग की जैसे मैंने आपसे बताया कि ये मैं पूरा कर लूं। एक मिनट दयानंद सरस्वती जी के सिद्धांत से जुड़ी चीजें नहीं है। अरे
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00:48:50:04 भाई तो आप इसको मैरिज ब्यूरो बोलो ना। फिर आप जो है आर्य समाज मंदिर क्यों बोल रहे हो?
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00:48:55:22 नहीं सर क्यों हम यहां पर सिर्फ मुस्लिमों का तो विवाह कराया नहीं जाता है या सिर्फ ऐसे विवाह कराया नहीं जाता मुस्लिमों का विवाह हो या ना हो यहां का जो मूल आधार है वो कानून है धर्म नहीं है मूल आधार अगर धर्म है पहले कानून बाद में है धर्म पहले कानून बाद में है ठीक है तो अब ये अब ये बताइए कि मुस्लिम को जो है जैसे कोई मुस्लिम आया तो उसको हमने हिंदू हिंदू बनाने के लिए हिंदू का सर्टिफिकेट देने के लिए कितने दिन में 15 दिन में होगा और फिर उसके बाद पहले उसको हिंदू एक मिनट भाई साहब जी हिंदू कोई आया मुस्लिम कोई आया उसका हमने शुद्धिकरण किया 15 दिन का ट्रायल पे भेजा उसके बाद ब्राह्मण वर्ण की बिटिया से अगर विवाह करना है तो उसको जनेऊ दे दिया ये
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00:49:42:26 जो कार्यवाही है ये जो प्रोसेस है विधि यह कौन से शास्त्र में लिखी है अगर हमारा पहले धर्म है आधार
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00:49:49:13 सर पहली बात तो हां कि उत्तर प्रदेश में अभी जल्दी में उत्तराखंड में भी यह बंद हुआ है। हम [गला साफ़ करने की आवाज़] धर्म परिवर्तन वाला मतलब अब जो है आर्य समाज के मंदिरों में ऐसा नहीं करा रहे हैं। आर्य समाज के सर ये आर्य समाज नहीं कराता है। ये कानून व्यवस्था कराती है। धर्म परिवर्तन का जो कार्य मैं ये कह रहा हूं कि अभी आपने कहा ना कि ये जो चलता है इसमें धर्म पहले कानून बाद में है। ठीक है? तो आर्य समाज का सिद्धांत क्या है? इस मंदिर का सिद्धांत क्या है? इस मंदिर का सिद्धांत ये है इसके जो जिस संस्था में आप बैठे हैं, इसका जो सिद्धांत है, यहां पे जो बच्चे असहाएं हैं, जो गरीब बच्चे हैं, उनके अध्ययन की व्यवस्था संस्था देखती है। जिनके तो उनको आप क्या बताएंगे? ईश्वर अवतार ले सकता है कि नहीं ले सकता है? क्या बताएंगे? अध्ययन करेंगे ना बच्चे तो क्या बताएंगे आप? वह गुरुकुल परंपरा से जुड़कर के अध्ययन करते हैं। तो गुरुकुल परंपरा में जो बताया जाता है देखिए हम लोग सनातन से या वेदों से या गुरु परंपराओं से विलग होकर के मैं आपसे वही तो पूछ रहा हूं यदि शंकराचार्य को आप प्रामाणिक मानते हैं तो आप बच्चों को क्या सिखाएंगे? दयानंद
00:51:04:19 सरस्वती जी का जो बचपन का नाम था मूल शंकर तिवारी मूलशंकर तिवारी ठीक है तो अब उनके जो माता-पिता थे हम तो उन्होंने जब उनका नामकरण किया या जिस भी गुरु ने उनका नामकरण किया था तो ऐसा तो है नहीं कि भगवान से अगर उनको विलग करते या भगवान को ना मानते हम ईश्वर को ना मानते हम तो फिर किस प्रकार से उनका नाम फिर गलत था लेकिन देखिए उनके उन्होंने ऐसा कहीं पे भी ये नहीं किया है कि हां ईश्वर नहीं है। मैं पूछ रहा हूं कि आपने कहा हम बच्चों का अध्ययन देखते हैं। जी तो बच्चों को आप जब ईश्वर विषय आएगा तो क्या बताएंगे आपके अनुसार दयानंद जी का अप्रामाणिक भाष्य कि ईश्वर अवतार नहीं ले सकता मूर्ति पूजा गलत है या फिर शंकराचार्य जी का प्रामाणिक भाष्य कि ईश्वर अवतार ले सकता है मूर्ति पूजा भी कर सकते हैं क्या बताएंगे इनमें से बच्चों को जैसे आप पढ़ाने की बात कर रहे हैं ना या या फिर धर्म की शिक्षा दी नहीं जाती गुरुकुल में
00:52:19:25 वो जो ए बी सी डी एफ जी है जो आधुनिक शिक्षा है वही दी जाती है सुनिए जी अध्ययन बच्चे अपने हिसाब से किस गुरुकुल से कर रहे हैं? आपका गुरुकुल क्या है? आपके गुरुकुल की पूछ रहा हूं मैं। आपका आप कह रहे हैं ना यहां व्यवस्था है। जो गुरुकुल की व्यवस्था चलेगी उसमें तो हमें दयानंद सरस्वती जी के सिद्धांतों को बताएंगे। तो फिर आप तो कह रहे हैं कि वो प्रामाणिक नहीं है। जी दयानंद जी की बातें प्रमाणिक नहीं है। जी मैं ठीक है। सुनिए हां जी। अभी जो आपने कहा प्रमाणिक नहीं है। उन्होंने जो प्रमाण दिए वेदों से लेकर के या उन्होंने जो इन सब चीजों में हमारी बात हो गई है। अब मैं इसको थोड़ा सा विराम देता हूं चर्चा को। अ ये थे आचार्य गोविंद जी है ना और आर्य समाज का ये मंदिर है। अभी हम इसकी शूट करेंगे थोड़ा सा इधर-उधर कि हम कहां बैठे हुए हैं। तो आपको ये चर्चा कैसी लगी अवश्य बताएं और जो बिंदु हमने उठाने के प्रयास किए हैं जो विचारणीय हैं आप लोग भी विचार करें। और मेरा यह सुझाव है एक व्यक्तिगत। मैं शंकराचार्य जी का शिष्य हूं कि सबसे पहली बात तो है कि अगर हम स्वयं को आचार्य कह रहे
00:53:34:28 हैं तो हमको कम से कम जो साधारण सिद्धांत हैं बेसिक सिद्धांत हैं दयानंद जी के नाम से उस गुरुकुल से हम लोग जुड़े हुए लेकर के चल रहे हैं। मतलब पढ़े तो हम वैष्णव में हैं। हालांकि एक सिद्धांत तो यहीं गलत हो गया कि हम पढ़े वैष्णव गुरुकुल में है और हमने कार्यालय ज्वाइन किया हुआ है आर्य समाज का। बिल्कुल इत विपरीत बात है। दूसरी बात यह है कि चलो हम जुड़ भी गए हैं अगर दयानंद जी से किसी कारणवश तो दयानंद जी के ही मूल सिद्धांतों को हम हमें अवगत होना चाहिए और हम उनको ही यथावत रखने में निपुण होने चाहिए। तीसरी बात यह है और अगर हम नहीं रख पा रहे हैं तो हमें कहना चाहिए कि नहीं हमको इन चीजों में गति नहीं है। हम पौहित ही जानते हैं। एक तीसरी बात ये आती है कि ये विचारणीय है कि यदि आप दयानंद से जुड़कर के भी कर रहे हो कानून भी इजाजत दे रहा है मुस्लिम के साथ ब्राह्मण को ब्राह्मण के साथ 15 दिन में विवाह करा दो तो ये विचारणीय स्थिति है। क्या ये सिद्धांत लागू होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए? भले ही साल में एक कराएं मगर कराएंगे कि नहीं कराएंगे ये सिद्धांत पे विचारणीय है और बाकी आपने हमें समय दिया यहां पर उसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। आप लोग जरूर हमें बताएं कि ये जो जागरूकता अभियान के निमित्त हमने जो ये प्रस्तुति की आपको कैसी लगी। जय श्री राम। तो ये था हमारा आचार्य जी के साथ एक छोटा सा इंटरव्यू।
00:54:50:00 इस समय हम इस आर्य समाज मंदिर के कार्यालय में बैठे हुए हैं और यहां पर कुछ ग्रंथ भी रखे हुए हैं आर्य समाज के। आचार्य जी ये भगवत गीता जी ये प्रामाणिक भगवत गीता है ये मतलब ये भी आर्य समाज की भगवत गीता है नहीं भगवत गीता तो ये इसमें जो अर्थ किया है आर्य समाज वाला अर्थ है या दयानंद जी वाला अर्थ है भगवत गीता के अर्थ में अंतर आ जाता है ना जैसे दयानंद जी लिखेंगे तो वह लिखेंगे कि अवतार नहीं है उस रूप में और कोई कोई लिखेगा तो उसमें लिखेंगे अवतार है तो यह नहीं यह भगवत गीता वैसे वाली है आर्य समाज सबके पढ़ने के लिए सबके पढ़ने के लिए ये भगवत गीता यहां की है ये आचार्य जी बता रहे हैं वैसे मेरी जानकारी में ये भगवत गीता जो है इस की है ना कह रहे सबके पढ़ने के लिए नहीं ये सबके पढ़ने के लिए नहीं है अगर कोई आर्य समाजी है तो उसके लिए अप्रामाणिक है व्यर्थ है ये हां अगर कोई दयानंद जी को मानने वाला है तो ये व्यर्थ है ये भगवत भगवत गीता इसमें देखिए जैसे आपने कहा कि दयानंद जी ईश्वर का अवतार नहीं मानते और जिस श्लोक को दयानंद
00:56:05:13 जी ने अप्रामाणिक कहा है ना यदा धर्मस ग्लानि भवती भारत वो है चार सात जब भी और जहां भी धर्म का पतन होता है और अधर्म की प्रधानता होने लगती है तबत मैं अवतार लेता हूं ये भगवत गीता कह रही है जी कि भगवान अवतार लेते हैं मगर दयानंद जी अवतार नहीं मानते इसीलिए मूर्ति पूजा नहीं मानते हम तो इस भगवत गीता को आप यह नहीं कह सकते कि यह सबके पढ़ने की है और अगर कह रहे हैं तो फिर दयानंद जी को दयानंद से जुड़ के आपका चलना फिर व्यर्थ हो जाता है थोड़ा सा ये देखिए ये सत्यार्थ प्रकाश है इसी में दिखाता हूं आपको ये देखिए क्या ईश्वर अवतार लेता है व नहीं ये दयानंद जी कह रहे हैं फिर क्या लिख रहे हैं नीचे यदा धर्मसानी ये क्या है जो लोप होता है यह बात वेद विरुद्ध होने से प्रमाण ही नहीं है। ये तो सीधे मना कर रहे हैं। ईश्वर अवतार नहीं लेता। नहीं ये कह रही है कि लेता है। फिर ये आर्य समाज के मंदिर में आर्य समाज के केंद्र में सर देखिए इसके देखिए इससे क्या होता है? मति भ्रम पैदा होता है। भ्रमित होती है जनता। जैसे देखिए ये जनता के हमने आपको क्या कहा कि जो भगवत गीता है भगवत गीता सबके पढ़ने के
00:57:20:16 लिए है। उसका अर्थ सबके पढ़ने के लिए नहीं है। वो सर हमारे शास्त्रों में हमारा है। आपका है कि आप दूसरी पद्धति से जुड़े हैं। हम दूसरी पद्धति से से जुड़े हैं। कहने का तात्पर्य यह है हमारे धर्म के बारे में ज्ञान दें। ये धर्म देखिए आपके धर्म के बारे में जो ज्ञान दे रहा है ना आपके हिसाब से क्योंकि आप आर्य समाज के मंदिर में बैठे हुए हो और उसके संचालन से सीधे तौर पर जुड़े हुए हो। तो आपके अनुसार जिस रूप में आप यहां पर हो आपके अनुसार ये जो है व्यर्थ है। ये गलत है। अप्रामाणिक है। हां। इसको प्रामाणिक कहना ही अपने आप में एक बहुत बड़ी चीज़ है। या तो आप आर्य समाज के रूप में यहां पर ना हो, एक सामान्य मंदिर के रूप में हो, तब आपको ये हो सकता है कि आप इस भगवत गीता को रखो। अच्छा दूसरी बात ये मैं थोड़ा सा ऐसे थोड़ा लाइट उस पे जाकर के पूरा करता हूं। थोड़ा सा अपनी चीजों को आप जानिए। किस रूप में आप है? बस मेरी यही प्रार्थना है। आपसे ठीक है। ठीक है। जय श्री राम। परंपरा के सिद्धांत को ठुकरा देने पर परंपरा विहीन होते हुए परंपरा के अभाव में धर्म की किस प्रकार से दुर्गति हो रही है इसका साक्षात प्रत्यक्ष उदाहरण है यह और इस जैसे अन्य आर्य समाज के मंदिर जी हां जहां गुरु
00:58:35:27 गद्दी नहीं है। जहां यह निर्णय करने वाला कोई नहीं है कि कौन है जो आर्य समाजी है और कौन है जो आर्य समाजी नहीं है। जहां कोई भी स्वयं को आर्य समाजी बोलने के लिए स्वतंत्र हैं। जहां कोई भी स्वयं को दयानंद जी का अनुगामी बोलने के लिए स्वतंत्र है। वहां धर्म की इसी प्रकार से दुर्गति होगी। मूर्खों का जमा होगा। सिद्धांत का पता नहीं है। कानून की आड़ लेकर के वहां पर मलच्छों के हाथ में भी हिंदू बिटियाओं को ब्या दिया जा रहा है। ईश्वर साकार है या निराकार है यह नहीं पता है। पर गुरुकुल अवश्य चला रहे हैं। गुरुकुल में बच्चों को अवश्य पढ़ा रहे हैं। इस की भगवत गीता को प्रामाणिक कह रहे हैं। तो इस तरह के वातावरण को उत्पन्न करने वाला कौन है? भाई जब तुमने एक दिन जिन गुरुओं से शिक्षा दीक्षा प्राप्त की उनका ही उनके ही द्वारा प्राप्त जो सनातन मान बिंदु थे उनके ही द्वारा प्राप्त जो सनातन प्रतीक चिन्ह थे उनको धारण करके सिद्धांत में बदलाव कर दिया तो आपके प्रतीक चिन्हों को धारण करके आपके मान बिंदुओं को धारण करके कोई आपके सिद्धांत में बदलाव क्यों नहीं कर सकता। अब कुछ लोग आएंगे
00:59:51:03 जो कहेंगे भाई यह तो कहीं भी हो सकता है। हो सकता है। परंतु एक जगह जहां पर कानून है ही नहीं इस बारे में कि कोई हमारे नाम का दुरुपयोग दुरुपयोग नहीं कर सकता और एक जगह जहां पर कानून है कि कोई हमारे नाम का दुरुपयोग नहीं कर सकता। इन दोनों स्थितियों में अंतर है। ठीक जिस प्रकार से कोई ऐसा देश जहां पर चोरी करने के विषय में कोई कानून ही ना हो। जहां पर चोरी करना कानूनन अपराध माना जाता हो। इन दोनों ही देशों की स्थितियों में अंतर है। उसी प्रकार से यदि कोई आज प्रामाणिक परंपरा का नाम लेकर के कुछ अनर्गल प्रलाप करता है तो उस पर पाबंदी लगाने के निमित्त आधिकारिक रूप से प्रयास किए जा सकते हैं। उनका सफल होना अथवा ना होना यह सब ईश्वरीय विषय है। परंतु हम अपना कार्य तो कर सकते हैं। कर्मण्यवादी कारस्ते मा फलेशु कदाचना। परंतु यहां तो कोई व्यक्ति कानूनी रूप से आधिकारिक रूप से स्वयं को दयानंद जी का अनुगामी और आर्य समाज मंदिर का संचालक आधिकारिक रूप से होने का दावा करने के लिए अधिकृत है और उसमें यह जो स्वयं को प्रामाणिक
01:01:06:16 बोलने वाले आर्य समाजी है यह कुछ नहीं कर सकते। क्यों नहीं कर सकते? क्योंकि स्वयं ही उस सिद्धांत को उद्भाषित करके बैठे हैं ना कि परंपरा से चलना आवश्यक नहीं है। तो लो जैसे तुमने जिन गुरुओं से वेद लिए उनके वेद को तो धारण कर लिया। प्रतीक चिन्ह के रूप में अर्थ अपना दे दिया। ऐसे ही इन्होंने जिनसे आर्य समाज मंदिर के प्रतीक चिन्ह लिए उन प्रतीक चिन्हों को तो धारण कर लिया। पर अर्थ अपना दे दिया। धर्म अपना लगा दिया। धर्म की दुर्गति और यह दुर्गति हो किसकी रही है? हिंदुओं की दुर्गति, सनातनियों की दुर्गति केवल आर्य समाज की दुर्गति नहीं हो रही है। वहां पर जब कोई बहन बेटी मुस्लिम के साथ बाई जा रही है तो वो केवल आर्य समाज को मानने वाली बहन बेटी नहीं है। वो एक सामान्य और अधिकांशतः एक सामान्य हिंदू गर्भ से आने वाली बहन बेटी है। जिसका बहुत आसानी से किसी म्लेच्छ के साथ विवाह करवा दिया जा रहा है। दयानंद के नाम पर दयानंद जी के सिद्धांतों के नाम पर आर्य समाज के नाम पर जाओ करो इन मंदिरों पर आधिकारिक कार्यवाही तब बात करना आकर के बरसात से बचने की
01:02:21:22 हैसियत नहीं है और गोलीबारी की बात करते हो तुम लोग जाओ पहले इन मंदिरों में जाकर के ठीक करो संशोधन करो इनमें जो दयानंद जी के नाम पर ये जो तुमने खड़ा किया था ना कि मां बाप माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध जो है किसी की भी शादी किसी से भी करा देंगे। उसका ही परिणाम है। परंपरा का विरोध करते हुए तुमने एक नया ताना-बाना खड़ा किया था ना उसका ही परिणाम है। जो आज आर्य समाज के मंदिर में बैठकर के व्यक्ति बोल रहा है कि दयानंद जी मूर्ति पूजक थे। दयानंद जी तो मूर्ति को मानते थे और आजकल जो किताबें छप रही है उसमें मिलावट कर दी गई है। क्योंकि यह बात यही बात एक समय पर तुमने कही थी। समझ गए? इसलिए इन स्थितियों के जनक तुम हो। इस दुर्गति के कारण तुम हो।
01:03:15:27 अपने घर की गंदगी साफ नहीं हो रही है। चले हैं। शंकराचार्य ने यह कर दिया। रामानुजाचार्य ने यह कर दिया। पौराणिकों ने यह कर दिया। घिन आती है ऐसी विचारधारा से। नहीं तो जाओ। सिद्ध करो जाकर के कि यह आर्य समाजी नहीं है। दयानंद को मानने वाले नहीं है। कर सकते हो कैसे करोगे? दयानंद जी के सिद्धांतों को यह लोग मान रहे हैं कि नहीं मान रहे हैं? कैसे सिद्ध करोगे? किताबें लाओगे ना? कह दी इसने मिलावटी है। क्या लाओगे? मनुस्क्रिप्ट? कैसे विश्वास करें कि वो वही मनुस्क्रिप्ट है जो उन्होंने लिखी थी। क्योंकि परंपरा तो मानते नहीं हो ना कि किसके माध्यम से इन किताबों को तुम प्राप्त कर रहे हो। वही उसका अर्थ सही बताएगा। परंपरा तो हम मानते नहीं हो तो बोल दिया इसने मूर्ति पूजक थे अप्रामाणिक थे ये सब बोला इसने सिद्ध कर सकते हो बिना परंपरा के सिद्धांत के कि ये आर्य समाजी नहीं है भाई अगर तुम यह कहो कि यह दयानंद के सिद्धांतों को नहीं मानता है इसलिए आर्य समाजी नहीं है तो दयानंद जी के सिद्धांत क्या थे इस विषय में कौन प्रामाणिक होगा ये तो कह रहा है मिलावट हो गई उनकी किताबों में यह है दुर्गति
01:04:31:03 धर्म की। तुम लोग कहते हो ना बहुत बड़े समाज सुधारक थे। यह दिया है तुमने समाज को। जगह-जगह धर्म के नाम पर धंधा और जिहाद को पोषण करने वाले इस तरह के केंद्र खुलते हैं। जहां पर जिसके लिए हिंदू लड़ता मरता है ना अपनी बहन बेटी को बचाने के लिए। उन्हीं बहन बेटियों को बड़ी आसानी से 15 दिन के ट्रायल के बाद मलच्छ के हाथ में सौंप दिया जाता है। ₹5100 लेकर के यह दिया है तुमने सनातन समाज को। जय श्री राम।
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आर्य समाज मंदिर का चौंका देने वाला खुलासा
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