1
00:00:01,960 --> 00:00:06,400
[घंटी की आवाज़] जी जी है ना सवालों का हल मुझे गुरुदेव से मिला जी

2
00:00:06,400 --> 00:00:10,560
सता ये सता वाली बात जो है ना ये मुझे गुरुदेव से मिली थी

3
00:00:10,560 --> 00:00:14,960
जी मुझे इस्लाम से लड़ते टाइम हमेशा मन में आता था कुछ तो है जो

4
00:00:14,960 --> 00:00:19,040
मेरे को आ नहीं रहा है जुबान पे ऐसा होता है अच्छा भैया आप जैसे ये भी मानते

5
00:00:19,040 --> 00:00:23,040
हैं कि जैसे मतलब कि जैसे ईश्वर जो है वो अपने स्वरूप के विरुद्ध कार्य कर सकता है

6
00:00:23,040 --> 00:00:28,160
या नहीं कर सकता जैसे इस वाले पे आप मानते हैं कुछ मतलब स्वरूप भूत लक्षण

7
00:00:28,160 --> 00:00:32,400
जैसे ही जो व्यवहारिक वाला निराकार ईश्वर है ना जैसे करपात्री जी की वो पुस्तक

8
00:00:32,400 --> 00:00:36,400
में लिखा था कि जैसे अगर ईश्वर का स्वरूप है कि स्वरूप के विरुद्ध कार्य नहीं

9
00:00:36,400 --> 00:00:40,800
कर सकता समझो इस बात को हम तब तक संसार

10
00:00:40,800 --> 00:00:44,880
की रचना ईश्वर के द्वारा अभी तक मेरी जानकारी में

11
00:00:44,880 --> 00:00:48,960
जो है वो तब तक हम नहीं कर पाएंगे जब तक हम माया का आलंबन नहीं

12
00:00:48,960 --> 00:00:53,040
लेंगे। पहली बात माया का आलंबन के बिना हम लोग

13
00:00:53,040 --> 00:00:57,440
संसार की रचना नहीं कर पाएंगे ईश्वर के द्वारा। जी जी

14
00:00:57,440 --> 00:01:01,520
तो माया का जब आलंबन ले लेंगे तो उस माया के अंदर आकर

15
00:01:01,520 --> 00:01:05,760
के ईश्वर जब माया ही है तो वो हमको कुछ भी फील करा सकता है।

16
00:01:05,760 --> 00:01:10,240
जी जी है ना जी जब उसने एक से दो ही फील करा दिया या त्रेतवाद

17
00:01:10,240 --> 00:01:14,320
से ले ले तो त्रेत से चार फील करा दिया तो वो कुछ भी फील करा सकता है उस माया के

18
00:01:14,320 --> 00:01:17,200
अंदर वो त्रतवाद वाला थोड़ा सा मतलब उसमें

19
00:01:17,200 --> 00:01:21,360
वो गड़बड़ी था जैसे वो त्रतवाद [गला साफ़ करने की आवाज़] वो तीन कारण मानते हैं जैसे

20
00:01:21,360 --> 00:01:25,520
दुनिया में तो जैसे 10 गाड़ी है 10 मनुष्य है तो वो कार्य है वो तीन कारण मानते

21
00:01:25,520 --> 00:01:29,520
वो ऐसा अच्छा अच्छा अच्छा चलो ठीक है

22
00:01:29,520 --> 00:01:33,680
मगर ये जो जो परम तत्व है जो हमारा वाला अद्वैत का मान लो

23
00:01:33,680 --> 00:01:37,760
अगर इसको मान लेंगे हम जी तो क्या कहते

24
00:01:37,760 --> 00:01:41,920
हैं कि एक मतलब माया से जो है तो माया के

25
00:01:41,920 --> 00:01:45,920
अंदर आके हमें वो कुछ भी फील करा सकता है तो स्वरूप के

26
00:01:45,920 --> 00:01:50,320
विरुद्ध उसका स्वरूप तो वास्तविक वो है ना क्या कहते हैं नित्य

27
00:01:50,320 --> 00:01:54,640
शुद्ध बुद्ध मुक्त वो है जी जी तो

28
00:01:54,640 --> 00:01:58,640
वो करपात्री जी मतलब उसमें मुझे वही वहीं से डाउट हुई जैसे करपा क्योंकि ईश्वर

29
00:01:58,640 --> 00:02:03,040
नित्य है इसलिए खुद का विनाश नहीं कर सकता तो समझ तो ये अल्टीमेट रियलिटी

30
00:02:03,040 --> 00:02:07,360
है ना खुद का विनाश नहीं कर मगर जैसे जैसे जैसे हम कहें

31
00:02:07,360 --> 00:02:11,680
कि ईश्वर किसी की किसी की माता रियलिटी में

32
00:02:11,680 --> 00:02:15,760
किसी को मां बना सकता है किसी की रियलिटी में नहीं बना सकता

33
00:02:15,760 --> 00:02:19,920
मगर यहां तो बन रही है ना मां किसी की तो व्यवहारिक जगत में हम

34
00:02:19,920 --> 00:02:24,160
कहते हैं कि वो सब कुछ कर रहा है और इनका इस्लामियों का ईश्वर यहीं पे खंडित

35
00:02:24,160 --> 00:02:28,240
है यही नहीं कर रहा वो सब कुछ उसमें भी थोड़ा सा और आपसे थोड़ा सा समझना

36
00:02:28,240 --> 00:02:32,400
चाहूंगा बस हां हां जी जी उसमें भी जैसे जो वो पुस्तक मैंने

37
00:02:32,400 --> 00:02:36,400
पढ़ा था ना तो उसमें नास्तिक बाद में शुरू शुरू में क्या करते हैं मतलब करपात्री जो है

38
00:02:36,400 --> 00:02:40,640
वो नास्तिक के सामने ईश्वर का सृष्टि बनाना सिद्ध करते हैं कि जैसे

39
00:02:40,640 --> 00:02:44,800
जो ईश्वर जैसे मटके वाला उदाहरण देते हैं हां कि जैसे अगर कोई

40
00:02:44,800 --> 00:02:48,800
घड़ा बना रहा है तो कुम्हार होगा तभी बन पाएगा मतलब बिना कर्ता के कार्य नहीं

41
00:02:48,800 --> 00:02:53,200
हो सकता तो वो तो और जितना मैंने अद्वैत के वही जो कंटेंजेंट

42
00:02:53,200 --> 00:02:57,520
वाली चीजें इन्होंने पकड़ी है जी जी जावेद अख्तर वाले उसमें

43
00:02:57,520 --> 00:03:01,600
तो उसमें मैंने उसमें यही था कि मैंने जो उपनिषद वगैरह पढ़े थे उसमें ये

44
00:03:01,600 --> 00:03:06,000
था कि क्या बोलते स्लिप हो गया पॉइंट दिमाग से कि

45
00:03:06,000 --> 00:03:10,240
अब जैसे हां जैसे अब ईश्वर जो है वो जो परमार्थिक

46
00:03:10,240 --> 00:03:14,480
ब्रह्म है और जो व्यवहारिक वाला ईश्वर है निराकार जो सर्व्यापक

47
00:03:14,480 --> 00:03:18,640
उसमें कि जो परमार्थिक ब्रह्म है उस वो केवल सच्चिदानंद है

48
00:03:18,640 --> 00:03:22,640
और और अगर उसके और वो उपाधि रहित है हम [गला साफ़ करने की आवाज़]

49
00:03:22,640 --> 00:03:27,200
और अगर उसके साथ कोई उपाधि जुड़ जा रही है जैसे सर्वज्य या सर्वशक्तिमान

50
00:03:27,200 --> 00:03:31,280
या कुछ भी कुछ भी है ना पवित्र इत्यादि अगर हम

51
00:03:31,280 --> 00:03:35,600
कुछ भी जोड़ रहे हैं उसके सामने तो व्यवहार के अनुसार है वो हां तो तो वो व्यवहारिक हो जाएगा

52
00:03:35,600 --> 00:03:39,680
अल्टीमेटली तो तो जैसे जब करपात्री जी जब ये जब ईश्वर

53
00:03:39,680 --> 00:03:43,760
की बात कर रहे थे कि वो नित्य है अनादि अनंत है और सृष्टि करता है

54
00:03:43,760 --> 00:03:47,440
पालन करता है विनाश करता है तो जब वो इस वाले ईश्वर की की के लिए कह रहे हैं

55
00:03:47,440 --> 00:03:51,920
कि वो खुद का विनाश नहीं कर सकता तो ऐसा मतलब प्रतीत होता है कि वो

56
00:03:51,920 --> 00:03:56,000
सगुण निराकार की बात कर रहे हैं। हां बिल्कुल है ना बिल्कुल

57
00:03:56,000 --> 00:04:00,320
सगुण निराकार की ही बात कर रहे हैं और क्या जी जी अब उसमें ये आ जाता है कि अगर सगुण

58
00:04:00,320 --> 00:04:04,320
निराकार का जो स्वरूप है जिसको हम लोग भी मानते हैं तो उसमें ये आ जाता है कि सगुण

59
00:04:04,320 --> 00:04:08,400
निराकार अगर जैसे मान लीजिए कि अगर मैं कहता हूं जैसे सगुण निराकार ईश्वर है वो न्यायकारी

60
00:04:08,400 --> 00:04:12,800
है उनका जो स्वरूप है वो न्यायकारी है यानी मुझे पता चला कि वो अन्याय नहीं कर सकते

61
00:04:12,800 --> 00:04:17,280
अगर वो अन्यायकार कर रहे हैं तो उनका वो न्याय वाला स्वरूप है वो खंडित हो रहा है

62
00:04:17,280 --> 00:04:21,360
हम उसी प्रकार जैसे करपात्री जी ने उसमें उदाहरण दिया कि

63
00:04:21,360 --> 00:04:25,920
ये क्या कहते हैं जन्मांतर जी हां जन्मांतर से वो वैश्या को बना देंगे

64
00:04:25,920 --> 00:04:29,920
तो उसमें उसमें उन्होंने बहुत वो मुझे बहुत अच्छा एग्जांपल लगा क्योंकि उसमें ये पॉइंट आता है

65
00:04:29,920 --> 00:04:34,000
कि क्यों करपादरी जी ने मैं वही समझ रहा था कि कृपा ने ऐसा लिखा क्यों तो मैं

66
00:04:34,000 --> 00:04:38,080
पर्सपेक्टिव से समझ रहा था द्वैत के तो मुझे ये समझ में आया कि जैसे वहां पे ये आता है

67
00:04:38,080 --> 00:04:42,160
कि बाकी मैंने आचार्य जी से भी पूछा था वो जो श्रृंगेरी वाले थे मतलब वो मेरे आचार्य जी से मैंने

68
00:04:42,160 --> 00:04:46,240
पूछवाया था उनसे तो मुझे वो ये समझ में आया कि क्या कहते हैं कि कि

69
00:04:46,240 --> 00:04:50,240
जैसे अगर ईश्वर उसी जन्म में वो जो कुमारी है ऐसा नहीं

70
00:04:50,240 --> 00:04:54,320
कि ईश्वर वो जो वैश्य है उसके ठीक ही नहीं कर सकता वो बिल्कुल कर सकता है। उसके पास सामर्थ्य

71
00:04:54,320 --> 00:04:58,320
है, शक्ति है। लेकिन बात ये आ जाएगी कि अगर वो ऐसा करेगा तो वो फिर

72
00:04:58,320 --> 00:05:02,400
वो बात आएगी कि उसने ऐसा किया क्यों? अगर है ना अगर अगर

73
00:05:02,400 --> 00:05:02,900
हम

74
00:05:02,560 --> 00:05:06,640
ये कहें कि नहीं कर्म फल था उसका ऐसा करने का तो फिर वो बात [गला साफ़ करने की आवाज़] आ जाएगी कि ईश्वर तो

75
00:05:06,640 --> 00:05:10,640
अपना जो कर्म का फल है वो क्या बोलते हैं? जाति आयु भोग के रूप में देता है तो फिर

76
00:05:10,640 --> 00:05:14,640
ये बीच में कैसे दिया? तो यानी एक वो प्रश्न चिन्ह आ जाएगा कि न्यायकारी

77
00:05:14,640 --> 00:05:18,640
वाला कर्म फल वाला कि अगर कर्म का फल इसी प्रकार से नहीं देना था तो

78
00:05:18,640 --> 00:05:22,800
न्यायकारी वाला पॉइंट आ जाएगा। इसीलिए जी ने वहां पे बोला कि नहीं उस जन्म में तो नहीं

79
00:05:22,800 --> 00:05:26,960
लेकिन जन्मांतर में दे देगा। हां हां मगर मगर इसमें पॉइंट ये है ना

80
00:05:26,960 --> 00:05:31,040
कि ये जो जन्मांतर देख पा रहा है ये

81
00:05:31,040 --> 00:05:35,280
कौन व्यक्ति है जो आस्थावान है जी जी

82
00:05:35,280 --> 00:05:39,600
जो ये मानता है कि ईश्वर है वही तो जन्मांतर मानेगा। भैया

83
00:05:39,600 --> 00:05:43,680
इसमें ये पॉइंट आ जाता है थोड़ा सा कि जैसे इसमें बात आ जाती

84
00:05:43,680 --> 00:05:47,760
है कि अगर हम किसी विषय पे चर्चा कर रहे हैं जैसे अवतार हो गया या इस टाइप के जो प्रश्न

85
00:05:47,760 --> 00:05:52,000
हो गए उस पे भी हम चर्चा कर रहे हैं तो उसमें ये होता है कि एक तो प्रत्यक्ष रूप से जान पाना

86
00:05:52,000 --> 00:05:56,000
है ना बिल्कुल वो हम नहीं कर रहे हैं तीन तरीके से चीज या तो

87
00:05:56,000 --> 00:06:00,000
हम अनुमान से जान रहे हैं तो प्रत्यक्ष जान रहे हैं तो शब्द प्रमाण से जान रहे हैं है ना उसमें आता है कि अब

88
00:06:00,000 --> 00:06:04,080
जैसे ईश्वर अवतार ले रहा है मैं इसको भी प्रत्यक्ष नहीं जान रहा हूं तो उस

89
00:06:04,080 --> 00:06:08,080
केस में फिर भी हम कहते हैं कि वो ले सकता है अनुमान से अनुमान

90
00:06:08,080 --> 00:06:12,080
उसी प्रकार से यहां पे जो करपात्री जी कह रहे हैं कि वो जन्मांतर में अवश्य लिख सकते हैं क्योंकि कहा तो

91
00:06:12,080 --> 00:06:16,080
है उन्होंने ये पॉइंट था कि बिल्कुल उन्होंने स्टेटमेंट दी है अर्थात वो क्या आधार पे रहे हैं

92
00:06:16,080 --> 00:06:17,680
कि अनुमान से बिल्कुल ये सिद्ध

93
00:06:17,680 --> 00:06:22,000
है कि वो जन्मांतर में कर सकता है अनुमान प्रमाण से ये पॉइंट नहीं ये मैं

94
00:06:22,000 --> 00:06:26,560
नहीं अब वो बिल्कुल सही बात है मगर जहां

95
00:06:26,560 --> 00:06:30,560
मतलब मैं दूसरी बात कर रहा हूं जो व्यक्ति भौतिकवादी है जी जी

96
00:06:30,560 --> 00:06:34,160
उसके लिए तो जन्मांतर है ही नहीं

97
00:06:34,160 --> 00:06:38,160
नास्तिक के लिए हां नास्तिक के लिए जो व्यक्ति भौतिकवादी है उसके लिए जन्मांतर

98
00:06:38,160 --> 00:06:42,240
नहीं है। ठीक है? उसको तो पहले ईश्वर सिद्ध करना पड़ेगा। हां या बिल्कुल सही बात

99
00:06:42,240 --> 00:06:46,320
पकड़ी तुमने। तो ईश्वर सिद्ध करना पड़ेगा। तो जैसे उसने कहा कि क्या वो कुमारी

100
00:06:46,320 --> 00:06:50,400
को जी वो बना सकता है? हां। वैश्या को कुमारी

101
00:06:50,400 --> 00:06:54,480
बना सकता है। तो अब वैश्या का वैश्या कुमारी हो गई तो इसमें उसकी कोई

102
00:06:54,480 --> 00:06:58,560
शरीर की ऐसी चीज होगी जो भाई क्षति हो जाती हो जो बिल्कुल फ्रेश मिलना चाहिए

103
00:06:58,560 --> 00:07:03,040
हो। है ना? जी जी। तो अब अगर ईश्वर तो बना रहा है जन्मांतर

104
00:07:03,040 --> 00:07:07,200
से। ईश्वर ने वो बॉडी खत्म कर दी। ठीक। जी जी। और एक नई बॉडी दी उसने

105
00:07:07,200 --> 00:07:11,600
ईश्वर ने। ईश्वर तो बना रहा है जन्मांतर से। रियलिटी क्या है कि उसने जन्मांतर

106
00:07:11,600 --> 00:07:15,680
से बनाया। जी। मगर जो भौतिकवादी है जिसको जिसको जिसने

107
00:07:15,680 --> 00:07:19,680
अभी तक विश्वास ही नहीं किया ईश्वर पे वो अपने किन पैमानों से उसको

108
00:07:19,680 --> 00:07:24,080
चेक करेगा कि कुमारी हो गई कि नहीं। भाई जो शारीरिक पैराटर्स होंगे, बायोलॉजिकल

109
00:07:24,080 --> 00:07:28,240
टेस्ट होंगे और फिंगरप्रिंट इत्यादि होंगे। इनसे ही तो वो टेस्ट करेगा कि

110
00:07:28,240 --> 00:07:32,560
वही है कि नहीं। मतलब लेकिन मतलब टेस्ट क्यों करेगा भैया?

111
00:07:32,560 --> 00:07:33,060
मतलब

112
00:07:32,720 --> 00:07:36,720
वो समझ नहीं आ जिसको जिसको जो यह दावा कर रहा है कि भाई इस

113
00:07:36,720 --> 00:07:40,800
लड़की को आप जो है वो बना दो। अब एक कमरे में ले गए

114
00:07:40,800 --> 00:07:45,040
वहां से दूसरा शरीर वापस आया। उस शरीर को नष्ट कर दिया गया। इसमें

115
00:07:45,040 --> 00:07:49,200
छोटा सा पॉइंट था छोटा सा अगर उसमें उसमें ये आ जाता है कि जैसे

116
00:07:49,200 --> 00:07:53,360
अगर हम किसी नास्तिक से बात कर रहे हैं तो सबसे पहले तो ये आ जाएगा कि

117
00:07:53,360 --> 00:07:57,360
क्या वो इस बात को मान रहा है कि ईश्वर कुछ भी कर सकता है या नहीं कर सकता? तो ये भी मानने से

118
00:07:57,360 --> 00:08:01,440
पहले क्या वो ये मान रहा है कि ईश्वर जैसा कुछ होता भी है कि नहीं होता? तो पहले हम उसको ईश्वर बनवा

119
00:08:01,440 --> 00:08:05,680
देंगे। अगर उसने अगर वह मान चुका है कि हां ईश्वर होता है तो बात ख़ हो गई। अगर

120
00:08:05,680 --> 00:08:09,840
ईश्वर मान चुका है तो बात ख़ हो गई। और उसमें यह कि करपात्री जी ने जो वहां पे नास्तिक

121
00:08:09,840 --> 00:08:14,000
को जो है मगर मगर जो अल्टीमेट जो अगर

122
00:08:14,000 --> 00:08:18,080
होगा इंटेलेक्चुअल तो वो यहां तक भी पहुंचेगा बस

123
00:08:18,080 --> 00:08:22,480
ये है। जैसे एक बार एक बार एक वो आया था

124
00:08:22,480 --> 00:08:26,560
मतलब शायद दयानंद जी में आस्था रखता होगा। एक लड़का आया था। जी जी

125
00:08:26,560 --> 00:08:30,640
उसने बोला करके पता नहीं कुछ गलत बात बोली

126
00:08:30,640 --> 00:08:35,360
कि वो यह कर सकता है कि नहीं तो मैंने मैंने बोला

127
00:08:35,360 --> 00:08:39,360
जी जी वो कुछ परमार्थ पे ही प्रश्न किया उसने सीधे क्या वो परमार्थ

128
00:08:39,360 --> 00:08:43,680
में मर सकता है जी जी तो मैंने उससे एक प्रश्न किया तुम परमार्थ पहुंचे

129
00:08:43,680 --> 00:08:47,760
कैसे थे अब मुझे ये बताओ परमार्थ होता क्या है बस ये बता दो होता क्या

130
00:08:47,760 --> 00:08:52,240
है तो होने परमार्थ की बात करने के लिए उसको आस्तिक बनना पड़ेगा ना पहले

131
00:08:52,240 --> 00:08:56,400
आस्तिक बन गया हमारा काम खत्म बिल्कुल पर आस्तिक तुम बने

132
00:08:56,400 --> 00:09:00,400
कैसे? आस्तिक बनोगे सर्वशक्तिमान ईश्वर से ही। जी है ना?

133
00:09:00,400 --> 00:09:04,480
जब ईश्वर की सत्ता को स्वीकार कर लोगे तभी आस्तिक बन पाओगे तो तब तक तुम

134
00:09:04,480 --> 00:09:08,640
परमार्थ को प्रश्न नहीं कर सकते। वही चीज है जो जन्मांतर

135
00:09:08,640 --> 00:09:13,200
भेद से उन्होंने बॉडी दी है दूसरी तो पर ये सब दूसरे ट्रुथ हैं।

136
00:09:13,200 --> 00:09:17,280
ये हमारा जो व्यवहारिक ट्रुथ है वो तो यही है कि भाई हम जिसको जानते थे उसका

137
00:09:17,280 --> 00:09:21,360
नाम ये था। उसके यहां पे तिल था। उसकी ये फिंगरप्रिंट थी। वो सारी मैच हो रही है

138
00:09:21,360 --> 00:09:25,360
और अब इसके शरीर में वो क्षति नहीं है जो वैश्या के कारण

139
00:09:25,360 --> 00:09:29,440
क्षति पहुंच गई थी। जी जी तो भगवान ने तो जन्मांतर वेद से

140
00:09:29,440 --> 00:09:33,520
बनाया। हां मगर जब तक व्यक्ति भगवान को मानता नहीं है

141
00:09:33,520 --> 00:09:37,760
तब तक उसको ये मानना पड़ेगा कि भगवान जो जिसकी बात हो रही है ना सत्ता की

142
00:09:37,760 --> 00:09:41,920
जी तो उसने जो है उसके शरीर को बदल दिया।

143
00:09:41,920 --> 00:09:46,000
तो भैया लेकिन उसमें उस वाली पुस्तक में जो मतलब करदात्री जी ने जो नास्तिक

144
00:09:46,000 --> 00:09:50,160
को मनवाया है वो वो मतलब कर्ता भाव से मनवाया

145
00:09:50,160 --> 00:09:54,320
कि जो ईश्वर है वो जगत का कर्ता है बिना कर्ता के कार्य नहीं हो सकता उस उस भाव से उन्होंने नास्तिक

146
00:09:54,320 --> 00:09:58,400
को पहले मनवाया है कि भाई तुम्हें हर हाल में मानना पड़ेगा अच्छा फिर उन्होंने ये किया कि अगर अगर तुम

147
00:09:58,400 --> 00:10:02,560
ये बात मान गए तो फिर बात आ जाती है कि फिर अगर तुमने ये स्वीकार कर लिया कि अगर

148
00:10:02,560 --> 00:10:03,060
ईश्वर

149
00:10:02,800 --> 00:10:06,800
ने सृष्टि बनाई है तो फिर अगर फिर आती है कि अगर कुम्हार

150
00:10:06,800 --> 00:10:10,800
ने घड़ा बनाया है बना दिया ठीक है मान लिया तो अगर वो बनाया है तो इससे पता चले कि

151
00:10:10,800 --> 00:10:15,280
कुमार में घड़ा बनाने का ज्ञान है। घड़ा बनाने का सामर्थ है। घड़ा बनाने के लिए बल है।

152
00:10:15,280 --> 00:10:19,440
इत्यादि बातों को ऑटोमेटिक क्योंकि इसके बिना बन नहीं सकता। उसी प्रकार से अगर ईश्वर

153
00:10:19,440 --> 00:10:23,520
को हमने मान लिया कि वो सृष्टि करता है तो हमने मान लिया कि उसमें बल है, उसमें ज्ञान है, उसमें

154
00:10:23,520 --> 00:10:27,680
इच्छा है। आदि आदि बातों को हमने स्वीकार कर लिया। तो इससे क्या होता है कि हमें इस

155
00:10:27,680 --> 00:10:31,760
ईश्वर के बारे में मतलब कई सारे लक्षण वक्षण मिल जाते हैं। हमें बहुत सारी बातें पता चल जाती है। सिद्धि

156
00:10:31,760 --> 00:10:36,720
तो मिल जाती है। जी। परंतु हम इस चीज से

157
00:10:36,720 --> 00:10:41,200
उसका कनेक्शन नहीं सिद्ध कर पाते व्यक्ति का

158
00:10:41,200 --> 00:10:45,280
जी कि आपको उस ईश्वर की आवश्यकता क्या है वो है उसने सब बनाया

159
00:10:45,280 --> 00:10:49,360
है वो तो मुक्ति के लिए तो उसमें ऐसा क्या आ रहा है सिद्धि

160
00:10:49,360 --> 00:10:53,360
से कि जो मुक्ति हो जाए उससे नहीं वो वो वाला पॉइंट आपको बहुत बढ़िया है जो आप वो

161
00:10:53,360 --> 00:10:57,360
इच्छा वाला बताते हो ना हां हां वो वो सच्चिदानंद वाला वो बहुत बढ़िया पॉइंट

162
00:10:57,360 --> 00:11:01,680
चाह का विषय तो तभी बनेगा जब वो जब वो वैसी चाहत का विषय हो और चाहत

163
00:11:01,680 --> 00:11:05,680
का विषय यही है कि हम अबाध्य बन जाना चाहते हैं। तो फिर मैंने

164
00:11:05,680 --> 00:11:09,760
थोड़ा सा विचार किया था। उसमें मैंने थोड़ा सा विचार किया तो मुझे समझ में आया कि

165
00:11:09,760 --> 00:11:13,760
जैसे मैंने मतलब इस चीज को समझने के लिए विचार किया था खंडन के लिए

166
00:11:13,760 --> 00:11:18,160
नहीं। मैंने विचार ये किया तो मुझे समझ में आया कि मेरी जो इच्छा है वो

167
00:11:18,160 --> 00:11:22,480
ये नहीं कि बिजली कंट्रोल हो या बारिश रुक जाए। मेरी इच्छा ये है कि जो बारिश

168
00:11:22,480 --> 00:11:26,480
होने के कारण जो मुझे दुख हुआ है वो ना हो। तो वो ना हो। ये

169
00:11:26,480 --> 00:11:30,640
कैसे पॉसिबल है? तो इसका ईश्वर ने बताया बहुत सिंपल सशन कि शरीर छोड़ दो नहीं होगा।

170
00:11:30,640 --> 00:11:34,640
हम हम तो फिर फिर मैं प्रश्न करता हूं कि नहीं मुझे इस शरीर के साथ

171
00:11:34,640 --> 00:11:38,800
जो सुख मिल रहे हैं वो तो चाहिए लेकिन जो दुख मिल रहे हैं वो नहीं चाहिए तो ईश्वर

172
00:11:38,800 --> 00:11:42,800
बोलता है कि बहुत सिंपल है एक काम करो मुक्ति में आ जाओ मतलब मैं अपने लेम लैंग्वेज में

173
00:11:42,800 --> 00:11:46,880
बता रहा हूं खाली उस चीज को बस समझिए कि एक काम करो भाई शरीर छोड़ो मुक्ति में आओ मुक्त अवस्था

174
00:11:46,880 --> 00:11:51,200
में आओ तो उससे क्या होगा कि अब शरीर तो नहीं रहेगा उससे होने वाले दुख तो नहीं रहेंगे

175
00:11:51,200 --> 00:11:55,360
लेकिन वो जो तुम्हारी जो स्थिति रहेगी वो क्योंकि तुम उस तुमने जो योग तपस्या इत्यादि की उससे

176
00:11:55,360 --> 00:11:59,920
तुम्हारी जो लेवल है वो उतना ऊपर उठ चुकी है अब तुम्हें सुख है और जो सुख है वो मैं दूंगा

177
00:11:59,920 --> 00:12:04,000
जैसे है ना तो इस टाइप का तो मगर मगर तुम जो ये कह रहे हो

178
00:12:04,000 --> 00:12:08,480
ना कि दुख मतलब दुख से मुक्ति जी दुख से मुक्ति

179
00:12:08,480 --> 00:12:12,800
में ही छिपा हुआ है अबाध्यता मतलब दुख क्या है प्राकृतिक बाधाओं

180
00:12:12,800 --> 00:12:16,960
से बाधित जी जी दुख कब मिलता है हमें जैसे मैं यहां हूं वहां नहीं

181
00:12:16,960 --> 00:12:21,600
हो सकता ये दुख है तो दुख दुख से

182
00:12:21,600 --> 00:12:25,920
दुख से मुक्ति में ही निहित है प्राकृतिक बाधाओं से बाधित

183
00:12:25,920 --> 00:12:29,920
ना होना क्योंकि प्रकृति से हमें दुख मिलता है हां तो उसमें क्योंकि

184
00:12:29,920 --> 00:12:33,520
इसमें जब हमारा शरीर नहीं रहेगा क्योंकि वो आता है ना मतलब

185
00:12:33,520 --> 00:12:37,760
आता है ये सांख्य में कि जैसे जब तक शरीर है तब तक जैसे त्रिविधता

186
00:12:37,760 --> 00:12:41,760
आपने देखा होगा जैसे तीन बार है ना तीन बार शांति शांति बोलते हैं तो त्रिता

187
00:12:41,760 --> 00:12:46,000
आध्यात्मिक दुख आदि भौतिक दुख और तीसरा वाला आता है तो तीन प्रकार

188
00:12:46,000 --> 00:12:50,080
के तो उसमें एक जो भौतिक वाला होता है वो यही होता है कि मतलब जैसे शरीर के शरीरांतर

189
00:12:50,080 --> 00:12:54,080
से जो प्राप्त हो रहा है एक होता है आत्मा के अंतर से शरीर के अंतर से और एक तीसरा एक और होता है

190
00:12:54,080 --> 00:12:58,160
जो मैं बोलूं तो जो प्राकृतिक दुख है जो मिल रहे हैं वो तो यही है

191
00:12:58,160 --> 00:13:02,240
कि मतलब क्या कहते हैं शरीर है इसीलिए दैविक वाला

192
00:13:02,240 --> 00:13:06,400
कि शरीर है इसीलिए मिल रहा है शरीर नहीं रहेगा हां तो उसकी प्राथमिक डिमांड तो

193
00:13:06,400 --> 00:13:10,400
यही हुई ना कि शरीर ना रहे मेरा प्राथमिक डिमांड जो

194
00:13:10,400 --> 00:13:14,800
है उसकी यह समझने की रही कि कोई ऐसा हो जो प्राकृतिक

195
00:13:14,800 --> 00:13:19,200
प्रकृति पर जिसका कब्जा हो प्राकृतिक नियमों के उसमें हो

196
00:13:19,200 --> 00:13:23,280
वो तो वो तो मोक्ष की स्थिति हो गई ना जब शरीर नहीं है मेरा तो बिल्कुल

197
00:13:23,280 --> 00:13:27,440
मैं बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल सही पॉइंट भैया मैं ये चीज कह रहा हूं कि जो आप एग्जांपल दे रहे थे ना जो

198
00:13:27,440 --> 00:13:31,680
जो आप वो तर्क दे रहे हो ना वो सीधी वाला वो रियल में क्या है कि वो रियल में मुक्ति

199
00:13:31,680 --> 00:13:35,840
की बताता है कि मुक्ति की आवश्यकता है। मुक्ति को सिद्ध करता है। मोक्ष

200
00:13:35,840 --> 00:13:40,080
को सिद्ध करता है। तो जब हम जब हम ये मोक्ष को सिद्ध करने वाला तर्क देते हैं

201
00:13:40,080 --> 00:13:44,320
तो अल्टीमेटली हम उसी दिशा में पहुंचते हैं। जो जो

202
00:13:44,320 --> 00:13:48,400
वहां पे बैठा हुआ ईश्वर है सच्चिदानंद जी बिल्कुल उसी

203
00:13:48,400 --> 00:13:48,900
के पास

204
00:13:48,640 --> 00:13:52,800
पहुंचते हैं। अब उसमें होता ये है इसमें छोटा सा ये आ जाता है कि अब अब जैसे

205
00:13:52,800 --> 00:13:56,880
अगर मैं ये सोचूं कि मुझे प्रकृति को कंट्रोल करना है तो जैसे आज मनुष्य

206
00:13:56,880 --> 00:14:00,880
क्या आज मनुष्य के कंट्रोल में बिजली है आज हम बटन दबाते हैं बिजली हमारे लिए पंखा चलाती

207
00:14:00,880 --> 00:14:04,880
है यानी हमने बिजली को अपने कंट्रोल में किया तो उसी प्रकार हम चीजें सोचते हैं कंट्रोल

208
00:14:04,880 --> 00:14:08,880
लेकिन फिर भी हमें दुख है उसके बावजूद भी दुख है तो ईश्वर हमें बताता है कि

209
00:14:08,880 --> 00:14:12,880
तुम कितनी भी चीजों को कंट्रोल करने का ट्राई कर लो दुख फिर भी रहेगा तो

210
00:14:12,880 --> 00:14:16,960
दुख से तुम ये सोचो कि तुम चीजों को कंट्रोल करो इससे नहीं है दुख मतलब

211
00:14:16,960 --> 00:14:21,040
क्योंकि जैसे जब सृष्टि नहीं रहती है प्रलय काल में तब भी ईश्वर रहता है और

212
00:14:21,040 --> 00:14:25,120
ईश्वर सच्चिदानंद उस अवस्था में भी रहता है। यानी अगर वो चीजों को कंट्रोल करने वाला उस

213
00:14:25,120 --> 00:14:29,120
टाइम नहीं कंट्रोल कर रहा है तो भी वो सुखी है। तो यानी सुखी होने का जो कारण है

214
00:14:29,120 --> 00:14:33,520
वो ये कंट्रोल करना इत्यादि नहीं है। वो एक उसका स्वभाव है कि वो आनंद

215
00:14:33,520 --> 00:14:37,520
है। अब पॉइंट ये आ जाता है कि उसी प्रकार से जैसे जीव है वो क्या करता है कि अगर

216
00:14:37,520 --> 00:14:41,640
वो उस चीज से ये तो वो जीव को समझ में आता है कि नहीं यार

217
00:14:41,640 --> 00:14:45,680
[गला साफ़ करने की आवाज़][नाक से की जाने वाली आवाज़] भी मैं पावर गेन कर लूं, पैसा गेन कर लूं, प्रकृति कंट्रोल कर लूं। दुख फिर भी कहीं ना कहीं रह

218
00:14:45,680 --> 00:14:49,920
रहा है। मान लेते हैं कि प्रकृति से होने वाला दुख नहीं है। मान लेते हैं कि

219
00:14:49,920 --> 00:14:53,920
शरीर से होने वाला दुख है। लेकिन अंदर तो दुख है। राग, द्वेष इत्यादि किसी ने मुझे

220
00:14:53,920 --> 00:14:58,080
प्रेम में धोखा दिया। अब मेरा मन दुखी हो रहा है। यानी वो दुख फिर भी कहीं वो तीसरा दुख

221
00:14:58,080 --> 00:15:02,080
रह ही जाएगा। तीनों प्रकार के दुख जब तक शरीर है तब तक मतलब हट

222
00:15:02,080 --> 00:15:03,680
ही नहीं सकता। तो लास्ट में नहीं नहीं

223
00:15:03,680 --> 00:15:07,920
वो वो मैं समझ रहा हूं। मगर प्रारंभिक जो है ना प्रारंभ

224
00:15:07,920 --> 00:15:12,720
वो तो यहां से करना पड़ेगा ना कि कोई हो जो प्राकृतिक बाधाओं के परे हो।

225
00:15:12,720 --> 00:15:16,800
तो वह ईश्वर है क्योंकि उसका शरीर इत्यादि नहीं है तो उसको प्रकृति का भी कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसे

226
00:15:16,800 --> 00:15:20,800
अगर आता है तो नहीं तो मगर यह वाली प्राकृतिक बाधा से

227
00:15:20,800 --> 00:15:25,120
बाधित हो गया ना वो प्राकृतिक बाधाओं से परे हो मतलब

228
00:15:25,120 --> 00:15:29,120
ईश्वर तो हो वो मतलब परे वाला तो हो जिसको कोई दुख नहीं है। सबसे मुक्त है

229
00:15:29,120 --> 00:15:33,200
वो। मगर वो इस प्राकृतिक बाधा से भी बाध्य ना हो ना कि वो यहां ये

230
00:15:33,200 --> 00:15:37,440
कर सकता है। व्यवहार आ सकता है। व्यवहार में कर सकता है। उससे बाध्य ना हो।

231
00:15:37,440 --> 00:15:41,440
जैसे ये तो ये तो हमने सिद्ध करना है ना। जैसे ये जो अभी आप कह रहे हो

232
00:15:41,440 --> 00:15:45,520
वो तो इसी को सिद्धि वाला ही पॉइंट है कि वो कुछ भी कर सकता है वाला विषय

233
00:15:45,520 --> 00:15:49,520
तो इसीलिए वो तो अभी तो वो चीज अभी हम उस

234
00:15:49,520 --> 00:15:53,520
ऑनगोइंग स्टेप में ही थे मतलब सिद्धि वाले में तो वो जो मुक्ति वाला जो आपका तर्क है

235
00:15:53,520 --> 00:15:57,680
ना उस मैंने उसमें विचार किया था तो मुझे उसमें यही लगा कि भैया ने जो बात

236
00:15:57,680 --> 00:16:01,760
रखी हुई है वहां पे वो मुक्ति के रियल में डिमांड है वो जो मुक्ति

237
00:16:01,760 --> 00:16:05,840
की डिमांड से है और उस डिमांड से ही यह निश्चित

238
00:16:05,840 --> 00:16:10,080
हो जाता है कि कोई है जो प्राकृतिक बाधाओं से मुक्त मुक्त है।

239
00:16:10,080 --> 00:16:14,160
हां हां बिल्कुल बिल्कुल सही भी है। बिल्कुल सही है। है ना? तो प्राकृतिक बाधा एक ये

240
00:16:14,160 --> 00:16:18,160
भी है कि मैं संसार में आऊं जाऊं अपनी उस बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल अब

241
00:16:18,160 --> 00:16:18,720
उसमें अब

242
00:16:18,720 --> 00:16:22,800
हम अब हमारी यानी मूल चाह जैसे आप कहते हो ना मूल चाह क्या है?

243
00:16:22,800 --> 00:16:26,880
मूल मूल जो चाह है वो हमारी ये नहीं कि हम प्रकृति को कंट्रोल करें। मूल जो चाह हमारी

244
00:16:26,880 --> 00:16:31,040
ये है कि मुक्ति वो मूल चाह है। यानी चाह

245
00:16:31,040 --> 00:16:35,200
वो मूल चाह है। तो उस चीज से सिद्धि होती है। बाकी भैया मैं आपको और समय

246
00:16:35,200 --> 00:16:38,960
मतलब आगे दोबारा हमारी बातचीत होती रहेगी। इसको इस तरीके से भी देखना। अच्छा

247
00:16:38,960 --> 00:16:43,360
इस विषय में तुम्हारा क्या पक्ष है कि ये जो है ईश्वर

248
00:16:43,360 --> 00:16:44,960
सृष्टि बनाता कैसे है

249
00:16:44,960 --> 00:16:49,120
यहां से क्या है सृष्टि कैसे जी उसमें भी हम लोग ये मानते हैं कि एक तो जैसे

250
00:16:49,120 --> 00:16:53,200
निराकार सर्व जैसे तुमने कहा ना तीन तत्व है वो तीन कारण है जो

251
00:16:53,200 --> 00:16:57,200
प्रत तत्व नहीं थे कारण थे तीन जी है ना जी

252
00:16:57,200 --> 00:17:01,200
तो तत्व क्या माने हैं आपने कितने माने हैं जी मैं

253
00:17:01,200 --> 00:17:05,280
बताता हूं देखिए उसमें मुख्य रूप से तो जो मुख्य रूप से तो ईश्वर

254
00:17:05,280 --> 00:17:09,360
जीव प्रकृति ये तीन आ जाते हैं तो तीन ही तत्व है हां मुख्य रूप से तीन

255
00:17:09,360 --> 00:17:13,440
है बाकी कुछ गौ माने जाते हैं जैसे दिशा काल आकाश इनको भी नित्य माना जाता है

256
00:17:13,440 --> 00:17:17,440
लेकिन ये कांसेप्ट मात्र है और हां द्रव्य है लेकिन द्रव्य है

257
00:17:17,440 --> 00:17:21,440
लेकिन वो ईश्वर जीव प्रकृति जैसे द्रव्य नहीं है गुण इनमें माने माने जाते हैं लेकिन अलग माने जाते हैं अच्छा

258
00:17:21,440 --> 00:17:25,600
जो हम त्रतवाद कहते हैं इसको वैसे कह सकते हैं वैचारिक तत्व

259
00:17:25,600 --> 00:17:29,920
जो बिल्कुल बिल्कुल सही है बिल्कुल सही वैचारिक तत्व बहुत सही वो जो दिशा

260
00:17:29,920 --> 00:17:33,920
काल आकाश वो वैचारिक तत्व है और ये ये एक्चुअल तत्व ऐसे कह सकते हैं

261
00:17:33,920 --> 00:17:38,000
अब इसमें आ जाता है कि जब हम त्रितवाद कहते हैं यानी तीन कारण मतलब वो ये तीन

262
00:17:38,000 --> 00:17:42,000
कारण कर पाते तीन कारण भी तीन तत्व भी हां अब इसमें

263
00:17:42,000 --> 00:17:46,080
कैसे है कैसे सेट है इसके अंदर यह है कि जैसे एक होता है निमित्त कारण

264
00:17:46,080 --> 00:17:50,080
एक होता है उपादान कारण एक होता है साधारण कारण तो निमित्त कारण में ईश्वर

265
00:17:50,080 --> 00:17:54,160
भी है जीव भी है जैसे है ना जैसे मैंने मटका बनाया तो यहां पे निमित्त

266
00:17:54,160 --> 00:17:58,560
मैं हुआ तो निमित्त कारण मैं हूं और पूरे ब्रह्मांड को ईश्वर ने बनाया तो ब्रह्मांड का निमित्त ईश्वर है ऐसा

267
00:17:58,560 --> 00:18:00,000
तो निमित्त में जीव भी है ईश्वर

268
00:18:00,000 --> 00:18:04,160
भी है फिर उपादान उपादान अर्थात किससे बनाया जैसे मम्मी ने रोटी बनाया तो रोटी

269
00:18:04,160 --> 00:18:08,160
किससे बनाया आटे से बनाया तो आटा उपदान हो गया रोटी से बनाया घड़ा फिर साधारण

270
00:18:08,160 --> 00:18:12,240
कारण में बाकी सारी चीजें साधारण कारण है। जैसे बनाने में समय लगा, बनाने में जान

271
00:18:12,240 --> 00:18:16,240
लगा, बनाने में बल लगा है ना? तो वो सारी की सारी चीजें उसमें

272
00:18:16,240 --> 00:18:20,560
आ जाती है साधारण कारण में। हम तो वो तो तीन कारण नहीं तो इसमें

273
00:18:20,560 --> 00:18:24,640
एक ये दिक्कत नहीं आती कि जब वो निर्गुण निराकार

274
00:18:24,640 --> 00:18:28,720
है एक रस है और व्यवहार में ना आ सकने वाला

275
00:18:28,720 --> 00:18:32,720
है तो व्यवहार में आ कैसे रहा है? उसको एक ही

276
00:18:32,720 --> 00:18:36,720
मानते हैं अभी हम लोग। मतलब जो व्यवहार में ना सीखने वाला और राखने वाला ना उसको हम एक ही ईश्वर मानते हैं।

277
00:18:36,720 --> 00:18:40,720
तो परिवर्तन हो रहा है ना यह दिक्कत है। वो

278
00:18:40,720 --> 00:18:44,960
व्यवहार में नहीं आ सकता। पहला स्टेप ये है प्रलय

279
00:18:44,960 --> 00:18:49,040
काल में जो ईश्वर की जो स्थिति है स्टेट वो

280
00:18:49,040 --> 00:18:53,200
व्यवहार में ना आने वाली है। लेकिन भैया प्रलय काल में तो देखिए उसमें पॉइंट आ जाता है कि प्रलय

281
00:18:53,200 --> 00:18:57,440
काल में उसको व्यवहारिक रूप से जानने वाला कोई नहीं है। इसीलिए वो बात आ रही है ना।

282
00:18:57,440 --> 00:19:01,520
मतलब ऐसी कोई स्टेट है ही नहीं जब वो व्यवहार में ना आ सकने वाला है। जैसे अगर

283
00:19:01,520 --> 00:19:05,600
जैसे अगर मैं हूं मैं मैं उसको ऐसी अवस्था में हूं कि मैं उसे एक्सपीरियंस कर सकता हूं तो

284
00:19:05,600 --> 00:19:09,920
बिल्कुल वो रहेगा। प्रलय वही ईश्वर रहता है। मतलब वहां साक्षी नहीं है इसलिए वो व्यवहार

285
00:19:09,920 --> 00:19:13,920
में ना आ सकने वाला है। जी जी बिल्कुल बिल्कुल अब उसमें ये होता है कि अब जैसे

286
00:19:13,920 --> 00:19:15,040
हम ये मानते हैं तो मतलब

287
00:19:15,040 --> 00:19:19,040
जो ईश्वर है वो फिर जो जैसे जो ये मैंने ये वाला

288
00:19:19,040 --> 00:19:23,120
जो पॉइंट बोला कि वो काम कर रहा है जब जी जी तो कम ज्यादा हो

289
00:19:23,120 --> 00:19:27,200
रहा है। उसमें क्या करेंगे? शगुण सगुण तो कम ज्यादा वाले

290
00:19:27,200 --> 00:19:31,440
को ही कह रहा है ना गुण तभी आ रहा है जब वो काम कर रहा है उसमें भी

291
00:19:31,440 --> 00:19:35,840
सगुण निर्गुण का हमारा ये रहता है कि शास्त जैसे जब

292
00:19:35,840 --> 00:19:39,840
निर्गुण यानी गुण रहित सगुण यानी गुण सहित तो उसमें ये होता है कि जो

293
00:19:39,840 --> 00:19:43,920
जो गुण ईश्वर में नहीं है जैसे नीचता धूर्तता इत्यादि

294
00:19:43,920 --> 00:19:48,080
मतलब जो भी है वो ईश्वर में नहीं है इसलिए निर्गुण है और सर्वजता सर्वशक्तिमत्ता

295
00:19:48,080 --> 00:19:52,080
इत्यादि गुण से सहित है इसलिए वो सगुण है तो स्वरूप स्वरूप भूत

296
00:19:52,080 --> 00:19:56,240
लक्षण क्या है उसके तो स्वरूपभूत लक्षण जो है

297
00:19:56,240 --> 00:20:00,240
ये पूरा दोनों मिलाकर के स्वरूप बनेगा। अच्छा इसमें एक और बात आती है कि महर्षि

298
00:20:00,240 --> 00:20:04,560
ने बताया कि संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो निर्गुण और सगुण दोनों ना हो।

299
00:20:04,560 --> 00:20:08,560
यानी यानी मैं भी निर्गुण हूं, सगुण भी हूं। क्यों? बहुत से गुण मुझ में है। बहुत से गुण नहीं

300
00:20:08,560 --> 00:20:12,800
भी है। नहीं दिक्कत ये आएगी। दिक्कत ये आती है ना कि वो एक रस

301
00:20:12,800 --> 00:20:16,800
वाली बात फिर कहां चली जाएगी? एक बताता हूं। एक रस वाला [गला साफ़ करने की आवाज़] एक बार थोड़ा सा वो प्रश्न को

302
00:20:16,800 --> 00:20:21,280
थोड़ा सा रख दीजिए तो मुझे वो रिमाइंड हो जाएगा। देखो मैंने प्रश्न बहुत सिंपल है

303
00:20:21,280 --> 00:20:25,440
कि ईश्वर सब जगह एक बराबर है। ये हो गया निर्गुण क्योंकि

304
00:20:25,440 --> 00:20:29,440
वो एक बराबर है इसलिए व्यवहार में ना आ सकने वाला है। जी जी ठीक है।

305
00:20:29,440 --> 00:20:30,400
अब क्या हुआ

306
00:20:30,400 --> 00:20:35,360
कि अब क्या हुआ कि ईश्वर जो है

307
00:20:35,360 --> 00:20:39,360
ईश्वर जो है अपनी शक्ति के रूप में मतलब जो कार्य कार्य

308
00:20:39,360 --> 00:20:43,360
करने वाले रूप में जी जी तो अब वो सगुण निराकार वाले रूप में अब वो

309
00:20:43,360 --> 00:20:47,440
काम कर रहा है। अब वह जो है जहां पर ज्यादा पावर लगनी है वह ज्यादा पावर के

310
00:20:47,440 --> 00:20:51,680
रूप में लग रहा है और जहां कम पावर लगनी है वहां कम पावर के रूप में लग रहा है।

311
00:20:51,680 --> 00:20:55,760
तो यह हो गया सगुण क्योंकि अब वो व्यवहारिक हो गया है। किसी के

312
00:20:55,760 --> 00:21:00,160
लिए धक्के का विषय है, किसी के लिए उठाने का जो भी बल लगते हो सृष्टि

313
00:21:00,160 --> 00:21:04,400
रचना के लिए वो सब उनका व्यवहार का विषय हो गया है। जी जी तो अब वो

314
00:21:04,400 --> 00:21:08,960
व्यवहार का विषय हुआ तो ईश्वर का जो नित्य स्वरूप था जी

315
00:21:08,960 --> 00:21:12,960
कि वो एक रस है बिल्कुल कम ज्यादा नहीं है कहीं उसमें

316
00:21:12,960 --> 00:21:17,680
गड़बड़ी आ रही है उसमें भैया ये पॉइंट आता है ना कि शास्त्रों में

317
00:21:17,680 --> 00:21:21,680
मैंने मतलब जितना मैं बता रहा हूं कि जो एक रस वाली जो बात आती है ना ईश्वर के

318
00:21:21,680 --> 00:21:25,840
लिए वो इस सेंस में आती है कि एक रस हम किस पैमाने पे कह रहे हैं तो बात

319
00:21:25,840 --> 00:21:29,920
हम कह रहे हैं कि जैसे ईश्वर कोई देख नहीं रहा है नहीं नहीं जैसे बताता हूं

320
00:21:29,920 --> 00:21:33,920
जैसे मान लीजिए कि ईश्वर सर्वव्यापक है। ठीक है? तो ऐसा नहीं है कि सर्वव्यापक

321
00:21:33,920 --> 00:21:38,240
ईश्वर जो अमेरिका में जो व्यापक है वो वाला ईश्वर सर्वशक्तिमान

322
00:21:38,240 --> 00:21:42,240
नहीं है। अल्पशक्तिमान है और जो भारत में सर्वशक्तिमान है वो ज्यादा शक्तिमान है। ये ऐसा

323
00:21:42,240 --> 00:21:45,440
नहीं है कि भारत वाला ईश्वर तो दयालु है। पाकिस्तान वाला ईश्वर जो है

324
00:21:45,440 --> 00:21:49,440
वो दयालु नहीं है। यानी गुण कहीं भी कहीं भी स्थिति में गुणों

325
00:21:49,440 --> 00:21:53,600
में क्योंकि हम जैसे किसी को जान रहे हैं तो कैसे जाने? उसके गुणों से ही जान रहे हैं। गुण नहीं

326
00:21:53,600 --> 00:21:57,600
तो काम ही खत्म। है ना? तो उसके गुणों में कहीं पे भेद

327
00:21:57,600 --> 00:22:01,600
नहीं आता। जब गुणों में कहीं भी भेद नहीं आता तब उस आधार पर उसको एक रस

328
00:22:01,600 --> 00:22:05,680
बोलते हैं। तो यहां पे होता यह है कि नहीं जैसे यहां भेद

329
00:22:05,680 --> 00:22:09,760
वाली जो बात आई कि उसके गुणों में भेद नहीं आता है। जी जी अब प्रॉब्लम

330
00:22:09,760 --> 00:22:13,920
यही है ना बस सबसे बड़ी प्रॉब्लम यहीं पर है। जी प्रॉब्लम क्या है

331
00:22:13,920 --> 00:22:18,640
कि अगर ईश्वर की शक्ति अलग होती जी

332
00:22:18,640 --> 00:22:23,280
मुसलमान की तरह। जी जी तो हम ये मान लेते कि उसमें

333
00:22:23,280 --> 00:22:27,440
जो है भेद नहीं आता। ठीक है। जी।

334
00:22:27,440 --> 00:22:31,600
अब दिक्कत क्या है कि जहां पे पहाड़ [गला साफ़ करने की आवाज़]

335
00:22:31,600 --> 00:22:35,760
उठाया जा रहा है जी जी मान के सपोज करिए जी तो वहां पावर

336
00:22:35,760 --> 00:22:39,920
ज्यादा लगेगी और जहां मटका उठाया जा रहा है मिट्टी का एक ढीला उठाया

337
00:22:39,920 --> 00:22:43,920
जा रहा है वहां पावर कम लगेगी। जी जी तो पावर कम ज्यादा जो लग

338
00:22:43,920 --> 00:22:48,080
रही है जी जी वो तो भेद है ना भैया उसमें उसमें

339
00:22:48,080 --> 00:22:52,160
ये बात आ जाती है ना वहां पावर है पूरी पावर है तुमने जो पहला कहा ना

340
00:22:52,160 --> 00:22:56,240
कि वहां अमेरिका में कम पावर वाला यहां वो है मगर जब

341
00:22:56,240 --> 00:23:00,320
वो कार्य कर रहा है वो कार्य नहीं कर सकता जो बराबर पावर वाला सब

342
00:23:00,320 --> 00:23:00,820
जगह

343
00:23:00,560 --> 00:23:04,640
है वो कार्य नहीं कर सकता कार्य तो तभी करेगा जब वो भेद ला पाए अपने

344
00:23:04,640 --> 00:23:08,720
अंदर मतलब जो पहाड़ उठाने में जो शक्ति लग रही है मान लो अगर शक्ति

345
00:23:08,720 --> 00:23:12,960
का कोई पैमाना होगा जो तुम जानते होगे शायद जी जी तो का पहाड़ उठाने

346
00:23:12,960 --> 00:23:17,200
में जिस जो पैरामीटर है मान लो 10 10 अंक वाली शक्ति जी जी

347
00:23:17,200 --> 00:23:20,000
समझिए तो फिर मिट्टी का ढेला उठाने [गला साफ़ करने की आवाज़]

348
00:23:20,000 --> 00:23:24,160
में तो दो पावर वाली लगेगी और अगर नहीं लगेगी तो वो अपनी निश्चित दूरी से ज्यादा

349
00:23:24,160 --> 00:23:28,160
आगे जाएगी फिर अगर पहाड़ वाली ताकत उसमें लग जाएगी तो तो भेद

350
00:23:28,160 --> 00:23:32,160
तो लाना ही पड़ेगा तभी तो सृष्टि रचना हो पाएगी उसमें भैया ये

351
00:23:32,160 --> 00:23:36,160
ये बात आ जाता है ना कि उस केस में ये जो पॉइंट है ना कि इस वाले प्रश्न

352
00:23:36,160 --> 00:23:40,560
को एड्रेस किया है महर्षि ने तो उसमें [गला साफ़ करने की आवाज़] से ये सेम प्रश्न पूछा सत्यार्थ

353
00:23:40,560 --> 00:23:45,040
प्रकाश में ही है वो वाला तो उसमें वो मानते हैं उसमें वो कहते हैं कि बिल्कुल जैसे जो जीव है

354
00:23:45,040 --> 00:23:49,040
वो वो अपनी इच्छा से चाहे हाथ उठाए चाहे हाथ की उंगली उठाए है ना कंट्रोलोल्ड

355
00:23:49,040 --> 00:23:53,120
उसकी शक्ति उसी प्रकार से ईश्वर भी कंट्रोल है क्योंकि वो बुद्धिमान है वो इस प्रकार की अपना

356
00:23:53,120 --> 00:23:57,200
शॉर्टकट में उसको बोलते हैं तो उसमें यही बात आ सकती है कि लेकिन जो उसको एक

357
00:23:57,200 --> 00:24:01,280
रस मानते हैं एक रस का क्या कारण है वो वो वो मैं नहीं जा रहा हूं यहीं पे बस यही

358
00:24:01,280 --> 00:24:05,280
हमें क्लियर करना है जी कि जो उंगली

359
00:24:05,280 --> 00:24:09,440
उठा सकता है ठीक है तो वो इसलिए उठा सकता है क्योंकि उसके पास भेद है

360
00:24:09,440 --> 00:24:13,760
बल बल है। हां बल भी है और भेद भी है। मतलब रेगुलेट

361
00:24:13,760 --> 00:24:17,920
मतलब उसको कंट्रोल है। उसको अपने बल के ऊपर कंट्रोल है। कंट्रोल है। चलो

362
00:24:17,920 --> 00:24:22,160
ठीक है। कंट्रोल है। मगर जो जो कंट्रोल करके वो

363
00:24:22,160 --> 00:24:26,240
जो जो बल लगा जी जी जी 10 नंबर और दो नंबर ये

364
00:24:26,240 --> 00:24:30,320
दोनों अलग-अलग बल है क्वांटिटी में। ठीक है? अब ये जो बल

365
00:24:30,320 --> 00:24:34,800
है ये उससे अलग नहीं है। ईश्वर से

366
00:24:34,800 --> 00:24:35,300
है

367
00:24:35,040 --> 00:24:39,200
ना? तो ये बल के रूप में ईश्वर में भेद है। ये कम बल है या

368
00:24:39,200 --> 00:24:43,600
ज्यादा भेद है? इसको मानते नहीं है अभी हम लोग। क्यों नहीं मानते?

369
00:24:43,600 --> 00:24:47,760
क्यों पता है यहां पे यहां पे वो अद्वैत की बात आती है। हां बिल्कुल

370
00:24:47,760 --> 00:24:51,760
सही। यहां क्या होता है? यहां अद्वैत की बात क्यों

371
00:24:51,760 --> 00:24:56,160
आती है? जी कि सबसे पहले तो ईश्वर सर्वव्यापक

372
00:24:56,160 --> 00:25:00,480
वो वाला सच्च जो सत्यम ज्ञान अनंतम ब्रह वाला।

373
00:25:00,480 --> 00:25:05,360
तो एक तो ये चीज हो गई। अब मैं वो बता रहा था यहां पे अद्वैत क्यों आता है

374
00:25:05,360 --> 00:25:07,600
कि

375
00:25:07,600 --> 00:25:12,000
क्या कहते हैं सबसे पहले हो गया सत्यम ज्ञानम अंतम ब्रह्म ठीक है जी जी

376
00:25:12,000 --> 00:25:16,080
अब अब भाई अगर आपको कुछ भी करना है ब्रह्म

377
00:25:16,080 --> 00:25:20,160
से कुछ भी करवाना है तो सबसे पहले उसमें चेंजेज आ जाएंगे फिर वो नित्यता भंग हो जाएगी शाश्वतता

378
00:25:20,160 --> 00:25:24,160
भंग हो जाएगी तो अब कैसे करें जी तो उनकी जो

379
00:25:24,160 --> 00:25:28,240
अभिन्न स्वरूप भूता शक्ति है माया जी जी है ना तो

380
00:25:28,240 --> 00:25:32,240
फिर माया से माया से एक दुनिया रचित हो गई अब इस माया से

381
00:25:32,240 --> 00:25:36,400
जो हम दुनिया रचित देख रहे हैं संसार आकाश खाली स्पेस

382
00:25:36,400 --> 00:25:40,400
पड़ा है अभी कुछ नहीं है। इस संसार में वो जो निर्गुण निराकार

383
00:25:40,400 --> 00:25:44,720
परमेश्वर है है ना वो है ठीक है वो सब जगह

384
00:25:44,720 --> 00:25:48,800
है बराबर एक रस अब क्या हुआ क्योंकि ये माया रूपी संसार

385
00:25:48,800 --> 00:25:52,960
है तो वो होते हुए भी उसने एक और अपना

386
00:25:52,960 --> 00:25:57,040
वहां पर एक और रूप प्रकट किया जो बिना दिखाई दिए मिट्टी

387
00:25:57,040 --> 00:26:01,040
के कणों को इकट्ठा कर देता है सूर्य को टांग देता है चंद्रमा को टांग देता है ये सब कर देता

388
00:26:01,040 --> 00:26:02,800
है बिना दिखाई दिए निराकार

389
00:26:02,800 --> 00:26:07,200
रूप से तो यह उसका अवतार होता है पहला सगुण निराकार

390
00:26:07,200 --> 00:26:11,280
जी जी यह अवतार हो जाता है क्योंकि उसकी एक रास्ता भंग नहीं

391
00:26:11,280 --> 00:26:15,600
होनी चाहिए जो जो है वो एक रास्ता है फिर भी उसका एक अवतार हुआ

392
00:26:15,600 --> 00:26:19,680
और जब हमने ये अवतार मान लिया तो फिर हमारा आगे का कांसेप्ट आ जाता है कि भाई जब यह मान

393
00:26:19,680 --> 00:26:24,000
रहे हैं हम यहां से ये यहां आ रहा है अपनी नित्यता को छोड़ते हुए तो अवतार

394
00:26:24,000 --> 00:26:28,240
मानना पड़ा तो फिर हम अगला अवतार मानते हैं उस

395
00:26:28,240 --> 00:26:32,320
ये बात आ जाती है ना कि जैसे अगर इस वाले चीज को आप अवतार कह रहे हैं तो क्या ये

396
00:26:32,320 --> 00:26:36,480
केवल मतलब संप आपके संप्रदाय में माना है या फिर जो मूल मूल

397
00:26:36,480 --> 00:26:40,640
शास्त्र है उसमें भी माना है। ये वाला प्रश्न आ जाता है। अब शास्त्रों का अर्थ तो लिया ही है। अब वो

398
00:26:40,640 --> 00:26:44,720
वही अर्थ दूसरा संप्रदाय माने या ना माने आर्य समाज माने या ना माने मगर शास्त्रों का

399
00:26:44,720 --> 00:26:49,280
अर्थ तो लिया ही है। जैसे हां जैसे अगर आचार्यों ने भी अगर ये शास्त्र जैसे मैं बताऊं

400
00:26:49,280 --> 00:26:53,360
है क्या? जैसे एक जगह पे मुंडकोपनिषद में मांडक उपनिषद में कह दिया गया

401
00:26:53,360 --> 00:26:57,520
कि भाई ईश्वर व्यवहार में ना आ सकने वाला है। तो ये हो गया निर्गुण निराकार।

402
00:26:57,520 --> 00:27:01,520
जी। ठीक। अब जो है ईश्वर की वो शक्ति भी बताई गई है। अविद्या

403
00:27:01,520 --> 00:27:05,600
माया इत्यादि के रूप में कई कई जगह बताई गई है। है ना? तो माया हो

404
00:27:05,600 --> 00:27:09,840
गई। माया हो गई। अब तीसरी बात क्या हो गई कि जो है

405
00:27:09,840 --> 00:27:13,920
अब ईश्वर जो है उसका निर्गुण मेरे पास वो है शास्त्रों के प्रमाण

406
00:27:13,920 --> 00:27:17,840
लिखे हुए हैं। बाकी इस वाले विषय क्योंकि अभी मैं थोड़ा सा ध्यान नहीं

407
00:27:17,840 --> 00:27:23,840
दे पा रहा हूं। हां बताता हूं।

408
00:27:39,790 --> 00:27:43,790
[संगीत]
