⬜ Not used yet · 00:00:01:28 – 00:00:52:04 (0:50)
00:00:01:28 [घंटी की आवाज़] सर्वप्रथम अधिकतम आप में से जितने लोग हैं वो ये सब जानते होंगे कि आर्य समाज जो है वो मूर्ति पूजा का पक्षधर नहीं है। सैद्धांतिक रूप से हम लोग इससे इसमें अपनी आस्था नहीं रखते। तो हम यदि सैद्धांतिक रूप से देखें तो जो हम कहते हैं ईश्वर व्यापक है उसकी व्यापकता का जब तक हमें सम्यक आभास नहीं होगा जब तक इस बात को हम समझ नहीं लेंगे तब तक व्यापक ईश्वर से हम पूरा लाभ नहीं उठा पाएंगे तो आर्य समाज की मुख्य विचारधारा है कि ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं क्योंकि व्यक्ति होगा तो जन्मेगा जनमेगा तो मरेगा ईश्वर को जन्मने और मरने वाला कोई भी नहीं मानता है और उसे सर्वव्यापक मानते हैं क्योंकि वो हर स्थान पर है हर स्थान पर है तो न्यायकारी है। यदि वह सब स्थान पर होगा ही नहीं तो न्याय कैसे करेगा?
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→ Used in: A · Video सर्व व्यापक ईश्वर एकदेशीय कैसे हो सकता है? अवतारसिद्धि at 23:37 ↗
00:00:52:04 इसमें आचार्य एक चीज हमने देखी कि अगर ईश्वर को न्यायकारी होना है तो उसका सर्वव्यापक होना आवश्यक है। आवश्यक है। है ना? तो इसमें जैसे हम ये देखते हैं कि जैसे मान लीजिए न्यायकारी होना है। यानी कोई ना कोई क्रिया करनी है। जैसे कि ईश्वर ईश्वर सर्वव्यापक तो है पर क्रिया भी उसने की। कहीं पर उसने सूर्य बनाया, कहीं पर उसने पृथ्वी बनाई और तभी वो सृष्टि की रचना कर रहा है। है ना? जी हां हां। यदि दुनिया में कोई भी जड़ पदार्थ इधर से उधर मूव करेगा ईश्वर के कारण तो उसमें ईश्वर का धक्का बल इत्यादि लगेगा। जो बल होने की बात स्वीकार की है सभी ग्रंथों में वो बात है वो देखो जड़ जगत में वो अलग तरह से प्रकट करता है अपने को और चेतन जगत में वो अलग तरह से प्रकट करता है। इसका मतलब ईश्वर ईश्वर ये रेगुलेट कर सकते हैं कि वो कहां पर शक्ति के रूप में ज्यादा प्रकट हो और कहां पर शक्ति के रूप में कम प्रकट हो। ठीक है?
00:01:51:15 हां। इसका मतलब जिस प्रकार से वो जड़ पदार्थों के लिए धक्के इत्यादि का विषय बन रहा है। उसी प्रकार से वो प्रकाश के मार्ग में भी धक्के का टकराने का विषय बन सकता है। निराशी विशेष नहीं नहीं बन सकता। जो अत्यंत सूक्ष्म होता है वो बाधक हो ही नहीं सकता। बाधक होने के लिए उसका स्थूल होना जरूरी है। किसी भी अर्थों में तो फिर वो तो फिर वो ये जो जड़ पदार्थ है पृथ्वी इत्यादि मिट्टी के कण इनके लिए बाधक कैसे बना? फिर रचना कैसे की उसने? एक तो हम ईश्वर को ना किसी पुरुष के नजरिए से ना देखें। परमात्मा की जो स्थिति है वो संसार में सर्वोपरि है। और हम जो उसे देख रहे हैं हम एक मानवीय दृष्टिकोण से उसे देख रहे हैं। सबसे पहले ये दृष्टिकोण छोड़ना होगा। तो कहने का मतलब यह है जब हम यहां पर यह मान लेते हैं कि ईश्वर के कार्य मनुष्य दृष्टि से समझ में ना आने वाले हैं तो वहां पर भी मान लेना चाहिए। नहीं तो यदि हम वहां पर तर्क कर रहे हैं कि जो सर्वव्यापक है वो मूर्त रूप में क्यों नहीं आ सकता है तो फिर हमें यहां पर भी जवाब देना चाहिए कि फिर वो यहां पर कैसे कर रहा है? और वैसे मैं एक बात आपको बताऊं ईश्वर विषय पर मैं चर्चा नहीं करना चाहता हूं। वैसे बेसिकली मैं अपना निजी विचार बता
00:03:06:16 रहा हूं। उसका अब इसमें क्या है? अब यही मैंने यही शुरू किया था कि आप मनुष्य की वस्तुएं भगवान पे आरोपित ना करें। वास्तव में तो मैं इसे समझ भी नहीं पाया। मैं सच बताऊं तो आपको अब तक से समझा तो आपके बेटे बात नहीं समझ पा रहा। आप ये बाधा शब्द का प्रयोग क्यों कर रहे हो बार-बार? बाधक्षेपक वाली बात नहीं समझ में आई। ये क्या कहना चाह रहे हो आप? मुझे बाधक ही नहीं समझ में नहीं आया मुझे तो अब तक। तो तर्क की दृष्टि से भले ही मूर्त रूप धारण करना सिद्ध हो सकता हो। मगर नहीं सिद्ध करिए। करो हो सकता नहीं। आप सिद्ध करिए तर्क से ऐसा हो सकता है। बताइए तो भाई साहब मैं कह तो रहा हूं कि आप जब यह तय करने चलेंगे कि उसने सृष्टि कैसे बनाई उसी से तय हो जाएगा कि वो अवतार कैसे लेगा? अच्छा आप क्या सोचते हैं ईश्वर ने सृष्टि कैसे बनाई? मैंने आपकी दोनों बातें ले ली है। अगर वो धक्के का विषय बनेगा तो प्रकाश के मार्ग में बाधक बन जाएगा। और अगर आप अगर अगर आप अचिंत शक्ति मान रहे हैं। आप यह नहीं बता पा रहे हैं वो कैसे जड़ पदार्थ जड़ पदार्थ मूव कैसे किया। आप अगर यह नहीं बता रहे हैं तो फिर हम यह कहेंगे कि वो अचंत शक्ति से ही अवतार धारण करेगा। यह तर्क की मेरी दो बातें हैं। जी
00:04:14:09 अब आप प्रश्न क्या करना चाहते हैं वो बताइए आप। तो ये बेटे साक्षात्कार का विषय है। ये इस तरह की चर्चा का विषय नहीं
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00:04:20:16 है। जी। जैसे बंधन का मतलब हो गया। यदि हम विचार उन्मुक्तता की बात करें के जिसके मन में जो आए वो कहे जिसके मन में जो आए वो सिद्धांत खड़ा कर दे लेकिन आश्चर्य की बात है कि ये सिद्धांत गणित में नहीं है मनमानी गणित में नहीं चलती मनमानी विज्ञान में नहीं चलती ये धर्म में मनमानी चलती है क्योंकि इसको विषय एक विषय के रूप में हम कभी मानते नहीं ना जानते ना पढ़ते तो ये ध्यान रहे हर विषय की अपनी परिधि है सीमाएं है उन सीमाओं में जो बंधा हुआ है वही लक्ष्य तक जाएगा। जो बिखरा हुआ है वो लक्ष्य तक [हंसी] नहीं जाएगा। पैरामीटर कौन है? मैं नहीं हूं। मैं पैरामीटर नहीं हूं। पैरामीटर है ऋषि। पैरामीटर है मुनि, ऋषि, मुनि, योगी, वेद वो पैरामीटर है। ठीक है? अब हम लोग शास्त्रों की बात करते हैं कि शास्त्र में कहां लिखा है? इस पर जाने से पहले मैं एक बात पूछना चाहूंगा कि आर्य समाज के पास ये वेद कैसे आए?
00:05:28:28 असल में क्या था जब ऋषि दयानंद सरस्वती यहां घूमे गए दाएं बाएं जहां भी काशी आदि तो वहां पूर्ण रूप में उनको चीजें प्राप्त नहीं हुई तो उन्होंने फिर ये जर्मनी से मंगवाए उन्होंने किससे वेद लिए थे जर्मनी में जर्मनी में कोई व्यक्ति थोड़ी जर्मन से उन्होंने मंगवाए थे उन्होंने किया कि ये वेद है अच्छा अच्छा हां उन्होंने तय कैसे किया अच्छा देखो ये है कि वो हम इसको तय नहीं करते कि वेद है वेद की रचना छंदोबद्ध रचना है। उसके अंदर स्वर है, ऋषि है, देवता है और हर चीज का एक हिसाब किताब है। एक प्रकार एक रचना है। तो जब हम ये देखते हैं कि सारी ठीक है तो भी हमें पता चल जाता है कि वेद का मंत्र है। तो ये जो वेदों को पहचानने की व्याख्या है ये दयानंद जी के पास कैसे आई? छह ग्रंथ पढ़ने पड़ते हैं बेटे। वेदों के पढ़ने से पहले छह ग्रंथ होते हैं। षडंग कहते हैं उनको। निरुक्त कल्प छंद ज्योतिष आदि ये छह होते हैं। छह ग्रंथों को पढ़ने से पता चलता है कि कौन किसको हम मंत्र मंत्र संज्ञा किसकी है? किस दयानंद जी ने किसी व्यक्ति से वेद लिए तो क्या किसी से भी वेद लेने को हम ये मान ले कि वेद है तो हम लोग ये प्रमाणित कैसे कर रहे हम लोग ये प्रमाणित कैसे कर
00:06:44:02 रहे हैं कि वो वेद ही है जो हम ले रहे हैं वेदों के नाम पे। अगर हम कहें कि षडांग के आधार पर हमने प्रमाणित किया तो हमें यह देखना होगा वो षडांग हमें किसने दिए। आपसे मैं पूछूं कि आपको वेद किसने दिए? तो आप कहोगे ना दयानंद जी ने दिए। नहीं दयानंद जी हां ठीक है। उन्होंने मंगाए और हम उनसे पढ़ रहे हैं। बिल्कुल ठीक है। हां। अब दयानंद जी से लिए हुए वेद आप इसलिए मानते हो क्योंकि आपको दयानंद जी पर विश्वास है। चलो कह भी सकते हो लेकिन उसके अलावा उन्होंने ऐसी बहुत सारी चीजें दी है कि हम परीक्षण भी कर सकते हैं। ये जो ये जो परीक्षण की विधि है ना ये भी जिससे ली होगी उस पर आपको विश्वास होना चाहिए। ये जो आप मेरी बात समझो अब आपने कहा जी बच्चे ने अ लिखना सीखा तो कहते हैं भई किसी पे ये अ कहां से आया और किसी पे इस पर विश्वास होना चाहिए। अब एक बात बताओ हमने अ लिखा मैं बता रहा हूं हमने आ लिखा और अंग्रेजों ने ए लिखा ठीक है अब आप कहेंगे ये तो भेद हो गया दोनों में वो कह रहे हैं ए माने ए और हम कह रहे आ माने आ दूसरी भाषा में उसकी लिपि दूसरी हो जाएगी मैं बता रहा हूं कि आ का अर्थ क्या है और उपयोग क्या है इस विषय में जो हमारा निर्णायक स्त्रोत है वो हमारे सामने व्यवहारिक है जैसे कि मगर जो वेद इत्यादि है वो अती्द्रिय विषय है अती विषय जैसे
00:07:59:06 गायत्री मंत्र से मुक्ति मिलेगी कि नहीं मिलेगी इसका निर्णय मैं यहां पर व्यवहारिक जगत में नहीं कर सकता हूं। तो इसमें मुझे विश्वास करना होगा कि जिससे मैं गायत्री मंत्र ले रहा हूं उस पर मुझे विश्वास है कि हां ये गायत्री मंत्र के नाम पर मुझे वही गायत्री मंत्र दे रहा है जो आज से कई वर्षों पूर्व हमारे ऋषियों ने जिसका दर्शन किया था। तो जिससे हमने गायत्री मंत्र लिए उसके यदि अर्थ पर विश्वास नहीं है तो हम यह कह रहे हैं कि वह हमको झूठ बोल सकता है अज्ञानता वश या किसी लोभ लालच वश वो हमें झूठ बता सकता है तो वो जो गायत्री मंत्र को हम मंत्र मान रहे हैं वो भी झूठा हो सकता है। हो सकता है कि ईश्वर ने कुछ और दिया हो और वो हमें झूठ कह रहा है। और तो इसके लिए सबसे पहले तो ये जरूरी होगा कि दयानंद जी ने मंत्र लिए कहां से? एक्सजेक्टली ये पता होना चाहिए। स्वतंत्र रूप से लेकर स्वतंत्र भाष्य किया या किसी प्रामाणिक परंपरा प्राप्त आचार्य से लिए। जी मैंने कहा वेद का मंत्र एक छंदोबद्ध रचना है। स्वरों में बंधी हुई रचना है। उसके अपने उसके छंद है अलग-अलग। उसके स्वर है उसके प्रकार है। आप किसी दूसरे शब्द की कविता में वो प्रकार डाल ही नहीं सकते। जी मैं ये कह रहा हूं कि यह जो है हमने यह कहा कि वेद मंत्रों को हम जो है एक निश्चित नियमावली
00:09:14:21 है। उसके द्वारा पहचानते हैं कि यह वेद मंत्र है। ठीक है? अब यह जो निश्चित नियमावली है यह हमने जिससे [गला साफ़ करने की आवाज़] ली जिससे भी ली क्या हमें उस पर विश्वास नहीं होना चाहिए जो हमें निश्चित नियमावली दे रहा है वेद मंत्रों को पहचानने की बेटे वो तो जब आप पढ़ोगे ना तो आपको तभी पता चल जाएगा कि तो मैं ये कह रहा हूं कि जैसे मैंने आपकी बात मान ली कि जब मैं पढूंगा डायरेक्ट जाकर के तब मुझे पता चलेगा। तो मैं किसी से पढ़ने कहां पर जाऊं वेद ये बताइए आप मुझे। कौन प्रामाणिक रूप से वेद पढ़ा रहा है? जी अनम्यूट करो। आप प्रमाणिक रूप से जो अगर वेद पढ़ना चाहते हैं तो आप गुरुकुलों से संपर्क कर सकते हो। हमारे यहां रेवली गुरुकुल है पास में ही। आप आप जो मूर्ति पूजक हैं जो वेदों का अर्थ मूर्ति पूजा बताते हैं उसको प्रामाणिक मानते हैं क्या? नहीं मानते। तो फिर मैं ये तय कैसे करूं कि वो प्रामाणिक नहीं है। आप प्रामाणिक हो। हां ये तो भाषा के नियम तय कर देंगे। अब अब किसी ने कहा मैं सुनो मेरी बात। अभी एक एक मिनट इसका मतलब आपसे मुझे जो है प्रामाणिक रूप से अध्ययन करने से पहले मुझे ज्ञात होना चाहिए कि जो है नियम क्या है? जी आप फिर वही बात कर रहे हो। आप तो कह रहे हो स्कूल जाने से पहले पता चलना चाहिए कि स्कूल प्रमाणिक है कि नहीं। ऐसा नहीं होता। वो प्रमाणिक ही है।
00:10:29:22 आप ही तो कह रहे हो। आप जाओ पढ़ो तो पता चलेगा। आप जाके तब जाके पता पढ़ो ना बेटा तब पता चलेगा। मुझे बताइए ना कि मैं शंकराचार्य के यहां क्यों ना जाऊं और आर्य अब मैंने बता तो दिया आपको कि इसमें जो जो रिफरेंट और कॉन्टेक्स्ट चल रहा है किस विषय में कौन मंत्र जा रहा है उसी विषय व्याख्या होगी जो उसके विरुद्ध व्याख्या करेंगे तो वो व्याख्या नहीं मानी जाएगी ये तो स्पष्ट सी बात है संजीव जी ये तो तब है ना जब मुझे मालूम हो कि वेद में क्या चल रहा है क्या नहीं चल रहा है ये तो तब होगा ना अभी तो मैं न्यूट्रल है मुझे तो कुछ पता ही नहीं ना कहां वेद में क्या है क्या नहीं है तो मैं कैसे निर्धारित करूंगा कि ये प्रामाणिक है जाने से पहले यह तो आप जो बोल रहे हो तब है जब मैं अंदर जा चुका हूं और मुझे मालूम पड़ गया क्या है क्या नहीं है उसमें आपने कहा कैसे डिसाइड करूं तो उसके लिए पढूं उनको बस पढ़ने से ही पता चलेगा आपको एक बड़ा लंबा समय देना होगा बट ढंग से उसको पढ़ना होगा और अपने आप चीजें स्पष्ट हो जाएंगे कुछ भी नहीं इतनी बहस इसलिए करनी पड़ रही है क्योंकि परंपरा से जो पठनपाठन की जो विधि है उस तरह से नहीं पढ़ा गया है इसलिए बहस हो रही है तो परंपरा क्या है आर्य समाज की वही तो पूछ रहा हूं रेवली गुरुकुल में जा रेवली गुरुकुल किसी भी गुरुकुल में चले जाओ आर्य समाज से जुड़े हुए देखिए आप अब यहां पे देखिए क्या हो रहा है। आपने कहा कि आपको किसी को गुरु को प्रमाण मानने की आवश्यकता
00:11:45:03 नहीं है। परंतु जब मैं पूछ रहा हूं आपसे कि कौन सा गुरुकुल प्रमाणिक है तो आप अपने आप को प्रमाण रूप में वहां ज्ञापित करना। हां देखो क्या है हमें ये भी देखना है कि कहां पठनपाठन विधि पूर्वक हो रहा है। वेदोक्त विधि जो पठनपाठन आप ये चाहते हो आप ये चाहते हो कि मैं आपको प्रमाण मान लू। आप यह चाहते हो कि मैं आपको प्रमाण नहीं मुझे नहीं बेटे मुझे नहीं फिर गलती कर रहे हो आप मुझे क्यों प्रमाण मान रहे हो मैं थोड़ी प्रमाण हूं मैं नहीं तो मैं नहीं जो लोग इस विषय में परिश्रम कर रहे हैं जिन्होंने जीवन खपाया है उनके पास जाओ जैसे तय करते हो स्कूल जाके आपके द्वारा बताया मैं क्यों जाऊं आपके द्वारा बताए हुए मैं क्यों जाऊं किसी और में क्यों मत जाओ मत जाओ फिर आप ये तो आपकी यानी कोई यानी कि कोई निश्चित नियम नहीं है आपके पास पहचान फिर वही मैंने आपको निश्चित नियम बताया कि ऐसे पढ़ लो आप कह रहे हो मैं आपको ये बात मानूंगा नहीं आप नियम नहीं बता रहे हो आप सीधे बोल रहे हो वहां चले जाओ नियम नहीं है ये मैं उसको मैं उसको प्रमाणिक क्यों मानू ये पूछ रहा हूं ना मानो यानी आपके पास निश्चित निश्चित नियमावली नहीं है प्रमाणिक अथवा अप्रामाणिक में अंतर करने के लिए मेरी बात सुनो मैं तो आपको बता रहा हूं जो ऋषियों के द्वारा दी गई चीजें वो प्रमाणिक है जो मनुष्यों के द्वारा प्रचलित है वो अप्रामाणिक है तो कैसे पता करें ये ऋषियों के द्वारा दिया गया है जो आर्य समाज बता रहा है पढ़ो पढ़ो इसका तो किसी के पास भी इलाज नहीं यानी यानी कि मैंने इंटरनेट खोलूं
00:13:00:14 वहां से वेद डाउनलोड कर पढ़ पढ़ो पढ़ो पढ़ो कहीं भटकोगे कुछ उल्टम पलटम करोगे तो कुछ शायद समझ में भी आए ये आपकी इच्छा है ना बेटा आपको स्कूल जाना है मैं सेंट मैरी में जाऊं मैं डीएवी में जाऊं मैं सनातन धर्म वाले में जाऊं जिसे मर्जी जाओ पढ़ो पढ़ना ही उपाय है और कोई उपाय नहीं आप हां जी तो दयानंद जी के पूर्वज कौन थे जो कहां से पढ़े थे जहां से उनको सफलता मिली थी दयानंद जी के पूर्वज कहने कहने का मतलब हम लोग यहां पे क्यों आए हैं मैं बता दूं क्यों आए हैं उनकी उनके जो पिताजी थे कृष्ण जी तिवारी औदित्य ब्राह्मण थे उनके गर्भ के अंदर वेद पाठ की बड़ी अच्छी परंपरा थी और उनको उसी समय में हां उनके यहां परंपरा थी वेद पाठ की यानी कि शुक्ल यजुर्वेद के विषय में जो उनके आने वाले आचार्य हैं वो दयानंद जी के प्रमाण है। संगीिता उन्होंने संगीिता बताई सिर्फ संगीिता पाठ केवल पाठ जैसे मान लीजिए हमने किसी आचार्य को यह माना कि इससे हमारे पास यजुर्वेद आया है वही आचार्य बता रहा है कि भैया यहां शिवलिंग की पूजा हो रही है वेदों के अनुसार हो रही है और हम कह रहे और हम ये कह रहे हैं कि नहीं इस विषय में तुम झूठ बोल रहे हो तुम अंधे हो हमें पता है कि यहां पर जो है जो है गलत है तो अगर वो हमसे झूठ बोल सकता है तो वो हमको गलत मंत्र
00:14:15:22 भी दे सकता है और यदि वो हमें सही मंत्र दे हमें विश्वास है तो फिर हमें उसके अर्थ पर भी विश्वास करना होगा। मेरा कहना है बस था वो। सुनो जैसे जब उन्होंने व्याख्या करी तो आप इसी से बेटे अंदाजा लगाओ कि उनके पिताजी रहे शिव जी के पुजारी बिल्कुल घोर और बड़े बड़े अच्छे वाले मतलब जिनको आप कह सकते हो बिल्कुल शव मत के बड़े अच्छे वो मानने वाले थे और उनकी शिव जी के प्रति बड़ी आस्था थी। इसमें कोई खराब बात भी नहीं है। लेकिन ऋषि दयानंद सरस्वती जी ने अपने पिता के द्वारा जो उनकी परंपरा से था, अच्छा था, बुरा था, उन्होंने ठीक गुरु से समझा कि गलत गुरु से समझा हमें नहीं पता। लेकिन ऋषि दयानंद सरस्वती ने 17 18 वर्ष लगाए इस बात को जानने के लिए कि जो ये जो चल रहा है ये युक्ति संगत तर्क संगत है कि नहीं? वो कह रहा हूं कि दयानंद जी ने जिससे वेद मंत्र लिए उस पर दयानंद जी को विश्वास नहीं था। बाद में उन्होंने वेदों की स्वतंत्र व्याख्या की अपनी बुद्धि से। ठीक है? अब उन विश्वास नहीं था। उस समय तो उन्होंने याद कर ही लिया था ना। एक मिनट आपने कहा एक जगह कि हमें परंपरा से पठनपाठन करना चाहिए। पर आप वहीं पर दूसरी जगह कह रहे हैं कि दयानंद जी ने परंपरा से पठनपाठन नहीं किया क्योंकि उनके यहां की जो परंपरा थी उसके विरुद्ध उन्होंने 17 साल जाकर के पढ़ाई की और जो है उन्होंने अपना स्वतंत्र व्याख्यान दिया।
00:15:30:28 हां बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल तो अब इसी के लिए उन्होंने जीवन लगाया और लोगों को ये समझाने की कोशिश की कि मैंने जैसे मैंने अपना जीवन नष्ट कर दिया बिना बात के तो मैं ऐसी परंपरा चीजें बना के जाऊंगा कि लोगों का जीवन नष्ट ना हो। उनको चीजें जल्दी और रिफाइन रिफाइन रूप में समझ में आ जाए। यानी कि वो स्वयं तो परंपरा को तोड़ रहे हैं मगर आगे चाहते हैं कि लोग परंपरा को थोड़ी तोड़ रहे हैं। बेटे प्राइमरी क्लास में पढ़ने वाला बीए में पढ़ने लगे तो वो मैथ की परंपरा तोड़ रहा है। अरे पांचवी का मैथ अलग है। बीए का मैथ अलग है। अब बीए में जाने के बाद ये नहीं होता है कि पांचवी की पढ़ाई गलत है। यहां गलत है। मैंने आपको आप समझे नहीं। मैंने आपको शुरू में ये बात कही थी कि कोई व्यक्ति विग्रह पर आस्था करता है। आप आप मेरी बात समझ ही नहीं रहे। आपने दो घंटे खराब कर दिए। आप लास्ट में यह कह देते हो ना वेदों में मूर्ति पूजा नहीं है। वेदों नहीं है नहीं। फिर मैं तो अभी भी कह रहा हूं। वो बात तो मैं आपको आप मुझसे कभी नहीं कह लो। यही है कि आप पांचवी के पांचवी की पढ़ाई को गलत बता रहे हो। या तो फिर आप सिद्ध करिए अपनी चीजों को। तो सिद्ध करने के नाम पे आप परंपरा बता नहीं रहे हो। तर्क बता नहीं रहे हो। शास्त्र कहां से आए वो बता नहीं रहे हो आप। जी। देखो बेटे यह जो वर्तमान में समय है यह इस बात के झगड़ने का नहीं है।
00:16:46:16 कि मूर्ति पूजा सही है कि निराकार पूजा सही है। तुम ऐसे ही मारे जाओगे। यह जो तुम कर रहे हो ना यहां बैठ के ये हम जो झगड़ रहे हैं ना तुम मुझे शत्रु फिर आप गलत तरीके से बोल रहे हैं। मारे जाओगे ये सब नहीं बोलना चाहिए। आप विषय पर रहिए। दूसरी बात यह है लाइन को क्रॉस करके लाइन को क्रॉस करके आप हमें गलत ठहरा करके झगड़ तो आप रहे हो ना। मैं तो आपसे नहीं कह रहा हूं कि नहीं वेदों में निराकार की पूजा नहीं है। आप मुझसे कह रहे हो कि वेदों में साकार की पूजा नहीं है। तो झगड़ तो आप रहे हो। मुझे गलत तो आप ठहरा रहे हो। आखिर में कह रहे हो तुम मारे जाओगे। तो यह सब गलत बात है भाई साहब। ऐसी बातें ना करें कृपा करके। जी देखो ऐसा यही तो मजा है। कोई व्यक्ति दूसरा भी उसको देखेगा तो बड़ा ही खुश होएगा कि देखो भैया दोनों हिंदू आर्य हैं। एक अपने आप को आर्य कहता है। एक अपने आप को हिंदू कहता है और आज तक ये फैसला ही नहीं कर पाए कि सही और गलत क्या है। तो ऐसे लोग अच्छा चारा बनते हैं दूसरे लोगों के लिए जो बिल्कुल जिनके सिद्धांत हो सकता है गलत हो। लेकिन उस पर वो बड़ी बड़ी तत्परता से चलते हैं। बड़े अच्छे से उसका पालन करते हैं। हम सिर्फ बहस करते हैं। मैं इसलिए मैं ये कह रहा हूं कि मूर्ति आप कह रहे हो कि आप मूर्ति पूजा को भी सही ठहरा रहे हो। ठहरा नहीं रहा बेटे बेटे। मैं ये ठहरा रहा हूं कि भारत में बहुत से लोग मूर्ति पूजा करते हैं। क्या मैं उनसे शत्रुता कर लूं? शत्रुता कर लूं उनसे। मैं उनको स्वीकार कर रहा
00:18:01:20 हूं। ये मैं उनका विरोधी नहीं हूं। देखो आर्य समाधि होने का अभिप्राय मूर्ति पूजा का विरोधी नहीं है। ये क्या बात हो गई यार? आप तो कुछ और ही सिद्ध करने में लगे हो। ये इससे तो हम बट जाएंगे और यह समय आज का समय बटने का नहीं है। आज का समय इकट्ठे होके चलने का है। मैं मैं इस दृष्टि से सामंजस्य बैठा रहा हूं। अपने को बड़ा दिखाने के लिए नहीं बेटे अपने देश की रक्षा के लिए हिंदुत्व की समृद्धि के लिए हम लोगों का एकजुट रहना जरूरी है। ये यहां ये लड़ाई मेरी और तुम्हारी नहीं है बेटे। अच्छा मेरी समय क्या हो गया? समय समय एक मिनट। समय एक घंटे 50 मिनट हो गई हमारी चर्चा। तो अब ना फिर इसको अगले उसमें रखें सत्र में। आशा करता हूं आप लोगों को आज की चर्चा काफी मतलब कुछ ऐसी लगी हो जिससे आपको कुछ सीखने को मिले और हो सका तो हम और आचार्य जी एक बार दोबारा कभी ना कभी कनेक्ट होंगे और इस चर्चा को आगे बढ़ाएंगे। आपका आने के लिए बहुत-बहुत आभार आचार्य जी। बहुत धन्यवाद। बहुत धन्यवाद।
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