1
00:00:01,960 --> 00:00:06,320
[घंटी की आवाज़] अच्छा अच्छा भैया सर्वशक्तिमान पर थोड़ा सा विचार करें बताओ

2
00:00:06,320 --> 00:00:10,400
अगर आपकी इच्छा हो तो बताओ हां तो अब जैसे

3
00:00:10,400 --> 00:00:14,480
जैसे वो वाला जो आप तर्क बता रहे थे हां तो सबसे पहले भी एक बात आती है कि जैसे अगर

4
00:00:14,480 --> 00:00:18,480
हम ईश्वर को सर्वशक्तिमान कह रहे हैं है ना कुछ भी कर सकने वाली बात कह रहे हैं

5
00:00:18,480 --> 00:00:22,880
तो ये हम क्या क्यों कह रहे हैं क्या हम केवल शब्द प्रमाण

6
00:00:22,880 --> 00:00:27,120
से कह रहे हैं या हमारे पास कोई इसलिए कह रहे हैं इसलिए कह रहे हैं जैसे हम एक नास्तिक

7
00:00:27,120 --> 00:00:31,520
को शुरुआत करते हैं ना वो बताने की जी जी कि भाई तुम्हारी इच्छाओं

8
00:00:31,520 --> 00:00:35,600
का विषय है तो उसकी जो मूल इच्छा का पता चलता है वो

9
00:00:35,600 --> 00:00:39,680
भी उसकी व्यवहार से ही पता चलता है। हां हां तो उसके व्यवहार से उसके

10
00:00:39,680 --> 00:00:43,680
मूल में जाते हैं। जी जी तो उसी प्रकार से उसका जो सब्जेक्ट होगा वो

11
00:00:43,680 --> 00:00:48,240
व्यवहार से ही मूल में जाने वाला होगा। हम थोड़ी ना कह रहे हैं कि मूल में भी निराकार नहीं है।

12
00:00:48,240 --> 00:00:52,400
मूल में तो निराकार ही है। जी मगर उसका व्यवहारिक स्वरूप जैसे उसकी जो मूल

13
00:00:52,400 --> 00:00:56,560
इच्छाएं हैं वो है सच्चिदानंद की इच्छा। उसका व्यवहारिक स्वरूप

14
00:00:56,560 --> 00:01:00,640
क्या है? व्यवहारिक स्वरूप यह है कि बारिश ज्यादा हो रही तो कम

15
00:01:00,640 --> 00:01:04,640
हो जाए। व्यवहारिक स्वरूप यही है। इनहीं से पता चलता है कि मूल में ये है। तो

16
00:01:04,640 --> 00:01:08,640
ऐसे ही जब क्या कहते उसकी जो व्यवहारिक इच्छा है उसके

17
00:01:08,640 --> 00:01:12,720
मूल में सच्चिदानंद है तो ऐसे ही उसकी व्यवहारिक इच्छाओं का एक

18
00:01:12,720 --> 00:01:16,960
व्यवहारिक विषय जिसके मूल में वो सच्चिदानंद वाला ईश्वर है जो

19
00:01:16,960 --> 00:01:17,460
जो

20
00:01:17,200 --> 00:01:21,280
इधर के मूल का उधर विषय है जो जी [गला साफ़ करने की आवाज़] मूल इच्छा

21
00:01:21,280 --> 00:01:25,520
का तो इसलिए कहते हैं। अच्छा भैया ये वाला जो तर्क इसका मैंने थोड़ा सा कल भी

22
00:01:25,520 --> 00:01:29,600
मैंने बताया था। हां इसमें यह अब मैं आपको बताता हूं जब आपने तर्क दिया तो मेरे को इतना

23
00:01:29,600 --> 00:01:33,680
बढ़िया तर्क लगा तो शुरू में मैंने इस तर्क का खंडन करने का प्रयास किया। मैंने कहा इसका खंडन सोचता हूं

24
00:01:33,680 --> 00:01:37,840
अगर पॉसिबल है तो खंडन नहीं है। नहीं मतलब जो

25
00:01:37,840 --> 00:01:41,840
आपसे डिस्कशन के बाद वो बात हुई थी ना उसमें मैंने विचार किया था कि मैंने तो

26
00:01:41,840 --> 00:01:46,000
मैंने वीडियो देखना शुरू किए पुराने वाले आपके तो उसमें मेरे को जो सबसे पहले वीडियो मिला था वो

27
00:01:46,000 --> 00:01:50,240
यही वाला मिला था। ये वाला तर्क वाला। सबसे पहला जो वीडियो था आपका आखरी मैंने देखा तो उसमें नास्तिक

28
00:01:50,240 --> 00:01:54,400
का ही खंडन था। तो उसमें मुझे ये वाला तर्क मिला। तो मैंने इसको लिखा। लिख करके मैंने

29
00:01:54,400 --> 00:01:58,560
इसमें विचार करना चालू किया। तो पहले मैंने सोचा कि ये मैं मान के चलता हूं कि तर्क गलत है। मैं इसका खंडन

30
00:01:58,560 --> 00:02:02,800
करता हूं। तो मेरे से खंडन नहीं हुआ इसका। तो फिर तो फिर मैंने तो मुझे समझा कि ये बहुत जबरदस्त

31
00:02:02,800 --> 00:02:07,040
तर्क है। बढ़िया तर्क है। फिर लेकिन मुझे इसके अंदर एक कमी नजर आई। कमी ये नजर आई कि इससे

32
00:02:07,040 --> 00:02:11,120
मुझे मुझे कुछ ना कुछ मतलब इसमें गड़बड़ी नजर आ रही थी। गड़बड़ी मुझे फिर मुझे

33
00:02:11,120 --> 00:02:15,280
ये क्रैक हुआ तो मैंने इसमें खूब विचार किया। विचार करने के बाद मुझे समझ में आया कि इस तर्क

34
00:02:15,280 --> 00:02:19,760
से वास्तव में मुक्ति और मुक्ति दाता की सिद्धि हो रही है। अब वो कोई भी हो। ठीक है।

35
00:02:19,760 --> 00:02:24,000
अब इसमें एक पॉइंट आया जो सच्चिदानंद है ना जी जी। उन्होंने नहीं माना

36
00:02:24,000 --> 00:02:28,400
है। हमने ही माना है कि हमने ही यह माना है

37
00:02:28,400 --> 00:02:32,480
कि सच्चिदानंद और मोक्ष में अंतर नहीं है। मोक्ष भगवान मोक्ष

38
00:02:32,480 --> 00:02:36,800
स्वरूप है। इसमें कारण क्या है? एक दिन गुरुदेव से हमने प्रश्न किया था

39
00:02:36,800 --> 00:02:40,880
कि कई लोग ये स्कॉन टाइप के लोग ऐसा उड़ाते हैं कि

40
00:02:40,880 --> 00:02:44,880
अद्वैत में भक्ति नहीं है। जी जी ईश्वर के प्रति प्रेम की भावना

41
00:02:44,880 --> 00:02:48,960
नहीं है। नीरस है क्योंकि हम ही भगवान है। जबकि व्यवहार

42
00:02:48,960 --> 00:02:53,280
में हम लोग ऐसा नहीं कहते हैं। वो तो एक प्राप्तव्य का विषय है। जी जी

43
00:02:53,280 --> 00:02:57,360
तो गुरुदेव ने एक सिद्धांत बताया कि अन्यों में

44
00:02:57,360 --> 00:03:01,360
प्रीति आत्मा के लिए होती है। आत्मा में प्रीति

45
00:03:01,360 --> 00:03:05,440
अन्यों के लिए नहीं होती है। जी। यानी कि अगर आप यह कह रहे हैं कि भगवान

46
00:03:05,440 --> 00:03:09,440
और हम अलग हैं तो भगवान एक साधन हो गए। जी जी।

47
00:03:09,440 --> 00:03:13,600
आप खुश तो खुद ही को करना चाह रहे तो आपकी भक्ति कहां सिद्ध हो रही? फिर अगर

48
00:03:13,600 --> 00:03:17,760
तात्विक उसमें चले गए तो भगवान की भक्ति करने से क्या मिला कि खुशी

49
00:03:17,760 --> 00:03:21,920
किसको मिली? आत्मा को तो अपने लिए की। तो भगवान भगवान को

50
00:03:21,920 --> 00:03:26,080
आत्मीय नहीं मानोगे तो भगवान के लिए समर्पण सिद्धि नहीं होगा। आपकी भक्ति वो

51
00:03:26,080 --> 00:03:30,080
सिद्धि नहीं हो पाएगी। जी। तो और दूसरा फिर देखो

52
00:03:30,080 --> 00:03:34,560
फिर द्वैतियों से बात होती है द्वैत वालों से जी जी कि भगवान

53
00:03:34,560 --> 00:03:38,640
सामने खड़े हैं। जी ठीक है। जी जी तो भगवान

54
00:03:38,640 --> 00:03:42,640
सामने खड़े हैं। जी तो शंकराचार्य ने बस इतना किया है कि

55
00:03:42,640 --> 00:03:46,720
भगवान सामने खड़े हैं। खड़े होने पर तुम्हें क्या मिल रहा है? कि मोक्ष

56
00:03:46,720 --> 00:03:47,840
का सुख

57
00:03:47,840 --> 00:03:51,840
जी मोक्ष का अनुभव जी जी तो इसका मतलब

58
00:03:51,840 --> 00:03:57,760
फिर भगवान साधन हो गए। बिल्कुल अनुभव प्राप्त करने के तो

59
00:03:57,760 --> 00:04:02,000
भगवान तुम्हारा अंतिम वो तभी सिद्ध हो पाएंगे जब तुम भगवान

60
00:04:02,000 --> 00:04:06,160
जो दिख रहे हैं या भगवान को जो तुम अनुभव जिस जिस भी तत्व से तुम

61
00:04:06,160 --> 00:04:10,160
अनुभव कर रहे हो जो है ना वो तत्व आखिरी स्टेज ना हो

62
00:04:10,160 --> 00:04:14,240
उसका जो आखिरी स्वरूप है ना परम स्वरूप वो वो अनुभव है जो तुम्हें हो रहा

63
00:04:14,240 --> 00:04:18,320
है हां जो तुम्हें जो तुम्हें ज्ञान और अनुभव का स्वरूप

64
00:04:18,320 --> 00:04:22,400
है वो हो रहा है जो वो ईश्वर का रूप है मतलब

65
00:04:22,400 --> 00:04:26,480
वो ईश्वर का अच्छा समझ में आया फाइनल मतलब फाइनल अल्टीमेट जो ईश्वर

66
00:04:26,480 --> 00:04:30,480
ईश्वर का स्वरूप है वो वो नहीं है जो बैकुंठ में दिख रहा है।

67
00:04:30,480 --> 00:04:34,720
वो वो है जो बैकुंठ में दिखने के कारण तुम्हें फील हो रहा है। [नाक से की जाने वाली आवाज़]

68
00:04:34,720 --> 00:04:38,720
दिखने की हां ठीक है। ठीक है। मतलब एक वो तो केवल मोक्ष के अनुसार

69
00:04:38,720 --> 00:04:42,720
नहीं बता रहा हूं। मैं अभी द्वैत के अनुसार एंडिंग बता रहा हूं। जी जी तो द्वैत

70
00:04:42,720 --> 00:04:46,800
के अनुसार भी अगर एंडिंग है तो कोई लोक है जहां पे भगवान बैठे हैं। हां बिल्कुल

71
00:04:46,800 --> 00:04:50,800
है ना? और हम उन्हें देख रहे हैं। हम खुश हो रहे हैं। सायुज्य सारूप्य सामिप्य इनमें से कोई

72
00:04:50,800 --> 00:04:55,120
मोक्ष है वो। जी तो जब ऐसा हो रहा है तो हमको जो फीलिंग हो रही है

73
00:04:55,120 --> 00:04:59,280
जी जी इसी को आपको भगवान कहना पड़ेगा नहीं तो भगवान साधन मात्र सिद्ध

74
00:04:59,280 --> 00:05:03,360
होंगे आपके बिल्कुल अच्छा इसमें एक पॉइंट आता है कि

75
00:05:03,360 --> 00:05:07,440
जैसे शंकराचार्य जी ने भी तो मतलब साधन माना ही है उन्हें अपने शास्त्रों में

76
00:05:07,440 --> 00:05:11,440
इसलिए अपने शास्त्रों में भगवान को ज्ञान स्वरूप कहा

77
00:05:11,440 --> 00:05:15,520
गया हां अंत में जो आनंद जो आपको आनंद मिल रहा है

78
00:05:15,520 --> 00:05:19,680
ना लास्ट में फाइनल वही भगवान है वो भगवान ही

79
00:05:19,680 --> 00:05:23,680
है वो आनंद की फॉर्म समय अब आपको मिल रहे हैं। बिल्कुल। अब इसमें

80
00:05:23,680 --> 00:05:27,680
ये आ जाता है कि जैसे स्वामी दयानंद जी ने बोला कि जो ईश्वर है वो आनंद स्वरूप है और ज्ञान

81
00:05:27,680 --> 00:05:32,090
स्वरूप है। है ना? तो इसमें अब इसमें बात आ जाती है कि

82
00:05:32,090 --> 00:05:36,240
[गला साफ़ करने की आवाज़] अब जैसे साधन वाली बात आई तो उसमें मैं आपको विचार बता रहा हूं। अगर

83
00:05:36,240 --> 00:05:40,480
जैसे आपको अच्छा लगे तो आप इस विचार को स्वीकार कर सकते हैं। मतलब मैं विरोध भाव से नहीं बता रहा हूं। हम

84
00:05:40,480 --> 00:05:44,560
इसमें ये कि अगर हम ये कहते हैं कि ईश्वर क्या आनंद पाने का

85
00:05:44,560 --> 00:05:48,560
साधन क्योंकि एक पॉइंट आता है कि हम मोक्ष की सिद्धि कर किस तरीके से रहे जिस

86
00:05:48,560 --> 00:05:52,560
तरीके से सिद्धि कर रहे हैं मोक्ष भी उसी तरीके से ही मानना पड़ेगा। है ना? ऐसा नहीं

87
00:05:52,560 --> 00:05:56,640
कर सकते कि मोक्ष को सिद्ध तो हम किसी और तरीके से कर रहे हैं और मान किसी और तरीके से रहे। अब जैसे हम

88
00:05:56,640 --> 00:06:00,800
जो सिद्धि वाला तर्क देते हैं हम ये देते हैं कि जैसे मुझे मिठास

89
00:06:00,800 --> 00:06:04,800
की चाह है तो मिठाई है। हम है ना? यानी

90
00:06:04,800 --> 00:06:08,800
अब मुझे मेरी डिमांड क्या है? मेरी डिमांड मिठाई बन जाना नहीं है। मेरी डिमांड

91
00:06:08,800 --> 00:06:12,960
है मिठाई से जो मुझे मिठास प्राप्त हो रही है वो मुझे चाहिए। वो मुझे चाहिए

92
00:06:12,960 --> 00:06:17,200
वो मेरे को मिलेगा उसकी विषय वस्तु मिठाई से। है ना? इसीलिए मैं मिठाई

93
00:06:17,200 --> 00:06:18,560
की डिमांड कर रहा हूं। रियल

94
00:06:18,560 --> 00:06:22,720
में तो मैं है ना ये एक बात आ जाती है। तो वो वो मिठाई

95
00:06:22,720 --> 00:06:27,200
व्यवहार में है मात्र असली में नहीं है। जी जी मैं केवल यहां है।

96
00:06:27,200 --> 00:06:31,200
जी जी मैं वही बता रहा था कि इसमें ये हो जाएगा कि उसी प्रकार से उसी प्रकार

97
00:06:31,200 --> 00:06:35,440
से जिस जैसे हम मोक्ष की या कह लीजिए सच्चिदानंद की जो हमारी इच्छा

98
00:06:35,440 --> 00:06:39,440
है तो सच्चिदानंद की जो चाह है मूल जो चाय है वो सच्चिदानंद की

99
00:06:39,440 --> 00:06:43,600
ही है। है ना? और सच्चिदानंद का जो विषय वस्तु है वो ईश्वर है।

100
00:06:43,600 --> 00:06:47,600
है ना? तो तो मूल जो चाहे वो ईश्वर बन जाना नहीं है। मूल जो चाहे वो

101
00:06:47,600 --> 00:06:51,680
सच्चिदानंद की अवस्था को पाना है। यानी सच्चिद आनंद आनंदित होना है। दुख से छूटना

102
00:06:51,680 --> 00:06:55,920
है। अच्छा अगर मैं एक बार को दुर्जन ऐसे मान लेता हूं कि मेरी जो मूल चाह है वो ईश्वर बन जाना है।

103
00:06:55,920 --> 00:07:00,080
ठीक है इसको मान लेता हूं। तो भी प्रश्न आएगा कि ईश्वर भी मैं क्यों बना? ये

104
00:07:00,080 --> 00:07:04,160
भी जो चाह है ये मेरे अंदर क्यों आई कि मैं ईश्वर बन जाऊं। फिर लास्ट बस फिर लास्ट

105
00:07:04,160 --> 00:07:08,240
में वही आ जाएगा कि अल्टीमेटली मुझे वो आनंद ही चाहिए। वही है ना कि हमारे यहां

106
00:07:08,240 --> 00:07:12,400
पे सच्चिदानंद को ही ईश्वर कहा गया है। हां मतलब जो आनंद

107
00:07:12,400 --> 00:07:16,400
जो समझने वाला पॉइंट है हां इसमें जो समझने वाला एक छोटा सा पॉइंट ये है कि

108
00:07:16,400 --> 00:07:20,560
यानी हम ये कह रहे हैं कि यानी हम ये मान रहे हैं कि रियल में जो जीव की जो चाय

109
00:07:20,560 --> 00:07:25,040
है वो ये नहीं कि मैं ईश्वर हो जाऊं। उसकी चाय ये है कि मैं आनंद मिले।

110
00:07:25,040 --> 00:07:29,040
अगर ईश्वर को अगर जीव को जीव को जो आनंद है वो ईश्वर

111
00:07:29,040 --> 00:07:33,040
के थ्रू मिल रहा है तो फिर वो उसकी इच्छा पूरी हो गई फिर उसी ईश्वर

112
00:07:33,040 --> 00:07:33,600
बनने वाली बात

113
00:07:33,600 --> 00:07:37,680
का कोई मतलब नहीं रह गया ये था पॉइंट क्या कहा तुमने

114
00:07:37,680 --> 00:07:41,760
लास्ट में जैसे में क्या कहा कि जैसे अगर जो उसकी जो

115
00:07:41,760 --> 00:07:45,760
मूल चाह है वो सच्चिदानंद होना ही है मतलब उसको आनंदित होना ही है दुख से छूट के

116
00:07:45,760 --> 00:07:49,920
आनंद को पाना अगर वो दुख से छूट के आनंद को पा रहा है विषय वस्तु से

117
00:07:49,920 --> 00:07:53,920
ईश्वर से तो ठीक है वो ईश्वर के माध्यम से मुझे सुख मिल रहा है तो बस जो मुझे चाहिए था मिल

118
00:07:53,920 --> 00:07:58,000
गया अब मुझे ईश्वर भी क्यों बनना है? हां तो नहीं बनना ना।

119
00:07:58,000 --> 00:08:02,240
मगर हमने उसको नाम दिया है कि तुमको जो तुम जिसको पा रहे हो वो ईश्वर

120
00:08:02,240 --> 00:08:06,800
है। हां ये ये ठीक है। मैं क्योंकि वो जिससे कि

121
00:08:06,800 --> 00:08:11,120
हां नहीं वो देखो ऐसा है। जी जी कि जब

122
00:08:11,120 --> 00:08:15,440
तक हम कोई एक तत्व छोड़ देंगे ना जी

123
00:08:15,440 --> 00:08:19,600
तब तक हमारा वो जो क्या कहते हैं मोक्ष की स्टेट

124
00:08:19,600 --> 00:08:23,600
है जी जी वो सिद्ध नहीं हो पाएगी। फिर ईश्वर की विवेचना तो यही है ना कि

125
00:08:23,600 --> 00:08:27,760
सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म हां ठीक है फिर वो वो

126
00:08:27,760 --> 00:08:31,840
जो तत्व है वो अलग कैसे हुआ फिर नहीं उसमें उसमें मैं आपको बताता

127
00:08:31,840 --> 00:08:35,920
हूं उसमें थोड़ा सा एक विरोध आता है विरोध ये आता है कि जैसे आप उस वाले वीडियो

128
00:08:35,920 --> 00:08:40,000
में ये भी था कि जैसे आपने कहा था कि ईश्वर वो है जो कुछ भी कर सकता है इसका प्रमाण आप देते

129
00:08:40,000 --> 00:08:44,000
हैं सत्यम ज्ञान अनंतम ब्रह्म ठीक है तो मैंने वो सत्य इसका प्रमाण ये नहीं

130
00:08:44,000 --> 00:08:48,080
है इसका प्रमाण ये तो एक ईश्वर की परिभाषा बना बताते हुए

131
00:08:48,080 --> 00:08:48,720
फिर बाद में

132
00:08:48,720 --> 00:08:52,880
कहते हैं व्यवहारिक व्याख्या अबाध्य फिर उससे आता है सर्वशक्तिमान मतलब

133
00:08:52,880 --> 00:08:56,880
सत्यम ज्ञानम अंतम ब्रह्म तो मूल की व्याख्या है। फिर उसकी एक व्यवहारिक

134
00:08:56,880 --> 00:09:01,600
व्याख्या है कि भाई वह जब सत्यम ज्ञानम अंतम ब्रह्म है तो उसका व्यवहारिक स्वरूप कैसा है कि अबाध्य

135
00:09:01,600 --> 00:09:06,000
अब व्यवहारिक स्वरूप अबाध्य तो वो सर्वशक्तिमान हो गया। देश कृत कालकृत परिस्थिति

136
00:09:06,000 --> 00:09:10,000
कृत किसी भी प्रकार की बाधा से जो मुक्त हो। तो यह वाली जो

137
00:09:10,000 --> 00:09:14,000
बाधा होती है ना कि वो एक सर्व्यापक है तो एक देश कैसे हो जाएगा

138
00:09:14,000 --> 00:09:18,160
या फिर जो पहले से है उसका आना जाना यह परिस्थिति बाधा है। नहीं नहीं

139
00:09:18,160 --> 00:09:22,240
इसका इसका बड़ा अच्छा सशन करपात्री जी ने भी दिया और वही स्वामी दानंद जी दोनों ने सेम ही दिया।

140
00:09:22,240 --> 00:09:26,320
मैं उस मैंने समझा मैंने विचार किया मतलब मैंने विरोध की दृष्टि से नहीं मैंने खुद से विचार किया।

141
00:09:26,320 --> 00:09:28,080
अब वो क्या आया कि

142
00:09:28,080 --> 00:09:32,560
जैसे मैंने ये कहा कि ईश्वर स्वरूप से निर्बाद है। है ना?

143
00:09:32,560 --> 00:09:36,720
तो निर्बाद होना भी उसका स्वरूप है। और अगर आप इस उसके

144
00:09:36,720 --> 00:09:40,800
ईश्वर के एक गुण से जो उसका निर्वाद वाला पॉइंट है उससे उसके स्वरूप का

145
00:09:40,800 --> 00:09:43,520
खंडन कर देंगे तो ये चीज ठीक नहीं बैठेगी। अब

146
00:09:43,520 --> 00:09:47,600
कैसे जैसे वही वही करपात्री जी उसमें उदाहरण देते हैं ना उस वाले वही

147
00:09:47,600 --> 00:09:51,600
नास्तिक वाद वाले में जो सरस्वती समझाते हैं उसी में वो उदाहरण देते हैं

148
00:09:51,600 --> 00:09:55,680
कि जैसे अग्नि जो है वो दाह पदार्थ काष्ट आदि का दहन

149
00:09:55,680 --> 00:09:59,760
करती है। अदाह आकाश आदि का दहन नहीं करती। है ना? यानी

150
00:09:59,760 --> 00:10:03,840
आग जो है वह जलने स्वरूप का खंडन नहीं होना चाहिए ना। हां हां वही उसी

151
00:10:03,840 --> 00:10:07,840
प्रकार हां तो इसमें इसमें यह बात है ना इसमें वो वाली बात आ जाती सृष्टि

152
00:10:07,840 --> 00:10:12,480
के निर्माण की अगर हम बात कहानी सुने तो हमें मानना पड़ेगा

153
00:10:12,480 --> 00:10:16,640
कि निर्गुण रहते हुए भी भगवान सगुण होते हैं। वो

154
00:10:16,640 --> 00:10:20,800
तो दोनों एक ही समय पे होते हैं। जैसे

155
00:10:20,800 --> 00:10:24,880
जैसे आप मुझे निर्गुण और सगुण समझाइए कि जैसे निर्गुण सगुण क्या है? फिर मैं आपको अपना पर्सेक्टिव

156
00:10:24,880 --> 00:10:28,960
बताता हूं। निर्गुण सगुण का यार यही पर्सपेक्टिव है कि जैसे

157
00:10:28,960 --> 00:10:33,440
सबसे पहला स्टेट जो है भगवान का वही सत्यम ज्ञानम अंतम ब्रहबाला जो है

158
00:10:33,440 --> 00:10:37,840
वो निर्गुण एक रस है। कहीं कोई ऐसा नहीं है कि यहां 5 किलोमीटर

159
00:10:37,840 --> 00:10:41,680
में ज्यादा है और वहां 5 किलोमीटर में कम है।

160
00:10:41,680 --> 00:10:45,760
परंतु यदि सृष्टि निर्माण करने करना पड़ेगा तो उनको

161
00:10:45,760 --> 00:10:50,000
कम ज्यादा होना पड़ेगा। वो मैंने फोर्स की बात बताई है ना कहीं

162
00:10:50,000 --> 00:10:54,000
पर ज्यादा हो रही शक्ति कहीं पर कम हो रही है। यह सगुण है उसमें उसमें

163
00:10:54,000 --> 00:10:58,080
मैंने थोड़ा सा विचार किया तो मुझे क्या समझ में आया कि जैसे जो हम ईश्वर

164
00:10:58,080 --> 00:11:02,080
का जो बल है ठीक है वास्तव में उसकी इच्छा ही है और उसका

165
00:11:02,080 --> 00:11:06,080
बल से हम अर्थ फोर्स नहीं ले सकते हैं। फॉर इसलिए कोइंसिडेंटली

166
00:11:06,080 --> 00:11:10,240
मैं एक बच्चे को पढ़ाता हूं चार से पांच मैं उसको ट्यूशन पढ़ाता हूं तो

167
00:11:10,240 --> 00:11:14,480
उसका वो उसमें चैप्टर था फोर्स वर्क एनर्जी वाला वो कल ही मैंने पढ़ाया उसको

168
00:11:14,480 --> 00:11:18,640
उसमें जब मैंने फोर्स देखा तो फोर्स की डेफिनेशन लिखी थी पुल या पुश है ना

169
00:11:18,640 --> 00:11:22,720
तो मेरे दिमाग में क्लिक किया कि यार पुश और पुल तो एक देसी चीज ही कर सकती है

170
00:11:22,720 --> 00:11:26,880
या एक ही साइड से पुश जो सर्वव्यापक है उसके पुल पुश और पुल सिद्ध नहीं होता

171
00:11:26,880 --> 00:11:31,040
इसीलिए तो सगुण का तभी होगा जब वो अवतार लेंगे वही तो मैं कह रहा हूं

172
00:11:31,040 --> 00:11:35,280
नहीं नहीं उसमें पॉइंट ये आ जाए कि पॉइंट ये है कि जैसे ईश्वर तो बिना अवतार लिए ही सृष्टि निर्माण

173
00:11:35,280 --> 00:11:39,440
कर रहा है। हम तो यहां पर या तो यह करना पड़ेगा मैं बताऊं। या तो यह मानना

174
00:11:39,440 --> 00:11:40,560
पड़ेगा कि फिर वही आप

175
00:11:40,560 --> 00:11:44,640
अदो अचिंत जो शंकराचार्य की फिलॉसोफी है उसमें एक चीज अच्छी

176
00:11:44,640 --> 00:11:48,720
लगती है जी। कि क्या किया है कि जो अन्य आचार्य गण हैं जैसे

177
00:11:48,720 --> 00:11:52,720
किसी ने बात की 70 तक जैसे मान लो नीचे से पिलर खड़ा है एक जी जी ठीक

178
00:11:52,720 --> 00:11:56,960
है तो कोई आचार्य गए 70 पे 70 के बाद उन्होंने कहा कि भाई मैं जिन

179
00:11:56,960 --> 00:12:01,120
लोगों को ये ज्ञान दे रहा हूं ना वो इससे आगे जाएंगे तो कंफ्यूज हो जाएंगे तो

180
00:12:01,120 --> 00:12:05,120
उन्होंने 70 पे स्टॉप कर दिया जी जी फिर कोई आचार्य 80 तक चले

181
00:12:05,120 --> 00:12:09,200
गए जी जी फिर कोई आचार्य मतलब अनिर्वचनीय शब्द सब ने कहा

182
00:12:09,200 --> 00:12:13,840
है जी ये नहीं है कि किसी ने नहीं कहा शंकराचार्य जी ने शंकराचार्य

183
00:12:13,840 --> 00:12:18,000
जी ने 100 पे जाके कहा है कि इसके बाद अनर्वचनी है और कई लोगों ने

184
00:12:18,000 --> 00:12:18,800
पहले कह दिया

185
00:12:18,800 --> 00:12:22,960
अब जैसे यहां पे अगर हम ये नहीं मानेंगे कि सगुण हुए भगवान

186
00:12:22,960 --> 00:12:27,040
है ना तो हमें यही यहीं पे अचिंत कह देना पड़ेगा भैया यहां अचिंत शक्ति से

187
00:12:27,040 --> 00:12:31,120
करते हैं उसमें बात आएगी उसमें बात आएगी कि जैसे

188
00:12:31,120 --> 00:12:35,200
जैसे इच्छा मात्र की बात आ गई ना हां हां तो अचिंत शक्ति हो गई फिर वो

189
00:12:35,200 --> 00:12:39,360
वो कैसे हो रहा है हम उसको डिफाइन नहीं कर सकते फिर मतलब जो प्रैक्टिकली हम

190
00:12:39,360 --> 00:12:43,360
डिफाइन कर रहे हैं चीजों को कि भाई वो कैसे हुआ वो डिफाइन नहीं अचिंत शक्ति से

191
00:12:43,360 --> 00:12:48,240
ही कर दिया उन्होंने लेकिन लेकिन ये है कि फिर भी उस अचिंत शक्ति को

192
00:12:48,240 --> 00:12:52,480
आचार्य शंकर ने भी उसको बल बोला है। मतलब बल रूप में उसको स्वीकार किया है। अब उसकी

193
00:12:52,480 --> 00:12:56,480
व्याख्या उसमें हमें थोड़ी और गहराई से मुझे भी शास्त्रों में थोड़ी और गहराई में पढ़नी पड़ेगी

194
00:12:56,480 --> 00:13:00,880
कि ईश्वर का बल और मनुष्य के बल मतलब किस प्रकार से उन्होंने व्याख्या की है। बाकी ये है कि

195
00:13:00,880 --> 00:13:04,880
जैसे अचिंत अगर हम इधर से देखें अगर हम इधर से देखें उधर

196
00:13:04,880 --> 00:13:09,280
ब्रह्म की दृष्टि से ना देखें। ब्रह्म ने तो इच्छा मात्र की है।

197
00:13:09,280 --> 00:13:13,280
इधर से देखें तो कहीं सूर्य कहीं पृथ्वी बन रही है तो हम हमारी दृष्टि

198
00:13:13,280 --> 00:13:16,400
से कहीं फोर्स का कम ज्यादा मानना पड़ेगा।

199
00:13:16,400 --> 00:13:20,720
और वही वही चीज होती है। ईश्वर के अनुसार ईश्वर के अनुसार

200
00:13:20,720 --> 00:13:25,040
क्या होता है? ईश्वर के अनुसार तो कहीं कुछ हो ही नहीं रहा होता है। सब केवल माया

201
00:13:25,040 --> 00:13:29,120
होती है। हम मैं अपना वाला बता रहा हूं। ईश्वर के अनुसार तो कहीं कुछ हो ही नहीं रहा

202
00:13:29,120 --> 00:13:33,120
होता है। माया होती है। मतलब वो माया रूपी संसार होता है। उसी में फिर सब कुछ हो

203
00:13:33,120 --> 00:13:33,840
जाता है।

204
00:13:33,840 --> 00:13:38,000
हमारी ओर से तो यही हो रहा है कि भैया जो निर्गुण भगवान है। सर्व

205
00:13:38,000 --> 00:13:42,160
जो ये क्या कहते हैं सर्वव्यापक जो व्यवहार में ना आ सकने वाला है

206
00:13:42,160 --> 00:13:46,640
वो फिर वो रहते हुए भी स्वरूप के विरुद्ध दूसरा अवतार

207
00:13:46,640 --> 00:13:50,640
लेते हैं। ठीक है। अच्छा वो वो जो क्योंकि यहीं से

208
00:13:50,640 --> 00:13:54,640
कहानी यहीं से हो गई ना व्यवहार में ना आ सकने वाला व्यवहारिक हो गया। ये स्वरूप

209
00:13:54,640 --> 00:13:58,640
के विरुद्ध ही तो हुआ। नहीं तो हम मान ही रहे हैं कि वही एक ही ईश्वर है। वही

210
00:13:58,640 --> 00:14:02,800
व्यवहार में आता ही आता है। ऐसा अब उसमें बात ये थी कि अब जैसे तो फिर वो परिवर्तनशील

211
00:14:02,800 --> 00:14:03,300
हो गया।

212
00:14:03,280 --> 00:14:07,440
नहीं नहीं समझते हैं इसको। जैसे हमने बोला कि व्यवहार में नहीं हंसता तो ऐसा तो नहीं कि मुक्ति मुक्ति

213
00:14:07,440 --> 00:14:11,440
के बाद आखिरकार जीव के व्यवहार में आया ना उसके आनंद का विषय बना ना। व्यवहार में

214
00:14:11,440 --> 00:14:15,520
तो वो आ ही रहा है। अगर आप जैसे जैसे आप ये मानिए कि जो परमार्थिक

215
00:14:15,520 --> 00:14:19,840
ब्रह्म है वो व्यवहार का विषय नहीं बन रहा। लेकिन वो तो एक ही भूत हुआ ना?

216
00:14:19,840 --> 00:14:23,920
नहीं एक एक भूत अभी हमारे यहां एक ही भूत हुआ और आपके यहां तो हुआ ही नहीं तो वो व्यवहार

217
00:14:23,920 --> 00:14:28,000
भी नहीं हुआ। आपके यहां नहीं आपके यहां भगवान के

218
00:14:28,000 --> 00:14:32,080
लोक में गया। आपके यहां पे ब्रह्म के अंदर विचरण करता है ना वो। जीव

219
00:14:32,080 --> 00:14:36,240
जो होता है मतलब अलग से कोई लोकांत नहीं यही दुनिया यही रहता है लेकिन वो ब्रह्मस्थ

220
00:14:36,240 --> 00:14:40,240
हो जाता है एक डायमेंशन चेंज चेंज हो जाता है बस उसका तो ब्रहस्त जब

221
00:14:40,240 --> 00:14:44,320
हो जाता है तो वो ब्रह्म के अंदर रहता है मैंने पढ़ा था कि आपका जो जीव

222
00:14:44,320 --> 00:14:48,640
है मुक्ति में ब्रह्म के अंदर विचरण करता है वो वही उसका सुख है

223
00:14:48,640 --> 00:14:52,720
तो तो उसको जो आनंद वगैरह मिला है कहां तो फिर बोला कि नहीं ब्रह्म

224
00:14:52,720 --> 00:14:56,800
तो हर जगह जैसे यहां घूम रहा है वो शरीर में बाधित नहीं है वो मेरे सामने हो गया अब तक मुक्ति

225
00:14:56,800 --> 00:15:00,880
जीव मेरे सामने होंगे मुझे नहीं पता वो हर जगह वो हर जगह [गला साफ़ करने की आवाज़] अच्छा

226
00:15:00,880 --> 00:15:05,120
अच्छा जी तो उसमें जो हम बात कर रहे थे क्या

227
00:15:05,120 --> 00:15:09,760
बोलते हैं ये जो तर्क था इस तर्क से कि जो व्यवहार में सर्वशक्तिमान की सिद्धि वाला

228
00:15:09,760 --> 00:15:13,840
उसमें हम मैंने मेरे दिमाग में ये क्लिक किया कि हम ये क्या पकड़ रहे हैं हम ये देख

229
00:15:13,840 --> 00:15:17,920
रहे हैं कि दो प्रकार की चाह है एक है मौलिक चा एक है व्यवहारिक चाह ठीक

230
00:15:17,920 --> 00:15:18,420
है

231
00:15:18,320 --> 00:15:22,800
जैसे ये जो आभास रूपी संसार है एक इसके अंदर की चाह है

232
00:15:22,800 --> 00:15:26,880
और क्या है कि जब तक अग्नि जलती नहीं है इधर से अगर देखें तो

233
00:15:26,880 --> 00:15:31,120
हमको ये चीज नहीं होती कि इसके अंदर जो है दाह चमता बिल्कुल

234
00:15:31,120 --> 00:15:35,440
तो हमारे को व्यवहार की दुनिया में एक अग्नि चाहिए ही चाहिए।

235
00:15:35,440 --> 00:15:39,760
तब हम जो है वहां से शुरुआत होती है। अब जैसे चलो मान लो अवतार नहीं है। मान लो सगुण

236
00:15:39,760 --> 00:15:43,840
साकार नहीं है। मगर जो चार ऋषियों के अंतःकरण में जो अग्नि

237
00:15:43,840 --> 00:15:48,000
जली ना ईश्वर ईश्वर रूपी अग्नि तो जली ना। उसने

238
00:15:48,000 --> 00:15:52,240
उपदेश किया ना। अगर वो अग्नि नहीं जलेगी तो वहां से यात्रा ही नहीं शुरू। क्योंकि यह

239
00:15:52,240 --> 00:15:56,320
चीज उन्होंने भी कही है। दयानंद जी ने दयानंद जी ने यह

240
00:15:56,320 --> 00:16:00,560
बात कही है कि ईश्वर के बिना दिए ईश्वर के बिना दिए कुछ नहीं

241
00:16:00,560 --> 00:16:05,040
ले सकते तुम। तुम अपने से सोचोगे तपस्या करके हासिल कर लेंगे नहीं कर पाओगे।

242
00:16:05,040 --> 00:16:09,120
ईश्वर को कहीं ना कहीं देना ही पड़ेगा आपको। जी जी जी तो तो वो जो

243
00:16:09,120 --> 00:16:13,120
अग्नि का मान मामला है अग्नि का मामला तो वहां भी उन्होंने भी लिया। बस

244
00:16:13,120 --> 00:16:17,440
ये है उस अग्नि को हम यहां जो है यहां आंखों वो आंखों का विषय नहीं था। वो केवल अनुभव

245
00:16:17,440 --> 00:16:21,520
का अच्छा ये बताओ तुम्हारे यहां ये और क्या-क्या माना जाता है मतलब

246
00:16:21,520 --> 00:16:25,520
ये सुन सकते हैं कि नहीं ईश्वर को नहीं जैसे

247
00:16:25,520 --> 00:16:29,520
सुनने के लिए वो बात आ जाती है ना कि जैसे जो वस्तु जैसे

248
00:16:29,520 --> 00:16:33,440
उसमें ये आता है कि दो कैटेगरी बांट दी साकार एक निराकार साकार वस्तु

249
00:16:33,440 --> 00:16:37,520
उसमें बोलते हैं जिसका रूप रस गंध स्पर्श इत्यादि माने जाते हैं। ठीक है जिसमें

250
00:16:37,520 --> 00:16:41,520
रूप है रस है गंध इत्यादि शब्द है ये सारे मतलब कहने का मेरा प्रश्न ये है निराकार में है

251
00:16:41,520 --> 00:16:45,520
ही नहीं अब क्योंकि [गला साफ़ करने की आवाज़] निराकार में नहीं तो उसको फिर डायरेक्टली क्योंकि सुनने के सीधे वो मन में

252
00:16:45,520 --> 00:16:49,520
डालता है सीधे मन में डालता है बुद्धि में डाल देता है चीज जो भी डालनी

253
00:16:49,520 --> 00:16:53,600
होती है प्रश्न किया था संदेश देना होगा तो सीधे मन

254
00:16:53,600 --> 00:16:57,760
में डाल दे ठीक उस करपात्र जी मतलब मैं ये बस मेरा ये पूछना था कि कौन-कौन

255
00:16:57,760 --> 00:17:01,760
से व्यवहार में ईश्वर आता है जी जी तो वो किसी व्यवहार में नहीं आता है। अब

256
00:17:01,760 --> 00:17:06,240
अब ये भी पता है ये भी क्यों बोला जाता है कि क्या कहते हैं कि वो मतलब वो

257
00:17:06,240 --> 00:17:10,240
ब्रह्मा आदि शरीर के रूप में वेद नहीं दे रहा वो डायरेक्ट मन में ये भी उसकी सर्वशक्ति मता के कारण

258
00:17:10,240 --> 00:17:14,320
ही बोला जाता है तो वो तो कर सकता है कुछ भी कर सकता है वो तो और

259
00:17:14,320 --> 00:17:18,480
उसमें उसमें बात ये देखी कि ईश्वर ने ये दुनिया जो बनाई है इसका प्रयोजन

260
00:17:18,480 --> 00:17:22,480
क्या है यूं ही अगर ये उसकी शक्ति का लक्षण मात्र

261
00:17:22,480 --> 00:17:27,040
अगर जैसे हम बैठे-बैठे पेन चलाते हैं ना जी जी जैसे हम बैठे-बैठे

262
00:17:27,040 --> 00:17:31,120
टांग हिलाते हैं हाथ चलाते हैं तो ये हमारी शक्ति परिलक्षित हो रही है बस और

263
00:17:31,120 --> 00:17:35,200
कुछ नहीं हो रहा है। इसमें हमारी कोई इच्छा नहीं होती है। उसमें उसमें

264
00:17:35,200 --> 00:17:39,280
ये बात आ जाती है कि जैसे करपात्री जी बोलते हैं मतलब करपात्री जी का उदाहरण मैं केवल

265
00:17:39,280 --> 00:17:43,360
इसलिए दे रहा हूं क्योंकि यही बात हमारे आचार्य जी भी बोलते हैं। अब बात ये है कि मैं अपने आचार्य जी का बोलूंगा तो

266
00:17:43,360 --> 00:17:47,360
सामने जो पक्ष है वो नहीं मानेंगे। तो मैं वही सेम बात जो मेरे आचार्य जी ने बोली वो सामने वाले के आचार्य ने

267
00:17:47,360 --> 00:17:48,480
बोली तो उनका आचार्य कोट कर

268
00:17:48,480 --> 00:17:52,480
देता हूं। ये चीज है। तो कृपात्री जी भी ये बात बोलते हैं कि संसार में

269
00:17:52,480 --> 00:17:56,480
एक भी ऐसा कोई कण भी नहीं है जो निष्प्रयोजन हो। हो वो अलग बात है कि हमें

270
00:17:56,480 --> 00:18:00,560
उसका प्रयोजन पता हो या ना पता हो। लेकिन ऐसी कोई चीज है ही नहीं है।

271
00:18:00,560 --> 00:18:04,640
अगर उन्होंने भक्ति सुधा में बोला है जैसे भगवान बिना किसी

272
00:18:04,640 --> 00:18:08,720
प्रयोजन के यूं ही सृष्टि रचते हैं ऐसे ही हमें मानना पड़ेगा कि

273
00:18:08,720 --> 00:18:14,720
यूं ही अवतार लेते हैं। वो फिर व्यवहारिक भेद है रसगत

274
00:18:15,440 --> 00:18:19,680
मतलब तुम कहीं पर भी तुम कहीं पर भी जो है भगवान की अचिंत

275
00:18:19,680 --> 00:18:23,760
शक्ति नहीं मानते हो। जब वही है ना जब क्लियर हो जा रही है शक्ति फिर अच क्या

276
00:18:23,760 --> 00:18:27,840
रही है ज्ञान पता चल रहा है तो फिर अच क्या हो गया तो निर्गुण से सगुण

277
00:18:27,840 --> 00:18:32,560
बताओ कैसे हुआ निर्गुण से सगुण हुआ ही नहीं ना निर्गुण सगुण एक ही समय में रहता है हमेशा तो

278
00:18:32,560 --> 00:18:36,640
तो एक ही समय में एक रस कैसे हुआ फिर वो मतलब वो कम ज्यादा रहता है कहां

279
00:18:36,640 --> 00:18:40,720
कम ज्यादा हुआ सिद्ध करिए कम ज्यादा हुआ जब कहीं पे फोर्स लग

280
00:18:40,720 --> 00:18:44,960
रही है कहीं पे फोर्स नहीं लग रही है क्या है फोर्स बताइए अरे धक्का

281
00:18:44,960 --> 00:18:49,120
और क्या यानी पुश एंड पुल हम पुश एंड पुल

282
00:18:49,120 --> 00:18:53,120
है ना पुश पुश एंड पुल हो गया फोर्स। ये डेफिनेशन हो गई फोर्स की। तो ये तो एक देसी

283
00:18:53,120 --> 00:18:57,120
के कॉन्टेक्स्ट में होता है। तो तुम बताओ ना मुझे कैसे हो रहा है?

284
00:18:57,120 --> 00:19:01,120
ईश्वर क्योंकि सर्व्यापक है। अब देखिए बात जैसे अगर मैं 5 किलो का डंबल उठा

285
00:19:01,120 --> 00:19:05,120
रहा हूं और एक 10 किलो का डंबल उठा रहा हूं। अंतर ये 10 किलो [गला साफ़ करने की आवाज़] वाले में परमाणु ज्यादा है। है ना?

286
00:19:05,120 --> 00:19:09,120
मैंने पकड़ा एक ही जगह से हुआ है। ईश्वर एक एक परमाणु को धारण किए। इसलिए वो हमेशा उसके

287
00:19:09,120 --> 00:19:13,120
ऊपर कभी 5 किलो 10 किलो का भार कम या ज्यादा लगता ही नहीं है।

288
00:19:13,120 --> 00:19:17,600
उसने तो एक-एक परमाणु को धारण कर रखा है ना। अरे भैया कहीं पे वो क्रियावान

289
00:19:17,600 --> 00:19:21,760
है। कहीं पे क्रियावान नहीं है। एक अंतर आता है। उसमें अंतर आता है

290
00:19:21,760 --> 00:19:25,760
कि उसमें हम उसका कम ज्यादा क्यों नहीं मानते? कम ज्यादा इसलिए नहीं मानते क्योंकि हम देखेंगे बल है क्या? बल

291
00:19:25,760 --> 00:19:29,760
की परिभाषा है क्या? तो बल की परिभाषा इतनी ही होती है सिंपल सा ये होता

292
00:19:29,760 --> 00:19:31,760
है कि

293
00:19:31,760 --> 00:19:36,000
ईश्वर ने इच्छा की या मैंने इच्छा की। ठीक है? और इच्छा करने पे

294
00:19:36,000 --> 00:19:40,080
जो फोर्स के इफेक्ट्स होते हैं जो चौथी क्लास में पढ़ते हैं हम। ठीक है? कि क्या होता है

295
00:19:40,080 --> 00:19:44,080
कि कोई चीज मतलब खड़ी है वहीं पे तो वो गति करने लग जाए।

296
00:19:44,080 --> 00:19:48,080
गति कर रही है तो रुक जाए या तो उसकी दिशा मुड़ जाए या तो उसका स्पीड कम या ज्यादा हो जाए

297
00:19:48,080 --> 00:19:52,160
या तो उसका शेप चेंज हो जाए। ये इफेक्ट्स जहां दिखेंगे तो हम मानते हैं कि फोर सप्लाई हुआ है यानी

298
00:19:52,160 --> 00:19:56,160
बल लगा है। ये परिणाम जहां मिलेंगे हम मानते हैं कि यानी अगर ईश्वर

299
00:19:56,160 --> 00:20:00,240
या जीव ऐसी इच्छा कर रहा है। इच्छा करने के पश्चात अगर ऐसा कुछ

300
00:20:00,240 --> 00:20:04,640
परिणाम दिख रहा है तो हम मानते हैं कि बल लगाया। अगर ऐसी इच्छा नहीं कर रहा है।

301
00:20:04,640 --> 00:20:08,800
ठीक है? मैंने मैंने इच्छा की कि मुझे सुख मिले। तो उसमें तो कुछ कोई परिवर्तन

302
00:20:08,800 --> 00:20:12,800
कोई यानी उसमें बल नहीं लगा। तो अल्टीमेटली उस वाली इच्छा में यानी वही बात

303
00:20:12,800 --> 00:20:16,800
है कि बल कहते किसे हैं? अब है ना अगर ईश्वर ने इच्छा की कि परमाणु इधर से

304
00:20:16,800 --> 00:20:20,800
उधर हो जाए। ठीक है? तो वो जो इफेक्ट है गति करने वाला या

305
00:20:20,800 --> 00:20:24,800
रुकने वाला सेफ चेंज उस इफेक्ट के कारण उन्होंने बोला कि यहां पे बल है। रियल में बल

306
00:20:24,800 --> 00:20:28,960
जैसा कुछ नहीं होता। बल एक फिनोमना मात्र है। तो कैसे हुआ? अब जो ईश्वर

307
00:20:28,960 --> 00:20:33,040
अब जो इच्छा की वो तो संपूर्ण ईश्वर ने की। एक पर्टिकुलर अमेरिका लंदन की

308
00:20:33,040 --> 00:20:37,200
ईश्वर ने की नहीं वो तो संपूर्ण ईश्वर ने की इच्छा। यानी कि चलो ठीक है

309
00:20:37,200 --> 00:20:41,200
ठीक है। ईश्वर इसका मतलब तुम्हारा क्रियावान भी नहीं है। इच्छा

310
00:20:41,200 --> 00:20:45,360
करो तो क्रियावान है ना? इच्छा के अलावा क्रियावान नहीं है। तो और क्या

311
00:20:45,360 --> 00:20:47,280
करेगा वो? इच्छा ही तो करेगा।

312
00:20:47,280 --> 00:20:51,280
इसका इसका इसका तुम अपने ग्रंथों से प्रमाण दो। किसका इच्छा?

313
00:20:51,280 --> 00:20:55,360
वो कोई क्रिया नहीं कर रहा है। केवल इच्छा कर रहा है। इच्छा ही तो उसकी क्रिया

314
00:20:55,360 --> 00:20:59,600
है। मैं बोल तो रहा हूं। अरे भाई ईश्वर कुछ करता नहीं है। केवल इच्छा

315
00:20:59,600 --> 00:21:03,680
करता है। इसका तुम प्रमाण दो मुझे। मैं तो आपको दे दूंगा। मैं आपको दे दूंगा। दो दो

316
00:21:03,680 --> 00:21:07,760
अभी कैसे दे दूं अभी मैं उठ के अपना बाकी बेसिक काम करूं क्या आपको मैं बुक खोल के प्रमाण

317
00:21:07,760 --> 00:21:11,760
दूं मैं बोल रहा हूं दे दूंगा लेकिन अब मैं स्टूडेंट हूं मैंने सारे ग्रंथ पढ़ रखे हैं तो मैं मेरे

318
00:21:11,760 --> 00:21:12,720
को ब्रीफ करिए ना

319
00:21:12,720 --> 00:21:16,800
बाकी बात ये है ना कि सामने वाले ने क्या अपना कांसेप्ट रखा है वो भी तो मैं क्योंकि मैंने

320
00:21:16,800 --> 00:21:21,040
कांसेप्ट रखा है काटिए मैं बता रहा हूं ना काट रहा हूं क्योंकि ईश्वर को अगर

321
00:21:21,040 --> 00:21:25,040
जो उधर तात्विक दृष्टि से देखोगे तो वो तो ठीक है कि तात्विक दृष्टि से उसने केवल

322
00:21:25,040 --> 00:21:29,120
इच्छा मात्र की है और सब हो गया उसको आप बल नहीं कह सकते हो जब

323
00:21:29,120 --> 00:21:33,440
बल बल तब कहेंगे जब उसमें वाले परिणाम घटेंगे तो उसको बल बोल देंगे वो केवल फिनोमना

324
00:21:33,440 --> 00:21:37,440
मात्र है। बल क्या है? बल कोई अलग से कोई गुण नहीं होता। बल एक फिनोमना मात्र होता है। तो वो घट तो

325
00:21:37,440 --> 00:21:41,680
रहे हैं। पृथ्वी घूम तो रही है। धक्का लग तो रहा है पृथ्वी को। तो उसमें कोई अलग से कोई

326
00:21:41,680 --> 00:21:45,680
देखिए अगर वो आपका जो पॉइंट है ना कम ज्यादा होने वाला वो तब सही होता है जब बल

327
00:21:45,680 --> 00:21:49,680
एक इच्छा की तरह एक अलग से कोई गुण होता है बल। है ना? तब वो आपका पॉइंट सही होता है कि

328
00:21:49,680 --> 00:21:53,680
कम ज्यादा बल लगा तो कम ज्यादा ईश्वर। यानी कि तुमने माना कि उन वो बल नहीं

329
00:21:53,680 --> 00:21:57,680
लगाता है। उसके पास बल भी नहीं है। अरे मैं क्या बोल रहा हूं? आप क्या बोल रहे हो?

330
00:21:57,680 --> 00:22:01,920
सगुण का मतलब गुण का मतलब क्या है? ये बताओ। नहीं मैंने क्या बोला? आप क्या बोल रहे गलत इंटरप्रेट

331
00:22:01,920 --> 00:22:07,200
कर रहे हो ना आप इसीलिए पूछ रहा हूं कि गुण का मतलब क्या है?

332
00:22:07,200 --> 00:22:11,200
गुण का मतलब क्या है? गुण का तो वही स्वरूप ही होता है। गुण से

333
00:22:11,200 --> 00:22:15,360
ही स्वरूप होता है। गुण का मतलब स्वरूप है। नहीं गुण से ही स्वरूप होता

334
00:22:15,360 --> 00:22:19,360
है। गुण से स्वरूप होता है। जो वो जो

335
00:22:19,360 --> 00:22:25,200
एक गुण है कि वो ये कर सकता है, वो कर सकता है। उसमें क्षमता एक गुण है। और

336
00:22:25,200 --> 00:22:28,080
स्वरूप स्वरूप क्या है? स्वरूप क्या है? स्वरूप भूत लक्षण

337
00:22:28,080 --> 00:22:32,080
होता है। जो बदला नहीं जा सकता। लक्षण लक्षण वो होता है जिससे किसी चीज को पहचाना

338
00:22:32,080 --> 00:22:36,240
जाता है। उदाहरण के लिए बताऊं कि जैसे मान लीजिए कि कोई वस्तु चेतन है। सगुण

339
00:22:36,240 --> 00:22:40,320
इसको इसको मत बदलो तुम। तुम तुम सगुण की व्याख्या अपनी बता दो मुझे। फिर मैं उसको

340
00:22:40,320 --> 00:22:44,400
काउंटर करूंगा। सगुण की मैं वो बता देता हूं। बाकी जो मैंने जो आपने मेरे को बोला था उस

341
00:22:44,400 --> 00:22:48,400
वाले में मैं थोड़ी सी क्लेरिटी और दे देता हूं। उसमें मैंने ये बात बोला। मैंने ये नहीं बोला कि

342
00:22:48,400 --> 00:22:52,880
ईश्वर बल लगाता ही नहीं है। मैंने वहां पे बताया कि बल है क्या? मैंने ये बताया।

343
00:22:52,880 --> 00:22:57,040
मैंने बोला ना कि ईश्वर तो क्या है कि इच्छा करता है और जब अगर वो ऐसी

344
00:22:57,040 --> 00:23:01,200
इच्छा करता है जिसका यह परिणाम निकले तो उस फिरोगना को बल बोलते हैं। मैंने तो पूरा बताया लेकिन आप

345
00:23:01,200 --> 00:23:05,280
बल तो बल लगा रहे हैं ना। ईश्वर से गुण नहीं है ना। मैं अलग

346
00:23:05,280 --> 00:23:09,360
से कहां कर रहा हूं? मैं कह रहा हूं गुण नहीं है तो फिर अलग से गुण नहीं उसका बल के रूप में कम ज्यादा

347
00:23:09,360 --> 00:23:13,360
होना सिद्ध नहीं होता। सिंपल। ये कहां लिखा है? अलग से कोई बल नहीं है तो बल के रूप में

348
00:23:13,360 --> 00:23:17,440
कम ज्यादा होना सिद्ध है। माना मेरी बात को पलट रहे हो मेरी बात को। मैं ये नहीं मैं ये नहीं कह रहा हूं कि

349
00:23:17,440 --> 00:23:21,760
वो अलग से क्या कहते बल लगता है मगर अलग से नहीं लगता इसलिए वो जो है

350
00:23:21,760 --> 00:23:25,840
वो बल नहीं है ये कहां से सिद्ध हुआ? नहीं मैंने कब बोला कि मैंने कब बोला

351
00:23:25,840 --> 00:23:27,120
कि वो वो

352
00:23:27,120 --> 00:23:31,440
इच्छा कर रहा हो या कुछ भी कर रहा हो पृथ्वी को घूमने के लिए धक्का

353
00:23:31,440 --> 00:23:33,360
मिलता है जिस कारण

354
00:23:33,360 --> 00:23:38,000
से वो घूम रही है जिस कारण से आप उसे धक्का ही देगा

355
00:23:38,000 --> 00:23:42,400
तो वही तो मैं कह रहा हूं कि एक देसी हो के काम करता है वो सगुण तभी तो हो रहा है

356
00:23:42,400 --> 00:23:46,560
तो सगुण देसी हो रहा तो तुम सगुण सगुण

357
00:23:46,560 --> 00:23:50,640
कर रहे हो उसको एक देसी आप केवल एक उसमें इमेजिनेशन कर रहे हो अरे भाई तुम मना कर

358
00:23:50,640 --> 00:23:54,640
रहे हो वो एक देसी दिख रहा है प्रत्यक्ष प्रमाण है भाई

359
00:23:54,640 --> 00:23:58,640
सूर्य रुका प्रमाण एक क्या बात कर रहे हो प्रत्यक्ष उसे बोलते हैं

360
00:23:58,640 --> 00:24:02,880
जिसका पंचेंद्रियों से ग्रहण हो रहा हो क्या बोल रहे हो आप क्यों ये जो ये

361
00:24:02,880 --> 00:24:07,200
प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है कि वो जो है पृथ्वी घूम रही है इत्यादि भैया जी प्रत्यक्ष प्रमाण

362
00:24:07,200 --> 00:24:11,360
नहीं प्रत्यक्ष प्रमाण आप ईश्वर के एक देसी होने का थोड़ी मिल रहा है आपको पृथ्वी के घूमने

363
00:24:11,360 --> 00:24:15,600
का तो मिल रहा है आप ईश्वर की बात कर रहे हो पृथ्वी पे आ जा रहे हो पट से हैं देखो अरे

364
00:24:15,600 --> 00:24:19,600
भाई तो किसको किस पे काम करना सिद्ध करोगे तुम तो आपने ईश्वर को एक देसी

365
00:24:19,600 --> 00:24:23,760
बोलने का प्रत्यक्ष प्रमाण बोला ना अभी एक तो उसकी एक देसी सीता वो उससे

366
00:24:23,760 --> 00:24:27,760
सिद्ध होगी ना कि जहां पे काम जहां पे काम होना सिखाई दिखाई देगा

367
00:24:27,760 --> 00:24:32,320
और काम हो रहा हो नहीं रही ना सिद्ध हो इसलिए नहीं रही तुम

368
00:24:32,320 --> 00:24:36,480
की व्याख्या दे नहीं रहे हो तुम अपने ग्रंथ का प्रमाण दे नहीं रहे हो की ईश्वर केवल इच्छा करता

369
00:24:36,480 --> 00:24:39,120
है बल नहीं है बल नहीं लगाता वो

370
00:24:39,120 --> 00:24:43,280
अब देखिए अब वही बात है ना अब अब मेरी मैंने मैं कुछ और बोल रहा हूं आप मेरी बात को मैं फिर

371
00:24:43,280 --> 00:24:47,280
यही हरकत मैं करूंगा फिर। तुम तुम बताओ ना मैं सुनने के लिए बैठा हूं तत्पर

372
00:24:47,280 --> 00:24:51,680
हूं मैं। है ना मैं आप कुछ और बोलेंगे मैं जबरदस्ती आपकी बात को अपनी मर्जी से इंटरप्रेट करूंगा।

373
00:24:51,680 --> 00:24:55,840
मैं तुमको कह तो रहा हूं कि तुम बताओ मुझे मैं सुनना चाहता हूं। है ना मैं बार-बार

374
00:24:55,840 --> 00:25:00,000
बोल रहा हूं कि अगर आप अगर कोई ईश्वर जो इच्छा करता है जिसके फलाना फलाना परिणाम जो मैंने गिनाए

375
00:25:00,000 --> 00:25:04,000
आपको मैं फिर से गिना देता हूं। ठीक है? वस्तु स्टिल है स्टेशनरी पोजीशन में मोशन में

376
00:25:04,000 --> 00:25:08,000
आ जाए मोशन में है रुक जाए डायरेक्शन चेंज हो जाए स्पीड कम हो जाए ज्यादा

377
00:25:08,000 --> 00:25:12,160
हो जाए या उसकी शेप चेंज हो जाए। ऐसे इफेक्ट्स दिखते हैं तो वो जो इच्छा की उस इच्छा के ही

378
00:25:12,160 --> 00:25:16,160
उस इच्छा मात्र को ही बल बोला जाता है। ये मैंने बोला। ठीक है? अब आप बलि नहीं

379
00:25:16,160 --> 00:25:20,640
बोला। बल ही नहीं बोला। बलि बल यानी कि बल लग रहा है।

380
00:25:20,640 --> 00:25:24,640
उस फिनोमना को बल बोल रहे हैं बल कोई अलग से गुण नहीं है। अरे

381
00:25:24,640 --> 00:25:28,720
भाई बल इच्छा लग रहा है उसी जैसे बल लग रहा है कि नहीं लग रहा है? अरे उस

382
00:25:28,720 --> 00:25:32,880
इच्छा को ही बल बोलते हैं और कुछ यानी कि कहीं पे कहीं पे इच्छा रूपी

383
00:25:32,880 --> 00:25:37,120
बल लग रहा है कहीं पे नहीं लग रहा है। कहीं पे इच्छा रूपी बल नहीं बोलेंगे।

384
00:25:37,120 --> 00:25:41,120
इच्छा रूपी बल नहीं बोलेंगे। इच्छा बोलेंगे इच्छा लग रही है। उस इच्छा को ही देखिए जैसे मान लीजिए 10 तरह

385
00:25:41,120 --> 00:25:46,000
की इच्छा है कि उनसे चार तरह की इच्छा को बल बोलते हैं। यही है। कर तो इच्छा रहा है ना?

386
00:25:46,000 --> 00:25:50,000
और इच्छा जो है इच्छा को बल बोलते हैं ना इच्छा को

387
00:25:50,000 --> 00:25:52,000
बल बोलते हैं इच्छा बल के

388
00:25:52,000 --> 00:25:56,080
मैं बताऊं हो क्या रहा है कि उसकी जो इच्छा है वो जो भौतिक पदार्थ

389
00:25:56,080 --> 00:26:00,720
है उनपे बल का काम कर रही है यही तो होगा बल का काम

390
00:26:00,720 --> 00:26:04,720
बल का काम नहीं कर [हंसी] रही है और जब वो इच्छा करता है और फलाना फलाना एक्टिविटी होती

391
00:26:04,720 --> 00:26:09,920
है तो उस पर्टिकुलर चीज को उस फिनोमिना को हम लोग वो बोल देते हैं बल बोल देते हैं

392
00:26:09,920 --> 00:26:14,160
मतलब कि मतलब कि क्या कहते हैं ईश्वर जो है

393
00:26:14,160 --> 00:26:18,560
वो बिना किसी चेतन वस्तु के वहां पर उसको घुमाने लगता है।

394
00:26:18,560 --> 00:26:22,720
कैसा बिना किसी चेतन वस्तु के मतलब जैसे उसके अंदर चेतन तो है नहीं मटेरियल

395
00:26:22,720 --> 00:26:26,960
में मटेरियल थोड़ी चेतन है। है ना? अब उसने केवल

396
00:26:26,960 --> 00:26:31,200
इच्छा की और वो घूमने लगा। उसकी क्या सूचना गई? क्या नहीं गई? इसके इसको थोड़ा सा डिफाइन

397
00:26:31,200 --> 00:26:35,200
करोगे। कैसे वो घूमी कैसे वहां? क्या सूचना गई? मतलब इच्छा से

398
00:26:35,200 --> 00:26:37,360
कैसे घूम गई पृथ्वी? इच्छा

399
00:26:37,360 --> 00:26:41,440
मात्र से कैसे घूम? हां। तो वो घूमा तो वो

400
00:26:41,440 --> 00:26:45,440
खुद घूमा। वो खुद घूमा। हां। नहीं। ईश्वर थोड़ी घूमेगा तो सर्व्यापक

401
00:26:45,440 --> 00:26:49,520
कैसे घूम जाएगा? सर्व्यापक तो इंच भी इधर उधर नहीं। जब जगह ही नहीं है तो इधर

402
00:26:49,520 --> 00:26:53,600
उधर कैसे हो जाएगा वो? वाइफ। तो ठीक है तो सिद्ध करो फिर पृथ्वी को कैसे घुमाया बताओ?

403
00:26:53,600 --> 00:26:57,600
बोल तो रहा हूं इच्छा से सनिधि मात्र से प्रेम अरे तो भाई

404
00:26:57,600 --> 00:27:01,840
पृथ्वी को क्या एहसास हुआ उस इच्छा के द्वारा जो वो घूम गई

405
00:27:01,840 --> 00:27:06,560
पृथ्वी को पृथ्वी जड़ है उसको क्या एहसास होगा पृथ्वी को फोर्स मिली ना

406
00:27:06,560 --> 00:27:10,640
पृथ्वी को वो इच्छा से ही घूमा इसी चीज को ही बोलते हैं इच्छा मात्र सन्निधि मात्र जिसको

407
00:27:10,640 --> 00:27:15,040
हम लोग बल बोल दे रहे हैं ना वही वो इच्छा मात्र ही है और कुछ नहीं तो यहां तुम इच्छा से

408
00:27:15,040 --> 00:27:19,120
क्या कहते हैं पृथ्वी पर लागू होने वाले फोर्स को मान रहे

409
00:27:19,120 --> 00:27:23,120
हो ना उसको हम लोग बल बोल दे रहे हैं हां तो बल बोलना

410
00:27:23,120 --> 00:27:27,120
पड़ेगा ना बल बोलना पड़ेगा ना लेकिन लेकिन अब देखिए बात यह है

411
00:27:27,120 --> 00:27:31,120
बात यह है कि अब जैसे उसमें या तो आप यह करें या तो आप अगर आप इस चीज को

412
00:27:31,120 --> 00:27:35,120
बल को अलग से कोई फिनोमना लेकर के अलग से गुण स्थापित करें तब बल का कम ज्यादा होना मानेंगे

413
00:27:35,120 --> 00:27:39,200
ठीक है लेकिन बात ये आ जा रही है कि जब ईश्वर जो इच्छा क्योंकि हो तो वो इच्छा से ही

414
00:27:39,200 --> 00:27:43,200
रहा है है ना उसी इच्छा को ही हम लोग बल बोल रहे हैं अब वो इच्छा जो कर रहा है वो तो

415
00:27:43,200 --> 00:27:47,440
ऐसा तो नहीं कर रहा कि वो इच्छा जो वो इच्छा कर रहा है तो संपूर्ण ईश्वर कर रहा है ना कंप्लीट ईश्वर जो सर्व्यापक

416
00:27:47,440 --> 00:27:51,440
ईश्वर है वो कर रहा है ठीक है ठीक है अब क्योंकि कंप्लीट ईश्वर कर रहा है इसीलिए वो

417
00:27:51,440 --> 00:27:52,480
कम या ज्यादा नहीं हो

418
00:27:52,480 --> 00:27:56,640
मैं बता रहा हूं कैसे हो रहा है। जब वो इच्छा संपूर्ण संपूर्ण ईश्वर कर रहा

419
00:27:56,640 --> 00:28:00,880
है। पूरा सर्वव्यापक ईश्वर कर रहा है तो किसी एक जगह

420
00:28:00,880 --> 00:28:04,880
पे अलग तरह का बल और दूसरी जगह पे अलग तरह का बल कैसे इच्छा में भेद है ना कि जैसी

421
00:28:04,880 --> 00:28:08,960
इच्छा कर रहा है वैसा हो रहा है। तो इच्छा में भेद के अनुसार बल में भेद हो रहा है

422
00:28:08,960 --> 00:28:12,960
ना। वो तो जैसे वही बात हो रही है मेरी इच्छा है कि मैं फल खाऊं मैं गाजर

423
00:28:12,960 --> 00:28:16,960
खाऊं। पंच भौतिक पदार्थों को मिलने वाला जो संपर्क है वो

424
00:28:16,960 --> 00:28:21,120
बल के रूप में प्राप्त हो रहा है वो कम ज्यादा हो रहा है उसका रूप भी बदल रहा है नहीं ईश्वर

425
00:28:21,120 --> 00:28:25,280
का नहीं बदल रहा ना वस्तु का बदल रहा है अरे जो

426
00:28:25,280 --> 00:28:29,280
जो उसको फोर्स प्राप्त हो रही है जो उसको

427
00:28:29,280 --> 00:28:33,520
फोर्स प्राप्त हो रही है वो ईश्वर का ही रूप है ना इच्छा

428
00:28:33,520 --> 00:28:37,520
का जो उसको फोर्स के रूप में प्राप्त हो रही है कि घूम वो

429
00:28:37,520 --> 00:28:41,600
घूम रही है फोर्स के रूप में प्राप्त हो रही है ना अब अब वो

430
00:28:41,600 --> 00:28:45,600
अगर सर्वव्यापी एक रस है तो उसकी वो फोर्स दुनिया के

431
00:28:45,600 --> 00:28:49,600
सभी कणों को प्राप्त होनी चाहिए। एक वो इच्छा के ऊपर डिपेंड करता है ना कि इच्छा अगर

432
00:28:49,600 --> 00:28:53,680
उसकी इच्छा यानी यानी कि उसकी फोर्स कहीं पे कम कहीं पे

433
00:28:53,680 --> 00:28:57,680
ज्यादा प्राप्त हो रही है उसकी इच्छा अनुसार। यानी कि उसकी यानी कि ये हुआ

434
00:28:57,680 --> 00:29:01,760
जो आप यानी कह रहे हैं तो उसका यानी ये अर्थ बैठेगा कि उसकी जहां इच्छा हुई

435
00:29:01,760 --> 00:29:05,680
जितने अंश में कार्य करने की इच्छा उतने में उसने इच्छा की वो कार्य।

436
00:29:05,680 --> 00:29:09,840
यानी कि कार्य करने वाली जो फोर्स है उसके रूप में

437
00:29:09,840 --> 00:29:14,080
उसने अपनी इच्छा अनुसार कहीं पे कम फोर्स और कहीं पे ज्यादा फोर्स दी

438
00:29:14,080 --> 00:29:18,560
पंच भौतिक पदार्थों को। ठीक है? मतलब उसने जैसी इच्छा की वैसा काम हुआ सिंपल।

439
00:29:18,560 --> 00:29:22,560
नहीं तुम यहां पे मिस कर रहे हो। तुम यहां पे ये मिस कर रहे हो। तुम शक्ति को मिस

440
00:29:22,560 --> 00:29:23,060
कर रहे

441
00:29:22,800 --> 00:29:26,960
हो ना। वो जो फोर्स है वही शक्ति है ना। वो तुम आप शक्ति और

442
00:29:26,960 --> 00:29:31,920
ईश्वर को अलग मान रहे हो क्या? आप अलग कर रहे हो। फोर्स को अलग कर रहे हो उसकी इच्छा से।

443
00:29:31,920 --> 00:29:36,000
पंचत पंच मैं तो एक ही बोल रहा हूं मैं अलग कहां कर मैं अलग

444
00:29:36,000 --> 00:29:40,160
कर दूंगा तो फिर वो अलग गुण हो जाएगा मैं अलग तो आप भी तो कह रहे हो कि वो तो इच्छा है वो फोर्स

445
00:29:40,160 --> 00:29:44,240
नहीं है मगर उसको तो जब मैंने ये बोला कि वो इच्छा है फोर्स नहीं तो मैंने

446
00:29:44,240 --> 00:29:48,320
अलग कैसे किया मैंने तो एक किया ना इसलिए अगर मैं बोलता कि इच्छा और फोर्स अलग

447
00:29:48,320 --> 00:29:52,480
अलग है तब करना होता आप ये मान रहे हो ना कि आप ये मान रहे हो ना कि पृथ्वी

448
00:29:52,480 --> 00:29:56,480
को फोर्स प्राप्त हुई फिर आप कह रहे हो कि ईश्वर ने तो इच्छा की पर पृथ्वी के लिए

449
00:29:56,480 --> 00:30:00,800
वो फोर्स है हां तो मैंने एकता स्थापित कर रहा हूं ना यहां पे अलग-अलग कहां कर रहा हूं

450
00:30:00,800 --> 00:30:04,880
एकता एकता इसलिए स्थापित नहीं हो रही कि अगर पृथ्वी के लिए हो रही नहीं है

451
00:30:04,880 --> 00:30:08,960
आपने बोला ना कि मैं अलग-अलग कर रहा हूं मतलब मैं बता तो रहा हूं बता तो रहा हूं मेरे भाई सुनो

452
00:30:08,960 --> 00:30:10,480
तो तसल्ली सुनो

453
00:30:10,480 --> 00:30:14,640
पृथ्वी को प्राप्त हो रही है फाॅर्स अब वो ईश्वर ने उसकी इच्छा की है

454
00:30:14,640 --> 00:30:15,840
मगर पृथ्वी को फाॅर्स

455
00:30:15,840 --> 00:30:20,800
प्राप्त हो रही अब ये फाॅर्स आई कहां से इच्छा के कारण आई और फाॅर्स

456
00:30:20,800 --> 00:30:24,800
है कौन अलग से कोई तत्व है क्या नहीं नहीं वही इच्छा ही है वो तो इच्छा ही है

457
00:30:24,800 --> 00:30:28,800
ना ईश्वर ही है फाॅर्स के रूप में वहां पे ईश्वर ही है

458
00:30:28,800 --> 00:30:32,880
इसीलिए उसको कहा के रूप में मतलब बोलिए जैसे बात ये है ना आपको ऐसा लग रहा है कि

459
00:30:32,880 --> 00:30:36,880
फोर्स कोई अलग वस्तु है तो फोर्स के रूप में इच्छा ठीक है बात ये है कि फोर्स कोई

460
00:30:36,880 --> 00:30:40,960
अलग वस्तु है नहीं फोर्स केवल एक शब्द है जो हम तब बोलते हैं जब हम ये

461
00:30:40,960 --> 00:30:45,200
हमें कोई पर्टिकुलर इफेक्ट दिखाई देता है जैसे कि गति करना रुकना गति वस्तु

462
00:30:45,200 --> 00:30:49,360
अगर हमें ये परिणाम दिखाई देते हैं तो ये जो परिणाम का जो कारण स्वरूप होता है उस कारण

463
00:30:49,360 --> 00:30:53,520
रूप इच्छा को हम लोग फोर्स बोलते हैं। ठीक है? तो

464
00:30:53,520 --> 00:30:57,520
यानी कि यानी कि कहीं पर कम कहीं पर ज्यादा

465
00:30:57,520 --> 00:31:01,600
फोर्स के रूप में ईश्वर की इच्छा के रूप में ईश्वर ही है ना। यानी

466
00:31:01,600 --> 00:31:05,760
ईश्वर अब देखिए कम और ज्यादा क्यों नहीं बोलेंगे? इसमें पॉइंट ये आ जाएगा कि अब ईश्वर ने इच्छा

467
00:31:05,760 --> 00:31:09,840
की अब जो ईश्वर ने इच्छा की कि ये जो पत्ता है ये हिले। ठीक है? अब ये जो

468
00:31:09,840 --> 00:31:14,000
इच्छा ईश्वर ने इच्छा की तो क्या ईश्वर ने हम ये नहीं बोलेंगे ईश्वर ने कम इच्छा की। ईश्वर ने ज्यादा इच्छा

469
00:31:14,000 --> 00:31:18,080
की। ईश्वर ने जो इच्छा की वो तो संपूर्ण ईश्वर में एक बराबर ही इच्छा हुई ना। तो एक

470
00:31:18,080 --> 00:31:22,160
रास्ता है। हां। तो फिर सारे पत्ते क्यों नहीं हिले? क्योंकि ईश्वर ने इच्छा ही यही

471
00:31:22,160 --> 00:31:26,560
की कि एक पत्ता हिले तो वो उस एक पत्ते को फोर्स मिली ना वहां पे

472
00:31:26,560 --> 00:31:30,720
ईश्वर के इच्छा ईश्वर के इच्छा करने के कारण पत्ते को फोर्स

473
00:31:30,720 --> 00:31:31,220
मिली

474
00:31:30,960 --> 00:31:35,040
है ना मतलब तुम ये कह रहे हो तुम ये कह रहे हो

475
00:31:35,040 --> 00:31:39,040
यानी ईश्वर ने इच्छा की और वो पत्ता हिला वो जो परिणाम हुआ उस परिणाम को हम फोर्स बोल रहे

476
00:31:39,040 --> 00:31:43,120
हैं सिंपल परिणाम को फोर्स बोल रहे हो परिणाम को कैसे बोल फोर्स बोल

477
00:31:43,120 --> 00:31:47,120
सकते हो क्यों चौथी क्लास की साइंस की बुक में आ रखा है सुनो सुनो सुनो सुनो सुनो सुनो परिणाम

478
00:31:47,120 --> 00:31:51,600
मतलब पृथ्वी का घूमना फाॅर्स है ये पृथ्वी पे फोर्स घुमा घुमा रही है

479
00:31:51,600 --> 00:31:55,600
ये इसमें ये होता है कि जैसे मान लीजिए हमने कोई क्रियाकलाप देखा ठीक है नहीं एक मिनट अभी

480
00:31:55,600 --> 00:31:59,600
तुम्हें परिणाम जरा सिद्ध कर दो पृथ्वी का घूमना वही मैं वही चीज सिद्ध कर

481
00:31:59,600 --> 00:32:03,680
रहा हूं मैं वही चीज सिद्ध कर रहा हूं अभी तक मैं वही बोल रहा था अब जैसे ये होता है कि

482
00:32:03,680 --> 00:32:07,680
जैसे मान लीजिए कि कोई बॉल मेरे सामने रखी है हम ठीक है इसमें फोर्स

483
00:32:07,680 --> 00:32:12,000
लगा नहीं लगा कैसे पता तो क्योंकि अब इसमें अब जब हम वो चार पांच इफेक्ट

484
00:32:12,000 --> 00:32:16,080
जब तक इसमें नहीं हटेंगे नहीं दिखेंगे हमें तब तक हम क्लेम नहीं कर सकते कि इसमें फोर्स लगा अब ये

485
00:32:16,080 --> 00:32:20,160
बॉल खड़ी है और इसको मैंने बुला तो मारा और ये बॉल चलने लग गई तो हम मानेंगे कि अगर इसमें में

486
00:32:20,160 --> 00:32:24,320
स्टेशनरी सेम मोशन में आई है। तो यानी इसमें फोर्स लगा है। यानी हमने क्या किया? यानी हमने

487
00:32:24,320 --> 00:32:28,880
माना कि ये जो परिणाम हुआ इस परिणाम को देख के हमने ये अस्यूम किया कि नहीं इसमें

488
00:32:28,880 --> 00:32:32,880
जो ये जिस भी कारण से हुआ ये फोर्स है। हमने उसको नाम दे दिया कि फोर्स हां मतलब

489
00:32:32,880 --> 00:32:36,960
परिणाम का कारण फोर्स है। परिणाम फोर्स नहीं है। परिणाम परिणाम

490
00:32:36,960 --> 00:32:40,960
हो जाएगा। परिणाम का अभी तुमने अभी तुमने कंफ्यूज किया था ना। तुमने परिणाम को ही फोर्स कर

491
00:32:40,960 --> 00:32:45,120
दिया। बोला यही था। हो सकता है कि हां वो मैं समझ गया। त्रुटि हो।

492
00:32:45,120 --> 00:32:46,080
निकल गया होगा। नहीं

493
00:32:46,080 --> 00:32:50,080
नहीं तुमने बोला यही था। तुमने यह बोला ना यही बोले आ रहा

494
00:32:50,080 --> 00:32:54,400
हूं मैं बार अपनी बात कई बार रिपीट कर चुका हूं हां तो गलती हो गई होगी रिपीट

495
00:32:54,400 --> 00:32:58,960
बार करने के कारण तो परिणाम परिणाम में

496
00:32:58,960 --> 00:33:03,040
क्या कहते हैं परिणाम से ज्ञात होता है कि फाॅर्स है वहां पे तो फाॅर्स को मान

497
00:33:03,040 --> 00:33:07,360
लिया ना हमने अरे भैया अभी मैंने क्या बोला था इस बार फाॅर्स

498
00:33:07,360 --> 00:33:11,840
फाॅर्स के अस्तित्व को माना कि नहीं माना उसको एक्सप्लेन कर देने से उसका अस्तित्व

499
00:33:11,840 --> 00:33:15,920
थोड़ी ना नकार सकते हो फाॅर्स का अस्तित्व है की नहीं भैया मैंने ये बोला

500
00:33:15,920 --> 00:33:20,000
हां हां हां हां कि जैसे जैसे मान लीजिए इसको ऐसे समझिएगा बड़ा सिंपल है कि मान लीजिए बॉल

501
00:33:20,000 --> 00:33:24,000
खड़ी है। ठीक है? इसको मैंने अब ये बॉल मूव मूव करने लग गई। ठीक है? खड़े-खड़े

502
00:33:24,000 --> 00:33:28,160
अचानक से ये मूव करने लग गई। तो अब ये अब ये जो मूवमेंट हुआ इसको हमने

503
00:33:28,160 --> 00:33:31,120
इसको बोला कि ये मूवमेंट हुआ यानी यहां पे फोर्स लगा। ठीक है?

504
00:33:31,120 --> 00:33:35,520
इसको हमने लौकिक भाषा में हमने इसको ऐसे बोल दिया कि इसको यहां पे फोर्स लगा तब ये वाल मूव करी। कैसे

505
00:33:35,520 --> 00:33:39,840
परिणाम देख के? अब इसमें अब इसमें अब इसमें आगे क्या आ रहा है? अब लौकिक

506
00:33:39,840 --> 00:33:43,920
भाषा से हम उसको फोर्स पूरा पूरा बोल देता हूं। ठीक है ना?

507
00:33:43,920 --> 00:33:47,920
अब इसमें ये आया अब ये जो ये जो मूव हुआ ये क्या था क्या ऐसा हो गया कौन

508
00:33:47,920 --> 00:33:52,400
सा तीर लग गया इसमें कि मूव हो गया तो पॉइंट यहां आया कि ये इच्छा से ही मूव हुआ

509
00:33:52,400 --> 00:33:52,900
ठीक है

510
00:33:52,880 --> 00:33:57,120
लेकिन उस पर अब जैसे मेरी इच्छा ये भी थी कि बॉल यहीं रहे मेरी इच्छा तो ये भी थी

511
00:33:57,120 --> 00:34:01,200
लेकिन फिर जब मेरी इच्छा ये होगी कि अब ये बॉल मूव करे तब मैंने किक किया और ये बॉल मूव भी करी यानी दो

512
00:34:01,200 --> 00:34:05,280
प्रकार की इच्छाएं हो गई जब तक ये मेरी इच्छा थी कि बॉल यहीं रहे ठीक है तो उस इच्छा को

513
00:34:05,280 --> 00:34:09,440
हम फोर्स नहीं बोलेंगे हम इच्छा को ही फोर्स बोल रहे हैं ठीक है एक प्रकार की इच्छा

514
00:34:09,440 --> 00:34:13,680
को हम फोर्स बोल रहे हैं दूसरे प्रकार की इच्छा को फोर्स नहीं बोल रहे इतना ही है अंतर मेरी

515
00:34:13,680 --> 00:34:18,240
का अस्तित्व है ना मेरे भाई फोर्स का अस्तित्व नहीं है अलग से कोई

516
00:34:18,240 --> 00:34:22,560
इच्छा ही है वो तो इच्छा फोर्स के रूप में प्राप्त हो रही है ना पंच भौतिक पदार्थों

517
00:34:22,560 --> 00:34:26,880
को उसको केवल जब जिस इच्छा से

518
00:34:26,880 --> 00:34:30,960
अगर निकल रहा है इच्छा को फोर्स बोल रहे हो हम अगर जिस इच्छा

519
00:34:30,960 --> 00:34:35,040
से हां तो इच्छा को फोर्स बोलना पड़ेगा ना फोर्स बोलना

520
00:34:35,040 --> 00:34:39,120
पड़ेगा ना क्यों मान रहे हो आप अलग से क्यों मान रहे हो नहीं अलग से फोर्स वो फोर्स कम ज्यादा हो

521
00:34:39,120 --> 00:34:43,520
रही है ना नहीं अलग से आप क्यों फोर्स मान रहे हो

522
00:34:43,520 --> 00:34:48,800
देखिए अगर आप खुद ही कह रहा हूं हां ठीक है अगर आप ये बोलेंगे कि

523
00:34:48,800 --> 00:34:52,960
सुनो मैं बताऊं हो क्या रहा है हो क्या रहा है मैं बताऊं तुम

524
00:34:52,960 --> 00:34:56,960
जो है ठीक है सही पॉइंट पे आ गया एकदम सही पॉइंट पे आ गया मैं मैं बोलना चाहता

525
00:34:56,960 --> 00:35:01,040
हूं मैं आपकी इसी स्टेटमेंट को ले रहा हूं आपकी इस स्टेटमेंट को ले ले रहा हूं कि फ़ कम ज्यादा हो रहा है

526
00:35:01,040 --> 00:35:05,040
ठीक है तो अगर आप ये कहेंगे कि अगर आप ये कहेंगे कि फोर्स कम ज्यादा हो रहा है अल्टीमेटली

527
00:35:05,040 --> 00:35:08,240
आप यही कह रहे हैं कि इच्छा कम ज्यादा हो रही है तो इच्छा ही इच्छा

528
00:35:08,240 --> 00:35:13,040
अनुसार फ़ यही यही यही तो अंतर है

529
00:35:13,040 --> 00:35:17,040
मैं बोल रहा हूं कि इच्छा अनुसार फोर्स कम या ज्यादा नहीं हो रही है। इच्छा ही फोर्स है। मैं यही तो

530
00:35:17,040 --> 00:35:21,040
बोल रहा हूं। ठीक है। ठीक है। ठीक है। इच्छा ही है। अब मैं बता रहा हूं

531
00:35:21,040 --> 00:35:25,360
है क्या। कि भगवान ने तो केवल इच्छा की। ठीक है?

532
00:35:25,360 --> 00:35:29,520
उस इच्छा के कारण जो हमारे पंचभौतिक पदार्थ है उनको जो है फाॅर्स

533
00:35:29,520 --> 00:35:33,520
प्राप्त हुई। जिसके कारण वो क्रियाशील दिखने लगे। ठीक है। नहीं नहीं ये

534
00:35:33,520 --> 00:35:37,520
नहीं है। हां हां हां बताओ क्या है। इच्छा ही इच्छा ही फोर्स है। जिस

535
00:35:37,520 --> 00:35:41,920
इच्छा से गति प्राप्त हुई उस इच्छा उस इच्छा पर्टिकुलर इच्छा कौन? भाई इच्छा

536
00:35:41,920 --> 00:35:46,000
ही है मगर वो फाॅर्स के रूप में प्राप्त हो रही है पंच भौतिक पदार्थों

537
00:35:46,000 --> 00:35:50,480
को और वो है तात्विक तात्विक विवेचना उसकी इच्छा है नहीं तात्विक

538
00:35:50,480 --> 00:35:54,640
फाॅर्स को भी तात्विक विवेचना के रूप में नहीं अगर अगर तुम इच्छा कहोगे तो फिर वो इच्छा

539
00:35:54,640 --> 00:35:59,200
सूचना कैसे पहुंची है पंचौतिक फिर ये फोर्स कैसे पहुंचा?

540
00:35:59,200 --> 00:36:03,200
फाॅर्स तो उसकी शक्ति है भैया धक्के के पास उसका एक्सप्लेन करिए फिर शक्ति को

541
00:36:03,200 --> 00:36:07,520
अगर आप इच्छा को एक्सप्लेन करने को बोलेंगे शक्ति को एक्सप्लेन करने को बोलूंगा। अरे भैया तो हमें मानना

542
00:36:07,520 --> 00:36:11,840
पड़ेगा ना यहां पर अचिंत शक्ति भाई तो मैं तुम्हें अचिंत मनवाना चाह रहा हूं। नहीं अचिंत

543
00:36:11,840 --> 00:36:15,920
इसलिए नहीं बोलेंगे क्योंकि हमें पता है कि इच्छा लग रही है तो अचिंत कहां रह गया फिर वो वो

544
00:36:15,920 --> 00:36:20,000
काम कैसे कर रही है यह अचिंत है ना वो एक अलग बात हो

545
00:36:20,000 --> 00:36:23,680
गई तो बस अचिंत तुमने मान लिया कि दुनिया में

546
00:36:23,680 --> 00:36:28,240
कुछ अचिंत होता है आप जबरदस्ती बोलेंगे तो थोड़ी हो जाएगा तुम

547
00:36:28,240 --> 00:36:34,240
एक्सप्लेन नहीं कर सकते मेरे पक्ष का उत्तर भी तो सुन लीजिए हां बताओ

548
00:36:34,240 --> 00:36:38,240
उसमें पॉइंट शायद ये चल रहा था कि इच्छा ही फोर्स है शायद ऐसा कुछ पॉइंट चल रहा था

549
00:36:38,240 --> 00:36:42,240
ना हां हां एक्सप्लेन वाला एक्सप्लेन वाला एक्सप्लेन वाला पॉइंट चला था कि अगर तो मैंने मैंने ये

550
00:36:42,240 --> 00:36:46,240
बोला कि जैसे मुझे पता है कि ये जो ये जो कार्य हुआ है

551
00:36:46,240 --> 00:36:50,400
इसका कारण क्या है? ठीक है? अब ये तो कारण तो पता चल गया

552
00:36:50,400 --> 00:36:54,480
लेकिन इस कारण ने ये कार्य किस प्रकार के मैकेनिज्म क्या है? तो

553
00:36:54,480 --> 00:36:58,720
मैकेनिज्म का ना पता होना और कारण का ना पता होना दोनों में अंतर है।

554
00:36:58,720 --> 00:37:02,880
ठीक है? अब जब हम बोलते हैं ना किस कैसे किया? ठीक है? यानी यानी इसका कारण

555
00:37:02,880 --> 00:37:07,040
क्या है? तो अब कारण बोल देते हैं अचिंत शक्ति। तो वहां पे मैं आपसे मैकेनिज्म नहीं पूछूंगा

556
00:37:07,040 --> 00:37:11,040
किस प्रकार किया? उस शक्ति ने कैसे क्योंकि वो शक्ति का मैकेनिज्म तो मैं खुद मतलब अभी नहीं

557
00:37:11,040 --> 00:37:15,120
बता रहा है ना मैकेनिज्म को समझने को तो फिजिक्स बोलते हैं फिजिक्स जो पूरी प्रणाली

558
00:37:15,120 --> 00:37:19,200
बनी हुई तो यही मैकेनिज्म ही समझेंगे दुनिया कैसे बनी है क्या काम करता है क्या फोर्स है वो अलग बात हो

559
00:37:19,200 --> 00:37:23,200
गई तो मैकेनिज्म पे बात नहीं है बात ये है कि उसका कारण क्या है अब आप कारण

560
00:37:23,200 --> 00:37:27,360
को अचिंत बोल देंगे तो फिर वहां हलफा हो जाएगा ना हम तो कारण बता रहे है आप कारण को अचिंत बोल दे रहे है पॉइंट

561
00:37:27,360 --> 00:37:31,520
यहां पे ये टकराव आ रहा है नहीं तो मैं उस विधि को पूछ रहा हूं कि वो सूचना

562
00:37:31,520 --> 00:37:35,920
कैसे प्राप्त हो रही है वहां ये तो मैकेनिज्म पे आ गए ना आप हां तो अब मैकेनिज्म

563
00:37:35,920 --> 00:37:38,800
समझाओ ना मुझे नहीं अभी मतलब

564
00:37:38,800 --> 00:37:42,880
मैं ये कहना चाह रहा हूं मैंने क्या लाइन बोला मैं मैं

565
00:37:42,880 --> 00:37:47,120
ये कहना चाह रहा हूं कि जैसे पृथ्वी भूमि तो उसको कोई

566
00:37:47,120 --> 00:37:51,200
फोर्स प्राप्त हुई या फिर उसको कोई नहीं

567
00:37:51,200 --> 00:37:55,500
वो वो इच्छा देखो तुम वहां शब्दों का खेल है मैं बता रहा हूं

568
00:37:55,500 --> 00:38:00,560
[हंसी] एक मिनट एक मिनट एक मिनट

569
00:38:00,560 --> 00:38:01,060
जब

570
00:38:00,880 --> 00:38:04,960
पृथ्वी घूमी तो उसके कोई ब्रेन है जिसमें उसको

571
00:38:04,960 --> 00:38:10,640
पता लगा कि ईश्वर की इच्छा ये है तो यह करना है। उसको क्या प्राप्त हुआ?

572
00:38:10,640 --> 00:38:13,920
उसको क्या प्राप्त हुआ?

573
00:38:13,920 --> 00:38:17,920
भाई तो इसका मतलब इच्छा प्राप्त हुई। यानी कि मतलब तुम ये मान रहे समझ

574
00:38:17,920 --> 00:38:21,920
सकते हैं ना। इसका मतलब एक मिनट एक मिनट एक मिनट 1 मिनट। यानी कि तुम

575
00:38:21,920 --> 00:38:26,000
ये मान रहे हो वहां पे कोई बल नहीं लगा। बस वो घूम गई। कुल मिला के कहना

576
00:38:26,000 --> 00:38:30,080
ये और जब वो घूमी तो उसी घूमने वाले जिस इच्छा को यानी जब ईश्वर ने इच्छा

577
00:38:30,080 --> 00:38:34,160
की नहीं कि तू घूम। ठीक है? यानी कि वो जो इच्छा है उसी इच्छा को हमने

578
00:38:34,160 --> 00:38:38,240
बल बोला। अरे तो फिर बल लगा बल मिला ना ऐसे बोलो ना

579
00:38:38,240 --> 00:38:41,360
कि बल मिला उसको नहीं बल मिलना अलग बात हो

580
00:38:41,360 --> 00:38:45,520
गई और हमने बल बोला हमने बल बोला पर उसको बल मिला नहीं वो

581
00:38:45,520 --> 00:38:49,600
अच्छा ही है बल जैसा कुछ नहीं है यानी कि तुमने अभी क्या बोला कि

582
00:38:49,600 --> 00:38:53,760
उसको उसको हमने बल बोला बल बोला कि नहीं बोला? बल हमने किसको बोला?

583
00:38:53,760 --> 00:38:57,920
बल हमने तब बोला ना अभी वही बात है ना। मेरे को लिखित रूप में आपको देना पड़ेगा

584
00:38:57,920 --> 00:39:02,000
क्योंकि आप मेरी बात को वो बार-बार कहिए ना मेरे को बार-बार आप बोलते रहते हैं। एक मिनट होल्ड

585
00:39:02,000 --> 00:39:06,400
करो हां एक मिनट होल्ड करो। जी जी तो अभी हम लोग यहां तक पहुंचे हैं

586
00:39:06,400 --> 00:39:10,400
कि जो इच्छा इक्वल टू बल हां जो इच्छा

587
00:39:10,400 --> 00:39:14,560
होती है उसे हम बल बोलते हैं। ठीक है पर्टिकुलर इच्छा इज इक्वल

588
00:39:14,560 --> 00:39:18,640
टू बल नॉट कंप्लीट इच्छा बट पर्टिकुलर इच्छा इक्वल टू बल ऐसा ही है। हां अब इसको

589
00:39:18,640 --> 00:39:20,400
यहां रोकिए फिर मैं नहा के आता हूं फिर बात करते हैं।

590
00:39:20,400 --> 00:39:24,400
और तुम वो भी बताना कि वो केवल इच्छा करता है बल नहीं लगाता। बता तो दिया

591
00:39:24,400 --> 00:39:29,040
मैंने और क्या बताना है प्रूफ तो कर दिया मैंने। तुम्हारे ग्रंथ से बताओ।

592
00:39:29,040 --> 00:39:33,040
अच्छा हमें आर्य समाज को गलत सिद्ध करना है ना। अब वो तो अगर कोई

593
00:39:33,040 --> 00:39:37,040
आर्य समाज के नाम से आर्य समाज के सिद्धांतों को क्रॉस करता चला जाएगा

594
00:39:37,040 --> 00:39:41,040
धीरे-धीरे अद्ती हो जाएगा उससे हमें क्या मतलब है नहीं आर्य समाज में स्वामी दयानंद छह

595
00:39:41,040 --> 00:39:45,440
के छह दर्शनों को माना हुआ है आर्य नहीं वो ठीक माना है उसमें कहीं

596
00:39:45,440 --> 00:39:49,520
उन्होंने ये बाला है उन्होंने माना है कि मेरा जो ज्ञान जो प्रदर्शित हो रहा है जो मैं बातें बोल रहा हूं कहां

597
00:39:49,520 --> 00:39:53,600
से बोल रहा हूं छे दर्शनों के समन्वय के आधार पर बोल रहा हूं अगर एक भी दर्शन हटा दो मेरा

598
00:39:53,600 --> 00:39:57,680
ज्ञान खंडित हो जाएगा ये ऐसे बहुत से लोग बोलते हैं मगर यह

599
00:39:57,680 --> 00:40:02,160
बात स्वामी दयानंद जी ने मानी है कि नहीं मानी कि ईश्वर बल नहीं लगाता

600
00:40:02,160 --> 00:40:06,560
ईश्वर केवल इच्छा करता है तो बात वही आ जाती है ना बात वही आ जाती है कि अगर वो

601
00:40:06,560 --> 00:40:10,960
बात बोल रहे हैं और जिस उन्होंने ग्रंथों को स्वीकार कर रखा है ठीक है तो हम ये मानेंगे ना कि

602
00:40:10,960 --> 00:40:15,040
दयानंद जी गलत थे जो उन्होंने छह दर्शनों को भी मान लिया और जो है ये भी कह दिया

603
00:40:15,040 --> 00:40:19,120
कि ईश्वर जो है बल लगाता है नहीं बोलने का आधार क्या होगा? यही की

604
00:40:19,120 --> 00:40:24,000
उनकी बातें मिस मम्मैच हो रही है। अगर तुम अगर तुमच

605
00:40:24,000 --> 00:40:28,080
तब होगी जब उनके विरुद्ध में बात होगी। मैं बता रहा हूं। जैसे तुमने छह दर्शनों

606
00:40:28,080 --> 00:40:32,240
से सिद्ध किया कि ईश्वर इच्छा करता है बल नहीं लगाता। ठीक है और उन्होंने

607
00:40:32,240 --> 00:40:35,440
उन्होंने ये कहा है कि मैंने जो भी बात बोली छह दर्शनों के हिसाब से बोली

608
00:40:35,440 --> 00:40:39,680
है ठीक है इच्छा से चाहिए ना मैं आपको भी दिखाता हूं भाषण है

609
00:40:39,680 --> 00:40:43,680
मैं मैं तुम्हें बल भी दिखा दूंगा मैं बल भी दिखा दूंगा तुम्हें उन्हीं का लिखा हुआ है

610
00:40:43,680 --> 00:40:47,760
कि बल बल होता हां तो हां तो बात ये है ना कि अब उसकी व्याख्या कौन करेगा उसकी व्याख्या भी

611
00:40:47,760 --> 00:40:51,840
करेंगे जो शिष्य मैं हम शिष्य की व्याख्या करेंगे ना तुम उन्होंने

612
00:40:51,840 --> 00:40:55,840
तुम्हें अपना प्रामाणिक शिष्य घोषित किया है क्या? नहीं उनकी शिष्य उनकी परंपरा में आता हूं ना मैं उनकी

613
00:40:55,840 --> 00:40:59,920
गुरु परंपरा में अरे भाई वो आपको अपना प्रामाणिक रूप से बोलने वाला मान

614
00:40:59,920 --> 00:41:04,000
रहे हैं कि नहीं मान रहे ये कैसे तय होगा अरे मैं आ तो रहा हूं मेरे को उनके ज्ञान प्राप्त

615
00:41:04,000 --> 00:41:08,080
हो रहा है ना इसीलिए हमको उनकी चीजों का और रिसर्च किया जो

616
00:41:08,080 --> 00:41:12,480
उन्होंने बोला था ना कि मेरे को प्रमाणिक मेरे को अच्छा सेशन नहीं मिला उन्होंने पहले बोला था बाद में उन्हें मिले थे

617
00:41:12,480 --> 00:41:16,480
मेरे को थोड़ा और मैंने पता किया तो इसका मतलब उससे मान लिया जाए आप उनकी ओर से बोलने

618
00:41:16,480 --> 00:41:20,480
वाले प्रामाणिक व्यक्ति है बिल्कुल है उन्होंने जबकि घोषित नहीं किया

619
00:41:20,480 --> 00:41:24,800
है हम ये हम ये क्यों ना हम ये क्यों ना मान ले कि दयानंद

620
00:41:24,800 --> 00:41:28,800
जी को आता नहीं था। आपको आता है। नहीं तो ये बात आपको

621
00:41:28,800 --> 00:41:32,880
कैसे ये बोलने का आधार क्या बनेगा इस बात का? दयानंद जी नहीं बता पाए वो बात

622
00:41:32,880 --> 00:41:36,880
जो तुम बता रहे हो और क्या नहीं बात ये है बात ये है कि जैसे वही बात

623
00:41:36,880 --> 00:41:41,040
है ना कि अब जैसे स्वामी दयानंद जी ने कुछ बात बोला ठीक है

624
00:41:41,040 --> 00:41:45,280
अब उन्होंने वो बोल रहे है कि मैं इस चीज को संक्षेप में बता रहा हूं संक्षेप में किसी किताब

625
00:41:45,280 --> 00:41:49,520
में लिखा अब आप कह रहे हो शब्द प्रमाण दो अब शब्द प्रमाण पूरा सुनिए

626
00:41:49,520 --> 00:41:50,480
नहीं आपने आरोप लगाया

627
00:41:50,480 --> 00:41:54,640
पूरा सुनिए अब आपने अब आपने अब मैंने उस शब्द प्रमाण यानी संक्षेप वाला जो था

628
00:41:54,640 --> 00:41:58,720
मैंने शब्द प्रमाण आपको दिखा दिया और शब्द प्रमाण दिखाने के बाद में आप बोलेंगे नहीं विरोध में भी मैं दिखा

629
00:41:58,720 --> 00:42:02,800
दूंगा बल भी लगाते हैं तो उस चीज को मैं एक्सप्लेन करूंगा ूंगा ना एक्सप्लेन कौन करेगा जो उनका शिष्यों को एक्सप्लेन

630
00:42:02,800 --> 00:42:06,800
करेगा। अब आप मेरे को क्या कह रहे हो कि नहीं अगर मैंने उस चीज को एक्सप्लेन किया जो स्वामी देन जो मेरे आचार्य जी

631
00:42:06,800 --> 00:42:10,800
ने लिखा हुआ है उस चीज को मैं एक्सप्लेन करूंगा तो आप कह रहे हो कि नहीं उनको नहीं आता ये प्रूफ हो जाएगा। वाह वाह

632
00:42:10,800 --> 00:42:15,040
वाह वाह बहुत बढ़िया यही काम मैं आपके साथ करूं। नहीं नहीं बात ये है

633
00:42:15,040 --> 00:42:19,600
जी को बोलूं कि उनको नहीं आता था। तो उनके जो प्रामाणिक शिष्य है वो तो है वहां उनकी बात

634
00:42:19,600 --> 00:42:23,680
प्रमाणिक शिष्यों को आता है उनको नहीं आता। अरे भाई वो घोषित करके गए हैं ना।

635
00:42:23,680 --> 00:42:27,920
घोषित नहीं किया है ना। हमें बोला है हमारे शिष्यों को स्वीकार किया है। भाई शिष्य रूप में स्वीकार कर लिया

636
00:42:27,920 --> 00:42:31,920
घोषित किया है। कहां घोषित किया? उन्होंने तो कहा मेरा कोई प्रतिनिधि मुझे कुछ

637
00:42:31,920 --> 00:42:36,000
समझ में नहीं आ रहा है। तुम उन्होंने नहीं उन्होंने बाद में मान लिया ना बाद में पहले

638
00:42:36,000 --> 00:42:40,080
उन्हें लगा बाद में उन्होंने किसको माना किसको माना गुरु विद्यार्थी को माना किसको विद्यार्थी को माना

639
00:42:40,080 --> 00:42:44,480
गुरुदेव विद्यार्थी को माना गुरुदेव विद्यार्थी को माना तुमने तो खुद ही कहा था कि भैया वो

640
00:42:44,480 --> 00:42:48,560
अभी मैंने एक और लाइन बोली वो आप क्यों छोड़ दे रहे पकड़िएगा आगे वाली

641
00:42:48,560 --> 00:42:52,640
बात छोड़ दीजिएगा यही करना है अरे भाई जब तुम ही अपनी बातों को बदलते

642
00:42:52,640 --> 00:42:56,800
हो तुमने मुझसे यह कहा था कि दयानंद जी ने खुद कहा

643
00:42:56,800 --> 00:43:00,800
कि भाई मेरा कोई उत्तराधिकारी बन सके ये मैं किसी शिष्य

644
00:43:00,800 --> 00:43:05,200
में ऐसी वो नहीं देखता हूं तो इसलिए उनका उन्होंने उन्होंने पहले कहा था अच्छा

645
00:43:05,200 --> 00:43:05,700
हां

646
00:43:05,520 --> 00:43:09,600
बाद में उन्होंने मिला क्या कौन मिला क्या नाम बताया तुमने

647
00:43:09,600 --> 00:43:13,760
गुरुदत्त विद्यार्थी उनके तुम विद्यार्थी हो गुरुदत्त विद्यार्थी

648
00:43:13,760 --> 00:43:17,840
से चलते आ रहे हैं हम लोग पूरी परंपरा और भी आचार्य हमारे जो उनके शिष्य बने हैं चलो

649
00:43:17,840 --> 00:43:23,840
ठीक है तो तुम अब ये प्रमाण ले आओ ये वाला इच्छा वाला ठीक है

650
00:43:40,680 --> 00:43:44,680
[संगीत]
