1
00:00:00,400 --> 00:00:06,400
ओम

2
00:00:24,000 --> 00:00:28,000
अब जैसे तुम्हारा बिलीव है कि वो सही है तो मेरा बिलीव है कि वो सही

3
00:00:28,000 --> 00:00:32,160
है। दोनों ने अपनी रिसर्च परंपरा वाले

4
00:00:32,160 --> 00:00:36,320
तो आपने खुद भी रिसर्च की देखी पूरा इतिहास मिल रहा है उसमें तो नहीं

5
00:00:36,320 --> 00:00:42,320
उसमें कई सारी चीजें हैं जैसे कि

6
00:00:43,600 --> 00:00:47,760
उसमें क्या व्याकरण की परंपरा है वो? हां

7
00:00:47,760 --> 00:00:51,840
उसका पूरा इतिहास है ना उसमें इसको तो वह जो पुस्तक है

8
00:00:51,840 --> 00:00:55,840
ना उसको सब ने स्वीकार किया उसे उस पुस्तक के

9
00:00:55,840 --> 00:01:00,080
लिए युधिष्ठिर जी को काशी के पंडितों से उपाधि मिली

10
00:01:00,080 --> 00:01:04,320
थी महापंडित की गवर्नमेंट ऑफ इंडिया से देखो जब

11
00:01:04,320 --> 00:01:08,320
जब कोई पुस्तक आ जाती है ना कि उन्होंने लिखी है

12
00:01:08,320 --> 00:01:12,400
सबसे पहली तो वो एक भाई मेरे सामने पहली बार आई

13
00:01:12,400 --> 00:01:16,480
है तो सबसे पहले तो वही हो जाता है कि ये पुस्तक कितनी प्रामाणिक है उनमें

14
00:01:16,480 --> 00:01:20,880
उसमें उसमें जो बातें लिखी गई है उससे कितना लोग मतलब क्या उसकी क्रेडिबिलिटी

15
00:01:20,880 --> 00:01:25,040
है वो एक जांच का विषय हो जाता है दूसरी बात ये है कि

16
00:01:25,040 --> 00:01:29,200
परंपरा तो आफ्टर ऑल व्याकरण की है वेद अथवा वेद अथवा वेदार्थ

17
00:01:29,200 --> 00:01:34,000
की तो नहीं है वेदार्थ तो व्याकरण क्या है वेदार्थ ही तो है

18
00:01:34,000 --> 00:01:38,080
आप ये बताइए व्याकरण नियम व्याकरण तो नियम है ना नहीं नहीं मैं

19
00:01:38,080 --> 00:01:42,160
जैसे मैं जैसे ये बताइए जैसे आप जो शंकर संप्रदाय है उसमें चार

20
00:01:42,160 --> 00:01:46,560
चीजें पढ़ाते हैं ठीक है मीमांसा न्याय वेदांत और व्याकरण ठीक है

21
00:01:46,560 --> 00:01:51,360
अब ये बताइए उसमें से वेद का अर्थ किससे करते हैं? व्याकरण से करते हैं। अगर व्याकरण

22
00:01:51,360 --> 00:01:55,440
वेद का अर्थ छोड़ दिए। व्याकरण नहीं रहेगा ना वेदांत भी नहीं पढ़ पाएंगे। अर्थ वो

23
00:01:55,440 --> 00:01:58,800
भी नहीं कर पाएंगे। व्याकरण नहीं रहेगा वो नहीं पढ़ पाएंगे। वो सही

24
00:01:58,800 --> 00:02:02,880
है मगर कई जगह वहां पे जैसे कि कोई अर्थ निकल रहा है। अब

25
00:02:02,880 --> 00:02:06,880
उस अर्थ में जो व्याकरण के अनुसार शाब्दिक अर्थ निकल रहा है वो

26
00:02:06,880 --> 00:02:10,960
ना लेके और जो है जो अलंकारिक अर्थ या भावार्थ उससे लेते हैं

27
00:02:10,960 --> 00:02:15,040
ना ब्राह्मण ग्रंथों से। नहीं तो वेद अकेले थोड़ी पढ़े

28
00:02:15,040 --> 00:02:19,360
जाते हैं। वेद का एक एक अर्थ क्या है? एक एक जो आपको मंत्र मिलते हैं ना

29
00:02:19,360 --> 00:02:23,520
उसमें कहां अलंकार है? क्या है? क्या नहीं है? कहां क्या चीज है? क्या कौन

30
00:02:23,520 --> 00:02:27,520
सा कर्म ब्राह्मण ग्रंथ में बता वो मतलब केवल वो व्याकरण से नहीं हो

31
00:02:27,520 --> 00:02:31,520
पाएगा। उसमें आपको भाव भी ले चलना पड़ेगा। जैसे भाव है ना वो ब्राह्मण ग्रंथों

32
00:02:31,520 --> 00:02:35,840
से जैसे कि सर्वशक्तिमान की ही बात ले ले। मान लो तो

33
00:02:35,840 --> 00:02:39,840
सर्वशक्तिमान जो है वो सर्वज्ञ

34
00:02:39,840 --> 00:02:44,320
में सब कुछ है और क्या कहते हैं? सर्वव्यापक

35
00:02:44,320 --> 00:02:48,560
में भी सब कुछ है। मगर सर्वशक्तिमान में कि भैया वो सब वो

36
00:02:48,560 --> 00:02:52,640
इन सब से ज्यादा है। जीव से ज्यादा है। वहां पे सब कुछ नहीं है।

37
00:02:52,640 --> 00:02:56,960
तो यहां क्या हुआ? व्याकरण खत्म हो गए। यहां भाव लेना पड़ा। नहीं उसमें

38
00:02:56,960 --> 00:03:01,040
देखिए ये कहते हैं इस चीज को ये वाला जो कांसेप्ट आप कह रहे हैं इसको मैं

39
00:03:01,040 --> 00:03:05,200
क्लियर करूंगा। ये ऐसा है कि जब मैं इस विषय में बताऊंगा

40
00:03:05,200 --> 00:03:09,360
तो ना इसमें आपकी तरफ से विरोध आएगा ना मेरी तरफ से विरोध आएगा। और दूसरी बात यह है कि

41
00:03:09,360 --> 00:03:13,360
जैसे मान लो कि व्याकरण की परंपरा है। हम

42
00:03:13,360 --> 00:03:13,920
उसमें

43
00:03:13,920 --> 00:03:18,720
फिर और भी कुछ काउंटर्स हैं। जैसे एक काउंटर ये आ जाएगा

44
00:03:18,720 --> 00:03:23,200
कि जैसे दयानंद जी ने जो भाष्य लिखा हम

45
00:03:23,200 --> 00:03:27,520
है ना वेदों का क्या उससे उसको

46
00:03:27,520 --> 00:03:31,760
सहमति वाला पहले वेदार्थ उनकी जो परंपरा है उसमें

47
00:03:31,760 --> 00:03:36,080
किसी ने लिखा जो वो बताया जा रहा है। दूसरी बात

48
00:03:36,080 --> 00:03:40,640
कि क्योंकि वेदार्थ पहले लिखा नहीं जाता था ना नहीं तो

49
00:03:40,640 --> 00:03:44,720
प्रमाण मान प्रमाण होना चाहिए ना भाई ढाई हजार साल पुराना प्रमाण हमारे

50
00:03:44,720 --> 00:03:48,800
पास तो है तो शंकराचार्य

51
00:03:48,800 --> 00:03:53,280
उन्होंने तो लिखा कौन सा वेद का उन्होंने कौन सा वेद का किया हुआ है बताइए अरे वेदार्थ

52
00:03:53,280 --> 00:03:57,680
मतलब उपनिषद व्याख्या प्रस्थान पर व्याख्या

53
00:03:57,680 --> 00:04:01,840
प्रस्थ थोड़ी है मैं वो नहीं कह रहा हूं मैं कह रहा हूं कि भाई धर्म

54
00:04:01,840 --> 00:04:06,160
ब्रह्म पर धर्म ब्रह्म की व्याख्या उनके के सपोर्ट में

55
00:04:06,160 --> 00:04:10,160
उनसे पहले के किस आचार्य ने की बुद्ध के समय पर वो क्या

56
00:04:10,160 --> 00:04:15,040
कर रहे थे ये सब काउंटर आएंगे एक काउंटर ये आ जाएगा

57
00:04:15,040 --> 00:04:20,320
किरण मीमांसक जी ने इस पुस्तक को लिखा अब

58
00:04:20,320 --> 00:04:24,320
दयानंद जी स्वयं कह के गए कि भाई मेरा कोई ऐसा उत्तराधिकारी नहीं है जिसको मैं

59
00:04:24,320 --> 00:04:28,480
मतलब ऐसा कोई शिष्य नहीं जिसको मैं उत्तराधिकारी कह सकूं। यानी कि दयानंद

60
00:04:28,480 --> 00:04:29,360
जी के अनुसार

61
00:04:29,360 --> 00:04:33,920
यह आगे यह ज्ञान चलना था कि नहीं चलना था? चलना था तो

62
00:04:33,920 --> 00:04:38,080
उन्होंने यह स्वीकार किया कि भैया जिसको मैं घोषित करूंगा वही मेरा

63
00:04:38,080 --> 00:04:42,080
ज्ञान प्रामाणिक रूप से बता सकेगा। उन्होंने तो ये गुरु बुद्धि का विरोध किया था

64
00:04:42,080 --> 00:04:46,400
ना। हां तो जब वो खुद गुरु बुद्धि का विरोध कर रहे हैं तो फिर वो गुरु परंपरा

65
00:04:46,400 --> 00:04:50,640
पे ही प्रहार हो गया। नहीं गुरु परंपरा गुरु बुद्धि में अंतर है ना?

66
00:04:50,640 --> 00:04:54,640
हम उसमें अंतर ये आ जाता है कि जैसे ये बताइए जैसे मैं पूछता

67
00:04:54,640 --> 00:04:59,120
हूं कि बताइए कि आदि शंकराचार्य जी से पहले की कौन सी गुरु गद्दी थी? हां बताइए

68
00:04:59,120 --> 00:05:03,200
नहीं पता क्यों नहीं पता है उनके पहले हां बताइए गोविंद पाद थे उससे

69
00:05:03,200 --> 00:05:07,280
उनसे पहले कौन टाइटल क्या था उनका शंकराचार्य टाइटल था ये तो उन्होंने

70
00:05:07,280 --> 00:05:11,600
टाइटल शुरू किया है यानी कि यानी मतलब उनको इस उपाधि उपाधि

71
00:05:11,600 --> 00:05:15,760
से दिक्कत मैं पूरा बताता हूं पूरा बताता हूं इसमें क्या है शंकराचार्य जी ने चार गद्दी

72
00:05:15,760 --> 00:05:19,760
स्थापित की ठीक है चारों को शंकराचार्य तो ये गद्दी परंपरा उन्होंने स्टार्ट

73
00:05:19,760 --> 00:05:23,920
की उसके पहले कोई गद्दी परंपरा नहीं थी लेकिन गुरु परंपरा थी गुरु शिष्य परंपरा

74
00:05:23,920 --> 00:05:28,000
था ठीक है अब जैसे ठीक है अब जैसे शंकराचार्य जी के पहले हमें दो आचार्य का

75
00:05:28,000 --> 00:05:32,560
नाम मिलता है। उसके पहले का नहीं मिलता। शंकराचार्य जी ने तो कभी नहीं बोला कि मेरे पहले की ये

76
00:05:32,560 --> 00:05:36,800
शिव से या नारायण से शुरू करके आते हैं। वो तो बाद के आचार्य ने अपनी मर्जी से जोड़ा। शंकराचार्य

77
00:05:36,800 --> 00:05:40,880
जी ने कहीं कोट नहीं किया। अगर अगर शंकराचार्य ने नहीं भी जोड़ा मगर शंकराचार्य

78
00:05:40,880 --> 00:05:44,800
ने बाद के आचार्यों को घोषित तो किया कि वो मेरा ही स्वरूप मान्य होगा।

79
00:05:44,800 --> 00:05:48,880
उसमें वही चीज मैं कह रहा हूं कि वहां पर गुरु गद्दी एक रखी गई। वहां पे गुरु गद्दी

80
00:05:48,880 --> 00:05:53,040
में। कहने का कहने का मतलब है उनका उनका प्रहार गुरु शिष्य परंपरा

81
00:05:53,040 --> 00:05:57,120
पे नहीं। मगर उनका प्रहार गुरु गद्दी पे था। हां। हां तो

82
00:05:57,120 --> 00:06:01,200
बात ये है कि गुरु की तरफ से वो शिष्य जो है वही बता रहा है जो गुरु

83
00:06:01,200 --> 00:06:05,360
ने कहा। तो इसके लिए तो गुरु गद्दी की आवश्यकता है। नहीं

84
00:06:05,360 --> 00:06:09,360
गुरु गद्दी का जो प्रहार कर गुरु गद्दी क्यों चाहिए? अब मैं एग्जांपल दे देता हूं आपको। अब

85
00:06:09,360 --> 00:06:13,600
जैसे जो ये थे ना आपके युधिष्ठिर हिमांसक जी इनके जो गुरु

86
00:06:13,600 --> 00:06:17,840
थे ब्रह्मदास जी जिजासु जी वो उनके जो गुरु थे वो किससे पड़े थे? वो डायरेक्ट उनसे

87
00:06:17,840 --> 00:06:22,000
पड़े थे। क्या नाम है? विजानंद जी से और इनके गुरु भाई थे स्वामी

88
00:06:22,000 --> 00:06:26,000
दयानंद जी के। हम्म तो परंपराएं तो उधर से जुड़ ही रही है

89
00:06:26,000 --> 00:06:30,000
ना? नहीं जुड़ी है मगर जैसे मान लो कि मैंने प्रभुपाद

90
00:06:30,000 --> 00:06:34,320
जी से वही वाले इस वाली बात कि भैया मैंने श्रीधर स्वामी से सीखा

91
00:06:34,320 --> 00:06:38,320
अब जो अपना बता रहा हूं इसमें फिर कैसे करेंगे। श्रीधर स्वामी की तरफ से

92
00:06:38,320 --> 00:06:42,400
अगर घोषित नहीं होगा ये मेरा प्रामाणिक है बताने वाला तो

93
00:06:42,400 --> 00:06:46,480
मैं तो अपना कुछ भी बता दूंगा। उसमें यह भी बात आ जाती है ना उसमें एक बात आ जाती

94
00:06:46,480 --> 00:06:50,640
है कि जो कोई व्यक्ति रिसर्च करता है और अगर हम अगर हम शंकराचार्य पर

95
00:06:50,640 --> 00:06:55,280
वो उठा देंगे तो फिर हमारा जो वैदिकता का प्रमाण है वो दिक्कत आने लगेगी

96
00:06:55,280 --> 00:06:59,920
नहीं वो दिक्कत आए चाहे ना आए लेकिन जो त्रुटियां है वो तो हम उठाएंगे ना सवाल

97
00:06:59,920 --> 00:07:04,080
तो अलग विषय है की दिक्कत आ गया नहीं आ गया लेकिन जो जब त्रुटि है तुम प्रश्न उठाएंगे

98
00:07:04,080 --> 00:07:08,160
तो उसमें तो शब्द प्रमाण की बात आ जाएगी ना आएगी वो आएगी एक अलग

99
00:07:08,160 --> 00:07:12,160
बात है लेकिन जैसे मैं एक पॉइंट रख रहा हूं पॉइंट ये है कि जैसे कोई व्यक्ति इतिहास लिख रहा

100
00:07:12,160 --> 00:07:16,160
है किसी का हां तो उसमें उसने सामने वाले उन्होंने तो देखिए एक एक

101
00:07:16,160 --> 00:07:20,160
आचार्य का प्रमाण दिया उन्होंने इनका आचार्य का ये मिलता है इस

102
00:07:20,160 --> 00:07:24,320
लाइब्रेरी के इस कॉर्नर के इस नंबर पर रखा हुआ है ठीक है एक एक बता

103
00:07:24,320 --> 00:07:28,320
रहे हैं वो तो कि हां ये चीज यहां इनका ये टीका मिलती है इनकी ये वृत्ति मिलती है और

104
00:07:28,320 --> 00:07:32,320
उन्होंने कई जगह पे कई जगह पे उन्होंने यदि शब्द

105
00:07:32,320 --> 00:07:36,720
का उपयोग भी किया जैसे इस नाम का कोई था यदि उसको इसका इसका रचनाकार

106
00:07:36,720 --> 00:07:40,800
माना जाए तो ये ठीक है मतलब वो भी खुद कंफर्म नहीं है वो यदि

107
00:07:40,800 --> 00:07:44,880
लेकर के चल गया इतिहास विषय ऐसा होता है कि बहुत बार क्या होता है कि कुछ-कुछ लोगों के क्लेरिटी नहीं

108
00:07:44,880 --> 00:07:48,880
होती है। तो उसमें उन्होंने अज्ञात करतिक करके उन्होंने नोट

109
00:07:48,880 --> 00:07:52,880
किया हुआ है। अज्ञात कर्तिक अर्थात उसकी कृति तो है उसका नाम।

110
00:07:52,880 --> 00:07:56,960
अज्ञात तो है मगर उन्होंने कई जगह पे जो जिसको जिसकी वो बात

111
00:07:56,960 --> 00:08:01,040
कर रहे हैं ना उसको यदि करके बोला है। मतलब वो खुद कंफर्म नहीं है अपनी परंपरा। दूसरी

112
00:08:01,040 --> 00:08:05,120
बात दयानंद जी ने अपनी जो है क्या कहते

113
00:08:05,120 --> 00:08:09,280
हैं? परंपरा बताई नहीं है। कहीं भी बताइए। बताइए ना वो तो

114
00:08:09,280 --> 00:08:13,360
बोलते हैं ना कि मैं जो मानता हूं क्या मान रहा हूं। मैं तो ये ब्रह्मा से लेकर जैमिनी जी मानते मैं

115
00:08:13,360 --> 00:08:14,960
वही मान रहा हूं। ऐसे तो वो भी

116
00:08:14,960 --> 00:08:18,960
मानते हैं ब्रह्मा ये ब्रह्माकुमारी वाले। नहीं तो फिर

117
00:08:18,960 --> 00:08:22,960
अगर यही दृष्टिकोण रखा जाए तो फिर आप लोग भी वैसे ही मानते हो। उससे कुछ अलग नहीं मानते। सुनो सुनो तो

118
00:08:22,960 --> 00:08:27,120
उन्होंने अपनी कहीं भी आचार्य परंपरा बताई नहीं। अब बात ये है कि

119
00:08:27,120 --> 00:08:31,280
युधिष्ठिर मीमांसक जी बता रहे हैं और उन्होंने कहा है कि भाई मेरी ओर से मेरा

120
00:08:31,280 --> 00:08:35,520
जो उत्तराधिकारी या मेरी ओर से मैं किसी को घोषित करूं कि वो मेरे जो

121
00:08:35,520 --> 00:08:40,160
मैं जानता हूं या जो मैं कहना चाहता हूं वो प्रामाणिक रूप से यह बताएगा। मेरा प्रतिनिधि।

122
00:08:40,160 --> 00:08:44,160
उन्होंने किसी आप कह रहे हैं और जो मैं कह रहा हूं उसमें दोनों में अंतर है। अंतर यह

123
00:08:44,160 --> 00:08:48,560
है जो आप कह रहे हैं वो उस गुरु गद्दी वाले दृष्टिकोण से कह रहे हैं। ठीक है?

124
00:08:48,560 --> 00:08:53,440
मैं जो कह रहा हूं उसमें मैं गुरु गद्दी वाले दृष्टिकोण से नहीं कह रहा। क्यों नहीं कह रहा?

125
00:08:53,440 --> 00:08:56,800
का गुरु गद्दी का मतलब

126
00:08:56,800 --> 00:09:00,800
कि अब जैसे ये है कि इसमें हम तो क्लेम ही नहीं करते कि हमारी गुरु

127
00:09:00,800 --> 00:09:04,960
गद्दी कोई व्याकरण परंपरा वालों ने स्थापित करी और वो वैसे चले। बात ये है जैसे

128
00:09:04,960 --> 00:09:09,040
आपने पहले कहा था कि इतिहास मिलना चाहिए। इतिहास तो कुछ ना कुछ तो मिलना चाहिए ना। हां तो

129
00:09:09,040 --> 00:09:13,040
इतिहास मिल रहा है कुछ ना कुछ। अच्छा अब बात ये आती है कि इतिहास मिल रहा है। अगर इतिहास नहीं मिल

130
00:09:13,040 --> 00:09:17,040
रहा तो आपके जो संप्रदाय हैं वो उनमें से भी कुछ-कुछ लोग हैं जो हमारे

131
00:09:17,040 --> 00:09:21,040
ही यहां से आकर के व्याकरण सीख करके जा रहे हैं और फिर वो अर्थ कर रहे हैं तो फिर उनको भी फिर

132
00:09:21,040 --> 00:09:25,040
खारिज करना पड़ेगा और ये बात आ जाएगी। बाकी यह है कि इतिहास मिल रहा है तो इतिहास तो मिल

133
00:09:25,040 --> 00:09:29,200
ही रहा है। अच्छा ऐसा मिल रहा है जो आपको 1000 साल पुरानी मैनुस्क्रिप्ट मिल रही

134
00:09:29,200 --> 00:09:30,080
है

135
00:09:30,080 --> 00:09:34,080
ठीक है और वह जो और वो जो उसमें जो अष्टाध्याय के जो सूत्र हैं

136
00:09:34,080 --> 00:09:38,320
सेम सूत्र वो है जो अभी 150 200 साल पहले महर्षि दया ने जिस पे वृत्ति

137
00:09:38,320 --> 00:09:42,560
लिखी थी जिसके चार अध्याय अभी उपलब्ध है चारको वो भी सेम है। अच्छा बुध

138
00:09:42,560 --> 00:09:46,720
के बुद्ध के समय महर्षि दयानंद जी का जो दर्शन

139
00:09:46,720 --> 00:09:50,800
था वो किस आचार्य ने लिखा था और वो कहां थे? मैं बताता

140
00:09:50,800 --> 00:09:54,960
हूं मैं बताता हूं। देखिए जो स्वामी दयानंद जी का दर्शन था ठीक है

141
00:09:54,960 --> 00:09:59,440
वो क्या है वो एज इट इज सांख्य वैशेषिक न्याय वाला एज इट इज सेम है

142
00:09:59,440 --> 00:10:03,440
उसमें 1% चेंज मत कीजिए उसको पूरा ले लीजिए जो सेम है उसका खंडन उसका

143
00:10:03,440 --> 00:10:07,760
खंडन आचार्य शंकर ने किया हुआ है

144
00:10:07,760 --> 00:10:11,760
ना सांघ के वैशिक जो दर्शन है वो आप है

145
00:10:11,760 --> 00:10:15,760
ना देखिए अब देखिए अगर कहां से आया त्रेतवाद

146
00:10:15,760 --> 00:10:19,840
कहां से आया यही अगर आप छह दर्शनों को मान लेंगे ना ऑटोमेटिकली त्रैतवाद सिद्ध

147
00:10:19,840 --> 00:10:24,000
हो जाएगा अलग से बाहर से थोड़ी आ रहा है तो फिर बुद्ध का खंडन क्यों

148
00:10:24,000 --> 00:10:29,520
नहीं किया इन्होंने? किसने किया? न्यायिकों ने ही तो किया खंडन और किसने किया है?

149
00:10:29,520 --> 00:10:33,760
ये बताइए बौद्धों के खंडन में किसने पुस्तकें लिखी हैं? ने एक भी नहीं लिखी सारी न्यायिकों

150
00:10:33,760 --> 00:10:37,840
ने लिखी हैं। दयानंद जी ने तो सत्यार्थ प्रकाश में स्वयं कहा है कि बौद्धों का खंडन इन्होंने

151
00:10:37,840 --> 00:10:42,000
किया शंकराचार्य ने। शंकराचार्य के नेतृत्व में, हां वो ठीक है, शंकराचार्य के नेतृत्व

152
00:10:42,000 --> 00:10:45,200
में हुआ था लेकिन लिखा किसने? जैसा आपने बोला ना कि खंडन किया है, बताइए किसने

153
00:10:45,200 --> 00:10:50,560
खंडन किया? आप मुझे सिर्फ बताइए किसी वेदांती ने लिखा हो।

154
00:10:50,560 --> 00:10:54,640
शंकराचार्य अरे भैया जो ब्रह्मसूत्र पर व्याख्या है वो बौद्धों के खंडन पे

155
00:10:54,640 --> 00:10:58,800
ही तो है। ब्रह्मसूत्र के अलावा बताइए ना वो कह रहा हूं कि ब्रह्मसूत्र तो ये पहला एक शुरुआत

156
00:10:58,800 --> 00:11:02,800
था जो आचार्य शंकर ने किया। ठीक है। उसमें तो उन्होंने सांख्य का भी किया। उसमें उन्होंने वैशेषिक का

157
00:11:02,800 --> 00:11:06,880
भी किया। उसमें उन्होंने न्याय का भी दयानंद जी ने किसको माना है? वेदा

158
00:11:06,880 --> 00:11:11,040
वैदिक की वैदिक उसकी स्थापना करने वाला। उन्होंने बोला

159
00:11:11,040 --> 00:11:15,200
उन्होंने वैसे उन्होंने बोला वैदिक धर्म की वो स्थापना करने की अब देखो यही बात है ना।

160
00:11:15,200 --> 00:11:19,280
अब यही बात नहीं उद्धत नहीं थे। उन्होंने माना वैदिक धर्म की स्थापना वर्ड लिखा

161
00:11:19,280 --> 00:11:23,280
है उन्होंने। अरे उन्होंने माना है कि उन्होंने ये उस समय पे जो है स्थापित

162
00:11:23,280 --> 00:11:27,600
किया। ये उनकी अच्छाई थी। हां उन्होंने इस चीज को बोला उन्होंने वहां कहीं न्याय

163
00:11:27,600 --> 00:11:31,680
वैशेषिक वगैरह की बात नहीं की है। अब वो हर चीज की व्याख्या थोड़ी करेंगे। तो फिर उनकी

164
00:11:31,680 --> 00:11:35,680
तरफ से किसी को प्रामाणिक कैसे माना जाए कि तुम तुम सही बोल रहे हो। उन्होंने नहीं किया तो

165
00:11:35,680 --> 00:11:39,840
यही तो दिक्कत है। उन्ही की मैं बता दे रहा हूं ना। क्योंकि उसी सत्यार्थ

166
00:11:39,840 --> 00:11:43,840
प्रकाश में वही तो कह रहे है ना कि छह के छह दर्शन मानने वाले और जो छह के छह

167
00:11:43,840 --> 00:11:47,920
और जैसे देखिए एग्जांपल देखिए जैसे आचार्य शंकर ने सांख्य का खंडन किया है

168
00:11:47,920 --> 00:11:51,920
नास्तिक बोला है ठीक है स्वामी दयानंद जी सांख्य सांख्य का वो मंडन

169
00:11:51,920 --> 00:11:56,000
करते हुए बोलते हैं कि जो कपिलाचार्य को नास्तिक बोले स्वयं नास्तिक है अब बताइए आचार्य

170
00:11:56,000 --> 00:12:00,160
शंकर को नास्तिक भी कह रहे हैं वो तो बात यहां ये हो रही है कि बुद्ध का खंडन किसने

171
00:12:00,160 --> 00:12:00,660
किया

172
00:12:00,400 --> 00:12:04,560
तो बुद्ध का अपने आचार्य से पूछिए ना किसने किया न्यायिकों ने किया है अरे

173
00:12:04,560 --> 00:12:08,640
बुद्ध का खंडन देखिए चार शिष्य उन्होंने रखे थे अपने आचार्य शंकर ने एक न्यायिक

174
00:12:08,640 --> 00:12:13,120
थे, एक मीमांसक थे, एक व्याकरण वाले थे, एक वेदांत वाले थे। ठीक है? उनमें से

175
00:12:13,120 --> 00:12:17,200
ये जो न्याय वाले थे, ये क्या कहते हैं? आपका जो बौद्धों

176
00:12:17,200 --> 00:12:21,280
का जिसने खंडन किया, पूरा खंडन में जो प्रक्रिया बौद्धों खंडन हुआ ऐसा थोड़ी कि आचार्य शंकर करके

177
00:12:21,280 --> 00:12:25,280
एक बार चले गए उसके बाद काम ही खत्म। बौद्ध खत्म हो गए, नष्ट हो गए। उन्होंने

178
00:12:25,280 --> 00:12:29,360
रामानुज ने भी किया है। रामानुजाचार्य जी ने भी किया है। बौद्धों रामानुजाचार्य

179
00:12:29,360 --> 00:12:33,680
ने किया होगा उनका नहीं पता मुझे। लेकिन मेरे को ये पता है कि अब जैसे बौद्धों के फंड में मैंने जितनी पुस्तकें

180
00:12:33,680 --> 00:12:37,680
पढ़ी। ठीक है? सारी न्यायिक है। न्याय लड़ते लड़ते लड़ते लड़ते न्याय

181
00:12:37,680 --> 00:12:41,840
जो है नव्या बन गया आज भी मैं आपको बताऊं

182
00:12:41,840 --> 00:12:45,920
आज भी और ये तो वेदांतियों की मजबूरी है कि उन्हें न्यायिकों

183
00:12:45,920 --> 00:12:50,000
के साथ में साठगाठ करना पड़ रहा है क्योंकि अगर न्यायिक साथ नहीं होंगे तो फिर तो वो टिक

184
00:12:50,000 --> 00:12:54,080
नहीं पाएंगे कहीं भी लेकिन उसके बावजूद भी न्याय जो है वो वेदांतियों का भी खंडन करते

185
00:12:54,080 --> 00:12:58,400
हैं। अभी प्रयागराज में कुछ महीने पहले शंकराचार्य जी के अध्यक्षता में नव्या वर्सेस वेदांत

186
00:12:58,400 --> 00:13:02,720
अद्वैत का डिबेट हुआ था। खंडन खंडन खाद्य का खंडन लिखा हुआ है न्यायों

187
00:13:02,720 --> 00:13:06,720
ने अभी हम तो वो मजबूरी है

188
00:13:06,720 --> 00:13:10,800
वो वो मैं नहीं कह रहा मजबूरी की मैं नहीं कह रहा अभी

189
00:13:10,800 --> 00:13:15,360
देखो एक चीज निकल के आई परंपरा की अगर बात करें कि दयानंद

190
00:13:15,360 --> 00:13:15,860
जी

191
00:13:15,600 --> 00:13:19,760
की तरफ से प्रामाणिक उनकी परंपरा बताने वाला किस व्यक्ति

192
00:13:19,760 --> 00:13:23,760
को क्यों माना जाए क्योंकि उनके शिष्य है ना तो

193
00:13:23,760 --> 00:13:27,760
वो तो कह रहे हैं कि मेरा कोई प्रतिनिधि नहीं है अधिकारिक नहीं प्रतिनिधि होना

194
00:13:27,760 --> 00:13:31,840
और यह एक शिष्य होने में अंतर है ना बात वो गुरु गद्दी को ही दूसरे

195
00:13:31,840 --> 00:13:36,400
शब्दों में प्रतिनिधि कह लो प्रामाणिक अधिकारी वो आप इसलिए देखो शिष्य देखो

196
00:13:36,400 --> 00:13:40,400
आपके हमारा अलग है ना देखो वही तो मैं कह

197
00:13:40,400 --> 00:13:44,640
रहा हूं गुरु गद्दी के अभाव में ही तो ये दिक्कत है कि दयानंद जी की ओर से उनके

198
00:13:44,640 --> 00:13:48,960
अलावा किसी की बात को प्रामाणिक क्यों मान लिया जाए जैसे जैसे अभी तुम्हारे

199
00:13:48,960 --> 00:13:53,040
यहां पर अभी कई गुट हैं जो कह रहे हैं कि हनुमान जी उड़ते थे मान रहे हैं कुछ लोग नहीं

200
00:13:53,040 --> 00:13:57,040
मान रहे हैं। अब वो भी कह रहे हैं हम भी शिष्य हैं उनके दयानंद जी के और

201
00:13:57,040 --> 00:14:01,040
जो जो नहीं मान रहे हैं वो भी कह रहे हैं हम शिष्य हैं दयानंद जी के तो प्रामाणिक

202
00:14:01,040 --> 00:14:05,040
किसको माना जाए जिसको वो घोषित करके गया अब वो घोषित तो किसी को करके नहीं गए नहीं इसमें

203
00:14:05,040 --> 00:14:09,120
पॉइंट ये आता है इसका मैं उत्तर देता हूं उसका पॉइंट आता है कि क्या स्वामी दयानंद ने इस विषय पे

204
00:14:09,120 --> 00:14:13,120
कुछ बोला है अगर उन्होंने इस विषय पे नहीं बोला है तो फिर तो मतभेद हो सकता है ना उसमें

205
00:14:13,120 --> 00:14:17,200
कोई समस्या नहीं है अब जैसे मैं बोलूं विवर्तवाद है कौन कौन से वाद है अद्वैत में तो

206
00:14:17,200 --> 00:14:21,200
दुनिया भर के मतभेद है है ना फिर अब क्या करना उन्होंने उन्होंने फिर भी मतभेद

207
00:14:21,200 --> 00:14:25,520
है आप बताइए मतभेद से नहीं उसमें फिर गुरु गद्दी है ना कि मैं मैं घोषित

208
00:14:25,520 --> 00:14:29,680
अरे तो वो घोषित करके जा रहे हैं ना उसकी बात मान्य होगी जैसे कि जैसे

209
00:14:29,680 --> 00:14:31,120
कि हमने

210
00:14:31,120 --> 00:14:35,840
बता रहा हूं मैं मैं बता रहा हूं ना मैं बता रहा हूं उसमें

211
00:14:35,840 --> 00:14:40,160
कि हम कम से कम ऑफिशियली क्लेम तो कर सकते हैं ना अपनी चीजों को

212
00:14:40,160 --> 00:14:44,160
अब वो वो क्या कहते हैं वो लागू नहीं हो पाए एम्पलीफाई नहीं हो पाए बात

213
00:14:44,160 --> 00:14:48,640
अलग है मगर बात ये अगर आपने कुछ बोला उसमें

214
00:14:48,640 --> 00:14:52,640
कितना वैल्यू है जैसे कि हमने कानून बनाया अब वो कानून जो है

215
00:14:52,640 --> 00:14:56,640
फिर भी दारू बिक रही है फिर भी मुर्गा मांस खाया जा रहा है। इसका मतलब सनातन धर्म ही

216
00:14:56,640 --> 00:15:00,720
बेकार है। ये तो कहना गलत है। नहीं पॉइंट ये जाता है। पॉइंट ये

217
00:15:00,720 --> 00:15:04,720
आता है कि एक गुरु कुछ और कह रहे दूसरे गुरु कुछ और कह रहे तो मान्यता अरे मान्यता उसकी जिसको

218
00:15:04,720 --> 00:15:09,120
घोषित किया गया गद्दी पर। दोनों को किया गया ना फिर तो कहां दोनों को किया गया?

219
00:15:09,120 --> 00:15:13,200
क्यों दोनों घोषित नहीं है। कौन? सरस्वती ने अपने आप को दोनों दो

220
00:15:13,200 --> 00:15:17,200
पीठों के शंकराचार्य घोषित नहीं कर लिया था। धर्म और ब्रह्म की व्याख्या

221
00:15:17,200 --> 00:15:21,360
की बात हो रही है। देखिए अभी धर्म और ब्रह्म की बात नहीं चल रही। परंपरा

222
00:15:21,360 --> 00:15:25,680
की बात चल रही है। धर्म और ब्रह्म की बात अलग है और जो क्या

223
00:15:25,680 --> 00:15:29,760
बात है मैं बात कीजिए तो मैं बता रहा हूं ना परंपरा से जो धर्म

224
00:15:29,760 --> 00:15:33,840
ब्रह्म है उसमें अंतर नहीं आना चाहिए क्योंकि वो पीछे से आ रहा है। मगर

225
00:15:33,840 --> 00:15:38,080
जो वर्तमान की स्थितियां है कि भैया कहीं किसी मंदिर में सोना

226
00:15:38,080 --> 00:15:42,160
गया। अब वो उस मंदिर में सोना गया तो एक शंकराचार्य को पता चला की

227
00:15:42,160 --> 00:15:46,160
गया। दूसरे को पता चला कि नहीं गया। इस जानकारी के लिए वो निर्भर किस

228
00:15:46,160 --> 00:15:50,160
पे हैं? आज के टीवी चैनल्स पे। तो आज की जो जानकारियां इनको

229
00:15:50,160 --> 00:15:54,320
लेकर के उनके बीच में मतभेद हो सकते हैं। मगर पीछे से जो धर्म ब्रह्म की व्याख्या

230
00:15:54,320 --> 00:15:58,320
चली आ रही है उसमें तो अंतर नहीं है ना? नहीं उसमें अंतर ऐसा है

231
00:15:58,320 --> 00:16:02,560
कि उसमें विवरित और दुनिया भर के सब मतभेद है। अरे तो उसमें उसमें जो घोषित

232
00:16:02,560 --> 00:16:06,640
होगा वह अंतर वो निर्णय बताएगा। उसमें चारों शंकराचार्य में से किसने

233
00:16:06,640 --> 00:16:11,200
निर्णायक फैसले में धर्म और ब्रह्म की व्याख्या में अंतर कर दिया बताओ।

234
00:16:11,200 --> 00:16:15,200
अभी तो मतभेद आ रहा है ना ये अपना इसका और डिटेल बता दूंगा। क्योंकि इसमें मतभेद आ

235
00:16:15,200 --> 00:16:19,440
रखा है। उत्तर में मानते ही अलग है। यहां अपने पूरे शंकराचार्य अलग मानते हैं। नहीं धर्म और ब्रह्म

236
00:16:19,440 --> 00:16:23,440
की व्याख्या में अंतर बताओ मुझे किस शंकराचार्य ने एक दूसरे का खंडन किया। अब जैसे

237
00:16:23,440 --> 00:16:27,680
मैं आपको बता देता हूं। ठीक है। अब जैसे मान लीजिए अगर आचार्य शंकर कब हुए ये चीज नहीं पता रहेगी।

238
00:16:27,680 --> 00:16:31,840
ठीक है। इसका कन्फर्मेशन नहीं रहेगा। ये भी ये भी वैसी ही चीज है। मैं उसको बताता हूं

239
00:16:31,840 --> 00:16:35,920
कैसे कनेक्टेड है। धर्म ब्रह्म की व्याख्या नहीं है। ये जानकारी की व्याख्या

240
00:16:35,920 --> 00:16:40,000
है। नहीं नहीं इसमें कैसे कनेक्टेड मैं बताता हूं। जैसे मान लीजिए आचार्य शंकर कब हुए इस बात

241
00:16:40,000 --> 00:16:44,080
की हमारे पास जानकारी नहीं है। ठीक है? तो बेसिक बात है कि जब हमें यही नहीं पता

242
00:16:44,080 --> 00:16:49,040
कि परंपरा कब से स्टार्ट हो रही है। हमारे पास है ना जानकारी ढाई हजार साल पहले हुए

243
00:16:49,040 --> 00:16:53,200
मैं पूरा गलत लिखता हूं कि आचार्य शंकर कब हुए हैं अगर हमें ये नहीं पता तो आचार्य शंकर

244
00:16:53,200 --> 00:16:57,200
के कौन-कौन से ग्रंथ हैं कब लिखे क्या लिखे। इसकी प्रमाणिकता का आधार खत्म। इसकी प्रमाणिकता

245
00:16:57,200 --> 00:17:01,280
का आधार खत्म। तो भैया ग्रंथ में जो बात लिखी है सही गलत। उसकी प्रमाणिकता का आधार खत्म।

246
00:17:01,280 --> 00:17:05,280
अगर अगर ऐसे तो हम यह वेदों की प्रमाणिकता पे भी वो कर सकते हैं

247
00:17:05,280 --> 00:17:09,280
कि भैया कई सारे पड़ेगा ना जब ये बात आ जाएगी तो फिर तो करना पड़ेगा या तो देखिए या तो ये

248
00:17:09,280 --> 00:17:13,360
कीजिए कि इतना 19 20 को एक्सेप्ट करके चलिए या तो बिल्कुल

249
00:17:13,360 --> 00:17:17,360
टिट फॉर टाइट करेंगे तो फिर तो हर चीज खत्म हो जाएगी कुछ फिर वही तो मैं कह

250
00:17:17,360 --> 00:17:21,760
रहा हूं कि अगर आप शंकराचार्य पर उंगली उठाएंगे तो वैदिकता खत्म हो जाएगी आपकी

251
00:17:21,760 --> 00:17:25,760
नहीं मैं वही कह रहा हूं कि अगर आप बाकियों में भी प्रश्न उठाएंगे क्योंकि जो जो कमी आप

252
00:17:25,760 --> 00:17:29,760
में है वैसी कमी दूसरे में ढूंढेंगे तो प्रश्न उठ जाएंगे ना हमारे में जो कमी है

253
00:17:29,760 --> 00:17:33,840
वो उस समय से पहले किए जिस समय के बाद आप हम पर निर्भर कर रहे हो।

254
00:17:33,840 --> 00:17:37,840
हम आप पर निर्भर नहीं कर रहे हैं। जैसे आचार्य शंकराचार्य जी ने बोला

255
00:17:37,840 --> 00:17:41,840
था पूरी शंकराचार्य जी ने कि मुझे सपने में धन और वेद का ज्ञान मिला था। तो वहां पे

256
00:17:41,840 --> 00:17:46,080
उस स्थिति में स्वीकार कर रहे हैं कि वो क्या कहते हैं? किसी सामने

257
00:17:46,080 --> 00:17:50,160
से जो एक फिजिकल फॉर्म में कोई गुरु की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने ये भी कहा है कि अगर

258
00:17:50,160 --> 00:17:54,320
आपको सपने में मंत्र इत्यादि प्राप्त हो जाए तो किसी प्रामाणिक आचार्य के पास जाकर

259
00:17:54,320 --> 00:17:58,400
के उसे सत्यापित कराएं। ये भी कहा है। अभी तो धनुर्वेद का जो ज्ञान उन्होंने उन्हें प्राप्त

260
00:17:58,400 --> 00:18:02,480
हुआ। उसे उन्होंने किससे सत्यापित करवाया? तो उन्होंने कराया होगा नहीं कराया होगा वो तो

261
00:18:02,480 --> 00:18:06,560
तब है ना जब वो किसी के ऊपर वो थोपे उस चीज को

262
00:18:06,560 --> 00:18:10,560
कह रहे है ना कि वो तो कह रहे है ना कि मेरे पास ये तो उनकी ये तो उनका पर्सनल एस्पेक्ट

263
00:18:10,560 --> 00:18:14,880
है ना इसको उन्होंने उसपे थोप कहां दिया कि तुम ऐसा करो या तुमको ऐसा करना चाहिए

264
00:18:14,880 --> 00:18:17,120
करने वाली बात

265
00:18:17,120 --> 00:18:21,120
करने मैंने करने का बोला ही नहीं मैंने ये बोला है कि यानी उस स्थिति में उन्होंने ये बात

266
00:18:21,120 --> 00:18:25,120
माना है ना कि इस तरीके से भी ज्ञान मिल सकता है ज्ञान ज्ञान बिल्कुल मिल

267
00:18:25,120 --> 00:18:29,120
सकता है फिजिकल गुरु के बिना मगर उसको सत्यापित कराना बहुत आवश्यक है

268
00:18:29,120 --> 00:18:33,120
अगर जैसे जैसे सुनो जैसे अभी देखो यही तो सत्यापित कराने

269
00:18:33,120 --> 00:18:37,120
वाला ना हो तो तो यही तो सुनो तो यही तो दिक्कत है सत्यापित

270
00:18:37,120 --> 00:18:41,120
कराने वाला ना हो तो फिर अपनी वैदिकता कैसे सिद्ध करेंगे जैसे सुनो मैं

271
00:18:41,120 --> 00:18:45,200
एक छोटी सी एग्जांपल दे रहा हूं ब्रह्मा कुमारीज वाले कहते हैं कि ब्रह्मा जी मुझे

272
00:18:45,200 --> 00:18:49,440
दिखाई देते है सीधे मुरली सुनाते हैं। अब हम उनको अगर यह नहीं कहेंगे जो परंपरा

273
00:18:49,440 --> 00:18:53,600
प्राप्त वैदिक हैं उनसे वो सत्यापन हुआ है आपका भेद तो आपको इधर

274
00:18:53,600 --> 00:18:57,600
से मिल रहे हैं तो उनकी बात तो फिर माननी पड़ेगी फिर इसमें कोई तर्क ही नहीं है उनको तो सीधे

275
00:18:57,600 --> 00:19:01,760
ब्रह्मा मुरली सुना रहा है| हर हर व्यक्ति कहने लगे मुझे भगवान दिख

276
00:19:01,760 --> 00:19:05,840
रहा है ये कह रहे हैं मैं क्या करूं मास्क नहीं उसमें पॉइंट ये आता है ना उसमें देखिए

277
00:19:05,840 --> 00:19:09,920
अब जैसे मान लीजिए कि इसका सोलशन ऐसे होता है कि मान लीजिए कोई व्यक्ति कुछ भी कह रहा है और अब

278
00:19:09,920 --> 00:19:13,920
कुछ भी कहने का अर्थ क्या होता है कुछ भी कहने का अर्थ होता है व्यक्ति अपनी व्याख्या दे रहा है यही होता है

279
00:19:13,920 --> 00:19:17,920
अर्थ उसका अब इसमें ये आ जाता है इसका सशन ऐसे करते हैं आचार्य शंकर

280
00:19:17,920 --> 00:19:22,080
के पहले जो परंपराएं थी कौन सी परंपराएं थी वेदांत गुरु गद्दी स्थापित करने से बहुत

281
00:19:22,080 --> 00:19:27,520
प्राचीन परंपरा थी वैशेषिक सांख्य और न्याय की ठीक है प्राचीन उनसे पहले की जो

282
00:19:27,520 --> 00:19:31,520
ग्रंथ है ना एक मिनट एक मिनट एक मिनट तो उन्होंने ये पूरा इन्होंने उनकी

283
00:19:31,520 --> 00:19:32,400
पहले की परंपरा

284
00:19:32,400 --> 00:19:36,480
थी मतलब अब जो आचार्य शंकर उनका खंडन कर रहे हैं तो ये बोल के खंडन नहीं कर रहे कि नहीं नहीं मेरी जो परंपरा

285
00:19:36,480 --> 00:19:40,560
है ये भी परंपरा है कोई इसलिए आपकी नहीं मान वो आप युक्ति दे रहे हैं कि आपका जो

286
00:19:40,560 --> 00:19:44,560
पॉइंट है ये वाला पॉइंट ऐसे युक्ति देखिए वो ना ठीक है वो कह रहे हैं श्रुति में ऐसा इसका

287
00:19:44,560 --> 00:19:48,560
इंटरप्रिटेशन ऐसा होगा ये वो हर हर चीज में युक्ति दे रहे हैं। युक्ति दे के खंडन कर

288
00:19:48,560 --> 00:19:52,720
रहे हैं। तो इससे ये कंक्लूजन निकल कर के आया कि और यही यही चीज फॉलो

289
00:19:52,720 --> 00:19:56,960
करते हैं रामानचार्य। वो भी युक्ति देकर के शंकराचार्य की बात खंडन करते हैं। फिर यही परंपरा

290
00:19:56,960 --> 00:20:01,040
फॉलो किया मधवाचार्य वो भी युक्ति देके खंडन कर रहे हैं। सब कुछ है युक्ति

291
00:20:01,040 --> 00:20:06,240
सेट। युक्ति के साथ साथ श्रुति भी दी है और

292
00:20:06,240 --> 00:20:10,640
चेंज किया ना दोनों लोगों ने, श्रुति के साथ साथ परंपरा है ना?

293
00:20:10,640 --> 00:20:14,640
परंपरा है परंपरा उन्होंने भगवत गीता में लिख दिया ना 13वें

294
00:20:14,640 --> 00:20:18,640
अध्याय के दूसरे श्लोक में कि वो जो संप्रदाय से हीन

295
00:20:18,640 --> 00:20:22,640
हो परंपरा से हीन हो उसको त्याग दो परंपरा पर जोर दिया तो

296
00:20:22,640 --> 00:20:26,720
है उन्होंने नहीं तो परंपरा से हीन का मतलब क्या होता है देखिए एक बात आती है अगर

297
00:20:26,720 --> 00:20:31,120
परंपरा से हीन है तो उसके पास ज्ञान ही नहीं होगा अगर ज्ञान है तो परंपरा के अनुकूल है

298
00:20:31,120 --> 00:20:35,520
ज्ञान सुनो ज्ञान बिल्कुल हो सकता है मगर उसको सत्यापित

299
00:20:35,520 --> 00:20:39,520
कराना आवश्यक है किसी परंपरा प्राप्त आचार्य से और जिस

300
00:20:39,520 --> 00:20:43,600
जिसके ऊपर परम आश्रित होंगे ना सत्यापन के लिए वही हमारी परंपरा कहलाएगी।

301
00:20:43,600 --> 00:20:47,680
नहीं उसमें देखिए जैसे आपकी जो परंपरा है वो किस चीज के लिए प्रमाणिक है? अद्वैत वेदांत के लिए प्रमाणिक

302
00:20:47,680 --> 00:20:51,760
है। ठीक है? आपकी जो परंपरा है वो वेदांत वो वेद की रियल में देखा जाए

303
00:20:51,760 --> 00:20:56,080
तो वेद के ऊपर बात करना ही तब शुरू किया गया जब स्वामी दयानंद जी ने बोला। नहीं तो इसके पहले तो

304
00:20:56,080 --> 00:21:00,400
ये श्रुति के नाम पे सेव केवल उपनिषद के रेफरेंस दिए जाते। क्यों

305
00:21:00,400 --> 00:21:04,560
भाष्य नहीं किया? क्यों सांड में भाष्य नहीं किया? मैं बताता हूं। सांड पे भी मैं आता हूं।

306
00:21:04,560 --> 00:21:08,560
सांड और महिधर में भी बहुत मंत्रों में मतभेद है। फिर क्यों परंपरा वाली बात आ जाती

307
00:21:08,560 --> 00:21:12,560
है। ठीक है। महध जरूरी थोड़ी है उसी परंपरा के हो नहीं तो नाम

308
00:21:12,560 --> 00:21:16,560
तो ले रहे ना ये राघवाचार्य बोल रहे कि नहीं परंपरागत भाष फिर वहां

309
00:21:16,560 --> 00:21:21,200
फिर वहां पर देखो अगर उनमें आपस में वो आएगा तो फिर क्या कहते हैं सर्वशक्तिमान

310
00:21:21,200 --> 00:21:25,440
ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष और शाश्वत धर्म से वो हो जाएगा क्या कैसे

311
00:21:25,440 --> 00:21:29,440
बताइए सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म इसको व्याख्या कीजिए

312
00:21:29,440 --> 00:21:33,520
कि कैसे कैसे दोनों में अगर मतभेद आ रहा है तो कैसे कटेगा इसकी जैसे मान लो कि

313
00:21:33,520 --> 00:21:37,600
राघव रामानुजाचार्य जी ये कह रहे हैं उनके पास भी उनकी परंपरा

314
00:21:37,600 --> 00:21:41,920
है ठीक है और शंकराचार्य जी यह कह रहे हैं उनके पास भी उनकी परंपरा

315
00:21:41,920 --> 00:21:46,000
है ठीक है अब राघवाचार्य जी आकर के विरोध कर रहे हैं कि नहीं नहीं हम

316
00:21:46,000 --> 00:21:50,160
तो जो है अगेंस्ट है आपके तो फिर उनसे पूछ लिया जाएगा भैया ठीक है दे दो आप परम

317
00:21:50,160 --> 00:21:54,240
स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म और सर्वशक्तिमान ईश्वर दे दो जीव की बात ये नहीं कह

318
00:21:54,240 --> 00:21:58,400
रहा मैं ये नहीं कह मैं कह रहा हूं कि वो कह रहे हैं वो कह रहे हैं कि जो

319
00:21:58,400 --> 00:22:02,480
संप्रदाय के विरुद्ध जो वेद भाषा है वो नहीं माना जाएगा संप्रदाय के अनुकूल जो भाषा कौन सा भाषा

320
00:22:02,480 --> 00:22:04,160
है परंपरा

321
00:22:04,160 --> 00:22:08,240
भाषा है कौन सा नाम लिखते हैं वो सायन और मैदतर का लेकिन सायन और मैदर के बहुत सारे मंत्र

322
00:22:08,240 --> 00:22:12,400
मत भेद दिखा दूंगा। अरे तो मतभेद के बाद फिर हमारा मत युक्ति

323
00:22:12,400 --> 00:22:16,560
युक्ति स्थापित कर रहे हैं हम। मगर साथ में हमारे पास परंपरा नहीं

324
00:22:16,560 --> 00:22:20,560
युक्ति सिर्फ नहीं है। परंपरा प्राप्त शब्द प्रमाण और फिर युक्ति।

325
00:22:20,560 --> 00:22:24,560
नहीं तो फिर बात वही अगर युक्ति को अगर युक्ति को

326
00:22:24,560 --> 00:22:28,720
ले आओगे तो वेद मंत्रों की भी आवश्यकता नहीं है। तुम नया धर्म्यापित कर सकते हो। अभी आज

327
00:22:28,720 --> 00:22:33,680
लिख दो सारा युक्ति के आधार पर। फिर भी देखिए उसमें यह है

328
00:22:33,680 --> 00:22:37,920
वैदिक क्लेम कर रहा है तो यानी वेद को स्वीकार कर रहा है वेद का वेद वेद

329
00:22:37,920 --> 00:22:41,920
का सुनो तो वेद का मतलब ही है श्रुति परंपरा वो ठीक है कि

330
00:22:41,920 --> 00:22:45,920
आप परंपरा से प्राप्त चीजों को अपने शब्द के प्रमाण के रूप में ले रहे हो

331
00:22:45,920 --> 00:22:50,080
लेकिन ये बात आती है बात ये आ जाती है कि जब हम इसको पढ़ते हैं

332
00:22:50,080 --> 00:22:54,240
ठीक तो हमें समझ में आता है जैसे हमने ये देखा कि अलग मंत्रार्थ कर रहे हैं ये महिर

333
00:22:54,240 --> 00:22:58,240
अलग मंत्रार्थ कर रहे हैं उनके पहले के नारायण स्वामी स्कंद स्वामी अलग-अलग मंत्रार्थ कर

334
00:22:58,240 --> 00:23:02,240
रहे हैं है ना जिसकी सबसे प्राचीन स्कंद स्वामी का मिलता है उनका तो साइंस एकदम ही अलग

335
00:23:02,240 --> 00:23:06,320
है और वो कैसे आता है तो फिर वहां पे युक्ति भी लगे वहां पे युक्ति

336
00:23:06,320 --> 00:23:10,320
भी लगेगी ना तो इसमें ये है कि अब जैसे

337
00:23:10,320 --> 00:23:14,400
इन लोगों का मतभेद आ रहा है यानी हमें क्या पता चला कि मंत्र वही है सब कुछ मंत्र

338
00:23:14,400 --> 00:23:18,560
में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन जो मंत्र का अर्थ कर रहे हैं वो अलग-अलग है तो इसका इसके

339
00:23:18,560 --> 00:23:19,200
पढ़ने पे हमें

340
00:23:19,200 --> 00:23:23,680
क्या पता चला इसका पढ़ने पे पता चला कि यहां पे जब हम निरुक्त पढ़ते हैं निरुक्त में व्यासकाचार्य

341
00:23:23,680 --> 00:23:27,840
ने क्या बताया कि वेद वेद तो वही है मंत्र वही है उन्होंने बोला कि लेकिन

342
00:23:27,840 --> 00:23:32,080
वेद का जो अर्थ करने वाले जो वेदार्थ के जो संप्रदाय है वो अलग-अलग हैं। ठीक है?

343
00:23:32,080 --> 00:23:36,320
उसमें से 10 संप्रदाय उन्होंने गिनाए। तो उसमें से एक संप्रदाय उन्होंने यह भी गिनाया

344
00:23:36,320 --> 00:23:40,320
हुआ है कि एक संप्रदाय ऐसा है कि जो वेद का अर्थ नहीं करता केवल मंत्र रटर रट के आगे बढ़ता है। उसको उन्होंने पशु

345
00:23:40,320 --> 00:23:44,320
बोला हुआ है कि तुम पशु के समान जैसे गधा बोचा होता है वैसे तुम वेद मंत्र ढो रहे हो। जैसे

346
00:23:44,320 --> 00:23:48,400
उन्होंने बोला हुआ है। फिर ऐसे 10 संप्रदाय के नाम गिनाए और एकाध ऐसे आचार्यों के नाम गिनाए जो स्वतंत्र

347
00:23:48,400 --> 00:23:52,480
थे जो किसी संप्रदाय से नहीं थे। मतलब ये बिना संप्रदाय के भी आप वेद का अर्थ करने वाला वो होता

348
00:23:52,480 --> 00:23:56,960
है उसके अंदर। वो भी गिना रखा है उन्होंने। तो उनमें से जिस संप्रदाय का नाम उन्होंने गिना है व्याकरण

349
00:23:56,960 --> 00:24:01,120
संप्रदाय। ठीक है? जिसको व्याकरण मानने वाले को व्याकरण कहते हैं। तो वो वो

350
00:24:01,120 --> 00:24:05,440
उसमें क्या है? तो व्याकरण और निरुक्त वाला जो है वो हमारा क्योंकि उसका इतिहास मिलता है। ठीक है?

351
00:24:05,440 --> 00:24:09,840
उसका इतिहास मिल जा रहा है। अब वो जो एक जो ट्रेिंग करते हैं तो हमें कुछ कुछ कुछ

352
00:24:09,840 --> 00:24:13,920
आचार्य जो जो हमें डॉक्यूमेंट इत्यादि मिलते हैं उसके बेस पे हमें पता चला कि नहीं इतने इतने पूरे श्रृंखलाएं

353
00:24:13,920 --> 00:24:18,320
चली आ रही है। ठीक है? इसमें कोई दिक्कत नहीं है। हम तो वही चीज मैं कह रहा हूं कि वेदार्थ

354
00:24:18,320 --> 00:24:22,320
करने के लिए जो वो संप्रदायों के नाम प्राचीन आचार्य ने गिराए हैं वो

355
00:24:22,320 --> 00:24:26,720
तो आपके नहीं है। तो आपको तो वेदार्थ करने का अधिकार ही नहीं है। एक पॉइंट आ गया। यानी वेदांत

356
00:24:26,720 --> 00:24:30,800
करने का मूल रूप से देखा जाए तो हमें अधिकार है। अच्छा इस पे एक और बात आ जाती है जो आचार्य शंकर जी

357
00:24:30,800 --> 00:24:34,240
ने जो परंपरा मैं पूरा बोल थोड़ा थोड़ा सा और है क्या कि जो आचार्य शंकर जी ने जो

358
00:24:34,240 --> 00:24:38,320
परंपरा चलाई थी उसमें क्या था? उन्होंने चलाई थी प्रस्थांतरीय की परंपरा। ठीक है? उन्होंने

359
00:24:38,320 --> 00:24:42,560
चारों वेद का अर्थ करने की परंपरा चलाई ही नहीं थी। उन्होंने क्या चलाया था कि आपको वेद मंत्र याद

360
00:24:42,560 --> 00:24:46,800
करना है। ठीक है? और बाकी जो प्रस्थांतरी के ऊपर भाष्य करने की उन्होंने परंपरा

361
00:24:46,800 --> 00:24:50,800
चलाई थी। वही परंपरा रामानुज ने वही परंपरा मधुवा ने लोगों ने आगे आगे चल के फॉलो

362
00:24:50,800 --> 00:24:54,800
किया। इस चीज को इस परंपरा को तोड़ा स्वामी दयानंद जी ने। तो उन्होंने बोला कि ये प्रस्था तो

363
00:24:54,800 --> 00:24:58,880
स्वतः प्रमाण है ही नहीं। तो परत प्रमाण है। स्वतः प्रमाण तो वेद है। इसको मैं क्यों भाष्य करू? उन्होंने

364
00:24:58,880 --> 00:25:03,040
मना कर दिया। तो उन्होंने क्या किया कि इनकी प्रस्थांतरी भाष्य ना करके उन्होंने वेद के ऊपर भाषण

365
00:25:03,040 --> 00:25:07,520
करना चालू किया। इन्होंने बोला कि स्वतः प्रमाण वेद है। वेद के आधार पे ये प्रस्थांतरी

366
00:25:07,520 --> 00:25:11,600
का अर्थ बदल सकता है। लेकिन प्रस्थांतरी के आधार पे आप कहो कि नहीं वेद का फलाना

367
00:25:11,600 --> 00:25:15,680
अर्थ होगा। ये गलत है। क्योंकि ये प्रस्थरी स्वत है। तो वहां से और

368
00:25:15,680 --> 00:25:19,760
उन्होंने वेद ये वेदार्थ करने का जो आधार लिया वो क्या लिया? वो तो उन्होंने वही

369
00:25:19,760 --> 00:25:24,160
लिया ना जो अष्टाधय महाभाष्य है क्या अष्टादय महाभाष को रिजेक्ट करते हैं ऋषि कृत नहीं कर सकते

370
00:25:24,160 --> 00:25:28,160
वही आ जाती है अब इसके अंदर बात आती है अब इस चीज को हर कोई स्वीकार करेगा उसे कोई

371
00:25:28,160 --> 00:25:32,480
मना नहीं करेगा बात इसमें अब जहां पे इस कांटे पर जो टकराती है बात ये आ जाती है

372
00:25:32,480 --> 00:25:36,480
कि जो एक सूत्र का दूसरे सूत्र सूत्र से युक्ति लगा करके जो

373
00:25:36,480 --> 00:25:40,560
जो अर्थ स्वामी दयानंद जी ने किया हुआ है और उसमें फिर ब्राह्मण ग्रंथों का आता है क्योंकि बहुत जगह

374
00:25:40,560 --> 00:25:45,360
पे अलंकारिक व्याख्या इत्यादि है तो वो ब्राह्मण ग्रंथों से टैली किया जाता है उसके बिना नहीं किया साथसा

375
00:25:45,360 --> 00:25:49,440
तो वो ब्राह्मण ग्रंथों से टैली करके और जो पूरा व्याकरण के आधार पे जिन्होंने अर्थ कर रखा है व्याकरण

376
00:25:49,440 --> 00:25:53,680
निरुक्त के आधार पे वो उसमें फिर सामने वाले व्यक्ति ने भी अगर पढ़ रखा है सेम

377
00:25:53,680 --> 00:25:57,680
चीज को तो आके उसमें फिर बात कर सके नहीं यहां पे ऐसे होना चाहिए था सामने वाले नहीं है

378
00:25:57,680 --> 00:26:01,680
यहां पे ऐसे होना चाहिए था वो एक अलग उसमें डिस्कशन है बाकी इसका कोई सशन नहीं है

379
00:26:01,680 --> 00:26:05,680
बाकी अब उसको रिजेक्ट करेंगे क्योंकि सामने वाले ने पढ़ रखा है कैसे रिजेक्ट कर देंगे आप पॉइंट ये

380
00:26:05,680 --> 00:26:09,680
है अब मैं बोलूं जी जी देखो सबसे

381
00:26:09,680 --> 00:26:13,760
पहली बात यहां से शुरू हुई है कि उन्होंने प्रस्थान त्रय पर परंपरा चलाई हम

382
00:26:13,760 --> 00:26:18,160
अब प्रस्थान त्रई को आप यह मानते हो कि वो जो है

383
00:26:18,160 --> 00:26:22,160
आपका ये मानना है कि वह जो है स्वता प्रमाण नहीं है। ठीक है मगर

384
00:26:22,160 --> 00:26:26,240
वेदार्थ के रूप में वेदार्थ के रूप में ही उपनिषदों को हमारे यहां माना गया

385
00:26:26,240 --> 00:26:30,480
है। अब इसमें मानने वाली बात जब आएगी मानने वाली है ना की वो स्वता

386
00:26:30,480 --> 00:26:35,040
प्रमाण है कि नहीं तो मानने वाली बात के लिए फिर वह परंपरा आनी ही पड़ेगी।

387
00:26:35,040 --> 00:26:39,120
आचार्य शंकर ने माना कि वेद स्वतः प्रमाण है। बाकी प्रमाण है। रामानुज ने माना है। मधुवा ने माना सबने

388
00:26:39,120 --> 00:26:43,280
माना। फिर भी वेस्टि भाष्य करते थे। क्योंकि परंपरा इसलिए इसलिए क्योंकि वो उसका

389
00:26:43,280 --> 00:26:47,360
प्रमाणिक भाष्य है ना उपनिषद। भाई जब एक बार

390
00:26:47,360 --> 00:26:51,360
वेद का अर्थ कर दिया उपनिषद में ब्रह्म की व्याख्या कर दी उपनिषद

391
00:26:51,360 --> 00:26:55,360
में प्रामाणिक व्याख्या जिसको हम प्रामाणिक अलग क्यों है फिर कहां

392
00:26:55,360 --> 00:26:59,760
अलग-अलग है नहीं आचार्य शंकर ने अलग किया मधवा ने अलग किया वो तो वो जब उपनिषदों

393
00:26:59,760 --> 00:27:03,760
पे भाष्य किया तो भाष्य अलग है ना उपनिषद थोड़ी अलग है मैं भाष्य की ही

394
00:27:03,760 --> 00:27:04,800
तो बात कर रहा हूं

395
00:27:04,800 --> 00:27:08,880
उपनिषद को तो हम भी मान रहे हैं अभी बात में ये कह रहा हूं की जैसे

396
00:27:08,880 --> 00:27:12,960
हमने वेदार्थ की परंपरा नहीं चलाई मगर उपनिषद का मतलब क्या है वेदार्थी तो है

397
00:27:12,960 --> 00:27:17,360
ब्रह्मसूत्र वेदांत तो है उपनिषद क्या उसकी जैसे उसमें जो आध्यात्मिक

398
00:27:17,360 --> 00:27:21,600
व्याख्या आती है ब्रह्म ब्रह्म की व्याख्या तात्विक व्याख्या की व्याख्या वो है क्या

399
00:27:21,600 --> 00:27:25,760
तो कोई अद्वैत पर कर रहा है मेरे मेरी बात रह

400
00:27:25,760 --> 00:27:30,000
जाएगी मेरी बात रह जाएगी तुमने काफी काफी सारी चीजें बोली है तो मुझे काफी सारी

401
00:27:30,000 --> 00:27:34,320
चीजें बोलनी तो पहली बात तो ये है कि वेदार्थ की जो व्याख्या है

402
00:27:34,320 --> 00:27:38,880
वो हमारे यहां पर उपनिषदों की व्याख्या करते हुए चलाया गया समय आने पर

403
00:27:38,880 --> 00:27:43,200
जब ये देखा गया कि जो क्या कहते है वैदिक भाष्य लुप्त

404
00:27:43,200 --> 00:27:47,200
हो सकता है तो दोबारा से हमारे आचार्य ने शयना आचार्य ने उसपे भाष्य

405
00:27:47,200 --> 00:27:51,360
किया। ठीक है तो ऐसा नहीं कि वेदार्थ को अलग हटा करके रख दिया था। ऐसा

406
00:27:51,360 --> 00:27:55,440
होता तो कोई भी उसपे भाष्य ही ना करता फिर। क्यों करवाया? दूसरी और

407
00:27:55,440 --> 00:27:59,840
ऐसा भी नहीं है कि कहीं पर भी वेद का वाक्य लिया ही नहीं गया प्रमाण के रूप में। जगह-जगह

408
00:27:59,840 --> 00:28:03,920
पर आचार्यों ने वेद का वाक्य भी लिया प्रमाण के रूप में। मुख्य रूप में उपनिषद

409
00:28:03,920 --> 00:28:07,920
लिए हैं। वो उपनिषद भी लिए वेद वेद वेद के लिए वेद एकदम ना के बराबर ले रखे

410
00:28:07,920 --> 00:28:12,400
हैं। बताइए कौन सा वेद है। देखो ना के बराबर लिए हो चाहे

411
00:28:12,400 --> 00:28:16,400
जरासा भी लिया हो। मतलब लेने का मतलब है कि वो वेद को लेकर चल रहे

412
00:28:16,400 --> 00:28:19,840
थे। ठीक है? अब जब हमें वेद का अर्थ प्रामाणिक

413
00:28:19,840 --> 00:28:23,840
रूप से अह उपनिषदों के रूप में प्राप्त है तो जल्दी हम उपनिषद ले लेते थे। नहीं

414
00:28:23,840 --> 00:28:27,840
वो अधूरा है ना। उपनिषद में कितने वेद मंत्र है? ठीक है।

415
00:28:27,840 --> 00:28:32,000
नहीं वेद मंत्र की बात नहीं कर रहा हूं। प्रामाणिक अर्थ की बात कर रहा हूं। नहीं नहीं अर्थ वेद

416
00:28:32,000 --> 00:28:36,320
मंत्र के अर्थ की बात कर रहा हूं ना। हमने उसे प्रामाणिक अर्थ के रूप में स्वीकार किया ना।

417
00:28:36,320 --> 00:28:40,320
उपनिषद को जैसे आप जैसे मान ले वेद में तो बहुत सारे मंत्र है ठीक है 100 मंत्रों का

418
00:28:40,320 --> 00:28:44,320
आपने उपनिषद उपनिषद में 100 मंत्र मान लीजिए आ गए उसका मैं अपनी मैं अपनी

419
00:28:44,320 --> 00:28:48,400
बात पूरी कर दूं फिर आप ठीक है एक तो रही ये

420
00:28:48,400 --> 00:28:52,640
वाली बात दूसरी बात ये है कि हमारी मुख्य विषय ये नहीं एक बीच में बात आई

421
00:28:52,640 --> 00:28:56,720
थी कि भाई हमारे पास युक्ति है तो हमने वैदिक स्वयं को

422
00:28:56,720 --> 00:29:00,960
कह दिया और युक्ति के युक्ति के आधार पर जो है वो कर दिया भले ही हमारे पास शब्द प्रमाण

423
00:29:00,960 --> 00:29:05,520
हो ना हो तो हमारे आचार्यों ने जो भाष्य किया है वो जो

424
00:29:05,520 --> 00:29:09,520
परम परंपरा अपनी दिखाते हुए कि भैया ये हमारे पास श्रुति को प्राप्त करने की

425
00:29:09,520 --> 00:29:13,920
विधा है। ये हमारी परंपरा है। उसके बाद अपनी युक्ति दी है। ठीक है?

426
00:29:13,920 --> 00:29:18,000
अब इस कई युक्तियों के आधार पर आचार्यों के भाष में अंतर

427
00:29:18,000 --> 00:29:22,240
तो है। मगर वहां पर क्योंकि उनके पास सबका शब्द प्रमाण है।

428
00:29:22,240 --> 00:29:26,240
इसलिए सबका ग्राह तो है। मगर फिर भी यदि एक दूसरे का वैसे

429
00:29:26,240 --> 00:29:30,480
ही विरोध करने लगेंगे कि आमने-सामने आ जाएं। तो फिर वहां पर बात क्योंकि सबके

430
00:29:30,480 --> 00:29:34,560
पास अपनी परंपरा है तो वहां पर बात यह हो जाएगी कि भैया सर्व शक्तिमान ईश्वर परम

431
00:29:34,560 --> 00:29:35,060
स्वतंत्र

432
00:29:34,880 --> 00:29:39,040
मोक्ष शाश्वत धर्म जो देगा वो उसका मान लिया जाएगा वहां पर मगर

433
00:29:39,040 --> 00:29:43,120
आप जो है केवल युक्ति को लेकर के आगे चले और जो है अपने शब्द प्रमाण

434
00:29:43,120 --> 00:29:47,440
को हटा ही दें कि भाई परंपरा हमारी 19 20 मान लो या क्लियर नहीं है वो मान लो

435
00:29:47,440 --> 00:29:51,440
तो फिर वहां पर ऑब्जेक्शनेबल हो जाएगा। नहीं यह तो

436
00:29:51,440 --> 00:29:55,600
सबका ही है ना और सबका नहीं है ना सब अपने आचार्यों के समय

437
00:29:55,600 --> 00:29:59,840
बता रहे हैं उन्होंने भाष्य लिखे हैं जगह जगह पर पंचदशी लिखी गई हमारे यहां धर्म

438
00:29:59,840 --> 00:30:03,840
ब्रह्म की व्याख्या में इनके इनको सपोर्ट करने वाली धर्म ब्रह्म

439
00:30:03,840 --> 00:30:08,080
की व्याख्या कौन सी है आचार्य शंकर से पहले कितने थे अरे आचार्य शंकर

440
00:30:08,080 --> 00:30:12,320
से पहले का अगर आप मानोगे नहीं वहां मान्यता विश्वास है अगर आचार्य

441
00:30:12,320 --> 00:30:16,320
शंकर से पहले का आप मानोगे नहीं तो अपनी वैदिकता भी तो सिद्ध करोगे फिर नहीं नहीं

442
00:30:16,320 --> 00:30:20,400
वैदिकता सिद्ध करने वाली बात अलग होगी अभी बात परंपरा पे चल रही है तो अभी बात हमें ऐसे

443
00:30:20,400 --> 00:30:24,720
तो हम तो बता रहे हैं भैया वशिष्ठ क्या कहते ब्रह्मा जी से वशिष्ठ

444
00:30:24,720 --> 00:30:28,880
वशिष्ठ जी से शक्ति शक्ति से पाराशर पाराशर से व्यास व्यास से वशिष्ट

445
00:30:28,880 --> 00:30:32,880
जी तो पूरा दो युग नाप गए हाँ दो युग नाप गए वही तो है

446
00:30:32,880 --> 00:30:36,960
वो आप मान्यता मानोगे नहीं वही मैं कह रहा हूं प्रमाणित करना पड़ेगा ना केवल

447
00:30:36,960 --> 00:30:39,120
मान्यता मानने से चीजें अरे भैया तो फिर

448
00:30:39,120 --> 00:30:43,200
प्रमाणित आप भी कर दोगे वेद मंत्र चार ऋषियों के उसमें आए थे तो वो जो है भगवान

449
00:30:43,200 --> 00:30:47,280
नहीं दिए। कैसे प्रमाणित करो? उस दिन लक्षण आप पूछ रहे थे मुझसे।

450
00:30:47,280 --> 00:30:51,520
वहां लक्षण क्या था? वहां लक्षण क्या था कि ईश्वर ने वो दिया

451
00:30:51,520 --> 00:30:55,600
मंत्र क्या लक्षण था वहां ईश्वर का लक्षण क्या था वहां पहचानने

452
00:30:55,600 --> 00:30:59,680
के लिए ईश्वर का लक्षण था कि जो वेद का ज्ञान दे तो कोई सा भी ज्ञान

453
00:30:59,680 --> 00:31:03,840
दे रहे क्योंकि बिना ज्ञान दिए गुरु के ज्ञान दिए हो नहीं सकता तो बस वही लक्षण हमारे जो अवतार

454
00:31:03,840 --> 00:31:07,920
है वो दे रहे है क्या दे रहे है वेद का ज्ञान वैदिक

455
00:31:07,920 --> 00:31:11,920
ज्ञान धर्म का ज्ञान ब्रह्म का ज्ञान दे तो रहे है ये अवतार

456
00:31:11,920 --> 00:31:16,000
दे रहे है अरे आपने ही तो कहा कि भैया उसका लक्षण है कि वेद का

457
00:31:16,000 --> 00:31:20,160
ज्ञान देता है हां हां तो वेद का ज्ञान दिया

458
00:31:20,160 --> 00:31:24,640
भगवान ने नहीं भगवान ने अवतार ने क्या दिया वेद का ज्ञान

459
00:31:24,640 --> 00:31:29,120
अवतार ने वेद का ज्ञान दिया और क्या कौन से अवतार ने दिया

460
00:31:29,120 --> 00:31:33,520
श्री कृष्ण ने गीता में दिया गीता में वेद दिए उन्होंने कौन से वेद मंत्र दिए

461
00:31:33,520 --> 00:31:37,840
अरे वेद मंत्र बिल्कुल उसी फॉर्म में नहीं ज्ञान की बात हो रही है ज्ञान दिया कि नहीं दिया

462
00:31:37,840 --> 00:31:42,240
मैं जो बोल रहा हूं फिर अगर अगर आप मंत्र की बात कर रहे हो अगर आप मैंने कहा

463
00:31:42,240 --> 00:31:46,320
मैंने कहा वेद का ज्ञान मैंने तो वेद नहीं बोला अगर आप कह रहे हो ज्ञान सुनो

464
00:31:46,320 --> 00:31:50,320
तो ज्ञान है तो इसका मतलब आप आपके पास पहले

465
00:31:50,320 --> 00:31:54,160
से ये होना चाहिए कि वेद का ज्ञान ये है जो वेद का ज्ञान देगा वो ईश्वर है। नहीं

466
00:31:54,160 --> 00:31:58,320
मैं आपसे पूछ रहा हूं कि फिर वेद का ज्ञान है क्या? मैं बता रहा हूं। आपने ऋषियों के ये

467
00:31:58,320 --> 00:32:02,880
कहा कि ऋषियों ने उनको वेद के ज्ञान से पहचाना। यही कहा ना आपने?

468
00:32:02,880 --> 00:32:07,120
मैंने देखिए मैंने ये बोला कि जैसे मान लीजिए कि आधी सृष्टि में लोग हैं।

469
00:32:07,120 --> 00:32:11,200
ठीक है? अभी हम अभी हम फिलहाल ये ऑब्जर्व कर रहे हैं कि बिना सिखाए कोई सीखता नहीं है।

470
00:32:11,200 --> 00:32:15,280
ठीक है? मां-बाप बच्चे को बोलना नहीं। मैं मैं वो बात पलट जाएगी। मैं ये कह

471
00:32:15,280 --> 00:32:19,440
रहा हूं ऋषियों ने उनको वेद के ज्ञान से पहचाना ना कि जो वेद का ज्ञान दे रहा है वो ईश्वर

472
00:32:19,440 --> 00:32:23,440
है। वेद का ज्ञान हटा दिया। वेद मतलब ये होता है जो ईश्वर द्वारा उसी

473
00:32:23,440 --> 00:32:27,440
को हमने वेद बोला है। ठीक है? यानी तो वो वो ईश्वर की पहचान कैसे

474
00:32:27,440 --> 00:32:31,600
की थी आपने? जिसने ज्ञान दिया वो ईश्वर है। तो बस ऐसे ही

475
00:32:31,600 --> 00:32:35,680
आपका एक विश्वास है वहां पर। अनुभव आप अनुमान प्रमाण है।

476
00:32:35,680 --> 00:32:36,960
केवल विश्वास थोड़ी है।

477
00:32:36,960 --> 00:32:41,120
हां बताओ क्या अनुमान प्रमाण है बताओ? अरे जैसे जैसे मैं बोल तो रहा हूं कि जैसे बिना सिखाए

478
00:32:41,120 --> 00:32:45,120
किसी को ज्ञान हो नहीं सकता। ठीक है? ठीक है तो वैसे बिना आधी सृष्टि में बिना किसी के ज्ञान दिए

479
00:32:45,120 --> 00:32:49,120
हो नहीं सकता। बिना सिखाए किसी को ज्ञान हो नहीं सकता।

480
00:32:49,120 --> 00:32:53,520
मतलब आप ये कह रहे हो कि बिना सिखाए व्यक्ति खाना खाना भी नहीं सीख सकता।

481
00:32:53,520 --> 00:32:57,600
अगर ये बताइए अगर बच्चा मान लीजिए बच्चा अभी पैदा हुआ है। ठीक है?

482
00:32:57,600 --> 00:33:01,600
उसको ये पता है कि पानी क्या है? शरबत क्या है? पता है

483
00:33:01,600 --> 00:33:05,680
उसको? तो इसका मतलब जानवर को तो पानी पीना नहीं चाहिए। बच्चा उठा के मिट्टी खाता है ना मुंह में।

484
00:33:05,680 --> 00:33:09,680
पता होता है उसको क्या खाना है? जानवर को पानी पीना चाहिए कि नहीं? जानवर के अंदर तो

485
00:33:09,680 --> 00:33:13,760
नेचुरली फिट कर रखा है वो चीज। तो हो सकता है नेचुरल हो सकता है

486
00:33:13,760 --> 00:33:18,320
हो सकता है नेचुरली आया ऋषियों के अंदर क्या आया वो यही ज्ञान

487
00:33:18,320 --> 00:33:22,720
अगर नेचुरली तो मानना पड़ेगा ना कि किसी के किसी के द्वारा दिया गया है नेचुरली भी अरे

488
00:33:22,720 --> 00:33:26,720
क्यों कुत्ते के अंदर जब आप नेचुरली मान रहे हो तो ऋषि के अंदर ईश्वर मानते हैं

489
00:33:26,720 --> 00:33:30,720
हम तो ईश्वर प्रदत्त मानते हो ना विश्वास है

490
00:33:30,720 --> 00:33:34,800
ना कि वो ईश्वर नहीं दिया वही है ना कि आएगा काम थोड़ी

491
00:33:34,800 --> 00:33:39,040
हो जाएगा हमारी अरे अभी तो तुमने कहा कि कुत्ते के अंदर नेचुरली

492
00:33:39,040 --> 00:33:43,280
होता है नेचुरली बोलने का अर्थ ही मेरा कि ईश्वर द्वारा दिया गया है

493
00:33:43,280 --> 00:33:47,280
और और इंसान को नहीं दिया गया है। इंसान को दिया तभी तो हमारे पास

494
00:33:47,280 --> 00:33:51,280
ज्ञान है। आज नहीं दिया तो कैसे होता? अच्छा दूसरी बात ये है कि वो ज्ञान ही है।

495
00:33:51,280 --> 00:33:52,000
ये कैसे सिद्ध

496
00:33:52,000 --> 00:33:55,040
हुआ? तो और क्या है? भाई

497
00:33:55,040 --> 00:33:59,040
जैसे कि हमें उससे मोक्ष प्राप्त होगा। ये सिद्ध कैसे हुआ?

498
00:33:59,040 --> 00:34:03,040
उसका लक्षण क्या है ज्ञान का? प्रयोग से क्या प्रयोग है

499
00:34:03,040 --> 00:34:07,040
बताओ। अगर कोई उसको टेस्ट करना चाहता कि इस ज्ञान से मोक्ष होगा नहीं होगा उसको टेस्ट

500
00:34:07,040 --> 00:34:11,040
कर ले। प्रत्यक्ष कर ले उसका। तो तुमने किया है नहीं

501
00:34:11,040 --> 00:34:15,040
मैंने तो नहीं किया तो इसका मतलब लक्षण सिद्ध नहीं हो रहा नहीं लक्षण

502
00:34:15,040 --> 00:34:19,120
बात ये नहीं कि लक्षण सिद्ध नहीं हो रहा बात है लक्षणों को चेक नहीं ऐसे तो ऐसे तो मैं भी

503
00:34:19,120 --> 00:34:23,840
कह सकता हूं ना कि राम जी को देख कर के मोक्ष प्राप्त हो जाएगा टेस्ट कर ले

504
00:34:23,840 --> 00:34:24,340
अब

505
00:34:24,080 --> 00:34:28,080
लाइए राम जी को टेस्ट कर लेते हैं हां तो करो भक्ति उनकी आजीवन

506
00:34:28,080 --> 00:34:32,080
कर लो नहीं आपने बोला ना कि राम जी को देख के देखना पड़ेगा लाइए देखते हैं अभी देखते हैं

507
00:34:32,080 --> 00:34:36,240
अभी हां तो अंतःकरण से आजीवन देखते रहो मोक्ष में अंतःकरण

508
00:34:36,240 --> 00:34:40,320
से अंतःकरण से तो किसी ऋषि ने लिखा नहीं कि भाई राम जी को देखिए आंखें आंखों से देखने का विषय है ना

509
00:34:40,320 --> 00:34:44,320
राम जी तो अच्छा तो मंत्र कैसे देखे गए थे वहां द्रष्टा

510
00:34:44,320 --> 00:34:48,400
कैसे बने थे अंतःकरण से बने थे कैसे बने थे अच्छा कौन से ऋषि ने दृष्टा

511
00:34:48,400 --> 00:34:52,400
का अर्थ देखना लिखा है जानना नहीं लिखा दर्शन करना आपके दयानंद जी

512
00:34:52,400 --> 00:34:56,480
ने ही लिखा है और बताओ ये भी उन्होंने लिखा कि अर्थ है ना अर्थ है

513
00:34:56,480 --> 00:35:01,280
ना अर्थ है ना हिंदी करना आना चाहिए ना संस्कृत यानी

514
00:35:01,280 --> 00:35:05,840
यानी कि ज्ञानार्थक उसका अर्थ ले रहे हो ना

515
00:35:05,840 --> 00:35:10,240
मैं भी मैं भी ले रहा हूं मैं भी ले रहा हूं राम जी को देखने का दर्शनार्थ अंतःकरण

516
00:35:10,240 --> 00:35:14,240
से उनको जीवन भर देखते रहिए मोक्ष मिल जाएगा टच कर लीजिए आपने ये क्लेम किया ना की उनको

517
00:35:14,240 --> 00:35:18,240
आंखों से देख सकते हैं आंखों से देखने के बाद भी अंतःकरण से

518
00:35:18,240 --> 00:35:22,240
भी देखिए ज्ञानार्थक दृष्टि से अलग विषय है अलग विषय आपने आंखों से

519
00:35:22,240 --> 00:35:26,400
देखना पहले बात किया था मेरी आपने भी पहले बात किया था कि वो चार ऋषियों को ज्ञान

520
00:35:26,400 --> 00:35:32,400
प्राप्त हुआ वो छोड़ दीजिए अभी बीच में मैं नहीं छोड़ रहा हूं मैं नहीं छोड़ रहा हूं मैं तो उसी

521
00:35:32,720 --> 00:35:36,880
पे बोल रहा हूं देखो अगर अगर तुम अगर तुम ज्ञान से टेस्टिंग मान

522
00:35:36,880 --> 00:35:39,200
रहे हो निर्भय तो तुमको यहां पे भी मानना

523
00:35:39,200 --> 00:35:43,200
पड़ेगा कि हम कह रहे हैं कि भैया हमारे बताए रास्ते पे चलो मोक्ष मिल जाएगा टेस्ट

524
00:35:43,200 --> 00:35:47,280
कर लो जाकर फिर अवतार को मान लो। नास्तिक आपको यही बोलना ही पड़ेगा और कोई चारा

525
00:35:47,280 --> 00:35:51,280
नहीं है। हां तो बोलना पड़ेगा उसमें क्या है? मगर आप जो

526
00:35:51,280 --> 00:35:55,520
आप जो लक्षण पे रोक रहे हो ना कि वो क्या कहते हैं लक्षण

527
00:35:55,520 --> 00:35:59,600
क्या है? एक एक बात बात इसके अंदर जाती है। लक्षण पे कैसे आए वो मैं बता

528
00:35:59,600 --> 00:36:04,240
दूं। लक्षण पे कैसे आए? कि वैदिकता वैदिकता से नहीं

529
00:36:04,240 --> 00:36:08,240
वो कैसे मैं बता रहा हूं। घूमा कैसे? वो मैं

530
00:36:08,240 --> 00:36:12,320
बता रहा हूं। क्यों घूमा? लक्षण पे क्यों आए थे? क्योंकि जब हमें वैदिकता सिद्ध

531
00:36:12,320 --> 00:36:16,480
करनी है तो हमने ऋषियों की बात को वहां प्रमाण मान लिया। तो ऐसे हमारी मान्यता

532
00:36:16,480 --> 00:36:20,480
है कि भैया दो-दो लाख वर्ष के वो वशिष्ठ इत्यादि हुए। नहीं तो

533
00:36:20,480 --> 00:36:24,480
बात ये है ना बाद आ जाता है। हम ये देखते हैं कि कौन सी चीज संभव

534
00:36:24,480 --> 00:36:28,640
है, कौन सी चीज असंभव है। है ना? अब देखिए ऋषि अगर

535
00:36:28,640 --> 00:36:32,640
मान लीजिए किसी व्यक्ति के पास ज्ञान नहीं तो उसके पास ज्ञान अचानक से आ गया और वही बात अगर आया नहीं तो

536
00:36:32,640 --> 00:36:36,960
फिर हमारे तक भी नहीं आता। है ना? इसके अंदर फिर असंभव असंभव

537
00:36:36,960 --> 00:36:41,040
असंभव तो असंभव तो इसमें ये आ जाता

538
00:36:41,040 --> 00:36:45,040
है कि यह अनुमान प्रमाण से चीज का पता चल रहा है लेकिन ये कहना कि नहीं कोई व्यक्ति

539
00:36:45,040 --> 00:36:49,120
जो है दो युग तक जी गया ठीक है इसको भी तो आपको कोई ना कोई

540
00:36:49,120 --> 00:36:53,840
अनुमान प्रमाण दीजिए प्रत्यक्ष दीजिए ना तो मानना पड़ेगा ना आप यहां पे असंभवता

541
00:36:53,840 --> 00:36:54,340
वो कर

542
00:36:54,240 --> 00:36:58,240
रहे हो ना क्या चीज अब मैं असंभवता बता रहा हूं कि पहला मानव

543
00:36:58,240 --> 00:37:02,400
आपका कैसे बना है बताओ ये भी तो असंभव है आप बताइए

544
00:37:02,400 --> 00:37:06,400
आप बताओ हमारा तो सीधे मानव प्रकट हुआ अब बताओ आप बताओ

545
00:37:06,400 --> 00:37:10,480
कैसे प्रकट आप अपना बताओ ना मैं अभी आपसे पूछ रहा हूं आपकी भी तो मान्यता मुझे

546
00:37:10,480 --> 00:37:14,800
क्लियर होनी चाहिए ना कैसे पहला सीधे भगवान की इच्छा शक्ति से

547
00:37:14,800 --> 00:37:18,800
नहीं इच्छा शक्ति से भी कुछ तो हुआ होगा क्या हुआ है वो तो बताइए सीधे

548
00:37:18,800 --> 00:37:23,120
प्रकट हो गया और क्या? नहीं प्रकट में भी अभाव से भाव हो गया क्या?

549
00:37:23,120 --> 00:37:27,280
अभाव से भाव क्यों होगा जब ईश्वर है ईश्वर को मान रहे हैं हम पीछे नहीं जैसे

550
00:37:27,280 --> 00:37:31,840
वह मनुष्य नहीं था उस मनुष्य का अभाव था उसका अभाव हो गया ऐसा कह रहे हैं आप

551
00:37:31,840 --> 00:37:37,520
मनुष्य का मनुष्य के रूप में तो अभाव था ही और क्या जो

552
00:37:37,520 --> 00:37:42,000
रूप है उसका तो अभाव था ही हा उपादान क्या था

553
00:37:42,000 --> 00:37:46,400
मैं आपसे पूछ रहा हूं आज भी वो उपादान है ना तो संभव

554
00:37:46,400 --> 00:37:50,400
है एक इंसान प्रकट कर दो नहीं हम तो

555
00:37:50,400 --> 00:37:54,560
प्रकट होना ऐसे डायरेक्ट थोड़ी बोल रहे हम तो बोल रहे बंद है पंचभूत से बनता है जैसे आज बनता है

556
00:37:54,560 --> 00:37:58,640
आज आज जैसे मतलब वो

557
00:37:58,640 --> 00:38:02,720
आज जो है गर्भ धारण करके बनता है ना हां हां उस समय गर्भ धारण हुआ था

558
00:38:02,720 --> 00:38:07,280
किसी महिला का हुआ था किसने किया था ईश्वर ने बनाए थे

559
00:38:07,280 --> 00:38:09,280
किसके पेट में ये गर्भ

560
00:38:09,280 --> 00:38:14,080
में बनाए थे अंडा के कौन बना रहा है मुर्गी के पेट में अंडा कौन बना रहा है मुर्गी बना रही है

561
00:38:14,080 --> 00:38:18,160
मुर्गी मुर्गी बना रही है अंडे के पेट में क्या बता रहे हो तुम समझ

562
00:38:18,160 --> 00:38:22,160
में नहीं मैं पूछ रहा हूं इसमें मेरा ये प्रश्न रूप में था प्रश्नात्मक शैली में था ये कि जैसे से

563
00:38:22,160 --> 00:38:26,160
अगर पेट में मुर्गी के अंडा बन रहा है। ठीक है? तो अंडा कौन बना

564
00:38:26,160 --> 00:38:30,240
रहा है? मुर्गी बना रही है। कौन बना रहा है? ठीक है? अज्ञात शक्ति बना रही है। और फिर अंडे

565
00:38:30,240 --> 00:38:34,320
को वो बाहर निकाल दे रही है तो भी उसको मुर्गी को नहीं पता कि अंडे के अंदर से बच्चा कैसे बन रहा है? कौन बना रहा है?

566
00:38:34,320 --> 00:38:38,320
अज्ञात शक्ति बना रही है। तो जैसे आज वो ईश्वर इस प्रकार से बना रहा है। गर्भ निर्माण अंडा

567
00:38:38,320 --> 00:38:42,320
क्या एक प्रकार का गर्भ है। ठीक है? तो जैसे वो गर्भ बना करके बच्चे का रचना आज

568
00:38:42,320 --> 00:38:46,320
कर रहा है। वैसे ही उस काल में भी कर रहा है। तो मैं वही तो कह रहा हूं। असंभव कुछ है ही

569
00:38:46,320 --> 00:38:50,560
नहीं। मैं वही तो कह रहा हूं असंभव कुछ है ही नहीं। आप कह रहे हो ना असंभव है कि दो लाख वर्ष जो वो

570
00:38:50,560 --> 00:38:54,640
जिया आपको उदाहरण दे के आज मैंने उसका

571
00:38:54,640 --> 00:38:58,640
उदाहरण देकर के दिखाया कि हां सुनिए आपका उदाहरण आपका उदाहरण इसलिए

572
00:38:58,640 --> 00:39:02,720
गलत है कि आज मुर्गी के गर्भ में ही अंडा पलेगा बढ़ेगा मगर वहां पे कोई

573
00:39:02,720 --> 00:39:06,880
मुर्गी नहीं थी फिर भी अंडा आप मान रहे हो वहां पे नहीं नहीं उसमें

574
00:39:06,880 --> 00:39:10,880
बात की बात क्या है पॉइंट पकड़िए इसलिए पॉइंट इसके अंदर ये आ रहा है कि हमें ये नहीं

575
00:39:10,880 --> 00:39:14,880
देखना कि मुर्गी के अंदर बन रहा है कि अंटार्कटिका में बन रहा है क्यों नहीं देखना है

576
00:39:14,880 --> 00:39:19,040
मुझे देखना है ना आज की साइंस ये नहीं मानती ना कि बिना उसके

577
00:39:19,040 --> 00:39:23,040
गर्भधारण हो जाएगा। अंडा बन जाएगा। साइंस मानती है। क्यों नहीं मानती? कहां मान रही है?

578
00:39:23,040 --> 00:39:24,640
साइंस मानती है। आर्टिफिशियल

579
00:39:24,640 --> 00:39:28,720
फर्टिलाइजेशन मानती है। साइंस करते नहीं है ये लोग। जागोट को मिला करके आपस में करते नहीं है ये

580
00:39:28,720 --> 00:39:32,720
लोग। क्यों नहीं करते? लैब में टेस्टिंग होती है। ये जो ये जो बेबी

581
00:39:32,720 --> 00:39:36,880
टेस्टिंग होती है जागोट को ये लोग मिला के उसमें जागोट तैयार करते हैं। पूरा क्या करते हैं वो?

582
00:39:36,880 --> 00:39:40,960
आर्टिफिशियली तो हो रहा है। मतलब लैब में कर रहे हैं चीजें तो। अगर कोई मनुष्य

583
00:39:40,960 --> 00:39:44,960
काम करता चलो ठीक है ठीक है वहां पर मतलब कि आपका कहना है

584
00:39:44,960 --> 00:39:48,960
कि वहां पर जो है ये जो पंच तत्व थे वो जिस तरीके से आज जो

585
00:39:48,960 --> 00:39:53,120
टेस्ट ट्यूब में ये बनाए जा रहे हैं अंडे वगैरह उस तरीके से ईश्वर

586
00:39:53,120 --> 00:39:57,840
ने बनाए हां मतलब ये देखिए इसमें बात होती है संभव और असंभव

587
00:39:57,840 --> 00:40:01,840
तो अगर अगर हम हां हां मैं मुंह धो ले रहा हूं

588
00:40:01,840 --> 00:40:06,000
तो वही बात आ जाती है ना कि इसमें अगर संभव असंभव वाला पॉइंट आता है अगर इस

589
00:40:06,000 --> 00:40:10,080
चीज को अगर हम आज दिखा रहे हैं कि नहीं ये चीज असंभव है ठीक है तो आप उसे से 1000

590
00:40:10,080 --> 00:40:14,240
साल पहले भी संभव है फिर तो आप रिजेक्ट नहीं कर सकते। लेकिन अगर वो चीज आज संभव

591
00:40:14,240 --> 00:40:18,400
नहीं है। ठीक है? आज अगर मतलब बिना माता-पिता के सहयोग के

592
00:40:18,400 --> 00:40:22,560
वहां पर संभव था या माता पिता का था। आज तो हो रहा है ना? अरे

593
00:40:22,560 --> 00:40:26,640
तो वीर तो ले रहे हैं ना वो किसी पुरुष का। यानी वो फिर वो

594
00:40:26,640 --> 00:40:30,960
वीर भी बना किसी चीज से। मैटर से बना है ना? आज बना पा रहे हैं कि नहीं बना पा रहे हम?

595
00:40:30,960 --> 00:40:35,680
तो वीर आज की साइंस तो ये मानती है ना कि वो एक मैन से ही निकलेगा।

596
00:40:35,680 --> 00:40:39,840
अरे आज आज आज तो हमारे पास में यह भी है ना कि हम एक डीएनए से सिंपल एक डीएनए से ही बच्चा

597
00:40:39,840 --> 00:40:44,240
बना सकते हैं। प्लांट का कि हम कैसे बनाते हैं? प्लांट से

598
00:40:44,240 --> 00:40:48,400
वो डीएनए कहां से लाएंगे हम? जैसे इस चीज को समझिए। ये तो एक हो गया कि

599
00:40:48,400 --> 00:40:52,400
पैटर्न से एक एक तरीका ये होता है और ऐसी बहुत सी चीजें हैं जो ईश्वरकृत

600
00:40:52,400 --> 00:40:56,560
कार्यों में असंभव वाली दिखेंगी। साइंस के मैं सबको प्रमाणित करूंगा।

601
00:40:56,560 --> 00:41:00,640
उसमें समस्या नहीं है। बात ये है कि उसमें समस्या ये आती है कि जब हम आपसे प्रश्न पूछते

602
00:41:00,640 --> 00:41:04,640
तो अपने प्रश्न का उत्तर ना दे के आप हमसे पूछते हैं। ये चीज खराब लगती है। लेकिन फिर

603
00:41:04,640 --> 00:41:08,640
भी मैं तो तैयार हूं। अपने आप जो मेरे से प्रश्न पूछेंगे सबका उत्तर देने को तैयार हूं। लेकिन कम से कम आप भी तो तैयार

604
00:41:08,640 --> 00:41:13,200
होइए। अपने वाले का देने के लिए उत्तर। भाई मैं तो दे ही रहा हूं ना भाई। आप मान नहीं रहे हो। तो

605
00:41:13,200 --> 00:41:17,200
आप आप वहां पे यह कह रहे हो कि भैया यह असंभव है। बिलकुल है

606
00:41:17,200 --> 00:41:21,200
तो मैं मैं आपको प्रमाणित करके रहूंगा कि आपके ईश्वर जिसको आप ईश्वर कह रहे

607
00:41:21,200 --> 00:41:25,360
हैं उसने कई ऐसे कार्य किए हैं जो असंभव है। देखिए अब ये बच्चा वाला तो आप असंभव

608
00:41:25,360 --> 00:41:29,520
क्लेम नहीं कर पा रहे हैं। क्यों नहीं क्लेम कर पा रहे भैया वो उनके पास मशीन होती है

609
00:41:29,520 --> 00:41:33,520
ये होता है वो होता है। आप मुझे दिखाओ करके बिना उसके इन सहायता के।

610
00:41:33,520 --> 00:41:37,760
किसके सहायता के? जिन उपकरणों का वो सहायता ले रहे हैं करने

611
00:41:37,760 --> 00:41:41,920
के लिए उन उपकरणों का वो दिखाओ मुझे करके। नहीं तो ऐसे तो ईश्वर भी जो

612
00:41:41,920 --> 00:41:46,240
पेट में बच्चा बनाता है वो क्या उपकरण से बनाता है? अपने से बनाता है ना? तो सामर्थ्य मानना

613
00:41:46,240 --> 00:41:50,320
पड़ेगा ना उसके पास ऐसा तो फिर सामर्थ मान रहे हो तो ऐसा सामर्थ

614
00:41:50,320 --> 00:41:54,400
भी मानो ना जो क्या कहते हैं ये क्या कहते हैं वो किसी को चाहे तो इतने

615
00:41:54,400 --> 00:41:55,200
लाख वर्ष जीवित

616
00:41:55,200 --> 00:41:59,440
रख दे। अब मैं इसको बताता हूं। अब जैसे मान लीजिए कि इसमें

617
00:41:59,440 --> 00:42:03,760
पॉइंट ये आ रहा है कि अब जैसे ये चीज क्योंकि बच्चा बना रहा है। ठीक है?

618
00:42:03,760 --> 00:42:07,920
तो ये चीज अनुमान प्रमाण से सिद्ध हो रही है कि अगर बच्चा बना रहा है तो उसमें बच्चा बनाने का सामर्थ्य है। है

619
00:42:07,920 --> 00:42:11,920
ना? तो यह चीज आपको प्रूफ करना पड़ेगा ना कि ऐसे हजारों करोड़ साल तक जिंदा रखने का सामर्थ्य

620
00:42:11,920 --> 00:42:16,880
है तो प्रूफ करिए क्यों नहीं कर रहे तो देखिए हम सामर्थ घटाने

621
00:42:16,880 --> 00:42:20,880
आप अचिंत शक्ति को मान रहे हो आपने उस दिन पृथ्वी इत्यादि में धक्का ना

622
00:42:20,880 --> 00:42:24,960
मानने की बात आपने जो है इच्छा शक्ति मान ली वो दिखाओ मुझे वहीं

623
00:42:24,960 --> 00:42:29,040
से शुरू हो जाता है तो बार-बार आप टॉपिक चेंज करेंगे मूलंग

624
00:42:29,040 --> 00:42:33,040
इसलिए क्योंकि आपको पता है कि किसी एक चीज में आपने जानकारी हासिल कर

625
00:42:33,040 --> 00:42:37,120
ली है मगर ऐसे बहुत से उदाहरण है जहां पर हमको चमत्कार को मानना ही पड़ेगा कि उसकी

626
00:42:37,120 --> 00:42:41,280
इच्छा शक्ति थी केवल देखिए बात है आप जो है अपनी जगह

627
00:42:41,280 --> 00:42:45,280
पे इच्छा शक्ति को मान रहे हो हमारी जगह पे आप काउंटर कर रहे हो मैं मैं आपको बताता हूं जैसे

628
00:42:45,280 --> 00:42:49,360
आपने एक वाला पॉइंट उठाया था अभी ये वाला पॉइंट उठाया इसका मैंने आपको उत्तर दिया

629
00:42:49,360 --> 00:42:53,600
ठीक है अब आप ये करेंगे आप एक इसमें उत्तर नहीं मिला है इसमें उत्तर नहीं मिला है उत्तर

630
00:42:53,600 --> 00:42:57,920
ये है कि साइंस जिस तरीके से मान रही है जिस तरीके से साइंस

631
00:42:57,920 --> 00:43:02,000
मान रही है उस तरीके से आप वहां पे क्या मशीन्स हैं जहां पे वो टेस्ट ट्यूब

632
00:43:02,000 --> 00:43:06,160
बेबी बनेगा अभी आपने सामर्थ्य वाला बात बोला था ना हां तो सामर्थ

633
00:43:06,160 --> 00:43:10,240
वाली बात हुई तो उसको रिपीट क्यों कर रहे हो फिर क्या मतलब तो मैं तो मैं तो सामर्थ्य को मान ही रहा हूं ना आप नहीं

634
00:43:10,240 --> 00:43:14,240
मान रहे हो मुझे नहीं अभी देखिए अभी मैंने पूरी स्टेटमेंट बोली आप मुझे दोबारा रिपीट करवा रहे हैं

635
00:43:14,240 --> 00:43:18,560
मेरी बात को मैंने अभी क्या बोला मैं मैं फिर बताता हूं मैंने बोला कि

636
00:43:18,560 --> 00:43:22,720
जब ईश्वर पेट में बच्चा बना रहा है ठीक है ईश्वर सृष्टि बना रहा है या ईश्वर फूलों

637
00:43:22,720 --> 00:43:26,720
में रंग डाल रहा है तो कौन सा मशीन यूज कर रहा है नहीं यूज कर रहा है ना तो इसीलिए तो हम बोल

638
00:43:26,720 --> 00:43:30,720
रहे है ना की सर्वशक्तिमान है लेकिन पॉइंट क्या आ जा रहा है पॉइंट ये रहा है कि आप बोल

639
00:43:30,720 --> 00:43:34,720
अब आप कह रहे हो मैं पूरा बोल देता हूं एक मिनट यानी नहीं

640
00:43:34,720 --> 00:43:38,720
मैं पूरा कम से कम स्टेटमेंट मेरी तरफ मैं अपनी बात क्लेरिटी के साथ मैं बस

641
00:43:38,720 --> 00:43:42,800
एक चीज़ यानी कि वो कुछ ऐसा कर रहा है जो और किसी जो हमारे लिए

642
00:43:42,800 --> 00:43:46,880
संभव नहीं है। हमें हम डिपेंड हो के कर हम भी रहे हैं हम डिपेंड होकर कर रहे हैं।

643
00:43:46,880 --> 00:43:50,880
वो डिपेंड हो के कर रहा है। तो यानी कि वो कर रहा है ना असंभव चीजें कर रहा है ना

644
00:43:50,880 --> 00:43:55,200
वो। असंभव जब कर दिया तो असंभव कहां रह गया? ये क्या बात हो गई? कर भी रहा है फिर भी कह रहे हो असंभव

645
00:43:55,200 --> 00:43:59,360
है। जब काम हो गया तो असंभव कहां रह गया? फिर यानी जो हमारी जो हमारी

646
00:43:59,360 --> 00:44:03,520
इंद्रियों के द्वारा क्या कहते हैं वो नहीं है कि हम उसको

647
00:44:03,520 --> 00:44:07,520
जो है कर पाए। ऐसी चीजें वो कर रहा है ना। बात यह है कि

648
00:44:07,520 --> 00:44:11,520
नहीं देखिए एक होते है करने वाले काम ना करने वाले जब ना करने वाले का काम उसने कर दिया तो फिर वो

649
00:44:11,520 --> 00:44:15,600
करने वाले काम की श्रेणी में आ गया ना एक तीसरा वाला दूध देना आप

650
00:44:15,600 --> 00:44:19,600
ये बताओ आप ये बताओ अभी साइंस ने ऐसी तरक्की कर ली है वो एक नया ग्रह बना

651
00:44:19,600 --> 00:44:23,600
दे पता नहीं मुझे नहीं पता सूर्य बनाने छोटा सा सूर्य

652
00:44:23,600 --> 00:44:25,760
बनाने का तो कर लिया है

653
00:44:25,760 --> 00:44:29,840
नया ग्रह बना दे इत्यादि कर लिया है नहीं छोटा सा सूर्य बना सकता

654
00:44:29,840 --> 00:44:34,320
है वो तो एक है लैब टेस्टिंग में बहुत स्माल था उन्होंने सन क्रिएट किया था

655
00:44:34,320 --> 00:44:38,400
तो वो ग्रह मान वो वो ग्रह मान लिया जाए उसको टांग देगा वो वहां

656
00:44:38,400 --> 00:44:43,760
पर और उस पर जीवन हो जाएगा। नहीं नहीं नहीं

657
00:44:43,760 --> 00:44:47,760
रक्त रक्त की जो बात होती है वो बनाने का वो मान लिया कि हम बना सकते

658
00:44:47,760 --> 00:44:51,760
हैं। नहीं नहीं नहीं मगर ईश्वर तो बना रहा है। तो बना रहा है

659
00:44:51,760 --> 00:44:56,080
तो आंखों से दिख रहा है। यानी पता ये चीज पॉसिबल है। है ना? पॉसिबल

660
00:44:56,080 --> 00:45:00,160
है ये पता है ना हमें? अब बात वही आती है कि जो हमें आंखों से दिख रहा है कि ये चीज बन रही है यानी

661
00:45:00,160 --> 00:45:04,640
ये चीज पॉसिबल है। आप ऐसा क्लेम कर रहे हो जो हमें दिख रहा पॉसिबल नहीं है। आप मतलब

662
00:45:04,640 --> 00:45:09,680
अच्छा आंखों से नहीं दिख रहा पॉसिबल नहीं है। तो विज्ञान ने ईश्वर को मान लिया है।

663
00:45:09,680 --> 00:45:14,160
आंखों से यानी वो क्रिया होते हुए दिख रही है। अरे भैया विज्ञान

664
00:45:14,160 --> 00:45:18,480
ने ईश्वर को मान लिया है। ये जो कर्म फल सिद्धांत इत्यादि मान लिया है।

665
00:45:18,480 --> 00:45:22,560
नहीं। तो फिर ये आंखों से कहां दिख रही है? क्यों मान रहे हो? नहीं मैंने बोला

666
00:45:22,560 --> 00:45:26,720
कुछ और आपने लिया कुछ और। क्या कर्म फल सिद्धांत इत्यादि के विषय

667
00:45:26,720 --> 00:45:31,040
में मैं क्या बोल रहा हूं वो तो आप पकड़िए मैं जो बोल रहा हूं वो छोड़ के आप सब पकड़ रहे हैं बताइए

668
00:45:31,040 --> 00:45:35,280
मैं ये बोल रहा हूं कि जैसे आप बोल रहे हैं ना कि रक्त बनना रस से रक्त बनना है ना

669
00:45:35,280 --> 00:45:39,440
ये क्रिया हो गई आप कह रहे हैं असंभव क्रिया मैं कह रहा हूं जब ये कार्य हो रहा है असंभव

670
00:45:39,440 --> 00:45:41,760
क्रिया के लिए इस श्रेणी में कैसे आ जाएगा

671
00:45:41,760 --> 00:45:45,920
क्योंकि रक्त क्योंकि क्योंकि रक्त से रक्त बन रहा है आज के टाइम

672
00:45:45,920 --> 00:45:50,000
में हम ईश्वर की अचिंत शक्ति मानते हैं जहां पे रक्त जहां पे रक्त

673
00:45:50,000 --> 00:45:54,000
से रक्त नहीं बना उसकी अचिंत शक्ति से रक्त बन गया नहीं अचिंत शक्ति

674
00:45:54,000 --> 00:45:58,080
देखिए उसमें पॉइंट वही है ना पॉइंट ये कि कोई भी क्रिया हो रही है तो

675
00:45:58,080 --> 00:46:02,400
उसमें परमाणु के मेल से नए पदार्थ बन रहे हैं। अश्वचिंत क्या है?

676
00:46:02,400 --> 00:46:06,640
परमाणु के मेल से परमाणुओं के मेल से परमाणुओं का वो जो मेल की विधि

677
00:46:06,640 --> 00:46:10,800
है वो आज रक्त बन रहा है क्या उस विधि से? नहीं तो

678
00:46:10,800 --> 00:46:14,800
हम देखिए बात ये है कि हम उस चीज को अगर नहीं कर पा रहे तो इसका मतलब ये नहीं कि नहीं वो

679
00:46:14,800 --> 00:46:18,800
इंपॉसिबल है। पॉइंट क्या है? इसमें दो वो प्रक्रिया आज

680
00:46:18,800 --> 00:46:22,800
हम क्या बोल रहे हैं मैं क्या मैं क्या बोल

681
00:46:22,800 --> 00:46:26,800
मैं बोल रहा हूं कि आप ये देखिए अगर कोई इंसान कोई काम कर पा रहा है तो संभव

682
00:46:26,800 --> 00:46:30,800
नहीं कर पा रहा तो संभव है बात ये आ रही है इसका मतलब ये है कि आज अगर हम रक्त

683
00:46:30,800 --> 00:46:34,800
नहीं बना पा रहे पूरा तो बोलने दीजिए मैं समझ गया तुम्हारी बात नहीं मैं नहीं समझे पूरा

684
00:46:34,800 --> 00:46:38,880
बोलने दीजिए पहले बात ये है कि अब जैसे आप ये बोल रहे हो कि कोई

685
00:46:38,880 --> 00:46:42,960
इंसान कर दे रहा है तो पॉसिबल है नहीं कर पा रहा इमॉसिबल है मैं बोल रहा हूं कि अगर कोई

686
00:46:42,960 --> 00:46:47,040
चीज नेचर में हो रही है ठीक है तो वो चीज हमें पॉसिबल ही दिख रही अब जैसे

687
00:46:47,040 --> 00:46:51,280
इंसान थोड़ी हमारी ऐज कितनी है? क्या हम उस चीज को नाप थोड़ी रहे हैं? जितना जीना

688
00:46:51,280 --> 00:46:55,280
इंसान जी जाके मर जाता है। तो पॉइंट वही है कि ये चीज नेचुरल है। तो नेचर में जो चीज

689
00:46:55,280 --> 00:46:56,800
पॉसिबल है, इंपॉसिबल है हम उस चीज

690
00:46:56,800 --> 00:47:01,120
को पॉसिबल इमॉसिबल कहते हैं। और वो चीज मैं मानू कि गॉड के द्वारा हो रहा है। नेचर में जो कुछ भी पॉसिबल

691
00:47:01,120 --> 00:47:05,200
इमॉसिबल हो रहा है। अब इंसान इतना दो युग तक जी चीज नेचर में पॉसिबल ही नहीं

692
00:47:05,200 --> 00:47:09,280
दिख रही है। फिर आप इसको कैसे क्लेम कर दे रहे हो? अरे भैया नेचर में तो यही

693
00:47:09,280 --> 00:47:13,680
पॉसिबल नहीं दिख रहा है कि सच्चिदानंद है कोई। नेचर तो बिल्कुल

694
00:47:13,680 --> 00:47:17,760
आपको विपरीत वो दे रही ना इंफॉर्मेशन क्या दे रही है आप

695
00:47:17,760 --> 00:47:22,400
उसके विपरीत जाकर के अपने मोक्ष की कामना कर रहे हो ना कैसा

696
00:47:22,400 --> 00:47:26,800
संसार तो दुखप्रद है मूर्खता प्रद है उसके विपरीत जाकर के आप सच्चिदानंद

697
00:47:26,800 --> 00:47:30,240
को मान तो रहे हो

698
00:47:30,240 --> 00:47:34,480
नेचर दूसरी बात मैं एक ये कह रहा हूं जैसे आपने कहा

699
00:47:34,480 --> 00:47:38,720
मैं मैं करता हूं मैं ये पहले रक्त पे आता हूं आज के टाइम

700
00:47:38,720 --> 00:47:42,800
में हम लोग नहीं जान पा रहे हैं कि रक्त जो किस

701
00:47:42,800 --> 00:47:47,360
विधि से रक्त बनाया जाए जबकि पंच तत्वों से ईश्वर ने रक्त बनाया। ठीक है?

702
00:47:47,360 --> 00:47:51,520
आज के टाइम में हम नहीं जान पा रहे कि क्या कहते हैं किस विधि से रक्त बनाया

703
00:47:51,520 --> 00:47:55,520
जाए। तो इससे ये सिद्ध नहीं क्योंकि हम अभी नहीं जानते तो इसका मतलब

704
00:47:55,520 --> 00:47:59,600
ये नहीं कि वो पॉसिबल नहीं है। तो इस प्रकार से अभी हम उस व्यक्ति को नहीं जानते

705
00:47:59,600 --> 00:48:03,680
हो जो क्या कहते हैं हजारों करोड़ों युगों युगों वर्ष जी रहा हो। इसमें

706
00:48:03,680 --> 00:48:07,920
और इसमें अंतर ये है कि हमें प्रत्यक्ष प्रमाण मिल रहा है ना इस चीज का कि रस से रक्त

707
00:48:07,920 --> 00:48:12,080
बन रहा है। प्रत्यक्ष मिल रहा है। अब हमें प्रत्यक्ष अगर देखिए रक्त से रक्त रक्त

708
00:48:12,080 --> 00:48:16,160
से रक्त बनने का मिल रहा है ना बिल्कुल जहां पे कुछ है ही नहीं सब अलग अलग

709
00:48:16,160 --> 00:48:20,160
पड़ा हुआ है। रस से रक्त का भी मिल रहा है। जैसे मैं बताता हूं ना जैसे मैंने

710
00:48:20,160 --> 00:48:24,800
भोजन खाया तो भोजन जो मैंने किया उसी से ही हमारा हीमोग्लोबिन वगैरह बन रहा है ना।

711
00:48:24,800 --> 00:48:28,800
भाई भोजन से जो उसमें जो उसमें जो विधि है

712
00:48:28,800 --> 00:48:32,800
वो मिसिंग है। विधि है वो मिसिंग है। इतना हमें

713
00:48:32,800 --> 00:48:36,800
पता है इतना हमें पता है ना कि ये कारण है ये इसका कार्य है इतना हमें पता है हमें पता

714
00:48:36,800 --> 00:48:40,880
है कि कारण क्या है कारण है भोजन कार्य क्या है रक्त है ना इतना और हमें

715
00:48:40,880 --> 00:48:45,360
पता है कि हमें प्रत्यक्ष दिख रहा है कि चीज हो रहा है बॉडी के अंदर स्थिति बन रही है मगर जो विधि

716
00:48:45,360 --> 00:48:49,440
पूरा सुनिए पूरा सुनिए पूरी सुनिए पूरी सुनिए अब बात ये है अब वो बात अलग है कि वो हमें टेक्निक पता हो

717
00:48:49,440 --> 00:48:53,440
कि ना पता हो एक अलग विषय है लेकिन हमें प्रत्यक्ष चीज क्या हमें प्रत्यक्ष कोई ऐसे हजारों करोड़ साल वाला

718
00:48:53,440 --> 00:48:57,520
व्यक्ति ऐसा दिख रहा है नहीं दिख रहा तो जब हमें नहीं दिख रहा तो इस चीज को हम क्यों माने उड़ने वाला बुरा

719
00:48:57,520 --> 00:49:01,600
नहीं मान चलो चलो चलो ठीक है नहीं माने चलो हमें कोई ऐसा ऋषि दिख रहा है

720
00:49:01,600 --> 00:49:05,760
जिसमें इसमें अंतःकरण में वेद मंत्र प्रकाशित हो रहे हैं। नहीं नहीं नहीं दिख रहा। तो

721
00:49:05,760 --> 00:49:09,840
फिर हम क्यों मान ले? अनुमान से मान रहे है ना तो अनुमान से ही वो मान रहे हैं।

722
00:49:09,840 --> 00:49:14,000
नहीं कैसे वही तो कह रहा हूं सिद्ध कर लीजिए ना हमारे पास हमारे पास वेद

723
00:49:14,000 --> 00:49:16,880
मंत्र कैसे आए? वही बात है। और वहां पे वहां पे

724
00:49:16,880 --> 00:49:20,880
अनुमान नहीं है। वहां पे शब्द प्रमाण है। वहां सुनो तो सुनो सुनो

725
00:49:20,880 --> 00:49:24,320
सुनो। वहां पे अनुमान नहीं है। वहां शब्द प्रमाण है। अनुमान

726
00:49:24,320 --> 00:49:28,400
क्या है वहां पे? बताओ। मैं बता रहा हूं मैं बता देता हूं। अब जो आपने बोला आपने जो बोला ऋषि

727
00:49:28,400 --> 00:49:32,560
वाली बात ठीक है जैसे जैसे ये अनुमान से हो गया वैसे अनुमान से हो गया उसमें बात ये है

728
00:49:32,560 --> 00:49:36,560
अभी हमें प्रत्यक्ष दिख रहा है ना कि बिना सिखाए नहीं कोई सीख सकता मैं कह रहा हूं अभी नहीं पूरा

729
00:49:36,560 --> 00:49:40,560
सुनिएगा पूरा सुनिएगा अभी जैसे हमें अभी हमें प्रत्यक्ष देखिए बात वही है ना कि

730
00:49:40,560 --> 00:49:44,640
प्रत्यक्ष अनुमान में से कुछ ना कुछ होना चाहिए तब वो शब्द मान्य हो जाएगा अब वेरिफिकेशन के लिए शब्द

731
00:49:44,640 --> 00:49:48,720
का अब बात ये आ जाती है कि अगर हमें प्रत्यक्ष यहां पे पता चल रहा है कि नहीं अगर बच्चे को ना सिखाया

732
00:49:48,720 --> 00:49:52,720
जाए तो बोलना भी ना सीखे आसपास गूंगरे बिठा दो चिड़िया भी ना हो घर के अंदर बच्चा

733
00:49:52,720 --> 00:49:56,720
बड़ा हो जाएगा गूंगा गूंगा रह जाएगा ठीक है तो पूछने में पॉइंट ये आ जाता

734
00:49:56,720 --> 00:50:00,800
कि उसी यानी अब बिना सीखा नहीं तो वही बात आधी सृष्टि में बिना सिखाए नहीं

735
00:50:00,800 --> 00:50:04,800
सीखा तो ये चीज अनुमान से आ रही है लेकिन वही यानी हमें प्रत्यक्ष कुछ ना

736
00:50:04,800 --> 00:50:08,800
कुछ मिला तो हमने उस बेस पे अनुमान लगा लिया है ना अरे भाई तो आज भी तो दिखना

737
00:50:08,800 --> 00:50:12,880
चाहिए ना जो बिना किसी की मदद के सीख जाए आप ही तो कह रहे हो बिना किसी की मदद के वहां

738
00:50:12,880 --> 00:50:17,440
पे ईश्वर की मदद से सीखे तो आज ईश्वर की मदद से क्यों नहीं सीख रहा कोई

739
00:50:17,440 --> 00:50:21,440
नहीं नहीं मैं क्या कह रहा हूं आप क्या कह रहे हो हां हां बताइए आप क्लेम

740
00:50:21,440 --> 00:50:25,440
हमें ये थोड़ी सीखना है कि क्लेम हमें क्या करना है अब हमें प्रूव ये नहीं करना है कि आज ईश्वर सिखा रहा

741
00:50:25,440 --> 00:50:29,440
नहीं सिखा रहा प्रूव हमें ये करना है कि आधी सिस्टम उसे सिखाई। ये प्रूफ करना है ना प्रति क्यों भूल जा रहे हो

742
00:50:29,440 --> 00:50:33,440
आप? चलो प्रूफ करो। प्रूफ करो। वही मैं बोल रहा हूं ना कि ये मैं ऑलरेडी सारी

743
00:50:33,440 --> 00:50:37,440
बात बोल चुका हूं। बस रिपीट करने वाली बात है कि जब हमें ये प्रूफ करना है कि आधी सृष्टि

744
00:50:37,440 --> 00:50:39,360
में ऋषियों को ज्ञान मिला तो ये तो भगवान से हो रहा

745
00:50:39,360 --> 00:50:43,360
है ना कि बिना सिखाए आज हमें दिख रहा कि बिना सिखाए कोई नहीं सीखता। तो

746
00:50:43,360 --> 00:50:47,360
यानी मैं पूरा बोल देता हूं। मैं पूरा बोल देता हूं कि आधी सृष्टि में अगर कोई बिना सिखाए

747
00:50:47,360 --> 00:50:51,600
नहीं सीख रहा मतलब अभी वर्तमान में नहीं सीख रहा। तो इससे हम अनुमान करते हैं अनुमान

748
00:50:51,600 --> 00:50:55,600
प्रमाण से कि हां पूर्व में भी ये काम नहीं हो सकती। आज नहीं हो सकता। पहले भी नहीं हो सकता। लेकिन पहले नहीं हो सकता

749
00:50:55,600 --> 00:50:59,680
आज भी नहीं हो पाएगा। तो अब इसमें पॉइंट क्या जा रहा है? पॉइंट जा रहा है। उसी प्रकार से आपने बोला

750
00:50:59,680 --> 00:51:03,760
कि उसी प्रकार से वो भी हनुमान मान लो। है ना? दो युगों में जीने वाला। मैं

751
00:51:03,760 --> 00:51:07,920
वही बात बोल रहा हूं कि अगर इसको मानने के लिए भी हमें तो कुछ ना कुछ प्रत्यक्ष भेष चाहिए। प्रत्यक्ष

752
00:51:07,920 --> 00:51:11,920
भेष क्या दे रहे हैं? ये 17 साल में आदमी जीने वाला ही प्रत्यक्ष है। ठीक है। ठीक है। अब मैं बताता

753
00:51:11,920 --> 00:51:16,240
हूं। पहली बात ये है कि जो वेद

754
00:51:16,240 --> 00:51:20,720
का ज्ञान है वो हम केवल इस संबंध में नहीं मानते हैं कि हमारा जो

755
00:51:20,720 --> 00:51:24,720
जो भौतिक जीवन है वो कैसे जिया जाए। इस संबंध में वेद का ज्ञान

756
00:51:24,720 --> 00:51:28,880
है वो इस संबंध में है मूल रूप से कि वो वहां पे हमारा ब्रह्म सध

757
00:51:28,880 --> 00:51:32,880
जाए। मोक्ष सध जाए। ठीक है? वो अलग विषय है। फिलहाल ज्ञान मिलने की बात सुनो तो

758
00:51:32,880 --> 00:51:37,120
सुनो मेरी बात। ज्ञान मिलने की बात ये है कि अ क्या कहते

759
00:51:37,120 --> 00:51:41,360
हैं ये अह क्या कहते हैं ये?

760
00:51:41,360 --> 00:51:45,360
पहले ज्ञान मिलना मान लेंगे। बाद में चीजें डिस्कस होती रहती। तुम बीच में टोकते हो फिर मैं भूल

761
00:51:45,360 --> 00:51:49,840
जाता हूं। सुनो जो

762
00:51:49,840 --> 00:51:54,000
ये जो क्या कहते हैं वेद के वेद से ज्ञान मिलने का है इसमें भूल

763
00:51:54,000 --> 00:51:54,500
गए भूल

764
00:51:54,400 --> 00:51:58,080
गए इसमें हमने इसमें हमने ये निश्चित नहीं किया इसमें

765
00:51:58,080 --> 00:52:02,080
हमने ये निश्चित नहीं किया है ये सिद्ध नहीं हुआ है कि वो जो ज्ञान मिला है वो मोक्ष

766
00:52:02,080 --> 00:52:05,920
का ही है जबकि वहां पर वो मोक्ष का कहा जा रहा है कल्याण का हेतु कहा जा रहा

767
00:52:05,920 --> 00:52:10,000
है दूसरी बात ये है कि जो बेसिक चीजें हैं

768
00:52:10,000 --> 00:52:14,080
वो एक जानवर भी सीख लेता है बिना किसी के सिखाए ठीक है

769
00:52:14,080 --> 00:52:18,320
चौथी तीसरी बात ये है कि जो वहां वहां पे जो ईश्वर ने दिया

770
00:52:18,320 --> 00:52:22,400
ज्ञान है ना तो वो आज क्यों नहीं दे

771
00:52:22,400 --> 00:52:26,480
रहा है किसी ऋषि के उसमें प्रत्यक्ष प्रमाण क्यों नहीं है ठीक है

772
00:52:26,480 --> 00:52:30,560
अब हिंदी में बताता हूं आपने बोला कि आज कुछ जो ज्ञान है वो बेसिक ज्ञान तो जानवर सीख

773
00:52:30,560 --> 00:52:35,520
लेता है ठीक है यही तो मूल अंतर जानवर और इसमें मनुष्य में

774
00:52:35,520 --> 00:52:39,760
यही अब क्यों अब देखिए अगर यही अगर मनुष्य भी बिना सिखाए बहुत सारी चीजें सीख

775
00:52:39,760 --> 00:52:43,840
लेता है ना तो ये चीज अनुमान प्रमाण से प्रूफ नहीं हो पाती कि अधिष्ठ ने ज्ञान दिया हम आराम

776
00:52:43,840 --> 00:52:47,840
से क्लेम रख देते भैया जैसे जानवर सीख रहा है वैसे इंसान ने भी सीख लिया होगा। ईश्वर की जरूरत ही क्या है?

777
00:52:47,840 --> 00:52:51,920
हम तो हम इस चीज को प्रूफ ही नहीं कर पाते। लेकिन क्योंकि इंसान जानवरों की तरह चीजें

778
00:52:51,920 --> 00:52:56,000
नहीं सीख पाता। ठीक है? उसको चाहिए होता है कोई ना कोई। इसीलिए इसी कारण से

779
00:52:56,000 --> 00:53:00,160
जो है हम जो है इस चीज को प्रूफ कर पाते हैं। है ना? ये वाली बात आ गई। अच्छा

780
00:53:00,160 --> 00:53:04,160
अब एक पॉइंट आपने क्या बोला था? कि वो मोक्ष वाला जो ज्ञान है वो वो वाली बात है।

781
00:53:04,160 --> 00:53:08,800
ठीक है फिलहाल वो एक अलग विषय है। फिलहाल हमें ये देखना है कि कौन सी चीज संभव है? कौन सी चीज असंभव है।

782
00:53:08,800 --> 00:53:12,800
मोक्ष मोक्ष वहां से सिद्ध कहां हुआ? नहीं नहीं अभी मोक्ष सिद्ध करना ना

783
00:53:12,800 --> 00:53:16,880
सिद्ध करना वो विषय नहीं अभी क्या ही चमत्कार वाली बात चल रही है नहीं नहीं इसलिए

784
00:53:16,880 --> 00:53:20,960
है कि हनुमान प्रमाण से मान रहे हैं ना और भगवान ने जो भी

785
00:53:20,960 --> 00:53:25,760
कहा है वो उसका जो अंतगत जो कारण है वो है मोक्ष

786
00:53:25,760 --> 00:53:29,840
वेद का जो तात्पर्य वो तो मोक्ष ही है ना तुम्हारा कल्याण हो जाए तो मोक्ष

787
00:53:29,840 --> 00:53:34,080
को तो हमने वो नहीं कर लिया तो फिर होने को

788
00:53:34,080 --> 00:53:38,160
प्रूफ हो जाएगा थोड़ा लंबा प्रोसीजर पड़ेगा लेकिन सुनो और सबसे

789
00:53:38,160 --> 00:53:42,240
तीसरा वाला जो पॉइंट है ना कि ईश्वर जब वहां दे रहे हैं तो आज नहीं

790
00:53:42,240 --> 00:53:46,400
दे रहे हैं। प्रत्यक्ष प्रमाण हमारे सामने नहीं है तो हम कैसे मान ले वहां दिया? बात

791
00:53:46,400 --> 00:53:50,560
यह है ना बात वही तो मैंने बोला ना कि इसीलिए मैं कह रहा था थोड़ा पंचाय वगैरह उसमें

792
00:53:50,560 --> 00:53:56,240
दोबारा से आप जाके थोड़ा सा रिककैप करते हैं तो आपको हेल्प होता है समझने में। वही बात है कि

793
00:53:56,240 --> 00:54:00,880
यही बात है। इसीलिए मैंने बोला थोड़ा न्याय जरूरी होता है। अब इसमें पॉइंट क्या आ रहा है यहां पे थोड़ा मतलब मैं

794
00:54:00,880 --> 00:54:05,040
कोशिश करूंगा आप थोड़ा सा मतलब वो सपोर्टिंग नहीं रहिएगा मेरे। अब इसमें ये है

795
00:54:05,040 --> 00:54:09,120
कि हमें क्या प्रूफ करना है? हमारा ऐ क्या है? हमें यह हमारा ऐ

796
00:54:09,120 --> 00:54:13,200
बोला कि आधी सृष्टि में चार ऋषियों का ज्ञान मिला क्या प्रमाण? ठीक है? तो चार छोड़े 10 को

797
00:54:13,200 --> 00:54:17,200
मिला। प्रमाण क्या है? ठीक है? प्रमाण इसमें ये मैंने बोला ना कि अनुमान प्रमाण

798
00:54:17,200 --> 00:54:21,200
ये है कि आज बिना सिखाए नहीं सीखता। उसी प्रकार आधी सृष्टि में बिना सिखाए नहीं सीख सकता।

799
00:54:21,200 --> 00:54:25,200
तो आदि सृष्टि में जो पहला मनुष्य है। ठीक है? और बाकी जानवर उससे जो है

800
00:54:25,200 --> 00:54:29,200
उच्चतम है नहीं। है ना? यानी और वही बात है कि सारे उसी समय हो गए हैं तो बाकियों को क्या ज्ञान?

801
00:54:29,200 --> 00:54:33,520
तो जब मनुष्य को सिखाने वाला कोई ना कोई होना चाहिए। ठीक है? तो जिसको जो

802
00:54:33,520 --> 00:54:36,160
जिसने मनुष्य को सिखाया हम उसी को मान रहे ईश्वर है।

803
00:54:36,160 --> 00:54:40,160
तो अनुमान प्रमाण से ऐसी चीज प्रूफ हो रहा है। ठीक है तो यहां पे बात यह है कि वहां पे ये था

804
00:54:40,160 --> 00:54:44,160
संभव और असंभव वाला है ना तो जैसा आपने बोला कि आदि सृष्टि में ज्ञान

805
00:54:44,160 --> 00:54:48,400
ठीक है। अब अनुमान प्रमाण से मैं एक चीज सिद्ध कर देता हूं। ठीक है? जी की कोई

806
00:54:48,400 --> 00:54:53,120
व्यक्ति बिना कुछ कहे ठीक है और बिना कुछ उसके

807
00:54:53,120 --> 00:54:57,200
सीधे उसके अंतःकरण में कोई बात डाल सकता है। क्या इसका प्रत्यक्ष प्रमाण

808
00:54:57,200 --> 00:55:01,200
आज है? मैं बस पूछ रहा हूं। ये सिद्ध

809
00:55:01,200 --> 00:55:05,360
क्या कर रहे हैं मतलब मैं बताऊंगा ना मैं बता रहा हूं ना आप एक बार क्लियर

810
00:55:05,360 --> 00:55:09,360
तो करो की है इसका प्रत्यक्ष प्रमाण क्या बोलिए दोबारा बोलिए कोई

811
00:55:09,360 --> 00:55:13,360
व्यक्ति बिना किसी अपनी इंद्रियों का उपयोग किए कोई किसी को ज्ञान दे

812
00:55:13,360 --> 00:55:17,600
सकता है नहीं दे सकता ठीक है इसका मतलब ईश्वर ने वहां पर

813
00:55:17,600 --> 00:55:21,600
बिना कोई इंद्रिय वो इंद्रियों वो इंद्रियों का यूज किए है

814
00:55:21,600 --> 00:55:25,680
ना क्योंकि उसके पास तो इंद्रिय है ही नहीं है ना तो उसने

815
00:55:25,680 --> 00:55:29,680
उसने बिना इंद्रियों का यूज किए किसी को ज्ञान दिया ठीक

816
00:55:29,680 --> 00:55:33,840
ठीक है? इसका, इसका मतलब हमें यहां ये मानना पड़ेगा, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण

817
00:55:33,840 --> 00:55:38,000
आज तो नहीं है। हम इसका मतलब हमें यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर ने कुछ

818
00:55:38,000 --> 00:55:42,080
ऐसा किया जो असंभव है। जैसे मतलब पॉइंट और

819
00:55:42,080 --> 00:55:46,240
क्लियर करके बताइए इसको। बिना कहना क्या चाह रहे हैं? असंभव बात की ना

820
00:55:46,240 --> 00:55:50,240
उसने बिना इंद्रियों के वो अपना ज्ञान दे के। अच्छा मतलब

821
00:55:50,240 --> 00:55:51,280
आप वो वाला विषय कह

822
00:55:51,280 --> 00:55:55,360
रहे हो जो मतलब कि ईश्वर ने जो है वेद ज्ञान दिया कैसे? मुंह से बोल के कि

823
00:55:55,360 --> 00:55:59,600
कैसे दिया? वो तो वो तो अंतःकरण में उसने प्रकाशित किया। मैं जानता हूं।

824
00:55:59,600 --> 00:56:03,760
मगर मैं ये कह रहा हूं कि तो उसने कुछ ऐसा किया ना जो असंभव

825
00:56:03,760 --> 00:56:07,920
है। नहीं असंभव नहीं है। असंभव है। बताता हूं कैसे मिलेगा?

826
00:56:07,920 --> 00:56:12,080
मिलेगा। बताओ बताओ।

827
00:56:12,080 --> 00:56:16,320
रुकिए बताओ बताओ। ये बताइए जो जीव

828
00:56:16,320 --> 00:56:20,400
है वो अपने मन में विचार कर पाता है। हां। क्यों कर

829
00:56:20,400 --> 00:56:24,640
पाता है? क्योंकि वो जीव है। चेतन

830
00:56:24,640 --> 00:56:29,600
चेतन तो है। ठीक है। इसके अलावा लेकिन वो अपने मन में वो कर पा रहा है। दूसरे के मन में क्यों नहीं कर पा रहा?

831
00:56:29,600 --> 00:56:33,600
क्योंकि वो बाध्य है। सर्वज्ञ नहीं है। व्यापक नहीं

832
00:56:33,600 --> 00:56:37,920
है। नहीं सर्व्यापक नहीं है। ये आपने करेक्ट पॉइंट बोला। उसको सर्वज

833
00:56:37,920 --> 00:56:42,000
वाला पॉइंट नहीं है। मेरे पास ए बी सी डी का तो कम से कम ज्ञान है। मैं दूसरे के मन में ये वाला भी क्यों नहीं दे पा रहा बिना

834
00:56:42,000 --> 00:56:46,080
कुछ बोले डायरेक्ट। कारण ये है कि मैं सर्व्यापक नहीं हूं। मैं केवल अपनी बॉडी तक ही सीमित

835
00:56:46,080 --> 00:56:50,240
हूं। है ना? ठीक है। लेकिन ईश्वर सर्व्यापक है। अब पॉइंट

836
00:56:50,240 --> 00:56:54,560
ये आ रहा है कि भाई फिर फिर ये बात आ जाएगी ना कि चेतन कोई ऐसा दिखाओ

837
00:56:54,560 --> 00:56:58,560
जो सर्व्यापक हो प्रत्यक्ष प्रमाण। बिल्कुल इसका भी मैं मैं तो इसीलिए मैंने बोला ना

838
00:56:58,560 --> 00:57:02,560
कि ये वाला थोड़ा लंबा जाएगा उसको मैं भी सिद्ध कर दूंगा। मेरे सामने मेरे सामने आप नास्तिक बन

839
00:57:02,560 --> 00:57:06,320
के आइए। मैं पूरा ए टू जेड सब सिद्ध करूंगा। खैर मैं इसी विषय पे रहता हूं फिलहाल। अब पॉइंट ये

840
00:57:06,320 --> 00:57:10,400
है कि अब जैसे भाई कि अब जैसे अगर मैं ठीक है? मेरे

841
00:57:10,400 --> 00:57:14,480
पास मेरा मन है। मेरे पास दूसरे का मन नहीं है। है ना? इसलिए मैं उसके मन में विचार नहीं रख सकता। तो

842
00:57:14,480 --> 00:57:18,640
जिस प्रकार मैं अपने मन में शब्द कर सकता हूं उसी प्रकार ईश्वर सर्व्यापक होते हुए

843
00:57:18,640 --> 00:57:22,720
भी सबके मन में है और ईश्वर भी जिसको लगता है जिसको चाहे उसके मन में शब्द कर सकता

844
00:57:22,720 --> 00:57:27,120
है। ठीक है? तो इसीलिए अब क्योंकि ईश्वर अंतर्यामी और सर्वज

845
00:57:27,120 --> 00:57:31,120
सर्व्यापक है। इसीलिए ईश्वर ने ऋषियों के मन में वेद को शब्द

846
00:57:31,120 --> 00:57:35,200
रूप ये शब्द रूप में देने के लिए जैसे मुझे अपने शब्द रूप में देने

847
00:57:35,200 --> 00:57:39,360
के लिए बीच में हाथ पांव मुंह नहीं चाहिए। बिना मुंह के मैं मन में शब्द कर सकता हूं। वैसे ईश्वर बिना मुंह

848
00:57:39,360 --> 00:57:43,360
के अपने हमारे मन में शब्द कर सकता है। मैं ये मना नहीं कर रहा। मैं ये मना नहीं

849
00:57:43,360 --> 00:57:47,520
कर रहा। मैं यह मना नहीं कर रहा, मैं यह कह रहा हूं कि इसका प्रत्यक्ष प्रमाण

850
00:57:47,520 --> 00:57:51,920
क्या है आज की तारीख में कि कोई सर्व्यापक चेतन है। प्रत्यक्ष प्रमाण

851
00:57:51,920 --> 00:57:56,000
हा अब इसका ये आ जाता है। है ना? या तो प्रत्यक्ष से सिद्ध तो अनुमान से सिद्ध दोनों चीजें रहती है

852
00:57:56,000 --> 00:58:00,000
ना? हां। अब है कि क्या कोई ऐसी वस्तु है संसार में

853
00:58:00,000 --> 00:58:04,000
जो सर्व्यापक है। चेतन। ठीक है। हां। सर्वव्यापक। चेतन

854
00:58:04,000 --> 00:58:08,240
तुमने पहले तो जब तुम अनुमान से मानोगे तो उसको फिर तुम उसकी शक्ति

855
00:58:08,240 --> 00:58:12,560
मानोगे ना, सामर्थ्य मानोगे ना। असंभव कार्य करने वाला मानोगे।

856
00:58:12,560 --> 00:58:16,560
तो हम उसी असंभव जैसे हम उसकी उसकी शक्ति का ही एक असंभव

857
00:58:16,560 --> 00:58:20,640
कार्य करने वाला और मान लेंगे कि भैया वो किसी जैसे हम जो हम जो कार्य हम जो

858
00:58:20,640 --> 00:58:21,360
कार्य करवा रहे हैं

859
00:58:21,360 --> 00:58:25,440
उससे वो जब कार्य होना सिद्ध हो रहा है तो असंभव कार्य कहां रह गया फिर वो भूल कर रहे हो ना आप यहां

860
00:58:25,440 --> 00:58:29,440
पे जब कार्य मैं दिखावा दे रहा हूं कि कार्य कर ले रहा हूं तो असंभव कार्य रह गया फिर जो कार्य

861
00:58:29,440 --> 00:58:33,440
कर दिया तो फिर असंभव कार्य हो गया ना फिर तो वो ये असंभव कैसे हो गया आप आप ईश्वर के

862
00:58:33,440 --> 00:58:37,440
द्वारा करवाना दिखा रहे हो ना मुझे आप भी नहीं तो ईश्वर के कान्टेक्स्ट में ही तो कह रहा हूं मैं नहीं तो

863
00:58:37,440 --> 00:58:41,440
आप जब मुझसे प्रत्यक्ष प्रमाण मांग रहे हो तो किसी इंसान इंसान को पूछ रहे हो ना की आज वो

864
00:58:41,440 --> 00:58:45,680
इंसान दिखाओ तो प्रत्यक्ष आपने तो इतना लंबा जो उसको जलाया है ईश्वर के सामर्थ से ही जलाया

865
00:58:45,680 --> 00:58:49,680
ना तो बस ईश्वर का सामर्थ जब आप मान रहे हो तो मैं क्यों नहीं मान सकता नहीं नहीं तो

866
00:58:49,680 --> 00:58:54,080
वो प्रूफ करना मैं तो आप मेरे से एक एक ईश्वर का जो जो सामर्थ आप कह रहे हो मैं प्रूफ कर रहा हूं ना आपसे

867
00:58:54,080 --> 00:58:58,080
भगवान से कर रहा हूं ना ईश्वर पे ले जा रहे हो ना आप ईश्वर पे ले

868
00:58:58,080 --> 00:59:02,400
जा रहे हो बात ही ईश्वर पे छेड़ रही है अब तो देखो जब जब मैं किसी कार्य को असंभव

869
00:59:02,400 --> 00:59:06,560
कहता हूं तो आप उसको कहते हो ईश्वर ने कर दिया संभव है जब आप कैसे

870
00:59:06,560 --> 00:59:10,720
कर दिया कहां कर दिया जब तक ईश्वर मन

871
00:59:10,720 --> 00:59:14,720
वाला प्रमाण मन से प्रत्यक्ष प्रमाण थोड़ी

872
00:59:14,720 --> 00:59:18,720
ना है उसका अरे प्रत्यक्ष अरे यार अनुमान से आपने

873
00:59:18,720 --> 00:59:22,960
अनुमान से आपने ईश्वर की एक शक्ति मानी ना मैं आपको बताता

874
00:59:22,960 --> 00:59:27,200
हूं देखिए अच्छा मुझे अनुमान की फिर भैया फिर आप बोलेंगे

875
00:59:27,200 --> 00:59:31,280
कि ऐसा चलिए छोड़िए जैसे हम किसी चीज का अनुमान करते हैं ना अनुमान प्रमाण से देते

876
00:59:31,280 --> 00:59:35,360
हैं ठीक है अनुमान प्रमाण के लिए हमें कुछ ना कुछ प्रत्यक्ष चाहिए होता है ना अब प्रत्यक्ष

877
00:59:35,360 --> 00:59:36,480
हमारे पास ये है कि हम

878
00:59:36,480 --> 00:59:40,560
जो है मेरे पास मेरा मन है और अपने मन में मैं शब्द कर सकता हूं ये प्रत्यक्ष

879
00:59:40,560 --> 00:59:44,640
हुआ कि नहीं हुआ। इस प्रत्यक्ष के आधार पे ही मैंने अनुमान किया कि ईश्वर भी

880
00:59:44,640 --> 00:59:48,800
हमारे मन में है। इसीलिए वो हमारे मन में शब्द कर सकता है। अरे मेरे भाई ईश्वर की

881
00:59:48,800 --> 00:59:52,800
सर्वव्यापकता के लिए प्रत्यक्ष प्रमाण क्या है? हां तो यानी

882
00:59:52,800 --> 00:59:56,880
इसी यानी मन में शब्द कर सकता है। इसको आपने मान लिया ना? ये तो मैं मान ही रहा हूं। बस

883
00:59:56,880 --> 01:00:01,440
अब मैं आपको सर्वव्यापकता के लिए प्रमाण देता हूं। सर्वव्यापकता सिद्ध होगी वैधर्म से?

884
01:00:01,440 --> 01:00:05,680
वैधर्म से कैसे सिद्ध होगी? अभी तो मुझे नास्तिक बना करके दे रहे थे। अब तुम वैधर्म

885
01:00:05,680 --> 01:00:09,680
से दिखाओगे। तो तुम्हें वैध समझा रहा हूं मैं क्या? भाई न्यूट्रल रहकर के बात करो ना। मैं

886
01:00:09,680 --> 01:00:13,680
न्यूट्रल रैंक की तो बात कर रहा हूं। मैं ये थोड़ी बोल रहा हूं मैं अब कोई नास्तिक मेरे सामने अनपढ़ाएगा तो मैं

887
01:00:13,680 --> 01:00:17,840
उसको थोड़ी बोलूंगा भाई तू सीख ले। मैं थोड़ी बहुत पढ़ाऊंगा। वैधर्म

888
01:00:17,840 --> 01:00:21,920
से बताओ चलो वैध अब जैसे मान लीजिए कि अब जब हम साधर्म की बात करे

889
01:00:21,920 --> 01:00:26,080
तो क्योंकि सर्वव्यापक कोई वस्तु का उदाहरण मिलेगा नहीं इसलिए साधर्म हो नहीं सकता। ठीक बात है। अनंत वस्तु

890
01:00:26,080 --> 01:00:30,080
कोई हो नहीं सकती। अनंत वस्तु प्रूव नहीं हो सकती। तो अनंत वस्तु के

891
01:00:30,080 --> 01:00:34,320
लिए हम साधर्म से दे देंगे। जैसे मैंने प्रतिज्ञा की कि प्रतिजिया

892
01:00:34,320 --> 01:00:38,480
ले लिया कि क्या ले लेंगे? कि मान लीजिए कोई वस्तु सर्व्यापक

893
01:00:38,480 --> 01:00:44,240
है। ठीक है? ये हमारी प्रतिज्ञा हो गई। हेतु ले लिया कि

894
01:00:44,240 --> 01:00:48,320
वो क्या होता है? क्षेत्रफल की दृष्टि से आरंभ ना होने से। ठीक है?

895
01:00:48,320 --> 01:00:51,760
ये हो गया हेतु और व्याप्ति ले ली व्याप्ति

896
01:00:51,760 --> 01:00:55,920
क्योंकि हेतु के अंदर ही आता है। व्याप्ति मैं वैधर्म से ले रहा हूं कि जो जो

897
01:00:55,920 --> 01:00:59,920
वस्तु क्षेत्रफल की दृष्टि से जिसजिस वस्तु का आरंभ नहीं होता

898
01:00:59,920 --> 01:01:04,000
है। ठीक है? अह क्षेत्रफल की दृष्टि से आरंभ ना होने से ना

899
01:01:04,000 --> 01:01:09,040
हां तो ये हो जाएगा। ऐसे व्यक्ति बनेगी जिसज वस्तु का क्षेत्रफल की दृष्टि से आरंभ होता है वो वस्तु

900
01:01:09,040 --> 01:01:13,120
ये मतलब अनंत नहीं होती सीमित होती है शांत होती है। ठीक है? उदाहरण

901
01:01:13,120 --> 01:01:17,120
ले लेते हैं कटोरी। कटोरी का एक स्टार्टिंग पॉइंट होता है या मान लीजिए

902
01:01:17,120 --> 01:01:21,280
कोई पेंसिल है। पेंसिल का एक क्षेत्रफल की दृष्टि से स्टार्टिंग पॉइंट ऊपर से ले नीचे तक खत्म हो जाता है।

903
01:01:21,280 --> 01:01:25,280
तो क्षेत्रफल की दृष्टि से ये शांत भी है। ठीक है? तो इसका उपनय बनेगा

904
01:01:25,280 --> 01:01:29,360
कि तो इस प्रकार ईश्वर का कह लीजिए कि ईश्वर को क्षेत्रफल

905
01:01:29,360 --> 01:01:33,360
की दृष्टि से आरंभ नहीं मिलता। इसीलिए क्या कहते हैं? आरंभ ना मिलने के

906
01:01:33,360 --> 01:01:37,360
कारण वो उसका कोई वो शांत भी सिद्ध नहीं होता निबंध बनेगा शांत

907
01:01:37,360 --> 01:01:41,360
ना सिद्ध होने से ईश्वर अनंत हो गया प्रूफ वैधान से तो

908
01:01:41,360 --> 01:01:45,440
प्रूफ कर दूंगा मैं सुनो सुनो सुनो सुनो वैधान से तुम प्रूफ

909
01:01:45,440 --> 01:01:49,680
कर दोगे मगर इसमें ये वाली इस पर थोड़ा प्रकाश डालो

910
01:01:49,680 --> 01:01:53,920
कि क्या कहते हैं ये जैसे तुमने कहा कि

911
01:01:53,920 --> 01:01:57,920
भाई अगर कोई जो व्यक्ति है वो दो लाख

912
01:01:57,920 --> 01:02:02,000
वर्ष जी सकता है ठीक है तो आज मुझे ऐसा कोई व्यक्ति

913
01:02:02,000 --> 01:02:06,000
दिखाओ। ठीक है? कुछ ना कुछ अनुमान से आपको प्रूफ करना पड़ेगा। मतलब

914
01:02:06,000 --> 01:02:07,200
सुनो तो

915
01:02:07,200 --> 01:02:11,920
आप तो यहां पर मैंने अगर कहा कि ईश्वर क्योंकि सर्वसामर्थ्यवान

916
01:02:11,920 --> 01:02:15,920
है। वो जब प्रकृति में चेतन डाल सकता है। एक जो

917
01:02:15,920 --> 01:02:19,920
है इंसान जैसा बना सकता है। प्रकृति पंच भौतिक से बना

918
01:02:19,920 --> 01:02:24,640
हुआ उसमें चेतन डाल दिया उसने। जीव उसमें डाला है। हां उसने डाला है।

919
01:02:24,640 --> 01:02:28,800
जीव डाल दिया उसने। तो हां हां तो अब इसका वो जब

920
01:02:28,800 --> 01:02:32,800
डाल सकता है तो मैंने कहा कि वह यह भी कर सकता है कि वह चाहे तो किसी को दो लाख वर्ष तक जिला

921
01:02:32,800 --> 01:02:36,800
सकता है। नहीं हेतु मिसमैच हो रहा है ना। सुनो सुनो तो वो मैं अभी देखूंगा

922
01:02:36,800 --> 01:02:40,800
इसमें हेतु वो टेबल लिख लूंगा फिर मैं उसमें हेतु भी फिट कर दूंगा। ठीक है? वो

923
01:02:40,800 --> 01:02:44,960
अभी उस जो तुम्हारा पंचाव के तरीके से उसमें फिट कर दूंगा मैं।

924
01:02:44,960 --> 01:02:49,200
ये बेसिक क्या है? ये हम नॉर्मल यूज़ करते हैं। मैं पंचाव के तरीके

925
01:02:49,200 --> 01:02:53,360
से भी कर दूंगा। अभी मैं जो स्वतंत्र रूप से पूरा

926
01:02:53,360 --> 01:02:57,440
कर लीजिए। तो उसमें क्या है कि अह जब

927
01:02:57,440 --> 01:03:01,440
वो किसी जैसे मिट्टी इत्यादि पंच जो पंचभूत हैं उनको

928
01:03:01,440 --> 01:03:05,600
लेकर के उसमें जा उसमें जो है एक चेतन डाल सकता है वो। ठीक है? तो मैंने

929
01:03:05,600 --> 01:03:10,320
माना कि वो जब इतना कर सकता है तो वो जो है अह क्या कहते हैं

930
01:03:10,320 --> 01:03:14,320
इतना भी कर सकता है कि किसी अगर इंसान को जिलाना चाहे तो वो दो लाख वर्ष तक जिला

931
01:03:14,320 --> 01:03:18,400
सकता है। अब ये ये तो बात अलग हो गई। अब तुम्हारा कहना है कि अगर

932
01:03:18,400 --> 01:03:22,640
उसने ऐसा किया था। ठीक है? किसी को

933
01:03:22,640 --> 01:03:26,800
सुनो तो पूरी बात तो सुनो की अगर वो अगर उसने ऐसा किया था

934
01:03:26,800 --> 01:03:31,360
तो आज भी दिखाओ तो तुम्हारा एक क्लेम है कि ईश्वर जो है अंतःकरण

935
01:03:31,360 --> 01:03:35,360
में जा करके ज्ञान दे सकता है तो मैं तुमसे कह रहा हूं कि अगर उसने ऐसा

936
01:03:35,360 --> 01:03:39,440
किया था तो आज भी ऐसा करके दिखाओ बोला ही नहीं

937
01:03:39,440 --> 01:03:43,440
ना हां क्या बोला मैं आपको बताता हूं इसमें कैसे प्रूफ करना होगा जैसे

938
01:03:43,440 --> 01:03:47,520
जो आपने अपना बात रखा ठीक है आपने यहां पे हेतु क्या ले लिया हेतु आपने ले लिया कि

939
01:03:47,520 --> 01:03:51,600
अगर ईश्वर ठीक है मनुष्य को तुम अभी पंचाल साइड में रख के बात

940
01:03:51,600 --> 01:03:55,680
करो। मैं पंचायत मैं लास्ट में ले लूंगा पंचा

941
01:03:55,680 --> 01:03:59,840
नहीं मैं पंचाय की बात नहीं कर रहा हूं। बेसिक कारण हेतु यानी हेतु हम इतना हमारे लिए नॉर्मलाइज

942
01:03:59,840 --> 01:04:03,840
है। मैं कारण की जगह हेतु ही बोलता हूं। इतना हमारे लिए नॉर्मलाइज है। ठीक है। ठीक है। ठीक है। अब इसमें क्या

943
01:04:03,840 --> 01:04:07,840
होता है कि अब जो मुझे लगा तुम सीधे पंचा। नहीं नहीं ये चीजें हम

944
01:04:07,840 --> 01:04:12,000
इतना ज्यादा घुसे कि हमारे लिए बिल्कुल नॉर्मलाइज है। कुछ ऐसे है नहीं।

945
01:04:12,000 --> 01:04:16,000
तो इसमें क्या है कि अब जैसे आपने पॉइंट यहां पे हेतु क्या यहां पे

946
01:04:16,000 --> 01:04:20,080
रख दिया कि अगर ईश्वर ये ये काम कर सकता है तो यानी अपने सामर्थ्य मान लिया कि उसमें अगर

947
01:04:20,080 --> 01:04:24,240
मनुष्य बनाने का सामर्थ्य है ठीक है तो फिर उसमें उसको ऐसे-ऐसे करोड़ों

948
01:04:24,240 --> 01:04:28,320
वर्ष तक अरबों वर्ष तक उसको जिलाने का भी सामर्थ्य है ठीक है तो बात ये आ रहा है कि

949
01:04:28,320 --> 01:04:32,480
फिर हमें फिर हम इसकी व्याप्ति घटा देंगे ये चीज रियल में ये चीज मतलब इस चीज से ये बात

950
01:04:32,480 --> 01:04:36,560
हो रही है कि नहीं हो रही हां व्याप्ति मैं नॉर्मल लोकल लैंग्वेज में बता

951
01:04:36,560 --> 01:04:37,680
देता हूं ठीक है

952
01:04:37,680 --> 01:04:41,680
जैसे बहुत सिंपल है आप मुझे अगर दो मिनट देंगे तो मैं पूरा क्लियर कर देता हूं मैं मैं सुन सुन रहा

953
01:04:41,680 --> 01:04:45,680
हूं। सुन रहा हूं। हां। अब जैसे मान लीजिए कि मैंने बात एक बात मैंने बात बोला कि जो अग्नि

954
01:04:45,680 --> 01:04:49,680
है वो जलाती है। ठीक है। ये मेरी प्रतिज्ञा हो गई। तो मैंने पूछा भाई कैसे

955
01:04:49,680 --> 01:04:54,080
पता? अरे वो पंचायत में मत बताओ। तुम वो बताओ। वही समझाने

956
01:04:54,080 --> 01:04:58,160
वही समझाने के लिए मेरे को बताना पड़ेगा। मैं एक ही मिनट लूंगा ज्यादा थोड़ी लूंगा। बस एक मिनट बोलो

957
01:04:58,160 --> 01:05:02,240
बोलो। अब जैसे मैंने बोला कि अग्नि है जलाती है। मैंने पूछा कैसे पता? तो हेतु तो उन्होंने बोला

958
01:05:02,240 --> 01:05:06,240
गरम है इसलिए जलाती है। है ना? तो जो गरम बोला ये आ गया हेतु है। यानी कारण बता

959
01:05:06,240 --> 01:05:10,400
दिया क्या? कि जलाती है। फिर अब मेरे को टेस्ट करना पड़ेगा कि यार इसने सही बोला है या झूठ बोला है।

960
01:05:10,400 --> 01:05:14,560
क्योंकि सामने वाला बोल सकता है ना कि पीला रंग है इसलिए जलाती है। ये भी बोल सकता है। तो मैं

961
01:05:14,560 --> 01:05:18,720
चेक करूंगा कि अच्छा ये तो ये ये मेरे पास में पेज है। इसका रंग पीला क्या मैंने इसको छुआ मेरा जला? नहीं जला।

962
01:05:18,720 --> 01:05:22,720
तो ये हेतु गलत है। उसी प्रकार से फिर सामने वाला बोला कि नहीं गरम है इसलिए जलाती

963
01:05:22,720 --> 01:05:26,720
है। तो मैंने चेक किया तो मैंने गर्म पानी में उंगली डाला तो जल गई। है ना? तो

964
01:05:26,720 --> 01:05:31,120
तो यानी ये चेक करना पड़ता है। यानी हम हर जगह चेक करते हैं। व्याप्ति बिठाते हैं कि सार्वभौमिक

965
01:05:31,120 --> 01:05:35,200
रूल ये फिट बैठ रहा है या नहीं बैठ रहा। क्योंकि अभी हम उस चीज का प्रत्यक्ष नहीं कर। अभी मैं देख नहीं रहा ना अपने आपको आंखों

966
01:05:35,200 --> 01:05:39,280
से कोई व्यक्ति इतना लंबा जी रहा है की नहीं जी रहा मुझे नहीं पता मैं ही मर जाऊंगा मैं कहां से देखूंगा तो बात

967
01:05:39,280 --> 01:05:43,280
ये आ जा रही है कि उस चीज को मैं प्रत्यक्ष नहीं कर सकता इसीलिए अनुमान के लिए मैं दूसरी चीजों में चेक

968
01:05:43,280 --> 01:05:47,680
करूंगा कि यार ऐसा पॉसिबल है कि नहीं है ठीक है वो मेरे को करना पड़ेगा

969
01:05:47,680 --> 01:05:51,680
बात ये आ जा रही है बात ये आ जा रही है मतलब मैं समझ गया तुम क्या कहना चाह रहे हो

970
01:05:51,680 --> 01:05:52,880
तुम ये कहना चाह रहे हो कि

971
01:05:52,880 --> 01:05:57,840
अगर ईश्वर अपनी सामर्थ्य से अ जो

972
01:05:57,840 --> 01:06:02,400
किसी को जिला सकता है तो अभी मतलब मेरे सामने वो नहीं है उदाहरण

973
01:06:02,400 --> 01:06:06,480
मगर यदि यदि मैं ये मानूं कि ईश्वर ने

974
01:06:06,480 --> 01:06:10,560
ऋषियों के मन में वो दिया। ठीक है? तो अनुमान प्रमाण

975
01:06:10,560 --> 01:06:14,640
से ऐसा सिद्ध हो रहा है कि ईश्वर अभी भी ऐसा कर सकता है।

976
01:06:14,640 --> 01:06:18,640
ये कह रहे हो ना तुम? हां इससे वो चीज तो सिद्ध हो जाएगी। लेकिन इससे ये सिद्ध नहीं हो पाएगा

977
01:06:18,640 --> 01:06:22,800
कि वो मतलब वो ये भी कर सकते हो कि वो मतलब तुम कहीं पर भी तुम कहीं पर

978
01:06:22,800 --> 01:06:27,040
भी जो है भगवान की अचिंत शक्ति नहीं मानते हो। जब

979
01:06:27,040 --> 01:06:31,120
वही है ना जब क्लियर हो जा रही है शक्ति फिर अचिंत क्या रहेगी। पता चल रहा है तो फिर

980
01:06:31,120 --> 01:06:35,120
अचिंत क्या हो गया? तो निर्गुण से सगुण बताओ कैसे हुआ? निर्गुण से सगुण हुआ

981
01:06:35,120 --> 01:06:39,200
ही नहीं ना वो निर्गुण सगुण एक ही समय में रहता है हमेशा तो तो एक ही समय में एक रस

982
01:06:39,200 --> 01:06:43,200
कैसे हुआ फिर वो मतलब वो कम ज्यादा रहता है कहां कम ज्यादा हुआ आपसे तो करी कम

983
01:06:43,200 --> 01:06:47,200
ज्यादा हुआ कहीं पे फोर्स लग रही है कहीं पे फोर्स नहीं लग

984
01:06:47,200 --> 01:06:51,520
रही है क्या है फोर्स बताइए अरे धक्का और क्या यानी

985
01:06:51,520 --> 01:06:55,520
पुश एंड पुल हम पुश एंड पुल है ना पुश एंड पुश एंड

986
01:06:55,520 --> 01:07:00,400
पुल हो गया फोर्स ये डेफिनेशन हो गई फोर्स की ये तो एक देसी के कांटेक्ट में होता है

987
01:07:00,400 --> 01:07:04,640
तो तुम बताओ ना मुझे कैसे हो रहा है ये ईश्वर क्योंकि सर्वव्यापक अब देखिए बात

988
01:07:04,640 --> 01:07:08,000
जैसे अगर मैं एक 5 किलो का डंबल उठा रहा हूं और एक 10 किलो का डंबल उठा रहा हूं। अंतर

989
01:07:08,000 --> 01:07:12,160
ये 10 किलो वाले में परमाणु ज्यादा है। है ना? मैंने पकड़ा एक ही जगह से हुआ है। ईश्वर

990
01:07:12,160 --> 01:07:16,320
एक-एक परमाणु को धारण किए इसलिए वो हमेशा उसके ऊपर कभी 5 किलो 10 किलो का भार कम

991
01:07:16,320 --> 01:07:20,960
या ज्यादा लगता ही नहीं है। उसने तो एक-ए परमाणु को धारण कर रखा है ना।

992
01:07:20,960 --> 01:07:25,040
अरे भैया कहीं पे वो क्रियावान है। कहीं पे क्रियावान नहीं है। उसमें

993
01:07:25,040 --> 01:07:29,040
अंतर ये आता है। उसमें अंतर ये आता है कि उसमें हम उसका कम ज्यादा क्यों नहीं मानते? कम ज्यादा

994
01:07:29,040 --> 01:07:33,040
इसलिए नहीं मानते क्योंकि हम देखेंगे बल है क्या? बल की परिभाषा है क्या? तो बल की परिभाषा

995
01:07:33,040 --> 01:07:37,440
इतनी ही होती है। सिंपल सा ही होता है कि ईश्वर

996
01:07:37,440 --> 01:07:41,520
ने इच्छा की या मैंने इच्छा की। ठीक है? और इच्छा करने पे जो

997
01:07:41,520 --> 01:07:45,680
फोर्स के इफेक्ट्स होते हैं जो चौथी क्लास में पढ़ते हैं हम। ठीक है? कि क्या होता है कि

998
01:07:45,680 --> 01:07:49,760
कोई चीज मतलब खड़ी है वहीं पे तो वो गति करने लग जाए। गति

999
01:07:49,760 --> 01:07:53,760
कर रही है तो रुक जाए या तो उसकी दिशा मुड़ जाए या तो उसका स्पीड कम या ज्यादा हो जाए या तो उसका

1000
01:07:53,760 --> 01:07:57,840
शेप चेंज हो जाए। ये इफेक्ट्स जहां दिखेंगे तो हम मानते हैं कि फोर सप्लाई हुआ है। यानी बल लगा

1001
01:07:57,840 --> 01:08:02,240
है। ये परिणाम जहां मिलेंगे हम मानते हैं कि यानी अगर ईश्वर या जीव

1002
01:08:02,240 --> 01:08:06,240
ऐसी इच्छा कर रहा है। इच्छा करने के पश्चात अगर ऐसा कुछ परिणाम दिख

1003
01:08:06,240 --> 01:08:10,480
रहा है तो हम मानते हैं कि बल लगाया। अगर ऐसी इच्छा नहीं कर रहा है। ठीक है?

1004
01:08:10,480 --> 01:08:14,560
मैंने मैंने इच्छा की कि मुझे सुख मिले। तो उसमें तो कुछ कोई परिवर्तन कोई यानी

1005
01:08:14,560 --> 01:08:18,560
उसमें बल नहीं लगा। तो अल्टीमेटली उस वाली इच्छा में यानी वही बात है कि बल

1006
01:08:18,560 --> 01:08:22,560
कहते किसे हैं? अब है ना? अगर ईश्वर ने इच्छा की कि परमाणु इधर से उधर हो

1007
01:08:22,560 --> 01:08:23,060
जाए।

1008
01:08:23,040 --> 01:08:23,540
ठीक है?

1009
01:08:23,360 --> 01:08:27,360
तो वो जो इफेक्ट है गति करने वाला या रुकने वाला सेफ चीज

1010
01:08:27,360 --> 01:08:31,440
उस इफेक्ट के कारण उन्होंने बोला कि यहां पे बल है रियल में बल जैसा कुछ नहीं होता बल एक फिनोमना

1011
01:08:31,440 --> 01:08:35,600
मात्र है तो कैसे हुआ अब जो ईश्वर अब जो इच्छा की वो तो संपूर्ण

1012
01:08:35,600 --> 01:08:39,600
ईश्वर ने की एक पर्टिकुलर अमेरिका लंदन की ईश्वर ने की नहीं वो तो संपूर्ण ईश्वर ने की

1013
01:08:39,600 --> 01:08:43,680
इच्छा यानी कि एक रास्ता है यानी चलो ठीक है ठीक है ईश्वर इसका मतलब

1014
01:08:43,680 --> 01:08:48,240
तुम्हारा क्रियावान भी नहीं है इच्छा कर रहा है तो क्रियावान है ना

1015
01:08:48,240 --> 01:08:52,240
इच्छा के अलावा क्रियावान नहीं है तो और क्या करेगा वो इच्छा ही तो करेगा और

1016
01:08:52,240 --> 01:08:56,400
क्या करेगा इसका इसका इसका तुम अपने ग्रंथों से प्रमाण दो। किसका?

1017
01:08:56,400 --> 01:09:00,400
वो वो कोई क्रिया नहीं कर रहा है। केवल इच्छा कर रहा है। इच्छा ही तो उसकी

1018
01:09:00,400 --> 01:09:04,640
क्रिया है। मैं बोल तो रहा हूं। अरे भाई ईश्वर कुछ करता नहीं है केवल

1019
01:09:04,640 --> 01:09:08,960
इच्छा करता है इसका तुम प्रमाण दो मुझे। मैं तो आपको दे दूंगा। मैं आपको दे दूंगा है। दो।

1020
01:09:08,960 --> 01:09:13,040
अभी कैसे दे दूं? अभी मैं उठ के अपना बाकी बेसिक काम करूं क्या आपको मैं बुक खोल के प्रमाण

1021
01:09:13,040 --> 01:09:17,040
दूं? मैं आपको बोल रहा हूं ना दे दूंगा। ठीक है? लेकिन अब मैं स्टूडेंट हूं। मैंने सारे ग्रंथ पढ़ रखे हैं। तो मैं मेरे

1022
01:09:17,040 --> 01:09:21,200
को ब्रीफ करिए ना। इससे इसलिए था मामला इसपे कैसे आता है वो क्रम बता

1023
01:09:21,200 --> 01:09:25,200
दूं। कि पहले हम लोग गए थे कि भाई वो

1024
01:09:25,200 --> 01:09:29,200
वशिष्ठ जी परंपरा अब परंपरा में जब तुमने हम पर क्वेश्चन

1025
01:09:29,200 --> 01:09:33,520
किया तो यहां पर ये बात आई कि भैया देखो मेरे गलत होने से तुम्हारा सही होना सिद्ध नहीं होता

1026
01:09:33,520 --> 01:09:37,920
मगर फिर भी तुम मेरा इतिहास पूछोगे तो मैं बता दूंगा कि वशिष्ट दो लाख वर्ष जिए

1027
01:09:37,920 --> 01:09:42,000
अब तुम उसको नहीं मान पा रहे हो नहीं मानो वो बात एक अलग है फेथ की बात आ गई तो तुमने वहां

1028
01:09:42,000 --> 01:09:46,400
पे कहा कि भाई मैं तो प्रत्यक्ष प्रमाण तो मैंने फिर मैंने फिर काउंटर करता क्या करता

1029
01:09:46,400 --> 01:09:50,720
कहीं पे ऐसी बात तुम मानो जहां पे तुम्हें असाधारण चीज जो चमत्कारिक

1030
01:09:50,720 --> 01:09:55,040
चीज जिसका इसका कोई प्रूफ नहीं बस सामर्थ्य के कारण तुम्हें मानना पड़ेगा। है ना? जिसे हम एक्सप्लेन

1031
01:09:55,040 --> 01:09:59,040
नहीं कर सकते। बस सामर्थ्य के कारण मानना पड़ेगा। उसके कारण हमारे निर्गुण से सगुण

1032
01:09:59,040 --> 01:10:03,040
पे ठीक है। निर्गुण से सगुण की व्याख्या पे है। उसपे व्याख्या में

1033
01:10:03,040 --> 01:10:03,540
हम जो

1034
01:10:03,520 --> 01:10:07,520
ये तुम उसको इच्छा कह रहे हो बल बांधने को तैयार नहीं हो। तो इस पे एक

1035
01:10:07,520 --> 01:10:11,760
बात ये भी तो ये परंपरा वाला अभी कहां तक अटका हुआ है। भाई वशिष्ट

1036
01:10:11,760 --> 01:10:15,920
जी की 2 लाख वर्ष की आयु हो सकती है कि नहीं? वो चमत्कार नहीं मान रहे हो तुम। चमत्कार

1037
01:10:15,920 --> 01:10:20,080
को नहीं मान रहे हो। और मैं वहां पे तुम्हें चमत्कार सिद्ध कर रहा हूं। निर्गुण से सगुण।

1038
01:10:20,080 --> 01:10:24,080
है ना? वो मतलब आप सिद्ध करने का ट्राई करेंगे। चलिए ठीक है एक अलग टाइप यानी चमत्कार

1039
01:10:24,080 --> 01:10:28,160
का ये वाला ठीक है चमत्कार से हट करके मोटा मोटी अगर परंपरा

1040
01:10:28,160 --> 01:10:32,240
पे देखें तो परंपरा में हमें क्या पहले परंपरा में परंपरा

1041
01:10:32,240 --> 01:10:36,720
परंपरा में सबसे जरूरी बात तो ये है ना कि दयानंद जी ने अपना किसी को प्रतिनिधि

1042
01:10:36,720 --> 01:10:40,720
नहीं कहा है इसलिए शिष्य बनाए थे शिष्य बनाए थे मगर उनमें से कौन

1043
01:10:40,720 --> 01:10:45,040
सा शिष्य उनकी बात करेगा प्रामाणिक रूप से नहीं ले सकते इसलिए दयानंद जी के रेफरेंस से दयानंद

1044
01:10:45,040 --> 01:10:50,000
जी की बात को मानना पड़ेगा क्योंकि उनका कोई प्रामाणिक प्रतिनिधि है ही नहीं

1045
01:10:50,000 --> 01:10:54,000
नहीं है ना उनके शिष्य हैं बिल्कुल अरे तो वो वो तो मना करके जा

1046
01:10:54,000 --> 01:10:58,080
रहे हैं ना कि भाई मेरे रेफरेंस से प्रामाणिक रूप से बोलने वाला कोई नहीं जो जो इस पर

1047
01:10:58,080 --> 01:11:02,400
सेट कर लेना उस पर सेट कर लेना वो मतलब फिर वो जजमेंट का विषय है

1048
01:11:02,400 --> 01:11:07,040
घोषित शब्द प्रमाण देके नहीं गए वो अपनी ओर से किसी को

1049
01:11:07,040 --> 01:11:11,040
ये मेरी ओर से बोलने वाला शब्द प्रमाण है। नहीं ऐसे तो ऐसे तो

1050
01:11:11,040 --> 01:11:15,120
कोई भी ये नहीं बोलता कोई भी गुरु नहीं बोलता की मेरी तरफ से सब ये बोलेंगे सीख के चले जाते हां

1051
01:11:15,120 --> 01:11:18,560
नहीं नहीं बोल के जाते है ना ये गुरु परंपरा यही है अच्छा

1052
01:11:18,560 --> 01:11:22,640
मुझे एक बात बताइए मुझे एक बात बताइए कृष्ण जी के गुरु कौन थे कृष्ण जी के

1053
01:11:22,640 --> 01:11:26,640
गुरु थे सादीपन जी उनके गुरु कौन थे होंगे

1054
01:11:26,640 --> 01:11:31,200
कोई क्यों बताओ नहीं है ही नहीं क्यों होंगे ही नहीं पूरी परंपरा

1055
01:11:31,200 --> 01:11:35,680
प्रणाली शास्त्र उठा के देख ले पुराण सब कहीं नहीं मिलेंगे उनके गुरु नहीं मिलेंगे तो उससे क्या होगा

1056
01:11:35,680 --> 01:11:40,320
उससे क्या होगा इससे ये प्रूफ होना कि गुरु परंपरा नहीं है यानी मानो सुनोद

1057
01:11:40,320 --> 01:11:44,320
गुरु परंपरा सुनो सुनो ऐसे कैसे मान ले उनका उनका जरूरत नहीं नहीं

1058
01:11:44,320 --> 01:11:48,480
थी उसमें देने की। अगर वेद में डायनासोर के बारे में नहीं दिया है मतलब

1059
01:11:48,480 --> 01:11:52,720
उसी तरीके उसी उसी भाषा में जिस भाषा में डायनासोर को हम जानते तो इसका मतलब वेद

1060
01:11:52,720 --> 01:11:56,720
क्योंकि डायनासोर को नहीं जानता था। इसलिए वेद गलत है। ये कौन सी बात हो गया वैसे तो

1061
01:11:56,720 --> 01:12:00,960
ये भाई मैं बता रहा हूं। बात ये है कि अगर उन्हें जरूरत

1062
01:12:00,960 --> 01:12:04,960
पड़ती तो उसका उनका इतिहास देते। नहीं पड़ी जरूरत नहीं दिया। जिसकी जरूरत उन्हें

1063
01:12:04,960 --> 01:12:09,360
दिखाई दी। उसमें ऐसे बहुत से पात्र है जिनका इतिहास

1064
01:12:09,360 --> 01:12:13,360
नहीं है हमारे पास। तो उससे क्या हो गया? जिसको हम

1065
01:12:13,360 --> 01:12:17,360
अपने प्रमाण में ले रहे हैं उनका इतिहास है हमारे पास। नहीं बात

1066
01:12:17,360 --> 01:12:21,600
बात पॉइंट क्या है मैं समझाता हूं। पॉइंट तुम तुम नहा लो तुम नहा लो। ना

1067
01:12:21,600 --> 01:12:25,680
रुकिए रुकिए रुकिए थोड़ा 10 मिनट रुकिए रुकिए। अब इसमें पॉइंट ये आ रहा है कि अगर

1068
01:12:25,680 --> 01:12:29,680
हम ये कह रहे हैं संदीपनी जी वाले विषय में। है ना? संदीपनी जी वाले विषय में हमारे

1069
01:12:29,680 --> 01:12:33,600
से यह बात टकरा रही है कि संदीपनी जी की गुरु परंपरा अगर नहीं मिल रही है तो फिर हम उनके द्वारा कही गई

1070
01:12:33,600 --> 01:12:37,760
बात प्रमाणिक क्यों मान रहे हैं क्योंकि वो दूसरी प्रामाणिक परंपराएं उनसे मैच

1071
01:12:37,760 --> 01:12:41,840
कर रही है इसीलिए तो इसीलिए तो वेद की परंपरा हमारे पास

1072
01:12:41,840 --> 01:12:45,920
होनी चाहिए नहीं तो कोई भी आके कह देगा नहीं तो कोई भी आके कह देगा मेरे पास

1073
01:12:45,920 --> 01:12:50,160
ज्ञान आया मैंने जो है ये वेद का अर्थ है लो वेद का अर्थ

1074
01:12:50,160 --> 01:12:54,320
करने के लिए आपके पास में वेदार्थ की परंपरा होनी चाहिए वो आपके पास नहीं है है तो वेदार्थ की परंपरा

1075
01:12:54,320 --> 01:12:58,560
है क्या वेदार धर्म ब्रह्म की व्याख्या हो रही है जो अरे नाम बताइए वेदासी परंपरा

1076
01:12:58,560 --> 01:13:02,640
का शंकराचार्य परंपरा शंकराचार्य परंपरा का तो यासकाचार्य ने नाम ही नहीं लिखा कहीं

1077
01:13:02,640 --> 01:13:06,960
यासकाचार्य ने नाम नहीं लिखा तो उन्होंने परंपरा की बात तो की है हमारी परंपरा

1078
01:13:06,960 --> 01:13:11,120
वैसे बिल्कुल तो परंपरा में कौन-कौन सी परंपराएं हैं उनका नाम लिखा है

1079
01:13:11,120 --> 01:13:15,520
ये ये कहां से सिद्ध हो रहा है यासकाचार्य जिसका नाम लेंगे उसी की परंपरा मान्य होगी

1080
01:13:15,520 --> 01:13:20,160
इतिहास प्रमाण है ना वो तो ऐतिहासिक रूप से प्रमाण मानते हैं कि नहीं मानते आप उन्हें और वो निरुक्त

1081
01:13:20,160 --> 01:13:24,240
निरुक्त किसने लिखा निरुक्त प्रमाण नहीं उन्होंने मना किया है क्या शंकराचार्य परंपरा

1082
01:13:24,240 --> 01:13:28,320
प्रमाणिक नहीं है तब प्रमाण शंकराचार्य परंपरा थी ही नहीं तो कहां से बोलेंगे या जो भी

1083
01:13:28,320 --> 01:13:32,560
उनके आचार्य उनके लिए उन्होंने मना किया है क्या? शंकराचार्य से पहले के आचार्य

1084
01:13:32,560 --> 01:13:34,960
बात

1085
01:13:34,960 --> 01:13:39,040
उनकी गवाही की जरूरत तब पड़ेगी जब उन्होंने उसपे बात की हो।

1086
01:13:39,040 --> 01:13:43,040
उसप उन्होंने बात ही नहीं की है। उन्होंने परंपरा से बात तो कर तो रखा है। परंपरा पे की है कि

1087
01:13:43,040 --> 01:13:47,040
ये परंपरा है परंपरा नहीं है। उन्होंने ये कहा है कि जो मैं नाम

1088
01:13:47,040 --> 01:13:50,000
ले रहा हूं वही परंपरा है बस। हां।

1089
01:13:50,000 --> 01:13:54,240
तो ठीक है मुझे रेफरेंस भेज दे। अरे आपके आचार्य होंगे निरुक्त

1090
01:13:54,240 --> 01:13:58,480
पड़े होंगे पूछ लीजिए। मैंने तो मेरे पास रखा है तुम रेफरेंस दो मुझे

1091
01:13:58,480 --> 01:14:02,560
क्या लिखा उन्होंने इस संबंध में और तुम भी और तुम वो भी बताना

1092
01:14:02,560 --> 01:14:06,560
कि वो केवल इच्छा करता है बल नहीं लगाता बता तो दिया मैंने और क्या बताना है प्रूफ तो कर

1093
01:14:06,560 --> 01:14:10,880
दिया मैंने तुम्हारे तुम्हारे ग्रंथ से बताओ

1094
01:14:10,880 --> 01:14:14,880
हमें आर्य समाज को गलत सिद्ध करना है ना अब वो तो अगर कोई आर्य समाज के

1095
01:14:14,880 --> 01:14:19,120
नाम से आर्य समाज के सिद्धांतों को क्रॉस करता चलाएगा धीरे धीरे अद्वैति

1096
01:14:19,120 --> 01:14:23,120
हो जाएगा उससे हमें क्या मतलब है नहीं आर्य समाज में स्वामी दयानंद छह के छह दर्शनों को माना

1097
01:14:23,120 --> 01:14:27,280
हुआ है आर्य नहीं वो ठीक माना उसमें उन्होंने ये माला

1098
01:14:27,280 --> 01:14:31,520
है उन्होंने माना कि मेरा जो ज्ञान जो प्रदर्शित हो रहा है जो मैं बातें बोल रहा हूं कहां से बोल रहा हूं छह दर्शनों

1099
01:14:31,520 --> 01:14:35,600
के समन्वय के आधार पर बोल रहा हूं अगर एक भी दर्शन हटा दो मेरा मेरा ज्ञान खंडित हो जाएगा

1100
01:14:35,600 --> 01:14:39,840
ये अरे भाई ऐसे ऐसे बहुत से लोग बोलते हैं मगर ये बात स्वामी दयानंद

1101
01:14:39,840 --> 01:14:43,920
जी ने मानी है कि नहीं मानी कि ईश्वर बल नहीं लगाता ईश्वर केवल

1102
01:14:43,920 --> 01:14:47,920
इच्छा करता है तो बात वही आ जाती है ना बात वही आ जाती है कि अगर वो बात

1103
01:14:47,920 --> 01:14:51,920
बोल रहे हैं और जिस उन्होंने ग्रंथ को स्वीकार कर रखा है ठीक है तो हम ये मानेंगे ना

1104
01:14:51,920 --> 01:14:56,000
की कि दयानंद जी गलत थे जो उन्होंने छह दर्शनों को भी मान लिया और जो है ये भी कह

1105
01:14:56,000 --> 01:15:00,080
दिया कि एक ईश्वर जो है बल लगाता है। नहीं बोलने का आधार क्या होगा? यही

1106
01:15:00,080 --> 01:15:04,160
कि उनकी बातें मिसमैच हो रही है। अगर तुम न्याय अगर तुम आ जाती है कि अगर

1107
01:15:04,160 --> 01:15:05,120
तुम छह मिसमैच

1108
01:15:05,120 --> 01:15:09,280
तब होगी जब उनके विरुद्ध में बात होगी। मैं बता रहा हूं। जैसे तुमने छह दर्शनों

1109
01:15:09,280 --> 01:15:13,440
से सिद्ध किया कि ईश्वर इच्छा करता है बल नहीं लगाता। ठीक है? और उन्होंने

1110
01:15:13,440 --> 01:15:17,440
उन्होंने ये कहा है कि मैंने जो भी बात बोली छह दर्शनों के हिसाब से बोली है। ठीक है।

1111
01:15:17,440 --> 01:15:21,600
इच्छा से चाहिए ना। मैं आपको अभी दिखा दो वेता भाषण का ऐसा प्रमाण है। मैं मैं तुम्हें बल

1112
01:15:21,600 --> 01:15:26,240
भी दिखा दूंगा। मैं बल भी दिखा दूंगा तुम्हें उन्हीं का लिखा हुआ कि बल बल होता

1113
01:15:26,240 --> 01:15:30,960
तो हां तो बात ये है ना कि अब उसकी व्याख्या कौन करेगा उसकी व्याख्या वही करेंगे जो शिष्य हैं

1114
01:15:30,960 --> 01:15:35,120
हम शिष्य व्याख्या करेंगे ना तुम उन्होंने तुम्हें अपना प्रामाणिक शिष्य घोषित किया है क्या

1115
01:15:35,120 --> 01:15:39,360
नहीं उनकी शिष्य उनकी परंपरा में आता हूं ना मैं उनकी गुरु परंपरा में अरे भाई वो आपको

1116
01:15:39,360 --> 01:15:43,360
अपना प्रामाणिक रूप से बोलने वाला मान रहे है की नहीं मान रहे ये कैसे तय होगा अरे मैं आ

1117
01:15:43,360 --> 01:15:47,360
तो रहा हूं मेरे को उनके ज्ञान प्राप्त हो रहा है ना इसीलिए हमको उनकी

1118
01:15:47,360 --> 01:15:51,360
चीजों का प्रमाणिक थोड़ा सा और रिसर्च किया जो उन्होंने बोला था ना की मेरे को प्रमाणिक मेरे को अच्छा सेशन नहीं

1119
01:15:51,360 --> 01:15:55,520
मिला उन्होंने पहले बोला बाद में उन्हें मिले थे। मेरे को थोड़ा और मैंने पता किया तो इसका

1120
01:15:55,520 --> 01:15:59,600
मतलब उससे मान लिया जाए। आप उनकी ओर से बोलने वाले प्रामाणिक व्यक्ति हैं। बिल्कुल

1121
01:15:59,600 --> 01:16:03,680
है। उन्होंने जबकि घोषित नहीं किया है। हम

1122
01:16:03,680 --> 01:16:08,960
ये क्यों ना हम ये क्यों ना मान ले कि दयानंद जी को आता नहीं था। आपको आता है।

1123
01:16:08,960 --> 01:16:12,960
नहीं तो ये बात आपको कैसे ये बोलने का आधार क्या बनेगा इस बात का? दयानंद

1124
01:16:12,960 --> 01:16:17,040
जी नहीं बता पाए वो बात जो तुम बता रहे हो और क्या आधार? नहीं बात ये है बात ये

1125
01:16:17,040 --> 01:16:20,240
है कि जैसे वही बात है ना कि अब जैसे स्वामी

1126
01:16:20,240 --> 01:16:24,240
दयानंद जी ने कुछ बात बोला ठीक है अब उन्होंने वो बोल रहे कि मैं इस चीज

1127
01:16:24,240 --> 01:16:28,240
को संक्षेप में बता रहा हूं संक्षेप में किसी किताब में लिखा अब आप कह रहे हो शब्द प्रमाण दो

1128
01:16:28,240 --> 01:16:32,400
अब शब्द प्रमाण पूरा सुनिए नहीं आपने आरोप लगाया पूरा सुनिए

1129
01:16:32,400 --> 01:16:36,480
अब आपने अब आपने अब मैंने उस शब्द प्रमाण यानी संक्षेप वाला जो थाने शब्द

1130
01:16:36,480 --> 01:16:40,480
प्रमाण आपको दिखा दिया शब्द प्रमाण दिखाने के बाद में आप बोलोगे नहीं विरुद्ध में भी मैं दिखा दूंगा बल भी

1131
01:16:40,480 --> 01:16:44,560
लगाते हैं तो उस चीज को मैं एक्सप्लेन करूंगा ना एक्सप्लेन कौन करेगा जो उनका शिष्य को एक्सप्लेन करेगा अब

1132
01:16:44,560 --> 01:16:48,720
आप मेरे को आप कह रहे हो कि नहीं अगर मैंने उस चीज को एक्सप्लेन किया जो स्वामी जो मेरे आचार्य जी ने लिखा हुआ है

1133
01:16:48,720 --> 01:16:53,120
उसी को मैं एक्सप्लेन करूंगा तो आप कह रहे हो कि नहीं उनको नहीं आता ये प्रूफ हो जाएगा वाह वाह वाह वाह बहुत बढ़िया

1134
01:16:53,120 --> 01:16:57,120
यही काम आपके साथ करूं नहीं नहीं बात ये है जी को बोलूं कि उनको नहीं

1135
01:16:57,120 --> 01:17:01,200
आता था तो उनके जो प्रामाणिक शिष्य है वो तो है वहां उनकी बात बताने के लिए प्रमाणिक

1136
01:17:01,200 --> 01:17:05,200
शिष्य को आता है उनको नहीं आता अरे भाई वो घोषित करके गए हैं ना घोषित

1137
01:17:05,200 --> 01:17:09,520
नहीं किया है ना हमें बोला है हमारे शिष्यों को स्वीकार किया है भाई शिष्य रूप में स्वीकार कर लिया घोषित

1138
01:17:09,520 --> 01:17:13,520
किया है कहां घोषित किया उन्होंने तो कहा मेरा कोई प्रतिनिधि मेरे समझ में

1139
01:17:13,520 --> 01:17:17,680
नहीं आ रहा है तुमने उन्होंने नहीं उन्होंने बाद में मान लिया ना बाद में पहले उन्हें लगा

1140
01:17:17,680 --> 01:17:21,680
बाद में उन्होंने किसको माना किसको माना विद्यार्थी को माना किसको विद्यार्थी को माना गुरुदेव

1141
01:17:21,680 --> 01:17:25,680
विद्यार्थी को माना गुरुदेव विद्यार्थी को माना तुमने तो खुद ही कहा था कि भैया वो

1142
01:17:25,680 --> 01:17:29,680
अभी मैंने एक और लाइन बोली वो आप क्यों छोड़ दे रहे तो बात पकड़िएगा आगे

1143
01:17:29,680 --> 01:17:33,840
वाली बात छोड़ दीजिएगा यही करना है अरे भाई जब तुम ही अपनी बातों को बदलते

1144
01:17:33,840 --> 01:17:36,080
हो तुमने मुझसे ये कहा था

1145
01:17:36,080 --> 01:17:40,800
कि दयानंद जी ने खुद कहा कि भाई मेरा कोई उत्तराधिकारी बन सके

1146
01:17:40,800 --> 01:17:44,800
ये मैं किसी शिष्य में ऐसी वो नहीं देखता हूं तो इसलिए उनका उन्होंने ये उन्होंने पहले

1147
01:17:44,800 --> 01:17:49,040
कहा था। अच्छा हां बाद में उन्होंने मिला। ओ

1148
01:17:49,040 --> 01:17:53,200
क्या कौन मिला? क्या नाम बताया तुमने? गुरुदत्त विद्यार्थी। कौन के तुम विद्यार्थी

1149
01:17:53,200 --> 01:17:57,280
हो? गुरुदत्त विद्यार्थी से चलते आ रहे हैं हम लोग। परंपरा और भी आचार्य हमारे जो उनके

1150
01:17:57,280 --> 01:18:01,440
शिष्य बने हैं। चलो ठीक है। तो तुम अब ये प्रमाण लेके आओ ये वाला इच्छा

1151
01:18:01,440 --> 01:18:05,440
वाला। ठीक है। हां इच्छा वाला प्रमाण देता हूं। तो अच्छा इसमें जो परंपरा वाली बात अटकी थी वो कहां

1152
01:18:05,440 --> 01:18:09,520
से अटकी थी? परंपरा वाली बात कहां पे है? वो वशिष्ठ हां। मैंने आपसे ये

1153
01:18:09,520 --> 01:18:13,520
पूछा था ना कि मुझे ये बताइए कि आपके वेदार्थ परंपरा क्या? आपके पास वेद की परंपरा नहीं है। प्रमाणिक

1154
01:18:13,520 --> 01:18:17,600
नहीं वेद का अर्थ करने के लिए सिंपल क्यों धर्म ब्रह्म की व्याख्या की तो है जरूरी

1155
01:18:17,600 --> 01:18:21,840
है तो वेद का अर्थ करने के लिए प्रमाणिक नहीं तो ये मानना पड़ेगा आपने अपने मन से व्याख्या की है क्यों

1156
01:18:21,840 --> 01:18:25,840
अपने मन से की है क्योंकि प्रमाणिक नहीं सारणाचार्य गुरु वो उनके समय

1157
01:18:25,840 --> 01:18:30,000
में थे क्या किसके समय में सारणाचार्य जो थे वो

1158
01:18:30,000 --> 01:18:34,080
आचार्य शंकर के समय में नहीं थे लेकिन आचार्य शंकर से भी पहले

1159
01:18:34,080 --> 01:18:38,080
कहने का मतलब यह है कि हर आचार्य जो है वेद का अर्थ करता चला जाए जबकि वेद का

1160
01:18:38,080 --> 01:18:42,320
अर्थ किया गया हो। बात वही पॉइंट ये मैं तो ये बोलूं कि

1161
01:18:42,320 --> 01:18:46,480
शणाचार्य ने अपने मन से किया है। मन से किया है। वो उनके बता देता हूं।

1162
01:18:46,480 --> 01:18:50,640
मैं परंपरा के थे ना मैं बता देता हूं ना क्यों क्यों उन्होंने अपने मन से किया क्योंकि

1163
01:18:50,640 --> 01:18:51,140
वो शंकर

1164
01:18:51,120 --> 01:18:55,360
परंपरा से थे। अगर आप ये क्लेम कर रहे हो तो है ना तो शंकर परंपरा को तो अधिकृत किया ही नहीं वेदार्थ

1165
01:18:55,360 --> 01:18:59,760
करने के लिए। किसने? वो शणाचार्य वो क्या कहते हैं?

1166
01:18:59,760 --> 01:19:04,640
निरुक्त आचार्य ने व्यासकाचार्य ने। किसको किसको अधिकृत किया उन्होंने?

1167
01:19:04,640 --> 01:19:09,200
उन्होंने संप्रदाय 10 संप्रदाय के नाम के ना व्याकरण वाले नुक्त वाले

1168
01:19:09,200 --> 01:19:13,360
प्रमाण दो आप मुझे प्रमाण दो पहले फिर बात करते हैं उस बिल्कुल दे रहा हूं अच्छा बाकी

1169
01:19:13,360 --> 01:19:17,440
मैं थोड़ा इसमें और लाइन दो चार बता देता हूं ताकि मतलब वो प्रमाण दूंगा तो कॉन्टक्स्ट के अराउंड

1170
01:19:17,440 --> 01:19:21,520
ही घूमेगा वो अच्छा इसमें ये है कि अब क्योंकि उन्होंने जिन संप्रदायों के नाम लिए हैं

1171
01:19:21,520 --> 01:19:25,520
ठीक है तो बात ये थी वो वेदार्थ के संप्रदाय के नाम लिए आपका संप्रदाय वेदार्थ में आता ही नहीं

1172
01:19:25,520 --> 01:19:29,600
आपका वेदांत का संप्रदाय है तो अब क्योंकि आप वेदांत के लिए ठीक है आप देते हो तो बात

1173
01:19:29,600 --> 01:19:33,600
ये थी कि वेदांत की जो मैं तो तुमसे यह भी पूछ लूंगा कि तुमको निरुक्त

1174
01:19:33,600 --> 01:19:37,600
का शास्त्र कहां से प्राप्त हुआ? वो ठीक है वो हमारे गुरु परंपरा से बोल तो रहा हूं परंपरा से

1175
01:19:37,600 --> 01:19:42,240
प्राप्त हुआ। वो परंपरा देखेंगे ना कैसी है वो परंपरा कैसे मैंने युधिष्ठिधर्षक

1176
01:19:42,240 --> 01:19:46,320
प्रमाण दिया था बुक से दिया तो अरे युधिष्ठिर मीमांसक जी उनके वो

1177
01:19:46,320 --> 01:19:51,120
क्या कहते है प्रामाणिक शिष्य है ये कैसे है

1178
01:19:51,120 --> 01:19:55,120
उस संबंध उस संबंध में प्रमाण दो उस संबंध में प्रमाण संबंध में किस संबंध में

1179
01:19:55,120 --> 01:19:59,440
की भैया वो दयानंद के उत्तराधिकारी थे उसी बुक में है

1180
01:19:59,440 --> 01:20:03,520
उसी बुक में वो तो वो तो युधिष्ठिर मीमांसक जी लिख रहे है ना

1181
01:20:03,520 --> 01:20:06,320
दयानंद जी लिखना चाहिए लिख रहे है ना अपने

1182
01:20:06,320 --> 01:20:10,320
दयानंद जी दयानंद ानंद जी घोषित करके गए हैं क्या उनको अपना उत्तराधिकारी

1183
01:20:10,320 --> 01:20:14,560
अपना शिष्य मान के गए हैं ना अरे भैया शिष्य मानने के बाद शिष्य

1184
01:20:14,560 --> 01:20:18,880
जो है बदल भी सकता है ना बातों को गुरु की जैसे

1185
01:20:18,880 --> 01:20:23,200
कोई सुनो शिष्य और उत्तराधिकारी में अंतर क्या है उत्तराधिकारी वो होता है

1186
01:20:23,200 --> 01:20:27,280
जिस पर गुरु को विश्वास हो जाए कि बदलेगा नहीं अब ये आज से आपका विश्वास तोड़ भी

1187
01:20:27,280 --> 01:20:31,440
है तो मनुष्य विश्वास तोड़ भी सकता है तोड़ सकता है मगर वो फिर उसपे गुरु की बात आएगी

1188
01:20:31,440 --> 01:20:35,440
वो अपने शिष्य को जांच नहीं पाए हां तो फिर बिल्कुल आ जाएगी यानी

1189
01:20:35,440 --> 01:20:39,520
उत्तराधिकारी वाली कंडीशन में आपने मान लिया ना ये चीज हो सकती है तो फिर हम पे भी मान लो

1190
01:20:39,520 --> 01:20:43,600
सिंपल क्या क्या मान लो उत्तराधिकारी वाले कैसे माना ना कि

1191
01:20:43,600 --> 01:20:47,760
बदल सकता है फिर भी आप स्वीकार कर रहे हो उत्तराधिकारी को तो हमारे कैसे मानो कि अगर बदल

1192
01:20:47,760 --> 01:20:51,760
सकता है तो भी स्वीकार कर लो क्या उत्तराधिकारी मतलब वही वाली बात कि भैया अगर

1193
01:20:51,760 --> 01:20:56,000
कानून बनने के बाद भी रेप हो रहा है तो कानून ही गलत है ये कोई बात है क्या

1194
01:20:56,000 --> 01:21:00,160
यदि आप ही थोड़ी ना भी बदल सकता है बदल सकता है गलत

1195
01:21:00,160 --> 01:21:04,320
हो सकता है मगर हमारा जो उत्तराधिकारी हमारा तो वो शब्द प्रमाण है नहीं बदल सकता

1196
01:21:04,320 --> 01:21:08,320
बदल ही नहीं रहा नहीं तो वही वही गलत क्या है? पॉइंट है कि आचार्य

1197
01:21:08,320 --> 01:21:12,720
शंकर वही बात अगर शब्द ही प्रमाण लेना है सब कुछ आचार्य शंकर का जो कहूंगा शब्द

1198
01:21:12,720 --> 01:21:16,880
अगर अगर अब तुम बताओ मुझे अब तुम बताओ मुझे कि जैसे

1199
01:21:16,880 --> 01:21:20,960
ही शब्द प्रमाण उठाइए डायरेक्ट जैसे तुम समझो कि जैसे आर्य समाज की

1200
01:21:20,960 --> 01:21:21,520
ओर से बोलने

1201
01:21:21,520 --> 01:21:25,600
वाले कई लोग हैं। तुम्हारी नजरों में भी कई लोग आर्य समाज के विरुद्ध बोल

1202
01:21:25,600 --> 01:21:29,920
रहे होंगे। ठीक है? और वो हो सकता है कि किसी तरीके से प्रमाणित

1203
01:21:29,920 --> 01:21:34,160
गुरु से उन्होंने शिक्षा ली भी हो। उसके बाद बदल गए हो। उसके

1204
01:21:34,160 --> 01:21:38,240
बाद वो बदल गए हो। ठीक है? तो ऐसे में क्या होता है शब्द प्रमाण की

1205
01:21:38,240 --> 01:21:42,400
आवश्यकता ये होती है कि गुरु ये गुरु ये घोषित करके जाता

1206
01:21:42,400 --> 01:21:46,400
है कि ये मेरे रेफरेंस से बोलेगा मेरे लिए मेरे संबंध में इसको

1207
01:21:46,400 --> 01:21:50,400
प्रमाण माना जाए अगर वो गलत बोल रहा है अगर वो आने वाले टाइम में

1208
01:21:50,400 --> 01:21:54,560
गलत बोल रहा है तो उसके गुरु का ज्ञान गलत ही मानना पड़ेगा

1209
01:21:54,560 --> 01:21:58,560
अगर वो गलत बोल रहा है तो उत्तराधिकारी की बातें होती है या तो वो गलत

1210
01:21:58,560 --> 01:22:02,720
बोले नहीं अगर वो गलत बोलेगा तो उसके गुरु का ज्ञान गलत ही मानना पड़ेगा उसके गुरु

1211
01:22:02,720 --> 01:22:06,800
को गलत मानना पड़ेगा क्योंकि शब्द खंडित हो गया। उसमें

1212
01:22:06,800 --> 01:22:10,960
पॉइंट ये आता है कि स्वामी दयानंद जी ने ये क्या

1213
01:22:10,960 --> 01:22:15,040
स्वामी दयानंद जी ने किसी व्यक्ति को ऐसे ऊपर नहीं रखा कि जो

1214
01:22:15,040 --> 01:22:19,200
व्यक्ति ने बोल दिया वही 100% सही है। ठीक है? उन्होंने ये चीज नहीं रखा।

1215
01:22:19,200 --> 01:22:23,200
उन्होंने क्या बोला कि भैया जैसे मैं परंपरा से वेद शास्त्र इत्यादि और ये क्या

1216
01:22:23,200 --> 01:22:27,280
नाम है? वेदार्थ परंपरा से आया हूं। ठीक है? उसी प्रकार तुम भी वेदार्थ परंपरा से आए

1217
01:22:27,280 --> 01:22:31,280
तो उसी के जो अनुकूल अर्थ होगा जो वेदार्थ का जो एक्चुअल अर्थ होगा वो माना जाएगा। व्यक्ति

1218
01:22:31,280 --> 01:22:35,280
विशेष द्वारा गलती हो सकती है। लेकिन जो वही है ना बात तो उन्होंने किसी ये नहीं

1219
01:22:35,280 --> 01:22:36,640
रखा कि नहीं व्यक्ति जो मैंने बोल दिया

1220
01:22:36,640 --> 01:22:40,640
वो 100% सही है। उन्होंने बोला नहीं ये नहीं है। भैया अगर मेरी बात वेद विरुद्ध जा रही है तो उसको खंड

1221
01:22:40,640 --> 01:22:44,640
करो। तो पॉइंट यहां पे कहने का ही अर्थ इसका मतलब तुम दयानंद जी से अच्छा

1222
01:22:44,640 --> 01:22:48,880
बता रहे हो ना फिर दयानंद जी गलत थे ना वहां पे उस प्रूफ करना पड़ेगा ना आपको।

1223
01:22:48,880 --> 01:22:53,200
तुम प्रूफ कर तो रहे हो तुम वो। तुम इच्छा को इच्छा मान रहे हो। बल भी मान रहे हो मैं दिखाऊंगा

1224
01:22:53,200 --> 01:22:57,360
तुम्हें। अरे तो देखिए बात ये है ना की अभी आपने प्रमाण दिखाया नहीं।

1225
01:22:57,360 --> 01:23:01,360
कह रहे हो प्रूफ मैं करूंगा बुरा मानूंगा फिर। तो तुम प्रमाण लेके आओ ना बेटा

1226
01:23:01,360 --> 01:23:05,360
क्यों खींच रहे हो अभी की अभी बात को नहीं बात ये है ना कि जब आपके पास प्रमाण अभी आपने मेरे

1227
01:23:05,360 --> 01:23:09,360
को प्रमाण दिखाया नहीं जबरदस्तीने तो नहीं चार पांचों लाइन मैं बोलूंगा फिर कर्पात्री जी

1228
01:23:09,360 --> 01:23:13,360
को लेकर के आप चढ़ोगे फिर तुमने भी तो नहीं दिखाया प्रमाण नहीं तो आपने कौन सा

1229
01:23:13,360 --> 01:23:17,360
दिखा दिया और जब दिखाया नहीं तो मैं आपके आपके कर्पति जी को गलत नहीं बोल रहे हो तो मेरे दयानंद जी क्यों गलत

1230
01:23:17,360 --> 01:23:21,440
मैं बोलूं कृपात्र जी गलत है कुछ नहीं आता था आपको अच्छा लगेगा फिर ये बात मैंने ये बोला कुछ नहीं आता था बताओ नहीं

1231
01:23:21,440 --> 01:23:25,440
आपने बोला ना कि वो गलत है इनको नहीं आता ये कौन सी बात है ये कौन सी लाइन है तुम यहां पे

1232
01:23:25,440 --> 01:23:30,160
ये कह रहे हो ना कि दयानंद जी ये कह के गए है कि इसके बाद भी और जो है रिसर्च होगी

1233
01:23:30,160 --> 01:23:34,160
बाबा वाक्यम प्रमाणम नहीं रखा उन्होंने। तो बाबा वाक्यम प्रमाणम की

1234
01:23:34,160 --> 01:23:38,400
ये भी तो बात है कि तुम अगर उनसे ज्यादा कुछ बता रहे हो तो जरूरी नहीं यही माना जाए कि ये दयानंद

1235
01:23:38,400 --> 01:23:42,640
जी की खोज है। ये भी माना ये भी माना जाएगा हां तो बस प्रमाण देना

1236
01:23:42,640 --> 01:23:46,800
बस। मतलब की मतलब की केवल तुम्हारे कहने मात्र से

1237
01:23:46,800 --> 01:23:50,800
अगर वो चीज प्रमाण नहीं मिल रहा है तो तुम्हारे कहने मात्र से हम ये नहीं मान

1238
01:23:50,800 --> 01:23:51,760
सकते। ये तो ये

1239
01:23:51,760 --> 01:23:55,920
तो अलग विषय हो गया। ये तो अलग विषय हो गया। विषय यह है कि जो हमारी वेदार्थ

1240
01:23:55,920 --> 01:23:59,920
की परंपरा है तो हम प्रमाणिक है आप नहीं हो वेद अर्थ करने के लिए विषय वेदार्थ की परंपरा

1241
01:23:59,920 --> 01:24:04,240
हमारी है भाई आपकी परंपरा तो खाली परंपरा का नाम ही नहीं है वेदार्थ में संप्रदाय

1242
01:24:04,240 --> 01:24:08,240
में कैसे हो जाएगा तो शंकर परंपरा के नाम से नहीं है अगर उसको

1243
01:24:08,240 --> 01:24:12,320
और किसी नाम से होगी तो वो मानी नहीं जाएगी ब्रह्मा में वशिष्ट

1244
01:24:12,320 --> 01:24:16,480
हमारे में ये सब वेद वैदिक नहीं थे तो संप्रदाय का नाम बदल जाता है आपके हा

1245
01:24:16,480 --> 01:24:20,560
अरे भैया जैसे अभी सत्यार्थ प्रकाश लिख दिए वेदार्थ

1246
01:24:20,560 --> 01:24:24,720
नहीं है नहीं वही है ना मैं भी पूछ रहा हूं सुनिए सुनिए पहले प्रश्न प्रश्न पूछे तो पहले उत्तर

1247
01:24:24,720 --> 01:24:28,080
दिया जाता है उसके बाद क्रॉस क्वेश्चन किया जाता

1248
01:24:28,080 --> 01:24:32,320
मैं उत्तर दे रहा हूं मैं उत्तर दे रहा हूं ठीक है उत्तर ये है कि उत्तर आप डायरेक्ट

1249
01:24:32,320 --> 01:24:36,400
देते नहीं हो ये बात ठीक नहीं है सुनो परंपरा थी परंपरा

1250
01:24:36,400 --> 01:24:40,560
का एक नवीनी नामकरण रख दिया गया पहचानने योग्य जैसे वेद

1251
01:24:40,560 --> 01:24:44,560
थे फिर भी उनका नवीन भाष्य किया गया और वेद थे

1252
01:24:44,560 --> 01:24:48,800
भाष्य वेद का नाम कहां बदला हमने भी तो अपनी परंपरा

1253
01:24:48,800 --> 01:24:52,960
को नारायण से बताया है लो कहां बदल दिया पॉइंट पॉइंट ये आ रहा है पॉइंट

1254
01:24:52,960 --> 01:24:56,960
आ रहा है जिस प्रकार से सुनो जिस प्रकार से वेद का नाम नहीं बदला उस प्रकार

1255
01:24:56,960 --> 01:25:01,200
से परंपरा का नाम भी नहीं बदला होगा ना कहां बदला कहां बदला नारायण परंपरा हां नहीं

1256
01:25:01,200 --> 01:25:05,360
पूछ रहा हूं नारायण परंपरा हां नहीं तो आपने हां तो नारायण परंपरा

1257
01:25:05,360 --> 01:25:07,120
का नाम दिखा देना आप तो नारायण

1258
01:25:07,120 --> 01:25:11,200
परंपरा में वो जो आचार्य गण है जिनका उन्होने नाम लिया है वो

1259
01:25:11,200 --> 01:25:15,280
हम दिखा देंगे देखो देखो जैसे तुम्हें मेरी ये चीज बुरी लगती है ना

1260
01:25:15,280 --> 01:25:19,520
की मैंने उनको गलत बोल दिया ऐसे तुम खामखा जो हस के अपनी बात को ये पुष्टि

1261
01:25:19,520 --> 01:25:24,640
देने की कोशिश करते हो ये मुझे बुरा लगता है मैं हस के लिए पुष्टि नहीं करता हूं वो तो मैं

1262
01:25:24,640 --> 01:25:28,880
आपसे छोटे भाई के हां देखिए छोटे भाई के रूप में जब मैं बात करता हूं छोटे

1263
01:25:28,880 --> 01:25:32,880
भाई के रूप में जब बात करता हूं तो उसमें कुछ चीजें होती है ना थोड़ा सा जाके वो तो ठीक है

1264
01:25:32,880 --> 01:25:36,480
छेड़ रहा है कोई आपसे छेड़े

1265
01:25:36,480 --> 01:25:40,640
जैसे बीच में मैंने आपको ये गाना गाने लग गया था तुम्हारे अंदर इंस्टिंक्ट

1266
01:25:40,640 --> 01:25:44,640
है छेड़ने का ये बात पक्की है मैंने बताया था ना

1267
01:25:44,640 --> 01:25:49,120
एक आदत हो जाए कि मेरे साथ लंबा श्रृंखला में बात करते अच्छा तो बात क्या थी

1268
01:25:49,120 --> 01:25:53,280
जैसे आपने कहा अब जैसे सुनो सुनो सुनो ऐसा पॉइंट ये आता है जैसे देर हो गई

1269
01:25:53,280 --> 01:25:57,360
एक लाइन एक लाइन एक लाइन एक लाइन एक लाइन एक लाइन बात जैसा आपने बोला कि नारायण से

1270
01:25:57,360 --> 01:26:01,440
परंपरा नारायण परंपरा नाम ले लेंगे तो बात ये है कि आपने ये बात बोला ये बात क्यों मानू मैं

1271
01:26:01,440 --> 01:26:06,000
कोई शब्द प्रमाण होगा तभी तो मानूंगा शब्द प्रमाण है वैदिक परंपरा लो

1272
01:26:06,000 --> 01:26:10,160
आर्यों की परंपरा लो ठीक है ये भी ठीक है बात ये है कि कुछ भी

1273
01:26:10,160 --> 01:26:14,240
जैसे वो एक हो सकता है शब्द प्रमाण लेकिन मैं ये बोल रहा हूं कि

1274
01:26:14,240 --> 01:26:18,240
अगर जैसे मान लीजिए कि कोई भी परंपरा का आप नाम लेते हैं कि नहीं शंकर परंपरा नाम से पूर्व

1275
01:26:18,240 --> 01:26:22,160
हमारा ये नाम था ठीक है ये बात क्लेम करने के लिए आपको किसी न

1276
01:26:22,160 --> 01:26:26,560
किसी आचार अपने आचार्य का प्रमाण देना पड़ेगा बात यह है कि हमने हमने

1277
01:26:26,560 --> 01:26:30,560
जो है जो उन्होंने नाम लिया है क्या उसके विरोधी माना है अपने को

1278
01:26:30,560 --> 01:26:34,800
अगर उनके नामों में जो उन्होंने नाम गिनाए उनके समर्थन वाले हमारे आचार्य

1279
01:26:34,800 --> 01:26:39,200
हुए तो नहीं ये कोई बात है क्या कि वो उसी नाम से जानते हो उसे

1280
01:26:39,200 --> 01:26:43,280
जिस नाम से हम उसे ज्ञापित कर रहे हो पॉइंट है कि ये तो इतिहास का विषय

1281
01:26:43,280 --> 01:26:47,920
सबसे पहले तो इसमें तुम प्रमाण लाओ फिर हम बात करें पहले उसकी विवेचना करते

1282
01:26:47,920 --> 01:26:52,000
इसमें बात आ जाती है कि इतिहास का विषय हो जाता है है ना कि अरे पहले प्रमाण तो लाओ पहले

1283
01:26:52,000 --> 01:26:56,000
प्रमाण तो दो हो सकता है कि उसे इतनी ज्यादा बहस करनी ना पड़े इस मामले

1284
01:26:56,000 --> 01:27:00,400
में पहले प्रमाण तो दो उस निरुक्त का कि उन्होंने कौन किसको मान्य माना है

1285
01:27:00,400 --> 01:27:05,040
तो यानी कि यहां पे टोटल बात कहां पे आके अटक गई क्या और पॉइंट रह गए हैं

1286
01:27:05,040 --> 01:27:09,280
अब वो सुन लेना अब बहुत देर हो गई अब सर में दर्द मतलब टोटल

1287
01:27:09,280 --> 01:27:13,600
पॉइंट टोटल पॉइंट तुमने रिकॉर्ड किया होगा ना

1288
01:27:13,600 --> 01:27:17,600
एक सेकंड रिकॉर्ड तो नहीं किया शायद अरे किया होगा तुमने स्क्रीन ऑफ

1289
01:27:17,600 --> 01:27:21,600
हो रखा है रुकिए ये क्या कहते हैं वो वो मैं चेक कर लूंगा। अभी ये मेरे को क्या कहते

1290
01:27:21,600 --> 01:27:25,680
हैं अभी जो पॉइंट अटका है वो इस पर अटका है ना कि मैं आपको वो प्रमाण देता हूं कि आपके शंकर

1291
01:27:25,680 --> 01:27:29,840
परंपरा का नाम नहीं है। नहीं वो हम उसकी विवेचना करेंगे।

1292
01:27:29,840 --> 01:27:33,840
ये नहीं कि उसका नाम नहीं है। उसको हर तरह से अलग-अलग तरह से जांचा जाएगा कि

1293
01:27:33,840 --> 01:27:37,200
किस-किस प्रकार से वो भैया हमारे विरोध में सिद्ध हो रहा है। केवल

1294
01:27:37,200 --> 01:27:41,520
एक यही बात थोड़ी ना है कि हमारा नाम नहीं है। ठीक है। नाम तो सत्यार्थ

1295
01:27:41,520 --> 01:27:45,680
प्रकाश का भी नहीं है। तो सत्यार्थ प्रकाश गलत हो गई। नहीं बात यह

1296
01:27:45,680 --> 01:27:49,840
है कि बात किसकी चल रही है? क्या सत्यार्थ प्रकाश के संबंधित प्रकरण ग्रंथों की बात चल रही है?

1297
01:27:49,840 --> 01:27:53,840
तो बात यह है सत्यार्थ प्रकाश को हम सही क्यों मानते हैं? क्योंकि सत्यार्थ प्रकाश

1298
01:27:53,840 --> 01:27:57,840
में आपके हिसाब से वही बातें कही गई है जो वेद के जो वेद ने कही

1299
01:27:57,840 --> 01:28:02,000
है। उसी प्रकार से उसी प्रकार से गलत उदाहरण दे रहे हैं आप।

1300
01:28:02,000 --> 01:28:06,160
मैं तुम एक काम करो तुम तुम प्रमाण लाओ। फिर बात करेंगे। ये

1301
01:28:06,160 --> 01:28:10,480
प्रमाण क्योंकि विषय अगर परंपरा का चल रहा है तो परंपरा वाले विषय में प्रमाण होगा।

1302
01:28:10,480 --> 01:28:14,560
प्रमाण थोड़ी हो जाएगा। क्यों नहीं होगा? मैं आपको उधार दूंगा। आप लॉजिकली उसको काट

1303
01:28:14,560 --> 01:28:18,720
देना जब मैं दूंगा उदाहरण तो पर यास्काचार्य परंपरा की बात कर प्रकरण

1304
01:28:18,720 --> 01:28:22,800
ग्रंथ घुसा दोगे अरे अरे भाई किसी चीज का नाम दूसरे नाम से

1305
01:28:22,800 --> 01:28:26,800
ख्यापित हो उसके अर्थ के रूप में तो उसका प्रमाण स्वीकार्य

1306
01:28:26,800 --> 01:28:31,600
होता है कि नहीं होता मैं संबंध में होता है होता है होता है होता है होता है प्रमाण दीजिए

1307
01:28:31,600 --> 01:28:35,600
प्रमाण देना पड़ेगा कि आप दे दूंगा तुम अभी अपने प्रमाण लाओ मैं दे दूंगा

1308
01:28:35,600 --> 01:28:39,680
प्रमाण ठीक है ठीक है और ये वाला पॉइंट हो गया इसके अलावा और क्या

1309
01:28:39,680 --> 01:28:43,760
था इसके वाला निर्गुण सगुण इच्छा बल उस बात नहीं वो नहीं वो

1310
01:28:43,760 --> 01:28:47,760
नहीं परंपरा में परंपरा में परंपरा में तो यही अटकी है बात

1311
01:28:47,760 --> 01:28:51,760
की वशिष्ट जी दो लाख वर्ष पूर्व हो सकते हैं कि नहीं चलिए अगर मैं उसको एक

1312
01:28:51,760 --> 01:28:52,320
दुर्जन दोष

1313
01:28:52,320 --> 01:28:56,560
न्याय से लेकर भी चलता हूं तो तो इसमें फिर क्या बात आती है तुम्हारी परंपरा

1314
01:28:56,560 --> 01:29:00,640
सिद्ध है और क्या तुम्हारी हमारे वाले हमारी परंपरा से लेकर के क्या

1315
01:29:00,640 --> 01:29:04,880
प्रश्न है आपके फिर तुम्हारे तुम्हारे पास सबसे बड़ा ड्रॉबैक तो यही है कि गुरु

1316
01:29:04,880 --> 01:29:08,880
गद्दी का खंडन उन्होंने किया है ठीक है और ये सबसे बड़े

1317
01:29:08,880 --> 01:29:13,120
गुरु परंपरा पर आघात है ठीक है इस पर विवेचना कर लेंगे और

1318
01:29:13,120 --> 01:29:17,200
केवल केवल शिष्य होने से किसी के हम उसी का ज्ञान आपको एज इट इज

1319
01:29:17,200 --> 01:29:21,520
दे रहे हैं। वो नहीं होता है। नहीं नहीं उसपे हम विवेचना कर लेंगे। वो तो अगर अगर

1320
01:29:21,520 --> 01:29:25,520
अगर पीछे जाओगे पीछे के ऋषियों के उन्होंने उत्तराधिकारी घोषित किया तो

1321
01:29:25,520 --> 01:29:29,600
वो हमारी आर्स प्रमाण है। उनको हम प्रमाण के रूप में लेते हैं। जिनकी तुम बात

1322
01:29:29,600 --> 01:29:33,760
करोगे। तो वो वाली बात है और कोई मुझे ध्यान नहीं है पॉइंट। निर्गुण सगुण

1323
01:29:33,760 --> 01:29:38,240
इच्छा बल और जो है वशिष्ठ जी का वो और तुम्हारा उत्तराधिकारी

1324
01:29:38,240 --> 01:29:42,400
ना चुनना उनको सत्यार्थ प्रकाश में गुरु परंपरा का एक तरीके से उत्तराधिकारी

1325
01:29:42,400 --> 01:29:46,640
गुरुगद्दी इत्यादि का खंडन करना ही वो सबसे बड़ी बात मिलाजुला

1326
01:29:46,640 --> 01:29:51,280
करके इतिहास तो मिल रहा है लेकिन गुरुगद्दी नहीं है यही ना

1327
01:29:51,280 --> 01:29:55,760
इतिहास भी कहां मिल रहा है वो इतिहास अभी जांच का विषय वो सत्यापन

1328
01:29:55,760 --> 01:29:59,840
का विषय है ना वो किताब तो दी है वो सत्यापन का विषय उसमें देखना पड़ेगा क्या है क्या नहीं

1329
01:29:59,840 --> 01:30:04,000
है चलिए वो सत्यापन करिएगा अपने हिसाब और बाकी

1330
01:30:04,000 --> 01:30:07,520
लेकिन वही है ना कि आचार्य शंकर के पहले तो गुरुगद्दी थी नहीं वो तो उन्होंने

1331
01:30:07,520 --> 01:30:11,600
गुरु इस मैं तुम्हें जवाब दे दूंगा मैं दे चुका हूं वैसे फिर मैं दे

1332
01:30:11,600 --> 01:30:15,760
दूंगा दोबारा ठीक ठीक है ठीक है यानी

1333
01:30:15,760 --> 01:30:19,920
ठीक है इतिहास हो रखा है इतिहास तो मिल ही रहा है उसमें समस्या नहीं है वो तो आप अपनी तरफ से चेक कर लीजिएगा

1334
01:30:19,920 --> 01:30:23,920
और अब इतिहास तो ऐसे मैं एक बुक छाप दूं अभी मैं अपने आचार्यों

1335
01:30:23,920 --> 01:30:28,240
के यहां के नाम प्रमाण वाली उन्होंने बहुत प्रमाण दिए एक एक आचार्य

1336
01:30:28,240 --> 01:30:32,320
तो कुछ थोड़े से सत्यापन देखने पड़ेंगे ना पूर्वकालीन कौन से किसका का

1337
01:30:32,320 --> 01:30:36,400
क्या दिया है? मैं उसमें विरोध नहीं कर रहा हूं। मैं केवल उसमें अपने पॉइंट रख रहा हूं कि इतिहास

1338
01:30:36,400 --> 01:30:40,640
तो मिल रहा है। विजानंद जी के गुरु का नाम क्या था? व्याकरण परंपरा

1339
01:30:40,640 --> 01:30:44,880
में? व्याकरण परंपरा उनका नाम गौरी शंकर था।

1340
01:30:44,880 --> 01:30:49,440
उनका नाम या उनके गुरु का नाम? उनके गुरु का नाम? गुरु के गुरु

1341
01:30:49,440 --> 01:30:53,680
पता नहीं। मतलब लिखा है इसमें ये नहीं उसमें तो ये प्रमाण

1342
01:30:53,680 --> 01:30:57,840
देख जिसका प्रमाण मिलता है इतिहास के दृष्टिकोण से लिखा हुआ है ना? नहीं उसमें ऐसे

1343
01:30:57,840 --> 01:31:02,000
लिखा है कि ये इनके शिष्य थे। ये इनके शिष्य थे। ऐसे लिखा है कुछ। इसमें

1344
01:31:02,000 --> 01:31:06,080
ऐसे इसमें ऐसे डायरेक्टली सबका नहीं लिखा शिष्यों का बहुतों का शिष्यों का भी लिखा हुआ है

1345
01:31:06,080 --> 01:31:10,160
और इसमें ऐसे भी बहुत है जिनका डायरेक्ट गुरु शिष्य मिल अब जैसे मान लीजिए

1346
01:31:10,160 --> 01:31:14,320
कि इसमें ये है क्या बोलते हैं उनकी

1347
01:31:14,320 --> 01:31:18,320
जैसे जो दयानंद जी के जो गुरु है ठीक है उनकी एक वृत्त मिलती है दयानंद जी की वृत्त मिलती है वृत्ति में उनके

1348
01:31:18,320 --> 01:31:22,400
गुरु का नाम लिखा तो वहां पे हमें मिलता है लेकिन इसमें उन्होंने डायरेक्ट उनका नाम नहीं लिखा

1349
01:31:22,400 --> 01:31:22,900
हुआ

1350
01:31:22,560 --> 01:31:26,720
नाम इसलिए नहीं लिखा हुआ क्योंकि जो उनके गुरु है उनके गुरु की कोई वृत्ति नहीं मिलती ऐतिहासिक

1351
01:31:26,720 --> 01:31:31,120
परिप्रेक्ष से है ना तो फिर इस दृष्टिकोण से उन्होंने उनका नाम नहीं लिखा यानी गुरु परंपरा

1352
01:31:31,120 --> 01:31:35,200
तो बहुतों की है लेकिन जानबूझ के इन्होंने इसलिए नहीं लिखा क्योंकि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से उन्होंने डाटा तैयार किया

1353
01:31:35,200 --> 01:31:39,280
है। गुरु परंपरा वाले स्टाइल से नहीं इतिहास मतलब गुरु परंपरा नहीं है ना अभी फिलहाल

1354
01:31:39,280 --> 01:31:43,360
इतिहास तो है ना अरे मैं परंपरा पूछ रहा हूं तो तुम पूरा

1355
01:31:43,360 --> 01:31:47,520
का पूरा इतिहास ला रहे हो भाई हमें ये बताना पड़ेगा पूछने का मतलब क्या है

1356
01:31:47,520 --> 01:31:51,840
जैसे मैं बता रहा हूं मैं बता रहा हूं क्या मतलब आपने मुझे उस दिन बोला था कि इतिहास मिलना चाहिए

1357
01:31:51,840 --> 01:31:55,840
मैं बता रहा हूं वो इतिहास इस परिपेक्ष में था कि जब तुमने परंपरा बताई तो मैंने

1358
01:31:55,840 --> 01:31:59,840
कहा कि इतिहास में चेक किया जाएगा क्या प्रमाण है क्या नहीं है जैसे अभी भी तुम कह रहे

1359
01:31:59,840 --> 01:32:04,000
हो कि उन्होंने वो बहुत सारे रेफरेंसेस दिए तो उसको मैंने कहा सत्यापन का विषय वो

1360
01:32:04,000 --> 01:32:08,160
कह रहा हूं और दूसरी बात यह है कि मैं यह पूछ रहा हूं जैसे विजानंद जी के गुरु

1361
01:32:08,160 --> 01:32:12,480
का नाम है गौरी शंकर जी। ठीक है? अब गौरी शंकर जी को किसने

1362
01:32:12,480 --> 01:32:18,080
वेदार्थ का ज्ञान दिया? ये है उसमें युधिष्ठिर मीमांसक में

1363
01:32:18,080 --> 01:32:22,160
नहीं है। तो फिर ये परंपरा कहां से हुई? उन्होंने तो ये बताया कि यहां पे इस व्यक्ति

1364
01:32:22,160 --> 01:32:26,240
ने भी ये बात बोली थी। यहां पे इस व्यक्ति ने भी बात बोली थी। मुझे लगता है ऐसा कुछ होगा।

1365
01:32:26,240 --> 01:32:30,400
मैंने अभी पढ़ा। नहीं नहीं ऐसा नहीं है उसमें ये है कि अष्टाध्यायी महाभाष्य के

1366
01:32:30,400 --> 01:32:34,560
ऊपर अष्टाध्यायी के ऊपर जिन जिन लोगों ने भाष्य की भाषावृत्ति की प्रथमावृत्ति लिखी द्वितीयवृत्ति

1367
01:32:34,560 --> 01:32:37,680
लिखी ठीक है काशिकावृत्ति लिखी आगे चल के फिर उसपे व्याख्या व्याख्या

1368
01:32:37,680 --> 01:32:41,920
रखी है दुनिया भर की तो इससे क्या होता है कि इससे हमें पता चलता है कि यार ये 4000

1369
01:32:41,920 --> 01:32:45,920
साल पुराना ग्रंथ है 5000 साल पुराना ग्रंथ है इसके ऊपर लगातार लोगों ने

1370
01:32:45,920 --> 01:32:50,000
काम किया है ठीक है ये 50 साल में 50 साल में इस व्यक्ति का काम है फिर अगले वाले

1371
01:32:50,000 --> 01:32:54,160
50 साल में इस व्यक्ति का काम है तो इससे क्या है इससे ये पता चल रहा है कि ये उनके बीच में

1372
01:32:54,160 --> 01:32:58,240
कनेक्शन था इन लोगों ने कहीं ना कहीं माध्यम से पढ़ा और पढ़ करके उसके ऊपर अनुमान है अनुमान है

1373
01:32:58,240 --> 01:33:02,320
शब्द प्रमाण नहीं अनुमान है वो नहीं शब्द प्रमाण भी है उसके अंदर उन्होंने

1374
01:33:02,320 --> 01:33:06,400
बहुत सारे प्रमाण दे रखे है ना अब जैसे जैसे मुझे कैसे पता कि उन्होंने वृत्ति लिखी थी तो वृत्ति मिल

1375
01:33:06,400 --> 01:33:10,560
रही है वृत्ति फलाना लाइब्रेरी में रखी हुई है तभी तो पता है नहीं वो तो ठीक है मगर

1376
01:33:10,560 --> 01:33:14,560
विजयनंद जी को वेदार्थ किसने दिया ये नहीं है ना गौरी शंकर जी को किसने

1377
01:33:14,560 --> 01:33:18,640
दिया कॉमन सी बात है उनके गुरु ने दिया होगा ना तो गुरु का नाम लिखा है उसमें दो तीन

1378
01:33:18,640 --> 01:33:23,040
साल पुराना ही तो इतिहास है अच्छा चलिए

1379
01:33:23,040 --> 01:33:27,360
कैसे होता है मैं बताता हूँ वेरिफिकेशन कैसे होता है जैसे मान लीजिए स्वामी दयानंद जी ने एक वृत्ति लिखी

1380
01:33:27,360 --> 01:33:31,920
ठीक है अष्टाध्यायी के ऊपर अब उन्होंने देखा कि जो वही अष्टाध्यायी है जो उन्हें

1381
01:33:31,920 --> 01:33:36,000
100 साल पहले के व्यक्ति ने लिखी थी वो सेम अष्टाध्यायी मैच करने पे सेम मिल रही है

1382
01:33:36,000 --> 01:33:40,000
अरे तो ये भी तो हो सकता है कि मैंने उसको कॉपी किया लिया हो कॉपी

1383
01:33:40,000 --> 01:33:44,000
किया हो वहां से और उसके पहले वो भी

1384
01:33:44,000 --> 01:33:48,080
सेम मैंने उसके भाव को ना समझते हुए उसकी बुक्स को कॉपी कर लिया

1385
01:33:48,080 --> 01:33:52,080
हो ये भी तो क्यों कह सकते हैं अष्टाध्यायी तो वही

1386
01:33:52,080 --> 01:33:52,800
है ना अष्टाध्याय

1387
01:33:52,800 --> 01:33:57,600
ही पढ़ा है उन्होंने अष्टाध्याय तो उन्होंने सेम इसलिए जो पुराने लोगों ने लिखा तो वो अष्टाध्यायी

1388
01:33:57,600 --> 01:34:01,600
के द्वारा वेद का क्या अर्थ बताना चाह रहे थे। उन्होंने अवतार माना था कि नहीं

1389
01:34:01,600 --> 01:34:05,600
माना था? ये चीजें तो देखनी पड़ेगी ना। अब उन्होंने उनके नियम

1390
01:34:05,600 --> 01:34:09,840
तो ले लिए व्याकरण के एज इट इज मगर उन्होंने वेद का जो अर्थ बताया

1391
01:34:09,840 --> 01:34:14,880
बताना चाह रहे होंगे कि अवतार भी लेता है ये नहीं लिया मान लो फिर क्या करेंगे?

1392
01:34:14,880 --> 01:34:18,960
उसमें उसमें क्या करेंगे? उसमें तो मेन यही है ना कि वैसे तो मिलना पड़ेगा। वो तो आपको ये भी

1393
01:34:18,960 --> 01:34:23,120
वेरिफिकेशन वो तो आप अपनी तरफ से करोगे तब होगा ना। अनुमान से तो फिर क्या ही बोलोगे आप।

1394
01:34:23,120 --> 01:34:28,160
तो इसीलिए तो शब्द प्रमाण की आवश्यकता है वहां पर कि उन्होंने इनसे पढ़ा।

1395
01:34:28,160 --> 01:34:32,160
वहां पर शब्द प्रमाण की आवश्यकता है ना फिर कि उन्होंने इनसे पढ़ा। उन्होंने व्याकरण

1396
01:34:32,160 --> 01:34:36,880
के नियम लिए वेद वेद का अर्थ समझा। धर्म ब्रह्म का अर्थ समझा।

1397
01:34:36,880 --> 01:34:41,120
तो इसमें नहीं इसमें बात ये आ रही है कि अगर मान लीजिए किसी गुरु का नाम नहीं मिल रहा है।

1398
01:34:41,120 --> 01:34:45,120
ठीक है? तो इसमें हम ये क्यों बोल रहे कि नहीं गुरु होंगे ही नहीं। क्योंकि बिना गुरु का ज्ञान नहीं मिलेगा। मैं

1399
01:34:45,120 --> 01:34:49,200
कहां कह रहा हूं कि गुरु होंगे ही नहीं। मगर गुरु के ज्ञान को एज इट

1400
01:34:49,200 --> 01:34:53,200
इज दिया जा रहा है। यह कैसे माने भाई? हमारा

1401
01:34:53,200 --> 01:34:58,080
हमारा किसी पुराने व्यक्ति के व्याकरण के नियमों से मैच खा रहा है। व्याकरण

1402
01:34:58,080 --> 01:35:02,160
ठीक है। अब उसने जो है अवतार माना था कि नहीं

1403
01:35:02,160 --> 01:35:06,400
माना था? वर्णाश्रम में क्या माना था? ये हमें प्राप्त नहीं है। उसने क्या माना था? जिससे

1404
01:35:06,400 --> 01:35:07,840
हमारा मैच खा रहा है। मगर

1405
01:35:07,840 --> 01:35:12,080
हम उसमें वेद और वेदार्थ में ये होता है ना? वेद और वेदार्थ वाले ये होता है कि जैसे

1406
01:35:12,080 --> 01:35:16,320
जो व्याकरण हमने पढ़ा वो तो सेम है। व्याकरण के अंदर अवतार थोड़ी बात है। उसमें केवल व्याकरण व्याकरण

1407
01:35:16,320 --> 01:35:20,480
है। मैं नहीं कह रहा मेरी बात तो मैं आगे बता रहा हूं। मेरी बात

1408
01:35:20,480 --> 01:35:24,480
प्लीज मेरी बात पूरी हो जाने दो जिसको हम अपना गुरु सिद्ध कर रहे हैं। ठीक

1409
01:35:24,480 --> 01:35:28,720
है? जिसको भी हम अपना गुरु सिद्ध कर रहे हैं। किसी को भी किसी का एक अज्ञात व्यक्ति

1410
01:35:28,720 --> 01:35:32,800
का भाष्य मिला है। अब मेरा भाष्य उससे मैच कर रहा है। तो इस बिना पर हम मान

1411
01:35:32,800 --> 01:35:36,800
ले रहे हैं कि वो हमारा अब उसका वेद के अर्थ में क्या उन्होंने स्वीकार

1412
01:35:36,800 --> 01:35:41,040
किया था जो व्याकरण के द्वारा उन्होंने लिया था। फिर वेदार्थ उन्होंने

1413
01:35:41,040 --> 01:35:45,120
क्या स्वीकार किया था। इसमें हमारे पास उसका अज्ञात व्यक्ति का कोई और प्रमाण है नहीं।

1414
01:35:45,120 --> 01:35:49,280
अब हमने जो है व्याकरण उससे ले ली और अपना अर्थ व्याकरण उससे कॉपी कर

1415
01:35:49,280 --> 01:35:53,360
ली और अपना अर्थ दे दिया। वेद का कि भाई अवतार नहीं ले सकता।

1416
01:35:53,360 --> 01:35:57,360
सगुण साकार नहीं हो सकता। ठीक है तो अब इसलिए क्योंकि हमारा

1417
01:35:57,360 --> 01:36:01,360
क्योंकि वो जो व्याकरण का भाष्य उससे मैच खा रहा है। इसलिए मान लिया

1418
01:36:01,360 --> 01:36:05,440
जाए कि हम जो है उसके प्रामाणिक शिष्य हैं। और हमने जो बताया है वो

1419
01:36:05,440 --> 01:36:09,600
परंपरा से हमें प्राप्त हुआ है। इसमें ये इसमें ये चीज प्रमाणित होती है। अगर

1420
01:36:09,600 --> 01:36:13,680
कोई ऐसा भाष्य मिलता है और पूरा इतिहास मिलता है। उस इतिहास के द्वारा ये चीज पता चलती है कि

1421
01:36:13,680 --> 01:36:17,680
इन्हें व्याकरण पता है। इन्हें वही व्याकरण पता है जो परंपरा से ही जो पहले पहले हजार

1422
01:36:17,680 --> 01:36:22,800
साल से 10 हजार साल से चला रहे हैं। इन्हें वही व्याकरण आता है इन्हें। ये पता चल गया।

1423
01:36:22,800 --> 01:36:23,600
पूरा

1424
01:36:23,600 --> 01:36:27,600
अब इसमें ये वाला उन्हें पता है। अब ये पता होने के बाद इतना तो कंफर्म हो चुका

1425
01:36:27,600 --> 01:36:31,680
है कि वही वाला व्याकरण आता है जो अष्टाध्याय महाभाष जो मूल पढ़ाई क्योंकि इतिहास इसका मिल

1426
01:36:31,680 --> 01:36:35,760
गया। ठीक है? इतिहास में हमें ऐसे कम से कम 1000 प्रमाण मिल जाते हैं। जो लोगों ने वृत्ति लिखी है सारे सेम

1427
01:36:35,760 --> 01:36:39,760
अष्टाध्याय है स्वामी दयानंद जी ने लिखवाए हैं। ठीक है? अब इसमें बात आती है

1428
01:36:39,760 --> 01:36:43,840
कि उसी अष्टाध्यायी महाभाष्य के आधार पर उन्होंने जो है वो वेद का हर्ष

1429
01:36:43,840 --> 01:36:47,920
किया। ठीक है? अब इसमें बात आ जाती है युक्ति की क्योंकि जो अर्थ होते हैं वो

1430
01:36:47,920 --> 01:36:51,920
उसमें जब आपको व्याकरण सेम आ रहा है। ठीक है? हम व्याकरण में

1431
01:36:51,920 --> 01:36:56,160
ऐसा होता है ना कि कौन सा सूत्र किधर बैठेगा वो युक्ति उसमें लगानी पड़ती है। क्या बोलते हैं उसको संगति

1432
01:36:56,160 --> 01:37:00,320
लगानी पड़ती है। संगति के आधार पे तो उसमें फिर आचार्यों की फिर अपनी डिबेट

1433
01:37:00,320 --> 01:37:04,640
वगैरह होती है कि नहीं कौन सी संगति कैसे बैठी कैसे नहीं बैठी

1434
01:37:04,640 --> 01:37:08,640
मैं इसमें क्लियर करता हूं व्याकरण के मैच खाने से ये

1435
01:37:08,640 --> 01:37:12,960
सिद्ध नहीं होता कि इन्होंने अपने गुरु का विरोध किया है कि नहीं किया। जिसको

1436
01:37:12,960 --> 01:37:17,040
जिसके कारण ये अपने आप को प्रामाणिक सिद्ध कर रहे हैं। समझ रहे हो मेरी बात?

1437
01:37:17,040 --> 01:37:21,360
व्याकरण के मैच मैच खाने से गुरु विरोध ना होना सिद्ध नहीं होता है।

1438
01:37:21,360 --> 01:37:25,360
उसके लिए का ज्ञान होना सिद्ध होता है। हां ठीक है। अब

1439
01:37:25,360 --> 01:37:29,600
व्याकरण का ज्ञान होना सिद्ध हो गया। अब उन्होंने व्याकरण का ज्ञान उनके अधिकार

1440
01:37:29,600 --> 01:37:33,600
पूर्वक उनकी इच्छा से या फिर उनकी किताब को कॉपी करके ये भी डाउट

1441
01:37:33,600 --> 01:37:37,840
की बात है। वहां पे घोषित नहीं है। शब्द प्रमाण कुछ नहीं है। अनुमान पे चल रहे हैं हम लोग।

1442
01:37:37,840 --> 01:37:38,960
समझ रहे? देखिए

1443
01:37:38,960 --> 01:37:43,040
नहीं उसमें बात उसमें बात ये आ जाती है कि बात ये आ रही है ना कि अब हमारे पास अगर किसी व्यक्ति

1444
01:37:43,040 --> 01:37:47,120
के पास में इतिहास नहीं है जैसे हम हमारे पास इतिहास नहीं है कि संदीपनी जी के गुरु कौन थे तो उसमें हम दूसरे

1445
01:37:47,120 --> 01:37:51,200
तरीकों से मैच करते हैं ना अब वही है कि अब हम उसमें गला पकड़ के थोड़ी इतिहास निकालेंगे बात ये

1446
01:37:51,200 --> 01:37:55,200
बस दूसरे तरीकों से हमने मैच किया दूसरे तरीकों से मैच नहीं खा रहा है इनका ध्यान मैं बता

1447
01:37:55,200 --> 01:37:59,280
रहा हूं मैं बता रहा हूं मैं बता रहा हूं मैं बता रहा हूं अब इसमें पॉइंट ये आ रहा है पॉइंट ये जैसे मैंने आपको बताया ना

1448
01:37:59,280 --> 01:38:03,440
कि अब अगर मान लीजिए कहीं-कहीं भी इतिहास इतिहास इतिहास में उसमें त्रुटियां आ रही है ठीक है क्योंकि आचार्य

1449
01:38:03,440 --> 01:38:07,440
शंकर ने भी अपने एक ही गुरु का नाम लिखा है 10 पीढ़ियों का नाम नहीं लिखा है ना उसी प्रकार स्वामी दानंद

1450
01:38:07,440 --> 01:38:11,760
जी ने हमेशा अपने एक ही गुरु का नाम लिख के आए हैं। है ना? देखिए पढ़ा तो उन्होंने कम से कम 100 लोगों से होगा।

1451
01:38:11,760 --> 01:38:16,160
ठीक है? चैतन्य में पढ़े थे। आचार्य शंकर ने ये घोषित

1452
01:38:16,160 --> 01:38:20,400
किया ये मेरी ओर से बोलने वाला व्यक्ति है। इसको शंकराचार्य ही मानना

1453
01:38:20,400 --> 01:38:24,480
ये घोषित किया। अब अगर वो जो जिसको वो ठीक है वो

1454
01:38:24,480 --> 01:38:28,560
मैं उसपे आऊंगा। मैं उसपे आऊंगा ठीक है। लेकिन अभी जो मैं पिछले उनसे पहले के लोगों की बात

1455
01:38:28,560 --> 01:38:32,560
कर रहा हूं। तो उनसे जब हम पहले के लोगों की बात कर रहे थे उन्होंने एक ही आचार्य को क्लियर नहीं

1456
01:38:32,560 --> 01:38:36,640
है कि आचार्य शंकर जी ने ये कहा है कि नहीं नारायण से अपनी परंपरा बताई

1457
01:38:36,640 --> 01:38:40,720
है कि नहीं। नहीं कहीं नहीं है कहीं नहीं है चलो ठीक है कोई

1458
01:38:40,720 --> 01:38:44,800
बात नहीं है कहीं नहीं है आगे आगे मतलब फिर मैं आखरी बात थोड़ी सी जुट रही थी अब

1459
01:38:44,800 --> 01:38:48,800
ये है कि यानी उन्होंने हर जगह अपने एक ही आचार्य को उन्होंने लास्ट में जब समापन करते हैं

1460
01:38:48,800 --> 01:38:53,040
तो समापन करने पे अपने गुरु की वंदना करते हैं ठीक है और तो करते हैं अच्छा

1461
01:38:53,040 --> 01:38:54,160
उसके बाद इसी प्रकार स्वामी

1462
01:38:54,160 --> 01:38:58,160
दयानंद जी में सेम परंपरा उस चीज को फॉलो करते हैं और वो भी अपने विजानंद जी को है ना

1463
01:38:58,160 --> 01:39:02,400
दंडी स्वामी विजान जी महाभाग इत्यादि करके वो भी अपना करते हैं

1464
01:39:02,400 --> 01:39:06,400
जब भी अब इससे पता चलता है कि यानी कोई व्यक्ति अगर अपने को अपने गुरु को बताता है तो

1465
01:39:06,400 --> 01:39:10,400
किसी एक अपने जिसको सबसे अधिक मानता हो उस वाले गुरु को नाम लिखता है। बाकी गुरु तो

1466
01:39:10,400 --> 01:39:14,720
उनके भी बहुत हुए थे। अच्छा बात फिर बात अंदाज आती है इतिहास मिलने

1467
01:39:14,720 --> 01:39:18,800
वाली। अच्छा इसमें पॉइंट ये आ रहा है कि इतना तो हम ये स्वीकार कर रहे हैं कि इनके

1468
01:39:18,800 --> 01:39:22,960
पास ये शास्त्र था। प्रमाणिक रूप से ये शास्त्र था। इतना तो हम मान रहे हैं। और ये वही

1469
01:39:22,960 --> 01:39:26,960
शास्त्र था जो 10,000 साल पहले कहते ये भी प्रमाणित हो रहा है। इतिहास मिल रहा है। तो इतिहास में

1470
01:39:26,960 --> 01:39:31,120
चीज़ सेम सेम है। हमें प्रमाणित क्या करना है? हमें इस पे ध्यान देना है। हमें प्रमाणित इस पे ध्यान देना है

1471
01:39:31,120 --> 01:39:35,520
कि जो शास्त्र मिल रहा है वो इनके पास भी था। वो इनके पास भी था। है ना? ये प्रमाणित

1472
01:39:35,520 --> 01:39:39,600
करना है। प्रमाणित ये करना है कि दयानंद जी ने

1473
01:39:39,600 --> 01:39:43,760
जो उन्हें ये जो शास्त्र मिला है व्याकरण वाला उनके गुरु

1474
01:39:43,760 --> 01:39:48,160
विजानंद से और विजानंद जी को गौरी शंकर से और गौरी शंकर जी को

1475
01:39:48,160 --> 01:39:52,880
किसी अज्ञात से हां अज्ञात आचार्यों से

1476
01:39:52,880 --> 01:39:57,360
इस व्याकरण शास्त्र के आधार पर है ना उन्होंने वेदों

1477
01:39:57,360 --> 01:40:01,520
का वही अर्थ दिया है जो जिनसे शास्त्र लेने की बात कर

1478
01:40:01,520 --> 01:40:05,760
रहे हैं उनको स्वीकार्य था वेद का अर्थ वही अर्थ दिया है कि

1479
01:40:05,760 --> 01:40:09,360
नहीं दिया है। ये कैसे सिद्ध करेंगे? नहीं हमें हमें

1480
01:40:09,360 --> 01:40:13,440
क्या सिद्ध करना है? हमें केवल इतना सिद्ध करना है। ठीक है मैं अपना पक्ष बता रहा हूं

1481
01:40:13,440 --> 01:40:17,440
इसमें। क्योंकि क्योंकि अच्छा पहले एक चीज़ क्लियर कर लो। तुम जिनसे

1482
01:40:17,440 --> 01:40:21,440
इनका व्याकरण प्राप्त होना मान रहे हो उन्हीं से वेद मंत्र भी प्राप्त होना मान रहे हो या

1483
01:40:21,440 --> 01:40:25,680
वेद मंत्र यजुर्वेद तो उन्हें अपने कुल से ही प्राप्त हो गए थे। पाठी ब्राह्मण

1484
01:40:25,680 --> 01:40:29,840
थे ना वो तो यजुर्वेद अपने कुल से प्राप्त हुए थे। बाकी वेद उन्होंने अलग-अलग आचार्यों से पढ़ लिए थे। तो जो कुल

1485
01:40:29,840 --> 01:40:33,920
से प्राप्त हुए थे उनका कुछ इतिहास है कि वो क्या मानते थे? यजुर्वेद वैसे

1486
01:40:33,920 --> 01:40:38,160
तो वो तो सामवेद मानते थे लेकिन वो शव थे तो फिर उन्होंने

1487
01:40:38,160 --> 01:40:42,240
पढ़वाया था अगर उनको कुल से प्राप्त हुए थे इसका मतलब कि वेदों के लिए वो

1488
01:40:42,240 --> 01:40:46,480
अपने कुल पर डिपेंड थे यजुर्वेद के लिए कम से कम ठीक और उनके यहां तो शिवलिंग

1489
01:40:46,480 --> 01:40:51,360
की पूजा हो रही थी बिल्कुल बिल्कुल तो फिर वो तो वहां हो गई मूर्ति पूजा

1490
01:40:51,360 --> 01:40:55,440
नहीं उससे सिद्ध नहीं हुआ ना बाद में रिजेक्ट भी तो किया ना नहीं तो उन्होंने किया कुल

1491
01:40:55,440 --> 01:40:59,440
परंपरा क्या मान रही है नहीं कुल परंपरा तो वही बात है ना कि कुल परंपरा ऐसे

1492
01:40:59,440 --> 01:41:03,600
तो वहीं यानी कि वेद वेद मंत्र के वो डिपेंड थे अपने कुल

1493
01:41:03,600 --> 01:41:07,680
पर मगर अर्थ अपने से दिया उन्होंने। यही बात मैं कह रहा हूं। अब जैसे सामवेद

1494
01:41:07,680 --> 01:41:11,840
में तो शिवलिंग पूजा नहीं है ना लेकिन कर रहे हैं तो क्या करेंगे उसका फिर? तो फिर मंत्र पर भी विश्वास

1495
01:41:11,840 --> 01:41:16,160
मत करो ना। उनके अर्थ पर विश्वास नहीं है तो। यही तो मेरा पॉइंट है। नहीं मंत्रार्थ

1496
01:41:16,160 --> 01:41:20,160
मैं क्या मैं कह रहा मंत्र के अंदर तो वो है ही नहीं ना शिवलिंग पूजा। मैं ये नहीं कह

1497
01:41:20,160 --> 01:41:24,240
रहा। उनके मंत्र पर विश्वास ये मत करो कि ये वही मंत्र है जो चार ऋषियों

1498
01:41:24,240 --> 01:41:24,800
के अंतकरण

1499
01:41:24,800 --> 01:41:28,880
में आए थे। ये मत करो। जैसे हम ये विश्वास कर रहे हैं कि ये वही

1500
01:41:28,880 --> 01:41:32,880
पुराण है। ठीक है? हम मान रहे हैं कि ये वही पुराण है जो आप मानते आ रहे हो। वैसे हम मान रहे कि ये

1501
01:41:32,880 --> 01:41:36,960
वही वेद है जो आप मानते आ रहे हो। तो ये जो शिवलिंग पूजा इत्यादि का जो विषय है वो तो पुराण में

1502
01:41:36,960 --> 01:41:40,960
आ रहा है। शिव पुराण में आ रहा है। ठीक है? अब उसके अंदर बात आ रही है कि उसी आधार पे जो हम उस चीज को

1503
01:41:40,960 --> 01:41:45,040
सही या गलत कह रहे हो वो एक अलग विषय है। ठीक है? तो हम है ना? हम तो पुराण

1504
01:41:45,040 --> 01:41:49,360
को मान के चल रहे है कि आप इस चीज को परंपरागत मैं बता रहा हूं। मैं

1505
01:41:49,360 --> 01:41:53,600
पूरा पूरा पूरा पूरा बोल। अब इसमें थोड़ा सा ये हो गया। है ना? अभी

1506
01:41:53,600 --> 01:41:57,600
अरे यार काफी देर हो गई। दो घंटे चार मिनट हो गए बोलो बोलो

1507
01:41:57,600 --> 01:42:02,000
पूरी करो बात अपनी। तो वही मतलब इतना

1508
01:42:02,000 --> 01:42:06,080
वो कर लिया चलो ये अच्छी चीज मुझे बताई तुमने कि यजुर्वेद उनको उनके कुल

1509
01:42:06,080 --> 01:42:10,320
से प्राप्त था तो 14 वर्ष में उनको यजुर्वेद कंठस्थ

1510
01:42:10,320 --> 01:42:14,400
था हां तो फिर उनका जो है कुल कुल परंपरा पे विश्वास होना जरूरी

1511
01:42:14,400 --> 01:42:18,560
है यजुर्वेद के लिए कम से कम तो जरूरी है वेद के लिए तो था ना बिल्कुल वेद था

1512
01:42:18,560 --> 01:42:22,560
तो बात यह है की जो व्यक्ति वेद के नाम पे झूठी पूजा आपको

1513
01:42:22,560 --> 01:42:26,640
दे सकता है की भैया वह कह रहा है कि पुराण भी वेद का ही अर्थ है वो यह कह

1514
01:42:26,640 --> 01:42:30,880
रहा है और तब वो पुराण के आधार पे शिवलिंग दे रहा है। ठीक है अब आपको अगर

1515
01:42:30,880 --> 01:42:34,880
उसके वेदार्थ पे वेदार्थ के रूप में उसके पुराण पर विश्वास

1516
01:42:34,880 --> 01:42:38,960
नहीं है उसकी शिवलिंग पूजा पर विश्वास नहीं है तो फिर वो वेद मंत्र भी

1517
01:42:38,960 --> 01:42:39,840
तो आपको झूते दे

1518
01:42:39,840 --> 01:42:44,000
सकता है इसमें पॉइंट ये है ना क्योंकि वेद की परंपरा और वेदार की परंपरा

1519
01:42:44,000 --> 01:42:48,000
दोनों अलग अलग है तो वो तो वो दोनों कुल परंपरा एक ही है ना शिवलिंग

1520
01:42:48,000 --> 01:42:52,080
की पूजा करने वाला भी वही वहाँ पे वो वेदार्थ की परंपरा में थोड़ी थे मैं ये

1521
01:42:52,080 --> 01:42:56,400
कह रहा हूं मैं ये कह रहा हूं कि शिवलिंग की पूजा करने वाला

1522
01:42:56,400 --> 01:43:00,400
शिवलिंग की पूजा बताने वाला शिवलिंग की पूजा को वैदिक धर्म बताने

1523
01:43:00,400 --> 01:43:04,480
वाला और वेद के मंत्र देने वाला वही कुल है ना उनका एक ही

1524
01:43:04,480 --> 01:43:08,480
हां हां ठीक है तो फिर तो वो एक जगह झूठा सिद्ध होगा ना

1525
01:43:08,480 --> 01:43:12,560
वो नहीं तो उसमें बात ये है इसमें सिंपल ये है कि वेद

1526
01:43:12,560 --> 01:43:16,640
के मंत्र उन्होंने दिए हां मैंने मान लिया आपने मेरे को पुराण दिए ठीक है मान लिया पुराण

1527
01:43:16,640 --> 01:43:20,800
पढ़ता है प्रमाण है वेद स्वतः प्रमाण है तो ये भी आपने बोला ठीक है मान लिया इसके बाद बात

1528
01:43:20,800 --> 01:43:24,800
आती है कि अब वेदार्थ क्या है तो वेदार्थ नहीं पता तो वेदार्थ करने के लिए वेदार्थ

1529
01:43:24,800 --> 01:43:29,280
करने के लिए क्या चाहिए भैया तो वेद का अर्थ आपको खुद से करना है तो खुद से कैसे करूं खुद से

1530
01:43:29,280 --> 01:43:33,440
मैं समझ गया मैं तुम्हारी सारी बातें मगर कहीं ना कहीं जिन्होंने आपको वेद मंत्र

1531
01:43:33,440 --> 01:43:37,520
दिए उन पर आपका डाउट आएगा जब आप अपने ज्ञान से करोगे।

1532
01:43:37,520 --> 01:43:41,520
आप कुछ भी कर लो आपको डाउट लाना पड़ेगा जिससे आपने वेद मंत्र लिए

1533
01:43:41,520 --> 01:43:45,680
हैं। और जब क्यों डाउट आ रहा है ना उसके ऊपर कि वह जो है व्याकरण

1534
01:43:45,680 --> 01:43:49,680
से नहीं किया उसने अर्थ जो किया है। नहीं वेद के नहीं हम कह ही नहीं रहे कि उन्होंने वेद

1535
01:43:49,680 --> 01:43:53,680
का अर्थ पढ़ा। हम कह रहे तो वो शिवलिंग को अवैदिक के रूप में दे रहे

1536
01:43:53,680 --> 01:43:55,200
थे क्या? अवैदिक

1537
01:43:55,200 --> 01:43:59,280
घोषित किया था शिवलिंग की पूजा को उनकी कुल ने ये जो है सनातन नहीं

1538
01:43:59,280 --> 01:44:03,280
है वैदिक नहीं है नहीं बात क्या है बात ये है कि जो वो वो

1539
01:44:03,280 --> 01:44:07,520
कह रहे हैं ना अगर वो चीज कह रहे हैं इतना सिंपल सी चीज है बिना कॉम्प्लेक्स

1540
01:44:07,520 --> 01:44:11,520
किए जा रहे थे इसमें बात ये है कि अगर वो कह रहे हैं कि नहीं शिवलिंग पूजा इत्यादि करो

1541
01:44:11,520 --> 01:44:15,600
तो वो तो वो तो शायद शिव पुराण पढ़वाते थे स्वामी दयानंद जी को शिव पुणराण बच्चों

1542
01:44:15,600 --> 01:44:19,840
ने पढ़ाते क्या वो ये कह रहे थे कि यह वैदिक शास्त्र है

1543
01:44:19,840 --> 01:44:24,320
नहीं यानी वो भी वैदिक ही मानते थे ना जो उनका कुल था उसको

1544
01:44:24,320 --> 01:44:28,560
हां यानी कि जब जब उनके इधर जाकर के दयानंद जी

1545
01:44:28,560 --> 01:44:32,960
भाष्य करेंगे कि नहीं शिवलिंग की पूजा गलत है तो उनकी या तो अज्ञानता

1546
01:44:32,960 --> 01:44:37,120
का डाउट आएगा कि भैया वो हो सकता है उनके ज्ञान की कमी थी जो समझ नहीं पाए

1547
01:44:37,120 --> 01:44:41,120
उनके कुल पर और या फिर उन पर जो है आएगा कि लालच वश या द्वेष वश या

1548
01:44:41,120 --> 01:44:45,200
भ्रमवश किसी कारणवश उन्होंने गलत बात बोली नहीं तो

1549
01:44:45,200 --> 01:44:49,440
ये तो देखिए पॉइंट ये है कि कोई कोई अधिक पांडित्य वाला होता है कोई कम पांडित्य

1550
01:44:49,440 --> 01:44:53,600
वाला होता है तो फिर जो जो देता हूं मैं समझ

1551
01:44:53,600 --> 01:44:57,680
गया तुम्हारी बात समझ गया। जैसे जैसे इन्होंने मंडल मिश्र

1552
01:44:57,680 --> 01:45:01,760
के साथ में डिबेट किया था और मंडल मिश्र को हराया था। मंडल मिश्र को अज्ञानी सिद्ध कर दिया था ना उस टाइम पे

1553
01:45:01,760 --> 01:45:06,000
और फिर भी उन्होंने अपना शिष्य प्रतिनिधित्व माना यानी उनका उनका जो प्रतिनिधित्व करने वाला उनसे कम ज्ञान रखता है।

1554
01:45:06,000 --> 01:45:10,000
हुआ था ना ये पॉइंट फिर तो यानी कि बात ये है ना कि कोई कम

1555
01:45:10,000 --> 01:45:10,500
विरोधी

1556
01:45:10,480 --> 01:45:14,560
विरोधी थोड़ी ना थे ज्यादा कम ज्ञानी कम ज्ञानी ज्यादा ज्ञानी हो सकते है ना। अगर कम ज्ञानी

1557
01:45:14,560 --> 01:45:18,560
ज्यादा ज्ञानी वाली बात है तो शंकराचार्य के शंकराचार्य के प्रति कम ज्ञानी थे।

1558
01:45:18,560 --> 01:45:22,560
कम ज्ञानी ज्यादा ज्ञानी अलग बात है। बहुत सी वेद की शाखाएं जो लुप्त हो गई

1559
01:45:22,560 --> 01:45:26,640
है प्रज्ञा शक्ति कम होने के कारण मगर विरोधी नहीं हो सकते।

1560
01:45:26,640 --> 01:45:30,960
नहीं वहां पर शाखा लुप्त हुई तो परंपरा पे प्रश्न आएगा फिर तो

1561
01:45:30,960 --> 01:45:35,040
शाखाएं बहुत सी लुप्त हुई है। क्यों परंपरा पे आएगा ना प्रश्न परंपरा में अगर आप

1562
01:45:35,040 --> 01:45:39,360
परंपरा से अगर आपकी इतनी सुदृढ़ परंपरा है तो लुप्त कैसे हो गए? लुप्त हो रही है ना? लुप्त

1563
01:45:39,360 --> 01:45:43,920
हो रही है। बदल नहीं रही। बदलने में विश्वास में दिक्कत आएगी। मैं लुप्त का ही पूछ रहा हूं।

1564
01:45:43,920 --> 01:45:48,160
बदलने का नहीं लुप्त का पूछ रहा हूं। क्यों लुप्त हो गई? परंपरा सुदृढ़ है ना? क्यों लुप्त हुई? अरे

1565
01:45:48,160 --> 01:45:52,320
सुदण है तो वेदार्थ तो मिल ही रहा है ना हमको धर्म मैं परंपरा मैं अगर नहीं

1566
01:45:52,320 --> 01:45:56,480
वो उसका मैं कह ही नहीं रहा ना मैं जिस पूछ उसका बताइए ना उत्तर जिसको पूछ उसका छोड़ के बाकी सबका

1567
01:45:56,480 --> 01:46:01,840
उत्तर देंगे मैं पूछ रहा हूं कि परंपरा सुदृढ़ है तो ये क्यों लुप्त हुए

1568
01:46:01,840 --> 01:46:05,840
क्योंकि व्यक्ति का जो दिमाग है याद रखने

1569
01:46:05,840 --> 01:46:09,920
वाला वो धीरेधीरे कम हो रहा है उसकी स्मरण शक्ति कम हो रही है

1570
01:46:09,920 --> 01:46:14,080
यानी बौद्धिक क्षमता में कमी आने के कारण अगर व्यक्ति जो है शास्त्रों

1571
01:46:14,080 --> 01:46:18,080
को भूल सकता है तो शास्त्रों में भूलने के कारण और अर्थों में तो गड़बड़ियां कर सकता है।

1572
01:46:18,080 --> 01:46:22,240
नहीं तो उसके हम विरोध नहीं जा सकते क्योंकि उससे हमको चीज प्राप्त हुई है ना।

1573
01:46:22,240 --> 01:46:25,920
या वो फिर हमारा अगर हम चले जाए

1574
01:46:25,920 --> 01:46:30,480
तो कर सकते हैं। तो वो डाउट करना ही तो विरोध है। डाउट करके विरोध चले तो गए।

1575
01:46:30,480 --> 01:46:34,560
डाउट करके करना इसलिए पड़ेगा आपने

1576
01:46:34,560 --> 01:46:39,200
माना इसी को खो दिए हैं। अगर हम डाउट करेंगे अगर हम डाउट करेंगे

1577
01:46:39,200 --> 01:46:43,280
तो डाउट पर हमारा वो शब्द प्रमाण सिद्ध नहीं होगा। फिर हमें अपना दूसरा आधार

1578
01:46:43,280 --> 01:46:47,280
चाहिए होगा कि हम वेद पे विश्वास क्यों करते हैं? वो विश्वास क्यों है?

1579
01:46:47,280 --> 01:46:51,360
नहीं आगे जैसे वेद हमें मिल रहा है। वो खुद भी क्लेम कर रहे हैं कि वेद मिल रहा है। खुद भी क्लेम करने के

1580
01:46:51,360 --> 01:46:55,360
लिए हमने वेद का अर्थ का अर्थ जो थे शाखा वगैरह थी वो हमें लुप्त कर दी।

1581
01:46:55,360 --> 01:46:59,520
क्योंकि भैया हमारी शारीरिक क्षमता कम हो रही है वातावरण के अनुसार। मगर हम

1582
01:46:59,520 --> 01:47:03,680
मगर इससे हमारा बदलना जितना बदला सिद्ध कर रहा हूं

1583
01:47:03,680 --> 01:47:07,760
यार। बदला बताओ बताओ बताओ बदलना कैसे? वेद की शाखा क्या वेद की व्याख्या

1584
01:47:07,760 --> 01:47:11,760
ही है। वेद की जो शाखा है वो कुछ कुछ कुछ 10 मंत्र इधर उठा

1585
01:47:11,760 --> 01:47:15,840
लिए 15 मंत्र इधर उठा लिए करके शाखा बनाई और उसकी व्याख्या कर रखी है तो वही शाखा है। बात

1586
01:47:15,840 --> 01:47:19,840
ये है कि अगर शाखा लुप्त हुई वेद का अर्थ लुप्त हो गया आपने मान लिया कि वेद

1587
01:47:19,840 --> 01:47:23,920
का अर्थ लुप्त हो गया तो अब आप वेद का अर्थ जो कह रहे हो कैसे अधिकार पूर्वक कह रहे कि नहीं हमारा जो हम जो

1588
01:47:23,920 --> 01:47:29,360
बोल रहे हैं वही अर्थ भैया आपने तो खुद ही लुप्त कर दिया अर्थ था

1589
01:47:29,360 --> 01:47:33,360
वो अर्थ आपने लुप्त कर दिया अब इसमें सुनिए सुनिए इसमें पॉइंट है अब इसमें बात है

1590
01:47:33,360 --> 01:47:37,360
कि यानी अब आवश्यकता क्या पड़ेगी आवश्यकता पड़ेगी फिर से यानी ये जो था ना वाली बात

1591
01:47:37,360 --> 01:47:41,040
कि कविता में है ना सिर फूट गया उसको मारो मारो अरुण रंग का घड़ा

1592
01:47:41,040 --> 01:47:45,200
या और भी उदाहरण दे सकते हैं जो आप दे तो उसमें बात है कि उसमें उस शब्द का यही अर्थ कैसे

1593
01:47:45,200 --> 01:47:49,360
पता चले इस वाली चीज को ये तो कट हो गया ना क्योंकि अब आप नहीं

1594
01:47:49,360 --> 01:47:53,360
बता रहा हूं अब इसमें और पॉइंट आएगा इसमें एक और पॉइंट आएगा मैं साथ में ही साथ में

1595
01:47:53,360 --> 01:47:57,440
कर देता हूं इसमें एक और पॉइंट ये आएगा कि अब आपको ये करना पड़ेगा कि आपको शास्त्रों के यानी

1596
01:47:57,440 --> 01:48:01,440
व्याकरण इत्यादि और जो ब्राह्मण ग्रंथ इत्यादि उसके आधार पे आपको अपनी प्रज्ञा शक्ति से उसका अर्थ

1597
01:48:01,440 --> 01:48:05,600
करना पड़ेगा। जब आप उसका अर्थ करेंगे तो उसमें से फिर उसमें तो फिर 100%

1598
01:48:05,600 --> 01:48:09,680
ही आएगा कि नहीं भैया एक आचार्य ने अर्थ किया ये सही है एक आचार्य ने अर्थ किया वो सही है तो इत्यादि

1599
01:48:09,680 --> 01:48:13,840
बातें के लिए वो डिबेट का विषय आ जाता है मैं भी तो बार-बार ये कह रहा हूं ठीक है मैं बता रहा हूं अब तुमने

1600
01:48:13,840 --> 01:48:17,920
बोला मैं बता रहा हूं इसमें बात ये है आयुष को कॉल

1601
01:48:17,920 --> 01:48:22,000
कर लो आयुष को कॉल करो इसमें बात ये है तुम

1602
01:48:22,000 --> 01:48:26,320
नहीं तुम नहीं इसमें बात ये है कि शारीरिक क्षमता

1603
01:48:26,320 --> 01:48:30,800
के कारण जो है चीजों का लुप्त होना ठीक है

1604
01:48:30,800 --> 01:48:34,880
और जो है जो हमें पीछे से ज्ञान प्राप्त हुआ

1605
01:48:34,880 --> 01:48:39,040
हमें मालूम है हमको याद नहीं है मगर हमने कुछ और कह दिया भैया देखो

1606
01:48:39,040 --> 01:48:43,120
जैसे हमें पीछे से प्राप्त हुआ कि भैया शिवलिंग की पूजा नहीं करनी है ठीक है मगर

1607
01:48:43,120 --> 01:48:47,120
हमने जो है हमने जो है हमको हम भूल चुके हैं हमें मालूम है कि क्या कहा

1608
01:48:47,120 --> 01:48:51,680
गया था फिर भी हम कह रहे है की शिवलिंग की पूजा कर लो ठीक है एक तो ये होना तो

1609
01:48:51,680 --> 01:48:55,760
ज्ञान को ज्ञान पूरा का पूरा ना दे पाना और

1610
01:48:55,760 --> 01:48:56,260
ज्ञान

1611
01:48:56,240 --> 01:49:00,240
का बदल जाना इन दोनों में अर्थ है अगर हम इन दोनों में

1612
01:49:00,240 --> 01:49:04,240
अर्थ अलग का अर्थ ये है कि जब हम ज्ञान को बदल के दे रहे है

1613
01:49:04,240 --> 01:49:08,240
ना बदल के मतलब पीछे से कुछ और दिया गया और हम या तो

1614
01:49:08,240 --> 01:49:12,480
उसके विरुद्ध बोल रहे है या फिर पीछे से जो दिया गया हम भूल गए फिर भी हम दे रहे है समझ

1615
01:49:12,480 --> 01:49:17,120
रहे हो फिर भी हम दे रहे है अपने मन से दे रहे है ठीक है तो यहां पर क्या होगा

1616
01:49:17,120 --> 01:49:21,200
कि हमारे अंदर कोई ना कोई द्वेष लालच कुछ ना कुछ अपना

1617
01:49:21,200 --> 01:49:25,200
स्वार्थ सिद्धि होगी जिसके कारण हम ऐसा कर रहे है तो

1618
01:49:25,200 --> 01:49:29,200
बताओ भाई जो जो ज्ञान लुप्त हुआ अगर वो कह दे भैया वो लुप्त हो गया

1619
01:49:29,200 --> 01:49:33,200
हमें नहीं पता हा मगर वो वो तो वहां पे कह रहे हैं ना कि नहीं भैया ये वैदिक

1620
01:49:33,200 --> 01:49:37,440
है शिवलिंग की पूजा और फिर दयानंद जी उनका विरोध कर रहे हैं। अगर विरोध,

1621
01:49:37,440 --> 01:49:41,680
मैं कह रहा हूं, मैं कह रहा हूं कि अगर विरोध कर रहे हैं ठीक है करें। मगर उसके

1622
01:49:41,680 --> 01:49:45,680
लिए फिर उनको अपने वेद मंत्रों का प्रमाण लाना पड़ेगा कि मैंने इससे मंत्र

1623
01:49:45,680 --> 01:49:50,160
लिए। नहीं बात क्या है? बात इसके अंदर देखिए।

1624
01:49:50,160 --> 01:49:54,240
बात वेद वेद मंत्र की नहीं है। वेद के मंत्र के अर्थ की है। वेद के मंत्र

1625
01:49:54,240 --> 01:49:58,560
का अर्थ आधार शाखा था। शाखा आपने लुप्त कर दिया। अब आपने आधार नष्ट कर दिया। मैं

1626
01:49:58,560 --> 01:50:02,720
कह सकते कि इस पर हम लोग बात करेंगे। अभी तुम्हारी जो परंपरा है

1627
01:50:02,720 --> 01:50:06,720
यजुर्वेद के लिए वो कुल पे गए हैं और कुल में उनके यहां ये वाली पूजा होती थी

1628
01:50:06,720 --> 01:50:11,200
मूर्ति पूजा। ठीक है? है ना? बताया ना अभी शाखा

1629
01:50:11,200 --> 01:50:11,700
ठीक

1630
01:50:11,280 --> 01:50:15,360
है। इस हम लोग इसप हम लोग बात करेंगे आगे। ठीक। जय श्री

1631
01:50:15,360 --> 01:50:21,360
राम। ठीक है। जय श्री राम। नमस्ते भैया। नमस्ते।

1632
01:50:28,960 --> 01:50:33,120
कैसे हैं? बस कृपा राम और क्या

1633
01:50:33,120 --> 01:50:37,280
चल रहा है? बस कुछ नहीं। मार्ग में जा रहे हैं थोड़ा पाखंडियों की खाल

1634
01:50:37,280 --> 01:50:39,600
उतारने।

1635
01:50:39,600 --> 01:50:43,680
बढ़िया बढ़िया सही है। टीम लेके जा रहे हैं। वहां

1636
01:50:43,680 --> 01:50:47,840
बहुत पाखंडी होते हैं। हम जगह-जगह पे

1637
01:50:47,840 --> 01:50:52,320
कल्कि अवतार ब्रह्मा एक्सपोज करना जरूरी है क्योंकि

1638
01:50:52,320 --> 01:50:56,560
इससे क्या होता है? बदनामी होती है बहुत ज्यादा। तो इसीलिए एक्सपोज करना बहुत जरूरी।

1639
01:50:56,560 --> 01:51:00,720
मैं हर साल करके आता हूं। दो तीन चिलाटुओं को तोस्ते में ही पकड़ लेता हूं।

1640
01:51:00,720 --> 01:51:05,040
हां बच्चे बांट रहे होते हैं। वही सही

1641
01:51:05,040 --> 01:51:09,520
है। कल की वाले वजह से बड़े खिसे आए हुए हैं।

1642
01:51:09,520 --> 01:51:12,800
एक्सपोज हो गया ना वो इसीलिए इधर-उधर बांट रही होती है। चलो

1643
01:51:12,800 --> 01:51:18,800
हमारे भगवान आए थे। 2006 में गोली मारकर हत्या कर दी गई उनकी। बताओ।

1644
01:51:19,040 --> 01:51:23,040
इनके भगवान कहानी पढ़ गए पता भी नहीं चला। चेलों को

1645
01:51:23,040 --> 01:51:26,240
प्रचार करना पड़ रहा है।

1646
01:51:26,240 --> 01:51:30,640
और बताओ। और भी आप वही तैयारी चल रही थी तो

1647
01:51:30,640 --> 01:51:35,280
हम निकलना था बस थोड़ी बहुत देर में ही तुम्हारी भाभी अच्छा

1648
01:51:35,280 --> 01:51:39,360
कर रही वही थोड़ा सिद्धांत वगैरह सोच रहा था चर्चा करूं अगर आपके पास समय हो

1649
01:51:39,360 --> 01:51:43,600
तो अरे हो तो गई अपने बीच में चर्चा वही पॉइंट अटक

1650
01:51:43,600 --> 01:51:48,080
जाता है सगुण निराकार में तुम इच्छा कर देते हो सगुण

1651
01:51:48,080 --> 01:51:52,160
निराकार में इच्छा हां तो वो तो सही पॉइंट है ना उसमें क्या उसके बाद

1652
01:51:52,160 --> 01:51:56,240
आर्गुमेंट क्या है आपके पास मतलब सही वहां पे वो संतुष्टिजनक नहीं है ना तुम्हारा ये

1653
01:51:56,240 --> 01:52:00,320
कहना बल नहीं है वो इच्छा है हम तो उसमें तो सही पॉइंट है उसमें आपके पास

1654
01:52:00,320 --> 01:52:05,680
सर फिर उसको शक्तिमान क्यों कह रहे हो इच्छा मान कहो

1655
01:52:05,680 --> 01:52:10,080
शक्ति का मतलब क्या होता है शक्ति का मतलब होता है सामर्थ्य

1656
01:52:10,080 --> 01:52:14,080
और सामर्थ्य कैसे होता है सामर्थ्य ऐसे होता है इच्छा के रूप में धक्का है

1657
01:52:14,080 --> 01:52:18,320
ही नहीं ईश्वर का इसमें इसमें ये होता है कि जैसे मान लीजिए मेरी इच्छा

1658
01:52:18,320 --> 01:52:22,400
हुई तर्क संगत नहीं लगी ना ये बात इसका एक्सप्लेनेशन देता हूं ना मैं आपको एक्सप्लेनेशन

1659
01:52:22,400 --> 01:52:26,640
देता हूं अरे वो लंबा हो चुका है काफी अपना उसको कहो तो रिकॉर्डिंग बड़ी

1660
01:52:26,640 --> 01:52:27,840
होगी मैं भेज देता हूं तुम

1661
01:52:27,840 --> 01:52:31,920
सुनो और ये लूप लूप टाइप से हुआ

1662
01:52:31,920 --> 01:52:36,320
है उसमें कुछ बार-बार नहीं मेरी मेरी जानकारी में तो अभी देखिए मेरी जानकारी

1663
01:52:36,320 --> 01:52:41,280
में तो जैसे तुम कह रहे हो ना कि स्वरूप से वो वो है

1664
01:52:41,280 --> 01:52:45,600
क्या कहते हैं निराकार या स्वरूप से वो नित्य शाश्वत

1665
01:52:45,600 --> 01:52:49,840
है तो स्वरूप से वो निर्गुण भी है एक रस भी है हम उसका

1666
01:52:49,840 --> 01:52:54,000
कार्य करने वाला होने के रूप में उसका सगुण होना ही आवश्यक है तो वहीं से

1667
01:52:54,000 --> 01:52:58,080
या तो यह मान लो अगर तुम अपने स्तर तर्क से अवतार का खंडन करोगे तो तुम्हें यह भी

1668
01:52:58,080 --> 01:53:02,160
मानना पड़ेगा कि ईश्वर की सृष्टि की रचना ईश्वर ने नहीं की फिर क्योंकि ईश्वर तो

1669
01:53:02,160 --> 01:53:06,240
एक रस है और वो कम ज्यादा हो रहा है यहां सगुण रूप में क्योंकि क्रियाशील

1670
01:53:06,240 --> 01:53:10,320
है ना ईश्वर जब जब ईश्वर दोनों के अंदर है और वो हिलना

1671
01:53:10,320 --> 01:53:14,320
चाहता है हिलने के रूप में अपनी शक्ति लगा रहा है तो वो अंदर भी हिलेगा बाहर

1672
01:53:14,320 --> 01:53:18,320
भी हिलेगा नहीं हिलने से नहीं महाराज जी ये बताइए शरीर के अंदर जीव है

1673
01:53:18,320 --> 01:53:22,560
तो क्या ही जीव हिल हिल के हाथों को उठाता है क्या तो आप वहां पे बताओ

1674
01:53:22,560 --> 01:53:27,360
ना वह बल है कि क्या है वो जैसे जैसे जैसे मेरे शरीर शरीर में जीव है। ठीक है?

1675
01:53:27,360 --> 01:53:31,520
मैंने चाहा और मेरा हाथ उठा। तुम वहां से बताओ कि वो जो पृथ्वी का

1676
01:53:31,520 --> 01:53:35,520
गोला है उसमें धक्का कैसे लगा? उसमें धक्का कहां? धक्का

1677
01:53:35,520 --> 01:53:39,760
लगने के लिए एक देसी चाहिए। तो क्या हुआ? तो क्या हुआ?

1678
01:53:39,760 --> 01:53:42,880
मतलब वहां कुल मिला के वहां कुछ तो कुछ समझाने वाली बात

1679
01:53:42,880 --> 01:53:47,120
नहीं। बस मान लो कि हुआ। यही तो है। ऐसा नहीं है ना।

1680
01:53:47,120 --> 01:53:51,120
तो भगवान ने धक्का लगाया कि नहीं? और भगवान ये ये सब जो बातें

1681
01:53:51,120 --> 01:53:55,200
लिखी हुई हैं तुम्हारे उसमें कि बिन उसके वो सब सुनता है बिन वो सब उसमें

1682
01:53:55,200 --> 01:53:59,200
ये करता है वो करता है करने वाली कई बातें लिखी हुई है तो करने

1683
01:53:59,200 --> 01:54:03,760
वाली जैसे ही क्रिया आएगी तो वहां पर वो फोर्स का ट्रांसफर ट्रांसफरिंग

1684
01:54:03,760 --> 01:54:08,160
फोर्स तो दिखाई देगा ना उसी को तो सामर्थ्य बोलते हैं ना जैसे

1685
01:54:08,160 --> 01:54:12,160
आंख आंख है तो कोई जैसे सामर्थ्य को ही तो मैं बल बोल रहा हूं बल ना बोले

1686
01:54:12,160 --> 01:54:16,240
उसे तो बल उसमें देखिए मैं समझाता हूं

1687
01:54:16,240 --> 01:54:20,240
जैसे एक तो जैसे हम उसे बोल रहे हैं कि सर्वशक्तिमान ठीक है? शक्ति का अर्थ

1688
01:54:20,240 --> 01:54:24,320
तो सामर्थ बताया हुआ है शास्त्रों में। तो सामर्थ्य का एक्सजीक्यूशन तो बल के

1689
01:54:24,320 --> 01:54:28,480
रूप में होगा ना। पत्ता हिलाना है। पत्ता हिलाना है तो केवल इतना मतलब नहीं होता

1690
01:54:28,480 --> 01:54:32,720
ना। अगर अगर नहीं है तो फिर वो जिस रूप में फिर वो बताओ।

1691
01:54:32,720 --> 01:54:36,720
हां तो मैं वो रूप बताते नहीं वो इच्छा कह देते हो तुम बस। बताता

1692
01:54:36,720 --> 01:54:40,720
रहूं। मैं बताता रहूं। हां। और खैर बताने से पहले

1693
01:54:40,720 --> 01:54:45,040
जो मैं थोड़ा सा इसमें और ओवरव्यू इसमें उधर बात करना चाहता था।

1694
01:54:45,040 --> 01:54:49,520
यह तो बिना अल्टीमेटम के आप में घुस गए। तो

1695
01:54:49,520 --> 01:54:53,600
इसमें जो टॉपिक रह रहे हैं हमारे सिद्धांतिक चर्चा के एक तो हम

1696
01:54:53,600 --> 01:54:57,600
उस पर चर्चा कर रहे थे परंपरा पे तो परंपरा वाला टॉपिक

1697
01:54:57,600 --> 01:54:58,100
छूटा

1698
01:54:57,920 --> 01:55:02,080
था परंपरा वाला टॉपिक में वो तुमने वशिष्ठ को नहीं माना मैंने जो है

1699
01:55:02,080 --> 01:55:06,080
फिर तुमको ये पूछा है कि भाई ऐसे अच्छा परंपरा वाले विषय में थोड़ी सी मैं क्लेरिटी

1700
01:55:06,080 --> 01:55:10,160
चाहता हूं आपसे कि जैसे आप जैसे जैसे ऐसे

1701
01:55:10,160 --> 01:55:14,240
ऋषियों पे आपत्ति उठा रहे हो जिनकी आयु जो है 1 लाख वर्ष थी या इतने

1702
01:55:14,240 --> 01:55:18,640
हजार वर्ष थी तो मैं ऐसे ऋषियों पे आपत्ति उठा बता रहा हूं जिनके अंतकरण

1703
01:55:18,640 --> 01:55:22,640
में वेद प्रकट हुआ ऐसा शरीर आज दिखा दो कहां है नहीं जिसमें वेद

1704
01:55:22,640 --> 01:55:26,800
प्रकट होता है मैंने तो आपको उसका सारा उत्तर उत्तर दे दिया था वो आप रिकॉर्डिंग में सुन लीजिएगा नहीं मैंने

1705
01:55:26,800 --> 01:55:30,960
सुना था मैंने सुना था उसमें तुमने कहा है उसमें तुमने हमको यह

1706
01:55:30,960 --> 01:55:35,200
कहा है अनुमान प्रमाण से क्योंकि हमें धर्म प्राप्त है तो वहां पर धर्म प्राप्त

1707
01:55:35,200 --> 01:55:39,360
होना सिद्ध हो रहा है मगर वो अंतःकरण में आकर के प्राप्त होना सिद्ध नहीं हो रहा नहीं वो

1708
01:55:39,360 --> 01:55:43,360
तो हम मन में अपने विचार करते हैं कि नहीं करते नहीं मैं ये कह रहा हूं

1709
01:55:43,360 --> 01:55:47,680
वो हमें धर्म हमारे पास आज की तारीख में है।

1710
01:55:47,680 --> 01:55:52,080
इससे यह सिद्ध हुआ कि ईश्वर ने ही धर्म दिया। मगर माध्यम अंतःकरण

1711
01:55:52,080 --> 01:55:56,160
में था। यह थोड़ी ना है। हो सकता है आंखों आंखों से कुछ उसने लिख के

1712
01:55:56,160 --> 01:56:00,640
बताया हो तो उन्होंने देखा होगा। इसका तो इसका इसका भी उत्तर है। इसका उत्तर है। इसका उत्तर है।

1713
01:56:00,640 --> 01:56:04,720
अगर आप कहोगे मुंह से बोल के बताया। हम ठीक है। तो खैर मैं ये

1714
01:56:04,720 --> 01:56:09,200
ये जो मूल विषय ये घुसेगा सर्वशक्तिमान वाले में घुसेगा तो मैं इसका उत्तर आपको दूंगा आगे।

1715
01:56:09,200 --> 01:56:12,960
लेकिन जब ये सर्वशक्तिमान वाला विषय आएगा तो मैं वहां पे आपको इस चीज को क्लेरिटी दे दूंगा। लेकिन जो

1716
01:56:12,960 --> 01:56:17,360
अंतःकरण वाला था अंतकरण में कैसे हुआ इसका मैंने आपको अनुमान प्रमाण से सिद्ध किया था। अंतःकरण

1717
01:56:17,360 --> 01:56:21,600
से अनुमान प्रमाण से यह सिद्ध है कि भाई धर्म उसी से मिला

1718
01:56:21,600 --> 01:56:25,600
ईश्वर से ये सिद्ध है। जो जो प्रक्रिया आप बता

1719
01:56:25,600 --> 01:56:29,760
रहे हो वो चमत्कारिक है। ना चमत्कारी को तो फिर उसका

1720
01:56:29,760 --> 01:56:34,160
प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाओ। और ना ही आपने बच्चे का प्रत्यक्ष

1721
01:56:34,160 --> 01:56:38,960
प्रमाण दिया कि बिना मां के बच्चा कहां जन्म ले रहा है आज? कोई

1722
01:56:38,960 --> 01:56:43,040
बात नहीं। चलिए आपने दिए थे इसके जवाब। आपने मगर वो संतुष्टिजनक नहीं

1723
01:56:43,040 --> 01:56:47,040
दिए थे। बिना मां के मनुष्य जन्म नहीं ले रहा आज की तारीख में।

1724
01:56:47,040 --> 01:56:51,360
देखिए उसमें बात ये आ जाती है ना कि जब तीन प्रमाण समझने

1725
01:56:51,360 --> 01:56:55,600
पड़ते हैं। अब अनुमान प्रमाण आप नहीं समझे तो फिर उसमें थोड़ा सा एक इशू होता है। बाकी रिकॉर्डिंग

1726
01:56:55,600 --> 01:56:59,760
आप फिर से सुनेंगे। नहीं हनुमान प्रमाण से हमने हनुमान प्रमाण से हमने

1727
01:56:59,760 --> 01:57:04,160
अगर हनुमान प्रमाण की बात आएगी तो हनुमान से तो हमने सर्वशक्तिमान भी सिद्ध किया है ना।

1728
01:57:04,160 --> 01:57:08,160
कहां से हो रहा है? सर्वशक्तिमान शब्द वो तो सच्चिदानंद सिद्ध हो रहा है। सर्वशक्तिमान कहां सिद्ध हो रहा है?

1729
01:57:08,160 --> 01:57:12,480
सच्चिदानंद का जो सच्चिदानंद जहां से वह सिद्ध हो रहा है उसका जो व्यवहारिक

1730
01:57:12,480 --> 01:57:17,120
रूप है वो तो वही है ना सब कुछ कर सकने वाला यह जो सब कुछ कर सकने वाला देखिए

1731
01:57:17,120 --> 01:57:21,280
ईश्वर की सिद्धि किस चाह से हो रही है मौलिक चाह से वो मौलिक चाह पता कैसे

1732
01:57:21,280 --> 01:57:25,440
चल रही है कि मौलिक चाह है उसका अवतार क्या है एग्जीक्यूशन कैसे

1733
01:57:25,440 --> 01:57:28,000
होता है हां व्यवहार

1734
01:57:28,000 --> 01:57:32,080
में हमें कैसे पता चल रहा है कि मूल में ये चाह है ये तो जब हम

1735
01:57:32,080 --> 01:57:36,160
अपने अंदर एनालाइज करेंगे उसी से पता चलेगा ना हमारे व्यवहार से पता चल रहा है ना हमें डर

1736
01:57:36,160 --> 01:57:40,480
लग रहा हम भाग रहे हैं तो ये व्यवहार आ तो वो जो जो इच्छाओं

1737
01:57:40,480 --> 01:57:44,640
का मौलिक स्वरूप है सच्चिदानंद उसका अवतार हो गया कि हम भाग रहे हैं। हम

1738
01:57:44,640 --> 01:57:48,640
जो है यह चाह रहे हैं वो चाह रहे हैं। उसका प्रकटीकरण ये हो गया। हां तो

1739
01:57:48,640 --> 01:57:52,720
बस ऐसे ही जब जैसे वो जो मौलिक चाह है उसका प्रकटीकरण ये

1740
01:57:52,720 --> 01:57:56,800
है ऐसे ही उस चाह का मैं थोड़ा सा ओवरव्यू उसमें दे देता हूं। एक एक मिनट

1741
01:57:56,800 --> 01:58:01,120
जैसे वो जो मौलिक चाह है सच्चिदानंद की मौलिक चाह उसका प्रकटीकरण

1742
01:58:01,120 --> 01:58:05,360
इसमें हो गया। वैसे ही उस मौलिक चा का जो मौलिक निवारण है

1743
01:58:05,360 --> 01:58:09,600
सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर उसका प्रकटीकरण इसमें हो गया

1744
01:58:09,600 --> 01:58:14,000
व्यवहार क्या हो गया क्या हो गया जैसे अवतार

1745
01:58:14,000 --> 01:58:18,560
लेना जैसे मौलिक जैसे हमारे जैसे प्रकटीकरण

1746
01:58:18,560 --> 01:58:22,560
से हमारी उस तर्क से तो आप सर्वशक्तिमान की सिद्धि करें अवतार बीच में कहां से

1747
01:58:22,560 --> 01:58:24,880
आ गया

1748
01:58:24,880 --> 01:58:28,960
सर्वशक्तिमान है सब कुछ कर सकने वाला ये आ गया तो ना

1749
01:58:28,960 --> 01:58:33,600
जब वो पहले सिद्ध हो जाएगा तब तो उसे अवतार पे आएंगे आएंगे ना

1750
01:58:33,600 --> 01:58:37,680
अभी तो आप अवतार पे बात अभी तो सर्वशक्तिमान पे बात कर रहे हैं तो अब अवतार पे चले सर्वशक्तिमान

1751
01:58:37,680 --> 01:58:41,440
इसीलिए तो नहीं सिद्ध होता है कि तुम अवतार पे बाधित कर देते हो उसे नहीं

1752
01:58:41,440 --> 01:58:45,600
तो इसमें अब दोष बताता हूं इसमें क्या है सर्वशक्तिमान नहीं सिद्ध हो रहा तो अवतार नहीं

1753
01:58:45,600 --> 01:58:49,760
सिद्ध हो रहा और अवतार से ही आप सर्वशक्तिमान सिद्ध कर रहे हो तो लीजिए आत्मा आश्रय दोष अवत अवतार

1754
01:58:49,760 --> 01:58:53,840
से सिद्ध कर रहे हैं अवतार से सर्वशक्तिमान सिद्ध कर रहे हैं और सर्वशक्तिमान से

1755
01:58:53,840 --> 01:58:58,000
अवतार सिद्ध कर रहे हैं नहीं तुम सर्वशक्तिमान पे ब्रेक लगा रहे हो ना कि अवतार नहीं

1756
01:58:58,000 --> 01:59:02,000
ले सकता सर्वशक्तिमान की पहले तो ये बात आती है कि

1757
01:59:02,000 --> 01:59:06,160
आप सर्वशक्तिमान सिद्ध करिए। पहले तो ये बात आती है ना और

1758
01:59:06,160 --> 01:59:10,400
अगर आप सर्वशक्तिमान के अवतार है सुनिए तो अगर आप सर्वशक्तिमान

1759
01:59:10,400 --> 01:59:14,800
के कांटेक्ट में अवतार का उदाहरण देंगे तो अवतार तो सिद्ध नहीं क्योंकि अवतार के सिद्ध करने के लिए हेतु ही सर्वशक्तिमान

1760
01:59:14,800 --> 01:59:18,960
है तो वो तो साध्य कोटि हो गई। साध कोटि की वस्तु आप सिद्ध कोटि में कैसे दे देंगे? ये पॉइंट आएगा।

1761
01:59:18,960 --> 01:59:21,360
मैं ये नहीं कह रहा। मैं ये कह रहा हूं। खैर

1762
01:59:21,360 --> 01:59:25,520
इसमें इसमें लंबी चर्चा आ जाएगी। मैं इसमें ओवरव्यू दे रहा हूं मैं कि एक तो

1763
01:59:25,520 --> 01:59:29,840
ये हमारा इसमें था जो मैंने अभी बोला ना परंपरा वाला तो परंपरा

1764
01:59:29,840 --> 01:59:33,920
वाले में जो आप वशिष्ठ जी की लंबी आयु कह रहे थे। चलिए ठीक है। अगर मैंने उसको मैंने उसमें बोला

1765
01:59:33,920 --> 01:59:37,920
भी था कि दुर्जन तोष ने ऐसे अगर मैं मान लेता हूं कि वो जो परंपरा है वो

1766
01:59:37,920 --> 01:59:41,920
ठीक चली आ रही है। ठीक है? और जो शास्त्र है वो सारे उसी परंपरा से चले हैं

1767
01:59:41,920 --> 01:59:46,720
और बाद में वो परंपराएं की बहुत सारी शाखाएं बनती चली गई। विश्व द्वैत इत्यादि इत्यादि

1768
01:59:46,720 --> 01:59:50,880
और सारे शास्त्र अलग-अलग पंडितों के माध्यम से हमें मिले हैं। ठीक है? अब इसमें

1769
01:59:50,880 --> 01:59:55,280
बात ये आ जाती है कि लेकिन फिर ये आता है कि आपने हमसे परंपरा पूछी क्यों?

1770
01:59:55,280 --> 01:59:59,360
तो जो मैं कारण समझ में आया आप मुझे करेक्ट कर दिए। मैं गलत हूं।

1771
01:59:59,360 --> 02:00:03,520
तो तो मैं जो कारण समझ पाया वो ये था कि आपका मूल चीज ये था कि भैया जितने

1772
02:00:03,520 --> 02:00:07,520
भी शास्त्र हैं वो सारे परत प्रमाण है। वेद जो है वो स्वतः प्रमाण है। तो

1773
02:00:07,520 --> 02:00:11,600
वेद का जो अर्थ होगा उसी हिसाब से बाकी सारे शास्त्रों के अर्थ मानने पड़ेंगे उसे क्योंकि

1774
02:00:11,600 --> 02:00:15,680
वेद के विरुद्ध नहीं हो सकते। तो अर्थ जो आएगा वो परंपरा

1775
02:00:15,680 --> 02:00:19,760
से ही मानना पड़ेगा। और जो हमने जो है वो अर्थ वेदों का अलग कर रखा है। आपने अलग

1776
02:00:19,760 --> 02:00:24,000
कर रखा है। तो आप कह रहे हो कि भैया आपने अलग कैसे कर दिया? ये परंपरा के विरुद्ध होने से अमान्य है।

1777
02:00:24,000 --> 02:00:28,240
यही यही मोटा-मोटा पॉइंट है। हां। हां। अब इसमें पॉइंट ये है।

1778
02:00:28,240 --> 02:00:32,240
समझने वाला जो पॉइंट है कि जब आप कह रहे हैं कि परंपरा से अर्थ आए हैं तो क्या आप ये कह रहे हैं

1779
02:00:32,240 --> 02:00:36,240
कि ईश्वर ने जो वेद दिए थे उसी समय ईश्वर ने वेद का अर्थ भी जनाया था और वो अर्थ

1780
02:00:36,240 --> 02:00:36,740
परंपरा

1781
02:00:36,560 --> 02:00:40,720
से चले आ रहे हैं आज तक क्या आप ये मानते हैं बिल्कुल हां तो मेरे पास इसका विरोध मैं प्रमाण

1782
02:00:40,720 --> 02:00:46,720
में दे देता हूं बता दो इसका आप खोलिए निरुक्त 120

1783
02:00:47,280 --> 02:00:51,520
निरुक्त 120 में लिखा हुआ है कि जो परंपरा

1784
02:00:51,520 --> 02:00:55,920
से जो समाधि अवस्था में जो ऋषियों को अर्थ जाने थे ना वेदार्थ हम

1785
02:00:55,920 --> 02:00:59,920
वो लोग लोगों को देते लेकिन लोगों की जो स्मृतियां है वो शीड होने लग

1786
02:00:59,920 --> 02:01:03,920
गई। तो फिर वो अर्थ जो है वो भूलने लग गए। हम फिर ऋषियों

1787
02:01:03,920 --> 02:01:08,000
ने वेदांगों की रचना की हम और वेदांगों में निरुक्त निघंटू और

1788
02:01:08,000 --> 02:01:12,080
ये व्याकरण आदि जो है वेदांग इनकी उन्होंने रचना की और यानी जो फिर

1789
02:01:12,080 --> 02:01:16,080
ये हुआ कि अब जो वेदों का अर्थ होगा वो वेदांगों के आधार पे होगा।

1790
02:01:16,080 --> 02:01:20,240
वेदांगों के आधार पे होगा। मगर वो आधार भी तो उन्होंने ही दिया।

1791
02:01:20,240 --> 02:01:24,320
वो वो हमारे शब्द प्रमाण के विरुद्ध थोड़ी ना जाएगा। नहीं उसमें

1792
02:01:24,320 --> 02:01:28,320
आप समझिए इसमें पॉइंट क्या आता है? हम हम हम जो अर्थ देते हैं उसमें वेदांगों का

1793
02:01:28,320 --> 02:01:32,480
विरोध थोड़ी ना है और दूसरी सुनो तो सुनो

1794
02:01:32,480 --> 02:01:36,560
सुनो सुनो सुनो दिक्कत क्या है दिक्कत ये है कि अगर आप यह

1795
02:01:36,560 --> 02:01:40,720
मानते हो कि आपका वेदांगों के अकॉर्डिंगली है उनका नहीं है तो

1796
02:01:40,720 --> 02:01:44,880
फिर आपको ये मानना पड़ेगा कि ये लोग जो है ये आपसे झूठे आपको झूठ बोल

1797
02:01:44,880 --> 02:01:48,960
रहे हैं। कैसा झूठ मन जो ये कि हम जो

1798
02:01:48,960 --> 02:01:51,760
ये कह रहे हैं कि नहीं हमारा वेदांगों के साथ है। नहीं

1799
02:01:51,760 --> 02:01:55,760
हमारा अर्थ वेदांग से ही है। तो आपको उन्हें झूठा सिद्ध करना झूठा

1800
02:01:55,760 --> 02:01:59,840
मानना पड़ेगा। तो जब आप उनको झूठा मान लोगे तो आप उनसे द्वारा मिलने

1801
02:01:59,840 --> 02:02:03,920
वाले मंत्रों को आप प्रमाणिक नहीं मान सकते। ये वही मंत्र है जो हम

1802
02:02:03,920 --> 02:02:08,400
ईश्वर से लेके आए हैं। नहीं क्योंकि जरूरी नहीं है ना

1803
02:02:08,400 --> 02:02:12,720
जरूरी इसलिए नहीं है। इसलिए नहीं है मैं आपको बताता हूं। क्योंकि देखिए क्या है

1804
02:02:12,720 --> 02:02:16,800
वेद जो चले आ रहे हैं वो तो हम मंत्रों को रटते आ रहे हैं। ठीक है? अब

1805
02:02:16,800 --> 02:02:20,880
ऐसा हो रहा है कि मतलब वो तो परंपरा से चला आ रहा है। जो वेद

1806
02:02:20,880 --> 02:02:25,200
चला आ रहा है वो पर लेकिन जो वेदार है वो परंपरा से नहीं। वेदार्थ नष्ट हो चुका है परंपरा से।

1807
02:02:25,200 --> 02:02:29,360
तो वेदार्थ करने के लिए जो रीति बताई गई है वो कही है वेदांग आप पढ़ो। परंपरा

1808
02:02:29,360 --> 02:02:34,240
से शास्त्र चले आ रहे हैं। वेदांग जो शास्त्र है वो परंपरा से चले आ रहे हैं।

1809
02:02:34,240 --> 02:02:38,480
और उन शास्त्रों को जो है हम वो पढ़ेंगे परंपरा से और फिर उन शास्त्रों

1810
02:02:38,480 --> 02:02:42,560
के द्वारा वेदांगों का मतलब वेदों का अर्थ करेंगे। हम मान लीजिए मैं

1811
02:02:42,560 --> 02:02:46,640
पूरा बोल देता हूं। मैं थोड़ा सा पूरा बोल देता हूं। मुझे पैर निकलना

1812
02:02:46,640 --> 02:02:50,800
भी है। जी जी अब उसमें 10 पंडित है। 10 पंडितों ने वेदांग पढ़े हैं और वेदांग

1813
02:02:50,800 --> 02:02:54,880
पढ़ पढ़ के अपने अपने वेदांगों के ज्ञान से अपना जो है उन्होंने अर्थ किए हैं। अब

1814
02:02:54,880 --> 02:02:59,120
उसमें से हमें देखना पड़ेगा ना कि किसका जो है वेदांग की अब उसमें विरोधाभास आ रहा है तो हम तो चेक करेंगे

1815
02:02:59,120 --> 02:03:03,200
भैया किसका सही है किसने क्या गलती क्योंकि मनुष्य मनुष्य गलती कर सकता है। है ना? तो उसमें

1816
02:03:03,200 --> 02:03:06,880
किसी ने ऐसा तो नहीं किसी व्याकरण के नियम में उसने फलाना गलती कर दी, फलाना गलती कर दी।

1817
02:03:06,880 --> 02:03:11,440
इत्यादि को चेक करना पड़ता है। अंतत ये जो है ये बात इसी पर आ जाएगी

1818
02:03:11,440 --> 02:03:15,600
कि इस आर्य समाज का जो भाषा है वो स्वामी दयानंद जी का जो भाषा है वो वेदांगों के अनुकूल

1819
02:03:15,600 --> 02:03:19,680
है या शणाचार्य जी का जो भाषा वेदांगों के अनुकूल है वो इसी और इसकी जो जांच है वो

1820
02:03:19,680 --> 02:03:23,840
व्याकरण के एक्सपर्ट है वो कर पाएंगे। ठीक है। अब यह बात हो गई तुम्हारी।

1821
02:03:23,840 --> 02:03:27,920
पहली बात इसमें यह वाला वो है कमी कि वहां पर जो

1822
02:03:27,920 --> 02:03:31,920
बात हो रही है वो इस केस में हो रही है कि स्मृति क्षी हो रही है। इसलिए ये वाला सहारा भी

1823
02:03:31,920 --> 02:03:36,080
रख लो। है ना? मगर मगर सहारा थोड़ी है। सुनो तो

1824
02:03:36,080 --> 02:03:40,240
मेरी बात सुनो। मगर यह नहीं है कि अगर किसी को याद है तो उसका विरोध

1825
02:03:40,240 --> 02:03:44,320
भी विरोध ही करो। याद कहां है? याद तो है नहीं ना। परंपरा से वो तो खत्म

1826
02:03:44,320 --> 02:03:48,320
हो चुका है। नहीं खत्म। उन्होंने यह कहा था खत्म हो चुका है या स्मृति क्षीण हो रही कहा था।

1827
02:03:48,320 --> 02:03:52,400
स्मृतिश होने से जो अर्थ था वो लुप्त हो गया। लुप्त

1828
02:03:52,400 --> 02:03:56,400
रचना की खत्म हो गया। आप पढ़िए ना तो खत्म हो गया तो

1829
02:03:56,400 --> 02:04:00,400
रचना कैसे कर दी? उसको उसको सिद्ध करने के लिए वैसे ईश्वर को

1830
02:04:00,400 --> 02:04:04,560
आना पड़ेगा। अर्थ देने की मैं बता दे रहा हूं ना जब हुआ ये कि जब अर्थ

1831
02:04:04,560 --> 02:04:08,640
लोग स्मृति शीड होने लग गई। ठीक है? लुप्त का मतलब वहां मानना पड़ेगा

1832
02:04:08,640 --> 02:04:12,640
कि प्राय लुप्त हो चला। अगर पूरा लुप्त मान लेंगे तो दोबारा भगवान

1833
02:04:12,640 --> 02:04:16,640
को आना पड़ेगा देने के लिए ना। क्योंकि हम अपने से तो अर्थ ज्ञान ले नहीं

1834
02:04:16,640 --> 02:04:20,640
सकते हैं उसका। नहीं उसमें यह हुआ ना कि जो समाधिष्ट

1835
02:04:20,640 --> 02:04:22,160
योगी थे उन्होंने तो

1836
02:04:22,160 --> 02:04:26,320
यानी समाधिष्ट योगी कुछ लोगों को मैं पूरा मैं समझ गया मैं समझ गया यानी

1837
02:04:26,320 --> 02:04:30,480
समाधि नहीं समझे मैं पूरा बोलना चाहता हूं मेरे को मैं चाहता हूं मैं बोलूं बताओ बताओ बताओ

1838
02:04:30,480 --> 02:04:34,480
अब उसमें बात ये है ना कि अब समाधिष्ट योगी थे अब जब अब ऐसा तो नहीं कि एक ही सेकंड

1839
02:04:34,480 --> 02:04:38,800
में पूरा वाइप आउट हो गया था थनोस की तरह वो तो हुआ नहीं वही मैं कह रहा हूं मैं अब जब उसमें लुप्त होना

1840
02:04:38,800 --> 02:04:42,800
जब लुप्त होना चालू हो रहा है ठीक है तो ऋषियों को समझ में आया कि भैया इनकी मेमोरी जो

1841
02:04:42,800 --> 02:04:47,040
है उतनी तगड़ी है नहीं ये लोग वेद भी याद करे फिर सारा अर्थ भी याद करे इंतजाम

1842
02:04:47,040 --> 02:04:51,200
कर उन्होंने क्या उन्होंने क्या किया? वेदांगों की रचना की। ठीक है? ऋषियों ने

1843
02:04:51,200 --> 02:04:55,360
समाधिस्थ जो ऋषि थे उन्होंने वेदांगों की रचना की। अब ये हो गया कि भैया अब आपको मंत्र

1844
02:04:55,360 --> 02:04:59,520
याद करने की जरूरत नहीं है। अब आप वेदांग पढ़ो। वेदांग से अर्थ करो। नहीं ये उन्होंने

1845
02:04:59,520 --> 02:05:03,600
ये नहीं कहा कि जो है परंपरा से नहीं होगा। क्योंकि उन्होंने अपने भाष्य में कई जगह

1846
02:05:03,600 --> 02:05:07,680
परंपरा से शास्त्र आ रहे हैं। उन्होंने उन्होंने जो उन्होंने

1847
02:05:07,680 --> 02:05:11,760
जो क्या कहते उन्होंने ये माना है कि परंपरा से जो है शुति परंपरा से ही वो

1848
02:05:11,760 --> 02:05:16,080
वेदार्थ निकाला जाएगा। ये भी माना उन्होंने। परंपरा क्या मैं निरुक्त मैं निरुक्त

1849
02:05:16,080 --> 02:05:21,040
से निकाल के दे दूंगा? हां मुझे आप बताइए। मैंने आपको बताया एक में आप चेक करेंगे।

1850
02:05:21,040 --> 02:05:25,120
श्रुति का सुनो श्रुति का मतलब ही होता है। श्रुति का मतलब ही है कि

1851
02:05:25,120 --> 02:05:29,360
हम जो है श्रुति से कर रहे हैं। अगर ज्ञान का ज्ञान निकाल रहे हैं तो श्रुति

1852
02:05:29,360 --> 02:05:33,440
का मतलब ही है कि परंपरा। नहीं तो श्रुति का मतलब ये लिखा हुआ है ना कि जो श्रुति से

1853
02:05:33,440 --> 02:05:37,840
जो वेदार्थ चले आ रहे थे वो नो नो नो नो नो नो नो नो नो नष्ट हो गए और वेदांग से अर्थ होता है। नष्ट हो गए।

1854
02:05:37,840 --> 02:05:41,920
ये लिखा उन्होंने नष्ट हो गए। अरे आप आप पढ़िए वो भाव उसी में पता चल जाएगा आपको

1855
02:05:41,920 --> 02:05:46,000
क्या है क्या नहीं है उसमें मैं मैं कह तो रहा हूं कि मेरे बोलने पे मत सुनिए आप खुद ही चेक कर लीजिए ना क्या लिखा

1856
02:05:46,000 --> 02:05:50,080
है अगर आपको उसमें विशेष उसमें जानकारी इसमें परंपरा की बात भी कई जगह हुई है

1857
02:05:50,080 --> 02:05:54,160
निरुक्त में ही मैंने खुद कहा निरुक्त में जो भी परंपरा की बात हुई वेदार्थ की परंपरा की बात हुई है और

1858
02:05:54,160 --> 02:05:58,560
वेदार्थ में मैं कह रहा हूं निरुक्त में जो एक 20 देखो अगर

1859
02:05:58,560 --> 02:06:02,640
अगर हम कुछ भी करके जो हमें मंत्र दे रहे हैं उनको झूठा

1860
02:06:02,640 --> 02:06:06,640
सिद्ध करेंगे कि भैया यह जो है हमको गलत ज्ञान दे रहे हैं

1861
02:06:06,640 --> 02:06:10,800
तो हमें उनकी क्रेडिबिलिटी पर उंगली उठनी उठ उठ ानी पड़ेगी। नहीं तो

1862
02:06:10,800 --> 02:06:14,880
जो मंत्र दे रहे हैं उनप थोड़ी मैं कुछ कह रहा हूं। जिन्होंने मैं तो उस तो मंत्र फिर

1863
02:06:14,880 --> 02:06:18,880
हमें मंत्र पर विश्वास क्यों? देखिए जो आपसे गलत बात बोल रहा है जो अर्थ

1864
02:06:18,880 --> 02:06:22,880
बोल रहा है गलत। ठीक है? तो मैं शारणाचार्य से मंत्र थोड़ी ले रहा हूं। आप कहीं से

1865
02:06:22,880 --> 02:06:26,880
भी ले आपको फिर अपनी परंपरा बतानी पड़ेगी जहां से आप ले रहे हो। वो आपकी है नहीं।

1866
02:06:26,880 --> 02:06:31,200
जैसे समझिए इस चीज को। जैसे जैसे मान लिया मैंने कोई कोई भी दूसरे आचार्य हैं जो परंपरा

1867
02:06:31,200 --> 02:06:35,280
से रूप से अपना उसे आप उसके विरुद्ध नहीं जा सकते

1868
02:06:35,280 --> 02:06:39,360
अर्थ में। अरे तो उसमें बात ये है ना बात क्या है? बात यह है कि

1869
02:06:39,360 --> 02:06:43,680
परंपरा से तो हमें मंत्र मिल रहे हैं। अरे वही उन्हीं मंत्रों की क्रेडिबिलिटी

1870
02:06:43,680 --> 02:06:47,760
की बात कर रहा हूं ना जो व्यक्ति द्वेषी हो सकता है। जब एक मिनट तुम इसमें वो

1871
02:06:47,760 --> 02:06:51,760
बताओ कहां का छपा हुआ है तुम्हारा निरुक्त? कहीं से भी ले लीजिए आप एक

1872
02:06:51,760 --> 02:06:52,880
बी चेक कर लीजिए। कोई सा

1873
02:06:52,880 --> 02:06:56,960
भी खोल लीजिए। किसी के भाषा उठा लीजिए। नहीं वो पेज नंबर बता

1874
02:06:56,960 --> 02:07:00,960
देते तो जल्दी हो जाता। नहीं मेरे पास जो आपके

1875
02:07:00,960 --> 02:07:05,040
पापा में है ना आपके पास में किसका? प्रथम पाद में है।

1876
02:07:05,040 --> 02:07:08,720
हां प्रथम

1877
02:07:08,720 --> 02:07:12,800
1 20 देख कीजिए। अब बात यह आ जाती है कि मंत्र जो हमने

1878
02:07:12,800 --> 02:07:16,880
लिए वो तो परंपरा से लिए हैं। जो अर्थ है वो परंपरा से थोड़ी है। अगर अर्थ परंपरा से होते

1879
02:07:16,880 --> 02:07:21,280
तो मानना पड़ता। परंपरा प्राप्त अर्थ को नकारते तो फिर वेद मंत्र को नकारने की बात आती।

1880
02:07:21,280 --> 02:07:25,440
अभी जो शयनाचार्य का अर्थ है वो फिर परंपरा से थोड़ी वेदांग के आधार पे। उसमें त्रुटियां है इसे नकार।

1881
02:07:25,440 --> 02:07:31,440
एक मिनट 1 मिनट।

1882
02:07:35,280 --> 02:07:39,440
इसमें तो 20वां है ही नहीं। अरे द्वितीय पाद

1883
02:07:39,440 --> 02:07:44,800
एक मिनट द्वितीय पाद

1884
02:07:44,800 --> 02:07:48,800
इसको कह रहेगे द्वितीय पाद में प्रथम अध्याय अध्याय

1885
02:07:48,800 --> 02:07:53,280
में अध्याय का 20वा है। निपात लक्षणम तो नहीं है। निपात

1886
02:07:53,280 --> 02:07:57,280
लक्षणम नहीं है। उसका दूसरा वचन होगा उसका। नाम क्या है? जैसे 20वें

1887
02:07:57,280 --> 02:08:03,280
में बहुत सारे वचन है ना उसमें दूसरा वचन होगा।

1888
02:08:05,280 --> 02:08:11,280
यही है। एक मिनट

1889
02:08:20,560 --> 02:08:24,640
इसमें तुम्हारी वाली बात नहीं है। तुम ऐसा करो मुझे फोटो खींच के भेज

1890
02:08:24,640 --> 02:08:28,640
दो। अरे आप जो जो आप पढ़ रहे हैं ना उसी के थोड़ा सा और नीचे जाइए नीचे

1891
02:08:28,640 --> 02:08:34,640
पेज पर और वहां पर दूसरा वचन आपको संस्कृत में दिखेगा उसकी हिंदी पढ़िए।

1892
02:08:35,440 --> 02:08:39,440
एक अध्याय में केवल एक ही वचन थोड़ी है। एक पाद में एक ही वचन थोड़ी वेदकालीन समाज

1893
02:08:39,440 --> 02:08:43,600
में वैदिक संस्कृति ऋषियों द्वारा देवताओं के लिए प्रयुक्त होती

1894
02:08:43,600 --> 02:08:47,920
थी। देवता विषयक ऋषियों द्वारा दृष्ट वैदिक

1895
02:08:47,920 --> 02:08:52,400
मंत्र इसी भाषा में निबद्ध हैं। इन मंत्रों के अध्ययन के लिए आगे-आगे

1896
02:08:52,400 --> 02:08:56,560
आचार्य इन मंत्रों का उच्चारण करता था तथा उनके पीछे-पीछे

1897
02:08:56,560 --> 02:09:00,560
अध्ययता उच्चारण करते हुए अध्ययन करता था। इसके

1898
02:09:00,560 --> 02:09:04,560
पीछे पीछे उच्चारण करके अध्ययन करने के कारण वेद मंत्रों

1899
02:09:04,560 --> 02:09:09,600
को अनुवाध्याय

1900
02:09:09,600 --> 02:09:13,760
अनु पीछे पीछे उच्चारण करके अध्याय पाठ होने वाला कहा गया

1901
02:09:13,760 --> 02:09:17,920
है। उस समय लौकिक संस्कृत जो परवर्ती

1902
02:09:17,920 --> 02:09:22,160
काल में पाणिनीकृत अष्टाध्याय

1903
02:09:22,160 --> 02:09:26,320
के विधानों द्वारा व्याकरण के नियमों से नियमित और परिनिष्ठित कर

1904
02:09:26,320 --> 02:09:30,400
दी गई। वह लोक में प्रचलित थी। इसी लोक में प्रयुक्त

1905
02:09:30,400 --> 02:09:34,480
भाषा को यहां भाषा शब्द से अभी अभिहित किया गया

1906
02:09:34,480 --> 02:09:38,800
है। उपमा अर्थ में इव का लौकिक

1907
02:09:38,800 --> 02:09:43,120
भाषा और वैदिक भाषा दोनों में प्रयोग होता है। यहां यास्क

1908
02:09:43,120 --> 02:09:47,120
ने उदाहरण के लिए केवल वैदिक मंत्रों का ही उदाहरण इसलिए दिया है क्योंकि

1909
02:09:47,120 --> 02:09:51,440
निरुक्त में निघंटू की व्याख्या करने की प्रतिज्ञा के प्रारंभ

1910
02:09:51,440 --> 02:09:55,440
में ही अह

1911
02:09:55,440 --> 02:09:58,160
सामामनाय

1912
02:09:58,160 --> 02:10:02,560
के द्वारा कह दिया गया है।

1913
02:10:02,560 --> 02:10:06,560
भाषा में लोग भाषा में निषेध अर्थ वाला यहां नहीं है वो वाली बात बहुत लंबा हो रहा

1914
02:10:06,560 --> 02:10:10,560
है। अरे आप मुझे फोटो लीजिए वो 20वा ठीक है कोई कोई नहीं

1915
02:10:10,560 --> 02:10:14,640
तुम अपनी फोटो भेज देना मुझे इसमें इसमें दोनों चीजें हैं और

1916
02:10:14,640 --> 02:10:18,800
इसमें सवाल यह भी आएगा ना कि अगर आप यास्क का प्रमाण हमको दे भी रहे हो

1917
02:10:18,800 --> 02:10:22,880
फिर हम ये पूछेंगे यास्क का वो कहां से आया क्या परंपरा तो

1918
02:10:22,880 --> 02:10:27,360
बतानी पड़ेगी ना मैं कह तो रहा हूं कि मान लो आप ही के आप ही के थ्रू आया। हां

1919
02:10:27,360 --> 02:10:31,360
अगर आप यह भी मान लो कि आप ही के थ्रू आया तो भी आपको ये मानना पड़ेगा कि वेद के जो

1920
02:10:31,360 --> 02:10:35,440
मंत्रार्थ जो ईश्वर ने दिए थे अभी वो नहीं है हमारे पास में। अभी जो वेद के मंत्रार्थ होते हैं वो उनका आधार

1921
02:10:35,440 --> 02:10:39,520
आपको वेदांगों को ही मानना पड़ेगा। नहीं वेदांगों को नहीं परंपरा से वेद

1922
02:10:39,520 --> 02:10:43,760
आए। परंपरा से वेद का अर्थ भी आया और वो जो वेद अर्थ

1923
02:10:43,760 --> 02:10:48,080
वो जो वेद अर्थ होगा वो अष्टाध्याय के अनुरूप भी होगा। व्याकरण

1924
02:10:48,080 --> 02:10:52,160
के अनुरूप भी होगा। ऐसा नहीं है कि विरुद्ध अगर वह विरुद्ध होगा तो तो

1925
02:10:52,160 --> 02:10:56,320
आपको यह मानना पड़ेगा कि ना हमारे पास वेद है ना वेदार्थ है। यही

1926
02:10:56,320 --> 02:11:00,320
सनातन ना पॉइंट ये कि जब शास्त्र ही खुद कह रहे हैं कि जब परंपरा से आने वाले

1927
02:11:00,320 --> 02:11:04,320
वेदार्थ नष्ट हो चुके तो आप जबरदस्ती अरे भैया शास्त्र उसमें परंपरा भी कह रहे हैं। श्रुति

1928
02:11:04,320 --> 02:11:08,800
श्रुति का श्रुति का मतलब ही श्रुति कितनी बार कहा होगा निरुक्त निरुक्त में बताओ यासकाचार्य

1929
02:11:08,800 --> 02:11:12,800
ने बताओ तो श्रुति जितनी बार कहा है वेदार्थ की परंपरा के लिए कहा है तो क्या वेदार्थ

1930
02:11:12,800 --> 02:11:13,300
की परंपरा

1931
02:11:13,280 --> 02:11:18,320
में ये निरक्तचार्य जो अर्थ किया जाता है

1932
02:11:18,320 --> 02:11:22,480
तो व्याकरण संप्रदाय बताया निरुक्त संप्रदाय बताया तो यास्काचार्य ने भी अरे देखो ये सब

1933
02:11:22,480 --> 02:11:26,560
चीजें तो तुमने अभी मुझे भेजी नहीं है भेज देना मैं देखूंगा जो तुम ये संप्रदाय

1934
02:11:26,560 --> 02:11:30,560
10 संप्रदाय वाली बात निरुक्त पढ़ा होगा तो आप तो खुद ही कह रहे हो ना उसमें है तो निरुक्त पढ़ी

1935
02:11:30,560 --> 02:11:34,960
तो उसमें सारी चीजें हैं फिर उसमें अलग से क्या ये वाली जो चीजें हैं कि उन्होंने 10 संप्रदाय

1936
02:11:34,960 --> 02:11:38,960
के नाम लिए हैं। वो मुझे बता देना। मगर मैं तुम्हें एक बात बता रहा हूं कि जहांजहां पे वो यह कहेंगे

1937
02:11:38,960 --> 02:11:43,200
कि धर्म और ब्रह्म की व्याख्या हम निरुक्त उससे करते हैं श्रुति से। तो श्रुति

1938
02:11:43,200 --> 02:11:47,280
का मतलब ही है कि हमने अपने गुरुजनों से जो सुना उससे करते हैं। श्रुति को

1939
02:11:47,280 --> 02:11:51,360
तो वेद कहा गया है ना। वेद हां तो वो वेद श्रुति वेद का अपने

1940
02:11:51,360 --> 02:11:55,600
आप में जो श्रुति नाम है उसका उसका मतलब ही परंपरा है। बिना परंपरा

1941
02:11:55,600 --> 02:11:59,600
के श्रुति का अस्तित्व क्या है? नहीं वेद तो मान रहे हैं ना परंपरा से। वेदार्थ तो ये

1942
02:11:59,600 --> 02:12:03,680
जोस्का कह रहे हैं कि व्यास का ये वेदा व्यासकाचार्य ये

1943
02:12:03,680 --> 02:12:07,680
नहीं कह रहे हैं कि जो परंपरा से जो ज्ञान विज्ञान है उसका विरोध में भी

1944
02:12:07,680 --> 02:12:11,760
तुम अपना खड़ा कर सकते हो ये जो मैं आधार दे रहा हूं उसके द्वारा नहीं हमने तो वेदांगों

1945
02:12:11,760 --> 02:12:16,000
के आधार पर खड़ा किया ना केवल वेदांग नहीं होगा ना उसमें श्रुति भी होगी वेदांग

1946
02:12:16,000 --> 02:12:20,000
भी होगा तब दोनों के समन्वय से होना चाहिए तो है और क्या है अरे श्रुति

1947
02:12:20,000 --> 02:12:24,080
परंपरा भाई परंपरा को आप ठुकरा नहीं सकते ना भैया श्रुति

1948
02:12:24,080 --> 02:12:28,160
मतलब परंपरा अपने आप में भी और मैं इसमें बता दूंगा कई जगह परंपरा के

1949
02:12:28,160 --> 02:12:28,660
उन्होंने

1950
02:12:28,400 --> 02:12:32,400
बोला होगा प्रत्यक्ष जितनी जगह परंपरा बोला है वेदार्थ की परंपरा बोला उसमें

1951
02:12:32,400 --> 02:12:36,480
निरुक्त परंपरा व्याकरण परंपरा है और बताइए ये भी दिखा

1952
02:12:36,480 --> 02:12:40,720
देंगे बात ये है कि तुम जहां पे तुम्हारी बात आ रही है तुम

1953
02:12:40,720 --> 02:12:44,800
यहां पे अब तर्क की बात ही नहीं छोड़ दे रहे हो बिल्कुल तुम मुझे शब्द प्रमाण से दबाने की

1954
02:12:44,800 --> 02:12:48,880
कोशिश कर रहे हो तर्क ये है कि सीधी बात है कि हमको शास्त्र देने

1955
02:12:48,880 --> 02:12:52,960
वाला कौन है हमारी परंपरा यदि वह झूठी हो सकती है

1956
02:12:52,960 --> 02:12:57,040
यदि उसकी क्रेडिबिलिटी पर बात आ सकती है तो वह हमको झूठे मंत्र भी दे सकती

1957
02:12:57,040 --> 02:13:01,200
है आसकाचार चार्य के नाम से झूठा शास्त्र भी दे सकती है। अगर तुम यह सिद्ध कर दोगे

1958
02:13:01,200 --> 02:13:05,200
कि यासकाचार्य के अनुसार शंकराचार्य जी फिट नहीं बैठ रहे। अगर तुम यह सिद्ध

1959
02:13:05,200 --> 02:13:09,360
कर दोगे कि यासकाचार्य के द्वारा दिए गए जो अष्टाध्याय सूत्र है व्याकरण

1960
02:13:09,360 --> 02:13:13,360
के सूत्र उसके उसके अनुसार जो हमारे पारंपरिक गुरु है वो सही सिद्ध नहीं हो

1961
02:13:13,360 --> 02:13:17,360
रहे तो आप यह सिद्ध करोगे कि वेदार्थ है ही नहीं कहीं वेद है

1962
02:13:17,360 --> 02:13:21,520
ही नहीं कहीं सब मनमाना है। सब कुछ मनमाना है। यह

1963
02:13:21,520 --> 02:13:25,520
सिद्ध करोगे। ठीक है। अब आपने एक पॉइंट बोला कि तर्क से सबसे पहले मैंने यही बोला

1964
02:13:25,520 --> 02:13:30,000
था कि मैं दुर्जन ऐसे मान लेता हूं कि शास्त्र आपकी परंपरा से आए। उन्हीं शास्त्रों के अंदर निरत्ताचार्य

1965
02:13:30,000 --> 02:13:34,000
बोल रहे हैं कि जो वेद तो परंपरा से चल रहे हैं। लेकिन जो वेदांत है उसकी परंपरा वो परंपरा से

1966
02:13:34,000 --> 02:13:38,160
आना भी तो मैं पूरा बोल देता हूं। आपने तो बोला ना मेरा तो सुनिए। तो आपने तो

1967
02:13:38,160 --> 02:13:42,160
उसी उसी शास्त्र में निरुक्तचार्य बोल रहे हैं कि जो मंत्र है वो तो परंपरा से चल

1968
02:13:42,160 --> 02:13:43,440
रहे हैं। लेकिन वेदार्थ जो है वो उसकी

1969
02:13:43,440 --> 02:13:47,520
परंपरा लुप्त होने के कारण बुद्धिश होने के कारण बुद्धिश होने के कारण वेदांगों की

1970
02:13:47,520 --> 02:13:51,600
ऋषियों ने रचना की। अब जो वेदांगों के जो वेद के जो अर्थ होंगे वेदांगों के आधार पे होंगे।

1971
02:13:51,600 --> 02:13:56,400
जिसका अर्थ वेदांगों के अनुकूल होगा उसका प्रमाण होगा। जिसका विरुद्ध होगा उसका अप्रमाण होगा।

1972
02:13:56,400 --> 02:14:00,400
सिंपल सी बात है ना इसमें कोई डिबेट का मुझे पहले तो यह फोटो भेजो फिर इसके

1973
02:14:00,400 --> 02:14:04,800
आगे हम बात करेंगे। दूसरी बात यह है कि उन्होंने इस स्थिति में कहा है कि वेदार्थ

1974
02:14:04,800 --> 02:14:08,880
का जो वो है वो क्षीण हो रहा है। उन्होंने माना है कि वेदार्थ लुप्त हो रहे हैं। हां

1975
02:14:08,880 --> 02:14:12,880
तो लुप्त हो रहे हैं। ये लुप्त हो गए। ये नहीं कह सकते क्योंकि उसके लिए फिर दोबारा भगवान

1976
02:14:12,880 --> 02:14:16,960
को आना पड़ेगा। नहीं तो नहीं तो तो उन्होंने यह नहीं कह दिया कि अगर कोई अगर

1977
02:14:16,960 --> 02:14:21,040
अगर सुनो अगर कोई यह कहेगा कि भाई मैं भूल गया हूं तो वहां पे

1978
02:14:21,040 --> 02:14:25,120
एक सिंगल पॉइंट एजेंडा आ जाएगा कि भैया यहां पर जो है आपके जो क्या

1979
02:14:25,120 --> 02:14:29,200
कहते हैं वेदांग है केवल उनके आधार पर कर सकते हो मगर जब कोई वहां खड़ा हुआ

1980
02:14:29,200 --> 02:14:33,200
कह रहा है कि नहीं मुझे याद है तो वहां पे ये वाली चीज फिर तो उसको उसका

1981
02:14:33,200 --> 02:14:37,200
विरोध नहीं कर सकते ना जैसे वो जो स्मृति क्षीण हो रही है प्रज्ञा शक्ति क्षीण

1982
02:14:37,200 --> 02:14:41,200
हो रही है उसकी वजह से हम भूले तो हम कह रहे हैं कि हम भूले ठीक है मगर हम जब कह रहे हैं

1983
02:14:41,200 --> 02:14:45,440
कि यह वाली चीज हमको याद है तो उसमें हमारा झूठ अगर आप हमें नकारते

1984
02:14:45,440 --> 02:14:49,520
हुए तो भी ठीक है तो इस केस में अब हमारे

1985
02:14:49,520 --> 02:14:53,520
पास में इतिहास प्रमाण है। इतिहास प्रमाण ये है हमारे पास में कि मतलब

1986
02:14:53,520 --> 02:14:57,600
शीण हुआ है। वेदार्थ जो है वो शीण हुए हैं। वेद आए हैं लेकिन वेदार्थ शीण हुए हैं। इसका हमारे

1987
02:14:57,600 --> 02:14:58,640
पास में प्रमाण है। अब

1988
02:14:58,640 --> 02:15:02,640
इस केस में मान लीजिए कि मैं दुर्जन ने ऐसे मान लेता हूं। वैसे तो प्रमाण कुछ है

1989
02:15:02,640 --> 02:15:06,720
नहीं। नहीं जीरो प्रमाण है। फिर भी मैं दुर्जन ऐसे मान लेता हूं। सुनिए तो दुर्जनोष ने ऐसे

1990
02:15:06,720 --> 02:15:10,800
मगर मैं मान लेता हूं कि जो वेदार्थ है वो किसी ना किसी आंस रूप में आज बचे हुए हैं। तो

1991
02:15:10,800 --> 02:15:14,800
भी उनका क्योंकि ये आपने बोला ना कि ईश्वर को दोबारा वेद देना पड़ेगा। वो

1992
02:15:14,800 --> 02:15:18,880
तब देना पड़ता जब ऋषियों ने इसकी व्यवस्था नहीं की होती वेदांगों के रूप में।

1993
02:15:18,880 --> 02:15:22,880
लेकिन वेदार्थ करने की व्यवस्था ऋषियों ने वेदांगों के रूप में कर रखी थी। इसीलिए दोबारा से वेदार्थ

1994
02:15:22,880 --> 02:15:27,200
देने की आवश्यकता नहीं। एक पॉइंट। दूसरा पॉइंट ये कि अगर मैं मान भी लेता हूं कि वेदार्थ

1995
02:15:27,200 --> 02:15:31,200
जो है वो किसी न किसी को याद भी होगा। वो कह रहे नहीं मेरे को तो परंपरा से वेदार्थ याद है भले ही खत्म हो

1996
02:15:31,200 --> 02:15:35,360
गया। कह रहे हो लेकिन मैं नहीं सुनता। मेरे को याद है तो भी उसका जो है वो

1997
02:15:35,360 --> 02:15:39,360
वेदांगों के विरुद्ध नहीं होना चाहिए। अगर वो वेदांगों के विरुद्ध दे बोलेगा कोई बात तो हम यही

1998
02:15:39,360 --> 02:15:43,440
मानेंगे कि भैया वो जो है उसकी बुद्धि क्षीण हो गई या उसकी अल्पशक्ति जो भी है क्षीण हो गई और वो व्यक्ति

1999
02:15:43,440 --> 02:15:47,440
गलत बोल रहा है क्योंकि वेदांगों को तो ऋषियों ने स्वीकार किया इसलिए वेदांगों के विरुद्ध नहीं हो सकता। हां उस व्यक्ति

2000
02:15:47,440 --> 02:15:51,840
पे दोष यहां पे एक कैची पॉइंट है। तुमने कहा कि उन्होंने व्यवस्था

2001
02:15:51,840 --> 02:15:55,920
कर दी थी। भगवान को आने की जरूरत नहीं है। यानी कि आपका मतलब है कि आपने

2002
02:15:55,920 --> 02:16:00,000
जो आपकी जो बुक्स हैं, हमारी जो बुक्स है, ग्रंथ है, अष्टाध्याय के

2003
02:16:00,000 --> 02:16:04,000
सूत्र हैं, पाणिनी है, अष्टाध्याय है या जो निरुक्त है, ये

2004
02:16:04,000 --> 02:16:08,080
सब हम एक बच्चे को पकड़ा देंगे और वो वेदार्थ कर लेगा। नहीं

2005
02:16:08,080 --> 02:16:13,520
मैंने कब बोला कि बच्चे को पढ़ा उसकी पूरी व्यवस्था है ना? कैसे पढ़ेंगे? हां। उस व्यवस्था

2006
02:16:13,520 --> 02:16:14,020
आ

2007
02:16:13,680 --> 02:16:18,080
जाएंगे। सुनिए बहुत सिंपल है। सबसे पहले शिक्षा पढ़ेंगे। शिक्षा के बाद अष्टाध्याय

2008
02:16:18,080 --> 02:16:22,560
के सूत्र याद करेंगे। प्रथमा पढ़ेंगे। भैया वो शिक्षा में कहीं ना कहीं उनकी प्रिपरेशन

2009
02:16:22,560 --> 02:16:26,640
में परंपरा प्राप्त ज्ञान आना पड़ेगा। परंपरा से शास्त्र ही तो पढ़ाएंगे और

2010
02:16:26,640 --> 02:16:31,920
क्या पढ़ाएंगे? अरे मैंने कहा कि जब भगवान को आना नहीं

2011
02:16:31,920 --> 02:16:36,000
जब उन्होंने ऐसी मतलब सबसे पहले सिखाते तो ख सिखाते

2012
02:16:36,000 --> 02:16:40,160
मतलब जाकिर नायक जाकिर नायक भी खड़ा हो के जो है वो बच्चों को प्रिपेयर

2013
02:16:40,160 --> 02:16:44,240
कर देगा कि भैया अष्टाध्याय के तुम सूत्र ले लो। तो कोई भी कर देगा।

2014
02:16:44,240 --> 02:16:48,240
बहुत सिंपल है ना? अगर मान लीजिए अष्टाधय से अष्टाध्याय के आधार पे कोई उसने बोलता है कि मैंने

2015
02:16:48,240 --> 02:16:52,320
जो भाषा की अष्टाध्याय के आधार पे है ठीक है तो अष्टाधय विशेषज्ञ चेक कर लेगा ना कि ये किध

2016
02:16:52,320 --> 02:16:56,320
अष्टाध्याय विशेषज्ञ है ना वहां पर इसका मतलब कहां पे

2017
02:16:56,320 --> 02:17:00,320
अष्टाध्याय विशेषज्ञ है ना वहां पर कहां पे इस

2018
02:17:00,320 --> 02:17:04,400
बात को तय करने के लिए कि हुआ है कि नहीं अष्टाध्याय से नहीं मैं पूछ रहा हूं कहां

2019
02:17:04,400 --> 02:17:08,400
पर तो कहां पर बताइए ना तुम कह रहे हो ना अष्टाध्याय विशेषज्ञ तय कर लेगा कि

2020
02:17:08,400 --> 02:17:12,560
वो अष्टाध्यायी से हुआ है कि नहीं हुआ है हां यही अष्टाध्याय हमारा शब्द

2021
02:17:12,560 --> 02:17:16,720
प्रमाण होगा यही विशेषज्ञ हमारा शब्द शब्द पुराण होगा हां तो यह

2022
02:17:16,720 --> 02:17:20,720
परंपरा प्राप्त होगा अष्टाध्याय विशेषज्ञ और उस उस

2023
02:17:20,720 --> 02:17:24,800
वो अष्टाध्याय विशेषज्ञ है कि नहीं उसको उसको कैसे माना जाए कि उसके पीछे

2024
02:17:24,800 --> 02:17:28,720
वाला वो विशेषज्ञ वो अष्टाध्याय विशेषज्ञ है कि नहीं उसको कैसे माना

2025
02:17:28,720 --> 02:17:32,960
जाए कि उसके पीछे वाला वो विशेषज्ञ वो वो तो चलिए बाद की बात है तो वो शब्द

2026
02:17:32,960 --> 02:17:37,040
तो वही मैं कह रहा हूं परंपरा तो आपने मान ली ना जब विशेषज्ञ के अधीन छोड़ दिया

2027
02:17:37,040 --> 02:17:41,440
नहीं छोड़ मैंने आपसे मैंने आपसे पहले मैंने आपसे पहले ही बोला ना कि दुर्जन

2028
02:17:41,440 --> 02:17:45,440
ने ऐसे मैं मान तो रहा हूं कि सारे शास्त्र आप की परंपरा से हम भी आपकी परंपरा से संबंधित है और हमें

2029
02:17:45,440 --> 02:17:49,600
सारे शास्त्र आदि की परंपरा से मिले। मैंने बोला तो शुरू में मैंने बोला तो मैं तो यह कह रहा हूं

2030
02:17:49,600 --> 02:17:53,920
कि किसी कारण से अगर हमें हमारे गुरुजनों का झूठ बोलना

2031
02:17:53,920 --> 02:17:58,320
हमारा लग रहा है। ये लग रहा है कि द्वेष वश या लालच वश या भयवश

2032
02:17:58,320 --> 02:18:02,320
झूठ बोल रहे हैं। सुनो उनके सामने हमने सिद्ध कर

2033
02:18:02,320 --> 02:18:06,320
दिया। सुनो तो उनके सामने हमने सिद्ध कर दिया। ये देखो अष्टाध्याय से

2034
02:18:06,320 --> 02:18:10,320
आपका मैच नहीं खा रहा है। फिर वो वो कह रहा है कि नहीं अष्टाध्यायी से मैच हमारा खा रहा

2035
02:18:10,320 --> 02:18:14,560
है। तो इसका मतलब वो लोग झूठे लोग हैं। उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता।

2036
02:18:14,560 --> 02:18:18,800
एक सूत भी नहीं किया जा सकता। और जब एक सूत गलत है। क्यों गलत है? अर्ध

2037
02:18:18,800 --> 02:18:22,800
कुकुट न्याय नहीं अर्ध कुकुट न्याय करोगे यहां? हां तो क्या दिक्कत है?

2038
02:18:22,800 --> 02:18:26,800
अर्ध कुकुट न्याय कर दोगे? किसी व्यक्ति की कोई एक बात गलत हो

2039
02:18:26,800 --> 02:18:30,880
तो सारी बात गलत हो जाती है क्या? अब बस बस अब इस पे मनन

2040
02:18:30,880 --> 02:18:35,120
करो अब तुम। और इसमें एक और शब्द वैसे इसका उत्तर देयर

2041
02:18:35,120 --> 02:18:39,280
है वो हमारा शब्द प्रमाण नहीं रहा। ये है पॉइंट

2042
02:18:39,280 --> 02:18:43,360
ये है कि वैसे मैं इसका उत्तर दे भी चुका हूं। इसका उत्तर मैंने आपको कम से कम पांच बार मैंने

2043
02:18:43,360 --> 02:18:43,860
रिपीट

2044
02:18:43,760 --> 02:18:47,840
किया कि ये बात तब बोला जा सकता है जब वेदार्थ परंपरा से आ रहा हो। है

2045
02:18:47,840 --> 02:18:51,920
ना? और अगर हम लेकिन परंपरा से नहीं आ रहा है। हमारा तो आ रहा है

2046
02:18:51,920 --> 02:18:56,000
वेदार्थ परंपरा से। तो जब सयास्काचार्य ने बोल दिया कि वेदार्थ की परंपरा नष्ट हो गई

2047
02:18:56,000 --> 02:19:01,760
तो कहां से आ रहा है? नष्ट नहीं हुई। वो प्रायः लुप्त हो रही है। इसमें लेना पड़ेगा।

2048
02:19:01,760 --> 02:19:05,840
लुप्त हो गई है अगर वह लुप्त ही हो जाएगी तो फिर लुप्त हो गई तो बिल्कुल कोई है

2049
02:19:05,840 --> 02:19:09,840
ही नहीं बताने वाला वहां ईश्वर को जाना पड़ जाएगा इसका मतलब और बात है कि शाखाएं भी

2050
02:19:09,840 --> 02:19:13,840
लुप्त हो चुकी है ये भी लीजिए तो शाखाएं लुप्त हो रही है मैं तो बोल रहा हूं लुप्त

2051
02:19:13,840 --> 02:19:17,920
हो रही है लुप्त होना और झूठ बोलने में अंतर है जहां लुप्त हो रही है वहां

2052
02:19:17,920 --> 02:19:21,920
सुनो जहां लुप्त हो रही है वहां बोला जा रहा है भैया हमारी स्मृति छीन हुई हम यह नहीं

2053
02:19:21,920 --> 02:19:26,080
बता पाएंगे इस विषय में मगर जिस विषय मगर जिस विषय में हम बता

2054
02:19:26,080 --> 02:19:30,240
रहे हैं उस विषय में हमें नकारा नहीं जा सकता है हमारी क्रेडिबिलिटी

2055
02:19:30,240 --> 02:19:34,480
नहीं आ सकता है। नहीं आपने तो यह स्वीकार किया ना कि जो हमारे आचार्यों का जो भाषा है वो वेदांगों

2056
02:19:34,480 --> 02:19:38,560
के अनुकूल है। आपने स्वीकार किया ना इस चीज को। हां माना कि नहीं और क्या है

2057
02:19:38,560 --> 02:19:42,640
ना? अब आप ही की परंपरा से मान लीजिए हमने वेदांग पढ़े। ठीक है? अब पढ़ के जब

2058
02:19:42,640 --> 02:19:46,720
हमने वेदांगों से अर्थ किया तो हम देखेंगे कि यार इसमें और जो एक 200 साल

2059
02:19:46,720 --> 02:19:50,800
पहले का आचार्य हुए थे शणाचार्य 400 साल पहले हुए थे मान लीजिए तो उनके भाष्य

2060
02:19:50,800 --> 02:19:54,960
से और इधर तो विरोधाभास आ रहा है। तो हम पूछेंगे ना कि ये विरोधाभास क्यों आ रहा है?

2061
02:19:54,960 --> 02:19:59,040
इसका उत्तर कौन? मेन मेन जो विरोधाभास आया है वो व्याकरण इत्यादि

2062
02:19:59,040 --> 02:20:03,040
विषयों में कम आया है वो ऐसे विषयों में ज्यादा आया है कि ईश्वर अवतार कैसे

2063
02:20:03,040 --> 02:20:07,120
ले सकता है यहां अलंकारिक व्याख्या ना ना ऐसी बात नहीं है

2064
02:20:07,120 --> 02:20:11,600
ऐसी ज्यादातर पलटा हुआ है मैं आपको समझाता हूं कैसे खेल पलटा समझाता हूं

2065
02:20:11,600 --> 02:20:15,760
सायनाचार्य ने बोला है इससे विषय बदल इससे विषय बदल जाएगा विषय नहीं बदलेगा

2066
02:20:15,760 --> 02:20:19,840
विषय यही है विषय यही है ये जो मैंने बात बोली है इसको अभी थोड़ी देर छोड़ दो

2067
02:20:19,840 --> 02:20:24,320
इससे क्योंकि मेरा विषय बदल सकता है मूल बात ये है

2068
02:20:24,320 --> 02:20:28,480
तो हो एक बार थोड़ा सा पूरा हो जाए। मैं थोड़ा सा बस दो लाइन ऐड करना चाहता हूं।

2069
02:20:28,480 --> 02:20:32,480
कि सायनाचार्य जी तो बोलते हैं कि नहीं वेद में तो कोई वेद तो केवल कर्मकांड

2070
02:20:32,480 --> 02:20:36,480
की पुस्तक है। वेद का प्रयोग तो केवल यज के लिए होना चाहिए। अब बताइए जब ऐसे

2071
02:20:36,480 --> 02:20:41,040
ही वो इस मानसिकता से वेद का अर्थ कर रहे हैं तो कैसे मान रहे हैं? मैं उन्हीं

2072
02:20:41,040 --> 02:20:45,280
के आचार उन्हीं के आचार परंपरा में उन्हीं के भाई आई क्यों लिख दे रहे पंचदशी

2073
02:20:45,280 --> 02:20:49,520
जहां ब्रह्म की व्याख्या हो रही है तब तात्विक विवेचन हो रहा है। अगर ऐसा

2074
02:20:49,520 --> 02:20:53,600
इसलिए वह तो इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि वेदांत की परंपरा आ रही है ना अद्वैत वेदांत की तो उन्होंने उस आधार

2075
02:20:53,600 --> 02:20:57,600
पर लिखा तो वेदांत को वेदांत को वेदांत के

2076
02:20:57,600 --> 02:21:01,760
रूप में नहीं कहते क्या वो वेदांत को अलग मानते हैं क्या उन्होंनेशन किया वेदांत

2077
02:21:01,760 --> 02:21:05,760
जो है वो तो वेदांत परतय प्रमाण है ना मैं ये नहीं कह रहा हूं मैं कह रहा

2078
02:21:05,760 --> 02:21:10,000
हूं क्या वो वेद प्रमाण वो वेद के बाहर मानते

2079
02:21:10,000 --> 02:21:14,160
हैं क्या वेदांत को परतय प्रमाण स्वत अरे भाई मैं बात

2080
02:21:14,160 --> 02:21:18,960
ये हो रही है क्या वो उसको वेद विरोधी मानते हैं क्या अरे

2081
02:21:18,960 --> 02:21:23,120
क्योंकि जिस वेदांत के आप कह रहे हैं ना उसके इंटरप्रिटेशन कई तरीके

2082
02:21:23,120 --> 02:21:27,120
से हो सकते हैं। तो कौन सा इंटरप्रिटेशन ठीक है इसके पूरा सुनिए पूरा सुनिए

2083
02:21:27,120 --> 02:21:31,120
पूरा सुनिए किसका जैसे उसका अद्वैत पर फर्क है विद्वत पर है

2084
02:21:31,120 --> 02:21:35,200
पर उसके जो इंटरप्रिटेशन है वो कौन सा सही है इसका इसीलिए वो क्या है वो प्रत्यय

2085
02:21:35,200 --> 02:21:39,440
प्रमाण है तो उसकी जो जांच होगी ठीक ठीक इंटरप्रिटेशन कौन सी वो वेदों के आधार पे होगी तो वेद ही स्वत

2086
02:21:39,440 --> 02:21:43,680
प्रमाण है वेदांत के आधार पे आप नहीं कर सकते

2087
02:21:43,680 --> 02:21:47,680
मैं ये नहीं कह रहा कि वेदांत के अरे क्या बात कर रहे हो तुम गलत जा रहे हो तुम

2088
02:21:47,680 --> 02:21:51,680
मैंने ये कहा कि वेदांत के आधार पर वेदार्थ कर रहे हैं मैंने यह

2089
02:21:51,680 --> 02:21:55,920
कहा कि अगर वो वेदार्थ सिर केवल कर्मकांड के लिए कर रहे थे। मतलब उसमें

2090
02:21:55,920 --> 02:21:59,920
तात्विक विवेचन देख ही नहीं रहे थे। तो जिन्होंने उन्हें आज्ञा दी थी यह करने

2091
02:21:59,920 --> 02:22:03,920
की जिन्होंने उनसे कहा था उन्हीं ने तो पंचदशी लिखा। हां तो

2092
02:22:03,920 --> 02:22:08,320
वो तो पॉइंट वही है ना कि उपनिषद में तो अगर वो अगर वो वेद

2093
02:22:08,320 --> 02:22:12,720
अपने आप को वैदिक नहीं मान रहे होते वेदों का आश्रय नहीं लिया होता तो काहे के लिए पंचदशी

2094
02:22:12,720 --> 02:22:16,800
लिखते। तो किसी की एक बात थोड़ी ना मानी जाती। उन्होंने तो लिखा नहीं। पहली बात

2095
02:22:16,800 --> 02:22:20,800
एक बात। दूसरी बात उन्होंने तो लिखा किसने लिखा है?

2096
02:22:20,800 --> 02:22:24,880
उनके भाई ने लिखा ना आपने बोला ना अभी तो भाई उसी ने तो आर्डर दिया था कि भैया वेदों

2097
02:22:24,880 --> 02:22:29,280
पर भाष्य कर दो तुम मेरे पास समय नहीं है पॉइंट इसके अंदर ये है कि

2098
02:22:29,280 --> 02:22:33,440
जैसे वो ये कह वो ये जो पंचदशी उन्होंने किया वो प्रस्था

2099
02:22:33,440 --> 02:22:39,280
के आधार पे किया अंदर तो उपनिषद आ रहा है ना मैं मैं ये नहीं कह रहा कि उन्होंने

2100
02:22:39,280 --> 02:22:44,880
मैं ये नहीं कह रहा हूं मैं यह कह रहा हूं कि वो वैदिक मानसिकता के थे कि नहीं

2101
02:22:44,880 --> 02:22:49,040
तुम मेरी बात समझ नहीं पाए तुमने एक आरोप लगाया कि उन्होंने वेदों

2102
02:22:49,040 --> 02:22:53,120
का आधार कर्मकांड माना है। उन्होंने खुद लिखा है। अरे

2103
02:22:53,120 --> 02:22:57,120
तो मैं तो किसी की केवल एक बात को लेकर के क्यों माना जाए

2104
02:22:57,120 --> 02:23:01,520
भाई उसको जो व्यापक दृष्टि है उससे देखोगे ना? अच्छा

2105
02:23:01,520 --> 02:23:05,760
नहीं वो जो सामने और सायन के भाष्य में जो ये विद्या की बातें हुई है उसपे

2106
02:23:05,760 --> 02:23:09,760
भाष्य किया तो है उन्होंने। तो वो तात्विक विवेचन हो गया। उन्होंने भले ही उसको

2107
02:23:09,760 --> 02:23:13,840
कर्मकांड कह दिया मगर उसमें तात्विक विवेचन तो कर रहे हैं सायन। अरे तात्विक विवेचन वो थोड़ी

2108
02:23:13,840 --> 02:23:17,840
कर रहे हैं। वो तो कर्मकांड के लिए बोल रहे हैं साफ-साफ। अरे भैया वहां विद्या की बात क्यों कर

2109
02:23:17,840 --> 02:23:20,400
रहे हैं फिर

2110
02:23:20,400 --> 02:23:24,800
पॉइंट अब जैसे विद्या को भी कैसे ले रहे हैं कर्मकांड विषय ले रहे हैं वो तो

2111
02:23:24,800 --> 02:23:29,360
ये तुम बताओगे कि अगर उन्होंने एक जगह लिख दिया उन्होंने कर्मकांड की

2112
02:23:29,360 --> 02:23:33,440
कर दी उन्होंने अपने वाक्य में जैसे कोई कोई अपने वेद भाष्य लिखता है तो वेद भाष्य की भूमिका

2113
02:23:33,440 --> 02:23:37,520
लिखता है उस भूमिका में बताता है कि मैंने वेदभाष्य कैसे कर रहा हूं क्या कर रहा हूं और सायन ने भी जैसे

2114
02:23:37,520 --> 02:23:41,920
स्वामी दयांद ने अपनी वेद भाष्य की भूमिका लिखी है वैसे सायरन ने भी लिखा हुआ है उसी भूमिका

2115
02:23:41,920 --> 02:23:44,480
उन्होंने उसमें कर्मकांड की प्राचुर्यता देखी तो लिख

2116
02:23:44,480 --> 02:23:48,560
दिया उसमें क्या इसका मतलब इसका वेद का

2117
02:23:48,560 --> 02:23:52,560
इसका अर्थ यह नहीं है इसका अर्थ ही नहीं इसका अर्थ यह नहीं है कि

2118
02:23:52,560 --> 02:23:56,640
उन्होंने उसमें तत्व ज्ञान नहीं देखा वेद में हां तो आप दिखा दो कि वेद में कहां तक तथ्य ज्ञान उन्होंने लिखा

2119
02:23:56,640 --> 02:24:00,640
अपनी भूमिका में मैं कह तो रहा हूं विद्या वाले पार्ट में उनको नहीं लिखना चाहिए था वहां

2120
02:24:00,640 --> 02:24:04,960
समझाना ही नहीं बहुत अच्छा समझा दिया उन्होंने भूमिका में बोल दिया ना कि जितने

2121
02:24:04,960 --> 02:24:08,960
अरे भूमिका में बोल दिया तो वो बाद वाला छोड़ दोगे जो उन्होंने यजुर्वेद के भाष्य में

2122
02:24:08,960 --> 02:24:13,680
लिखा है 40वें अध्याय में उसको हम समझेंगे ना कि कौन सी दृष्टिकोण से लिखा है जो दृष्टिकोण

2123
02:24:13,680 --> 02:24:17,680
दृष्टिकोण तो साफ पता लग रहा है वहां तत्व ज्ञान है। नहीं तो आप थोड़ी

2124
02:24:17,680 --> 02:24:21,760
डिसाइड करोगे क्या है क्या नहीं आप डिसाइड कैसे कर रहे हो जी क्या सोचते हैं

2125
02:24:21,760 --> 02:24:25,760
डिसाइड की बात से ही कोट करके कर रहा हूं ना अपने चलो ठीक है शनाचार्य

2126
02:24:25,760 --> 02:24:29,760
ने क्या कोट किया है तुम्हारे पास कैसे आया चलो इस पे आ जाओ ठीक अरे परंपरा

2127
02:24:29,760 --> 02:24:34,160
से ही मैं परंपरा से आया तो सुनो तो

2128
02:24:34,160 --> 02:24:38,160
सुनो अरे अभी अभी दुर्जन तोष न्याय से तुम वो वाली मान रहे हो ना वेदार्थ की परंपरा

2129
02:24:38,160 --> 02:24:42,160
अभी मैं शारणाचार्य की परंपरा की बात कर रहा हूं तो सायनाचार्य ने क्या

2130
02:24:42,160 --> 02:24:47,040
लिखा क्या माना क्या कहा ये तुम्हें कौन बता रहा है कौन दे रहा है छाप के बुक

2131
02:24:47,040 --> 02:24:51,040
यानी पॉइंट इसके अंदर क्या है कि मान लो अरे भैया मैं बोल रहा हूं मैंने आप ही के आचार्य से

2132
02:24:51,040 --> 02:24:55,280
पढ़ा तो भी तो मेरा जो आचार्य जो मैं मेरा आचार्य बता रहा है कि शारणाचार्य

2133
02:24:55,280 --> 02:24:59,360
ने ये लिखा और मेरा ही आचार्य बता रहा है कि शारणाचार्य उसमें तत्व ज्ञान भी देखते

2134
02:24:59,360 --> 02:24:59,860
थे

2135
02:24:59,600 --> 02:25:03,680
वेद में अच्छा दिखाओ आचार्य बता रहे हैं जरा ऐसा दिखाओ मेरे पूरी के शंकराचार्य

2136
02:25:03,680 --> 02:25:08,000
बता रहे हैं पूरी के शंकराचार्य बता रहे आपके दुनिया भर के आचार्य की वीडियो

2137
02:25:08,000 --> 02:25:12,080
शंकराचार्य की ओर से बोलने वाला प्रामाणिक कौन है मैं कि तुम और

2138
02:25:12,080 --> 02:25:16,160
बात ये है नहीं उसमें बात ये है कि अगर शंकराचार्य ने कोई बात गलत बोली तो शास्त्रों तो चेक होगा

2139
02:25:16,160 --> 02:25:20,320
कि नहीं हुआ? फिर वही बात आ गई। अभी बात क्या चल रही है? साणाचार्य क्या सोचते थे? क्या

2140
02:25:20,320 --> 02:25:24,640
नहीं सोचते थे? ये कौन बताएगा? तो जबरदस्ती इस पे ला रहे हो। बात तो सब चल रही है।

2141
02:25:24,640 --> 02:25:28,640
बात देखो अभी बात ये चल रही साचार्य तो उन्हें कर्मकांड नहीं मानते थे। तो तुम्हें इस

2142
02:25:28,640 --> 02:25:32,640
पे आ गया कि अगर तुम्हें उनका एक कोट मिल गया है। मुझे नहीं जरूरत है उनकी कोई किताब

2143
02:25:32,640 --> 02:25:37,360
लाने की मिल जाएगी तो दे भी दूंगा जिसमें उन्होंने तत्व ज्ञान की बात की हो वेद में। मगर

2144
02:25:37,360 --> 02:25:41,920
वो क्या सोचते थे, क्या नहीं सोचते थे? ऑथेंटिकली बताने वाला उनसे जो प्रामाणिक

2145
02:25:41,920 --> 02:25:46,080
रूप से जुड़ा हुआ व्यक्ति वही बताएगा ना। नहीं वो तो गलत भी तो बोल सकता है ना तो गलत

2146
02:25:46,080 --> 02:25:50,080
बोल सकता है तो वो तुम्हें छपी हुई किताब भी तो गलत बोल सकता है फिर तुम यह भी क्लेम मत करो कि उन्होंने यह

2147
02:25:50,080 --> 02:25:54,240
लिखा आप उसमें न्यूट्रल हो जाओ उन्होंने क्या लिखा क्या नहीं लिखा मुझे नहीं पता

2148
02:25:54,240 --> 02:25:58,320
यही मेरा कहना है कि जब तुम्हें वेद प्रमाण उनका डायरेक्ट जब हमें

2149
02:25:58,320 --> 02:26:02,400
उनका डायरेक्ट शब्द प्रमाण मिल रहा है तो किसी तीसरे किसने किसने दिया वो शब्द प्रमाण उनका डायरेक्ट

2150
02:26:02,400 --> 02:26:07,840
उन्होंने दिया मिल रहा है मैनुस्क्रिप्ट मिल रहा है मैनुस्क्रिप्ट उन्होंने दिया

2151
02:26:07,840 --> 02:26:12,160
मिल रहा है ना उन्होंने दिया नहीं तो वो वो यहां पे मेरे सामने थोड़ी है

2152
02:26:12,160 --> 02:26:14,640
अभी शंकराचार्य कोई बीच में कोई बीच

2153
02:26:14,640 --> 02:26:18,880
में विश्वास पात्र है ना जो ये बोल रहा है ये उनका मनुस्क्रिप्ट है

2154
02:26:18,880 --> 02:26:22,960
कोई बीच में है ना मध्यस्थ ये भी नहीं पता कि जो ईश्वर ने वेद दिए थे वही वेद दिए थे वही तो

2155
02:26:22,960 --> 02:26:26,960
मेरा कहना है कि जब उनके मंत्रों पर विश्वास सुनिए तो जैसा आपने बोला कि

2156
02:26:26,960 --> 02:26:31,280
शंकराचार्य बताएंगे कि शराणाचार्य ने क्या शंकराचार्य शराणाचार्य थोड़ी दूर क्यों

2157
02:26:31,280 --> 02:26:35,360
क्योंकि हमारे लिए वो शब्द प्रमाण है। हम उनका किसी भी मामले में विरोध नहीं करेंगे। यही मेरा

2158
02:26:35,360 --> 02:26:39,520
कहना है कि विरोध करेंगे तो क्यों नहीं करेंगे? विरोध तो हो रहा है ना साफ़।

2159
02:26:39,520 --> 02:26:43,520
तो फिर हम अपने आप को वैदिक नहीं कहेंगे। हम अपना नया अलग से बना लेंगे। नहीं हम तो कहेंगे ना

2160
02:26:43,520 --> 02:26:47,520
तो तो तुम सिद्ध करो तुम्हारा वैदिक होना स्वतंत्र रूप से बिना गुरु परंपरा

2161
02:26:47,520 --> 02:26:51,680
के नहीं गुरु परंपरा इसमें क्या है अभी देखो जैसे यहां पर ये वाली बात मैंने

2162
02:26:51,680 --> 02:26:55,840
कहीं आपके ही शास्त्रों से टकरा रही है तब आप अपनी परंपरा को ही खत्म कर दे रहे हो पॉइंट

2163
02:26:55,840 --> 02:26:59,840
याद मैं ये नहीं कह रहा हूं मैं परंपरा को खत्म नहीं कर रहा हूं तुम मेरी बातों को गलत मतलब

2164
02:26:59,840 --> 02:27:03,920
निकाल रहे हो अभी जैसे शणाचार्य की बात करी तुमने माना कि उन्होंने कर्मकांड कहा है अब

2165
02:27:03,920 --> 02:27:07,920
मैं जब इस पर आ गया कि भैया जब उनकी चीज तुम्हें किताब प्राप्त कैसे हुई परंपरा

2166
02:27:07,920 --> 02:27:12,000
से उनकी परंपरा से तो उनकी परंपरा का जो व्यक्ति तुम्हें किताब दे रहा

2167
02:27:12,000 --> 02:27:16,080
है वही व्यक्ति बताएगा कि उनकी सही मानसिकता क्या थी। अब उनकी उनकी

2168
02:27:16,080 --> 02:27:20,080
परंपरा का व्यक्ति बता रहा है। उनकी मानसिकता तात्विक भी थी। तुम कह रहे हो वो झूठ बोल रहा है

2169
02:27:20,080 --> 02:27:24,160
क्योंकि उनकी किताब में तो केवल कर्मकांड लिखा है। उन्होंने ये नहीं लिखा तत्व ज्ञान

2170
02:27:24,160 --> 02:27:28,160
है ही नहीं वेद में। उन्होंने ये लिखा कि कर्मकांड है। मगर तुमने अपने आप उनको

2171
02:27:28,160 --> 02:27:29,920
तत्व ज्ञान का विरोधी मान लिया वेदार्थ

2172
02:27:29,920 --> 02:27:34,000
में। मगर ठीक है। मान भी लिया तो जो व्यक्ति तुमको ये झूठ बोल सकता है

2173
02:27:34,000 --> 02:27:38,160
कि उनके वो तत्व ज्ञान देखते थे। वेदार्थ में वही व्यक्ति तुम्हें झूठी

2174
02:27:38,160 --> 02:27:42,160
किताब भी तो दे सकता है। तो इसीलिए मेरा कहना है कि जब हम

2175
02:27:42,160 --> 02:27:46,400
परंपरा से प्राप्त होने वाले अर्थ पर विश्वास नहीं करते हैं

2176
02:27:46,400 --> 02:27:50,400
या फिर सायनाचार्य की परंपरा से प्राप्त होने वाले

2177
02:27:50,400 --> 02:27:54,400
जो गुरुजनों द्वारा कहे जाने वाले वाक्य सायनाचार्य के संदर्भ

2178
02:27:54,400 --> 02:27:58,400
में उस पर जब हम विश्वास नहीं करते हैं तो हमें उस बुक पर भी विश्वास नहीं करना

2179
02:27:58,400 --> 02:28:02,960
चाहिए जो हमें उसी गुरु परंपरा से मिली है जिसमें लिखा हुआ है कि कर्मकांड की प्राचुर्यता

2180
02:28:02,960 --> 02:28:07,040
है। पहली बात तो उस स्थिति में आपको अपने आप को न्यूट्रल मानना पड़ेगा कि

2181
02:28:07,040 --> 02:28:11,040
भैया उसमें क्या लिखा था क्या नहीं लिखा था हमें नहीं पता हमारा यह है

2182
02:28:11,040 --> 02:28:15,200
इस विषय में तो ऐसे ही तो यही बात चाहे

2183
02:28:15,200 --> 02:28:19,440
जितना पूछ लो अंत में यही बात आएगी अगर तुमने हमको गलत साबित कर भी दिया

2184
02:28:19,440 --> 02:28:23,760
तो तुम वैदिक सिद्ध नहीं हो पाओगे वेद को तुम खत्म करोगे वहां तर्क

2185
02:28:23,760 --> 02:28:28,000
खत्म हो जाएगा फिर वहां पर आपके पास सिर्फ अपनी बातें रह जाएंगी वहां तर्क

2186
02:28:28,000 --> 02:28:30,720
नहीं है फिर लॉजिक खत्म वहां पर

2187
02:28:30,720 --> 02:28:35,520
अच्छा एक बात बताइए हां अगर अगर मान दीजिए कि विरोध होता है तो फिर किससे पूछेंगे

2188
02:28:35,520 --> 02:28:39,520
तो विरोध पूछो ऐसा तो तुमने अभी कोई विरोध बताया नहीं सर्वशक्तिमान

2189
02:28:39,520 --> 02:28:43,520
की बात मैंने तरह-तरह से सिद्ध कर अभी तो देखिए पॉइंट तो वही है ना आपने सिद्ध तो कुछ भी

2190
02:28:43,520 --> 02:28:47,520
नहीं किया सर्वशक्तिमान पे तो अभी बात ही नहीं हुई सर्वशक्तिमान पे तो आप अपने तर्क से भी सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं

2191
02:28:47,520 --> 02:28:51,680
कर पाए क्या देखो ना देखो अगर ऐसी बात है तो तुम उसका खंडन भी नहीं कर पाए

2192
02:28:51,680 --> 02:28:55,680
हो अगर अगर किया मैंने बोला कि सच्ची की सिद्धि हो रही सर्वशक्तिमान की सिद्धि नहीं हो रही मैंने

2193
02:28:55,680 --> 02:28:58,960
किया मैंने भी किया है मैंने भी किया निर्गुण से सगुण पे तुम कह रहे हो वो

2194
02:28:58,960 --> 02:29:03,360
इच्छावान है बस फिर शक्तिमान भी मान रहे हो शक्ति का पूछ रहा हूं तो वो बस

2195
02:29:03,360 --> 02:29:07,360
उसके आगे आप पूछो मत आपने कहा उसके आगे पूछो मत सामर्थ के

2196
02:29:07,360 --> 02:29:11,360
आगे वह क्या है पृथ्वी को धक्का लग रहा है कि नहीं लग रहा है

2197
02:29:11,360 --> 02:29:15,600
वो क्या है साकार एक देसी वस्तु होनी चाहिए साकार बताओ

2198
02:29:15,600 --> 02:29:19,680
ना पृथ्वी पृथ्वी सरकी कैसे मुझे बताओ थोड़ा प्रैक्टिकली नहीं आप मुझे आप मुझे

2199
02:29:19,680 --> 02:29:20,960
बताइए आप सगुण ईश्वर को साकार एक

2200
02:29:20,960 --> 02:29:24,960
देश मानते हैं सगुण ईश्वर वो होता है जो सगुण

2201
02:29:24,960 --> 02:29:28,960
निराकार ईश्वर वो होता है जो मैं बताऊंगा सगुण निराकार

2202
02:29:28,960 --> 02:29:32,960
ईश्वर वो होता है जो अपने आप को रेगुलेट कर सकता है कि मैं

2203
02:29:32,960 --> 02:29:36,960
साकार साकार एक देसी मानते हैं या नहीं मानते? साकार दिखता है एक

2204
02:29:36,960 --> 02:29:41,120
देसी है। नहीं साकार एक देसी दिखता है दिखता नहीं है। साकार एक देसी है कि नहीं ये बता दीजिए।

2205
02:29:41,120 --> 02:29:45,120
एक नहीं है तो धक्का नहीं लगा सकता। बात खत्म हो गई। अगर नहीं

2206
02:29:45,120 --> 02:29:49,120
है साकार एक देसी नहीं है तो धक्का नहीं लगा सकता। एक देसी है

2207
02:29:49,120 --> 02:29:53,120
तो धक्का नहीं लगा सकता। मतलब अगर साकार एक देसी मानेंगे तब

2208
02:29:53,120 --> 02:29:57,040
तो धक्का लगाना। आपके आपके ही वचनों के अनुकूल हम तो नहीं मानते। लेकिन

2209
02:29:57,040 --> 02:30:01,040
सर्वव्यापक होते हुए भी एक देसी है। ऐसे है वो जैसे

2210
02:30:01,040 --> 02:30:05,040
सगुण निराकार निर्गुण होते हुए भी सगुण है। मैं पूछ रहा हूं साकार

2211
02:30:05,040 --> 02:30:09,200
एक देसी है कि नहीं है? क्योंकि धक्का लगा अगर कोई वस्तु किसी दूसरे वस्तु को धक्का दे

2212
02:30:09,200 --> 02:30:13,440
रही है तो उसके लिए उसका साकार हो क्योंकि लक्षण में तो हमें ही दिख रहे हैं भाई जो भी हम देखते हैं कि या तो धक्का

2213
02:30:13,440 --> 02:30:17,840
लगाने के लिए उसका साकार होना है और दूसरा उसके कांटेक्ट में साकार हो एक देश तभी उसका धक्का लगा पाएगा।

2214
02:30:17,840 --> 02:30:21,920
हम है ना? जैसे जैसे जैसे बैट जैसे बॉल है बॉल

2215
02:30:21,920 --> 02:30:25,920
को बैट ने हिट किया तो जो बैट तो बॉल मूव कर गई है ना? तो बॉल मूव क्यों की

2216
02:30:25,920 --> 02:30:29,920
क्योंकि उसको एक बैट साकार वस्तु एक देश वस्तु ने किया तो वैसे ही अगर आप मान रहे हो कि ईश्वर

2217
02:30:29,920 --> 02:30:34,080
भी धक्का लगा रहा है तो आपको मानना पड़ेगा ईश्वर भी साकार एक देश है मानो बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल अपने

2218
02:30:34,080 --> 02:30:38,080
को रेगुलेट करता है ठीक है ठीक है आप इसी पे रुकिए इसी पे रुकिए यानी आपने माना कि जो आपका ईश्वर है वो

2219
02:30:38,080 --> 02:30:42,240
साकार एक देश है व्यवहार वाला है ना सर्वव्यापक होते हुए भी

2220
02:30:42,240 --> 02:30:46,240
सर्व्यापक अगर वही पॉइंट है ना यही बात है ना तुम ऐसे कह रहे हो देखो

2221
02:30:46,240 --> 02:30:50,560
मैं बताऊं तुम क्या कह रहे हो जैसे मैंने कोई बुक उठाई तो तुम कह रहे हो कि आपने नहीं उठाई

2222
02:30:50,560 --> 02:30:56,560
आपके हाथ ने उठाई तो मैं कह रहा हूं मैं होते हुए भी मेरे हाथ से बुक उठा रहा हूं

2223
02:30:56,960 --> 02:31:01,200
आप जीव भी तो एक देसी है। नहीं एक देश

2224
02:31:01,200 --> 02:31:05,280
है। मगर बुक के बुक के एंगल से तो मैं उसके अनुपात से तो बड़ा सिद्ध हो रहा हूं

2225
02:31:05,280 --> 02:31:09,600
ना। फिर मैंने बुक उठाई कि नहीं उठाई? नहीं मेरे हाथ ने उठाई। ये कोई बात है क्या?

2226
02:31:09,600 --> 02:31:13,680
इसी तरीके से इसी तरीके से निर्गुण ने ही सृष्टि बनाई।

2227
02:31:13,680 --> 02:31:17,840
सुनो सुनो। निर्गुण ने ही सगुण सृष्टि निर्गुण ने ही सृष्टि की। मगर

2228
02:31:17,840 --> 02:31:21,920
किस किसके द्वारा? अपने सगुण रूप के द्वारा। निर्गुण रूप के द्वारा वो सृष्टि

2229
02:31:21,920 --> 02:31:26,000
कर ही नहीं सकता। क्योंकि मैं पूछ ही नहीं रहा हूं। मैं पूछने निर्गुण

2230
02:31:26,000 --> 02:31:30,080
तुम क्यों पूछ रहे हो? अभी सवाल तो मेरा चल रहा है। तुम वहां पृथ्वी मूव कैसे की यह

2231
02:31:30,080 --> 02:31:34,320
बताओ। नहीं पॉइंट अच्छा ये अब ये कौन सी बात आई कि मैं नहीं पूछूं? क्योंकि निर्गुण

2232
02:31:34,320 --> 02:31:38,480
सगुण क्योंकि निर्गुण सगुण की बात चल रही है ना तुम दूसरे विषय को खोल रहे हो।

2233
02:31:38,480 --> 02:31:40,640
नहीं मैं बता देता हूं ना मैं बताता हूं। क्यों पूछा मैंने

2234
02:31:40,640 --> 02:31:44,640
आपने जब वो बोला ना कि धक्का लगाता है। आपने बोला ना कि नहीं धक्का लगाता है धक्का लगा। मैंने उसी पे ही

2235
02:31:44,640 --> 02:31:48,640
मैंने आपको धक्के वाले पे ही प्रश्न किया ना कि धक्का लगाने के लिए उसका सगुण एक साकार एक देश होना

2236
02:31:48,640 --> 02:31:54,080
जरूरी है। तो क्या आप ईश्वर को तो क्या आप ईश्वर को साकार एक देसी मानते हो अपना?

2237
02:31:54,080 --> 02:31:59,120
नहीं मानते ध्यान से सुनिए सर्व्यापक होते हुए भी साकार एक देश

2238
02:31:59,120 --> 02:32:03,600
पॉइंट सुनिए जो ईश्वर सृष्टि बना रहा है धक्का लगा के बना रहा है ना आपके

2239
02:32:03,600 --> 02:32:07,920
मंतव्य में हां यानी जिस ईश्वर ने और धक्का लगाने के लिए उसका साकार

2240
02:32:07,920 --> 02:32:11,920
एकदेशी होना जरूरी है यानी आपके यानी आपके हिसाब से

2241
02:32:11,920 --> 02:32:16,560
जिस ईश्वर ने सृष्टि की रचना की है वो साकार एक देश है ना

2242
02:32:16,560 --> 02:32:21,280
सर्वव्यापक होते हुए भी यही तो पॉइंट है

2243
02:32:21,280 --> 02:32:25,440
हो तो रहा है तभी तभी तो आपको वहां पे अवतार मानना पड़ेगा वरना पृथ्वी

2244
02:32:25,440 --> 02:32:29,600
पे धक्का सिद्ध कर दो आप वहां पे आप सिद्ध नहीं कर रहे वहां आप इच्छा इच्छा

2245
02:32:29,600 --> 02:32:33,680
बोल के हट जाते हो इच्छा है वहां बल नहीं अवतार मानना पड़ेगा नहीं मानना पड़ेगा बाद की बात है पहले मैं

2246
02:32:33,680 --> 02:32:37,680
आपसे पूछ रहा हूं यही तो बात है वहां तुम वहां वाले मामले में तुम कमजोर

2247
02:32:37,680 --> 02:32:41,840
हो वहां वो तुम खुल के बात मैं कमजोर नहीं हूं अभी उसप बात ही नहीं हो रही है ये

2248
02:32:41,840 --> 02:32:45,680
क्यों नहीं उसी पे तो बात हो रही है निर्गुण अभी तुम रिकॉर्डिंग सुन लो मैंने निर्गुण

2249
02:32:45,680 --> 02:32:49,760
ये जो बीच-बीच में ये जो इस तरीके से करते हैं ना कि मतलब एक थोड़ा सा क्या बोलते हैं उसको

2250
02:32:49,760 --> 02:32:53,760
एक मोनोपोली सेट करने का प्रयास यहां पे तुम दब रहे हो। यहां पे तुम कमजोर पड़ रहे हो। यहां पे तुम ऐसे

2251
02:32:53,760 --> 02:32:57,840
कर रहे हो। ये चीजें मैं नहीं करता। लेकिन यहां पे ऐसा नहीं करूंगा। नहीं मगर

2252
02:32:57,840 --> 02:33:01,840
मैंने एक देखा है तो ऐसी चीजें होती है कि रिकॉर्डिंग लेने की टेक्निक्स होते हैं। ठीक है? ये

2253
02:33:01,840 --> 02:33:06,000
चीज़ ठीक नहीं है। नहीं ऐसा कुछ नहीं है। तुम गलत सोच रहे हो। ऐसा कुछ नहीं

2254
02:33:06,000 --> 02:33:10,160
है। वो एक एक जो एक्साइटमेंट होता है। इसमें कोई सोची

2255
02:33:10,160 --> 02:33:14,320
समझी प्लानिंग नहीं होती है। इसमें एक एक्साइटमेंट होता है। अंपायर हाउस दैट वाला।

2256
02:33:14,320 --> 02:33:18,480
तो मैं वैसे कह नहीं रहा कि प्लानिंग है लेकिन वो एक आदत होती है तो बस उसी नहीं वो अगर

2257
02:33:18,480 --> 02:33:22,400
तुम याद दिलाओगे तो मैं उसको ओवरकम करने की कोशिश करूंगा मैं समझता हूं उस चीज को वो

2258
02:33:22,400 --> 02:33:26,400
निकल गया मुंह से मगर ऐसा कुछ नहीं कि मैं सोच समझ के कर रहा हूं मैं ये कह रहा हूं कि जितनी

2259
02:33:26,400 --> 02:33:30,640
बार निर्गुण सगुण की बात अभी तक हमारे बीच में आई है तुमने वहां से

2260
02:33:30,640 --> 02:33:34,880
मतलब वहां पे कट जो निर्भय आर्य है जो निर्भय

2261
02:33:34,880 --> 02:33:39,440
आर्य है जिस तरह से बात करने वाला निर्भय आर्य ने अपने स्वाभाविक

2262
02:33:39,440 --> 02:33:43,600
लक्षण के अनुसार वहां पर प्रस्तुतीकरण नहीं दिया है निर्गुण और सगुण

2263
02:33:43,600 --> 02:33:46,560
वाले विषय में वहां वो बचता है। सबसे पहली

2264
02:33:46,560 --> 02:33:50,640
बार तो तुमने यही कह दिया था निर्गुण सगुण वाले में कि जो है

2265
02:33:50,640 --> 02:33:54,720
बस यही तक मानता है आर्य समाज तो ये पहली बार की बात है। मैंने तो निर्गुण सगुण पूरा समझाया

2266
02:33:54,720 --> 02:33:58,800
था। मैंने बोला कि प्रत्येक वस्तु निर्गुण सगुण मैं तुम्हें रिकॉर्डिंग भेज दूंगा। पहली वाली भी

2267
02:33:58,800 --> 02:34:02,800
पढ़ी होगी। सामने बोल रहा हूं ना रिकॉर्डिंग। अरे तुमने मैं तुम्हें मैं

2268
02:34:02,800 --> 02:34:06,800
ये मैं बता रहा हूं अभी तक कहां-कहां पे हमारा इस मामले में इंटरेक्शन हुआ है। तो वो

2269
02:34:06,800 --> 02:34:10,880
बता रहा हूं। पहली बार तुमने यह कह दिया था कि नहीं नहीं वो आर्य समाज जो है यहीं तक

2270
02:34:10,880 --> 02:34:14,960
मानता है वो बस मतलब इस बारे में फिर बात नहीं थी मैंने भी उसको नहीं है वो

2271
02:34:14,960 --> 02:34:19,120
भी तो बोलिए ना कहां तक मैंने बोला बताइए बस वो वो सगुण ही मानता है वो सगुण निर्गुण

2272
02:34:19,120 --> 02:34:19,680
एक मैंने

2273
02:34:19,680 --> 02:34:24,080
उसको खोलना चाहा था तो तुमने उसको बात को खत्म कर दिया था मतलब उसमें बहुत ज्यादा क्लेरिटी

2274
02:34:24,080 --> 02:34:28,080
नहीं थी ठीक है मैं ये पहली बार की बात है फिर दोबारा हुआ तो तुमने

2275
02:34:28,080 --> 02:34:32,080
कहा वो बल नहीं है वो इच्छा है तो इच्छा जो है पृथ्वी

2276
02:34:32,080 --> 02:34:36,320
को प्राप्त हो रही है समझा देता हूं आगे बढ़िएगा बाद में पहले मैं सगुण निर्गुण वाला बोल देता हूं

2277
02:34:36,320 --> 02:34:40,320
हां सगुण निर्गुण वाले पे जब मैंने आपसे ये वाला पॉइंट बोला था ना कि हम जो सगुण मानते हैं तो

2278
02:34:40,320 --> 02:34:44,480
मैंने आपसे ये बोला था अब तुम एक काम करो तुम तुमने बोला

2279
02:34:44,480 --> 02:34:48,480
क्या था छोड़ दो उसको हटाओ उसको डिलीट अभी मिसकोट कर रहे हो

2280
02:34:48,480 --> 02:34:52,480
मैं मैं उसको मैं उसको मैं तुम्हें बता रहा हूं ना ही मैं उसको सुनूंगा मैं

2281
02:34:52,480 --> 02:34:56,560
उसको डिलीट मार दूंगा तुमने जो कुछ बोला होगा तो तुम उस अभी फ्रेश व्याख्या

2282
02:34:56,560 --> 02:35:00,640
दे दो निर्गुण सगुण की क्या है मैंने आपसे पहले ही बोला था कि जो विशिष्टा

2283
02:35:00,640 --> 02:35:04,800
इसमें इसमें माना जाता है ना सगुण निर्गुण हां ठीक है कि उस

2284
02:35:04,800 --> 02:35:08,960
उस दृष्टिकोण से मैंने कहा था कि अभी भी अभी भी तुम कुछ मत करो तुम अपनी फ्रेश

2285
02:35:08,960 --> 02:35:12,960
व्याख्या दो वो छोड़ दो विशिष्टा द्वैत सब कुछ को अपनी निर्गुण सगुण की व्याख्या

2286
02:35:12,960 --> 02:35:17,040
दो अब उसमें देखिए मैंने तो आपको पहले बताया था कि निर्गुण सगुण हर वस्तु

2287
02:35:17,040 --> 02:35:21,360
जो होती है निर्गुण सगुण होती है ठीक है कुछ गुणों से सहित कुछ गुणों से रहित इसलिए उसको निर्गुण

2288
02:35:21,360 --> 02:35:25,360
सगुण बोला जाता है पॉइंट आ जाता है मतलब हमारा हर तरीके से एक रस नहीं है पहली बात तो हम

2289
02:35:25,360 --> 02:35:29,440
ये मान ले कुछ गुणों में एक रस है कुछ गुणों में जो है कम ज्यादा है एक रस का

2290
02:35:29,440 --> 02:35:33,920
मतलब क्या होता है एक रस इसको ईश्वर को एक रस का मतलब समझा दो एक रस की सिद्धि कैसे एक से नित्य

2291
02:35:33,920 --> 02:35:34,800
बिल्कुल कहीं भी

2292
02:35:34,800 --> 02:35:39,120
अभाव नहीं कि यहां इतना है, यहां ज्यादा है, यहां कम है। ये नहीं बिल्कुल इक्वल

2293
02:35:39,120 --> 02:35:40,640
हर तरह से एक रस।

2294
02:35:40,640 --> 02:35:44,800
हां। तो अब इसी को समझाता हूं। अब इसी को सुन लीजिए। जब हमने बोल दिया कि हर तरह से एक रस

2295
02:35:44,800 --> 02:35:48,880
है। तो यानी कि अगर मान लीजिए ईश्वर सर्वज्य है। है ना? तो एक रस का मतलब तो

2296
02:35:48,880 --> 02:35:52,880
ये सीधा-सीधा बनेगा कि लंदन में का ईश्वर भी जो लंदन में व्यापक ईश्वर है वो भी सर्वज है।

2297
02:35:52,880 --> 02:35:57,040
भारत में व्यापक ईश्वर वो भी है। है ना? अब इससे इस बात का क्या संबंध हो गया कि नहीं कुछ गुण

2298
02:35:57,040 --> 02:36:01,120
है कुछ गुण नहीं है। इसका क्या संबंध हो गया? तुम कह रहे हो ना कि बिल्कुल। अरे

2299
02:36:01,120 --> 02:36:05,120
अभी तुमने कहा ना यार मैं तो तुमसे पूछ रहा हूं। तो मैंने बताया ना? तुमने कहा

2300
02:36:05,120 --> 02:36:09,200
कुछ गुणों में वो एक रस है कुछ गुणों में नहीं भी है। हां तो तो मैं

2301
02:36:09,200 --> 02:36:13,280
इसमें नित्यता अनित्यता कहां से आ गया? अरे तो एक रसता भंग हो रही है ना। कुछ गुणों

2302
02:36:13,280 --> 02:36:17,440
में है कुछ गुणों में नहीं है। बताइए नहीं कैसी बात कर रहे हो आप?

2303
02:36:17,440 --> 02:36:21,520
हां ये बताओ कितनी ये तो कितनी बेसिक सी लेवल की बात है। ये सोचो।

2304
02:36:21,520 --> 02:36:25,760
अच्छा तुम तुम व्याख्या दो अपनी। अब देखो ये ये तुम्हारी मोनोपोली है। ये जो हंसते

2305
02:36:25,760 --> 02:36:30,960
हो कहते हो कितनी बेसिक सी वाली है। हो सकता है। हो सकता है।

2306
02:36:30,960 --> 02:36:35,520
तो अब इसमें जैसे ये पॉइंट है कि जैसे

2307
02:36:35,520 --> 02:36:39,600
कोई जैसे अग्नी है ठीक है वो गर्म है लेकिन ठंडी नहीं है यानी उसमें

2308
02:36:39,600 --> 02:36:44,000
गर्मी है लेकिन ठंडी नहीं है तो ये वाला हां

2309
02:36:44,000 --> 02:36:46,800
हट गया

2310
02:36:46,800 --> 02:36:49,920
पेन पेन

2311
02:36:49,920 --> 02:36:53,920
तो एक सेकंड तो अब जैसे अग्नि है वो गर्म है

2312
02:36:53,920 --> 02:36:57,920
वो ठंडी नहीं है ठीक है इस वाले केस में क्या हो रहा है कि उसमें अग्नि उनमें गर्मी के गुण

2313
02:36:57,920 --> 02:37:02,080
है लेकिन कुछ गुण नहीं भी है तो उसी प्रकार से दुनिया की हर वस्तु में

2314
02:37:02,080 --> 02:37:06,400
जैसे ईश्वर सच्चिदानंद है ठीक है लेकिन दुख ही नहीं है

2315
02:37:06,400 --> 02:37:10,880
तो सच्चिदानंद का जो है उसके अंदर तो इस दृष्टिकोण से सगुण है और जो दुख

2316
02:37:10,880 --> 02:37:14,960
राग आदि ये सब नहीं है तो इस दृष्टिकोण से निर्गुण अब वो

2317
02:37:14,960 --> 02:37:19,200
एक रास्ता वाला पॉइंट ये आता है कि ईश्वर सर्वव्यापक है और कहीं ऐसा तो नहीं कि लंदन

2318
02:37:19,200 --> 02:37:23,280
वाला ईश्वर सच्चिदानंद है और भारत वाले ईश्वर सच्चिदानंद नहीं है तब उसकी एक रास्ता भंग होती

2319
02:37:23,280 --> 02:37:27,280
है ऐसे भंग नहीं हो जाती कहते कोई गुण है कोई गुण नहीं है तो भंग हो गई ये

2320
02:37:27,280 --> 02:37:31,280
कौन सी बात कौन से गुण है उसमें और कौन से नहीं है हां तो वो तो आर्य

2321
02:37:31,280 --> 02:37:35,440
समाज का जो दूसरा समुलास है उसमें मुख्य मुख्य मेजर मेजर गुणों का अधिक दिया है। हम

2322
02:37:35,440 --> 02:37:39,600
सर्वशक्तिमान सर्वंतमी अजर अमर नित्य पवित्र सृष्टि करता आदिआदि जो है वह मेजर

2323
02:37:39,600 --> 02:37:44,400
मेजर उसके गुण है। सर्वशक्तिमान से वो एक रस है ना।

2324
02:37:44,400 --> 02:37:46,240
हां ठीक है। यानी

2325
02:37:46,240 --> 02:37:51,200
कि फोर्स की दृष्टि से वो एक रस वाला है। फोर्स

2326
02:37:51,200 --> 02:37:55,600
की दृष्टि से एक रस वो तो इच्छा हो गया ना। फोर्स क्या होता है? तो फिर शक्तिमान

2327
02:37:55,600 --> 02:37:59,680
क्यों लिख रहे हो? इच्छा मान लिखो। अच्छा सर्वशक्तिमान का इच्छा अर्थ क्या होता

2328
02:37:59,680 --> 02:38:03,680
है? सर्वशक्तिमान सब कुछ कर सकने वाला जो सब कुछ कर सकने का

2329
02:38:03,680 --> 02:38:08,240
सामर्थ रखे जिसमें सब कुछ कर सकने के वो हो बल हो क्या

2330
02:38:08,240 --> 02:38:12,320
ठीक है अब अब आपने बोला कि सर्वशक्तिमान का अर्थ होता है सब कुछ कर सकता है

2331
02:38:12,320 --> 02:38:16,320
ठीक है अब मुझे ये बताइए कि आपको कैसे पता चला कि सर्वशक्तिमान अरे तुम देखो

2332
02:38:16,320 --> 02:38:20,560
फिर टॉपिक चेंज कर रहे हो टॉपिक नहीं तो अपनी व्याख्या क्यों नहीं दे रहे हो सर्वशक्तिमान पे लाइन

2333
02:38:20,560 --> 02:38:24,800
मैंने क्या पूछा है मैंने पूछा क्या था तुमसे मैंने पूछा क्या था तुमसे अभी मैंने

2334
02:38:24,800 --> 02:38:29,040
पूछा था क्या वो शक्ति के गुण से बिल्कुल एक रस है सभी जगह कि नहीं

2335
02:38:29,040 --> 02:38:33,200
तुमने उसका जवाब आपल पूछा शक्ति का मतलब क्या समझते

2336
02:38:33,200 --> 02:38:37,840
ना जब वो बल मैंने आपको पहले मतलब आप कुल मिलाके मुझे

2337
02:38:37,840 --> 02:38:41,840
आप हां हां बोलो बोलो अब बात ये

2338
02:38:41,840 --> 02:38:46,000
है कि जब मैंने आपको पहले ही बता दिया कि जो बल वाला जो विषय है वो तो इच्छा से संबंधित

2339
02:38:46,000 --> 02:38:50,080
है अब आप उसे अब उसे सर्वशक्तिमान से जोड़ोगे अगर अगर मेरे भाई वो

2340
02:38:50,080 --> 02:38:54,240
इच्छा से देखो दूसरी जगह चली जाएगी बात वही बात है अगर इच्छा

2341
02:38:54,240 --> 02:38:58,240
से संबंधित भी है मैं कह रहा हूं क्या पृथ्वी के कण को

2342
02:38:58,240 --> 02:39:01,280
कुछ प्राप्त हुआ या नहीं हुआ। बस ये बताओ कोई

2343
02:39:01,280 --> 02:39:06,880
क्या प्राप्त हुआ उसे? एक सेकंड रुकिए।

2344
02:39:06,880 --> 02:39:10,960
हां। हेलो हम हां तो अब बात ये आ जाती है कि

2345
02:39:10,960 --> 02:39:14,960
जब मैं कह रहा हूं कि आपने बल वाला विषय छेड़ा। अब मेरे को जब मेरी जब

2346
02:39:14,960 --> 02:39:19,040
मेरे अकॉर्डिंग वो बल से संबंधित उस टाइप से है नहीं। क्योंकि सर्वशक्तिमान में बहुत सारी

2347
02:39:19,040 --> 02:39:23,120
चीजें आ जाती है। इसीलिए तो मैं कह रहा हूं ना निर्भय। सर्व शक्तिमान में देखना है। तो देखने

2348
02:39:23,120 --> 02:39:27,120
को बल मान लेंगे। मैं समझ गया। मैं यह कह रहा हूं कि तुम मुझे बस इतना

2349
02:39:27,120 --> 02:39:31,120
बताओ अभी कि पृथ्वी को प्राप्त क्या हो रहा है? कुछ फोर सोर्स प्राप्त हो रही है उसे कि

2350
02:39:31,120 --> 02:39:35,200
नहीं हो रही है? बस वो एक उसके अंदर कोई ऐसा भैया ये सारा विषय मैंने आपको पिछली

2351
02:39:35,200 --> 02:39:39,280
बार भी इच्छा वाला पूरा कांसेप्ट अच्छे से बताया था। नहीं नहीं बताया

2352
02:39:39,280 --> 02:39:43,280
था अच्छे से। तुम उसमें खिचड़ी पका रहे हो। सगुण निर्गुण में तुम्हारी खिचड़ी

2353
02:39:43,280 --> 02:39:47,360
पक रही है। दृष्टिकोण से पक रही है। लेकिन चलिए कोई बात नहीं।

2354
02:39:47,360 --> 02:39:51,520
मैं उसमें अपना ले लेता हूं। उसमें अपना भी मैं इशू ले लेता हूं तो भी उसमें

2355
02:39:51,520 --> 02:39:55,520
हम सॉल्यूशन की ओर बढ़ते हैं। इसमें वो क्लियर नहीं है सगुण निर्गुण और वहीं पे

2356
02:39:55,520 --> 02:39:59,840
अवतार की सिद्धि होती है। क्योंकि अगर वो शक्ति शक्ति के उससे

2357
02:39:59,840 --> 02:40:04,160
सर्व वो है सर्वव्यापक एक रस है तो जब वो

2358
02:40:04,160 --> 02:40:08,320
पृथ्वी इत्यादि के लिए व्यवहारिक होगा तो वहां पर वो कहीं पर कम कहीं

2359
02:40:08,320 --> 02:40:12,320
पे ज्यादा होगा। सिंपल। तो ऐसी स्थिति में या तो यह मानना

2360
02:40:12,320 --> 02:40:16,400
पड़ेगा कि निर्गुण ने अपने स्वरूप को बदला जो कि वह बदल नहीं सकता। बदला

2361
02:40:16,400 --> 02:40:20,560
तो उसकी शाश्वतता भंग हो जाएगी। तो यहीं पर अवतार मानना पड़ेगा कि वो

2362
02:40:20,560 --> 02:40:24,640
एक और अवतार लेता है। अपने उस रूप को सुरक्षित रखते हुए नित्यता

2363
02:40:24,640 --> 02:40:28,720
को सुरक्षित रखते हुए सगुण अवतार लेता है और अब वो जो है क्रियाशील

2364
02:40:28,720 --> 02:40:32,960
होता है। क्रिया करने के लिए ही उसे कहीं कम कहीं ज्यादा होना पड़ेगा। मेरे

2365
02:40:32,960 --> 02:40:37,280
भाई क्रिया हो ही नहीं सकती जब वो सही सब जगह है। हां उस दृष्टि

2366
02:40:37,280 --> 02:40:41,280
से तत्व की दृष्टि से वो केवल इच्छा मात्र कर रहा है। मगर हमारी ओर से तो

2367
02:40:41,280 --> 02:40:45,280
हमें कुछ ना कुछ उसका बल प्राप्त हुआ ना कि हम किसके नहीं तो हमें मानना

2368
02:40:45,280 --> 02:40:49,440
पड़ेगा केवल वो सोचता है। उसके पास ना बल है ना कुछ है ना फोर्स है कुछ केवल सोचता

2369
02:40:49,440 --> 02:40:53,440
है वो बस और वहां सोचने पे भी जब अगर आर्य समाज के अनुसार चलो एक बार

2370
02:40:53,440 --> 02:40:57,520
वो अद्वैत के अनुसार तो केवल सोचता है चल भी जाएगा। आर्य समाज के अनुसार तो वो चलेगा

2371
02:40:57,520 --> 02:41:01,760
ही नहीं। आपको क्या कहते व्यवहारिक तौर पर उसकी वो सिद्धि करनी

2372
02:41:01,760 --> 02:41:05,840
पड़ेगी कि वो बल लगा कि नहीं लगा। ये इस तरह की बातें तो अद्वैत में है कि उसने

2373
02:41:05,840 --> 02:41:09,920
केवल सोचा और हो गया क्योंकि माया

2374
02:41:09,920 --> 02:41:12,400
है।

2375
02:41:12,400 --> 02:41:16,480
ये वाली बात है। हम ठीक है। अब देखिए तो

2376
02:41:16,480 --> 02:41:20,480
चलिए आपने अपनी व्याख्या कर दी ना। अब तो अब तुम इस पर और करो। इस पे और

2377
02:41:20,480 --> 02:41:23,840
अध्ययन करो। मुझे जो अरे अध्ययन मेरा पूरा हो चुका है। पॉइंट

2378
02:41:23,840 --> 02:41:27,920
वही जैसे अभी मैंने धैर्य पूरा आपकी बात सुनी। जब मैं बोलना चालू अरे मुझे जाना है

2379
02:41:27,920 --> 02:41:31,920
भाई। भाई मैंने तुम्हें बताया था तैयारी चल रही मैं वर्कआउट करने जा रहा था पंपिंग

2380
02:41:31,920 --> 02:41:36,160
आयरन बनने तुमने कहा कि फोन कर लो मैंने सोचा 15 मिनट कुछ

2381
02:41:36,160 --> 02:41:40,240
बातें होंगी बढ़िया और उसमें बातें होते जगह

2382
02:41:40,240 --> 02:41:44,880
कॉल पे झगड़ा हां झगड़ा इंसा नहीं हुआ मगर मेरा पंपिंग आयरन छूट गया

2383
02:41:44,880 --> 02:41:49,280
मैं सोच रहा था कुछ तीन चार दिन के लिए जा रहा हूं तो थोड़ा सा पंप मार लूं कुछ

2384
02:41:49,280 --> 02:41:55,280
आज बैक और बाईसेप्स का डे था फुल डे ये भी सही है हां

2385
02:41:55,360 --> 02:41:59,600
बाकी मतलब मतलब बातचीतवाचीत थोड़ी बहुत गरमा गर्मी

2386
02:41:59,600 --> 02:42:03,680
हो जाती है। अग्नि की तरफ से आपको कुछ बुरा लगता है। नहीं खेल में पहले से ही ऐसा कुछ नहीं है।

2387
02:42:03,680 --> 02:42:07,840
अभी देखो मैंने अभी कितना अच्छा बोला था तुम्हारे बारे में देखो उसमें वीडियो में मैंने

2388
02:42:07,840 --> 02:42:12,000
बहुत भाव प्रकट दोबारा से किए थे। हां मैंने वो शुरू का मैंने वो 15 मिनट देखा था।

2389
02:42:12,000 --> 02:42:16,240
उसके बाद फिर नींद बहुत ज्यादा आ रही थी। बाद में खराब लगा होगा।

2390
02:42:16,240 --> 02:42:20,240
शुरू में अच्छा लगा। मतलब पता है मेरे को ऐसा लगा कि यार ऐसा कोई कांसेप्ट है ही नहीं। मतलब

2391
02:42:20,240 --> 02:42:23,760
नया जिसका मैंने खंडन नहीं कर रखा। तो मेरे को ऐसा कोई नया नहीं लगा जैसे मैंने फिर सुना नहीं आगे।

2392
02:42:23,760 --> 02:42:27,840
मेरे हिसाब से मैं एक बड़े भाई होने के नाते तुम्हें कह रहा हूं तुम

2393
02:42:27,840 --> 02:42:32,080
सगुण निर्गुण पर और वो करो क्योंकि यहां पर तुम जो है क्लियर नहीं

2394
02:42:32,080 --> 02:42:37,760
हो मेरा क्लियर है वो इच्छा वाला पॉइंट आप खंडन करिए ना

2395
02:42:37,760 --> 02:42:41,920
कर तो दिया खंडन कि भैया यहां पे हमें प्राप्त क्या हो रहा है जैसे हमें

2396
02:42:41,920 --> 02:42:46,320
व्यवहार में क्या प्राप्त हो रहा है इच्छा इच्छा मतलब इच्छा मतलब एक मानसिक

2397
02:42:46,320 --> 02:42:51,120
सूचना अब जैसे मैं उदाहरण देता हूं

2398
02:42:51,120 --> 02:42:55,200
इच्छा मतलब मानसिक समझिए समझिए जैसे पॉइंट क्या है कि जैसे आप आप समझने के

2399
02:42:55,200 --> 02:42:59,200
लिए मुझसे पूछ रहे हैं ना समझने का्सप्ट समझने के लिए कि मानसिक मानसिक तरंगे क्या? आपने समझने

2400
02:42:59,200 --> 02:43:03,360
के लिए बोला तो समझने के लिए ही मैं दृष्टांत दे रहा हूं अपनी तरफ से।

2401
02:43:03,360 --> 02:43:07,840
दृष्टांत ये दे रहा हूं कि जैसे चेतन जीव है। ठीक है?

2402
02:43:07,840 --> 02:43:12,080
जीव इच्छा करता है और मन में विचार आता है। इच्छा करता है और हाथ उठता

2403
02:43:12,080 --> 02:43:16,080
है। है ना? तो चाहने मात्र से ऐसा तो नहीं कि जीव अलग से हाथ के

2404
02:43:16,080 --> 02:43:20,080
नीचे आकर के धक्का मार रहा है। ये तो हो नहीं रहा। चाहने मात्र से

2405
02:43:20,080 --> 02:43:24,320
क्या हुआ? जैसे जीव इच्छा कर रहा है। मैं इच्छा कर रहा हूं। तो मेरे इच्छा करने से

2406
02:43:24,320 --> 02:43:28,320
मेरे शब्द मन में हो रहे हैं। मुंह से निकल रहे हैं। हाथ पैर हिल रहे हैं इत्यादि। है ना?

2407
02:43:28,320 --> 02:43:32,400
हम हम तो ये इच्छा मात्र से ही तो हो रहा है। मैं कोई जैसे मैंने हाथ उठाया

2408
02:43:32,400 --> 02:43:36,480
मैंने हाथ उठाया। तो क्या मैं हाथों तो मेरा जो जीव है शरीर के बाहर आकर के हाथों के

2409
02:43:36,480 --> 02:43:38,960
नीचे से ऊपर कोई धक्का थोड़ी लगा। नहीं नहीं। अब मैं बताता

2410
02:43:38,960 --> 02:43:42,960
हूं। हमारी जो वो होती है माइटोकांड्रिया जहां से एनर्जी प्रोड्यूस

2411
02:43:42,960 --> 02:43:46,960
होती है। हां। हमारे चाहने मात्र से वो एनर्जी काम

2412
02:43:46,960 --> 02:43:50,960
करती है हम और वो एनर्जी देती है कि हाथ वो जो हमारी

2413
02:43:50,960 --> 02:43:55,200
जो हड्डियों पे चिपकी हुई वो है ना वो सूचना के द्वारा

2414
02:43:55,200 --> 02:43:59,280
उस मसल को ये सूचना पहुंचाती है उस मसल को कि तुमको

2415
02:43:59,280 --> 02:44:03,360
जो एनर्जी कहां से आ रही है माइट्रोकांड्रिया से है ना ठीक है अब तुम्हें जो

2416
02:44:03,360 --> 02:44:07,920
है वो क्या कहते हैं अगर फैला हुआ है इलास्टिसिटी है तो अब तुम्हें सिकुड़ना

2417
02:44:07,920 --> 02:44:12,080
है तो मेरा जीव जो है वो उसकी सूचना जाती है

2418
02:44:12,080 --> 02:44:16,160
मन को मस्तिष्क को मान लो मस्तिष्क के द्वारा नर्व्स के द्वारा उस चिपाक

2419
02:44:16,160 --> 02:44:20,240
को जो हड्डियों से चिपकी हुई है। ठीक है? और वह जब सिकुड़ती है तो

2420
02:44:20,240 --> 02:44:24,480
हाथ मेरा मुड़ने लगता है और जब फैलती है तो हाथ मेरा सीधा होने लगता है। लेकिन चाहने

2421
02:44:24,480 --> 02:44:27,600
मात्र से हुआ ना ये चाहने मात्र से एनर्जी का यूज़ किया।

2422
02:44:27,600 --> 02:44:31,920
अब दिक्कत ये है यूज़ एनर्जी भी क्यों क्यों एनर्जी क्रिया में आया?

2423
02:44:31,920 --> 02:44:36,080
सुनो तो सुनो सुनो तो सुनो तो मैं बता रहा हूं।

2424
02:44:36,080 --> 02:44:40,080
मैं वही मैं वही बता रहा हूं। बस बस यही तुम सही

2425
02:44:40,080 --> 02:44:44,080
जगह आ गए। बिल्कुल सही जगह आ गए। अब यहीं पर सबसे बड़ी बात है क्या

2426
02:44:44,080 --> 02:44:48,320
वो जो एनर्जी जो यूज हो रही है मेरे मेरे जो मेरे

2427
02:44:48,320 --> 02:44:52,400
कांसेप्ट में तो वो एनर्जी और मैं अलग हूं ईश्वर के कांसेप्ट में वो

2428
02:44:52,400 --> 02:44:57,120
जो एनर्जी यूज़ हो रही है वो और ईश्वर अलग है क्या ये

2429
02:44:57,120 --> 02:45:01,440
एटीपी की बात कर रहे हैं एटीपी रूप एनर्जी की जो एनर्जी हाथ

2430
02:45:01,440 --> 02:45:05,440
को ये कैपेसिटी प्रोवाइड करा रही है कि वो फ्लेक्स

2431
02:45:05,440 --> 02:45:09,440
या फिर इलास्टिसिटी करे मसल्स को वो जो एनर्जी है जो

2432
02:45:09,440 --> 02:45:13,920
ग्लूकोस से आती है हां है ना? ग्लूकोस इंटेक करते हैं। ग्लाइकोजन

2433
02:45:13,920 --> 02:45:18,240
हमारा होता है जिसकी वजह से वो एनर्जी प्रोड्यूस होती है माइटोकांड्रिया इत्यादि से।

2434
02:45:18,240 --> 02:45:22,240
वो एनर्जी जो है वो तत्व और मैं यानी मेरा जो जीव

2435
02:45:22,240 --> 02:45:26,240
है जो ऑर्डर दे रहा है वो अलग-अलग है मेरे कांसेप्ट में। तुम्हारे

2436
02:45:26,240 --> 02:45:30,400
कांसेप्ट में थोड़ा सा मैं और समझना चाहता हूं इस चीज को। आप वही कह रहे है ना कि जैसे

2437
02:45:30,400 --> 02:45:34,560
तीन शरीर जैसे दो एक सूक्ष्म शरीर एक स्थूल शरीर है ना। मैं तो ये कह रहा

2438
02:45:34,560 --> 02:45:38,640
मैं तो ये कह रहा हूं। नहीं मैं थोड़ा सा अपने समझने के लिए मैं पूछ रहा हूं। मैं इसी मैं और सरल

2439
02:45:38,640 --> 02:45:42,880
बता दे रहा हूं। मैं प्रश्न तो अपना स्पष्ट कर दूं एक बार प्रश्न अपना स्पष्ट कर दू जैसे

2440
02:45:42,880 --> 02:45:47,040
सूक्ष्म शरीर यानी जो मन हो गया है ना मन अहंकार मुझे मैं

2441
02:45:47,040 --> 02:45:51,360
इस तरीके से तुम्हें नहीं बता पाऊंगा मैं इस तरीके से बता पाऊंगा तुम्हें कि

2442
02:45:51,360 --> 02:45:52,560
नहीं इसमें मैं तुम

2443
02:45:52,560 --> 02:45:56,560
ये बताओ एनर्जी का अस्तित्व तुम मान रहे हो कि नहीं मान रहे हो मैं उस तरीके

2444
02:45:56,560 --> 02:46:00,560
से नहीं समझ पा रहा ना भैया इसीलिए तो मैं ऐसे बोल रहा हूं तो इस मैं इसीलिए तुम्हें समझाने

2445
02:46:00,560 --> 02:46:04,560
के लिए बोल रहा हूं एनर्जी का अस्तित्व मान रहे हो कि नहीं मैं नहीं वो एनर्जी किस

2446
02:46:04,560 --> 02:46:08,720
चीज की क्या एनर्जी है वो मेरे को समझना तो पड़ेगा ना पहले कुछ हां ना बोलने के लिए बिना बिना

2447
02:46:08,720 --> 02:46:12,800
समझे मैं कैसे बोल दूं आप बताइए कैसे तो मैंने मैंने बताया था कि भैया मैं जो खाता

2448
02:46:12,800 --> 02:46:16,800
पीता हूं वो जो कार्ब कार्ब इंटेक करता हूं आप एटीपी की बात

2449
02:46:16,800 --> 02:46:21,200
कर रहे हैं चलो एटीपी मान लो चलो ठीक है एटीपी हां

2450
02:46:21,200 --> 02:46:25,280
एटीपी तो स्थूल शरीर में आ गया ना जीव जो क्रिया करता है वो तो सूक्ष्म शरीर में क्रिया करता है अरे

2451
02:46:25,280 --> 02:46:29,520
तो मेरे चिपाक को तो एटीपी मिली ना वो तो सूक्ष्म शरीर

2452
02:46:29,520 --> 02:46:33,520
में आ गया ना तो एटीपी मिली स्थूल शरीर में आ गया ना वो तो भाई एटीपी का

2453
02:46:33,520 --> 02:46:37,760
अस्तित्व है कि नहीं मैंने कहा मना किया अस्तित्व है कि नहीं

2454
02:46:37,760 --> 02:46:41,760
अलग-अलग आ गया। ठीक है? तो मैं और एटीपी तो

2455
02:46:41,760 --> 02:46:46,400
अलग-अलग होता है वो तो सूक्ष्म शरीर पे होता है। तो यानी कि यानी कि सूक्ष्म

2456
02:46:46,400 --> 02:46:51,280
शरीर पर नियंत्रण के कारण सूक्ष्म शरीर ने एटीपी को यूज किया।

2457
02:46:51,280 --> 02:46:55,280
ये माने सूक्ष्म शरीर क्या करता है? सूक्ष्म जैसे जीव का

2458
02:46:55,280 --> 02:46:59,280
नियंत्रण सूक्ष्म शरीर पे है। हां हां हां उसने उसने सूक्ष्म

2459
02:46:59,280 --> 02:47:04,000
शरीर को आर्डर दिया और सूक्ष्म शरीर ने एटीपी को यूज़ किया।

2460
02:47:04,000 --> 02:47:08,160
अरे केवल सोचा उसने बस केवल इच्छा की। इच्छा उसने इच्छा की

2461
02:47:08,160 --> 02:47:12,400
हां उसने इच्छा की उस इच्छा के कारण जो मेरा सूक्ष्म शरीर है उसने एटीपी

2462
02:47:12,400 --> 02:47:16,800
को यूज़ किया और मेरे स्थूल शरीर पे उसका जो है रिफ्लेक्शन दिखाई एटीपी एटीपी

2463
02:47:16,800 --> 02:47:21,120
भी जो हो गया वो आपका इसी में स्थूल में ही आ गया ये होता है मैं इसको पूरा बोल देता हूं कि जैसे

2464
02:47:21,120 --> 02:47:25,280
जीव ने चाहा और जीव का जीव के चाहने से जो है ये वो

2465
02:47:25,280 --> 02:47:29,680
सूक्ष्म शरीर है ठीक है जिसमें मन बुद्धि चित अहंकार आ जाता है इसमें प्रतिक्रिया

2466
02:47:29,680 --> 02:47:34,000
होती है जब इसमें प्रतिक्रिया होती है तो इसके प्रतिक्रिया के अनुकूल शरीर में क्रिया

2467
02:47:34,000 --> 02:47:38,000
होती है अरे मेरे भाई फिर भी एक एनर्जी का तत्व लिया ना

2468
02:47:38,000 --> 02:47:42,080
क्रिया कराने के लिए तो वो जो वो जो सारा कुछ एनर्जी का बता रहे हो ये पूरे

2469
02:47:42,080 --> 02:47:46,080
शरीर के वो स्थूल शरीर में होगा ना तो पृथ्वी स्थूल नहीं है

2470
02:47:46,080 --> 02:47:50,160
उससे जीव का लेना देना नहीं होता जो जीव का लेना देना नहीं होता बिल्कुल सही

2471
02:47:50,160 --> 02:47:54,240
कह रहे हो बिल्कुल सही कह रहे हो अब मुझे ये बता दो कि मेरी मसल्स चिपाक

2472
02:47:54,240 --> 02:47:58,640
को सिकुड़ने अथवा इलास्टिसिटी होने के लिए एक तुमने एटीपी

2473
02:47:58,640 --> 02:48:02,640
नामक वो मानी शक्ति वो ऑर्डर्स कहीं से भी आए हो मगर उस

2474
02:48:02,640 --> 02:48:06,640
शक्ति का उपयोग हुआ हां ठीक हां हां तो

2475
02:48:06,640 --> 02:48:10,960
जो शक्ति का उपयोग हो रहा है पृथ्वी को खिसकाने इत्यादि

2476
02:48:10,960 --> 02:48:15,200
में वो और ईश्वर अलग-अलग है क्या? जिस

2477
02:48:15,200 --> 02:48:19,360
शक्ति का प्रयोग हो रहा है नहीं वो इच्छा तो उसका गुण है ना

2478
02:48:19,360 --> 02:48:23,680
देखा बस क्या अब तुम अब बस अभी अब फिर बात करेंगे

2479
02:48:23,680 --> 02:48:28,560
हां क्यों क्या हुआ अब फिर बात करेंगे मुझे निकलना भी है और यहां पे तुम

2480
02:48:28,560 --> 02:48:32,640
थोड़ा वैसा दे रहे हो धुंधला आंसर क्लियर नहीं कर रहे हो नहीं धुंधला मतलब कैसे मैं

2481
02:48:32,640 --> 02:48:36,880
समझ गया अब यहां तुम इच्छा पे क्यों ले आए तुमने माना ना मेरी मसल्स को हिलाने के लिए एक एनर्जी

2482
02:48:36,880 --> 02:48:40,960
नामक तत्व है जिसको तुमने एटीपी नाम दिया फिलहाल नहीं अब अब जैसे मैंने मैंने जो उदाहरण

2483
02:48:40,960 --> 02:48:45,120
दिया था मैंने क्या दिया था मैंने उदाहरण यह दिया कि जिस प्रकार इसीलिए

2484
02:48:45,120 --> 02:48:49,120
मैंने उसमें दो तीन पॉइंट इसलिए रखे हुए थे। अब इसमें मैंने उसमें बोला था विचार का भी

2485
02:48:49,120 --> 02:48:53,120
बोला था। है ना विचार। अब इसमें यह होता है कि जैसे हाथ हिलाने पर तो जीव का डायरेक्ट कंट्रोल

2486
02:48:53,120 --> 02:48:57,120
नहीं होता है। वो जैसा चाहता है उसके अकॉर्डिंग वो ईश्वर ही उसके सहायक होता है हाथ हिलाने में। ठीक है?

2487
02:48:57,120 --> 02:49:01,120
खैर वो मैंने मोटे मोटे भाषा में बोला था। लेकिन मैंने इसलिए मैंने जानबूझ करके उसके साथ में ये शब्द

2488
02:49:01,120 --> 02:49:05,280
भी बोला था कि इच्छा मतलब चाहता है विचार करता है। तो जीव के चाहने मात्र से

2489
02:49:05,280 --> 02:49:09,440
मन में मतलब वो जो विचार होते हैं। ठीक है? और वो उसके खुद के सामर्थ्य से होते हैं। उसमें कोई

2490
02:49:09,440 --> 02:49:13,680
ऐसा आप ये नहीं दिखा सकते कि अलग से कोई एनर्जी कुछ ऐसा हो ये गलत बात है फिर। फिर तो खाना

2491
02:49:13,680 --> 02:49:17,680
खाने की जरूरत ही नहीं है। चाहने मात्र से हो जाना चाहिए। एनर्जी तत्व

2492
02:49:17,680 --> 02:49:21,760
का विषय हो गया ना। तो भाई स्थूल पृथ्वी स्थूल है ना उसको एनर्जी चाहिए ना फिर

2493
02:49:21,760 --> 02:49:25,840
हिलने के लिए। पूरी बात तो सुनिए। पूरी बात जब

2494
02:49:25,840 --> 02:49:30,160
तुम जीव के चाहने मात्र से स्थूल शरीर के ऊपर एक एनर्जी

2495
02:49:30,160 --> 02:49:34,160
का स्थूल नहीं कह रहा। सूक्ष्म कह रहा हूं। इसीलिए तो कह

2496
02:49:34,160 --> 02:49:38,240
रहा हूं सुनते नहीं हो आप मेरी बात। आधा तुम कितना भी घुमाओ उसमें अंत में आएगा कि एक

2497
02:49:38,240 --> 02:49:38,960
तत्व मानना

2498
02:49:38,960 --> 02:49:43,440
पड़ेगा एनर्जी के रूप में जो कि एक देश में हो रहा है। घुमा लीजिए कभी कि सिद्ध नहीं कर पाएंगे।

2499
02:49:43,440 --> 02:49:47,520
कितना भी जेली भी बना लिया सिद्ध नहीं पाएंगे। अच्छा ठीक है ठीक है। गुस्सा मत हो गुस्सा मत दो हो चलो

2500
02:49:47,520 --> 02:49:51,680
चलो आगे बढ़ो बताओ। मैं ये शब्द मैं भी बोल दूंगा ना क्या बताओ चलो

2501
02:49:51,680 --> 02:49:55,760
बताओ है ना ऐसे नहीं बोलना चाहिए। खैर बताओ बताओ।

2502
02:49:55,760 --> 02:50:00,400
क्या है? सुन तो लिया एक बार में। चलो ठीक है निर्भय।

2503
02:50:00,400 --> 02:50:04,400
हां। मुझे थोड़ा पंप मारने दो फिर बात करेंगे। हां। चलिए ठीक है भैया। फिर

2504
02:50:04,400 --> 02:50:10,080
बात करते हैं। जय श्री राम। सुन लो। घर वालों की भी सुन लो। दिन भर इसी में ना रहो।

2505
02:50:10,080 --> 02:50:11,920
हां। चलो ठीक ठीक। जय श्री

2506
02:50:11,920 --> 02:50:17,920
राम। ठीक है। नमस्ते।

2507
02:50:37,040 --> 02:50:41,040
जय
